Question
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भारत में प्रथम चरण के क्रांतिकारी राष्टवाद के उद्भव के कारणों को स्पष्ट करते हुए इसकी प्रमुख विशेषताओं की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द/10 अंक) Explain the reasons for the emergence of first stage revolutionary nationalism in India and discuss its main features. (150 to 200 words/10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में प्रथम चरण के क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के बारे में जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के उद्भव के कारणों को सूचीबद्ध कीजिये 3- दुसरे भाग में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की प्रमुख विशेषताओं की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| 1890 के दशक में राजनीतिक हत्याओं का दौर प्रारम्भ हुआ लेकिन स्वदेशी आन्दोलन के विफलता के पश्चात ही राष्ट्रीय आन्दोलन में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद एक मुख्य प्रवृति बन पायी| क्रांतिकारियों लक्ष्य अंग्रेजों को हिन्दुस्तान से निकालना था| ग़दर आन्दोलन ने स्वतंत्रता के पश्चात भारत में गणतंत्र की स्थापना का लक्ष्य रखा| इस चरण में भारतीय क्रांतिकारी राष्ट्रवादियों ने न केवल भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की स्वतंत्रता के लिए क्रांतिकारी गतिविधियाँ संपन्न की| जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है क्रांतिकारी गतिविधियाँ हिंसात्मक तरीकों पर आधारित थीं| अलोकप्रिय अधिकारियों की हत्याएं, सरकारी खजाने को लूटना आदि इनकी मुख्य गतिविधियाँ थीं| भारत में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के उदय के पीछे अनेक कारक उत्तरदायी थे| क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के उदय के कारण सरकार की दमनकारी नीति, स्वदेशी आन्दोलन के दौरान गरमदलीय नेतृत्व पर सरकार के द्वारा प्रहार किया गया| इससे आन्दोलन नेतृत्व विहीन हो गया और युवाओं ने क्रान्ति एवं हिंसा का मार्ग अपना लिया कांग्रेस की संगठनात्मक कमजोरी के कारण युवाओं को दिशा न दिखा पाना नरम दलीय नेतृत्व एवं उनकी कार्यशैली से युवाओं में असंतोष था| अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क्रांतिकारी गतिविधियाँ हो रही थी इसी समय जापान का एक बड़ी शक्ति के रूप में उदय हुआ था विवेकानंद, दयानंद सरस्वती तथा अरविन्द घोष जैसे बुद्धिजीवियों के विचारों व लेखों ने युवाओं में निडरता तथा आत्मविश्वास की भावना का संचार किया| क्रांतिकारी राष्ट्रवाद कीविशेषताएं युवाओं को अपने साथ जोड़ने के लिए पत्रिकाओं के माध्यम से क्रांतिकारी विचारों का प्रसार किया जाता था इसके साथ ही क्रांतिकारी गतिविधियों ने भी युवाओं को प्रभावित व आकर्षित किया क्रांतिकारी गतिविधियाँ प्रायः संगठित रूप से होती थीं किन्तु इनका संचालन गुप्त रूप से होता था| आन्दोलन का प्रसार भारत के विभिन्न शहरों के साथ साथ यूरोप, अमेरिका, कनाडा, फ़्रांस, जर्मनी तथा दक्षिण पूर्व के एशिया के कई राष्ट्रों तक हुआ आन्दोलन का मुख्य आधार शहरी पृष्ठभूमि के शिक्षित युवा थे हालांकि गदर आन्दोलन में आम लोगों के बीच भी क्रांतिकारी चेतना का प्रसार देखा गया| प्रथम चरण में क्रांतिकारी गतिविधियों में महिलाओं की भूमिका अप्रत्यक्ष थी जनता की संवेदना तो इनके साथ थी लेकिन जन समर्थन का अभाव दिखाई देता है राष्ट्रीय आन्दोलन के साथ एक ओर साम्प्रदायिक चेतना का प्रसार हुआ तो दूसरी ओर क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के प्रत्येक चरण में भारत की आजादी ही इनका मुख्य पंथ बना रहा| क्रांतिकारी गतिविधियों को कांग्रेस ने औपचारिक समर्थन नहीं दिया लेकिन अधिकांशतः क्रांतिकारियों के आदर्श लाल बाल पाल जैसे नेता ही थे| और इनकी गतिविधियों में तीव्रता तभी देखी गयी जबकि कांग्रेस के आन्दोलन कमजोर पड़ते थे| संसाधनों की कमी, हिंसात्मक राजनीति की सीमाएं तथा सरकारी दमन के कारण क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की धारा कमजोर हुई| किन्तु स्वदेशी आन्दोलन के पश्चात उत्पन्न राजनीतिक शून्यता को भरने का कार्य क्रांतिकारियों द्वारा किया गया| क्रांतिकारी राष्ट्रवाद ने राष्ट्रीय आन्दोलन या आजादी की लड़ाई के लिए लोगों के समक्ष एक वैकल्पिक मार्ग प्रस्तुत किया गया क्रांतिकारी राष्ट्रवादियों की गतिविधियों से ब्रिटिश सरकार भी दहशत में थी इसके माध्यम से अंग्रेजों की अपराजेयता सम्बन्धी मिथक को तोड़ने का कार्य किया अतः स्पष्ट होता है कि क्रांतिकारी राष्ट्रवाद ने राष्ट्रीय आन्दोलन को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया|
##Question:भारत में प्रथम चरण के क्रांतिकारी राष्टवाद के उद्भव के कारणों को स्पष्ट करते हुए इसकी प्रमुख विशेषताओं की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द/10 अंक) Explain the reasons for the emergence of first stage revolutionary nationalism in India and discuss its main features. (150 to 200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में प्रथम चरण के क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के बारे में जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के उद्भव के कारणों को सूचीबद्ध कीजिये 3- दुसरे भाग में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की प्रमुख विशेषताओं की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| 1890 के दशक में राजनीतिक हत्याओं का दौर प्रारम्भ हुआ लेकिन स्वदेशी आन्दोलन के विफलता के पश्चात ही राष्ट्रीय आन्दोलन में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद एक मुख्य प्रवृति बन पायी| क्रांतिकारियों लक्ष्य अंग्रेजों को हिन्दुस्तान से निकालना था| ग़दर आन्दोलन ने स्वतंत्रता के पश्चात भारत में गणतंत्र की स्थापना का लक्ष्य रखा| इस चरण में भारतीय क्रांतिकारी राष्ट्रवादियों ने न केवल भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की स्वतंत्रता के लिए क्रांतिकारी गतिविधियाँ संपन्न की| जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है क्रांतिकारी गतिविधियाँ हिंसात्मक तरीकों पर आधारित थीं| अलोकप्रिय अधिकारियों की हत्याएं, सरकारी खजाने को लूटना आदि इनकी मुख्य गतिविधियाँ थीं| भारत में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के उदय के पीछे अनेक कारक उत्तरदायी थे| क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के उदय के कारण सरकार की दमनकारी नीति, स्वदेशी आन्दोलन के दौरान गरमदलीय नेतृत्व पर सरकार के द्वारा प्रहार किया गया| इससे आन्दोलन नेतृत्व विहीन हो गया और युवाओं ने क्रान्ति एवं हिंसा का मार्ग अपना लिया कांग्रेस की संगठनात्मक कमजोरी के कारण युवाओं को दिशा न दिखा पाना नरम दलीय नेतृत्व एवं उनकी कार्यशैली से युवाओं में असंतोष था| अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क्रांतिकारी गतिविधियाँ हो रही थी इसी समय जापान का एक बड़ी शक्ति के रूप में उदय हुआ था विवेकानंद, दयानंद सरस्वती तथा अरविन्द घोष जैसे बुद्धिजीवियों के विचारों व लेखों ने युवाओं में निडरता तथा आत्मविश्वास की भावना का संचार किया| क्रांतिकारी राष्ट्रवाद कीविशेषताएं युवाओं को अपने साथ जोड़ने के लिए पत्रिकाओं के माध्यम से क्रांतिकारी विचारों का प्रसार किया जाता था इसके साथ ही क्रांतिकारी गतिविधियों ने भी युवाओं को प्रभावित व आकर्षित किया क्रांतिकारी गतिविधियाँ प्रायः संगठित रूप से होती थीं किन्तु इनका संचालन गुप्त रूप से होता था| आन्दोलन का प्रसार भारत के विभिन्न शहरों के साथ साथ यूरोप, अमेरिका, कनाडा, फ़्रांस, जर्मनी तथा दक्षिण पूर्व के एशिया के कई राष्ट्रों तक हुआ आन्दोलन का मुख्य आधार शहरी पृष्ठभूमि के शिक्षित युवा थे हालांकि गदर आन्दोलन में आम लोगों के बीच भी क्रांतिकारी चेतना का प्रसार देखा गया| प्रथम चरण में क्रांतिकारी गतिविधियों में महिलाओं की भूमिका अप्रत्यक्ष थी जनता की संवेदना तो इनके साथ थी लेकिन जन समर्थन का अभाव दिखाई देता है राष्ट्रीय आन्दोलन के साथ एक ओर साम्प्रदायिक चेतना का प्रसार हुआ तो दूसरी ओर क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के प्रत्येक चरण में भारत की आजादी ही इनका मुख्य पंथ बना रहा| क्रांतिकारी गतिविधियों को कांग्रेस ने औपचारिक समर्थन नहीं दिया लेकिन अधिकांशतः क्रांतिकारियों के आदर्श लाल बाल पाल जैसे नेता ही थे| और इनकी गतिविधियों में तीव्रता तभी देखी गयी जबकि कांग्रेस के आन्दोलन कमजोर पड़ते थे| संसाधनों की कमी, हिंसात्मक राजनीति की सीमाएं तथा सरकारी दमन के कारण क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की धारा कमजोर हुई| किन्तु स्वदेशी आन्दोलन के पश्चात उत्पन्न राजनीतिक शून्यता को भरने का कार्य क्रांतिकारियों द्वारा किया गया| क्रांतिकारी राष्ट्रवाद ने राष्ट्रीय आन्दोलन या आजादी की लड़ाई के लिए लोगों के समक्ष एक वैकल्पिक मार्ग प्रस्तुत किया गया क्रांतिकारी राष्ट्रवादियों की गतिविधियों से ब्रिटिश सरकार भी दहशत में थी इसके माध्यम से अंग्रेजों की अपराजेयता सम्बन्धी मिथक को तोड़ने का कार्य किया अतः स्पष्ट होता है कि क्रांतिकारी राष्ट्रवाद ने राष्ट्रीय आन्दोलन को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया|
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तत्कालीन सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों ने छठवीं शताब्दी ईसा पूर्व में असनातनी पंथों के उदय का मार्ग प्रशस्त किया| स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) The then socio-economic circumstances paved the way for the rise of Asanatani cults in the sixth century BC. Explain (150 to 200 words, 10 marks)
दृष्टिकोण भूमिका में सूत्रकाल/बुद्धकाल/ महाजनपद काल का परिचय दीजिये प्रथम भाग में बुद्धकालीन अर्थव्यवस्था की विशेषताओं को स्पष्ट कीजिये दूसरे भाग में बुद्धकालीन समाज की विशेषताओं को स्पष्ट कीजिये तीसरे भाग में असनातनी पंथों के उदय में उपरोक्त विशेषताओं के योगदान को स्पष्ट कीजिये अंतिम में विभिन्न असनातनी पंथों का विवरण देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये उत्तरवैदिक कालीन संस्कृति के बाद 6वीं शताब्दी BC में विकसित संस्कृति को सूत्रकाल अथवा बुद्धकाल की संज्ञा दी जाती है| इस काल में धर्मसूत्रों की रचना हुई थी इसीकारण इसे सूत्रकाल कहा जाता है| इसी समय महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ था तथा भारत में राज्यों के रूप में 16 महाजनपदों का अस्तित्व मिलता है| 6वीं शताब्दी BC वैश्विक स्तर पर वैचारिक क्रान्ति का काल था| इसीक्रम में भारत में भी परम्परागत मान्यताओं का विरोध करने वाले विभिन्न असनातनी पंथों का उदय हुआ| इन असनातनी पंथों के उदय में तत्कालीन सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| बुद्धकालीन अर्थव्यवस्था बुद्ध काल में कृषि में लोहे का बड़े पैमाने पर प्रयोग हुआ जिसके परिणाम स्वरुप उत्पादन में वृद्धि हुई तथा अधिशेष उत्पादन प्राप्त हुआ जिसने द्वितीय नगरीकरण की परिघटना को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| इस काल के साहित्य में भूस्वामित्व का स्पष्ट उल्लेख मिलता है| दास प्रथा उपस्थित थी और दासों का नियोजन कृषि में किया जाने लगा था ,जिससे कृषि उत्पादन में वृद्धि को सुनिश्चित किया| इस चरण में शिल्प विशेषीकरण के साक्ष्य मिलने लगते हैं जैसे इस काल में शिल्पों की संख्या में वृद्धि की सूचना मिलती है तथा इन शिल्पों स्थानबद्ध पहचान भी स्थापित होने लगी थी उदाहरण के तौर पर वैशाली में एक साथ कुम्हारों की 500 दुकानों का उल्लेख, बनारस हाथीदांत कारीगरों की गलियों का उल्लेख मिलता है| सूत्रकाल में गिल्ड/ श्रेणियों/व्यावसायिक संगठनों के साक्ष्य मिलने लगते हैं | NBPW मृद्भांडों के देश के अन्य भागों में पाये जाने से आंतरिक एवं बाह्य व्यापार के साक्ष्य मिलते हैं| जातकों में दक्षिण पूर्ण एशिया के साथ व्यापार की जानकारी दी गयी है| साहित्य में ताम्रिलिप्ती बंदरगाह का भी उल्लेख है| चांदी एवं तांबे से निर्मित सिक्के पांचवी सदी ई.पू .से मिलने लगते हैं,इन्हें पंचमार्क/आहत सिक्के के नाम से जाना जाता है,इनपर लेख नहीं होते हैं| इस काल में बड़ी संख्या में नगरों का विकास हुआ था, जिनका चरमोत्कर्ष मौर्योत्तर काल में होता है| इसे द्वितीय नगरीकरण/लौह युगीन नगरीकरण/गंगा घाटी नगरीकरण भी कहा जाता है | बुद्धकालीन समाज वर्णव्यवस्था पूर्णतः स्थापित हो गयी थी किन्तु आपातकालीन स्थितियों में वैकल्पिक व्यवसाय अपनाने की अनुमति थी इस काल में जाति व्यवस्था का भी उल्लेख मिलने लगता है, व्यक्ति की पहचान, कार्यों का निर्धारण जन्म के आधार पर किया जाता था अंतरजातीय विवाह और खान-पान पर प्रतिबन्ध था, प्रायः निर्धारित कार्यों से हट कर कार्य करने पर रोक थी समाज में छुआ-छूत का प्रचलन था तथा दासों को कृषि में नियोजित किया जाने लगा था बाल-विवाह की उपस्थिति और उपनयन पर रोक से स्पष्ट होता है कि महिलाओं की स्थिति में गिरावट आयी थी बौध एवं जैन मठों में शिक्षा दी जाती थी| उत्तरवैदिक कालीन कर्मकांडों एवं संस्कारों का प्रचलन जारी था असनातनी पंथों के उदय में उपरोक्त विशेषताओं का योगदान आर्थिक परिवर्तनों में ब्राहमणवादी मान्यताएं बाधक सिद्ध हो रही थी जैसे ब्राहमण धर्म में कर्मकांडों और पशुबलि पर जोर के कारण कृषि को नुकसान हो रहा था सूदखोरी की निंदा के कारण व्यापारीवर्ग को हानि होती थी तथाछुआ-छूत का प्रचलन नगरीकरण की प्रक्रिया में बाधक था| वर्ण व्यवस्था को लेकर भी ब्राहमणों के विरुद्ध अन्य वर्गों में असंतोष था बलि प्रथा, दान-दक्षिणा व अन्य कारणों से ब्राहमणवादी मान्यताओं से राज्य को नुक्सान हो रहा था अतः राज्य ने भी असनातनी पंथों को संरक्षण प्रदान किया उत्तरवैदिक काल से ही कर्मकांडों को उपनिषदों के द्वारा चुनौती मिलने लगी थी| बौद्ध व जैन धर्मों के उदय को इस प्रक्रिया की कड़ी के रूप में भी देखा जाता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि तत्कालीन सामाजिक-आर्थिक जीवन की कुछ विसंगतियों, आर्थिक आवश्यकताओं तथा सामाजिक तनाव के कारण असनातनी धर्मों का उदय हुआ| इन असानातनी धर्मों ने अब तक की प्रचलित मान्यताओं को तर्क की कसौटी पर आंकना शुरू किया| इस क्रम में भारत में महात्मा बुद्ध द्वारा बौद्ध धर्म, महावीर स्वामी द्वारा जैन धर्म, मक्खलिगोशाल जो महावीर के शिष्य थे, महावीर से अलग होकर नियतिवादी आजीवक सम्प्रदाय की स्थापना की इसी तरह अजितकेशकमब्लिन जिन्हें भौतिक वाद का प्रथम चिन्तक माना गया है, उच्छेदवादी दर्शन प्रस्तुत किया|
##Question:तत्कालीन सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों ने छठवीं शताब्दी ईसा पूर्व में असनातनी पंथों के उदय का मार्ग प्रशस्त किया| स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) The then socio-economic circumstances paved the way for the rise of Asanatani cults in the sixth century BC. Explain (150 to 200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में सूत्रकाल/बुद्धकाल/ महाजनपद काल का परिचय दीजिये प्रथम भाग में बुद्धकालीन अर्थव्यवस्था की विशेषताओं को स्पष्ट कीजिये दूसरे भाग में बुद्धकालीन समाज की विशेषताओं को स्पष्ट कीजिये तीसरे भाग में असनातनी पंथों के उदय में उपरोक्त विशेषताओं के योगदान को स्पष्ट कीजिये अंतिम में विभिन्न असनातनी पंथों का विवरण देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये उत्तरवैदिक कालीन संस्कृति के बाद 6वीं शताब्दी BC में विकसित संस्कृति को सूत्रकाल अथवा बुद्धकाल की संज्ञा दी जाती है| इस काल में धर्मसूत्रों की रचना हुई थी इसीकारण इसे सूत्रकाल कहा जाता है| इसी समय महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ था तथा भारत में राज्यों के रूप में 16 महाजनपदों का अस्तित्व मिलता है| 6वीं शताब्दी BC वैश्विक स्तर पर वैचारिक क्रान्ति का काल था| इसीक्रम में भारत में भी परम्परागत मान्यताओं का विरोध करने वाले विभिन्न असनातनी पंथों का उदय हुआ| इन असनातनी पंथों के उदय में तत्कालीन सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| बुद्धकालीन अर्थव्यवस्था बुद्ध काल में कृषि में लोहे का बड़े पैमाने पर प्रयोग हुआ जिसके परिणाम स्वरुप उत्पादन में वृद्धि हुई तथा अधिशेष उत्पादन प्राप्त हुआ जिसने द्वितीय नगरीकरण की परिघटना को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| इस काल के साहित्य में भूस्वामित्व का स्पष्ट उल्लेख मिलता है| दास प्रथा उपस्थित थी और दासों का नियोजन कृषि में किया जाने लगा था ,जिससे कृषि उत्पादन में वृद्धि को सुनिश्चित किया| इस चरण में शिल्प विशेषीकरण के साक्ष्य मिलने लगते हैं जैसे इस काल में शिल्पों की संख्या में वृद्धि की सूचना मिलती है तथा इन शिल्पों स्थानबद्ध पहचान भी स्थापित होने लगी थी उदाहरण के तौर पर वैशाली में एक साथ कुम्हारों की 500 दुकानों का उल्लेख, बनारस हाथीदांत कारीगरों की गलियों का उल्लेख मिलता है| सूत्रकाल में गिल्ड/ श्रेणियों/व्यावसायिक संगठनों के साक्ष्य मिलने लगते हैं | NBPW मृद्भांडों के देश के अन्य भागों में पाये जाने से आंतरिक एवं बाह्य व्यापार के साक्ष्य मिलते हैं| जातकों में दक्षिण पूर्ण एशिया के साथ व्यापार की जानकारी दी गयी है| साहित्य में ताम्रिलिप्ती बंदरगाह का भी उल्लेख है| चांदी एवं तांबे से निर्मित सिक्के पांचवी सदी ई.पू .से मिलने लगते हैं,इन्हें पंचमार्क/आहत सिक्के के नाम से जाना जाता है,इनपर लेख नहीं होते हैं| इस काल में बड़ी संख्या में नगरों का विकास हुआ था, जिनका चरमोत्कर्ष मौर्योत्तर काल में होता है| इसे द्वितीय नगरीकरण/लौह युगीन नगरीकरण/गंगा घाटी नगरीकरण भी कहा जाता है | बुद्धकालीन समाज वर्णव्यवस्था पूर्णतः स्थापित हो गयी थी किन्तु आपातकालीन स्थितियों में वैकल्पिक व्यवसाय अपनाने की अनुमति थी इस काल में जाति व्यवस्था का भी उल्लेख मिलने लगता है, व्यक्ति की पहचान, कार्यों का निर्धारण जन्म के आधार पर किया जाता था अंतरजातीय विवाह और खान-पान पर प्रतिबन्ध था, प्रायः निर्धारित कार्यों से हट कर कार्य करने पर रोक थी समाज में छुआ-छूत का प्रचलन था तथा दासों को कृषि में नियोजित किया जाने लगा था बाल-विवाह की उपस्थिति और उपनयन पर रोक से स्पष्ट होता है कि महिलाओं की स्थिति में गिरावट आयी थी बौध एवं जैन मठों में शिक्षा दी जाती थी| उत्तरवैदिक कालीन कर्मकांडों एवं संस्कारों का प्रचलन जारी था असनातनी पंथों के उदय में उपरोक्त विशेषताओं का योगदान आर्थिक परिवर्तनों में ब्राहमणवादी मान्यताएं बाधक सिद्ध हो रही थी जैसे ब्राहमण धर्म में कर्मकांडों और पशुबलि पर जोर के कारण कृषि को नुकसान हो रहा था सूदखोरी की निंदा के कारण व्यापारीवर्ग को हानि होती थी तथाछुआ-छूत का प्रचलन नगरीकरण की प्रक्रिया में बाधक था| वर्ण व्यवस्था को लेकर भी ब्राहमणों के विरुद्ध अन्य वर्गों में असंतोष था बलि प्रथा, दान-दक्षिणा व अन्य कारणों से ब्राहमणवादी मान्यताओं से राज्य को नुक्सान हो रहा था अतः राज्य ने भी असनातनी पंथों को संरक्षण प्रदान किया उत्तरवैदिक काल से ही कर्मकांडों को उपनिषदों के द्वारा चुनौती मिलने लगी थी| बौद्ध व जैन धर्मों के उदय को इस प्रक्रिया की कड़ी के रूप में भी देखा जाता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि तत्कालीन सामाजिक-आर्थिक जीवन की कुछ विसंगतियों, आर्थिक आवश्यकताओं तथा सामाजिक तनाव के कारण असनातनी धर्मों का उदय हुआ| इन असानातनी धर्मों ने अब तक की प्रचलित मान्यताओं को तर्क की कसौटी पर आंकना शुरू किया| इस क्रम में भारत में महात्मा बुद्ध द्वारा बौद्ध धर्म, महावीर स्वामी द्वारा जैन धर्म, मक्खलिगोशाल जो महावीर के शिष्य थे, महावीर से अलग होकर नियतिवादी आजीवक सम्प्रदाय की स्थापना की इसी तरह अजितकेशकमब्लिन जिन्हें भौतिक वाद का प्रथम चिन्तक माना गया है, उच्छेदवादी दर्शन प्रस्तुत किया|
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प्रजातंत्र में सिविल सेवकों की भूमिका का उल्लेख कीजिये | साथ ही भारत में सिविल सेवकों के समक्ष आने वाली समस्यायों को भी रेख्नाकित कीजिये | (150-200 शब्द) Explain the role of civil servants in democracy. Also, underline the problems faced by civil servants in India. (150-200 words)
एप्रोच- भारत में सिविल सेवा का संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये | मुख्य भाग के पहले हिस्से में,भारत का विशेष संदर्भ लेते हुए, लोकतंत्र को मजबूत करने में सिविल सेवकों की भूमिका का उल्लेख कीजिये | अंतिम भाग में,भारत में सिविल सेवकों द्वारा भूमिका निर्वहन में आने वाली चुनौतियाँ का जिक्र कीजिये | निष्कर्षतः, इस संदर्भ में अपने कुछ सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये | उत्तर- भारत में संघ और राज्य स्तर पर विभिन्न सिविल सेवाओं को तीन व्यापक समूहों में वर्गीकृत किया जाता है- केंद्रीय सिविल सेवाएँ; अखिल भारतीय सेवाएँ तथा राज्य सिविल सेवाएँ| भारत में नागरिकसेवाओं सेसंबंधित विभिन्न संवैधानिक प्रावधानों को अनुच्छेद309 310;311 तथा312के अंतर्गत रखा गया है| भारतीय नागरिक सेवाओं की विशेषताओं मेंव्यापक जवाबदेहिता; अपेक्षित ज्ञान; स्थायी नागरिक सेवाएँ; सेवा शर्तें, वेतन-भत्ते आदि विधि द्वारा निर्धारित; एकरूपता के साथ विविधताएँ; प्रशासन की निरंतरता पर आधारित आदि आते हैं| लोकतंत्र को मजबूत करने में सिविल सेवकों की भूमिका यह भारतीय शासन विशेषकर कार्यपालिका का आधार है| किसी भी सरकार का प्रशासनिक मशीनरी के बिना अस्तित्व नहीं हो सकता है| यह सरकार के कानूनों एवं नीतिओं को लागू करने हेतु उत्तरदायी है| यह विधि निर्माण, उनके विकास एवं क्रियान्वयन में सहायता करती है| सिविल सेवकों के प्रशासनिक कार्यों में नीतियों/योजनाओं का निर्माण, कार्यक्रमों का निष्पादन एवं निगरानी करना; कानूनों, नियमों और विनियमों को निर्धारित करना शामिल होता है| यह राजनीतिक अस्थिरता के बीच रहते हुए प्रशासन तंत्र को स्थायित्व प्रदान करता है| यह नीति निर्माण तथा उसके कार्यान्वयन में अपने राजनीतिक प्रमुखों की सहायता कर लोकतांत्रिक आदर्शों की सहायता करता है| भारत से नए लोकतंत्र को स्थायी, दक्ष एवं सुदृढ़ बनाने में सिविल सेवकों का बहुमूल्य योगदान है| यह सामाजिक परिवर्तन एवं आर्थिक विकास के संसाधनों के संबंध में राजनीतिक कार्यपालिका को अवगत करवाता है एवं दिशानिर्देश प्रदान करता है| यह देश में चल रही कल्याणकारी योजनाओं को व्यवहारिकता प्रदान करता है एवं उनकी सफलता/विफलता का मूल्यांकन करता है| यह तंत्र कल्याणकारी योजनाओं के लिए उपयुक्त लाभार्थी की पहचान करता है| विकासात्मक कार्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक प्रबंधकीय कौशल और तकनीकी क्षमता को सुरक्षित करने के लिए मानवीय संसाधनों का विकास करना , आदि सिविल सेवकों के समक्ष आने वाली चुनौतियाँ नौकरशाही के वेबेरियन मॉडल की वजह से उत्पन समस्याएं; जैसे-योग्यता की जगह वरिष्ठता पर पदोन्नति | निश्चित वेतन एवं कार्यकाल की सुरक्षा से असक्षम अधिकारियों के मातहत भी मेधावी लोकसेवकों का कार्य करना आदि | हमारे नागरिक सेवकों के अंदर व्यवसायिकता का अभाव एवं न्यून कार्यक्षमता | अप्रभावी प्रोत्साहन प्रणाली जो कार्यशील, मेधावी और ईमानदार नागरिक सेवकों को पुरूस्कृत नहीं करता है| कठोर नियम और प्रक्रियाएं सिविल सेवकों को व्यक्तिगत निर्णय लेने और कुशलता का प्रदर्शन करने से रोकते हैं जिससेनिरूत्साहिता को भी बढ़ावा मिलता है| राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण मनमाने ढंग से स्थानांतरण और कार्यकाल में असुरक्षा अधिकारियों की स्वायत्तता को रोकती है| विद्यमान नैतिकता का अभाव अधिकारियों के अंदर अनेक नकारात्मक प्रवृतियों को जन्म देता है जैसे- भ्रष्टाचार; भाई-भतीजावाद आदि |
##Question:प्रजातंत्र में सिविल सेवकों की भूमिका का उल्लेख कीजिये | साथ ही भारत में सिविल सेवकों के समक्ष आने वाली समस्यायों को भी रेख्नाकित कीजिये | (150-200 शब्द) Explain the role of civil servants in democracy. Also, underline the problems faced by civil servants in India. (150-200 words)##Answer:एप्रोच- भारत में सिविल सेवा का संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये | मुख्य भाग के पहले हिस्से में,भारत का विशेष संदर्भ लेते हुए, लोकतंत्र को मजबूत करने में सिविल सेवकों की भूमिका का उल्लेख कीजिये | अंतिम भाग में,भारत में सिविल सेवकों द्वारा भूमिका निर्वहन में आने वाली चुनौतियाँ का जिक्र कीजिये | निष्कर्षतः, इस संदर्भ में अपने कुछ सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये | उत्तर- भारत में संघ और राज्य स्तर पर विभिन्न सिविल सेवाओं को तीन व्यापक समूहों में वर्गीकृत किया जाता है- केंद्रीय सिविल सेवाएँ; अखिल भारतीय सेवाएँ तथा राज्य सिविल सेवाएँ| भारत में नागरिकसेवाओं सेसंबंधित विभिन्न संवैधानिक प्रावधानों को अनुच्छेद309 310;311 तथा312के अंतर्गत रखा गया है| भारतीय नागरिक सेवाओं की विशेषताओं मेंव्यापक जवाबदेहिता; अपेक्षित ज्ञान; स्थायी नागरिक सेवाएँ; सेवा शर्तें, वेतन-भत्ते आदि विधि द्वारा निर्धारित; एकरूपता के साथ विविधताएँ; प्रशासन की निरंतरता पर आधारित आदि आते हैं| लोकतंत्र को मजबूत करने में सिविल सेवकों की भूमिका यह भारतीय शासन विशेषकर कार्यपालिका का आधार है| किसी भी सरकार का प्रशासनिक मशीनरी के बिना अस्तित्व नहीं हो सकता है| यह सरकार के कानूनों एवं नीतिओं को लागू करने हेतु उत्तरदायी है| यह विधि निर्माण, उनके विकास एवं क्रियान्वयन में सहायता करती है| सिविल सेवकों के प्रशासनिक कार्यों में नीतियों/योजनाओं का निर्माण, कार्यक्रमों का निष्पादन एवं निगरानी करना; कानूनों, नियमों और विनियमों को निर्धारित करना शामिल होता है| यह राजनीतिक अस्थिरता के बीच रहते हुए प्रशासन तंत्र को स्थायित्व प्रदान करता है| यह नीति निर्माण तथा उसके कार्यान्वयन में अपने राजनीतिक प्रमुखों की सहायता कर लोकतांत्रिक आदर्शों की सहायता करता है| भारत से नए लोकतंत्र को स्थायी, दक्ष एवं सुदृढ़ बनाने में सिविल सेवकों का बहुमूल्य योगदान है| यह सामाजिक परिवर्तन एवं आर्थिक विकास के संसाधनों के संबंध में राजनीतिक कार्यपालिका को अवगत करवाता है एवं दिशानिर्देश प्रदान करता है| यह देश में चल रही कल्याणकारी योजनाओं को व्यवहारिकता प्रदान करता है एवं उनकी सफलता/विफलता का मूल्यांकन करता है| यह तंत्र कल्याणकारी योजनाओं के लिए उपयुक्त लाभार्थी की पहचान करता है| विकासात्मक कार्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक प्रबंधकीय कौशल और तकनीकी क्षमता को सुरक्षित करने के लिए मानवीय संसाधनों का विकास करना , आदि सिविल सेवकों के समक्ष आने वाली चुनौतियाँ नौकरशाही के वेबेरियन मॉडल की वजह से उत्पन समस्याएं; जैसे-योग्यता की जगह वरिष्ठता पर पदोन्नति | निश्चित वेतन एवं कार्यकाल की सुरक्षा से असक्षम अधिकारियों के मातहत भी मेधावी लोकसेवकों का कार्य करना आदि | हमारे नागरिक सेवकों के अंदर व्यवसायिकता का अभाव एवं न्यून कार्यक्षमता | अप्रभावी प्रोत्साहन प्रणाली जो कार्यशील, मेधावी और ईमानदार नागरिक सेवकों को पुरूस्कृत नहीं करता है| कठोर नियम और प्रक्रियाएं सिविल सेवकों को व्यक्तिगत निर्णय लेने और कुशलता का प्रदर्शन करने से रोकते हैं जिससेनिरूत्साहिता को भी बढ़ावा मिलता है| राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण मनमाने ढंग से स्थानांतरण और कार्यकाल में असुरक्षा अधिकारियों की स्वायत्तता को रोकती है| विद्यमान नैतिकता का अभाव अधिकारियों के अंदर अनेक नकारात्मक प्रवृतियों को जन्म देता है जैसे- भ्रष्टाचार; भाई-भतीजावाद आदि |
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भारतीय संदर्भ में विधि के शासन को समझाते हुए, इसे वर्तमान के लिए प्रासंगिक बनाने के लिए कुछ सुझाव भी दीजिये । । ( 150-200 शब्द ) Explaining the rule of law in the Indian context,also give some suggestions to make it relevant for present . (150-200 words)
दृष्टिकोण : विधि के शासन को परिभाषित कीजिये। भारत के संदर्भ में इसकी अवधारणा स्पष्ट कीजिए । वर्तमान में प्रासंगिक बनाने के उपायों की बिन्दुवार चर्चा कीजिये। विधि के शासन के महत्संव को बताते हुए संक्षिप्त निष्कर्ष लिखें। उत्तर : विधि का शासन का अर्थ विधि के अनुरूप शासन है जिसमें कोई भी व्यक्ति विधि से ऊपर नहीं है। । प्रत्येक व्यक्ति चाहे उसकी प्रस्थिति कुछ भी हो, देश की सामान्य विधियों के अधीन और साधारण न्यायालयों की अधिकारिता के भीतर ही है। भारत के संदर्भ में विधि के शासन के दो भाग हैं : पहला, विधि की सर्वोच्चता अथवा मनमानी शक्ति का अभाव, जिसका अर्थ है कि एक व्यक्ति को सिर्फ विधि के उल्लंघन के लिए ही दंड दिया जा सकता है, किसी अन्य कारण से नहीं। दूसरा, विधि के समक्ष समता, जिसका अर्थ है कि सभी व्यक्ति सामान्य विधि के अधीन हैं, जिनको सामान्य न्यायालय द्वारा लागू किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में कोई भी व्यक्ति विधि से ऊपर नहीं है। अनुच्छेद-14 में निहित ‘विधि का शासन’ संविधान का आधारभूत ढांचा है। इसलिए इनको अनुच्छेद 368 के तहत संशोधित करके भी नष्ट नहीं किया जा सकता है। विधि के शासन को वर्तमान के लिए प्रासंगिक बनाने के लिए सुझाव: शासन के तीनों अंगों विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के बीच शक्ति संतुलन को स्थापित करना। अनावश्यक रूप से एक दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं किया जाना। न्यायिक सुधार: जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए, अधिक सार्वजनिक पहुंच प्रदान करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी प्रणाली स्थापित की जा सकती है। अदालतों की स्वतंत्रता बढ़ाने के लिए, सरकार उन्हें वित्त पोषण प्रदान कर सकती है जो उन्हें अपने वित्तीय और प्रशासनिक निर्णय लेने की अनुमति देगा। जन प्रतिनिधियों द्वारा खुले एवं पारदर्शी प्रक्रिया द्वारा जन हित में कानूनों का निर्माण किया जाना चाहिए। शासन में विशेषाधिकारों की न्यूनतम उपस्थिति होनी चाहिए। विधि के समक्ष समता की स्थापना होनी चाहिए। किसी भी अपराध नागरिक या आपराधिक के लिए किसी को तब तक दोषी नहीं माना जा सकता है, जब तक ऐसा कृत्य उस समय के कानून के तहत दंडनीय ना हो। विधियों का निर्माण जन अपेक्षाओं के अनुसार संवैधानिक दायरे में होना चाहिए। विधि का शासन एक आधुनिक अवधारणा माना जाता है जो लोकतंत्र का एक उपहार है यह सुशासन के मूल विचार के लिए मौलिक अवधारणा है। मीडिया, सिविल सोसाइटी और यहां तक ​​कि सामान्य नागरिक जैसे हितधारक अपनी-अपनी जिम्मेदारियों कानून के अनुसार निभा कर विधि के शासन को बनाए रखने में अपनी भूमिका का निर्वहन कर सकते हैं।
##Question:भारतीय संदर्भ में विधि के शासन को समझाते हुए, इसे वर्तमान के लिए प्रासंगिक बनाने के लिए कुछ सुझाव भी दीजिये । । ( 150-200 शब्द ) Explaining the rule of law in the Indian context,also give some suggestions to make it relevant for present . (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण : विधि के शासन को परिभाषित कीजिये। भारत के संदर्भ में इसकी अवधारणा स्पष्ट कीजिए । वर्तमान में प्रासंगिक बनाने के उपायों की बिन्दुवार चर्चा कीजिये। विधि के शासन के महत्संव को बताते हुए संक्षिप्त निष्कर्ष लिखें। उत्तर : विधि का शासन का अर्थ विधि के अनुरूप शासन है जिसमें कोई भी व्यक्ति विधि से ऊपर नहीं है। । प्रत्येक व्यक्ति चाहे उसकी प्रस्थिति कुछ भी हो, देश की सामान्य विधियों के अधीन और साधारण न्यायालयों की अधिकारिता के भीतर ही है। भारत के संदर्भ में विधि के शासन के दो भाग हैं : पहला, विधि की सर्वोच्चता अथवा मनमानी शक्ति का अभाव, जिसका अर्थ है कि एक व्यक्ति को सिर्फ विधि के उल्लंघन के लिए ही दंड दिया जा सकता है, किसी अन्य कारण से नहीं। दूसरा, विधि के समक्ष समता, जिसका अर्थ है कि सभी व्यक्ति सामान्य विधि के अधीन हैं, जिनको सामान्य न्यायालय द्वारा लागू किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में कोई भी व्यक्ति विधि से ऊपर नहीं है। अनुच्छेद-14 में निहित ‘विधि का शासन’ संविधान का आधारभूत ढांचा है। इसलिए इनको अनुच्छेद 368 के तहत संशोधित करके भी नष्ट नहीं किया जा सकता है। विधि के शासन को वर्तमान के लिए प्रासंगिक बनाने के लिए सुझाव: शासन के तीनों अंगों विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के बीच शक्ति संतुलन को स्थापित करना। अनावश्यक रूप से एक दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं किया जाना। न्यायिक सुधार: जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए, अधिक सार्वजनिक पहुंच प्रदान करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी प्रणाली स्थापित की जा सकती है। अदालतों की स्वतंत्रता बढ़ाने के लिए, सरकार उन्हें वित्त पोषण प्रदान कर सकती है जो उन्हें अपने वित्तीय और प्रशासनिक निर्णय लेने की अनुमति देगा। जन प्रतिनिधियों द्वारा खुले एवं पारदर्शी प्रक्रिया द्वारा जन हित में कानूनों का निर्माण किया जाना चाहिए। शासन में विशेषाधिकारों की न्यूनतम उपस्थिति होनी चाहिए। विधि के समक्ष समता की स्थापना होनी चाहिए। किसी भी अपराध नागरिक या आपराधिक के लिए किसी को तब तक दोषी नहीं माना जा सकता है, जब तक ऐसा कृत्य उस समय के कानून के तहत दंडनीय ना हो। विधियों का निर्माण जन अपेक्षाओं के अनुसार संवैधानिक दायरे में होना चाहिए। विधि का शासन एक आधुनिक अवधारणा माना जाता है जो लोकतंत्र का एक उपहार है यह सुशासन के मूल विचार के लिए मौलिक अवधारणा है। मीडिया, सिविल सोसाइटी और यहां तक ​​कि सामान्य नागरिक जैसे हितधारक अपनी-अपनी जिम्मेदारियों कानून के अनुसार निभा कर विधि के शासन को बनाए रखने में अपनी भूमिका का निर्वहन कर सकते हैं।
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असहयोग आंदोलन के कारणों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये। साथ ही इसकी प्रकृति पर टिप्पणी कीजिये। ( 150-200 शब्द/10 अंक ) Briefly discuss the reasons for non-cooperation movement. Also comment on its nature. (150-200 words/10 अंक)
दृष्टिकोण : असहयोग आंदोलन की पृष्ठभूमि बताते हुए भूमिका लिखिए । आंदोलन के कारणों की विस्तृत चर्चा कीजिये। असहयोग आंदोलन की विशेषताओं की चर्चा कर इसकी प्रकृति स्पष्ट कीजिये। इसके भविष्यगामी प्रभावों की चर्चा कर निष्कर्ष लिख सकते है। उत्तर : 1919 से 1922 के मध्य भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने एक नए दौर अर्थात जन राजनीति और जनता को लामबंद करने के दौर में प्रवेश किया। ब्रिटिश शासन का विरोध असहयोग आंदोलन के रूप में हुआ जिसमें अहिंसात्मक संघर्ष कि नीति राष्ट्रीय स्तर पर अपनाई गयी। असहयोग आंदोलन के कारण: प्रथम विश्व युद्ध: युद्ध में भारत को जबर्दस्ती शामिल कर दिया गया। साथ ही युद्ध के बाद की आर्थिक स्थिति से आंदोलन को प्रेरणा मिली। प्रथम विश्व युद्ध के बाद खाद्यान्नों की भारी कमी, मुद्रास्फीति में वृद्धि, कम औद्योगिक उत्पादन, करों के बोझ से कस्बों और नगरों में रहने वाले मध्य वर्ग एवं निम्न वर्ग के लोग प्रभावित थे। ऐसी परिस्थितियों ने लोगों के मन में ब्रिटिश विरोधी भावनाओं को मजबूत किया। रौलट एक्ट विरोधी आंदोलन ने पूरी भारतीय जनता को एकसमान रूप से प्रभावित किया था, जिससे हिन्दुओं और मुसलमानों ने बीच निकटता बढ़ी तथा ब्रिटिश विरोधी भावनाओं का संचार किया। पंजाब में मार्शल ला तथा जलियाँवाला बाग हत्याकांड जैसी घटनाओं ने ब्रिटिश शासन के क्रूर और असभ्य चरित्र को उद्घाटित कर दिया। ब्रिटिश संसद द्वारा जनरल डायर के कृत्यों को उचित ठहराना तथा हंटर कमीशन की सिफ़ारिशों ने सबकी आँखें खोल दी। 1919 में उत्तरदायी शासन की आशा लगाए राष्ट्रवादियों को मोण्टेग्यू चेम्सफोर्ड सुधारों से घोर निराशा हुई। इन सुधारों का वास्तविक उद्देश्य द्वैध शासन प्रणाली को लागू करना था न की जनता को राहत पहुंचाना खिलाफत का मुद्दा: तुर्की में खलीफा को पुंर्स्थापित करने के लिए भारत में मुसलमानों ने खिलाफत आंदोलन प्रारम्भ किया। अलग अलग समस्याओं से उभरने के बावजूद दोनों आंदोलनों ने एक समान कार्य योजना को अपनाया। असहयोग आंदोलन की प्रकृति: दिसम्बर 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में असहयोग आंदोलन से संबन्धित प्रस्ताव पारित हुआ जिसमें अब संवैधानिक और वैधानिक तरीके से स्वशासन की प्राप्ति के स्थान पर अहिंसक और उचित तरीकों से स्वराज की प्राप्ति को लक्ष्य बनाया गया। कांग्रेस में कुछ संगठनात्मक परिवर्तन किए गए। 15 सदस्यीय कार्यसमिति का गठन किया गया। अखिल भारतीय, प्रांतीय समितियों का भी गठन किया गया। सरकारी शिक्षण संस्थाओं का बहिष्कार किया गया। न्यायालयों का बहिष्कार तथा पंचायती अदालतों के माध्यम से न्याय का कार्य। विधान परिषदों का बहिष्कार: नवम्बर 1920 में विधान परिषदों के चुनाव सम्पन्न हुए और सभी कांग्रेस के उम्मीदवारों ने चुनावों का बहिष्कार किया। अधिकांश मतदाताओं ने भी इन चुनाओं में भाग नहीं लिया। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार तथा इसके स्थान पर खादी के उपयोग को बढ़ावा देना। चरखा कातने को प्रोत्साहन दिया गया। सरकारी उपाधियों तथा अवैतनिक पदों का परित्याग। इस आंदोलन के प्रभाव को देखते हुए गांधी जी ने कहा था यदि इन कार्यकर्मों के अनुसार आंदोलन चलाया गया तो एक वर्ष तक स्वराज का लक्ष्य प्राप्त हो जाएगा। इस आंदोलन ने भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन को नयी दिशा दी साथ ही हिन्दू मुस्लिम एकता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
##Question:असहयोग आंदोलन के कारणों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये। साथ ही इसकी प्रकृति पर टिप्पणी कीजिये। ( 150-200 शब्द/10 अंक ) Briefly discuss the reasons for non-cooperation movement. Also comment on its nature. (150-200 words/10 अंक)##Answer:दृष्टिकोण : असहयोग आंदोलन की पृष्ठभूमि बताते हुए भूमिका लिखिए । आंदोलन के कारणों की विस्तृत चर्चा कीजिये। असहयोग आंदोलन की विशेषताओं की चर्चा कर इसकी प्रकृति स्पष्ट कीजिये। इसके भविष्यगामी प्रभावों की चर्चा कर निष्कर्ष लिख सकते है। उत्तर : 1919 से 1922 के मध्य भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने एक नए दौर अर्थात जन राजनीति और जनता को लामबंद करने के दौर में प्रवेश किया। ब्रिटिश शासन का विरोध असहयोग आंदोलन के रूप में हुआ जिसमें अहिंसात्मक संघर्ष कि नीति राष्ट्रीय स्तर पर अपनाई गयी। असहयोग आंदोलन के कारण: प्रथम विश्व युद्ध: युद्ध में भारत को जबर्दस्ती शामिल कर दिया गया। साथ ही युद्ध के बाद की आर्थिक स्थिति से आंदोलन को प्रेरणा मिली। प्रथम विश्व युद्ध के बाद खाद्यान्नों की भारी कमी, मुद्रास्फीति में वृद्धि, कम औद्योगिक उत्पादन, करों के बोझ से कस्बों और नगरों में रहने वाले मध्य वर्ग एवं निम्न वर्ग के लोग प्रभावित थे। ऐसी परिस्थितियों ने लोगों के मन में ब्रिटिश विरोधी भावनाओं को मजबूत किया। रौलट एक्ट विरोधी आंदोलन ने पूरी भारतीय जनता को एकसमान रूप से प्रभावित किया था, जिससे हिन्दुओं और मुसलमानों ने बीच निकटता बढ़ी तथा ब्रिटिश विरोधी भावनाओं का संचार किया। पंजाब में मार्शल ला तथा जलियाँवाला बाग हत्याकांड जैसी घटनाओं ने ब्रिटिश शासन के क्रूर और असभ्य चरित्र को उद्घाटित कर दिया। ब्रिटिश संसद द्वारा जनरल डायर के कृत्यों को उचित ठहराना तथा हंटर कमीशन की सिफ़ारिशों ने सबकी आँखें खोल दी। 1919 में उत्तरदायी शासन की आशा लगाए राष्ट्रवादियों को मोण्टेग्यू चेम्सफोर्ड सुधारों से घोर निराशा हुई। इन सुधारों का वास्तविक उद्देश्य द्वैध शासन प्रणाली को लागू करना था न की जनता को राहत पहुंचाना खिलाफत का मुद्दा: तुर्की में खलीफा को पुंर्स्थापित करने के लिए भारत में मुसलमानों ने खिलाफत आंदोलन प्रारम्भ किया। अलग अलग समस्याओं से उभरने के बावजूद दोनों आंदोलनों ने एक समान कार्य योजना को अपनाया। असहयोग आंदोलन की प्रकृति: दिसम्बर 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में असहयोग आंदोलन से संबन्धित प्रस्ताव पारित हुआ जिसमें अब संवैधानिक और वैधानिक तरीके से स्वशासन की प्राप्ति के स्थान पर अहिंसक और उचित तरीकों से स्वराज की प्राप्ति को लक्ष्य बनाया गया। कांग्रेस में कुछ संगठनात्मक परिवर्तन किए गए। 15 सदस्यीय कार्यसमिति का गठन किया गया। अखिल भारतीय, प्रांतीय समितियों का भी गठन किया गया। सरकारी शिक्षण संस्थाओं का बहिष्कार किया गया। न्यायालयों का बहिष्कार तथा पंचायती अदालतों के माध्यम से न्याय का कार्य। विधान परिषदों का बहिष्कार: नवम्बर 1920 में विधान परिषदों के चुनाव सम्पन्न हुए और सभी कांग्रेस के उम्मीदवारों ने चुनावों का बहिष्कार किया। अधिकांश मतदाताओं ने भी इन चुनाओं में भाग नहीं लिया। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार तथा इसके स्थान पर खादी के उपयोग को बढ़ावा देना। चरखा कातने को प्रोत्साहन दिया गया। सरकारी उपाधियों तथा अवैतनिक पदों का परित्याग। इस आंदोलन के प्रभाव को देखते हुए गांधी जी ने कहा था यदि इन कार्यकर्मों के अनुसार आंदोलन चलाया गया तो एक वर्ष तक स्वराज का लक्ष्य प्राप्त हो जाएगा। इस आंदोलन ने भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन को नयी दिशा दी साथ ही हिन्दू मुस्लिम एकता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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प्रजातंत्र में सिविल सेवकों की भूमिका का उल्लेख कीजिये | साथ ही भारत में सिविल सेवकों के समक्ष आने वाली समस्यायों को भी रेख्नाकित कीजिये | (150-200 शब्द) Explain the role of civil servants in democracy. Also, underline the problems faced by civil servants in India. (150-200 words)
एप्रोच- भारत में सिविल सेवा का संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये | मुख्य भाग के पहले हिस्से में,भारत का विशेष संदर्भ लेते हुए, लोकतंत्र को मजबूत करने में सिविल सेवकों की भूमिका का उल्लेख कीजिये | अंतिम भाग में,भारत में सिविल सेवकों द्वारा भूमिका निर्वहन में आने वाली चुनौतियाँ का जिक्र कीजिये | निष्कर्षतः, इस संदर्भ में अपने कुछ सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये | उत्तर- भारत में संघ और राज्य स्तर पर विभिन्न सिविल सेवाओं को तीन व्यापक समूहों में वर्गीकृत किया जाता है- केंद्रीय सिविल सेवाएँ; अखिल भारतीय सेवाएँ तथा राज्य सिविल सेवाएँ| भारत में नागरिकसेवाओं सेसंबंधित विभिन्न संवैधानिक प्रावधानों को अनुच्छेद309 310;311 तथा312के अंतर्गत रखा गया है| भारतीय नागरिक सेवाओं की विशेषताओं मेंव्यापक जवाबदेहिता; अपेक्षित ज्ञान; स्थायी नागरिक सेवाएँ; सेवा शर्तें, वेतन-भत्ते आदि विधि द्वारा निर्धारित; एकरूपता के साथ विविधताएँ; प्रशासन की निरंतरता पर आधारित आदि आते हैं| लोकतंत्र को मजबूत करने में सिविल सेवकों की भूमिका - यह भारतीय शासन विशेषकर कार्यपालिका का आधार है| किसी भी सरकार का प्रशासनिक मशीनरी के बिना अस्तित्व नहीं हो सकता है| यह सरकार के कानूनों एवं नीतिओं को लागू करने हेतु उत्तरदायी है| यह विधि निर्माण, उनके विकास एवं क्रियान्वयन में सहायता करती है| सिविल सेवकों के प्रशासनिक कार्यों में नीतियों/योजनाओं का निर्माण, कार्यक्रमों का निष्पादन एवं निगरानी करना; कानूनों, नियमों और विनियमों को निर्धारित करना शामिल होता है| यह राजनीतिक अस्थिरता के बीच रहते हुए प्रशासन तंत्र को स्थायित्व प्रदान करता है| यह नीति निर्माण तथा उसके कार्यान्वयन में अपने राजनीतिक प्रमुखों की सहायता कर लोकतांत्रिक आदर्शों की सहायता करता है| भारत से नए लोकतंत्र को स्थायी, दक्ष एवं सुदृढ़ बनाने में सिविल सेवकों का बहुमूल्य योगदान है| यह सामाजिक परिवर्तन एवं आर्थिक विकास के संसाधनों के संबंध में राजनीतिक कार्यपालिका को अवगत करवाता है एवं दिशानिर्देश प्रदान करता है| यह देश में चल रही कल्याणकारी योजनाओं को व्यवहारिकता प्रदान करता है एवं उनकी सफलता/विफलता का मूल्यांकन करता है| यह तंत्र कल्याणकारी योजनाओं के लिए उपयुक्त लाभार्थी की पहचान करता है| विकासात्मक कार्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक प्रबंधकीय कौशल और तकनीकी क्षमता को सुरक्षित करने के लिए मानवीय संसाधनों का विकास करना , आदि सिविल सेवकों के समक्ष आने वाली चुनौतियाँ - नौकरशाही के वेबेरियन मॉडल की वजह से उत्पन समस्याएं; जैसे-योग्यता की जगह वरिष्ठता पर पदोन्नति | निश्चित वेतन एवं कार्यकाल की सुरक्षा से असक्षम अधिकारियों के मातहत भी मेधावी लोकसेवकों का कार्य करना आदि | हमारे नागरिक सेवकों के अंदर व्यवसायिकता का अभाव एवं न्यून कार्यक्षमता | अप्रभावी प्रोत्साहन प्रणाली जो कार्यशील, मेधावी और ईमानदार नागरिक सेवकों को पुरूस्कृत नहीं करता है| कठोर नियम और प्रक्रियाएं सिविल सेवकों को व्यक्तिगत निर्णय लेने और कुशलता का प्रदर्शन करने से रोकते हैं जिससेनिरूत्साहिता को भी बढ़ावा मिलता है| राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण मनमाने ढंग से स्थानांतरण और कार्यकाल में असुरक्षा अधिकारियों की स्वायत्तता को रोकती है| विद्यमान नैतिकता का अभाव अधिकारियों के अंदर अनेक नकारात्मक प्रवृतियों को जन्म देता है जैसे- भ्रष्टाचार; भाई-भतीजावाद आदि |
##Question:प्रजातंत्र में सिविल सेवकों की भूमिका का उल्लेख कीजिये | साथ ही भारत में सिविल सेवकों के समक्ष आने वाली समस्यायों को भी रेख्नाकित कीजिये | (150-200 शब्द) Explain the role of civil servants in democracy. Also, underline the problems faced by civil servants in India. (150-200 words)##Answer:एप्रोच- भारत में सिविल सेवा का संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये | मुख्य भाग के पहले हिस्से में,भारत का विशेष संदर्भ लेते हुए, लोकतंत्र को मजबूत करने में सिविल सेवकों की भूमिका का उल्लेख कीजिये | अंतिम भाग में,भारत में सिविल सेवकों द्वारा भूमिका निर्वहन में आने वाली चुनौतियाँ का जिक्र कीजिये | निष्कर्षतः, इस संदर्भ में अपने कुछ सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये | उत्तर- भारत में संघ और राज्य स्तर पर विभिन्न सिविल सेवाओं को तीन व्यापक समूहों में वर्गीकृत किया जाता है- केंद्रीय सिविल सेवाएँ; अखिल भारतीय सेवाएँ तथा राज्य सिविल सेवाएँ| भारत में नागरिकसेवाओं सेसंबंधित विभिन्न संवैधानिक प्रावधानों को अनुच्छेद309 310;311 तथा312के अंतर्गत रखा गया है| भारतीय नागरिक सेवाओं की विशेषताओं मेंव्यापक जवाबदेहिता; अपेक्षित ज्ञान; स्थायी नागरिक सेवाएँ; सेवा शर्तें, वेतन-भत्ते आदि विधि द्वारा निर्धारित; एकरूपता के साथ विविधताएँ; प्रशासन की निरंतरता पर आधारित आदि आते हैं| लोकतंत्र को मजबूत करने में सिविल सेवकों की भूमिका - यह भारतीय शासन विशेषकर कार्यपालिका का आधार है| किसी भी सरकार का प्रशासनिक मशीनरी के बिना अस्तित्व नहीं हो सकता है| यह सरकार के कानूनों एवं नीतिओं को लागू करने हेतु उत्तरदायी है| यह विधि निर्माण, उनके विकास एवं क्रियान्वयन में सहायता करती है| सिविल सेवकों के प्रशासनिक कार्यों में नीतियों/योजनाओं का निर्माण, कार्यक्रमों का निष्पादन एवं निगरानी करना; कानूनों, नियमों और विनियमों को निर्धारित करना शामिल होता है| यह राजनीतिक अस्थिरता के बीच रहते हुए प्रशासन तंत्र को स्थायित्व प्रदान करता है| यह नीति निर्माण तथा उसके कार्यान्वयन में अपने राजनीतिक प्रमुखों की सहायता कर लोकतांत्रिक आदर्शों की सहायता करता है| भारत से नए लोकतंत्र को स्थायी, दक्ष एवं सुदृढ़ बनाने में सिविल सेवकों का बहुमूल्य योगदान है| यह सामाजिक परिवर्तन एवं आर्थिक विकास के संसाधनों के संबंध में राजनीतिक कार्यपालिका को अवगत करवाता है एवं दिशानिर्देश प्रदान करता है| यह देश में चल रही कल्याणकारी योजनाओं को व्यवहारिकता प्रदान करता है एवं उनकी सफलता/विफलता का मूल्यांकन करता है| यह तंत्र कल्याणकारी योजनाओं के लिए उपयुक्त लाभार्थी की पहचान करता है| विकासात्मक कार्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक प्रबंधकीय कौशल और तकनीकी क्षमता को सुरक्षित करने के लिए मानवीय संसाधनों का विकास करना , आदि सिविल सेवकों के समक्ष आने वाली चुनौतियाँ - नौकरशाही के वेबेरियन मॉडल की वजह से उत्पन समस्याएं; जैसे-योग्यता की जगह वरिष्ठता पर पदोन्नति | निश्चित वेतन एवं कार्यकाल की सुरक्षा से असक्षम अधिकारियों के मातहत भी मेधावी लोकसेवकों का कार्य करना आदि | हमारे नागरिक सेवकों के अंदर व्यवसायिकता का अभाव एवं न्यून कार्यक्षमता | अप्रभावी प्रोत्साहन प्रणाली जो कार्यशील, मेधावी और ईमानदार नागरिक सेवकों को पुरूस्कृत नहीं करता है| कठोर नियम और प्रक्रियाएं सिविल सेवकों को व्यक्तिगत निर्णय लेने और कुशलता का प्रदर्शन करने से रोकते हैं जिससेनिरूत्साहिता को भी बढ़ावा मिलता है| राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण मनमाने ढंग से स्थानांतरण और कार्यकाल में असुरक्षा अधिकारियों की स्वायत्तता को रोकती है| विद्यमान नैतिकता का अभाव अधिकारियों के अंदर अनेक नकारात्मक प्रवृतियों को जन्म देता है जैसे- भ्रष्टाचार; भाई-भतीजावाद आदि |
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गांधीजी के प्रारंभिक आंदोलनों का संक्षिप्त परिचय दीजिये | साथ ही इनके महत्व की भी चर्चा कीजिये । ( 10अंक/150-200 शब्द ) Give a brief introduction of Gandhiji"s primary movements. Also, discuss their importance (10 marks/150-200 words).
दृष्टिकोण : गांधीजी के अफ्रीका के अनुभवों का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । भारत आगमन तथा तत्कालीन परिस्थितियों की चर्चा करें। प्रारंभिक आंदोलनों की बिंदुवत चर्चा कीजिए । इन आंदोलनों के महत्व को लिखिए। संतुलित निष्कर्ष से उत्तर समाप्त कीजिये। उत्तर : भारतीय स्वतन्त्रता संघर्ष का नेतृत्व करने से पहले गांधी जी ने लगभग दो दशक दक्षिण अफ्रीका में एक वकील एवं सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में कार्य किया। इस दौरान उन्होने दक्षिण अफ्रीका के मूल निवासी एवं प्रवासी भारतीयों के साथ हो रहे अन्याय एवं नस्लीय भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष किया। गांधीजी, जनवरी 1915 में भारत लौटे। दक्षिण अफ्रीका में उनके संघर्ष और उनकी सफलताओं ने उन्हे भारत में अत्यंत लोकप्रिय बना दिया था। न केवल शिक्षित भारतीय अपितु जन सामान्य भी गांधीजी के बारे में भली भांति परिचित हो चुका था। गांधीजी का मानना था कि किसी भी मुद्दे पर तब तक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जब तक पूरी स्थिति का अध्ययन न कर लिया जाये। अखिल भारतीय स्तर पर स्वतन्त्रता संग्राम से जुड़ने से पहले उन्होने तीन प्रमुख संघर्षों में भागीदारी की। गांधीजी के प्रारम्भिक आंदोलन: 1. चंपारण सत्याग्रह: चंपारण में ब्रिटिश बागान मालिकों ने जमीदारों की भूमिका अपना ली थी तथा किसानों को नील की खेती के लिए मजबूर किया जिसे तिनकाठिया पद्धति कहा जाता था। किसान तिनकाठिया पद्धति से छुटकारा चाहते थे। चंपारण के राजकुमार शुक्ल के आमंत्रण पर गांधीजी ने आंदोलन का नेतृत्व संभाला। गांधीजी ने कमिश्नर के तुरंत चले जाने के आदेश को मानने से इंकार करते हुए किसानों की मांगो की वकालत की। चंपारण में गांधीजी द्वारा सत्याग्रह का सर्वप्रथम प्रयोग करने का प्रयास किया गया। 1917 में चंपारण एग्रेरियन कमेटी का गठन किया गया जिसके गांधीजी सदस्य थे। इस कमेटी के प्रतिवेदन पर इस पद्धति को समाप्त कर दिया गया। 2. अहमदाबाद मिल हड़ताल: अहमदाबाद में मिल मालिकों द्वारा 1917 से मजदूरों को प्लेग बोनस दिया जा रहा था जिसे प्लेग का प्रकोप खत्म होने पर मिल मालिक समाप्त करना चाहते थे। जबकि कामगार प्रथम विश्व युद्ध तथा महंगाई जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों में मजदूरी में 50% की वृद्धि की मांग कर रहे थे। गांधीजी की सलाह पर इससे 35% किया गया था लेकिन मिल मालिक 20% से अधिक की वृद्धि के लिए तैयार नहीं थे। गांधीजी ने मजदूरों की मांगे मनवाने तथा उत्साह बढ़ाने के लिए भूख हड़ताल प्रारम्भ की। मजबूर होकर मामला एक ट्रिब्यूनल को सौंपा गया। ट्रिब्यूनल ने मजदूरों के पक्ष में फैसला सुनाया। गांधीजी की यह दूसरी प्रमुख विजय थी। 3. खेड़ा सत्याग्रह: 1918 के भीषण दुर्भिक्ष के कारण गुजरात के खेड़ा जिले में पूरी फसल बरबाद हो गयी थी। राजस्व संहिता के अनुसार यदि फसल का उत्पादन कुल उत्पादन के एक चौथाई से भी कम हो तो किसानों का राजस्व पूरी तरह माफ कर दिया जाना चाहिए, किन्तु सरकार ने किसानों का राजस्व माफ करने से इंकार कर दिया। गांधीजी ने पूरी जांच पड़ताल के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि राजस्व संहिता के अनुसार पूरा लगान माफ किया जाना चाहिए। गांधीजी ने घोषणा की कि यदि सरकार गरीब किसानों का लगान माफ कर दे तो लगान देने में सक्षम किसान स्वेच्छा से अपना लगान अदा कर देंगे। इसी बीच सरकार ने अधिकारियों को गुप्त निर्देश दिया कि लगान उन्ही लोगों से वसूला जाये जो लगान दे सकते हैं। इस आदेश से गांधीजी का उद्देश्य पूरा हो गया था और आंदोलन समाप्त हो गया। गांधीजी के प्रारम्भिक आंदोलनों का महत्व: चंपारण, अहमदाबाद तथा खेड़ा आंदोलन ने गांधीजी को संघर्ष के गांधीवादी तरीकों यथा सत्याग्रह, अनशन आदि को आजमाने का अवसर दिया। गांधीजी को देश कि जनता के करीब आने तथा उनकी समस्याओं को समझने का अवसर मिला। गांधीजी जनता कि ताकत तथा कमजोरियों से परिचित हुए तथा उन्हे अपनी रणनीति का मूल्यांकन करने का अवसर मिला। इन आंदोलनों में गांधीजी को समाज के विभिन्न वर्गों का भरपूर समर्थन मिला तथा भारतीयों के मध्य उनकी विशिष्ट पहचान कायम हुई। गांधीजी कि छवि एक ऐसे नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित हुई जो उद्देश्य पूर्ति हेतु स्वयं किसी भी सीमा तक त्याग कर सकता है, जैसा कि भूख हड़ताल के मामले में गांधी जी ने किया। इन्हीं प्रारम्भिक आंदोलनों का प्रभाव था कि गांधीजी सर्वमान्य नेता के रूप में उभरे तथा उन्होने आने वाले राष्ट्रीय आन्दोलनों कि दशा व दिशा बदली। जो उनके नेतृत्व में चलाये गए असहयोग, सविनय अवज्ञा तथा भारत छोड़ो आंदोलनों में देखने को मिली।
##Question:गांधीजी के प्रारंभिक आंदोलनों का संक्षिप्त परिचय दीजिये | साथ ही इनके महत्व की भी चर्चा कीजिये । ( 10अंक/150-200 शब्द ) Give a brief introduction of Gandhiji"s primary movements. Also, discuss their importance (10 marks/150-200 words).##Answer:दृष्टिकोण : गांधीजी के अफ्रीका के अनुभवों का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । भारत आगमन तथा तत्कालीन परिस्थितियों की चर्चा करें। प्रारंभिक आंदोलनों की बिंदुवत चर्चा कीजिए । इन आंदोलनों के महत्व को लिखिए। संतुलित निष्कर्ष से उत्तर समाप्त कीजिये। उत्तर : भारतीय स्वतन्त्रता संघर्ष का नेतृत्व करने से पहले गांधी जी ने लगभग दो दशक दक्षिण अफ्रीका में एक वकील एवं सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में कार्य किया। इस दौरान उन्होने दक्षिण अफ्रीका के मूल निवासी एवं प्रवासी भारतीयों के साथ हो रहे अन्याय एवं नस्लीय भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष किया। गांधीजी, जनवरी 1915 में भारत लौटे। दक्षिण अफ्रीका में उनके संघर्ष और उनकी सफलताओं ने उन्हे भारत में अत्यंत लोकप्रिय बना दिया था। न केवल शिक्षित भारतीय अपितु जन सामान्य भी गांधीजी के बारे में भली भांति परिचित हो चुका था। गांधीजी का मानना था कि किसी भी मुद्दे पर तब तक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जब तक पूरी स्थिति का अध्ययन न कर लिया जाये। अखिल भारतीय स्तर पर स्वतन्त्रता संग्राम से जुड़ने से पहले उन्होने तीन प्रमुख संघर्षों में भागीदारी की। गांधीजी के प्रारम्भिक आंदोलन: 1. चंपारण सत्याग्रह: चंपारण में ब्रिटिश बागान मालिकों ने जमीदारों की भूमिका अपना ली थी तथा किसानों को नील की खेती के लिए मजबूर किया जिसे तिनकाठिया पद्धति कहा जाता था। किसान तिनकाठिया पद्धति से छुटकारा चाहते थे। चंपारण के राजकुमार शुक्ल के आमंत्रण पर गांधीजी ने आंदोलन का नेतृत्व संभाला। गांधीजी ने कमिश्नर के तुरंत चले जाने के आदेश को मानने से इंकार करते हुए किसानों की मांगो की वकालत की। चंपारण में गांधीजी द्वारा सत्याग्रह का सर्वप्रथम प्रयोग करने का प्रयास किया गया। 1917 में चंपारण एग्रेरियन कमेटी का गठन किया गया जिसके गांधीजी सदस्य थे। इस कमेटी के प्रतिवेदन पर इस पद्धति को समाप्त कर दिया गया। 2. अहमदाबाद मिल हड़ताल: अहमदाबाद में मिल मालिकों द्वारा 1917 से मजदूरों को प्लेग बोनस दिया जा रहा था जिसे प्लेग का प्रकोप खत्म होने पर मिल मालिक समाप्त करना चाहते थे। जबकि कामगार प्रथम विश्व युद्ध तथा महंगाई जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों में मजदूरी में 50% की वृद्धि की मांग कर रहे थे। गांधीजी की सलाह पर इससे 35% किया गया था लेकिन मिल मालिक 20% से अधिक की वृद्धि के लिए तैयार नहीं थे। गांधीजी ने मजदूरों की मांगे मनवाने तथा उत्साह बढ़ाने के लिए भूख हड़ताल प्रारम्भ की। मजबूर होकर मामला एक ट्रिब्यूनल को सौंपा गया। ट्रिब्यूनल ने मजदूरों के पक्ष में फैसला सुनाया। गांधीजी की यह दूसरी प्रमुख विजय थी। 3. खेड़ा सत्याग्रह: 1918 के भीषण दुर्भिक्ष के कारण गुजरात के खेड़ा जिले में पूरी फसल बरबाद हो गयी थी। राजस्व संहिता के अनुसार यदि फसल का उत्पादन कुल उत्पादन के एक चौथाई से भी कम हो तो किसानों का राजस्व पूरी तरह माफ कर दिया जाना चाहिए, किन्तु सरकार ने किसानों का राजस्व माफ करने से इंकार कर दिया। गांधीजी ने पूरी जांच पड़ताल के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि राजस्व संहिता के अनुसार पूरा लगान माफ किया जाना चाहिए। गांधीजी ने घोषणा की कि यदि सरकार गरीब किसानों का लगान माफ कर दे तो लगान देने में सक्षम किसान स्वेच्छा से अपना लगान अदा कर देंगे। इसी बीच सरकार ने अधिकारियों को गुप्त निर्देश दिया कि लगान उन्ही लोगों से वसूला जाये जो लगान दे सकते हैं। इस आदेश से गांधीजी का उद्देश्य पूरा हो गया था और आंदोलन समाप्त हो गया। गांधीजी के प्रारम्भिक आंदोलनों का महत्व: चंपारण, अहमदाबाद तथा खेड़ा आंदोलन ने गांधीजी को संघर्ष के गांधीवादी तरीकों यथा सत्याग्रह, अनशन आदि को आजमाने का अवसर दिया। गांधीजी को देश कि जनता के करीब आने तथा उनकी समस्याओं को समझने का अवसर मिला। गांधीजी जनता कि ताकत तथा कमजोरियों से परिचित हुए तथा उन्हे अपनी रणनीति का मूल्यांकन करने का अवसर मिला। इन आंदोलनों में गांधीजी को समाज के विभिन्न वर्गों का भरपूर समर्थन मिला तथा भारतीयों के मध्य उनकी विशिष्ट पहचान कायम हुई। गांधीजी कि छवि एक ऐसे नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित हुई जो उद्देश्य पूर्ति हेतु स्वयं किसी भी सीमा तक त्याग कर सकता है, जैसा कि भूख हड़ताल के मामले में गांधी जी ने किया। इन्हीं प्रारम्भिक आंदोलनों का प्रभाव था कि गांधीजी सर्वमान्य नेता के रूप में उभरे तथा उन्होने आने वाले राष्ट्रीय आन्दोलनों कि दशा व दिशा बदली। जो उनके नेतृत्व में चलाये गए असहयोग, सविनय अवज्ञा तथा भारत छोड़ो आंदोलनों में देखने को मिली।
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India-China relations are in a tumultuous stage where both countries are opposing each other as well as cooperating on certain matters. In the context of the above statement, analyze the current state of India-China relations. (10 marks/150 words)
Approach : Introduction - Highlight the uniqueness of relations between India and China. Body - Explain the confronting issues between India and China, also discuss the positive side/efforts of India-China relations. Conclusion - Suggest measures to be taken by India in this regard. Answer : India has China both are growing economically and militarily at a fast pace. There is a conflict as well as cooperation between these two countries in this context relation between India and China becomes important. India - China relationship is based upon the "principle of simultaneous engagement". One hand both countries have engaged with each other very positively, however, at the same time, there lies many confronting issues between the two nations. India - China recent confront 1. NSG Membership - China opposed India’s entry to the elite club of nuclear power known as NSG by citing the fact that India is not signatory to the Non-Proliferation Treaty and Comprehensive Test Ban Treaty. Here, purposefully China ignored the credential of India being the Nuclear responsible state regarding the non-proliferation of nuclear technology. 2. Fight against Terrorism - China blocking India’s efforts within the UN to designate Pakistan based terrorist Masood Azhar as a global terrorist. It shows China’s indifference towards major issues like terrorism for favoring his iron brother Pakistan. 3. Doklam stands off – 2 months-long showdown between India and China over the Dokhlam plateau in Bhutan was a high point in the relationship between India and China. China’s assertion on the plateau was hurting India’s strategic interest and Bhutan’s claim over the land. 4. Belt and Road Initiative (BRI) – India deemed the OBOR initiative of China as an example of neo-Imperialism. If India had joined OBOR it could have impacted India’s Geopolitical, Geo-economic interests especially regarding the issue of POK and CPEC. 5. J&K issue -China also expressed its opposition to India"s move to create a separate Union Territory of Ladakh, saying that there are areas of dispute between the two nations which, according to Beijing, affect China"s territorial integrity and sovereignty. 6. Staple visa issue - China considers Arunachal Pradesh as his part of this area is a bone of contention for the two. 7. B order issue - There are border disputes in Eastern as well as the western sector of India e.g. Aksa Chin, Arunanchal Pradesh, etc. Recent areas of Cooperation When the above-mentioned issues diverging the interests of both India and China. There are also many areas of cooperation between India-China which are strengthening the relationship between the two nations. 1. Issue of terrorism – China is working with India on the issue of terrorism in various international organizations such as the Shanghai cooperation organization, BRICS, Wuhan informal summit. China also agreed to place Pakistan on FATF terror financing greylist. 2. An informal summit in Wuhan between Modi and XI JIN PING took place. Both the countries agreed on China-India Plus format to work in third countries such as Afghanistan, Nepal, and Myanmar, etc. India-China under this format has conducted a joint training program for Afghan diplomats. In Mammalpuram informal summit issues like Multilateral trading system, Strategic issues, Sister state between Tamilnadu and Fujian, etc. were raised. 3. India and China have agreed on the Ten Pillars of Cooperation . This includes cooperation and traditional medicine, yoga, and education, on tourism, in films and television, in sports, etc. 4. India and China share the same concerns on the global stage such as World trade organization for agricultural subsidies and on the International monetary fund for reform in IMF. Given the bitterness that preceded this recent uptick in relations and again Doklam issue and continuing competition between the two, it seems unlikely that the bilateral relations will improve significantly. Despite the recent thaw, there is no decrease in theexpansion of China’s military and diplomatic presence in India’s periphery. India’s Approach 1. External Balancing – India is continuing to build its partnership in the region surrounding China through ASEAN, and participating in QUAD etc. 2. India held inaugural two plus two plus dialogue with the USA and signed communication compatibility and security agreement. 3. Navy inaugurated The information fusion center based in Gurugram in NCR to coordinate maritime intelligence with multiple countries. India needs to continue with this pragmatic foreign policy approach while dealing with China. It needs to follow the policy of containment as well as engagement. For dealing with revisionist China, the formula has to be engagement whenever possible and containment wherever necessary.
##Question:India-China relations are in a tumultuous stage where both countries are opposing each other as well as cooperating on certain matters. In the context of the above statement, analyze the current state of India-China relations. (10 marks/150 words)##Answer:Approach : Introduction - Highlight the uniqueness of relations between India and China. Body - Explain the confronting issues between India and China, also discuss the positive side/efforts of India-China relations. Conclusion - Suggest measures to be taken by India in this regard. Answer : India has China both are growing economically and militarily at a fast pace. There is a conflict as well as cooperation between these two countries in this context relation between India and China becomes important. India - China relationship is based upon the "principle of simultaneous engagement". One hand both countries have engaged with each other very positively, however, at the same time, there lies many confronting issues between the two nations. India - China recent confront 1. NSG Membership - China opposed India’s entry to the elite club of nuclear power known as NSG by citing the fact that India is not signatory to the Non-Proliferation Treaty and Comprehensive Test Ban Treaty. Here, purposefully China ignored the credential of India being the Nuclear responsible state regarding the non-proliferation of nuclear technology. 2. Fight against Terrorism - China blocking India’s efforts within the UN to designate Pakistan based terrorist Masood Azhar as a global terrorist. It shows China’s indifference towards major issues like terrorism for favoring his iron brother Pakistan. 3. Doklam stands off – 2 months-long showdown between India and China over the Dokhlam plateau in Bhutan was a high point in the relationship between India and China. China’s assertion on the plateau was hurting India’s strategic interest and Bhutan’s claim over the land. 4. Belt and Road Initiative (BRI) – India deemed the OBOR initiative of China as an example of neo-Imperialism. If India had joined OBOR it could have impacted India’s Geopolitical, Geo-economic interests especially regarding the issue of POK and CPEC. 5. J&K issue -China also expressed its opposition to India"s move to create a separate Union Territory of Ladakh, saying that there are areas of dispute between the two nations which, according to Beijing, affect China"s territorial integrity and sovereignty. 6. Staple visa issue - China considers Arunachal Pradesh as his part of this area is a bone of contention for the two. 7. B order issue - There are border disputes in Eastern as well as the western sector of India e.g. Aksa Chin, Arunanchal Pradesh, etc. Recent areas of Cooperation When the above-mentioned issues diverging the interests of both India and China. There are also many areas of cooperation between India-China which are strengthening the relationship between the two nations. 1. Issue of terrorism – China is working with India on the issue of terrorism in various international organizations such as the Shanghai cooperation organization, BRICS, Wuhan informal summit. China also agreed to place Pakistan on FATF terror financing greylist. 2. An informal summit in Wuhan between Modi and XI JIN PING took place. Both the countries agreed on China-India Plus format to work in third countries such as Afghanistan, Nepal, and Myanmar, etc. India-China under this format has conducted a joint training program for Afghan diplomats. In Mammalpuram informal summit issues like Multilateral trading system, Strategic issues, Sister state between Tamilnadu and Fujian, etc. were raised. 3. India and China have agreed on the Ten Pillars of Cooperation . This includes cooperation and traditional medicine, yoga, and education, on tourism, in films and television, in sports, etc. 4. India and China share the same concerns on the global stage such as World trade organization for agricultural subsidies and on the International monetary fund for reform in IMF. Given the bitterness that preceded this recent uptick in relations and again Doklam issue and continuing competition between the two, it seems unlikely that the bilateral relations will improve significantly. Despite the recent thaw, there is no decrease in theexpansion of China’s military and diplomatic presence in India’s periphery. India’s Approach 1. External Balancing – India is continuing to build its partnership in the region surrounding China through ASEAN, and participating in QUAD etc. 2. India held inaugural two plus two plus dialogue with the USA and signed communication compatibility and security agreement. 3. Navy inaugurated The information fusion center based in Gurugram in NCR to coordinate maritime intelligence with multiple countries. India needs to continue with this pragmatic foreign policy approach while dealing with China. It needs to follow the policy of containment as well as engagement. For dealing with revisionist China, the formula has to be engagement whenever possible and containment wherever necessary.
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निर्वाचन सुधार से आप क्या समझते हैं ? साथ ही इस दिशा में किये गए प्रयासों का भी उल्लेख कीजिये | (150-200 शब्द, अंक - 10 ) What do you understand by the election reform ? Also mention the efforts made in this direction . (150-200 Words, Marks - 10 )
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत निर्वाचन सुधार का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात निर्वाचन सुधार के क्षेत्र किये विभीन प्रयासों का उदहारण देते हुए उत्ते को विस्तारित कीजिये | अंत में निर्वाचन सुधार का महत्व बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - निर्वाचन सुधार- लोकतंत्र के लिए आवश्यक है की देश में सुशासन के लिए सबसे आचे प्रत्याशी को जनप्रतिनिधि के रूप में चुना जाये | इससे लोगों में नातिक मूल्यों को बढ़ावा मिलता है और ऐसे उम्मीदवारों की संख्या भी बढ़ती है जो सकारात्मक वोट पर चुनाव जीतते हैं | लोकतंत्र में मतदाता को उम्मीदवारों को चुनने या अस्वीकृत करने अवसर दिया जाना चाहिए , जिससे राजनीतिक दल अच्छे उम्मीदवार उतारने पर विवश हों | निर्वाचन सुधार सम्बन्धी किये गए प्रयास विभिन्न समितियों का गठन निर्वाचन सुधार पर गठित विभिन्न समितियों के द्वारा भी निर्वाचन सुधार का समर्थन अलग-अलग तरीकों से किया गया है , जैसे - दिनेश गोस्वामी समिति का गठन निर्वाचन सुधार को लेकर , वोहरा समिति राजनीति के अपराधीकरण पर , इन्द्रजीत गुप्ता समिति राज्य के निवेश पर गठित थी | इनके अतिरिक्त अन्य समिति/ आयोग जैसे - विधि आयोग , चुनाव आयोग , संविधान की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग का गठन भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है | नोटा 2013 में नोटा व्यवस्था लागू की गयी , जिसे अहम सुधार माना जाता है | नोटा से तात्पर्य " उपरोक्त में से कोई नहीं " से है | यह व्यवस्था मतदाता को किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में वोट नहीं देने और मतदाता की पसंद को रिकॉर्ड करने का विकल्प देती है | 2013 से 2016 के बीच हुए विभिन्न राज्यों के चुनाव में नोटा के तहत औसतन 2 प्रतिशत वोट पड़े | वापस बुलाने की प्रणाली (System of Recall) इसकी भी चर्चा समय-समय पर निर्वाचन सुधार के अंतर्गत की जाती रही है | निर्वाचन में राज्य का निवेश राज्य द्वारा निवेश की भी बात निर्वाचन सुधार के तहत की जाती रही है | पिंक बूथ निर्वाचन आयोग ने 2018 में सुधारों को लेकर एक और नविन प्रयोग किया , जिसका उद्देश्य महिलाओं को बड़ी संख्या में वोट डालने के लिए प्रेरित करना था | इसमें मतदान केन्द्रों को गुलाबी रंग से सजाया जाता है तथा उस बूथ पर तैनात सभी कर्मचारी गुलाबी रंग के कपडे पहनते हैं , जो की महिलायें ही होती है | इन बूथों का इस्तेमाल कई चुनावों में सफलतापूर्वक किया गया है | निर्वाचन व राजनीति सम्बन्धी पारदर्शिता से ही लोकतंत्र मजबूत होता है , इसलिए निर्वाचन सम्बन्धी सुधारों को लागू किया जाना आवश्यक है ताकि देश भ्रष्टाचार व अपराधमुक्त होकर विकास व समृद्धि की तरफ अग्रसर हो सके |
##Question:निर्वाचन सुधार से आप क्या समझते हैं ? साथ ही इस दिशा में किये गए प्रयासों का भी उल्लेख कीजिये | (150-200 शब्द, अंक - 10 ) What do you understand by the election reform ? Also mention the efforts made in this direction . (150-200 Words, Marks - 10 )##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत निर्वाचन सुधार का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात निर्वाचन सुधार के क्षेत्र किये विभीन प्रयासों का उदहारण देते हुए उत्ते को विस्तारित कीजिये | अंत में निर्वाचन सुधार का महत्व बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - निर्वाचन सुधार- लोकतंत्र के लिए आवश्यक है की देश में सुशासन के लिए सबसे आचे प्रत्याशी को जनप्रतिनिधि के रूप में चुना जाये | इससे लोगों में नातिक मूल्यों को बढ़ावा मिलता है और ऐसे उम्मीदवारों की संख्या भी बढ़ती है जो सकारात्मक वोट पर चुनाव जीतते हैं | लोकतंत्र में मतदाता को उम्मीदवारों को चुनने या अस्वीकृत करने अवसर दिया जाना चाहिए , जिससे राजनीतिक दल अच्छे उम्मीदवार उतारने पर विवश हों | निर्वाचन सुधार सम्बन्धी किये गए प्रयास विभिन्न समितियों का गठन निर्वाचन सुधार पर गठित विभिन्न समितियों के द्वारा भी निर्वाचन सुधार का समर्थन अलग-अलग तरीकों से किया गया है , जैसे - दिनेश गोस्वामी समिति का गठन निर्वाचन सुधार को लेकर , वोहरा समिति राजनीति के अपराधीकरण पर , इन्द्रजीत गुप्ता समिति राज्य के निवेश पर गठित थी | इनके अतिरिक्त अन्य समिति/ आयोग जैसे - विधि आयोग , चुनाव आयोग , संविधान की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग का गठन भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है | नोटा 2013 में नोटा व्यवस्था लागू की गयी , जिसे अहम सुधार माना जाता है | नोटा से तात्पर्य " उपरोक्त में से कोई नहीं " से है | यह व्यवस्था मतदाता को किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में वोट नहीं देने और मतदाता की पसंद को रिकॉर्ड करने का विकल्प देती है | 2013 से 2016 के बीच हुए विभिन्न राज्यों के चुनाव में नोटा के तहत औसतन 2 प्रतिशत वोट पड़े | वापस बुलाने की प्रणाली (System of Recall) इसकी भी चर्चा समय-समय पर निर्वाचन सुधार के अंतर्गत की जाती रही है | निर्वाचन में राज्य का निवेश राज्य द्वारा निवेश की भी बात निर्वाचन सुधार के तहत की जाती रही है | पिंक बूथ निर्वाचन आयोग ने 2018 में सुधारों को लेकर एक और नविन प्रयोग किया , जिसका उद्देश्य महिलाओं को बड़ी संख्या में वोट डालने के लिए प्रेरित करना था | इसमें मतदान केन्द्रों को गुलाबी रंग से सजाया जाता है तथा उस बूथ पर तैनात सभी कर्मचारी गुलाबी रंग के कपडे पहनते हैं , जो की महिलायें ही होती है | इन बूथों का इस्तेमाल कई चुनावों में सफलतापूर्वक किया गया है | निर्वाचन व राजनीति सम्बन्धी पारदर्शिता से ही लोकतंत्र मजबूत होता है , इसलिए निर्वाचन सम्बन्धी सुधारों को लागू किया जाना आवश्यक है ताकि देश भ्रष्टाचार व अपराधमुक्त होकर विकास व समृद्धि की तरफ अग्रसर हो सके |
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प्रशासनिक सुधार को परिभाषित करते हुए इसके अभिलक्षणों पर चर्चा कीजिये| इसके साथ ही, भारत में प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द/ 10 अंक) Define administrative reform and discuss its characteristics. Along with this, clarify the need for administrative reforms in India (150 to 200 words/ 10 marks).
दृष्टिकोण 1- भूमिका में प्रशासनिक सुधार को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में प्रशासनिक सुधार के अभिलक्षणों की चर्चा कीजिये 3- दूसरे भाग में भारत में प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में प्रशासनिक सुधारों के क्रम एवं किये गए प्रयासों की चर्चा करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| प्रशासन में यथार्थ और वांछनीयता के मध्य अंतर को समाप्त करने के लिए किये गए परिवर्तन ही प्रशासनिक सुधार कहलाते हैं, अथवाप्रशासन के विद्यमान रूप को वांछनीय रूप में परिवर्तित करने के लिए व्यवस्था में किये गए संरचनात्मक, प्रक्रियात्मक और व्यावहारिक परिवर्तनों को प्रशासनिक सुधार कहा जाता है| प्रशासनिक सुधार के कई अभिलक्षण होते हैं| प्रशासनिक सुधार के लक्षण बेहतर प्रशासन के लिए आवश्यक होता है कि नियोजन अथवा योजनाओं का निर्धारण करते समय नैतिक मूल्यों पर ध्यान दिया जाए और नियोजन में नैतिकता का समावेश किया जाए ताकि सार्वजनिक संसाधनों का दुरूपयोग रोका जा सके जिस मात्रा में नैतिकता की कमी होती है उस मात्रा में ही प्रशासनिक सुधार बेहतर सुधार होते हैं प्रशासन में सुधार की संभावना सदैव बनी रहती है, सुधारों में निरन्तरता प्रशासनिक सुधार का विशिष्ट लक्षण है| यदि सुधारों को आकस्मिक या आमूलचूल रूप में किया जाता है तो समाज में असंतोष एवं अव्यवस्था उत्पन्न होने की आशंका बढ़ जाती है| प्रशासन तंत्र में स्वतः उत्पन्न होने वाले परिवर्तनों को सुधार नहीं माना जाता है अर्थात सुधार सदैव ‘कृत्रिम’ होते हैं जिन्हें बाहर से अधिरोपित किया जाता है| सुधार में अनिवार्यतः प्रतिरोध उत्पन्न होता है अर्थात प्रशासनिक सुधार को निरंतर प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है| यदि उठाये गए किसी सुधारात्मक कदम का प्रतिरोध नहीं होता तो वह वास्तव में सुधार नहीं अपितु स्वतःस्फूर्त परिवर्तन होता है| भारत में प्रशासनिक सुधार की आवश्यकता सामाजिक परिवर्तन की तीव्रता को बढाने के लिए प्रशासनिक सुधार की आवश्यकता है| शासन-प्रशासन तंत्र को सामाजिक परिवर्तनों के अनुकूल बनाने के लिए प्रशासनिक सुधार की आवश्यकता है मनुष्य चाहे जितनी भी उन्नति कर ले कोई भी मानव संस्था पूर्ण नहीं होती अर्थात व्यवस्था में अपूर्णता निरंतर विद्यमान है| प्रशासनिक सुधार इस सिद्धांत पर आधारित है कि सभी प्रशासनिक तंत्र चाहे उनका प्रदर्शन कितना भी अच्छा क्यों न हो उनमें सुधार की संभावना सदैव बनी रहती है अतः व्यवस्था के परिमार्जन के लिए नवाचार स्वतः ही आवश्यक होते हैं समाज के तीव्र परिवर्तन और नागरिकों की मूलभूत आवश्यकताओं के दायरे में हो रही वृद्धि के कारण प्रशासन तंत्र में सुधार की अपेक्षा होती है अतः शासन को कृत्रिम रूप से परिवर्तित करना आवश्यक हो गया है भारत में विद्यमान में प्रशासन तंत्र विधिबद्ध नौकरशाही पर आधारित है अर्थात संरचनाओं का गठन, प्रक्रियाओं का निर्धारण और अधिकारियों के व्यावहारिक आचरण सभी विधियों पर निर्भर करते हैं| इसके परिणामस्वरुप प्रशासन में रुढिवादिता का पृवृत्ति का जन्म होता है| विद्यमान नौकरशाही रूढ़िवादी प्रवृत्ति पर आधारित है अतः नौकरशाही को लोकतांत्रिक बाने की आवश्यकता है भारतीय प्रशासनिक तंत्र स्थैतिक है जिसका कारण भी विधिबद्धता है जबकि दूसरी ओर लोकतंत्र निरंतर परिवर्तन शील और व्यापक हो रहा है|लोकतंत्र का जिस गति से विकास हो रहा है शासन तंत्र का विकास उस गति से नहीं हो रहा है भारत में आज लोकतंत्र का स्वरुप भावी लोकतंत्र की और बढ़ रहा है जबकि प्रशासन तंत्र अभी भी स्थैतिक बना हुआ है अतः सुधार अपरिहार्य हो जाते हैं| भारत में प्रशासनिक सुधारों का एक क्रमिक विकास हुआ है| सबसे पहले संरचनात्मक सुधार, उसका बाद प्रक्रियात्मक सुधार हुए हैं तथा वर्तमान में व्यवहारात्मक सुधारों के प्रयास चल रहे हैं| इस सन्दर्भ में भारत सरकार को प्रथम एवं द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोगों के गठन को समझा जा सकता है|
##Question:प्रशासनिक सुधार को परिभाषित करते हुए इसके अभिलक्षणों पर चर्चा कीजिये| इसके साथ ही, भारत में प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द/ 10 अंक) Define administrative reform and discuss its characteristics. Along with this, clarify the need for administrative reforms in India (150 to 200 words/ 10 marks).##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में प्रशासनिक सुधार को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में प्रशासनिक सुधार के अभिलक्षणों की चर्चा कीजिये 3- दूसरे भाग में भारत में प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में प्रशासनिक सुधारों के क्रम एवं किये गए प्रयासों की चर्चा करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| प्रशासन में यथार्थ और वांछनीयता के मध्य अंतर को समाप्त करने के लिए किये गए परिवर्तन ही प्रशासनिक सुधार कहलाते हैं, अथवाप्रशासन के विद्यमान रूप को वांछनीय रूप में परिवर्तित करने के लिए व्यवस्था में किये गए संरचनात्मक, प्रक्रियात्मक और व्यावहारिक परिवर्तनों को प्रशासनिक सुधार कहा जाता है| प्रशासनिक सुधार के कई अभिलक्षण होते हैं| प्रशासनिक सुधार के लक्षण बेहतर प्रशासन के लिए आवश्यक होता है कि नियोजन अथवा योजनाओं का निर्धारण करते समय नैतिक मूल्यों पर ध्यान दिया जाए और नियोजन में नैतिकता का समावेश किया जाए ताकि सार्वजनिक संसाधनों का दुरूपयोग रोका जा सके जिस मात्रा में नैतिकता की कमी होती है उस मात्रा में ही प्रशासनिक सुधार बेहतर सुधार होते हैं प्रशासन में सुधार की संभावना सदैव बनी रहती है, सुधारों में निरन्तरता प्रशासनिक सुधार का विशिष्ट लक्षण है| यदि सुधारों को आकस्मिक या आमूलचूल रूप में किया जाता है तो समाज में असंतोष एवं अव्यवस्था उत्पन्न होने की आशंका बढ़ जाती है| प्रशासन तंत्र में स्वतः उत्पन्न होने वाले परिवर्तनों को सुधार नहीं माना जाता है अर्थात सुधार सदैव ‘कृत्रिम’ होते हैं जिन्हें बाहर से अधिरोपित किया जाता है| सुधार में अनिवार्यतः प्रतिरोध उत्पन्न होता है अर्थात प्रशासनिक सुधार को निरंतर प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है| यदि उठाये गए किसी सुधारात्मक कदम का प्रतिरोध नहीं होता तो वह वास्तव में सुधार नहीं अपितु स्वतःस्फूर्त परिवर्तन होता है| भारत में प्रशासनिक सुधार की आवश्यकता सामाजिक परिवर्तन की तीव्रता को बढाने के लिए प्रशासनिक सुधार की आवश्यकता है| शासन-प्रशासन तंत्र को सामाजिक परिवर्तनों के अनुकूल बनाने के लिए प्रशासनिक सुधार की आवश्यकता है मनुष्य चाहे जितनी भी उन्नति कर ले कोई भी मानव संस्था पूर्ण नहीं होती अर्थात व्यवस्था में अपूर्णता निरंतर विद्यमान है| प्रशासनिक सुधार इस सिद्धांत पर आधारित है कि सभी प्रशासनिक तंत्र चाहे उनका प्रदर्शन कितना भी अच्छा क्यों न हो उनमें सुधार की संभावना सदैव बनी रहती है अतः व्यवस्था के परिमार्जन के लिए नवाचार स्वतः ही आवश्यक होते हैं समाज के तीव्र परिवर्तन और नागरिकों की मूलभूत आवश्यकताओं के दायरे में हो रही वृद्धि के कारण प्रशासन तंत्र में सुधार की अपेक्षा होती है अतः शासन को कृत्रिम रूप से परिवर्तित करना आवश्यक हो गया है भारत में विद्यमान में प्रशासन तंत्र विधिबद्ध नौकरशाही पर आधारित है अर्थात संरचनाओं का गठन, प्रक्रियाओं का निर्धारण और अधिकारियों के व्यावहारिक आचरण सभी विधियों पर निर्भर करते हैं| इसके परिणामस्वरुप प्रशासन में रुढिवादिता का पृवृत्ति का जन्म होता है| विद्यमान नौकरशाही रूढ़िवादी प्रवृत्ति पर आधारित है अतः नौकरशाही को लोकतांत्रिक बाने की आवश्यकता है भारतीय प्रशासनिक तंत्र स्थैतिक है जिसका कारण भी विधिबद्धता है जबकि दूसरी ओर लोकतंत्र निरंतर परिवर्तन शील और व्यापक हो रहा है|लोकतंत्र का जिस गति से विकास हो रहा है शासन तंत्र का विकास उस गति से नहीं हो रहा है भारत में आज लोकतंत्र का स्वरुप भावी लोकतंत्र की और बढ़ रहा है जबकि प्रशासन तंत्र अभी भी स्थैतिक बना हुआ है अतः सुधार अपरिहार्य हो जाते हैं| भारत में प्रशासनिक सुधारों का एक क्रमिक विकास हुआ है| सबसे पहले संरचनात्मक सुधार, उसका बाद प्रक्रियात्मक सुधार हुए हैं तथा वर्तमान में व्यवहारात्मक सुधारों के प्रयास चल रहे हैं| इस सन्दर्भ में भारत सरकार को प्रथम एवं द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोगों के गठन को समझा जा सकता है|
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वैश्वीकरण को परिभाषित कीजिये । साथ ही भारतीय समाज पर इसके प्रभावों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये । ( 150-200 शब्द ) Define globalization.Also critically examine its impacts on Indian society.(150-200 words)
दृष्टिकोण भूमिका में वैश्वीकरण को परिभाषित कीजिये| वैश्वीकरण के भारतीय समाज पर प्रभावों की विस्तार से आलोचनात्मक चर्चा कीजिये| संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- वैश्वीकरण से तात्पर्य विश्व का एकीकृत होते हुए आर्थिक, राजनैतिक एवं सांस्कृतिक सम्बन्धों में समांगीकृत होने से है । जिसके अंतर्गत राष्ट्रीय सीमाओं से परे जाते हुए पूरा विश्व एक ग्लोबल वीलेज़ की तरह विकसित हो जाता है । वैश्वीकरण के चरम अवस्था के अंतर्गत संपूर्ण विश्व का जुड़ाव इस प्रकार हो जाता है कि विश्व के किसी एक भाग में घटित कोई घटना संपूर्ण विश्व को प्रभावित करती है । आज वैश्वीकरण के प्रभाव से कोई अछूता नहीं है। इसका प्रभाव सभी देशों पर किसी न किसी रूप में अवश्य दिखाई पड़ता है। भारतीय लोगों के जीवन, संस्कृति, रूची, फैशन, प्राथमिकता इत्यादि पर भी वैश्वीकरण का प्रभाव पड़ा है। एक तरफ इनसे आर्थिक विकास को गति और प्रौद्योगिकी का विस्तार कर लोगों के जीवन स्तर को सुधारने में मदद की है वहीं दूसरी ओर स्थानीय संस्कृति और परंपरा में सेंध लगाकर विदेशी संस्कृतियों को थोपने का भी प्रयास किया गया है| वैश्वीकरण के भारतीय समाज पर प्रभाव: परमाणु परिवार का उभार : वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप परम्परागत संयुक्त भारतीय का ह्रास हो रहा है और परमाणु परिवार का उभार । जाति व्यवस्था में परिवर्तन : वैश्वीकरण ने परंपरागत जाति व्यवस्था को कमजोर किया है । वही साथ ही जातियों के उभार में नए प्रकार से प्रेरक के रूप में कार्य कर रहा है । महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन : वैश्वीकरण ने भारतीय समाज में महिलाओं की परंपरागत भूमिका में परिवर्तन किया है । अब महिलाएं महज घर की चहारदीवारी के भीतर रहने को बाध्य नहीं है , बल्कि समाज में पुरुषों की बराबरी से अपना महत्व सिद्ध कर रही है । भारतीय ग्रामीण व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव : ग्रामीण समाज पर भी वैश्वीकरण का स्पष्ट प्रभाव दृष्टिगत । वस्त्र: महिलाओं के लिएपारंपरिक भारतीय कपड़े साड़ी, सूट इत्यादि हैं और पुरुषों के लिए पारंपरिक कपड़े धोती, कुर्ता हैं।हिंदू विवाहित महिलाओं ने लाल बिंदी और सिंधुर को भी सजाया, लेकिन अब, यह एक बाध्यता नहीं है।भारतीय लड़कियों के बीच जींस, टी-शर्ट, मिनी स्कर्ट पहनना आम हो गया है। भारतीय प्रदर्शन कला: भारत केसंगीत में धार्मिक, लोक और शास्त्रीय संगीत की किस्में शामिल हैं। भारतीय नृत्य के भी विविध लोक और शास्त्रीय रूप हैं। भरतनाट्यम, कथक, कथकली, मोहिनीट्टम, कुचीपुडी, ओडिसी भारत में लोकप्रिय नृत्य रूप हैं।संक्षेप में कलारिपयट्टू या कालारी को दुनिया की सबसे पुरानी मार्शल आर्ट माना जाता है। लेकिन हाल ही में, पश्चिमीसंगीत भीहमारे देश में बहुत लोकप्रिय हो रहा है।पश्चिमी संगीत के साथ भारतीय संगीत को फ्यूज करना संगीतकारों के बीच प्रोत्साहित किया जाता है।अधिक भारतीय नृत्य कार्यक्रम विश्व स्तर पर आयोजित किए जाते हैं।भरतनाट्यमसीखने वालों की संख्या बढ़ रही है।भारतीय युवाओं के बीच जैज़, हिप हॉप, साल्सा, बैले जैसे पश्चिमी नृत्य रूप आम हो गए हैं। वृद्धावस्था भेद्यता: परमाणु परिवारों के उदय ने सामाजिक सुरक्षा को कम कर दिया है जोसंयुक्त परिवारप्रदान करता है।इसने बुढ़ापे में व्यक्तियों की अधिक आर्थिक, स्वास्थ्य और भावनात्मक भेद्यता को जन्म दिया है। व्यापक मीडिया: दुनियाभर से समाचार,संगीत, फिल्में, वीडियो तक अधिक पहुंच है।विदेशी मीडिया घरों ने भारत में अपनी उपस्थिति में वृद्धि की है।भारत हॉलीवुड फिल्मों के वैश्विक लॉन्च का हिस्सा है। यह हमारे समाज पर एक मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव है| हमयह नहीं कह सकते कि वैश्वीकरण का प्रभावपूरी तरह से सकारात्मकया पूरी तरह से नकारात्मक रहा है। ऊपर वर्णित प्रत्येक प्रभाव कोसकारात्मक और नकारात्मकदोनों के रूप में देखा जा सकता है।हालांकि, यह चिंता का मुद्दा तब बन जाता है, जब भारतीय संस्कृति परवैश्वीकरण का नकारात्मक प्रभाव देखा जाता है।
##Question:वैश्वीकरण को परिभाषित कीजिये । साथ ही भारतीय समाज पर इसके प्रभावों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये । ( 150-200 शब्द ) Define globalization.Also critically examine its impacts on Indian society.(150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में वैश्वीकरण को परिभाषित कीजिये| वैश्वीकरण के भारतीय समाज पर प्रभावों की विस्तार से आलोचनात्मक चर्चा कीजिये| संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- वैश्वीकरण से तात्पर्य विश्व का एकीकृत होते हुए आर्थिक, राजनैतिक एवं सांस्कृतिक सम्बन्धों में समांगीकृत होने से है । जिसके अंतर्गत राष्ट्रीय सीमाओं से परे जाते हुए पूरा विश्व एक ग्लोबल वीलेज़ की तरह विकसित हो जाता है । वैश्वीकरण के चरम अवस्था के अंतर्गत संपूर्ण विश्व का जुड़ाव इस प्रकार हो जाता है कि विश्व के किसी एक भाग में घटित कोई घटना संपूर्ण विश्व को प्रभावित करती है । आज वैश्वीकरण के प्रभाव से कोई अछूता नहीं है। इसका प्रभाव सभी देशों पर किसी न किसी रूप में अवश्य दिखाई पड़ता है। भारतीय लोगों के जीवन, संस्कृति, रूची, फैशन, प्राथमिकता इत्यादि पर भी वैश्वीकरण का प्रभाव पड़ा है। एक तरफ इनसे आर्थिक विकास को गति और प्रौद्योगिकी का विस्तार कर लोगों के जीवन स्तर को सुधारने में मदद की है वहीं दूसरी ओर स्थानीय संस्कृति और परंपरा में सेंध लगाकर विदेशी संस्कृतियों को थोपने का भी प्रयास किया गया है| वैश्वीकरण के भारतीय समाज पर प्रभाव: परमाणु परिवार का उभार : वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप परम्परागत संयुक्त भारतीय का ह्रास हो रहा है और परमाणु परिवार का उभार । जाति व्यवस्था में परिवर्तन : वैश्वीकरण ने परंपरागत जाति व्यवस्था को कमजोर किया है । वही साथ ही जातियों के उभार में नए प्रकार से प्रेरक के रूप में कार्य कर रहा है । महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन : वैश्वीकरण ने भारतीय समाज में महिलाओं की परंपरागत भूमिका में परिवर्तन किया है । अब महिलाएं महज घर की चहारदीवारी के भीतर रहने को बाध्य नहीं है , बल्कि समाज में पुरुषों की बराबरी से अपना महत्व सिद्ध कर रही है । भारतीय ग्रामीण व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव : ग्रामीण समाज पर भी वैश्वीकरण का स्पष्ट प्रभाव दृष्टिगत । वस्त्र: महिलाओं के लिएपारंपरिक भारतीय कपड़े साड़ी, सूट इत्यादि हैं और पुरुषों के लिए पारंपरिक कपड़े धोती, कुर्ता हैं।हिंदू विवाहित महिलाओं ने लाल बिंदी और सिंधुर को भी सजाया, लेकिन अब, यह एक बाध्यता नहीं है।भारतीय लड़कियों के बीच जींस, टी-शर्ट, मिनी स्कर्ट पहनना आम हो गया है। भारतीय प्रदर्शन कला: भारत केसंगीत में धार्मिक, लोक और शास्त्रीय संगीत की किस्में शामिल हैं। भारतीय नृत्य के भी विविध लोक और शास्त्रीय रूप हैं। भरतनाट्यम, कथक, कथकली, मोहिनीट्टम, कुचीपुडी, ओडिसी भारत में लोकप्रिय नृत्य रूप हैं।संक्षेप में कलारिपयट्टू या कालारी को दुनिया की सबसे पुरानी मार्शल आर्ट माना जाता है। लेकिन हाल ही में, पश्चिमीसंगीत भीहमारे देश में बहुत लोकप्रिय हो रहा है।पश्चिमी संगीत के साथ भारतीय संगीत को फ्यूज करना संगीतकारों के बीच प्रोत्साहित किया जाता है।अधिक भारतीय नृत्य कार्यक्रम विश्व स्तर पर आयोजित किए जाते हैं।भरतनाट्यमसीखने वालों की संख्या बढ़ रही है।भारतीय युवाओं के बीच जैज़, हिप हॉप, साल्सा, बैले जैसे पश्चिमी नृत्य रूप आम हो गए हैं। वृद्धावस्था भेद्यता: परमाणु परिवारों के उदय ने सामाजिक सुरक्षा को कम कर दिया है जोसंयुक्त परिवारप्रदान करता है।इसने बुढ़ापे में व्यक्तियों की अधिक आर्थिक, स्वास्थ्य और भावनात्मक भेद्यता को जन्म दिया है। व्यापक मीडिया: दुनियाभर से समाचार,संगीत, फिल्में, वीडियो तक अधिक पहुंच है।विदेशी मीडिया घरों ने भारत में अपनी उपस्थिति में वृद्धि की है।भारत हॉलीवुड फिल्मों के वैश्विक लॉन्च का हिस्सा है। यह हमारे समाज पर एक मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव है| हमयह नहीं कह सकते कि वैश्वीकरण का प्रभावपूरी तरह से सकारात्मकया पूरी तरह से नकारात्मक रहा है। ऊपर वर्णित प्रत्येक प्रभाव कोसकारात्मक और नकारात्मकदोनों के रूप में देखा जा सकता है।हालांकि, यह चिंता का मुद्दा तब बन जाता है, जब भारतीय संस्कृति परवैश्वीकरण का नकारात्मक प्रभाव देखा जाता है।
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निर्वाचन सुधार से आप क्या समझते हैं ? साथ ही इस दिशा में किये गए प्रयासों का भी उल्लेख कीजिये | (150-200 शब्द) What do you understand by the election reform ? Also mention the efforts made in this direction . (150-200 Words)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत निर्वाचन सुधार का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात निर्वाचन सुधार के क्षेत्र किये विभीन प्रयासों का उदहारण देते हुए उत्ते को विस्तारित कीजिये | अंत में निर्वाचन सुधार का महत्व बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - निर्वाचन सुधार- लोकतंत्र के लिए आवश्यक है की देश में सुशासन के लिए सबसे आचे प्रत्याशी को जनप्रतिनिधि के रूप में चुना जाये | इससे लोगों में नातिक मूल्यों को बढ़ावा मिलता है और ऐसे उम्मीदवारों की संख्या भी बढ़ती है जो सकारात्मक वोट पर चुनाव जीतते हैं | लोकतंत्र में मतदाता को उम्मीदवारों को चुनने या अस्वीकृत करने अवसर दिया जाना चाहिए , जिससे राजनीतिक दल अच्छे उम्मीदवार उतारने पर विवश हों | निर्वाचन सुधार सम्बन्धी किये गए प्रयास विभिन्न समितियों का गठन निर्वाचन सुधार पर गठित विभिन्न समितियों के द्वारा भी निर्वाचन सुधार का समर्थन अलग-अलग तरीकों से किया गया है , जैसे - दिनेश गोस्वामी समिति का गठन निर्वाचन सुधार को लेकर , वोहरा समिति राजनीति के अपराधीकरण पर , इन्द्रजीत गुप्ता समिति राज्य के निवेश पर गठित थी | इनके अतिरिक्त अन्य समिति/ आयोग जैसे - विधि आयोग , चुनाव आयोग , संविधान की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग का गठन भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है | नोटा 2013 में नोटा व्यवस्था लागू की गयी , जिसे अहम सुधार माना जाता है | नोटा से तात्पर्य " उपरोक्त में से कोई नहीं " से है | यह व्यवस्था मतदाता को किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में वोट नहीं देने और मतदाता की पसंद को रिकॉर्ड करने का विकल्प देती है | 2013 से 2016 के बीच हुए विभिन्न राज्यों के चुनाव में नोटा के तहत औसतन 2 प्रतिशत वोट पड़े | वापस बुलाने की प्रणाली (System of Recall)- इसकी भी चर्चा समय -समय पर निर्वाचन सुधार प्रणाली के तहत की जाती रही है | निर्वाचन में राज्य का निवेश - निर्वाचन में राज्य द्वारा निवेश की भी बात निर्वाचन सुधार प्रणाली के अंतर्गत समय -समय पर की जाती रही है | पिंक बूथ निर्वाचन आयोग ने 2018 में सुधारों को लेकर एक और नविन प्रयोग किया , जिसका उद्देश्य महिलाओं को बड़ी संख्या में वोट डालने के लिए प्रेरित करना था | इसमें मतदान केन्द्रों को गुलाबी रंग से सजाया जाता है तथा उस बूथ पर तैनात सभी कर्मचारी गुलाबी रंग के कपडे पहनते हैं , जो की महिलायें ही होती है | इन बूथों का इस्तेमाल कई चुनावों में सफलतापूर्वक किया गया है | निर्वाचन व राजनीति सम्बन्धी पारदर्शिता से ही लोकतंत्र मजबूत होता है , इसलिए निर्वाचन सम्बन्धी सुधारों को लागू किया जाना आवश्यक है ताकि देश भ्रष्टाचार व अपराधमुक्त होकर विकास व समृद्धि की तरफ अग्रसर हो सके |
##Question:निर्वाचन सुधार से आप क्या समझते हैं ? साथ ही इस दिशा में किये गए प्रयासों का भी उल्लेख कीजिये | (150-200 शब्द) What do you understand by the election reform ? Also mention the efforts made in this direction . (150-200 Words)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत निर्वाचन सुधार का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात निर्वाचन सुधार के क्षेत्र किये विभीन प्रयासों का उदहारण देते हुए उत्ते को विस्तारित कीजिये | अंत में निर्वाचन सुधार का महत्व बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - निर्वाचन सुधार- लोकतंत्र के लिए आवश्यक है की देश में सुशासन के लिए सबसे आचे प्रत्याशी को जनप्रतिनिधि के रूप में चुना जाये | इससे लोगों में नातिक मूल्यों को बढ़ावा मिलता है और ऐसे उम्मीदवारों की संख्या भी बढ़ती है जो सकारात्मक वोट पर चुनाव जीतते हैं | लोकतंत्र में मतदाता को उम्मीदवारों को चुनने या अस्वीकृत करने अवसर दिया जाना चाहिए , जिससे राजनीतिक दल अच्छे उम्मीदवार उतारने पर विवश हों | निर्वाचन सुधार सम्बन्धी किये गए प्रयास विभिन्न समितियों का गठन निर्वाचन सुधार पर गठित विभिन्न समितियों के द्वारा भी निर्वाचन सुधार का समर्थन अलग-अलग तरीकों से किया गया है , जैसे - दिनेश गोस्वामी समिति का गठन निर्वाचन सुधार को लेकर , वोहरा समिति राजनीति के अपराधीकरण पर , इन्द्रजीत गुप्ता समिति राज्य के निवेश पर गठित थी | इनके अतिरिक्त अन्य समिति/ आयोग जैसे - विधि आयोग , चुनाव आयोग , संविधान की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग का गठन भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है | नोटा 2013 में नोटा व्यवस्था लागू की गयी , जिसे अहम सुधार माना जाता है | नोटा से तात्पर्य " उपरोक्त में से कोई नहीं " से है | यह व्यवस्था मतदाता को किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में वोट नहीं देने और मतदाता की पसंद को रिकॉर्ड करने का विकल्प देती है | 2013 से 2016 के बीच हुए विभिन्न राज्यों के चुनाव में नोटा के तहत औसतन 2 प्रतिशत वोट पड़े | वापस बुलाने की प्रणाली (System of Recall)- इसकी भी चर्चा समय -समय पर निर्वाचन सुधार प्रणाली के तहत की जाती रही है | निर्वाचन में राज्य का निवेश - निर्वाचन में राज्य द्वारा निवेश की भी बात निर्वाचन सुधार प्रणाली के अंतर्गत समय -समय पर की जाती रही है | पिंक बूथ निर्वाचन आयोग ने 2018 में सुधारों को लेकर एक और नविन प्रयोग किया , जिसका उद्देश्य महिलाओं को बड़ी संख्या में वोट डालने के लिए प्रेरित करना था | इसमें मतदान केन्द्रों को गुलाबी रंग से सजाया जाता है तथा उस बूथ पर तैनात सभी कर्मचारी गुलाबी रंग के कपडे पहनते हैं , जो की महिलायें ही होती है | इन बूथों का इस्तेमाल कई चुनावों में सफलतापूर्वक किया गया है | निर्वाचन व राजनीति सम्बन्धी पारदर्शिता से ही लोकतंत्र मजबूत होता है , इसलिए निर्वाचन सम्बन्धी सुधारों को लागू किया जाना आवश्यक है ताकि देश भ्रष्टाचार व अपराधमुक्त होकर विकास व समृद्धि की तरफ अग्रसर हो सके |
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"अखिल भारतीय सेवा भारत के संघीय शासन प्रणाली के विचारधारा के अनुरूप है|" क्या आप इस कथन से सहमत है? चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द, अंक - 10 ) The All India Service conforms to the ideology of India"s federal governance system. Do you agree with this statement? Discuss. (150-200 Words, Marks - 10)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत अखिल भारतीय सेवाओं का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात अखिल भारतीय सेवा संघीय शासन प्रणाली के अनुरूप है, यह तर्क प्रस्तुत करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - केन्द्रीय तथा राज्य सेवाओं के अतिरिक्त संविधान के अनुच्छेद 312 में केंद्र व राज्य दोनों के लिए अखिल भारतीय सेवाओं के सृजन सम्बन्धी उपबंध हैं | अखिल भारतीय सेवा- भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा एवं भारतीय वन सेवा का संयुक्त रूप है | देश के प्रशासन में महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए तथा निर्णायक सम्बन्धी प्रबंधन हेतु एकीकृत एवं सुगठित अखिल भारतीय सेवा के सृजन का उपबंध भारतीय संविधान में किया गया है | अखिल भारतीय सेवा संघीय शासन प्रणाली के अनुरूप - अखिल भारतीय सेवा का उद्देश्य राष्ट्र की एकता एवं अखंडता को प्रोत्साहित करने से है | अखिल भारतीय सेवा के माध्यम से केंद्र के द्वारा राज्यों पर नियंत्रण कर पाना संभव हो पता है | जिससे केंद्र की नीतियों को प्रभावी तौर पर राज्यों में लागू किया जाता है | अखिल भारतीय सेवा सहकारी संघवाद की विचारधारा के अनुरूप है , जिससे केंद्र व राज्यों के बीच के प्रयासों का उचित तरीके से समन्वय हो सके | सरकार की कार्यकुशलता को प्रभावी बनाने में इन सेवाओं का महत्वपूर्ण योगदान है | क्योंकि इन पर कोई राजनैतिक दबाव नहीं होता तथा अंतिम नियंत्रण केंद्र सरकार का होता है | दक्षता एवं क्षमता के आधार पर भी यदि देखा जाये तो अखिल भारतीय सेवाएँ राज्य की सेवाओं से अधिक बेहतर एवं प्रभावशाली हैं | अखिल भारतीय सेवाओं के माध्यम से केंद्र व राज्य के साथ-साथ विभिन्न राज्यों के मध्य समन्वय स्थापित करने में आसानी होती है | अधिकाँश रणनीतिक पदों पर भी अधिक अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों को सम्मिलित किया जाता है | अखिल भारतीय सेवा प्रशासन में एकरूपता को प्राप्त करने का एक माध्यम है | अतः हम कह सकते हैं कि अखिल भारतीय सेवा संघीय शासन प्रणाली के अनुरूप है | सरकारिया आयोग के द्वारा भी भारत में अधिक से अधिक अखिल भारतीय सेवा के गठन की अनुशंसा की गयी है |
##Question:"अखिल भारतीय सेवा भारत के संघीय शासन प्रणाली के विचारधारा के अनुरूप है|" क्या आप इस कथन से सहमत है? चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द, अंक - 10 ) The All India Service conforms to the ideology of India"s federal governance system. Do you agree with this statement? Discuss. (150-200 Words, Marks - 10)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत अखिल भारतीय सेवाओं का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात अखिल भारतीय सेवा संघीय शासन प्रणाली के अनुरूप है, यह तर्क प्रस्तुत करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - केन्द्रीय तथा राज्य सेवाओं के अतिरिक्त संविधान के अनुच्छेद 312 में केंद्र व राज्य दोनों के लिए अखिल भारतीय सेवाओं के सृजन सम्बन्धी उपबंध हैं | अखिल भारतीय सेवा- भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा एवं भारतीय वन सेवा का संयुक्त रूप है | देश के प्रशासन में महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए तथा निर्णायक सम्बन्धी प्रबंधन हेतु एकीकृत एवं सुगठित अखिल भारतीय सेवा के सृजन का उपबंध भारतीय संविधान में किया गया है | अखिल भारतीय सेवा संघीय शासन प्रणाली के अनुरूप - अखिल भारतीय सेवा का उद्देश्य राष्ट्र की एकता एवं अखंडता को प्रोत्साहित करने से है | अखिल भारतीय सेवा के माध्यम से केंद्र के द्वारा राज्यों पर नियंत्रण कर पाना संभव हो पता है | जिससे केंद्र की नीतियों को प्रभावी तौर पर राज्यों में लागू किया जाता है | अखिल भारतीय सेवा सहकारी संघवाद की विचारधारा के अनुरूप है , जिससे केंद्र व राज्यों के बीच के प्रयासों का उचित तरीके से समन्वय हो सके | सरकार की कार्यकुशलता को प्रभावी बनाने में इन सेवाओं का महत्वपूर्ण योगदान है | क्योंकि इन पर कोई राजनैतिक दबाव नहीं होता तथा अंतिम नियंत्रण केंद्र सरकार का होता है | दक्षता एवं क्षमता के आधार पर भी यदि देखा जाये तो अखिल भारतीय सेवाएँ राज्य की सेवाओं से अधिक बेहतर एवं प्रभावशाली हैं | अखिल भारतीय सेवाओं के माध्यम से केंद्र व राज्य के साथ-साथ विभिन्न राज्यों के मध्य समन्वय स्थापित करने में आसानी होती है | अधिकाँश रणनीतिक पदों पर भी अधिक अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों को सम्मिलित किया जाता है | अखिल भारतीय सेवा प्रशासन में एकरूपता को प्राप्त करने का एक माध्यम है | अतः हम कह सकते हैं कि अखिल भारतीय सेवा संघीय शासन प्रणाली के अनुरूप है | सरकारिया आयोग के द्वारा भी भारत में अधिक से अधिक अखिल भारतीय सेवा के गठन की अनुशंसा की गयी है |
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Inland waterways have the potential to be used as major transport mode in India. Explain. (150 words/10 marks)
Approach 1. Introduce the answer by briefly explaining Inland waterways Transport. 2. Then highlight the Potential/Benefits of the same. 3.Conclude accordingly Answer Inland Waterways Transport (IWT) is a network of rivers, backwaters, canals, and creeks that can be utilized for transportation instead of or in addition to roads and railways. India has a large network of water bodies in the form of rivers, canals, backwaters, and creeks. The total navigable length is 14,500 km, out of which about 5,200 km of the river and 4,000 km of canals can be used by mechanized crafts. However, inland water transport accounts for less than 1% of its freight traffic, compared to 35% in Bangladesh and 20% in Germany. Potential/Benefits of Inland waterways 1. Cheaper and effective Logistic support: Nearly 60 % of goods today travel by congested roads 25 % by rail networks. This slows down the movement of cargo, adds to uncertainties, increases the costs of trade. So logistics costs in the country can be brought down considerably by transporting more and more goods by waterways. 2. Environment-Friendly : Fuel costs are low and environmental pollution is lower than in transport by road, rail, or air.Thus, it helps in achieving India’s INDC commitments under the Paris Agreement of UNFCCC. 3. There is a huge potential for domestic cargo transportation as well as for cruise, tourism and passenger traffic. 4. There is huge potential for public-private partnership (PPP) led investments in dredging, construction, operation and maintenance of barges, terminals, storage facilities, and navigation, as well as tourism. 5. It will help in the generation of millions of job opportunities, especially at the Grassroot level. 6. It will boost the maritime trade of the states and augment their economies. 7. As the acquisition of land for national and State highways becomes scarce and the cost of construction of roads, flyovers, and bridges goes up, the government is now exploring using water as a means of public transportation. Conclusion A sound and efficient transport infrastructure is the key to boosting economic growth and in turn, to alleviating poverty and promoting sustainable development. The inland water transport system ensures both, by way of providing access, mobility and connectivity and generating employment at the grassroots with lesser environmental footprint and cost.
##Question:Inland waterways have the potential to be used as major transport mode in India. Explain. (150 words/10 marks)##Answer:Approach 1. Introduce the answer by briefly explaining Inland waterways Transport. 2. Then highlight the Potential/Benefits of the same. 3.Conclude accordingly Answer Inland Waterways Transport (IWT) is a network of rivers, backwaters, canals, and creeks that can be utilized for transportation instead of or in addition to roads and railways. India has a large network of water bodies in the form of rivers, canals, backwaters, and creeks. The total navigable length is 14,500 km, out of which about 5,200 km of the river and 4,000 km of canals can be used by mechanized crafts. However, inland water transport accounts for less than 1% of its freight traffic, compared to 35% in Bangladesh and 20% in Germany. Potential/Benefits of Inland waterways 1. Cheaper and effective Logistic support: Nearly 60 % of goods today travel by congested roads 25 % by rail networks. This slows down the movement of cargo, adds to uncertainties, increases the costs of trade. So logistics costs in the country can be brought down considerably by transporting more and more goods by waterways. 2. Environment-Friendly : Fuel costs are low and environmental pollution is lower than in transport by road, rail, or air.Thus, it helps in achieving India’s INDC commitments under the Paris Agreement of UNFCCC. 3. There is a huge potential for domestic cargo transportation as well as for cruise, tourism and passenger traffic. 4. There is huge potential for public-private partnership (PPP) led investments in dredging, construction, operation and maintenance of barges, terminals, storage facilities, and navigation, as well as tourism. 5. It will help in the generation of millions of job opportunities, especially at the Grassroot level. 6. It will boost the maritime trade of the states and augment their economies. 7. As the acquisition of land for national and State highways becomes scarce and the cost of construction of roads, flyovers, and bridges goes up, the government is now exploring using water as a means of public transportation. Conclusion A sound and efficient transport infrastructure is the key to boosting economic growth and in turn, to alleviating poverty and promoting sustainable development. The inland water transport system ensures both, by way of providing access, mobility and connectivity and generating employment at the grassroots with lesser environmental footprint and cost.
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जाति व्यवस्था से आप क्या समझते हैं ? स्वतंत्रता पश्चात जाति व्यवस्था में आये संरचनात्मक परिवर्तनों को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द) What do you understand by caste system? Explain the structural changes in the caste system after independence. (150 to 200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में जाति व्यवस्था को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में स्वतंत्रता पश्चात जाति व्यवस्था में आये संरचनात्मक परिवर्तनों को स्पष्ट कीजिये| 3- अंतिम में जाति व्यवस्था के उन्मूलन के सन्दर्भ में उपाय बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये प्रत्येक समाज में व्याप्त विभेदों के आधार पर समाज के वर्गों को अलग-अलग प्रकार से श्रेणीबद्ध किया जाता है, जिसके फलस्वरूप असामनता एवं वंचन की स्थिति स्थापित होती है| भारतीय संदर्भ में यह सामाजिक स्तरीकरण जाति व्यवस्था के रूप में दिखाई पड़ता है| इस प्रकार जाति व्यवस्था से तात्पर्य उस श्रेणीबद्धता से है जिसके आधार पर विभिन्न समुदायों के जीवन अवसर सुनिश्चित होते हैं| ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भारतीय समाज में इस असमानता का प्रारंभ आर्यन आगमन से माना जाता है| आर्य जो श्वेत वर्ण के थें, ने समाज को पृथक्कृत करते हुए श्वेत वर्ण एवं कृष्ण वर्ण आधारित द्विवर्णीय व्यवस्था प्रारंभ की जो कालांतर में जन्म आधारित होते हुए चतुषवर्णीय हो गयी| इतिहासकारों का यह मत है कि वर्ण व्यवस्था प्रारम्भ में नृजातीय तथा कर्म आधारित थी परन्तु उत्तर वैदिक काल तक आते आते यह जन्म-आधारित विशिष्टता बन गयी| भारतीय समाज में स्वतंत्रता के पश्चात जाति व्यवस्था में अनेक अवसंरचनात्मक परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं| स्वतंत्रता पश्चात जाति व्यवस्था भारतीय समाज में स्वतंत्रता के पश्चात जाति व्यवस्था में अनेक अवसंरचनात्मक परिवर्तन दिखाई पड़े जिनके निम्नलिखित 4 मुख्य कारण थें यथा अनुच्छेद 15 एवं 17 जैसे मूल अधिकारों के आधार पर राज्य ने जाति आधारित भेदभाव को अस्वीकृत किया, विभिन्न निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रमों द्वारा गतिशीलता; सरकार द्वारा गरीबी हटाने एवं कल्याण हेतु किये जा रहे प्रयास ने भी जाति आधारित भेदभाव को कमजोर किया आरक्षण प्रणाली द्वारा सुरक्षात्मक भेदभाव आधारित गतिशीलता; राजनीतिक आरक्षण के परिणाम स्वरुप, राजनीतिक सशक्तिकरण की प्रक्रिया का आरम्भ होना और राजनीतिक चेतना का विकास हुआ जाति आधारित राजनीति; नयी राजनीतिक प्रक्रिया में राजनीतिक संचेतना के परिणाम स्वरुप वोट बैंक राजनीति प्रारम्भ हुई| रजनी कोठारी के मतानुसार जाति आधारित राजनीति के निम्नलिखित 3 परिणाम दिखाई देते हैं पहले चरण में विभिन्न जातियों का समांगीकरण तथा इस आधार पर जातिगत राजनैतिक समीकरण; वोटबैंक राजनीति के अंतर्गत अलग-अलग जाति समूहों की पहचान आधारित राजनीति जिसके परिणामस्वरूप विकासात्मक मुद्दों के संदर्भ में उदासीनता; धर्म एवं जाति का समांगीकरण जिसके परिणामस्वरूप 1990 के दशक में मंडल आयोग की राजनीति आरम्भ हुई| दूसरे चरण में (मंडल कमीशन के बाद) अलग अलग जातियां समांगीकृत होते हुए एक जाति समूह में परिवर्तित होनी प्रारम्भ हुई इन सबके परिणाम स्वरूप यद्यपि जाति एक व्यवस्था के तौर पर तो कमजोर हुई परन्तु एक राजनीतिक पहचान के सन्दर्भ में सुदृढ़ भी हुई जो जाति व्यवस्था के समापन में मुख्य अवरोधक बना| अतः यह कहा जा सकता है कि 21 वीं सदी में यह जाति व्यवस्था एक दोराहे पर खड़ी है जहाँ इसे यह निर्धारित करना होगा अम्बेडकरवादी दृष्टिकोण अपनाते हुए जाति को पूर्णतः समाप्त किया जाए और यदि ऐसा है तो जाति आधारित विवाह के प्रतिपक्ष में अंतरजातीय विवाहों को प्रोत्साहित किया जाए तथा जाति आधारित आरक्षण प्रणाली को नए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संशोधित किया जाए जिसमें जाति एक घटक हो न कि एक मात्र घटक| वहीं दूसरी ओर गांधीवादी दृष्टिकोण को मानते हुए जाति आधारित कुरीतियों को समाप्त करना है तो इस सन्दर्भ में कठोर कानून बनाए जाएँ एवं समाजीकरण की प्रक्रिया को बदला जाए ताकि एक समतामूलक समाज की स्थापना की जा सके|
##Question:जाति व्यवस्था से आप क्या समझते हैं ? स्वतंत्रता पश्चात जाति व्यवस्था में आये संरचनात्मक परिवर्तनों को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द) What do you understand by caste system? Explain the structural changes in the caste system after independence. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में जाति व्यवस्था को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में स्वतंत्रता पश्चात जाति व्यवस्था में आये संरचनात्मक परिवर्तनों को स्पष्ट कीजिये| 3- अंतिम में जाति व्यवस्था के उन्मूलन के सन्दर्भ में उपाय बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये प्रत्येक समाज में व्याप्त विभेदों के आधार पर समाज के वर्गों को अलग-अलग प्रकार से श्रेणीबद्ध किया जाता है, जिसके फलस्वरूप असामनता एवं वंचन की स्थिति स्थापित होती है| भारतीय संदर्भ में यह सामाजिक स्तरीकरण जाति व्यवस्था के रूप में दिखाई पड़ता है| इस प्रकार जाति व्यवस्था से तात्पर्य उस श्रेणीबद्धता से है जिसके आधार पर विभिन्न समुदायों के जीवन अवसर सुनिश्चित होते हैं| ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भारतीय समाज में इस असमानता का प्रारंभ आर्यन आगमन से माना जाता है| आर्य जो श्वेत वर्ण के थें, ने समाज को पृथक्कृत करते हुए श्वेत वर्ण एवं कृष्ण वर्ण आधारित द्विवर्णीय व्यवस्था प्रारंभ की जो कालांतर में जन्म आधारित होते हुए चतुषवर्णीय हो गयी| इतिहासकारों का यह मत है कि वर्ण व्यवस्था प्रारम्भ में नृजातीय तथा कर्म आधारित थी परन्तु उत्तर वैदिक काल तक आते आते यह जन्म-आधारित विशिष्टता बन गयी| भारतीय समाज में स्वतंत्रता के पश्चात जाति व्यवस्था में अनेक अवसंरचनात्मक परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं| स्वतंत्रता पश्चात जाति व्यवस्था भारतीय समाज में स्वतंत्रता के पश्चात जाति व्यवस्था में अनेक अवसंरचनात्मक परिवर्तन दिखाई पड़े जिनके निम्नलिखित 4 मुख्य कारण थें यथा अनुच्छेद 15 एवं 17 जैसे मूल अधिकारों के आधार पर राज्य ने जाति आधारित भेदभाव को अस्वीकृत किया, विभिन्न निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रमों द्वारा गतिशीलता; सरकार द्वारा गरीबी हटाने एवं कल्याण हेतु किये जा रहे प्रयास ने भी जाति आधारित भेदभाव को कमजोर किया आरक्षण प्रणाली द्वारा सुरक्षात्मक भेदभाव आधारित गतिशीलता; राजनीतिक आरक्षण के परिणाम स्वरुप, राजनीतिक सशक्तिकरण की प्रक्रिया का आरम्भ होना और राजनीतिक चेतना का विकास हुआ जाति आधारित राजनीति; नयी राजनीतिक प्रक्रिया में राजनीतिक संचेतना के परिणाम स्वरुप वोट बैंक राजनीति प्रारम्भ हुई| रजनी कोठारी के मतानुसार जाति आधारित राजनीति के निम्नलिखित 3 परिणाम दिखाई देते हैं पहले चरण में विभिन्न जातियों का समांगीकरण तथा इस आधार पर जातिगत राजनैतिक समीकरण; वोटबैंक राजनीति के अंतर्गत अलग-अलग जाति समूहों की पहचान आधारित राजनीति जिसके परिणामस्वरूप विकासात्मक मुद्दों के संदर्भ में उदासीनता; धर्म एवं जाति का समांगीकरण जिसके परिणामस्वरूप 1990 के दशक में मंडल आयोग की राजनीति आरम्भ हुई| दूसरे चरण में (मंडल कमीशन के बाद) अलग अलग जातियां समांगीकृत होते हुए एक जाति समूह में परिवर्तित होनी प्रारम्भ हुई इन सबके परिणाम स्वरूप यद्यपि जाति एक व्यवस्था के तौर पर तो कमजोर हुई परन्तु एक राजनीतिक पहचान के सन्दर्भ में सुदृढ़ भी हुई जो जाति व्यवस्था के समापन में मुख्य अवरोधक बना| अतः यह कहा जा सकता है कि 21 वीं सदी में यह जाति व्यवस्था एक दोराहे पर खड़ी है जहाँ इसे यह निर्धारित करना होगा अम्बेडकरवादी दृष्टिकोण अपनाते हुए जाति को पूर्णतः समाप्त किया जाए और यदि ऐसा है तो जाति आधारित विवाह के प्रतिपक्ष में अंतरजातीय विवाहों को प्रोत्साहित किया जाए तथा जाति आधारित आरक्षण प्रणाली को नए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संशोधित किया जाए जिसमें जाति एक घटक हो न कि एक मात्र घटक| वहीं दूसरी ओर गांधीवादी दृष्टिकोण को मानते हुए जाति आधारित कुरीतियों को समाप्त करना है तो इस सन्दर्भ में कठोर कानून बनाए जाएँ एवं समाजीकरण की प्रक्रिया को बदला जाए ताकि एक समतामूलक समाज की स्थापना की जा सके|
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ललितकला तथा वास्तुकला के क्षेत्र में मौर्यों के योगदान या मौर्यकालीन ललितकला तथा वास्तुकला का वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Describe the contribution of the Mauryans in the field of Art(Fine Arts) and Architecture. (150-200 words; 10 Marks)
एप्रोच- भूमिका में मौर्य काल के बारे में संक्षिप्त चर्चा कीजिये| मौर्यकालीन ललितकला एवं वास्तुकला की चर्चा कीजिये| संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- मौर्य राजवंश(322-185 ईसा पूर्व) ने 137 वर्षभारत में राज्य किया। इसकी स्थापना का श्रेयचन्द्रगुप्त मौर्य और उसके मन्त्रीआचार्य चाणक्य को दिया जाता है, जिन्होंनेनंदवंश केसम्राट घनानन्द को पराजित किया। यह साम्राज्य पूर्व मेंमगध राज्य मेंगंगा नदी के मैदानों से शुरू हुआ। इसकी राजधानीपाटलिपुत्र थी। मौर्यकालीन ललितकला एवं वास्तुकला कला की दृष्टि सेहड़प्पा की सभ्यता औरमौर्य काल के बीच लगभग 1500 वर्ष का अंतराल है। इस बीच की कला के भौतिकअवशेष उपलब्ध नहीं है।महाकाव्यों और बौद्ध ग्रंथों में हाथीदाँत,मिट्टी औरधातुओं के काम का उल्लेख है। किन्तु मौर्य काल से पूर्ववास्तुकला औरमूर्तिकला के मूर्त उदाहरण कम ही मिलते हैं। इस युग में कला के दो रूप मिलते हैं- पहला, राजरक्षकों के द्वारा निर्मित कला, जो कि मौर्य प्रासाद और अशोक स्तंभों में पाई जाती है। दूसरा, वह रूप जो परखम के यक्षदीदारगंज की चामर ग्राहिणी और वेसनगर की यक्षिणी में देखने को मिलता है। मौर्यकाल में विभिन्न शासकों ने कई नगरों के साथ-साथ स्तूपों, गुफाओं तथा स्तंभों का निर्माण करवाया। इस दौरान अशोक ने स्थापत्य कला में काफी महत्वपूर्ण योगदान दिया, उसके द्वारा निर्मित किये गए कई प्रतीक व चिह्न वर्तमान में भारत के राष्ट्रीय प्रतीक हैं। अशोक के स्तम्भ चुनार के बलुआ पत्थर के बने हुए हैं और 40 फीट से 50 फीट तक ऊँचे हैं| इन स्तम्भों की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि प्रायः प्रत्येक स्तम्भ के ऊपर एक अलग पत्थर का मस्तक है| मस्तक के तीन भाग हैं| सबसे नीचे का भाग उल्टी घंटी की तरह है| सारनाथ के शीर्ष स्तम्भ पर चार सिंह पीठ सटाए बैठे हैं। यह चार सिंह एक चक्र धारण किये हुए हैं। चक्र में 24 तीलियाँ हैं। यह चक्र बुद्ध के धर्म चक्र-प्रवर्तन का प्रतीक है। अशोक के एकाश्म स्तंभों का सर्वोत्कृष्ट नमूना सारनाथ के सिंहस्तम्भ का शीर्ष है। रामपुरवा में नटूवा बैल ललित मुद्रा में खड़ा है। रामपुरवा के स्तम्भ शीर्ष को राष्ट्रपति भवन में रखा गया है| संकिशा स्तम्भ के शीर्ष पर हाथी की आकृति है। मौर्यकाल में वास्तुकला का प्रथम उदाहरण चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रासाद है| इसका सभा भवन अनेक स्तम्भों पर खड़ा था जिन पर अत्यधिक सुन्दर मूर्तियों और चित्रकला का प्रदर्शन किया गया था| मेगास्थनीज के अनुसार ईरान की राजधानी सूसा के राजप्रासाद से यह प्रासाद अधिक सुन्दर तथा भव्य था| बौद्ध ग्रन्थोंके अनुसार अशोक ने 8,400 स्तूप, चैत्य और विहार बनवाये थे| संभवतः अशोक ने श्रीनगर तथा ललितपाटन (नेपाल) नामक दो नगरों का निर्माण करवाया| मौर्य काल में राजकीय स्थापत्य और मूर्तिकला के असाधारण विकास पर यूनानी और ईरानी सम्पर्क का प्रभाव भी दृष्टिगोचर होता है| मौर्यकाल में स्तूप की वस्तुकला भी काफी विकसित हुई। सम्राट अशोक ने काफी संख्या में स्तूपों का निर्माण करवाया। इस दौरान निर्मित किये गए प्रमुख स्तूप इस प्रकार से हैं – साँची का महास्तूप, सारनाथ का धर्मराजिका स्तूप, भरहुत और तक्षशिला स्तूप इत्यादि। मौर्यकालीन स्तूप साहित्यिक साक्ष्यों से बुद्ध के शरीर त्याग के पश्चात स्तूप निर्माण की चर्चा तो मिलती है लेकिन उसके अवशेष नहीं मिलते हैं| मौर्य शासक अशोक के समय साँची, सारनाथ, बोधगया इत्यादि स्थलों पर स्तूपों का निर्माण हुआ| अधिकांशतः स्तूप क्षतिग्रस्त अवस्था में हैं| स्तूप की संरचना से संबंधित सभी विशेषताएं इसमें देखी जा सकती हैं| अशोककालीन स्तूपों में ईंटों का प्रयोग हुआ है तथा तोरण एवं रेलिंग में लकड़ी का| मौर्यकालीन विहार भिक्षुओं के निवासस्थल के संदर्भ में विहार की चर्चा; बौद्ध, जैन, ब्राह्मण सभी धर्मों से संबंधित विहार के साक्ष्य; दो प्रकार के विहार- प्रथम गुफाओं को काटकर; द्वितीय- संरचनात्मक विहार; साहित्यिक साक्ष्यों से बुद्ध के समकक्ष कई विहारों के प्रमाण; हालाँकि, इसके भी अवशेष प्राप्त नहीं होते हैं| संभवतः, पहाड़ों को काटकर विहार निर्माण की परंपरा की शुरुआत अशोक ने की| गया के बराबर नामक पहाड़ियों में सुदामा, विश्वझोपड़ी, तथा कर्णचौपड़ नामक विहारों का निर्माण अशोक ने कराया और आजीवक संप्रदाय को दान में दिया; इसी पहाड़ी में अशोक के पौत्र दशरथ ने लोमेश ऋषि नामक विहार का निर्माण करवाया; मौर्यकालीन मूर्तिकला इसको भी दो भागों में वर्गीकृत कर अध्ययन किया जाता है- राजकीय मूर्तिकला एवं आम लोगों के द्वारा निर्मित मूर्तियाँ| राजकीय मूर्तिकला के साक्ष्य अशोक के स्तंभों एवं शिलालेखों से प्राप्त होते हैं| स्तंभों के शीर्ष से मूर्तियों के प्रमाण मिले हैं| जैसे- साँची एवं सारनाथ(4 सिंह की मूर्ति); रामपुरवा से बैल एवं शेर की मूर्ति ; धौली एवं कालशी से हाथी की मूर्ति; इन मूर्तियों में शारीरिक अनुपात, सौंदर्य, मांशपेशियों का उभार; जीवंतता, सजीव चित्रण जैसी विशेषताएं दिखाई पड़ती हैं| संभवतः इन मूर्तियों के निर्माण के पीछे राज्य का यह उद्देश्य रहा हो कि प्रजा अशोक के आदेशों को पढ़े और उसपर आचरण करे| कला को प्रजा के साथ संपर्क/संवाद के लिए अशोक के द्वारा उपयोग किया गया; पटना, मथुरा, विदिशा इत्यादि विभिन्न स्थलों से पत्थर के निर्मित यक्ष एवं यक्षिणी की मूर्तियाँ भी बड़ी संख्या में प्राप्त होती हैं| इन्हें नगर देवी एवं देवता के रूप में महत्व दिया जाता था| इसका संबंध बौद्ध,जैन एवं ब्राह्मण सभी धर्म के अनुयायियों से था| इन मूर्तियों में सौंदर्य, शारीरिक बनावट तथा अलंकरण को विशेष महत्व दिया गया है| कला के क्षेत्र में मिट्टी की मूर्तियों के साथ यक्ष एवं यक्षिणी की मूर्तियाँ आम लोगों का प्रतिनिधित्व करती हैं| वस्तुतः मौर्य काल, कला एवं स्थापत्य विकास की दृष्टि से एक समृद्ध काल था जिसकी निरंतरता में आगे मौर्योत्तर काल में मूर्तिकला की मथुरा एवं अमरावती शैली तथा गुप्त काल में मंदिर निर्माण की नागर शैली आदि का विकास हुआ|
##Question:ललितकला तथा वास्तुकला के क्षेत्र में मौर्यों के योगदान या मौर्यकालीन ललितकला तथा वास्तुकला का वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Describe the contribution of the Mauryans in the field of Art(Fine Arts) and Architecture. (150-200 words; 10 Marks)##Answer: एप्रोच- भूमिका में मौर्य काल के बारे में संक्षिप्त चर्चा कीजिये| मौर्यकालीन ललितकला एवं वास्तुकला की चर्चा कीजिये| संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- मौर्य राजवंश(322-185 ईसा पूर्व) ने 137 वर्षभारत में राज्य किया। इसकी स्थापना का श्रेयचन्द्रगुप्त मौर्य और उसके मन्त्रीआचार्य चाणक्य को दिया जाता है, जिन्होंनेनंदवंश केसम्राट घनानन्द को पराजित किया। यह साम्राज्य पूर्व मेंमगध राज्य मेंगंगा नदी के मैदानों से शुरू हुआ। इसकी राजधानीपाटलिपुत्र थी। मौर्यकालीन ललितकला एवं वास्तुकला कला की दृष्टि सेहड़प्पा की सभ्यता औरमौर्य काल के बीच लगभग 1500 वर्ष का अंतराल है। इस बीच की कला के भौतिकअवशेष उपलब्ध नहीं है।महाकाव्यों और बौद्ध ग्रंथों में हाथीदाँत,मिट्टी औरधातुओं के काम का उल्लेख है। किन्तु मौर्य काल से पूर्ववास्तुकला औरमूर्तिकला के मूर्त उदाहरण कम ही मिलते हैं। इस युग में कला के दो रूप मिलते हैं- पहला, राजरक्षकों के द्वारा निर्मित कला, जो कि मौर्य प्रासाद और अशोक स्तंभों में पाई जाती है। दूसरा, वह रूप जो परखम के यक्षदीदारगंज की चामर ग्राहिणी और वेसनगर की यक्षिणी में देखने को मिलता है। मौर्यकाल में विभिन्न शासकों ने कई नगरों के साथ-साथ स्तूपों, गुफाओं तथा स्तंभों का निर्माण करवाया। इस दौरान अशोक ने स्थापत्य कला में काफी महत्वपूर्ण योगदान दिया, उसके द्वारा निर्मित किये गए कई प्रतीक व चिह्न वर्तमान में भारत के राष्ट्रीय प्रतीक हैं। अशोक के स्तम्भ चुनार के बलुआ पत्थर के बने हुए हैं और 40 फीट से 50 फीट तक ऊँचे हैं| इन स्तम्भों की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि प्रायः प्रत्येक स्तम्भ के ऊपर एक अलग पत्थर का मस्तक है| मस्तक के तीन भाग हैं| सबसे नीचे का भाग उल्टी घंटी की तरह है| सारनाथ के शीर्ष स्तम्भ पर चार सिंह पीठ सटाए बैठे हैं। यह चार सिंह एक चक्र धारण किये हुए हैं। चक्र में 24 तीलियाँ हैं। यह चक्र बुद्ध के धर्म चक्र-प्रवर्तन का प्रतीक है। अशोक के एकाश्म स्तंभों का सर्वोत्कृष्ट नमूना सारनाथ के सिंहस्तम्भ का शीर्ष है। रामपुरवा में नटूवा बैल ललित मुद्रा में खड़ा है। रामपुरवा के स्तम्भ शीर्ष को राष्ट्रपति भवन में रखा गया है| संकिशा स्तम्भ के शीर्ष पर हाथी की आकृति है। मौर्यकाल में वास्तुकला का प्रथम उदाहरण चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रासाद है| इसका सभा भवन अनेक स्तम्भों पर खड़ा था जिन पर अत्यधिक सुन्दर मूर्तियों और चित्रकला का प्रदर्शन किया गया था| मेगास्थनीज के अनुसार ईरान की राजधानी सूसा के राजप्रासाद से यह प्रासाद अधिक सुन्दर तथा भव्य था| बौद्ध ग्रन्थोंके अनुसार अशोक ने 8,400 स्तूप, चैत्य और विहार बनवाये थे| संभवतः अशोक ने श्रीनगर तथा ललितपाटन (नेपाल) नामक दो नगरों का निर्माण करवाया| मौर्य काल में राजकीय स्थापत्य और मूर्तिकला के असाधारण विकास पर यूनानी और ईरानी सम्पर्क का प्रभाव भी दृष्टिगोचर होता है| मौर्यकाल में स्तूप की वस्तुकला भी काफी विकसित हुई। सम्राट अशोक ने काफी संख्या में स्तूपों का निर्माण करवाया। इस दौरान निर्मित किये गए प्रमुख स्तूप इस प्रकार से हैं – साँची का महास्तूप, सारनाथ का धर्मराजिका स्तूप, भरहुत और तक्षशिला स्तूप इत्यादि। मौर्यकालीन स्तूप साहित्यिक साक्ष्यों से बुद्ध के शरीर त्याग के पश्चात स्तूप निर्माण की चर्चा तो मिलती है लेकिन उसके अवशेष नहीं मिलते हैं| मौर्य शासक अशोक के समय साँची, सारनाथ, बोधगया इत्यादि स्थलों पर स्तूपों का निर्माण हुआ| अधिकांशतः स्तूप क्षतिग्रस्त अवस्था में हैं| स्तूप की संरचना से संबंधित सभी विशेषताएं इसमें देखी जा सकती हैं| अशोककालीन स्तूपों में ईंटों का प्रयोग हुआ है तथा तोरण एवं रेलिंग में लकड़ी का| मौर्यकालीन विहार भिक्षुओं के निवासस्थल के संदर्भ में विहार की चर्चा; बौद्ध, जैन, ब्राह्मण सभी धर्मों से संबंधित विहार के साक्ष्य; दो प्रकार के विहार- प्रथम गुफाओं को काटकर; द्वितीय- संरचनात्मक विहार; साहित्यिक साक्ष्यों से बुद्ध के समकक्ष कई विहारों के प्रमाण; हालाँकि, इसके भी अवशेष प्राप्त नहीं होते हैं| संभवतः, पहाड़ों को काटकर विहार निर्माण की परंपरा की शुरुआत अशोक ने की| गया के बराबर नामक पहाड़ियों में सुदामा, विश्वझोपड़ी, तथा कर्णचौपड़ नामक विहारों का निर्माण अशोक ने कराया और आजीवक संप्रदाय को दान में दिया; इसी पहाड़ी में अशोक के पौत्र दशरथ ने लोमेश ऋषि नामक विहार का निर्माण करवाया; मौर्यकालीन मूर्तिकला इसको भी दो भागों में वर्गीकृत कर अध्ययन किया जाता है- राजकीय मूर्तिकला एवं आम लोगों के द्वारा निर्मित मूर्तियाँ| राजकीय मूर्तिकला के साक्ष्य अशोक के स्तंभों एवं शिलालेखों से प्राप्त होते हैं| स्तंभों के शीर्ष से मूर्तियों के प्रमाण मिले हैं| जैसे- साँची एवं सारनाथ(4 सिंह की मूर्ति); रामपुरवा से बैल एवं शेर की मूर्ति ; धौली एवं कालशी से हाथी की मूर्ति; इन मूर्तियों में शारीरिक अनुपात, सौंदर्य, मांशपेशियों का उभार; जीवंतता, सजीव चित्रण जैसी विशेषताएं दिखाई पड़ती हैं| संभवतः इन मूर्तियों के निर्माण के पीछे राज्य का यह उद्देश्य रहा हो कि प्रजा अशोक के आदेशों को पढ़े और उसपर आचरण करे| कला को प्रजा के साथ संपर्क/संवाद के लिए अशोक के द्वारा उपयोग किया गया; पटना, मथुरा, विदिशा इत्यादि विभिन्न स्थलों से पत्थर के निर्मित यक्ष एवं यक्षिणी की मूर्तियाँ भी बड़ी संख्या में प्राप्त होती हैं| इन्हें नगर देवी एवं देवता के रूप में महत्व दिया जाता था| इसका संबंध बौद्ध,जैन एवं ब्राह्मण सभी धर्म के अनुयायियों से था| इन मूर्तियों में सौंदर्य, शारीरिक बनावट तथा अलंकरण को विशेष महत्व दिया गया है| कला के क्षेत्र में मिट्टी की मूर्तियों के साथ यक्ष एवं यक्षिणी की मूर्तियाँ आम लोगों का प्रतिनिधित्व करती हैं| वस्तुतः मौर्य काल, कला एवं स्थापत्य विकास की दृष्टि से एक समृद्ध काल था जिसकी निरंतरता में आगे मौर्योत्तर काल में मूर्तिकला की मथुरा एवं अमरावती शैली तथा गुप्त काल में मंदिर निर्माण की नागर शैली आदि का विकास हुआ|
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वैश्वीकरण का वृद्धजनों पर पड़ने वाले प्रभावों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये । ( 150-200 शब्द ) Critically examine the effects of globalization on the elderly. (150-200 words)
दृष्टिकोण: वैश्वीकरण को परिभाषित करें वृद्धजनों पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभावों की बिंदुवत चर्चा कीजिये। वैश्वीकरण ने किस प्रकार वृद्धजन को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है। संक्षिप्त चर्चा कीजिये। संतुलित निष्कर्ष से उत्तर समाप्त कीजिये। उत्तर : वैश्वीकरण, विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं एवं समाज के मध्य पारस्परिक निर्भरता, अंतरसंबद्धता और एकीकरण में ऐसे स्तर तक की वृद्धि करने की प्रक्रिया है कि विश्व के किसी एक हिस्से में घटित कोई घटना विश्व के अन्य हिस्सों को प्रभावित करने लगे। वैश्वीकरण का प्रभाव इतना व्यापक होता है। यह प्रत्येक व्यक्ति को भिन्न भिन्न प्रकार से प्रभावित करता है। वैश्वीकरण का वृद्धजनों पर सकारात्मक प्रभाव: वृद्ध जनों कि सबसे बड़ी समस्या स्वस्थ्य संबंधी देखभाल कि होती है। वैश्वीकरण ने स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं की सुलभता, वहनीयता तथा गुणवत्ता में वृद्धि की है। विदेशी दवाओं की उपलब्धता ने असाध्य रोगों से सुरक्षा में वृद्धि की है। वृद्ध जनों के विशेष उपयोग से संबन्धित उत्पादों तक भारतीय व्रद्धों की पहुँच हूई है। वैश्विक जुड़ाव से सेवा निवृति पश्चात रोजगार के अवसर भी उपलब्ध हुए हैं। जिससे आर्थिक सुरक्षा में वृद्धि हुई है। संचार के साधनों ने परिवार के सदस्यों के बीच भौतिक दूरी को कम किया है। मोबाइल, इंटरनेट, इत्यादि का उपयोग कर वृद्ध जन अपने परिवार, गाँव, समाज से लगातार संपर्क बनाए रखते हैं, जिससे एकाकीपन में कमी होती है तथा मानसिक संतुष्टि में वृद्धि होती है। वैश्वीकरण का वृद्धजनों पर नकारात्मक प्रभाव: वैश्वीकरण के कारण एकल परिवारों में वृद्धि हुई है जिससे संयुक्त परिवारों में कमी आई है। वृद्धजन की पारिवारिक भूमिका तथा महत्व में कमी आई है। युवाओं और वृद्धजन के बीच भावनात्मक लगाव में कमी आई है। पीढ़ीगत अंतराल में वृद्धि हुई है । बुजुर्गों के अनुभव, सोच, ज्ञान के महत्व में कमी आई है। सेवानिवृति के पश्चात वृद्धजन परिवार एवं समाज के लिए बोझ समझे जाने लगे हैं। वर्तमान में युवा पूर्ववर्ती पीढ़ी के अनुरूप अपने दादा-दादी के करीब नहीं है तथा वे बड़े-बुजुर्गों के साथ बहुत कम समय व्यतीत करते हैं। जिसके परिणामस्वरूप एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को ज्ञान हस्तांतरण में कमी आ रही है। परिवार के आदर्शों में बदलाव ने बुजुर्गों के लिए देखभाल एवं पोषण की इकाई के रूप में परिवार के प्रारम्भिक आदर्श को प्रभावित किया है। कार्यबल में महिलाओं के शामिल होने से परिवार में बुजुर्गों की देखभाल में कमी हुई है। बुजुर्गों के खिलाफ हिंसात्मक घटनाओं और उत्पीड़न में वृद्धि हुई है। वैश्वीकरण के वृद्धजन पर मिश्रित प्रभाव रहे हैं। सरकारी प्रयासों तथा जन संवेदनशीलता में वृद्धि कर इसके नकारात्मक प्रभाओं को कम किया जा सकता है।
##Question:वैश्वीकरण का वृद्धजनों पर पड़ने वाले प्रभावों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये । ( 150-200 शब्द ) Critically examine the effects of globalization on the elderly. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण: वैश्वीकरण को परिभाषित करें वृद्धजनों पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभावों की बिंदुवत चर्चा कीजिये। वैश्वीकरण ने किस प्रकार वृद्धजन को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है। संक्षिप्त चर्चा कीजिये। संतुलित निष्कर्ष से उत्तर समाप्त कीजिये। उत्तर : वैश्वीकरण, विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं एवं समाज के मध्य पारस्परिक निर्भरता, अंतरसंबद्धता और एकीकरण में ऐसे स्तर तक की वृद्धि करने की प्रक्रिया है कि विश्व के किसी एक हिस्से में घटित कोई घटना विश्व के अन्य हिस्सों को प्रभावित करने लगे। वैश्वीकरण का प्रभाव इतना व्यापक होता है। यह प्रत्येक व्यक्ति को भिन्न भिन्न प्रकार से प्रभावित करता है। वैश्वीकरण का वृद्धजनों पर सकारात्मक प्रभाव: वृद्ध जनों कि सबसे बड़ी समस्या स्वस्थ्य संबंधी देखभाल कि होती है। वैश्वीकरण ने स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं की सुलभता, वहनीयता तथा गुणवत्ता में वृद्धि की है। विदेशी दवाओं की उपलब्धता ने असाध्य रोगों से सुरक्षा में वृद्धि की है। वृद्ध जनों के विशेष उपयोग से संबन्धित उत्पादों तक भारतीय व्रद्धों की पहुँच हूई है। वैश्विक जुड़ाव से सेवा निवृति पश्चात रोजगार के अवसर भी उपलब्ध हुए हैं। जिससे आर्थिक सुरक्षा में वृद्धि हुई है। संचार के साधनों ने परिवार के सदस्यों के बीच भौतिक दूरी को कम किया है। मोबाइल, इंटरनेट, इत्यादि का उपयोग कर वृद्ध जन अपने परिवार, गाँव, समाज से लगातार संपर्क बनाए रखते हैं, जिससे एकाकीपन में कमी होती है तथा मानसिक संतुष्टि में वृद्धि होती है। वैश्वीकरण का वृद्धजनों पर नकारात्मक प्रभाव: वैश्वीकरण के कारण एकल परिवारों में वृद्धि हुई है जिससे संयुक्त परिवारों में कमी आई है। वृद्धजन की पारिवारिक भूमिका तथा महत्व में कमी आई है। युवाओं और वृद्धजन के बीच भावनात्मक लगाव में कमी आई है। पीढ़ीगत अंतराल में वृद्धि हुई है । बुजुर्गों के अनुभव, सोच, ज्ञान के महत्व में कमी आई है। सेवानिवृति के पश्चात वृद्धजन परिवार एवं समाज के लिए बोझ समझे जाने लगे हैं। वर्तमान में युवा पूर्ववर्ती पीढ़ी के अनुरूप अपने दादा-दादी के करीब नहीं है तथा वे बड़े-बुजुर्गों के साथ बहुत कम समय व्यतीत करते हैं। जिसके परिणामस्वरूप एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को ज्ञान हस्तांतरण में कमी आ रही है। परिवार के आदर्शों में बदलाव ने बुजुर्गों के लिए देखभाल एवं पोषण की इकाई के रूप में परिवार के प्रारम्भिक आदर्श को प्रभावित किया है। कार्यबल में महिलाओं के शामिल होने से परिवार में बुजुर्गों की देखभाल में कमी हुई है। बुजुर्गों के खिलाफ हिंसात्मक घटनाओं और उत्पीड़न में वृद्धि हुई है। वैश्वीकरण के वृद्धजन पर मिश्रित प्रभाव रहे हैं। सरकारी प्रयासों तथा जन संवेदनशीलता में वृद्धि कर इसके नकारात्मक प्रभाओं को कम किया जा सकता है।
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मथुरा मूर्तिकला का परिचय देते हुए उसकी विशेषताओं का वर्णन कीजिये| मथुरा मूर्तिकला किस प्रकार से गांधार मूर्तिकला से भिन्न थी? (150-200 शब्द; 10 अंक) Describe the mathura sculpture and its features. How was the mathura sculpture different from the gandhara sculpture? (150-200 words; 10 marks)
दृष्टिकोण- भूमिका में मथुरा मूर्तिकला का परिचय दीजिये| प्रथम भाग में मथुरा मूर्तिकला की विशेषताओं को सूचीबद्ध कीजिये| अंतिम भाग में मथुरा मूर्तिकला एवं गांधार मूर्तिकला के मध्य अंतरों की चर्चा कीजिये| उत्तर- मूर्ति कला की तीन प्रमुख शैलियों अर्थात गंधार, मथुरा और अमरावती शैली का विकास अलग-अलग स्थानों पर हुआ है| मथुरा शैली का विकास पहली और तीसरी शताब्दी ई .पू के बीच की अवधि में यमुना नदी के किनारे हुआ| मथुरा इस मूर्ति निर्माण शैली का सबसे प्रमुख केंद्र था| कुषाणो के समय इस कला शैली का सर्वाधिक विकास हुआ| मथुरा मूर्तिकला उत्तरापथ पर स्थित तथा कुषाणों की आर्थिक राजधानी; मथुरा, सारनाथ आदि मूर्तिकला का एक केंद्र; व्यापारियों के द्वारा उत्तर-पश्चिम भारत से भी संपर्क; कुषाणों के समय राजनीतिक स्थिरता, विभिन्न धर्मों को संरक्षण आदि से प्रभाव; संरक्षक- कुषाण शासक; निर्माण सामग्री- मुख्यतः लाल-बलुआ पत्थर; प्रमुख केंद्र- मथुरा; सारनाथ आदि; विषय- बौद्ध, जैन, ब्राह्मण धर्म के साथ-साथ धर्मेत्तर मूर्तियाँ भी; मथुरा मूर्तिकलाकीविशेषताएँ कुछ बुद्ध की मूर्तियों पर प्रभाव; यह शैली बाह्य संस्कृतियों से प्रभावित नहीं थी और स्वदेशी शैली के रूप से विकसित हुई थी| अधिकांशतः गांधार कला के विपरीत आदर्शवादी दृष्टिकोण से निर्मित; साधू/तपस्वी के रूप में बुद्ध को प्रस्तुत करना;इसमें बुद्ध को मुस्कुराते चेहरे के साथ प्रसन्नचित दिखाया गया है| गांधार की तरह यथार्थवादी तरीके का प्रयोग यदाकदा ही; यहाँ भी विभिन्न मुद्राओं में मूर्तियों के प्रमाण; जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ भी जैसे- पार्श्वनाथ, महावीर आदि की मूर्तियाँ भी प्राप्त;" अधिकांशतः मूर्तियों का कायोत्सर्ग या श्रीवत्स मुद्रा में; ब्राह्मण धर्म से संबंधित मूर्तियों में शिव-पार्वती, लक्ष्मी-विष्णु, गणेश आदि की मूर्तियाँ; यक्ष एवं यक्षिणी की मूर्तियाँ भी(परंपरा मौर्यकाल से जारी); कनिष्क की सिरविहीन मूर्ति; ओवरकोट और बूट के साथ; कुषाणों के पश्चात भी कलाकेंद्र के रूप में मथुरा का महत्व बना रहना; गुप्तों का भी संरक्षण; मथुरा मूर्तिकला एवं गांधार मूर्तिकला के मध्य अंतर गांधार मूर्तिकला पर बाह्य कारकों(यूनानी या हेलेनिस्टिक मूर्ति कला का) का भारी प्रभाव हैं वहीँ मथुराशैली बाह्य संस्कृतियों से प्रभावित नहीं थी और स्वदेशी शैली के रूप से विकसित हुई थी| गंधार शैली में नीले-धूसर बलुआ प्रस्तर का प्रयोग किया जाता थाएवं बाद की अवधि मिटटी और प्लास्टर के उपयोग में लाई जाती थी| वहीँ, मथुरा शैली में मुख्यतःलाल-बलुआ पत्थर का प्रयोग हुआ है| गांधार मूर्तिकला पर धार्मिक प्रभाव मुख्य रूप से बौध चित्रकला, ग्रीको रोमन देवताओं के मंदिरों से प्रभावित थी वहीँ मथुरा कला में बौद्ध, जैन तथा ब्राहमण तीनों धर्म का प्रभाव नजर आता है| गांधार मूर्तिकला में यूनानी देवता अपोलो के समान मूर्तियाँ मिलती हैं वहीँ मथुरा शैली में ऐसा प्रमाण नहीं मिलता है| वस्तुतः मथुरा शैली आदर्शवाद से प्रभावित है जबकि गांधार शैली यथार्थवाद की ओर अधिक झुकाव रखती है|
##Question:मथुरा मूर्तिकला का परिचय देते हुए उसकी विशेषताओं का वर्णन कीजिये| मथुरा मूर्तिकला किस प्रकार से गांधार मूर्तिकला से भिन्न थी? (150-200 शब्द; 10 अंक) Describe the mathura sculpture and its features. How was the mathura sculpture different from the gandhara sculpture? (150-200 words; 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण- भूमिका में मथुरा मूर्तिकला का परिचय दीजिये| प्रथम भाग में मथुरा मूर्तिकला की विशेषताओं को सूचीबद्ध कीजिये| अंतिम भाग में मथुरा मूर्तिकला एवं गांधार मूर्तिकला के मध्य अंतरों की चर्चा कीजिये| उत्तर- मूर्ति कला की तीन प्रमुख शैलियों अर्थात गंधार, मथुरा और अमरावती शैली का विकास अलग-अलग स्थानों पर हुआ है| मथुरा शैली का विकास पहली और तीसरी शताब्दी ई .पू के बीच की अवधि में यमुना नदी के किनारे हुआ| मथुरा इस मूर्ति निर्माण शैली का सबसे प्रमुख केंद्र था| कुषाणो के समय इस कला शैली का सर्वाधिक विकास हुआ| मथुरा मूर्तिकला उत्तरापथ पर स्थित तथा कुषाणों की आर्थिक राजधानी; मथुरा, सारनाथ आदि मूर्तिकला का एक केंद्र; व्यापारियों के द्वारा उत्तर-पश्चिम भारत से भी संपर्क; कुषाणों के समय राजनीतिक स्थिरता, विभिन्न धर्मों को संरक्षण आदि से प्रभाव; संरक्षक- कुषाण शासक; निर्माण सामग्री- मुख्यतः लाल-बलुआ पत्थर; प्रमुख केंद्र- मथुरा; सारनाथ आदि; विषय- बौद्ध, जैन, ब्राह्मण धर्म के साथ-साथ धर्मेत्तर मूर्तियाँ भी; मथुरा मूर्तिकलाकीविशेषताएँ कुछ बुद्ध की मूर्तियों पर प्रभाव; यह शैली बाह्य संस्कृतियों से प्रभावित नहीं थी और स्वदेशी शैली के रूप से विकसित हुई थी| अधिकांशतः गांधार कला के विपरीत आदर्शवादी दृष्टिकोण से निर्मित; साधू/तपस्वी के रूप में बुद्ध को प्रस्तुत करना;इसमें बुद्ध को मुस्कुराते चेहरे के साथ प्रसन्नचित दिखाया गया है| गांधार की तरह यथार्थवादी तरीके का प्रयोग यदाकदा ही; यहाँ भी विभिन्न मुद्राओं में मूर्तियों के प्रमाण; जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ भी जैसे- पार्श्वनाथ, महावीर आदि की मूर्तियाँ भी प्राप्त;" अधिकांशतः मूर्तियों का कायोत्सर्ग या श्रीवत्स मुद्रा में; ब्राह्मण धर्म से संबंधित मूर्तियों में शिव-पार्वती, लक्ष्मी-विष्णु, गणेश आदि की मूर्तियाँ; यक्ष एवं यक्षिणी की मूर्तियाँ भी(परंपरा मौर्यकाल से जारी); कनिष्क की सिरविहीन मूर्ति; ओवरकोट और बूट के साथ; कुषाणों के पश्चात भी कलाकेंद्र के रूप में मथुरा का महत्व बना रहना; गुप्तों का भी संरक्षण; मथुरा मूर्तिकला एवं गांधार मूर्तिकला के मध्य अंतर गांधार मूर्तिकला पर बाह्य कारकों(यूनानी या हेलेनिस्टिक मूर्ति कला का) का भारी प्रभाव हैं वहीँ मथुराशैली बाह्य संस्कृतियों से प्रभावित नहीं थी और स्वदेशी शैली के रूप से विकसित हुई थी| गंधार शैली में नीले-धूसर बलुआ प्रस्तर का प्रयोग किया जाता थाएवं बाद की अवधि मिटटी और प्लास्टर के उपयोग में लाई जाती थी| वहीँ, मथुरा शैली में मुख्यतःलाल-बलुआ पत्थर का प्रयोग हुआ है| गांधार मूर्तिकला पर धार्मिक प्रभाव मुख्य रूप से बौध चित्रकला, ग्रीको रोमन देवताओं के मंदिरों से प्रभावित थी वहीँ मथुरा कला में बौद्ध, जैन तथा ब्राहमण तीनों धर्म का प्रभाव नजर आता है| गांधार मूर्तिकला में यूनानी देवता अपोलो के समान मूर्तियाँ मिलती हैं वहीँ मथुरा शैली में ऐसा प्रमाण नहीं मिलता है| वस्तुतः मथुरा शैली आदर्शवाद से प्रभावित है जबकि गांधार शैली यथार्थवाद की ओर अधिक झुकाव रखती है|
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What is "Strategic Autonomy"? Discuss it"s importance in India"s foreign policy. (200 words)
Approach- 1 . Define strategic autonomy in the introduction. 2 . Explain the importance of strategic autonomy in formulating foreign policy. 3 . Give instances to show India’s foreign policy driven by strategic autonomy. 4 . Give a way forward with a balancing approach regarding strategic autonomy. Answer- Strategic Autonomy - Strategic autonomy denotes the ability of a state to pursue its national interests and adopt its preferred foreign policy without being constrained in any manner by other states. Importance of Strategic Autonomy in Foreign Policy- 1 . In unipolar international order, it is very much possible that a superpower can posses true strategic autonomy i.e. it would have economic, industrial, military & technological capabilities to resist undue pressure from other countries. 2 . But in the bipolar or multipolar world order, it is very difficult to maintain strategic autonomy. So the ability to be strategically autonomous is not absolute but only relative in bipolar/ multipolar world. 3 . In the case of India, there are some core national interests like Jammu and Kashmir issue, nuclear weapon, etc. on which India, resist any type of external pressure. But there are instances, where India has altered its policy involving non- core issues based on cost-benefit analysis. So strategic autonomy plays an important role in determining the country’s foreign policy. We can see it with the following instances- Instances of India pursuing Strategic autonomy in foreign policy- 1 . The policy of non- alignment 2 . Nuclear tests conducted by India. 3 . Indo-US civil nuclear deal. 4 . On economic front- decent performance in the 2008 global financial meltdown. 5 . India’s position in WTO on farm subsidies. 6 . Refusal to RCEP agreement 7 . India’s strong campaign against terrorism. 8 . Defense co-operation with the USA- Communications Compatibility and Security Agreement (COMCASA), Logistics Exchange Memorandum of Agreement (LEMOA), etc. 9 . India- Russia defense equipment procurement (S-400 missile system) 10 . India’s position on border disputes with China and Pakistan (Dokhlam, the latest map published by the government of India.) Instances of India diluting strategic autonomy in foreign policy- 1 . India supported the invasion of Afghanistan by USSR. 2 . Indo- Soviet treaty of friendship 1971 3 . Influence of the International Monetary Fund in 1991 economic reforms. 4 . Legally binding international agreements related to the environment- Kyoto, UN convention to combat desertification, etc. 5 . India’s decision to vote against Iran in the International Atomic Energy Agency. It is very difficult to achieve absolute strategic autonomy in the contemporary world. But India should adopt a foreign policy keeping in mind it’s core security issues, at the same time, may reflect some flexibility in non-core areas.
##Question:What is "Strategic Autonomy"? Discuss it"s importance in India"s foreign policy. (200 words)##Answer:Approach- 1 . Define strategic autonomy in the introduction. 2 . Explain the importance of strategic autonomy in formulating foreign policy. 3 . Give instances to show India’s foreign policy driven by strategic autonomy. 4 . Give a way forward with a balancing approach regarding strategic autonomy. Answer- Strategic Autonomy - Strategic autonomy denotes the ability of a state to pursue its national interests and adopt its preferred foreign policy without being constrained in any manner by other states. Importance of Strategic Autonomy in Foreign Policy- 1 . In unipolar international order, it is very much possible that a superpower can posses true strategic autonomy i.e. it would have economic, industrial, military & technological capabilities to resist undue pressure from other countries. 2 . But in the bipolar or multipolar world order, it is very difficult to maintain strategic autonomy. So the ability to be strategically autonomous is not absolute but only relative in bipolar/ multipolar world. 3 . In the case of India, there are some core national interests like Jammu and Kashmir issue, nuclear weapon, etc. on which India, resist any type of external pressure. But there are instances, where India has altered its policy involving non- core issues based on cost-benefit analysis. So strategic autonomy plays an important role in determining the country’s foreign policy. We can see it with the following instances- Instances of India pursuing Strategic autonomy in foreign policy- 1 . The policy of non- alignment 2 . Nuclear tests conducted by India. 3 . Indo-US civil nuclear deal. 4 . On economic front- decent performance in the 2008 global financial meltdown. 5 . India’s position in WTO on farm subsidies. 6 . Refusal to RCEP agreement 7 . India’s strong campaign against terrorism. 8 . Defense co-operation with the USA- Communications Compatibility and Security Agreement (COMCASA), Logistics Exchange Memorandum of Agreement (LEMOA), etc. 9 . India- Russia defense equipment procurement (S-400 missile system) 10 . India’s position on border disputes with China and Pakistan (Dokhlam, the latest map published by the government of India.) Instances of India diluting strategic autonomy in foreign policy- 1 . India supported the invasion of Afghanistan by USSR. 2 . Indo- Soviet treaty of friendship 1971 3 . Influence of the International Monetary Fund in 1991 economic reforms. 4 . Legally binding international agreements related to the environment- Kyoto, UN convention to combat desertification, etc. 5 . India’s decision to vote against Iran in the International Atomic Energy Agency. It is very difficult to achieve absolute strategic autonomy in the contemporary world. But India should adopt a foreign policy keeping in mind it’s core security issues, at the same time, may reflect some flexibility in non-core areas.
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Although there are many women educated in STEM, But there are few women scientists in India. Critically Analyse. Suggest improvement measures to increase more participation of women in Scientific Research in India. (250 words/15 marks)
Approach:- · Introduction - Write about Female scientists in India. · Main Body - 1. Highlight the reasons for low participation in India 2. Suggest measures to increase Women participation in research · Conclusion - Write about government efforts in this regard Answer - India has a rich history of women scientists and mathematicians, including: Rukhmabai (India’s first practicing lady doctor, 1894); Janaki Ammal (Masters in Botany, 1925); Asima Chatterjee (doctorate in organic chemistry, 1944); Kamla Sohonie (doctorate in biochemistry, 1939); and, Rajeshwari Chatterji (degree in engineering, 1943). In current times also, scientists like Nandini Harinath and Ritu Karidhal who played an important role in success of Mars orbitor mission. However, in present times, it has been experienced that though women in India do study STEM (Science, Technology, Engineering, and Mathematics), but they are reluctant to take research as their profession. Reasons for Low Participation 1. The “double-burden syndrome”—which makes women quit jobs mid-career, especially in technical careers 2. Psychological reasons- Research is still considered to be the domain of male. Women are allowed to study and pursue easy careers but career in research makes them less lucrative of marriage 3. Lack of security- Research demands countless hours on job, lack of security makes it difficult for women to carry on with the job. 4. Glass ceiling effect- that is biasness against women in reaching the highest level due to her gender. Measures to increase Women participation in research- 1. Change of mindset of masses needs to be brought by more sensitisation towards career aspirations of women and glorifying the female scientists. 2. Ensuring job security by giving them opportunity to re-join and providing facility of work from home. 3. Security at work place for un-interrupted research work. 4. Developing adequate infrastructure like scientific labs and research institution across the country so that equal exposure can be ensured. 5. More resource allocation to research and gender budgeting. DST has launched DISHA Programme for Women in Science to address these issues and made focused efforts to not only facilitate the re-entry of such women to mainstream science by offering them opportunities to pursue R&D, take up projects having distinct societal impact and explore a career in Intellectual Property domain. Such efforts need to be scaled up.
##Question:Although there are many women educated in STEM, But there are few women scientists in India. Critically Analyse. Suggest improvement measures to increase more participation of women in Scientific Research in India. (250 words/15 marks)##Answer:Approach:- · Introduction - Write about Female scientists in India. · Main Body - 1. Highlight the reasons for low participation in India 2. Suggest measures to increase Women participation in research · Conclusion - Write about government efforts in this regard Answer - India has a rich history of women scientists and mathematicians, including: Rukhmabai (India’s first practicing lady doctor, 1894); Janaki Ammal (Masters in Botany, 1925); Asima Chatterjee (doctorate in organic chemistry, 1944); Kamla Sohonie (doctorate in biochemistry, 1939); and, Rajeshwari Chatterji (degree in engineering, 1943). In current times also, scientists like Nandini Harinath and Ritu Karidhal who played an important role in success of Mars orbitor mission. However, in present times, it has been experienced that though women in India do study STEM (Science, Technology, Engineering, and Mathematics), but they are reluctant to take research as their profession. Reasons for Low Participation 1. The “double-burden syndrome”—which makes women quit jobs mid-career, especially in technical careers 2. Psychological reasons- Research is still considered to be the domain of male. Women are allowed to study and pursue easy careers but career in research makes them less lucrative of marriage 3. Lack of security- Research demands countless hours on job, lack of security makes it difficult for women to carry on with the job. 4. Glass ceiling effect- that is biasness against women in reaching the highest level due to her gender. Measures to increase Women participation in research- 1. Change of mindset of masses needs to be brought by more sensitisation towards career aspirations of women and glorifying the female scientists. 2. Ensuring job security by giving them opportunity to re-join and providing facility of work from home. 3. Security at work place for un-interrupted research work. 4. Developing adequate infrastructure like scientific labs and research institution across the country so that equal exposure can be ensured. 5. More resource allocation to research and gender budgeting. DST has launched DISHA Programme for Women in Science to address these issues and made focused efforts to not only facilitate the re-entry of such women to mainstream science by offering them opportunities to pursue R&D, take up projects having distinct societal impact and explore a career in Intellectual Property domain. Such efforts need to be scaled up.
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महावीर स्वामी की प्रमुख शिक्षाओं का वर्णन करते हुए जैन धर्म और बौद्ध धर्म के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिये (10 अंक / 150 से 200 शब्द) Explain the major teachings of Mahavir Swami and clarify the difference between Jainism and Buddhism. ( 10 marks / 150 to 200 words).
दृष्टिकोण 1- भूमिका में जैन धर्म के बारे में जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में महावीर स्वामी की प्रमुख शिक्षाओं का वर्णन कीजिये 3- दूसरे भाग में जैन धर्म के प्रमुख उपसम्प्रदायों के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में उत्थान और अवसान की जानकारी देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये उत्तरवैदिक कालीन संस्कृति के बाद 6वीं शताब्दी BC में विकसित संस्कृति को सूत्रकाल अथवा बुद्धकाल की संज्ञा दी जाती है| इस काल में भारत में राज्यों के रूप में 16 महाजनपदों का अस्तित्व मिलता है| 6वीं शताब्दी BC वैश्विक स्तर पर वैचारिक क्रान्ति का काल था| इसीक्रम में भारत में भी परम्परागत मान्यताओं का विरोध करने वाले विभिन्न असनातनी पंथों का उदय हुआ जैन धर्म इन्ही असनातनी पंथों में से एक था| यह बौद्ध धर्म से पुराना धर्म है| परम्परा के अनुसारजैन धर्म में 24 तीर्थंकर(नियम बनाने वाले) हुए, ऐतिहासिक तौर पर 23वें एवं 24वें के साक्ष्य मिलते हैं| इसके प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव या आदिनाथ थे जबकि 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ(काशी नरेश अश्वसेन के पुत्र थे) इनके अनुयायी वस्त्र धारण करते थे, इन्होने चार व्रतों (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह) का निर्धारण किया| जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी थे| ये वज्जिसंघ के ज्ञात्रिक गण से सम्बन्धित थे| महावीर स्वामी कैवल्य, महावीर, जिन, निर्ग्रन्थ के नाम से भी जाने जाते हैं| चौथी सदी BC में पाटलिपुत्र में प्रथम जैन संगीति का आयोजन तथा 6वी सदी में बल्लभी में द्वितीय जैन संगीति का आयोजनहुआ| जैन साहित्य(आगम)- अंग, उपांग, मूलसूत्र, छेद्सूत्र के रूप में वर्गीकृत हैं| भद्रबाहु का कल्प सूत्र एवं हेमचन्द्र का परिशिष्टपर्वन जैन धर्म की प्रमुख पुस्तकें हैं| महावीर स्वामी की शिक्षाएं इनकी शिक्षाओं का प्रमुख उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति अर्थात संसार में आवागमन के चक्र से मुक्ति बौद्धों के विपरीत महावीर संसार को शाश्वत मानते थे| इनका मानना था कर्मफल (या अज्ञानता) के कारण व्यक्ति का पुनर्जन्म होता है, त्रिरत्न के आचरण से व्यक्ति आवागमन के चक्र से मुक्त हो सकता है त्रिरत्न-सम्यक ज्ञान- जैन धर्म से सम्बन्धित ज्ञान/स्रोतों को समझना; सम्यक दर्शन- तीर्थंकरों की शिक्षाओं का पालन; सम्यक चरित्र- पंचमहाव्रतों का पालन भिक्षुओं के लिए इसे महाव्रत एवं उपासकों के लिए अनुव्रत कहा गया है पुनर्जन्म एवं मुक्ति के संदर्भ में आस्रव-बंधन, संवर-निर्जरा इत्यादि चरणों का उल्लेख है आवागमन के चक्र से मुक्ति की प्रक्रिया में कठोर तपस्या तथा शरीर त्याग को आवश्यक माना गया है(संथारा/ संलेखना व्रत) बौद्धों के विपरीत इश्वर एवं आत्मा को मानते थे लेकिन जैनों के अनुसार ईश्वर संसार का रचयिता नहीं है, संसार के प्रत्येक जीव में आत्मा के वास को मानते हैं| बुद्ध के पंचशील में अपरिग्रह के स्थान पर नशे का सेवन न करने का उल्लेख है लेकिन दसशील में अपरिग्रह भी शामिल है जैन धर्म में ज्ञान की सापेक्षता के संदर्भ में स्यादवाद/अनेकान्तवाद/सप्तभंगीनय का उल्लेख मिलता है बुद्ध की तरह इन्होने भी जाति प्रथा, छुआ-छूत की आलोचना की, वेदों को अपौरुषेय नहीं माना किन्तु कठोर शब्दों में नहीं अस्वीकृति नहीं की गयी है बौद्ध धर्म में सृष्टि को क्षणभंगुर माना गया है लेकिन जैन दर्शन सृष्टि को शाश्वत मानता है जैन धर्म के सम्प्रदाय ऐसा माना जाता है कि मौर्य शासक चन्द्रगुप्त के शासन के अंतिम वर्षों में पाटलिपुत्र में अकाल आया था और बड़ी संख्या में जैन भिक्षु भद्रबाहू के नेतृत्व में दक्षिण चले गए लौटने पर स्थूलभद्र के नेतृत्व में पटना में रहने वाले भिक्षुओं के जीवन में नियम विरुद्ध आचरण को देखा, इसी मुद्दे को लेकर दोनों में विवाद हुआ इस मुद्दे को लेकर तीसरी या चौथी सदी BC में प्रथम जैन संगीति का आयोजन हुआ और जैन धर्म दिगम्बर एवं श्वेताम्बर नामक दो सम्प्रदायों में विभाजित हुआ| दिगंबर सम्प्रदाय दिगम्बर सम्प्रदाय के भिक्षु वस्त्र धारण नहीं करते हैं दिगम्बर सम्प्रदाय में महिलायें मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकती हैं दिगम्बर सम्प्रदाय की मान्यता है कि कैवल्य पश्चात भोजन नहीं किया जा सकता है कालान्तर में दिगम्बर सम्प्रदाय विभिन्न उपसम्प्रदायों में विभाजित हो गया यथा बीसपंथी, तेरापंथी, समयापंथी आदि श्वेताम्बर सम्प्रदाय श्वेताम्बर सम्प्रदाय के भिक्षु वस्त्र धारण करते हैं श्वेताम्बर सम्प्रदाय में महिलायें मोक्ष प्राप्त कर सकती हैं श्वेताम्बर सम्प्रदाय के भिक्षु कैवल्य पश्चात भी भोजन कर सकते हैं कालान्तर श्वेताम्बर सम्प्रदाय विभिन्न उपसम्प्रदायों में विभाजित हो गया यथा मूर्तिपूजक, स्थानकवासी, तेरापंथी आदि महावीर के समकालीन विम्बिसार, अजातशत्रु, उदयन एवं लिच्छवि शासकों ने जैन धर्म को संरक्षण दिया| महावीर के पश्चात- नन्दवंश, मौर्यवंश(चन्द्रगुप्त एवं सम्प्रति) कुषाण शासक हुविष्क, कलिंग शासक खारवेल, राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष, चालुक्य शासक कुमार पाल आदि शासकों ने जैन धर्म को संरक्षण प्रदान किया था जिसके कारण जैन धर्म का प्रचार-प्रसार हुआ था| किन्तु अव्यवहारिक स्तर तक अहिंसा पर बल आदि सीमाओं के कारण जैन धर्म का बौद्ध धर्म के समान्तर प्रचार प्रसार नहीं हो पाया और आज यह केवल भारत के सीमित क्षेत्रों तक ही विस्तृत है|
##Question:महावीर स्वामी की प्रमुख शिक्षाओं का वर्णन करते हुए जैन धर्म और बौद्ध धर्म के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिये (10 अंक / 150 से 200 शब्द) Explain the major teachings of Mahavir Swami and clarify the difference between Jainism and Buddhism. ( 10 marks / 150 to 200 words).##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में जैन धर्म के बारे में जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में महावीर स्वामी की प्रमुख शिक्षाओं का वर्णन कीजिये 3- दूसरे भाग में जैन धर्म के प्रमुख उपसम्प्रदायों के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में उत्थान और अवसान की जानकारी देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये उत्तरवैदिक कालीन संस्कृति के बाद 6वीं शताब्दी BC में विकसित संस्कृति को सूत्रकाल अथवा बुद्धकाल की संज्ञा दी जाती है| इस काल में भारत में राज्यों के रूप में 16 महाजनपदों का अस्तित्व मिलता है| 6वीं शताब्दी BC वैश्विक स्तर पर वैचारिक क्रान्ति का काल था| इसीक्रम में भारत में भी परम्परागत मान्यताओं का विरोध करने वाले विभिन्न असनातनी पंथों का उदय हुआ जैन धर्म इन्ही असनातनी पंथों में से एक था| यह बौद्ध धर्म से पुराना धर्म है| परम्परा के अनुसारजैन धर्म में 24 तीर्थंकर(नियम बनाने वाले) हुए, ऐतिहासिक तौर पर 23वें एवं 24वें के साक्ष्य मिलते हैं| इसके प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव या आदिनाथ थे जबकि 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ(काशी नरेश अश्वसेन के पुत्र थे) इनके अनुयायी वस्त्र धारण करते थे, इन्होने चार व्रतों (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह) का निर्धारण किया| जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी थे| ये वज्जिसंघ के ज्ञात्रिक गण से सम्बन्धित थे| महावीर स्वामी कैवल्य, महावीर, जिन, निर्ग्रन्थ के नाम से भी जाने जाते हैं| चौथी सदी BC में पाटलिपुत्र में प्रथम जैन संगीति का आयोजन तथा 6वी सदी में बल्लभी में द्वितीय जैन संगीति का आयोजनहुआ| जैन साहित्य(आगम)- अंग, उपांग, मूलसूत्र, छेद्सूत्र के रूप में वर्गीकृत हैं| भद्रबाहु का कल्प सूत्र एवं हेमचन्द्र का परिशिष्टपर्वन जैन धर्म की प्रमुख पुस्तकें हैं| महावीर स्वामी की शिक्षाएं इनकी शिक्षाओं का प्रमुख उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति अर्थात संसार में आवागमन के चक्र से मुक्ति बौद्धों के विपरीत महावीर संसार को शाश्वत मानते थे| इनका मानना था कर्मफल (या अज्ञानता) के कारण व्यक्ति का पुनर्जन्म होता है, त्रिरत्न के आचरण से व्यक्ति आवागमन के चक्र से मुक्त हो सकता है त्रिरत्न-सम्यक ज्ञान- जैन धर्म से सम्बन्धित ज्ञान/स्रोतों को समझना; सम्यक दर्शन- तीर्थंकरों की शिक्षाओं का पालन; सम्यक चरित्र- पंचमहाव्रतों का पालन भिक्षुओं के लिए इसे महाव्रत एवं उपासकों के लिए अनुव्रत कहा गया है पुनर्जन्म एवं मुक्ति के संदर्भ में आस्रव-बंधन, संवर-निर्जरा इत्यादि चरणों का उल्लेख है आवागमन के चक्र से मुक्ति की प्रक्रिया में कठोर तपस्या तथा शरीर त्याग को आवश्यक माना गया है(संथारा/ संलेखना व्रत) बौद्धों के विपरीत इश्वर एवं आत्मा को मानते थे लेकिन जैनों के अनुसार ईश्वर संसार का रचयिता नहीं है, संसार के प्रत्येक जीव में आत्मा के वास को मानते हैं| बुद्ध के पंचशील में अपरिग्रह के स्थान पर नशे का सेवन न करने का उल्लेख है लेकिन दसशील में अपरिग्रह भी शामिल है जैन धर्म में ज्ञान की सापेक्षता के संदर्भ में स्यादवाद/अनेकान्तवाद/सप्तभंगीनय का उल्लेख मिलता है बुद्ध की तरह इन्होने भी जाति प्रथा, छुआ-छूत की आलोचना की, वेदों को अपौरुषेय नहीं माना किन्तु कठोर शब्दों में नहीं अस्वीकृति नहीं की गयी है बौद्ध धर्म में सृष्टि को क्षणभंगुर माना गया है लेकिन जैन दर्शन सृष्टि को शाश्वत मानता है जैन धर्म के सम्प्रदाय ऐसा माना जाता है कि मौर्य शासक चन्द्रगुप्त के शासन के अंतिम वर्षों में पाटलिपुत्र में अकाल आया था और बड़ी संख्या में जैन भिक्षु भद्रबाहू के नेतृत्व में दक्षिण चले गए लौटने पर स्थूलभद्र के नेतृत्व में पटना में रहने वाले भिक्षुओं के जीवन में नियम विरुद्ध आचरण को देखा, इसी मुद्दे को लेकर दोनों में विवाद हुआ इस मुद्दे को लेकर तीसरी या चौथी सदी BC में प्रथम जैन संगीति का आयोजन हुआ और जैन धर्म दिगम्बर एवं श्वेताम्बर नामक दो सम्प्रदायों में विभाजित हुआ| दिगंबर सम्प्रदाय दिगम्बर सम्प्रदाय के भिक्षु वस्त्र धारण नहीं करते हैं दिगम्बर सम्प्रदाय में महिलायें मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकती हैं दिगम्बर सम्प्रदाय की मान्यता है कि कैवल्य पश्चात भोजन नहीं किया जा सकता है कालान्तर में दिगम्बर सम्प्रदाय विभिन्न उपसम्प्रदायों में विभाजित हो गया यथा बीसपंथी, तेरापंथी, समयापंथी आदि श्वेताम्बर सम्प्रदाय श्वेताम्बर सम्प्रदाय के भिक्षु वस्त्र धारण करते हैं श्वेताम्बर सम्प्रदाय में महिलायें मोक्ष प्राप्त कर सकती हैं श्वेताम्बर सम्प्रदाय के भिक्षु कैवल्य पश्चात भी भोजन कर सकते हैं कालान्तर श्वेताम्बर सम्प्रदाय विभिन्न उपसम्प्रदायों में विभाजित हो गया यथा मूर्तिपूजक, स्थानकवासी, तेरापंथी आदि महावीर के समकालीन विम्बिसार, अजातशत्रु, उदयन एवं लिच्छवि शासकों ने जैन धर्म को संरक्षण दिया| महावीर के पश्चात- नन्दवंश, मौर्यवंश(चन्द्रगुप्त एवं सम्प्रति) कुषाण शासक हुविष्क, कलिंग शासक खारवेल, राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष, चालुक्य शासक कुमार पाल आदि शासकों ने जैन धर्म को संरक्षण प्रदान किया था जिसके कारण जैन धर्म का प्रचार-प्रसार हुआ था| किन्तु अव्यवहारिक स्तर तक अहिंसा पर बल आदि सीमाओं के कारण जैन धर्म का बौद्ध धर्म के समान्तर प्रचार प्रसार नहीं हो पाया और आज यह केवल भारत के सीमित क्षेत्रों तक ही विस्तृत है|
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भारतीय संवैधानिक व्यवस्था की तुलना अमेरिका की संवैधानिक व्यवस्था से कीजिये | (150-200 शब्द; 10 शब्द) Compare Indian constitutional system with America"s constitutional system. (150-200 words; 10 Marks)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत अमेरिकी संवैधानिक व्यवस्था का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के संवैधानिक व्यवस्था की तुलना कीजिये | अंत में निष्कर्ष बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत का संविधान विश्व के किसी भी संविधान से लम्बा व लिखित संविधान है , यद्यपि कि संयुक्त राज्य अमेरिका का भी संविधान भी लिखित है | 1789 में लागू होने से लेकर आज तक अमेरिका का संविधान बदलते परिवेश और आवश्यकताओं के अनुसार परिवर्तित और विकसित हो रहा है | भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका की तुलना - भारतीय महासंघ राज्यों के बीच एक समझौते का परिणाम नहीं है, जबकि अमेरिकी फेडरेशन राज्यों के बीच एक समझौते का परिणाम है | भारत में राज्य और संघ दोनों में एकल नागरिकता है जबकि अमेरिका में दोहरी नागरिकता है - प्रथम संघीय नागरिकता तथा द्वितीय - राज्य की नागरिकता | भारत में प्रत्येक राज्य, राज्य की जनसँख्या के आधार पर सांसदों को संसद में भेजता है, जबकि अमेरिका में प्रत्येक राज्य सीनेट में सामान प्रतिनिधि भेजता है | भारत में कोई भी राज्य भारतीय क्षेत्र से अलग नहीं हो सकता, जबकि अमेरिका में राज्य यदि चाहे तो संघ से अलग हो सकते हैं क्योंकि यह सम्बन्ध केवल समझौते पर आधारित है | भारतीय संवैधानिक व्यवस्था संसदीय शासन प्रणाली पर आधारित है जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका की संवैधानिक व्यवस्था अध्याक्षात्मक शासन प्रणाली पर आधारित है | भारत के सर्वोच्च न्यायालय को अपीलीय क्षेत्राधिकार दिए गए हैं जबकि अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय को अपीलीय क्षेत्राधिकार नहीं दिए गए हैं | भारत में संविधान संशोधन के लिए सांसदों का बहुमत और कुछ मामलों में राज्य विधानसभाओं का बहुमत प्राप्त करना पर्याप्त है जबकि अमेरिका में संविधान में संशोधन के लिए जनमत संग्रह (लोगों की सहमति) आवश्यक है | भारत में राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष तरीके होता है, जबकि अमेरिका में प्रत्यक्ष तरीके से | भारत में राज्य का प्रमुख राष्ट्रपति और सरकार का प्रमुख प्रधानमंत्री होता है जबकि अमेरिका में राज्य और सरकार का प्रमुख एक पद/एक ही व्यक्ति होता है | भारतीय संविधान में "शक्ति का पृथक्करण" पूर्ण रूप में न होकर सीमित रूप में देखने को मिलता है, जबकि अमेरिकी संवैधानिक व्यवस्था पूर्ण रूप से शक्ति के पृथक्करण के सिद्धांत पर आधारित है | इस प्रकार यह कहा जा सकता है, कि भारतीय संवैधानिक व्यवस्था और अमेरिकी संवैधानिक व्यवस्था में पर्याप्त भिन्नताएं देखने को मिलती है |
##Question:भारतीय संवैधानिक व्यवस्था की तुलना अमेरिका की संवैधानिक व्यवस्था से कीजिये | (150-200 शब्द; 10 शब्द) Compare Indian constitutional system with America"s constitutional system. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत अमेरिकी संवैधानिक व्यवस्था का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के संवैधानिक व्यवस्था की तुलना कीजिये | अंत में निष्कर्ष बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत का संविधान विश्व के किसी भी संविधान से लम्बा व लिखित संविधान है , यद्यपि कि संयुक्त राज्य अमेरिका का भी संविधान भी लिखित है | 1789 में लागू होने से लेकर आज तक अमेरिका का संविधान बदलते परिवेश और आवश्यकताओं के अनुसार परिवर्तित और विकसित हो रहा है | भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका की तुलना - भारतीय महासंघ राज्यों के बीच एक समझौते का परिणाम नहीं है, जबकि अमेरिकी फेडरेशन राज्यों के बीच एक समझौते का परिणाम है | भारत में राज्य और संघ दोनों में एकल नागरिकता है जबकि अमेरिका में दोहरी नागरिकता है - प्रथम संघीय नागरिकता तथा द्वितीय - राज्य की नागरिकता | भारत में प्रत्येक राज्य, राज्य की जनसँख्या के आधार पर सांसदों को संसद में भेजता है, जबकि अमेरिका में प्रत्येक राज्य सीनेट में सामान प्रतिनिधि भेजता है | भारत में कोई भी राज्य भारतीय क्षेत्र से अलग नहीं हो सकता, जबकि अमेरिका में राज्य यदि चाहे तो संघ से अलग हो सकते हैं क्योंकि यह सम्बन्ध केवल समझौते पर आधारित है | भारतीय संवैधानिक व्यवस्था संसदीय शासन प्रणाली पर आधारित है जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका की संवैधानिक व्यवस्था अध्याक्षात्मक शासन प्रणाली पर आधारित है | भारत के सर्वोच्च न्यायालय को अपीलीय क्षेत्राधिकार दिए गए हैं जबकि अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय को अपीलीय क्षेत्राधिकार नहीं दिए गए हैं | भारत में संविधान संशोधन के लिए सांसदों का बहुमत और कुछ मामलों में राज्य विधानसभाओं का बहुमत प्राप्त करना पर्याप्त है जबकि अमेरिका में संविधान में संशोधन के लिए जनमत संग्रह (लोगों की सहमति) आवश्यक है | भारत में राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष तरीके होता है, जबकि अमेरिका में प्रत्यक्ष तरीके से | भारत में राज्य का प्रमुख राष्ट्रपति और सरकार का प्रमुख प्रधानमंत्री होता है जबकि अमेरिका में राज्य और सरकार का प्रमुख एक पद/एक ही व्यक्ति होता है | भारतीय संविधान में "शक्ति का पृथक्करण" पूर्ण रूप में न होकर सीमित रूप में देखने को मिलता है, जबकि अमेरिकी संवैधानिक व्यवस्था पूर्ण रूप से शक्ति के पृथक्करण के सिद्धांत पर आधारित है | इस प्रकार यह कहा जा सकता है, कि भारतीय संवैधानिक व्यवस्था और अमेरिकी संवैधानिक व्यवस्था में पर्याप्त भिन्नताएं देखने को मिलती है |
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भारतीय संवैधानिक व्यवस्था की तुलना अमेरिका के संवैधानिक व्यवस्था से कीजिये | (150-200 शब्द) Compare Indian constitutional system with America"s constitutional system. (150-200 words)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत अमेरिकी संवैधानिक व्यवस्था का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के संवैधानिक व्यवस्था की तुलना कीजिये | अंत में निष्कर्ष बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत का संविधान विश्व के किसी भी संविधान से लम्बा व लिखित संविधान है , यद्यपि कि संयुक्त राज्य अमेरिका का भी संविधान भी लिखित है | 1789 में लागू होने से लेकर आज तक अमेरिका का संविधान बदलते परिवेश और आवश्यकताओं के अनुसार परिवर्तित और विकसित हो रहा है | भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका की तुलना - भारतीय महासंघ राज्यों के बीच एक समझौते का परिणाम नहीं है, जबकि अमेरिकी फेडरेशन राज्यों के बीच एक समझौते का परिणाम है | भारत में राज्य और संघ दोनों में एकल नागरिकता है जबकि अमेरिका में दोहरी नागरिकता है - प्रथम संघीय नागरिकता तथा द्वितीय - राज्य की नागरिकता | भारत में प्रत्येक राज्य, राज्य की जनसँख्या के आधार पर सांसदों को संसद में भेजता है, जबकि अमेरिका में प्रत्येक राज्य सीनेट में सामान प्रतिनिधि भेजता है | भारत में कोई भी राज्य भारतीय क्षेत्र से अलग नहीं हो सकता, जबकि अमेरिका में राज्य यदि चाहे तो संघ से अलग हो सकते हैं क्योंकि यह सम्बन्ध केवल समझौते पर आधारित है | भारतीय संवैधानिक व्यवस्था संसदीय शासन प्रणाली पर आधारित है जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका की संवैधानिक व्यवस्था अध्याक्षात्मक शासन प्रणाली पर आधारित है | भारत के सर्वोच्च न्यायालय को अपीलीय क्षेत्राधिकार दिए गए हैं जबकि अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय को अपीलीय क्षेत्राधिकार नहीं दिए गए हैं भारत में राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष तरीके होता है, जबकि अमेरिका में प्रत्यक्ष तरीके से | भारत में राज्य का प्रमुख राष्ट्रपति और सरकार का प्रमुख प्रधानमंत्री होता है जबकि अमेरिका में राज्य और सरकार का प्रमुख एक पद/एक ही व्यक्ति होता है | भारतीय संविधान में "शक्ति का पृथक्करण" पूर्ण रूप में न होकर सीमित रूप में देखने को मिलता है, जबकि अमेरिकी संवैधानिक व्यवस्था पूर्ण रूप से शक्ति के पृथक्करण के सिद्धांत पर आधारित है | इस प्रकार यह कहा जा सकता है, कि भारतीय संवैधानिक व्यवस्था और अमेरिकी संवैधानिक व्यवस्था में पर्याप्त भिन्नताएं देखने को मिलती है |
##Question:भारतीय संवैधानिक व्यवस्था की तुलना अमेरिका के संवैधानिक व्यवस्था से कीजिये | (150-200 शब्द) Compare Indian constitutional system with America"s constitutional system. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत अमेरिकी संवैधानिक व्यवस्था का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के संवैधानिक व्यवस्था की तुलना कीजिये | अंत में निष्कर्ष बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत का संविधान विश्व के किसी भी संविधान से लम्बा व लिखित संविधान है , यद्यपि कि संयुक्त राज्य अमेरिका का भी संविधान भी लिखित है | 1789 में लागू होने से लेकर आज तक अमेरिका का संविधान बदलते परिवेश और आवश्यकताओं के अनुसार परिवर्तित और विकसित हो रहा है | भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका की तुलना - भारतीय महासंघ राज्यों के बीच एक समझौते का परिणाम नहीं है, जबकि अमेरिकी फेडरेशन राज्यों के बीच एक समझौते का परिणाम है | भारत में राज्य और संघ दोनों में एकल नागरिकता है जबकि अमेरिका में दोहरी नागरिकता है - प्रथम संघीय नागरिकता तथा द्वितीय - राज्य की नागरिकता | भारत में प्रत्येक राज्य, राज्य की जनसँख्या के आधार पर सांसदों को संसद में भेजता है, जबकि अमेरिका में प्रत्येक राज्य सीनेट में सामान प्रतिनिधि भेजता है | भारत में कोई भी राज्य भारतीय क्षेत्र से अलग नहीं हो सकता, जबकि अमेरिका में राज्य यदि चाहे तो संघ से अलग हो सकते हैं क्योंकि यह सम्बन्ध केवल समझौते पर आधारित है | भारतीय संवैधानिक व्यवस्था संसदीय शासन प्रणाली पर आधारित है जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका की संवैधानिक व्यवस्था अध्याक्षात्मक शासन प्रणाली पर आधारित है | भारत के सर्वोच्च न्यायालय को अपीलीय क्षेत्राधिकार दिए गए हैं जबकि अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय को अपीलीय क्षेत्राधिकार नहीं दिए गए हैं भारत में राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष तरीके होता है, जबकि अमेरिका में प्रत्यक्ष तरीके से | भारत में राज्य का प्रमुख राष्ट्रपति और सरकार का प्रमुख प्रधानमंत्री होता है जबकि अमेरिका में राज्य और सरकार का प्रमुख एक पद/एक ही व्यक्ति होता है | भारतीय संविधान में "शक्ति का पृथक्करण" पूर्ण रूप में न होकर सीमित रूप में देखने को मिलता है, जबकि अमेरिकी संवैधानिक व्यवस्था पूर्ण रूप से शक्ति के पृथक्करण के सिद्धांत पर आधारित है | इस प्रकार यह कहा जा सकता है, कि भारतीय संवैधानिक व्यवस्था और अमेरिकी संवैधानिक व्यवस्था में पर्याप्त भिन्नताएं देखने को मिलती है |
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भारत में सिविल सेवाओं की प्रमुख समस्याओं व अपेक्षित सुधारों की चर्चा कीजिये । ( 150-200 ) Discuss the major problems and expected reforms of civil services in India. (150-200)
दृष्टिकोण : भूमिका में भारतीय सिविल सेवा का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत कीजिए। सिविल सेवाओं की समस्याओं की बिंदुवत चर्चा कीजिए। सिविल सेवा में अपेक्षित सुधारों को लिखिए। संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : भारतीय सिविल सेवा प्रणाली विश्व की प्राचीनतम प्रशासनिक प्रणालियों में से एक है। भारत में आधुनिक सिविल सेवाओं की उत्पत्ति ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी। सिविल सेवा सरकार की कार्यकारी स्थायी शाखा है। यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें निर्वाचित सरकार द्वारा राज्य के अधिकारियों को राज्य के संचालन का कार्य सौंपा जाता है। इनका चयन सरकार द्वारा मेरिट आधारित प्रक्रिया के माध्यम से होता है। भारत को वेबेरियन मोडेल आधारित सिविल सेवा अंग्रेजों से विरासत में मिली। इसमें वरिष्ठता के आधार पर पद्योन्नति की एक प्रणाली, पेंशन के अधिकार के साथ अधिकारियों के लिए निश्चित पारिश्रमिक, पदानुक्रम के रूप में संगठन एवं कठोर नियमों का अनुपालन जैसी विशेषताएँ होती है। वर्तमान सिविल सेवा के समक्ष समस्याएँ -: परंपरागत प्रकृति की यह सेवा लोगों की आवश्यकताओं के प्रति उत्तरदायी नही है। नियमों प्रक्रियों की जटिलता ने नौकरशाही में लालफ़ीताशाही एवं औपचारिकतावाद को बढावा दिया है। स्व हित को जनहित पर वरीयता देने के कारण नौकरशाही में भाई-भतीजावाद देखने को मिलता है। अखिल भारतीय सेवाओं के प्रति राज्यों का दृष्टिकोण नकारात्मक रहा है। जवाबदेहीता की अनुपस्थिति अंत्यधिक केन्द्रीकरण की प्रवृति अप्रचलित कानून, नियम और प्रक्रियाएँ निम्नस्तरीय कार्य सनस्तृति और दक्षता का अभाव सेवाओं का राजनीतिकरण और राजनीतिक हस्तक्षेप प्राधिकरण के दुरुपयोग की नकारात्मक शक्ति और भ्रष्टाचार भूमंडलीकृत विश्व में सामानयज्ञ सिविल सेवेक वर्तमान सिविल सेवा में अपेक्षित सुधार -: लोक सेवाओं की जवाबदेहिता ससुनिश्चित करना निष्पादन पर बल देना वरिष्ठ स्तर की नियुक्ति के लिए प्रतियोगिता और विशेषज्ञतापूर्ण ज्ञान प्रभावी अनुशासनात्मक व्यवस्था कार्य संस्कृति का रूपान्तरण नियमों एवं प्रक्रियाओं को व्यवस्थित करना सूचना प्रौद्योगिकी और ई गवर्नेंस को अपनाना कार्यकाल की स्थिरता प्रदान करना सिविल सेवाओं का विराजनीतिकरण सिविल सेवाओं में पार्श्व प्रवेश सिविल सेवक किसी भी मजबूत लोकतन्त्र की महत्वपूर्ण संरचना होती है। सुशासन जैसे लक्ष्यों की प्राप्ति मजबूत नौकरशाही के बिना संभव नहीं है। प्रक्रियात्मक एवं संरचनात्मक सुधारों के माध्यम से भारतीय सिविल सेवा को प्रभावी बनाया जा सकता है।
##Question:भारत में सिविल सेवाओं की प्रमुख समस्याओं व अपेक्षित सुधारों की चर्चा कीजिये । ( 150-200 ) Discuss the major problems and expected reforms of civil services in India. (150-200)##Answer:दृष्टिकोण : भूमिका में भारतीय सिविल सेवा का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत कीजिए। सिविल सेवाओं की समस्याओं की बिंदुवत चर्चा कीजिए। सिविल सेवा में अपेक्षित सुधारों को लिखिए। संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : भारतीय सिविल सेवा प्रणाली विश्व की प्राचीनतम प्रशासनिक प्रणालियों में से एक है। भारत में आधुनिक सिविल सेवाओं की उत्पत्ति ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी। सिविल सेवा सरकार की कार्यकारी स्थायी शाखा है। यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें निर्वाचित सरकार द्वारा राज्य के अधिकारियों को राज्य के संचालन का कार्य सौंपा जाता है। इनका चयन सरकार द्वारा मेरिट आधारित प्रक्रिया के माध्यम से होता है। भारत को वेबेरियन मोडेल आधारित सिविल सेवा अंग्रेजों से विरासत में मिली। इसमें वरिष्ठता के आधार पर पद्योन्नति की एक प्रणाली, पेंशन के अधिकार के साथ अधिकारियों के लिए निश्चित पारिश्रमिक, पदानुक्रम के रूप में संगठन एवं कठोर नियमों का अनुपालन जैसी विशेषताएँ होती है। वर्तमान सिविल सेवा के समक्ष समस्याएँ -: परंपरागत प्रकृति की यह सेवा लोगों की आवश्यकताओं के प्रति उत्तरदायी नही है। नियमों प्रक्रियों की जटिलता ने नौकरशाही में लालफ़ीताशाही एवं औपचारिकतावाद को बढावा दिया है। स्व हित को जनहित पर वरीयता देने के कारण नौकरशाही में भाई-भतीजावाद देखने को मिलता है। अखिल भारतीय सेवाओं के प्रति राज्यों का दृष्टिकोण नकारात्मक रहा है। जवाबदेहीता की अनुपस्थिति अंत्यधिक केन्द्रीकरण की प्रवृति अप्रचलित कानून, नियम और प्रक्रियाएँ निम्नस्तरीय कार्य सनस्तृति और दक्षता का अभाव सेवाओं का राजनीतिकरण और राजनीतिक हस्तक्षेप प्राधिकरण के दुरुपयोग की नकारात्मक शक्ति और भ्रष्टाचार भूमंडलीकृत विश्व में सामानयज्ञ सिविल सेवेक वर्तमान सिविल सेवा में अपेक्षित सुधार -: लोक सेवाओं की जवाबदेहिता ससुनिश्चित करना निष्पादन पर बल देना वरिष्ठ स्तर की नियुक्ति के लिए प्रतियोगिता और विशेषज्ञतापूर्ण ज्ञान प्रभावी अनुशासनात्मक व्यवस्था कार्य संस्कृति का रूपान्तरण नियमों एवं प्रक्रियाओं को व्यवस्थित करना सूचना प्रौद्योगिकी और ई गवर्नेंस को अपनाना कार्यकाल की स्थिरता प्रदान करना सिविल सेवाओं का विराजनीतिकरण सिविल सेवाओं में पार्श्व प्रवेश सिविल सेवक किसी भी मजबूत लोकतन्त्र की महत्वपूर्ण संरचना होती है। सुशासन जैसे लक्ष्यों की प्राप्ति मजबूत नौकरशाही के बिना संभव नहीं है। प्रक्रियात्मक एवं संरचनात्मक सुधारों के माध्यम से भारतीय सिविल सेवा को प्रभावी बनाया जा सकता है।
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सुशासन से आप क्या समझते हैं? सुशासन की अवधारणाओं की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) What do you understand by good governance? Discuss the concepts of good governance. (150-200 words)
दृष्टिकोण भूमिका में सुशासन को परिभाषित कीजिये तथा अन्य पक्षों को लिखिए। दुसरे भाग में सुशासन सम्बन्धी विभिन्न अवधारणाओं की चर्चा कीजिये। सारांश रूप में निष्कर्ष लिखिए। सुशासन, प्रशासन का वह रूप है जिसमें विधि के शासन के साथ भागीदारी, सहमतिमूलकता, उत्तरदायित्व, पारदर्शिता, अनुक्रियाशीलता, समता एवं समावेशिता तथा प्रभाविता और दक्षता को शामिल किया जाता है। शासन का समाज के परिवर्तनों के अनुरूप परिवर्तनशील होना चाहिए। वर्तमान में विभिन्न कारणों से उपरोक्त गुणों से युक्त सुशासन की आवश्यकता है। शासन में लालफीताशाही तथा भ्रष्टाचार आदि की उपस्थिति है अतः कुशासन से मुक्ति के लिए सुशासन की आवश्यकता होती है । सामाजिक अनुकूलता का अभाव पाया जाता है अतः शासन को सामाजिक परिवर्तनों के अनुरूप करने के लिए सुशासन की आवश्यकता होती है। सुशासन की अवधारणायें: सुशासन की व्यक्तिवादी अवधारणा: ऐसा शासन जो व्यक्तियों पर न्यूनतम प्रतिबन्ध आरोपित करते हुएव्यक्ति की विश्व दृष्टि को आगे बढाता है उसे सुशासन की व्यक्तिवादी अवधारणा कहते हैं यह अवधारणा न्यूनतम शासन सुनिश्चित करते हुए स्वतंत्रता, स्वायत्तता आदि मूल्यों को प्रोत्साहित करती है व्यक्तिवादी अवधारणा शासन के सुविधाप्रदाता स्वरुप का पक्षधर है अर्थात जहाँ कहीं असुविधा उत्पन्न हो सकती है शासन को उसका समाधान प्रस्तुत करने वाला होना चाहिए सार्वजनिक नीति समग्र हितों पर आधारित होनी चाहिए यह अवधारणा कमजोरों के लिए अतिरिक्त सुविधाओं की बात नहीं करती, यह सर्वोत्तम की उत्तरजीविता पर आधारित सिद्धांत है यदि इस अवधारणा को अपनाया जाएगा तो विकास केवल उन लोगों तक सीमित होगा जिनका पहले से ही विकास हो चुका है सुशासन की कल्याणकारी अवधारणा: व्यक्तिवादी व्यवस्था में व्यक्ति अधिकतम लाभ सुनिश्चित करने के लिए नैतिकता को त्याग देता है अतःयह अवधारणा स्पष्ट करती है कि नैतिकता का अभाव, सम्पूर्ण अव्यवस्था का कारण है व्यक्तिवाद से धन संचय प्रोत्साहित होता है इससे समाज पतित होता जाता है अतः कल्याणकारी अवधारणा यह घोषित करती है कि सुशासन का उद्देश्य नैतिकता का विकास करना है। श्रम की समस्त संभावनाओं को साकार करने के लिए यह अवधारणा पूर्ण रोजगार की मांग करती है यह अवधारणा, राज्य के दायित्व के निरंतर विकेंद्रीकरण की मांग करती है इसी क्रम में दायित्व को विकेंद्रीकृत करते हुए यह अवधारणा मांग करती है कि राज्य, सामाजिक दायित्व(CSR) की भावना का विकास करे इसी प्रकार राज्य को सृजनशील एवं जिम्मेदार व्यक्तियों के मध्य भी सामाजिक दायित्व के विकास करना चाहिए राज्य को प्रतिसंतुलनकारी शक्तियों को बढ़ावा देना चाहिए अर्थात समाज के प्रत्येक वर्ग का सशक्तिकरण किया जाना चाहिए ताकि समाज को शोषण से मुक्त किया जा सके| प्रतिसंतुलनकारी शक्तियां एकाधिकारवाद पर नियंत्रण स्थापित करती हैं इससे समाज में प्रतिस्पर्धा की स्थिति उत्पन्न होती है| सुशासन की समतावादी अवधारणा: ऐसी अवधारणा जो समाज के अनुकूल हो, तर्क संगत हो तथा समानता एवं स्वतंत्रता में तर्कपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करती हो उसे सुशासन की समतावादी अवधारणा कहते हैं| जॉन राल्स एवं मैकफर्सन इस अवधारणा से सम्बन्धित विचारक हैं| ऐसा शासन अच्छा शासन होगा जो उत्तरउदारवादी लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्था के मूल्यों को बढाते हुए सामाजिक न्याय में वृद्धि करता है| यहाँ व्यक्तिगत न्याय के साथ साथ सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के प्रयास किये जाते हैं| इसके लिए अवसरों का समान वितरण किया जाता है और समाज के पिछड़े वर्गों को अतिरिक्त सुविधा दी जाती है| जब समानता स्थापित हो जाए तो शुद्ध प्रक्रियात्मक न्याय को अपनाया जाना चाहिए, तब किसी को अतिरिक्त सुविधा नहीं दी जायेगी सुशासन की गांधीवादी अवधारणा: अपने आदर्शवादी सिद्धांत में गांधी जी मानते हैं कि आदर्श अहिंसक समाज में आत्म अनुशासन के कारण राज्य का अभाव होता है चूँकि अपूर्ण व्यक्तियों के द्वारा आदर्श अहिंसक समाज का निर्माण नहीं हो सकता अतः एक अस्थायी एवं न्यूनतम राज्य होना चाहिए अतः प्रत्येक व्यावहारिक राज्य के लिए अनिवार्य है कि वह आदर्श अहिंसक समाज की मान्यताओं एवं मूल्यों को व्यावहारिक स्तर पर लाने का प्रयास करे| उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि सुशासन की विभिन्न अवधारणाओं में मिश्रित पहलुओं का समावेश किया गया है किन्तु समाज और अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति को देखते हुए विश्व बैंक ने सुशासन को नवीनतम एवं समावेशी रूप में परिभाषित किया| विश्व बैंक के अनुसार, प्रत्येक प्रकार का ऐसा शासन जो जनहित के अनुकूल हो उसे सुशासन कहते हैं| ध्यातव्य है कि विश्व बैंक की अवधारणा के पहले सुशासन के लिए दो मानदंड माने जाते थे यथा, नीतियों का क्रियान्वयन (इसमें न्यायपालिका, विधायिका एवं अस्थायी कार्यपालिका को शामिल नहीं किया जाता था) तथाक्रियान्वयन की दक्षता में वृद्धि| इससे आगे बढ़ते हुए विश्व बैंक ने कहा कि बेहतर एवं समावेशी नीतियों का निर्माण(लोकतांत्रिक प्रणाली), लोकतांत्रिक विधि से नीतियों का क्रियान्वयन, जनहित को ध्यान में रखते हुए क्रियान्वयन की दक्षता में वृद्धि को सुशासन कहते हैं| वर्तमान में सुशासन की विश्व बैंक द्वारा दी गयी परिभाषा ही सर्वमान्य है।
##Question:सुशासन से आप क्या समझते हैं? सुशासन की अवधारणाओं की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) What do you understand by good governance? Discuss the concepts of good governance. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में सुशासन को परिभाषित कीजिये तथा अन्य पक्षों को लिखिए। दुसरे भाग में सुशासन सम्बन्धी विभिन्न अवधारणाओं की चर्चा कीजिये। सारांश रूप में निष्कर्ष लिखिए। सुशासन, प्रशासन का वह रूप है जिसमें विधि के शासन के साथ भागीदारी, सहमतिमूलकता, उत्तरदायित्व, पारदर्शिता, अनुक्रियाशीलता, समता एवं समावेशिता तथा प्रभाविता और दक्षता को शामिल किया जाता है। शासन का समाज के परिवर्तनों के अनुरूप परिवर्तनशील होना चाहिए। वर्तमान में विभिन्न कारणों से उपरोक्त गुणों से युक्त सुशासन की आवश्यकता है। शासन में लालफीताशाही तथा भ्रष्टाचार आदि की उपस्थिति है अतः कुशासन से मुक्ति के लिए सुशासन की आवश्यकता होती है । सामाजिक अनुकूलता का अभाव पाया जाता है अतः शासन को सामाजिक परिवर्तनों के अनुरूप करने के लिए सुशासन की आवश्यकता होती है। सुशासन की अवधारणायें: सुशासन की व्यक्तिवादी अवधारणा: ऐसा शासन जो व्यक्तियों पर न्यूनतम प्रतिबन्ध आरोपित करते हुएव्यक्ति की विश्व दृष्टि को आगे बढाता है उसे सुशासन की व्यक्तिवादी अवधारणा कहते हैं यह अवधारणा न्यूनतम शासन सुनिश्चित करते हुए स्वतंत्रता, स्वायत्तता आदि मूल्यों को प्रोत्साहित करती है व्यक्तिवादी अवधारणा शासन के सुविधाप्रदाता स्वरुप का पक्षधर है अर्थात जहाँ कहीं असुविधा उत्पन्न हो सकती है शासन को उसका समाधान प्रस्तुत करने वाला होना चाहिए सार्वजनिक नीति समग्र हितों पर आधारित होनी चाहिए यह अवधारणा कमजोरों के लिए अतिरिक्त सुविधाओं की बात नहीं करती, यह सर्वोत्तम की उत्तरजीविता पर आधारित सिद्धांत है यदि इस अवधारणा को अपनाया जाएगा तो विकास केवल उन लोगों तक सीमित होगा जिनका पहले से ही विकास हो चुका है सुशासन की कल्याणकारी अवधारणा: व्यक्तिवादी व्यवस्था में व्यक्ति अधिकतम लाभ सुनिश्चित करने के लिए नैतिकता को त्याग देता है अतःयह अवधारणा स्पष्ट करती है कि नैतिकता का अभाव, सम्पूर्ण अव्यवस्था का कारण है व्यक्तिवाद से धन संचय प्रोत्साहित होता है इससे समाज पतित होता जाता है अतः कल्याणकारी अवधारणा यह घोषित करती है कि सुशासन का उद्देश्य नैतिकता का विकास करना है। श्रम की समस्त संभावनाओं को साकार करने के लिए यह अवधारणा पूर्ण रोजगार की मांग करती है यह अवधारणा, राज्य के दायित्व के निरंतर विकेंद्रीकरण की मांग करती है इसी क्रम में दायित्व को विकेंद्रीकृत करते हुए यह अवधारणा मांग करती है कि राज्य, सामाजिक दायित्व(CSR) की भावना का विकास करे इसी प्रकार राज्य को सृजनशील एवं जिम्मेदार व्यक्तियों के मध्य भी सामाजिक दायित्व के विकास करना चाहिए राज्य को प्रतिसंतुलनकारी शक्तियों को बढ़ावा देना चाहिए अर्थात समाज के प्रत्येक वर्ग का सशक्तिकरण किया जाना चाहिए ताकि समाज को शोषण से मुक्त किया जा सके| प्रतिसंतुलनकारी शक्तियां एकाधिकारवाद पर नियंत्रण स्थापित करती हैं इससे समाज में प्रतिस्पर्धा की स्थिति उत्पन्न होती है| सुशासन की समतावादी अवधारणा: ऐसी अवधारणा जो समाज के अनुकूल हो, तर्क संगत हो तथा समानता एवं स्वतंत्रता में तर्कपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करती हो उसे सुशासन की समतावादी अवधारणा कहते हैं| जॉन राल्स एवं मैकफर्सन इस अवधारणा से सम्बन्धित विचारक हैं| ऐसा शासन अच्छा शासन होगा जो उत्तरउदारवादी लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्था के मूल्यों को बढाते हुए सामाजिक न्याय में वृद्धि करता है| यहाँ व्यक्तिगत न्याय के साथ साथ सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के प्रयास किये जाते हैं| इसके लिए अवसरों का समान वितरण किया जाता है और समाज के पिछड़े वर्गों को अतिरिक्त सुविधा दी जाती है| जब समानता स्थापित हो जाए तो शुद्ध प्रक्रियात्मक न्याय को अपनाया जाना चाहिए, तब किसी को अतिरिक्त सुविधा नहीं दी जायेगी सुशासन की गांधीवादी अवधारणा: अपने आदर्शवादी सिद्धांत में गांधी जी मानते हैं कि आदर्श अहिंसक समाज में आत्म अनुशासन के कारण राज्य का अभाव होता है चूँकि अपूर्ण व्यक्तियों के द्वारा आदर्श अहिंसक समाज का निर्माण नहीं हो सकता अतः एक अस्थायी एवं न्यूनतम राज्य होना चाहिए अतः प्रत्येक व्यावहारिक राज्य के लिए अनिवार्य है कि वह आदर्श अहिंसक समाज की मान्यताओं एवं मूल्यों को व्यावहारिक स्तर पर लाने का प्रयास करे| उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि सुशासन की विभिन्न अवधारणाओं में मिश्रित पहलुओं का समावेश किया गया है किन्तु समाज और अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति को देखते हुए विश्व बैंक ने सुशासन को नवीनतम एवं समावेशी रूप में परिभाषित किया| विश्व बैंक के अनुसार, प्रत्येक प्रकार का ऐसा शासन जो जनहित के अनुकूल हो उसे सुशासन कहते हैं| ध्यातव्य है कि विश्व बैंक की अवधारणा के पहले सुशासन के लिए दो मानदंड माने जाते थे यथा, नीतियों का क्रियान्वयन (इसमें न्यायपालिका, विधायिका एवं अस्थायी कार्यपालिका को शामिल नहीं किया जाता था) तथाक्रियान्वयन की दक्षता में वृद्धि| इससे आगे बढ़ते हुए विश्व बैंक ने कहा कि बेहतर एवं समावेशी नीतियों का निर्माण(लोकतांत्रिक प्रणाली), लोकतांत्रिक विधि से नीतियों का क्रियान्वयन, जनहित को ध्यान में रखते हुए क्रियान्वयन की दक्षता में वृद्धि को सुशासन कहते हैं| वर्तमान में सुशासन की विश्व बैंक द्वारा दी गयी परिभाषा ही सर्वमान्य है।
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भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रधानमन्त्री की भूमिका एवं महत्त्व को स्पष्ट कीजिये |(150 से 200 शब्द; 10 अंक) Clarify the role and importance of the Prime Minister in the Indian democratic system. (150 to 200 words; 10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था और प्रधानमन्त्री के बारे में बताइये 2- प्रथम भाग में प्रधानमन्त्री की भूमिका स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था वेस्टमिनिस्टर प्रणाली आधारित संसदीय लोकतंत्र के माध्यम से संचालित होती है| वेस्टमिन्स्टर प्रणाली में बहुमत की सत्ता की सत्ता होती है| इस प्रणाली में प्रधानमंत्री सरकार का प्रमुख(सर्वेसर्वा ) होता है| भारत में प्रधानमंत्री कि स्थिति अपने दल के सबसे बडे नेता की होती है| यदि वह दल सत्ता में आता है तो उसका नेता कौन होगा इस पर चर्चा नहीं होती है| प्रधानमन्त्री की भूमिका प्रधानमंत्री और उसका दल प्रधानमन्त्री जिस गठबंधन और जिस सरकार का नेतृत्व करता है उसमें शामिल दल प्रधानमन्त्री की विचारधारा से रायः सहमत होते हैं यदि प्रधानमंती देश के हित सम्बन्धी किसी मुद्दे पर अपनी अलग से राय रखते है तो ,प्रायः उसके दल और उसकी सरकार को समर्थन देने वाले दल इस पर सहमत हो जाते हैं आर्थिक और वित्तीय प्रबंधन में भूमिका देश का वित्त मंत्रालय राजकोषीय नीति का निर्माण करता है| बजट के माध्यम से संसद सरकार को इस बात के लिए अधिकृत करती है दुसरी और केन्द्रीय बैंक (RBI) देश की मौद्रिक नीति का निर्माण करता है, यह विदेशी मुद्रा के प्रबंधन के लिए भी उत्तरदायी होता है, साथ ही घरेलू बाजार में साख नियंत्रण एवं मुद्रास्फीति पर नियंत्रण करना इसके प्रमुख कार्य होते हैं किन्तु ये दोनों अभिकरण तत्संबंधी नीतियों का निर्माण उसी अनुरूप करती हैं जैसा कि प्रधानमन्त्री का निर्देश होता है| अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के तीन घटक होते हैं यथा राष्ट्रीय हित, राष्ट्रीय सुरक्षा ,राष्ट्रीय शक्ति उपरोक्त तीनों घटकों का मुख्य संचालक प्रधानमंत्री होता है आपातकाल के दौरान प्रधानमंत्री की भूमिका राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा के बाद केंद्र और राज्यों के बीच जिन शक्तियों का विभाजन हुआ है वे निलंबित हो जाते हैं और देश में एकात्मक शासन प्रणाली लागु हो जाती है, दुसरे शब्दों में राज्य सरकारें बनी रहती हैं किन्तु मुख्यमंत्रियों कि भूमिका बहुत कम हो जाती है, परिणामस्वरूप सत्ता प्रधानमंत्री क्वे चारों तरफ घूमने लगती है और जैसा वह चाहता है देश का शासन उसी अनुसार संचालित होता है ; प्रधानमंत्री का महत्त्व प्रधानमन्त्री मंत्रिपरिषद का प्रधान होता है|वह केवल प्रधान ही नहीं बल्कि मंत्री परिषद् वही करती है जो प्रधानमंत्री चाहता है; यदि मंत्री को विरोध करना है तो बेहतर है कि वह मंत्रीपरिषद् छोड़ दे, अन्यथा प्रधानमत्री उसे हटा देगा यदि प्रधानमंत्री लोकसभा का सदस्य है तो वही सदन का नेता कहलाता है, अर्थात लोकसभा में जो भी राजनीतक और नैतिक आचरण होते हैं वे प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व से प्रेरित होते हैं साथ ही उसी के मार्गदर्शन में सदन कि कार्यवाही सम्पान्न होगी संसद का अविभाज्य अंग; यदि प्रधानमंत्री राज्यसभा का सदस्य है तो भी संसद का सञ्चालन उसके दिशानिर्देशों के अनुरूप और उसके आचरण के अनुसार होता है | इसके साथ साथ वह संसद व सरकार के बीच एक मजबूत कड़ी भी है संसदीय प्रणाली में प्रधानमन्त्री के उपरोक्त महत्त्व को देखते हुए विभिन्न विद्वानों ने प्रधानमंत्री पद के सन्दर्भ में अपने विचार व्यक्त किये हैं| मारले के अनुसार वह अपने मंत्रियों में सर्वश्रेष्ठ होता है|जबकि हर्बर्ट मोरिसन के अनुसार वह सत्ता की धुरी है |सर विलियम हरकोर्ट के अनुसार वह लघु तारों के बीच चमकता हुआ चन्द्रमा है| एच जे लास्की- वह अपनी कैबिनेट का केंद्र बिंदु होता है तथा वह कैबिनेट की जीवनधारा का भी कार्य करता है|इस तरह से देखते हैं कि वेस्ट मिन्स्टर प्रणाली के अंतर्गत प्रधानमन्त्री की मजबूत स्थिति होती है
##Question:भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रधानमन्त्री की भूमिका एवं महत्त्व को स्पष्ट कीजिये |(150 से 200 शब्द; 10 अंक) Clarify the role and importance of the Prime Minister in the Indian democratic system. (150 to 200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था और प्रधानमन्त्री के बारे में बताइये 2- प्रथम भाग में प्रधानमन्त्री की भूमिका स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था वेस्टमिनिस्टर प्रणाली आधारित संसदीय लोकतंत्र के माध्यम से संचालित होती है| वेस्टमिन्स्टर प्रणाली में बहुमत की सत्ता की सत्ता होती है| इस प्रणाली में प्रधानमंत्री सरकार का प्रमुख(सर्वेसर्वा ) होता है| भारत में प्रधानमंत्री कि स्थिति अपने दल के सबसे बडे नेता की होती है| यदि वह दल सत्ता में आता है तो उसका नेता कौन होगा इस पर चर्चा नहीं होती है| प्रधानमन्त्री की भूमिका प्रधानमंत्री और उसका दल प्रधानमन्त्री जिस गठबंधन और जिस सरकार का नेतृत्व करता है उसमें शामिल दल प्रधानमन्त्री की विचारधारा से रायः सहमत होते हैं यदि प्रधानमंती देश के हित सम्बन्धी किसी मुद्दे पर अपनी अलग से राय रखते है तो ,प्रायः उसके दल और उसकी सरकार को समर्थन देने वाले दल इस पर सहमत हो जाते हैं आर्थिक और वित्तीय प्रबंधन में भूमिका देश का वित्त मंत्रालय राजकोषीय नीति का निर्माण करता है| बजट के माध्यम से संसद सरकार को इस बात के लिए अधिकृत करती है दुसरी और केन्द्रीय बैंक (RBI) देश की मौद्रिक नीति का निर्माण करता है, यह विदेशी मुद्रा के प्रबंधन के लिए भी उत्तरदायी होता है, साथ ही घरेलू बाजार में साख नियंत्रण एवं मुद्रास्फीति पर नियंत्रण करना इसके प्रमुख कार्य होते हैं किन्तु ये दोनों अभिकरण तत्संबंधी नीतियों का निर्माण उसी अनुरूप करती हैं जैसा कि प्रधानमन्त्री का निर्देश होता है| अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के तीन घटक होते हैं यथा राष्ट्रीय हित, राष्ट्रीय सुरक्षा ,राष्ट्रीय शक्ति उपरोक्त तीनों घटकों का मुख्य संचालक प्रधानमंत्री होता है आपातकाल के दौरान प्रधानमंत्री की भूमिका राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा के बाद केंद्र और राज्यों के बीच जिन शक्तियों का विभाजन हुआ है वे निलंबित हो जाते हैं और देश में एकात्मक शासन प्रणाली लागु हो जाती है, दुसरे शब्दों में राज्य सरकारें बनी रहती हैं किन्तु मुख्यमंत्रियों कि भूमिका बहुत कम हो जाती है, परिणामस्वरूप सत्ता प्रधानमंत्री क्वे चारों तरफ घूमने लगती है और जैसा वह चाहता है देश का शासन उसी अनुसार संचालित होता है ; प्रधानमंत्री का महत्त्व प्रधानमन्त्री मंत्रिपरिषद का प्रधान होता है|वह केवल प्रधान ही नहीं बल्कि मंत्री परिषद् वही करती है जो प्रधानमंत्री चाहता है; यदि मंत्री को विरोध करना है तो बेहतर है कि वह मंत्रीपरिषद् छोड़ दे, अन्यथा प्रधानमत्री उसे हटा देगा यदि प्रधानमंत्री लोकसभा का सदस्य है तो वही सदन का नेता कहलाता है, अर्थात लोकसभा में जो भी राजनीतक और नैतिक आचरण होते हैं वे प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व से प्रेरित होते हैं साथ ही उसी के मार्गदर्शन में सदन कि कार्यवाही सम्पान्न होगी संसद का अविभाज्य अंग; यदि प्रधानमंत्री राज्यसभा का सदस्य है तो भी संसद का सञ्चालन उसके दिशानिर्देशों के अनुरूप और उसके आचरण के अनुसार होता है | इसके साथ साथ वह संसद व सरकार के बीच एक मजबूत कड़ी भी है संसदीय प्रणाली में प्रधानमन्त्री के उपरोक्त महत्त्व को देखते हुए विभिन्न विद्वानों ने प्रधानमंत्री पद के सन्दर्भ में अपने विचार व्यक्त किये हैं| मारले के अनुसार वह अपने मंत्रियों में सर्वश्रेष्ठ होता है|जबकि हर्बर्ट मोरिसन के अनुसार वह सत्ता की धुरी है |सर विलियम हरकोर्ट के अनुसार वह लघु तारों के बीच चमकता हुआ चन्द्रमा है| एच जे लास्की- वह अपनी कैबिनेट का केंद्र बिंदु होता है तथा वह कैबिनेट की जीवनधारा का भी कार्य करता है|इस तरह से देखते हैं कि वेस्ट मिन्स्टर प्रणाली के अंतर्गत प्रधानमन्त्री की मजबूत स्थिति होती है
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The north-eastern region of India has been infested with insurgency for a very long time. Analyze the major reasons for the armed insurgency in this region. (200 words)
Approach: Introduce by giving the background for insurgency in the North-East Explain the reasons for armed insurgency in north-east India Suggest a solution to the problem at hand and conclude the answer Answer: The insurgencies in the North-East are a reflection of its social, cultural, ethnic and linguistic diversity, politico-economic conditions, historical evolution and changes in the environment of the area. Historical Background Most of the North-eastern region was not part of India before coming of British, for example, Assam was an independent state and most of the parts were integrated during British rule. The formation of states also did not consider the ethnicity of people and organisation of states aggravated the ethnic conflict. Reasons for conflict Conflicts in the region can be broadly grouped under the following categories: 1. National conflicts: Involving the concept of a distinct ‘homeland’ as a separate nation and pursuit of the realization of that goal by use of various methods both violent as well as non-violent. Ex: ULFA demand for sovereign Asom, NSCN for Greater Nagaland. 2. Ethnic conflicts: Involving the assertion of numerically smaller and less dominant tribal groups against the political and cultural hold of the dominant tribal group. In Assam, this also takes the form of tension between local and migrant communities. 3. Sub-regional conflicts: Involving movements which ask for recognition of sub-regional aspirations and often come in direct conflict with the State Governments or even the autonomous Councils. Ex: UPDS in Assam. General conditions favoring Insurgency: 1. Large scale migration has created a fear in the minds of people that they will be reduced to a minority in their own states or regions. Migrants threaten their culture and traditions and also occupy already limited employment opportunities. The migration of Muslims has also imparted a communal color. 2. Lack of economic opportunities and governance deficit making it easier for people to feel alienated and left out and thus providing support for the insurgency. 3. Porous international borders and the easy availability of arms. 4. Difficult terrain and weak infrastructure facilitating insurgents involved in the conflict. 5. The deep sense of alienation due to human right violation and excesses by security forces To tackle the problem of insurgency in North-east following can be done: 1. Meeting the political aspirations of groups by giving them autonomy. Implementing sixth schedule provisions in these areas will help them to preserve their identity and culture while giving them greater autonomy. 2. The economic development of the area in a calibrated manner. Any development should be sustainable and should have the participation and acceptance by the locals. 3. Improving Governance and delivery mechanisms of the government and administration. 4. The pre-condition of complete abjuring of violence for holding peace talks is a flawed notion. If violence is discarded and peace is established then the need for peace talks becomes futile. Dialogue should be an ongoing process to reach concrete solutions by involving all the stakeholders and not a single group. 5. Coordinating operations with the neighboring countries and use of force only when needed. Draconian laws like AFSPA should be repealed as it is one of the causes of inflating insurgency in North east. 6. Rebel groups must also be more pragmatic by seeking greater autonomy within the constitutional mandate rather than demanding newer states and regions based on ever-narrowing ethnic and linguistic identities, which are beyond acceptance. 7. Centre and states should coordinate in decision making. State police and central forces should cooperate on intelligence sharing, investigation, and operations against militants. Although varying in their demands and methods, there is a common thread running through the insurgency infested in north-east, that is of identity and development. Hence, some solutions that are common need to be explored with specifics derived from them for specific regions and groups to solve the problem of insurgency in the north-east.
##Question:The north-eastern region of India has been infested with insurgency for a very long time. Analyze the major reasons for the armed insurgency in this region. (200 words)##Answer:Approach: Introduce by giving the background for insurgency in the North-East Explain the reasons for armed insurgency in north-east India Suggest a solution to the problem at hand and conclude the answer Answer: The insurgencies in the North-East are a reflection of its social, cultural, ethnic and linguistic diversity, politico-economic conditions, historical evolution and changes in the environment of the area. Historical Background Most of the North-eastern region was not part of India before coming of British, for example, Assam was an independent state and most of the parts were integrated during British rule. The formation of states also did not consider the ethnicity of people and organisation of states aggravated the ethnic conflict. Reasons for conflict Conflicts in the region can be broadly grouped under the following categories: 1. National conflicts: Involving the concept of a distinct ‘homeland’ as a separate nation and pursuit of the realization of that goal by use of various methods both violent as well as non-violent. Ex: ULFA demand for sovereign Asom, NSCN for Greater Nagaland. 2. Ethnic conflicts: Involving the assertion of numerically smaller and less dominant tribal groups against the political and cultural hold of the dominant tribal group. In Assam, this also takes the form of tension between local and migrant communities. 3. Sub-regional conflicts: Involving movements which ask for recognition of sub-regional aspirations and often come in direct conflict with the State Governments or even the autonomous Councils. Ex: UPDS in Assam. General conditions favoring Insurgency: 1. Large scale migration has created a fear in the minds of people that they will be reduced to a minority in their own states or regions. Migrants threaten their culture and traditions and also occupy already limited employment opportunities. The migration of Muslims has also imparted a communal color. 2. Lack of economic opportunities and governance deficit making it easier for people to feel alienated and left out and thus providing support for the insurgency. 3. Porous international borders and the easy availability of arms. 4. Difficult terrain and weak infrastructure facilitating insurgents involved in the conflict. 5. The deep sense of alienation due to human right violation and excesses by security forces To tackle the problem of insurgency in North-east following can be done: 1. Meeting the political aspirations of groups by giving them autonomy. Implementing sixth schedule provisions in these areas will help them to preserve their identity and culture while giving them greater autonomy. 2. The economic development of the area in a calibrated manner. Any development should be sustainable and should have the participation and acceptance by the locals. 3. Improving Governance and delivery mechanisms of the government and administration. 4. The pre-condition of complete abjuring of violence for holding peace talks is a flawed notion. If violence is discarded and peace is established then the need for peace talks becomes futile. Dialogue should be an ongoing process to reach concrete solutions by involving all the stakeholders and not a single group. 5. Coordinating operations with the neighboring countries and use of force only when needed. Draconian laws like AFSPA should be repealed as it is one of the causes of inflating insurgency in North east. 6. Rebel groups must also be more pragmatic by seeking greater autonomy within the constitutional mandate rather than demanding newer states and regions based on ever-narrowing ethnic and linguistic identities, which are beyond acceptance. 7. Centre and states should coordinate in decision making. State police and central forces should cooperate on intelligence sharing, investigation, and operations against militants. Although varying in their demands and methods, there is a common thread running through the insurgency infested in north-east, that is of identity and development. Hence, some solutions that are common need to be explored with specifics derived from them for specific regions and groups to solve the problem of insurgency in the north-east.
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बुद्ध की शिक्षाओं का संक्षेप में उल्लेख करते हुए बौद्ध धर्म की लोकप्रियता के कारणों को स्पष्ट कीजिये | (150 से 200 शब्द, अंक-10 ) Briefly mention the teachings of Buddha and explain the reasons for the popularity of Buddhism. (150 to 200 words, Marks-10 )
दृष्टिकोण 1- भूमिका में बौद्ध धर्म के बारे में बताइये 2- प्रथम भाग में बुद्ध की शिक्षाओं का उल्लेख कीजिये 3- दुसरे भाग में बौद्ध धर्म की लोकप्रियता के कारणों को स्पष्ट कीजिये 4- अतिम में योगदान स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये उत्तरवैदिक कालीन संस्कृति के बाद 6वीं शताब्दी BC में विकसित संस्कृति को सूत्रकाल अथवा बुद्धकाल की संज्ञा दी जाती है| इस काल में भारत में राज्यों के रूप में 16 महाजनपदों का अस्तित्व मिलता है| 6वीं शताब्दी BC वैश्विक स्तर पर वैचारिक क्रान्ति का काल था| इसीक्रम में भारत में भी परम्परागत मान्यताओं का विरोध करने वाले विभिन्न असनातनी पंथों का उदय हुआ बौद्ध धर्म इन्ही असनातनी पंथों में से एक था| बुद्ध की प्रमुख शिक्षाएं बुद्ध की शिक्षाओं का लक्ष्य निर्वाण अर्थात दुखों और संसार में आवागमन से मुक्ति था बुद्ध तर्कबुद्धिवादी विचारक थे, बुद्ध ने संसार को दुखमय मानते हुए इसे दुःख के चक्र से निकलने के लिए चार आर्यसत्य, अष्टांगिक मार्ग एवं निर्वाण की अवधारणा को प्रस्तुत किया दुखों के कारणों के रूप में प्रतीत्य समुत्पाद/द्वादस निदान, जबकि समाधान के रूप में पंचशील एवं मध्यम मार्ग का प्रतिपादन किया बुद्ध ईश्वर तथा आत्मा को नहीं मानते थें लेकिन पुनर्जन्म को मानते थें| वे संसार को क्षणभंगुर मानते थें| वेदों को अपारूषेय नहीं मानते थें| ब्राह्मण धर्म में प्रचलित अंधविश्वास, चमत्कार, कर्मकांड आदि की कठोर शब्दों में आलोचना की| जन्म के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव के विरोधी थे| यही कारण है कि जातिप्रथा और छुआछूत आदि की कठोर शब्दों में आलोचना की और समानता के विचारों का प्रसार किया| मित्रता, दया, अहिंसा जैसे गुणों को प्राणियों के लिए आवश्यक माना; बुद्ध एक व्यवहारिक चिंतक थें| एक तरफ भिक्षुओं के लिए आचरण के दस नियम प्रतिपादित किया तो दूसरी तरफ गृहस्थों के लिए पंचशील का उपदेश दिया| पंचशील- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, नशा का सेवन नहीं तथा ब्रह्मचर्य का पालन; बौद्ध धर्म की लोकप्रियता के कारण ब्राह्मण धर्म एवं व्यवस्था से समाज में व्यापक असंतोष था, धर्म का सरलीकरण होने से यह आम जनों के लिए सहज था सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षाओं के कारण इसे लोकप्रियता मिली आम लोगों की भाषा में उपदेश देने के कारण बौद्ध धर्म लोकप्रिय हुआ बुद्ध के राज परिवार से सम्बन्धित होने के कारण भी बौद्ध धर्म को लोकप्रियता प्राप्त हुई बुद्ध का व्यक्तित्व जैसे धैर्य, तार्किक दृष्टिकोण, परिस्थितियों के अनुकूल यदाकदा शिक्षा में परिवर्तन बुद्ध के समकालीन शासकों का समर्थन एवं संरक्षण प्राप्त होना जैसे बिम्बिसार, अजातशत्रु, प्रसेनजीत आदि, बुद्ध के पश्चात भी अलग अलग दौर में कई शासकों ने बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया जैसे अशोक, कनिष्क, हर्षवर्धन आदि बुद्ध के पश्चात बुद्ध की शिक्षाओं के संकलन एवं विवादों के निराकरण के लिए बौद्ध संगीतियों का आयोजन किया गया बुद्ध के पश्चात कई विद्वानों ने भी बुद्ध की शिक्षाओं पर पुस्तकें लिखी जैसे- बुद्धघोष, बुद्धदत, धर्मपाल आदि जिन्होंने बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी बौद्ध धर्म ने कला के क्षेत्र में स्थापत्य कला, चित्रकला तथा मूर्तिकला के क्षेत्र में बुद्ध को केंद्र मन रख कर भारत सहित विश्व के कई देशों में कलात्मक गतिविधियाँ का विस्तार किया है | भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में योगदान, पालि व संस्कृत भाषा के विकास में बौद्ध धर्म का महत्वपूर्ण योगदान है| बड़ी संख्या में धार्मिक ग्रंथों की रचना की गयी है| सामाजिक क्षेत्र में प्रत्येक प्रकार की असमानता पर प्रहार, दया, सहिष्णुता जैसे विचारों के आचरण पर बल दिया गया है | राजनीतिक क्षेत्र में अहिंसा, मित्रता, सहिष्णुता जैसे विचारों का राजनीतिक महत्त्व भी है| बुद्ध की शिक्षाओं को आधार बना कर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में भारत ने पंचशील की अवधारणा रखी है और संविधान के अनुच्छेद 51 पर भी इसका प्रभाव दे सकते हैं| बौद्ध धर्म ने धर्म का सरलीकरण अर्थात कर्मकांड, अंधविश्वास तथा मध्यस्थमुक्त धर्म तथा अच्छे आचरण पर बल, जो आज भी भारत सहित विश्व के कई देशों में लोकप्रिय है|
##Question:बुद्ध की शिक्षाओं का संक्षेप में उल्लेख करते हुए बौद्ध धर्म की लोकप्रियता के कारणों को स्पष्ट कीजिये | (150 से 200 शब्द, अंक-10 ) Briefly mention the teachings of Buddha and explain the reasons for the popularity of Buddhism. (150 to 200 words, Marks-10 )##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में बौद्ध धर्म के बारे में बताइये 2- प्रथम भाग में बुद्ध की शिक्षाओं का उल्लेख कीजिये 3- दुसरे भाग में बौद्ध धर्म की लोकप्रियता के कारणों को स्पष्ट कीजिये 4- अतिम में योगदान स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये उत्तरवैदिक कालीन संस्कृति के बाद 6वीं शताब्दी BC में विकसित संस्कृति को सूत्रकाल अथवा बुद्धकाल की संज्ञा दी जाती है| इस काल में भारत में राज्यों के रूप में 16 महाजनपदों का अस्तित्व मिलता है| 6वीं शताब्दी BC वैश्विक स्तर पर वैचारिक क्रान्ति का काल था| इसीक्रम में भारत में भी परम्परागत मान्यताओं का विरोध करने वाले विभिन्न असनातनी पंथों का उदय हुआ बौद्ध धर्म इन्ही असनातनी पंथों में से एक था| बुद्ध की प्रमुख शिक्षाएं बुद्ध की शिक्षाओं का लक्ष्य निर्वाण अर्थात दुखों और संसार में आवागमन से मुक्ति था बुद्ध तर्कबुद्धिवादी विचारक थे, बुद्ध ने संसार को दुखमय मानते हुए इसे दुःख के चक्र से निकलने के लिए चार आर्यसत्य, अष्टांगिक मार्ग एवं निर्वाण की अवधारणा को प्रस्तुत किया दुखों के कारणों के रूप में प्रतीत्य समुत्पाद/द्वादस निदान, जबकि समाधान के रूप में पंचशील एवं मध्यम मार्ग का प्रतिपादन किया बुद्ध ईश्वर तथा आत्मा को नहीं मानते थें लेकिन पुनर्जन्म को मानते थें| वे संसार को क्षणभंगुर मानते थें| वेदों को अपारूषेय नहीं मानते थें| ब्राह्मण धर्म में प्रचलित अंधविश्वास, चमत्कार, कर्मकांड आदि की कठोर शब्दों में आलोचना की| जन्म के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव के विरोधी थे| यही कारण है कि जातिप्रथा और छुआछूत आदि की कठोर शब्दों में आलोचना की और समानता के विचारों का प्रसार किया| मित्रता, दया, अहिंसा जैसे गुणों को प्राणियों के लिए आवश्यक माना; बुद्ध एक व्यवहारिक चिंतक थें| एक तरफ भिक्षुओं के लिए आचरण के दस नियम प्रतिपादित किया तो दूसरी तरफ गृहस्थों के लिए पंचशील का उपदेश दिया| पंचशील- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, नशा का सेवन नहीं तथा ब्रह्मचर्य का पालन; बौद्ध धर्म की लोकप्रियता के कारण ब्राह्मण धर्म एवं व्यवस्था से समाज में व्यापक असंतोष था, धर्म का सरलीकरण होने से यह आम जनों के लिए सहज था सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षाओं के कारण इसे लोकप्रियता मिली आम लोगों की भाषा में उपदेश देने के कारण बौद्ध धर्म लोकप्रिय हुआ बुद्ध के राज परिवार से सम्बन्धित होने के कारण भी बौद्ध धर्म को लोकप्रियता प्राप्त हुई बुद्ध का व्यक्तित्व जैसे धैर्य, तार्किक दृष्टिकोण, परिस्थितियों के अनुकूल यदाकदा शिक्षा में परिवर्तन बुद्ध के समकालीन शासकों का समर्थन एवं संरक्षण प्राप्त होना जैसे बिम्बिसार, अजातशत्रु, प्रसेनजीत आदि, बुद्ध के पश्चात भी अलग अलग दौर में कई शासकों ने बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया जैसे अशोक, कनिष्क, हर्षवर्धन आदि बुद्ध के पश्चात बुद्ध की शिक्षाओं के संकलन एवं विवादों के निराकरण के लिए बौद्ध संगीतियों का आयोजन किया गया बुद्ध के पश्चात कई विद्वानों ने भी बुद्ध की शिक्षाओं पर पुस्तकें लिखी जैसे- बुद्धघोष, बुद्धदत, धर्मपाल आदि जिन्होंने बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी बौद्ध धर्म ने कला के क्षेत्र में स्थापत्य कला, चित्रकला तथा मूर्तिकला के क्षेत्र में बुद्ध को केंद्र मन रख कर भारत सहित विश्व के कई देशों में कलात्मक गतिविधियाँ का विस्तार किया है | भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में योगदान, पालि व संस्कृत भाषा के विकास में बौद्ध धर्म का महत्वपूर्ण योगदान है| बड़ी संख्या में धार्मिक ग्रंथों की रचना की गयी है| सामाजिक क्षेत्र में प्रत्येक प्रकार की असमानता पर प्रहार, दया, सहिष्णुता जैसे विचारों के आचरण पर बल दिया गया है | राजनीतिक क्षेत्र में अहिंसा, मित्रता, सहिष्णुता जैसे विचारों का राजनीतिक महत्त्व भी है| बुद्ध की शिक्षाओं को आधार बना कर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में भारत ने पंचशील की अवधारणा रखी है और संविधान के अनुच्छेद 51 पर भी इसका प्रभाव दे सकते हैं| बौद्ध धर्म ने धर्म का सरलीकरण अर्थात कर्मकांड, अंधविश्वास तथा मध्यस्थमुक्त धर्म तथा अच्छे आचरण पर बल, जो आज भी भारत सहित विश्व के कई देशों में लोकप्रिय है|
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सत्यनिष्ठा से आप क्या समझते हैं? सत्यनिष्ठा तथा लोकसेवकों के मध्य संबंधों के विभिन्न आयामों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए| (150-200 शब्द;10 अंक) What do you understand by Integrity? Briefly Describe the various dimensions of the relationship between Integrity and Public Servants. (150-200 Words; 10 Marks)
एप्रोच- पहले भाग में, सत्यनिष्ठा को परिभाषित करते हुए उसका संक्षिप्त वर्णन कीजिये| अगले भाग में, सत्यनिष्ठा तथा लोकसेवकों के मध्य संबंधों के विभिन्न आयामों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए| उत्तर- सत्यनिष्ठा या इंटेग्रिटी लैटिन शब्दइन्टिजर(Integer)से बना है जिसका अर्थ संपूर्ण या पूर्ण होता है| नीतिशास्त्र में सत्यनिष्ठ होने का अर्थईमानदारी तथा अपरिवर्तनशील दृढ नैतिक सिद्धांतोंका गुण रखने वाला व्यक्तिहोता है| सत्यनिष्ठा कोकार्यों, मूल्यों, पद्धतियों, उपायों, सिद्धांतों, अपेक्षाओं और परिणामों के साथ सामंजस्य या संगतताकी अवधारणाके रूप में परिभाषित किया जाता है| यह एकगुणात्मक अवधारणाहै अतःमात्रात्मक तरीके से सत्यनिष्ठा को परिभाषित किया जाना संभव नहींहै| सत्यनिष्ठा व्यक्तव्य, विचार एवं क्रियाशीलता पर केंद्रित होता है | भ्रष्टाचार सत्यनिष्ठा का एक आयाम है या अधिक से अधिक एक महत्वपूर्ण आयाम है परंतु एकमात्र आयाम नहीं है| सत्यनिष्ठा एकपरिपूर्ण अवधारणाहै जिससे इसका आंशिक/सापेक्षिक मापन/विश्लेषण किया जाना संभव नहीं है| अतः सत्यनिष्ठा को लेकर दो ही प्रकार की स्थिति हो सकती है यानिव्यक्ति या तो सत्यनिष्ठ होगा या नहीं होगा | सत्यनिष्ठागैर-समझौता एवं गैर-चयनितहोता है| बिना ज्ञान के सत्यनिष्ठा कमजोर एवं निरर्थक है परंतु बिना सत्यनिष्ठा के ज्ञान खतरनाक है | सत्यनिष्ठा यह अपेक्षा करता है व्यक्ति निजी एवं सार्वजनिक जीवन में एकरूप हो | पूर्ण सत्यनिष्ठ व्यक्ति कभी भी प्रलोभन या बाहरी दबाव से प्रभावित नहीं होता है क्योंकि वह अपनी अंतरात्मा के अनुरूप ही अनुक्रिया करता है| सत्यनिष्ठा तथा लोकसेवकों के मध्य संबंधों के विभिन्न आयाम सत्यनिष्ठा का लोकसेवकों को उनके कर्तव्यों के निर्वहन में महत्वपूर्ण योगदान होता है|नोलन समितिद्वारा सिविल सेवकों के लिए सत्यनिष्ठा को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया गया है - " सार्वजनिक पदधारकों को स्वंय को बाहरी व्यक्तियों या संगठनों के प्रति किसी भी वितीय या अन्य दायित्व के अधीन नहीं रखना चाहिए जो उन्हें उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निष्पादन को प्रभावित करे|" एक लोकसेवक का व्यवहार लोकसेवक की तरह होना चाहिए एवं इसमे किसी प्रकार की कमी सत्यनिष्ठा की कमी को दर्शाती है| अतः लोकसेवकों को उनके कार्यों के उचित निष्पादन हेतु उनमें सत्यनिष्ठा का होना बेहद जरुरी है| लोकसेवकों में विभिन्न मानवीय तथा पेशेवर मूल्यों का होना बेहद जरुरी है|सत्यनिष्ठा लोकसेवकों केमूल्यों का मूल्य(Values)हैअतः यह मूल्यों का एकीकरण है जोलोकसेवकों को नैतिक रूप से सही कार्यों को करने में सहायता प्रदान करती है| केंद्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली, 1964के द्वारालोकसेवकों से यह अपेक्षा की जाती है कि विधिक प्रावधानों के साथ-साथ आचार संहिता(कोड ऑफ़ कंडक्ट) का अनुपालन भी किया जाये|सत्यनिष्ठा के माध्यम से ही लोकसेवकों के द्वारालोकनिधि या लोक संसाधनों का अनुकूलतम प्रयोग, कार्यकुशलता एवं मितव्ययिता के आधार परकिया जाता है | यह लोकसेवकों को उनके द्वाराअपनेकर्तव्यों के निर्वहन मेंसंवेदनशीलता एवं उत्तरदायित्वको जन्मदेती है एवं यह सुनिश्चित करती है कि लोकसेवकों का कर्तव्य पूर्णतः जनहित की भावना से प्रेरित हो| सत्यनिष्ठा यह सुनिश्चित करती है कि लोकसेवक के द्वारासरकारी पद का दुरूपयोग निजी हितों के लिए नहींकिया जाना चाहिए| वह किसी ऐसे उपहार या फायदों को प्राप्त ना करे जो उसके व्यक्तिगत निर्णय या सत्यनिष्ठा के साथ कोई समझौता के रूप में प्रतीत हो| सत्यनिष्ठा के द्वारा यह भी सुनिश्चित किया जाता है किलोकसेवक के द्वारा बिना प्राधिकार के किसी भी सरकारी सूचनाओं को उजागर नहीं करनाचाहिए| यह प्रतिबंध लोकसेवकों के सेवानिवृति के उपरांत भी लागू होता है| लोकसेवक कोईमानदार होने हेतु उनमें सत्यनिष्ठा का होना बेहद जरुरीहै| एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक के द्वारा मंत्रियों या किसी अन्य को जानबूझकर गुमराह नहीं करना चाहिए| एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक अपने निजी हितों के लिए किसी भी अन्य से प्रभावित नहीं होता है| एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक मेंपेशेवर मूल्यों के साथ-साथ दक्षता भी विद्यमानहोती है| सत्यनिष्ठामूल्यों का मूल्य(Values)हैअतः लोकसेवकों के आधारभूत निर्णयों में निम्न बुनियादी मूल्यों को शामिलकरने हेतु सत्यनिष्ठा का अहम् योगदान है| जैसे- भेदभावरहित तथा निष्पक्षता, गैर-तरफदारी, समर्पण, सहिष्णुता, सहानुभूति एवं संवेदना आदि| भारत सरकार के द्वारा सत्यनिष्ठा को प्रोत्साहित करने हेतु1962 में संथानम समितिका गठन किया गया परंतु इसके औपचारिक उद्देश्य कोभ्रष्टाचार निवारक समितिके रूप में परिभाषित किया गया| इस समिति की अनुशंसा के आधार पर1964 में कार्यकारी निर्णय के द्वाराकेन्द्रीय सतर्कता आयोगका गठनकिया गया जिसे2003 के विधि के द्वारा वैधानिक दर्जादिया गया|
##Question:सत्यनिष्ठा से आप क्या समझते हैं? सत्यनिष्ठा तथा लोकसेवकों के मध्य संबंधों के विभिन्न आयामों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए| (150-200 शब्द;10 अंक) What do you understand by Integrity? Briefly Describe the various dimensions of the relationship between Integrity and Public Servants. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- पहले भाग में, सत्यनिष्ठा को परिभाषित करते हुए उसका संक्षिप्त वर्णन कीजिये| अगले भाग में, सत्यनिष्ठा तथा लोकसेवकों के मध्य संबंधों के विभिन्न आयामों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए| उत्तर- सत्यनिष्ठा या इंटेग्रिटी लैटिन शब्दइन्टिजर(Integer)से बना है जिसका अर्थ संपूर्ण या पूर्ण होता है| नीतिशास्त्र में सत्यनिष्ठ होने का अर्थईमानदारी तथा अपरिवर्तनशील दृढ नैतिक सिद्धांतोंका गुण रखने वाला व्यक्तिहोता है| सत्यनिष्ठा कोकार्यों, मूल्यों, पद्धतियों, उपायों, सिद्धांतों, अपेक्षाओं और परिणामों के साथ सामंजस्य या संगतताकी अवधारणाके रूप में परिभाषित किया जाता है| यह एकगुणात्मक अवधारणाहै अतःमात्रात्मक तरीके से सत्यनिष्ठा को परिभाषित किया जाना संभव नहींहै| सत्यनिष्ठा व्यक्तव्य, विचार एवं क्रियाशीलता पर केंद्रित होता है | भ्रष्टाचार सत्यनिष्ठा का एक आयाम है या अधिक से अधिक एक महत्वपूर्ण आयाम है परंतु एकमात्र आयाम नहीं है| सत्यनिष्ठा एकपरिपूर्ण अवधारणाहै जिससे इसका आंशिक/सापेक्षिक मापन/विश्लेषण किया जाना संभव नहीं है| अतः सत्यनिष्ठा को लेकर दो ही प्रकार की स्थिति हो सकती है यानिव्यक्ति या तो सत्यनिष्ठ होगा या नहीं होगा | सत्यनिष्ठागैर-समझौता एवं गैर-चयनितहोता है| बिना ज्ञान के सत्यनिष्ठा कमजोर एवं निरर्थक है परंतु बिना सत्यनिष्ठा के ज्ञान खतरनाक है | सत्यनिष्ठा यह अपेक्षा करता है व्यक्ति निजी एवं सार्वजनिक जीवन में एकरूप हो | पूर्ण सत्यनिष्ठ व्यक्ति कभी भी प्रलोभन या बाहरी दबाव से प्रभावित नहीं होता है क्योंकि वह अपनी अंतरात्मा के अनुरूप ही अनुक्रिया करता है| सत्यनिष्ठा तथा लोकसेवकों के मध्य संबंधों के विभिन्न आयाम सत्यनिष्ठा का लोकसेवकों को उनके कर्तव्यों के निर्वहन में महत्वपूर्ण योगदान होता है|नोलन समितिद्वारा सिविल सेवकों के लिए सत्यनिष्ठा को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया गया है - " सार्वजनिक पदधारकों को स्वंय को बाहरी व्यक्तियों या संगठनों के प्रति किसी भी वितीय या अन्य दायित्व के अधीन नहीं रखना चाहिए जो उन्हें उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निष्पादन को प्रभावित करे|" एक लोकसेवक का व्यवहार लोकसेवक की तरह होना चाहिए एवं इसमे किसी प्रकार की कमी सत्यनिष्ठा की कमी को दर्शाती है| अतः लोकसेवकों को उनके कार्यों के उचित निष्पादन हेतु उनमें सत्यनिष्ठा का होना बेहद जरुरी है| लोकसेवकों में विभिन्न मानवीय तथा पेशेवर मूल्यों का होना बेहद जरुरी है|सत्यनिष्ठा लोकसेवकों केमूल्यों का मूल्य(Values)हैअतः यह मूल्यों का एकीकरण है जोलोकसेवकों को नैतिक रूप से सही कार्यों को करने में सहायता प्रदान करती है| केंद्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली, 1964के द्वारालोकसेवकों से यह अपेक्षा की जाती है कि विधिक प्रावधानों के साथ-साथ आचार संहिता(कोड ऑफ़ कंडक्ट) का अनुपालन भी किया जाये|सत्यनिष्ठा के माध्यम से ही लोकसेवकों के द्वारालोकनिधि या लोक संसाधनों का अनुकूलतम प्रयोग, कार्यकुशलता एवं मितव्ययिता के आधार परकिया जाता है | यह लोकसेवकों को उनके द्वाराअपनेकर्तव्यों के निर्वहन मेंसंवेदनशीलता एवं उत्तरदायित्वको जन्मदेती है एवं यह सुनिश्चित करती है कि लोकसेवकों का कर्तव्य पूर्णतः जनहित की भावना से प्रेरित हो| सत्यनिष्ठा यह सुनिश्चित करती है कि लोकसेवक के द्वारासरकारी पद का दुरूपयोग निजी हितों के लिए नहींकिया जाना चाहिए| वह किसी ऐसे उपहार या फायदों को प्राप्त ना करे जो उसके व्यक्तिगत निर्णय या सत्यनिष्ठा के साथ कोई समझौता के रूप में प्रतीत हो| सत्यनिष्ठा के द्वारा यह भी सुनिश्चित किया जाता है किलोकसेवक के द्वारा बिना प्राधिकार के किसी भी सरकारी सूचनाओं को उजागर नहीं करनाचाहिए| यह प्रतिबंध लोकसेवकों के सेवानिवृति के उपरांत भी लागू होता है| लोकसेवक कोईमानदार होने हेतु उनमें सत्यनिष्ठा का होना बेहद जरुरीहै| एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक के द्वारा मंत्रियों या किसी अन्य को जानबूझकर गुमराह नहीं करना चाहिए| एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक अपने निजी हितों के लिए किसी भी अन्य से प्रभावित नहीं होता है| एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक मेंपेशेवर मूल्यों के साथ-साथ दक्षता भी विद्यमानहोती है| सत्यनिष्ठामूल्यों का मूल्य(Values)हैअतः लोकसेवकों के आधारभूत निर्णयों में निम्न बुनियादी मूल्यों को शामिलकरने हेतु सत्यनिष्ठा का अहम् योगदान है| जैसे- भेदभावरहित तथा निष्पक्षता, गैर-तरफदारी, समर्पण, सहिष्णुता, सहानुभूति एवं संवेदना आदि| भारत सरकार के द्वारा सत्यनिष्ठा को प्रोत्साहित करने हेतु1962 में संथानम समितिका गठन किया गया परंतु इसके औपचारिक उद्देश्य कोभ्रष्टाचार निवारक समितिके रूप में परिभाषित किया गया| इस समिति की अनुशंसा के आधार पर1964 में कार्यकारी निर्णय के द्वाराकेन्द्रीय सतर्कता आयोगका गठनकिया गया जिसे2003 के विधि के द्वारा वैधानिक दर्जादिया गया|
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भारत में अपेक्षित चुनाव सुधारों का वर्णन कीजिये । ( 150-200 शब्द ) Describe the expected electoral reforms in India. (150-200 words)
दृष्टिकोण: 1. भूमिका में चुनाव सम्बन्धी प्रावधानों को स्पष्ट कीजिये| 2. भारत में अपेक्षित चुनाव सुधारों की चर्चा कीजिए| 3. संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: भारत निर्वाचन आयोग, जिसे चुनाव आयोग के नाम से भी जाना जाता है, एक स्वायत्त संवैधानिक निकाय है जो भारत में संघ और राज्य चुनाव प्रक्रियाओं का संचालन करता है। यह देश में लोकसभा, राज्यसभा, राज्य विधानसभाओं, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव का संचालन करता है। भारतीय संविधान का भाग 15 चुनावों से संबंधित है जिसमें चुनावों के संचालन के लिये एक आयोग की स्थापना करने की बात कही गई है। संविधान के अनुच्छेद 324 से 329 तक चुनाव आयोग और सदस्यों की शक्तियों, कार्य, कार्यकाल, पात्रता आदि से संबंधित हैं। एक जीवंत लोकतंत्र के लिये आवश्यक है कि देश में सुशासन के लिये सबसे अच्छे नागरिकों को जनप्रतिनिधियों के रूप में चुना जाए। एक जीवंत लोकतंत्र में मतदाता को उम्मीदवारों को चुनने का या अस्वीकार करने का अवसर दिया जाना चाहिये जो राजनीतिक दलों को चुनाव में अच्छे उम्मीदवार उतारने पर मजबूर करे। भारत विश्व का सातवाँ सबसे बड़ा देश और सबसे बड़ा लोकतंत्र है। हमारा चुनाव लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था से नियंत्रित राजनीति का सबसे खास हिस्सा है। कोई भी लोकतंत्र इस आस्था पर काम करता है कि चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होंगे। इनमें हेरफेर और धाँधली नहीं होगी। हमारे देश में चुनाव कराना असंभव न सही लेकिन कठिन ज़रूर है। अपेक्षित चुनाव सुधार: राजनीति के जटिल आंतरिक चरित्र और गठबंधन की अंतहीन संभावनाओं के चलते भारत के चुनाव का अनुमान लगाना बेहद कठिन है। चुनाव की प्रक्रिया में लाखों मतदान कार्यकर्त्ता, पुलिस और सुरक्षा कर्मी शहरों, कस्बों, गाँवों और बस्तियों में तैनात होते हैं। महिलाओं ने 2014 के चुनाव में आधे राज्यों में मतदान केंद्रों पर पुरुषों को पछाड़ दिया था। इस चुनाव में लगभग 65% महिला मतदाताओं ने अपने मत का इस्तेमाल कर इतिहास बनाया था। हालाँकि अभी भी महिलाओं का संसद में समान प्रतिनिधित्व नहीं है। आधी आबादी होने के बावजूद लोकसभा में इनकी उपस्थिति लगभग 12 प्रतिशत है। इस बार लोकसभा के चुनाव में 18 से 19 वर्ष के बीच की आयु वाले लगभग डेढ़ करोड़ युवा मतदाता होंगे जो पहली बार मतदान करेंगे। यह चुनाव आयोग के सामने बिल्कुल नई चुनौती होगी क्योंकि पुराने मतदाताओं की तुलना में यह वर्ग अधिक शिक्षित और तकनीक से लैस है। अब आयोग को चुनाव प्रचार की तेज़ी से बदलती शैली से भी जूझना होगा। राजनीतिक दल और उम्मीदवार युवा मतदाताओं का दिल और दिमाग जीतने के लिये नई तकनीक और सोशल मीडिया का इस्तेमाल करेंगे। इन प्लेटफॉर्म का संभावित दुरुपयोग रोकना चुनाव आयोग के लिये एक महत्त्वपूर्ण चिंता का विषय है। सन् 2000 के बाद का चुनाव सुधार: एक्ज़िट पोल पर प्रतिबंध । चुनावी खर्च पर सीलिंग । सरकारी कर्मचारियों और समस्त बलों को पोस्टल बैलेट के माध्यम से मतदान जागरूकता और प्रसार: हर वर्ष 25 जनवरी को राष्ट्रीय मतदाता दिवस नोटा: 2013 से नोटा व्यवस्था लागू करना। नोटा को एक अहम चुनाव सुधार माना जाता है। नोटा का मतलब है उपरोक्त में से कोई नहीं। यानी नन ऑफ द एबव (None of the above)। डुप्लीकेट इंट्री को खत्म करना : डी-डुप्लीकेशन तकनीक, ऑनलाइन संचार यानी कोमेट प्रणाली साफ-सुथरे चुनावों और राजनीतिक पारदर्शिता से ही लोकतंत्र को वैधता मिलती है। ऐसे में महत्त्वपूर्ण चुनावी सुधारों को लागू कराना बहुत ज़रूरी है ताकि लोकतांत्रिक भारत भ्रष्टाचार और आपराधिक माहौल से मुक्त होकर विकास और समृद्धि की ओर अग्रसर हो सके।
##Question:भारत में अपेक्षित चुनाव सुधारों का वर्णन कीजिये । ( 150-200 शब्द ) Describe the expected electoral reforms in India. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण: 1. भूमिका में चुनाव सम्बन्धी प्रावधानों को स्पष्ट कीजिये| 2. भारत में अपेक्षित चुनाव सुधारों की चर्चा कीजिए| 3. संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: भारत निर्वाचन आयोग, जिसे चुनाव आयोग के नाम से भी जाना जाता है, एक स्वायत्त संवैधानिक निकाय है जो भारत में संघ और राज्य चुनाव प्रक्रियाओं का संचालन करता है। यह देश में लोकसभा, राज्यसभा, राज्य विधानसभाओं, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव का संचालन करता है। भारतीय संविधान का भाग 15 चुनावों से संबंधित है जिसमें चुनावों के संचालन के लिये एक आयोग की स्थापना करने की बात कही गई है। संविधान के अनुच्छेद 324 से 329 तक चुनाव आयोग और सदस्यों की शक्तियों, कार्य, कार्यकाल, पात्रता आदि से संबंधित हैं। एक जीवंत लोकतंत्र के लिये आवश्यक है कि देश में सुशासन के लिये सबसे अच्छे नागरिकों को जनप्रतिनिधियों के रूप में चुना जाए। एक जीवंत लोकतंत्र में मतदाता को उम्मीदवारों को चुनने का या अस्वीकार करने का अवसर दिया जाना चाहिये जो राजनीतिक दलों को चुनाव में अच्छे उम्मीदवार उतारने पर मजबूर करे। भारत विश्व का सातवाँ सबसे बड़ा देश और सबसे बड़ा लोकतंत्र है। हमारा चुनाव लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था से नियंत्रित राजनीति का सबसे खास हिस्सा है। कोई भी लोकतंत्र इस आस्था पर काम करता है कि चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होंगे। इनमें हेरफेर और धाँधली नहीं होगी। हमारे देश में चुनाव कराना असंभव न सही लेकिन कठिन ज़रूर है। अपेक्षित चुनाव सुधार: राजनीति के जटिल आंतरिक चरित्र और गठबंधन की अंतहीन संभावनाओं के चलते भारत के चुनाव का अनुमान लगाना बेहद कठिन है। चुनाव की प्रक्रिया में लाखों मतदान कार्यकर्त्ता, पुलिस और सुरक्षा कर्मी शहरों, कस्बों, गाँवों और बस्तियों में तैनात होते हैं। महिलाओं ने 2014 के चुनाव में आधे राज्यों में मतदान केंद्रों पर पुरुषों को पछाड़ दिया था। इस चुनाव में लगभग 65% महिला मतदाताओं ने अपने मत का इस्तेमाल कर इतिहास बनाया था। हालाँकि अभी भी महिलाओं का संसद में समान प्रतिनिधित्व नहीं है। आधी आबादी होने के बावजूद लोकसभा में इनकी उपस्थिति लगभग 12 प्रतिशत है। इस बार लोकसभा के चुनाव में 18 से 19 वर्ष के बीच की आयु वाले लगभग डेढ़ करोड़ युवा मतदाता होंगे जो पहली बार मतदान करेंगे। यह चुनाव आयोग के सामने बिल्कुल नई चुनौती होगी क्योंकि पुराने मतदाताओं की तुलना में यह वर्ग अधिक शिक्षित और तकनीक से लैस है। अब आयोग को चुनाव प्रचार की तेज़ी से बदलती शैली से भी जूझना होगा। राजनीतिक दल और उम्मीदवार युवा मतदाताओं का दिल और दिमाग जीतने के लिये नई तकनीक और सोशल मीडिया का इस्तेमाल करेंगे। इन प्लेटफॉर्म का संभावित दुरुपयोग रोकना चुनाव आयोग के लिये एक महत्त्वपूर्ण चिंता का विषय है। सन् 2000 के बाद का चुनाव सुधार: एक्ज़िट पोल पर प्रतिबंध । चुनावी खर्च पर सीलिंग । सरकारी कर्मचारियों और समस्त बलों को पोस्टल बैलेट के माध्यम से मतदान जागरूकता और प्रसार: हर वर्ष 25 जनवरी को राष्ट्रीय मतदाता दिवस नोटा: 2013 से नोटा व्यवस्था लागू करना। नोटा को एक अहम चुनाव सुधार माना जाता है। नोटा का मतलब है उपरोक्त में से कोई नहीं। यानी नन ऑफ द एबव (None of the above)। डुप्लीकेट इंट्री को खत्म करना : डी-डुप्लीकेशन तकनीक, ऑनलाइन संचार यानी कोमेट प्रणाली साफ-सुथरे चुनावों और राजनीतिक पारदर्शिता से ही लोकतंत्र को वैधता मिलती है। ऐसे में महत्त्वपूर्ण चुनावी सुधारों को लागू कराना बहुत ज़रूरी है ताकि लोकतांत्रिक भारत भ्रष्टाचार और आपराधिक माहौल से मुक्त होकर विकास और समृद्धि की ओर अग्रसर हो सके।
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प्रधानमन्त्री कार्यालय (PMO) की भूमिका स्पष्ट करते हुए हाल ही में PMO की भूमिका में आये परिवर्तनों की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द; 10 अंक) While clarifying the role of Prime Minister"s Office (PMO), discuss the recent changes in the role of PMO. (150 to 200 words; 10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में प्रधानमन्त्री कार्यालय के बारे में बताएं 2- प्रथम भाग में PMO की भूमिका को स्पष्ट कीजिये 3- द्वितीय भाग में हाल ही में PMO में आये परिवर्तनों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) का जन्म लार्ड वेवेल के समय में हुआ था जब गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद की बैठकों और मुद्दों के रिकॉर्डिंग के लिए वायसराय का एक निजी सचिवालय बनाया गया था| पंडित नेहरु ने 1950 में इसका नाम बदल कर प्रधानमंत्री कार्यालय कर दिया| PMO का प्रधान अधिकारी, प्रधान सचिव(प्रिंसिपल सेक्रेटरी) होता है जिसकी रैंक कैबिनेट सेक्रेटरी की भांति निर्धारित की जाती है| अतः उसे कैबिनेट सचिव की तरह ही सभी सुविधाएं प्राप्त होती हैं| PMO की भूमिका एवं कार्य · देश का मुख्य कार्यपालक अधिकारी होने के कारण प्रधानमंत्री के ऊपर काम का बोझ सर्वाधिक होता है| अतः प्रधानमंत्री दैनिक आधार पर निपटाने के लिए उसे एक निजी सचिवालय की आवश्यकता होती है| इसी निजी सचिवालय को PMO कहते हैं| यह कैबिनेट सचिवालय से भिन्न होता है| · कैबिनेट सचिवालय एक संवैधानिक संस्था की तरह होता है जिसका गठन अनुच्छेद 77(3) के अंतर्गत किया गया है यह समूची कैबिनेट, राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री तीनों का कार्य करता है जबकि PMO केवल उन्ही विषयों पर विमर्श करता है जिन्हें प्रधानमंत्री द्वारा उसे संदर्भित किया जाता है · PM द्वारा जिस विषय को PMO को प्रेषित किया जाता है, उस विषय पर PMO द्वारा विचार करना और प्रधानमंत्री को उस पर उचित राय देना · मुख्य कार्यपालक के रूप में PM द्वारा निष्पादित किये जाने वाले दायित्व में उसकी सहायता करना · नीति आयोग के अध्यक्ष के रूप में PM को आवश्यक सहायता देना · प्रधानमंत्री के जन सम्पर्क पक्ष का ध्यान रखना · न्यायालयों के निर्णयों के परिप्रेक्ष्य में सरकार के काम काज या नीतियों में अपेक्षित बदलाव करना और साथ ही निर्धारित नियम के अनुसार शासन व प्रशासन संचालन में PM का सहयोग करना · प्रधानमन्त्री द्वारा दिए गए दिशा निर्देशों के अनुपालन पर निगरानी रखना साथ ही उनके कार्यान्वयन पर निगरानी रखना, प्रधानमन्त्री को इनकी प्रगति की जानकारी देते रहना| · प्रधानमन्त्री के कार्यों में जटिलता को देखते हुए हाल ही में PMO में कुछ समर्पित परिषदों का गठन किया गया है ताकि कार्य निष्पादन में तत्परता लायी जा सके| निकट वर्षों में PMO में किये गए बदलाव जलवायु परिवर्तन पर प्रधानमन्त्री की परिषद् · जलवायु परिवर्तन पर प्रधानमन्त्री की परिषद् का गठन में जून 2008 में किया गया, इसकी अध्यक्षता PM करते हैं जबकि संचालन प्रधान सचित द्वारा किया जाता है · इस परिषद का कार्य जलवायु परिवर्तन के सन्दर्भ में एक ऐसी नीति तैयार करना है जो पूरे देश में जलवायु परिवर्तन को कम करने के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय संधियों व समझौतों के अनुरूप हो · इससे सम्बन्धित नीतियों के कार्यान्वयन पर निगरानी रखने, प्रगति की समीक्षा करने और इसे समयानुसार परिवर्तित करने का कार्य किया जाता है कौशल विकास पर PM की परिषद् · इसका गठन जुलाई 2008 में किया गया, इसके अध्यक्षी PM होते हैं, PMO के प्रधान सचिव इसके सदस्य सचिव होते हैं| इसमें प्रधानमन्त्री द्वारा चुने गए 6 कैबिनेट मंत्री भी शामिल होते हैं · इसका मुख्य उद्देश्य युवाओं को कौशल प्रशिक्षण देकर उन्हें स्वरोजगार के लिए तैयार करना है| इसके साथ हीनिजी क्षेत्रों को प्रोत्साहन देकर उन्हें कौशल विकास के लिए प्रेरित करना और रोजगार के अवसरों के सृजन के लिए प्रेरित करना है| व्यापार एवं आर्थिक सम्बन्धों पर PM की समिति · इसका गठन मई 2005 में किया गया थाइसके अध्यक्ष PM होते हैं जबकि संचालक प्रधान सचिव होता है · इसका प्रमुख कार्य दुसरे देशों के साथ भारत के व्यापार एवं आर्थिक सम्बन्धों को मजबूत बनाना है MSME पर PM की परिषद · इसका गठन अप्रैल 2010 में किया गया,इसके सदस्य संचालक प्रधान सचिव एवं अध्यक्ष PM होते हैं · ऐसे निर्देश तैयार करना जिससे MSME उद्योगों का विकास किया जा सके व्यापार एवं उद्योग पर प्रधानमंत्री की परिषद् · इसके अध्यक्ष PM होते हैं जबकि सदस्य सचित प्रधान सचिव होते हैं| इसमें उद्योगपति एवं अर्थशास्त्री भी शामिल होते हैं · यह एक ऐसा मंच है जो उद्योगों को बढाने के लिए और इससे सम्बन्धित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करने के लिए एक साझा मंच प्रदान करता है| भारत में अनेक प्रधानमंत्रियों ने विषयों के राष्ट्रीय महत्त्व को देखते हुए अनेक विभागों को अपने प्राधिकार के अंतर्गत रखा है जिससे प्रधानमन्त्री के कार्य निरंतर जटिल होते गए हैं| इस जटिलता को देखते हुए प्रधानमंत्री के निजी कार्यालय के रूप में प्रधानमन्त्री कार्यालय महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है|
##Question:प्रधानमन्त्री कार्यालय (PMO) की भूमिका स्पष्ट करते हुए हाल ही में PMO की भूमिका में आये परिवर्तनों की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द; 10 अंक) While clarifying the role of Prime Minister"s Office (PMO), discuss the recent changes in the role of PMO. (150 to 200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में प्रधानमन्त्री कार्यालय के बारे में बताएं 2- प्रथम भाग में PMO की भूमिका को स्पष्ट कीजिये 3- द्वितीय भाग में हाल ही में PMO में आये परिवर्तनों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) का जन्म लार्ड वेवेल के समय में हुआ था जब गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद की बैठकों और मुद्दों के रिकॉर्डिंग के लिए वायसराय का एक निजी सचिवालय बनाया गया था| पंडित नेहरु ने 1950 में इसका नाम बदल कर प्रधानमंत्री कार्यालय कर दिया| PMO का प्रधान अधिकारी, प्रधान सचिव(प्रिंसिपल सेक्रेटरी) होता है जिसकी रैंक कैबिनेट सेक्रेटरी की भांति निर्धारित की जाती है| अतः उसे कैबिनेट सचिव की तरह ही सभी सुविधाएं प्राप्त होती हैं| PMO की भूमिका एवं कार्य · देश का मुख्य कार्यपालक अधिकारी होने के कारण प्रधानमंत्री के ऊपर काम का बोझ सर्वाधिक होता है| अतः प्रधानमंत्री दैनिक आधार पर निपटाने के लिए उसे एक निजी सचिवालय की आवश्यकता होती है| इसी निजी सचिवालय को PMO कहते हैं| यह कैबिनेट सचिवालय से भिन्न होता है| · कैबिनेट सचिवालय एक संवैधानिक संस्था की तरह होता है जिसका गठन अनुच्छेद 77(3) के अंतर्गत किया गया है यह समूची कैबिनेट, राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री तीनों का कार्य करता है जबकि PMO केवल उन्ही विषयों पर विमर्श करता है जिन्हें प्रधानमंत्री द्वारा उसे संदर्भित किया जाता है · PM द्वारा जिस विषय को PMO को प्रेषित किया जाता है, उस विषय पर PMO द्वारा विचार करना और प्रधानमंत्री को उस पर उचित राय देना · मुख्य कार्यपालक के रूप में PM द्वारा निष्पादित किये जाने वाले दायित्व में उसकी सहायता करना · नीति आयोग के अध्यक्ष के रूप में PM को आवश्यक सहायता देना · प्रधानमंत्री के जन सम्पर्क पक्ष का ध्यान रखना · न्यायालयों के निर्णयों के परिप्रेक्ष्य में सरकार के काम काज या नीतियों में अपेक्षित बदलाव करना और साथ ही निर्धारित नियम के अनुसार शासन व प्रशासन संचालन में PM का सहयोग करना · प्रधानमन्त्री द्वारा दिए गए दिशा निर्देशों के अनुपालन पर निगरानी रखना साथ ही उनके कार्यान्वयन पर निगरानी रखना, प्रधानमन्त्री को इनकी प्रगति की जानकारी देते रहना| · प्रधानमन्त्री के कार्यों में जटिलता को देखते हुए हाल ही में PMO में कुछ समर्पित परिषदों का गठन किया गया है ताकि कार्य निष्पादन में तत्परता लायी जा सके| निकट वर्षों में PMO में किये गए बदलाव जलवायु परिवर्तन पर प्रधानमन्त्री की परिषद् · जलवायु परिवर्तन पर प्रधानमन्त्री की परिषद् का गठन में जून 2008 में किया गया, इसकी अध्यक्षता PM करते हैं जबकि संचालन प्रधान सचित द्वारा किया जाता है · इस परिषद का कार्य जलवायु परिवर्तन के सन्दर्भ में एक ऐसी नीति तैयार करना है जो पूरे देश में जलवायु परिवर्तन को कम करने के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय संधियों व समझौतों के अनुरूप हो · इससे सम्बन्धित नीतियों के कार्यान्वयन पर निगरानी रखने, प्रगति की समीक्षा करने और इसे समयानुसार परिवर्तित करने का कार्य किया जाता है कौशल विकास पर PM की परिषद् · इसका गठन जुलाई 2008 में किया गया, इसके अध्यक्षी PM होते हैं, PMO के प्रधान सचिव इसके सदस्य सचिव होते हैं| इसमें प्रधानमन्त्री द्वारा चुने गए 6 कैबिनेट मंत्री भी शामिल होते हैं · इसका मुख्य उद्देश्य युवाओं को कौशल प्रशिक्षण देकर उन्हें स्वरोजगार के लिए तैयार करना है| इसके साथ हीनिजी क्षेत्रों को प्रोत्साहन देकर उन्हें कौशल विकास के लिए प्रेरित करना और रोजगार के अवसरों के सृजन के लिए प्रेरित करना है| व्यापार एवं आर्थिक सम्बन्धों पर PM की समिति · इसका गठन मई 2005 में किया गया थाइसके अध्यक्ष PM होते हैं जबकि संचालक प्रधान सचिव होता है · इसका प्रमुख कार्य दुसरे देशों के साथ भारत के व्यापार एवं आर्थिक सम्बन्धों को मजबूत बनाना है MSME पर PM की परिषद · इसका गठन अप्रैल 2010 में किया गया,इसके सदस्य संचालक प्रधान सचिव एवं अध्यक्ष PM होते हैं · ऐसे निर्देश तैयार करना जिससे MSME उद्योगों का विकास किया जा सके व्यापार एवं उद्योग पर प्रधानमंत्री की परिषद् · इसके अध्यक्ष PM होते हैं जबकि सदस्य सचित प्रधान सचिव होते हैं| इसमें उद्योगपति एवं अर्थशास्त्री भी शामिल होते हैं · यह एक ऐसा मंच है जो उद्योगों को बढाने के लिए और इससे सम्बन्धित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करने के लिए एक साझा मंच प्रदान करता है| भारत में अनेक प्रधानमंत्रियों ने विषयों के राष्ट्रीय महत्त्व को देखते हुए अनेक विभागों को अपने प्राधिकार के अंतर्गत रखा है जिससे प्रधानमन्त्री के कार्य निरंतर जटिल होते गए हैं| इस जटिलता को देखते हुए प्रधानमंत्री के निजी कार्यालय के रूप में प्रधानमन्त्री कार्यालय महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है|
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कला एवं साहित्य के महत्वपूर्ण विकास के कारण गुप्तकाल को स्वर्ण युग का दर्जा दिया जाता है| ऐसी मान्यता के पक्ष में तर्क एवं उदाहरणों को प्रस्तुत करते हुए कथन की पुष्टि कीजिए। (10 अंक/150-200 शब्द) The gupta period is given the status of the golden age due to the significant development of art and literature. Give arguments and examples in favor of this and confirm this statement. (150-200 Words; 10 Marks)
एप्रोच- गुप्तकाल तथा उस काल के जीवन के बारे में संक्षिप्तता से उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, गुप्तकाल में कला के विभिन्न आयामों को बिंदुबार बताईये| अगले हिस्से में, गुप्तकाल में साहित्य के विकास को बिंदुबार लिखिए| निष्कर्षतः, उपरोक्त तथ्यों के माध्यम से समझाईये कि क्यों गुप्तकाल को कला एवं साहित्य के विकास के क्षेत्र में स्वर्ण युग का दर्जा दिया जाता है| उत्तर- मौर्यों के 500 वर्ष के बाद उत्तर भारत मेंप्रभावशाली गुप्त साम्राज्य का उदय हुआ जिसने सारे भारत को लगभग एक सदी तक राजनीतिक एकता के सूत्र में बांधे रखा| चंद्रगुप्त प्रथम, समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त द्वितीय जैसे प्रभावी राजाओं के कारण इस काल में कला एवं साहित्य के क्षेत्र में व्यापक विकास हुआ| गुप्तकालीन कला गुप्तकालीनस्थापत्य कला स्तूप - गुप्त शासकों के समय भी स्तूप निर्माण की परम्परा जारी रही; सारनाथ एवं राजगृह में गुप्तकालीन स्तूपों के साक्ष्य; हालाँकि तुलनात्मक रूप से संख्या कम तथा निर्माण शैली में भी गिरावट के संकेत; विहार - गुप्तकाल में गुफा विहार एवं संरचनात्मक विहार दोनों के साक्ष्य- अजन्ता की पहाड़ियों में बौद्ध विहारों का निर्माण, उदयगिरि में ब्राह्मण धर्म से संबंधित विहारों के साक्ष्य आदि; कुमारगुप्त के काल में नालंदा महाविहार का प्रमाण-यह शिक्षा का प्रमुख केंद्र (सरंचनात्मक विहार); मंदिर स्थापत्य गुप्तकाल में मंदिर स्थापत्य या शिखर शैली से संबंधित सभी महत्वपूर्ण विशेषताओं का विकास; गुप्तयुगीन मंदिर की संरचना - अधिष्ठान या जगती या चबूतरा, मंडप-अर्ध मंडप, प्रवेश द्वार पर अलंकरण, गर्भगृह(मुख्य देवता की मूर्ति), शिखर, आमलक, कलश, प्रदक्षिणापथ आदि का साक्ष्य; पंचायतन शैली के मंदिर - मुख्य मंदिर के साथ साथ चार सहयोगी देवताओ के लिए भी मंदिरों का निर्माण; गुप्तकाल में मंदिर स्थापत्य का क्रमशः विकास और झाँसी के देवगढ के मंदिर में गुप्तकालीन स्थापत्य से संबंधित सभी महत्वपूर्ण विशेषताएँ मिलना; गुप्तकालीनमूर्तिकला कुषाण शासको के पश्चात गुप्त शासकों ने भी मूर्तिकला को संरक्षण प्रदान किया- मथुरा, सारनाथ, कौशाम्बी आदि मूर्ति कला के प्रमुख केंद्र| लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग, मिट्टी की मूर्तियों के भी साक्ष्य; धातुओं की मूर्तियों के प्रमाण; मुख्यतः धार्मिक मूर्तियाँ ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन धर्म से संबंधित; ब्राह्मण धर्म से जुड़े विष्णु, विष्णु के विभिन्न अवतार ,शिव-पार्वती, अर्धनारीश्वर, शिवलिंग आदि मूर्तियों के साक्ष्य; कुषाण काल की तरह बड़े पैमाने पर बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण; बिहार के भागलपुर से तांबे या कांसे से निर्मित बुद्ध की मूर्ति प्राप्त; सारनाथ तथा मथुरा में बुद्ध की सुन्दर प्रतिमाओं का निर्माण; कुषाण काल की तुलना में मूर्तियों में आभामंडल एवं सादगी को अधिक महत्व; गुप्तकालीनचित्रकला अजन्ता चित्रकला - यहाँ बड़ी संख्या में कलात्मक विरासत को संजोए हुए चित्रकला का नमूना देखा जा सकता है| कलात्मक महत्व के कारण ही यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर सूची में शामिल किया है| अजन्ता में कला के विभिन्न क्षेत्रों जैसे- चैत्य, विहार आदि की जानकारी मिलती है| अजन्ता चित्रकला के प्रारंभिक चित्रों में आम जनजीवन, राज परिवार तथा प्रकृति के विभिन्न पक्षों का चित्रण; गुप्तकालीन चित्रों में बुद्ध एवं बोधिसत्व से संबंधित विषयों को महत्व; बुद्ध के जीवन की विभिन्न घटनाओं तथा जातक कथाओं को क्रमबद्ध तरीके से चित्रों के रूप में प्रस्तुत करना; कुछ महत्वपूर्ण गुप्तकालीन चित्र - महाभिनिष्क्रमण, गृह त्याग, मार विजय का चित्र आदि;पदम्पाणी एवं अवलोकितेश्वर नामक बोधिसत्व का चित्र; मानवीय भावों को चित्रों में उतारने में काफी सफलता; चित्र बनाने से पूर्व फ्रेस्को एवं टेम्पेरा दोनों विधियों से दीवारों को चित्रण के लिए तैयार किया जाना; चित्रों में प्राकृतिक रंगों जैसे लाल,हरा आदि विभिन्न रंगों का प्रयोग किया जाना; गुप्तकालीनसाहित्य धार्मिक साहित्य की रचना में भारी प्रगति जैसे- रामायण; महाभारत आदि धर्मग्रंथों का अंतिम तौर पर संकलन; परिवार रूपी संस्था का आदर्श दिखाया जाना; बुराई पर अच्छाई की जीत; व्यापक सामाजिक तथा धार्मिक प्रभाव; अधिकतर पुराणों का अंतिम तौर पर संकलन/संपादन; बड़ी मात्रा में स्मृतियाँ तथा उनपर टीकाएँ लिखा जाना; लौकिक साहित्य के सृजन के लिए स्मरणीय; धर्मेत्तर साहित्य का विकास- कालिदास, विशाखदत्त आदि; कालिदास की कृतियों को लेकर प्रसिद्ध जैसे- अभिज्ञानशाकुन्तलम जो विश्व की प्रमुख उत्कृष्टतम साहित्यिक कृतियों में शामिल तथा पहली भारतीय रचना जिसका अनुवाद यूरोपीय भाषाओँ में भी; बड़ी संख्या में नाटकों का संकलन; जैसे- भास के तेरह नाटक; शूद्रक का लिखा मृच्छकटिक/माटी; सुखांत नाटक; उच्च वर्ण के पात्र संस्कृत बोलते हैं जबकि निम्न वर्णों द्वारा प्राकृत बोला जाना; विज्ञान की अलग अलग विधाओं का विकास; आर्यभट्ट(गणित एवं खगोल विज्ञान); बाग्गभट्ट(अष्टांग ह्रदय) ; पाणिनि और पतंजलि के ग्रंथों के आधार पर संस्कृत व्याकरण का भी विकास ; जैसे- अमरकोश जैसे शब्दकोष का संकलन; शास्त्रीय साहित्य के इतिहास में गुप्तकाल उज्जवल अध्याय की तरह है| बाघ की गुफाएं; आम जनजीवन से संबंधित विषयों को महत्व; इसके अतिरिक्त गुप्त शासकों द्वारा सबसे अधिक स्वर्ण मुद्राएँ भी जारी की गयी थीं| चंद्रगुप्त द्वितीय तथा समुद्रगुप्त कला एवं साहित्य के बड़े संपोषक थें| समुद्रगुप्त को खुद अपने सिक्के पर वीणा बजाते हुए दिखाया गया है| वहीँ, चंद्रगुप्त का दरबार नवरत्नों अर्थात 9 बड़े-बड़े विद्वानों से अलंकृत था| साथ ही, गुप्तकालीन शिल्पकारों ने अपना चमत्कार लौह तथा कांस्य कृतियों में दिखाया है| उपरोक्त आयामों को देखते हुए एवं सांस्कृतिक विकास की वजह सेही गुप्तकाल को कला एवं साहित्य के क्षेत्र में प्राचीन भारत का स्वर्ण युग का दर्जा दिया जाता है|
##Question:कला एवं साहित्य के महत्वपूर्ण विकास के कारण गुप्तकाल को स्वर्ण युग का दर्जा दिया जाता है| ऐसी मान्यता के पक्ष में तर्क एवं उदाहरणों को प्रस्तुत करते हुए कथन की पुष्टि कीजिए। (10 अंक/150-200 शब्द) The gupta period is given the status of the golden age due to the significant development of art and literature. Give arguments and examples in favor of this and confirm this statement. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- गुप्तकाल तथा उस काल के जीवन के बारे में संक्षिप्तता से उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, गुप्तकाल में कला के विभिन्न आयामों को बिंदुबार बताईये| अगले हिस्से में, गुप्तकाल में साहित्य के विकास को बिंदुबार लिखिए| निष्कर्षतः, उपरोक्त तथ्यों के माध्यम से समझाईये कि क्यों गुप्तकाल को कला एवं साहित्य के विकास के क्षेत्र में स्वर्ण युग का दर्जा दिया जाता है| उत्तर- मौर्यों के 500 वर्ष के बाद उत्तर भारत मेंप्रभावशाली गुप्त साम्राज्य का उदय हुआ जिसने सारे भारत को लगभग एक सदी तक राजनीतिक एकता के सूत्र में बांधे रखा| चंद्रगुप्त प्रथम, समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त द्वितीय जैसे प्रभावी राजाओं के कारण इस काल में कला एवं साहित्य के क्षेत्र में व्यापक विकास हुआ| गुप्तकालीन कला गुप्तकालीनस्थापत्य कला स्तूप - गुप्त शासकों के समय भी स्तूप निर्माण की परम्परा जारी रही; सारनाथ एवं राजगृह में गुप्तकालीन स्तूपों के साक्ष्य; हालाँकि तुलनात्मक रूप से संख्या कम तथा निर्माण शैली में भी गिरावट के संकेत; विहार - गुप्तकाल में गुफा विहार एवं संरचनात्मक विहार दोनों के साक्ष्य- अजन्ता की पहाड़ियों में बौद्ध विहारों का निर्माण, उदयगिरि में ब्राह्मण धर्म से संबंधित विहारों के साक्ष्य आदि; कुमारगुप्त के काल में नालंदा महाविहार का प्रमाण-यह शिक्षा का प्रमुख केंद्र (सरंचनात्मक विहार); मंदिर स्थापत्य गुप्तकाल में मंदिर स्थापत्य या शिखर शैली से संबंधित सभी महत्वपूर्ण विशेषताओं का विकास; गुप्तयुगीन मंदिर की संरचना - अधिष्ठान या जगती या चबूतरा, मंडप-अर्ध मंडप, प्रवेश द्वार पर अलंकरण, गर्भगृह(मुख्य देवता की मूर्ति), शिखर, आमलक, कलश, प्रदक्षिणापथ आदि का साक्ष्य; पंचायतन शैली के मंदिर - मुख्य मंदिर के साथ साथ चार सहयोगी देवताओ के लिए भी मंदिरों का निर्माण; गुप्तकाल में मंदिर स्थापत्य का क्रमशः विकास और झाँसी के देवगढ के मंदिर में गुप्तकालीन स्थापत्य से संबंधित सभी महत्वपूर्ण विशेषताएँ मिलना; गुप्तकालीनमूर्तिकला कुषाण शासको के पश्चात गुप्त शासकों ने भी मूर्तिकला को संरक्षण प्रदान किया- मथुरा, सारनाथ, कौशाम्बी आदि मूर्ति कला के प्रमुख केंद्र| लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग, मिट्टी की मूर्तियों के भी साक्ष्य; धातुओं की मूर्तियों के प्रमाण; मुख्यतः धार्मिक मूर्तियाँ ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन धर्म से संबंधित; ब्राह्मण धर्म से जुड़े विष्णु, विष्णु के विभिन्न अवतार ,शिव-पार्वती, अर्धनारीश्वर, शिवलिंग आदि मूर्तियों के साक्ष्य; कुषाण काल की तरह बड़े पैमाने पर बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण; बिहार के भागलपुर से तांबे या कांसे से निर्मित बुद्ध की मूर्ति प्राप्त; सारनाथ तथा मथुरा में बुद्ध की सुन्दर प्रतिमाओं का निर्माण; कुषाण काल की तुलना में मूर्तियों में आभामंडल एवं सादगी को अधिक महत्व; गुप्तकालीनचित्रकला अजन्ता चित्रकला - यहाँ बड़ी संख्या में कलात्मक विरासत को संजोए हुए चित्रकला का नमूना देखा जा सकता है| कलात्मक महत्व के कारण ही यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर सूची में शामिल किया है| अजन्ता में कला के विभिन्न क्षेत्रों जैसे- चैत्य, विहार आदि की जानकारी मिलती है| अजन्ता चित्रकला के प्रारंभिक चित्रों में आम जनजीवन, राज परिवार तथा प्रकृति के विभिन्न पक्षों का चित्रण; गुप्तकालीन चित्रों में बुद्ध एवं बोधिसत्व से संबंधित विषयों को महत्व; बुद्ध के जीवन की विभिन्न घटनाओं तथा जातक कथाओं को क्रमबद्ध तरीके से चित्रों के रूप में प्रस्तुत करना; कुछ महत्वपूर्ण गुप्तकालीन चित्र - महाभिनिष्क्रमण, गृह त्याग, मार विजय का चित्र आदि;पदम्पाणी एवं अवलोकितेश्वर नामक बोधिसत्व का चित्र; मानवीय भावों को चित्रों में उतारने में काफी सफलता; चित्र बनाने से पूर्व फ्रेस्को एवं टेम्पेरा दोनों विधियों से दीवारों को चित्रण के लिए तैयार किया जाना; चित्रों में प्राकृतिक रंगों जैसे लाल,हरा आदि विभिन्न रंगों का प्रयोग किया जाना; गुप्तकालीनसाहित्य धार्मिक साहित्य की रचना में भारी प्रगति जैसे- रामायण; महाभारत आदि धर्मग्रंथों का अंतिम तौर पर संकलन; परिवार रूपी संस्था का आदर्श दिखाया जाना; बुराई पर अच्छाई की जीत; व्यापक सामाजिक तथा धार्मिक प्रभाव; अधिकतर पुराणों का अंतिम तौर पर संकलन/संपादन; बड़ी मात्रा में स्मृतियाँ तथा उनपर टीकाएँ लिखा जाना; लौकिक साहित्य के सृजन के लिए स्मरणीय; धर्मेत्तर साहित्य का विकास- कालिदास, विशाखदत्त आदि; कालिदास की कृतियों को लेकर प्रसिद्ध जैसे- अभिज्ञानशाकुन्तलम जो विश्व की प्रमुख उत्कृष्टतम साहित्यिक कृतियों में शामिल तथा पहली भारतीय रचना जिसका अनुवाद यूरोपीय भाषाओँ में भी; बड़ी संख्या में नाटकों का संकलन; जैसे- भास के तेरह नाटक; शूद्रक का लिखा मृच्छकटिक/माटी; सुखांत नाटक; उच्च वर्ण के पात्र संस्कृत बोलते हैं जबकि निम्न वर्णों द्वारा प्राकृत बोला जाना; विज्ञान की अलग अलग विधाओं का विकास; आर्यभट्ट(गणित एवं खगोल विज्ञान); बाग्गभट्ट(अष्टांग ह्रदय) ; पाणिनि और पतंजलि के ग्रंथों के आधार पर संस्कृत व्याकरण का भी विकास ; जैसे- अमरकोश जैसे शब्दकोष का संकलन; शास्त्रीय साहित्य के इतिहास में गुप्तकाल उज्जवल अध्याय की तरह है| बाघ की गुफाएं; आम जनजीवन से संबंधित विषयों को महत्व; इसके अतिरिक्त गुप्त शासकों द्वारा सबसे अधिक स्वर्ण मुद्राएँ भी जारी की गयी थीं| चंद्रगुप्त द्वितीय तथा समुद्रगुप्त कला एवं साहित्य के बड़े संपोषक थें| समुद्रगुप्त को खुद अपने सिक्के पर वीणा बजाते हुए दिखाया गया है| वहीँ, चंद्रगुप्त का दरबार नवरत्नों अर्थात 9 बड़े-बड़े विद्वानों से अलंकृत था| साथ ही, गुप्तकालीन शिल्पकारों ने अपना चमत्कार लौह तथा कांस्य कृतियों में दिखाया है| उपरोक्त आयामों को देखते हुए एवं सांस्कृतिक विकास की वजह सेही गुप्तकाल को कला एवं साहित्य के क्षेत्र में प्राचीन भारत का स्वर्ण युग का दर्जा दिया जाता है|
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Kashmir has proven to be an unsolvable challenge for the Indian govt, and the recent step was taken by the GOI tonullify Article 370 shows the need for a fresh approach to solving the issue of the Kashmir. Comment( 200 words)
Approach Brief introduction about Kashmir issue or can write about recent incidents in the valley. Briefly discuss why the issue of Kashmir has become an unsolvable challenge for the Indian government. Mention the present strategies of the government including the nullification of article 370 to deal with it and issues with these strategies. Suggest way forward for the same. Answer: The insurgency in Kashmir started way back in 1989 when the state assembly election was rigged. This has contributed to anti-government sentiment. The Kashmir insurgency mainly a conflict between various Kashmiri separatists and nationalists. Why the issue of Kashmir has become an unsolvable challenge for the Indian government There has been an increase in local recruitment which shows the changing nature of militancy. Earlier most of the militants were of foreign origin. Mass participation in the protest, especially at encounter sites and funerals. Mass level indoctrination provided by the terrorist groups and narratives provided by Pakistan A large number of unemployed youth (40-50 percent unemployment rate) are an easy target for terrorist recruitment agencies. A large number of youths not getting modern education (getting education in madrasas) Large scale corruption in administration and politics Less industrial and regional development In the absence of a political and reconciliation process, asking security forces to show restraint in the face of constant stoning is not feasible. Strategies of the Government The Kashmir insurgency offers no ready solutions. There were two broad approaches to dealing with an insurgency. One is the conventional military approach, also called the anti-insurgency or enemy-centric approach, which focuses on targeting the insurgents.The government has initiated “Operation All-out” to deal with militant and violent activities in the valley. The operation involves the killing of Militants in the Kashmir region to install terror in minds of Kashmiri Youth. The other is aPopulation-Centric Counter Insurgency (COIN) approach, which is aimed at cutting off the insurgents’ supply lines by either providing incentives to the population for supporting the counterinsurgent forces or by imposing costs on the population for supporting the insurgents. The general bias of the population-centric COIN perspectives is to give prominence to winning the hearts and minds of the population, which essentially means convincing the people that the advantages of supporting the government against the insurgents outweigh the advantages of supporting the insurgents. Nullification of Article 370 of the Indian constitution. The ultimate goal of both approaches is to restore stability and the population’s support for the government forces which was also the case with the recent step of nullifying Article 370. Issues with government strategies Hybrid policy of appeasing separatists along with stop-start counter-terror operations won’t work. More civilians, militants and security forces have died in the first five months of 2018 than in corresponding periods for the previous decade. The government is not able to change the narratives set by the terrorist groups and youth alienation is still prevalent. Normalcy after the nullification of article 370 is yet to fulfill its fruits but keeping the population into the hardship in the guise of security issues will further put them into disaffection for the govt which has yet to be reflected in the coming years. Measures to be taken as a fresh approach Internal Governance, employment generation, poverty reduction, infrastructure, Emphasis on deradicalization program Revise its surrender and rehabilitation policy Development into focus again: Tourism, health; education, etc. People to people contacts, trust-building measures, periodic dialogues with all groups, Speedy disposal of cases against armed forces, sensitization of armed forces Lethal force should be the last resort - 2016 SC guidelines on AFSPA to be implemented effectively External Border infrastructure, resolution of LoC issue, diplomatic pressure on Pakistan, Internationalization of issue of terrorism, Cross border trade The Need of the hour is to understand that Kashmir is an integral part of India. Although they have their own set of problems and issues it is the main task of the Government to address their Issues to provide a peaceful and dignified life to them.
##Question:Kashmir has proven to be an unsolvable challenge for the Indian govt, and the recent step was taken by the GOI tonullify Article 370 shows the need for a fresh approach to solving the issue of the Kashmir. Comment( 200 words)##Answer:Approach Brief introduction about Kashmir issue or can write about recent incidents in the valley. Briefly discuss why the issue of Kashmir has become an unsolvable challenge for the Indian government. Mention the present strategies of the government including the nullification of article 370 to deal with it and issues with these strategies. Suggest way forward for the same. Answer: The insurgency in Kashmir started way back in 1989 when the state assembly election was rigged. This has contributed to anti-government sentiment. The Kashmir insurgency mainly a conflict between various Kashmiri separatists and nationalists. Why the issue of Kashmir has become an unsolvable challenge for the Indian government There has been an increase in local recruitment which shows the changing nature of militancy. Earlier most of the militants were of foreign origin. Mass participation in the protest, especially at encounter sites and funerals. Mass level indoctrination provided by the terrorist groups and narratives provided by Pakistan A large number of unemployed youth (40-50 percent unemployment rate) are an easy target for terrorist recruitment agencies. A large number of youths not getting modern education (getting education in madrasas) Large scale corruption in administration and politics Less industrial and regional development In the absence of a political and reconciliation process, asking security forces to show restraint in the face of constant stoning is not feasible. Strategies of the Government The Kashmir insurgency offers no ready solutions. There were two broad approaches to dealing with an insurgency. One is the conventional military approach, also called the anti-insurgency or enemy-centric approach, which focuses on targeting the insurgents.The government has initiated “Operation All-out” to deal with militant and violent activities in the valley. The operation involves the killing of Militants in the Kashmir region to install terror in minds of Kashmiri Youth. The other is aPopulation-Centric Counter Insurgency (COIN) approach, which is aimed at cutting off the insurgents’ supply lines by either providing incentives to the population for supporting the counterinsurgent forces or by imposing costs on the population for supporting the insurgents. The general bias of the population-centric COIN perspectives is to give prominence to winning the hearts and minds of the population, which essentially means convincing the people that the advantages of supporting the government against the insurgents outweigh the advantages of supporting the insurgents. Nullification of Article 370 of the Indian constitution. The ultimate goal of both approaches is to restore stability and the population’s support for the government forces which was also the case with the recent step of nullifying Article 370. Issues with government strategies Hybrid policy of appeasing separatists along with stop-start counter-terror operations won’t work. More civilians, militants and security forces have died in the first five months of 2018 than in corresponding periods for the previous decade. The government is not able to change the narratives set by the terrorist groups and youth alienation is still prevalent. Normalcy after the nullification of article 370 is yet to fulfill its fruits but keeping the population into the hardship in the guise of security issues will further put them into disaffection for the govt which has yet to be reflected in the coming years. Measures to be taken as a fresh approach Internal Governance, employment generation, poverty reduction, infrastructure, Emphasis on deradicalization program Revise its surrender and rehabilitation policy Development into focus again: Tourism, health; education, etc. People to people contacts, trust-building measures, periodic dialogues with all groups, Speedy disposal of cases against armed forces, sensitization of armed forces Lethal force should be the last resort - 2016 SC guidelines on AFSPA to be implemented effectively External Border infrastructure, resolution of LoC issue, diplomatic pressure on Pakistan, Internationalization of issue of terrorism, Cross border trade The Need of the hour is to understand that Kashmir is an integral part of India. Although they have their own set of problems and issues it is the main task of the Government to address their Issues to provide a peaceful and dignified life to them.
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एक महान विरासत के रूप में, समकालीन भारतीय जनजीवन पर हड़प्पाई सांस्कृतिक तत्वों के सातत्य को रेखांकित कीजिये | (150 से 200 शब्द, 10 अंक) As a great heritage, underline the Continuity of Harappan cultural elements on contemporary Indian life. (150 to 200 words, 10 marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में हड़प्पा सभ्यता के बारे में सूचनायें दीजिये 2- मुख्य भाग में उपशीर्षकों के अंतर्गत नगर नियोजन, मूर्तिकला एवं चित्रकला तथा समाज का विश्लेषण कीजिये| 3- अंतिम में विरासत के रूप में महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| हड़प्पा अथवा सिन्धु घाटी सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है | यह 2600 से 1900 ई.पू. के मध्य अपनी परिपक्व अवस्था में थी| हड़प्पा सभ्यता मुख्यतः उत्तर पूर्वी अफगानिस्तान, पश्चिमोत्तर पाकिस्तान से लेकर भारत के उत्तरी क्षेत्र में विस्तृत थी| यह प्राचीन मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यता की समकालीन सभ्यता थी| हड़प्पा सभ्यता से सम्बन्धित पुरातात्विक स्थलों का सर्वाधिक संकेद्रण घग्घर/ हाकरा नदी घाटी में पाया गया है| हड़प्पा सभ्यता के स्थलों से प्राप्त पुरातात्विक स्रोतों से तत्कालीन कला एवं स्थापत्य के बारे में जानकारी मिलती है| हड़प्पा युगीन नगर स्थापत्य हड़प्पा सभ्यता की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता इसकी नगर योजना थी| इस सभ्यता के अधिकाँश नगरों का नियोजन समरूप था| नगर प्रायः सड़कों के जाल से युक्त थे|प्रायः नगरों में पूर्व तथा पश्चिम की बसावट में अंतर दिखता है| जहाँ पश्चिमी भाग में दुर्ग अथवा गढ़ी संरचनाएं दिखती हैं वहीँ पूर्वी भाग सामान्य आवासीय क्षेत्र प्रतीत होता है|संभव है कि पश्चिमी भाग प्रशासनिक अथवा सार्वजानिक क्षेत्र रहा होगा| संभवतः पश्चिमी भाग में शासक वर्ग के लोग रहते थे| आज भी प्रशासनिक केंद्र तथा प्रशासकों के आवासीय स्थल प्रायः विशिष्ट क्षेत्रों में होते हैं| हड़प्पा सभ्यता के नगरों की एक प्रमुख विशेषता इनकी जल निकास प्रणाली थी| प्रत्येक घर से आने वाली नाली सड़क किनारे बनी हुई नालियों में खुलती थी| सभी नालियां पत्थरों से ढकी रहती थीं| नालियों में कहीं कहीं मेनहोल भी बनाये जाते थे| नालियों का निर्माण पक्की इंटों से किया जाता था| यह वर्तमान नगरीय जल प्रबन्धन की विशेषता बनी हुई है यहाँ की सड़कें एक दूसरे को समकोण पर काटती थीं| जिससे नगर अनेक आयताकार खण्डों में विभक्त हो जाता था| आज भी नगरीकरण का यह एक लोकप्रिय प्रारूप है| नगरीकरण के इस प्रारूप का महत्त्व सौन्दर्य के साथ सुरक्षा तथा प्रशासन के साथ संवाद के दृष्टिकोण से है सड़कों के दोनों ओर मकान बने होते थे| इन मकानों के दफ्वाजे और खिड़कियाँ सड़क की ओर नहीं बल्कि घर के पिछवाड़े की ओर खुलते थे | इन भवनों का प्रारूप बहुत सीमा तक आधुनिक भवनों की तरह ही था कालीबंगा में अलंकृत इंटों का प्रयोग किया गया था शेष नगरों के भवन प्रायः अलंकरण रहित हैं| सभी सैन्धव नगरों में प्रयुक्त ईंटों की माप में समरूपता थी| कुछ नगर विशिष्ट उद्योगों के केंद्र थे जैसे चान्हुदड़ो मनका निर्माण का केंद्र था| इसी तरह आज भी उद्योग विशिष्ट नगरीय प्रणाली को देखा जा सकता है मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, राखीगढ़ी, लोथल, धौलावीरा, सुरकोटडा तथा कालीबंगा आदि सैन्धव सभ्यता के प्रमुख नगरीय केंद्र थे| इन नगरों का नियोजन सैन्धव सभ्यता के विकसित नगरीय सभ्यता होने का प्रमाण प्रस्तुत करता है| हड़प्पा युगीन मूर्तिकला एवंचित्रकला हड़प्पाई शहरों से पत्थर, धातु तथा मिटटी की मूर्तियों के साक्ष्य मिलते हैंहालांकि समकालीन सभ्यताओं की तुलना में पत्थरों एवं धातुओं की मूर्तियों के साक्ष्य कम मिलते हैं पत्थर की मूर्तियों के अधिकाँश साक्ष्य मोहनजोदड़ो से मिलते हैं और कुछ मूर्तियाँ हड़प्पा से प्राप्त हुई हैं हालांकि पत्थर की मूर्तियाँ संख्यात्मक रूप से कम हैं| नृत्यरत युवक का धड़(हड़प्पा), मोहनजोदड़ो से दाढ़ी युक्त एक पुरुष की मूर्ति आदि कुछ प्रमुख मूर्तियाँ हैं| धातु की मूर्तियों के निर्माण में द्रव मोम विधि (लॉस्ट वैक्स) का उपयोग किया जाता था| धातु की मूर्तियों में कांसे की नर्तकी (मोहनजोदड़ो) की मूर्ति सर्वाधिक रूप से प्रसिद्ध है|इसके अतिरिक्त धातु से निर्मित बैल व अन्य पशुओं की मूर्तियाँ भी प्राप्त हुई हैं सौन्दर्य एवं संतुलित शारीरिक अनुपात इन मूर्तियों की महत्वपूर्ण विशेषता है| दुसरे शब्दों में ये मूर्तियाँ यथार्थवादी कला का प्रतिनिधित्व करती हैं| इसके साथ ही इन मूर्तियों की लागत अधिक रही होगी अतः ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि ये मूर्तियाँ कला के क्षेत्र में समाज के उच्च वर्गों के दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करती हैं हड़प्पा के विभिन्न शहरों से मिटटी की मूर्तियाँ भी बहुतायत में प्राप्त हुई हैं| इनमें पुरुषों की तुलना में महिलाओं की मूर्तियाँ अधिक हैं| पशुओं में कूबड़ वाले बैल की मूर्तियाँ सर्वाधिक संख्या प्राप्त हुई हैं| इसके अतिरिक्त विभिन्न पशु-पक्षियों, खिलौने व हास्यबोध से सम्बन्धित मूर्तियों के साक्ष्य मिलते हैं इन मूर्तियों में पत्थर व धातु की मूर्तियों तरह कलात्मक सौन्दर्य नहीं है लेकिन समकालीन समाज के आम जनों के धार्मिक विश्वास एवं मनोरंजन के साधन को जानने का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं| मूर्तिकला की यह परम्परा किसी न किसी रूप में आज भी हमारे जीवन में विद्यमान है| चित्रों को उकेरने में लाल रंग एवं काले रंग का अधिक उपयोग किया गया है हड़प्पाई चित्रों के अधिकांशतः प्रमाण बर्तनो से प्राप्त होते हैं| बर्तनों पर सर्वाधिक रूप से पेड़-पौधों का चित्रण किया गया जैसे पीपल, नीम आदिलोथल से प्राप्त चालाक लोमड़ी का चित्र, हड़प्पा से प्राप्त एक मछुआरे का चित्र आदि कुछ प्रमुख चित्र हैं| अर्थात चित्रों में प्रकृति के विभिन्न तत्वों को महत्त्व दिया गया है| बर्तनों पर चित्रों की परम्परा आगे भी जारी रही है| हड़प्पा युगीन धर्म एवं समाज हड़प्पाई धर्म से सम्बन्धित कई परम्पराएं न केवल परवर्ती काल बल्कि आज भी हमारे जीवन में प्रचलित हैं जैसे अग्नि पूजा, पीपल की पूजा, जल का महत्त्व, शिव की आराधना आदि इसी तरह तत्कालीन सामाजिक विशेषताएं आज भी हमारे जीवन में देखि जा सकती हैं जैसे सामाजिक वर्गीकरण, खानपान, मनोरंजन के साधन आदि स्पष्ट होता है कि हड़प्पा सभ्यता, कला एवं स्थापत्य के सन्दर्भ में पर्याप्त रूप से विकसित अवस्था में थी| हड़प्पा युगीन कला एवं स्थापत्य के विभिन्न पहलू वर्तमान कला एवं स्थापत्य को निवेश प्रदान करते हैं| हड़प्पा युगीन सांस्कृतिक पहलू किसी न किसी रूप में आज भी विद्यमान है|
##Question:एक महान विरासत के रूप में, समकालीन भारतीय जनजीवन पर हड़प्पाई सांस्कृतिक तत्वों के सातत्य को रेखांकित कीजिये | (150 से 200 शब्द, 10 अंक) As a great heritage, underline the Continuity of Harappan cultural elements on contemporary Indian life. (150 to 200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में हड़प्पा सभ्यता के बारे में सूचनायें दीजिये 2- मुख्य भाग में उपशीर्षकों के अंतर्गत नगर नियोजन, मूर्तिकला एवं चित्रकला तथा समाज का विश्लेषण कीजिये| 3- अंतिम में विरासत के रूप में महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| हड़प्पा अथवा सिन्धु घाटी सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है | यह 2600 से 1900 ई.पू. के मध्य अपनी परिपक्व अवस्था में थी| हड़प्पा सभ्यता मुख्यतः उत्तर पूर्वी अफगानिस्तान, पश्चिमोत्तर पाकिस्तान से लेकर भारत के उत्तरी क्षेत्र में विस्तृत थी| यह प्राचीन मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यता की समकालीन सभ्यता थी| हड़प्पा सभ्यता से सम्बन्धित पुरातात्विक स्थलों का सर्वाधिक संकेद्रण घग्घर/ हाकरा नदी घाटी में पाया गया है| हड़प्पा सभ्यता के स्थलों से प्राप्त पुरातात्विक स्रोतों से तत्कालीन कला एवं स्थापत्य के बारे में जानकारी मिलती है| हड़प्पा युगीन नगर स्थापत्य हड़प्पा सभ्यता की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता इसकी नगर योजना थी| इस सभ्यता के अधिकाँश नगरों का नियोजन समरूप था| नगर प्रायः सड़कों के जाल से युक्त थे|प्रायः नगरों में पूर्व तथा पश्चिम की बसावट में अंतर दिखता है| जहाँ पश्चिमी भाग में दुर्ग अथवा गढ़ी संरचनाएं दिखती हैं वहीँ पूर्वी भाग सामान्य आवासीय क्षेत्र प्रतीत होता है|संभव है कि पश्चिमी भाग प्रशासनिक अथवा सार्वजानिक क्षेत्र रहा होगा| संभवतः पश्चिमी भाग में शासक वर्ग के लोग रहते थे| आज भी प्रशासनिक केंद्र तथा प्रशासकों के आवासीय स्थल प्रायः विशिष्ट क्षेत्रों में होते हैं| हड़प्पा सभ्यता के नगरों की एक प्रमुख विशेषता इनकी जल निकास प्रणाली थी| प्रत्येक घर से आने वाली नाली सड़क किनारे बनी हुई नालियों में खुलती थी| सभी नालियां पत्थरों से ढकी रहती थीं| नालियों में कहीं कहीं मेनहोल भी बनाये जाते थे| नालियों का निर्माण पक्की इंटों से किया जाता था| यह वर्तमान नगरीय जल प्रबन्धन की विशेषता बनी हुई है यहाँ की सड़कें एक दूसरे को समकोण पर काटती थीं| जिससे नगर अनेक आयताकार खण्डों में विभक्त हो जाता था| आज भी नगरीकरण का यह एक लोकप्रिय प्रारूप है| नगरीकरण के इस प्रारूप का महत्त्व सौन्दर्य के साथ सुरक्षा तथा प्रशासन के साथ संवाद के दृष्टिकोण से है सड़कों के दोनों ओर मकान बने होते थे| इन मकानों के दफ्वाजे और खिड़कियाँ सड़क की ओर नहीं बल्कि घर के पिछवाड़े की ओर खुलते थे | इन भवनों का प्रारूप बहुत सीमा तक आधुनिक भवनों की तरह ही था कालीबंगा में अलंकृत इंटों का प्रयोग किया गया था शेष नगरों के भवन प्रायः अलंकरण रहित हैं| सभी सैन्धव नगरों में प्रयुक्त ईंटों की माप में समरूपता थी| कुछ नगर विशिष्ट उद्योगों के केंद्र थे जैसे चान्हुदड़ो मनका निर्माण का केंद्र था| इसी तरह आज भी उद्योग विशिष्ट नगरीय प्रणाली को देखा जा सकता है मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, राखीगढ़ी, लोथल, धौलावीरा, सुरकोटडा तथा कालीबंगा आदि सैन्धव सभ्यता के प्रमुख नगरीय केंद्र थे| इन नगरों का नियोजन सैन्धव सभ्यता के विकसित नगरीय सभ्यता होने का प्रमाण प्रस्तुत करता है| हड़प्पा युगीन मूर्तिकला एवंचित्रकला हड़प्पाई शहरों से पत्थर, धातु तथा मिटटी की मूर्तियों के साक्ष्य मिलते हैंहालांकि समकालीन सभ्यताओं की तुलना में पत्थरों एवं धातुओं की मूर्तियों के साक्ष्य कम मिलते हैं पत्थर की मूर्तियों के अधिकाँश साक्ष्य मोहनजोदड़ो से मिलते हैं और कुछ मूर्तियाँ हड़प्पा से प्राप्त हुई हैं हालांकि पत्थर की मूर्तियाँ संख्यात्मक रूप से कम हैं| नृत्यरत युवक का धड़(हड़प्पा), मोहनजोदड़ो से दाढ़ी युक्त एक पुरुष की मूर्ति आदि कुछ प्रमुख मूर्तियाँ हैं| धातु की मूर्तियों के निर्माण में द्रव मोम विधि (लॉस्ट वैक्स) का उपयोग किया जाता था| धातु की मूर्तियों में कांसे की नर्तकी (मोहनजोदड़ो) की मूर्ति सर्वाधिक रूप से प्रसिद्ध है|इसके अतिरिक्त धातु से निर्मित बैल व अन्य पशुओं की मूर्तियाँ भी प्राप्त हुई हैं सौन्दर्य एवं संतुलित शारीरिक अनुपात इन मूर्तियों की महत्वपूर्ण विशेषता है| दुसरे शब्दों में ये मूर्तियाँ यथार्थवादी कला का प्रतिनिधित्व करती हैं| इसके साथ ही इन मूर्तियों की लागत अधिक रही होगी अतः ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि ये मूर्तियाँ कला के क्षेत्र में समाज के उच्च वर्गों के दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करती हैं हड़प्पा के विभिन्न शहरों से मिटटी की मूर्तियाँ भी बहुतायत में प्राप्त हुई हैं| इनमें पुरुषों की तुलना में महिलाओं की मूर्तियाँ अधिक हैं| पशुओं में कूबड़ वाले बैल की मूर्तियाँ सर्वाधिक संख्या प्राप्त हुई हैं| इसके अतिरिक्त विभिन्न पशु-पक्षियों, खिलौने व हास्यबोध से सम्बन्धित मूर्तियों के साक्ष्य मिलते हैं इन मूर्तियों में पत्थर व धातु की मूर्तियों तरह कलात्मक सौन्दर्य नहीं है लेकिन समकालीन समाज के आम जनों के धार्मिक विश्वास एवं मनोरंजन के साधन को जानने का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं| मूर्तिकला की यह परम्परा किसी न किसी रूप में आज भी हमारे जीवन में विद्यमान है| चित्रों को उकेरने में लाल रंग एवं काले रंग का अधिक उपयोग किया गया है हड़प्पाई चित्रों के अधिकांशतः प्रमाण बर्तनो से प्राप्त होते हैं| बर्तनों पर सर्वाधिक रूप से पेड़-पौधों का चित्रण किया गया जैसे पीपल, नीम आदिलोथल से प्राप्त चालाक लोमड़ी का चित्र, हड़प्पा से प्राप्त एक मछुआरे का चित्र आदि कुछ प्रमुख चित्र हैं| अर्थात चित्रों में प्रकृति के विभिन्न तत्वों को महत्त्व दिया गया है| बर्तनों पर चित्रों की परम्परा आगे भी जारी रही है| हड़प्पा युगीन धर्म एवं समाज हड़प्पाई धर्म से सम्बन्धित कई परम्पराएं न केवल परवर्ती काल बल्कि आज भी हमारे जीवन में प्रचलित हैं जैसे अग्नि पूजा, पीपल की पूजा, जल का महत्त्व, शिव की आराधना आदि इसी तरह तत्कालीन सामाजिक विशेषताएं आज भी हमारे जीवन में देखि जा सकती हैं जैसे सामाजिक वर्गीकरण, खानपान, मनोरंजन के साधन आदि स्पष्ट होता है कि हड़प्पा सभ्यता, कला एवं स्थापत्य के सन्दर्भ में पर्याप्त रूप से विकसित अवस्था में थी| हड़प्पा युगीन कला एवं स्थापत्य के विभिन्न पहलू वर्तमान कला एवं स्थापत्य को निवेश प्रदान करते हैं| हड़प्पा युगीन सांस्कृतिक पहलू किसी न किसी रूप में आज भी विद्यमान है|
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लोक सेवकों के मूल्यों के अन्तः पारस्परिक सम्बन्ध को व्यक्त करते हुए, इसकी चर्चा कीजिये कि "सत्यनिष्ठा मूल्यों का मूल्य है |" (150-200 शब्द) While explaining the inter-relationship of the values of the public servants, discuss the "integrity is the value of values." (150-200 Words)
एप्रोच - भूमिका में लोकसेवा को परिभाषित करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | प्रथम भाग में लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों में अंतरनिर्भरता का विश्लेषण कीजिये | अंतिम में सत्यनिष्ठा को परिभाषित करते हुए उससे मूल्यों के मूल्य के रूप में स्पष्ट कीजिये | उत्तर - सरकार के द्वारा नागरिकों को जिन सेवाओं को प्रदान किया जाता है उन्हें लोकसेवा कहते हैं| लोकसेवाओं का सम्बन्ध मौलिक रूप से नियामिकीय सेवा(कर संग्रह, न्याय प्रशासन तथा कानून एवं व्यवस्था), विकासात्मक सेवा( सामाजिक विकास-शिक्षा स्वास्थ्य आदि एवं आर्थिक विकास में कृषि परिवहन आदि),कल्याण सेवा(समाज के विशिष्ट वर्गों के लिए सेवा),एवं आपातकालीन सेवा(बाढ़,सूखा, आपदा आदि के दौरान प्रदत्त सेवायें) से होता है| संसदीय शासन व्यवस्था में प्रशासनिक नीतियों का निर्धारण मंत्रियों द्वारा किया जाता है परंतु देश का प्रशासनलोक सेवाअधिकारियों के एक विशाल समूह द्वारा चलाया जाता है| यही समूह लोकसेवा प्रदान करने के लिए उत्तरदायी होता है| अतः लोकसेवाओं के न्यायपूर्ण वितरण को सुनिश्चित करने के लिए लोकसेवकों से कुछ मूल्यों के अनुपालन की अपेक्षा की जाती है| लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों में अंतरनिर्भरता देखने को मिलती है| लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों में अन्तः पारस्परिक सम्बन्ध - लोकसेवकों के मूल्यों के चार मौलिक आयाम है यथा नैतिक मूल्य(सत्यनिष्ठा, इमानदारी, सम्मान, प्रोबिटी), मानवीय मूल्य(समानुभूति, करुणा, सहिष्णुता, मानवता), लोकतांत्रिक मूल्य(तटस्थता, जवाबदेहिता, समावेशिता, पारदर्शिता और विधि का शासन) एवं पेशेवर मूल्य(प्रभावशीलता, कार्यकुशलता, नवाचार, दक्षता, समर्पण, नेतृत्व)| इन मूल्यों में परस्पर अंतरनिर्भरता देखने को मिलती है | समर्पण प्रतिबद्धताके उच्चतम स्तर को दर्शाता है| अतः इसके अंतर्गत लोकसेवकों से यह अपेक्षा की जाती है कि अपना सम्पूर्ण समय, ध्यान, ऊर्जा एवं स्वतः अपने आप को लोकसेवा के प्रति केन्द्रित कर दे | सत्यनिष्ठा इस बात की मांग करती है कि लोकसेवकों के लिए लोक हित सर्वोपरि है एवं इस दिशा में लोकसेवकों के लिए समर्पण का होना आवश्यक है | एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक के लिएसमानुभूतियुक्त होना अति आवश्यक है ताकि इसके माध्यम से लोकसेवक विशेषकर समाज के कमजोर एवं संवेदनशील वर्गों की समस्याओं कावास्तविकविश्लेषण कर सके एवं इसके निराकरण की दिशा में प्रभावी नीतियों एवं कार्यक्रमों को लागू कर सके| जब समानुभूति व्यवहार में परिवर्तित होती है तो उसेकरुणा (कम्पैशन)की संज्ञा दी जाती है| महात्मा गांधी के अनुसार, धार्मिक वह व्यक्ति होता है जो कि दूसरे की पीड़ा को समझता है | सत्यनिष्ठा यह मांग करती है कि लोकसेवकसहिष्णुताके मूल्य से युक्त हो| लोकसेवकों में समानुभूति एवं करुणा को प्राप्त करने हेतु सहिष्णुता का होना अति आवश्यक है विशेषकर भारत जैसे देश में जहाँ विचारों की बहुलता एवं विविधता अधिक हो | सत्यनिष्ठा यह मांग करती है कि लोकसेवक तटस्थ हो, यहाँतटस्थताका तात्पर्य लोकसेवकों को किसी भी एक राजनीतिक विचारधारा के प्रति वचनबद्ध नहीं होने से है| तटस्थ लोकसेवक की 3 मौलिक विशेषताएं होती हैं यथाभेदभावरहितता, गैर-तरफदारी एवं अनामिता| एक तटस्थ लोकसेवक से यह अपेक्षा की जाती है कि वहअनामिता(Anonymity)के मूल्य का भी अनुपालन करे यानी सरकार की नीतियों के साथ किसी भी लोकसेवक के नाम को प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित नहीं किया जाए| भेदभावरहित होने का आशय सबके प्रति(आम जनता के प्रति,राजनीतिक दलों के प्रति)समान व्यवहार से है| जबकि गैर-तरफदारी का आशय लोकसेवकों के द्वारा राजनीतिक गतिविधियों में भाग न लेने से है| भेदभावरहितता को प्राप्त करने हेतु लोकसेवकों मेंवस्तुनिष्ठताका होना अनिवार्य है|बिना वस्तुनिष्ठता के लोकसेवकों की सत्यनिष्ठा को प्राप्त किया जाना संभव नहीं है | उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों पारस्परिक अंतरनिर्भरता है| ध्यातव्य है कि एक लोक सेवक का व्यवहार एक लोक सेवक की तरह होना चाहिए एवं इसमें किसी भी प्रकार की कमी का होना या अभाव का होना सत्यनिष्ठा की कमी को दर्शाता है| अतः सत्यनिष्ठा एक व्यापक एवं सर्वांगीणमूल्य(Value)को दर्शाती है|मूल्य का आशय किसी व्यक्ति के मानसिक प्राथमिकता से है अर्थात उसकी पसंद या नापसंद से है| व्यक्तिगत स्तर पर प्राथमिकता उसके मानव होने की प्राथमिकता, संगठन की प्राथमिकता, सामाजिक प्राथमिकता आदि से मेल खानी चाहिए|मनसा वाचा कर्मणा समभाव ही सत्यनिष्ठा है| यह किसी लोकसेवा का आधारभूत मूल्य है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि सत्यनिष्ठा मूल्यों का मूल्य है|
##Question:लोक सेवकों के मूल्यों के अन्तः पारस्परिक सम्बन्ध को व्यक्त करते हुए, इसकी चर्चा कीजिये कि "सत्यनिष्ठा मूल्यों का मूल्य है |" (150-200 शब्द) While explaining the inter-relationship of the values of the public servants, discuss the "integrity is the value of values." (150-200 Words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में लोकसेवा को परिभाषित करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | प्रथम भाग में लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों में अंतरनिर्भरता का विश्लेषण कीजिये | अंतिम में सत्यनिष्ठा को परिभाषित करते हुए उससे मूल्यों के मूल्य के रूप में स्पष्ट कीजिये | उत्तर - सरकार के द्वारा नागरिकों को जिन सेवाओं को प्रदान किया जाता है उन्हें लोकसेवा कहते हैं| लोकसेवाओं का सम्बन्ध मौलिक रूप से नियामिकीय सेवा(कर संग्रह, न्याय प्रशासन तथा कानून एवं व्यवस्था), विकासात्मक सेवा( सामाजिक विकास-शिक्षा स्वास्थ्य आदि एवं आर्थिक विकास में कृषि परिवहन आदि),कल्याण सेवा(समाज के विशिष्ट वर्गों के लिए सेवा),एवं आपातकालीन सेवा(बाढ़,सूखा, आपदा आदि के दौरान प्रदत्त सेवायें) से होता है| संसदीय शासन व्यवस्था में प्रशासनिक नीतियों का निर्धारण मंत्रियों द्वारा किया जाता है परंतु देश का प्रशासनलोक सेवाअधिकारियों के एक विशाल समूह द्वारा चलाया जाता है| यही समूह लोकसेवा प्रदान करने के लिए उत्तरदायी होता है| अतः लोकसेवाओं के न्यायपूर्ण वितरण को सुनिश्चित करने के लिए लोकसेवकों से कुछ मूल्यों के अनुपालन की अपेक्षा की जाती है| लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों में अंतरनिर्भरता देखने को मिलती है| लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों में अन्तः पारस्परिक सम्बन्ध - लोकसेवकों के मूल्यों के चार मौलिक आयाम है यथा नैतिक मूल्य(सत्यनिष्ठा, इमानदारी, सम्मान, प्रोबिटी), मानवीय मूल्य(समानुभूति, करुणा, सहिष्णुता, मानवता), लोकतांत्रिक मूल्य(तटस्थता, जवाबदेहिता, समावेशिता, पारदर्शिता और विधि का शासन) एवं पेशेवर मूल्य(प्रभावशीलता, कार्यकुशलता, नवाचार, दक्षता, समर्पण, नेतृत्व)| इन मूल्यों में परस्पर अंतरनिर्भरता देखने को मिलती है | समर्पण प्रतिबद्धताके उच्चतम स्तर को दर्शाता है| अतः इसके अंतर्गत लोकसेवकों से यह अपेक्षा की जाती है कि अपना सम्पूर्ण समय, ध्यान, ऊर्जा एवं स्वतः अपने आप को लोकसेवा के प्रति केन्द्रित कर दे | सत्यनिष्ठा इस बात की मांग करती है कि लोकसेवकों के लिए लोक हित सर्वोपरि है एवं इस दिशा में लोकसेवकों के लिए समर्पण का होना आवश्यक है | एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक के लिएसमानुभूतियुक्त होना अति आवश्यक है ताकि इसके माध्यम से लोकसेवक विशेषकर समाज के कमजोर एवं संवेदनशील वर्गों की समस्याओं कावास्तविकविश्लेषण कर सके एवं इसके निराकरण की दिशा में प्रभावी नीतियों एवं कार्यक्रमों को लागू कर सके| जब समानुभूति व्यवहार में परिवर्तित होती है तो उसेकरुणा (कम्पैशन)की संज्ञा दी जाती है| महात्मा गांधी के अनुसार, धार्मिक वह व्यक्ति होता है जो कि दूसरे की पीड़ा को समझता है | सत्यनिष्ठा यह मांग करती है कि लोकसेवकसहिष्णुताके मूल्य से युक्त हो| लोकसेवकों में समानुभूति एवं करुणा को प्राप्त करने हेतु सहिष्णुता का होना अति आवश्यक है विशेषकर भारत जैसे देश में जहाँ विचारों की बहुलता एवं विविधता अधिक हो | सत्यनिष्ठा यह मांग करती है कि लोकसेवक तटस्थ हो, यहाँतटस्थताका तात्पर्य लोकसेवकों को किसी भी एक राजनीतिक विचारधारा के प्रति वचनबद्ध नहीं होने से है| तटस्थ लोकसेवक की 3 मौलिक विशेषताएं होती हैं यथाभेदभावरहितता, गैर-तरफदारी एवं अनामिता| एक तटस्थ लोकसेवक से यह अपेक्षा की जाती है कि वहअनामिता(Anonymity)के मूल्य का भी अनुपालन करे यानी सरकार की नीतियों के साथ किसी भी लोकसेवक के नाम को प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित नहीं किया जाए| भेदभावरहित होने का आशय सबके प्रति(आम जनता के प्रति,राजनीतिक दलों के प्रति)समान व्यवहार से है| जबकि गैर-तरफदारी का आशय लोकसेवकों के द्वारा राजनीतिक गतिविधियों में भाग न लेने से है| भेदभावरहितता को प्राप्त करने हेतु लोकसेवकों मेंवस्तुनिष्ठताका होना अनिवार्य है|बिना वस्तुनिष्ठता के लोकसेवकों की सत्यनिष्ठा को प्राप्त किया जाना संभव नहीं है | उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों पारस्परिक अंतरनिर्भरता है| ध्यातव्य है कि एक लोक सेवक का व्यवहार एक लोक सेवक की तरह होना चाहिए एवं इसमें किसी भी प्रकार की कमी का होना या अभाव का होना सत्यनिष्ठा की कमी को दर्शाता है| अतः सत्यनिष्ठा एक व्यापक एवं सर्वांगीणमूल्य(Value)को दर्शाती है|मूल्य का आशय किसी व्यक्ति के मानसिक प्राथमिकता से है अर्थात उसकी पसंद या नापसंद से है| व्यक्तिगत स्तर पर प्राथमिकता उसके मानव होने की प्राथमिकता, संगठन की प्राथमिकता, सामाजिक प्राथमिकता आदि से मेल खानी चाहिए|मनसा वाचा कर्मणा समभाव ही सत्यनिष्ठा है| यह किसी लोकसेवा का आधारभूत मूल्य है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि सत्यनिष्ठा मूल्यों का मूल्य है|
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लोक सेवकों के मूल्यों के अन्तः पारस्परिक सम्बन्ध को व्यक्त करते हुए, इसकी चर्चा कीजिये कि "सत्यनिष्ठा मूल्यों का मूल्य है |" (150-200 शब्द) While explaining the inter-relationship of the values of the public servants, discuss the "integrity is the value of values." (150-200 Words)
एप्रोच - भूमिका में लोकसेवा को परिभाषित करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | प्रथम भाग में लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों में अंतरनिर्भरता का विश्लेषण कीजिये | अंतिम में सत्यनिष्ठा को परिभाषित करते हुए उससे मूल्यों के मूल्य के रूप में स्पष्ट कीजिये | उत्तर - सरकार के द्वारा नागरिकों को जिन सेवाओं को प्रदान किया जाता है उन्हें लोकसेवा कहते हैं| लोकसेवाओं का सम्बन्ध मौलिक रूप से नियामिकीय सेवा(कर संग्रह, न्याय प्रशासन तथा कानून एवं व्यवस्था), विकासात्मक सेवा( सामाजिक विकास-शिक्षा स्वास्थ्य आदि एवं आर्थिक विकास में कृषि परिवहन आदि),कल्याण सेवा(समाज के विशिष्ट वर्गों के लिए सेवा),एवं आपातकालीन सेवा(बाढ़,सूखा, आपदा आदि के दौरान प्रदत्त सेवायें) से होता है| संसदीय शासन व्यवस्था में प्रशासनिक नीतियों का निर्धारण मंत्रियों द्वारा किया जाता है परंतु देश का प्रशासनलोक सेवाअधिकारियों के एक विशाल समूह द्वारा चलाया जाता है| यही समूह लोकसेवा प्रदान करने के लिए उत्तरदायी होता है| अतः लोकसेवाओं के न्यायपूर्ण वितरण को सुनिश्चित करने के लिए लोकसेवकों से कुछ मूल्यों के अनुपालन की अपेक्षा की जाती है| लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों में अंतरनिर्भरता देखने को मिलती है| लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों में अन्तः पारस्परिक सम्बन्ध - लोकसेवकों के मूल्यों के चार मौलिक आयाम है यथा नैतिक मूल्य(सत्यनिष्ठा, इमानदारी, सम्मान, प्रोबिटी), मानवीय मूल्य(समानुभूति, करुणा, सहिष्णुता, मानवता), लोकतांत्रिक मूल्य(तटस्थता, जवाबदेहिता, समावेशिता, पारदर्शिता और विधि का शासन) एवं पेशेवर मूल्य(प्रभावशीलता, कार्यकुशलता, नवाचार, दक्षता, समर्पण, नेतृत्व)| इन मूल्यों में परस्पर अंतरनिर्भरता देखने को मिलती है| समर्पण प्रतिबद्धताके उच्चतम स्तर को दर्शाता है| अतः इसके अंतर्गत लोकसेवकों से यह अपेक्षा की जाती है कि अपना सम्पूर्ण समय, ध्यान, ऊर्जा एवं स्वतः अपने आप को लोकसेवा के प्रति केन्द्रित कर दे | सत्यनिष्ठा इस बात की मांग करती है कि लोकसेवकों के लिए लोक हित सर्वोपरि है एवं इस दिशा में लोकसेवकों के लिए समर्पण का होना आवश्यक है | एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक के लिएसमानुभूतियुक्त होना अति आवश्यक है ताकि इसके माध्यम से लोकसेवक विशेषकर समाज के कमजोर एवं संवेदनशील वर्गों की समस्याओं कावास्तविकविश्लेषण कर सके एवं इसके निराकरण की दिशा में प्रभावी नीतियों एवं कार्यक्रमों को लागू कर सके| जब समानुभूतिव्यवहार में परिवर्तित होती है तो उसेकरुणा (कम्पैशन)की संज्ञा दी जाती है| महात्मा गांधी के अनुसार, धार्मिक वह व्यक्ति होता है जो कि दूसरे की पीड़ा को समझता है | सत्यनिष्ठा यह मांग करती है कि लोकसेवकसहिष्णुताके मूल्य से युक्त हो| लोकसेवकों में समानुभूति एवं करुणा को प्राप्त करने हेतु सहिष्णुता का होना अति आवश्यक है विशेषकर भारत जैसे देश में जहाँ विचारों की बहुलता एवं विविधता अधिक हो | सत्यनिष्ठा यह मांग करती है कि लोकसेवक तटस्थ हो, यहाँतटस्थताका तात्पर्य लोकसेवकों को किसी भी एक राजनीतिक विचारधारा के प्रति वचनबद्ध नहीं होने से है| तटस्थ लोकसेवक की 3 मौलिक विशेषताएं होती हैं यथाभेदभावरहितता, गैर-तरफदारी एवं अनामिता| एक तटस्थ लोकसेवक से यह अपेक्षा की जाती है कि वहअनामिता(Anonymity)के मूल्य का भी अनुपालन करे यानी सरकार की नीतियों के साथ किसी भी लोकसेवक के नाम को प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित नहीं किया जाए| भेदभावरहित होने का आशय सबके प्रति(आम जनता के प्रति,राजनीतिक दलों के प्रति)समान व्यवहार से है| जबकि गैर-तरफदारी का आशय लोकसेवकों के द्वारा राजनीतिक गतिविधियों में भाग न लेने से है | भेदभावरहितता को प्राप्त करने हेतु लोकसेवकों मेंवस्तुनिष्ठताका होना अनिवार्य है|बिना वस्तुनिष्ठता के लोकसेवकों की सत्यनिष्ठा को प्राप्त किया जाना संभव नहीं है | उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों पारस्परिक अंतरनिर्भरता है| ध्यातव्य है कि एक लोक सेवक का व्यवहार एक लोक सेवक की तरह होना चाहिए एवं इसमें किसी भी प्रकार की कमी का होना या अभाव का होना सत्यनिष्ठा की कमी को दर्शाता है| अतः सत्यनिष्ठा एक व्यापक एवं सर्वांगीणमूल्य(Value)को दर्शाती है|मूल्य का आशय किसी व्यक्ति के मानसिक प्राथमिकता से है अर्थात उसकी पसंद या नापसंद से है| व्यक्तिगत स्तर पर प्राथमिकता उसके मानव होने की प्राथमिकता, संगठन की प्राथमिकता, सामाजिक प्राथमिकता आदि से मेल खानी चाहिए|मनसा वाचा कर्मणा समभाव ही सत्यनिष्ठा है| यह किसी लोकसेवा का आधारभूत मूल्य है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि सत्यनिष्ठा मूल्यों का मूल्य है|
##Question:लोक सेवकों के मूल्यों के अन्तः पारस्परिक सम्बन्ध को व्यक्त करते हुए, इसकी चर्चा कीजिये कि "सत्यनिष्ठा मूल्यों का मूल्य है |" (150-200 शब्द) While explaining the inter-relationship of the values of the public servants, discuss the "integrity is the value of values." (150-200 Words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में लोकसेवा को परिभाषित करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | प्रथम भाग में लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों में अंतरनिर्भरता का विश्लेषण कीजिये | अंतिम में सत्यनिष्ठा को परिभाषित करते हुए उससे मूल्यों के मूल्य के रूप में स्पष्ट कीजिये | उत्तर - सरकार के द्वारा नागरिकों को जिन सेवाओं को प्रदान किया जाता है उन्हें लोकसेवा कहते हैं| लोकसेवाओं का सम्बन्ध मौलिक रूप से नियामिकीय सेवा(कर संग्रह, न्याय प्रशासन तथा कानून एवं व्यवस्था), विकासात्मक सेवा( सामाजिक विकास-शिक्षा स्वास्थ्य आदि एवं आर्थिक विकास में कृषि परिवहन आदि),कल्याण सेवा(समाज के विशिष्ट वर्गों के लिए सेवा),एवं आपातकालीन सेवा(बाढ़,सूखा, आपदा आदि के दौरान प्रदत्त सेवायें) से होता है| संसदीय शासन व्यवस्था में प्रशासनिक नीतियों का निर्धारण मंत्रियों द्वारा किया जाता है परंतु देश का प्रशासनलोक सेवाअधिकारियों के एक विशाल समूह द्वारा चलाया जाता है| यही समूह लोकसेवा प्रदान करने के लिए उत्तरदायी होता है| अतः लोकसेवाओं के न्यायपूर्ण वितरण को सुनिश्चित करने के लिए लोकसेवकों से कुछ मूल्यों के अनुपालन की अपेक्षा की जाती है| लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों में अंतरनिर्भरता देखने को मिलती है| लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों में अन्तः पारस्परिक सम्बन्ध - लोकसेवकों के मूल्यों के चार मौलिक आयाम है यथा नैतिक मूल्य(सत्यनिष्ठा, इमानदारी, सम्मान, प्रोबिटी), मानवीय मूल्य(समानुभूति, करुणा, सहिष्णुता, मानवता), लोकतांत्रिक मूल्य(तटस्थता, जवाबदेहिता, समावेशिता, पारदर्शिता और विधि का शासन) एवं पेशेवर मूल्य(प्रभावशीलता, कार्यकुशलता, नवाचार, दक्षता, समर्पण, नेतृत्व)| इन मूल्यों में परस्पर अंतरनिर्भरता देखने को मिलती है| समर्पण प्रतिबद्धताके उच्चतम स्तर को दर्शाता है| अतः इसके अंतर्गत लोकसेवकों से यह अपेक्षा की जाती है कि अपना सम्पूर्ण समय, ध्यान, ऊर्जा एवं स्वतः अपने आप को लोकसेवा के प्रति केन्द्रित कर दे | सत्यनिष्ठा इस बात की मांग करती है कि लोकसेवकों के लिए लोक हित सर्वोपरि है एवं इस दिशा में लोकसेवकों के लिए समर्पण का होना आवश्यक है | एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक के लिएसमानुभूतियुक्त होना अति आवश्यक है ताकि इसके माध्यम से लोकसेवक विशेषकर समाज के कमजोर एवं संवेदनशील वर्गों की समस्याओं कावास्तविकविश्लेषण कर सके एवं इसके निराकरण की दिशा में प्रभावी नीतियों एवं कार्यक्रमों को लागू कर सके| जब समानुभूतिव्यवहार में परिवर्तित होती है तो उसेकरुणा (कम्पैशन)की संज्ञा दी जाती है| महात्मा गांधी के अनुसार, धार्मिक वह व्यक्ति होता है जो कि दूसरे की पीड़ा को समझता है | सत्यनिष्ठा यह मांग करती है कि लोकसेवकसहिष्णुताके मूल्य से युक्त हो| लोकसेवकों में समानुभूति एवं करुणा को प्राप्त करने हेतु सहिष्णुता का होना अति आवश्यक है विशेषकर भारत जैसे देश में जहाँ विचारों की बहुलता एवं विविधता अधिक हो | सत्यनिष्ठा यह मांग करती है कि लोकसेवक तटस्थ हो, यहाँतटस्थताका तात्पर्य लोकसेवकों को किसी भी एक राजनीतिक विचारधारा के प्रति वचनबद्ध नहीं होने से है| तटस्थ लोकसेवक की 3 मौलिक विशेषताएं होती हैं यथाभेदभावरहितता, गैर-तरफदारी एवं अनामिता| एक तटस्थ लोकसेवक से यह अपेक्षा की जाती है कि वहअनामिता(Anonymity)के मूल्य का भी अनुपालन करे यानी सरकार की नीतियों के साथ किसी भी लोकसेवक के नाम को प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित नहीं किया जाए| भेदभावरहित होने का आशय सबके प्रति(आम जनता के प्रति,राजनीतिक दलों के प्रति)समान व्यवहार से है| जबकि गैर-तरफदारी का आशय लोकसेवकों के द्वारा राजनीतिक गतिविधियों में भाग न लेने से है | भेदभावरहितता को प्राप्त करने हेतु लोकसेवकों मेंवस्तुनिष्ठताका होना अनिवार्य है|बिना वस्तुनिष्ठता के लोकसेवकों की सत्यनिष्ठा को प्राप्त किया जाना संभव नहीं है | उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों पारस्परिक अंतरनिर्भरता है| ध्यातव्य है कि एक लोक सेवक का व्यवहार एक लोक सेवक की तरह होना चाहिए एवं इसमें किसी भी प्रकार की कमी का होना या अभाव का होना सत्यनिष्ठा की कमी को दर्शाता है| अतः सत्यनिष्ठा एक व्यापक एवं सर्वांगीणमूल्य(Value)को दर्शाती है|मूल्य का आशय किसी व्यक्ति के मानसिक प्राथमिकता से है अर्थात उसकी पसंद या नापसंद से है| व्यक्तिगत स्तर पर प्राथमिकता उसके मानव होने की प्राथमिकता, संगठन की प्राथमिकता, सामाजिक प्राथमिकता आदि से मेल खानी चाहिए|मनसा वाचा कर्मणा समभाव ही सत्यनिष्ठा है| यह किसी लोकसेवा का आधारभूत मूल्य है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि सत्यनिष्ठा मूल्यों का मूल्य है|
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राज्य के मुख्य सचिव की भूमिका का वर्णन करते हुए संघीय कैबिनेट सचिव और राज्य के मुख्य सचिव की तुलनात्मक स्थिति को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द) Describing the role of the Chief Secretary of State,Explain the comparative position of Federal Cabinet Secretary and Chief Secretary of State, (150 to 200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में राज्य के मुख्य सचिव और संघीय कैबिनेट सचिव के बारे में सामान्य जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में राज्य के मुख्य सचिव की भूमिका को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में संघीय कैबिनेट सचिव के सापेक्ष राज्य के मुख्य सचिव की स्थिति को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में संघीय कैबिनेट सचिव का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत के संविधान में संसदीय प्रणाली की सरकार का प्रावधान है जिसमें मंत्रिमंडल को कार्यपालक का दर्जा प्राप्त है| प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल भारत सरकार के पूरे प्रशासन की जिम्मेदारी लेता है| इस कार्य में मंत्रिमंडल के सहायतार्थ मंत्रिमंडल(कैबिनेट) सचिवालय होता है |इस प्रकार कैबिनेट सचिवालय केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्टाफ एजेंसी है| यह भारत के प्रधानमंत्री के दिशानिर्देशन और नेतृत्व में कार्य करता है| केंद्र सरकार में उच्च स्तरीय नीति-निर्धारण प्रक्रिया में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है| दूसरी ओर राज्य का मुख्य सचिव राज्य का वरिष्ठ अथवा वरिष्ठतम IAS अधिकारी होता हैइसका चुनाव मुख्यमंत्री द्वारा किया जाता है| इस सन्दर्भ में मुख्यमंत्री तीन बातों को ध्यान में रखता है यथा; वह प्रशासनिक मामले में राज्य का बहुत अनुभवी IAS अधिकारी हो; वह जटिल समस्याओं को हल करने में कुशल हो अर्थात वह प्रशासन के विभिन्न पहलुओं से चिरपरिचित हो (प्रशासनिक योग्यता से संपन्न) तथा वह मुख्यमंत्री का विश्वासपात्र हो| ध्यातव्य है कि राज्य का मुख्या सचिव मुख्यमंत्री सहित अन्य सभी उच्चाधिकारियों एवं मीडिया से प्रत्यक्ष अंतःक्रिया करता है| अतः राज्य के प्रशासन में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है| राज्य के मुख्य सचिव की प्रमुख भूमिकायें मुख्यमंत्री का सबसे विश्वासपात्र सिविल सेवक होने के कारण वह नीति निर्धारण में प्रमुख भूमिका निभाता है वह राज्य की कैबिनेट का भी सचिव होता है,वह राज्य सिविल सेवा का प्रधान होता है वह नीति कार्यान्वयन पर निगरानी रखता है और प्रगति की समीक्षा करता है वह किसी भी मंत्रालय अथवा विभाग के किसी भी वरिष्ठ पदाधिकारी को कभी भी बुला सकता है और उनसे सम्बन्धित विभाग की कमियों के बारे में जानकारी मांग सकता है और संतुष्ट न होने पर वह उनके विरुद्ध कार्यवाही भी कर सकता है| वह सरकार के किसी भी नीति कार्यक्रम या परियोजना को सफल बनाने के लिए सीधे उत्तरदायी होता है वह राज्य के विभिन्न विभागों अथवा दूसरे राज्यों अथवा केंद्र के साथ समन्वय स्थापित करने के लिए भी उत्तरदायी होता है राज्य लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति, राज्य लोकायुक्त की नियुक्ति करते समय मुख्यमंत्री उससे परामर्श करता है वह राज्य राज्य सरकार का जनसम्पर्क अधिकारी भी होता है| इसीलिए मीडिया प्रबंधन का दायित्व भी उसी पर होता है| इस तरह से वह राज्य के प्रशासन के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है तथा कुछ सन्दर्भों में वह सघीय कैबिनेट सचिव की अपेक्षा सशक्त स्थिति में होता है जिसे निम्नलिखित विश्लेषण से समझ सकते हैं कैबिनेट सचिव बनाम राज्य का मुख्य सचिव कैबिनेट सचिव यद्यपि कि देश का सबसे वरिष्ठ नौकरशाह होता है किन्तु वह सबसे शक्तिशाली नौकरशाह नहीं होता है क्योंकि सीधे उसके अधीन कोई विभाग या मंत्रालय नहीं होते हैं| दूसरी ओर राज्य का मुख्य सचिव न केवल राज्य का सबसे वरिष्ठ नौकरशाह होता है बल्कि वह राज्य सिविल सेवा का प्रधान भी होता है| साथ ही उसके अधीन चार विभाग होते हैं यथा; कार्मिक, पेंशन और लोक शिकायत विभाग, सूचना विभाग, नियोजन विभाग तथा सामान्य प्रशासन विभाग| कैबिनेट सचिव की शक्तियां बहुत सीमा तक प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा सीमित कर दी जाती हैं किन्तु राज्य में मुख सचिव न केवल कैबिनेट सचिव की भूमिका निभाता है बल्कि वह मुख्यमंत्री के निजी सचिवालय का भी प्रधान होता है|यही कारण है कि मुख्य सचिव की नियुक्ति मुख्यमंत्री द्वारा अपने सबसे विश्वसनीय नौकरशाहों में से की जाती है| कैबिनेट सचिव सीधे किसी विभाग या मंत्रालय को किसी सरकारी काम के लिए आदेश नहीं दे सकता| दूसरी ओर राज्य का मुख्य सचिव राज्य के अधीन आने वाले सभी विभाग, मंत्रालय आदि के पदाधिकारियों को उपरोक्त निर्देश दे सकता है| कैबिनेट सचिव किसी मंत्रालय या विभाग के सिविल सेवक के विरुद्ध सीधे कोई अनुशासनात्मक कार्यवाई नहीं कर सकता जबकि राज्य का मुख्य सचिव यह कार्य कर सकता है| और केंद्र का कैबिनेट सचिव अपने सचिवालय के बाहर मीडिया, जनप्रतिनिधि, आम नागरिक, पत्रकार और उनके शिष्टमंडल, प्रशासनिक सचिव, पुलिस विभाग के प्रमुख आदि के साथ सीढ़ी अंतर्क्रिया नहीं कर पाता| दूसरी ओर राज्य का मुख्य सचिव इनसे निरंतर अंतर्क्रिया करता रहता है| इनकी समस्याएं सुनता है और अपने स्तर से उन्हें हल भी करता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि राज्यों केमुख्य सचिव की अपेक्षाकैबिनेट सचिवों को कम शक्तियां प्राप्त होती हैं किन्तुअपनी बहुविध एवं महत्वपूर्ण भूमिका के माध्यम से कैबिनेट सचिवालय कार्यपालिका की प्रभावशीलता बढाने में एक सहायक निकाय के रूप में कार्य करता है|
##Question:राज्य के मुख्य सचिव की भूमिका का वर्णन करते हुए संघीय कैबिनेट सचिव और राज्य के मुख्य सचिव की तुलनात्मक स्थिति को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द) Describing the role of the Chief Secretary of State,Explain the comparative position of Federal Cabinet Secretary and Chief Secretary of State, (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में राज्य के मुख्य सचिव और संघीय कैबिनेट सचिव के बारे में सामान्य जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में राज्य के मुख्य सचिव की भूमिका को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में संघीय कैबिनेट सचिव के सापेक्ष राज्य के मुख्य सचिव की स्थिति को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में संघीय कैबिनेट सचिव का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत के संविधान में संसदीय प्रणाली की सरकार का प्रावधान है जिसमें मंत्रिमंडल को कार्यपालक का दर्जा प्राप्त है| प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल भारत सरकार के पूरे प्रशासन की जिम्मेदारी लेता है| इस कार्य में मंत्रिमंडल के सहायतार्थ मंत्रिमंडल(कैबिनेट) सचिवालय होता है |इस प्रकार कैबिनेट सचिवालय केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्टाफ एजेंसी है| यह भारत के प्रधानमंत्री के दिशानिर्देशन और नेतृत्व में कार्य करता है| केंद्र सरकार में उच्च स्तरीय नीति-निर्धारण प्रक्रिया में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है| दूसरी ओर राज्य का मुख्य सचिव राज्य का वरिष्ठ अथवा वरिष्ठतम IAS अधिकारी होता हैइसका चुनाव मुख्यमंत्री द्वारा किया जाता है| इस सन्दर्भ में मुख्यमंत्री तीन बातों को ध्यान में रखता है यथा; वह प्रशासनिक मामले में राज्य का बहुत अनुभवी IAS अधिकारी हो; वह जटिल समस्याओं को हल करने में कुशल हो अर्थात वह प्रशासन के विभिन्न पहलुओं से चिरपरिचित हो (प्रशासनिक योग्यता से संपन्न) तथा वह मुख्यमंत्री का विश्वासपात्र हो| ध्यातव्य है कि राज्य का मुख्या सचिव मुख्यमंत्री सहित अन्य सभी उच्चाधिकारियों एवं मीडिया से प्रत्यक्ष अंतःक्रिया करता है| अतः राज्य के प्रशासन में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है| राज्य के मुख्य सचिव की प्रमुख भूमिकायें मुख्यमंत्री का सबसे विश्वासपात्र सिविल सेवक होने के कारण वह नीति निर्धारण में प्रमुख भूमिका निभाता है वह राज्य की कैबिनेट का भी सचिव होता है,वह राज्य सिविल सेवा का प्रधान होता है वह नीति कार्यान्वयन पर निगरानी रखता है और प्रगति की समीक्षा करता है वह किसी भी मंत्रालय अथवा विभाग के किसी भी वरिष्ठ पदाधिकारी को कभी भी बुला सकता है और उनसे सम्बन्धित विभाग की कमियों के बारे में जानकारी मांग सकता है और संतुष्ट न होने पर वह उनके विरुद्ध कार्यवाही भी कर सकता है| वह सरकार के किसी भी नीति कार्यक्रम या परियोजना को सफल बनाने के लिए सीधे उत्तरदायी होता है वह राज्य के विभिन्न विभागों अथवा दूसरे राज्यों अथवा केंद्र के साथ समन्वय स्थापित करने के लिए भी उत्तरदायी होता है राज्य लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति, राज्य लोकायुक्त की नियुक्ति करते समय मुख्यमंत्री उससे परामर्श करता है वह राज्य राज्य सरकार का जनसम्पर्क अधिकारी भी होता है| इसीलिए मीडिया प्रबंधन का दायित्व भी उसी पर होता है| इस तरह से वह राज्य के प्रशासन के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है तथा कुछ सन्दर्भों में वह सघीय कैबिनेट सचिव की अपेक्षा सशक्त स्थिति में होता है जिसे निम्नलिखित विश्लेषण से समझ सकते हैं कैबिनेट सचिव बनाम राज्य का मुख्य सचिव कैबिनेट सचिव यद्यपि कि देश का सबसे वरिष्ठ नौकरशाह होता है किन्तु वह सबसे शक्तिशाली नौकरशाह नहीं होता है क्योंकि सीधे उसके अधीन कोई विभाग या मंत्रालय नहीं होते हैं| दूसरी ओर राज्य का मुख्य सचिव न केवल राज्य का सबसे वरिष्ठ नौकरशाह होता है बल्कि वह राज्य सिविल सेवा का प्रधान भी होता है| साथ ही उसके अधीन चार विभाग होते हैं यथा; कार्मिक, पेंशन और लोक शिकायत विभाग, सूचना विभाग, नियोजन विभाग तथा सामान्य प्रशासन विभाग| कैबिनेट सचिव की शक्तियां बहुत सीमा तक प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा सीमित कर दी जाती हैं किन्तु राज्य में मुख सचिव न केवल कैबिनेट सचिव की भूमिका निभाता है बल्कि वह मुख्यमंत्री के निजी सचिवालय का भी प्रधान होता है|यही कारण है कि मुख्य सचिव की नियुक्ति मुख्यमंत्री द्वारा अपने सबसे विश्वसनीय नौकरशाहों में से की जाती है| कैबिनेट सचिव सीधे किसी विभाग या मंत्रालय को किसी सरकारी काम के लिए आदेश नहीं दे सकता| दूसरी ओर राज्य का मुख्य सचिव राज्य के अधीन आने वाले सभी विभाग, मंत्रालय आदि के पदाधिकारियों को उपरोक्त निर्देश दे सकता है| कैबिनेट सचिव किसी मंत्रालय या विभाग के सिविल सेवक के विरुद्ध सीधे कोई अनुशासनात्मक कार्यवाई नहीं कर सकता जबकि राज्य का मुख्य सचिव यह कार्य कर सकता है| और केंद्र का कैबिनेट सचिव अपने सचिवालय के बाहर मीडिया, जनप्रतिनिधि, आम नागरिक, पत्रकार और उनके शिष्टमंडल, प्रशासनिक सचिव, पुलिस विभाग के प्रमुख आदि के साथ सीढ़ी अंतर्क्रिया नहीं कर पाता| दूसरी ओर राज्य का मुख्य सचिव इनसे निरंतर अंतर्क्रिया करता रहता है| इनकी समस्याएं सुनता है और अपने स्तर से उन्हें हल भी करता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि राज्यों केमुख्य सचिव की अपेक्षाकैबिनेट सचिवों को कम शक्तियां प्राप्त होती हैं किन्तुअपनी बहुविध एवं महत्वपूर्ण भूमिका के माध्यम से कैबिनेट सचिवालय कार्यपालिका की प्रभावशीलता बढाने में एक सहायक निकाय के रूप में कार्य करता है|
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भारतीय न्यायप्रणाली की जटिल प्रकृति लोकतान्त्रिक मूल्यों को विकृत कर देती है। ऐसी स्थिति में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय को सूचना के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत लाना कहाँ तक तर्कसंगत है। (150-200 शब्द) The complex nature of the Indian judiciary distorts democratic values. In such a situation, How far is it reasonable to bring the office of the Chief Justice of the Supreme Court under the Right to Information Act? (150-200 words)
संक्षिप्त दृष्टिकोण भूमिका में न्याय प्रणाली की स्थिति के बारे लिखिए। इसके बाद स्पष्ट कीजिये कि यह कैसे लोकतान्त्रिक मूल्यों को विकृत करती है। दूसरे में भाग में CJI को आरटीआई के अंतर्गत लाने के पक्ष-विपक्ष में चर्चा कीजिए। सुझाव देते हुए निष्कर्ष लिखिए। भारतीय न्यायपालिका बहुस्तरीय है जिसमें सर्वोच्च न्यायालय न्याय प्रदान करने की उच्चतम संस्था है। इसके नीचे उच्च न्यायालय, अधीनस्थ न्यायालय आते हैं। न्यायपालिका की जटिल प्रकृति लोकतान्त्रिक मूल्यों को इस प्रकार से विकृत करती है: न्यायालय में तीन करोड़ से भी अधिक मामले लंबित हैं। यह न्याय प्रदान करने के स्वयं के उद्देश्यों का विरोधाभास है। न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता का अभाव है। कोलेजियम के निर्णय सार्वजनिक नहीं किए जाते हैं न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार के मामले। जैसे- सी कर्णन, सौमित्र सेन न्यायिक नियुक्तियों में परिवारवाद को महत्व देना आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 के अनुसार इज ऑफ डूइंग बिज़नस में खराब रैंकिंग के लिए न्यायपालिका भी काफी सीमा तक उत्तरदाई है गौरतलब है कि सूचना के अधिकार के अंतर्गत न्यायपालिका को शामिल नहीं किया गया है। हाल ही में उच्चतम न्यायालय CJI कार्यालय को इस अधिनियम के दायरे में लाने जा निर्णय दिया है। इसके पश्चात वाद-विवाद उतपान हुआ है। पक्ष में तर्क: पारदर्शिता किसी भी संस्था में सुशासन के लिए महत्वपूर्ण घटक है। इस निर्णय न्यायपालिका में पारदर्शिता बढ़ेगी। न्यायपालिका एक सार्वजनिक संस्था होने के कारण इस अधिनियम में अपवाद नहीं हो सकती है। इस निर्णय से आरटीआई की स्वीकार्यता में वृद्धि होगी सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्तियों, मामलों के आवंटन संबंधी जानकारी अब प्राप्त की जा सकती है कार्यालयी कार्यों में पारदर्शिता आएगी जैसे- स्टाफ की नियुक्ति, वेतन भत्ते आदि के संबंध में निर्णय न्यायालय का मानना है कि पारदर्शिता स्वतन्त्रता में बाधक नहीं हो सकती है। हालांकि इस निर्णय के संबंध में कुछ आशंकायें भी विद्यमान हैं जैसे- नियुक्ति से संबन्धित प्रक्रिया में के बारे में जानकारी नहीं मांगी जा सकती है। सूचना के अधिकार का दुरुपयोग न्यायपालिका की छवि धूमिल कर सकती है। संवेदनशील मामलों में मांगी गयी सूचना कार्यपालिका और न्यपालिका के मध्य तनाव उत्पन्न कर करेगी जो शक्ति के पृथक्करण के सिद्धान्त के विपरीत होगा। अतः इस प्रकार का निर्णय निश्चित ही न्यायपालिका की परदर्शिता में वृद्धि की दिशा में एक सार्थक कदम है। चूंकि आरटीआई अधिनियम इस पर पूर्ण रूप से लागू नहीं हुआ है अतः आवश्यक है कि उन प्रमुख विषयों को स्पष्ट रूप से उल्लेख किया जाए जिस पर जानकारी प्राप्त की जा सकती है। साथ में न्यायपालिका को पारदर्शिता में वृद्धि के लिए स्वयं ही कुछ मामलों को सार्वजनिक करना चाहिए।
##Question:भारतीय न्यायप्रणाली की जटिल प्रकृति लोकतान्त्रिक मूल्यों को विकृत कर देती है। ऐसी स्थिति में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय को सूचना के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत लाना कहाँ तक तर्कसंगत है। (150-200 शब्द) The complex nature of the Indian judiciary distorts democratic values. In such a situation, How far is it reasonable to bring the office of the Chief Justice of the Supreme Court under the Right to Information Act? (150-200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण भूमिका में न्याय प्रणाली की स्थिति के बारे लिखिए। इसके बाद स्पष्ट कीजिये कि यह कैसे लोकतान्त्रिक मूल्यों को विकृत करती है। दूसरे में भाग में CJI को आरटीआई के अंतर्गत लाने के पक्ष-विपक्ष में चर्चा कीजिए। सुझाव देते हुए निष्कर्ष लिखिए। भारतीय न्यायपालिका बहुस्तरीय है जिसमें सर्वोच्च न्यायालय न्याय प्रदान करने की उच्चतम संस्था है। इसके नीचे उच्च न्यायालय, अधीनस्थ न्यायालय आते हैं। न्यायपालिका की जटिल प्रकृति लोकतान्त्रिक मूल्यों को इस प्रकार से विकृत करती है: न्यायालय में तीन करोड़ से भी अधिक मामले लंबित हैं। यह न्याय प्रदान करने के स्वयं के उद्देश्यों का विरोधाभास है। न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता का अभाव है। कोलेजियम के निर्णय सार्वजनिक नहीं किए जाते हैं न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार के मामले। जैसे- सी कर्णन, सौमित्र सेन न्यायिक नियुक्तियों में परिवारवाद को महत्व देना आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 के अनुसार इज ऑफ डूइंग बिज़नस में खराब रैंकिंग के लिए न्यायपालिका भी काफी सीमा तक उत्तरदाई है गौरतलब है कि सूचना के अधिकार के अंतर्गत न्यायपालिका को शामिल नहीं किया गया है। हाल ही में उच्चतम न्यायालय CJI कार्यालय को इस अधिनियम के दायरे में लाने जा निर्णय दिया है। इसके पश्चात वाद-विवाद उतपान हुआ है। पक्ष में तर्क: पारदर्शिता किसी भी संस्था में सुशासन के लिए महत्वपूर्ण घटक है। इस निर्णय न्यायपालिका में पारदर्शिता बढ़ेगी। न्यायपालिका एक सार्वजनिक संस्था होने के कारण इस अधिनियम में अपवाद नहीं हो सकती है। इस निर्णय से आरटीआई की स्वीकार्यता में वृद्धि होगी सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्तियों, मामलों के आवंटन संबंधी जानकारी अब प्राप्त की जा सकती है कार्यालयी कार्यों में पारदर्शिता आएगी जैसे- स्टाफ की नियुक्ति, वेतन भत्ते आदि के संबंध में निर्णय न्यायालय का मानना है कि पारदर्शिता स्वतन्त्रता में बाधक नहीं हो सकती है। हालांकि इस निर्णय के संबंध में कुछ आशंकायें भी विद्यमान हैं जैसे- नियुक्ति से संबन्धित प्रक्रिया में के बारे में जानकारी नहीं मांगी जा सकती है। सूचना के अधिकार का दुरुपयोग न्यायपालिका की छवि धूमिल कर सकती है। संवेदनशील मामलों में मांगी गयी सूचना कार्यपालिका और न्यपालिका के मध्य तनाव उत्पन्न कर करेगी जो शक्ति के पृथक्करण के सिद्धान्त के विपरीत होगा। अतः इस प्रकार का निर्णय निश्चित ही न्यायपालिका की परदर्शिता में वृद्धि की दिशा में एक सार्थक कदम है। चूंकि आरटीआई अधिनियम इस पर पूर्ण रूप से लागू नहीं हुआ है अतः आवश्यक है कि उन प्रमुख विषयों को स्पष्ट रूप से उल्लेख किया जाए जिस पर जानकारी प्राप्त की जा सकती है। साथ में न्यायपालिका को पारदर्शिता में वृद्धि के लिए स्वयं ही कुछ मामलों को सार्वजनिक करना चाहिए।
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लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक ही साथ करवाने के पक्ष एवं विपक्ष में अपने मत प्रस्तुत कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) Write the argumentsin favor and opposition of holding elections to Lok Sabha and state assemblies at the same time. (150-200 Words; 10 Marks)
एप्रोच- भारत में चुनावों की बारम्बारता की पृष्ठभूमि से उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में, लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक ही साथ करवाने की आवश्यकता/लाभों का बिंदुबार उल्लेख कीजिये| अगले भाग में, एक साथ चुनाव करवाने से उत्पन चुनौतियों या विपक्ष में तर्कों को स्पष्ट कीजिये| इस संदर्भ में अपनी एक संतुलित राय के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- भारत को अगर चुनावों का देश कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी| हर वर्ष या तो किसी ना किसी राज्य में या संसद हेतु चुनाव होते ही रहते हैं| चुनावों की इस निरंतरता के कारण राजनीतिक कार्यपालिका एवं प्रशासन दोनों चुनावी मोड में ही बने रहते हैं| चुनाव आचार संहिता लागू होने के कारण नाकेवल प्रशासनिक और नीतिगत निर्णय प्रभावित होते हैं बल्कि देश के खजाने पर भी भारी बोझ भी पड़ता है। पिछले कुछ वर्षों से वर्तमान प्रधानमंत्री लगातार एक साथ चुनावों के बारे में बात कर रहे हैं। संसद की स्थायी समिति कीरिपोर्टों में भी आदर्श आचार संहिता के प्रभाव के कारण जनता के पैसे बचाने और नीतिगत पक्षाघात को रोकने के लिए एक साथ चुनाव कराने का सुझाव दिया गया है| एक देश-एक चुनाव के पक्ष में तर्क/लाभ एक साथ लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनाव होने से सार्वजनिक धन की बचत होगी, प्रशासनिक सेटअप और सुरक्षा बलों पर भार कम होगा, सरकार की नीतियों का समय पर कार्यान्वयन सुनिश्चित हो सकेगा और यह भी सुनिश्चित होगा कि प्रशासनिक मशीनरी चुनावी गतिविधियों में संलग्न रहने के बजाय विकासात्मक गतिविधियों में लगी रहे| मतदाता सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों को राज्य और केंद्रीय दोनों स्तरों पर परख सकेंगे। इसके अलावा, मतदाताओं के लिये यह तय करने में आसानी होगी कि किस राजनीतिक दल ने क्या वादे किये थे और वह उन पर कितना खरा उतरा। प्रायः यह देखा जाता है कि किसी विशेष विधानसभा चुनाव में अल्पकालिक राजनीतिक लाभ उठाने के लिये सत्तारूढ़ राजनेता ऐसे कठोर दीर्घकालिक निर्णय लेने से बचते हैं, जो अंततः देश को लंबे समय में मदद कर सकता है।एक साथ चुनाव होने से चुनी हुई सरकार को अपने विकास के एजेंडे को पूरा करने और कुछ मजबूत और अलोकप्रिय फैसले लेने के लिए पांच साल का समय मिलता है। पाँच साल में एक बार चुनाव कराने से सभी हितधारकों यानी राजनीतिक दलों, निर्वाचन आयोग, अर्द्धसैनिक बलों, नागरिकों को इसकी तैयारी के लिये अधिक समय मिल सकता है। भारत में चुनाव करवाने पर काफी ज्यादा व्यय आता है| एक साथ चुनाव कराने से खर्च को कम किया जा सकता है। लॉ कमिशन ने अपनी 170 वीं रिपोर्ट {रिफॉर्म ऑफ इलेक्टोरल लॉज़ (1999)} के माध्यम से भी शासन में स्थिरता के लिए सभी स्तरों पर एक साथ चुनाव कराने का सुझाव दिया था। बार-बार चुनाव सामान्य सार्वजनिक जीवन को बाधित करते हैं और आवश्यक सेवाओं के कामकाज को प्रभावित करते हैं। इसके अलावा, लगातार चुनावों से राजनीतिक रैलियों द्वारा सड़क यातायात में बार-बार व्यवधान होता है और ध्वनि प्रदूषण भी होता है। विशेष रूप से शिक्षकों की लंबे समय तक चुनाव ड्यूटी पर तैनात किया जाता है। यदि एक साथ चुनाव होते हैं, तो यह जनशक्ति अन्य महत्वपूर्ण कार्यों के लिए उपलब्ध कराई जाएगी। चुनाव में बड़ी मात्रा में खर्च होने वाला धन भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले कारणों में सबसे ऊपर है। ऐसे में चुनाव की बारंबारता में रोक भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मज़बूत कदम साबित हो सकता है। एक साथ चुनाव करवाने से उत्पन चुनौतियां या विपक्ष में तर्क सबसे बड़ी चुनौती लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को समन्वित करने की है, ताकि दोनों का चुनाव निश्चित समय के भीतर हो सके। राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को लोकसभा के साथ समन्वित करने के लिये उनके कार्यकाल को तदनुसार घटाया और बढ़ाया जाना होगा| लेकिन इसके लिये कुछ संवैधानिक संशोधनों की आवश्यकता होगी- अनुच्छेद 83; अनुच्छेद 85;अनुच्छेद 172;अनुच्छेद 174;अनुच्छेद 356 आदि| इन संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों में संशोधन के लिए व्यापक सहमति की आवश्यकता होगी। अगर एक बार दोनों के चुनावों को एक सह करवा भी लिया जाता है तो इसकी कोई गारंटी नहीं होगी कि अगली बार भी वे चुनाव एक साथ ही होंगे क्योंकि कोई विधानसभा समयपूर्व भी विघटित हो सकती है| इनके अलावाजनप्रतिनिधित्वअधिनियमके साथ-साथ संबंधितसंसदीय प्रक्रियामें भी संशोधन करना होगा। ‘एक देश-एक चुनाव’ के लिये सभी राजनीतिक दलों को राज़ी करना आसान काम नहीं है। कुछ राजनीतिक विशेषज्ञों का यह मानना है कि ‘एक देश-एक चुनाव’ की आवधारणा देश के संघात्मक ढाँचे के विपरीत सिद्ध हो सकती है| भारत में मतदाताओं की एक बड़ी संख्या यह जानने के लिए उच्च शिक्षित नहीं हैं कि किसे वोट देना है| एक साथ चुनाव होने से वे भ्रमित हो सकते हैं कि वे किसके लिए अपना वोट दे रहे हैं- संबंधित लोकसभा उम्मीदवार के लिए या विधानसभा उम्मीदवार के लिए| बार-बार चुनाव राजनेताओं को मतदाताओं के पास वापस लाते हैं| कुछ नौकरियां पैदा करते हैं(हालांकि अस्थायी) और मतदाताओं के दिमाग में स्थानीय और राष्ट्रीय मुद्दों के मिश्रण को रोकते हैं| लॉजिस्टिक संबंधी चुनौतियाँ वर्तमान में मतदान करने के लिये प्रत्येक मतदान केंद्र पर एक EVM का उपयोग एक VVPAT मशीन के साथ किया जा रहा है। लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने पर इनकी संख्या दोगुनी हो जाएगी। देश भर में एक साथ स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए पर्याप्त सुरक्षा और प्रशासनिक अधिकारियों की कमी है। अतिरिक्त मतदान कर्मियों के साथ बेहतर और चाक-चौबंद सुरक्षा व्यवस्था की आवश्यकता होगी और यह काम केंद्रीय पुलिस बलों की संख्या बढ़ाए बिना करना संभव नहीं है। एक साथ इतनी बड़ी संख्या में EVM और VVPAT मशीनों को सुरक्षित रखना भी एक बड़ी चुनौती होगा, क्योंकि निर्वाचन आयोग को वर्तमान में ही इन्हें सुरक्षित रखने की समस्या से जूझना पड़ रहा है। एक साथ चुनाव करवाने से निःसंदेह भारतीय लोकतंत्र को व्यापक लाभ पहुँच सकता है लेकिन उसके लिए पहले उपरोक्त चुनौतियों को पार करना होगा| संसदीय स्थायी समिति द्वारा जारी एक रिपोर्ट (जिसका समर्थन नीति आयोग ने भी किया है) में इसके लिए एक रास्ता सुझाया गया है- चुनावों को 2 फेज में करवाना | एक फेज का चुनाव लोकसभा के साथ हो तथा दूसरे फेज(मिड-टर्म) में उन विधानसभाओं के चुनाव हों जिनका समयपूर्व विघटन हुआ हो| जिन विधानसभाओं का समयपूर्व विघटन हुआ हो उनके चुनाव के बाद बने विधानसभा के कार्यकाल को पुरानी विधानसभा के कार्यकाल तक ही सीमित करके एक देश-एक चुनाव का सपना व्यवहारिक रूप ले सकता है|
##Question:लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक ही साथ करवाने के पक्ष एवं विपक्ष में अपने मत प्रस्तुत कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) Write the argumentsin favor and opposition of holding elections to Lok Sabha and state assemblies at the same time. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- भारत में चुनावों की बारम्बारता की पृष्ठभूमि से उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में, लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक ही साथ करवाने की आवश्यकता/लाभों का बिंदुबार उल्लेख कीजिये| अगले भाग में, एक साथ चुनाव करवाने से उत्पन चुनौतियों या विपक्ष में तर्कों को स्पष्ट कीजिये| इस संदर्भ में अपनी एक संतुलित राय के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- भारत को अगर चुनावों का देश कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी| हर वर्ष या तो किसी ना किसी राज्य में या संसद हेतु चुनाव होते ही रहते हैं| चुनावों की इस निरंतरता के कारण राजनीतिक कार्यपालिका एवं प्रशासन दोनों चुनावी मोड में ही बने रहते हैं| चुनाव आचार संहिता लागू होने के कारण नाकेवल प्रशासनिक और नीतिगत निर्णय प्रभावित होते हैं बल्कि देश के खजाने पर भी भारी बोझ भी पड़ता है। पिछले कुछ वर्षों से वर्तमान प्रधानमंत्री लगातार एक साथ चुनावों के बारे में बात कर रहे हैं। संसद की स्थायी समिति कीरिपोर्टों में भी आदर्श आचार संहिता के प्रभाव के कारण जनता के पैसे बचाने और नीतिगत पक्षाघात को रोकने के लिए एक साथ चुनाव कराने का सुझाव दिया गया है| एक देश-एक चुनाव के पक्ष में तर्क/लाभ एक साथ लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनाव होने से सार्वजनिक धन की बचत होगी, प्रशासनिक सेटअप और सुरक्षा बलों पर भार कम होगा, सरकार की नीतियों का समय पर कार्यान्वयन सुनिश्चित हो सकेगा और यह भी सुनिश्चित होगा कि प्रशासनिक मशीनरी चुनावी गतिविधियों में संलग्न रहने के बजाय विकासात्मक गतिविधियों में लगी रहे| मतदाता सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों को राज्य और केंद्रीय दोनों स्तरों पर परख सकेंगे। इसके अलावा, मतदाताओं के लिये यह तय करने में आसानी होगी कि किस राजनीतिक दल ने क्या वादे किये थे और वह उन पर कितना खरा उतरा। प्रायः यह देखा जाता है कि किसी विशेष विधानसभा चुनाव में अल्पकालिक राजनीतिक लाभ उठाने के लिये सत्तारूढ़ राजनेता ऐसे कठोर दीर्घकालिक निर्णय लेने से बचते हैं, जो अंततः देश को लंबे समय में मदद कर सकता है।एक साथ चुनाव होने से चुनी हुई सरकार को अपने विकास के एजेंडे को पूरा करने और कुछ मजबूत और अलोकप्रिय फैसले लेने के लिए पांच साल का समय मिलता है। पाँच साल में एक बार चुनाव कराने से सभी हितधारकों यानी राजनीतिक दलों, निर्वाचन आयोग, अर्द्धसैनिक बलों, नागरिकों को इसकी तैयारी के लिये अधिक समय मिल सकता है। भारत में चुनाव करवाने पर काफी ज्यादा व्यय आता है| एक साथ चुनाव कराने से खर्च को कम किया जा सकता है। लॉ कमिशन ने अपनी 170 वीं रिपोर्ट {रिफॉर्म ऑफ इलेक्टोरल लॉज़ (1999)} के माध्यम से भी शासन में स्थिरता के लिए सभी स्तरों पर एक साथ चुनाव कराने का सुझाव दिया था। बार-बार चुनाव सामान्य सार्वजनिक जीवन को बाधित करते हैं और आवश्यक सेवाओं के कामकाज को प्रभावित करते हैं। इसके अलावा, लगातार चुनावों से राजनीतिक रैलियों द्वारा सड़क यातायात में बार-बार व्यवधान होता है और ध्वनि प्रदूषण भी होता है। विशेष रूप से शिक्षकों की लंबे समय तक चुनाव ड्यूटी पर तैनात किया जाता है। यदि एक साथ चुनाव होते हैं, तो यह जनशक्ति अन्य महत्वपूर्ण कार्यों के लिए उपलब्ध कराई जाएगी। चुनाव में बड़ी मात्रा में खर्च होने वाला धन भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले कारणों में सबसे ऊपर है। ऐसे में चुनाव की बारंबारता में रोक भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मज़बूत कदम साबित हो सकता है। एक साथ चुनाव करवाने से उत्पन चुनौतियां या विपक्ष में तर्क सबसे बड़ी चुनौती लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को समन्वित करने की है, ताकि दोनों का चुनाव निश्चित समय के भीतर हो सके। राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को लोकसभा के साथ समन्वित करने के लिये उनके कार्यकाल को तदनुसार घटाया और बढ़ाया जाना होगा| लेकिन इसके लिये कुछ संवैधानिक संशोधनों की आवश्यकता होगी- अनुच्छेद 83; अनुच्छेद 85;अनुच्छेद 172;अनुच्छेद 174;अनुच्छेद 356 आदि| इन संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों में संशोधन के लिए व्यापक सहमति की आवश्यकता होगी। अगर एक बार दोनों के चुनावों को एक सह करवा भी लिया जाता है तो इसकी कोई गारंटी नहीं होगी कि अगली बार भी वे चुनाव एक साथ ही होंगे क्योंकि कोई विधानसभा समयपूर्व भी विघटित हो सकती है| इनके अलावाजनप्रतिनिधित्वअधिनियमके साथ-साथ संबंधितसंसदीय प्रक्रियामें भी संशोधन करना होगा। ‘एक देश-एक चुनाव’ के लिये सभी राजनीतिक दलों को राज़ी करना आसान काम नहीं है। कुछ राजनीतिक विशेषज्ञों का यह मानना है कि ‘एक देश-एक चुनाव’ की आवधारणा देश के संघात्मक ढाँचे के विपरीत सिद्ध हो सकती है| भारत में मतदाताओं की एक बड़ी संख्या यह जानने के लिए उच्च शिक्षित नहीं हैं कि किसे वोट देना है| एक साथ चुनाव होने से वे भ्रमित हो सकते हैं कि वे किसके लिए अपना वोट दे रहे हैं- संबंधित लोकसभा उम्मीदवार के लिए या विधानसभा उम्मीदवार के लिए| बार-बार चुनाव राजनेताओं को मतदाताओं के पास वापस लाते हैं| कुछ नौकरियां पैदा करते हैं(हालांकि अस्थायी) और मतदाताओं के दिमाग में स्थानीय और राष्ट्रीय मुद्दों के मिश्रण को रोकते हैं| लॉजिस्टिक संबंधी चुनौतियाँ वर्तमान में मतदान करने के लिये प्रत्येक मतदान केंद्र पर एक EVM का उपयोग एक VVPAT मशीन के साथ किया जा रहा है। लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने पर इनकी संख्या दोगुनी हो जाएगी। देश भर में एक साथ स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए पर्याप्त सुरक्षा और प्रशासनिक अधिकारियों की कमी है। अतिरिक्त मतदान कर्मियों के साथ बेहतर और चाक-चौबंद सुरक्षा व्यवस्था की आवश्यकता होगी और यह काम केंद्रीय पुलिस बलों की संख्या बढ़ाए बिना करना संभव नहीं है। एक साथ इतनी बड़ी संख्या में EVM और VVPAT मशीनों को सुरक्षित रखना भी एक बड़ी चुनौती होगा, क्योंकि निर्वाचन आयोग को वर्तमान में ही इन्हें सुरक्षित रखने की समस्या से जूझना पड़ रहा है। एक साथ चुनाव करवाने से निःसंदेह भारतीय लोकतंत्र को व्यापक लाभ पहुँच सकता है लेकिन उसके लिए पहले उपरोक्त चुनौतियों को पार करना होगा| संसदीय स्थायी समिति द्वारा जारी एक रिपोर्ट (जिसका समर्थन नीति आयोग ने भी किया है) में इसके लिए एक रास्ता सुझाया गया है- चुनावों को 2 फेज में करवाना | एक फेज का चुनाव लोकसभा के साथ हो तथा दूसरे फेज(मिड-टर्म) में उन विधानसभाओं के चुनाव हों जिनका समयपूर्व विघटन हुआ हो| जिन विधानसभाओं का समयपूर्व विघटन हुआ हो उनके चुनाव के बाद बने विधानसभा के कार्यकाल को पुरानी विधानसभा के कार्यकाल तक ही सीमित करके एक देश-एक चुनाव का सपना व्यवहारिक रूप ले सकता है|
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मथुरा एवं गांधार मूर्तिकला शैलियों के विकास की पृष्ठभूमि और इनकी विशेषताओं को स्पष्ट कीजिये |(150 से 200 शब्द, 10 अंक) Explain the background and characteristics of the development of Mathura and Gandhara sculpture styles. (150 to 200 words, 10 marks).
दृष्टिकोण 1- भूमिका में मौर्योत्तर युग में राजनीतिक स्थिति की संक्षिप्त जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में मथुरा कला के विकास की पृष्ठभूमि एवं विशेषताएं बताइये 3- दूसरे भाग में गांधार कला के विकास की पृष्ठभूमि एवं विशेषताएं लिखिए 4- अंतिम में दोनों के विकास की पृष्ठभूमि और विशेषताओं में अंतर के संदर्भ में निष्कर्ष लिखिए मौर्य साम्राज्य के अवसान के बाद सम्पूर्ण भारत में अनेक राज्यों का उदय हुआ| मौर्योत्तर काल में अधिकतर छोटे-छोटे राज्य थे। मौर्योत्तर युग में भारत में अनेक देशी-विदेशी राज्यों की स्थापना हुई| मौर्य साम्राज्य के अवशेषों पर शुंगों ने शासन किया उनके बाद कणव वंश का शासन स्थापित हुआ| इसी समय मिनांडर जैसे इंडो-ग्रीक, रुद्रदामां जैसे शक आदि प्रसिद्ध विदेशी शासक हुए| कुषाणों और सातवाहनों के अतिरक्त मौर्योत्तर काल में आभीर, वाकाटक एवं सुदूर दक्षिण में चेर, चोल एवं पांड्य राज्य स्थापित हुए | उत्तर में कुषाणों एवं दक्षिण में सातवाहनों ने काफी विस्तृत प्रदेशों पर राज किया| सातवाहन शासकों के कई अधीनस्थ शासक थे, जैसे-इक्ष्वाकु आदि, जिन्होंने सातवाहन शासकों के पतन होने पर स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिये। कुषाणों द्वारा मध्य एशिया तक विस्तृत साम्राज्य की स्थापना, इसी प्रकार सातवाहनों द्वारा विशाल क्षेत्र पर शासन किया गया| मौर्योत्तर युगीन राजनीतिक स्थिरता, व्यापार के अनुकूल परिस्थितियों के निर्माण से व्यावसायिक जातियों का विकास हुआ जिन्होंने कला को संरक्षण प्रदान किया, विदेशी प्रभाव आदि कारकों ने मौर्योत्तर युग में कला के विकास को प्रोत्साहित किया| इस समय भारतीय उपमहाद्वीप क्षेत्र में विशिष्ट पृष्ठभूमियों में मथुरा,गांधार एवं अमरावती में तीन मूर्तिकला केन्द्रों का विकास हुआ| गांधार कला केंद्र के विकास की पृष्ठभूमि · गंधार शैली का विकास आधुनिक पेशावर और अफगानिस्तान के निकट पंजाब की पश्चिमी सीमाओं में 50 ईसा पूर्व से लेकर 500 AD तक हुआ| इस शैली को इंडो ग्रीक शैली के रूप में भी जाना जाता है| · इस क्षेत्र पर हिन्द- यवन शासकों द्वारा शासन किया गया था और यूनान में मूर्तिकला की विकसित परंपरा थी| अतः इस क्षेत्र में मूर्तिकला के विकास की समृद्ध पृष्ठभूमि निर्मित हो चुकी थी| · कुषाणों द्वारा उत्तर भारत से लेकर मध्य एशिया तक विस्तृत साम्राज्य की स्थापना की गयी थी जिससे गांधार क्षेत्र चीन एवं इरान के सम्पर्क में आया| ध्यातव्य है की चीन एवं ईरान में भी मूर्तिकला निर्माण की विकसित परंपरा थी| · उपरोक्त के अतिरिक्त उत्साही बौद्ध अनुयायियों के रूप में कुषाणों ने गांधार कला को अपना संरक्षण प्रदान किया जिससे गांधार मूर्तिकला केंद्र का विकास संभव हुआ| गांधार कला की विशेषताएं · गांधार मूर्तिकला शैली में मूर्ति निर्माण के प्रमुख केंद्र तक्षशिला, कपिसा, बगराम एवं बामियान आदि थे| · गांधार शैली में मूर्ति निर्माण में मुख्यतः भूरे पत्थरों, चुना पत्थर एवं मिटटी का उपयोग निर्माण सामग्री के रूप में किया जाता था| · बुद्ध एवं बोधिसत्व की मूर्तियाँ, यक्ष-यक्षिणी, यूनानी देवताओं की मूर्तियाँ गांधार मूर्तिकला शैली के मुख्य विषय थे| · यहाँ बुद्ध की खड़ी एवं बैठी मूर्तियों के साथ ही विभिन्न मुद्रा में मूर्तियों का निर्माण किया गया था जैसे धर्मचक्रप्रवर्तन मुद्रा, अभय मुद्रा, वितर्क मुद्रा, अंजलि मुद्रा एवं भूमि स्पर्श मुद्रा आदि| · बुद्ध मूर्तियाँ यूनानी देवता अपोलो से मिलती जुलती प्रतीत होती हैं| मांसपेशियों का उभार, पारदर्शी वस्त्र,मूर्तियों के घुंघराले बाल, कानों पर बाल, मूछें आदि उत्कीर्ण की गयी हैं · मूर्तियों का स्वरुप यथार्थवादी है साथ ही इनमे अलंकरण को महत्त्व दिया गया है जिससे इनपर रोमन प्रभाव की पुष्टि होती है| · संभवतः सर्वप्रथम गांधार कला में ही बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण किया गया था| कुषाणों के बाद राजकीय संरक्षण में कमी, आर्थिक आधार में आयी गिरावट आदि के कारण गांधार कला केन्द्रों का अवसान हुआ| मथुरा कला केंद्र के विकास की पृष्ठभूमि · मथुरा शैली का विकास पहली और तीसरी शताब्दी ई .पू के बीच की अवधि में यमुना नदी के किनारे के क्षेत्रों में हुआ, · मौर्य एवं मौर्योत्तर युग में मथुरा महत्वपूर्ण आर्थिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ था| महत्वपूर्ण आर्थिक केंद्र होने के कारण कला को संरक्षण देने वाले वर्ग का विकास संभव हुआ, जिसने मथुरा मूर्तिकला केंद्र के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी, · इसके साथ ही मथुरा उत्तरापथ और दक्षिणापथ महामार्गों का मिलन बिंदु था, इससे कला मूल्यों के संचयन एवं विकास में सहायता मिली, · मथुरा में मौर्ययुग से मूर्तिकला का विकास के प्रारम्भ होने के साक्ष्य मिलते हैं| अर्थात मूर्तिकला के विकास के लिए आधार तैयार था, · मौर्योत्तर काल में पेशावर के अतिरिक्त मथुराकुषाणों की दूसरी राजधानी थी इससे मूर्तिकला को सहजता से कुषाणों का संरक्षण प्राप्त हुआ और मथुरा मूर्तिकला केंद्र के रूप में विकसित हुआ, · एक ही साम्राज्य में स्थित होने के कारण गांधार कला एवं मथुरा कला में स्वाभाविक अंतःक्रिया हो रही थी जिसने मथुरा मूर्तिकला के विकास को प्रोत्साहित किया मथुरा कला की विशेषताएं · मथुरा मूर्तिकला शैली में मूर्ति निर्माण मथुरा के अतिरिक्त सारनाथ और अहिछत्र में भी होता था, · मथुरा शैली में मूर्ति निर्माण के लिए निर्माण सामग्री के रूप में मुख्यतः लाल बलुआ पत्थरों का उपयोग किया गया है, · मथुरा मूर्तिकला में धार्मिक एवं धर्मेत्तर दोनों विषयों पर मूर्तियों का निर्माण किया गया| धार्मिक मूर्तियों में मथुरा के कटरा क्षेत्र से बुद्ध & बोधिसत्व की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं, इसी प्रकार कंकाली टीला क्षेत्र से जैन तीर्थंकरों जैसे पार्श्वनाथ आदि की मूर्तियाँ प्राप्त हुई है | मथुरा कचहरी से ब्राहमण मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं| धर्मेत्तर विषयों में मथुरा से प्राप्त कनिष्क की मूर्ति का उल्लेख किया जा सकता है| · ब्राहमण मूर्तियों में शिव-पार्वती, विष्णु- लक्ष्मी, गणेश की मूर्तियाँ बहुतायत में बनायीं गयी थीं| जैन मूर्तियों में पार्श्वनाथ, महावीर आदि जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों का निर्माण किया गया| ध्यातव्य है कि अधिकाँश जैन मूर्तियाँ कायोत्सर्ग मुद्रा में हैं| बौद्ध मूर्तियों में- खड़ी मूर्तियों, बैठी मूर्तियों के अतिरिक्त विभिन्न मुद्रा में बुद्ध और बोधिसत्वों की मूर्तियाँ बनायी गयी हैं यहाँ मूर्तियों में बुद्ध का मोटे उत्तरीय कपड़ों में आदर्शवादी उत्कीर्णन किया गया है| · मथुरा से यक्ष- यक्षिणी मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं इनमें श्रृंगार एवं सौन्दर्य पर विशेष ध्यान ध्यान दिया गया है, इसके अतिरिक्त कनिष्क की सिर विहीन मूर्ति में कनिष्क को ओवरकोट और बूट पहने दिखाया गया है, · कुषाणों के बाद भी मथुरा मूर्तिकला को गुप्तों का संरक्षण प्राप्त हुआ जिससे मथुरा मूर्तिकला केंद्र बना रहा| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि गांधार कला एवं मथुरा कला के विकास की पृष्ठभूमि में राजकीय संरक्षण में समानता के अतिरिक्त विभिन्न किन्तु पृथक-पृथक कारकों ने भूमिका निभायी थी| इसके अतिरिक्त दोनों शैलियों की विशेषताओं में भी प्रभावशाली अंतर देखने को मिलते हैं|
##Question:मथुरा एवं गांधार मूर्तिकला शैलियों के विकास की पृष्ठभूमि और इनकी विशेषताओं को स्पष्ट कीजिये |(150 से 200 शब्द, 10 अंक) Explain the background and characteristics of the development of Mathura and Gandhara sculpture styles. (150 to 200 words, 10 marks).##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में मौर्योत्तर युग में राजनीतिक स्थिति की संक्षिप्त जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में मथुरा कला के विकास की पृष्ठभूमि एवं विशेषताएं बताइये 3- दूसरे भाग में गांधार कला के विकास की पृष्ठभूमि एवं विशेषताएं लिखिए 4- अंतिम में दोनों के विकास की पृष्ठभूमि और विशेषताओं में अंतर के संदर्भ में निष्कर्ष लिखिए मौर्य साम्राज्य के अवसान के बाद सम्पूर्ण भारत में अनेक राज्यों का उदय हुआ| मौर्योत्तर काल में अधिकतर छोटे-छोटे राज्य थे। मौर्योत्तर युग में भारत में अनेक देशी-विदेशी राज्यों की स्थापना हुई| मौर्य साम्राज्य के अवशेषों पर शुंगों ने शासन किया उनके बाद कणव वंश का शासन स्थापित हुआ| इसी समय मिनांडर जैसे इंडो-ग्रीक, रुद्रदामां जैसे शक आदि प्रसिद्ध विदेशी शासक हुए| कुषाणों और सातवाहनों के अतिरक्त मौर्योत्तर काल में आभीर, वाकाटक एवं सुदूर दक्षिण में चेर, चोल एवं पांड्य राज्य स्थापित हुए | उत्तर में कुषाणों एवं दक्षिण में सातवाहनों ने काफी विस्तृत प्रदेशों पर राज किया| सातवाहन शासकों के कई अधीनस्थ शासक थे, जैसे-इक्ष्वाकु आदि, जिन्होंने सातवाहन शासकों के पतन होने पर स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिये। कुषाणों द्वारा मध्य एशिया तक विस्तृत साम्राज्य की स्थापना, इसी प्रकार सातवाहनों द्वारा विशाल क्षेत्र पर शासन किया गया| मौर्योत्तर युगीन राजनीतिक स्थिरता, व्यापार के अनुकूल परिस्थितियों के निर्माण से व्यावसायिक जातियों का विकास हुआ जिन्होंने कला को संरक्षण प्रदान किया, विदेशी प्रभाव आदि कारकों ने मौर्योत्तर युग में कला के विकास को प्रोत्साहित किया| इस समय भारतीय उपमहाद्वीप क्षेत्र में विशिष्ट पृष्ठभूमियों में मथुरा,गांधार एवं अमरावती में तीन मूर्तिकला केन्द्रों का विकास हुआ| गांधार कला केंद्र के विकास की पृष्ठभूमि · गंधार शैली का विकास आधुनिक पेशावर और अफगानिस्तान के निकट पंजाब की पश्चिमी सीमाओं में 50 ईसा पूर्व से लेकर 500 AD तक हुआ| इस शैली को इंडो ग्रीक शैली के रूप में भी जाना जाता है| · इस क्षेत्र पर हिन्द- यवन शासकों द्वारा शासन किया गया था और यूनान में मूर्तिकला की विकसित परंपरा थी| अतः इस क्षेत्र में मूर्तिकला के विकास की समृद्ध पृष्ठभूमि निर्मित हो चुकी थी| · कुषाणों द्वारा उत्तर भारत से लेकर मध्य एशिया तक विस्तृत साम्राज्य की स्थापना की गयी थी जिससे गांधार क्षेत्र चीन एवं इरान के सम्पर्क में आया| ध्यातव्य है की चीन एवं ईरान में भी मूर्तिकला निर्माण की विकसित परंपरा थी| · उपरोक्त के अतिरिक्त उत्साही बौद्ध अनुयायियों के रूप में कुषाणों ने गांधार कला को अपना संरक्षण प्रदान किया जिससे गांधार मूर्तिकला केंद्र का विकास संभव हुआ| गांधार कला की विशेषताएं · गांधार मूर्तिकला शैली में मूर्ति निर्माण के प्रमुख केंद्र तक्षशिला, कपिसा, बगराम एवं बामियान आदि थे| · गांधार शैली में मूर्ति निर्माण में मुख्यतः भूरे पत्थरों, चुना पत्थर एवं मिटटी का उपयोग निर्माण सामग्री के रूप में किया जाता था| · बुद्ध एवं बोधिसत्व की मूर्तियाँ, यक्ष-यक्षिणी, यूनानी देवताओं की मूर्तियाँ गांधार मूर्तिकला शैली के मुख्य विषय थे| · यहाँ बुद्ध की खड़ी एवं बैठी मूर्तियों के साथ ही विभिन्न मुद्रा में मूर्तियों का निर्माण किया गया था जैसे धर्मचक्रप्रवर्तन मुद्रा, अभय मुद्रा, वितर्क मुद्रा, अंजलि मुद्रा एवं भूमि स्पर्श मुद्रा आदि| · बुद्ध मूर्तियाँ यूनानी देवता अपोलो से मिलती जुलती प्रतीत होती हैं| मांसपेशियों का उभार, पारदर्शी वस्त्र,मूर्तियों के घुंघराले बाल, कानों पर बाल, मूछें आदि उत्कीर्ण की गयी हैं · मूर्तियों का स्वरुप यथार्थवादी है साथ ही इनमे अलंकरण को महत्त्व दिया गया है जिससे इनपर रोमन प्रभाव की पुष्टि होती है| · संभवतः सर्वप्रथम गांधार कला में ही बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण किया गया था| कुषाणों के बाद राजकीय संरक्षण में कमी, आर्थिक आधार में आयी गिरावट आदि के कारण गांधार कला केन्द्रों का अवसान हुआ| मथुरा कला केंद्र के विकास की पृष्ठभूमि · मथुरा शैली का विकास पहली और तीसरी शताब्दी ई .पू के बीच की अवधि में यमुना नदी के किनारे के क्षेत्रों में हुआ, · मौर्य एवं मौर्योत्तर युग में मथुरा महत्वपूर्ण आर्थिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ था| महत्वपूर्ण आर्थिक केंद्र होने के कारण कला को संरक्षण देने वाले वर्ग का विकास संभव हुआ, जिसने मथुरा मूर्तिकला केंद्र के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी, · इसके साथ ही मथुरा उत्तरापथ और दक्षिणापथ महामार्गों का मिलन बिंदु था, इससे कला मूल्यों के संचयन एवं विकास में सहायता मिली, · मथुरा में मौर्ययुग से मूर्तिकला का विकास के प्रारम्भ होने के साक्ष्य मिलते हैं| अर्थात मूर्तिकला के विकास के लिए आधार तैयार था, · मौर्योत्तर काल में पेशावर के अतिरिक्त मथुराकुषाणों की दूसरी राजधानी थी इससे मूर्तिकला को सहजता से कुषाणों का संरक्षण प्राप्त हुआ और मथुरा मूर्तिकला केंद्र के रूप में विकसित हुआ, · एक ही साम्राज्य में स्थित होने के कारण गांधार कला एवं मथुरा कला में स्वाभाविक अंतःक्रिया हो रही थी जिसने मथुरा मूर्तिकला के विकास को प्रोत्साहित किया मथुरा कला की विशेषताएं · मथुरा मूर्तिकला शैली में मूर्ति निर्माण मथुरा के अतिरिक्त सारनाथ और अहिछत्र में भी होता था, · मथुरा शैली में मूर्ति निर्माण के लिए निर्माण सामग्री के रूप में मुख्यतः लाल बलुआ पत्थरों का उपयोग किया गया है, · मथुरा मूर्तिकला में धार्मिक एवं धर्मेत्तर दोनों विषयों पर मूर्तियों का निर्माण किया गया| धार्मिक मूर्तियों में मथुरा के कटरा क्षेत्र से बुद्ध & बोधिसत्व की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं, इसी प्रकार कंकाली टीला क्षेत्र से जैन तीर्थंकरों जैसे पार्श्वनाथ आदि की मूर्तियाँ प्राप्त हुई है | मथुरा कचहरी से ब्राहमण मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं| धर्मेत्तर विषयों में मथुरा से प्राप्त कनिष्क की मूर्ति का उल्लेख किया जा सकता है| · ब्राहमण मूर्तियों में शिव-पार्वती, विष्णु- लक्ष्मी, गणेश की मूर्तियाँ बहुतायत में बनायीं गयी थीं| जैन मूर्तियों में पार्श्वनाथ, महावीर आदि जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों का निर्माण किया गया| ध्यातव्य है कि अधिकाँश जैन मूर्तियाँ कायोत्सर्ग मुद्रा में हैं| बौद्ध मूर्तियों में- खड़ी मूर्तियों, बैठी मूर्तियों के अतिरिक्त विभिन्न मुद्रा में बुद्ध और बोधिसत्वों की मूर्तियाँ बनायी गयी हैं यहाँ मूर्तियों में बुद्ध का मोटे उत्तरीय कपड़ों में आदर्शवादी उत्कीर्णन किया गया है| · मथुरा से यक्ष- यक्षिणी मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं इनमें श्रृंगार एवं सौन्दर्य पर विशेष ध्यान ध्यान दिया गया है, इसके अतिरिक्त कनिष्क की सिर विहीन मूर्ति में कनिष्क को ओवरकोट और बूट पहने दिखाया गया है, · कुषाणों के बाद भी मथुरा मूर्तिकला को गुप्तों का संरक्षण प्राप्त हुआ जिससे मथुरा मूर्तिकला केंद्र बना रहा| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि गांधार कला एवं मथुरा कला के विकास की पृष्ठभूमि में राजकीय संरक्षण में समानता के अतिरिक्त विभिन्न किन्तु पृथक-पृथक कारकों ने भूमिका निभायी थी| इसके अतिरिक्त दोनों शैलियों की विशेषताओं में भी प्रभावशाली अंतर देखने को मिलते हैं|
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ई-शासन की अवधारणा को समझाते हुए इसकी चुनौतियों को भी रेखांकित कीजिये | साथ ही भारत में इसके सफल प्रयोगों को चिन्हित कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) While explaining the concept of e-governance, underline its challenges. Also,mark its successful implementation in India. (150-200 word/10 marks)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत ई-शासन की अवधारणा को समझाते हुए कीजिये | इसके पश्चात ई- शासन में में मौजूद चुनौतियों को रेखांकित कीजिये | अंत में भारत में ई-शासन के सफल प्रयोग को बताते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - ई- शासन का आशय शासन तंत्र की प्रक्रिया में ICT का अनुप्रयोग करना है ताकि इसके माध्यम से शासन तंत्र में परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन को प्राप्त किया जा सके| ई. शासन के चार मौलिक चरण हैं यथा सूचना, परस्पर तालमेल, लेनदेन, परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन| परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन के अंतर्गत सम्पूर्ण सूचना प्रणाली का एकीकरण किया जाना चाहिए एवं जनता के द्वारा गवर्नमेंट टू सिटीजन,गवर्नमेंट टू बिजिनेस सेवाओं को एक काउंटर के माध्यम से प्राप्त किया जा सके अतः ट्रांसफारमेशन के माध्यम से सभी सेवाओं को प्राप्त करने के लिए एकल सूत्री संपर्क को स्थापित किया जाना ई.शासन का अंतिम उद्देश्य है|ई. शासन, सुशासन को प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण आधार है जिसका मौलिक उद्देश्य स्मार्ट (सरल, नैतिक, जवाबदेह, संवेदनशील, पारदर्शी) सरकार, के उद्देश्य को प्राप्त किया जाना है ई.शासन की चुनौतियां - भारत में ई.शासन से सम्बन्धित निम्नलिखित चुनौतियों को देखा जा सकता है जिनके कारण ई.शासन के वास्तविक लाभ को प्राप्त किया जाना संभव नहीं हो पाया है| तकनीकी आधारभूत संरचना की कमी(डिजिटल अवसंरचना) | तकनीकी साक्षरता की कमी | प्रशिक्षण के द्वारा ई.शासन के प्रति अभिवृत्ति परिवर्तन को प्राप्त न किया जाना | ई.शासन के दीर्घकालीन लाभों को लेकर समाज में व्यापक जनजागरूकता की कमी | विशिष्ट भाषाओं का वर्चस्व& साइबर सुरक्षा का मुद्दा | गरीबी एवं सामाजिक-आर्थिक असमानता( ग्रामीण-नगरीय, अमीर-गरीब, शिक्षित-अशिक्षित) | भारत में ई-शासन का सफल प्रयोग - उपरोक्त सीमाओं के बावजूद भी भारत में ई.शासन की दिशा में कई सफल प्रयोगों को देखा जा सकता है जैसे भूमि परियोजना(कर्नाटक), CARD(आंध्र प्रदेश), ज्ञानदूत(MP) लोकवाणी परियोजना(UP), ई.मित्र(लोकमित्र+जनमित्र, राजस्थान ), FRIENDS (केरल) आदि | भारत सरकार के द्वारा ई.शासन की दिशा में निम्नांकित प्रयासों का उल्लेख किया जा सकता है जैसे 2006 में प्रारम्भ नेशनल ई.गवर्नेंस प्लान, द्वितीय ARC द्वारा प्रस्तुत 11 प्रतिवेदन में ई.शासन पर अनुशंसाएं प्रस्तुत की गयीं| भारत सरकार के द्वारा ई.शासन को बेहतर तरीके से लागू करने की दिशा में नेशनल ई गवर्नेंस पुरस्कार का वितरण किया जाता है | 2015 में भारत सरकार के द्वारा डिजिटल इंडिया कि शुरुआत की गयी इसी के साथ नेशनल ई.गवर्नेंस प्लान 2.0 को लागू किया गयाडिजिटल इंडिया के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं-प्रत्येक नागरिक की उपयोगिता हेतु डिजिटल अवसंरचना पर बल, शासन एवं सेवायें जनता की मांग पर उपलब्ध कराना एवं नागरिकों का डिजिटल सशक्तिकरण करना| डिजिटल इंडिया के 9 मौलिक स्तम्भ हैं जिसमें विशेष रूप से स्तम्भ नम्बर 4 का सम्बन्ध ई.शासन से है जिसका उद्देश्य तकनीक के द्वारा सरकार में सुधार करना है एवं स्तम्भ नम्बर 5 का सम्बन्ध ई.क्रान्ति से है जिसके माध्यम से सेवाओं को इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से प्रस्तुत किया जाना है | डिजिटल इंडिया एक ऐसा कार्यक्रम है जिसका सम्बन्ध सरकार के विभिन्न विभागों से है एवं इसके माध्यम से IT+IT=IT को प्राप्त किया जाना है | डिजिटल इंडिया के अंतर्गत भारत नेट के माध्यम से देश की 2.5 लाख ग्राम पंचायतों को डिजिटल सम्पर्क के साथ जोड़ा जा रहा है| भारत सरकार के द्वारा प्रगति(प्रोएक्टिव गवरनेंस एंड टाइमली इम्प्लीमेंट) की शुरुआत की गयी है | UN के द्वारा 193 देशों के सर्वेक्षण के आधार पर EGDI(ई.शासन विकास सूचकांक) में भारत का स्थान 96 है एवं भारत को प्राप्त अंक 0.5669 है| UN के द्वारा घोषित EPI(ई.शासन भागीदारी सूचकांक) में भारत की रैंक 15 वीं है | इस प्रकार देखते हैं कि विभिन्न सीमाओं के बावजूद भी विश्वव्यापी स्तर पर भारत की स्थिति बेहतर है|
##Question:ई-शासन की अवधारणा को समझाते हुए इसकी चुनौतियों को भी रेखांकित कीजिये | साथ ही भारत में इसके सफल प्रयोगों को चिन्हित कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) While explaining the concept of e-governance, underline its challenges. Also,mark its successful implementation in India. (150-200 word/10 marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत ई-शासन की अवधारणा को समझाते हुए कीजिये | इसके पश्चात ई- शासन में में मौजूद चुनौतियों को रेखांकित कीजिये | अंत में भारत में ई-शासन के सफल प्रयोग को बताते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - ई- शासन का आशय शासन तंत्र की प्रक्रिया में ICT का अनुप्रयोग करना है ताकि इसके माध्यम से शासन तंत्र में परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन को प्राप्त किया जा सके| ई. शासन के चार मौलिक चरण हैं यथा सूचना, परस्पर तालमेल, लेनदेन, परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन| परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन के अंतर्गत सम्पूर्ण सूचना प्रणाली का एकीकरण किया जाना चाहिए एवं जनता के द्वारा गवर्नमेंट टू सिटीजन,गवर्नमेंट टू बिजिनेस सेवाओं को एक काउंटर के माध्यम से प्राप्त किया जा सके अतः ट्रांसफारमेशन के माध्यम से सभी सेवाओं को प्राप्त करने के लिए एकल सूत्री संपर्क को स्थापित किया जाना ई.शासन का अंतिम उद्देश्य है|ई. शासन, सुशासन को प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण आधार है जिसका मौलिक उद्देश्य स्मार्ट (सरल, नैतिक, जवाबदेह, संवेदनशील, पारदर्शी) सरकार, के उद्देश्य को प्राप्त किया जाना है ई.शासन की चुनौतियां - भारत में ई.शासन से सम्बन्धित निम्नलिखित चुनौतियों को देखा जा सकता है जिनके कारण ई.शासन के वास्तविक लाभ को प्राप्त किया जाना संभव नहीं हो पाया है| तकनीकी आधारभूत संरचना की कमी(डिजिटल अवसंरचना) | तकनीकी साक्षरता की कमी | प्रशिक्षण के द्वारा ई.शासन के प्रति अभिवृत्ति परिवर्तन को प्राप्त न किया जाना | ई.शासन के दीर्घकालीन लाभों को लेकर समाज में व्यापक जनजागरूकता की कमी | विशिष्ट भाषाओं का वर्चस्व& साइबर सुरक्षा का मुद्दा | गरीबी एवं सामाजिक-आर्थिक असमानता( ग्रामीण-नगरीय, अमीर-गरीब, शिक्षित-अशिक्षित) | भारत में ई-शासन का सफल प्रयोग - उपरोक्त सीमाओं के बावजूद भी भारत में ई.शासन की दिशा में कई सफल प्रयोगों को देखा जा सकता है जैसे भूमि परियोजना(कर्नाटक), CARD(आंध्र प्रदेश), ज्ञानदूत(MP) लोकवाणी परियोजना(UP), ई.मित्र(लोकमित्र+जनमित्र, राजस्थान ), FRIENDS (केरल) आदि | भारत सरकार के द्वारा ई.शासन की दिशा में निम्नांकित प्रयासों का उल्लेख किया जा सकता है जैसे 2006 में प्रारम्भ नेशनल ई.गवर्नेंस प्लान, द्वितीय ARC द्वारा प्रस्तुत 11 प्रतिवेदन में ई.शासन पर अनुशंसाएं प्रस्तुत की गयीं| भारत सरकार के द्वारा ई.शासन को बेहतर तरीके से लागू करने की दिशा में नेशनल ई गवर्नेंस पुरस्कार का वितरण किया जाता है | 2015 में भारत सरकार के द्वारा डिजिटल इंडिया कि शुरुआत की गयी इसी के साथ नेशनल ई.गवर्नेंस प्लान 2.0 को लागू किया गयाडिजिटल इंडिया के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं-प्रत्येक नागरिक की उपयोगिता हेतु डिजिटल अवसंरचना पर बल, शासन एवं सेवायें जनता की मांग पर उपलब्ध कराना एवं नागरिकों का डिजिटल सशक्तिकरण करना| डिजिटल इंडिया के 9 मौलिक स्तम्भ हैं जिसमें विशेष रूप से स्तम्भ नम्बर 4 का सम्बन्ध ई.शासन से है जिसका उद्देश्य तकनीक के द्वारा सरकार में सुधार करना है एवं स्तम्भ नम्बर 5 का सम्बन्ध ई.क्रान्ति से है जिसके माध्यम से सेवाओं को इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से प्रस्तुत किया जाना है | डिजिटल इंडिया एक ऐसा कार्यक्रम है जिसका सम्बन्ध सरकार के विभिन्न विभागों से है एवं इसके माध्यम से IT+IT=IT को प्राप्त किया जाना है | डिजिटल इंडिया के अंतर्गत भारत नेट के माध्यम से देश की 2.5 लाख ग्राम पंचायतों को डिजिटल सम्पर्क के साथ जोड़ा जा रहा है| भारत सरकार के द्वारा प्रगति(प्रोएक्टिव गवरनेंस एंड टाइमली इम्प्लीमेंट) की शुरुआत की गयी है | UN के द्वारा 193 देशों के सर्वेक्षण के आधार पर EGDI(ई.शासन विकास सूचकांक) में भारत का स्थान 96 है एवं भारत को प्राप्त अंक 0.5669 है| UN के द्वारा घोषित EPI(ई.शासन भागीदारी सूचकांक) में भारत की रैंक 15 वीं है | इस प्रकार देखते हैं कि विभिन्न सीमाओं के बावजूद भी विश्वव्यापी स्तर पर भारत की स्थिति बेहतर है|
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नागरिक अधिकार पत्र से आप क्या समझते हैं ? इसके प्रमुख सिद्धांतों की चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द ) What do you understand by Citizen"s Charter? Discuss its main principles. (150-200 words)
दृष्टिकोण: नागरिक अधिकार पत्र को परिभाषित करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । कुछ उदाहरणों के माध्यम से इसे समझाइए । आधुनिक काल में नागरिक अधिकार पत्र के विकास की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । नागरिक अधिकार पत्र के प्रमुख सिद्धांतों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । उत्तर : नागरिक अधिकार पत्र, नागरिकों के प्रति तय की गई प्रतिबद्धता का एक ऐसा दस्तावेज है जिसका संबंध नागरिकों को उपलब्ध कराई गई सेवाओं से होता है । किसी विभाग का नागरिक घोषणा पत्र अपने ग्राहकों के लिए सेवा में श्रेष्ठता के लिए प्रतिबद्धता की घोषणा है । यह विभिन्न सेवाओं के लिए मानकों की घोषणा करता है ।इसमें अपनी प्रतिबद्धता को पूरा करने के लिए नागरिकों से संगठन की अपेक्षाएं शामिल हैं। नागरिक अधिकार पत्र की अवधारणा सेवा प्रदाता व उसके उपयोगकर्ता के बीच विश्वास को बढ़ाता है । यह सरकार व नागरिकों के बीच सेतु का कार्य करता है । आधुनिक काल में पहली बार ब्रिटेन में नागरिक अधिकार पत्र की घोषणा की गई और लागू किया गया । 1991 में जॉन मेजर की कंजर्वेटिव सरकार द्वारा गुणवत्ता के लिए प्रतियोगिता और व्यावसायिक क्षेत्र में लालफीताशाही को कम करने तथा सेवाओं में विकल्प, गुणवत्ता मानक, मूल्य उत्तरदायित्व और पारदर्शिता को विकसित करने के उद्देश से नागरिक अधिकार पत्र को विकसित किया गया । नागरिक अधिकार पत्र के सिद्धांत : नागरिक चार्टर का लक्ष्य सार्वजनिक सेवा वितरण के संबंध में नागरिकों को सशक्त बनाना है। इसी उद्देश की प्राप्ति के लिए नागरिक चार्टर आंदोलन में मूल रूप से 6 सिद्धांतों को तैयार किया गया , जो हैं :- गुणवत्ता, मानक, विकल्प , मूल्य, जवाबदेही व पारदर्शिता । आगे चलकर 1998 में ब्रिटेन ने नागरिक अधिकार पत्र के लिए 9 सिद्धांतों को विकसित किया और यही सिद्धांत आज दुनिया के अधिकतर देशों के नागरिक अधिकार पत्रों के आधार हैं । ये सिद्धांत निम्नलिखित हैं : उत्कृष्ट मानक । खुलापन एवं पूर्ण सूचना उपलब्धता । परामर्श व सम्मिलन । पहुँच और विकल्प का प्रोत्साहन । सभी के साथ निष्पक्ष व्यवहार । गलत होने पर चीजों को सही करना । संसाधनों का प्रभावी ढंग से उपयोग । नवोन्मेष व सुधार । अन्य प्रदाताओं के साथ कार्य करना । उपरोक्त सिद्धांतों के आधार पर ही विश्व के विभिन्न भागों में नागरिक अधिकार पत्रों का विकास किया गया और सरकारी सेवा प्रदाता तंत्र में सुधार के प्रयास किए गए ।
##Question:नागरिक अधिकार पत्र से आप क्या समझते हैं ? इसके प्रमुख सिद्धांतों की चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द ) What do you understand by Citizen"s Charter? Discuss its main principles. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण: नागरिक अधिकार पत्र को परिभाषित करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । कुछ उदाहरणों के माध्यम से इसे समझाइए । आधुनिक काल में नागरिक अधिकार पत्र के विकास की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । नागरिक अधिकार पत्र के प्रमुख सिद्धांतों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । उत्तर : नागरिक अधिकार पत्र, नागरिकों के प्रति तय की गई प्रतिबद्धता का एक ऐसा दस्तावेज है जिसका संबंध नागरिकों को उपलब्ध कराई गई सेवाओं से होता है । किसी विभाग का नागरिक घोषणा पत्र अपने ग्राहकों के लिए सेवा में श्रेष्ठता के लिए प्रतिबद्धता की घोषणा है । यह विभिन्न सेवाओं के लिए मानकों की घोषणा करता है ।इसमें अपनी प्रतिबद्धता को पूरा करने के लिए नागरिकों से संगठन की अपेक्षाएं शामिल हैं। नागरिक अधिकार पत्र की अवधारणा सेवा प्रदाता व उसके उपयोगकर्ता के बीच विश्वास को बढ़ाता है । यह सरकार व नागरिकों के बीच सेतु का कार्य करता है । आधुनिक काल में पहली बार ब्रिटेन में नागरिक अधिकार पत्र की घोषणा की गई और लागू किया गया । 1991 में जॉन मेजर की कंजर्वेटिव सरकार द्वारा गुणवत्ता के लिए प्रतियोगिता और व्यावसायिक क्षेत्र में लालफीताशाही को कम करने तथा सेवाओं में विकल्प, गुणवत्ता मानक, मूल्य उत्तरदायित्व और पारदर्शिता को विकसित करने के उद्देश से नागरिक अधिकार पत्र को विकसित किया गया । नागरिक अधिकार पत्र के सिद्धांत : नागरिक चार्टर का लक्ष्य सार्वजनिक सेवा वितरण के संबंध में नागरिकों को सशक्त बनाना है। इसी उद्देश की प्राप्ति के लिए नागरिक चार्टर आंदोलन में मूल रूप से 6 सिद्धांतों को तैयार किया गया , जो हैं :- गुणवत्ता, मानक, विकल्प , मूल्य, जवाबदेही व पारदर्शिता । आगे चलकर 1998 में ब्रिटेन ने नागरिक अधिकार पत्र के लिए 9 सिद्धांतों को विकसित किया और यही सिद्धांत आज दुनिया के अधिकतर देशों के नागरिक अधिकार पत्रों के आधार हैं । ये सिद्धांत निम्नलिखित हैं : उत्कृष्ट मानक । खुलापन एवं पूर्ण सूचना उपलब्धता । परामर्श व सम्मिलन । पहुँच और विकल्प का प्रोत्साहन । सभी के साथ निष्पक्ष व्यवहार । गलत होने पर चीजों को सही करना । संसाधनों का प्रभावी ढंग से उपयोग । नवोन्मेष व सुधार । अन्य प्रदाताओं के साथ कार्य करना । उपरोक्त सिद्धांतों के आधार पर ही विश्व के विभिन्न भागों में नागरिक अधिकार पत्रों का विकास किया गया और सरकारी सेवा प्रदाता तंत्र में सुधार के प्रयास किए गए ।
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ई-शासन की अवधारणा को समझाते हुए इसकी चुनौतियों को भी रेखांकित कीजिये | साथ ही भारत में इसके सफल प्रयोग को चिन्हित कीजिये | (150-200 शब्द) While explaining the concept of e-governance, underline its challenges. Also,mark its successful implementation in India. (150-200 word)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत ई-शासन की अवधारणा को समझाते हुए कीजिये | इसके पश्चात ई- शासन में में मौजूद चुनौतियों को रेखांकित कीजिये | अंत में भारत में ई-शासन के सफल प्रयोग को बताते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - ई- शासन का आशय शासन तंत्र की प्रक्रिया में ICT का अनुप्रयोग करना है ताकि इसके माध्यम से शासन तंत्र में परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन को प्राप्त किया जा सके| ई. शासन के चार मौलिक चरण हैं यथा सूचना, परस्पर तालमेल, लेनदेन, परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन| परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन के अंतर्गत सम्पूर्ण सूचना प्रणाली का एकीकरण किया जाना चाहिए एवं जनता के द्वारा गवर्नमेंट टू सिटीजन,गवर्नमेंट टू बिजिनेस सेवाओं को एक काउंटर के माध्यम से प्राप्त किया जा सके अतः ट्रांसफारमेशन के माध्यम से सभी सेवाओं को प्राप्त करने के लिए एकल सूत्री संपर्क को स्थापित किया जाना ई.शासन का अंतिम उद्देश्य है|ई. शासन, सुशासन को प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण आधार है जिसका मौलिक उद्देश्य स्मार्ट (सरल, नैतिक, जवाबदेह, संवेदनशील, पारदर्शी) सरकार, के उद्देश्य को प्राप्त किया जाना है ई.शासन की चुनौतियां - भारत में ई.शासन से सम्बन्धित निम्नलिखित चुनौतियों को देखा जा सकता है जिनके कारण ई.शासन के वास्तविक लाभ को प्राप्त किया जाना संभव नहीं हो पाया है| तकनीकी आधारभूत संरचना की कमी(डिजिटल अवसंरचना) | तकनीकी साक्षरता की कमी | प्रशिक्षण के द्वारा ई.शासन के प्रति अभिवृत्ति परिवर्तन को प्राप्त न किया जाना | ई.शासन के दीर्घकालीन लाभों को लेकर समाज में व्यापक जनजागरूकता की कमी | विशिष्ट भाषाओं का वर्चस्व& साइबर सुरक्षा का मुद्दा | गरीबी एवं सामाजिक-आर्थिक असमानता( ग्रामीण-नगरीय, अमीर-गरीब, शिक्षित-अशिक्षित) | भारत में ई-शासन का सफल प्रयोग - उपरोक्त सीमाओं के बावजूद भी भारत में ई.शासन की दिशा में कई सफल प्रयोगों को देखा जा सकता है जैसे भूमि परियोजना(कर्नाटक), CARD(आंध्र प्रदेश), ज्ञानदूत(MP) लोकवाणी परियोजना(UP), ई.मित्र(लोकमित्र+जनमित्र, राजस्थान ), FRIENDS (केरल) आदि | भारत सरकार के द्वारा ई.शासन की दिशा में निम्नांकित प्रयासों का उल्लेख किया जा सकता है जैसे 2006 में प्रारम्भ नेशनल ई.गवर्नेंस प्लान, द्वितीय ARC द्वारा प्रस्तुत 11 प्रतिवेदन में ई.शासन पर अनुशंसाएं प्रस्तुत की गयीं| भारत सरकार के द्वारा ई.शासन को बेहतर तरीके से लागू करने की दिशा में नेशनल ई गवर्नेंस पुरस्कार का वितरण किया जाता है | 2015 में भारत सरकार के द्वारा डिजिटल इंडिया कि शुरुआत की गयी इसी के साथ नेशनल ई.गवर्नेंस प्लान 2.0 को लागू किया गयाडिजिटल इंडिया के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं-प्रत्येक नागरिक की उपयोगिता हेतु डिजिटल अवसंरचना पर बल, शासन एवं सेवायें जनता की मांग पर उपलब्ध कराना एवं नागरिकों का डिजिटल सशक्तिकरण करना| डिजिटल इंडिया के 9 मौलिक स्तम्भ हैं जिसमें विशेष रूप से स्तम्भ नम्बर 4 का सम्बन्ध ई.शासन से है जिसका उद्देश्य तकनीक के द्वारा सरकार में सुधार करना है एवं स्तम्भ नम्बर 5 का सम्बन्ध ई.क्रान्ति से है जिसके माध्यम से सेवाओं को इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से प्रस्तुत किया जाना है | डिजिटल इंडिया एक ऐसा कार्यक्रम है जिसका सम्बन्ध सरकार के विभिन्न विभागों से है एवं इसके माध्यम से IT+IT=IT को प्राप्त किया जाना है | डिजिटल इंडिया के अंतर्गत भारत नेट के माध्यम से देश की 2.5 लाख ग्राम पंचायतों को डिजिटल सम्पर्क के साथ जोड़ा जा रहा है| भारत सरकार के द्वारा प्रगति(प्रोएक्टिव गवरनेंस एंड टाइमली इम्प्लीमेंट) की शुरुआत की गयी है | UN के द्वारा 193 देशों के सर्वेक्षण के आधार पर EGDI(ई.शासन विकास सूचकांक) में भारत का स्थान 96 है एवं भारत को प्राप्त अंक 0.5669 है| UN के द्वारा घोषित EPI(ई.शासन भागीदारी सूचकांक) में भारत की रैंक 15 वीं है | इस प्रकार देखते हैं कि विभिन्न सीमाओं के बावजूद भी विश्वव्यापी स्तर पर भारत की स्थिति बेहतर है|
##Question:ई-शासन की अवधारणा को समझाते हुए इसकी चुनौतियों को भी रेखांकित कीजिये | साथ ही भारत में इसके सफल प्रयोग को चिन्हित कीजिये | (150-200 शब्द) While explaining the concept of e-governance, underline its challenges. Also,mark its successful implementation in India. (150-200 word)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत ई-शासन की अवधारणा को समझाते हुए कीजिये | इसके पश्चात ई- शासन में में मौजूद चुनौतियों को रेखांकित कीजिये | अंत में भारत में ई-शासन के सफल प्रयोग को बताते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - ई- शासन का आशय शासन तंत्र की प्रक्रिया में ICT का अनुप्रयोग करना है ताकि इसके माध्यम से शासन तंत्र में परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन को प्राप्त किया जा सके| ई. शासन के चार मौलिक चरण हैं यथा सूचना, परस्पर तालमेल, लेनदेन, परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन| परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन के अंतर्गत सम्पूर्ण सूचना प्रणाली का एकीकरण किया जाना चाहिए एवं जनता के द्वारा गवर्नमेंट टू सिटीजन,गवर्नमेंट टू बिजिनेस सेवाओं को एक काउंटर के माध्यम से प्राप्त किया जा सके अतः ट्रांसफारमेशन के माध्यम से सभी सेवाओं को प्राप्त करने के लिए एकल सूत्री संपर्क को स्थापित किया जाना ई.शासन का अंतिम उद्देश्य है|ई. शासन, सुशासन को प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण आधार है जिसका मौलिक उद्देश्य स्मार्ट (सरल, नैतिक, जवाबदेह, संवेदनशील, पारदर्शी) सरकार, के उद्देश्य को प्राप्त किया जाना है ई.शासन की चुनौतियां - भारत में ई.शासन से सम्बन्धित निम्नलिखित चुनौतियों को देखा जा सकता है जिनके कारण ई.शासन के वास्तविक लाभ को प्राप्त किया जाना संभव नहीं हो पाया है| तकनीकी आधारभूत संरचना की कमी(डिजिटल अवसंरचना) | तकनीकी साक्षरता की कमी | प्रशिक्षण के द्वारा ई.शासन के प्रति अभिवृत्ति परिवर्तन को प्राप्त न किया जाना | ई.शासन के दीर्घकालीन लाभों को लेकर समाज में व्यापक जनजागरूकता की कमी | विशिष्ट भाषाओं का वर्चस्व& साइबर सुरक्षा का मुद्दा | गरीबी एवं सामाजिक-आर्थिक असमानता( ग्रामीण-नगरीय, अमीर-गरीब, शिक्षित-अशिक्षित) | भारत में ई-शासन का सफल प्रयोग - उपरोक्त सीमाओं के बावजूद भी भारत में ई.शासन की दिशा में कई सफल प्रयोगों को देखा जा सकता है जैसे भूमि परियोजना(कर्नाटक), CARD(आंध्र प्रदेश), ज्ञानदूत(MP) लोकवाणी परियोजना(UP), ई.मित्र(लोकमित्र+जनमित्र, राजस्थान ), FRIENDS (केरल) आदि | भारत सरकार के द्वारा ई.शासन की दिशा में निम्नांकित प्रयासों का उल्लेख किया जा सकता है जैसे 2006 में प्रारम्भ नेशनल ई.गवर्नेंस प्लान, द्वितीय ARC द्वारा प्रस्तुत 11 प्रतिवेदन में ई.शासन पर अनुशंसाएं प्रस्तुत की गयीं| भारत सरकार के द्वारा ई.शासन को बेहतर तरीके से लागू करने की दिशा में नेशनल ई गवर्नेंस पुरस्कार का वितरण किया जाता है | 2015 में भारत सरकार के द्वारा डिजिटल इंडिया कि शुरुआत की गयी इसी के साथ नेशनल ई.गवर्नेंस प्लान 2.0 को लागू किया गयाडिजिटल इंडिया के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं-प्रत्येक नागरिक की उपयोगिता हेतु डिजिटल अवसंरचना पर बल, शासन एवं सेवायें जनता की मांग पर उपलब्ध कराना एवं नागरिकों का डिजिटल सशक्तिकरण करना| डिजिटल इंडिया के 9 मौलिक स्तम्भ हैं जिसमें विशेष रूप से स्तम्भ नम्बर 4 का सम्बन्ध ई.शासन से है जिसका उद्देश्य तकनीक के द्वारा सरकार में सुधार करना है एवं स्तम्भ नम्बर 5 का सम्बन्ध ई.क्रान्ति से है जिसके माध्यम से सेवाओं को इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से प्रस्तुत किया जाना है | डिजिटल इंडिया एक ऐसा कार्यक्रम है जिसका सम्बन्ध सरकार के विभिन्न विभागों से है एवं इसके माध्यम से IT+IT=IT को प्राप्त किया जाना है | डिजिटल इंडिया के अंतर्गत भारत नेट के माध्यम से देश की 2.5 लाख ग्राम पंचायतों को डिजिटल सम्पर्क के साथ जोड़ा जा रहा है| भारत सरकार के द्वारा प्रगति(प्रोएक्टिव गवरनेंस एंड टाइमली इम्प्लीमेंट) की शुरुआत की गयी है | UN के द्वारा 193 देशों के सर्वेक्षण के आधार पर EGDI(ई.शासन विकास सूचकांक) में भारत का स्थान 96 है एवं भारत को प्राप्त अंक 0.5669 है| UN के द्वारा घोषित EPI(ई.शासन भागीदारी सूचकांक) में भारत की रैंक 15 वीं है | इस प्रकार देखते हैं कि विभिन्न सीमाओं के बावजूद भी विश्वव्यापी स्तर पर भारत की स्थिति बेहतर है|
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मौर्यकला, राजकीय कला का उदाहरण प्रस्तुत करता है| सोदाहरण बताईये| (150-200 शब्द) Mauryan Era represents an example of art developed under State protection. Discusswithexamples. (150-200 words)
एप्रोच- मौर्यकाल तथा उसके अंतर्गत कला के विकास का संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग में मौर्यकालीन कला के विभिन्न आयामों को उदाहरण सहित बिंदुबार लिखिए| निष्कर्षतः, इन उदाहरणों को राजकीय संरक्षण की भूमिका के साथ जोड़ते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- कला और वास्तुशिल्प में मौर्यों का योगदान बड़ा मूल्यवान रहा है| एक बड़े भूभाग पर नियंत्रण के साथ ही, उनकी सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था एवं आर्थिक नियंत्रण के कारण राज्य द्वारा कला एवं स्थापत्य के विकास पर काफी ध्यान दिया गया था| पत्थर के इमारत बनाने का काम भारी पैमाने पर उन्होंने ही शुरू किया था| मेगास्थनीज़ के अनुसार, पाटलिपुत्र स्थित मौर्य राजप्रसाद उतना ही भव्य था जितना ईरान की राजधानी में बना राजभवन|पटना के कुम्हरार से चंद्रगुप्त मौर्य के काल के निर्मित एक विशाल राजभवन के अवशेष(पत्थर के स्तंभों के टुकड़े और उनके ठूंठ) प्राप्त हुआ है जो कि उसी भवन की ओर इशारा करते हैं| उस समय के स्तंभ उत्तरी पौलिश्ड काले मृदभांड की तरह व्यापक चमकीले ; वृहद् शिलालेख; पृथक शिलालेख तथा लघु शिलालेख की भूमिका; स्तंभलेख तथा स्मारक स्तंभ; मौर्यकालीन स्तूप साहित्यिक साक्ष्यों से बुद्ध के शरीर त्याग के पश्चात स्तूप निर्माण की चर्चा तो मिलती है लेकिन उसके अवशेष नहीं मिलते हैं| मौर्य शासक अशोक के समय साँची, सारनाथ, बोधगया इत्यादि स्थलों पर स्तूपों का निर्माण हुआ| अधिकांशतः स्तूप क्षतिग्रस्त अवस्था में हैं| स्तूप की संरचना से संबंधित सभी विशेषताएं इसमें देखी जा सकती हैं| अशोककालीन स्तूपों में ईंटों का प्रयोग हुआ है तथा तोरण एवं रेलिंग में लकड़ी का; मौर्यकालीन विहार भिक्षुओं के निवासस्थल के संदर्भ में विहार की चर्चा; बौद्ध, जैन, ब्राह्मण सभी धर्मों से संबंधित विहार के साक्ष्य; दो प्रकार के विहार- प्रथम गुफाओं को काटकर; द्वितीय- संरचनात्मक विहार; साहित्यिक साक्ष्यों से बुद्ध के समकक्ष कई विहारों के प्रमाण; हालाँकि, इसके भी अवशेष प्राप्त नहीं होते हैं| संभवतः, पहाड़ों को काटकर विहार निर्माण की परंपरा की शुरुआत अशोक ने की| गया के बराबर नामक पहाड़ियों में सुदामा, विश्वझोपड़ी, तथा कर्णचौपड़ नामक विहारों का निर्माण अशोक ने कराया और आजीवक संप्रदाय को दान में दिया| इसी पहाड़ी में अशोक के पौत्र दशरथ ने लोमेश ऋषि नामक विहार का निर्माण करवाया; इन विहारों की सामान्य विशेषताएं हैं- संकीर्ण प्रवेशद्वार; छोटे-छोटे कमरे; मौर्यकालीन चमकीली पौलिश आदि| मौर्यकालीन मूर्तिकला राजकीय मूर्तिकला एवं आम लोगों के द्वारा निर्मित मूर्तियाँ; राजकीय मूर्तिकला के साक्ष्य अशोक के स्तंभों एवं शिलालेखों से प्राप्त होते हैं| स्तंभों के शीर्ष से मूर्तियों के प्रमाण मिले हैं| जैसे- साँची एवं सारनाथ(4 सिंह की मूर्ति); रामपुरवा से बैल एवं शेर की मूर्ति ; धौली एवं कालशी से हाथी की मूर्ति; इन मूर्तियों में शारीरिक अनुपात, सौंदर्य, मांशपेशियों का उभार; जीवंतता, सजीव चित्रण जैसी विशेषताएं दिखाई पड़ती हैं| संभवतः इन मूर्तियों के निर्माण के पीछे राज्य का यह उद्देश्य रहा हो कि प्रजा अशोक के आदेशों को पढ़े और उसपर आचरण करे| कला को प्रजा के साथ संपर्क/संवाद के लिए अशोक के द्वारा उपयोग किया गया| पटना, मथुरा, विदिशा इत्यादि विभिन्न स्थलों से पत्थर के निर्मित यक्ष एवं यक्षिणी की मूर्तियाँ भी बड़ी संख्या में प्राप्त होती हैं| इन्हें नगर देवी एवं देवता के रूप में महत्व दिया जाता था| इसका संबंध बौद्ध,जैन एवं ब्राह्मण सभी धर्म के अनुयायियों से था| इन मूर्तियों में सौंदर्य, शारीरिक बनावट तथा अलंकरण को विशेष महत्व दिया गया है| कला के क्षेत्र में मिट्टी की मूर्तियों के साथ यक्ष एवं यक्षिणी की मूर्तियाँ आम लोगों का प्रतिनिधित्व करती हैं| इस प्रकार हम देखते हैं कि उपरोक्त कला के आयामों को ज्यादातर राज्य द्वारा ही संरक्षण प्रदान किया गया था| हालाँकि कुछ अवसरों पर हमें आम लोगों द्वारा निर्मित मूर्तियों के साक्ष्य मिलते हैं पर ज्यादातर कला के उदाहरण राजकीय संरक्षण में ही होना प्रतीत होते हैं|
##Question:मौर्यकला, राजकीय कला का उदाहरण प्रस्तुत करता है| सोदाहरण बताईये| (150-200 शब्द) Mauryan Era represents an example of art developed under State protection. Discusswithexamples. (150-200 words)##Answer:एप्रोच- मौर्यकाल तथा उसके अंतर्गत कला के विकास का संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग में मौर्यकालीन कला के विभिन्न आयामों को उदाहरण सहित बिंदुबार लिखिए| निष्कर्षतः, इन उदाहरणों को राजकीय संरक्षण की भूमिका के साथ जोड़ते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- कला और वास्तुशिल्प में मौर्यों का योगदान बड़ा मूल्यवान रहा है| एक बड़े भूभाग पर नियंत्रण के साथ ही, उनकी सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था एवं आर्थिक नियंत्रण के कारण राज्य द्वारा कला एवं स्थापत्य के विकास पर काफी ध्यान दिया गया था| पत्थर के इमारत बनाने का काम भारी पैमाने पर उन्होंने ही शुरू किया था| मेगास्थनीज़ के अनुसार, पाटलिपुत्र स्थित मौर्य राजप्रसाद उतना ही भव्य था जितना ईरान की राजधानी में बना राजभवन|पटना के कुम्हरार से चंद्रगुप्त मौर्य के काल के निर्मित एक विशाल राजभवन के अवशेष(पत्थर के स्तंभों के टुकड़े और उनके ठूंठ) प्राप्त हुआ है जो कि उसी भवन की ओर इशारा करते हैं| उस समय के स्तंभ उत्तरी पौलिश्ड काले मृदभांड की तरह व्यापक चमकीले ; वृहद् शिलालेख; पृथक शिलालेख तथा लघु शिलालेख की भूमिका; स्तंभलेख तथा स्मारक स्तंभ; मौर्यकालीन स्तूप साहित्यिक साक्ष्यों से बुद्ध के शरीर त्याग के पश्चात स्तूप निर्माण की चर्चा तो मिलती है लेकिन उसके अवशेष नहीं मिलते हैं| मौर्य शासक अशोक के समय साँची, सारनाथ, बोधगया इत्यादि स्थलों पर स्तूपों का निर्माण हुआ| अधिकांशतः स्तूप क्षतिग्रस्त अवस्था में हैं| स्तूप की संरचना से संबंधित सभी विशेषताएं इसमें देखी जा सकती हैं| अशोककालीन स्तूपों में ईंटों का प्रयोग हुआ है तथा तोरण एवं रेलिंग में लकड़ी का; मौर्यकालीन विहार भिक्षुओं के निवासस्थल के संदर्भ में विहार की चर्चा; बौद्ध, जैन, ब्राह्मण सभी धर्मों से संबंधित विहार के साक्ष्य; दो प्रकार के विहार- प्रथम गुफाओं को काटकर; द्वितीय- संरचनात्मक विहार; साहित्यिक साक्ष्यों से बुद्ध के समकक्ष कई विहारों के प्रमाण; हालाँकि, इसके भी अवशेष प्राप्त नहीं होते हैं| संभवतः, पहाड़ों को काटकर विहार निर्माण की परंपरा की शुरुआत अशोक ने की| गया के बराबर नामक पहाड़ियों में सुदामा, विश्वझोपड़ी, तथा कर्णचौपड़ नामक विहारों का निर्माण अशोक ने कराया और आजीवक संप्रदाय को दान में दिया| इसी पहाड़ी में अशोक के पौत्र दशरथ ने लोमेश ऋषि नामक विहार का निर्माण करवाया; इन विहारों की सामान्य विशेषताएं हैं- संकीर्ण प्रवेशद्वार; छोटे-छोटे कमरे; मौर्यकालीन चमकीली पौलिश आदि| मौर्यकालीन मूर्तिकला राजकीय मूर्तिकला एवं आम लोगों के द्वारा निर्मित मूर्तियाँ; राजकीय मूर्तिकला के साक्ष्य अशोक के स्तंभों एवं शिलालेखों से प्राप्त होते हैं| स्तंभों के शीर्ष से मूर्तियों के प्रमाण मिले हैं| जैसे- साँची एवं सारनाथ(4 सिंह की मूर्ति); रामपुरवा से बैल एवं शेर की मूर्ति ; धौली एवं कालशी से हाथी की मूर्ति; इन मूर्तियों में शारीरिक अनुपात, सौंदर्य, मांशपेशियों का उभार; जीवंतता, सजीव चित्रण जैसी विशेषताएं दिखाई पड़ती हैं| संभवतः इन मूर्तियों के निर्माण के पीछे राज्य का यह उद्देश्य रहा हो कि प्रजा अशोक के आदेशों को पढ़े और उसपर आचरण करे| कला को प्रजा के साथ संपर्क/संवाद के लिए अशोक के द्वारा उपयोग किया गया| पटना, मथुरा, विदिशा इत्यादि विभिन्न स्थलों से पत्थर के निर्मित यक्ष एवं यक्षिणी की मूर्तियाँ भी बड़ी संख्या में प्राप्त होती हैं| इन्हें नगर देवी एवं देवता के रूप में महत्व दिया जाता था| इसका संबंध बौद्ध,जैन एवं ब्राह्मण सभी धर्म के अनुयायियों से था| इन मूर्तियों में सौंदर्य, शारीरिक बनावट तथा अलंकरण को विशेष महत्व दिया गया है| कला के क्षेत्र में मिट्टी की मूर्तियों के साथ यक्ष एवं यक्षिणी की मूर्तियाँ आम लोगों का प्रतिनिधित्व करती हैं| इस प्रकार हम देखते हैं कि उपरोक्त कला के आयामों को ज्यादातर राज्य द्वारा ही संरक्षण प्रदान किया गया था| हालाँकि कुछ अवसरों पर हमें आम लोगों द्वारा निर्मित मूर्तियों के साक्ष्य मिलते हैं पर ज्यादातर कला के उदाहरण राजकीय संरक्षण में ही होना प्रतीत होते हैं|
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लोक सेवा या जन सेवा की गुणवत्ता से आप क्या समझते हैं? लोक सेवा की गुणवत्ता को सुनश्चित करने वाले तत्वों को बताते हुए इसमें आने वाली बाधाओं को भी रेखांकित कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by the quality of public service? While explaining the elements that ensure the quality of public service, underline the constraints in it. (150-200 Words; 10 Marks)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत लोक सेवा की गुणवत्ता को स्पष्ट करते हुए कीजिये | इसके पश्चात लोक सेवा की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने वाले तत्वों को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में लोक सेवा की गुणवत्ता में आने वाली बाधाओं को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - लोक सेवा या जन सेवा की गुणवत्ता से आशय सरकार द्वारा दी जाने वाली सेवाओं के सन्दर्भ में जन अपेक्षाओं से है | जैसे - सेवा समयबद्ध आधार पर प्रदान की जाय | सेवा तक सभी नागरिकों की आसान पहुँच हो | सेवाओं को नागरिकों के अनुरूप प्रदान किया जाय | जन शिकायतों का उचित मानते हुए निवारण हेतु उचित तंत्र को विकसित किया जाए | सरकार के द्वारा दी जाने वाली सेवाओं का व्यापक प्रचार एवं प्रसार किया जाए | सरकार के द्वारा जन सेवाओं को प्रस्तुत करते समय समर्पण का होना अति आवश्यक है | लोक सेवा की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने वाले तत्व सेवाओं का प्रस्तुतीकरण द्विपक्षीय संचार पर आधारित होना चाहिए ताकि सरकार को फीडबैक या प्रतिपुष्टि प्राप्त हो | प्रतिपुष्टि के आधार पर सरकार सेवाओं में आवश्यक सुधार एवं नवाचार को प्राप्त करे | लोक सेवाओं को प्रस्तुत करने की प्रक्रिया में लोक निधि का अनुकूलतम प्रयोग किया जाना चाहिए ताकि प्रभावशीलता एवं मितव्ययिता को प्राप्त किया जा सके | सरकार के द्वारा सेवाओं को प्रस्तुत करने के सन्दर्भ में समावेशी विकास को प्राप्त किये जाने पर बल दिया जाना चाहिए | सरकार के द्वारा सेवाओं को प्रस्तुत करते समय समाज के संवेदनशील या कमजोर वर्गों के विशिष्ट हितों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए | सरकार के द्वारा लोक सेवाओं के सन्दर्भ में समर्पण का होना भी आवश्यक है | आदि लोक सेवा की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने में बाधाएं आधारभूत संरचना की कमी भ्रस्टाचार का होना लाल फीताशाही , भाई-भतीजावाद सेवाओं को लेकर विश्वसनीय एवं नियमित सूचनाओं की कमी का होना | लोक सेवा की गुणवत्ता के प्रति लोक अधिकारियों में संवेदनशीलता की कमी का होना | राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण जन सेवा का वितरण संतुलित आधार पर संभव नहीं हो पाता है|, आदि उपरोक्त कमियों से स्पष्ट है कि इन कमियों को दूर करके ही लोक सेवा की गुणवत्ता को सुनिश्चित किया जा सकता है |
##Question:लोक सेवा या जन सेवा की गुणवत्ता से आप क्या समझते हैं? लोक सेवा की गुणवत्ता को सुनश्चित करने वाले तत्वों को बताते हुए इसमें आने वाली बाधाओं को भी रेखांकित कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by the quality of public service? While explaining the elements that ensure the quality of public service, underline the constraints in it. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत लोक सेवा की गुणवत्ता को स्पष्ट करते हुए कीजिये | इसके पश्चात लोक सेवा की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने वाले तत्वों को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में लोक सेवा की गुणवत्ता में आने वाली बाधाओं को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - लोक सेवा या जन सेवा की गुणवत्ता से आशय सरकार द्वारा दी जाने वाली सेवाओं के सन्दर्भ में जन अपेक्षाओं से है | जैसे - सेवा समयबद्ध आधार पर प्रदान की जाय | सेवा तक सभी नागरिकों की आसान पहुँच हो | सेवाओं को नागरिकों के अनुरूप प्रदान किया जाय | जन शिकायतों का उचित मानते हुए निवारण हेतु उचित तंत्र को विकसित किया जाए | सरकार के द्वारा दी जाने वाली सेवाओं का व्यापक प्रचार एवं प्रसार किया जाए | सरकार के द्वारा जन सेवाओं को प्रस्तुत करते समय समर्पण का होना अति आवश्यक है | लोक सेवा की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने वाले तत्व सेवाओं का प्रस्तुतीकरण द्विपक्षीय संचार पर आधारित होना चाहिए ताकि सरकार को फीडबैक या प्रतिपुष्टि प्राप्त हो | प्रतिपुष्टि के आधार पर सरकार सेवाओं में आवश्यक सुधार एवं नवाचार को प्राप्त करे | लोक सेवाओं को प्रस्तुत करने की प्रक्रिया में लोक निधि का अनुकूलतम प्रयोग किया जाना चाहिए ताकि प्रभावशीलता एवं मितव्ययिता को प्राप्त किया जा सके | सरकार के द्वारा सेवाओं को प्रस्तुत करने के सन्दर्भ में समावेशी विकास को प्राप्त किये जाने पर बल दिया जाना चाहिए | सरकार के द्वारा सेवाओं को प्रस्तुत करते समय समाज के संवेदनशील या कमजोर वर्गों के विशिष्ट हितों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए | सरकार के द्वारा लोक सेवाओं के सन्दर्भ में समर्पण का होना भी आवश्यक है | आदि लोक सेवा की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने में बाधाएं आधारभूत संरचना की कमी भ्रस्टाचार का होना लाल फीताशाही , भाई-भतीजावाद सेवाओं को लेकर विश्वसनीय एवं नियमित सूचनाओं की कमी का होना | लोक सेवा की गुणवत्ता के प्रति लोक अधिकारियों में संवेदनशीलता की कमी का होना | राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण जन सेवा का वितरण संतुलित आधार पर संभव नहीं हो पाता है|, आदि उपरोक्त कमियों से स्पष्ट है कि इन कमियों को दूर करके ही लोक सेवा की गुणवत्ता को सुनिश्चित किया जा सकता है |
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भारतीय शिक्षा प्रणाली की प्रमुख चुनौतियों को रेखांकित कीजिये। शिक्षा के संदर्भ में स्वतंत्रता पश्चात किए गए प्रयासों की चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द) List out the challenges of Indian education system. Discuss efforts made in educatioin after independence.(150-200 Words)
Approach: भूमिका में संक्षिप्त में शिक्षा की महत्ता तथा भारतीय शिक्षा प्रणाली की चर्चा कीजिये। शिक्षा प्रणाली की चुनौतियों की बिंदुवत चर्चा कीजिये। भारत में शिक्षा के विकास हेतु स्वतंत्रता पश्चात किए गए प्रयासों की रूपरेखा प्रस्तुत कीजिये। संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये। उत्तर: शिक्षा व्यक्ति के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक विकास के लिए आवश्यक तत्व है। भारतीय शिक्षण प्रणाली प्राचीन समय से नैतिक आदर्शों युक्त रही है। सर्व सुलभ, गुणवत्ता युक्त एवं वहनीय शिक्षा वर्तमान भारत के विकास हेतु अनिवार्य आवश्यकता है। 21 वीं सदी में घरेलू एवं वैश्विक सामाजिक-आर्थिक परिदृश्यों में बदलाव हो रहा है जिससे भारतीय शिक्षण प्रणाली कई चुनौतियों का सामना कर रही है। भारतीय शिक्षण प्रणाली द्वारा सामना की जा रही चुनौतियां: • उपयुक्त अवसंरचना का अभाव- विद्यालय भवन, कक्षा कक्षों, खेल के मैदान, शौचालयों, शुद्ध पेयजल आदि की समस्याएँ बनी हुई हैं • मानव संसाधन की कमी- प्रशिक्षित शिक्षक एवं गैर शिक्षक स्टाफ की कमी है। छात्र शिक्षक अनुपात भी उच्च बना हुआ है। • शिक्षकों में उपयुक्त प्रशिक्षण का अभाव: नियुक्ति पूर्व प्रशिक्षण का अभाव है जिससे विद्यार्थियों के प्रति संवेंदनशीलता प्रभावित होती है। • पाठ्यक्रम का परंपरागत होना जो 21वीं सदी की चुनौतियों से निपटने हेतु अक्षम • शिक्षा का व्यवसायीकरण: वैश्वीकरण, शिक्षा के निजीकरण ने शिक्षा को व्यवसाय बना दिया है जिससे वहनीयता गुणवत्ता प्रभावित हुई है। • पाठयक्रम के मानकों का असमान होना जिसमें अनुप्रयोगात्मक शिक्षा एवं कौशल प्रशिक्षण के प्रति तटस्थता होना • परीक्षा प्रणाली का वार्षिक होना तथा याद करने की क्षमता को अधिक महत्व देना। • शिक्षा में नीतिगत घटकों का अभाव:" शिक्षक कौन, विद्यार्थी कौन एवं पाठ्यक्रम क्या? के संदर्भ में गंभीर विश्लेषण का अभाव है। भारत में शिक्षा के संदर्भ में किए गए कुछ मुख्य प्रयास - वर्ष 1986 राष्ट्रीय शिक्षा नीति जिसके अंतर्गत अवसंरचना का विकास एवं कौशल प्रशिक्षण को प्राथमिकता दी गयी। - वर्ष 1987 ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड जिसका उद्देश्य का विकास तथा मानव संसाधन सुलभ करना। - वर्ष 1989 में राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा नीति द्वारा माध्यमिक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हेतु प्रयास। - वर्ष 1995 मिड डे मिल जिसमें उचित पोषण हेतु भोजन के माध्यम से विद्यार्थियाओं को स्कूल आने के लिए प्रोत्साहित करना (हाल ही में गुणवत्ता सुधार हेतु जिला स्तरीय निरीक्षण केंद्र बनाए जा रहे हैं) - वर्ष 2001 सर्व शिक्षा अभियान जिसके अंतर्गत मुख्य उद्देश्य में 2 किमी. परिधि के अंतर्गत माध्यमिक शिक्षा सुनिश्चित करना तथा उपयुक्त मानव संसाधन एवं गैर शिक्षक स्टाफ की सुलभता सुनिश्चित करना - वर्ष 2009 शिक्षा का अधिकार कानून जिसके अंतर्गत 6-14 वर्ष के बच्चों को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करना प्रमुख उद्देश्य - 2009 में ही सर्वशिक्षा भारत अभियान जिसके अंतर्गत व्यवहारपरक पाठयकर्मों द्वारा गैर संगठित क्षेत्र में श्रम शक्ति को शिक्षा सुनिश्चित करना - कस्तूरंगन समिति ने शिक्षा के अधिकार को बढ़ा कर 18 वर्ष तक करने की बात भी कही है - 2011 DTH के माध्यम से EDUSAT का प्रयोग करते हुए डिजिटल शिक्षा को प्रोत्साहित करना तथा दूरदर्शन एवं प्रसार भारती के सहयोग से गुणवत्तायुक्त शिक्षण डिजिटल माध्यमों से लोगों तक पहुंचाना -वर्ष 2017 "संकल्प" के अंतर्गत NSDC के सहयोग से कौशल प्रशिक्षण को त्वरित करना। भारत सरकार द्वारा समय समय पर समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा प्रणाली के विकास हेतु प्रयास किए जा रहे हैं। वर्तमान संदर्भों को संबोधित करने के लिए नई शिक्षा नीति हेतु कस्तुरीरंगन समिति का गठन किया गया है जिसकी रिपोर्ट संसद में विचारधीन है।
##Question:भारतीय शिक्षा प्रणाली की प्रमुख चुनौतियों को रेखांकित कीजिये। शिक्षा के संदर्भ में स्वतंत्रता पश्चात किए गए प्रयासों की चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द) List out the challenges of Indian education system. Discuss efforts made in educatioin after independence.(150-200 Words)##Answer:Approach: भूमिका में संक्षिप्त में शिक्षा की महत्ता तथा भारतीय शिक्षा प्रणाली की चर्चा कीजिये। शिक्षा प्रणाली की चुनौतियों की बिंदुवत चर्चा कीजिये। भारत में शिक्षा के विकास हेतु स्वतंत्रता पश्चात किए गए प्रयासों की रूपरेखा प्रस्तुत कीजिये। संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये। उत्तर: शिक्षा व्यक्ति के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक विकास के लिए आवश्यक तत्व है। भारतीय शिक्षण प्रणाली प्राचीन समय से नैतिक आदर्शों युक्त रही है। सर्व सुलभ, गुणवत्ता युक्त एवं वहनीय शिक्षा वर्तमान भारत के विकास हेतु अनिवार्य आवश्यकता है। 21 वीं सदी में घरेलू एवं वैश्विक सामाजिक-आर्थिक परिदृश्यों में बदलाव हो रहा है जिससे भारतीय शिक्षण प्रणाली कई चुनौतियों का सामना कर रही है। भारतीय शिक्षण प्रणाली द्वारा सामना की जा रही चुनौतियां: • उपयुक्त अवसंरचना का अभाव- विद्यालय भवन, कक्षा कक्षों, खेल के मैदान, शौचालयों, शुद्ध पेयजल आदि की समस्याएँ बनी हुई हैं • मानव संसाधन की कमी- प्रशिक्षित शिक्षक एवं गैर शिक्षक स्टाफ की कमी है। छात्र शिक्षक अनुपात भी उच्च बना हुआ है। • शिक्षकों में उपयुक्त प्रशिक्षण का अभाव: नियुक्ति पूर्व प्रशिक्षण का अभाव है जिससे विद्यार्थियों के प्रति संवेंदनशीलता प्रभावित होती है। • पाठ्यक्रम का परंपरागत होना जो 21वीं सदी की चुनौतियों से निपटने हेतु अक्षम • शिक्षा का व्यवसायीकरण: वैश्वीकरण, शिक्षा के निजीकरण ने शिक्षा को व्यवसाय बना दिया है जिससे वहनीयता गुणवत्ता प्रभावित हुई है। • पाठयक्रम के मानकों का असमान होना जिसमें अनुप्रयोगात्मक शिक्षा एवं कौशल प्रशिक्षण के प्रति तटस्थता होना • परीक्षा प्रणाली का वार्षिक होना तथा याद करने की क्षमता को अधिक महत्व देना। • शिक्षा में नीतिगत घटकों का अभाव:" शिक्षक कौन, विद्यार्थी कौन एवं पाठ्यक्रम क्या? के संदर्भ में गंभीर विश्लेषण का अभाव है। भारत में शिक्षा के संदर्भ में किए गए कुछ मुख्य प्रयास - वर्ष 1986 राष्ट्रीय शिक्षा नीति जिसके अंतर्गत अवसंरचना का विकास एवं कौशल प्रशिक्षण को प्राथमिकता दी गयी। - वर्ष 1987 ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड जिसका उद्देश्य का विकास तथा मानव संसाधन सुलभ करना। - वर्ष 1989 में राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा नीति द्वारा माध्यमिक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हेतु प्रयास। - वर्ष 1995 मिड डे मिल जिसमें उचित पोषण हेतु भोजन के माध्यम से विद्यार्थियाओं को स्कूल आने के लिए प्रोत्साहित करना (हाल ही में गुणवत्ता सुधार हेतु जिला स्तरीय निरीक्षण केंद्र बनाए जा रहे हैं) - वर्ष 2001 सर्व शिक्षा अभियान जिसके अंतर्गत मुख्य उद्देश्य में 2 किमी. परिधि के अंतर्गत माध्यमिक शिक्षा सुनिश्चित करना तथा उपयुक्त मानव संसाधन एवं गैर शिक्षक स्टाफ की सुलभता सुनिश्चित करना - वर्ष 2009 शिक्षा का अधिकार कानून जिसके अंतर्गत 6-14 वर्ष के बच्चों को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करना प्रमुख उद्देश्य - 2009 में ही सर्वशिक्षा भारत अभियान जिसके अंतर्गत व्यवहारपरक पाठयकर्मों द्वारा गैर संगठित क्षेत्र में श्रम शक्ति को शिक्षा सुनिश्चित करना - कस्तूरंगन समिति ने शिक्षा के अधिकार को बढ़ा कर 18 वर्ष तक करने की बात भी कही है - 2011 DTH के माध्यम से EDUSAT का प्रयोग करते हुए डिजिटल शिक्षा को प्रोत्साहित करना तथा दूरदर्शन एवं प्रसार भारती के सहयोग से गुणवत्तायुक्त शिक्षण डिजिटल माध्यमों से लोगों तक पहुंचाना -वर्ष 2017 "संकल्प" के अंतर्गत NSDC के सहयोग से कौशल प्रशिक्षण को त्वरित करना। भारत सरकार द्वारा समय समय पर समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा प्रणाली के विकास हेतु प्रयास किए जा रहे हैं। वर्तमान संदर्भों को संबोधित करने के लिए नई शिक्षा नीति हेतु कस्तुरीरंगन समिति का गठन किया गया है जिसकी रिपोर्ट संसद में विचारधीन है।
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Discuss the advantages and challenges of using Hydrogen as a fuel with the help of examples. (150 Words/10 marks)
Approach : Introduce an answer by highlighting the mechanism of using hydrogen as a fuel in brief. Explain the advantages of hydrogen fuel. Highlight challenges in using hydrogen fuel. Answer : "Hydrogen as a fuel has been touted for the only abundantly available source of energy that causes no pollution. The by-products of the combustion reaction give out water which can be used for other defined purposes. Thus harnessing energy from it gives an edge to its advantages under SDG goal 7. Some of the advantages of using hydrogen fuel are as follows:- Fuel cells have higher efficiency (Calorific value) than diesel and gas engines. Most fuel cells operate silently compared to IC engine. Hydrogen is non-toxic as compared to natural gas and nuclear energy. Useful for Rocket technology due to its lesser weight and efficient power delivery. Cheap maintenance of fuel cells. Disadvantages: Dependence of fuel cell production on fossil fuels. Costly to produce. It will require huge capital to use on a commercial basis. Hydrogen fuel is flammable. So to avoid an accident, adequate precautions need to be taken. Hydrogen energy cannot sustain a population with current developments in Fuel cell technology. Storage complications is also an issue in the use of hydrogen as a technology. In current scenarios, Hydrogen usage has been confined to Space explorations and Advanced technologies. Despite the fact that hydrogen is bountiful in supply, the cost of harnessing it limits extensive utilization. Even if hydrogen were to become cheap right now, it would take years to become the most used source of energy since vehicles themselves and service stations would need to be customized to conform to hydrogen requirements. This would require massive capital outlay.
##Question:Discuss the advantages and challenges of using Hydrogen as a fuel with the help of examples. (150 Words/10 marks)##Answer:Approach : Introduce an answer by highlighting the mechanism of using hydrogen as a fuel in brief. Explain the advantages of hydrogen fuel. Highlight challenges in using hydrogen fuel. Answer : "Hydrogen as a fuel has been touted for the only abundantly available source of energy that causes no pollution. The by-products of the combustion reaction give out water which can be used for other defined purposes. Thus harnessing energy from it gives an edge to its advantages under SDG goal 7. Some of the advantages of using hydrogen fuel are as follows:- Fuel cells have higher efficiency (Calorific value) than diesel and gas engines. Most fuel cells operate silently compared to IC engine. Hydrogen is non-toxic as compared to natural gas and nuclear energy. Useful for Rocket technology due to its lesser weight and efficient power delivery. Cheap maintenance of fuel cells. Disadvantages: Dependence of fuel cell production on fossil fuels. Costly to produce. It will require huge capital to use on a commercial basis. Hydrogen fuel is flammable. So to avoid an accident, adequate precautions need to be taken. Hydrogen energy cannot sustain a population with current developments in Fuel cell technology. Storage complications is also an issue in the use of hydrogen as a technology. In current scenarios, Hydrogen usage has been confined to Space explorations and Advanced technologies. Despite the fact that hydrogen is bountiful in supply, the cost of harnessing it limits extensive utilization. Even if hydrogen were to become cheap right now, it would take years to become the most used source of energy since vehicles themselves and service stations would need to be customized to conform to hydrogen requirements. This would require massive capital outlay.
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भारत में नागरिक अधिकार पत्र की प्रमुख कमियों की चर्चा कीजिए । साथ ही इन्हें दूर करने के कुछ सुझाव भी प्रस्तुत कीजिए । ( 150-200 शब्द , अंक-10 ) Discuss the major shortcomings of the Citizen"s Charter in India. Also, offer some suggestions to overcome them. (150-200 words, Marks -10 )
दृष्टिकोण : नागरिक अधिकार पत्र की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । भारत में नागरिक अधिकार पत्र की प्रमुख कमियों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । नागरिक अधिकार पत्र की इन कमियों को दूर करने के कुछ सुझाव भी बिन्दुवार रूप में प्रस्तुत कीजिए । उत्तर : नागरिक अधिकार पत्र, नागरिकों के प्रति तय की गई प्रतिबद्धता का एक ऐसा दस्तावेज है जिसका संबंध नागरिकों को उपलब्ध कराई गई सेवाओं से होता है । इसका उद्देश सरकार व नागरिकों के बीच सेतु का कार्य करना है । भारत सरकार के अनुसार नागरिक अधिकार पत्र एक ऐसा दस्तावेज है जिसमें निम्नलिखित को शामिल किया जाता है : संगठन की प्रतिबद्धता । सेवाओं के स्तर । सूचनाओं के विकल्प एवं सुझाव । शिकायत निवारण एवं सेवाओं में लागत आदि । भारत में नागरिक अधिकार पत्र की प्रमुख कमियों को हम निम्नलिखित रूप में देख सकते हैं : नागरिक अधिकार पत्रों को संवैधानिक एवं वैधानिक समर्थन न होने के कारण , इन्हें न्यायपालकीय संरक्षण प्राप्त नहीं हो पाता और न ही उपभोक्ताओं को अधिकार सम्मत रूप में ये प्राप्त हो पाते हैं । अधिकतर नागरिक चार्टर का निर्माण एक बार किया गया , किन्तु उसे अधतन बनाने में कोताही दिखाई गई । नागरिक अधिकार पत्रों का निर्माण परामर्श प्रक्रियाओं के अंतर्गत नहीं किया गया है । जिससे ये जमीनी स्तर पर अपर्याप्त साबित हुए । सार्वजनिक जागरूकता का अभाव होने के कारण भी नागरिक अधिकार पत्र व्यावहारिक रूप धारण नहीं कर सके । नौकरशाही तंत्र आज भी विधिगत प्रक्रियाओं पर आधारित रूढ़िगत मानदंडों के आधार पर कार्य करते हैं , परिणामस्वरूप नागरिक अधिकार पत्रों को लागू कर पाना जटिल । भारत में नागरिक अधिकार पत्र की उपरोक्त कमियों को दूर करने हेतु सुझाव : नागरिक अधिकार पत्रों के माध्यम से सेवाओं का संचालन न होने पर दंडात्मक उपबंधों के प्रारूप निर्धारित किए जाने चाहिए । जिससे ऐसे नागरिक सेवक जो निरुत्साही हैं उन्हें सक्रिय किया जा सके । लोकतांत्रिक नौकरशाही को विकसित करने की प्रक्रिया को तीव्र किया जाना चाहिए । सरकार एवं उसके संगठनों के द्वारा किए जाने वाले अवांछित एवं अतिवायदों पर नियंत्रण । वर्ष 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी राजनीतिक दलों के द्वारा ऐसी घोषणाओं को रोकने हेतु निर्वाचन आयोग को सतर्क किया था । सभी कार्यालयों के द्वारा अपने द्वारा किए जाने वाले कार्यों एवं सेवाओं का उपयुक्त प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए । भारत में परिसंघीय प्रणाली को स्वीकार किया गया है, किन्तु समय-समय पर अनेकों बार केंद्र व राज्यों के बीच विधियों के क्रियान्वयन के स्तर पर विरोध उत्पन्न होते हैं । नागरिक अधिकार पत्रों के संबंध में भी ऐसे विरोध मौजूद हैं। अतः इसे समाप्त करने के लिए सहकारी संघवाद को व्यापक बनाने की आवश्यकता है । एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना के संदर्भ में नागरिक अधिकार पत्र का महत्व सर्वविदित है । अतः भारत सरकार को भी चाहिए कि वह इस दिशा में अपेक्षित कदम उठाए ।
##Question:भारत में नागरिक अधिकार पत्र की प्रमुख कमियों की चर्चा कीजिए । साथ ही इन्हें दूर करने के कुछ सुझाव भी प्रस्तुत कीजिए । ( 150-200 शब्द , अंक-10 ) Discuss the major shortcomings of the Citizen"s Charter in India. Also, offer some suggestions to overcome them. (150-200 words, Marks -10 )##Answer:दृष्टिकोण : नागरिक अधिकार पत्र की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । भारत में नागरिक अधिकार पत्र की प्रमुख कमियों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । नागरिक अधिकार पत्र की इन कमियों को दूर करने के कुछ सुझाव भी बिन्दुवार रूप में प्रस्तुत कीजिए । उत्तर : नागरिक अधिकार पत्र, नागरिकों के प्रति तय की गई प्रतिबद्धता का एक ऐसा दस्तावेज है जिसका संबंध नागरिकों को उपलब्ध कराई गई सेवाओं से होता है । इसका उद्देश सरकार व नागरिकों के बीच सेतु का कार्य करना है । भारत सरकार के अनुसार नागरिक अधिकार पत्र एक ऐसा दस्तावेज है जिसमें निम्नलिखित को शामिल किया जाता है : संगठन की प्रतिबद्धता । सेवाओं के स्तर । सूचनाओं के विकल्प एवं सुझाव । शिकायत निवारण एवं सेवाओं में लागत आदि । भारत में नागरिक अधिकार पत्र की प्रमुख कमियों को हम निम्नलिखित रूप में देख सकते हैं : नागरिक अधिकार पत्रों को संवैधानिक एवं वैधानिक समर्थन न होने के कारण , इन्हें न्यायपालकीय संरक्षण प्राप्त नहीं हो पाता और न ही उपभोक्ताओं को अधिकार सम्मत रूप में ये प्राप्त हो पाते हैं । अधिकतर नागरिक चार्टर का निर्माण एक बार किया गया , किन्तु उसे अधतन बनाने में कोताही दिखाई गई । नागरिक अधिकार पत्रों का निर्माण परामर्श प्रक्रियाओं के अंतर्गत नहीं किया गया है । जिससे ये जमीनी स्तर पर अपर्याप्त साबित हुए । सार्वजनिक जागरूकता का अभाव होने के कारण भी नागरिक अधिकार पत्र व्यावहारिक रूप धारण नहीं कर सके । नौकरशाही तंत्र आज भी विधिगत प्रक्रियाओं पर आधारित रूढ़िगत मानदंडों के आधार पर कार्य करते हैं , परिणामस्वरूप नागरिक अधिकार पत्रों को लागू कर पाना जटिल । भारत में नागरिक अधिकार पत्र की उपरोक्त कमियों को दूर करने हेतु सुझाव : नागरिक अधिकार पत्रों के माध्यम से सेवाओं का संचालन न होने पर दंडात्मक उपबंधों के प्रारूप निर्धारित किए जाने चाहिए । जिससे ऐसे नागरिक सेवक जो निरुत्साही हैं उन्हें सक्रिय किया जा सके । लोकतांत्रिक नौकरशाही को विकसित करने की प्रक्रिया को तीव्र किया जाना चाहिए । सरकार एवं उसके संगठनों के द्वारा किए जाने वाले अवांछित एवं अतिवायदों पर नियंत्रण । वर्ष 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी राजनीतिक दलों के द्वारा ऐसी घोषणाओं को रोकने हेतु निर्वाचन आयोग को सतर्क किया था । सभी कार्यालयों के द्वारा अपने द्वारा किए जाने वाले कार्यों एवं सेवाओं का उपयुक्त प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए । भारत में परिसंघीय प्रणाली को स्वीकार किया गया है, किन्तु समय-समय पर अनेकों बार केंद्र व राज्यों के बीच विधियों के क्रियान्वयन के स्तर पर विरोध उत्पन्न होते हैं । नागरिक अधिकार पत्रों के संबंध में भी ऐसे विरोध मौजूद हैं। अतः इसे समाप्त करने के लिए सहकारी संघवाद को व्यापक बनाने की आवश्यकता है । एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना के संदर्भ में नागरिक अधिकार पत्र का महत्व सर्वविदित है । अतः भारत सरकार को भी चाहिए कि वह इस दिशा में अपेक्षित कदम उठाए ।
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लोक सेवा या जन सेवा की गुणवत्ता से आप क्या समझते हैं ? लोक सेवा की गुणवत्ता को सुनश्चित करने वाले तत्वों को बताते हुए इसमें आने वाली बाधाओं को भी रेखांकित कीजिये | (150-200 शब्द, अंक -10 ) What do you understand by the quality of public service ? While explaining the elements that ensure the quality of public service, underline the constraints in it. (150-200 Words , marks - 10)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत लोक सेवा की गुणवत्ता को स्पष्ट करते हुए कीजिये | इसके पश्चात लोक सेवा की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने वाले तत्वों को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में लोक सेवा की गुणवत्ता में आने वाली बाधाओं को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - लोक सेवा या जन सेवा की गुणवत्ता से आशय सरकार द्वारा दी जाने वाली सेवाओं के सन्दर्भ में जन अपेक्षाओं से है | जैसे - सेवा समयबद्ध आधार पर प्रदान की जाय | सेवा तक सभी नागरिकों की आसान पहुँच हो | सेवाओं को नागरिकों के अनुरूप प्रदान किया जाय | जन शिकायतों का उचित मानते हुए निवारण हेतु उचित तंत्र को विकसित किया जाए | सरकार के द्वारा दी जाने वाली सेवाओं का व्यापक प्रचार एवं प्रसार किया जाए | सरकार के द्वारा जन सेवाओं को प्रस्तुत करते समय समर्पण का होना अति आवश्यक है | लोक सेवा की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने वाले तत्व सेवाओं का प्रस्तुतीकरण द्विपक्षीय संचार पर आधारित होना चाहिए ताकि सरकार को फीडबैक या प्रतिपुष्टि प्राप्त हो | प्रतिपुष्टि के आधार पर सरकार सेवाओं में आवश्यक सुधार एवं नवाचार को प्राप्त करे | लोक सेवाओं को प्रस्तुत करने की प्रक्रिया में लोक निधि का अनुकूलतम प्रयोग किया जाना चाहिए ताकि प्रभावशीलता एवं मितव्ययिता को प्राप्त किया जा सके | सरकार के द्वारा सेवाओं को प्रस्तुत करने के सन्दर्भ में समावेशी विकास को प्राप्त किये जाने पर बल दिया जाना चाहिए | सरकार के द्वारा सेवाओं को प्रस्तुत करते समय समाज के संवेदनशील या कमजोर वर्गों के विशिष्ट हितों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए | सरकार के द्वारा लोक सेवाओं के सन्दर्भ में समर्पण का होना भी आवश्यक है | आदि लोक सेवा की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने में बाधाएं आधारभूत संरचना की कमी भ्रस्टाचार का होना लाल फीताशाही , भाई-भतीजावाद सेवाओं को लेकर विश्वसनीय एवं नियमित सूचनाओं की कमी का होना | लोक सेवा की गुणवत्ता के प्रति लोक अधिकारियों में संवेदनशीलता की कमी का होना | राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण जन सेवा का वितरण संतुलित आधार पर संभव नहीं हो पाता है|, आदि उपरोक्त कमियों से स्पष्ट है कि इन कमियों को दूर करके ही लोक सेवा की गुणवत्ता को सुनिश्चित किया जा सकता है |
##Question:लोक सेवा या जन सेवा की गुणवत्ता से आप क्या समझते हैं ? लोक सेवा की गुणवत्ता को सुनश्चित करने वाले तत्वों को बताते हुए इसमें आने वाली बाधाओं को भी रेखांकित कीजिये | (150-200 शब्द, अंक -10 ) What do you understand by the quality of public service ? While explaining the elements that ensure the quality of public service, underline the constraints in it. (150-200 Words , marks - 10)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत लोक सेवा की गुणवत्ता को स्पष्ट करते हुए कीजिये | इसके पश्चात लोक सेवा की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने वाले तत्वों को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में लोक सेवा की गुणवत्ता में आने वाली बाधाओं को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - लोक सेवा या जन सेवा की गुणवत्ता से आशय सरकार द्वारा दी जाने वाली सेवाओं के सन्दर्भ में जन अपेक्षाओं से है | जैसे - सेवा समयबद्ध आधार पर प्रदान की जाय | सेवा तक सभी नागरिकों की आसान पहुँच हो | सेवाओं को नागरिकों के अनुरूप प्रदान किया जाय | जन शिकायतों का उचित मानते हुए निवारण हेतु उचित तंत्र को विकसित किया जाए | सरकार के द्वारा दी जाने वाली सेवाओं का व्यापक प्रचार एवं प्रसार किया जाए | सरकार के द्वारा जन सेवाओं को प्रस्तुत करते समय समर्पण का होना अति आवश्यक है | लोक सेवा की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने वाले तत्व सेवाओं का प्रस्तुतीकरण द्विपक्षीय संचार पर आधारित होना चाहिए ताकि सरकार को फीडबैक या प्रतिपुष्टि प्राप्त हो | प्रतिपुष्टि के आधार पर सरकार सेवाओं में आवश्यक सुधार एवं नवाचार को प्राप्त करे | लोक सेवाओं को प्रस्तुत करने की प्रक्रिया में लोक निधि का अनुकूलतम प्रयोग किया जाना चाहिए ताकि प्रभावशीलता एवं मितव्ययिता को प्राप्त किया जा सके | सरकार के द्वारा सेवाओं को प्रस्तुत करने के सन्दर्भ में समावेशी विकास को प्राप्त किये जाने पर बल दिया जाना चाहिए | सरकार के द्वारा सेवाओं को प्रस्तुत करते समय समाज के संवेदनशील या कमजोर वर्गों के विशिष्ट हितों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए | सरकार के द्वारा लोक सेवाओं के सन्दर्भ में समर्पण का होना भी आवश्यक है | आदि लोक सेवा की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने में बाधाएं आधारभूत संरचना की कमी भ्रस्टाचार का होना लाल फीताशाही , भाई-भतीजावाद सेवाओं को लेकर विश्वसनीय एवं नियमित सूचनाओं की कमी का होना | लोक सेवा की गुणवत्ता के प्रति लोक अधिकारियों में संवेदनशीलता की कमी का होना | राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण जन सेवा का वितरण संतुलित आधार पर संभव नहीं हो पाता है|, आदि उपरोक्त कमियों से स्पष्ट है कि इन कमियों को दूर करके ही लोक सेवा की गुणवत्ता को सुनिश्चित किया जा सकता है |
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राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति के सम्बन्ध में चर्चा कीजिये| अध्यादेश किन परिस्थितियों में जारी किया जा सकता है? (150-200 शब्द) Discuss the President"s power to issue ordinances. Under what circumstances can the ordinance be issued? (150-200 words)
दृष्टिकोण: 1. संक्षिप्त भूमिका से उत्तर आरंभ कीजिये। 2. राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति की चर्चा कीजिये। 3. अध्यादेश जारी करने हेतू आवश्यक परिस्थितियों का उल्लेख कीजिये। भारतीय संविधान में केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों को स्पष्ट रूप से विभाजित किया गया है। इसके लिए विधायी शक्तियों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया है- केंद्र सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची।केंद्र सूची में शामिल विषयों पर कानून बनाने के सभी अधिकार केंद्र के पास होते हैं जबकि राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार राज्य सरकार के पास होता है। समवर्ती सूची में शामिल विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों ही के पास कानून बनाने का अधिकार होता है| - राष्ट्रपतिकेंद्र सूची और समवर्तीसूची से सम्बंधित विषयों पर अध्यादेश जारी कर सकता है| - संविधान के अनुच्छेद 123 के अंतर्गत राष्ट्रपति के पास अध्यादेश जारी करने का अधिकार है,लेकिन वे इसका इस्तेमाल तभी कर सकते हैं जबकि संबद्ध बिल को संसद की मंजूरी दिलाने के लिए पर्याप्त समय न हो और कानून बनाना अनिवार्य हो। अध्यादेशजारी करने हेतु आवश्यक परिस्थितियां: राष्ट्रपति के इस अधिकार के साथ तीन शर्तें जुड़ी हैं- 1.राष्ट्रपति कैबिनेट की अनुशंसा के बाद ही अध्यादेश जारी कर सकते हैं। 2.अध्यादेश तभी जारी किया जा सकता है जबकि संसद के दोनों में से किसी सदन का सत्र नहीं चल रहा हो। 3.अध्यादेश को संसद की अगली बैठक के छः सप्ताह के अंदर ही उसके सामने पेश करना अनिवार्य है अन्यथा वह निष्प्रभावी हो जाएगा। अकस्मात् परिस्थति को नियंत्रित करने के लिए जारी किये गए अध्यादेश की अवधि न्यूनतम छ: सप्ताह तथा अधिकतम छः मासछ: सप्ताह हो सकती है |
##Question:राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति के सम्बन्ध में चर्चा कीजिये| अध्यादेश किन परिस्थितियों में जारी किया जा सकता है? (150-200 शब्द) Discuss the President"s power to issue ordinances. Under what circumstances can the ordinance be issued? (150-200 words)##Answer: दृष्टिकोण: 1. संक्षिप्त भूमिका से उत्तर आरंभ कीजिये। 2. राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति की चर्चा कीजिये। 3. अध्यादेश जारी करने हेतू आवश्यक परिस्थितियों का उल्लेख कीजिये। भारतीय संविधान में केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों को स्पष्ट रूप से विभाजित किया गया है। इसके लिए विधायी शक्तियों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया है- केंद्र सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची।केंद्र सूची में शामिल विषयों पर कानून बनाने के सभी अधिकार केंद्र के पास होते हैं जबकि राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार राज्य सरकार के पास होता है। समवर्ती सूची में शामिल विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों ही के पास कानून बनाने का अधिकार होता है| - राष्ट्रपतिकेंद्र सूची और समवर्तीसूची से सम्बंधित विषयों पर अध्यादेश जारी कर सकता है| - संविधान के अनुच्छेद 123 के अंतर्गत राष्ट्रपति के पास अध्यादेश जारी करने का अधिकार है,लेकिन वे इसका इस्तेमाल तभी कर सकते हैं जबकि संबद्ध बिल को संसद की मंजूरी दिलाने के लिए पर्याप्त समय न हो और कानून बनाना अनिवार्य हो। अध्यादेशजारी करने हेतु आवश्यक परिस्थितियां: राष्ट्रपति के इस अधिकार के साथ तीन शर्तें जुड़ी हैं- 1.राष्ट्रपति कैबिनेट की अनुशंसा के बाद ही अध्यादेश जारी कर सकते हैं। 2.अध्यादेश तभी जारी किया जा सकता है जबकि संसद के दोनों में से किसी सदन का सत्र नहीं चल रहा हो। 3.अध्यादेश को संसद की अगली बैठक के छः सप्ताह के अंदर ही उसके सामने पेश करना अनिवार्य है अन्यथा वह निष्प्रभावी हो जाएगा। अकस्मात् परिस्थति को नियंत्रित करने के लिए जारी किये गए अध्यादेश की अवधि न्यूनतम छ: सप्ताह तथा अधिकतम छः मासछ: सप्ताह हो सकती है |
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पूर्व मध्यकालीन मूर्तिकला तथा चित्रकला का एक संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत कीजिये| (150-200 शब्द) Give a brief introduction of the sculpture and painting in Early Medieval era. (150–200 words)
एप्रोच- उत्तर के पहले भाग में,पूर्व मध्यकालीन मूर्तिकला का परिचय दीजिये| उत्तर के अंतिम भाग में,पूर्व मध्यकालीन चित्रकला का एक संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत कीजिये| उत्तर- 750 ई. से 1200 ई. तक के काल को पूर्व मध्यकाल की संज्ञा दी जाती है| इस काल में प्रतिहारों, गुजरात के सोलंकी/चालुक्यों, अजमेर के चौहानों, बुंदेलखंड के चंदेलों, वातापी, राष्ट्रकूट एवं कल्याणी के चालुक्यों, पाल वंश, पल्लवों तथा चोलों के शासनकाल में कला के विभिन्न रूपों का व्यापक विकास हुआ था| पूर्व मध्यकालीन मूर्तिकला बड़े पैमाने पर हिंदू धर्म से संबंधित मूर्तियों का निर्माण; दक्षिण एवं पश्चिम भारत में पत्थर एवं धातु से निर्मित नटराज की मूर्तियों को लेकर विशेष तौर पर यह काल आकर्षण का विषय; शिव को नृत्य का स्वामी माना गया है| नृत्य के 2 रूप- रौद्र एवं सौम्य; नृत्य के संदर्भ में ही तांडव नृत्य की भी चर्चा; नटराज की मूर्ति में शिव को विभिन्न मुद्रा में दिखाया जाना; दायें हाथ में डमरू(सृजन का प्रतीक) तथा अभयमुद्रा(भयमुक्त होने का सूचक); बाएं हाथ में अग्नि(विनाश का सूचक) एक हाथ पैर की ओर इशारा करते हुए जो आत्मा की मुक्ति का सूचक; बायाँ पैर नृत्य की मुद्रा में सूचक; बायाँ पैर गति का सूचक; दायाँ पैर राक्षस पर चलते हुए बुराईयों के अंत का सूचक; मूर्ति अग्नि ज्वाला से घिरी हुयी है पवित्रता का सूचक; जैन धर्म से संबंधित मूर्तियों की विशेषताएं मौर्योत्तर एवं गुप्तकाल जैसे ही हैं| विशालता एवं अलंकरण पर बल जैसे- श्रवणबेलगोला में गोमेतेश्वर या बाहुबली की मूर्ति; बुद्ध मूर्तियाँ भी विशालता एवं अलंकरण से युक्त तथा तांत्रिक संप्रदाय का भी प्रभाव; पाल शासकों के संरक्षण में बड़ी संख्या में अष्टधातु से निर्मित मूर्तियों के प्रमाण; मूर्तिकार- धीमन तथा विठ्पाल; पूर्व मध्यकालीन चित्रकला सोलंकी चित्रकला विषय- जैनधर्म एवं आम जनजीवन से संबंधित; लघु चित्रकला के उदाहरण; चित्रों में स्वभाविकता नहीं है जैसे- लंबी आँखें; भावशून्य चेहरा आदि; पाल चित्रकला बुद्ध, बोधिसत्व तथा तांत्रिक संप्रदाय से संबंधित विषय; ये भी लघु चित्रकला का उदाहरण है| प्राकृतिक रंग; चालुक्य/वातापी शैली विषय- बौद्ध, जैन, ब्राह्मण धर्म से संबंधित; राजपरिवार एवं आम जनजीवन से भी संबंधित; भित्तिचित्र के उदाहरण; कुछ प्रमुख चित्र- इंद्र के सभा का चित्र; चालुक्य शासक का चित्र; राष्ट्रकूट चित्रकला/एलोरा पेंटिंग भित्तिचित्र के साक्ष्य; विषय- चालुक्यों की तरह; कुछ प्रमुख चित्र- नटराज का चित्र; गरुड़ का चित्र; घुमड़ते बादल का चित्र; पल्लवकालीन चित्रकला कांची एवं महाबलीपुरम से मंदिरों के दीवारों पर चित्रों के साक्ष्य; चोलकालीन चित्रकला(तंजौर पेंटिंग) वृहद्रेश्वर मंदिर तथा गैंगेयकोंडचोलपुरम मंदिरों के दीवारों से चित्रों के साक्ष्य; विषय- हिंदू धर्म, राजपरिवार तथा आम जनजीवन से संबंधित; प्रमुख चित्र- नटराज का चित्र ; दक्षिण की मुद्रा में शिव का चित्र; त्रिपुरांतक शिव का चित्र; सितनावसल की गुफाओं से जैन धर्म से संबंधित चित्रों का संबंध संभवतः पांड्य काल से है| विजयनगरकालीन चित्र हंपी के विरूपाक्ष मंदिर तथा आंध्रप्रदेश के लेपाक्षी मंदिर से रामायण, महाभारत तथा पौराणिक विषयों से संबंधित चित्रों के साक्ष्य; इसके अलावा, छतीसगढ़ के जोगीमारा की गुफाओं से अजंता से पूर्व भी गुफा चित्रकला या भित्ति चित्रकला के भी साक्ष्य मिलते हैं|
##Question:पूर्व मध्यकालीन मूर्तिकला तथा चित्रकला का एक संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत कीजिये| (150-200 शब्द) Give a brief introduction of the sculpture and painting in Early Medieval era. (150–200 words)##Answer:एप्रोच- उत्तर के पहले भाग में,पूर्व मध्यकालीन मूर्तिकला का परिचय दीजिये| उत्तर के अंतिम भाग में,पूर्व मध्यकालीन चित्रकला का एक संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत कीजिये| उत्तर- 750 ई. से 1200 ई. तक के काल को पूर्व मध्यकाल की संज्ञा दी जाती है| इस काल में प्रतिहारों, गुजरात के सोलंकी/चालुक्यों, अजमेर के चौहानों, बुंदेलखंड के चंदेलों, वातापी, राष्ट्रकूट एवं कल्याणी के चालुक्यों, पाल वंश, पल्लवों तथा चोलों के शासनकाल में कला के विभिन्न रूपों का व्यापक विकास हुआ था| पूर्व मध्यकालीन मूर्तिकला बड़े पैमाने पर हिंदू धर्म से संबंधित मूर्तियों का निर्माण; दक्षिण एवं पश्चिम भारत में पत्थर एवं धातु से निर्मित नटराज की मूर्तियों को लेकर विशेष तौर पर यह काल आकर्षण का विषय; शिव को नृत्य का स्वामी माना गया है| नृत्य के 2 रूप- रौद्र एवं सौम्य; नृत्य के संदर्भ में ही तांडव नृत्य की भी चर्चा; नटराज की मूर्ति में शिव को विभिन्न मुद्रा में दिखाया जाना; दायें हाथ में डमरू(सृजन का प्रतीक) तथा अभयमुद्रा(भयमुक्त होने का सूचक); बाएं हाथ में अग्नि(विनाश का सूचक) एक हाथ पैर की ओर इशारा करते हुए जो आत्मा की मुक्ति का सूचक; बायाँ पैर नृत्य की मुद्रा में सूचक; बायाँ पैर गति का सूचक; दायाँ पैर राक्षस पर चलते हुए बुराईयों के अंत का सूचक; मूर्ति अग्नि ज्वाला से घिरी हुयी है पवित्रता का सूचक; जैन धर्म से संबंधित मूर्तियों की विशेषताएं मौर्योत्तर एवं गुप्तकाल जैसे ही हैं| विशालता एवं अलंकरण पर बल जैसे- श्रवणबेलगोला में गोमेतेश्वर या बाहुबली की मूर्ति; बुद्ध मूर्तियाँ भी विशालता एवं अलंकरण से युक्त तथा तांत्रिक संप्रदाय का भी प्रभाव; पाल शासकों के संरक्षण में बड़ी संख्या में अष्टधातु से निर्मित मूर्तियों के प्रमाण; मूर्तिकार- धीमन तथा विठ्पाल; पूर्व मध्यकालीन चित्रकला सोलंकी चित्रकला विषय- जैनधर्म एवं आम जनजीवन से संबंधित; लघु चित्रकला के उदाहरण; चित्रों में स्वभाविकता नहीं है जैसे- लंबी आँखें; भावशून्य चेहरा आदि; पाल चित्रकला बुद्ध, बोधिसत्व तथा तांत्रिक संप्रदाय से संबंधित विषय; ये भी लघु चित्रकला का उदाहरण है| प्राकृतिक रंग; चालुक्य/वातापी शैली विषय- बौद्ध, जैन, ब्राह्मण धर्म से संबंधित; राजपरिवार एवं आम जनजीवन से भी संबंधित; भित्तिचित्र के उदाहरण; कुछ प्रमुख चित्र- इंद्र के सभा का चित्र; चालुक्य शासक का चित्र; राष्ट्रकूट चित्रकला/एलोरा पेंटिंग भित्तिचित्र के साक्ष्य; विषय- चालुक्यों की तरह; कुछ प्रमुख चित्र- नटराज का चित्र; गरुड़ का चित्र; घुमड़ते बादल का चित्र; पल्लवकालीन चित्रकला कांची एवं महाबलीपुरम से मंदिरों के दीवारों पर चित्रों के साक्ष्य; चोलकालीन चित्रकला(तंजौर पेंटिंग) वृहद्रेश्वर मंदिर तथा गैंगेयकोंडचोलपुरम मंदिरों के दीवारों से चित्रों के साक्ष्य; विषय- हिंदू धर्म, राजपरिवार तथा आम जनजीवन से संबंधित; प्रमुख चित्र- नटराज का चित्र ; दक्षिण की मुद्रा में शिव का चित्र; त्रिपुरांतक शिव का चित्र; सितनावसल की गुफाओं से जैन धर्म से संबंधित चित्रों का संबंध संभवतः पांड्य काल से है| विजयनगरकालीन चित्र हंपी के विरूपाक्ष मंदिर तथा आंध्रप्रदेश के लेपाक्षी मंदिर से रामायण, महाभारत तथा पौराणिक विषयों से संबंधित चित्रों के साक्ष्य; इसके अलावा, छतीसगढ़ के जोगीमारा की गुफाओं से अजंता से पूर्व भी गुफा चित्रकला या भित्ति चित्रकला के भी साक्ष्य मिलते हैं|
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Explain the salient features of the Constitutional 101st Amendment Act 2016.2016.Do you think its effective enough to provide for common national market for goods and services? (150 words)
Approach:- 1. Brief introduction about Act and GST. 2. List the features of the Act. 3. Explain the role of GST in integrating the market. 4. Give a conclusion by highlighting some problems and suggesting a way forward. Answer:- The 101st Constitutional Amendment Act was passed to replace the existing indirect tax structure in India with a new regime of taxes with the name of Goods and Services Tax (GST). GST is a comprehensive indirect tax on manufacture, sale, and consumption of goods and services throughout India. GST would replace many indirect taxes levied by the central and state governments. Key features of the 101st Constitutional Amendment Act: - 1. Article 246 A- Under this article, both Union and States in India now have "concurrent powers" to make law with respect to goods and services. The intra-state trade now comes under the jurisdiction of both Centre and state; while inter-state trade and commerce are "exclusively" under Central Government jurisdiction. 2. Article 269 A - This article says that in case of the inter-state trade, the tax will be levied and collected by the Government of India and shared between the Union and States as per the recommendation of the GST Council. The article also makes it clear that the proceeds such collected will not be credited to the consolidated fund of India or state but respective share shall be assigned to that state or Centre. 3. Article 279 A- GST Council-The GST Council will be a joint forum of the Centre and the States. The Council will make recommendations to the Union and the States on important issues like tax rates, exemption list, threshold limits, etc. One-half of the total number of Members of the Council will constitute the quorum of GST council. 4. Changes in 7th Schedule - changes in different entries in union and state list. 5. Article 268A- It has been repealed so now service tax is subsumed in GST 6. The amendment also provided that Parliament shall, by law, on the recommendation of the Goods and Services Tax Council, provide for compensation tothe States for loss of revenue arising on account of implementation of the goods and services tax for a period of five years. 7. Other features of GST- a) GST is destination based consumption tax. b) GST has three dimensions: Central GST, State GST and Integrated GST c) IGST-The Centre would levy and collect the Integrated Goods and Services Tax (IGST) on all inter-State supply of goods and services. c) Goods and Services Tax Network (GSTN)-jointly set up by the Central and State Governments will provide shared IT infrastructure and services to the Central and State Governments, taxpayers and other stakeholders. c) Input Tax Credit-reducing the taxes paid on inputs from taxes to be paid on output. d) Anti-profiteering-statutory mechanism under GST law to check the unfair profiteering activities by the registered suppliers under GST law. Role of GST in the integration of the market of goods and services: - 1. GST will facilitate seamless credit across the entire supply chain and across all States under a common tax base. 2. Increased Uniformit y: Uniform GST rates will reduce the incentive for evasion by eliminating rate arbitrage between neighbouring States and that between intra and inter-State sales. Harmonization of laws, procedures and rates of tax will make compliance easier and simple. 3. Elimination of Cascading effec t : Goods & Service Tax would eliminate the cascading effects of taxes on production and distribution cost of goods and services. 4. There would be common definitions, common forms/formats, common interface through GST portal, resulting in efficiencies and synergies across the board. This will also remove multiple taxations of the same transactions and inter-State disputes like the ones on entry tax and e-commerce taxation existing today. 5. Increased Certainty : Common procedures for registration of taxpayers, a refund of taxes, uniform formats of tax return, common tax base, a common system of classification of goods or services along with timelines for every activity will lend greater certainty to the taxation system. 6. Increased Digitalization : GST is largely technology-driven. The interface of the taxpayer with the tax authorities will be through the common portal (GSTN). There will be simplified and automated procedures for various processes such as registration, returns, refunds, tax payments, etc. 7. Revenue Gain : Revenue will increase under the GST regime because of the widening of the dealer base by capturing value addition in the distributive trade and increased compliance. 8. Increased Transparency - GST regime will result in increased transparency in the economy. But there are some impediments such as many tax slabs, exclusion of products (petroleum crude, aviation turbine fuel etc.) in the way of a common national market for goods and services. It is the responsibility of the GST council to iron out the differences and realize the dream of a common national market.
##Question:Explain the salient features of the Constitutional 101st Amendment Act 2016.2016.Do you think its effective enough to provide for common national market for goods and services? (150 words)##Answer:Approach:- 1. Brief introduction about Act and GST. 2. List the features of the Act. 3. Explain the role of GST in integrating the market. 4. Give a conclusion by highlighting some problems and suggesting a way forward. Answer:- The 101st Constitutional Amendment Act was passed to replace the existing indirect tax structure in India with a new regime of taxes with the name of Goods and Services Tax (GST). GST is a comprehensive indirect tax on manufacture, sale, and consumption of goods and services throughout India. GST would replace many indirect taxes levied by the central and state governments. Key features of the 101st Constitutional Amendment Act: - 1. Article 246 A- Under this article, both Union and States in India now have "concurrent powers" to make law with respect to goods and services. The intra-state trade now comes under the jurisdiction of both Centre and state; while inter-state trade and commerce are "exclusively" under Central Government jurisdiction. 2. Article 269 A - This article says that in case of the inter-state trade, the tax will be levied and collected by the Government of India and shared between the Union and States as per the recommendation of the GST Council. The article also makes it clear that the proceeds such collected will not be credited to the consolidated fund of India or state but respective share shall be assigned to that state or Centre. 3. Article 279 A- GST Council-The GST Council will be a joint forum of the Centre and the States. The Council will make recommendations to the Union and the States on important issues like tax rates, exemption list, threshold limits, etc. One-half of the total number of Members of the Council will constitute the quorum of GST council. 4. Changes in 7th Schedule - changes in different entries in union and state list. 5. Article 268A- It has been repealed so now service tax is subsumed in GST 6. The amendment also provided that Parliament shall, by law, on the recommendation of the Goods and Services Tax Council, provide for compensation tothe States for loss of revenue arising on account of implementation of the goods and services tax for a period of five years. 7. Other features of GST- a) GST is destination based consumption tax. b) GST has three dimensions: Central GST, State GST and Integrated GST c) IGST-The Centre would levy and collect the Integrated Goods and Services Tax (IGST) on all inter-State supply of goods and services. c) Goods and Services Tax Network (GSTN)-jointly set up by the Central and State Governments will provide shared IT infrastructure and services to the Central and State Governments, taxpayers and other stakeholders. c) Input Tax Credit-reducing the taxes paid on inputs from taxes to be paid on output. d) Anti-profiteering-statutory mechanism under GST law to check the unfair profiteering activities by the registered suppliers under GST law. Role of GST in the integration of the market of goods and services: - 1. GST will facilitate seamless credit across the entire supply chain and across all States under a common tax base. 2. Increased Uniformit y: Uniform GST rates will reduce the incentive for evasion by eliminating rate arbitrage between neighbouring States and that between intra and inter-State sales. Harmonization of laws, procedures and rates of tax will make compliance easier and simple. 3. Elimination of Cascading effec t : Goods & Service Tax would eliminate the cascading effects of taxes on production and distribution cost of goods and services. 4. There would be common definitions, common forms/formats, common interface through GST portal, resulting in efficiencies and synergies across the board. This will also remove multiple taxations of the same transactions and inter-State disputes like the ones on entry tax and e-commerce taxation existing today. 5. Increased Certainty : Common procedures for registration of taxpayers, a refund of taxes, uniform formats of tax return, common tax base, a common system of classification of goods or services along with timelines for every activity will lend greater certainty to the taxation system. 6. Increased Digitalization : GST is largely technology-driven. The interface of the taxpayer with the tax authorities will be through the common portal (GSTN). There will be simplified and automated procedures for various processes such as registration, returns, refunds, tax payments, etc. 7. Revenue Gain : Revenue will increase under the GST regime because of the widening of the dealer base by capturing value addition in the distributive trade and increased compliance. 8. Increased Transparency - GST regime will result in increased transparency in the economy. But there are some impediments such as many tax slabs, exclusion of products (petroleum crude, aviation turbine fuel etc.) in the way of a common national market for goods and services. It is the responsibility of the GST council to iron out the differences and realize the dream of a common national market.
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छद्म नगरीकरण की प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिये? छद्म नगरीकरण के प्रभावों की चर्चा करते हुए इस संदर्भ में किए गए अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों को रेखांकित कीजिये? (150-200 शब्द, 10 अंक) Explain pseudo urbanisation. Discuss various effects of pseudo urbanisation and list out international efforts in this regard. (150-200 words, 10 Marks)
Approach: भूमिका में छद्म नगरीकरण को परिभाषित कीजिये। इसकी अवधारणा को थोड़ा स्पस्ट कीजिये। छद्म नगरीकरण के परिणामों को बिंदुवत्त लिखिए। इस संदर्भ में अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों की चर्चा कीजिये। संक्षिप्त निष्कर्ष से उत्तर समाप्त कीजिये। उत्तर- भारतीय संदर्भ में प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत में सामान्य नगरीकरण की प्रक्रिया के अनेकों साक्ष्य मिलते हैं परंतु दुर्भाग्यवश आधुनिक भारत में ब्रिटिश शासनकाल की नीतियों के दुष्परिणामस्वरूप ग्रामीण सामाजिक संरचना प्रभावित हुई। जिससे शहरों की तरफ पलायन की संख्या में वृद्धि हुई तथा आधुनिक काल खंड में शहरीकरण की प्रक्रिया छदम रही। छदम नगरीकरण से तात्पर्य शहर में तेजी से बढ़ रही जनसंख्या से है जिसके परिणामस्वरूप शहरों में अवसंरचना एवं सुविधाओं के अभाव की स्थिति जन्म लेती है। छद्म नगरीकरण के प्रभाव: स्लम बस्तियों का निर्माण- प्रणव सेन समिति के अनुसार स्लम से तात्पर्य कम से कम 20 परिवारों के ऐसे समूहों से है जो अवसंरचनात्मक अभाव जैसे पक्का घर, विद्यूत आपूर्ति, शुद्ध पेयजल, शुद्ध वायु, स्वच्छता एवं जल निकासी, सड़कों तथा उपयुक्त दूरसंचार सुविधाओं का अभाव हो। प्रजातीय संघर्ष- छ्द्म नगरीकरण के परिणामस्वरूप विभिन्न क्षेत्रों से आए हुए लोगों के बीच सांस्कृतिक सामंजस्य के अभाव का दुष्परिणाम प्रजातीय संघर्ष के रूप में दिखाई पड़ता है। इसका परिणाम क्षेत्रवाद के रूप में भी दिखाई पड़ता है। क्षेत्रवाद से तात्पर्य सांस्कृतिक संकीर्णता से है जिसके अंतर्गत एक क्षेत्र विशेष के लोग पूर्वाग्रही एवं क्षेत्रवादी हो जाते हैं। बढ़ते अपराध एवं घटता लिंगानुपात - छद्म नगरीकरण जिसका मुख्य स्रोत पलायन होता है वह लिंगानुपात पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष पलायन की संख्या स्वभावत: अधिक होती है। महिलों के प्रति अपराध एवं अन्य संदर्भित सामाजिक कुरीतियाँ भी जन्म लेती है यथा वैश्वृयाति। इसके साथ ही तेजी से पलायन का दुष्परिणाम सामाजिक नियंत्रण में कमी के रूप में भी देखा जाता है जिससे छोटे अपराधों की प्रवृति में वृद्धि होती है। वायु, ध्वनि, जल, भूमि प्रदूषण कूड़ा प्रबंधन की समस्या शहरी गरीबी बढ़ते मनोरोग ट्रेफिक जाम की समस्या सार्वजनिक परिवहन के साधनों पर दबाव में वृद्धि इस दिशा में किए गए अंतर्राष्ट्रीय प्रयास: इस दिशा में आधारभूत परिवर्तन का श्रेय हेबीटेट की परिकल्पना को जाता है। वर्ष 1976 में वैंकूवर उद्घोषणा के अंतर्गत हेबीटेट की स्थापना की गयी. इसमें शोध इत्यादि के माध्यम से राष्ट्रों को सतत एवं प्रगतिशील शहरी नीतियाँ बनाने में सहयोग किया जाता है इस दिशा में यह एक वैश्विक दबाव समूह की भूमिका का भी निर्वहन करता है। हेबीटेट 1मेंप्रशासनिक परिसीमन तथा त्वरित विकास हेतु वित्तीय संस्थान बनाए जाने की अनुशंसा की गई। हेबीटेट 2में शहरी विकास के संदर्भ में क्षेत्रीय परिसीमन की आवश्यकता पर बल दिया गया। हेबिटेट 32016 में पर्यावरणीय घटकों को शहरी विकास का अभिन्न अंग मानते हुए हरित पट्टी विस्तार एवं जैव विविधता संरक्षण के महत्व की बात की गयी। बढ़ते आर्थिक विकास ने शहरों पर तथा शहरी संसाधनों पर दबाव बढ़ाया है। अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों के साथ साथ घरेलू स्तर पर प्रयास कर इसके नकारात्मक प्रभावों को कम किया जा सकता है। अमृत योजना तथा स्मार्ट सिटी मिशन इसी दिशा में किए गए सरकारी प्रयास हैं।
##Question:छद्म नगरीकरण की प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिये? छद्म नगरीकरण के प्रभावों की चर्चा करते हुए इस संदर्भ में किए गए अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों को रेखांकित कीजिये? (150-200 शब्द, 10 अंक) Explain pseudo urbanisation. Discuss various effects of pseudo urbanisation and list out international efforts in this regard. (150-200 words, 10 Marks) ##Answer:Approach: भूमिका में छद्म नगरीकरण को परिभाषित कीजिये। इसकी अवधारणा को थोड़ा स्पस्ट कीजिये। छद्म नगरीकरण के परिणामों को बिंदुवत्त लिखिए। इस संदर्भ में अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों की चर्चा कीजिये। संक्षिप्त निष्कर्ष से उत्तर समाप्त कीजिये। उत्तर- भारतीय संदर्भ में प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत में सामान्य नगरीकरण की प्रक्रिया के अनेकों साक्ष्य मिलते हैं परंतु दुर्भाग्यवश आधुनिक भारत में ब्रिटिश शासनकाल की नीतियों के दुष्परिणामस्वरूप ग्रामीण सामाजिक संरचना प्रभावित हुई। जिससे शहरों की तरफ पलायन की संख्या में वृद्धि हुई तथा आधुनिक काल खंड में शहरीकरण की प्रक्रिया छदम रही। छदम नगरीकरण से तात्पर्य शहर में तेजी से बढ़ रही जनसंख्या से है जिसके परिणामस्वरूप शहरों में अवसंरचना एवं सुविधाओं के अभाव की स्थिति जन्म लेती है। छद्म नगरीकरण के प्रभाव: स्लम बस्तियों का निर्माण- प्रणव सेन समिति के अनुसार स्लम से तात्पर्य कम से कम 20 परिवारों के ऐसे समूहों से है जो अवसंरचनात्मक अभाव जैसे पक्का घर, विद्यूत आपूर्ति, शुद्ध पेयजल, शुद्ध वायु, स्वच्छता एवं जल निकासी, सड़कों तथा उपयुक्त दूरसंचार सुविधाओं का अभाव हो। प्रजातीय संघर्ष- छ्द्म नगरीकरण के परिणामस्वरूप विभिन्न क्षेत्रों से आए हुए लोगों के बीच सांस्कृतिक सामंजस्य के अभाव का दुष्परिणाम प्रजातीय संघर्ष के रूप में दिखाई पड़ता है। इसका परिणाम क्षेत्रवाद के रूप में भी दिखाई पड़ता है। क्षेत्रवाद से तात्पर्य सांस्कृतिक संकीर्णता से है जिसके अंतर्गत एक क्षेत्र विशेष के लोग पूर्वाग्रही एवं क्षेत्रवादी हो जाते हैं। बढ़ते अपराध एवं घटता लिंगानुपात - छद्म नगरीकरण जिसका मुख्य स्रोत पलायन होता है वह लिंगानुपात पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष पलायन की संख्या स्वभावत: अधिक होती है। महिलों के प्रति अपराध एवं अन्य संदर्भित सामाजिक कुरीतियाँ भी जन्म लेती है यथा वैश्वृयाति। इसके साथ ही तेजी से पलायन का दुष्परिणाम सामाजिक नियंत्रण में कमी के रूप में भी देखा जाता है जिससे छोटे अपराधों की प्रवृति में वृद्धि होती है। वायु, ध्वनि, जल, भूमि प्रदूषण कूड़ा प्रबंधन की समस्या शहरी गरीबी बढ़ते मनोरोग ट्रेफिक जाम की समस्या सार्वजनिक परिवहन के साधनों पर दबाव में वृद्धि इस दिशा में किए गए अंतर्राष्ट्रीय प्रयास: इस दिशा में आधारभूत परिवर्तन का श्रेय हेबीटेट की परिकल्पना को जाता है। वर्ष 1976 में वैंकूवर उद्घोषणा के अंतर्गत हेबीटेट की स्थापना की गयी. इसमें शोध इत्यादि के माध्यम से राष्ट्रों को सतत एवं प्रगतिशील शहरी नीतियाँ बनाने में सहयोग किया जाता है इस दिशा में यह एक वैश्विक दबाव समूह की भूमिका का भी निर्वहन करता है। हेबीटेट 1मेंप्रशासनिक परिसीमन तथा त्वरित विकास हेतु वित्तीय संस्थान बनाए जाने की अनुशंसा की गई। हेबीटेट 2में शहरी विकास के संदर्भ में क्षेत्रीय परिसीमन की आवश्यकता पर बल दिया गया। हेबिटेट 32016 में पर्यावरणीय घटकों को शहरी विकास का अभिन्न अंग मानते हुए हरित पट्टी विस्तार एवं जैव विविधता संरक्षण के महत्व की बात की गयी। बढ़ते आर्थिक विकास ने शहरों पर तथा शहरी संसाधनों पर दबाव बढ़ाया है। अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों के साथ साथ घरेलू स्तर पर प्रयास कर इसके नकारात्मक प्रभावों को कम किया जा सकता है। अमृत योजना तथा स्मार्ट सिटी मिशन इसी दिशा में किए गए सरकारी प्रयास हैं।
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भारत में पाषण युगीन संस्कृति के विकास का संक्षेप में विवरण प्रस्तुत कीजिये|(150-200 शब्द, 10 अंक) Briefly describe the evolution of the stone age culture in India.(150-200 words, 10 marks)
दृष्टिकोण : 1.भूमिका में पाषाण युग के कालिक विभाजन की चर्चा कीजिये। 2. पुरापाषाण, मध्यपाषाण एवं नवपाषण काल से संबंधित विभिन्न विशेषताओं की चर्चा कीजिये। 3. संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये। पाषाण युग के रूप में उस युग को परिभाषित किया गया है जब प्रागैतिहासिक मनुष्य अपने प्रयोजनों के लिए पत्थरों का उपयोग करते थे| इस युग को तीन भाग- पुरापाषाण युग, मध्य पाषाण युग और नवपाषाण युग में बांटा गया है| पुरापाषाण काल (10000 ई.पू. तक) भारत में सर्वप्रथम पुरापाषाण कालीन चट्टान की खोज रॉबर्ट ब्रूस फूटी ने 1863 में की थी| इस काल में अधिकांश उपकरण कठोर “क्वार्टजाइट” से बनाए जाते थे| इस काल के लोग मुख्यतः“शिकारी” एवं “खाद्य संग्राहक”थे| प्रारंभिक या निम्न पुरापाषाण काल का संबंध मुख्यतः हिम युग से है और इस काल के प्रमुख औजारहस्त-कुठार और कुल्हाड़ी थे| मध्य पुरापाषाण काल की प्रमुख विशेषता शल्क (flakes) से बने औजार हैं| उच्च पुरापाषाण काल में होमो सेपियन्स और नए चकमक पत्थर की उपस्थिति के निशान मिलते हैं| इसके अलावा छोटी मूर्तियों और कला एवं रीति-रिवाजों को दर्शाती अनेक कलाकृतियों की व्यापक उपस्थिति के निशान मिलते हैं| इस काल के प्रमुख औजारहड्डियों से निर्मित औजार, सुई, मछली पकड़ने के उपकरण, हारपून, ब्लेड और खुदाई वाले उपकरणथे| मध्यपाषाण काल (10000- 4000 ई.पू. ) 1.यह पुरापाषाण काल और नवपाषाण काल के बीच का काल है| 2.इस काल की मुख्य विशेषता“माइक्रोलिथ”(लघु पाषाण उपकरण) है| 3. “माइक्रोलिथ”(लघु पाषाण उपकरण) की खोज सर्वप्रथम कार्लाइल द्वारा 1867 में विंध्य क्षेत्र में की गई थी| 4.इस काल के मनुष्यों का मुख्य पेशा शिकार करना, मछली पकड़ना और खाद्य-संग्रह करना था| 5.इस काल में पशुपालन की शुरूआत हुई थी जिसके प्रारंभिक निशान मध्य प्रदेश और राजस्थान से मिले हैं| नवपाषाण काल (4000 ई.पू. से 1800 ई.पू. ) 1.नवपाषाण कालीन उपकरण और औजारों की खोज 1860 में उत्तर प्रदेश में “ली मेसुरियर” द्वारा की गई थी| 2. “नवपाषाणकालीन ताम्रपाषाण युग” आत्मनिर्भर खाद्य अर्थव्यवस्था के रूप मेंविकसितथा| 3. नवपाषाण संस्कृति की प्रमुख विशेषता कृषि-कार्यों की शुरूआत, पशुपालन, पत्थरों के चिकने औजार और मिट्टी के बर्तनों का निर्माण है| भीमबेटका में तीनों कालों के क्रमबद्ध विकास के प्रमाण मिलते हैं; इसके साथ ही जोगीमारा गुफा, बेलन घाटी, नेवासा, नर्मदा घाटी आदि क्षेत्रों में इनकालों से सम्बन्धितप्रमाण मिले हैं|
##Question:भारत में पाषण युगीन संस्कृति के विकास का संक्षेप में विवरण प्रस्तुत कीजिये|(150-200 शब्द, 10 अंक) Briefly describe the evolution of the stone age culture in India.(150-200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण : 1.भूमिका में पाषाण युग के कालिक विभाजन की चर्चा कीजिये। 2. पुरापाषाण, मध्यपाषाण एवं नवपाषण काल से संबंधित विभिन्न विशेषताओं की चर्चा कीजिये। 3. संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये। पाषाण युग के रूप में उस युग को परिभाषित किया गया है जब प्रागैतिहासिक मनुष्य अपने प्रयोजनों के लिए पत्थरों का उपयोग करते थे| इस युग को तीन भाग- पुरापाषाण युग, मध्य पाषाण युग और नवपाषाण युग में बांटा गया है| पुरापाषाण काल (10000 ई.पू. तक) भारत में सर्वप्रथम पुरापाषाण कालीन चट्टान की खोज रॉबर्ट ब्रूस फूटी ने 1863 में की थी| इस काल में अधिकांश उपकरण कठोर “क्वार्टजाइट” से बनाए जाते थे| इस काल के लोग मुख्यतः“शिकारी” एवं “खाद्य संग्राहक”थे| प्रारंभिक या निम्न पुरापाषाण काल का संबंध मुख्यतः हिम युग से है और इस काल के प्रमुख औजारहस्त-कुठार और कुल्हाड़ी थे| मध्य पुरापाषाण काल की प्रमुख विशेषता शल्क (flakes) से बने औजार हैं| उच्च पुरापाषाण काल में होमो सेपियन्स और नए चकमक पत्थर की उपस्थिति के निशान मिलते हैं| इसके अलावा छोटी मूर्तियों और कला एवं रीति-रिवाजों को दर्शाती अनेक कलाकृतियों की व्यापक उपस्थिति के निशान मिलते हैं| इस काल के प्रमुख औजारहड्डियों से निर्मित औजार, सुई, मछली पकड़ने के उपकरण, हारपून, ब्लेड और खुदाई वाले उपकरणथे| मध्यपाषाण काल (10000- 4000 ई.पू. ) 1.यह पुरापाषाण काल और नवपाषाण काल के बीच का काल है| 2.इस काल की मुख्य विशेषता“माइक्रोलिथ”(लघु पाषाण उपकरण) है| 3. “माइक्रोलिथ”(लघु पाषाण उपकरण) की खोज सर्वप्रथम कार्लाइल द्वारा 1867 में विंध्य क्षेत्र में की गई थी| 4.इस काल के मनुष्यों का मुख्य पेशा शिकार करना, मछली पकड़ना और खाद्य-संग्रह करना था| 5.इस काल में पशुपालन की शुरूआत हुई थी जिसके प्रारंभिक निशान मध्य प्रदेश और राजस्थान से मिले हैं| नवपाषाण काल (4000 ई.पू. से 1800 ई.पू. ) 1.नवपाषाण कालीन उपकरण और औजारों की खोज 1860 में उत्तर प्रदेश में “ली मेसुरियर” द्वारा की गई थी| 2. “नवपाषाणकालीन ताम्रपाषाण युग” आत्मनिर्भर खाद्य अर्थव्यवस्था के रूप मेंविकसितथा| 3. नवपाषाण संस्कृति की प्रमुख विशेषता कृषि-कार्यों की शुरूआत, पशुपालन, पत्थरों के चिकने औजार और मिट्टी के बर्तनों का निर्माण है| भीमबेटका में तीनों कालों के क्रमबद्ध विकास के प्रमाण मिलते हैं; इसके साथ ही जोगीमारा गुफा, बेलन घाटी, नेवासा, नर्मदा घाटी आदि क्षेत्रों में इनकालों से सम्बन्धितप्रमाण मिले हैं|
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नैतिक दुविधा से क्या तात्पर्य है ? इस संदर्भ में नैतिक मार्गदर्शन के आधारो की चर्चा कीजिये । (150-200 शब्द, 10 अंक) What is mean by ethical dilemma? Discuss the basis of ethical guidance in this context. (150-200 words, 10 Marks)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत नैतिक दुविधा के बारे में संक्षिप्त में बताते हुए कीजिये | उत्तर के दूसरे भाग में नैतिक दुबिधा के समाधान में मार्गदर्शक आधारों की चर्चा कीजिये । अंत में एक निष्कर्षात्मक शैली में उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - नैतिक दुविधा से तात्पर्य उचित एवं अनुचित के बीच के चयन से संबंधित न होकर बल्कि प्रतिस्पर्धात्मक उचित के बीच का चयन से है । जिसमे कोई भी विकल्प पूर्ण रूप से सही या गलत नही होता , बल्कि उनके सही या गलत होने में डिग्री का अंतर होता है ।कुछ विकल्प कम सही और कुछ ज्यादा सही होते हैं । सिविल सेवक के सेवा कार्य में नैतिक दुबिधा निम्नलिखित बिन्दुओ से समझी जा सकती है :- नियंत्रण बनाम स्व-निर्णय | लोक हित बनाम सार्वजनिक हित | निजीकरण बनाम राष्ट्रीयकरण | आर्थिक मूल्य बनाम सामाजिक मूल्य | राजनीतिक सेवक बनाम लोकसेवक | गोपनीयता एवं पारदर्शिता | तटस्थता एवं प्रतिबद्धता | आदि | उपरोक्त मानकों के कारण लोक सेवक को नैतिक दुबिधा का सामना करना पड़ता है । नैतिक दुबिधा के समाधान हेतु लोक सेवकों द्वारा विधि और अंतरात्मा को नैतिक मार्गदर्शन के स्त्रोत के रूप में अपनाया जाता है । जिसमे विधि बाहरी मार्गदर्शक के रूप में तथा अंतरात्मा आंतरिक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करती है । इसको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है- विधि का आशय , नियम , मान्यताओ , परम्पराओं आदि से है जो की संगठन या समाज प्रत्येक के लिए बाध्यकारी होता है । विधि लिखित और अलिखित दोनों हो सकता है । विधि स्वतः अपने आप में नैतिक मूल्यो का सहिंताकरण है जोकि सामाजिक व्यवस्था को नियंत्रित करती है और सामाजिक व्यवस्था समाज में विद्यमान नैतिक व्यवस्था पर निर्भर होती है । विधि नैतिकता को नियमित करती है और नैतिकता स्वतः विधि के द्वारा नियमित होती है । कोई विधि सामाजिक स्वीकृति को तभी प्राप्त करती है जब वह सामाजिक नैतिक मूल्यो के अनुरूप हो । वैधानिकता और नैतिकता एक दूसरे पर परस्पर रूप से निर्भर हैं । एक अच्छा नागरिक बनने हेतु विधि का अनुपालन किया जाना आवश्यक है। जबकि एक अच्छा मानव प्राणी बनने के लिए नैतिकता का अनुपालन किया जाना आवश्यक है । एक अच्छा नागरिक सदैव अच्छा मानव हो या एक अच्छा मानव सदैव अच्छा नागरिक हो यह अनिवार्य नही है लेकिन इसकी संभावना अधिक है । प्रत्येक विधि नैतिक मूल्यो का संहिताकरण है। अतः अच्छे नागरिक द्वारा विधि का पालन किया जाना स्वतः नैतिक मूल्यो के अनुपालन को भी दर्शाती है । विधि कोई सुझाव या अनुशंसा नही बल्कि बाध्यकारी होती है । जब विधि के द्वारा नैतिक दुबिधा के समाधान हेतु मार्गदर्शन संभव न हो तो व्यक्ति अंतरात्मा की ओर देखता है जो नैतिक मार्गदर्शन का आंतरिक स्त्रोत है । अंतरात्मा कोई भावना या अनुभूति न होकर तार्किक चिंतन और विवेकशीलता पर आधारित है। अंतरात्मा मानव प्राणी का आधार है । अतः प्रत्येक व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह अंतरात्मा का अनुपालन करे । अतः लोक सेवको के द्वारा नैतिक दुबिधा के समाधान में विधि के साथ साथ अंतरात्मा का मार्गदर्शन अतिआवश्यक होता है । अंतरात्मा के मार्गदर्शन के लिए, अंतरात्मा को शिक्षित किया जाना और अधिक महत्वपूर्ण होता है क्योकि प्रशासन व प्रबंधन का आशय चीज़ों को उचित तरीके से किए जाने से है | अंतरात्मा का आधार विवेकशीलता है । महात्मा गांधी के अनुसार अंतरात्मा के न्यायालय से अपील का कोई अन्य उच्चतर न्यायालय नही है।
##Question:नैतिक दुविधा से क्या तात्पर्य है ? इस संदर्भ में नैतिक मार्गदर्शन के आधारो की चर्चा कीजिये । (150-200 शब्द, 10 अंक) What is mean by ethical dilemma? Discuss the basis of ethical guidance in this context. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत नैतिक दुविधा के बारे में संक्षिप्त में बताते हुए कीजिये | उत्तर के दूसरे भाग में नैतिक दुबिधा के समाधान में मार्गदर्शक आधारों की चर्चा कीजिये । अंत में एक निष्कर्षात्मक शैली में उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - नैतिक दुविधा से तात्पर्य उचित एवं अनुचित के बीच के चयन से संबंधित न होकर बल्कि प्रतिस्पर्धात्मक उचित के बीच का चयन से है । जिसमे कोई भी विकल्प पूर्ण रूप से सही या गलत नही होता , बल्कि उनके सही या गलत होने में डिग्री का अंतर होता है ।कुछ विकल्प कम सही और कुछ ज्यादा सही होते हैं । सिविल सेवक के सेवा कार्य में नैतिक दुबिधा निम्नलिखित बिन्दुओ से समझी जा सकती है :- नियंत्रण बनाम स्व-निर्णय | लोक हित बनाम सार्वजनिक हित | निजीकरण बनाम राष्ट्रीयकरण | आर्थिक मूल्य बनाम सामाजिक मूल्य | राजनीतिक सेवक बनाम लोकसेवक | गोपनीयता एवं पारदर्शिता | तटस्थता एवं प्रतिबद्धता | आदि | उपरोक्त मानकों के कारण लोक सेवक को नैतिक दुबिधा का सामना करना पड़ता है । नैतिक दुबिधा के समाधान हेतु लोक सेवकों द्वारा विधि और अंतरात्मा को नैतिक मार्गदर्शन के स्त्रोत के रूप में अपनाया जाता है । जिसमे विधि बाहरी मार्गदर्शक के रूप में तथा अंतरात्मा आंतरिक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करती है । इसको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है- विधि का आशय , नियम , मान्यताओ , परम्पराओं आदि से है जो की संगठन या समाज प्रत्येक के लिए बाध्यकारी होता है । विधि लिखित और अलिखित दोनों हो सकता है । विधि स्वतः अपने आप में नैतिक मूल्यो का सहिंताकरण है जोकि सामाजिक व्यवस्था को नियंत्रित करती है और सामाजिक व्यवस्था समाज में विद्यमान नैतिक व्यवस्था पर निर्भर होती है । विधि नैतिकता को नियमित करती है और नैतिकता स्वतः विधि के द्वारा नियमित होती है । कोई विधि सामाजिक स्वीकृति को तभी प्राप्त करती है जब वह सामाजिक नैतिक मूल्यो के अनुरूप हो । वैधानिकता और नैतिकता एक दूसरे पर परस्पर रूप से निर्भर हैं । एक अच्छा नागरिक बनने हेतु विधि का अनुपालन किया जाना आवश्यक है। जबकि एक अच्छा मानव प्राणी बनने के लिए नैतिकता का अनुपालन किया जाना आवश्यक है । एक अच्छा नागरिक सदैव अच्छा मानव हो या एक अच्छा मानव सदैव अच्छा नागरिक हो यह अनिवार्य नही है लेकिन इसकी संभावना अधिक है । प्रत्येक विधि नैतिक मूल्यो का संहिताकरण है। अतः अच्छे नागरिक द्वारा विधि का पालन किया जाना स्वतः नैतिक मूल्यो के अनुपालन को भी दर्शाती है । विधि कोई सुझाव या अनुशंसा नही बल्कि बाध्यकारी होती है । जब विधि के द्वारा नैतिक दुबिधा के समाधान हेतु मार्गदर्शन संभव न हो तो व्यक्ति अंतरात्मा की ओर देखता है जो नैतिक मार्गदर्शन का आंतरिक स्त्रोत है । अंतरात्मा कोई भावना या अनुभूति न होकर तार्किक चिंतन और विवेकशीलता पर आधारित है। अंतरात्मा मानव प्राणी का आधार है । अतः प्रत्येक व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह अंतरात्मा का अनुपालन करे । अतः लोक सेवको के द्वारा नैतिक दुबिधा के समाधान में विधि के साथ साथ अंतरात्मा का मार्गदर्शन अतिआवश्यक होता है । अंतरात्मा के मार्गदर्शन के लिए, अंतरात्मा को शिक्षित किया जाना और अधिक महत्वपूर्ण होता है क्योकि प्रशासन व प्रबंधन का आशय चीज़ों को उचित तरीके से किए जाने से है | अंतरात्मा का आधार विवेकशीलता है । महात्मा गांधी के अनुसार अंतरात्मा के न्यायालय से अपील का कोई अन्य उच्चतर न्यायालय नही है।
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सार्वजनिक वितरण प्रणाली से आप क्या समझते हैं? भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की चुनौतियों को रेखांकित करते हुए दूर करने केउपायों की चर्चा कीजिये। (10 अंक I 150-200 शब्द) What do you understand by public distribution system? List out challenges of Indian public distribution system and also suggest some measures. (10 marks I 150-200 words)
Approach: सार्वजनिक वितरण प्रणाली की पृष्ठभूमि से भूमिका लिख सकते हैं। पीडीएस को स्पष्ट कीजिये पीडीएस तंत्र में निहित चुनौतियों की चर्चा कीजिये इन चुनौतियों को दूर करने के उपायों पर चर्चा कीजिये। उत्तर: भारत में निम्न आयवर्ग के व्यक्तियों को खाद्य सुरक्षा उपलब्ध कारवाई जाती है। भारतीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत गरीब एवं निम्न आय वर्ग को उचित मूल्य की दुकान से खाद्यान्न उपलब्ध कराया जाता है। किसानों से खाद्यान्न खरीद से लेकर अंतिम लाभार्थी तक पहुँचाने की प्रक्रिया सार्वजनिक वितरण प्रणाली कहलाती है। PDS से जुड़ी समस्याएँ उपयोगकर्ताओं को अकसर मात्रा के संबंध में सही हक नहीं मिल पाना राशन की दुकानें हर दिन नहीं खुलना तथा सीमित समय के लिए खुलना निर्धारित दरों से अधिक दाम वसूला जाना सदस्य के नाम जोड़ने व हटाने के लिए भ्रष्टाचार प्रदान किए जाने वाले राशन की गुणवत्ता खराब होना PDS से जुड़ी समस्याओं को दूर करने के उपाय: सभी राशन दुकानों का गैर-निजीकरण कर तंत्र को प्रभावी बनाया जा सकता है। राशन की दुकान चलाने का कार्य अन्य सार्वजनिक संस्थानों तथा सामुदायिक संस्थानों को सौंपा जा सकता है। केंद्रीकृत ऑनलाइन वास्तविक समय इलेक्ट्रोनिक PDS (कोर पीडीएस) का उपयोग किया जा सकता है। जनता को शामिल करने के लिए ऑनलाइन सिस्टम का उपयोग किया जा सकता है। राशन की दुकान पर राशन के संग्रह और वितरण के बारे में सभी जानकारी वैबसाइट पर उपलब्ध करवाया जा सकता है। लोगों को राशन प्रवाह के लिए SMS अलर्ट जारी किया जाना चाहिए। आपूर्ति बिक्री के सभी रेकॉर्ड कम्प्यूटरीकृत किया जा सकता है। PDS योजना के अंतर्गत सभी राशन की दुकानें चलाने वाले लोग उपभोक्ताओं के प्रति जवाबदेह होंगे राज्य सरकार अपनी पसंद की दुकान से राशन खरीदने का विकल्प उपलब्ध करवा सकती है। इन सभी विशेषताओं को छत्तीसगढ़ द्वारा अपनाया गया जिससे पीडीएस तंत्र में काफी सुधार हुआ तथा लीकज में भी काफी कमी हुई है। इन विशेषताओं को सभी राज्यों में अपनाकर तंत्र को प्रभावी बनाया जा सकता है।
##Question:सार्वजनिक वितरण प्रणाली से आप क्या समझते हैं? भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की चुनौतियों को रेखांकित करते हुए दूर करने केउपायों की चर्चा कीजिये। (10 अंक I 150-200 शब्द) What do you understand by public distribution system? List out challenges of Indian public distribution system and also suggest some measures. (10 marks I 150-200 words)##Answer:Approach: सार्वजनिक वितरण प्रणाली की पृष्ठभूमि से भूमिका लिख सकते हैं। पीडीएस को स्पष्ट कीजिये पीडीएस तंत्र में निहित चुनौतियों की चर्चा कीजिये इन चुनौतियों को दूर करने के उपायों पर चर्चा कीजिये। उत्तर: भारत में निम्न आयवर्ग के व्यक्तियों को खाद्य सुरक्षा उपलब्ध कारवाई जाती है। भारतीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत गरीब एवं निम्न आय वर्ग को उचित मूल्य की दुकान से खाद्यान्न उपलब्ध कराया जाता है। किसानों से खाद्यान्न खरीद से लेकर अंतिम लाभार्थी तक पहुँचाने की प्रक्रिया सार्वजनिक वितरण प्रणाली कहलाती है। PDS से जुड़ी समस्याएँ उपयोगकर्ताओं को अकसर मात्रा के संबंध में सही हक नहीं मिल पाना राशन की दुकानें हर दिन नहीं खुलना तथा सीमित समय के लिए खुलना निर्धारित दरों से अधिक दाम वसूला जाना सदस्य के नाम जोड़ने व हटाने के लिए भ्रष्टाचार प्रदान किए जाने वाले राशन की गुणवत्ता खराब होना PDS से जुड़ी समस्याओं को दूर करने के उपाय: सभी राशन दुकानों का गैर-निजीकरण कर तंत्र को प्रभावी बनाया जा सकता है। राशन की दुकान चलाने का कार्य अन्य सार्वजनिक संस्थानों तथा सामुदायिक संस्थानों को सौंपा जा सकता है। केंद्रीकृत ऑनलाइन वास्तविक समय इलेक्ट्रोनिक PDS (कोर पीडीएस) का उपयोग किया जा सकता है। जनता को शामिल करने के लिए ऑनलाइन सिस्टम का उपयोग किया जा सकता है। राशन की दुकान पर राशन के संग्रह और वितरण के बारे में सभी जानकारी वैबसाइट पर उपलब्ध करवाया जा सकता है। लोगों को राशन प्रवाह के लिए SMS अलर्ट जारी किया जाना चाहिए। आपूर्ति बिक्री के सभी रेकॉर्ड कम्प्यूटरीकृत किया जा सकता है। PDS योजना के अंतर्गत सभी राशन की दुकानें चलाने वाले लोग उपभोक्ताओं के प्रति जवाबदेह होंगे राज्य सरकार अपनी पसंद की दुकान से राशन खरीदने का विकल्प उपलब्ध करवा सकती है। इन सभी विशेषताओं को छत्तीसगढ़ द्वारा अपनाया गया जिससे पीडीएस तंत्र में काफी सुधार हुआ तथा लीकज में भी काफी कमी हुई है। इन विशेषताओं को सभी राज्यों में अपनाकर तंत्र को प्रभावी बनाया जा सकता है।
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नागर शैली की महत्वपूर्ण विशेषताओं का संक्षेप में वर्णन करते हुए द्रविड़ शैली से अंतरों को बताये|(150-200 शब्द) Briefly describe the important features of the Nagara style and explain the differences from the Dravidian style. (150-200 words)
"नागर" शब्द नगर से बना है। सर्वप्रथम नगर में निर्माण होने के कारण इन्हे नागर की संज्ञा प्रदान की गई। नागर शैली की बहुलता मुख्यतः उत्तर व मध्य भारतीय परिक्षेत्र में है। नागर शैली का प्रसार हिमालय से लेकर विंध्य पर्वत माला तक विशेषत: नर्मदा नदी के उत्तरी क्षेत्र तक देखा जा सकता है। यह कहीं-कहीं अपनी सीमाओं से आगे भी विस्तारित हो गयी है । नागर शैली की महत्वपूर्ण विशेषताएं - गर्भगृह- मुख्य देवता की मूर्ति का स्थान| अधिष्ठान - मूल आधार, जिस पर सम्पूर्ण भवन खड़ा किया जाता है। शिखर - मंदिर का शीर्ष भाग अथवा गर्भगृह का उपरी भाग| कलश - शिखर का शीर्षभाग, जो कलश ही या कलशवत् होता है। आमलक - शिखर के शीर्ष पर कलश के नीचे का वर्तुलाकार भाग| प्रदक्षिणा पथ - गर्भगृह के चारों ओर परिक्रमा मार्ग| आधार से लेकर सर्वोच्च अंश तक इसका चतुष्कोण होना| नागर शैली एवं द्रविड़ शैली में अंतर: कृष्णा नदी से लेकर कन्याकुमारी तक द्रविड़ शैली के मंदिर पाए जाते हैं| द्रविड़ शैली के मंदिरों के विभिन्न अंगों के नामकरण को लेकर एवं कुछ क्रियाकलापों के स्तर पर यह नागर शैली के मंदिरों से भिन्न होते हैं| द्रविड़ शैली की पहचान विशेषताओं में- प्राकार (चहारदीवारी), गोपुरम (प्रवेश द्वार), वर्गाकार या अष्टकोणीय गर्भगृह (रथ), पिरामिडनुमा शिखर, मंडप (नंदी मंडप) विशाल संकेन्द्रित प्रांगण तथा अष्टकोण मंदिर संरचना शामिल हैं| द्रविड़ शैली के मंदिर बहुमंजिला होते हैं। नागर शैली के मंदिर सामान्यतः एक या दो मंजिल तक ही सीमित रहते हैं| द्रविड़ शैली के मंदिर जहाँचहारदीवारी से घिरे होते हैं वहीँ नागर शैली के मंदिर खुले मैदान में स्थित होते हैं| द्रविड़ शैली के मंदिर आर्थिक क्रियाओं में भी सम्मिलित रहते थे, नागर शैली सम्बन्धी मंदिर ऐसी क्रियाओं में संलग्न नहीं|
##Question:नागर शैली की महत्वपूर्ण विशेषताओं का संक्षेप में वर्णन करते हुए द्रविड़ शैली से अंतरों को बताये|(150-200 शब्द) Briefly describe the important features of the Nagara style and explain the differences from the Dravidian style. (150-200 words)##Answer:"नागर" शब्द नगर से बना है। सर्वप्रथम नगर में निर्माण होने के कारण इन्हे नागर की संज्ञा प्रदान की गई। नागर शैली की बहुलता मुख्यतः उत्तर व मध्य भारतीय परिक्षेत्र में है। नागर शैली का प्रसार हिमालय से लेकर विंध्य पर्वत माला तक विशेषत: नर्मदा नदी के उत्तरी क्षेत्र तक देखा जा सकता है। यह कहीं-कहीं अपनी सीमाओं से आगे भी विस्तारित हो गयी है । नागर शैली की महत्वपूर्ण विशेषताएं - गर्भगृह- मुख्य देवता की मूर्ति का स्थान| अधिष्ठान - मूल आधार, जिस पर सम्पूर्ण भवन खड़ा किया जाता है। शिखर - मंदिर का शीर्ष भाग अथवा गर्भगृह का उपरी भाग| कलश - शिखर का शीर्षभाग, जो कलश ही या कलशवत् होता है। आमलक - शिखर के शीर्ष पर कलश के नीचे का वर्तुलाकार भाग| प्रदक्षिणा पथ - गर्भगृह के चारों ओर परिक्रमा मार्ग| आधार से लेकर सर्वोच्च अंश तक इसका चतुष्कोण होना| नागर शैली एवं द्रविड़ शैली में अंतर: कृष्णा नदी से लेकर कन्याकुमारी तक द्रविड़ शैली के मंदिर पाए जाते हैं| द्रविड़ शैली के मंदिरों के विभिन्न अंगों के नामकरण को लेकर एवं कुछ क्रियाकलापों के स्तर पर यह नागर शैली के मंदिरों से भिन्न होते हैं| द्रविड़ शैली की पहचान विशेषताओं में- प्राकार (चहारदीवारी), गोपुरम (प्रवेश द्वार), वर्गाकार या अष्टकोणीय गर्भगृह (रथ), पिरामिडनुमा शिखर, मंडप (नंदी मंडप) विशाल संकेन्द्रित प्रांगण तथा अष्टकोण मंदिर संरचना शामिल हैं| द्रविड़ शैली के मंदिर बहुमंजिला होते हैं। नागर शैली के मंदिर सामान्यतः एक या दो मंजिल तक ही सीमित रहते हैं| द्रविड़ शैली के मंदिर जहाँचहारदीवारी से घिरे होते हैं वहीँ नागर शैली के मंदिर खुले मैदान में स्थित होते हैं| द्रविड़ शैली के मंदिर आर्थिक क्रियाओं में भी सम्मिलित रहते थे, नागर शैली सम्बन्धी मंदिर ऐसी क्रियाओं में संलग्न नहीं|
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नागर शैली की महत्वपूर्ण विशेषताओं का संक्षेप में वर्णन करते हुए द्रविड़ शैली से अंतरों को स्पष्ट कीजिये | (10 अंक /150-200 शब्द) Briefly describe the important features of the Nagara style and explain the differences from the Dravidian style. (10 Marks/150-200 words)
दृष्टिकोण: 1. मंदिर निर्माण की विभिन्न शैलियों का भूमिका में उल्लेख कीजिये। 2. मंदिर निर्माण की नागर शैली की प्रमुख विशेषताओं को सूचीबद्धकीजिये। 3. नागर शैली एवं द्रविड़ शैली के मध्य प्रमुख अंतरों को सूचीबद्ध कीजिये। नागर" शब्द नगर से बना है। सर्वप्रथम नगर में निर्माण होने के कारण इन्हे नागर की संज्ञा प्रदान की गई। नागर शैली की बहुलता मुख्यतः उत्तर व मध्य भारतीय परिक्षेत्र में है। नागर शैली का प्रसार हिमालय से लेकर विंध्य पर्वत माला तक विशेषत: नर्मदा नदी के उत्तरी क्षेत्र तक देखा जा सकता है। यह कहीं-कहीं अपनी सीमाओं से आगे भी विस्तारित हो गयी है । नागर शैली की महत्वपूर्ण विशेषताएं - 1. गर्भगृह- मुख्य देवता की मूर्ति का स्थान| 2. अधिष्ठान - मूल आधार, जिस पर सम्पूर्ण भवन खड़ा किया जाता है। 3. शिखर - मंदिर का शीर्ष भाग अथवा गर्भगृह का उपरी भाग| 4. कलश - शिखर का शीर्षभाग, जो कलश ही या कलशवत् होता है। 5. आमलक - शिखर के शीर्ष पर कलश के नीचे का वर्तुलाकार भाग| 6. प्रदक्षिणा पथ - गर्भगृह के चारों ओर परिक्रमा मार्ग| 7. आधार से लेकर सर्वोच्च अंश तक इसका चतुष्कोण होना| नागर शैली एवं द्रविड़ शैली में अंतर : 1. कृष्णा नदी से लेकर कन्याकुमारी तक द्रविड़ शैली के मंदिर पाए जाते हैं| द्रविड़ शैली के मंदिरों के विभिन्न अंगों के नामकरण को लेकर एवं कुछ क्रियाकलापों के स्तर पर यह नागर शैली के मंदिरों से भिन्न होते हैं| 2. द्रविड़ शैली की पहचान विशेषताओं में- प्राकार (चहारदीवारी), गोपुरम (प्रवेश द्वार), वर्गाकार या अष्टकोणीय गर्भगृह (रथ), पिरामिडनुमा शिखर, मंडप (नंदी मंडप) विशाल संकेन्द्रित प्रांगण तथा अष्टकोण मंदिर संरचना शामिल हैं| 3. द्रविड़ शैली के मंदिर बहुमंजिला होते हैं। नागर शैली के मंदिर सामान्यतः एक या दो मंजिल तक ही सीमित रहते हैं| 4. द्रविड़ शैली के मंदिर जहाँचहारदीवारी से घिरे होते हैं वहीँ नागर शैली के मंदिर खुले मैदान में स्थित होते हैं| 5. द्रविड़ शैली के मंदिर आर्थिक क्रियाओं में भी सम्मिलित रहते थे, नागर शैली सम्बन्धी मंदिर ऐसी क्रियाओं में संलग्न नहीं|
##Question:नागर शैली की महत्वपूर्ण विशेषताओं का संक्षेप में वर्णन करते हुए द्रविड़ शैली से अंतरों को स्पष्ट कीजिये | (10 अंक /150-200 शब्द) Briefly describe the important features of the Nagara style and explain the differences from the Dravidian style. (10 Marks/150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण: 1. मंदिर निर्माण की विभिन्न शैलियों का भूमिका में उल्लेख कीजिये। 2. मंदिर निर्माण की नागर शैली की प्रमुख विशेषताओं को सूचीबद्धकीजिये। 3. नागर शैली एवं द्रविड़ शैली के मध्य प्रमुख अंतरों को सूचीबद्ध कीजिये। नागर" शब्द नगर से बना है। सर्वप्रथम नगर में निर्माण होने के कारण इन्हे नागर की संज्ञा प्रदान की गई। नागर शैली की बहुलता मुख्यतः उत्तर व मध्य भारतीय परिक्षेत्र में है। नागर शैली का प्रसार हिमालय से लेकर विंध्य पर्वत माला तक विशेषत: नर्मदा नदी के उत्तरी क्षेत्र तक देखा जा सकता है। यह कहीं-कहीं अपनी सीमाओं से आगे भी विस्तारित हो गयी है । नागर शैली की महत्वपूर्ण विशेषताएं - 1. गर्भगृह- मुख्य देवता की मूर्ति का स्थान| 2. अधिष्ठान - मूल आधार, जिस पर सम्पूर्ण भवन खड़ा किया जाता है। 3. शिखर - मंदिर का शीर्ष भाग अथवा गर्भगृह का उपरी भाग| 4. कलश - शिखर का शीर्षभाग, जो कलश ही या कलशवत् होता है। 5. आमलक - शिखर के शीर्ष पर कलश के नीचे का वर्तुलाकार भाग| 6. प्रदक्षिणा पथ - गर्भगृह के चारों ओर परिक्रमा मार्ग| 7. आधार से लेकर सर्वोच्च अंश तक इसका चतुष्कोण होना| नागर शैली एवं द्रविड़ शैली में अंतर : 1. कृष्णा नदी से लेकर कन्याकुमारी तक द्रविड़ शैली के मंदिर पाए जाते हैं| द्रविड़ शैली के मंदिरों के विभिन्न अंगों के नामकरण को लेकर एवं कुछ क्रियाकलापों के स्तर पर यह नागर शैली के मंदिरों से भिन्न होते हैं| 2. द्रविड़ शैली की पहचान विशेषताओं में- प्राकार (चहारदीवारी), गोपुरम (प्रवेश द्वार), वर्गाकार या अष्टकोणीय गर्भगृह (रथ), पिरामिडनुमा शिखर, मंडप (नंदी मंडप) विशाल संकेन्द्रित प्रांगण तथा अष्टकोण मंदिर संरचना शामिल हैं| 3. द्रविड़ शैली के मंदिर बहुमंजिला होते हैं। नागर शैली के मंदिर सामान्यतः एक या दो मंजिल तक ही सीमित रहते हैं| 4. द्रविड़ शैली के मंदिर जहाँचहारदीवारी से घिरे होते हैं वहीँ नागर शैली के मंदिर खुले मैदान में स्थित होते हैं| 5. द्रविड़ शैली के मंदिर आर्थिक क्रियाओं में भी सम्मिलित रहते थे, नागर शैली सम्बन्धी मंदिर ऐसी क्रियाओं में संलग्न नहीं|
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भारत में नगरीय विकास हेतु किए गए प्रयासों की चर्चा कीजिये। इस संदर्भ में चलायी जा रही विभिन्न योजनाओं तथा कार्यक्रमों को सूचीबद्ध कीजिये। (150-200 शब्द) Discuss effort made in India for urban development. List out various schemes and programmes running in India for urban development. (150-200 words)
Approach: नगरीय विकास की चर्चा करते हुए भूमिका लिख सकते हैं। नगरीय विकास हेतु भारत सरकार द्वारा किए गए प्रयासों की कालक्रमानुसार चर्चा कीजिये। वर्तमान में नगरों के विकास हेतु चलायी जा रही महत्वपूर्ण योजना की चर्चा कीजिये उत्तर- आर्थिक विकास के साथ ही नगरों का विकास दृष्टिगत होता है। भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार 32% जनसंख्या नगरों में निवास करती है जिसके जल्द ही 50% तक बढ्ने की संभावना है। बढ़ती नगरीय जनसंख्या के मद्देनजर सरकारी प्रयासों द्वारा इसे नियोजित करने का प्रयास किया जाता है। नगरीय विकास हेतु किए गए प्रयास: वर्ष 1976 में भारत सरकार द्वारा हुड़को की स्थापना की गयी जो नगरीकरण के संदर्भ में वित्तीय एवं तकनीकी सहायता प्रदान करने हेतु सर्वोच्च संस्थान है जिससे नगरीकरण की प्रक्रिया को तेज किया जा सके। वर्ष 2005 में जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीनीकरण कार्यक्रम के अंतर्गत न सिर्फ अवसंरचनात्मक विकास अपितु साथ ही शहरी गरीबी निवारण हेतु अतिरिक्त प्रयास किए जाने के उद्देश्य के साथ दो अलग अलग मंत्रालय बनाते हुए प्रयासों को त्वरित किया गया। वर्ष 2014 में इन दोनों मंत्रालयों को एकीकृत करते हुए शहरी मामलों के संदर्भ में आवासीय एवं शहरी मामले के मंत्रालय का गठन किया गया 2013 में पथ विक्रेता अधिनियम के अंतर्गत पंजीकरण की प्रक्रिया द्वारा इन पथ विक्रेताओं को जीविकोपार्जन के विकल्प दिये जा रहे हैं एवं साथ ही विक्रय पदार्थों की गुणवत्ता में भी सुधार किए जा रहे हैं। नगरीय विकास हेतु योजनाएँ: AMRUT (अटल मिशन फॉर रेजुंन्वेशन एवं अर्बन ट्रांसफोरमेशन) योजना अमृत को लागू करते हुए शहरों के नवीनीकरण को और प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसके तहत 500 शहरों को नवीनीकृत करने के प्रयास किए जा रहे हैं, जिसमें वे सभी शहर जो हेरिटेज सिटी हैं या 1 लाख से अधिक आबादी वाले हैं, राज्यों की राजधानी हैं या पर्वतीय रार्ज्यों के शहर है, शामिल हैं इस योजना के अंतर्गत शुद्ध पेयजल आपूर्ति को अति महत्वपूर्ण लक्ष्य रखा गया है इसके साथ ही सीवरेज क्षमता को बढ़ाना तथा उनका उचित प्रबंधन एवं रखरखाव, सिटी पार्कों का विकास, सार्वजनिक यातायात प्रणाली को बेहतर करना तथा इस संबंध में क्षमता विकास, दूरसंचार एवं विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करना तथा जल शक्ति संरक्षण को प्रोत्साहित करना इन उद्देश्यों को सिद्ध करने हेतु परसर समन्वय सहयोग तथा प्रतिस्पर्धा के माध्यम से शहरों में परिवर्तन को त्वरित किया जा रहा है। दीनदयाल अंत्योदय योजना द्वारा इसके द्वारा शहरी गरीबी के संदर्भ में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु एवं साथ ही असंगठित क्षेत्र में जुड़े लोगों हेतु कौशल विकास एवं प्लेसमेंट आदि के प्रयास भी किए जा रहे हैं। राजीव आवास योजना वर्ष 2010 में बनाई गयी राजीव आवास योजना जो मलिन बस्ती में रहने वाले तथा निम्न आय के लोगों को आवास सुलभ करवाने का एक प्रयास थी को प्रधानमंत्री आवास योजना शहरी में विलय कर दिया गया है तथा सब्सिडी एवं कम ब्याज दर पर गृह ऋण के माध्यम से सभी के लिए आवास सुनिश्चित किए जाने के प्रयास हो रहे हैं। राष्ट्रीय हाउसिंग बैंक के माध्यम से इन को और सुलभ बनाया जा रहा है स्मार्ट सिटी मिशन वर्ष 2015 में महत्वाकांक्षी जिलो के प्रमुख शहरों के विकास हेतु स्मार्ट सिटी मिशन को लागू किया गया है जिस्ममें 100 शहरों को नवीनीकृत करने हेतु स्मार्ट विकल्पों के माध्यम से इन शहरों को नवीनीकृत किया जा रहा है इसमें रेट्रोफिटिंग, शहर विस्तारण एवं शहर पुनर्जीवन की प्रक्रियाओं द्वारा इन शहरों को विकसित किया जा रहा है। रेट्रोफिटिंग से तात्पर्य दिये गए संरचना में ही सुधार करते हुए शहरों के नवीनीकरण से है। शहर विस्तारण के अंतर्गत शहर की सीमाओं को परिसीमित करते हुए नए शहरी विन्यास बनाने से है तथा पुंर्स्थापन के अंतर्गत क्षेत्र को नए सिरे से पुंर्स्थापित करने से है जिसके दो पायलट उदाहरण दिल्ली में दक्षिणी किदवई नगर एवं मुंबई में भिंडी बाजार परियोजना है। इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए हरित पट्टी विस्तारण द्वारा ग्रीन फील्ड प्रोजेक्ट के अंतर्गत आकांक्षी जिलों को रेखांकित किया गया है जो प्रारम्भ से ही प्रचुर जलापूर्ति, विदूत आपूर्ति, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, वहनीय आवास के घटकों को समन्वय को सुनिश्चित कर रहे हैं।
##Question:भारत में नगरीय विकास हेतु किए गए प्रयासों की चर्चा कीजिये। इस संदर्भ में चलायी जा रही विभिन्न योजनाओं तथा कार्यक्रमों को सूचीबद्ध कीजिये। (150-200 शब्द) Discuss effort made in India for urban development. List out various schemes and programmes running in India for urban development. (150-200 words)##Answer:Approach: नगरीय विकास की चर्चा करते हुए भूमिका लिख सकते हैं। नगरीय विकास हेतु भारत सरकार द्वारा किए गए प्रयासों की कालक्रमानुसार चर्चा कीजिये। वर्तमान में नगरों के विकास हेतु चलायी जा रही महत्वपूर्ण योजना की चर्चा कीजिये उत्तर- आर्थिक विकास के साथ ही नगरों का विकास दृष्टिगत होता है। भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार 32% जनसंख्या नगरों में निवास करती है जिसके जल्द ही 50% तक बढ्ने की संभावना है। बढ़ती नगरीय जनसंख्या के मद्देनजर सरकारी प्रयासों द्वारा इसे नियोजित करने का प्रयास किया जाता है। नगरीय विकास हेतु किए गए प्रयास: वर्ष 1976 में भारत सरकार द्वारा हुड़को की स्थापना की गयी जो नगरीकरण के संदर्भ में वित्तीय एवं तकनीकी सहायता प्रदान करने हेतु सर्वोच्च संस्थान है जिससे नगरीकरण की प्रक्रिया को तेज किया जा सके। वर्ष 2005 में जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीनीकरण कार्यक्रम के अंतर्गत न सिर्फ अवसंरचनात्मक विकास अपितु साथ ही शहरी गरीबी निवारण हेतु अतिरिक्त प्रयास किए जाने के उद्देश्य के साथ दो अलग अलग मंत्रालय बनाते हुए प्रयासों को त्वरित किया गया। वर्ष 2014 में इन दोनों मंत्रालयों को एकीकृत करते हुए शहरी मामलों के संदर्भ में आवासीय एवं शहरी मामले के मंत्रालय का गठन किया गया 2013 में पथ विक्रेता अधिनियम के अंतर्गत पंजीकरण की प्रक्रिया द्वारा इन पथ विक्रेताओं को जीविकोपार्जन के विकल्प दिये जा रहे हैं एवं साथ ही विक्रय पदार्थों की गुणवत्ता में भी सुधार किए जा रहे हैं। नगरीय विकास हेतु योजनाएँ: AMRUT (अटल मिशन फॉर रेजुंन्वेशन एवं अर्बन ट्रांसफोरमेशन) योजना अमृत को लागू करते हुए शहरों के नवीनीकरण को और प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसके तहत 500 शहरों को नवीनीकृत करने के प्रयास किए जा रहे हैं, जिसमें वे सभी शहर जो हेरिटेज सिटी हैं या 1 लाख से अधिक आबादी वाले हैं, राज्यों की राजधानी हैं या पर्वतीय रार्ज्यों के शहर है, शामिल हैं इस योजना के अंतर्गत शुद्ध पेयजल आपूर्ति को अति महत्वपूर्ण लक्ष्य रखा गया है इसके साथ ही सीवरेज क्षमता को बढ़ाना तथा उनका उचित प्रबंधन एवं रखरखाव, सिटी पार्कों का विकास, सार्वजनिक यातायात प्रणाली को बेहतर करना तथा इस संबंध में क्षमता विकास, दूरसंचार एवं विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करना तथा जल शक्ति संरक्षण को प्रोत्साहित करना इन उद्देश्यों को सिद्ध करने हेतु परसर समन्वय सहयोग तथा प्रतिस्पर्धा के माध्यम से शहरों में परिवर्तन को त्वरित किया जा रहा है। दीनदयाल अंत्योदय योजना द्वारा इसके द्वारा शहरी गरीबी के संदर्भ में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु एवं साथ ही असंगठित क्षेत्र में जुड़े लोगों हेतु कौशल विकास एवं प्लेसमेंट आदि के प्रयास भी किए जा रहे हैं। राजीव आवास योजना वर्ष 2010 में बनाई गयी राजीव आवास योजना जो मलिन बस्ती में रहने वाले तथा निम्न आय के लोगों को आवास सुलभ करवाने का एक प्रयास थी को प्रधानमंत्री आवास योजना शहरी में विलय कर दिया गया है तथा सब्सिडी एवं कम ब्याज दर पर गृह ऋण के माध्यम से सभी के लिए आवास सुनिश्चित किए जाने के प्रयास हो रहे हैं। राष्ट्रीय हाउसिंग बैंक के माध्यम से इन को और सुलभ बनाया जा रहा है स्मार्ट सिटी मिशन वर्ष 2015 में महत्वाकांक्षी जिलो के प्रमुख शहरों के विकास हेतु स्मार्ट सिटी मिशन को लागू किया गया है जिस्ममें 100 शहरों को नवीनीकृत करने हेतु स्मार्ट विकल्पों के माध्यम से इन शहरों को नवीनीकृत किया जा रहा है इसमें रेट्रोफिटिंग, शहर विस्तारण एवं शहर पुनर्जीवन की प्रक्रियाओं द्वारा इन शहरों को विकसित किया जा रहा है। रेट्रोफिटिंग से तात्पर्य दिये गए संरचना में ही सुधार करते हुए शहरों के नवीनीकरण से है। शहर विस्तारण के अंतर्गत शहर की सीमाओं को परिसीमित करते हुए नए शहरी विन्यास बनाने से है तथा पुंर्स्थापन के अंतर्गत क्षेत्र को नए सिरे से पुंर्स्थापित करने से है जिसके दो पायलट उदाहरण दिल्ली में दक्षिणी किदवई नगर एवं मुंबई में भिंडी बाजार परियोजना है। इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए हरित पट्टी विस्तारण द्वारा ग्रीन फील्ड प्रोजेक्ट के अंतर्गत आकांक्षी जिलों को रेखांकित किया गया है जो प्रारम्भ से ही प्रचुर जलापूर्ति, विदूत आपूर्ति, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, वहनीय आवास के घटकों को समन्वय को सुनिश्चित कर रहे हैं।
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महिला सशक्तिकरण के सम्बन्ध में सरकार द्वारा उठाये गए कदमों की राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण मिशन-2017 के विशेष सन्दर्भ में चर्चा कीजिये|(150-200 शब्द; 10 अंक ) Discuss the steps taken by the government in relation to women empowerment with special reference to the National Women"s Empowerment Mission-2017. (150-200 words; 10 Marks)
दृष्टिकोण: 1. भूमिका में महिला सशक्तिकरण का आशय स्पष्टकीजिये। 2. महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में सरकार द्वारा उठाए कदमों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये। 3. राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण मिशन को विस्तार से स्पष्ट कीजिये। 4. संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये। अपनी निजी स्वतंत्रता और स्वयं के फैसले लेने के लिये महिलाओं को अधिकार देना ही महिला सशक्तिकरण है।समाज में सभी क्षेत्रों में पुरुष और महिला दोनों को लिये बराबरी में लाना होगा । देश, समाज और परिवार के उज्जवल भविष्य के लिये महिला सशक्तिकरण बेहद जरुरी है। जेंडर समानता का सिद्धांत भारतीय संविधान की प्रस्‍तावना, मौलिक अधिकारों, मौलिक कर्तव्‍यों और नीति निर्देशक सिद्धांतों में प्रतिपादित है। संविधान महिलाओं को न केवल समानता का दर्जा प्रदान करता है अपितु राज्‍य को महिलाओं के पक्ष में सकारात्‍मक भेदभाव के उपाय करने की शक्‍ति भी प्रदान करता है। महिला सशक्तिकरण के सम्बन्ध में सरकार द्वारा उठाये गए कदम: 1. भारत ने महिलाओं के समान अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध विभिन्‍न अंतरराष्‍ट्रीय अभिसमयों की पुष्टि की है। इनमें से एक प्रमुख वर्ष 1993 में महिलाओं के प्रति सभी प्रकार के भेदभाव की समाप्‍ति पर अभिसमय की पुष्टि है| 2. मेक्‍सिको कार्य योजना (1975), नैरोबी अग्रदर्शी रणनीतियां (1985), बीजिंग घोषणा और प्‍लेटफार्म फॉर एक्‍शन (1995) को अपनाया जाना| 3. नौवीं पंचवर्षीय योजना की प्रतिबद्धताओं एवं महिलाओं के सशक्‍तीकरण से संबंधित अन्‍य सेक्‍टोरल नीतियों को भी ध्‍यान में रखा गया है। 4.राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण मिशन-2017 राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण मिशन-2017: लक्ष्य एवं उद्देश्य- - राष्ट्रीय मिशन का लक्ष्य महिलाओं की उन्नति,विकास और सशक्तिकरण सुनिश्चित करना है। - उसके उद्देश्यों में महिलाओं के विकास के लिए सकारात्मक आर्थिक एवं सामाजिक नीतियों के माध्यम से ऐसा अनुकूल माहौल तैयार करना है जिससे महिलाएं अपनी क्षमताओं को साकार कर सकें| - स्वास्थ्य देखभाल, - गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, - रोजगार,समान पारिश्रमिक एवं सामाजिक सुरक्षा का लाभ उठा सकने में सक्षम बनाना| - महिलाओं और बालिकाओं के खिलाफ सभी प्रकार के भेदभाव एवं हिंसा का उन्मूलन तथा सामाजिक दृष्टिकोण मेंबदलाव भी सुनिश्चित करना शामिल है। मिशन का लक्ष्य महिला केंद्रित कार्यक्रमों को मिशन के रूप में लागू करना है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय गरीब और हाशिए पर रहने वाली महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए महिला प्रशिक्षण एवं रोजगार कार्यक्रम का संचालन कर रहा है। आवश्यकता है कि योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर ध्यान दिया जाये|
##Question:महिला सशक्तिकरण के सम्बन्ध में सरकार द्वारा उठाये गए कदमों की राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण मिशन-2017 के विशेष सन्दर्भ में चर्चा कीजिये|(150-200 शब्द; 10 अंक ) Discuss the steps taken by the government in relation to women empowerment with special reference to the National Women"s Empowerment Mission-2017. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण: 1. भूमिका में महिला सशक्तिकरण का आशय स्पष्टकीजिये। 2. महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में सरकार द्वारा उठाए कदमों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये। 3. राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण मिशन को विस्तार से स्पष्ट कीजिये। 4. संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये। अपनी निजी स्वतंत्रता और स्वयं के फैसले लेने के लिये महिलाओं को अधिकार देना ही महिला सशक्तिकरण है।समाज में सभी क्षेत्रों में पुरुष और महिला दोनों को लिये बराबरी में लाना होगा । देश, समाज और परिवार के उज्जवल भविष्य के लिये महिला सशक्तिकरण बेहद जरुरी है। जेंडर समानता का सिद्धांत भारतीय संविधान की प्रस्‍तावना, मौलिक अधिकारों, मौलिक कर्तव्‍यों और नीति निर्देशक सिद्धांतों में प्रतिपादित है। संविधान महिलाओं को न केवल समानता का दर्जा प्रदान करता है अपितु राज्‍य को महिलाओं के पक्ष में सकारात्‍मक भेदभाव के उपाय करने की शक्‍ति भी प्रदान करता है। महिला सशक्तिकरण के सम्बन्ध में सरकार द्वारा उठाये गए कदम: 1. भारत ने महिलाओं के समान अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध विभिन्‍न अंतरराष्‍ट्रीय अभिसमयों की पुष्टि की है। इनमें से एक प्रमुख वर्ष 1993 में महिलाओं के प्रति सभी प्रकार के भेदभाव की समाप्‍ति पर अभिसमय की पुष्टि है| 2. मेक्‍सिको कार्य योजना (1975), नैरोबी अग्रदर्शी रणनीतियां (1985), बीजिंग घोषणा और प्‍लेटफार्म फॉर एक्‍शन (1995) को अपनाया जाना| 3. नौवीं पंचवर्षीय योजना की प्रतिबद्धताओं एवं महिलाओं के सशक्‍तीकरण से संबंधित अन्‍य सेक्‍टोरल नीतियों को भी ध्‍यान में रखा गया है। 4.राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण मिशन-2017 राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण मिशन-2017: लक्ष्य एवं उद्देश्य- - राष्ट्रीय मिशन का लक्ष्य महिलाओं की उन्नति,विकास और सशक्तिकरण सुनिश्चित करना है। - उसके उद्देश्यों में महिलाओं के विकास के लिए सकारात्मक आर्थिक एवं सामाजिक नीतियों के माध्यम से ऐसा अनुकूल माहौल तैयार करना है जिससे महिलाएं अपनी क्षमताओं को साकार कर सकें| - स्वास्थ्य देखभाल, - गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, - रोजगार,समान पारिश्रमिक एवं सामाजिक सुरक्षा का लाभ उठा सकने में सक्षम बनाना| - महिलाओं और बालिकाओं के खिलाफ सभी प्रकार के भेदभाव एवं हिंसा का उन्मूलन तथा सामाजिक दृष्टिकोण मेंबदलाव भी सुनिश्चित करना शामिल है। मिशन का लक्ष्य महिला केंद्रित कार्यक्रमों को मिशन के रूप में लागू करना है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय गरीब और हाशिए पर रहने वाली महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए महिला प्रशिक्षण एवं रोजगार कार्यक्रम का संचालन कर रहा है। आवश्यकता है कि योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर ध्यान दिया जाये|
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शासन में भ्रष्टाचार के लिए उत्तरदायी कारणों को सूचीबद्ध कीजिये| इसके साथ ही भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा प्रस्तुत सुझावों को स्पष्ट कीजिये|(150 से 200 शब्द/ 10 अंक) List the reasons responsible for the corruption in governance. Along with this,for the eradication of corruption, clarify the suggestions submitted by the Second Administrative Reforms Commission (150 to 200 words/ 10 marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में भ्रष्टाचार को परिभाषित करते हुए भारत की स्थिति स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में भ्रष्टाचार के कारणों को सूचीबद्ध कीजिये 3- दूसरे भाग में भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा प्रस्तुत सुझावों को स्पष्ट कीजिये| 4- अंतिम में भ्रष्टाचार उन्मूलन के प्रयासों की सीमाओं को स्पष्ट करते हुए सुझाव के साथ उत्तर समाप्त कीजिये भ्रष्टाचार का आशय निजी हितों के लिए सरकारी पद या लोक संसाधनों के दुरुपयोग किये जाने से है| CPI(भ्रष्टाचार परिदृश्य सूचकांक)जिसे ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी किया जाता है| वर्ष 2018 में 180 देशों में भारत की रैंक 78 है और भारत को प्राप्त भारांक 41 है| जबकिडेनमार्क में सबसे कम भ्रष्टाचार (प्रथम रैंक) है जिसको 88 भारांक प्राप्त हुआ है| इस तरह स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार एक वैश्विक समस्या है किन्तु भारत में यह समस्या से आगे बढ़ते हुए चुनौती का रूप धारण कर चुका है| इसके लिए विभिन्न कारण उत्तरदायी हैं भ्रष्टाचार के कारण द्वितीय ARC की रिपोर्ट्स में यह स्पष्ट किया गया है कि नैतिकता मानक नियमों का एक समुच्चय है जिनके अभाव में भ्रष्टाचार बढ़ हो रहा है औपनिवेशिक काल की पैतृक संपत्ति की उपलब्धता से कुछ अधिकारी या राज्य से सम्बन्धित कर्मचारी, भ्रष्टाचार के द्वारा अर्जित की गयी संपत्ति की आसानी से खपत कर लेते हैं भारतीय समाज में विद्यमान सत्ता में अनेक विषमताएं हैं| यहाँ तक कि असंगठित क्षेत्रों, शिक्षा प्रणालियों आदि में नैतिकता में मानदंडों को भी सत्तासीन वर्ग द्वारा बदल दिया जाता है| उदाहरण के लिए कुछ राजनीतिक दल एवं अधिकारी समूह है जो पूँजी के केन्द्रीयकरण को अनिवार्य मानते हैं और इसके लिए तर्क देते हैं कि केंद्रीकृत पूँजी से ही औद्योगीकरण को बढ़ावा दिया जा सकता है| जबकि दूसरी ओर कुछ राजनीति दल एवं अधिकारी नागरिकों की क्रय क्षमता को विकसित करना ही आर्थिक नैतिकता का आधार मानते हैं| राजनीतिक विचारधाराओं एवं दृष्टिकोण में अंतर दिखता है संघ या राज्यों के द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी एवं उसमें विद्यमान विवेकाधिकार मनमानेपन को जन्म देता है जो भ्रष्टाचार का एक बहुत बड़ा कारण है नागरिक सेवकों के स्थानान्तरण में मंत्रियों का एकाधिकार एवं विवेकाधिकार भ्रष्टाचार की जड़ है| यहाँ तक भारत में इसे स्थानान्तरण उद्योग की संज्ञा दी गयी है विद्यमान पदसोपानीयता ने अति केन्द्रीकरण का रूप धारण कर लिया है| जिसके कारण व्यवस्था में भ्रष्टाचार पनपता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार स्वरूपतः परिवेशीय है जो कि ऐतिहासिक, राजनीतिक, प्रशासनिक, आर्थिक, विधिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों के अंतःक्रिया का एक सम्मिलित परिणाम है|अतः भ्रष्टाचार विविध एवं बहुल कारकों का एक सम्मिलित परिणाम होता है| अतः द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने भ्रष्टाचार उन्मूलन के सन्दर्भ में निम्नलिखित सुझाव दिए हैं| भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए उठाये गए कदम एवं सुझाव भ्रष्टाचार एवं सत्ता के दुरुपयोग से निकलने के लिए अधिकारियों के मूल्यों और चरित्र पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए सूचना प्रौद्योगिकी तंत्र का अधिकाधिक मात्रा में प्रयोग किया जाना चाहिए ताकि अधिकारी के द्वारा किये गए प्रत्येक कार्य को सार्वजनिक किया जा सके| भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के दायरे में विस्तार किया जाना चाहिएतथा ऐसे कामों को जो संविधान, लोकतंत्र में बाधक हों, न्याय के विपरीत हों या अनुचित रूप से पक्षपातपूर्ण हों आदि को अधिनियम के तहत अपराध घोषित किया जाना चाहिए कपटपूर्ण रिश्वतखोरी (राज्य, जनता या जनता के हितों को हानि पहुचाते हुए रिश्वत खोरी करना) को अपराध की श्रेणी में लाना चाहिए| ऐसी किसी लोकसेवक के विरुद्ध जो भ्रष्टाचार में रंगे हाथों पकड़ा गया हो अथवा उसके पास आय से अधिक संपत्ति हो, के ऊपर कार्यवाही करने के लिए किसी भी पूर्वानुमति की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए| यदि किसी मामले में भारत सरकार की स्वीकृति अनिवार्य हो तो ऐसी स्वीकृति केन्द्रीय सतर्कता आयोग और विभागीय सचिव की आधिकारिक समिति द्वारा दी जानी चाहिए ऐसे लोकसेवकों के लिए दंड के अतिरिक्त प्रावधान होने चाहिए जो राज्य और नागरिकों को हानि पहुचाते हैं भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत सुनवाई करने वाले न्यायाधीशों को दैनिक आधार पर कार्यवाही करनी चाहिए और अवांछित विलम्ब से बचना चाहिए सार्वजनिक महत्त्व से जुड़े निजी क्षेत्रों को भ्रष्टाचार अधिनियम के दायरे में लाना चाहिए भ्रष्ट लोकसेवक(संपत्ति जब्ती) विधेयक शीघ्र ही पारित किया जाना चाहिए बेनामी लेन देन प्रतिषेध अधिनियम का सख्ती से पालन होना चाहिए व्हिसल ब्लोविंग करने वाले अधिकारियों को पर्याप्त सुरक्षा दी जानी चाहिए विशेषाधिकार से सम्बन्धित संविधान के अनुच्छेद 105(2) और 194(2) को संशोधित किये जाने की आवश्यकता है ऐसे अधिकारी जो अच्छा बर्ताव करते हैं उन्हें समय समय पर पुरस्कृत किया जाना चाहिए जबकि अच्छा बर्ताव न करने वालों को दण्डित करने का प्रावधान होना चाहिए| उपरोक्त सुझाओं के आधार पर भारत सरकार द्वारा अनेक प्रयास किये गए हैं| CPI (भ्रष्टाचार परिदृश्य सूचकांक)जिसे ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी किया जाता है के सूचकांक के आधार पर स्पष्ट होता है कि भारत को प्राप्त विगत वर्षों के अंकों में सुधार हुआ है| वर्ष 2003 में यह 36 अंक था जबकि 2018 में 41 था| सुधार के बाद भी यह सराहनीय नहीं है| भ्रष्टाचार की रोकथाम की दिशा में सरकार का प्रयास कारगर या प्रभावी नहीं है| भारत में भ्रष्टाचार की मूल प्रकृति लालच या लोभ पर आधारित है न की आवश्यकता आधारित है| ऐसी स्थिति में वैधानिक उपायों के द्वारा भ्रष्टाचार पर रोकथाम लगाया जाना पूर्णतयः संभव नहीं है|अतः भ्रष्टाचार की रोकथाम की दिशा में नैतिक मानकों को विकसित करने का महत्त्व अधिक हो जाता है|
##Question:शासन में भ्रष्टाचार के लिए उत्तरदायी कारणों को सूचीबद्ध कीजिये| इसके साथ ही भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा प्रस्तुत सुझावों को स्पष्ट कीजिये|(150 से 200 शब्द/ 10 अंक) List the reasons responsible for the corruption in governance. Along with this,for the eradication of corruption, clarify the suggestions submitted by the Second Administrative Reforms Commission (150 to 200 words/ 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भ्रष्टाचार को परिभाषित करते हुए भारत की स्थिति स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में भ्रष्टाचार के कारणों को सूचीबद्ध कीजिये 3- दूसरे भाग में भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा प्रस्तुत सुझावों को स्पष्ट कीजिये| 4- अंतिम में भ्रष्टाचार उन्मूलन के प्रयासों की सीमाओं को स्पष्ट करते हुए सुझाव के साथ उत्तर समाप्त कीजिये भ्रष्टाचार का आशय निजी हितों के लिए सरकारी पद या लोक संसाधनों के दुरुपयोग किये जाने से है| CPI(भ्रष्टाचार परिदृश्य सूचकांक)जिसे ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी किया जाता है| वर्ष 2018 में 180 देशों में भारत की रैंक 78 है और भारत को प्राप्त भारांक 41 है| जबकिडेनमार्क में सबसे कम भ्रष्टाचार (प्रथम रैंक) है जिसको 88 भारांक प्राप्त हुआ है| इस तरह स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार एक वैश्विक समस्या है किन्तु भारत में यह समस्या से आगे बढ़ते हुए चुनौती का रूप धारण कर चुका है| इसके लिए विभिन्न कारण उत्तरदायी हैं भ्रष्टाचार के कारण द्वितीय ARC की रिपोर्ट्स में यह स्पष्ट किया गया है कि नैतिकता मानक नियमों का एक समुच्चय है जिनके अभाव में भ्रष्टाचार बढ़ हो रहा है औपनिवेशिक काल की पैतृक संपत्ति की उपलब्धता से कुछ अधिकारी या राज्य से सम्बन्धित कर्मचारी, भ्रष्टाचार के द्वारा अर्जित की गयी संपत्ति की आसानी से खपत कर लेते हैं भारतीय समाज में विद्यमान सत्ता में अनेक विषमताएं हैं| यहाँ तक कि असंगठित क्षेत्रों, शिक्षा प्रणालियों आदि में नैतिकता में मानदंडों को भी सत्तासीन वर्ग द्वारा बदल दिया जाता है| उदाहरण के लिए कुछ राजनीतिक दल एवं अधिकारी समूह है जो पूँजी के केन्द्रीयकरण को अनिवार्य मानते हैं और इसके लिए तर्क देते हैं कि केंद्रीकृत पूँजी से ही औद्योगीकरण को बढ़ावा दिया जा सकता है| जबकि दूसरी ओर कुछ राजनीति दल एवं अधिकारी नागरिकों की क्रय क्षमता को विकसित करना ही आर्थिक नैतिकता का आधार मानते हैं| राजनीतिक विचारधाराओं एवं दृष्टिकोण में अंतर दिखता है संघ या राज्यों के द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी एवं उसमें विद्यमान विवेकाधिकार मनमानेपन को जन्म देता है जो भ्रष्टाचार का एक बहुत बड़ा कारण है नागरिक सेवकों के स्थानान्तरण में मंत्रियों का एकाधिकार एवं विवेकाधिकार भ्रष्टाचार की जड़ है| यहाँ तक भारत में इसे स्थानान्तरण उद्योग की संज्ञा दी गयी है विद्यमान पदसोपानीयता ने अति केन्द्रीकरण का रूप धारण कर लिया है| जिसके कारण व्यवस्था में भ्रष्टाचार पनपता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार स्वरूपतः परिवेशीय है जो कि ऐतिहासिक, राजनीतिक, प्रशासनिक, आर्थिक, विधिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों के अंतःक्रिया का एक सम्मिलित परिणाम है|अतः भ्रष्टाचार विविध एवं बहुल कारकों का एक सम्मिलित परिणाम होता है| अतः द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने भ्रष्टाचार उन्मूलन के सन्दर्भ में निम्नलिखित सुझाव दिए हैं| भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए उठाये गए कदम एवं सुझाव भ्रष्टाचार एवं सत्ता के दुरुपयोग से निकलने के लिए अधिकारियों के मूल्यों और चरित्र पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए सूचना प्रौद्योगिकी तंत्र का अधिकाधिक मात्रा में प्रयोग किया जाना चाहिए ताकि अधिकारी के द्वारा किये गए प्रत्येक कार्य को सार्वजनिक किया जा सके| भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के दायरे में विस्तार किया जाना चाहिएतथा ऐसे कामों को जो संविधान, लोकतंत्र में बाधक हों, न्याय के विपरीत हों या अनुचित रूप से पक्षपातपूर्ण हों आदि को अधिनियम के तहत अपराध घोषित किया जाना चाहिए कपटपूर्ण रिश्वतखोरी (राज्य, जनता या जनता के हितों को हानि पहुचाते हुए रिश्वत खोरी करना) को अपराध की श्रेणी में लाना चाहिए| ऐसी किसी लोकसेवक के विरुद्ध जो भ्रष्टाचार में रंगे हाथों पकड़ा गया हो अथवा उसके पास आय से अधिक संपत्ति हो, के ऊपर कार्यवाही करने के लिए किसी भी पूर्वानुमति की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए| यदि किसी मामले में भारत सरकार की स्वीकृति अनिवार्य हो तो ऐसी स्वीकृति केन्द्रीय सतर्कता आयोग और विभागीय सचिव की आधिकारिक समिति द्वारा दी जानी चाहिए ऐसे लोकसेवकों के लिए दंड के अतिरिक्त प्रावधान होने चाहिए जो राज्य और नागरिकों को हानि पहुचाते हैं भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत सुनवाई करने वाले न्यायाधीशों को दैनिक आधार पर कार्यवाही करनी चाहिए और अवांछित विलम्ब से बचना चाहिए सार्वजनिक महत्त्व से जुड़े निजी क्षेत्रों को भ्रष्टाचार अधिनियम के दायरे में लाना चाहिए भ्रष्ट लोकसेवक(संपत्ति जब्ती) विधेयक शीघ्र ही पारित किया जाना चाहिए बेनामी लेन देन प्रतिषेध अधिनियम का सख्ती से पालन होना चाहिए व्हिसल ब्लोविंग करने वाले अधिकारियों को पर्याप्त सुरक्षा दी जानी चाहिए विशेषाधिकार से सम्बन्धित संविधान के अनुच्छेद 105(2) और 194(2) को संशोधित किये जाने की आवश्यकता है ऐसे अधिकारी जो अच्छा बर्ताव करते हैं उन्हें समय समय पर पुरस्कृत किया जाना चाहिए जबकि अच्छा बर्ताव न करने वालों को दण्डित करने का प्रावधान होना चाहिए| उपरोक्त सुझाओं के आधार पर भारत सरकार द्वारा अनेक प्रयास किये गए हैं| CPI (भ्रष्टाचार परिदृश्य सूचकांक)जिसे ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी किया जाता है के सूचकांक के आधार पर स्पष्ट होता है कि भारत को प्राप्त विगत वर्षों के अंकों में सुधार हुआ है| वर्ष 2003 में यह 36 अंक था जबकि 2018 में 41 था| सुधार के बाद भी यह सराहनीय नहीं है| भ्रष्टाचार की रोकथाम की दिशा में सरकार का प्रयास कारगर या प्रभावी नहीं है| भारत में भ्रष्टाचार की मूल प्रकृति लालच या लोभ पर आधारित है न की आवश्यकता आधारित है| ऐसी स्थिति में वैधानिक उपायों के द्वारा भ्रष्टाचार पर रोकथाम लगाया जाना पूर्णतयः संभव नहीं है|अतः भ्रष्टाचार की रोकथाम की दिशा में नैतिक मानकों को विकसित करने का महत्त्व अधिक हो जाता है|
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निगम शासन की विशेषताओं की चर्चा करते हुए, निगम सामाजिक दायित्व की विशेषताओं को बताइए। (150-200 शब्द; 10 अंक) While discussing the characteristics of corporate governance, explain the features of corporate social responsibility. (150-200 words; 10 Marks)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत निगम शासन को परिभाषित करते हुए कीजिये | इसके पश्चात निगम शासन की विशेषताओं को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में निगम सामाजिक दायित्व की विशेषताओं को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - निगम शासन - निगम शासन का आशय ऐसी प्रक्रिया, प्रणाली या सिद्धांतों से है, जिसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाए कि कम्पनी का शासन सभी पक्षधर समूहों के हित को सर्वोत्तम तरीके से सुनिश्चित करे | निगम शासन की विशेषताएं - व्यवसाय का संचालन नैतिकता, पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता के आधार पर निर्धारित करना | व्यवसाय के संचालन मेंगुणवत्ता के मानकों के अनुरूप वस्तुएं एवं सेवाएँ उपलब्ध कराना | विधि एवं नियामक नीतियों का अनुपालन किया जाना तथा शेयरधारकों एवं निवेशकों के हितों को आगे लाना | कंपनी की अभिशासन क्रियाविधि को समाज की कारपोरेट जिम्मेदारी की अवधारणा से जोड़ना | मूल्यों, नैतिकतापूर्ण व्यापारिक आचरणों के प्रति प्रतिबद्धता तथा निजी एवं कारपोरेट निधियों के बीच के अंतर का कठोरता से पालन करना | कारपोरेट निष्पादन में सुधार करना | वित्तीय व जन संसाधनों को आकर्षित करना | अंतरराष्ट्रीय वित्त बाजारों का लाभ उठाना | निगम सामाजिक दायित्व की विशेषताएं - निगम शासन यह अपेक्षा करता है कि कंपनी ऐसे सामाजिक फायदों को प्रोत्साहित करने का प्रयत्न करे जोकि कंपनी के हित से आगे हो, जिसे निगम सामाजिक दायित्व की संज्ञा दी जाती है | समाज के द्वारा कंपनी में किया जाने वाला निवेश सिर्फ भौतिक या वित्तीय न होकर एक विश्वास का निवेश है, अतः कम्पनी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह नैतिक प्रबंधन के द्वारा सारे पक्षधर समूहों के हितों को अधिकतम तरीके से सुनिश्चित करे, ऐसा करने हेतु निगम शासन हेतु निगम सामाजिक दायित्व का विशेष महत्व है | निगम सामाजिक दायित्व कंपनी की ओर से किया जाने वाला कोई उपकार या दया न होकर एक सामाजिक दायित्व है, क्योंकि समाज के द्वारा कंपनी के विकास और वृद्धि में योगदान दिया जाता है | निगम सामाजिक दायित्व के कुछ उदहारण भी प्रस्तुत किये सकते हैं, जैसे- रिलायंस द्वारा दृष्टि और एसबीआई द्वारा अपना गाँव तथा टाटा कंपनी द्वारा किये जाने वाले अन्य प्रकार के शैक्षणिक और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्य | अतः कंपनी को अपने हितों से आगे जाकर जनता के हितों का भी ध्यान रखना चाहिए क्योंकि कंपनी और जनता एक-दूसरे पर निर्भर है | तथा इससे समावेशी और संतुलित विकास को भी बढ़ावा मिलेगा |
##Question:निगम शासन की विशेषताओं की चर्चा करते हुए, निगम सामाजिक दायित्व की विशेषताओं को बताइए। (150-200 शब्द; 10 अंक) While discussing the characteristics of corporate governance, explain the features of corporate social responsibility. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत निगम शासन को परिभाषित करते हुए कीजिये | इसके पश्चात निगम शासन की विशेषताओं को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में निगम सामाजिक दायित्व की विशेषताओं को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - निगम शासन - निगम शासन का आशय ऐसी प्रक्रिया, प्रणाली या सिद्धांतों से है, जिसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाए कि कम्पनी का शासन सभी पक्षधर समूहों के हित को सर्वोत्तम तरीके से सुनिश्चित करे | निगम शासन की विशेषताएं - व्यवसाय का संचालन नैतिकता, पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता के आधार पर निर्धारित करना | व्यवसाय के संचालन मेंगुणवत्ता के मानकों के अनुरूप वस्तुएं एवं सेवाएँ उपलब्ध कराना | विधि एवं नियामक नीतियों का अनुपालन किया जाना तथा शेयरधारकों एवं निवेशकों के हितों को आगे लाना | कंपनी की अभिशासन क्रियाविधि को समाज की कारपोरेट जिम्मेदारी की अवधारणा से जोड़ना | मूल्यों, नैतिकतापूर्ण व्यापारिक आचरणों के प्रति प्रतिबद्धता तथा निजी एवं कारपोरेट निधियों के बीच के अंतर का कठोरता से पालन करना | कारपोरेट निष्पादन में सुधार करना | वित्तीय व जन संसाधनों को आकर्षित करना | अंतरराष्ट्रीय वित्त बाजारों का लाभ उठाना | निगम सामाजिक दायित्व की विशेषताएं - निगम शासन यह अपेक्षा करता है कि कंपनी ऐसे सामाजिक फायदों को प्रोत्साहित करने का प्रयत्न करे जोकि कंपनी के हित से आगे हो, जिसे निगम सामाजिक दायित्व की संज्ञा दी जाती है | समाज के द्वारा कंपनी में किया जाने वाला निवेश सिर्फ भौतिक या वित्तीय न होकर एक विश्वास का निवेश है, अतः कम्पनी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह नैतिक प्रबंधन के द्वारा सारे पक्षधर समूहों के हितों को अधिकतम तरीके से सुनिश्चित करे, ऐसा करने हेतु निगम शासन हेतु निगम सामाजिक दायित्व का विशेष महत्व है | निगम सामाजिक दायित्व कंपनी की ओर से किया जाने वाला कोई उपकार या दया न होकर एक सामाजिक दायित्व है, क्योंकि समाज के द्वारा कंपनी के विकास और वृद्धि में योगदान दिया जाता है | निगम सामाजिक दायित्व के कुछ उदहारण भी प्रस्तुत किये सकते हैं, जैसे- रिलायंस द्वारा दृष्टि और एसबीआई द्वारा अपना गाँव तथा टाटा कंपनी द्वारा किये जाने वाले अन्य प्रकार के शैक्षणिक और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्य | अतः कंपनी को अपने हितों से आगे जाकर जनता के हितों का भी ध्यान रखना चाहिए क्योंकि कंपनी और जनता एक-दूसरे पर निर्भर है | तथा इससे समावेशी और संतुलित विकास को भी बढ़ावा मिलेगा |
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It is a golden opportunity for the judiciary of India to prove that no practices, even in the name of religion can be allowed to violate the dignity and life of women. Explain. (150 words/10 marks)
Approach : Introduce the answer by linking secularism, gender justice to religious freedom. Refer to various judicial pronouncements in favour of women. Conclude the answer in a balanced way. Answer : The Indian Constitution posits a separation between a secular domain regulated by the State and a religious domain in which it must not interfere. However, courts of law are regularly called upon to resolve a multiplicity of issues related to religion, and their decisions may have a far-reaching impact on religious conceptions and practices. India is known for its cultural diversity globally. And a major credit for the rich cultural asset that we possess goes to the women in the country. However, there are several ironical stories as well which one can definitely not ignore. Amongst several such citations, there are a few that have a critical relation to the laws the country has. Recent prominent issues Parsi women - The struggles of a Parsi woman, to be allowed entry into the Parsi Fire Temple is not resolved yet. A Constitution Bench of the Supreme Court is to pass a final order in Goolrukh"s case. A Parsi woman was excommunicated from her faith and disallowed entry into the Fire Temple on a self-assumed premise that women ought to take on the religion of their husband, implying that women cannot have their own religious stance. Sabarimala issue - The Supreme Court is to constitute another 5-judge bench to look into the ban of entry of women aged 10 – 50 years, into the famous Ayyapa Swamy Tempe at Sabarimala.In the Sabarimala case, the Temple Board had argued and the Kerala High Court alsoupheldthat young women should not offer worship as the temple deity is aBrahmachari(a celibate), for whom women are a source of deviation. Haji Ali Darga - There was aban on women"s entry into the sanctum sanctorum of the Haji Ali Dargah. Shani Shignapur Temple - There was a ban on women"s entry into inside premises of the temple. Triple Talaq - This religious practice allowed Muslim men to give divorce instantly to his wife just by uttering the word "talaq" trice. The stand of the judiciary In Goolrukh"s case and Sabrimala case,both High Courts gave precedence to the consideration of a religious institution"s rights and a religious custom"s "essential character" over the right to equality and non-discrimination – the rights of women to be treated with dignity and with equal participation in society. However, in the issue of Haji Ali Darga and Shani Shignapur Temple, judiciary favoured the side of women, their dignity, liberal interpretation of the constitutional values in changing time. The majority ruling in the Triple Talaq judgment, which constitutes a milestone victory for women, banned the practice of triple talaq and asked the parliament to frame a comprehensive law to implement the ban on the practice of triple talaq. In the Sabrimala case, the Supreme court linked the issue of not allowing entry to women of a particular age group to Article 17 and outrightly declared the practice as unconstitutional and void. However, the Kerala state government has filed the review petition in the supreme court. Judiciary is doing the right things in identifying the customs that are discriminatory and derogatory towards women and holding them in violation of the rights mentioned in our Constitution. However it is also true that women"s religious rights have seen slow reforms, yet there is no strong, cohesive effort by courts to declare discriminatory religious customs as unconstitutional. For instance, while there is a growing awareness of the role of women priestesses, there is only an old Supreme Court judgment that recognizes a Hindu female"s hereditary right to succeed to the priestly office of a pujari, which does so, only in the narrow context of the administrative responsibilities of such office. There is no recognition of her equal right or ability to perform sacred rituals as a pujari. Two separate Constitution Benches of the Supreme Court are soon to give judgment on Parsi women"s religious rights (Goolrukh"s case) and on women"s entry into the Ayyapa Swamy Temple (Sabarimala case). These matters should be seen as an opportunity to uniformly apply the "test for laws" in force: declare religious customs as laws in force under Article 13(3)(a) and clean the country of customs that are discriminatory and derogatory towards women and in violation of their Fundamental Rights.
##Question:It is a golden opportunity for the judiciary of India to prove that no practices, even in the name of religion can be allowed to violate the dignity and life of women. Explain. (150 words/10 marks)##Answer:Approach : Introduce the answer by linking secularism, gender justice to religious freedom. Refer to various judicial pronouncements in favour of women. Conclude the answer in a balanced way. Answer : The Indian Constitution posits a separation between a secular domain regulated by the State and a religious domain in which it must not interfere. However, courts of law are regularly called upon to resolve a multiplicity of issues related to religion, and their decisions may have a far-reaching impact on religious conceptions and practices. India is known for its cultural diversity globally. And a major credit for the rich cultural asset that we possess goes to the women in the country. However, there are several ironical stories as well which one can definitely not ignore. Amongst several such citations, there are a few that have a critical relation to the laws the country has. Recent prominent issues Parsi women - The struggles of a Parsi woman, to be allowed entry into the Parsi Fire Temple is not resolved yet. A Constitution Bench of the Supreme Court is to pass a final order in Goolrukh"s case. A Parsi woman was excommunicated from her faith and disallowed entry into the Fire Temple on a self-assumed premise that women ought to take on the religion of their husband, implying that women cannot have their own religious stance. Sabarimala issue - The Supreme Court is to constitute another 5-judge bench to look into the ban of entry of women aged 10 – 50 years, into the famous Ayyapa Swamy Tempe at Sabarimala.In the Sabarimala case, the Temple Board had argued and the Kerala High Court alsoupheldthat young women should not offer worship as the temple deity is aBrahmachari(a celibate), for whom women are a source of deviation. Haji Ali Darga - There was aban on women"s entry into the sanctum sanctorum of the Haji Ali Dargah. Shani Shignapur Temple - There was a ban on women"s entry into inside premises of the temple. Triple Talaq - This religious practice allowed Muslim men to give divorce instantly to his wife just by uttering the word "talaq" trice. The stand of the judiciary In Goolrukh"s case and Sabrimala case,both High Courts gave precedence to the consideration of a religious institution"s rights and a religious custom"s "essential character" over the right to equality and non-discrimination – the rights of women to be treated with dignity and with equal participation in society. However, in the issue of Haji Ali Darga and Shani Shignapur Temple, judiciary favoured the side of women, their dignity, liberal interpretation of the constitutional values in changing time. The majority ruling in the Triple Talaq judgment, which constitutes a milestone victory for women, banned the practice of triple talaq and asked the parliament to frame a comprehensive law to implement the ban on the practice of triple talaq. In the Sabrimala case, the Supreme court linked the issue of not allowing entry to women of a particular age group to Article 17 and outrightly declared the practice as unconstitutional and void. However, the Kerala state government has filed the review petition in the supreme court. Judiciary is doing the right things in identifying the customs that are discriminatory and derogatory towards women and holding them in violation of the rights mentioned in our Constitution. However it is also true that women"s religious rights have seen slow reforms, yet there is no strong, cohesive effort by courts to declare discriminatory religious customs as unconstitutional. For instance, while there is a growing awareness of the role of women priestesses, there is only an old Supreme Court judgment that recognizes a Hindu female"s hereditary right to succeed to the priestly office of a pujari, which does so, only in the narrow context of the administrative responsibilities of such office. There is no recognition of her equal right or ability to perform sacred rituals as a pujari. Two separate Constitution Benches of the Supreme Court are soon to give judgment on Parsi women"s religious rights (Goolrukh"s case) and on women"s entry into the Ayyapa Swamy Temple (Sabarimala case). These matters should be seen as an opportunity to uniformly apply the "test for laws" in force: declare religious customs as laws in force under Article 13(3)(a) and clean the country of customs that are discriminatory and derogatory towards women and in violation of their Fundamental Rights.
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निगम शासन की विशेषताओं की चर्चा करते हुए, निगम सामाजिक दायित्व की विशेषताओं को बताइए | (150-200 शब्द) While discussing the characteristics of corporate governance, explain the features of corporate social responsibility. (150-200 words)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत निगम शासन को परिभाषित करते हुए कीजिये | इसके पश्चात निगम शासन की विशेषताओं को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में निगम सामाजिक दायित्व की विशेषताओं को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - निगम शासन - निगम शासन का आशय ऐसी प्रक्रिया, प्रणाली या सिद्धांतों से है, जिसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाए कि कम्पनी का शासन सभी पक्षधर समूहों के हित को सर्वोत्तम तरीके से सुनिश्चित करे | निगम शासन की विशेषताएं - व्यवसाय का संचालन नैतिकता, पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता के आधार पर निर्धारित करना | व्यवसाय के संचालन मेंगुणवत्ता के मानकों के अनुरूप वस्तुएं एवं सेवाएँ उपलब्ध कराना | विधि एवं नियामक नीतियों का अनुपालन किया जाना तथा शेयरधारकों एवं निवेशकों के हितों को आगे लाना | कंपनी की अभिशासन क्रियाविधि को समाज की कारपोरेट जिम्मेदारी की अवधारणा से जोड़ना | मूल्यों, नैतिकतापूर्ण व्यापारिक आचरणों के प्रति प्रतिबद्धता तथा निजी एवं कारपोरेट निधियों के बीच के अंतर का कठोरता से पालन करना | कारपोरेट निष्पादन में सुधार करना | वित्तीय व जन संसाधनों को आकर्षित करना | अंतरराष्ट्रीय वित्त बाजारों का लाभ उठाना | निगम सामाजिक दायित्व की विशेषताएं निगम शासन यह अपेक्षा करता है कि कंपनी ऐसे सामाजिक फायदों को प्रोत्साहित करने का प्रयत्न करे जोकि कंपनी के हित से आगे हो, जिसे निगम सामाजिक दायित्व की संज्ञा दी जाती है | समाज के द्वारा कंपनी में किया जाने वाला निवेश सिर्फ भौतिक या वित्तीय न होकर एक विश्वास का निवेश है, अतः कम्पनी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह नैतिक प्रबंधन के द्वारा सारे पक्षधर समूहों के हितों को अधिकतम तरीके से सुनिश्चित करे, ऐसा करने हेतु निगम शासन हेतु निगम सामाजिक दायित्व का विशेष महत्व है | निगम सामाजिक दायित्व कंपनी की ओर से किया जाने वाला कोई उपकार या दया न होकर एक सामाजिक दायित्व है, क्योंकि समाज के द्वारा कंपनी के विकास और वृद्धि में योगदान दिया जाता है | निगम सामाजिक दायित्व के कुछ उदहारण भी प्रस्तुत किये सकते हैं, जैसे- रिलायंस द्वारा दृष्टि और एसबीआई द्वारा अपना गाँव तथा टाटा कंपनी द्वारा किये जाने वाले अन्य प्रकार के शैक्षणिक और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्य | अतः कंपनी को अपने हितों से आगे जाकर जनता के हितों का भी ध्यान रखना चाहिए क्योंकि कंपनी और जनता एक-दूसरे पर निर्भर है | तथा इससे समावेशी और संतुलित विकास को भी बढ़ावा मिलेगा |
##Question:निगम शासन की विशेषताओं की चर्चा करते हुए, निगम सामाजिक दायित्व की विशेषताओं को बताइए | (150-200 शब्द) While discussing the characteristics of corporate governance, explain the features of corporate social responsibility. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत निगम शासन को परिभाषित करते हुए कीजिये | इसके पश्चात निगम शासन की विशेषताओं को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में निगम सामाजिक दायित्व की विशेषताओं को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - निगम शासन - निगम शासन का आशय ऐसी प्रक्रिया, प्रणाली या सिद्धांतों से है, जिसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाए कि कम्पनी का शासन सभी पक्षधर समूहों के हित को सर्वोत्तम तरीके से सुनिश्चित करे | निगम शासन की विशेषताएं - व्यवसाय का संचालन नैतिकता, पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता के आधार पर निर्धारित करना | व्यवसाय के संचालन मेंगुणवत्ता के मानकों के अनुरूप वस्तुएं एवं सेवाएँ उपलब्ध कराना | विधि एवं नियामक नीतियों का अनुपालन किया जाना तथा शेयरधारकों एवं निवेशकों के हितों को आगे लाना | कंपनी की अभिशासन क्रियाविधि को समाज की कारपोरेट जिम्मेदारी की अवधारणा से जोड़ना | मूल्यों, नैतिकतापूर्ण व्यापारिक आचरणों के प्रति प्रतिबद्धता तथा निजी एवं कारपोरेट निधियों के बीच के अंतर का कठोरता से पालन करना | कारपोरेट निष्पादन में सुधार करना | वित्तीय व जन संसाधनों को आकर्षित करना | अंतरराष्ट्रीय वित्त बाजारों का लाभ उठाना | निगम सामाजिक दायित्व की विशेषताएं निगम शासन यह अपेक्षा करता है कि कंपनी ऐसे सामाजिक फायदों को प्रोत्साहित करने का प्रयत्न करे जोकि कंपनी के हित से आगे हो, जिसे निगम सामाजिक दायित्व की संज्ञा दी जाती है | समाज के द्वारा कंपनी में किया जाने वाला निवेश सिर्फ भौतिक या वित्तीय न होकर एक विश्वास का निवेश है, अतः कम्पनी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह नैतिक प्रबंधन के द्वारा सारे पक्षधर समूहों के हितों को अधिकतम तरीके से सुनिश्चित करे, ऐसा करने हेतु निगम शासन हेतु निगम सामाजिक दायित्व का विशेष महत्व है | निगम सामाजिक दायित्व कंपनी की ओर से किया जाने वाला कोई उपकार या दया न होकर एक सामाजिक दायित्व है, क्योंकि समाज के द्वारा कंपनी के विकास और वृद्धि में योगदान दिया जाता है | निगम सामाजिक दायित्व के कुछ उदहारण भी प्रस्तुत किये सकते हैं, जैसे- रिलायंस द्वारा दृष्टि और एसबीआई द्वारा अपना गाँव तथा टाटा कंपनी द्वारा किये जाने वाले अन्य प्रकार के शैक्षणिक और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्य | अतः कंपनी को अपने हितों से आगे जाकर जनता के हितों का भी ध्यान रखना चाहिए क्योंकि कंपनी और जनता एक-दूसरे पर निर्भर है | तथा इससे समावेशी और संतुलित विकास को भी बढ़ावा मिलेगा |
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केहर सिंह बनाम भारत संघ,1989 वाद में राष्ट्रपति की क्षमादान सम्बन्धी शक्तियों पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय की संक्षेप में चर्चा करते हुए राष्ट्रपति एवं राज्यपाल की क्षमादान सम्बन्धी शक्तियों की तुलना कीजिये|(150-200 शब्द, अंक - 10 ) Discuss the decision given by the Supreme Court on the powers of clemency of the President in Kehar Singh V/S Union of India, 1989 suit. Compare the clemency powers of the President and the Governor. (150-200 words, Marks - 10 )
दृष्टिकोण: 1. भूमिका मेंराष्ट्रपति एवं राज्यपाल की क्षमादान सम्बन्धी शक्तियों के स्त्रोतों की चर्चा कीजिये| 2.केहर सिंह बनाम भारत संघ,1989 वाद में राष्ट्रपति की क्षमादान सम्बन्धी शक्तियों पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय की संक्षेप में चर्चा कीजिये| 3.राष्ट्रपति एवं राज्यपाल की क्षमादान सम्बन्धी शक्तियों की तुलना कीजिये| उत्तर- क्षमादान सम्बन्धी राष्ट्रपति की शक्तियां कार्यपालिकायी शक्तियां हैं जो संविधान के अनुच्छेद-72 द्वारा प्रदत्त हैं|अनुच्छेद 161 राज्यपाल को क्षमादान की शक्ति प्रदान करता है| केहर सिंह बनाम भारत संघ वाद,1989- 1. दोषी व्यक्ति कोराष्ट्रपति से व्यक्तिगत रूप से मिलकर अपनी बात कहने का कोईअधिकार नहीं है| 2. राष्ट्रपति सुनवाई कीकोई भीप्रक्रिया अपना सकता है| 3. राष्ट्रपति केंद्र सरकार के सुझाव पर ही इस अधिकार का प्रयोग कर सकता है| राष्ट्रपति एवं राज्यपाल की क्षमादान शक्ति की तुलना: - अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति की क्षमा शक्ति का दायरा अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल की क्षमा शक्ति से व्यापक है। शक्ति निम्नलिखित दो तरीकों से भिन्न होती है: 1. माफी देने के लिए राष्ट्रपति की शक्ति उन मामलोंतक विस्तृतहै जहां सजा कोर्ट मार्शल द्वारा होती है लेकिन अनुच्छेद 161 राज्यपाल को ऐसी कोई शक्ति प्रदान नहीं करता है। 2. राष्ट्रपति उन सभी मामलों में क्षमा प्रदान कर सकता है जहां दी गई सजा मौत की सजा है लेकिन राज्यपाल की क्षमादान शक्ति मृत्युदंड के मामलों तक विस्तृतनहीं है। 3. संघ सूची से सम्बंधित मामले केवल राष्ट्रपति के विचाराधीन होते हैं| मारू राम बनाम भारत संघ वाद,1980 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि राष्ट्रपति की क्षमा शक्ति की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है; शत्रुघ्न एवं अन्य बनाम भारत संघ वाद, 2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि किसी दोषी के मौलिक अधिकार की यह मांग है कि राष्ट्रपति उसकी दया याचिका पर फैसला देने में अकारण देरी नहीं करे; इसके लिए राष्ट्रपति को जितनी जल्दी हो सके अपना फैसला देना होगा अन्यथा न्यायालय मृत्यु की सजा को आजीवन कारावास की सजा में बदलने के लिए स्वतंत्र होगा|
##Question:केहर सिंह बनाम भारत संघ,1989 वाद में राष्ट्रपति की क्षमादान सम्बन्धी शक्तियों पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय की संक्षेप में चर्चा करते हुए राष्ट्रपति एवं राज्यपाल की क्षमादान सम्बन्धी शक्तियों की तुलना कीजिये|(150-200 शब्द, अंक - 10 ) Discuss the decision given by the Supreme Court on the powers of clemency of the President in Kehar Singh V/S Union of India, 1989 suit. Compare the clemency powers of the President and the Governor. (150-200 words, Marks - 10 )##Answer:दृष्टिकोण: 1. भूमिका मेंराष्ट्रपति एवं राज्यपाल की क्षमादान सम्बन्धी शक्तियों के स्त्रोतों की चर्चा कीजिये| 2.केहर सिंह बनाम भारत संघ,1989 वाद में राष्ट्रपति की क्षमादान सम्बन्धी शक्तियों पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय की संक्षेप में चर्चा कीजिये| 3.राष्ट्रपति एवं राज्यपाल की क्षमादान सम्बन्धी शक्तियों की तुलना कीजिये| उत्तर- क्षमादान सम्बन्धी राष्ट्रपति की शक्तियां कार्यपालिकायी शक्तियां हैं जो संविधान के अनुच्छेद-72 द्वारा प्रदत्त हैं|अनुच्छेद 161 राज्यपाल को क्षमादान की शक्ति प्रदान करता है| केहर सिंह बनाम भारत संघ वाद,1989- 1. दोषी व्यक्ति कोराष्ट्रपति से व्यक्तिगत रूप से मिलकर अपनी बात कहने का कोईअधिकार नहीं है| 2. राष्ट्रपति सुनवाई कीकोई भीप्रक्रिया अपना सकता है| 3. राष्ट्रपति केंद्र सरकार के सुझाव पर ही इस अधिकार का प्रयोग कर सकता है| राष्ट्रपति एवं राज्यपाल की क्षमादान शक्ति की तुलना: - अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति की क्षमा शक्ति का दायरा अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल की क्षमा शक्ति से व्यापक है। शक्ति निम्नलिखित दो तरीकों से भिन्न होती है: 1. माफी देने के लिए राष्ट्रपति की शक्ति उन मामलोंतक विस्तृतहै जहां सजा कोर्ट मार्शल द्वारा होती है लेकिन अनुच्छेद 161 राज्यपाल को ऐसी कोई शक्ति प्रदान नहीं करता है। 2. राष्ट्रपति उन सभी मामलों में क्षमा प्रदान कर सकता है जहां दी गई सजा मौत की सजा है लेकिन राज्यपाल की क्षमादान शक्ति मृत्युदंड के मामलों तक विस्तृतनहीं है। 3. संघ सूची से सम्बंधित मामले केवल राष्ट्रपति के विचाराधीन होते हैं| मारू राम बनाम भारत संघ वाद,1980 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि राष्ट्रपति की क्षमा शक्ति की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है; शत्रुघ्न एवं अन्य बनाम भारत संघ वाद, 2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि किसी दोषी के मौलिक अधिकार की यह मांग है कि राष्ट्रपति उसकी दया याचिका पर फैसला देने में अकारण देरी नहीं करे; इसके लिए राष्ट्रपति को जितनी जल्दी हो सके अपना फैसला देना होगा अन्यथा न्यायालय मृत्यु की सजा को आजीवन कारावास की सजा में बदलने के लिए स्वतंत्र होगा|
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सूचना का अधिकार लोकतंत्र का आधार स्तम्भ एवं सुशासन स्थापित करने की आवश्यकता है| भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए बताइये कि क्या सूचना के अधिकार को मूल अधिकार के रूप व्यवहारिकता प्रदान कर देना तर्कसंगत होगा?(150-200 शब्द) The right to information is the foundation of democracy and the need to establish good governance. Keeping in view the Indian circumstances, tell whether it would be rational to grant the right to information as a fundamental right, in practice? (150-200 words)
दृष्टिकोण: 1. भूमिका में RTI का उद्देश्य एवं महत्त्व संक्षेप में लिखें| 2. RTI को मूल अधिकार के रूप में स्थापित करने का महत्व एवं सीमाओं का उल्लेख कीजिये| 3. संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- लोकतंत्र को एक सूचित नागरिकता और सूचना की पारदर्शिता की आवश्यकता होती है, जो उसके कामकाज के लिए महत्वपूर्ण होती है| शासितों के प्रति उत्तरदायी सरकारों और उनके उपकरणों का विशिष्ट महत्त्वहोता है। RTI इस सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण उपकरण है| सूचना का अधिकार (RTI) आमतौर पर लोकतंत्र के पर्याय के रूप में प्रयोग किया जाता है। यह नागरिकों की संप्रभुता को मजबूत करने का एक उपकरण है। यह मानव अधिकारों के मुख्य घटकों में से एक है। भारतीय परिस्थितियों के अनुसार सूचना के अधिकार को मूल अधिकार के रूप व्यवहारिकता प्रदान करने तर्कसंगतता: मूल अधिकार के रूप में महत्त्व - इसने प्रत्येक कार्यालय में अधिकारियों को अपने कार्य और दायित्व को साझाकरण और खुलेपन में से एक में बदल दिया, जो कि सुशासन के लिए महत्वपूर्ण है| 1. पारदर्शिता: यह नागरिकों के अधिकार को सुनिश्चित करता है कि वे सरकारी गतिविधियों, नियमों और विनियमों आदि के बारे में जितनी जानकारी चाहते हैं| 2. नागरिक-केंद्रित दृष्टिकोण: अधिकारियों को नागरिकों द्वारा पूछी गई जानकारी देना सुनिश्चित हो जाता है और इससे अधिकारियों को कोई भी यादृच्छिक कदम उठाने से पहले अधिक सोचना पड़ता है। 3. सूचना की उपलब्धता: आरटीआई ने संबंधित व्यक्ति को सूचना देने का एक आसान तरीका तैयार किया| 4. भ्रष्टाचार में कमी: चूंकि सभी जानकारी सुलभ है, भ्रष्टाचार के ग्राफ में गिरावट देखी गई है। 5. सरकार-सार्वजनिक संबंध: अधिनियम संचार में वृद्धि के कारण सरकार-सार्वजनिक संबंध को मजबूत करना भी सुनिश्चित करता है। 6. मूल अधिकार के रूप में यह न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय होगा जिससे नागरिक सशक्त होगा| मूल अधिकार के रूप में सीमायें: 1.अंतर्राष्ट्रीय संबंध, राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक सुरक्षा,सरकार के आंतरिक विचार-विमर्श, सूचना जिसका खुलासा होने पर व्यक्ति की निजता का उल्लंघन होगा,वैज्ञानिक खोजों के बारे में जानकारी आदि कुछ ऐसे विषय हैं जिन पर सूचना देना किसी अन्य के मूल अधिकारों के हनन का कारण या देश की संप्रभु शासन के लिए खतरा हो सकता है| 2. विभिन्न प्रकार की जानकारी मांगी जाती है जिनकासार्वजनिक हित से कोई सम्बन्ध नहीं होता है| 3. इसका उपयोग कानून का दुरुपयोग करने और सार्वजनिक अधिकारियों को परेशान करने के लिए किया जा सकता है। 4. बहुधा आरटीआई को सार्वजनिक प्राधिकरण को परेशान करने या दबाव डालने के लिए प्रतिशोधी उपकरण के रूप में दायर किया गया है| 5. देश में बहुसंख्यक आबादी के बीच अशिक्षा और गैर-बराबरी के कारण, आरटीआई का प्रयोग नहीं किया जा सकता है। आरटीआई ने सार्वजनिक प्राधिकरणों के कार्यों की पारदर्शिता के साथ लोगों की मदद की है| RTI के सम्बन्ध में राकेश संघी बनाम अंतर्राष्ट्रीय उन्नत केंद्र, हैदराबाद मामले में CIC ने यहनिर्णयदिया कि नागरिकों हेतु सूचना का अधिकार निरपेक्ष नहीं है, सरकार द्वारा इस अधिकार पर आवश्यक निर्बंध लागू किये जा सकते हैं| वस्तुतः कानून की प्रभावकारिता इसकी सामग्री पर निर्भर नहीं करती है बल्कि इसके उचित कार्यान्वयन पर निर्भर करती है। इसका प्रभावी क्रियान्वयन इसे मूल अधिकार बनाए जाने से बेहतर कदम हो सकता|
##Question:सूचना का अधिकार लोकतंत्र का आधार स्तम्भ एवं सुशासन स्थापित करने की आवश्यकता है| भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए बताइये कि क्या सूचना के अधिकार को मूल अधिकार के रूप व्यवहारिकता प्रदान कर देना तर्कसंगत होगा?(150-200 शब्द) The right to information is the foundation of democracy and the need to establish good governance. Keeping in view the Indian circumstances, tell whether it would be rational to grant the right to information as a fundamental right, in practice? (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण: 1. भूमिका में RTI का उद्देश्य एवं महत्त्व संक्षेप में लिखें| 2. RTI को मूल अधिकार के रूप में स्थापित करने का महत्व एवं सीमाओं का उल्लेख कीजिये| 3. संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- लोकतंत्र को एक सूचित नागरिकता और सूचना की पारदर्शिता की आवश्यकता होती है, जो उसके कामकाज के लिए महत्वपूर्ण होती है| शासितों के प्रति उत्तरदायी सरकारों और उनके उपकरणों का विशिष्ट महत्त्वहोता है। RTI इस सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण उपकरण है| सूचना का अधिकार (RTI) आमतौर पर लोकतंत्र के पर्याय के रूप में प्रयोग किया जाता है। यह नागरिकों की संप्रभुता को मजबूत करने का एक उपकरण है। यह मानव अधिकारों के मुख्य घटकों में से एक है। भारतीय परिस्थितियों के अनुसार सूचना के अधिकार को मूल अधिकार के रूप व्यवहारिकता प्रदान करने तर्कसंगतता: मूल अधिकार के रूप में महत्त्व - इसने प्रत्येक कार्यालय में अधिकारियों को अपने कार्य और दायित्व को साझाकरण और खुलेपन में से एक में बदल दिया, जो कि सुशासन के लिए महत्वपूर्ण है| 1. पारदर्शिता: यह नागरिकों के अधिकार को सुनिश्चित करता है कि वे सरकारी गतिविधियों, नियमों और विनियमों आदि के बारे में जितनी जानकारी चाहते हैं| 2. नागरिक-केंद्रित दृष्टिकोण: अधिकारियों को नागरिकों द्वारा पूछी गई जानकारी देना सुनिश्चित हो जाता है और इससे अधिकारियों को कोई भी यादृच्छिक कदम उठाने से पहले अधिक सोचना पड़ता है। 3. सूचना की उपलब्धता: आरटीआई ने संबंधित व्यक्ति को सूचना देने का एक आसान तरीका तैयार किया| 4. भ्रष्टाचार में कमी: चूंकि सभी जानकारी सुलभ है, भ्रष्टाचार के ग्राफ में गिरावट देखी गई है। 5. सरकार-सार्वजनिक संबंध: अधिनियम संचार में वृद्धि के कारण सरकार-सार्वजनिक संबंध को मजबूत करना भी सुनिश्चित करता है। 6. मूल अधिकार के रूप में यह न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय होगा जिससे नागरिक सशक्त होगा| मूल अधिकार के रूप में सीमायें: 1.अंतर्राष्ट्रीय संबंध, राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक सुरक्षा,सरकार के आंतरिक विचार-विमर्श, सूचना जिसका खुलासा होने पर व्यक्ति की निजता का उल्लंघन होगा,वैज्ञानिक खोजों के बारे में जानकारी आदि कुछ ऐसे विषय हैं जिन पर सूचना देना किसी अन्य के मूल अधिकारों के हनन का कारण या देश की संप्रभु शासन के लिए खतरा हो सकता है| 2. विभिन्न प्रकार की जानकारी मांगी जाती है जिनकासार्वजनिक हित से कोई सम्बन्ध नहीं होता है| 3. इसका उपयोग कानून का दुरुपयोग करने और सार्वजनिक अधिकारियों को परेशान करने के लिए किया जा सकता है। 4. बहुधा आरटीआई को सार्वजनिक प्राधिकरण को परेशान करने या दबाव डालने के लिए प्रतिशोधी उपकरण के रूप में दायर किया गया है| 5. देश में बहुसंख्यक आबादी के बीच अशिक्षा और गैर-बराबरी के कारण, आरटीआई का प्रयोग नहीं किया जा सकता है। आरटीआई ने सार्वजनिक प्राधिकरणों के कार्यों की पारदर्शिता के साथ लोगों की मदद की है| RTI के सम्बन्ध में राकेश संघी बनाम अंतर्राष्ट्रीय उन्नत केंद्र, हैदराबाद मामले में CIC ने यहनिर्णयदिया कि नागरिकों हेतु सूचना का अधिकार निरपेक्ष नहीं है, सरकार द्वारा इस अधिकार पर आवश्यक निर्बंध लागू किये जा सकते हैं| वस्तुतः कानून की प्रभावकारिता इसकी सामग्री पर निर्भर नहीं करती है बल्कि इसके उचित कार्यान्वयन पर निर्भर करती है। इसका प्रभावी क्रियान्वयन इसे मूल अधिकार बनाए जाने से बेहतर कदम हो सकता|
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What do you understand by cloud computing? Briefly discuss its advantages? (150 words/10 Marks)
"Cloud computing means storing and accessing data and programs over the Internet instead of your computer"s hard drive.The cloud is just a metaphor for the Internet. Some advantages of Cloud as follows, 1) Automation: The primary goal of any computing is to automate the process. With cloud, you can achieve, server provisioning, orchestration, as it will reduce costly human labor and improves customer satisfaction through in reduction while computing task on the cloud. 2) Virtualization: It is software that separates physical infrastructure to create various dedicated resources. And, its a virtue of cloud computing. 3) Flexibility and Scalability: Flexibility is best w.r.t. employees as they can work from anywhere, in and out, even with any device as BYOD, etc. And it’s much more scalable, i.e. easily scale-up and scale-down e.g. BookMyShow having enormous traffic in weekends rather than week days, so availability can be ramped up and then down afterwards. 4) Better Security : Many companies struggling with this approach, which most firms implementing their own security policy, and improving their service security offerings. Currently, all cloud SP, providing as they take a great concern and claim the best security. 5) Overall cost reduction : In networking, security, back up, CRM, maintenances, software upgrades, everything is taking care by the cloud SP, and you will pay only how much you exactly used. It turns, ""capital expenditure into operational expenditure. It is accessible everywhere(just with the internet) i.e. anything, anytime, anywhere. So, with this we can say, we are moving towards green IT. For mid-scale businesses and startups the cloud is also excellent as it allows them to get up and running with key business tools, with minimum fuss and cost, allowing them to instead focus their on their innovative world-changing ideas Cloud computing for sure provides advantages over the conventional approach. However, it increases the exposure to cyber sabotage which needs to be addressed through adequate cyber security measures."
##Question:What do you understand by cloud computing? Briefly discuss its advantages? (150 words/10 Marks)##Answer:"Cloud computing means storing and accessing data and programs over the Internet instead of your computer"s hard drive.The cloud is just a metaphor for the Internet. Some advantages of Cloud as follows, 1) Automation: The primary goal of any computing is to automate the process. With cloud, you can achieve, server provisioning, orchestration, as it will reduce costly human labor and improves customer satisfaction through in reduction while computing task on the cloud. 2) Virtualization: It is software that separates physical infrastructure to create various dedicated resources. And, its a virtue of cloud computing. 3) Flexibility and Scalability: Flexibility is best w.r.t. employees as they can work from anywhere, in and out, even with any device as BYOD, etc. And it’s much more scalable, i.e. easily scale-up and scale-down e.g. BookMyShow having enormous traffic in weekends rather than week days, so availability can be ramped up and then down afterwards. 4) Better Security : Many companies struggling with this approach, which most firms implementing their own security policy, and improving their service security offerings. Currently, all cloud SP, providing as they take a great concern and claim the best security. 5) Overall cost reduction : In networking, security, back up, CRM, maintenances, software upgrades, everything is taking care by the cloud SP, and you will pay only how much you exactly used. It turns, ""capital expenditure into operational expenditure. It is accessible everywhere(just with the internet) i.e. anything, anytime, anywhere. So, with this we can say, we are moving towards green IT. For mid-scale businesses and startups the cloud is also excellent as it allows them to get up and running with key business tools, with minimum fuss and cost, allowing them to instead focus their on their innovative world-changing ideas Cloud computing for sure provides advantages over the conventional approach. However, it increases the exposure to cyber sabotage which needs to be addressed through adequate cyber security measures."
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प्राचीन भारत में स्तूप स्थापत्य कला के विकास का संक्षेप में वर्णन कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Briefly describe the development of stupa architecture in ancient India. (150 to 200 words, 10 marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में स्तूप स्थापत्य एवं उसके विकास के बारे में सूचनाएं दीजिये 2- मुख्य भाग में स्तूप स्थापत्य के विकास का वर्णन कीजिये 3- अंतिम में महान विरासत के रूप में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये प्राचीन भारतीय स्थापत्य के अध्ययन के सन्दर्भ में स्तूप स्थापत्य का महत्वपूर्ण स्थान है|स्तूप बुद्ध के शारीरिक अवशेषों एवं प्रयोग में लायी गयी वस्तुओं पर निर्मित अर्धगोलाकार ढाँचे हैं,इन्हें बुद्ध के महापरिनिर्वाण का प्रतीक माना जाता है| अर्धगोलाकार ढाँचे के उपर बने बॉक्स को हर्मिका कहा जाता है इस पर छत्र लगा होता है| हर्मिका को पवित्र स्थान माना जाता है क्योंकि इसी में बुद्ध के अवशेष होते हैं| स्तूप के आधार तल को मेढ़ी कहते हैं इसी पर स्तूप बना होता है| स्तूप के प्रवेश द्वार को तोरण कहा जाता है जबकि स्तूप के चारों तरफ बनी चार दीवारी को वेदिका कहते हैं| इसके चारों ओर प्रदक्षिणापथ का निर्माण किया गया होता है| स्तूपों का चार प्रकार से वर्गीकरण किया जा सकता है यथा शारीरिक स्तूप, ये बुद्ध के शारीरिक अवशेषों पर निर्मित किये गए हैं; पारीभौगिक स्तूप बुद्ध द्वारा उपयोग में लायी गयी वस्तुओं पर पर निर्मित हुए हैं जबकि उद्देशिक स्तूप जीवन से सम्बन्धित महत्वपूर्ण स्थलों पर बनाए गए हैं एवं पूजार्थक/संकल्पित स्तूप, बौद्ध धर्म के अनुयायियों द्वारा पूजा के उद्देश्य से बनाए जाते हैं| भारत में स्तूप स्थापत्य का विकास क्रमिक रूप से हुआ है| मौर्यकाल में स्तूप स्थापत्य बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात उनके शारीरिक अवशेषों पर 8 स्तूपों का निर्माण किया गया था, हालांकि पुरातात्विक साक्ष्य नही मिलते है बौद्ध ग्रंथों से यह जानकारी मिलती है की अशोक ने 84 हजार स्तूपों का निर्माण करवाया था, हालांकि इसे किवदंती माना जाता है, फिर भी मौर्यकालीन कुछ स्तूपों के साक्ष्य बोधगया, सारनाथ, तक्षशिला, साँची गया आदि से मिले हैं अशोक कालीन स्तूपों में स्तूप स्थापत्य से सम्बन्धित सभी विशेषताएं दिखाई पड़ती हैं, मौर्य कालीन स्तूपों के तोरण एवं वेदिका में लकड़ी का प्रयोग किया गया था तथा स्तूपों के निर्माण में ईंटों का प्रयोग किया गया था| बड़ी संख्या में स्तूपों का निर्माण न केवल समकालीन समाज में बौद्ध धर्म कि लोकप्रियता बल्कि राजकीय संरक्षण का भी प्रमाण देते हैं| मौर्योत्तर काल में स्तूप स्थापत्य मौर्योत्तर काल में ब्राह्मण धर्म के संरक्षक होने के बावजूद शुंग शासकों के संरक्षण में साँची, सारनाथ, भरहुत आदि स्थलों पर नए स्तूपों का निर्माण तथा कुछ अशोककालीन स्तूपों का पुनरोद्धार भी; मौर्य कालीन स्तूप स्थापत्य के विपरीत शुंग कालीन स्तूपों के तोरण एवं रेलिंग में लकड़ी के स्थान पर पत्थरों का अधिकाधिक प्रयोग होने लगा शुंग कालीन स्तूपों पर बुद्ध की जीवन की घटनाओं को प्रतीक (यहाँ बुद्ध की मूर्तियाँ नहीं बनीं ) के माध्यम से स्पष्ट किया गया था, कुषाण शासकों द्वारा पेशावर, तक्षशिला तथा चारसद्दा आदि में विशाल स्तूपों का निर्माण किया गया कुषाण कालीन स्तूपों में अलंकरण पर अत्यधिक बल दिया गया है शुंग कालीन स्तूपों से लग कुषाण कालीन स्तूपों पर प्रतीक के साथ-साथ बुद्ध एवं बोधिसत्व के मूर्तियों के साक्ष्य भी मिलने लगते हैं| इसी तरह सातवाहन शासकों ने अमरावती, नागार्जुनीकोंडा में स्तूपों का निर्माण करवाया था सातवाहन युगीन स्तूपों के निर्माण में संगमरमर का भी प्रयोग इस काल की प्रमुख विशेषता है; सातवाहन युगीन स्तूप स्थापत्य पर हीनयान एवं महायान दोनों का प्रभाव दिखाई देता है गुप्तकालीन स्तूपस्थापत्य गुप्त शासकों के समय भी स्तूप निर्माण की परम्परा जारी रही| सारनाथ एवं राज्ग्रह में गुप्तकालीन स्तूपों के साक्ष्य मिलते हैं| हालांकि इस काल में तुलनात्मक रूप से स्तूपों की संख्या कम दिखाई देती है| स्तूपों की निर्माण शैली में भी गिरावट के संकेत दिखने लगते हैं जैसे चबूतरों की उंचाई कम, पक्की ईटों का प्रयोग आदि| गुप्तों के पश्चात स्तूप स्थापत्य के विकास के साक्ष्य प्रायः नहीं मिलते हैं| वस्तुतः ब्राहमण धर्म के उत्थान के कारण गुप्तकाल से मंदिर स्थापत्य पर बल दिया जाने लगा था अतः स्तूप स्थापत्य का पूर्ववत विकास नहीं हो पाया| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत में स्तूप स्थापत्य का क्रमिक रूप से विकास हुआ| स्तूप स्थापत्य का चरमोत्कर्ष मौर्योत्तर काल में दिखाई देता है| प्राचीन भारतीय संस्कृति की विरासत होने के कारण भारतीय स्थापत्य के अध्ययन में स्तूपों का स्थान महत्वपूर्ण है|
##Question:प्राचीन भारत में स्तूप स्थापत्य कला के विकास का संक्षेप में वर्णन कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Briefly describe the development of stupa architecture in ancient India. (150 to 200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में स्तूप स्थापत्य एवं उसके विकास के बारे में सूचनाएं दीजिये 2- मुख्य भाग में स्तूप स्थापत्य के विकास का वर्णन कीजिये 3- अंतिम में महान विरासत के रूप में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये प्राचीन भारतीय स्थापत्य के अध्ययन के सन्दर्भ में स्तूप स्थापत्य का महत्वपूर्ण स्थान है|स्तूप बुद्ध के शारीरिक अवशेषों एवं प्रयोग में लायी गयी वस्तुओं पर निर्मित अर्धगोलाकार ढाँचे हैं,इन्हें बुद्ध के महापरिनिर्वाण का प्रतीक माना जाता है| अर्धगोलाकार ढाँचे के उपर बने बॉक्स को हर्मिका कहा जाता है इस पर छत्र लगा होता है| हर्मिका को पवित्र स्थान माना जाता है क्योंकि इसी में बुद्ध के अवशेष होते हैं| स्तूप के आधार तल को मेढ़ी कहते हैं इसी पर स्तूप बना होता है| स्तूप के प्रवेश द्वार को तोरण कहा जाता है जबकि स्तूप के चारों तरफ बनी चार दीवारी को वेदिका कहते हैं| इसके चारों ओर प्रदक्षिणापथ का निर्माण किया गया होता है| स्तूपों का चार प्रकार से वर्गीकरण किया जा सकता है यथा शारीरिक स्तूप, ये बुद्ध के शारीरिक अवशेषों पर निर्मित किये गए हैं; पारीभौगिक स्तूप बुद्ध द्वारा उपयोग में लायी गयी वस्तुओं पर पर निर्मित हुए हैं जबकि उद्देशिक स्तूप जीवन से सम्बन्धित महत्वपूर्ण स्थलों पर बनाए गए हैं एवं पूजार्थक/संकल्पित स्तूप, बौद्ध धर्म के अनुयायियों द्वारा पूजा के उद्देश्य से बनाए जाते हैं| भारत में स्तूप स्थापत्य का विकास क्रमिक रूप से हुआ है| मौर्यकाल में स्तूप स्थापत्य बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात उनके शारीरिक अवशेषों पर 8 स्तूपों का निर्माण किया गया था, हालांकि पुरातात्विक साक्ष्य नही मिलते है बौद्ध ग्रंथों से यह जानकारी मिलती है की अशोक ने 84 हजार स्तूपों का निर्माण करवाया था, हालांकि इसे किवदंती माना जाता है, फिर भी मौर्यकालीन कुछ स्तूपों के साक्ष्य बोधगया, सारनाथ, तक्षशिला, साँची गया आदि से मिले हैं अशोक कालीन स्तूपों में स्तूप स्थापत्य से सम्बन्धित सभी विशेषताएं दिखाई पड़ती हैं, मौर्य कालीन स्तूपों के तोरण एवं वेदिका में लकड़ी का प्रयोग किया गया था तथा स्तूपों के निर्माण में ईंटों का प्रयोग किया गया था| बड़ी संख्या में स्तूपों का निर्माण न केवल समकालीन समाज में बौद्ध धर्म कि लोकप्रियता बल्कि राजकीय संरक्षण का भी प्रमाण देते हैं| मौर्योत्तर काल में स्तूप स्थापत्य मौर्योत्तर काल में ब्राह्मण धर्म के संरक्षक होने के बावजूद शुंग शासकों के संरक्षण में साँची, सारनाथ, भरहुत आदि स्थलों पर नए स्तूपों का निर्माण तथा कुछ अशोककालीन स्तूपों का पुनरोद्धार भी; मौर्य कालीन स्तूप स्थापत्य के विपरीत शुंग कालीन स्तूपों के तोरण एवं रेलिंग में लकड़ी के स्थान पर पत्थरों का अधिकाधिक प्रयोग होने लगा शुंग कालीन स्तूपों पर बुद्ध की जीवन की घटनाओं को प्रतीक (यहाँ बुद्ध की मूर्तियाँ नहीं बनीं ) के माध्यम से स्पष्ट किया गया था, कुषाण शासकों द्वारा पेशावर, तक्षशिला तथा चारसद्दा आदि में विशाल स्तूपों का निर्माण किया गया कुषाण कालीन स्तूपों में अलंकरण पर अत्यधिक बल दिया गया है शुंग कालीन स्तूपों से लग कुषाण कालीन स्तूपों पर प्रतीक के साथ-साथ बुद्ध एवं बोधिसत्व के मूर्तियों के साक्ष्य भी मिलने लगते हैं| इसी तरह सातवाहन शासकों ने अमरावती, नागार्जुनीकोंडा में स्तूपों का निर्माण करवाया था सातवाहन युगीन स्तूपों के निर्माण में संगमरमर का भी प्रयोग इस काल की प्रमुख विशेषता है; सातवाहन युगीन स्तूप स्थापत्य पर हीनयान एवं महायान दोनों का प्रभाव दिखाई देता है गुप्तकालीन स्तूपस्थापत्य गुप्त शासकों के समय भी स्तूप निर्माण की परम्परा जारी रही| सारनाथ एवं राज्ग्रह में गुप्तकालीन स्तूपों के साक्ष्य मिलते हैं| हालांकि इस काल में तुलनात्मक रूप से स्तूपों की संख्या कम दिखाई देती है| स्तूपों की निर्माण शैली में भी गिरावट के संकेत दिखने लगते हैं जैसे चबूतरों की उंचाई कम, पक्की ईटों का प्रयोग आदि| गुप्तों के पश्चात स्तूप स्थापत्य के विकास के साक्ष्य प्रायः नहीं मिलते हैं| वस्तुतः ब्राहमण धर्म के उत्थान के कारण गुप्तकाल से मंदिर स्थापत्य पर बल दिया जाने लगा था अतः स्तूप स्थापत्य का पूर्ववत विकास नहीं हो पाया| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत में स्तूप स्थापत्य का क्रमिक रूप से विकास हुआ| स्तूप स्थापत्य का चरमोत्कर्ष मौर्योत्तर काल में दिखाई देता है| प्राचीन भारतीय संस्कृति की विरासत होने के कारण भारतीय स्थापत्य के अध्ययन में स्तूपों का स्थान महत्वपूर्ण है|
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लोकसेवकों की नैतिक जवाबदेहिता को सुनिश्चित करने की दिशा में विभिन्न प्रकार की बाधाओं की चर्चा करते हुए इसे दूर करने हेतु उपयुक्त उपायों को भी बताइए | (150-200 शब्द) While discussing various types of obstacles towrads ensuring ethical accountability of public servants, also mention suitable measures to overcome it. (150-200 words)
एप्रोच- भूमिका में लोकसेवकों की जवाबदेही का सामान्य परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | पुनः जवाबदेहिता को सुनिश्चित करने में आने वाली बाधाओं को को बताइए | अंत में इन बाधाओं को दूर करने के उपाय को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिए | उत्तर - जवाबदेहिता का अर्थ है कि किसी सिविल सेवक ने अपनी शक्तियों तथा विवेकाधिकार का प्रयोग करते हुए जो कृत्य किये हैं उन कृत्यों के विधिक और नैतिक औचित्य की व्याख्या करने में यदि सक्षम नहीं होता तो उसे समुचित दंड का भागी होना होगा | उससे जिस व्याख्या की अपेक्षा की जाती है उसमे निहित है कि उसके कृत्य में विवेकशीलता , उपयुक्तता , शुचिता , विधिकता जैसे तत्व उपस्थित रहें | यदि ये तत्व उपस्थित हैं तो गलती से होने वाली भूल पर दंड नहीं दिया जायेगा किन्तु यदि ये तत्व अनुपस्थित हैं तो उसे दंड भुगतना होगा | जवाबदेहिता को सुनिश्चित करने में बाधाएं - लोक सेवकों की अपने विशिष्ट कार्यक्षेत्र में विशेषज्ञता का होना | लोक सेवकों का पूर्णकालीन होना | समय के परिवर्तन के साथ लोकसेवकों के कार्यों में अधिक जटिलता एवं विस्तारीकरण का होना | लोकसेवकों की जवाबदेहिता को सुनिश्चित करने हेतु विधिक दायित्व के साथ-साथ नैतिक दायित्व भी | लोक सेवकों का संगठन के प्रति वफादार होने के कारण शासन प्रणाली की खामियों को उजागर करने पर विशेष बल नहीं | सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर लोकसेवकों का महत्वपूर्ण सूचनाओं पर नियंत्रण, जोकि आम जनता की पहुँच से बाहर | लोक सेवकों की व्यक्तिगत और सामूहिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के निम्नलिखित उपाय- सुनिश्चित सोपानक्रम होना चाहिए , जिसमें सभी पदों की शक्तियां और उत्तरदायित्व स्पष्टतः परिभाषित हो | जहाँ-जहाँ संभव हो प्रशासनिक एकाधिकार ख़त्म करके सीमित या मुक्त प्रतिस्पर्धा शुरू की जानी चाहिए क्योंकि प्रतिस्पर्धा स्वतः जवाबदेहिता सुनिश्चित करती है | पब्लिक सर्विस गारंटी एक्ट या लोकसेवा गारंटी अधिनियम के तहत प्रशासन को कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों की पूर्ण सुरक्षा की गारंटी देनी चाहिए , ताकि वे निर्भयतापूर्वक लोकहित में निर्णय कर सकें | किसी कार्य या परियोजना के सन्दर्भ में सभी अधिकारियों में स्पष्ट कार्य विभाजन हो | संदेह की गुन्जाइश नहीं रहनी चाहिए | जिम्मेदारी को निभाने की प्रतिबद्धता और निष्पादन के आधार पर समुचित पुरस्कारों तथा दंडों की वस्तुनिष्ठ व्यवस्था हो | सूचना के अधिकार का समुचित क्रियान्वयन | सिटिजन चार्टर की व्यवस्था | भ्रष्ट अधिकारियों के विरुद्ध कठोर और त्वरित कारवाई होनी चाहिए ताकि सभी कर्मचारियों के पास भ्रष्ट न होने की स्पष्ट वजह हो |
##Question:लोकसेवकों की नैतिक जवाबदेहिता को सुनिश्चित करने की दिशा में विभिन्न प्रकार की बाधाओं की चर्चा करते हुए इसे दूर करने हेतु उपयुक्त उपायों को भी बताइए | (150-200 शब्द) While discussing various types of obstacles towrads ensuring ethical accountability of public servants, also mention suitable measures to overcome it. (150-200 words)##Answer:एप्रोच- भूमिका में लोकसेवकों की जवाबदेही का सामान्य परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | पुनः जवाबदेहिता को सुनिश्चित करने में आने वाली बाधाओं को को बताइए | अंत में इन बाधाओं को दूर करने के उपाय को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिए | उत्तर - जवाबदेहिता का अर्थ है कि किसी सिविल सेवक ने अपनी शक्तियों तथा विवेकाधिकार का प्रयोग करते हुए जो कृत्य किये हैं उन कृत्यों के विधिक और नैतिक औचित्य की व्याख्या करने में यदि सक्षम नहीं होता तो उसे समुचित दंड का भागी होना होगा | उससे जिस व्याख्या की अपेक्षा की जाती है उसमे निहित है कि उसके कृत्य में विवेकशीलता , उपयुक्तता , शुचिता , विधिकता जैसे तत्व उपस्थित रहें | यदि ये तत्व उपस्थित हैं तो गलती से होने वाली भूल पर दंड नहीं दिया जायेगा किन्तु यदि ये तत्व अनुपस्थित हैं तो उसे दंड भुगतना होगा | जवाबदेहिता को सुनिश्चित करने में बाधाएं - लोक सेवकों की अपने विशिष्ट कार्यक्षेत्र में विशेषज्ञता का होना | लोक सेवकों का पूर्णकालीन होना | समय के परिवर्तन के साथ लोकसेवकों के कार्यों में अधिक जटिलता एवं विस्तारीकरण का होना | लोकसेवकों की जवाबदेहिता को सुनिश्चित करने हेतु विधिक दायित्व के साथ-साथ नैतिक दायित्व भी | लोक सेवकों का संगठन के प्रति वफादार होने के कारण शासन प्रणाली की खामियों को उजागर करने पर विशेष बल नहीं | सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर लोकसेवकों का महत्वपूर्ण सूचनाओं पर नियंत्रण, जोकि आम जनता की पहुँच से बाहर | लोक सेवकों की व्यक्तिगत और सामूहिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के निम्नलिखित उपाय- सुनिश्चित सोपानक्रम होना चाहिए , जिसमें सभी पदों की शक्तियां और उत्तरदायित्व स्पष्टतः परिभाषित हो | जहाँ-जहाँ संभव हो प्रशासनिक एकाधिकार ख़त्म करके सीमित या मुक्त प्रतिस्पर्धा शुरू की जानी चाहिए क्योंकि प्रतिस्पर्धा स्वतः जवाबदेहिता सुनिश्चित करती है | पब्लिक सर्विस गारंटी एक्ट या लोकसेवा गारंटी अधिनियम के तहत प्रशासन को कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों की पूर्ण सुरक्षा की गारंटी देनी चाहिए , ताकि वे निर्भयतापूर्वक लोकहित में निर्णय कर सकें | किसी कार्य या परियोजना के सन्दर्भ में सभी अधिकारियों में स्पष्ट कार्य विभाजन हो | संदेह की गुन्जाइश नहीं रहनी चाहिए | जिम्मेदारी को निभाने की प्रतिबद्धता और निष्पादन के आधार पर समुचित पुरस्कारों तथा दंडों की वस्तुनिष्ठ व्यवस्था हो | सूचना के अधिकार का समुचित क्रियान्वयन | सिटिजन चार्टर की व्यवस्था | भ्रष्ट अधिकारियों के विरुद्ध कठोर और त्वरित कारवाई होनी चाहिए ताकि सभी कर्मचारियों के पास भ्रष्ट न होने की स्पष्ट वजह हो |
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राष्ट्रीय आपातकाल के संदर्भ में 44 वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा किए गए बदलाओं की चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द, अंक-10 ) Discuss the changes made by 44th constitutional amendment act in terms of national emergency। (150-200 words, marks -10 )
Approach: भूमिका में 44 वें संविधान संशोधन की पृष्टभूमि की चर्चा कर सकते हैं। 44 वें संविधान संशोधन से हुए बदलाओं की चर्चा बिंदुवत कीजिये। निष्कर्ष में इन बदलावों के महत्व को लिख सकते हैं। उत्तर: 1975 से1977 के बीच देश में आपातकाल लागू था। इस दौरान आपातकाल के संदर्भ में कई कमियों को पाया गया। 1978 में 44 वें संविधान संशोधन के माध्यम से आपात व्यवस्था को और तार्किक व प्रभावी बनाने का प्रयास किया गया। 44 वां संशोधन अधिनियम से आपातकाल के संदर्भ में हुए बदलाव: राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा राष्ट्रपति द्वारा तभी की जा सकेगी जब अनु. 352(A) के तहत केन्द्रीय केबिनेट लिखित रूप में राष्ट्रपति को इसकी सिफ़ारिश करे। पहले युद्ध,बाह्य आक्रमण या आंतरिक अशांति के आधार पर राष्ट्रीय आपात की घोषणा की जा सकती थी अब आंतरिक अशांति की स्थिति तभी मानी जाएगी जब सशस्त्र विद्रोह हो अब सशस्त्र विद्रोह के आधार पर यह तय होगा कि देश की सुरक्षा को कितना खतरा है। भाग 18 के अंतर्गत वर्णित आपातकालीन शक्तियों में राष्ट्रपति की संतुष्टि को केबिनेट की संतुष्टि के अनुसार तय करने कि व्यवस्था की गयी, पहले ऐसी व्यवस्था नहीं थी। पहले की भांति अब भी बाह्यआक्रमण युद्द अथवा सशस्त्र विद्रोह की वास्तविक घटना घटित होने पर ही राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा की जाएगी, यह अनिवार्य नहीं है। राष्ट्रपति अनुमान के आधार पर भी यह उद्घोषणा कर सकता है। राष्ट्रपति की उद्घोषणा को न्यायालय में चुनौती दी जा सकेगी। राष्ट्रीय आपात की घोषणा के दौरान किसी भी दशा में भाग 3 के अनु. 20 व 21 को निलंबित नहीं किया जा सकेगा। पहले यह व्यवस्था थी कि राष्ट्रपति कि आपात संबंधी उद्घोषणा को यदि संसद साधारण बहुमत से इस उद्घोषणा की तिथि से 60 दिन के भीतर कोई संकल्प पारित कर देती है तो ऐसी स्थिति में यह उद्घोषणा तब तक प्रभावी रहेगी जब तक राष्ट्रपति इसे खुद से वापस ना ले ले। किन्तु 1978 के बाद यह व्यवस्था बदल गयी अब इस प्रकार की किसी भी उद्घोषणा को उद्घोषणा की तिथि के 30 दिन के भीतर संसद के दोनों सदनों द्वारा अलग अलग विशेष बहुमत से संबन्धित संकल्प पारित करना होगा और पुन: उक्त तिथि से 6 माह कि समाप्ति के पूर्व इसी प्रकार संकल्प पारित करना होगा तभी अगले 6 माह तक यह उद्घोषणा प्रभावी रहेगी। पहले केवल राष्ट्रपति ही अपनी उद्घोषणा को वापस ले सकता था किन्तु 1978 में यह व्यवस्था की गयी कि यदि लोकसभा के 1/10 सदस्य लोकसभा अध्यक्ष या राष्ट्रपति में से किसी एक के पास आपातकाल को हटाने संबंधी कोई संदेश देते हैं अथवा पत्र देते हैं तो हर हाल में इस पत्र प्राप्ति के 14 दिन के भीतर लोक सभा की विशेष बैठक बुलानी होगी और यदि साधारण बहुमत से लोकसभा ने राष्ट्रीय आपात को हटाने संबंधी प्रस्ताव पारित कर दिया तो राष्ट्रपति को हर हाल में अपनी उद्घोषणा वापस लेनी होगी। यहाँ यह बताना आवश्यक है कि 44 वें संविधान संशोधन अधिनियम के अंतर्गत सशस्त्र विद्रोह या बाह्यआक्रमण कि स्थिति देश के किसी के हिस्से में घटित हो सकती है तो पूरे देश में राष्ट्रीय आपात कि जरूरत नहीं पड़ेगी। 44 वें संविधान संशोधन अधिनियम में इसे स्पष्ट कर दिया गया अर्थात आपातकाल अब देश के किसी एक भाग में भी लगाया जा सकता है। 44 वें संविधान संशोधन ने आपातकाल घोषणा हेतु केन्द्रीय मंत्रिमंडल को उत्तरदायी बनाया गया तथा मूल अधिकारों के संदर्भ में अधिक तार्किक बनाया गया। इसने आपातकाल जैसी व्यवस्था के दुरुपयोग को कठिन बनाया जिसके सकारात्मक दूरगामी परिणाम देखने को मिले।
##Question:राष्ट्रीय आपातकाल के संदर्भ में 44 वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा किए गए बदलाओं की चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द, अंक-10 ) Discuss the changes made by 44th constitutional amendment act in terms of national emergency। (150-200 words, marks -10 )##Answer:Approach: भूमिका में 44 वें संविधान संशोधन की पृष्टभूमि की चर्चा कर सकते हैं। 44 वें संविधान संशोधन से हुए बदलाओं की चर्चा बिंदुवत कीजिये। निष्कर्ष में इन बदलावों के महत्व को लिख सकते हैं। उत्तर: 1975 से1977 के बीच देश में आपातकाल लागू था। इस दौरान आपातकाल के संदर्भ में कई कमियों को पाया गया। 1978 में 44 वें संविधान संशोधन के माध्यम से आपात व्यवस्था को और तार्किक व प्रभावी बनाने का प्रयास किया गया। 44 वां संशोधन अधिनियम से आपातकाल के संदर्भ में हुए बदलाव: राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा राष्ट्रपति द्वारा तभी की जा सकेगी जब अनु. 352(A) के तहत केन्द्रीय केबिनेट लिखित रूप में राष्ट्रपति को इसकी सिफ़ारिश करे। पहले युद्ध,बाह्य आक्रमण या आंतरिक अशांति के आधार पर राष्ट्रीय आपात की घोषणा की जा सकती थी अब आंतरिक अशांति की स्थिति तभी मानी जाएगी जब सशस्त्र विद्रोह हो अब सशस्त्र विद्रोह के आधार पर यह तय होगा कि देश की सुरक्षा को कितना खतरा है। भाग 18 के अंतर्गत वर्णित आपातकालीन शक्तियों में राष्ट्रपति की संतुष्टि को केबिनेट की संतुष्टि के अनुसार तय करने कि व्यवस्था की गयी, पहले ऐसी व्यवस्था नहीं थी। पहले की भांति अब भी बाह्यआक्रमण युद्द अथवा सशस्त्र विद्रोह की वास्तविक घटना घटित होने पर ही राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा की जाएगी, यह अनिवार्य नहीं है। राष्ट्रपति अनुमान के आधार पर भी यह उद्घोषणा कर सकता है। राष्ट्रपति की उद्घोषणा को न्यायालय में चुनौती दी जा सकेगी। राष्ट्रीय आपात की घोषणा के दौरान किसी भी दशा में भाग 3 के अनु. 20 व 21 को निलंबित नहीं किया जा सकेगा। पहले यह व्यवस्था थी कि राष्ट्रपति कि आपात संबंधी उद्घोषणा को यदि संसद साधारण बहुमत से इस उद्घोषणा की तिथि से 60 दिन के भीतर कोई संकल्प पारित कर देती है तो ऐसी स्थिति में यह उद्घोषणा तब तक प्रभावी रहेगी जब तक राष्ट्रपति इसे खुद से वापस ना ले ले। किन्तु 1978 के बाद यह व्यवस्था बदल गयी अब इस प्रकार की किसी भी उद्घोषणा को उद्घोषणा की तिथि के 30 दिन के भीतर संसद के दोनों सदनों द्वारा अलग अलग विशेष बहुमत से संबन्धित संकल्प पारित करना होगा और पुन: उक्त तिथि से 6 माह कि समाप्ति के पूर्व इसी प्रकार संकल्प पारित करना होगा तभी अगले 6 माह तक यह उद्घोषणा प्रभावी रहेगी। पहले केवल राष्ट्रपति ही अपनी उद्घोषणा को वापस ले सकता था किन्तु 1978 में यह व्यवस्था की गयी कि यदि लोकसभा के 1/10 सदस्य लोकसभा अध्यक्ष या राष्ट्रपति में से किसी एक के पास आपातकाल को हटाने संबंधी कोई संदेश देते हैं अथवा पत्र देते हैं तो हर हाल में इस पत्र प्राप्ति के 14 दिन के भीतर लोक सभा की विशेष बैठक बुलानी होगी और यदि साधारण बहुमत से लोकसभा ने राष्ट्रीय आपात को हटाने संबंधी प्रस्ताव पारित कर दिया तो राष्ट्रपति को हर हाल में अपनी उद्घोषणा वापस लेनी होगी। यहाँ यह बताना आवश्यक है कि 44 वें संविधान संशोधन अधिनियम के अंतर्गत सशस्त्र विद्रोह या बाह्यआक्रमण कि स्थिति देश के किसी के हिस्से में घटित हो सकती है तो पूरे देश में राष्ट्रीय आपात कि जरूरत नहीं पड़ेगी। 44 वें संविधान संशोधन अधिनियम में इसे स्पष्ट कर दिया गया अर्थात आपातकाल अब देश के किसी एक भाग में भी लगाया जा सकता है। 44 वें संविधान संशोधन ने आपातकाल घोषणा हेतु केन्द्रीय मंत्रिमंडल को उत्तरदायी बनाया गया तथा मूल अधिकारों के संदर्भ में अधिक तार्किक बनाया गया। इसने आपातकाल जैसी व्यवस्था के दुरुपयोग को कठिन बनाया जिसके सकारात्मक दूरगामी परिणाम देखने को मिले।
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भारत एवं श्रीलंका के मध्य विवाद के पक्षों को प्रस्तुत कीजिये | साथ ही, इन दोनों के मध्य सहयोग के आयामों पर चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) Present the areas of dispute between India and Sri Lanka. Also, Discuss the dimensions of cooperation between these two. (150-200 words/10 Marks)
एप्रोच- भारत एवं श्रीलंका के मध्य ऐतिहासिक संबंधों की पृष्ठभूमि से उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में,भारत एवं श्रीलंका के मध्य विवाद के पक्षों को बिंदुबार बताईये| अंतिम भाग में,भारत एवं श्रीलंका के मध्य सहयोग के आयामों पर चर्चा कीजिये| निष्कर्षतः, भारत के लिए श्रीलंका का महत्व दर्शाते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- भारत एवं श्रीलंका के संबंध 2500 वर्ष से भी अधिक पुराने हैं तथा दोनों देशों में बौद्धिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, भाषाई आदि आधारों पर काफी समानताएं भी हैं| हिंद महासागर में सबसे नजदीकी पड़ोसी होने के कारण इसकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है| हालाँकि श्रीलंका से ज्यादातर हमारे मित्रवत संबंध ही रहे हैं फिर भी कुछ विवाद के आयाम भी दिखाई देते हैं- मछुआरों का विवाद- समुद्री सीमा समझौता(1974) होने के बावजूद श्रीलंका द्वारा भारतीय मछुआरों को पकड़ना; भारतीय मछुआरों द्वारा पाक की खाड़ी तथा मन्नार की खाड़ी में श्रीलंका के जलक्षेत्र में जाकर मछली पकड़ना; कच्चातिवु द्वीप का भारतीय मछुआरों के लिए महत्व; श्रीलंका के संघीय स्वरूप में हस्तक्षेप को लेकर; चीन का बढ़ता प्रभाव- महिंद्रा राजपक्षे के कार्यकाल में श्रीलंका का चीन की ओर अत्यधिक झुकाव; हंबनटोटा को लेकर; चीनी निवेश का लगातार बढ़ना तथा श्रीलंका का चीन के कर्ज जाल में फंसना; भारत द्वारा श्रीलंका के खिलाफ़ UNHRC में वोट(2012-13); श्रीलंका के नृजातीय मुद्दे(तमिल-सिंघली विवाद) पर दोनों देशों का रूख; लिट्टे एवं भारतीय शांति सेना से जुड़ा पक्ष; भारत-श्रीलंका के मध्य सहयोग के आयाम रक्षा एवं सुरक्षा क्षेत्र मित्रशक्ति एवं SLINEX द्विपक्षीय एक्सरसाइज; डिफेंस ट्रेनिंग प्रोग्राम्स; त्रिपक्षीय समुद्री सुरक्षा सहयोग(भारत-श्रीलंका-मालदीव); आर्थिक पक्ष मताला एयरपोर्ट का विकास; हंबनटोटा में भूमिका; द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग एवं निवेश में बढ़ोतरी; त्रिकोंमाली पोर्ट एवं कोलंबो पोर्ट में सहयोग; अवसंरचनात्मक एवं विकासात्मक सहयोग रेलवे; जाफ़ना-कोलंबो रेलवे लाइन; अवसंरचनात्मक विकास के लिए लाइन ऑफ़ क्रेडिट; उत्तरी श्रीलंका में लिट्टे के साथ युद्ध खत्म होने के बाद विकास एवं अवसंरचना विकास में भारत की भूमिका; तुरंत सहायता के रूप में वॉर रिलीफ; दीर्घ समय में रिकंस्ट्रक्शन क्षेत्र में; सांस्कृतिक एवं शैक्षिक सहयोग सांस्कृतिक सहयोग समझौता(1977); इंडिया-श्रीलंका फाउंडेशन(1998)- तकनीक एवं विज्ञान; सांस्कृतिक एवं शैक्षिक सहयोग; पर्यटन- भारतीय पर्यटकों के लिए वीजा की आसान प्रक्रिया, वीजा ऑन अराइवल तथा वीजा शुल्कों में छुट; नालंदा प्रोजेक्ट में पार्टनर के रूप में श्रीलंका; भारत के राष्ट्रीय ज्ञान नेटवर्क(NKN) को लंका शिक्षा और अनुंसधान नेटवर्क(LEARN) से जोड़ना ताकि दोनों तरफ के विश्वविद्यालय सर्वोत्तम प्रथाओं और अनुसंधान विचारों को साझा कर सकें| साउथ एशियन सैटेलाइट; मौसम पूर्वानुमान; सुनामी चेतावनी; दूरसंचार; गवर्नेंस; मीटरोलॉजी; भारत के लिए श्रीलंका का व्यापक महत्व है जैसे-हिंद महासागर में महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्ग की रक्षा हेतु; समुद्री पायरेसी;चीन के मेरीटाइम सिल्क रूट को काउंटर करने हेतु आदि| साथ ही,हिंद महासागर को विवादरहित क्षेत्र बनाने एवंब्लू इकॉनोमी एवं व्यापार को बढ़ावा देने हेतु भी श्रीलंका महत्वपूर्ण है| इस दृष्टिकोण से श्रीलंका राष्ट्रपति चुनाव, 2019 का व्यापक महत्व है क्योंकि नए राष्ट्रपति गोटाबेय राजपक्षे द्वारा पहली विदेश यात्रा के लिए भारत को चुना गया है|
##Question:भारत एवं श्रीलंका के मध्य विवाद के पक्षों को प्रस्तुत कीजिये | साथ ही, इन दोनों के मध्य सहयोग के आयामों पर चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) Present the areas of dispute between India and Sri Lanka. Also, Discuss the dimensions of cooperation between these two. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच- भारत एवं श्रीलंका के मध्य ऐतिहासिक संबंधों की पृष्ठभूमि से उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में,भारत एवं श्रीलंका के मध्य विवाद के पक्षों को बिंदुबार बताईये| अंतिम भाग में,भारत एवं श्रीलंका के मध्य सहयोग के आयामों पर चर्चा कीजिये| निष्कर्षतः, भारत के लिए श्रीलंका का महत्व दर्शाते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- भारत एवं श्रीलंका के संबंध 2500 वर्ष से भी अधिक पुराने हैं तथा दोनों देशों में बौद्धिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, भाषाई आदि आधारों पर काफी समानताएं भी हैं| हिंद महासागर में सबसे नजदीकी पड़ोसी होने के कारण इसकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है| हालाँकि श्रीलंका से ज्यादातर हमारे मित्रवत संबंध ही रहे हैं फिर भी कुछ विवाद के आयाम भी दिखाई देते हैं- मछुआरों का विवाद- समुद्री सीमा समझौता(1974) होने के बावजूद श्रीलंका द्वारा भारतीय मछुआरों को पकड़ना; भारतीय मछुआरों द्वारा पाक की खाड़ी तथा मन्नार की खाड़ी में श्रीलंका के जलक्षेत्र में जाकर मछली पकड़ना; कच्चातिवु द्वीप का भारतीय मछुआरों के लिए महत्व; श्रीलंका के संघीय स्वरूप में हस्तक्षेप को लेकर; चीन का बढ़ता प्रभाव- महिंद्रा राजपक्षे के कार्यकाल में श्रीलंका का चीन की ओर अत्यधिक झुकाव; हंबनटोटा को लेकर; चीनी निवेश का लगातार बढ़ना तथा श्रीलंका का चीन के कर्ज जाल में फंसना; भारत द्वारा श्रीलंका के खिलाफ़ UNHRC में वोट(2012-13); श्रीलंका के नृजातीय मुद्दे(तमिल-सिंघली विवाद) पर दोनों देशों का रूख; लिट्टे एवं भारतीय शांति सेना से जुड़ा पक्ष; भारत-श्रीलंका के मध्य सहयोग के आयाम रक्षा एवं सुरक्षा क्षेत्र मित्रशक्ति एवं SLINEX द्विपक्षीय एक्सरसाइज; डिफेंस ट्रेनिंग प्रोग्राम्स; त्रिपक्षीय समुद्री सुरक्षा सहयोग(भारत-श्रीलंका-मालदीव); आर्थिक पक्ष मताला एयरपोर्ट का विकास; हंबनटोटा में भूमिका; द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग एवं निवेश में बढ़ोतरी; त्रिकोंमाली पोर्ट एवं कोलंबो पोर्ट में सहयोग; अवसंरचनात्मक एवं विकासात्मक सहयोग रेलवे; जाफ़ना-कोलंबो रेलवे लाइन; अवसंरचनात्मक विकास के लिए लाइन ऑफ़ क्रेडिट; उत्तरी श्रीलंका में लिट्टे के साथ युद्ध खत्म होने के बाद विकास एवं अवसंरचना विकास में भारत की भूमिका; तुरंत सहायता के रूप में वॉर रिलीफ; दीर्घ समय में रिकंस्ट्रक्शन क्षेत्र में; सांस्कृतिक एवं शैक्षिक सहयोग सांस्कृतिक सहयोग समझौता(1977); इंडिया-श्रीलंका फाउंडेशन(1998)- तकनीक एवं विज्ञान; सांस्कृतिक एवं शैक्षिक सहयोग; पर्यटन- भारतीय पर्यटकों के लिए वीजा की आसान प्रक्रिया, वीजा ऑन अराइवल तथा वीजा शुल्कों में छुट; नालंदा प्रोजेक्ट में पार्टनर के रूप में श्रीलंका; भारत के राष्ट्रीय ज्ञान नेटवर्क(NKN) को लंका शिक्षा और अनुंसधान नेटवर्क(LEARN) से जोड़ना ताकि दोनों तरफ के विश्वविद्यालय सर्वोत्तम प्रथाओं और अनुसंधान विचारों को साझा कर सकें| साउथ एशियन सैटेलाइट; मौसम पूर्वानुमान; सुनामी चेतावनी; दूरसंचार; गवर्नेंस; मीटरोलॉजी; भारत के लिए श्रीलंका का व्यापक महत्व है जैसे-हिंद महासागर में महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्ग की रक्षा हेतु; समुद्री पायरेसी;चीन के मेरीटाइम सिल्क रूट को काउंटर करने हेतु आदि| साथ ही,हिंद महासागर को विवादरहित क्षेत्र बनाने एवंब्लू इकॉनोमी एवं व्यापार को बढ़ावा देने हेतु भी श्रीलंका महत्वपूर्ण है| इस दृष्टिकोण से श्रीलंका राष्ट्रपति चुनाव, 2019 का व्यापक महत्व है क्योंकि नए राष्ट्रपति गोटाबेय राजपक्षे द्वारा पहली विदेश यात्रा के लिए भारत को चुना गया है|
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मंदिर स्थापत्य की द्रविड़ शैली की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करते हुए द्रविड़ शैली के विकास को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Describing the main features of the Dravidian style of temple architecture, Explain the development of the Dravidian style. (150 to 200 words, 10 marks)
दृष्टिकोण- 1- भूमिका में भारत में मंदिर निर्माण की तीनों शैलियों के बारे में सामान्य जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में द्रविड़ शैली के बारे में बताते हुए इसकी सामान्य विशेषताएं बताइये, 3- दूसरे भाग में विशेषताओं के साथ द्रविड़ शैली के विकास की चरणबद्ध जानकारी दीजिये 4- अंतिम में द्रविड़ शैली के महत्त्व के संदर्भ में निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| पूर्व मध्यकालीन भारत में मंदिर निर्माण कला की तीन बड़ी शैलियों का विकास देखने को मिलता है यथा नागर शैली, द्रविड़ शैली और वेसर शैली| नागर शैली का प्रचलन हिमालय और विन्ध्य पर्वत के मध्य के भाग में पाया जाता है जबकि वेसर शैली विन्ध्य पर्वत के दक्षिण और कृष्णा नदी के बीच के प्रदेश में विकसित हुई| द्रविड़ शैली का विकास मुख्यतः कृष्णा और कावेरी नदियों के मध्य के क्षेत्र में देखने को मिलता है| द्रविड़ शैली, हिन्दू मंदिर स्थापत्य कला की तीन में से एक शैली है। यह शैली दक्षिण भारत में विकसित होने के कारण द्रविड़ शैली कहलाती है। तमिलनाडु व निकटवर्ती क्षेत्रों के अधिकांश मंदिर इसी श्रेणी के होते हैं। इस शैली की कुछ सामान्य विशेषताएं इसे मंदिर निर्माण की अन्य शैलियों के समक्ष विशिष्टता प्रदान करती हैं, इन्हें हम निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं- द्रविड शैली के मंदिरों की सामान्य विशेषताएं नागर शैली से अलग द्रविड़ शैली में चारदीवारी के भीतर समूहों में मंदिरों का निर्माण किया जाता है, यहाँ चारदीवारी में गोपुरम (प्रवेश द्वार) का निर्माण किया जाता था, ये प्रवेश द्वार(गोपुरम) पिरामिड की तरह होते थे, नागर शैली के विपरीत द्रविड़ शैली के मंदिरों के निर्माण में अधिष्ठान/जगती के साक्ष्य अपवाद स्वरुप ही मिलते हैं, नागर शैली में गर्भ गृह के ऊपर के भाग में जहाँ शिखर का निर्माण किया जाता था वहीं द्रविड़ मंदिरों में गर्भ गृह के ऊपर के भाग को विमान कहते हैं यह भी पिरामिड नुमा होता है, मंदिर परिसर में विभिन्न देवताओं के मंदिरों के साथ अलग-अलग उद्देश्यों से मंदिरों का भी निर्माण किया जाता है द्रविड़ शैली में मंदिर परिसर में ही जलाशय बनाये जाते हैं द्रविड़ मंदिर स्थापत्य शैली का विकास द्रविड़ मंदिर स्थापत्य शैली का विकास पल्लव शासकों के काल में शुरू हुआ; इसके बाद चोलों,पांड्यों, विजयनगर तथा मदुरा के नायकों के संरक्षण में द्रविड़ शैली का विकास जारी रहा| द्रविड़ मंदिर स्थापत्य शैली के विकास को निम्नलिखित शीर्षकों के माध्यम से देखा जा सकता है- पल्लव काल में द्रविड़ स्थापत्य का विकास द्रविड़ मंदिर स्थापत्य का प्रारंभिक विकास सातवीं से दसवीं सदी के मध्य पल्लवों के शासनकाल में हुआ| पल्लव शासक कला के महान संरक्षक एवं उत्साही निर्माता थे| पल्लव काल में विभिन्न शासकों के समय विकासात्मक शैलियों का उद्भव हुआ सर्वप्रथम महेंद्रवर्मन शैली (610 से 640 ईस्वी)का विकास हुआ, इसमें पहाड़ों को काट कर मंदिरों का निर्माण किया जाता था जिन्हें मंडप कहा जाता है उदाहरणार्थ- पंचपांडव मंदिर, महेंद्रवर्मन शैली के बाद विकसित महामल्ल शैली/नरसिंहवर्मन शैली (640 से 674 ईस्वी ) में एकाश्मक पत्थर से मंदिरों का निर्माण किया जाता था जिन्हें रथ कहा जाता है जैसे महाबलीपुरम में सप्त पैगोडा रथ, पंच पांडव रथ आदि राजसिंह शैली (674 से 800 ईस्वी)के चरण में पल्लव मंदिरों से द्रविड़ स्थापत्य से सम्बन्धित सभी विशेषताओं के साक्ष्य मिलने लगते हैं|यहाँ से संरचनात्मक मंदिरों का निर्माण भी प्रारम्भ हो जाता है जैसे कांची का कैलाश मंदिर एवं महाबलीपुरम का शोर/तटीय मंदिर नन्दिवर्मन शैली (800-900 ईस्वी ) के अंतर्गत भी द्रविड़ विशेषताओं के साथ संरचनात्मक मंदिरों का निर्माण जारी रहा, जैसे कांची का मुक्तेश्वर मंदिर आदि चोल काल में द्रविड़ स्थापत्य का विकास यद्यपि द्रविड़ स्थापत्य से सम्बंधित सभी विशेषताओं का विकास चोल काल में भी जारी रहा,तथापि विशाल संरचनात्मक मंदिरों का निर्माण निर्माण चोल काल की प्रमुख विशेषता है, इस दौर में गोपुरम एवं विमानों के निर्माण में विशालता एवं अलंकरण को अत्याधिक महत्त्व दिया गया, इस काल में निर्मित शैव मंदिरों में नदी मंडप का निर्माण एवं एकाश्मक पत्थर से निर्मित नंदी के साक्ष्य भी मिलते हैं, मंदिरों में तक्षण कार्यों पर अत्यधिक बल दिया जाता था, तक्षण के माध्यम से पौराणिक कहानियों का चित्रांकन किया जाता था इसके साथ ही मंदिरों की दीवारों पर रामायण, महाभारत आदि से सम्बन्धित विषयों का चित्रण किया जाता था, तंजौर में चोल शासक राजराज प्रथम द्वारा निर्मित बृहदेश्वर मंदिर तथा राजेन्द्र प्रथम द्वारा निर्मित गंगइकोंडचोलपुरम मंदिर चोल काल निर्मित में प्रमुख मंदिर हैं| विजयनगर एवं मदुरा के नायकों के समय विकास (14वीं से 17वीं सदी) विजयनगर शैली में द्रविड़ स्थापत्य से सम्बन्धित और अब तक विकसित सभी विशेषताएं उपस्थित थीं, विजयनगर शैली में अलंकरण पर प्रमुख बल देखने को मिलता है, नवीनता के तौर पर यहाँ चारों दिशाओं में गोपुरम के निर्माण को देख सकते हैं, विजयनगर शैली में मंदिर समूहों में दो नये मंडपों का निर्माण किया जाने लगा, अब देवताओं के विवाह के लिए कल्याण मंडप और उपदेवताओं के लिए अम्मान मंडप का भी निर्माण किया जाने लगा था, विजयनगर शैली में बने द्रविड़ मंदिरों के सर्वाधिक साक्ष्य कर्नाटक के हम्पी से मिलते हैं जैसे विरूपाक्ष मंदिर, हजारा मंदिर, विट्ठल स्वामी मंदिर आदि विजयनगर के पश्चात मदुरा के नायकों के समय में भी द्रविड़ शैली में मंदिर स्थापत्य की परम्परा जारी रही इस समय मंदिरों के प्रांगण में विभिन्न आवासीय भवन एवं बाजारों का भी निर्माण किया जाने लगा जैसे मदुरा का मीनाक्षी मंदिर आदि| मदुरा के नायकों के समय तक द्रविड़ मंदिर स्थापत्य अपने विशुद्ध रूप से विकसित क्लासिकल स्वरुप को प्राप्त कर चुका था| इस प्रकार हम देख सकते हैं कि द्रविड़ मंदिर स्थापत्य कला का विकास सातवीं सदी से शुरू होकर 17वीं सदी तक किसी न किसी रूप में होता रहा| द्रविड़ स्थापत्य, भारतीय कला और सांस्कृतिक विरासत में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है| यह पूरे दक्षिण भारत और पड़ोसी द्वीपों में प्रचलित है| इनके महत्त्व को देखते हुए वर्ष 1987 में यूनेस्को ने चोल कालीन मंदिरों विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था|
##Question:मंदिर स्थापत्य की द्रविड़ शैली की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करते हुए द्रविड़ शैली के विकास को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Describing the main features of the Dravidian style of temple architecture, Explain the development of the Dravidian style. (150 to 200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण- 1- भूमिका में भारत में मंदिर निर्माण की तीनों शैलियों के बारे में सामान्य जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में द्रविड़ शैली के बारे में बताते हुए इसकी सामान्य विशेषताएं बताइये, 3- दूसरे भाग में विशेषताओं के साथ द्रविड़ शैली के विकास की चरणबद्ध जानकारी दीजिये 4- अंतिम में द्रविड़ शैली के महत्त्व के संदर्भ में निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| पूर्व मध्यकालीन भारत में मंदिर निर्माण कला की तीन बड़ी शैलियों का विकास देखने को मिलता है यथा नागर शैली, द्रविड़ शैली और वेसर शैली| नागर शैली का प्रचलन हिमालय और विन्ध्य पर्वत के मध्य के भाग में पाया जाता है जबकि वेसर शैली विन्ध्य पर्वत के दक्षिण और कृष्णा नदी के बीच के प्रदेश में विकसित हुई| द्रविड़ शैली का विकास मुख्यतः कृष्णा और कावेरी नदियों के मध्य के क्षेत्र में देखने को मिलता है| द्रविड़ शैली, हिन्दू मंदिर स्थापत्य कला की तीन में से एक शैली है। यह शैली दक्षिण भारत में विकसित होने के कारण द्रविड़ शैली कहलाती है। तमिलनाडु व निकटवर्ती क्षेत्रों के अधिकांश मंदिर इसी श्रेणी के होते हैं। इस शैली की कुछ सामान्य विशेषताएं इसे मंदिर निर्माण की अन्य शैलियों के समक्ष विशिष्टता प्रदान करती हैं, इन्हें हम निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं- द्रविड शैली के मंदिरों की सामान्य विशेषताएं नागर शैली से अलग द्रविड़ शैली में चारदीवारी के भीतर समूहों में मंदिरों का निर्माण किया जाता है, यहाँ चारदीवारी में गोपुरम (प्रवेश द्वार) का निर्माण किया जाता था, ये प्रवेश द्वार(गोपुरम) पिरामिड की तरह होते थे, नागर शैली के विपरीत द्रविड़ शैली के मंदिरों के निर्माण में अधिष्ठान/जगती के साक्ष्य अपवाद स्वरुप ही मिलते हैं, नागर शैली में गर्भ गृह के ऊपर के भाग में जहाँ शिखर का निर्माण किया जाता था वहीं द्रविड़ मंदिरों में गर्भ गृह के ऊपर के भाग को विमान कहते हैं यह भी पिरामिड नुमा होता है, मंदिर परिसर में विभिन्न देवताओं के मंदिरों के साथ अलग-अलग उद्देश्यों से मंदिरों का भी निर्माण किया जाता है द्रविड़ शैली में मंदिर परिसर में ही जलाशय बनाये जाते हैं द्रविड़ मंदिर स्थापत्य शैली का विकास द्रविड़ मंदिर स्थापत्य शैली का विकास पल्लव शासकों के काल में शुरू हुआ; इसके बाद चोलों,पांड्यों, विजयनगर तथा मदुरा के नायकों के संरक्षण में द्रविड़ शैली का विकास जारी रहा| द्रविड़ मंदिर स्थापत्य शैली के विकास को निम्नलिखित शीर्षकों के माध्यम से देखा जा सकता है- पल्लव काल में द्रविड़ स्थापत्य का विकास द्रविड़ मंदिर स्थापत्य का प्रारंभिक विकास सातवीं से दसवीं सदी के मध्य पल्लवों के शासनकाल में हुआ| पल्लव शासक कला के महान संरक्षक एवं उत्साही निर्माता थे| पल्लव काल में विभिन्न शासकों के समय विकासात्मक शैलियों का उद्भव हुआ सर्वप्रथम महेंद्रवर्मन शैली (610 से 640 ईस्वी)का विकास हुआ, इसमें पहाड़ों को काट कर मंदिरों का निर्माण किया जाता था जिन्हें मंडप कहा जाता है उदाहरणार्थ- पंचपांडव मंदिर, महेंद्रवर्मन शैली के बाद विकसित महामल्ल शैली/नरसिंहवर्मन शैली (640 से 674 ईस्वी ) में एकाश्मक पत्थर से मंदिरों का निर्माण किया जाता था जिन्हें रथ कहा जाता है जैसे महाबलीपुरम में सप्त पैगोडा रथ, पंच पांडव रथ आदि राजसिंह शैली (674 से 800 ईस्वी)के चरण में पल्लव मंदिरों से द्रविड़ स्थापत्य से सम्बन्धित सभी विशेषताओं के साक्ष्य मिलने लगते हैं|यहाँ से संरचनात्मक मंदिरों का निर्माण भी प्रारम्भ हो जाता है जैसे कांची का कैलाश मंदिर एवं महाबलीपुरम का शोर/तटीय मंदिर नन्दिवर्मन शैली (800-900 ईस्वी ) के अंतर्गत भी द्रविड़ विशेषताओं के साथ संरचनात्मक मंदिरों का निर्माण जारी रहा, जैसे कांची का मुक्तेश्वर मंदिर आदि चोल काल में द्रविड़ स्थापत्य का विकास यद्यपि द्रविड़ स्थापत्य से सम्बंधित सभी विशेषताओं का विकास चोल काल में भी जारी रहा,तथापि विशाल संरचनात्मक मंदिरों का निर्माण निर्माण चोल काल की प्रमुख विशेषता है, इस दौर में गोपुरम एवं विमानों के निर्माण में विशालता एवं अलंकरण को अत्याधिक महत्त्व दिया गया, इस काल में निर्मित शैव मंदिरों में नदी मंडप का निर्माण एवं एकाश्मक पत्थर से निर्मित नंदी के साक्ष्य भी मिलते हैं, मंदिरों में तक्षण कार्यों पर अत्यधिक बल दिया जाता था, तक्षण के माध्यम से पौराणिक कहानियों का चित्रांकन किया जाता था इसके साथ ही मंदिरों की दीवारों पर रामायण, महाभारत आदि से सम्बन्धित विषयों का चित्रण किया जाता था, तंजौर में चोल शासक राजराज प्रथम द्वारा निर्मित बृहदेश्वर मंदिर तथा राजेन्द्र प्रथम द्वारा निर्मित गंगइकोंडचोलपुरम मंदिर चोल काल निर्मित में प्रमुख मंदिर हैं| विजयनगर एवं मदुरा के नायकों के समय विकास (14वीं से 17वीं सदी) विजयनगर शैली में द्रविड़ स्थापत्य से सम्बन्धित और अब तक विकसित सभी विशेषताएं उपस्थित थीं, विजयनगर शैली में अलंकरण पर प्रमुख बल देखने को मिलता है, नवीनता के तौर पर यहाँ चारों दिशाओं में गोपुरम के निर्माण को देख सकते हैं, विजयनगर शैली में मंदिर समूहों में दो नये मंडपों का निर्माण किया जाने लगा, अब देवताओं के विवाह के लिए कल्याण मंडप और उपदेवताओं के लिए अम्मान मंडप का भी निर्माण किया जाने लगा था, विजयनगर शैली में बने द्रविड़ मंदिरों के सर्वाधिक साक्ष्य कर्नाटक के हम्पी से मिलते हैं जैसे विरूपाक्ष मंदिर, हजारा मंदिर, विट्ठल स्वामी मंदिर आदि विजयनगर के पश्चात मदुरा के नायकों के समय में भी द्रविड़ शैली में मंदिर स्थापत्य की परम्परा जारी रही इस समय मंदिरों के प्रांगण में विभिन्न आवासीय भवन एवं बाजारों का भी निर्माण किया जाने लगा जैसे मदुरा का मीनाक्षी मंदिर आदि| मदुरा के नायकों के समय तक द्रविड़ मंदिर स्थापत्य अपने विशुद्ध रूप से विकसित क्लासिकल स्वरुप को प्राप्त कर चुका था| इस प्रकार हम देख सकते हैं कि द्रविड़ मंदिर स्थापत्य कला का विकास सातवीं सदी से शुरू होकर 17वीं सदी तक किसी न किसी रूप में होता रहा| द्रविड़ स्थापत्य, भारतीय कला और सांस्कृतिक विरासत में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है| यह पूरे दक्षिण भारत और पड़ोसी द्वीपों में प्रचलित है| इनके महत्त्व को देखते हुए वर्ष 1987 में यूनेस्को ने चोल कालीन मंदिरों विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था|
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लोकतान्त्रिक सुशासन क्या है? भारत सरकार ने किन लक्ष्यों को निर्धारित करके लोकतान्त्रिक सुशासन को स्थापित करने की मुहिम आरम्भ की है? चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द,10 अंक ) What is democratic good governance? The Government of India has set a goal to establish democratic governance by setting what goals? Discuss. (150-200 words, 10 marks)
दृष्टिकोण: 1. लोकतान्त्रिक सुशासन को परिभाषित कीजिये| 2.लोकतान्त्रिक सुशासन को स्थापित करने हेतु भारत सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्यों की चर्चा कीजिये| 3. संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये उत्तर: लोकतान्त्रिक सुशासन- ऐसा शासन जो लोकतान्त्रिक मूल्यों, सिद्धांतों और मानदंडों को तत्कालीन समाज के अनुकूल बनाता हो एवं उन्हें व्यवहारिकता प्रदान करते हुए मानव अधिकारों की देख-रेख करता हो| लोकतान्त्रिक सुशासन के विकास हेतु सामाजिक (समरसतामूलक समाज), आर्थिक(तात्कालिक लाभ के स्थान पर संधारणीय लाभ को महत्व), राजनीतिक(आतंरिक लोकतंत्र, समावेशिता), न्यायिक(समय पर न्याय मिलना एवं न्याय होते हुए भी दिखना), आधुनिक मूल्यों का विकास (जलवायु एवं पर्यावरण का संरक्षण) आदिपक्षोंको ध्यान में रखा जाता है| लोकतान्त्रिक सुशासन को स्थापित करने हेतु भारत सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्य: 1. विधि का शासन: अर्थात विधि सर्वोपरि होगी एवं विशिष्ठ वर्गों जैसे- महिला, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति आदि के लिए सकारात्मक कार्यवाही हेतु प्रावधान किये जा सकेंगे| 2. भागीदारी: आम लोगों की शासन में भागीदारी बढ़ाना| 3. सहमति मूलकता: अहम मामलों पर आम सहमति से निर्णय निर्माण| 4. उत्तर दायित्व: निर्णय निर्माणकारी प्राधिकारी अपने कृत्यों एवं दायित्वों के लिए जवाबदेह| 5. पारदर्शिता: लिए गए निर्णयों के सम्बन्ध में खुलापन| 6. अनुक्रियाशीलता: मांग के अनुसार सेवा प्रदायगी एवंसेवा प्रदायगी हेतु तत्परता| 7. समानता: विशेषाधिकारों की अनुपस्थिति| 8. समावेशिता: सभी हितधारकों को शामिल करना | 9. प्रभाविता एवं दक्षता:शासन का प्रत्येक आयाम स्थैतिक ना होकर गत्यात्मक होना चाहिए| वस्तुतः वर्तमान समय में जबकि वर्गीय विभाजन अपने चरम पर है, आवश्यक है कि लोकतान्त्रिक सुशासन जैसी अवधारणा को साकार किया जाये| "सबका साथ, सबका विकास" के लक्ष्य को प्राप्त करने में यह एक अहम कदम होगा|
##Question:लोकतान्त्रिक सुशासन क्या है? भारत सरकार ने किन लक्ष्यों को निर्धारित करके लोकतान्त्रिक सुशासन को स्थापित करने की मुहिम आरम्भ की है? चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द,10 अंक ) What is democratic good governance? The Government of India has set a goal to establish democratic governance by setting what goals? Discuss. (150-200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण: 1. लोकतान्त्रिक सुशासन को परिभाषित कीजिये| 2.लोकतान्त्रिक सुशासन को स्थापित करने हेतु भारत सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्यों की चर्चा कीजिये| 3. संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये उत्तर: लोकतान्त्रिक सुशासन- ऐसा शासन जो लोकतान्त्रिक मूल्यों, सिद्धांतों और मानदंडों को तत्कालीन समाज के अनुकूल बनाता हो एवं उन्हें व्यवहारिकता प्रदान करते हुए मानव अधिकारों की देख-रेख करता हो| लोकतान्त्रिक सुशासन के विकास हेतु सामाजिक (समरसतामूलक समाज), आर्थिक(तात्कालिक लाभ के स्थान पर संधारणीय लाभ को महत्व), राजनीतिक(आतंरिक लोकतंत्र, समावेशिता), न्यायिक(समय पर न्याय मिलना एवं न्याय होते हुए भी दिखना), आधुनिक मूल्यों का विकास (जलवायु एवं पर्यावरण का संरक्षण) आदिपक्षोंको ध्यान में रखा जाता है| लोकतान्त्रिक सुशासन को स्थापित करने हेतु भारत सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्य: 1. विधि का शासन: अर्थात विधि सर्वोपरि होगी एवं विशिष्ठ वर्गों जैसे- महिला, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति आदि के लिए सकारात्मक कार्यवाही हेतु प्रावधान किये जा सकेंगे| 2. भागीदारी: आम लोगों की शासन में भागीदारी बढ़ाना| 3. सहमति मूलकता: अहम मामलों पर आम सहमति से निर्णय निर्माण| 4. उत्तर दायित्व: निर्णय निर्माणकारी प्राधिकारी अपने कृत्यों एवं दायित्वों के लिए जवाबदेह| 5. पारदर्शिता: लिए गए निर्णयों के सम्बन्ध में खुलापन| 6. अनुक्रियाशीलता: मांग के अनुसार सेवा प्रदायगी एवंसेवा प्रदायगी हेतु तत्परता| 7. समानता: विशेषाधिकारों की अनुपस्थिति| 8. समावेशिता: सभी हितधारकों को शामिल करना | 9. प्रभाविता एवं दक्षता:शासन का प्रत्येक आयाम स्थैतिक ना होकर गत्यात्मक होना चाहिए| वस्तुतः वर्तमान समय में जबकि वर्गीय विभाजन अपने चरम पर है, आवश्यक है कि लोकतान्त्रिक सुशासन जैसी अवधारणा को साकार किया जाये| "सबका साथ, सबका विकास" के लक्ष्य को प्राप्त करने में यह एक अहम कदम होगा|
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नीतिशास्त्र के आशय को स्पष्ट करते हुए, इसके सारतत्व की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द; 10 अंक) While explaining the meaning of Ethics, discuss its essance.(150-200 Words; 10 Words)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत नीतिशास्त्र के आशय को स्पष्ट करते हुए कीजिये | इसके पश्चात नीतिशास्त्र के सारतत्व की व्याख्या करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - नीतिशास्त्र का आशय मानवीय आचरण के आदर्शात्मक विज्ञान से है | आदर्शात्मक विज्ञान का सम्बन्ध मानवीय आचरण के उचित या अनुचित, शुभ या अशुभ से सम्बन्धित निर्णय को प्राप्त किये जाने से है | नीतिशास्त्र मानवीय आचरण का आकलन नैतिक मानकों के आधार पर करता है| अतः नीतिशास्त्र ऐसे मानकों या नियमों या परम्पराओं से भी सम्बन्धित है जिसके आधार पर मानवीय आचरण को उचित या अनुचित/शुभ या अशुभ होने की संज्ञा दी जा सकती है| नीतिशास्त्र ऐसे मानवीय आचरण के आकलन पर आधारित है जो कि व्यक्ति के ऐच्छिक क्रियाशीलता से सम्बन्धित हो अर्थात यदि व्यक्ति के पास चयन का विकल्प होता तो उस क्रियाशीलता को अन्य प्रकार से भी किया गया होता| इस प्रकार नीतिशास्त्र, नैतिक मानकों की सत्यता या मान्यता से भी सम्बन्धित होता है | नीतिशास्त्र के सारतत्व- नीतिशास्त्र का मूलभूत तत्व इस विचारधारा पर आधारित है कि व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है | एक सामाजिक प्राणी के रूप में नीतिशास्त्र मानवीय आचरण के उचित या अनुचित, शुभ या अशुभ के सन्दर्भ में मानकों पर बल देती है | इसके साथ-साथ नीतिशास्त्र प्रस्तावित मानकों की मान्यता या सत्यता का भी परीक्षण करती है | नीतिशास्त्र का महत्व मानवीय सह-सम्बन्ध से है, अतः नीतिशास्त्र कभी भी शून्य में संचालित नहीं हो सकता | व्यक्ति संस्कृति या सामाजिक मूल्यों से सिर्फ प्रभावित न होकर इसे प्रभावित भी करता है | मानवीय मूल्यों के विकसित होने में प्राकृतिक एवं पर्यावरण इन दोनों का प्रभाव देखने को मिलता है | पर्यावरण का सम्बन्ध सामाजीकरण की प्रक्रिया से जिसके अंतर्गत -परिवार की भूमिका का एक विशेष महत्व है - परिवार को सामाजिक प्रणाली की मूल इकाई मानी गयी है | अतः नैतिक मूल्यों को विकसित करने की दिशा में माता-पिता का योगदान विशेष रूप से महत्वपूर्ण है | व्यक्ति के सामाजिक प्राणी होने के कारण यह स्वाभाविक है कि सामाजिक मूल्यों का प्रभाव मानवीय मूल्यों पर पड़ता है | मानवीय मूल्यों को विकसित करने की दिशा में शैक्षणिक संस्थानों का एक विशेष महत्व है क्योंकि समाज के साथ व्यक्ति का प्रथम औपचारिक सम्पर्क विद्यालय के साथ ही होता है | सरकार के द्वारा निर्धारित शिक्षा नीति में भी मूल्यों के विकास पर विशेष बल दिया जाता है | NCERT के द्वारा प्रकाशित राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा के अंतर्गत भी नैतिक मूल्यों पर विशेष बल दिया गया- 2005 मानवीय मूल्यों के विकास की दिशा में महान नेताओं, सुधारकों एवं प्रशासकों के जीवन एवं उपदेशों से भी मानवीय मूल्यों का विकास किया जाता है | नीतिशास्त्र का संचालन, सन्दर्भ से प्रभावित होता है | अतः किसी भी एक सन्दर्भ में नीतिशास्त्र का सन्दर्भ एक होगा | नीतिशास्त्र का संचालन विभिन्न स्तरों पर होता है एवं प्रत्येक स्तर का नीतिशास्त्र एक-दूसरे को प्रभावित करता है | नीतिशास्त्र न्याय की भावना पर आधारित होता है | नीतिशास्त्र औपचारिक विधि एवं नियमावली से आगे जाता है, अतः विधि की तुलना में नीतिशास्त्र अधिक व्यापक होता है | नीतिशास्त्र उत्तरदायित्व की भावना से प्रभावित होता है नाकि सिर्फ बाहरी जवाबदेहिता से | अतः नीतिशास्त्र का सम्बन्ध आतंरिक पक्ष से है | नीतिशास्त्र का आधार व्यक्ति की विवेकशीलता या बुद्धिमत्ता है | नीतिशास्त्र समाजीकरण की प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है |
##Question:नीतिशास्त्र के आशय को स्पष्ट करते हुए, इसके सारतत्व की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द; 10 अंक) While explaining the meaning of Ethics, discuss its essance.(150-200 Words; 10 Words)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत नीतिशास्त्र के आशय को स्पष्ट करते हुए कीजिये | इसके पश्चात नीतिशास्त्र के सारतत्व की व्याख्या करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - नीतिशास्त्र का आशय मानवीय आचरण के आदर्शात्मक विज्ञान से है | आदर्शात्मक विज्ञान का सम्बन्ध मानवीय आचरण के उचित या अनुचित, शुभ या अशुभ से सम्बन्धित निर्णय को प्राप्त किये जाने से है | नीतिशास्त्र मानवीय आचरण का आकलन नैतिक मानकों के आधार पर करता है| अतः नीतिशास्त्र ऐसे मानकों या नियमों या परम्पराओं से भी सम्बन्धित है जिसके आधार पर मानवीय आचरण को उचित या अनुचित/शुभ या अशुभ होने की संज्ञा दी जा सकती है| नीतिशास्त्र ऐसे मानवीय आचरण के आकलन पर आधारित है जो कि व्यक्ति के ऐच्छिक क्रियाशीलता से सम्बन्धित हो अर्थात यदि व्यक्ति के पास चयन का विकल्प होता तो उस क्रियाशीलता को अन्य प्रकार से भी किया गया होता| इस प्रकार नीतिशास्त्र, नैतिक मानकों की सत्यता या मान्यता से भी सम्बन्धित होता है | नीतिशास्त्र के सारतत्व- नीतिशास्त्र का मूलभूत तत्व इस विचारधारा पर आधारित है कि व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है | एक सामाजिक प्राणी के रूप में नीतिशास्त्र मानवीय आचरण के उचित या अनुचित, शुभ या अशुभ के सन्दर्भ में मानकों पर बल देती है | इसके साथ-साथ नीतिशास्त्र प्रस्तावित मानकों की मान्यता या सत्यता का भी परीक्षण करती है | नीतिशास्त्र का महत्व मानवीय सह-सम्बन्ध से है, अतः नीतिशास्त्र कभी भी शून्य में संचालित नहीं हो सकता | व्यक्ति संस्कृति या सामाजिक मूल्यों से सिर्फ प्रभावित न होकर इसे प्रभावित भी करता है | मानवीय मूल्यों के विकसित होने में प्राकृतिक एवं पर्यावरण इन दोनों का प्रभाव देखने को मिलता है | पर्यावरण का सम्बन्ध सामाजीकरण की प्रक्रिया से जिसके अंतर्गत -परिवार की भूमिका का एक विशेष महत्व है - परिवार को सामाजिक प्रणाली की मूल इकाई मानी गयी है | अतः नैतिक मूल्यों को विकसित करने की दिशा में माता-पिता का योगदान विशेष रूप से महत्वपूर्ण है | व्यक्ति के सामाजिक प्राणी होने के कारण यह स्वाभाविक है कि सामाजिक मूल्यों का प्रभाव मानवीय मूल्यों पर पड़ता है | मानवीय मूल्यों को विकसित करने की दिशा में शैक्षणिक संस्थानों का एक विशेष महत्व है क्योंकि समाज के साथ व्यक्ति का प्रथम औपचारिक सम्पर्क विद्यालय के साथ ही होता है | सरकार के द्वारा निर्धारित शिक्षा नीति में भी मूल्यों के विकास पर विशेष बल दिया जाता है | NCERT के द्वारा प्रकाशित राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा के अंतर्गत भी नैतिक मूल्यों पर विशेष बल दिया गया- 2005 मानवीय मूल्यों के विकास की दिशा में महान नेताओं, सुधारकों एवं प्रशासकों के जीवन एवं उपदेशों से भी मानवीय मूल्यों का विकास किया जाता है | नीतिशास्त्र का संचालन, सन्दर्भ से प्रभावित होता है | अतः किसी भी एक सन्दर्भ में नीतिशास्त्र का सन्दर्भ एक होगा | नीतिशास्त्र का संचालन विभिन्न स्तरों पर होता है एवं प्रत्येक स्तर का नीतिशास्त्र एक-दूसरे को प्रभावित करता है | नीतिशास्त्र न्याय की भावना पर आधारित होता है | नीतिशास्त्र औपचारिक विधि एवं नियमावली से आगे जाता है, अतः विधि की तुलना में नीतिशास्त्र अधिक व्यापक होता है | नीतिशास्त्र उत्तरदायित्व की भावना से प्रभावित होता है नाकि सिर्फ बाहरी जवाबदेहिता से | अतः नीतिशास्त्र का सम्बन्ध आतंरिक पक्ष से है | नीतिशास्त्र का आधार व्यक्ति की विवेकशीलता या बुद्धिमत्ता है | नीतिशास्त्र समाजीकरण की प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है |
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वित्तीय आपातकाल के प्रावधानों पर चर्चा कीजिये। साथ ही,राष्ट्रीय आपातकाल एवं राज्य आपातकाल में अंतर स्पष्ट कीजिये। (150-200 शब्द; 10 अंक) Discuss financial emergency provisions. Along with this, differentiate between National emergency and state emergency. (150-200 words; 10 marks)
Approach: भूमिका में आपातकाल व्यवस्था की संक्षिप्त चर्चा कीजिये। वित्तीय आपातकाल के प्रावधानों को सूचीबद्ध कीजिये राष्ट्रीय आपातकाल तथा राज्य आपातकाल के बीच अंतर स्पष्ट कीजिये। निष्कर्ष में आपातकाल के महत्व की चर्चा कर सकते हैं। उत्तर: भारतीय संविधान में अनु. 352 से 360 में आपातकालीन प्रावधानों की चर्चा की गयी है। अनु. 352 में राष्ट्रीय आपातकाल, अनु. 356 में राज्य आपातकाल (राष्ट्रपति शासन) तथा अनु. 360 में वित्तीय आपातकाल की चर्चा की गयी है। वित्तीय आपातकाल 360(1) यदि राष्ट्रपति इस बात से संतुष्ट है कि भारत अथवा उसके किसी भाग कि वित्तीय स्थिरता अथवा उसकी साख संकटग्रस्त है तो वह वित्तीय आपात की घोषणा कर सकता है 360(2) वह बाद में की गयी एक घोषणा से पहले वाली घोषणा में बदलाव करते हुए वह वित्तीय आपातकाल को समाप्त कर सकता है, इसकी अवधि बढ़ा सकता है या कोई और आवश्यक बदलाव कर सकता है। 360(3) राष्ट्रपति राज्यों को उपयुक्त दिशानिर्देश दे सकता है जो वित्तीय मामलों में स्थिरता लाने हेतु आवश्यक है राज्य के अधीन सेवा योजन में लगे हुए किसी एक वर्ग या विभिन्न वर्ग के कर्मचारियों व अधिकारियों के वेतन एवं भत्ते में कटौती का निर्देश दे सकता है जिससे कि देश में वित्तीय स्थिरता दोबारा कायम की जा सके। वह इसी प्रकार केंद्र के अधीन कार्यरत किसी वर्ग के अधिकारी या कर्मचारी के वेतन व भत्ते में कटौती का निर्देश दे सकता है। पुन: वह सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन भत्तों में कटौती का निर्देश दे सकता है। केंद्र राज्यों को निर्देश दे सकता है कि वे धन विधयेक व राज्य की संचित निधि से संबन्धित विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखे केंद्र व राज्य के अधीन कार्यरत किसी भी वर्ग के अधिकारी या कर्मचारी के वेतन भत्ते में कटौती की बात की गयी है उसमें राष्ट्रपति मंत्रीगण, सांसद विधायक आदि भी शामिल होंगे राष्ट्रीय आपातकाल तथा राज्य आपातकाल में अंतर- उद्घोषणा: राष्ट्रीय आपातकाल युद्ध, बाह्य आक्रमण, सशस्त्र विद्रोह के आधार पर, राष्ट्रपति शासन - संवैधानिक तंत्र की विफलता के आधार पर उद्घोषणा के 1 माह के भीतर राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा को संसद से पारित करवाना आवश्यक जबकि राष्ट्रपति शासन के लिए 2 माह। राष्ट्रपति शासन राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर जबकि राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा केबिनेट की लिखित सिफ़ारिश पर राष्ट्रपति द्वारा। मूल अधिकारों पर प्रभाव- राष्ट्रीय आपातकाल में युद्ध व बाह्य आक्रमण के आधार पर उद्घोषणा होने पर अनु. 358 के स्वत: लागू। अनु. 19 के तहत मूल अधिकार निलंबित अनु. 359 के तहत अन्य मूल अधिकारों को निलंबित करने की शक्ति राष्ट्रपति के पास राष्ट्रपति शासन से मूल अधिकारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है केंद्र राज्य सम्बन्धों पर प्रभाव राष्ट्रीय आपातकाल केंद्र की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार किसी भी विषय पर राज्य को निर्देश देने तक राज्य सूची पर कानून बनाने की शक्ति राष्ट्रपति वित्तीय हस्तांतरण में बदलाव कर सकता है राष्ट्रपति शासन राज्यपाल सहित सभी कार्यपालिका शक्तियाँ राष्ट्रपति को हस्तांतरित विधायिका शक्तियाँ राज्यपाल को हस्तांतरित आपातकालीन व्यवस्था किसी भी आकस्मिक परिस्थितियों में केंद्र को त्वरित कार्यवाही करने की शक्तियाँ देती है। यहाँ राष्ट्रीय आपातकाल में यह पूरे देश को एकात्मक रूप में स्थापित करती है तो वहीं राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता पर निर्वात को भरती हैं।
##Question:वित्तीय आपातकाल के प्रावधानों पर चर्चा कीजिये। साथ ही,राष्ट्रीय आपातकाल एवं राज्य आपातकाल में अंतर स्पष्ट कीजिये। (150-200 शब्द; 10 अंक) Discuss financial emergency provisions. Along with this, differentiate between National emergency and state emergency. (150-200 words; 10 marks)##Answer:Approach: भूमिका में आपातकाल व्यवस्था की संक्षिप्त चर्चा कीजिये। वित्तीय आपातकाल के प्रावधानों को सूचीबद्ध कीजिये राष्ट्रीय आपातकाल तथा राज्य आपातकाल के बीच अंतर स्पष्ट कीजिये। निष्कर्ष में आपातकाल के महत्व की चर्चा कर सकते हैं। उत्तर: भारतीय संविधान में अनु. 352 से 360 में आपातकालीन प्रावधानों की चर्चा की गयी है। अनु. 352 में राष्ट्रीय आपातकाल, अनु. 356 में राज्य आपातकाल (राष्ट्रपति शासन) तथा अनु. 360 में वित्तीय आपातकाल की चर्चा की गयी है। वित्तीय आपातकाल 360(1) यदि राष्ट्रपति इस बात से संतुष्ट है कि भारत अथवा उसके किसी भाग कि वित्तीय स्थिरता अथवा उसकी साख संकटग्रस्त है तो वह वित्तीय आपात की घोषणा कर सकता है 360(2) वह बाद में की गयी एक घोषणा से पहले वाली घोषणा में बदलाव करते हुए वह वित्तीय आपातकाल को समाप्त कर सकता है, इसकी अवधि बढ़ा सकता है या कोई और आवश्यक बदलाव कर सकता है। 360(3) राष्ट्रपति राज्यों को उपयुक्त दिशानिर्देश दे सकता है जो वित्तीय मामलों में स्थिरता लाने हेतु आवश्यक है राज्य के अधीन सेवा योजन में लगे हुए किसी एक वर्ग या विभिन्न वर्ग के कर्मचारियों व अधिकारियों के वेतन एवं भत्ते में कटौती का निर्देश दे सकता है जिससे कि देश में वित्तीय स्थिरता दोबारा कायम की जा सके। वह इसी प्रकार केंद्र के अधीन कार्यरत किसी वर्ग के अधिकारी या कर्मचारी के वेतन व भत्ते में कटौती का निर्देश दे सकता है। पुन: वह सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन भत्तों में कटौती का निर्देश दे सकता है। केंद्र राज्यों को निर्देश दे सकता है कि वे धन विधयेक व राज्य की संचित निधि से संबन्धित विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखे केंद्र व राज्य के अधीन कार्यरत किसी भी वर्ग के अधिकारी या कर्मचारी के वेतन भत्ते में कटौती की बात की गयी है उसमें राष्ट्रपति मंत्रीगण, सांसद विधायक आदि भी शामिल होंगे राष्ट्रीय आपातकाल तथा राज्य आपातकाल में अंतर- उद्घोषणा: राष्ट्रीय आपातकाल युद्ध, बाह्य आक्रमण, सशस्त्र विद्रोह के आधार पर, राष्ट्रपति शासन - संवैधानिक तंत्र की विफलता के आधार पर उद्घोषणा के 1 माह के भीतर राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा को संसद से पारित करवाना आवश्यक जबकि राष्ट्रपति शासन के लिए 2 माह। राष्ट्रपति शासन राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर जबकि राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा केबिनेट की लिखित सिफ़ारिश पर राष्ट्रपति द्वारा। मूल अधिकारों पर प्रभाव- राष्ट्रीय आपातकाल में युद्ध व बाह्य आक्रमण के आधार पर उद्घोषणा होने पर अनु. 358 के स्वत: लागू। अनु. 19 के तहत मूल अधिकार निलंबित अनु. 359 के तहत अन्य मूल अधिकारों को निलंबित करने की शक्ति राष्ट्रपति के पास राष्ट्रपति शासन से मूल अधिकारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है केंद्र राज्य सम्बन्धों पर प्रभाव राष्ट्रीय आपातकाल केंद्र की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार किसी भी विषय पर राज्य को निर्देश देने तक राज्य सूची पर कानून बनाने की शक्ति राष्ट्रपति वित्तीय हस्तांतरण में बदलाव कर सकता है राष्ट्रपति शासन राज्यपाल सहित सभी कार्यपालिका शक्तियाँ राष्ट्रपति को हस्तांतरित विधायिका शक्तियाँ राज्यपाल को हस्तांतरित आपातकालीन व्यवस्था किसी भी आकस्मिक परिस्थितियों में केंद्र को त्वरित कार्यवाही करने की शक्तियाँ देती है। यहाँ राष्ट्रीय आपातकाल में यह पूरे देश को एकात्मक रूप में स्थापित करती है तो वहीं राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता पर निर्वात को भरती हैं।
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अलाउद्दीन खिलजी के प्रशासनिक सुधारों का एक विवरण प्रस्तुत कीजिये | इसके साथ ही, उसके द्वारा आय में वृद्धि हेतु किये गये उपाय एवं उसकी बाजार नियंत्रण पद्धति का भी संक्षिप्त परिचय दीजिये | (150-200 शब्द, 10 अंक) Present a description of the administrative reforms made by Alauddin Khilji. Along with this, Give a brief introduction to the measures taken by him to increase income and his Market Control Methods. (150-200 words, 10 marks)
एप्रोच- अलाउद्दीन खिलजी के बारे में संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में,अलाउद्दीन खिलजी के प्रशासनिक सुधारों का एक विवरण प्रस्तुत कीजिये| अगले भाग में,उसके द्वारा आय में वृद्धि हेतु किये गये उपायों को बिंदुबार बताईये| अंतिम भाग में,उसकी बाजार नियंत्रण पद्धति का संक्षिप्त परिचय दीजिये| उत्तर- अलाउद्दीन खिलजी का शासनकाल1296 से 1316 ई. के मध्य का था जिसे साम्राज्य विस्तार के दृष्टिकोण से अहम् माना जाता है|अलाउद्दीन खिलजी ने जहाँ एक ओरउत्तर भारत में गुजरात; रणथम्भौर; चितौड़; मालवा आदि क्षेत्रों पर कब्ज़ा किया वहीँ दक्षिणी भारत में भी 4 प्रमुख राज्यों[ देवगिरी(यादव वंश); वारंगल(काकतीय वंश); द्वारसमुद्र(होयसेल वंश); मदुरै(पांड्य)] पर विजय प्राप्त की| मलिक काफूर के नेतृत्व में चारों राज्यों के विरुद्ध अभियान के माध्यम सेअलाउद्दीन खिलजी नेचारों राज्यों को नजराना देने पर एवं दिल्ली की अधीनता स्वीकार करने हेतु बाध्य किया| अलाउद्दीन खिलजी के प्रशासनिक सुधार स्थायी केंद्रीय सेना का गठन; सैनिकों को नगद वेतन; दाग एवं हुलिया प्रथा; अमीरों पर नियंत्रण हेतु इनके बीच वैवाहिक संबंधों पर नियंत्रण; अमीरों से बकाया राजस्व की वसूली के लिए "दीवान-ए-मुस्तखराज " नामक मंत्रालय का गठन; उलेमा वर्ग का राजनीति में हस्तक्षेप रोकना; राज्य एवं धर्म को अलग करने का श्रेय; मध्यस्थों को भूराजस्व वसूली से अलग कर किसानों से प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करने की कोशिश; अलाउद्दीन खिलजी के द्वारा आय में वृद्धि हेतु किये गये उपाय दोआब में भूराजस्व की दर को एक-तिहाई से बढ़ाकर 50% करना; भूमि को मापने हेतु "मसाहत" नामक पद्धति की शुरुआत; "ख़ुम्स(लूट से प्राप्त आय) " में राज्य का हिस्सा 20% से बढ़ाकर 80% करना; "घरही" एवं "चरही" नामक कर; विभिन्न प्रकार के अनुदानों(इनाम, वक्फ़, मिल्क आदि) को रद्द करना; अलाउद्दीन खिलजी की बाजार नियंत्रण नीति "मंडी" में अनाज का व्यापार; "सराय अदल" में अन्य वस्तुओं का बाजार; मवेशी एवं दासों का बाजार; बाजारों में कीमतों का निर्धारण राज्य के द्वारा; बाजारों की देखरेख के लिए " दीवान-ए-रियासत " विभाग का गठन; प्रत्येक बाजार में अधीक्षक की नियुक्ति; गुप्तचरों(बरीद; मुन्हियाँ) के माध्यम से बाजार की गतिविधियों पर नियंत्रण; अलाउद्दीन खिलजी के इन सुधारों और प्रयोगों का उद्देश्य प्रशासन को चुस्ती देना, सेना को मजबूत बनाना, भूराजस्व की व्यवस्था का एक तंत्र स्थापित करना एवं कृषि के विस्तार तथा प्रगति के लिए तेजी से फैलते शहरों के नागरिकों के कल्याण के लिए जरुरी उपाय करना था| अलाउद्दीन की बाजार नियमन नीति अपने समय की एक आश्चर्यजनक व्यवस्था थी परंतु उसके मृत्यु के साथ ही वह समाप्त हो गयी| इन नियमों के फलस्वरूप ही अलाउद्दीन एक विशाल और कुशल घुड़सवार सेना बनाए रख पाने में सफल हुआ तथा दिल्ली को मंगोल आक्रमण से सुरक्षित रख सका| साथ ही, भूराजस्व संबंधी सुधारों से उसके ग्रामीण क्षेत्रों के साथ नजदीकी संबंध भी स्थापित हुए|
##Question:अलाउद्दीन खिलजी के प्रशासनिक सुधारों का एक विवरण प्रस्तुत कीजिये | इसके साथ ही, उसके द्वारा आय में वृद्धि हेतु किये गये उपाय एवं उसकी बाजार नियंत्रण पद्धति का भी संक्षिप्त परिचय दीजिये | (150-200 शब्द, 10 अंक) Present a description of the administrative reforms made by Alauddin Khilji. Along with this, Give a brief introduction to the measures taken by him to increase income and his Market Control Methods. (150-200 words, 10 marks)##Answer:एप्रोच- अलाउद्दीन खिलजी के बारे में संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में,अलाउद्दीन खिलजी के प्रशासनिक सुधारों का एक विवरण प्रस्तुत कीजिये| अगले भाग में,उसके द्वारा आय में वृद्धि हेतु किये गये उपायों को बिंदुबार बताईये| अंतिम भाग में,उसकी बाजार नियंत्रण पद्धति का संक्षिप्त परिचय दीजिये| उत्तर- अलाउद्दीन खिलजी का शासनकाल1296 से 1316 ई. के मध्य का था जिसे साम्राज्य विस्तार के दृष्टिकोण से अहम् माना जाता है|अलाउद्दीन खिलजी ने जहाँ एक ओरउत्तर भारत में गुजरात; रणथम्भौर; चितौड़; मालवा आदि क्षेत्रों पर कब्ज़ा किया वहीँ दक्षिणी भारत में भी 4 प्रमुख राज्यों[ देवगिरी(यादव वंश); वारंगल(काकतीय वंश); द्वारसमुद्र(होयसेल वंश); मदुरै(पांड्य)] पर विजय प्राप्त की| मलिक काफूर के नेतृत्व में चारों राज्यों के विरुद्ध अभियान के माध्यम सेअलाउद्दीन खिलजी नेचारों राज्यों को नजराना देने पर एवं दिल्ली की अधीनता स्वीकार करने हेतु बाध्य किया| अलाउद्दीन खिलजी के प्रशासनिक सुधार स्थायी केंद्रीय सेना का गठन; सैनिकों को नगद वेतन; दाग एवं हुलिया प्रथा; अमीरों पर नियंत्रण हेतु इनके बीच वैवाहिक संबंधों पर नियंत्रण; अमीरों से बकाया राजस्व की वसूली के लिए "दीवान-ए-मुस्तखराज " नामक मंत्रालय का गठन; उलेमा वर्ग का राजनीति में हस्तक्षेप रोकना; राज्य एवं धर्म को अलग करने का श्रेय; मध्यस्थों को भूराजस्व वसूली से अलग कर किसानों से प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करने की कोशिश; अलाउद्दीन खिलजी के द्वारा आय में वृद्धि हेतु किये गये उपाय दोआब में भूराजस्व की दर को एक-तिहाई से बढ़ाकर 50% करना; भूमि को मापने हेतु "मसाहत" नामक पद्धति की शुरुआत; "ख़ुम्स(लूट से प्राप्त आय) " में राज्य का हिस्सा 20% से बढ़ाकर 80% करना; "घरही" एवं "चरही" नामक कर; विभिन्न प्रकार के अनुदानों(इनाम, वक्फ़, मिल्क आदि) को रद्द करना; अलाउद्दीन खिलजी की बाजार नियंत्रण नीति "मंडी" में अनाज का व्यापार; "सराय अदल" में अन्य वस्तुओं का बाजार; मवेशी एवं दासों का बाजार; बाजारों में कीमतों का निर्धारण राज्य के द्वारा; बाजारों की देखरेख के लिए " दीवान-ए-रियासत " विभाग का गठन; प्रत्येक बाजार में अधीक्षक की नियुक्ति; गुप्तचरों(बरीद; मुन्हियाँ) के माध्यम से बाजार की गतिविधियों पर नियंत्रण; अलाउद्दीन खिलजी के इन सुधारों और प्रयोगों का उद्देश्य प्रशासन को चुस्ती देना, सेना को मजबूत बनाना, भूराजस्व की व्यवस्था का एक तंत्र स्थापित करना एवं कृषि के विस्तार तथा प्रगति के लिए तेजी से फैलते शहरों के नागरिकों के कल्याण के लिए जरुरी उपाय करना था| अलाउद्दीन की बाजार नियमन नीति अपने समय की एक आश्चर्यजनक व्यवस्था थी परंतु उसके मृत्यु के साथ ही वह समाप्त हो गयी| इन नियमों के फलस्वरूप ही अलाउद्दीन एक विशाल और कुशल घुड़सवार सेना बनाए रख पाने में सफल हुआ तथा दिल्ली को मंगोल आक्रमण से सुरक्षित रख सका| साथ ही, भूराजस्व संबंधी सुधारों से उसके ग्रामीण क्षेत्रों के साथ नजदीकी संबंध भी स्थापित हुए|
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बहुस्तरीय शासन व्यवस्था क्या है ? इसके लाभ व भारत में इसे लागू करने से संबंधित समस्याओं की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द ) What is Multilevel Governance? Briefly discuss its benefits and the problems related to its implementation in India. (150-200 words)
दृष्टिकोण : बहुस्तरीय शासन व्यवस्था को परिभाषित करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । कुछ उदाहरणों के माध्यम से बहुस्तरीय व्यवस्था को समझाइए । बहुस्तरीय शासन व्यवस्था के लाभों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । भारत में बहुस्तरीय व्यवस्था को लागू करने से संबंधित समस्याओं की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । उत्तर : ऐसी शासन व्यवस्था जिसमें सरकार के विभिन्न स्तरों, स्थानीय, क्षेत्रीय, गैर राज्य अभिकर्ताओं , गैर सरकारी संगठनों, सामुदायिक समूहों, निजी निगमों, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधकों आदि के बीच शक्तियों को साझा करना एवं समन्वय के साथ उनका प्रयोग ही बहुस्तरीय शासन व्यवस्था है । समाज की विविधता व जटिलताओं के अनुरूप शासन व्यवस्था में जनता के हितों व आकांक्षाओं को समुचित प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए विभिन्न वर्गों की नीति निर्माण में भागीदारी आवश्यक है । बहुस्तरीय शासन व्यवस्था इसी सिद्धांत के अनुरूप कार्य करता है । स्थानीय स्वशासन प्रणाली को मजबूत बनाना, किसी संबंधित क्षेत्र के लिए नीति निर्माण में उस क्षेत्र विशेष से संबंधित गैर सरकारी संगठनों की भूमिका को महत्व देना आदि बहुस्तरीय शासन व्यवस्था के उदाहरण हैं । बहुस्तरीय शासन व्यवस्था के लाभ : बहुस्तरीय शासन व्यवस्था से लोगों के अंदर उत्तरदायित्व की भावना का विकास होगा और शासन में पारदर्शिता बढ़ेगी । अनेक स्तरों की भागीदारी से सार्वजनिक नीतियों का निर्माण, विकास और क्रियान्वयन सामाजिक हितों के अनुकूल हो सकेगा । सरकार द्वारा सामाजिक स्तरों के सहयोग से शक्ति और संसाधनों के वितरण को प्रभावी बनाया जा सकेगा । ऐसे शासन में समाज के अभावग्रस्त एवं पिछड़े लोगों को उपयुक्त स्थान प्राप्त हो जाता है । यह भारत में विधमान क्षेत्रीय विविधताओं के अनुकूल है क्योंकि इससे विकास को प्रत्येक क्षेत्र तक पहुंचाया जा सकता है और विकास की एक मजबूत शृंखला को निर्मित किया जा सकता है । इसके द्वारा बुनियादी ढांचे में निवेश को बढ़ाया जा सकता है । सतत विकास एवं नवाचार बढ़ेगा । चूंकि भारत एक संघीय व्यवस्था है , जहां सहकारिता का विकास अनिवार्य है । अर्थात बहुस्तरीय व्यवस्था सहकारी संघवाद को बढ़ावा देगा । बहुस्तरीय शासन व्यवस्था को भारत में लागू करने से संबंधित समस्याएं : भारत में विधमान अशिक्षा, हितों में असमानता, असहमति की भावना, अकुशलता, गरीबी, आदि बहुस्तरीय शासन के निर्माण में बाधक । भारत में अभी तक किसी ऐसी प्रणाली का विकास नहीं हो सका है, जो राष्ट्र के अंदर या राष्ट्र के बाहर से मूल्यों को प्राप्त करने के लिए संवाद स्थापित करती हो । विधमान आतंकवाद, साइबर अपराध बहुस्तरीय शासन के माध्यम से देश की आंतरिक सुरक्षा को बाधित कर सकता है । आवश्यक संस्थाकरण के अभाव में भागीदारी सापेक्षिक वंचना को बढ़ावा देगी । बहुस्तरीय शासन व्यवस्था, शासन के लोकतांत्रिकरण की दिशा में एक अच्छी पहल है जिसके माध्यम से शासन व नीति निर्माण में आम लोगों की सहभागिता बढ़ती है तथापि भारत में इसे बढ़ावा देने के लिए कई अन्य महत्वपूर्ण सुधारों की आवश्यकता है ।
##Question:बहुस्तरीय शासन व्यवस्था क्या है ? इसके लाभ व भारत में इसे लागू करने से संबंधित समस्याओं की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द ) What is Multilevel Governance? Briefly discuss its benefits and the problems related to its implementation in India. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण : बहुस्तरीय शासन व्यवस्था को परिभाषित करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । कुछ उदाहरणों के माध्यम से बहुस्तरीय व्यवस्था को समझाइए । बहुस्तरीय शासन व्यवस्था के लाभों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । भारत में बहुस्तरीय व्यवस्था को लागू करने से संबंधित समस्याओं की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । उत्तर : ऐसी शासन व्यवस्था जिसमें सरकार के विभिन्न स्तरों, स्थानीय, क्षेत्रीय, गैर राज्य अभिकर्ताओं , गैर सरकारी संगठनों, सामुदायिक समूहों, निजी निगमों, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधकों आदि के बीच शक्तियों को साझा करना एवं समन्वय के साथ उनका प्रयोग ही बहुस्तरीय शासन व्यवस्था है । समाज की विविधता व जटिलताओं के अनुरूप शासन व्यवस्था में जनता के हितों व आकांक्षाओं को समुचित प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए विभिन्न वर्गों की नीति निर्माण में भागीदारी आवश्यक है । बहुस्तरीय शासन व्यवस्था इसी सिद्धांत के अनुरूप कार्य करता है । स्थानीय स्वशासन प्रणाली को मजबूत बनाना, किसी संबंधित क्षेत्र के लिए नीति निर्माण में उस क्षेत्र विशेष से संबंधित गैर सरकारी संगठनों की भूमिका को महत्व देना आदि बहुस्तरीय शासन व्यवस्था के उदाहरण हैं । बहुस्तरीय शासन व्यवस्था के लाभ : बहुस्तरीय शासन व्यवस्था से लोगों के अंदर उत्तरदायित्व की भावना का विकास होगा और शासन में पारदर्शिता बढ़ेगी । अनेक स्तरों की भागीदारी से सार्वजनिक नीतियों का निर्माण, विकास और क्रियान्वयन सामाजिक हितों के अनुकूल हो सकेगा । सरकार द्वारा सामाजिक स्तरों के सहयोग से शक्ति और संसाधनों के वितरण को प्रभावी बनाया जा सकेगा । ऐसे शासन में समाज के अभावग्रस्त एवं पिछड़े लोगों को उपयुक्त स्थान प्राप्त हो जाता है । यह भारत में विधमान क्षेत्रीय विविधताओं के अनुकूल है क्योंकि इससे विकास को प्रत्येक क्षेत्र तक पहुंचाया जा सकता है और विकास की एक मजबूत शृंखला को निर्मित किया जा सकता है । इसके द्वारा बुनियादी ढांचे में निवेश को बढ़ाया जा सकता है । सतत विकास एवं नवाचार बढ़ेगा । चूंकि भारत एक संघीय व्यवस्था है , जहां सहकारिता का विकास अनिवार्य है । अर्थात बहुस्तरीय व्यवस्था सहकारी संघवाद को बढ़ावा देगा । बहुस्तरीय शासन व्यवस्था को भारत में लागू करने से संबंधित समस्याएं : भारत में विधमान अशिक्षा, हितों में असमानता, असहमति की भावना, अकुशलता, गरीबी, आदि बहुस्तरीय शासन के निर्माण में बाधक । भारत में अभी तक किसी ऐसी प्रणाली का विकास नहीं हो सका है, जो राष्ट्र के अंदर या राष्ट्र के बाहर से मूल्यों को प्राप्त करने के लिए संवाद स्थापित करती हो । विधमान आतंकवाद, साइबर अपराध बहुस्तरीय शासन के माध्यम से देश की आंतरिक सुरक्षा को बाधित कर सकता है । आवश्यक संस्थाकरण के अभाव में भागीदारी सापेक्षिक वंचना को बढ़ावा देगी । बहुस्तरीय शासन व्यवस्था, शासन के लोकतांत्रिकरण की दिशा में एक अच्छी पहल है जिसके माध्यम से शासन व नीति निर्माण में आम लोगों की सहभागिता बढ़ती है तथापि भारत में इसे बढ़ावा देने के लिए कई अन्य महत्वपूर्ण सुधारों की आवश्यकता है ।
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प्राचीन भारत में शिक्षा प्रणाली की प्रमुख विशेषताओं और स्वरुप को स्पष्ट करते हुए इसकी सीमाओं की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Explain the main features and nature of education system in ancient India and discuss its limitations. (150 to 200 words, 10 marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली की संक्षिप्त जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली का स्वरुप स्पष्ट करते हुए प्रमुख विशेषताएं बताइये 3- प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली की सीमाओं को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली का महत्त्व बताते हुए निष्कर्ष दीजिये| भारत में शिक्षा पद्धति का क्रमशः विकास हुआ, भारत की प्राचीन शिक्षा पद्धति में हमें अनौपचारिक तथा औपचारिक दोनों प्रकार के शैक्षणिक केन्द्रों का उल्लेख प्राप्त होता है। प्राचीन भारत में सामान्य औपचारिक शिक्षा के प्रमुख केंद्र आश्रम, गुरुकुल, मंदिर, मठ और विहार आदि थे| दूसरी ओर परिवार, पुरोहित, पण्डित, सन्यासी और त्यौहार आदि के माध्यम से अनौपचारिक शिक्षा प्राप्त होती थी| कालान्तर में शिक्षा प्रणाली के विकास के साथ भारत मे उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी कुछ संस्थाएं सक्रिय दिखाई देती हैं जैसे तक्षशिला, नालंदा, वल्लभी, विक्रमशिला विश्वविद्यालय आदि । इससे स्पष्ट होता है कि जैसे-जैसे सामाजिक विकास हुआ वैसे-वैसे शैक्षणिक संस्थाएं स्थापित होने लगी। गुरुकुल पद्धति तत्कालीन शिक्षण पद्धतियों में सर्वाधिक प्रचलित पद्धति थी| प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली की प्रमुख विशेषताएं प्रारम्भिक चरण में प्रचलित गुरुकुल पद्धति के अंतर्गत सामान्य औपचारिक शिक्षा दी जाती थी| यह शिक्षा की सबसे लोकप्रिय पद्धति थी, इसमें गुरु के पास रह कर शिक्षा ग्रहण की जाती थी| प्रायः गुरु का आश्रम ग्रामीण या शहरी आबादी से दूर होता था| प्रायः छात्र आश्रम में गुरु के पास रह कर शिक्षा ग्रहण करते थे लेकिन ऐसे छात्रों की भी जानकारी मिलती है जो प्रतिदिन आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने के लिए आया करते थे| आश्रम में छात्र अत्यंत ही अनुशाषित जीवन व्यतीत करते थे, गुरु का सम्मान करते थे और गुरु भी छात्रों का ध्यान रखते थे| यहाँ प्रायः निर्धारित पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाया जाता था, जीवन से जुड़े सभी विषयों की जानकारी दी जाती थी, भिक्षाटन छात्रों के प्रशिक्षण का भाग होता था| गुरुकुल शिक्षा पद्धति में शिक्षा की औपचारिक शुरुआत उपनयन संस्कार से जबकि औपचारिक समापन समावर्तन संस्कार के साथ होता था| औचारिक तौर शिक्षा के लिए शुल्क की व्यवस्था आज की तरह नहीं थी प्रायः छात्रों एवं उनके अभिभावकों के द्वारा गुरु को दान-दक्षिणा एवं उपहार दिए जाते थे| शिक्षा प्रणाली में वर्तमान की तरह शैक्षिक उपाधियों का भी प्रावधान नहीं था लेकिन शिक्षा के अंतिम चरण में विद्वानों की मण्डली के समक्ष छात्रों को उपस्थित होना पड़ता था, लेकिन यह औपचारिकता अधिक होती थी, अंतिम रूप से छात्रों के संदर्भ में गुरु के निर्णय को ही महत्त्व दिया जाता था| प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली का स्वरुप प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य व्यक्ति का मानसिक, शारीरिक एवं नैतिक रूप से सर्वांगीण विकासकरना था| उत्तम चरित्र के निर्माण एवं और इसके माध्यम से संस्कृति का संरक्षण और बेहतर समाज निर्माण के प्रयास किये जाते थे| प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली में वेद, उपनिषद, व्याकरण, दर्शन एवं विभिन्न प्रकार के शिल्प आदि अध्ययन अध्यापन के प्रमुख विषय थे| शिल्पों में धनुर्विद्या, आयुर्वेद, नृत्य और संगीत का विशिष्ट स्थान था| महिलाओं के लिए विशेष तौर पर पाक-कला, सिलाई, नृत्य और संगीत आदि विषयों की शिक्षा को महत्व दिया जाता था बुद्ध एवं जैन धर्म की लोकप्रियता के साथ विहारों, मठों एवं उच्च शिक्षा केन्द्रों में इन धर्मों से सम्बन्धित विषयों का भी अध्ययन कराया जाता था दस्तकारी से सम्बन्धित विषयों की शिक्षा व्यावहारिक तौर पर जाति विशेष के लोग, संगठनों एवं कारीगरों से जुड़ कर ग्रहण की जाती थी| यह शिक्षण और प्रशिक्षण की अनौपचारिक प्रणाली थी| प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली की सीमाएं प्राचीन शिक्षा प्रणाली में जाति एवं लिंग के आधार पर भेदभाव ने इसे लोकतांत्रिक शिक्षा प्रणाली के रूप में विकसित नही होने दिया, धार्मिक विषयों पर अत्यधिक बल दिया जाता था, इससे भौतिक विज्ञानों एवं व्यावहारिक अध्ययन की परम्परा कमजोर होती गयी, शिक्षा का बुद्धिवादी स्वरुप अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है, गुप्तकाल तक आते-आते धार्मिक शिक्षा पर प्रश्न चिन्ह उठाने की परम्परा कमजोर पड़ गयी और जो भी ज्ञान था उसके प्रति आत्म संतुष्टि का भाव था और इसके प्रसार पर ही बल दिया जाने लगा| इससे उदारीकृत शिक्षा का विकास अवरुद्ध होने लगा और वैज्ञानिक चिंतन की परम्परा अवरुद्ध हुई| इसका प्रभाव समाज पर भी दिखाई देता है| उपरोक्त सीमाओं से स्पष्ट होता है कि यद्यपि प्राचीन भारतीय शिक्षण प्रणाली अभी समग्रता को नही प्राप्त कर पायी थी तथापि प्राचीन भारत में विज्ञान, ज्योतिष, गणित, बीजगणित और इनके माध्यम से खगोल शास्त्र आदि धाराओं में पर्याप्त विकास दिखाई देता है| इसके अतिरिक रसायन शास्त्र , धातुविज्ञान, स्थापत्य आदि के साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि विभिन्न प्रायोगिक विज्ञानों का भी पर्याप्त विकास हुआ था जो प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली के पर्याप्त रूप से विकसित होने के प्रमाण के रूप में ग्रहण किया जा सकता है|
##Question:प्राचीन भारत में शिक्षा प्रणाली की प्रमुख विशेषताओं और स्वरुप को स्पष्ट करते हुए इसकी सीमाओं की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Explain the main features and nature of education system in ancient India and discuss its limitations. (150 to 200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली की संक्षिप्त जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली का स्वरुप स्पष्ट करते हुए प्रमुख विशेषताएं बताइये 3- प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली की सीमाओं को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली का महत्त्व बताते हुए निष्कर्ष दीजिये| भारत में शिक्षा पद्धति का क्रमशः विकास हुआ, भारत की प्राचीन शिक्षा पद्धति में हमें अनौपचारिक तथा औपचारिक दोनों प्रकार के शैक्षणिक केन्द्रों का उल्लेख प्राप्त होता है। प्राचीन भारत में सामान्य औपचारिक शिक्षा के प्रमुख केंद्र आश्रम, गुरुकुल, मंदिर, मठ और विहार आदि थे| दूसरी ओर परिवार, पुरोहित, पण्डित, सन्यासी और त्यौहार आदि के माध्यम से अनौपचारिक शिक्षा प्राप्त होती थी| कालान्तर में शिक्षा प्रणाली के विकास के साथ भारत मे उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी कुछ संस्थाएं सक्रिय दिखाई देती हैं जैसे तक्षशिला, नालंदा, वल्लभी, विक्रमशिला विश्वविद्यालय आदि । इससे स्पष्ट होता है कि जैसे-जैसे सामाजिक विकास हुआ वैसे-वैसे शैक्षणिक संस्थाएं स्थापित होने लगी। गुरुकुल पद्धति तत्कालीन शिक्षण पद्धतियों में सर्वाधिक प्रचलित पद्धति थी| प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली की प्रमुख विशेषताएं प्रारम्भिक चरण में प्रचलित गुरुकुल पद्धति के अंतर्गत सामान्य औपचारिक शिक्षा दी जाती थी| यह शिक्षा की सबसे लोकप्रिय पद्धति थी, इसमें गुरु के पास रह कर शिक्षा ग्रहण की जाती थी| प्रायः गुरु का आश्रम ग्रामीण या शहरी आबादी से दूर होता था| प्रायः छात्र आश्रम में गुरु के पास रह कर शिक्षा ग्रहण करते थे लेकिन ऐसे छात्रों की भी जानकारी मिलती है जो प्रतिदिन आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने के लिए आया करते थे| आश्रम में छात्र अत्यंत ही अनुशाषित जीवन व्यतीत करते थे, गुरु का सम्मान करते थे और गुरु भी छात्रों का ध्यान रखते थे| यहाँ प्रायः निर्धारित पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाया जाता था, जीवन से जुड़े सभी विषयों की जानकारी दी जाती थी, भिक्षाटन छात्रों के प्रशिक्षण का भाग होता था| गुरुकुल शिक्षा पद्धति में शिक्षा की औपचारिक शुरुआत उपनयन संस्कार से जबकि औपचारिक समापन समावर्तन संस्कार के साथ होता था| औचारिक तौर शिक्षा के लिए शुल्क की व्यवस्था आज की तरह नहीं थी प्रायः छात्रों एवं उनके अभिभावकों के द्वारा गुरु को दान-दक्षिणा एवं उपहार दिए जाते थे| शिक्षा प्रणाली में वर्तमान की तरह शैक्षिक उपाधियों का भी प्रावधान नहीं था लेकिन शिक्षा के अंतिम चरण में विद्वानों की मण्डली के समक्ष छात्रों को उपस्थित होना पड़ता था, लेकिन यह औपचारिकता अधिक होती थी, अंतिम रूप से छात्रों के संदर्भ में गुरु के निर्णय को ही महत्त्व दिया जाता था| प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली का स्वरुप प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य व्यक्ति का मानसिक, शारीरिक एवं नैतिक रूप से सर्वांगीण विकासकरना था| उत्तम चरित्र के निर्माण एवं और इसके माध्यम से संस्कृति का संरक्षण और बेहतर समाज निर्माण के प्रयास किये जाते थे| प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली में वेद, उपनिषद, व्याकरण, दर्शन एवं विभिन्न प्रकार के शिल्प आदि अध्ययन अध्यापन के प्रमुख विषय थे| शिल्पों में धनुर्विद्या, आयुर्वेद, नृत्य और संगीत का विशिष्ट स्थान था| महिलाओं के लिए विशेष तौर पर पाक-कला, सिलाई, नृत्य और संगीत आदि विषयों की शिक्षा को महत्व दिया जाता था बुद्ध एवं जैन धर्म की लोकप्रियता के साथ विहारों, मठों एवं उच्च शिक्षा केन्द्रों में इन धर्मों से सम्बन्धित विषयों का भी अध्ययन कराया जाता था दस्तकारी से सम्बन्धित विषयों की शिक्षा व्यावहारिक तौर पर जाति विशेष के लोग, संगठनों एवं कारीगरों से जुड़ कर ग्रहण की जाती थी| यह शिक्षण और प्रशिक्षण की अनौपचारिक प्रणाली थी| प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली की सीमाएं प्राचीन शिक्षा प्रणाली में जाति एवं लिंग के आधार पर भेदभाव ने इसे लोकतांत्रिक शिक्षा प्रणाली के रूप में विकसित नही होने दिया, धार्मिक विषयों पर अत्यधिक बल दिया जाता था, इससे भौतिक विज्ञानों एवं व्यावहारिक अध्ययन की परम्परा कमजोर होती गयी, शिक्षा का बुद्धिवादी स्वरुप अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है, गुप्तकाल तक आते-आते धार्मिक शिक्षा पर प्रश्न चिन्ह उठाने की परम्परा कमजोर पड़ गयी और जो भी ज्ञान था उसके प्रति आत्म संतुष्टि का भाव था और इसके प्रसार पर ही बल दिया जाने लगा| इससे उदारीकृत शिक्षा का विकास अवरुद्ध होने लगा और वैज्ञानिक चिंतन की परम्परा अवरुद्ध हुई| इसका प्रभाव समाज पर भी दिखाई देता है| उपरोक्त सीमाओं से स्पष्ट होता है कि यद्यपि प्राचीन भारतीय शिक्षण प्रणाली अभी समग्रता को नही प्राप्त कर पायी थी तथापि प्राचीन भारत में विज्ञान, ज्योतिष, गणित, बीजगणित और इनके माध्यम से खगोल शास्त्र आदि धाराओं में पर्याप्त विकास दिखाई देता है| इसके अतिरिक रसायन शास्त्र , धातुविज्ञान, स्थापत्य आदि के साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि विभिन्न प्रायोगिक विज्ञानों का भी पर्याप्त विकास हुआ था जो प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली के पर्याप्त रूप से विकसित होने के प्रमाण के रूप में ग्रहण किया जा सकता है|
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मालदीव का भारत के लिए क्या महत्व है? भारत-मालदीव संबंधों में प्रगाढ़ता लाने के लिए उठाये गये हालिया क़दमों की चर्चा कीजिये| साथ ही, भारत-मालदीव संबंधों में जो चुनौतियाँ शेष हैं, उन्हें भी बताईये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Write down the importance of Maldives for India? Discuss the recent steps taken to intensify India-Maldives relations. Also, Mention the challenges left in India-Maldives relations. (150-200 words; 10 Marks)
एप्रोच- भारत-मालदीव संबंधों की संक्षिप्त पृष्ठभूमि से उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में, भारत के लिए मालदीव का महत्व बिंदुबार बताईये| (NOTE- यहाँ पर भारत-मालदीव-हिंद महासागर का चित्र देना ज्यादा प्रभावी रहेगा) दूसरे भाग में, मालदीव में सत्ता परिवर्तन की पृष्ठभूमि को दर्शाते हुएभारत-मालदीव संबंधों में प्रगाढ़ता लाने के लिए उठाये गये हालिया क़दमों की चर्चा कीजिये| अंतिम भाग में,भारत-मालदीव संबंधों में जो चुनौतियाँ शेष हैं, उन्हें भी बताईये| उत्तर- भारत 1965 में मालदीव की स्वतंत्रता के पश्चात उसे मान्यता प्रदान करने तथा राजनयिक संबंध स्थापित करने वाला पहला देश था| भारत द्वारा अनेकों अवसरों पर मालदीव के साथ नजदीकी सहयोग स्थापित किया गया है जैसे- तख्तापलट रोकने हेतु ऑपरेशन कैक्टस; सुनामी पश्चात राहत-बचाव तथा जरुरी सामानों की आपूर्ति; नौसैनिक उपस्थिति; जल संकट होने पर त्वरित जल सहायता(2014) आदि| भारत के लिए मालदीव का महत्व इसकी अवस्थिति मलक्का तथा स्वेज जलसंधि के लगभग बीच में होने सेहिंद महासागर में महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्ग की रक्षा हेतु; केरल तथा लक्षद्वीप के निकट होने से भारतीय हितों के विरुद्ध कोई कदम उठने से रोकने हेतु; समुद्री पायरेसी को रोकने के संदर्भ में; चीन के मेरीटाइम सिल्क रूट को काउंटर करने हेतु; चीन के सैनिक प्रभाव में जाने से रोकने हेतु; भारत द्वारा हिंद महासागर में "नेट सुरक्षा प्रोवाइडर" के रूप में भूमिका को देखते हुए; मालदीव के आतंरिक राजनीति का प्रभाव तथा इस संदर्भ में भारत की भूमिका; सार्क सदस्य के रूप में दक्षिण एशिया में मालदीव की भूमिका के संदर्भ में; भारत के साथ नृजातीय, सांस्कृतिक, भाषाई, धार्मिक और आर्थिक घनिष्ठ संबंध; हिंद महासागर को विवादरहित क्षेत्र बनाने के दृष्टिकोण से; ब्लू इकॉनोमी एवं व्यापार को बढ़ावा देने हेतु; मालदीव में भारतीय डायस्पोरा की रक्षा करने हेतु; मालदीव के लोगों हेतु शिक्षा, स्वास्थ्य आदि क्षेत्रों में भारत की भूमिका; भारत-मालदीव संबंधों में प्रगाढ़ता लाने के लिए उठाये गये हालिया क़दम 2013 में अब्दुल्ला यामिन द्वारा सता में आने के बाद लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया जाने लगा था तथा भारतीय हितों की अनदेखी की जाने लगी थी जैसे- भारतीय निवेश की असुरक्षा(GMR विवाद)| 2018 में आपातकाल की घोषणा के बाद दोनों देशों के मध्य संबंधों में और कटुता आ गयी थी| भारत- मालदीव पहले से ही कई क्षेत्रों में व्यापक सहयोग कर रहे थें जैसे- समुद्री सीमा निपटान, 1976; व्यापार समझौता, 1981; ऑपरेशन कैक्टस, 1988; भारत द्वारा पानी आपूर्ति, 2014; भारत द्वारा उदार आर्थिक सहायता/अनुदान आदि| भारत-मालदीव के मध्य सहयोग केहालिया आयाम2015 में राजनयिक संबंधों के 50 वर्ष पूरा होने के पश्चात भारत सरकार द्वारा आर्थिकसहयोग का मजबूतकरने हेतु विकासात्मक मुद्दे पर ध्यान दिया गया तथा लो इंटरेस्ट क्रेडिट; अनिवार्य कमोडिटीज़ देना; यूक्रेन संकट के समय मालदीव के छात्रों को निकालना; नजदीकी सैन्य सहयोग हेतु हेलिकॉप्टर बेस; मालदीव कोस्ट के साथ भारतीय कोस्टगार्ड एवं रडार का एकीकरण जैसे आयामों पर भी ध्यान दिया गया| 2011 के बाद मालदीव के राष्ट्रपति सोलेह के शपथग्रहण में भारतीय प्रधानमंत्री की यात्रा के पश्चात मालदीव द्वारा इंडिया-फर्स्ट नीति का आगे जारी रखने हेतु प्रतिबद्धता व्यक्त की गयीहै| भारतद्वारा भी नेबरहुड फर्स्ट पालिसी को ध्यान में रखते हुए जून 2019 में भारतीय पीएम ने मालदीव यात्रा की जिसमें सहयोग के निम्न आयामों पर ध्यान दिया गया- हाइड्रोग्राफी के क्षेत्र में सहयोग करने हेतु एमओयू; ब्लू-इकॉनोमी में सहयोग; समुद्र में कार्गो तथा पैसेंजर सेवाएँ शुरू करने हेतु समझौता; स्वास्थ्य के क्षेत्र में सहयोग करने हेतु समझौता; कस्टम्स विभागों के बीच कस्टम बिल्डिंग समझौता; दोनों देशों के नेवी के बीचवाइट शिपिंगइनफार्मेशन के क्षेत्र में तकनीकी सहयोग; स्वास्थ्य, परिवहन, शिक्षा आदि क्षेत्रों में सहयोग; भारत-मालदीव संबंधों में चुनौतियाँ हालाँकि नयी सरकार आने के बाद दोनों देशों के मध्य सहयोग के आयामों में वृद्धि हुयी है फिर भी निम्न चुनौतियों पर ध्यान देने की आवश्यकता है- जीएमआर द्वारा निवेश को वापस लेने का मुद्दा; मालदीव के राजनैतिक संकट के दौरान भारत की भूमिका; कट्टरता का बढ़ना तथा पाकिस्तान की भूमिका बढ़ने की चुनौती; चीन के बढ़ते प्रभाव का मुद्दा - मुक्त व्यापार समझौता; मेरीटाइम सिल्क रूट तथा मखुंडू; इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं; उपरोक्त को देखते हुए दोनों देशों को एक दूसरे के साथ चुनौतियों को दूर करने की दिशा में निकट सहयोग करने की आवश्यकता है|
##Question:मालदीव का भारत के लिए क्या महत्व है? भारत-मालदीव संबंधों में प्रगाढ़ता लाने के लिए उठाये गये हालिया क़दमों की चर्चा कीजिये| साथ ही, भारत-मालदीव संबंधों में जो चुनौतियाँ शेष हैं, उन्हें भी बताईये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Write down the importance of Maldives for India? Discuss the recent steps taken to intensify India-Maldives relations. Also, Mention the challenges left in India-Maldives relations. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- भारत-मालदीव संबंधों की संक्षिप्त पृष्ठभूमि से उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में, भारत के लिए मालदीव का महत्व बिंदुबार बताईये| (NOTE- यहाँ पर भारत-मालदीव-हिंद महासागर का चित्र देना ज्यादा प्रभावी रहेगा) दूसरे भाग में, मालदीव में सत्ता परिवर्तन की पृष्ठभूमि को दर्शाते हुएभारत-मालदीव संबंधों में प्रगाढ़ता लाने के लिए उठाये गये हालिया क़दमों की चर्चा कीजिये| अंतिम भाग में,भारत-मालदीव संबंधों में जो चुनौतियाँ शेष हैं, उन्हें भी बताईये| उत्तर- भारत 1965 में मालदीव की स्वतंत्रता के पश्चात उसे मान्यता प्रदान करने तथा राजनयिक संबंध स्थापित करने वाला पहला देश था| भारत द्वारा अनेकों अवसरों पर मालदीव के साथ नजदीकी सहयोग स्थापित किया गया है जैसे- तख्तापलट रोकने हेतु ऑपरेशन कैक्टस; सुनामी पश्चात राहत-बचाव तथा जरुरी सामानों की आपूर्ति; नौसैनिक उपस्थिति; जल संकट होने पर त्वरित जल सहायता(2014) आदि| भारत के लिए मालदीव का महत्व इसकी अवस्थिति मलक्का तथा स्वेज जलसंधि के लगभग बीच में होने सेहिंद महासागर में महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्ग की रक्षा हेतु; केरल तथा लक्षद्वीप के निकट होने से भारतीय हितों के विरुद्ध कोई कदम उठने से रोकने हेतु; समुद्री पायरेसी को रोकने के संदर्भ में; चीन के मेरीटाइम सिल्क रूट को काउंटर करने हेतु; चीन के सैनिक प्रभाव में जाने से रोकने हेतु; भारत द्वारा हिंद महासागर में "नेट सुरक्षा प्रोवाइडर" के रूप में भूमिका को देखते हुए; मालदीव के आतंरिक राजनीति का प्रभाव तथा इस संदर्भ में भारत की भूमिका; सार्क सदस्य के रूप में दक्षिण एशिया में मालदीव की भूमिका के संदर्भ में; भारत के साथ नृजातीय, सांस्कृतिक, भाषाई, धार्मिक और आर्थिक घनिष्ठ संबंध; हिंद महासागर को विवादरहित क्षेत्र बनाने के दृष्टिकोण से; ब्लू इकॉनोमी एवं व्यापार को बढ़ावा देने हेतु; मालदीव में भारतीय डायस्पोरा की रक्षा करने हेतु; मालदीव के लोगों हेतु शिक्षा, स्वास्थ्य आदि क्षेत्रों में भारत की भूमिका; भारत-मालदीव संबंधों में प्रगाढ़ता लाने के लिए उठाये गये हालिया क़दम 2013 में अब्दुल्ला यामिन द्वारा सता में आने के बाद लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया जाने लगा था तथा भारतीय हितों की अनदेखी की जाने लगी थी जैसे- भारतीय निवेश की असुरक्षा(GMR विवाद)| 2018 में आपातकाल की घोषणा के बाद दोनों देशों के मध्य संबंधों में और कटुता आ गयी थी| भारत- मालदीव पहले से ही कई क्षेत्रों में व्यापक सहयोग कर रहे थें जैसे- समुद्री सीमा निपटान, 1976; व्यापार समझौता, 1981; ऑपरेशन कैक्टस, 1988; भारत द्वारा पानी आपूर्ति, 2014; भारत द्वारा उदार आर्थिक सहायता/अनुदान आदि| भारत-मालदीव के मध्य सहयोग केहालिया आयाम2015 में राजनयिक संबंधों के 50 वर्ष पूरा होने के पश्चात भारत सरकार द्वारा आर्थिकसहयोग का मजबूतकरने हेतु विकासात्मक मुद्दे पर ध्यान दिया गया तथा लो इंटरेस्ट क्रेडिट; अनिवार्य कमोडिटीज़ देना; यूक्रेन संकट के समय मालदीव के छात्रों को निकालना; नजदीकी सैन्य सहयोग हेतु हेलिकॉप्टर बेस; मालदीव कोस्ट के साथ भारतीय कोस्टगार्ड एवं रडार का एकीकरण जैसे आयामों पर भी ध्यान दिया गया| 2011 के बाद मालदीव के राष्ट्रपति सोलेह के शपथग्रहण में भारतीय प्रधानमंत्री की यात्रा के पश्चात मालदीव द्वारा इंडिया-फर्स्ट नीति का आगे जारी रखने हेतु प्रतिबद्धता व्यक्त की गयीहै| भारतद्वारा भी नेबरहुड फर्स्ट पालिसी को ध्यान में रखते हुए जून 2019 में भारतीय पीएम ने मालदीव यात्रा की जिसमें सहयोग के निम्न आयामों पर ध्यान दिया गया- हाइड्रोग्राफी के क्षेत्र में सहयोग करने हेतु एमओयू; ब्लू-इकॉनोमी में सहयोग; समुद्र में कार्गो तथा पैसेंजर सेवाएँ शुरू करने हेतु समझौता; स्वास्थ्य के क्षेत्र में सहयोग करने हेतु समझौता; कस्टम्स विभागों के बीच कस्टम बिल्डिंग समझौता; दोनों देशों के नेवी के बीचवाइट शिपिंगइनफार्मेशन के क्षेत्र में तकनीकी सहयोग; स्वास्थ्य, परिवहन, शिक्षा आदि क्षेत्रों में सहयोग; भारत-मालदीव संबंधों में चुनौतियाँ हालाँकि नयी सरकार आने के बाद दोनों देशों के मध्य सहयोग के आयामों में वृद्धि हुयी है फिर भी निम्न चुनौतियों पर ध्यान देने की आवश्यकता है- जीएमआर द्वारा निवेश को वापस लेने का मुद्दा; मालदीव के राजनैतिक संकट के दौरान भारत की भूमिका; कट्टरता का बढ़ना तथा पाकिस्तान की भूमिका बढ़ने की चुनौती; चीन के बढ़ते प्रभाव का मुद्दा - मुक्त व्यापार समझौता; मेरीटाइम सिल्क रूट तथा मखुंडू; इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं; उपरोक्त को देखते हुए दोनों देशों को एक दूसरे के साथ चुनौतियों को दूर करने की दिशा में निकट सहयोग करने की आवश्यकता है|
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भारत में नागरिक सेवकों की भूमिका की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । साथ ही इससे संबंधित प्रमुख समस्याओं व सुधार के कुछ सुझाव प्रस्तुत कीजिए । ( 150-200 शब्द ) Briefly discuss the role of civil servants in India. Also discussing the major problems related to it and suggest some remedies for improvement. (150-200 words)
दृष्टिकोण : नागरिक सेवा की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । भारत में नागरिक सेवकों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । भारत में नागरिक सेवकों से संबंधित प्रमुख समस्याओं की चर्चा कीजिए । नागरिक सेवा में सुधार के कुछ प्रमुख उपाय बताइए । उत्तर : प्रशासन के नागरिक पक्ष में प्रमाणित व्यक्ति जिसकी नियुक्ति, पद या नियोजन नियुक्त और नियोक्ता के बीच स्वामी और सेवक सिद्धांत पर आधारित हो तथा ऐसा व्यक्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नागरिकों के कल्याण से संबद्ध हो । अमेरिका व भारत की नागरिक सेवा में अंतर । भारत में नागरिक सेवा का विकास : अनुच्छेद 309, 310, 311, 312 । नागरिक सेवकों की नियुक्ति के संबंध में संसद/विधानमंडल अधिनियम पारित करके नियुक्ति प्रक्रिया को निर्धारित करे । बिना नियम/अधिनियम निर्मित किए राष्ट्रपति व राज्यपाल द्वारा नियुक्ति की जा सकती है । भारतीय नागरिक सेवा की विशेषताएं : किसी भी लोकतंत्र में मंत्री संसद के माध्यम से लोगों के प्रति जिम्मेदार होता और सिविल सेवक मंत्री के प्रति जवाबदेह होता है । एक निष्पक्ष नागरिक सेवा न केवल तात्कालिक सरकार के प्रति उत्तरदायी है , अपितु यह देश के संविधान के प्रति भी उत्तरदायी होते हैं । भारतीय नागरिक सेवा अपेक्षित योग्यता, ज्ञान और अनुभव पर आधारित होती है , यह अमेरिका की स्पॉइल व्यवस्था से भिन्न निष्पक्ष व स्थायी होती है । एक स्थायी नागरिक सेवा निरंतरता प्रदान करती है और विशेषज्ञता के साथ-साथ नीति निर्माण, नीतियों के क्रियान्वयन एवं निर्णय निर्माण को प्रभावी बनाती है । भारतीय नागरिक सेवा विधिगत, पदसोपनीयता, श्रम विभाजन एवं स्वामी व सेवक सिद्धांत पर आधारित है । भारतीय नागरिक सेवा क्षेत्रीय विशिष्टता और एकीकरण पर आधारित है , अर्थात प्रांतीय नागरिक सेवा को उस क्षेत्र की वास्तुस्थिति एवं आवश्यकता को ध्यान में रखकर प्रारूपीत किया गया है । जबकि दूसरी ओर अखिल भारतीय नागरिक सेवकों के माध्यम से संपूर्ण देश के प्रशासन को एकीकृत करने का प्रयास किया गया है । नागरिक सेवकों की चुनौतियाँ : भारत में नागरिक सेवकों के अंदर व्यावसायिकता , दक्षता एवं कार्य के प्रति लगनशीलता में कमी पाई जाती है । अतिनियमबद्धता नागरिक सेवकों को नीरस बनाती है, जिससे उनके अंदर नवीनता की प्रवृति कमजोर हो जाती है और नागरिक सेवक कुंठित हो जाते हैं । भारत में नागरिक हस्तक्षेप, मनमाना स्थानांतरण एवं कार्यकाल की अनिश्चित्ता अपने आप में एक जटिलता बनी हुई है । भारत में petrimoniyalism पाया जाता है, जिससे नागरिक सेवक हमेशा स्वयं को अधीनता की स्थिति में पाते हैं । अच्छे व ईमानदार नागरिक सेवकों के प्रोत्साहन हेतु योजनाओं की कमी पाई जाती है । सुझाव : नागरिक सेवकों की भूमिका को सकारात्मक बनाने के लिए नागरिक सेवकों का लोगों के प्रति उत्तरदायित्व बढ़ाने की आवश्यकता है । दायित्वों का निर्वहन प्रवृति के अनुकूल बदलने की व्यवस्था होनी चाहिए । प्रवृति परीक्षण के लिए स्वतंत्र संस्थाओं का निर्माण होना चाहिए । नागरिक सेवकों के तैनातीकरण का कार्यकाल निर्धारित करने का उपबंध होना चाहिए , हालांकि arc- 2 की रिपोर्ट व सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार इस दिशा में काम करना आरंभ कर दिया है । अच्छे, कुशल और ईमानदार नागरिक सेवकों को प्रोत्साहीत करने के लिए प्रोत्साहनात्मक योजना की आवश्यकता है ।
##Question:भारत में नागरिक सेवकों की भूमिका की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । साथ ही इससे संबंधित प्रमुख समस्याओं व सुधार के कुछ सुझाव प्रस्तुत कीजिए । ( 150-200 शब्द ) Briefly discuss the role of civil servants in India. Also discussing the major problems related to it and suggest some remedies for improvement. (150-200 words) ##Answer:दृष्टिकोण : नागरिक सेवा की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । भारत में नागरिक सेवकों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । भारत में नागरिक सेवकों से संबंधित प्रमुख समस्याओं की चर्चा कीजिए । नागरिक सेवा में सुधार के कुछ प्रमुख उपाय बताइए । उत्तर : प्रशासन के नागरिक पक्ष में प्रमाणित व्यक्ति जिसकी नियुक्ति, पद या नियोजन नियुक्त और नियोक्ता के बीच स्वामी और सेवक सिद्धांत पर आधारित हो तथा ऐसा व्यक्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नागरिकों के कल्याण से संबद्ध हो । अमेरिका व भारत की नागरिक सेवा में अंतर । भारत में नागरिक सेवा का विकास : अनुच्छेद 309, 310, 311, 312 । नागरिक सेवकों की नियुक्ति के संबंध में संसद/विधानमंडल अधिनियम पारित करके नियुक्ति प्रक्रिया को निर्धारित करे । बिना नियम/अधिनियम निर्मित किए राष्ट्रपति व राज्यपाल द्वारा नियुक्ति की जा सकती है । भारतीय नागरिक सेवा की विशेषताएं : किसी भी लोकतंत्र में मंत्री संसद के माध्यम से लोगों के प्रति जिम्मेदार होता और सिविल सेवक मंत्री के प्रति जवाबदेह होता है । एक निष्पक्ष नागरिक सेवा न केवल तात्कालिक सरकार के प्रति उत्तरदायी है , अपितु यह देश के संविधान के प्रति भी उत्तरदायी होते हैं । भारतीय नागरिक सेवा अपेक्षित योग्यता, ज्ञान और अनुभव पर आधारित होती है , यह अमेरिका की स्पॉइल व्यवस्था से भिन्न निष्पक्ष व स्थायी होती है । एक स्थायी नागरिक सेवा निरंतरता प्रदान करती है और विशेषज्ञता के साथ-साथ नीति निर्माण, नीतियों के क्रियान्वयन एवं निर्णय निर्माण को प्रभावी बनाती है । भारतीय नागरिक सेवा विधिगत, पदसोपनीयता, श्रम विभाजन एवं स्वामी व सेवक सिद्धांत पर आधारित है । भारतीय नागरिक सेवा क्षेत्रीय विशिष्टता और एकीकरण पर आधारित है , अर्थात प्रांतीय नागरिक सेवा को उस क्षेत्र की वास्तुस्थिति एवं आवश्यकता को ध्यान में रखकर प्रारूपीत किया गया है । जबकि दूसरी ओर अखिल भारतीय नागरिक सेवकों के माध्यम से संपूर्ण देश के प्रशासन को एकीकृत करने का प्रयास किया गया है । नागरिक सेवकों की चुनौतियाँ : भारत में नागरिक सेवकों के अंदर व्यावसायिकता , दक्षता एवं कार्य के प्रति लगनशीलता में कमी पाई जाती है । अतिनियमबद्धता नागरिक सेवकों को नीरस बनाती है, जिससे उनके अंदर नवीनता की प्रवृति कमजोर हो जाती है और नागरिक सेवक कुंठित हो जाते हैं । भारत में नागरिक हस्तक्षेप, मनमाना स्थानांतरण एवं कार्यकाल की अनिश्चित्ता अपने आप में एक जटिलता बनी हुई है । भारत में petrimoniyalism पाया जाता है, जिससे नागरिक सेवक हमेशा स्वयं को अधीनता की स्थिति में पाते हैं । अच्छे व ईमानदार नागरिक सेवकों के प्रोत्साहन हेतु योजनाओं की कमी पाई जाती है । सुझाव : नागरिक सेवकों की भूमिका को सकारात्मक बनाने के लिए नागरिक सेवकों का लोगों के प्रति उत्तरदायित्व बढ़ाने की आवश्यकता है । दायित्वों का निर्वहन प्रवृति के अनुकूल बदलने की व्यवस्था होनी चाहिए । प्रवृति परीक्षण के लिए स्वतंत्र संस्थाओं का निर्माण होना चाहिए । नागरिक सेवकों के तैनातीकरण का कार्यकाल निर्धारित करने का उपबंध होना चाहिए , हालांकि arc- 2 की रिपोर्ट व सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार इस दिशा में काम करना आरंभ कर दिया है । अच्छे, कुशल और ईमानदार नागरिक सेवकों को प्रोत्साहीत करने के लिए प्रोत्साहनात्मक योजना की आवश्यकता है ।
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उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय की संरचना एवं अधिकारों की तुलना कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) Compare the structure and functions of the supreme court and the high court. (150-200 words/10 marks)
Approach: भूमिका में भारतीय न्यायपालिका तथा HC, SC की चर्चा कर सकते हैं। दोनों की तुलना बिंदुवत प्रस्तुत कर सकते हैं। निष्कर्ष में संक्षिप्त में उच्चतर न्यायपालिका के महत्व की चर्चा की जा सकती है। उत्तर: भारत में एकीकृत न्यायपालिका की अवधारणा को अपनाया गया है। जिसके शीर्ष पर सर्वोच्च न्यायालय तथा राज्य स्तर पर उच्च न्यायालय की व्यवस्था की गयी है। इन्हे सम्मिलित रूप से उच्चतर न्यायपालिका भी कहा जाता है। उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय की संरचना एवं अधिकारों की तुलना: न्यायाधीशों की संख्या उच्चतम न्यायालय हेतु अनु. 124 के तहत, बढ़ाने की शक्ति संसद के पास सुरक्षित है। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाती है। उच्चतम न्यायालय में केवल मुख्य न्यायाधीश ही कार्यवाहक हो सकता है जबकि उच्च न्यायालय में कोई भी कार्यवाहक हो सकता है। उच्चतम न्यायालय में अतिरिक्त न्यायाधीश की कोई भी व्यवस्था नहीं है जबकि उच्च न्यायालय में 2 वर्ष के लिए अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त करने की व्यवस्था है। उच्चतम न्यायालय में यदि संवैधानिक पीठ बनाने के लिए जजों की संख्या कम हो जाती है तो HC के किसी वरिष्ठ जज कुछ समय के लिए इस गणपूर्ति के लिए तदर्थ जज नियुक्त किया जा सकता है। HC में ऐसी व्यवस्था नहीं है। अनु. 141 के अंतर्गत SC के द्वारा दिये गए फैसले HC सहित भारत की सभी अदालतों पर लागू होते हैं। फैसले को नहीं मानना न्यायालय की अवमानना माना जाएगा। अनु. 215 के अंतर्गत केवल अपने क्षेत्राधिकार में आने वाली अधीनस्थ अदालतों आदि पर इसे लागू कर सकता है। अनु. 145(1) के तहत संवैधानिक पीठ का गठन केवल सर्वोच्च न्यायालय में होता है जिसमें कम से कम 5 न्यायाधीश होते हैं। अनु. 124(3) के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए एक अर्हता प्रख्यात विधिवेत्ता की भी है। अनु. 217 के अंतर्गत HC के जज लिए ऐसी कोई भी योग्यता निर्धारित नहीं है। SC के पास अनु. 136 के तहत विशेष अवकाश याचिका के आधार पर सुनवाई का अधिकार है। HC के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं है। संविधान सम्मत अथवा विधि सम्मत किसी प्रश्न की व्याख्या का अधिकार केवल SC के पास है। SC की आधिकारिता HC की तुलना में अधिक व्यापक होती है। रिट के मामलों में जहां सर्वोच्च न्यायालय की अधिकारिता केवल मूल अधिकारों से जुड़ी है तो वहीं उच्च न्यायालय की अधिकारिता अन्य विधिक मामलों से भी जुड़ी है। वस्तुत: सर्वोच्च न्यायालय की शक्तियाँ तथा क्षेत्राधिकार उच्च न्यायालय से अधिक होते हैं। फिर भी उच्च न्यायालय को सर्वोच्च न्यायालय का अधीनस्थ नहीं बनाया गया है। यह राज्य स्तर पर स्वतंत्र रूप से कार्य करता है।
##Question:उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय की संरचना एवं अधिकारों की तुलना कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) Compare the structure and functions of the supreme court and the high court. (150-200 words/10 marks)##Answer:Approach: भूमिका में भारतीय न्यायपालिका तथा HC, SC की चर्चा कर सकते हैं। दोनों की तुलना बिंदुवत प्रस्तुत कर सकते हैं। निष्कर्ष में संक्षिप्त में उच्चतर न्यायपालिका के महत्व की चर्चा की जा सकती है। उत्तर: भारत में एकीकृत न्यायपालिका की अवधारणा को अपनाया गया है। जिसके शीर्ष पर सर्वोच्च न्यायालय तथा राज्य स्तर पर उच्च न्यायालय की व्यवस्था की गयी है। इन्हे सम्मिलित रूप से उच्चतर न्यायपालिका भी कहा जाता है। उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय की संरचना एवं अधिकारों की तुलना: न्यायाधीशों की संख्या उच्चतम न्यायालय हेतु अनु. 124 के तहत, बढ़ाने की शक्ति संसद के पास सुरक्षित है। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाती है। उच्चतम न्यायालय में केवल मुख्य न्यायाधीश ही कार्यवाहक हो सकता है जबकि उच्च न्यायालय में कोई भी कार्यवाहक हो सकता है। उच्चतम न्यायालय में अतिरिक्त न्यायाधीश की कोई भी व्यवस्था नहीं है जबकि उच्च न्यायालय में 2 वर्ष के लिए अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त करने की व्यवस्था है। उच्चतम न्यायालय में यदि संवैधानिक पीठ बनाने के लिए जजों की संख्या कम हो जाती है तो HC के किसी वरिष्ठ जज कुछ समय के लिए इस गणपूर्ति के लिए तदर्थ जज नियुक्त किया जा सकता है। HC में ऐसी व्यवस्था नहीं है। अनु. 141 के अंतर्गत SC के द्वारा दिये गए फैसले HC सहित भारत की सभी अदालतों पर लागू होते हैं। फैसले को नहीं मानना न्यायालय की अवमानना माना जाएगा। अनु. 215 के अंतर्गत केवल अपने क्षेत्राधिकार में आने वाली अधीनस्थ अदालतों आदि पर इसे लागू कर सकता है। अनु. 145(1) के तहत संवैधानिक पीठ का गठन केवल सर्वोच्च न्यायालय में होता है जिसमें कम से कम 5 न्यायाधीश होते हैं। अनु. 124(3) के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए एक अर्हता प्रख्यात विधिवेत्ता की भी है। अनु. 217 के अंतर्गत HC के जज लिए ऐसी कोई भी योग्यता निर्धारित नहीं है। SC के पास अनु. 136 के तहत विशेष अवकाश याचिका के आधार पर सुनवाई का अधिकार है। HC के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं है। संविधान सम्मत अथवा विधि सम्मत किसी प्रश्न की व्याख्या का अधिकार केवल SC के पास है। SC की आधिकारिता HC की तुलना में अधिक व्यापक होती है। रिट के मामलों में जहां सर्वोच्च न्यायालय की अधिकारिता केवल मूल अधिकारों से जुड़ी है तो वहीं उच्च न्यायालय की अधिकारिता अन्य विधिक मामलों से भी जुड़ी है। वस्तुत: सर्वोच्च न्यायालय की शक्तियाँ तथा क्षेत्राधिकार उच्च न्यायालय से अधिक होते हैं। फिर भी उच्च न्यायालय को सर्वोच्च न्यायालय का अधीनस्थ नहीं बनाया गया है। यह राज्य स्तर पर स्वतंत्र रूप से कार्य करता है।
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ई-शासन से आप क्या समझते हैं ? भारत में हाल के वर्षों में ई-शासन के लिए उठाए गए कुछ प्रमुख कदमों की चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द, अंक-10 ) What do you understand by e-governance? Discuss some of the major steps taken for e-governance in India in recent years. (150-200 words, marks -10 )
दृष्टिकोण: 1. भूमिका में ई-शासन की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये| 2. हाल के वर्षों में ई-शासन के लिए उठाए गए कुछ प्रमुख कदमों की चर्चा कीजिए| 3. संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: सरकार की आम नागरिकों के लिए उपलब्ध सुविधाओं को इंटरनेट के माध्यम से उपलब्ध कराना ई-गवर्नेंस या ई-शासन कहलाता है। इसके अंतर्गत शासकीय सेवाएँ और सूचनाएँ ऑनलाइन उपलब्ध होती हैं। भारत सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक विभाग की स्थापना 1970 में की और 1977 में नेशनल इंफ़ॉर्मेटिक्स सेंटर की स्थापना ई-शासन की दिशा में पहला कदम था। ई-गवर्नेंस के मुख्य लक्ष्य :- नागरिकों को बेहतर सेवा प्रदायगी पारदर्शिता और जवाबदेही का आरंभ सूचना के जरिए लोगों का सशक्तिकरण सरकारों के भीतर बेहतर दक्षता व्यावसाय और उद्योग के साथ बेहतर कार्यकलाप ई-शासन के लिए उठाए गए प्रमुख कदमों :- राष्ट्रीय ई-शासन योजना: राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना (NeGP) को 2006 में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग (DEITY) और प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग (DARPG) द्वारा तैयार किया गया है। एनजीपी का उद्देश्य निम्नलिखित सेवाओं के साथ नागरिकों और व्यवसायों को सरकारी सेवाओं की डिलीवरी में सुधार करना है: “सभी सरकारी सेवाओं को अपने इलाके में आम आदमी के लिए सुलभ बनाना, आम सेवा वितरण आउटलेट्स के माध्यम से और सस्ती लागत पर ऐसी सेवाओं की दक्षता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना। आम आदमी की बुनियादी जरूरतों को महसूस करना। " नागरिक से सरकार (G2C) पहल: भूमि अभिलेखों का कम्प्यूटरीकरण: एनआईसी के सहयोग से। यह सुनिश्चित करना कि भूस्वामियों को मांग पर स्वामित्व, फसल और किरायेदारी और रिकॉर्ड्स ऑफ राइट्स (RoRs) की कम्प्यूटरीकृत प्रतियां प्राप्त हों। Gyandoot: यह इंट्रानेट-आधारित सरकार से नागरिक (G2C) सेवा वितरण पहल है। इसकी शुरुआत जनवरी 2000 में मध्य प्रदेश के धार जिले में हुई थी, जिसका उद्देश्य ग्रामीण आबादी को प्रासंगिक जानकारी प्रदान करना और जिला प्रशासन और लोगों के बीच एक इंटरफेस के रूप में कार्य करना था। उत्तर प्रदेश में लोकवाणी परियोजना| केरल में परियोजना के मित्र: FRIENDS (तेज, विश्वसनीय, त्वरित, सेवाओं के संवितरण के लिए दक्ष नेटवर्क) राजस्थान में ई-मित्रा परियोजना| व्यवसाय से सरकार (G2B) पहल: आंध्र प्रदेश और गुजरात में ई-प्रोक्योरमेंट प्रोजेक्ट: विक्रेताओं और सरकार दोनों के लिए व्यापार करने का समय और लागत कम करना। MCA 21: कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय द्वारा। इस परियोजना का उद्देश्य किसी भी समय कॉरपोरेट और अन्य हितधारकों को कॉर्पोरेट मामलों के केंद्रीय मंत्रालय द्वारा प्रदान की जाने वाली सभी रजिस्ट्री से संबंधित सेवाओं के लिए आसान और सुरक्षित ऑनलाइन पहुँच प्रदान करना है| सरकार से सरकार (G2G) पहल: .कर्नाटक में खाजाने परियोजना: यह कर्नाटक सरकार की एक व्यापक ऑनलाइन राजकोषीय कम्प्यूटरीकरण परियोजना SmartGov (आंध्र प्रदेश): SmartGov को संचालन को सुव्यवस्थित करने, आंध्र प्रदेश सचिवालय में कार्यान्वयन के लिए कार्य प्रवाह स्वचालन और ज्ञान प्रबंधन के माध्यम से दक्षता बढ़ाने के लिए विकसित किया गया है।
##Question:ई-शासन से आप क्या समझते हैं ? भारत में हाल के वर्षों में ई-शासन के लिए उठाए गए कुछ प्रमुख कदमों की चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द, अंक-10 ) What do you understand by e-governance? Discuss some of the major steps taken for e-governance in India in recent years. (150-200 words, marks -10 )##Answer:दृष्टिकोण: 1. भूमिका में ई-शासन की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये| 2. हाल के वर्षों में ई-शासन के लिए उठाए गए कुछ प्रमुख कदमों की चर्चा कीजिए| 3. संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: सरकार की आम नागरिकों के लिए उपलब्ध सुविधाओं को इंटरनेट के माध्यम से उपलब्ध कराना ई-गवर्नेंस या ई-शासन कहलाता है। इसके अंतर्गत शासकीय सेवाएँ और सूचनाएँ ऑनलाइन उपलब्ध होती हैं। भारत सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक विभाग की स्थापना 1970 में की और 1977 में नेशनल इंफ़ॉर्मेटिक्स सेंटर की स्थापना ई-शासन की दिशा में पहला कदम था। ई-गवर्नेंस के मुख्य लक्ष्य :- नागरिकों को बेहतर सेवा प्रदायगी पारदर्शिता और जवाबदेही का आरंभ सूचना के जरिए लोगों का सशक्तिकरण सरकारों के भीतर बेहतर दक्षता व्यावसाय और उद्योग के साथ बेहतर कार्यकलाप ई-शासन के लिए उठाए गए प्रमुख कदमों :- राष्ट्रीय ई-शासन योजना: राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना (NeGP) को 2006 में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग (DEITY) और प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग (DARPG) द्वारा तैयार किया गया है। एनजीपी का उद्देश्य निम्नलिखित सेवाओं के साथ नागरिकों और व्यवसायों को सरकारी सेवाओं की डिलीवरी में सुधार करना है: “सभी सरकारी सेवाओं को अपने इलाके में आम आदमी के लिए सुलभ बनाना, आम सेवा वितरण आउटलेट्स के माध्यम से और सस्ती लागत पर ऐसी सेवाओं की दक्षता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना। आम आदमी की बुनियादी जरूरतों को महसूस करना। " नागरिक से सरकार (G2C) पहल: भूमि अभिलेखों का कम्प्यूटरीकरण: एनआईसी के सहयोग से। यह सुनिश्चित करना कि भूस्वामियों को मांग पर स्वामित्व, फसल और किरायेदारी और रिकॉर्ड्स ऑफ राइट्स (RoRs) की कम्प्यूटरीकृत प्रतियां प्राप्त हों। Gyandoot: यह इंट्रानेट-आधारित सरकार से नागरिक (G2C) सेवा वितरण पहल है। इसकी शुरुआत जनवरी 2000 में मध्य प्रदेश के धार जिले में हुई थी, जिसका उद्देश्य ग्रामीण आबादी को प्रासंगिक जानकारी प्रदान करना और जिला प्रशासन और लोगों के बीच एक इंटरफेस के रूप में कार्य करना था। उत्तर प्रदेश में लोकवाणी परियोजना| केरल में परियोजना के मित्र: FRIENDS (तेज, विश्वसनीय, त्वरित, सेवाओं के संवितरण के लिए दक्ष नेटवर्क) राजस्थान में ई-मित्रा परियोजना| व्यवसाय से सरकार (G2B) पहल: आंध्र प्रदेश और गुजरात में ई-प्रोक्योरमेंट प्रोजेक्ट: विक्रेताओं और सरकार दोनों के लिए व्यापार करने का समय और लागत कम करना। MCA 21: कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय द्वारा। इस परियोजना का उद्देश्य किसी भी समय कॉरपोरेट और अन्य हितधारकों को कॉर्पोरेट मामलों के केंद्रीय मंत्रालय द्वारा प्रदान की जाने वाली सभी रजिस्ट्री से संबंधित सेवाओं के लिए आसान और सुरक्षित ऑनलाइन पहुँच प्रदान करना है| सरकार से सरकार (G2G) पहल: .कर्नाटक में खाजाने परियोजना: यह कर्नाटक सरकार की एक व्यापक ऑनलाइन राजकोषीय कम्प्यूटरीकरण परियोजना SmartGov (आंध्र प्रदेश): SmartGov को संचालन को सुव्यवस्थित करने, आंध्र प्रदेश सचिवालय में कार्यान्वयन के लिए कार्य प्रवाह स्वचालन और ज्ञान प्रबंधन के माध्यम से दक्षता बढ़ाने के लिए विकसित किया गया है।
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कार्पोरेट गवर्नेंस की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए भारत में इसकी आवश्यकता एवं चुनौतियों पर चर्चा कीजिये|(150-200 शब्द; 10 अंक ) Explain the concept of corporate governance and discuss its need and challenges in India. (150-200 words; 10 Marks)
दृष्टिकोण- 1. भूमिका में कार्पोरेट गुड गवर्नेंस की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये| 2. भारत मेंकार्पोरेट गुड गवर्नेंसकी आवश्यकता के सन्दर्भ में चर्चा कीजिये| 3. कार्पोरेट गुड गवर्नेंस की स्थापना में आने वाली चुनौतियों की चर्चा कीजिये| उत्तर- कार्पोरेट गवर्नेंस ऐसा गवर्नंस जिसके माध्यम सेसंस्थाओं का संचालन, विभिन्न हितधारकों के अधिकारों केहितों की रक्षा,दायित्वों का निर्धारणएवं कार्पोरेट के शेयर धारकों कीसंपत्ति में वृद्दिके उद्देश्य से संचालित किया जाता है| भारत में कार्पोरेटगवर्नेंसकी आवश्यकता 1. भारत में कार्पोरेट जगत को संचालित करने के लिए उपयुक्त कानूनों विनियामक प्रणालियों तथा प्रवर्तन क्षमताओं को पूरी तरह विकसित नहीं हो पायी हैं| 2. निजी क्षेत्र की संस्थाएं विकसित देशीं की भांति व्यवस्थित नहीं हैं| 3. भारत में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व का अभाव कार्पोरेट जगत में भी पाया जाता है| 4. भारत में मानदंडों का प्रकटीकरण हेतु उपयुक्त नियम निर्धारित नही किये गए हैं| 5. कम्पनी के संचालन कर्ताओं द्वारा खातों की गलत जानकारी देना एक बड़ी समस्या है| 6. भारतीय बाजार में अवैध कंपनियों की बड़ी संख्या, कार्पोरेट जगत की विश्वनीयता को कमजोर कर देती है| 7. कार्पोरेट की जवाबदेहिता, विश्वसनीयता को बढाने एवं उसे अनुक्रियाशील बनाने के लिए| चुनौतियाँ 1. कार्पोरेट जगत में धोखाधडी विद्यमान है| 2. निवेशकों में विश्वास का अभाव| 3. बड़े शेयर धारक विशेषकर एक्टिंग शेयरधारक(BOD) कार्पोरेट के ऊपर अपना शिकंजा स्थापित कर लेते हैं और उनके द्वारा निर्धारित की गयी नीतियाँ उनके हितों को अपेक्षाकृत अधिक तरजीह प्रदान करते हैं| 4. शेयरधारकों की रक्षा हेतु उपयुक्त कानूनों की कमी है| 5. भारतीय लोगों के अन्दर भ्रष्टाचार के प्रति व्यापक सहनशीलता विद्यमान है| 6. यहाँ मानवीय मूल्यों के प्रति कार्पोरेट जगत स्वैच्छिक रूप में उत्तरदायित्वों का निर्वहन नहीं करता जैसे- पर्यावरण के प्रति सक्रियता का भाव| 7. भारत में कार्पोरेट वस्तु उत्पादन में नैतिकता के विपरीत कदम उठाता है; वस्तुओं में मिलावट इसका उदाहरण है| कार्पोरेट गुड गवर्नेंस कार्पोरेट क्षेत्रक को अधिक उत्पादक बनाने में सहायक सिद्ध साबित होगा| सरकार के द्वारा इस दिशा में कोटक पैनल को गठित किया जिसकी अनुशंसाएं प्रभावी हैं|
##Question:कार्पोरेट गवर्नेंस की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए भारत में इसकी आवश्यकता एवं चुनौतियों पर चर्चा कीजिये|(150-200 शब्द; 10 अंक ) Explain the concept of corporate governance and discuss its need and challenges in India. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण- 1. भूमिका में कार्पोरेट गुड गवर्नेंस की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये| 2. भारत मेंकार्पोरेट गुड गवर्नेंसकी आवश्यकता के सन्दर्भ में चर्चा कीजिये| 3. कार्पोरेट गुड गवर्नेंस की स्थापना में आने वाली चुनौतियों की चर्चा कीजिये| उत्तर- कार्पोरेट गवर्नेंस ऐसा गवर्नंस जिसके माध्यम सेसंस्थाओं का संचालन, विभिन्न हितधारकों के अधिकारों केहितों की रक्षा,दायित्वों का निर्धारणएवं कार्पोरेट के शेयर धारकों कीसंपत्ति में वृद्दिके उद्देश्य से संचालित किया जाता है| भारत में कार्पोरेटगवर्नेंसकी आवश्यकता 1. भारत में कार्पोरेट जगत को संचालित करने के लिए उपयुक्त कानूनों विनियामक प्रणालियों तथा प्रवर्तन क्षमताओं को पूरी तरह विकसित नहीं हो पायी हैं| 2. निजी क्षेत्र की संस्थाएं विकसित देशीं की भांति व्यवस्थित नहीं हैं| 3. भारत में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व का अभाव कार्पोरेट जगत में भी पाया जाता है| 4. भारत में मानदंडों का प्रकटीकरण हेतु उपयुक्त नियम निर्धारित नही किये गए हैं| 5. कम्पनी के संचालन कर्ताओं द्वारा खातों की गलत जानकारी देना एक बड़ी समस्या है| 6. भारतीय बाजार में अवैध कंपनियों की बड़ी संख्या, कार्पोरेट जगत की विश्वनीयता को कमजोर कर देती है| 7. कार्पोरेट की जवाबदेहिता, विश्वसनीयता को बढाने एवं उसे अनुक्रियाशील बनाने के लिए| चुनौतियाँ 1. कार्पोरेट जगत में धोखाधडी विद्यमान है| 2. निवेशकों में विश्वास का अभाव| 3. बड़े शेयर धारक विशेषकर एक्टिंग शेयरधारक(BOD) कार्पोरेट के ऊपर अपना शिकंजा स्थापित कर लेते हैं और उनके द्वारा निर्धारित की गयी नीतियाँ उनके हितों को अपेक्षाकृत अधिक तरजीह प्रदान करते हैं| 4. शेयरधारकों की रक्षा हेतु उपयुक्त कानूनों की कमी है| 5. भारतीय लोगों के अन्दर भ्रष्टाचार के प्रति व्यापक सहनशीलता विद्यमान है| 6. यहाँ मानवीय मूल्यों के प्रति कार्पोरेट जगत स्वैच्छिक रूप में उत्तरदायित्वों का निर्वहन नहीं करता जैसे- पर्यावरण के प्रति सक्रियता का भाव| 7. भारत में कार्पोरेट वस्तु उत्पादन में नैतिकता के विपरीत कदम उठाता है; वस्तुओं में मिलावट इसका उदाहरण है| कार्पोरेट गुड गवर्नेंस कार्पोरेट क्षेत्रक को अधिक उत्पादक बनाने में सहायक सिद्ध साबित होगा| सरकार के द्वारा इस दिशा में कोटक पैनल को गठित किया जिसकी अनुशंसाएं प्रभावी हैं|
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भारतीय विदेश नीति में हिंद महासागर एक महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में उभरा है| साथ ही, विश्व की प्रमुख शक्तियों के लिए भी इसकी महत्ता बढ़ी है| इस संदर्भ में, हिंद महासागर के महत्व की चर्चा वैश्विक परिदृश्य तथा भारत के संदर्भ में गिनाईये| (150-200 शब्द , अंक -10 ) Indian Ocean has emerged as an important area in Indian foreign policy. Also, its importance has increased for the major powers of the world. In this context, discuss the importance of the Indian Ocean in the context of the global scenario and India. (150-200 words , marks - 10 )
एप्रोच- हिंद महासागर की अवस्थिति तथा भारतीय विदेश नीति में इसकी महता के बारे में बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| (NOTE- हिंद महासागर का एक छोटा मैप देना प्रभावी सिद्ध हो सकता है) उत्तर के पहले भाग में, विश्व की प्रमुख शक्तियों के लिए हिंद महासागर का महत्व बताईये| अंतिम भाग में, भारत के संदर्भ में हिंद महासागर के महत्व की चर्चा बिंदुबार कीजिये| निष्कर्षतः, इस संदर्भ में भारत के समक्ष कुछ चुनौतियों तथा भारत द्वारा उठाये गये क़दमों का जिक्र संक्षिप्तता से कीजिये| उत्तर- हिंद महासागर अफ्रीका के दक्षिणी छोर से ऑस्ट्रेलिया के बीच तथा दक्षिणी एवं दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों तक विस्तृत है| यह सांस्कृतिक विविधता और भाषाओँ, धर्मों, परम्पराओं, कलाओं और व्यंजनों की समृद्धता से भरपूर हैं| यह भारत के लिए भू-राजनीतिक तथा भू-रणनीतिक रूप से भी काफी महत्वपूर्ण स्थान रखता है| विश्व का यह एकमात्र ऐसा महासागर है जिसका नाम किसी देश के नाम पर रखा गया है| इस तरह से यह स्वाभाविक रूप से हमारी विदेश नीति में अहम् स्थान रखता है| साथ ही, भारत की लगभग 7500 किमी तटीय रेखा होने के कारण भी इसका एक प्रमुख स्थान है| विश्व कीप्रमुख शक्तियों के लिए हिंद महासागर का महत्व यह विश्व की एक-तिहाई जनसँख्या से व्यापार की असीम संभावना प्रदान करता है| यह मध्य-पूर्व, अफ्रीका और पूर्वी एशिया को यूरोप और अमेरिका के साथ जोड़ने वाला प्रमुख समुद्री मार्ग प्रदान करता है| यह एक तिहाई माल परिवहन और लगभग आधे कंटेनर यातायात के लिए उत्तरदायी; विश्व का 80% सागर तेल व्यापार; खासकर फारस की खाड़ी तथा इण्डोनेशियाई तेल क्षेत्रों से पेट्रोलियम तथा पेट्रो-उत्पादों के परिवहन के संदर्भ में; चार महत्वपूर्ण चोक पॉइंट्स - मलक्का जलसंधि क्षेत्र, बाब-अल-मंडप, होर्मुज, स्वेज नहर की समुद्री नौपरिवहन की भूमिका; कई महत्वपूर्ण मत्स्यन क्षेत्र जिससे झींगा तथा टूना मछली का दोहन; सऊदी अरब, ईरान, भारत और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के अपतटीय क्षेत्रों में हाइड्रोकार्बन के बड़े भण्डार; विश्व का 40% तेल एवं गैस जिससे ऊर्जा सुरक्षा हेतु महत्वपूर्ण; सीमावर्ती राष्ट्रों द्वारा भारी खनिजों में समृद्ध समुद्र तटीय रेत और अपतटीय प्लेसर निक्षेपों का सक्रीय रूप से दोहन; महत्वपूर्ण बंदरगाहों की उपस्थिति; सोमालिया तथा समुद्री लुटेरे; अमेरिका का दुबारा इस क्षेत्र में बढ़ती रूचि; ईरान की समस्या से अमेरिका द्वारा प्रभाव बढ़ाने की भूमिका; पश्चिमी एशिया के देशों में बाहरी शक्तियों की भूमिका; जैसे- इराक़; सूडान समस्या; श्रीलंका- लिट्टे, UNHRC विवाद; चीन के बढ़ते प्रभाव से अन्य शक्तियों की इस क्षेत्र में रूचि; पाकिस्तान; भारत के लिए हिंद महासागर की महता हिंद महासागर का बढ़ता हुआ महत्व; सामरिक एवं सैन्य महत्व; भारतीय समुद्री सुरक्षा रणनीति, 2015 के अनुसार भारत इस क्षेत्र में "निवल सुरक्षा प्रदाता" के रूप में अपनी भूमिका देखता है| व्यापारिक दृष्टिकोण से - भारत का 95% से ज्यादा व्यापार(वजन के हिसाब से); ऊर्जा सुरक्षा- 70% से ज्यादा आयातित तेल पश्चिमी एशिया से; अमेरिका से शेल गैस/LNG; नाइजीरिया, वेनेजुएला से तेल आपूर्ति; पॉलिमेटालिक न्यूडल्स तथा खनिजों के भण्डार; रणनीतिक महत्व - चाबहार, मालदीव, अफ्रीका, श्रीलंका में भारतीय निवेश की सुरक्षा; अफ्रीका तक अपनी पहुँच बढ़ाने हेतु; बिम्सटेक, IORA जैसे सहयोग के आयाम; मेरीटाइम सुरक्षा - काउंटर पायरेसी; लंबा तटीय क्षेत्र- आतंकवादरोधी अभियान; ड्रग्स, मानव तथा आर्म्स तस्करी; आपदा के क्षेत्र में - साइक्लोन; ज्वालामुखी; सुनामी; स्पेस-डिप्लोमेसी; बड़ा अनन्य आर्थिक क्षेत्र(EEZ)से संसाधनों का दोहन; पॉलिमेटालिक न्यूडल्स; सीबेड संसाधन; शैवाल संसाधन; डीप सागर मत्स्यन; हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ते रणनीतिक मुद्दों के संदर्भ में- भारत एवं चीन के प्रतिस्पर्धी हित; भारत एवं पाकिस्तान के बीच नाभिकीय टकराव की संभावना को लेकर; इराक एवं अफगानिस्तान में अमेरिका का हस्तक्षेप; बढ़ती पायरेसी की घटनाएँ; हिंद महासागर क्षेत्र में संसाधन प्रबंधन; कोरल्स तथा जलवायु परिवर्तन प्रभाव; चीन की आक्रामक सॉफ्ट पॉवर डिप्लोमेसी तथा अमेरिका का रणनीतिक प्रत्युतर(पाइवोट एशिया पालिसी); क्वाड; मालाबार आदि के संदर्भ में; क्लाइमेट रिफ्यूजी जैसे आयामों को लेकर; उपरोक्त आयामों के साथ-साथ हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के लिए कई चुनौतियाँ भी हैं जैसे- ओबोर तथा समुद्री सिल्क रूट; आतंकवादी हमलें; मोतियों की माला(स्प्रिंग ऑफ पर्ल्स); पायरेसी की बढ़ती घटनाएँ; क्लाइमेट रिफ्यूजी का मुद्दा; ड्रग्स, मानव तथा आर्म्स तस्करी आदि| इन मुद्दों/चुनौतियों के संदर्भ में हिंद महासागर के क्षेत्र में भारत द्वारा कई उद्देश्य एवं रणनीतियां अपनाई जा रही हैं जैसे- मेरीटाइम सिक्यूरिटी स्ट्रेटेजी, 2015; प्रोजेक्ट मौसम; एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर; सागर(SAGAR); कॉटन एवं स्पाइस रूट; प्रमुख सैन्य अभ्यास- मालाबार आदि; विभिन्न द्विपक्षीय द्विपक्षीय समझौतें- LEMOA आदि; विभिन्न क्षेत्रीय फ़ोरम- IORA; IONS आदि के माध्यम से सहयोग; हीरों की माला(Necklace of Diamonds) आदि |
##Question:भारतीय विदेश नीति में हिंद महासागर एक महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में उभरा है| साथ ही, विश्व की प्रमुख शक्तियों के लिए भी इसकी महत्ता बढ़ी है| इस संदर्भ में, हिंद महासागर के महत्व की चर्चा वैश्विक परिदृश्य तथा भारत के संदर्भ में गिनाईये| (150-200 शब्द , अंक -10 ) Indian Ocean has emerged as an important area in Indian foreign policy. Also, its importance has increased for the major powers of the world. In this context, discuss the importance of the Indian Ocean in the context of the global scenario and India. (150-200 words , marks - 10 )##Answer:एप्रोच- हिंद महासागर की अवस्थिति तथा भारतीय विदेश नीति में इसकी महता के बारे में बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| (NOTE- हिंद महासागर का एक छोटा मैप देना प्रभावी सिद्ध हो सकता है) उत्तर के पहले भाग में, विश्व की प्रमुख शक्तियों के लिए हिंद महासागर का महत्व बताईये| अंतिम भाग में, भारत के संदर्भ में हिंद महासागर के महत्व की चर्चा बिंदुबार कीजिये| निष्कर्षतः, इस संदर्भ में भारत के समक्ष कुछ चुनौतियों तथा भारत द्वारा उठाये गये क़दमों का जिक्र संक्षिप्तता से कीजिये| उत्तर- हिंद महासागर अफ्रीका के दक्षिणी छोर से ऑस्ट्रेलिया के बीच तथा दक्षिणी एवं दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों तक विस्तृत है| यह सांस्कृतिक विविधता और भाषाओँ, धर्मों, परम्पराओं, कलाओं और व्यंजनों की समृद्धता से भरपूर हैं| यह भारत के लिए भू-राजनीतिक तथा भू-रणनीतिक रूप से भी काफी महत्वपूर्ण स्थान रखता है| विश्व का यह एकमात्र ऐसा महासागर है जिसका नाम किसी देश के नाम पर रखा गया है| इस तरह से यह स्वाभाविक रूप से हमारी विदेश नीति में अहम् स्थान रखता है| साथ ही, भारत की लगभग 7500 किमी तटीय रेखा होने के कारण भी इसका एक प्रमुख स्थान है| विश्व कीप्रमुख शक्तियों के लिए हिंद महासागर का महत्व यह विश्व की एक-तिहाई जनसँख्या से व्यापार की असीम संभावना प्रदान करता है| यह मध्य-पूर्व, अफ्रीका और पूर्वी एशिया को यूरोप और अमेरिका के साथ जोड़ने वाला प्रमुख समुद्री मार्ग प्रदान करता है| यह एक तिहाई माल परिवहन और लगभग आधे कंटेनर यातायात के लिए उत्तरदायी; विश्व का 80% सागर तेल व्यापार; खासकर फारस की खाड़ी तथा इण्डोनेशियाई तेल क्षेत्रों से पेट्रोलियम तथा पेट्रो-उत्पादों के परिवहन के संदर्भ में; चार महत्वपूर्ण चोक पॉइंट्स - मलक्का जलसंधि क्षेत्र, बाब-अल-मंडप, होर्मुज, स्वेज नहर की समुद्री नौपरिवहन की भूमिका; कई महत्वपूर्ण मत्स्यन क्षेत्र जिससे झींगा तथा टूना मछली का दोहन; सऊदी अरब, ईरान, भारत और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के अपतटीय क्षेत्रों में हाइड्रोकार्बन के बड़े भण्डार; विश्व का 40% तेल एवं गैस जिससे ऊर्जा सुरक्षा हेतु महत्वपूर्ण; सीमावर्ती राष्ट्रों द्वारा भारी खनिजों में समृद्ध समुद्र तटीय रेत और अपतटीय प्लेसर निक्षेपों का सक्रीय रूप से दोहन; महत्वपूर्ण बंदरगाहों की उपस्थिति; सोमालिया तथा समुद्री लुटेरे; अमेरिका का दुबारा इस क्षेत्र में बढ़ती रूचि; ईरान की समस्या से अमेरिका द्वारा प्रभाव बढ़ाने की भूमिका; पश्चिमी एशिया के देशों में बाहरी शक्तियों की भूमिका; जैसे- इराक़; सूडान समस्या; श्रीलंका- लिट्टे, UNHRC विवाद; चीन के बढ़ते प्रभाव से अन्य शक्तियों की इस क्षेत्र में रूचि; पाकिस्तान; भारत के लिए हिंद महासागर की महता हिंद महासागर का बढ़ता हुआ महत्व; सामरिक एवं सैन्य महत्व; भारतीय समुद्री सुरक्षा रणनीति, 2015 के अनुसार भारत इस क्षेत्र में "निवल सुरक्षा प्रदाता" के रूप में अपनी भूमिका देखता है| व्यापारिक दृष्टिकोण से - भारत का 95% से ज्यादा व्यापार(वजन के हिसाब से); ऊर्जा सुरक्षा- 70% से ज्यादा आयातित तेल पश्चिमी एशिया से; अमेरिका से शेल गैस/LNG; नाइजीरिया, वेनेजुएला से तेल आपूर्ति; पॉलिमेटालिक न्यूडल्स तथा खनिजों के भण्डार; रणनीतिक महत्व - चाबहार, मालदीव, अफ्रीका, श्रीलंका में भारतीय निवेश की सुरक्षा; अफ्रीका तक अपनी पहुँच बढ़ाने हेतु; बिम्सटेक, IORA जैसे सहयोग के आयाम; मेरीटाइम सुरक्षा - काउंटर पायरेसी; लंबा तटीय क्षेत्र- आतंकवादरोधी अभियान; ड्रग्स, मानव तथा आर्म्स तस्करी; आपदा के क्षेत्र में - साइक्लोन; ज्वालामुखी; सुनामी; स्पेस-डिप्लोमेसी; बड़ा अनन्य आर्थिक क्षेत्र(EEZ)से संसाधनों का दोहन; पॉलिमेटालिक न्यूडल्स; सीबेड संसाधन; शैवाल संसाधन; डीप सागर मत्स्यन; हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ते रणनीतिक मुद्दों के संदर्भ में- भारत एवं चीन के प्रतिस्पर्धी हित; भारत एवं पाकिस्तान के बीच नाभिकीय टकराव की संभावना को लेकर; इराक एवं अफगानिस्तान में अमेरिका का हस्तक्षेप; बढ़ती पायरेसी की घटनाएँ; हिंद महासागर क्षेत्र में संसाधन प्रबंधन; कोरल्स तथा जलवायु परिवर्तन प्रभाव; चीन की आक्रामक सॉफ्ट पॉवर डिप्लोमेसी तथा अमेरिका का रणनीतिक प्रत्युतर(पाइवोट एशिया पालिसी); क्वाड; मालाबार आदि के संदर्भ में; क्लाइमेट रिफ्यूजी जैसे आयामों को लेकर; उपरोक्त आयामों के साथ-साथ हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के लिए कई चुनौतियाँ भी हैं जैसे- ओबोर तथा समुद्री सिल्क रूट; आतंकवादी हमलें; मोतियों की माला(स्प्रिंग ऑफ पर्ल्स); पायरेसी की बढ़ती घटनाएँ; क्लाइमेट रिफ्यूजी का मुद्दा; ड्रग्स, मानव तथा आर्म्स तस्करी आदि| इन मुद्दों/चुनौतियों के संदर्भ में हिंद महासागर के क्षेत्र में भारत द्वारा कई उद्देश्य एवं रणनीतियां अपनाई जा रही हैं जैसे- मेरीटाइम सिक्यूरिटी स्ट्रेटेजी, 2015; प्रोजेक्ट मौसम; एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर; सागर(SAGAR); कॉटन एवं स्पाइस रूट; प्रमुख सैन्य अभ्यास- मालाबार आदि; विभिन्न द्विपक्षीय द्विपक्षीय समझौतें- LEMOA आदि; विभिन्न क्षेत्रीय फ़ोरम- IORA; IONS आदि के माध्यम से सहयोग; हीरों की माला(Necklace of Diamonds) आदि |
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न्यायिक सक्रियतावाद से आप क्या समझते हैं? भारत में न्यायिक सक्रियतावाद का उदाहरण सहित आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by judicial activism. Critically analyse judical activism in India with examples. (150-200 words/ 10 marks)
Approach: न्यायिक सक्रियता को भूमिका में परिभाषित कीजिये। न्यायिक सक्रियता की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये। इसके पक्ष में उदाहरण सहित अपने तर्क प्रस्तुत कीजिये न्यायिक सक्रियता से जुड़ी चुनौतियों की चर्चा कीजिये। दोनों पक्षों के विश्लेषण से निष्कर्ष तक पहुंचिए। उत्तर- न्यायिक समीक्षा को एक सिद्धांत के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसके तहत न्यायपालिका द्वारा विधायिका और कार्यपालिका के कार्यों की समीक्षा की जाती है। नागरिक दुविधाओं को संबोधित करने और कानूनों के सकारात्मक और मानक पहलुओं के बीच अंतर को भरने के लिये न्यायपालिका अपने स्वविवेक और रचनात्मकता का प्रयोग कर न्याय निर्गमन करती है परिणामतः न्यायिक सक्रियता का उद्भव होता है।न्यायालय, न्यायिक समीक्षा द्वारा कार्यपालिका और विधायिका दोनों को नियंत्रित कर सकते हैं। भारत में न्यायिक सक्रियता के पक्ष में तर्क यह सरकारी तंत्र में चेक और बैलेन्स की एक प्रणाली प्रदान करती है। न्यायिक सक्रियता शासन में रचनात्मकता को प्रेरित करती है। यह न्याय-निर्णयन में आवश्यक नवाचार लाती है। न्यायिक सक्रियता न्यायाधीशों को उन मामलों में अपने व्यक्तिगत ज्ञान का उपयोग करने का अवसर प्रदान करती है जहाँ कानून संतुलन प्रदान करने में विफल रहता है। न्यायिक सक्रियता विभिन्न मुद्दों में अंतर्दृष्टि प्रदान करती है, जिससे स्थापित न्याय प्रणाली और उसके निर्णयों में त्वरित विश्वास कायम रखती है। कई बार सार्वजनिक शक्ति लोगों को नुकसान पहुँचाती है, इसलिये न्यायपालिका के लिये सार्वजनिक शक्ति के दुरुपयोग को जाँचना आवश्यक हो जाता है। यह तेज़ी से उन विभिन्न मुद्दों पर समाधान प्रदान करने का एक अच्छा विकल्प है, जहाँ विधायिका बहुमत के मुद्दे पर फँस जाती है। भारत में न्यायिक सक्रियता के उदाहरण- केशवानन्द भारती निर्णय में संविधान के आधारभूत लक्षण का सिद्धान्त, जनहित याचिका की शुरुवात, NGT द्वारा दिल्ली क्षेत्र में 10 वर्ष से पुराने डीजल वाहनों पर प्रतिबंध। भारत में न्यायिक सक्रियता के विपक्ष में तर्क इसे कभी कभी कार्यपालिका के कार्यों में हस्तक्षेप मानकर शक्ति पृथकरण के खिलाफ माना जाता है। न्यायाधीश किसी भी मौजूदा कानून को ओवरराइड कर सकते हैं। इसलिये यह स्पष्ट रूप से संविधान द्वारा तैयार की गई सीमा रेखा का उल्लंघन करता है। न्यायाधीशों की न्यायिक राय अन्य मामलों पर शासन करने के लिये मानक बन जाती है। इसके अतिरिक्त निर्णय निजी या स्वार्थी उद्देश्यों से प्रेरित हो सकते हैं जो जनता को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुँचा सकते हैं। अदालतों के बार-बार हस्तक्षेप के कारण लोगों का विश्वास सरकारी संस्थानों की गुणवत्ता, अखंडता और दक्षता के प्रति कम हो जाता है। न्यायिक सक्रियता संविधान द्वारा समर्थित नहीं है; यह न्यायिक अधिकारियों द्वारा पूरी तरह तैयार एक उत्पाद है जिसका उद्देश्य शासन व्यवस्था को प्रभावी बनाना तथा कार्यपालिका व विधायिका को और अधिक जन जवाबदेह बनाना है। किन्तु इसमें संतुलन बनाए रखने के लिये न्यायिक अनुशासन पर विचार किया जाना चाहिये। कानून बनाना और कानूनों के बीच अंतर को भरना विधायिका का कर्तव्य है और इसे उचित तरीके से लागू करना कार्यपालिका का कार्य है। न्यायपालिका को यह ध्यान रखना होगा की यह व्यवस्था पूरक के रूप में भूमिका निभा सकती है। उसका प्रतिस्थापन नहीं कर सकती।
##Question:न्यायिक सक्रियतावाद से आप क्या समझते हैं? भारत में न्यायिक सक्रियतावाद का उदाहरण सहित आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by judicial activism. Critically analyse judical activism in India with examples. (150-200 words/ 10 marks) ##Answer:Approach: न्यायिक सक्रियता को भूमिका में परिभाषित कीजिये। न्यायिक सक्रियता की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये। इसके पक्ष में उदाहरण सहित अपने तर्क प्रस्तुत कीजिये न्यायिक सक्रियता से जुड़ी चुनौतियों की चर्चा कीजिये। दोनों पक्षों के विश्लेषण से निष्कर्ष तक पहुंचिए। उत्तर- न्यायिक समीक्षा को एक सिद्धांत के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसके तहत न्यायपालिका द्वारा विधायिका और कार्यपालिका के कार्यों की समीक्षा की जाती है। नागरिक दुविधाओं को संबोधित करने और कानूनों के सकारात्मक और मानक पहलुओं के बीच अंतर को भरने के लिये न्यायपालिका अपने स्वविवेक और रचनात्मकता का प्रयोग कर न्याय निर्गमन करती है परिणामतः न्यायिक सक्रियता का उद्भव होता है।न्यायालय, न्यायिक समीक्षा द्वारा कार्यपालिका और विधायिका दोनों को नियंत्रित कर सकते हैं। भारत में न्यायिक सक्रियता के पक्ष में तर्क यह सरकारी तंत्र में चेक और बैलेन्स की एक प्रणाली प्रदान करती है। न्यायिक सक्रियता शासन में रचनात्मकता को प्रेरित करती है। यह न्याय-निर्णयन में आवश्यक नवाचार लाती है। न्यायिक सक्रियता न्यायाधीशों को उन मामलों में अपने व्यक्तिगत ज्ञान का उपयोग करने का अवसर प्रदान करती है जहाँ कानून संतुलन प्रदान करने में विफल रहता है। न्यायिक सक्रियता विभिन्न मुद्दों में अंतर्दृष्टि प्रदान करती है, जिससे स्थापित न्याय प्रणाली और उसके निर्णयों में त्वरित विश्वास कायम रखती है। कई बार सार्वजनिक शक्ति लोगों को नुकसान पहुँचाती है, इसलिये न्यायपालिका के लिये सार्वजनिक शक्ति के दुरुपयोग को जाँचना आवश्यक हो जाता है। यह तेज़ी से उन विभिन्न मुद्दों पर समाधान प्रदान करने का एक अच्छा विकल्प है, जहाँ विधायिका बहुमत के मुद्दे पर फँस जाती है। भारत में न्यायिक सक्रियता के उदाहरण- केशवानन्द भारती निर्णय में संविधान के आधारभूत लक्षण का सिद्धान्त, जनहित याचिका की शुरुवात, NGT द्वारा दिल्ली क्षेत्र में 10 वर्ष से पुराने डीजल वाहनों पर प्रतिबंध। भारत में न्यायिक सक्रियता के विपक्ष में तर्क इसे कभी कभी कार्यपालिका के कार्यों में हस्तक्षेप मानकर शक्ति पृथकरण के खिलाफ माना जाता है। न्यायाधीश किसी भी मौजूदा कानून को ओवरराइड कर सकते हैं। इसलिये यह स्पष्ट रूप से संविधान द्वारा तैयार की गई सीमा रेखा का उल्लंघन करता है। न्यायाधीशों की न्यायिक राय अन्य मामलों पर शासन करने के लिये मानक बन जाती है। इसके अतिरिक्त निर्णय निजी या स्वार्थी उद्देश्यों से प्रेरित हो सकते हैं जो जनता को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुँचा सकते हैं। अदालतों के बार-बार हस्तक्षेप के कारण लोगों का विश्वास सरकारी संस्थानों की गुणवत्ता, अखंडता और दक्षता के प्रति कम हो जाता है। न्यायिक सक्रियता संविधान द्वारा समर्थित नहीं है; यह न्यायिक अधिकारियों द्वारा पूरी तरह तैयार एक उत्पाद है जिसका उद्देश्य शासन व्यवस्था को प्रभावी बनाना तथा कार्यपालिका व विधायिका को और अधिक जन जवाबदेह बनाना है। किन्तु इसमें संतुलन बनाए रखने के लिये न्यायिक अनुशासन पर विचार किया जाना चाहिये। कानून बनाना और कानूनों के बीच अंतर को भरना विधायिका का कर्तव्य है और इसे उचित तरीके से लागू करना कार्यपालिका का कार्य है। न्यायपालिका को यह ध्यान रखना होगा की यह व्यवस्था पूरक के रूप में भूमिका निभा सकती है। उसका प्रतिस्थापन नहीं कर सकती।
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Explain the process of President"s assent to the different types of bills passed in the parliament. (10 Marks/150 Words)
Approach 1. In brief, discuss about bill and types of bills 2. Explain the process of Assent of bills, as done by the president Answer: A Bill is a draft statute which becomes law after it is passed by both the Houses of Parliament and assented to by the President. All legislative proposals are brought before Parliament in the forms of Bills. They may be broadly classified into Government Bills and Private Members’ Bills depending upon their initiation in the House by a Minister or a Private Member. Therefore, bills are classified into the following four types: 1.Ordinary Bills - which are concerned with any matter other than Financial subjects. 2.Financial Bills (I) & (II)- which is concerned with financial matters but other than the money bills. 3.Money Bills (art 110) - which are too concerned with financial matters like taxation, public expenditure, etc 4.Constitution Amendment bills- which are concerned with the amendment of the provisions of the constitution. President"s Assent to different types of the bill- Ordinary bill- Every bill after being passed by both houses of the parliament either singly or at a joint session is presented to the president to the president for his assent. There are basically three alternatives before the president: (a) he may give his assent to the bill; or (b) he may withhold his assent to the bill; or (c) he may return the bill for reconsideration of the Houses. If the president gives his assent to the bill, the bill becomes an act and is placed on the Statute Book. If the President withholds his assent to the bill, it ends and does not become an act. If the President returns the bill for reconsideration and if it is passed by both the Houses again with or without amendments and presented to the President for his assent, the president must give his assent to the bill. Thus, the President enjoys only a “suspensive veto.” Money Bill When a money bill is presented to the president, he may either give his assent to the bill or withhold his assent to the bill but cannot return the bill for reconsideration of the Houses. Normally, the president gives his assent to a money bill as it is introduced in Parliament with his prior permission. Financial Bill (I) It is governed by the same legislative procedure applicable to an ordinary bill. Hence, it can be either rejected or amended by the Rajya Sabha (except that an amendment other than for reduction or abolition of a tax cannot be moved in either House without the recommendation of the president). In case of a disagreement between the two Houses over such a bill, the president can summon a joint sitting of the two Houses to resolve the deadlock. When the bill is presented to the President, he can either give his assent to the bill or withhold his assent to the bill or return the bill for reconsideration of the Houses. Financial Bill (II) It is treated as an ordinary bill and in all respects, it is governed by the same legislative procedure which is applicable to an ordinary bill. The only special feature of this bill is that it cannot be passed by either House of Parliament unless the President has recommended to that House the consideration of the bill. Hence, the financial bill (II) can be introduced in either House of Parliament and the recommendation of the President is not necessary for its introduction. It can be either rejected or amendedby either House of Parliament. In case of a disagreement between thetwo Houses over such a bill, the President can summon a joint sitting of thetwo Houses to resolve the deadlock. When the bill is presented to the president, he can either give his assent to the bill or withhold his assent to the billor return the bill for reconsideration of the Houses. Constitutional Amendment Bill The president must give his assent to the bill. He can neither withhold his assent to the bill nor return the bill for reconsideration of the Parliament.After the president’s assent, the bill becomes an Act (i.e., a constitutional amendment act) and the Constitution stands amended in accordance with the terms of the Act.
##Question:Explain the process of President"s assent to the different types of bills passed in the parliament. (10 Marks/150 Words)##Answer:Approach 1. In brief, discuss about bill and types of bills 2. Explain the process of Assent of bills, as done by the president Answer: A Bill is a draft statute which becomes law after it is passed by both the Houses of Parliament and assented to by the President. All legislative proposals are brought before Parliament in the forms of Bills. They may be broadly classified into Government Bills and Private Members’ Bills depending upon their initiation in the House by a Minister or a Private Member. Therefore, bills are classified into the following four types: 1.Ordinary Bills - which are concerned with any matter other than Financial subjects. 2.Financial Bills (I) & (II)- which is concerned with financial matters but other than the money bills. 3.Money Bills (art 110) - which are too concerned with financial matters like taxation, public expenditure, etc 4.Constitution Amendment bills- which are concerned with the amendment of the provisions of the constitution. President"s Assent to different types of the bill- Ordinary bill- Every bill after being passed by both houses of the parliament either singly or at a joint session is presented to the president to the president for his assent. There are basically three alternatives before the president: (a) he may give his assent to the bill; or (b) he may withhold his assent to the bill; or (c) he may return the bill for reconsideration of the Houses. If the president gives his assent to the bill, the bill becomes an act and is placed on the Statute Book. If the President withholds his assent to the bill, it ends and does not become an act. If the President returns the bill for reconsideration and if it is passed by both the Houses again with or without amendments and presented to the President for his assent, the president must give his assent to the bill. Thus, the President enjoys only a “suspensive veto.” Money Bill When a money bill is presented to the president, he may either give his assent to the bill or withhold his assent to the bill but cannot return the bill for reconsideration of the Houses. Normally, the president gives his assent to a money bill as it is introduced in Parliament with his prior permission. Financial Bill (I) It is governed by the same legislative procedure applicable to an ordinary bill. Hence, it can be either rejected or amended by the Rajya Sabha (except that an amendment other than for reduction or abolition of a tax cannot be moved in either House without the recommendation of the president). In case of a disagreement between the two Houses over such a bill, the president can summon a joint sitting of the two Houses to resolve the deadlock. When the bill is presented to the President, he can either give his assent to the bill or withhold his assent to the bill or return the bill for reconsideration of the Houses. Financial Bill (II) It is treated as an ordinary bill and in all respects, it is governed by the same legislative procedure which is applicable to an ordinary bill. The only special feature of this bill is that it cannot be passed by either House of Parliament unless the President has recommended to that House the consideration of the bill. Hence, the financial bill (II) can be introduced in either House of Parliament and the recommendation of the President is not necessary for its introduction. It can be either rejected or amendedby either House of Parliament. In case of a disagreement between thetwo Houses over such a bill, the President can summon a joint sitting of thetwo Houses to resolve the deadlock. When the bill is presented to the president, he can either give his assent to the bill or withhold his assent to the billor return the bill for reconsideration of the Houses. Constitutional Amendment Bill The president must give his assent to the bill. He can neither withhold his assent to the bill nor return the bill for reconsideration of the Parliament.After the president’s assent, the bill becomes an Act (i.e., a constitutional amendment act) and the Constitution stands amended in accordance with the terms of the Act.
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सामाजिक अंकेक्षण से आप क्या समझते हैं? सामाजिक अंकेक्षण के लाभों को सूचीबद्ध कीजिये तथा इसके विकास में निहित चुनौतियों की भी चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द, अंक-10 ) What do you understand by social audit? List out benefits of social audit and also discuss challenges in its development. (150-200 words, Marks - 10 )
Approach: भूमिका - सामाजिक अंकेक्षण को परिभाषित करते हुए स्पष्ट कीजिये सामाजिक अंकेक्षण के लाभों की बिंदुवत चर्चा कीजिये सामाजिक अंकेक्षण के विकास में बाधाएँ स्पष्ट कीजिये बाधाओं को दूर करने के उपायों की चर्चा कर निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर: सामाजिक अंकेक्षणलोगों की सक्रिय भागीदारी और वास्तविक जमीनी स्तरीय वस्तुस्थिति के साथ आधिकारिक रेकॉर्ड की तुलना करने के लिए निर्धारित किया गया तंत्र है। सामाजिक अंकेक्षण सामाजिक परिवर्तन सामाजिक भागीदारी तथा सरकारी जवाबदेहिता के लिए एक शक्तिशाली उपकरण है।भारत में सबसे पहले मनरेगा में सामाजिक अंकेक्षण किया गया।इसमें सभी हितधारकों के साथ विचार विमर्श करके मनरेगा की योजना में खर्च हुए धन और क्रियान्वयन की नीति का समाज में पड़ने वाले प्रभाव के साथ समन्वय स्थापित किया गया सामाजिक अंकेक्षण के लाभ- यह लोगों को उनके अधिकारों के बारे में अवगत करवाता है और लोगों के लिए सरकार द्वारा चलायी जाने वाली योजनाओं एवं लाभों को प्राप्त करने के लिए प्रशिक्षित करता है यह लोगों को प्रश्न पूछने उनकी आवश्यकताओं और शिकायतों को व्यक्त करने के लिए एक सामूहिक मंच प्रदान करता है। सामाजिक अंकेक्षण से शासन प्रणाली निरंतर प्रभावी एवं लोकतान्त्रिक होती जाती है अर्थात निरंतर रूप में समाज के पिछड़े लोगों या हाशिये पर बैठे लोगों को शामिल किया जाता है सोशल ऑडिट के माध्यम से क्षेत्रीय प्राकृतिक संसाधनों और मानवीय संसाधनों का उचित दोहन करने के लिए लोगों को जागरूक किया जाता है। सोशल ऑडिट स्वयं में एक प्रति संभरण है, जो सरकार को समाज से जोड़ता है और सरकार के कार्यों को बेहतर प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित करता है। सामाजिक अंकेक्षण में बाधाएँ- भारत में समाज का विभाजन तथा स्तरीकरण सोशल ऑडिट करने वाले अधिकारियों को उचित जानकारी देने में बाधक बना हुआ है ऑडिट अधिकारी एवं कर्मचारी शक्तिशाली एवं प्रभावी लोगों के साथ सरोकार स्थापित करके आंकड़ों में फेर बदल कर देते हैं योजनाओं के लाभार्थी अत्यंत हीन होने की स्थिति होने के कारण योजना से प्राप्त होने वाले लाभ का एक हिस्सा बिचौलियों को देने के लिए बाध्य हो जाते हैं योजनाओं की व्यापकता एवं लाभार्थियों की बड़ी संख्या बिना किसी तकनीकी के ऑडिट को जटिल बना देती है सोशल ऑडिट सरकारों का एक विवेकाधिकार है अर्थात ऑडिट करवाने की इच्छा शक्ति का अभाव पाया जाता है। सामाजिक अंकेक्षण को प्रभावी बनाने के सुझाव- सोशल ऑडिट के अर्थ कार्यक्षेत्र एवं उद्देश्यों के संबंध में व्यापक जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि ऑडिट की कार्य प्रक्रिया के संबंध में सामान्य लोगों को जानकारी हो ऑडिट करने वाले अधिकारियों, कर्मचारियों एवं सम्बद्ध नागरिकों के अंदर नैतिकता, सदाचार, ईमानदारी, पारदर्शिता और कर्तव्यनिष्ठता को आदतन रूप में विकसित करने की आवश्यकता है प्रत्येक जिले में सोशल ऑडिट विशेषज्ञों की एक टीम स्थापित की जानी चाहिए जो सामाजिक लेखापरीक्षण समिति के सदस्यों और हितधारकों को समय समय पर प्रशिक्षित करेगी सोशल ऑडिट विधियों का आयोजन और रिपोर्ट तैयार करने तथा प्रस्तुति करने के लिए समय समय पर सभाओं का आयोजन किया जाना चाहिए।
##Question:सामाजिक अंकेक्षण से आप क्या समझते हैं? सामाजिक अंकेक्षण के लाभों को सूचीबद्ध कीजिये तथा इसके विकास में निहित चुनौतियों की भी चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द, अंक-10 ) What do you understand by social audit? List out benefits of social audit and also discuss challenges in its development. (150-200 words, Marks - 10 )##Answer:Approach: भूमिका - सामाजिक अंकेक्षण को परिभाषित करते हुए स्पष्ट कीजिये सामाजिक अंकेक्षण के लाभों की बिंदुवत चर्चा कीजिये सामाजिक अंकेक्षण के विकास में बाधाएँ स्पष्ट कीजिये बाधाओं को दूर करने के उपायों की चर्चा कर निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर: सामाजिक अंकेक्षणलोगों की सक्रिय भागीदारी और वास्तविक जमीनी स्तरीय वस्तुस्थिति के साथ आधिकारिक रेकॉर्ड की तुलना करने के लिए निर्धारित किया गया तंत्र है। सामाजिक अंकेक्षण सामाजिक परिवर्तन सामाजिक भागीदारी तथा सरकारी जवाबदेहिता के लिए एक शक्तिशाली उपकरण है।भारत में सबसे पहले मनरेगा में सामाजिक अंकेक्षण किया गया।इसमें सभी हितधारकों के साथ विचार विमर्श करके मनरेगा की योजना में खर्च हुए धन और क्रियान्वयन की नीति का समाज में पड़ने वाले प्रभाव के साथ समन्वय स्थापित किया गया सामाजिक अंकेक्षण के लाभ- यह लोगों को उनके अधिकारों के बारे में अवगत करवाता है और लोगों के लिए सरकार द्वारा चलायी जाने वाली योजनाओं एवं लाभों को प्राप्त करने के लिए प्रशिक्षित करता है यह लोगों को प्रश्न पूछने उनकी आवश्यकताओं और शिकायतों को व्यक्त करने के लिए एक सामूहिक मंच प्रदान करता है। सामाजिक अंकेक्षण से शासन प्रणाली निरंतर प्रभावी एवं लोकतान्त्रिक होती जाती है अर्थात निरंतर रूप में समाज के पिछड़े लोगों या हाशिये पर बैठे लोगों को शामिल किया जाता है सोशल ऑडिट के माध्यम से क्षेत्रीय प्राकृतिक संसाधनों और मानवीय संसाधनों का उचित दोहन करने के लिए लोगों को जागरूक किया जाता है। सोशल ऑडिट स्वयं में एक प्रति संभरण है, जो सरकार को समाज से जोड़ता है और सरकार के कार्यों को बेहतर प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित करता है। सामाजिक अंकेक्षण में बाधाएँ- भारत में समाज का विभाजन तथा स्तरीकरण सोशल ऑडिट करने वाले अधिकारियों को उचित जानकारी देने में बाधक बना हुआ है ऑडिट अधिकारी एवं कर्मचारी शक्तिशाली एवं प्रभावी लोगों के साथ सरोकार स्थापित करके आंकड़ों में फेर बदल कर देते हैं योजनाओं के लाभार्थी अत्यंत हीन होने की स्थिति होने के कारण योजना से प्राप्त होने वाले लाभ का एक हिस्सा बिचौलियों को देने के लिए बाध्य हो जाते हैं योजनाओं की व्यापकता एवं लाभार्थियों की बड़ी संख्या बिना किसी तकनीकी के ऑडिट को जटिल बना देती है सोशल ऑडिट सरकारों का एक विवेकाधिकार है अर्थात ऑडिट करवाने की इच्छा शक्ति का अभाव पाया जाता है। सामाजिक अंकेक्षण को प्रभावी बनाने के सुझाव- सोशल ऑडिट के अर्थ कार्यक्षेत्र एवं उद्देश्यों के संबंध में व्यापक जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि ऑडिट की कार्य प्रक्रिया के संबंध में सामान्य लोगों को जानकारी हो ऑडिट करने वाले अधिकारियों, कर्मचारियों एवं सम्बद्ध नागरिकों के अंदर नैतिकता, सदाचार, ईमानदारी, पारदर्शिता और कर्तव्यनिष्ठता को आदतन रूप में विकसित करने की आवश्यकता है प्रत्येक जिले में सोशल ऑडिट विशेषज्ञों की एक टीम स्थापित की जानी चाहिए जो सामाजिक लेखापरीक्षण समिति के सदस्यों और हितधारकों को समय समय पर प्रशिक्षित करेगी सोशल ऑडिट विधियों का आयोजन और रिपोर्ट तैयार करने तथा प्रस्तुति करने के लिए समय समय पर सभाओं का आयोजन किया जाना चाहिए।
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अभिवृत्ति के अर्थ को स्पष्ट कीजिये | साथ ही नैतिक अभिवृत्ति और राजनीतिक अभिवृत्ति की संक्षेप में चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द; 10 अंक) Expalin the meaning of attitude . Also, briefly discuss moral attitude and political attitude. (150-200 Words; 10 Marks)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत अभिवृत्ति के अर्थ को स्पष्ट करते हुए कीजिये | इसके पश्चात नैतिक अभिवृत्ति को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में राजनीतिक अभिवृत्ति को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - अभिवृत्ति अभिवृत्ति का आशय व्यक्ति के सामाजिक वातावरण जैसे किसी वस्तु, घटना,मुद्दे आदि को लेकर एक झुकाव या प्रवृत्ति |जो की सकारात्मक या नकारात्मक या तटस्थ हो सकता है यह प्रवृत्ति दीर्घकालीन होता है , अतः अभिवृत्ति की प्रकृति मूल्यात्मक है | जब किसी विषयवस्तु पर व्यक्ति का विचार या मत भावना से शामिल होते हुए व्यवहार में परिवर्तित होता है, तो अभिवृत्ति की संज्ञा दी जाती है | अभिवृत्ति के तीन भाग है- विचारात्मक , भावात्मक और व्यवहारिक | अभिवृत्ति व्यक्ति में एक अपेक्षित व्यवहार की सम्भावना को व्यक्त करती है | परन्तु आवश्यक नहीं कि यह अपने आप में व्यवहार को प्रदर्शित करे | कई अवसरों पर व्यक्ति की अभिवृत्ति एवं व्यवहार के बीच का सामंजस्य ना होने पर संज्ञानात्मक मतभेद होता है | यह व्यक्ति में मानसिक दुखद स्थिति को उत्पन्न करता है | व्यक्ति के द्वारा ऐसी परिस्थिति में संज्ञानात्मक प्रतिध्वनि को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है | तथा इस सन्दर्भ में व्यल्क्ति के द्वारा व्यवहार में इस प्रकार के परिवर्तन को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है, जो उसकी अभिवृत्ति से मेल खाता हो, आदि नैतिक अभिवृत्ति ऐसे अभिवृत्ति को दर्शाती है जोकि नैतिक विश्वास पर आधारित हो | विश्वास का आशय उस प्रकार के विश्वास से है जोकि किसी भी उचित या अनुचित या नैतिक -अनैतिक को लेकर मजबूत हो | नैतिक अभिवृत्ति का तथ्य व्यक्ति को प्रेरित करता है | नैतिक अभिवृत्ति सामान्यतः मजबूत भावनाओं से जुडी होती है अतः इसमें भावात्मक भाव का भाग अधिक होता है | राजनीतिक अभिवृत्ति राजनीतिक अभिवृत्ति, राजनीति संस्कृति एवं राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित होती है | राजनीतिक विचारधारा में व्यक्तियों के बीच भिन्नता होने पर भी राजनीतिक संस्कृति में समानता होती है | राजनीतिक संस्कृति का स्थानांतरण पीढ़ी दर पीढ़ी होती है | अतः राजनीतिक संस्कृति सामाजिक प्रक्रिया का एक अंग है | राजनीतिक अभिवृत्ति का वर्गीकरण व्यापक रूप से तीन भागों में किया जा सकता है | नागरिक सिर्फ राजनीतिक व्यवस्था से अवगत है | नागरिक राजनीतिक व्यवस्था से अवगत होते हुए इसके निर्णय से अपने को प्रभावित मानते हैं| विभिन्न माध्यमों के द्वारा राजनीतिक व्यवस्था के निर्णय को प्रभावित करते हैं | राष्ट्रवाद का सम्बन्ध शक्ति से है अतः इसकी प्रकृति आक्रत्मक होती है | जबकि स्वदेश प्रेम राजनीतिक समुदाय के प्रति व्यक्तियों को नैतिक दायित्वों से अवगत कराती है | स्वदेश प्रेम की प्रकृति रक्षात्मक होती है एवं यह अपने आप में सर्वोत्तम तरीके से जीवन यापन का माध्यम है | इसे किसी अन्य पर थोपने की इच्छा नहीं होती है | राजनीतिक अभिवृत्ति के सन्दर्भ में संविधानवाद का विशेष महत्व है | इस प्रकार अभिवृत्ति का परिणाम सीखने की प्रक्रिया का ही परिणाम है|अतः प्रत्येक नयी सीख के साथ अभिवृत्ति परिवर्तन का होना स्वाभाविक है |अभिवृत्ति परिवर्तन में सामाजिक प्रभाव का विशेष महत्व होता है
##Question:अभिवृत्ति के अर्थ को स्पष्ट कीजिये | साथ ही नैतिक अभिवृत्ति और राजनीतिक अभिवृत्ति की संक्षेप में चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द; 10 अंक) Expalin the meaning of attitude . Also, briefly discuss moral attitude and political attitude. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत अभिवृत्ति के अर्थ को स्पष्ट करते हुए कीजिये | इसके पश्चात नैतिक अभिवृत्ति को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में राजनीतिक अभिवृत्ति को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - अभिवृत्ति अभिवृत्ति का आशय व्यक्ति के सामाजिक वातावरण जैसे किसी वस्तु, घटना,मुद्दे आदि को लेकर एक झुकाव या प्रवृत्ति |जो की सकारात्मक या नकारात्मक या तटस्थ हो सकता है यह प्रवृत्ति दीर्घकालीन होता है , अतः अभिवृत्ति की प्रकृति मूल्यात्मक है | जब किसी विषयवस्तु पर व्यक्ति का विचार या मत भावना से शामिल होते हुए व्यवहार में परिवर्तित होता है, तो अभिवृत्ति की संज्ञा दी जाती है | अभिवृत्ति के तीन भाग है- विचारात्मक , भावात्मक और व्यवहारिक | अभिवृत्ति व्यक्ति में एक अपेक्षित व्यवहार की सम्भावना को व्यक्त करती है | परन्तु आवश्यक नहीं कि यह अपने आप में व्यवहार को प्रदर्शित करे | कई अवसरों पर व्यक्ति की अभिवृत्ति एवं व्यवहार के बीच का सामंजस्य ना होने पर संज्ञानात्मक मतभेद होता है | यह व्यक्ति में मानसिक दुखद स्थिति को उत्पन्न करता है | व्यक्ति के द्वारा ऐसी परिस्थिति में संज्ञानात्मक प्रतिध्वनि को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है | तथा इस सन्दर्भ में व्यल्क्ति के द्वारा व्यवहार में इस प्रकार के परिवर्तन को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है, जो उसकी अभिवृत्ति से मेल खाता हो, आदि नैतिक अभिवृत्ति ऐसे अभिवृत्ति को दर्शाती है जोकि नैतिक विश्वास पर आधारित हो | विश्वास का आशय उस प्रकार के विश्वास से है जोकि किसी भी उचित या अनुचित या नैतिक -अनैतिक को लेकर मजबूत हो | नैतिक अभिवृत्ति का तथ्य व्यक्ति को प्रेरित करता है | नैतिक अभिवृत्ति सामान्यतः मजबूत भावनाओं से जुडी होती है अतः इसमें भावात्मक भाव का भाग अधिक होता है | राजनीतिक अभिवृत्ति राजनीतिक अभिवृत्ति, राजनीति संस्कृति एवं राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित होती है | राजनीतिक विचारधारा में व्यक्तियों के बीच भिन्नता होने पर भी राजनीतिक संस्कृति में समानता होती है | राजनीतिक संस्कृति का स्थानांतरण पीढ़ी दर पीढ़ी होती है | अतः राजनीतिक संस्कृति सामाजिक प्रक्रिया का एक अंग है | राजनीतिक अभिवृत्ति का वर्गीकरण व्यापक रूप से तीन भागों में किया जा सकता है | नागरिक सिर्फ राजनीतिक व्यवस्था से अवगत है | नागरिक राजनीतिक व्यवस्था से अवगत होते हुए इसके निर्णय से अपने को प्रभावित मानते हैं| विभिन्न माध्यमों के द्वारा राजनीतिक व्यवस्था के निर्णय को प्रभावित करते हैं | राष्ट्रवाद का सम्बन्ध शक्ति से है अतः इसकी प्रकृति आक्रत्मक होती है | जबकि स्वदेश प्रेम राजनीतिक समुदाय के प्रति व्यक्तियों को नैतिक दायित्वों से अवगत कराती है | स्वदेश प्रेम की प्रकृति रक्षात्मक होती है एवं यह अपने आप में सर्वोत्तम तरीके से जीवन यापन का माध्यम है | इसे किसी अन्य पर थोपने की इच्छा नहीं होती है | राजनीतिक अभिवृत्ति के सन्दर्भ में संविधानवाद का विशेष महत्व है | इस प्रकार अभिवृत्ति का परिणाम सीखने की प्रक्रिया का ही परिणाम है|अतः प्रत्येक नयी सीख के साथ अभिवृत्ति परिवर्तन का होना स्वाभाविक है |अभिवृत्ति परिवर्तन में सामाजिक प्रभाव का विशेष महत्व होता है
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अभिवृत्ति से आप क्या समझते हैं? अभिवृत्ति के प्रारूपों के रूप में नैतिक एवं राजनीतिक अभिवृत्ति की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by attitude? Discuss moral and political attitudes as patterns of attitude. (150-200 words; 10 marks)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत अभिवृत्ति के अर्थ को स्पष्ट करते हुए कीजिये | इसके पश्चात नैतिक अभिवृत्ति को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में राजनीतिक अभिवृत्ति को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - अभिवृत्ति अभिवृत्ति का आशय व्यक्ति के सामाजिक वातावरण जैसे किसी वस्तु, घटना,मुद्दे आदि को लेकर एक झुकाव या प्रवृत्ति |जो की सकारात्मक या नकारात्मक या तटस्थ हो सकता है यह प्रवृत्ति दीर्घकालीन होता है , अतः अभिवृत्ति की प्रकृति मूल्यात्मक है | जब किसी विषयवस्तु पर व्यक्ति का विचार या मत भावना से शामिल होते हुए व्यवहार में परिवर्तित होता है, तो अभिवृत्ति की संज्ञा दी जाती है | अभिवृत्ति के तीन भाग है- विचारात्मक , भावात्मक और व्यवहारिक | अभिवृत्ति व्यक्ति में एक अपेक्षित व्यवहार की सम्भावना को व्यक्त करती है | परन्तु आवश्यक नहीं कि यह अपने आप में व्यवहार को प्रदर्शित करे | कई अवसरों पर व्यक्ति की अभिवृत्ति एवं व्यवहार के बीच का सामंजस्य ना होने पर संज्ञानात्मक मतभेद होता है | यह व्यक्ति में मानसिक दुखद स्थिति को उत्पन्न करता है | व्यक्ति के द्वारा ऐसी परिस्थिति में संज्ञानात्मक प्रतिध्वनि को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है | तथा इस सन्दर्भ में व्यल्क्ति के द्वारा व्यवहार में इस प्रकार के परिवर्तन को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है, जो उसकी अभिवृत्ति से मेल खाता हो, आदि नैतिक अभिवृत्ति ऐसे अभिवृत्ति को दर्शाती है जोकि नैतिक विश्वास पर आधारित हो | विश्वास का आशय उस प्रकार के विश्वास से है जोकि किसी भी उचित या अनुचित या नैतिक -अनैतिक को लेकर मजबूत हो | नैतिक अभिवृत्ति का तथ्य व्यक्ति को प्रेरित करता है | नैतिक अभिवृत्ति सामान्यतः मजबूत भावनाओं से जुडी होती है अतः इसमें भावात्मक भाव का भाग अधिक होता है | राजनीतिक अभिवृत्ति राजनीतिक अभिवृत्ति, राजनीति संस्कृति एवं राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित होती है | राजनीतिक विचारधारा में व्यक्तियों के बीच भिन्नता होने पर भी राजनीतिक संस्कृति में समानता होती है | राजनीतिक संस्कृति का स्थानांतरण पीढ़ी दर पीढ़ी होती है | अतः राजनीतिक संस्कृति सामाजिक प्रक्रिया का एक अंग है | राजनीतिक अभिवृत्ति का वर्गीकरण व्यापक रूप से तीन भागों में किया जा सकता है | नागरिक सिर्फ राजनीतिक व्यवस्था से अवगत है | नागरिक राजनीतिक व्यवस्था से अवगत होते हुए इसके निर्णय से अपने को प्रभावित मानते हैं| विभिन्न माध्यमों के द्वारा राजनीतिक व्यवस्था के निर्णय को प्रभावित करते हैं | राष्ट्रवाद का सम्बन्ध शक्ति से है अतः इसकी प्रकृति आक्रत्मक होती है | जबकि स्वदेश प्रेम राजनीतिक समुदाय के प्रति व्यक्तियों को नैतिक दायित्वों से अवगत कराती है | स्वदेश प्रेम की प्रकृति रक्षात्मक होती है एवं यह अपने आप में सर्वोत्तम तरीके से जीवन यापन का माध्यम है | इसे किसी अन्य पर थोपने की इच्छा नहीं होती है | राजनीतिक अभिवृत्ति के सन्दर्भ में संविधानवाद का विशेष महत्व है | इस प्रकार अभिवृत्ति का परिणाम सीखने की प्रक्रिया का ही परिणाम है|अतः प्रत्येक नयी सीख के साथ अभिवृत्ति परिवर्तन का होना स्वाभाविक है |अभिवृत्ति परिवर्तन में सामाजिक प्रभाव का विशेष महत्व होता है |
##Question:अभिवृत्ति से आप क्या समझते हैं? अभिवृत्ति के प्रारूपों के रूप में नैतिक एवं राजनीतिक अभिवृत्ति की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by attitude? Discuss moral and political attitudes as patterns of attitude. (150-200 words; 10 marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत अभिवृत्ति के अर्थ को स्पष्ट करते हुए कीजिये | इसके पश्चात नैतिक अभिवृत्ति को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में राजनीतिक अभिवृत्ति को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - अभिवृत्ति अभिवृत्ति का आशय व्यक्ति के सामाजिक वातावरण जैसे किसी वस्तु, घटना,मुद्दे आदि को लेकर एक झुकाव या प्रवृत्ति |जो की सकारात्मक या नकारात्मक या तटस्थ हो सकता है यह प्रवृत्ति दीर्घकालीन होता है , अतः अभिवृत्ति की प्रकृति मूल्यात्मक है | जब किसी विषयवस्तु पर व्यक्ति का विचार या मत भावना से शामिल होते हुए व्यवहार में परिवर्तित होता है, तो अभिवृत्ति की संज्ञा दी जाती है | अभिवृत्ति के तीन भाग है- विचारात्मक , भावात्मक और व्यवहारिक | अभिवृत्ति व्यक्ति में एक अपेक्षित व्यवहार की सम्भावना को व्यक्त करती है | परन्तु आवश्यक नहीं कि यह अपने आप में व्यवहार को प्रदर्शित करे | कई अवसरों पर व्यक्ति की अभिवृत्ति एवं व्यवहार के बीच का सामंजस्य ना होने पर संज्ञानात्मक मतभेद होता है | यह व्यक्ति में मानसिक दुखद स्थिति को उत्पन्न करता है | व्यक्ति के द्वारा ऐसी परिस्थिति में संज्ञानात्मक प्रतिध्वनि को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है | तथा इस सन्दर्भ में व्यल्क्ति के द्वारा व्यवहार में इस प्रकार के परिवर्तन को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है, जो उसकी अभिवृत्ति से मेल खाता हो, आदि नैतिक अभिवृत्ति ऐसे अभिवृत्ति को दर्शाती है जोकि नैतिक विश्वास पर आधारित हो | विश्वास का आशय उस प्रकार के विश्वास से है जोकि किसी भी उचित या अनुचित या नैतिक -अनैतिक को लेकर मजबूत हो | नैतिक अभिवृत्ति का तथ्य व्यक्ति को प्रेरित करता है | नैतिक अभिवृत्ति सामान्यतः मजबूत भावनाओं से जुडी होती है अतः इसमें भावात्मक भाव का भाग अधिक होता है | राजनीतिक अभिवृत्ति राजनीतिक अभिवृत्ति, राजनीति संस्कृति एवं राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित होती है | राजनीतिक विचारधारा में व्यक्तियों के बीच भिन्नता होने पर भी राजनीतिक संस्कृति में समानता होती है | राजनीतिक संस्कृति का स्थानांतरण पीढ़ी दर पीढ़ी होती है | अतः राजनीतिक संस्कृति सामाजिक प्रक्रिया का एक अंग है | राजनीतिक अभिवृत्ति का वर्गीकरण व्यापक रूप से तीन भागों में किया जा सकता है | नागरिक सिर्फ राजनीतिक व्यवस्था से अवगत है | नागरिक राजनीतिक व्यवस्था से अवगत होते हुए इसके निर्णय से अपने को प्रभावित मानते हैं| विभिन्न माध्यमों के द्वारा राजनीतिक व्यवस्था के निर्णय को प्रभावित करते हैं | राष्ट्रवाद का सम्बन्ध शक्ति से है अतः इसकी प्रकृति आक्रत्मक होती है | जबकि स्वदेश प्रेम राजनीतिक समुदाय के प्रति व्यक्तियों को नैतिक दायित्वों से अवगत कराती है | स्वदेश प्रेम की प्रकृति रक्षात्मक होती है एवं यह अपने आप में सर्वोत्तम तरीके से जीवन यापन का माध्यम है | इसे किसी अन्य पर थोपने की इच्छा नहीं होती है | राजनीतिक अभिवृत्ति के सन्दर्भ में संविधानवाद का विशेष महत्व है | इस प्रकार अभिवृत्ति का परिणाम सीखने की प्रक्रिया का ही परिणाम है|अतः प्रत्येक नयी सीख के साथ अभिवृत्ति परिवर्तन का होना स्वाभाविक है |अभिवृत्ति परिवर्तन में सामाजिक प्रभाव का विशेष महत्व होता है |
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राज्य सभा की विशिष्ट शक्तियों को बताते हुए इसके गैर संघीय अभिलक्षणों का विश्लेषण कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Analyze the non-federal characteristics of the Rajya Sabha by stating its specific powers.( 150-200 words, 10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में राज्य सभा के सन्दर्भ में सामान्य जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में राज्य सभा की विशिष्ट शक्तियों का वर्णन कीजिये 3- द्वितीय भाग में गैर संघीय अभिलक्षणों का विश्लेषण कीजिये 4- अंतिम में राज्य सभा के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये | भारत में द्विसदनीय प्रणाली अपनायी गयी है जिसमें निम्न सदन नागरिकों का प्रतिनिधित्व करता है जबकि उच्च सदन राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है| राज्य सभा का आशय परिसंघीय सदन अर्थात् एक ऐसी सभा से था जिसका निर्वाचन राज्यों और दो संघ राज्य क्षेत्रों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया गया, जिनमें राज्यों को समान प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है| निर्वाचित सदस्यों के अलावा, राष्ट्रपति द्वारा सभा के लिए बारह सदस्यों के नामनिर्देशन का भी उपबंध किया गया। इसकी सदस्यता हेतु न्यूनतम आयु तीस वर्ष नियत की गई जबकि निचले सदन के लिए यह पच्चीस वर्ष है| ऐसा भारत के उपराष्ट्रपति को राज्य सभा का पदेन सभापति बनाकर किया गया, जो इसकी बैठकों का सभापतित्व करते हैं| राज्य सभा को लोक सभा की अपेक्षा कुछ विशिष्ट अधिकार प्राप्त हैं| राज्य सभा के अधिकार एवं विशिष्ट कार्य अनुच्छेद 249 के अंतर्गत यदि राज्य सभा को ऐसा लगता है कि राष्ट्रीय हित में राज्य सूची के किसी विषय पर कानून बनाना अनिवार्य हो गया है तो ऐसी दशा में राज्य सभा विशेष बहुमत से एक संकल्प पारित कर संसद को इस बात के लिए अधिकृत कर सकती है कि वह उस विषय पर कानून बनाए हालांकि इस कानून का प्रभाव प्रारम्भ में केवल एक वर्ष तक रहेगा, इसके बाद इस कानून को पुनः एक वर्ष के लिए बढाया जा सकता है| अनुच्छेद 312 के अंतर्गत यदि राज्य सभा को यह लगता है किराष्ट्रीय हित में किसी अखिल भारतीय सेवा के सृजन की आवश्यकता है तो वह इस सम्बन्ध में विशेष बहुमत से एक संकल्प पारित कर संसद को इस सन्दर्भ में अधिकृत कर सकती है| अखिल भारतीय सेवा एवं केन्द्रीय सेवाओं में 2 प्रमुख अंतर होते हैं यथा अखिल भारतीय सेवा का कैडर हो सकता है किन्तु केन्द्रीय सेवा का कैडर नही हो सकता है, केन्द्रीय सेवा के अधिकारियों की केंद्र में प्रति नियुक्ति नही हो सकती है| अनु. 67B के अनुसार उपराष्ट्रपति को हटाने वाला प्रस्ताव राज्यसभा में ही लाया जा सकेगा| राज्य सभा के गैर परिसंघीय लक्षण अमेरिका में राज्य का आकार बड़ा हो या छोटा हो, सभी राज्यों से केवल 2 प्रतिनिधि ही सीनेट(ऊपरी सदन) के लिए चुने जाते हैं इसी लिए 50 अमेरिकी राज्यों से केवल 100 सदस्य आते हैं जिनसे मिलकर सीनेट का निर्माण होता है भारत में राज्य सभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व जनसंख्या के अनुसारहोता है जैसे उत्तर प्रदेश की जनसंख्या अधिक होने के कारण राज्य सभा के लिए सर्वाधिक सदस्य (31) भेजे जाते हैं वहीँ कम जनसंख्या होने के कारण मणिपुर आदि राज्यों से केवल 1 सदस्य भेजा जाता है| अर्थात राज्य सभा में राज्यों का असमान प्रतिनिधित्व एक गैर परिसंघीय लक्षण है अमेरिकी सीनेट के सदस्य भी सीधे लोगों द्वारा चुने जाते हैं, इनका कार्यकाल भी 6 वर्ष का होता है| दूसरी और भारत में राज्य सभा के सदस्यों का निर्वाचन जनता के द्वारा नहीं बल्कि विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया जाता है| अर्थात संघ का प्रतिनिधित्व लोगों के माध्यम से न हो कर उन दलों के माध्यम से होता है जो राज्य में चुनाव हारने के बाद भी राज्यसभा में बने रहते हैं अमेरिका में वही व्यक्ति किसी राज्य से सीनेट का चुनाव लड़ सकता है जो उस राज्य का स्थायी निवासी है| किन्तु भारत में किसी राज्य का निवासी किसी अन्य राज्य से भी राज्य सभा का चुनाव लड़ सकता है और राज्यसभा सदस्य बन सकता है| अमेरिका में सीनेट के अनुमोदन के बिना किसी भी उच्च संवैधानिक पद, जैसे संघ के मंत्री, SC के जज, संघ के महान्यायवादी आदि पदों पर आसीन नहीं हो सकते भले ही राष्ट्रपति ने उनको नियुक्त कर रखा हो| भारत में यह शक्ति राज्य सभा की बजाय नियुक्ति सम्बन्धी कैबिनेट समिति को है, जिसकी अध्यक्षता प्रधानमन्त्री करता है| कुछ मामलों में कोलेजियम तथा अन्य संस्थाएं यह कार्य करती हैं| अमेरिका में किसी भी अंतर्राष्ट्रीय संधि या समझौते आदि को कानूनी स्वीकार्यता तभी मिलती है जबकि सीनेट द्वारा उसका अनुमोदन कर दिया जाए| इसके विपरीत भारत में यह शक्ति कुछ मामलों में संसद जबकि कुछ मामलों में कार्यपालिका के पास है अर्थात यह शक्ति केवल राज्य सभा में निहित नही है| उपरोक्त सीमाओं के होते हुए भी स्वतंत्र भारत के लिए एक द्विसदनी विधानमंडल बनाने का निर्णय मुख्य रूप से इसलिए किया गया क्योंकि परिसंघीय प्रणाली को अपार विविधताओं वाले इतने विशाल देश के लिए सर्वाधिक सहज स्वरूप की सरकार माना गया। वस्तुत: एक प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित एकल सभा को स्वतंत्र भारत के समक्ष आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए अपर्याप्त समझा गया। अत: "काउंसिल ऑफ स्टेट्स" के रूप में ज्ञात एक ऐसे द्वितीय सदन का सृजन किया गया जिसकी संरचना और निर्वाचन पद्धति प्रत्यक्षत: निर्वाचित लोक सभा से पूर्णत: भिन्न है| देश की व्यवस्था में राज्यों के हितों के संरक्षण के सन्दर्भ में यह सभा कई दृष्टिकोणों से महत्वपूर्ण है|
##Question:राज्य सभा की विशिष्ट शक्तियों को बताते हुए इसके गैर संघीय अभिलक्षणों का विश्लेषण कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Analyze the non-federal characteristics of the Rajya Sabha by stating its specific powers.( 150-200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में राज्य सभा के सन्दर्भ में सामान्य जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में राज्य सभा की विशिष्ट शक्तियों का वर्णन कीजिये 3- द्वितीय भाग में गैर संघीय अभिलक्षणों का विश्लेषण कीजिये 4- अंतिम में राज्य सभा के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये | भारत में द्विसदनीय प्रणाली अपनायी गयी है जिसमें निम्न सदन नागरिकों का प्रतिनिधित्व करता है जबकि उच्च सदन राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है| राज्य सभा का आशय परिसंघीय सदन अर्थात् एक ऐसी सभा से था जिसका निर्वाचन राज्यों और दो संघ राज्य क्षेत्रों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया गया, जिनमें राज्यों को समान प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है| निर्वाचित सदस्यों के अलावा, राष्ट्रपति द्वारा सभा के लिए बारह सदस्यों के नामनिर्देशन का भी उपबंध किया गया। इसकी सदस्यता हेतु न्यूनतम आयु तीस वर्ष नियत की गई जबकि निचले सदन के लिए यह पच्चीस वर्ष है| ऐसा भारत के उपराष्ट्रपति को राज्य सभा का पदेन सभापति बनाकर किया गया, जो इसकी बैठकों का सभापतित्व करते हैं| राज्य सभा को लोक सभा की अपेक्षा कुछ विशिष्ट अधिकार प्राप्त हैं| राज्य सभा के अधिकार एवं विशिष्ट कार्य अनुच्छेद 249 के अंतर्गत यदि राज्य सभा को ऐसा लगता है कि राष्ट्रीय हित में राज्य सूची के किसी विषय पर कानून बनाना अनिवार्य हो गया है तो ऐसी दशा में राज्य सभा विशेष बहुमत से एक संकल्प पारित कर संसद को इस बात के लिए अधिकृत कर सकती है कि वह उस विषय पर कानून बनाए हालांकि इस कानून का प्रभाव प्रारम्भ में केवल एक वर्ष तक रहेगा, इसके बाद इस कानून को पुनः एक वर्ष के लिए बढाया जा सकता है| अनुच्छेद 312 के अंतर्गत यदि राज्य सभा को यह लगता है किराष्ट्रीय हित में किसी अखिल भारतीय सेवा के सृजन की आवश्यकता है तो वह इस सम्बन्ध में विशेष बहुमत से एक संकल्प पारित कर संसद को इस सन्दर्भ में अधिकृत कर सकती है| अखिल भारतीय सेवा एवं केन्द्रीय सेवाओं में 2 प्रमुख अंतर होते हैं यथा अखिल भारतीय सेवा का कैडर हो सकता है किन्तु केन्द्रीय सेवा का कैडर नही हो सकता है, केन्द्रीय सेवा के अधिकारियों की केंद्र में प्रति नियुक्ति नही हो सकती है| अनु. 67B के अनुसार उपराष्ट्रपति को हटाने वाला प्रस्ताव राज्यसभा में ही लाया जा सकेगा| राज्य सभा के गैर परिसंघीय लक्षण अमेरिका में राज्य का आकार बड़ा हो या छोटा हो, सभी राज्यों से केवल 2 प्रतिनिधि ही सीनेट(ऊपरी सदन) के लिए चुने जाते हैं इसी लिए 50 अमेरिकी राज्यों से केवल 100 सदस्य आते हैं जिनसे मिलकर सीनेट का निर्माण होता है भारत में राज्य सभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व जनसंख्या के अनुसारहोता है जैसे उत्तर प्रदेश की जनसंख्या अधिक होने के कारण राज्य सभा के लिए सर्वाधिक सदस्य (31) भेजे जाते हैं वहीँ कम जनसंख्या होने के कारण मणिपुर आदि राज्यों से केवल 1 सदस्य भेजा जाता है| अर्थात राज्य सभा में राज्यों का असमान प्रतिनिधित्व एक गैर परिसंघीय लक्षण है अमेरिकी सीनेट के सदस्य भी सीधे लोगों द्वारा चुने जाते हैं, इनका कार्यकाल भी 6 वर्ष का होता है| दूसरी और भारत में राज्य सभा के सदस्यों का निर्वाचन जनता के द्वारा नहीं बल्कि विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया जाता है| अर्थात संघ का प्रतिनिधित्व लोगों के माध्यम से न हो कर उन दलों के माध्यम से होता है जो राज्य में चुनाव हारने के बाद भी राज्यसभा में बने रहते हैं अमेरिका में वही व्यक्ति किसी राज्य से सीनेट का चुनाव लड़ सकता है जो उस राज्य का स्थायी निवासी है| किन्तु भारत में किसी राज्य का निवासी किसी अन्य राज्य से भी राज्य सभा का चुनाव लड़ सकता है और राज्यसभा सदस्य बन सकता है| अमेरिका में सीनेट के अनुमोदन के बिना किसी भी उच्च संवैधानिक पद, जैसे संघ के मंत्री, SC के जज, संघ के महान्यायवादी आदि पदों पर आसीन नहीं हो सकते भले ही राष्ट्रपति ने उनको नियुक्त कर रखा हो| भारत में यह शक्ति राज्य सभा की बजाय नियुक्ति सम्बन्धी कैबिनेट समिति को है, जिसकी अध्यक्षता प्रधानमन्त्री करता है| कुछ मामलों में कोलेजियम तथा अन्य संस्थाएं यह कार्य करती हैं| अमेरिका में किसी भी अंतर्राष्ट्रीय संधि या समझौते आदि को कानूनी स्वीकार्यता तभी मिलती है जबकि सीनेट द्वारा उसका अनुमोदन कर दिया जाए| इसके विपरीत भारत में यह शक्ति कुछ मामलों में संसद जबकि कुछ मामलों में कार्यपालिका के पास है अर्थात यह शक्ति केवल राज्य सभा में निहित नही है| उपरोक्त सीमाओं के होते हुए भी स्वतंत्र भारत के लिए एक द्विसदनी विधानमंडल बनाने का निर्णय मुख्य रूप से इसलिए किया गया क्योंकि परिसंघीय प्रणाली को अपार विविधताओं वाले इतने विशाल देश के लिए सर्वाधिक सहज स्वरूप की सरकार माना गया। वस्तुत: एक प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित एकल सभा को स्वतंत्र भारत के समक्ष आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए अपर्याप्त समझा गया। अत: "काउंसिल ऑफ स्टेट्स" के रूप में ज्ञात एक ऐसे द्वितीय सदन का सृजन किया गया जिसकी संरचना और निर्वाचन पद्धति प्रत्यक्षत: निर्वाचित लोक सभा से पूर्णत: भिन्न है| देश की व्यवस्था में राज्यों के हितों के संरक्षण के सन्दर्भ में यह सभा कई दृष्टिकोणों से महत्वपूर्ण है|
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Q. What do you understand by good governance? Explain the key characteristics of good governance as given by UNDP. (150 words / 10 Marks)
Approach:- In the Introduction try to define Good governance In the body discuss its key features point-by-point. In conclusion, try to give suggestions to further strengthen Good Governance in India Answer - Good governance refers to the incorporation of social, economic, political units in such a way that they achieve their desired objectives. Through good governance, social, economic, and political justice can be achieved through administrative activities and free the administration from corruption and red tape. Key Characteristics of Good Governance: - Responsibility and responsiveness - The administration should be accountable to its functions on objective grounds and should complete the works as per rules within the prescribed limit. In order to ensure the availability of essential services to the public. Transparency - Putting all public activities in front of the public and lack of privacy is called transparency. Public participation - Shortening the distance between the people and the administration is an important part of involving the people towards the goals of governance. By increasing public participation, various problems can be solved easily such as in meeting the goal of cleanliness. Efficiency - Any nation needs to use its limited resources efficiently for its best development. So that the growing population and other challenges can be solved. Rule of law - The rule of law is an essential condition in avoiding the situation of anarchy and providing necessary conditions for all citizens to freely observe their rights. Equitable Development - Ensuring access to equal opportunities for development to the people of different sections of the society, regions and caste groups creates a better nation. Decision-based on consensus - Everyone in a democracy should have access to the government to solve problems. Along with this, various stakeholders should be included in the policymaking process while avoiding unilateral decisions. Inclusive development - Distribution of the benefits of development and prosperity of the nation to all the residents of the nation is called inclusive development. Conclusion Presently, the importance of good governance has increased in solving the challenges of inequality, poverty, etc. in Indian society so that the nation can be taken on a fast path of development
##Question:Q. What do you understand by good governance? Explain the key characteristics of good governance as given by UNDP. (150 words / 10 Marks)##Answer:Approach:- In the Introduction try to define Good governance In the body discuss its key features point-by-point. In conclusion, try to give suggestions to further strengthen Good Governance in India Answer - Good governance refers to the incorporation of social, economic, political units in such a way that they achieve their desired objectives. Through good governance, social, economic, and political justice can be achieved through administrative activities and free the administration from corruption and red tape. Key Characteristics of Good Governance: - Responsibility and responsiveness - The administration should be accountable to its functions on objective grounds and should complete the works as per rules within the prescribed limit. In order to ensure the availability of essential services to the public. Transparency - Putting all public activities in front of the public and lack of privacy is called transparency. Public participation - Shortening the distance between the people and the administration is an important part of involving the people towards the goals of governance. By increasing public participation, various problems can be solved easily such as in meeting the goal of cleanliness. Efficiency - Any nation needs to use its limited resources efficiently for its best development. So that the growing population and other challenges can be solved. Rule of law - The rule of law is an essential condition in avoiding the situation of anarchy and providing necessary conditions for all citizens to freely observe their rights. Equitable Development - Ensuring access to equal opportunities for development to the people of different sections of the society, regions and caste groups creates a better nation. Decision-based on consensus - Everyone in a democracy should have access to the government to solve problems. Along with this, various stakeholders should be included in the policymaking process while avoiding unilateral decisions. Inclusive development - Distribution of the benefits of development and prosperity of the nation to all the residents of the nation is called inclusive development. Conclusion Presently, the importance of good governance has increased in solving the challenges of inequality, poverty, etc. in Indian society so that the nation can be taken on a fast path of development
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Briefly mention the significance of the Kartarpur corridor in India-Pakistan relations. Also, discuss various policy options available to India in dealing with Pakistan.(150 words/10 marks)
Q. What is the significance of the Kartarpur corridor in India-Pakistan relations? Briefly discuss various policy options available with India in dealing with Pakistan. (250 words) Approach: Introduction : A brief introduction to the details of the Kartarpur corridor. Body: A brief discussion on the significance of the Kartarpur corridor in India-Pakistan relations. Enumerate various policy options available for India in dealing with Pakistan. Conclusion: Give a balancing conclusion acknowledging the fact that reconciliation between the countries is a long-term process. Model Answer: The Kartarpur Corridor is a visa-free border crossing and secure corridor, connecting the Gurdwara Darbar Sahib in Pakistan to the border with India. It was inaugurated in November 2019. Significance: The corridor has come up at a time when few avenues for India-Pakistan relations exist. In the past few years, not only has all official dialogue ceased but other exchanges by actors, artists, authors, academics, media and musicians have all but ended. In this perspective, this can be considered as a new beginning toward the reconciliation between the two countries. Also, as it provides visa-free travel to pilgrims from India, it promotes cultural ties as well as people-to-people ties. Moreover, it acts as a major confidence-building measure to bridge the trust deficit among the neighbours. Policy options for India: Thus, India needs a toolkit of options that involve pressure points imposing costs on any misdemeanour by Pakistan and incentives to create space for normalization when the opportunity arises. In order to create pressure, India should: · Work to create international pressure on Pakistan for its role in promoting terrorism. · Maintain adequate long-term and short-term military preparedness to respond to acts of disruption such as terrorism and sub-conventional warfare. · Adopt all diplomatic means including the demand for a renegotiation of the Indus Water Treaty. · Raise the issue of human rights in Baluchistan and voice its concerns on Gilgit Baltistan. · Strengthen its presence in Afghanistan even if Pakistan objects to it. On the other hand, to incentivize normalization, India should: · Engage Pakistan at all levels such as through diplomatic channels, dialogue between armed forces and back-channel negotiations. · Promote opportunities for improving trade even if it means making non-reciprocal gestures. · Promote people-to-people ties and civil society dialogue to create constituencies of peace on the other side of the border. · Project its soft power through art, culture, cinema and sports in order to create goodwill and win hearts and minds. · Explore the possibility of adopting a river basin management approach in the case of Indus waters. Any policy should be based on the acknowledgement of the fact that reconciling political and historical narratives as well as changes in the structural realities of the relations is a long-term process.
##Question:Briefly mention the significance of the Kartarpur corridor in India-Pakistan relations. Also, discuss various policy options available to India in dealing with Pakistan.(150 words/10 marks)##Answer:Q. What is the significance of the Kartarpur corridor in India-Pakistan relations? Briefly discuss various policy options available with India in dealing with Pakistan. (250 words) Approach: Introduction : A brief introduction to the details of the Kartarpur corridor. Body: A brief discussion on the significance of the Kartarpur corridor in India-Pakistan relations. Enumerate various policy options available for India in dealing with Pakistan. Conclusion: Give a balancing conclusion acknowledging the fact that reconciliation between the countries is a long-term process. Model Answer: The Kartarpur Corridor is a visa-free border crossing and secure corridor, connecting the Gurdwara Darbar Sahib in Pakistan to the border with India. It was inaugurated in November 2019. Significance: The corridor has come up at a time when few avenues for India-Pakistan relations exist. In the past few years, not only has all official dialogue ceased but other exchanges by actors, artists, authors, academics, media and musicians have all but ended. In this perspective, this can be considered as a new beginning toward the reconciliation between the two countries. Also, as it provides visa-free travel to pilgrims from India, it promotes cultural ties as well as people-to-people ties. Moreover, it acts as a major confidence-building measure to bridge the trust deficit among the neighbours. Policy options for India: Thus, India needs a toolkit of options that involve pressure points imposing costs on any misdemeanour by Pakistan and incentives to create space for normalization when the opportunity arises. In order to create pressure, India should: · Work to create international pressure on Pakistan for its role in promoting terrorism. · Maintain adequate long-term and short-term military preparedness to respond to acts of disruption such as terrorism and sub-conventional warfare. · Adopt all diplomatic means including the demand for a renegotiation of the Indus Water Treaty. · Raise the issue of human rights in Baluchistan and voice its concerns on Gilgit Baltistan. · Strengthen its presence in Afghanistan even if Pakistan objects to it. On the other hand, to incentivize normalization, India should: · Engage Pakistan at all levels such as through diplomatic channels, dialogue between armed forces and back-channel negotiations. · Promote opportunities for improving trade even if it means making non-reciprocal gestures. · Promote people-to-people ties and civil society dialogue to create constituencies of peace on the other side of the border. · Project its soft power through art, culture, cinema and sports in order to create goodwill and win hearts and minds. · Explore the possibility of adopting a river basin management approach in the case of Indus waters. Any policy should be based on the acknowledgement of the fact that reconciling political and historical narratives as well as changes in the structural realities of the relations is a long-term process.
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धन विधेयक को परिभाषित करते हुए इसके घटकों का वर्णन कीजिये। साथ ही वित्त विधेयक के साथ इसके सम्बन्ध को भी स्पष्ट कीजिये। (150 से 200 शब्द/ 10 अंक) While defining the money bill, describe its components. Also, clarify its relations with the Finance Bill. (150 to 200 words/ 10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में धन विधेयक को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में धन विधेयक के घटकों का वर्णन कीजिये 3- दुसरे भाग में धन विधेयक एवं वित्त विधेयक के अंतरों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये धन विधेयक को संविधान के अनुच्छेद 110 (1) के अंतर्गत परिभाषित किया गया है| कोई विधेयक धन विधेयक तब कहलाता है यदि उसमे करों के अधिरोपण, उन्मूलन, छूट, परिवर्तन या विनियमन से संबंधित प्रावधान होते हैं| एक साधारण विधेयक संसद के दोनों सदनों में से किसी में भी पेश किया जा सकता है, जबकि धन विधेयक केवल लोकसभा में ही पेश किया जा सकता है। धन विधेयक में निम्नलिखित घटक शामिल होते हैं| धन विधेयक के घटक धन विधेयक को किसी कर को लगाने , किसी विद्यमान कर को समाप्त करने, कर सम्बन्धी छूटें, वापसी या बटवारे का निर्णय लेने , किसी कर को विनियमित करना अर्थात उससे सम्बन्धित विवाद निपटारे के लिए नियम बनाने के सन्दर्भ में लाया जाता है| यदि सरकार ने आंतरिक या बाह्य स्रोत से कोई ऋण लिया है और उसके चुकता करने की गारंटी दी है अथवा कोई और वित्तीय देनदारी के लिए वह जिम्मेदार है तो इसका निर्धारण करना भारत की संचित निधि, आकस्मिक निधि और लोकलेखा निधि से पैसा निकालना अथवा उस पर कोई खर्च या सम्बन्धी दावेदारी करना, से सम्बन्धित नियम बनाना इसके अतिरिक्त उपरोक्त किसी भी मद से सम्बन्धित किसी मामले में कोई नियम बनाने के सन्दर्भ में धन विधेयक लाया जाता है| किन्तु धन विधेयक में निम्नलिखित को शामिल नही किया जाता यथा सरकार द्वारा अर्थ दंड लगाना या कोई जुर्माना वसूलना, किसी सेवा के बदले सरकार द्वारा कोई फीस या शुल्क लेना स्थानीय निकायों द्वारा कोई कर लगाना, कर समाप्त करना या उसका विनियमन करना जहाँ तक करों की दर में बदलाव का प्रश्न है, यह विशेषाधिकार केवल कार्यपालिका के पास है| दुसरे शब्दों में कर की दर अथवा राशि या कोई अन्य राशि के बढाने का प्रस्ताव जब तक कार्यपालिका की ओर से नहीं आयेगा, विधायिका इस सम्बन्ध में कुछ नहीं कर सकती है| धन विधेयक एवं वित्त विधेयक धन विधेयक व प्रथम श्रेणी के वित्त विधेयक के मध्य समानता धन विधेयक की भांति प्रथम श्रेणी के वित्त विधेयक को भी सदन में प्रस्तुत करने के पहले राष्ट्रपति की सहमति लेनी होती है इसे धन विधेयक की तरह ही केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है| प्रथम व द्वितीय श्रेणी के वित्त विधेयक के मध्य अंतर प्रथम श्रेणी का वित्त विधेयक वह विधेयक होता है जिसमें अनुच्छेद 110(1) के अंतर्गत वर्णित कोई मद शामिल होती है इसमें अनुच्छेद 110(1) में वर्णित सभी मदें भी शामिल हो सकती हैं दूसरी ओर द्वितीय श्रेणी का वित्त विधेयक वह विधेयक होता है जिसमें 110(1) में वर्णित सभी मदें शामिल नही होती हैं बल्कि कुछ अतिरिक्त मदें भी शामिल होती हैं जैसे GST का वर्णन प्रथम श्रेणी के वित्त विधेयक में आयेगा किन्तु GST परिषद् का वर्णन भी यदि साथ में हो तो उसे द्वितीय श्रेणी के वित्त विधेयक के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा द्वितीय श्रेणी का वित्त विधेयक साधारण विधेयक की तरह होता है जिसे राज्य सभा में भी प्रस्तुत किया जा सकता है धन विधेयक एवं प्रथम श्रेणी के वित्त विधेयक में प्रमुख अंतर कोई विधेयक धन विधेयक तभी माना जाएगा जब लोक सभा अध्यक्ष द्वारा उसको धन विधेयक होने का प्रमाणपत्र दे दिया जाए अन्यथा वह वित्त विधेयक अथवा साधारण विधेयक की श्रेणी में ही रहेगा धन विधेयक के मामले में राज्य सभा के पास लोक सभा की तुलना में बहुत सीमित शक्तियां होती हैं दूसरी और वित्त विधेयक के मामले में राज्य सभा के पास लोक सभा के समान शक्तियां होती हैं वित्त विधेयक को राज्य सभा अन्य विधेयकों की तरह ही खारिज कर सकती है, संशोधित कर सकती है अथवा 6 माह से अधिक समय तक अपने पास रोक कर रख सकती है साधारण विधेयक की भांति वित्त विधेयक पर गतिरोध दूर करने के लिए संसद की संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है | इस प्रकार स्पष्ट होता है कि धन विधेयक एवं वित्त विधेयक महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देते हैं| यद्यपि देश की राजकोषीय नीति के सन्दर्भ में दोनों का महत्वपूर्ण स्थान होता है|
##Question:धन विधेयक को परिभाषित करते हुए इसके घटकों का वर्णन कीजिये। साथ ही वित्त विधेयक के साथ इसके सम्बन्ध को भी स्पष्ट कीजिये। (150 से 200 शब्द/ 10 अंक) While defining the money bill, describe its components. Also, clarify its relations with the Finance Bill. (150 to 200 words/ 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में धन विधेयक को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में धन विधेयक के घटकों का वर्णन कीजिये 3- दुसरे भाग में धन विधेयक एवं वित्त विधेयक के अंतरों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये धन विधेयक को संविधान के अनुच्छेद 110 (1) के अंतर्गत परिभाषित किया गया है| कोई विधेयक धन विधेयक तब कहलाता है यदि उसमे करों के अधिरोपण, उन्मूलन, छूट, परिवर्तन या विनियमन से संबंधित प्रावधान होते हैं| एक साधारण विधेयक संसद के दोनों सदनों में से किसी में भी पेश किया जा सकता है, जबकि धन विधेयक केवल लोकसभा में ही पेश किया जा सकता है। धन विधेयक में निम्नलिखित घटक शामिल होते हैं| धन विधेयक के घटक धन विधेयक को किसी कर को लगाने , किसी विद्यमान कर को समाप्त करने, कर सम्बन्धी छूटें, वापसी या बटवारे का निर्णय लेने , किसी कर को विनियमित करना अर्थात उससे सम्बन्धित विवाद निपटारे के लिए नियम बनाने के सन्दर्भ में लाया जाता है| यदि सरकार ने आंतरिक या बाह्य स्रोत से कोई ऋण लिया है और उसके चुकता करने की गारंटी दी है अथवा कोई और वित्तीय देनदारी के लिए वह जिम्मेदार है तो इसका निर्धारण करना भारत की संचित निधि, आकस्मिक निधि और लोकलेखा निधि से पैसा निकालना अथवा उस पर कोई खर्च या सम्बन्धी दावेदारी करना, से सम्बन्धित नियम बनाना इसके अतिरिक्त उपरोक्त किसी भी मद से सम्बन्धित किसी मामले में कोई नियम बनाने के सन्दर्भ में धन विधेयक लाया जाता है| किन्तु धन विधेयक में निम्नलिखित को शामिल नही किया जाता यथा सरकार द्वारा अर्थ दंड लगाना या कोई जुर्माना वसूलना, किसी सेवा के बदले सरकार द्वारा कोई फीस या शुल्क लेना स्थानीय निकायों द्वारा कोई कर लगाना, कर समाप्त करना या उसका विनियमन करना जहाँ तक करों की दर में बदलाव का प्रश्न है, यह विशेषाधिकार केवल कार्यपालिका के पास है| दुसरे शब्दों में कर की दर अथवा राशि या कोई अन्य राशि के बढाने का प्रस्ताव जब तक कार्यपालिका की ओर से नहीं आयेगा, विधायिका इस सम्बन्ध में कुछ नहीं कर सकती है| धन विधेयक एवं वित्त विधेयक धन विधेयक व प्रथम श्रेणी के वित्त विधेयक के मध्य समानता धन विधेयक की भांति प्रथम श्रेणी के वित्त विधेयक को भी सदन में प्रस्तुत करने के पहले राष्ट्रपति की सहमति लेनी होती है इसे धन विधेयक की तरह ही केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है| प्रथम व द्वितीय श्रेणी के वित्त विधेयक के मध्य अंतर प्रथम श्रेणी का वित्त विधेयक वह विधेयक होता है जिसमें अनुच्छेद 110(1) के अंतर्गत वर्णित कोई मद शामिल होती है इसमें अनुच्छेद 110(1) में वर्णित सभी मदें भी शामिल हो सकती हैं दूसरी ओर द्वितीय श्रेणी का वित्त विधेयक वह विधेयक होता है जिसमें 110(1) में वर्णित सभी मदें शामिल नही होती हैं बल्कि कुछ अतिरिक्त मदें भी शामिल होती हैं जैसे GST का वर्णन प्रथम श्रेणी के वित्त विधेयक में आयेगा किन्तु GST परिषद् का वर्णन भी यदि साथ में हो तो उसे द्वितीय श्रेणी के वित्त विधेयक के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा द्वितीय श्रेणी का वित्त विधेयक साधारण विधेयक की तरह होता है जिसे राज्य सभा में भी प्रस्तुत किया जा सकता है धन विधेयक एवं प्रथम श्रेणी के वित्त विधेयक में प्रमुख अंतर कोई विधेयक धन विधेयक तभी माना जाएगा जब लोक सभा अध्यक्ष द्वारा उसको धन विधेयक होने का प्रमाणपत्र दे दिया जाए अन्यथा वह वित्त विधेयक अथवा साधारण विधेयक की श्रेणी में ही रहेगा धन विधेयक के मामले में राज्य सभा के पास लोक सभा की तुलना में बहुत सीमित शक्तियां होती हैं दूसरी और वित्त विधेयक के मामले में राज्य सभा के पास लोक सभा के समान शक्तियां होती हैं वित्त विधेयक को राज्य सभा अन्य विधेयकों की तरह ही खारिज कर सकती है, संशोधित कर सकती है अथवा 6 माह से अधिक समय तक अपने पास रोक कर रख सकती है साधारण विधेयक की भांति वित्त विधेयक पर गतिरोध दूर करने के लिए संसद की संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है | इस प्रकार स्पष्ट होता है कि धन विधेयक एवं वित्त विधेयक महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देते हैं| यद्यपि देश की राजकोषीय नीति के सन्दर्भ में दोनों का महत्वपूर्ण स्थान होता है|
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भारत में नागरिक सेवा के ऊपर राजनीतिक हस्तक्षेप की बढ़ रही घटनाओं ने उन्हे निर्धारित भूमिका पर काम करने की स्थिति को बाधित कर दिया है ऐसी स्थिति में नागरिक सेवकों के संबंध में किस प्रकार के कदम उठाए जाने चाहिए? (150-200 शब्द/10 अंक) The increasing incidence of political interference over civil service in India has hindered their position to work on the prescribed role, in this case what steps should be taken in relation to civil servants? (150-200 words/10 marks)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में कथन के संदर्भ को स्पष्ट कीजिए। इसके बाद स्पष्ट कीजिए कि राजनीतिक हस्तक्षेप न होने से पड़ने वाले सकारात्मक प्रभावों तथा इसका हस्तक्षेप करने का क्या नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इस समस्या के समाधान के सुझाव दीजिए। भारतीय शासन व्यवस्था में कार्यपालिका को दो भागों में बांटा जाता है, स्थायी और अस्थायी कार्यपालिका। स्थायी कार्यपालिका के अंतर्गत नौकरशाही आती है। अस्थायी कार्यपालिका में सरकार में शामिल राजनेता आते हैं। गौरतलब है कि नौकरशाही की स्थायी प्रवृत्ति के कारण राजनेता अपने विचारधारा के अनुरूप नीतियों के क्रियान्वयन के लिए उन पर हस्तक्षेप करती है। इस राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण नौकरशाही की मूल भावना प्रभावित होती है। नौकरशाही पर राजनीतिक हस्तक्षेप न होने से वास्तविक उद्देश्यों की पूर्ति की जा सकती है जैसे- यह लोकसेवकों के गैर-राजनीतिक प्रकृति में जनविश्वसनीयता को प्रोत्साहित करती है| किसी भी राजनीतिक दल के मंत्रियों को लोकसेवकों के वफ़ादारी में विश्वास को प्रोत्साहित करती है| यह लोकसेवकों के उच्चतर मनोबल को प्रोत्साहित करता है क्योंकि लोकसेवकों की पदोन्नति, पदस्थापना, तबादला तथा अन्य सेवा-शर्तें राजनीतिक मानकों पर आधारित ना होकर योग्यता पर आधारित होगा| यह लोकसेवकों के राजनीतिकरण को रोकने में सहायक सिद्ध होती है जो कि भ्रष्टाचार के रोकथाम की दिशा में कारगर सिद्ध होता है| लोकसेवकों का तटस्थ होना उसमें जनसेवा की भावना को विकसित करती है| मंत्री तथा सचिव के बीच के संबंध को अधिक सुचारू बनाना; लोकसेवकों की तटस्थता संसदीय शासन प्रणाली की अनिवार्यता को दर्शाती है| तटस्थता लोकसेवकों की कार्यकुशलता एवं प्रभावकारिता को प्रोत्साहित करने में सहायक सिद्ध होता है। परंतु समय के साथ बढ़ते राजनीतिक हस्तक्षेप ने नौकरशाही को निम्नलिखित प्रकार से प्रभावित किया है: सरकार/शासन में किसी भी प्रकार की लापरवाही होने पर किसी भी प्रकार के दायित्व को निर्धारित किया जाना संभव नहीं हो पाता है| यह विकासीय अनिवार्यताओं में बाधाओं/प्रतिरोध को उत्पन करता है| लोकसेवकों के द्वारा यथास्थिति को बनाए रखने पर बल दिया जाता है जो कि सुधारात्मक प्रयासों एवं नवाचार की प्रवृति को हतोत्साहित करती है। इस समस्या के समाधान के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए: लोकसेवकों के द्वारा राजनीतिक स्तर पर भी भेदभावरहित व्यवस्था को बनाए रखा जाना आवश्यक है एवं इस उद्देश्य से लोकसेवकों को राजनीतिक गतिविधियों में भागीदारी नहीं दी जानी चाहिए जो कि गैर-तरफदारी के मूल्य को दर्शाती है। टीएसआर सुब्रहमण्यम वाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए निर्णय को लागू करना। जिसमें नौकरशाहों के स्थानांतरण, पदोन्नति आदि के संबंध में निर्णय दिये गए थे सिविल सेवा आचरण नियमावली में आवश्यक संशोधन करते हुए नौकरशाहों के विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर प्रतिबंध को कम करना लोकसेवकों की तटस्थता को प्राप्त करने हेतु यह आवश्यक है कि लोकसेवकों के राजनीतिक गतिविधियों को प्रतिबंधित किया जाए। दलीय राजनीति के प्रति लोकसेवक को तटस्थ होना जबकि नीति राजनीति के प्रति लोकसेवक को प्रतिबद्ध होना। दलीय राजनीति के प्रति लोकसेवक को तटस्थ होना जबकि नीति राजनीति के प्रति लोकसेवक को प्रतिबद्ध होना| व्यवहारिकता में नीति राजनीति पर दलीय राजनीति के प्रभाव का होना जरुरी है अतः नीति राजनीति के प्रति लोकसेवक की प्रतिबद्धता अंततः दलीय राजनीति के प्रति वचनबद्धता को भी दर्शाती है जिसे रोकने हेतु लोकसेवकों के तटस्थता के मूल्य पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है
##Question:भारत में नागरिक सेवा के ऊपर राजनीतिक हस्तक्षेप की बढ़ रही घटनाओं ने उन्हे निर्धारित भूमिका पर काम करने की स्थिति को बाधित कर दिया है ऐसी स्थिति में नागरिक सेवकों के संबंध में किस प्रकार के कदम उठाए जाने चाहिए? (150-200 शब्द/10 अंक) The increasing incidence of political interference over civil service in India has hindered their position to work on the prescribed role, in this case what steps should be taken in relation to civil servants? (150-200 words/10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में कथन के संदर्भ को स्पष्ट कीजिए। इसके बाद स्पष्ट कीजिए कि राजनीतिक हस्तक्षेप न होने से पड़ने वाले सकारात्मक प्रभावों तथा इसका हस्तक्षेप करने का क्या नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इस समस्या के समाधान के सुझाव दीजिए। भारतीय शासन व्यवस्था में कार्यपालिका को दो भागों में बांटा जाता है, स्थायी और अस्थायी कार्यपालिका। स्थायी कार्यपालिका के अंतर्गत नौकरशाही आती है। अस्थायी कार्यपालिका में सरकार में शामिल राजनेता आते हैं। गौरतलब है कि नौकरशाही की स्थायी प्रवृत्ति के कारण राजनेता अपने विचारधारा के अनुरूप नीतियों के क्रियान्वयन के लिए उन पर हस्तक्षेप करती है। इस राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण नौकरशाही की मूल भावना प्रभावित होती है। नौकरशाही पर राजनीतिक हस्तक्षेप न होने से वास्तविक उद्देश्यों की पूर्ति की जा सकती है जैसे- यह लोकसेवकों के गैर-राजनीतिक प्रकृति में जनविश्वसनीयता को प्रोत्साहित करती है| किसी भी राजनीतिक दल के मंत्रियों को लोकसेवकों के वफ़ादारी में विश्वास को प्रोत्साहित करती है| यह लोकसेवकों के उच्चतर मनोबल को प्रोत्साहित करता है क्योंकि लोकसेवकों की पदोन्नति, पदस्थापना, तबादला तथा अन्य सेवा-शर्तें राजनीतिक मानकों पर आधारित ना होकर योग्यता पर आधारित होगा| यह लोकसेवकों के राजनीतिकरण को रोकने में सहायक सिद्ध होती है जो कि भ्रष्टाचार के रोकथाम की दिशा में कारगर सिद्ध होता है| लोकसेवकों का तटस्थ होना उसमें जनसेवा की भावना को विकसित करती है| मंत्री तथा सचिव के बीच के संबंध को अधिक सुचारू बनाना; लोकसेवकों की तटस्थता संसदीय शासन प्रणाली की अनिवार्यता को दर्शाती है| तटस्थता लोकसेवकों की कार्यकुशलता एवं प्रभावकारिता को प्रोत्साहित करने में सहायक सिद्ध होता है। परंतु समय के साथ बढ़ते राजनीतिक हस्तक्षेप ने नौकरशाही को निम्नलिखित प्रकार से प्रभावित किया है: सरकार/शासन में किसी भी प्रकार की लापरवाही होने पर किसी भी प्रकार के दायित्व को निर्धारित किया जाना संभव नहीं हो पाता है| यह विकासीय अनिवार्यताओं में बाधाओं/प्रतिरोध को उत्पन करता है| लोकसेवकों के द्वारा यथास्थिति को बनाए रखने पर बल दिया जाता है जो कि सुधारात्मक प्रयासों एवं नवाचार की प्रवृति को हतोत्साहित करती है। इस समस्या के समाधान के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए: लोकसेवकों के द्वारा राजनीतिक स्तर पर भी भेदभावरहित व्यवस्था को बनाए रखा जाना आवश्यक है एवं इस उद्देश्य से लोकसेवकों को राजनीतिक गतिविधियों में भागीदारी नहीं दी जानी चाहिए जो कि गैर-तरफदारी के मूल्य को दर्शाती है। टीएसआर सुब्रहमण्यम वाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए निर्णय को लागू करना। जिसमें नौकरशाहों के स्थानांतरण, पदोन्नति आदि के संबंध में निर्णय दिये गए थे सिविल सेवा आचरण नियमावली में आवश्यक संशोधन करते हुए नौकरशाहों के विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर प्रतिबंध को कम करना लोकसेवकों की तटस्थता को प्राप्त करने हेतु यह आवश्यक है कि लोकसेवकों के राजनीतिक गतिविधियों को प्रतिबंधित किया जाए। दलीय राजनीति के प्रति लोकसेवक को तटस्थ होना जबकि नीति राजनीति के प्रति लोकसेवक को प्रतिबद्ध होना। दलीय राजनीति के प्रति लोकसेवक को तटस्थ होना जबकि नीति राजनीति के प्रति लोकसेवक को प्रतिबद्ध होना| व्यवहारिकता में नीति राजनीति पर दलीय राजनीति के प्रभाव का होना जरुरी है अतः नीति राजनीति के प्रति लोकसेवक की प्रतिबद्धता अंततः दलीय राजनीति के प्रति वचनबद्धता को भी दर्शाती है जिसे रोकने हेतु लोकसेवकों के तटस्थता के मूल्य पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है
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Briefly explain the process of the formation of thunderstorms and lightning.(150 words/10 marks)
Q .Briefly explain the process of the formation of thunderstorm and lightening.(250 words) Approach: Introduction: A brief definition of the thunderstorm. Body: · Explain the three stages of the thunderstorm life cycle. · A brief discussion on the formation of the lightening. Model Answer: A thunderstorm is a well-grown cumulonimbus cloud producing thunder and lightening. These are caused by intense convection on moist hot days in hot, humid tropical areas like India very frequently. Life cycle of thunderstorm: The rising temperatures produce strong upward rising winds. These winds carry water droplets upwards, where they freeze, and fall down again. The swift movement of the falling water droplets along with the rising air create lightning and sound. This process of formation of the thunderstorms can be discussed in a life cycle approach consisting of the following three stages: 1.Developing stage: Cumulus clouds start to form and grow due to the rising thermal (or updraft). The rising updraft of air will begin to cool and condense as it rises. During this stage, small raindrops may begin to form and try to fall; however, the wind flow in the updraft can push the raindrops higher into the cloud rather than letting them fall out. Thus, this stage is characterised by: · Towering cumulus cloud indicates rising air; · Usually little if any rain; · Lasts about 10 minutes; · Occasional lightning. 2.Mature Stage: During the mature stage, the heaviest rain and (sometimes) hail fall from the storm. As long as the updraft can keep feeding the thunderstorm warm, humid air, it will continue to grow and intensify. Thus, this stage is characterised by: · Most likely time for hail, heavy rain, frequent lightning, strong winds, and tornadoes; · Storm occasionally has a black or dark green appearance; · Lasts an average of 10 to 20 minutes but some storms may last longer. 3.Dissipating Stage: The updraft is very weak or non-existent, and the downdraft is the main dominant force in the thunderstorm which slowly dies out .This stage is characterized by: · Rainfall decreases in intensity; · Can still produce a burst of strong winds; · Lightning remains a danger. Formation of Lightening: Lightning is a discharge of electricity and that happens when the negative charges (electrons) in the bottom of the cloud are attracted to the positive charges (protons) in the ground. In the early stages of development, air acts as an insulator between the positive and negative charges in the cloud and between the cloud and the ground. When the opposite charges builds up enough, this insulating capacity of the air breaks down and there is a rapid discharge of electricity causing lightning. Energy from a lightning channel heats the air to around 20000-25000 degrees centigrade. This causes the air to rapidly expand, creating a sound wave known as thunder. Tall objects such as trees and skyscrapers are commonly struck by lightning as their tops are closer to the base of the storm cloud.
##Question:Briefly explain the process of the formation of thunderstorms and lightning.(150 words/10 marks)##Answer:Q .Briefly explain the process of the formation of thunderstorm and lightening.(250 words) Approach: Introduction: A brief definition of the thunderstorm. Body: · Explain the three stages of the thunderstorm life cycle. · A brief discussion on the formation of the lightening. Model Answer: A thunderstorm is a well-grown cumulonimbus cloud producing thunder and lightening. These are caused by intense convection on moist hot days in hot, humid tropical areas like India very frequently. Life cycle of thunderstorm: The rising temperatures produce strong upward rising winds. These winds carry water droplets upwards, where they freeze, and fall down again. The swift movement of the falling water droplets along with the rising air create lightning and sound. This process of formation of the thunderstorms can be discussed in a life cycle approach consisting of the following three stages: 1.Developing stage: Cumulus clouds start to form and grow due to the rising thermal (or updraft). The rising updraft of air will begin to cool and condense as it rises. During this stage, small raindrops may begin to form and try to fall; however, the wind flow in the updraft can push the raindrops higher into the cloud rather than letting them fall out. Thus, this stage is characterised by: · Towering cumulus cloud indicates rising air; · Usually little if any rain; · Lasts about 10 minutes; · Occasional lightning. 2.Mature Stage: During the mature stage, the heaviest rain and (sometimes) hail fall from the storm. As long as the updraft can keep feeding the thunderstorm warm, humid air, it will continue to grow and intensify. Thus, this stage is characterised by: · Most likely time for hail, heavy rain, frequent lightning, strong winds, and tornadoes; · Storm occasionally has a black or dark green appearance; · Lasts an average of 10 to 20 minutes but some storms may last longer. 3.Dissipating Stage: The updraft is very weak or non-existent, and the downdraft is the main dominant force in the thunderstorm which slowly dies out .This stage is characterized by: · Rainfall decreases in intensity; · Can still produce a burst of strong winds; · Lightning remains a danger. Formation of Lightening: Lightning is a discharge of electricity and that happens when the negative charges (electrons) in the bottom of the cloud are attracted to the positive charges (protons) in the ground. In the early stages of development, air acts as an insulator between the positive and negative charges in the cloud and between the cloud and the ground. When the opposite charges builds up enough, this insulating capacity of the air breaks down and there is a rapid discharge of electricity causing lightning. Energy from a lightning channel heats the air to around 20000-25000 degrees centigrade. This causes the air to rapidly expand, creating a sound wave known as thunder. Tall objects such as trees and skyscrapers are commonly struck by lightning as their tops are closer to the base of the storm cloud.
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स्वतंत्र भारत में सामाजिक न्याय के विभिन्न चरण व उनकी उपलब्धियों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए । ( 150-200 शब्द ) Critically examine various stages of social justice and their achievements in independent India. (150-200 words)
दृष्टिकोण : सामाजिक न्याय को परिभाषित करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । स्वतंत्र भारत में सामाजिक न्याय के विभिन्न चरणों की चर्चा कीजिए । प्रत्येक चरण की उपलब्धियों व चुनौतियों की चर्चा कीजिए । प्रत्येक चरण में हुए बदलाओं के कारणों की भी संक्षिप्त चर्चा कीजिए । संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए । उत्तर : सामान्यतः सामाजिक न्याय से तात्पर्य है सामाज के वंचित समूहों तक कल्याणकारी योजनाओं की पहुँच सुनिश्चित करते हुए उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ना । सामाजिक न्याय किसी भी कल्याणकारी राज्य का प्राथमिक उद्देश होता है । भारत में भी हमें सामाजिक न्याय का क्रमबद्ध विकास आजादी के बाद ही देखने को मिलता है । अमर्त्य सेन के अनुसार सामाजिक न्याय के दो प्रमुख घटक होते हैं ।पहला आर्थिक प्रगति, जो न सिर्फ स्रोतों को ही सुलभ कराती है अपितु साथ ही यह भी सुनिश्चित करती है कि स्रोतों की निरंतरता भी बनी रहे ।दूसरा है लोक कल्याण । राज्य का मुख्य उद्देश आर्थिक दक्षता के बजाय लोकहितकारी नीतियों को बनाना तथा उनके क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना होता है । भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस आधार पर सामाजिक न्याय को निम्नलिखित तीन चरणों में बांटा जा सकता है । प्रथम चरण ( 1947-1991 तक ) : इस चरण में समाजवादी दृष्टिकोण के अंतर्गत आर्थिक विकास एवं लोककल्याण दोनों जिम्मेदारियाँ सार्वजनिक क्षेत्रों की थी । जिसमें नौकरशाही का महत्वपूर्ण योगदान अपेक्षित था । स्वतंत्र भारत में सामाजिक न्याय की आधारशिला इस चरण में रखी गई और सामाजिक न्याय की प्राप्ति को सरकार का एक प्रमुख उद्देश माना गया । तथापि इस कालखंड में न सिर्फ आर्थिक विकास की प्रगति धीमी रही बल्कि राजनीतिक स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार एवं 1970 के दशक से बढ़ी लोककल्याण के प्रति उदासीनता के कारण सामाजिक न्याय के लक्ष्य की प्राप्ति में बाधा उत्पन्न हुई । प्रसिद्ध राजनीतिक विश्लेषक व लेखक रजनी कोठारी के अनुसार इस कालखंड में यधपि पहचान आधारित राजनीति एवं भ्रष्टाचार जैसी समस्याएं दिखी परंतु यह समय लोककल्याण हेतु आवश्यक नींव रखने हेतु जाना जाएगा । द्वितीय चरण ( 1991-2004 तक ) : इस चरण में आर्थिक प्रगति की जिम्मेदारी निजी उपक्रमों पर दी गई और राज्य धीरे-धीरे आर्थिक गतिविधियों से बाहर आने लगा । निजीकरण, वैश्वीकरण आदि के माध्यमों से सोच को उदारवादी, लोकतांत्रिक बनाते हुए अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए खोला गया ।इस कालखंड में राज्य का प्रमुख उद्देश लोककल्याणकारी नीतियों का निर्माण व क्रियान्वयन माना गया तथा आर्थिक प्रगति के संदर्भ में राज्य की भूमिका नियामक की रही ।इस कालखंड के सबसे महत्वपूर्ण सुपरिणाम लोककल्याण हेतु बजटीय आवंटन में बढ़ावा तथा प्रशासनिक सुधार, सिटीजन चार्टर, सूचना के अधिकार आदि माध्यमों से जबावदेही सुनिश्चित करना मुख्य उद्देश रहे । तृतीय चरण ( 2005-अबतक ) : इस कालखंड में गवर्नमेंट से गवर्नेंस की तरफ एक नए नीति दृष्टिकोण के अंतर्गत विकास उद्योगों को प्रोत्साहित किया गया ।इस कालखंड में आर्थिक प्रगति एवं सामाजिक लोककल्याण दोनों उद्देश्यों को निजी उपक्रमों, गैर सरकारी संगठनों, सिविल सोसायटियों एवं जन सहभागिता के माध्यम से सुनिश्चित करने के माध्यम से प्रयास किए गए ।नौकरशाही का मुख्य कार्य अब क्रियान्वयन के बजाय नियामक एवं स्रोतों के प्रबंधन के संदर्भ में सुनिश्चित किया गया । साथ ही इस कालखंड में जबावदेही , पारदर्शिता, सूचना का अधिकार एवं सोशल ऑडिट के माध्यम से यह भी सुनिश्चित किया गया कि सामाजिक न्याय के संदर्भ में दक्षता को बढ़ाया जाए । इस प्रकार हम देखते हैं कि सामाजिक न्याय के संदर्भ में भारत में एक क्रमिक विकास देखने को मिलता है । जहां प्रथम चरण में आर्थिक स्रोत के साथ-साथ सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने का दायित्व सरकार पर ही था वहीं आगे के चरणों में सरकार की भूमिका नियामक की होती गई और अन्य दायित्व क्रमिक रूप से निजी क्षेत्र को सौपें जा रहे हैं ।
##Question:स्वतंत्र भारत में सामाजिक न्याय के विभिन्न चरण व उनकी उपलब्धियों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए । ( 150-200 शब्द ) Critically examine various stages of social justice and their achievements in independent India. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण : सामाजिक न्याय को परिभाषित करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । स्वतंत्र भारत में सामाजिक न्याय के विभिन्न चरणों की चर्चा कीजिए । प्रत्येक चरण की उपलब्धियों व चुनौतियों की चर्चा कीजिए । प्रत्येक चरण में हुए बदलाओं के कारणों की भी संक्षिप्त चर्चा कीजिए । संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए । उत्तर : सामान्यतः सामाजिक न्याय से तात्पर्य है सामाज के वंचित समूहों तक कल्याणकारी योजनाओं की पहुँच सुनिश्चित करते हुए उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ना । सामाजिक न्याय किसी भी कल्याणकारी राज्य का प्राथमिक उद्देश होता है । भारत में भी हमें सामाजिक न्याय का क्रमबद्ध विकास आजादी के बाद ही देखने को मिलता है । अमर्त्य सेन के अनुसार सामाजिक न्याय के दो प्रमुख घटक होते हैं ।पहला आर्थिक प्रगति, जो न सिर्फ स्रोतों को ही सुलभ कराती है अपितु साथ ही यह भी सुनिश्चित करती है कि स्रोतों की निरंतरता भी बनी रहे ।दूसरा है लोक कल्याण । राज्य का मुख्य उद्देश आर्थिक दक्षता के बजाय लोकहितकारी नीतियों को बनाना तथा उनके क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना होता है । भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस आधार पर सामाजिक न्याय को निम्नलिखित तीन चरणों में बांटा जा सकता है । प्रथम चरण ( 1947-1991 तक ) : इस चरण में समाजवादी दृष्टिकोण के अंतर्गत आर्थिक विकास एवं लोककल्याण दोनों जिम्मेदारियाँ सार्वजनिक क्षेत्रों की थी । जिसमें नौकरशाही का महत्वपूर्ण योगदान अपेक्षित था । स्वतंत्र भारत में सामाजिक न्याय की आधारशिला इस चरण में रखी गई और सामाजिक न्याय की प्राप्ति को सरकार का एक प्रमुख उद्देश माना गया । तथापि इस कालखंड में न सिर्फ आर्थिक विकास की प्रगति धीमी रही बल्कि राजनीतिक स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार एवं 1970 के दशक से बढ़ी लोककल्याण के प्रति उदासीनता के कारण सामाजिक न्याय के लक्ष्य की प्राप्ति में बाधा उत्पन्न हुई । प्रसिद्ध राजनीतिक विश्लेषक व लेखक रजनी कोठारी के अनुसार इस कालखंड में यधपि पहचान आधारित राजनीति एवं भ्रष्टाचार जैसी समस्याएं दिखी परंतु यह समय लोककल्याण हेतु आवश्यक नींव रखने हेतु जाना जाएगा । द्वितीय चरण ( 1991-2004 तक ) : इस चरण में आर्थिक प्रगति की जिम्मेदारी निजी उपक्रमों पर दी गई और राज्य धीरे-धीरे आर्थिक गतिविधियों से बाहर आने लगा । निजीकरण, वैश्वीकरण आदि के माध्यमों से सोच को उदारवादी, लोकतांत्रिक बनाते हुए अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए खोला गया ।इस कालखंड में राज्य का प्रमुख उद्देश लोककल्याणकारी नीतियों का निर्माण व क्रियान्वयन माना गया तथा आर्थिक प्रगति के संदर्भ में राज्य की भूमिका नियामक की रही ।इस कालखंड के सबसे महत्वपूर्ण सुपरिणाम लोककल्याण हेतु बजटीय आवंटन में बढ़ावा तथा प्रशासनिक सुधार, सिटीजन चार्टर, सूचना के अधिकार आदि माध्यमों से जबावदेही सुनिश्चित करना मुख्य उद्देश रहे । तृतीय चरण ( 2005-अबतक ) : इस कालखंड में गवर्नमेंट से गवर्नेंस की तरफ एक नए नीति दृष्टिकोण के अंतर्गत विकास उद्योगों को प्रोत्साहित किया गया ।इस कालखंड में आर्थिक प्रगति एवं सामाजिक लोककल्याण दोनों उद्देश्यों को निजी उपक्रमों, गैर सरकारी संगठनों, सिविल सोसायटियों एवं जन सहभागिता के माध्यम से सुनिश्चित करने के माध्यम से प्रयास किए गए ।नौकरशाही का मुख्य कार्य अब क्रियान्वयन के बजाय नियामक एवं स्रोतों के प्रबंधन के संदर्भ में सुनिश्चित किया गया । साथ ही इस कालखंड में जबावदेही , पारदर्शिता, सूचना का अधिकार एवं सोशल ऑडिट के माध्यम से यह भी सुनिश्चित किया गया कि सामाजिक न्याय के संदर्भ में दक्षता को बढ़ाया जाए । इस प्रकार हम देखते हैं कि सामाजिक न्याय के संदर्भ में भारत में एक क्रमिक विकास देखने को मिलता है । जहां प्रथम चरण में आर्थिक स्रोत के साथ-साथ सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने का दायित्व सरकार पर ही था वहीं आगे के चरणों में सरकार की भूमिका नियामक की होती गई और अन्य दायित्व क्रमिक रूप से निजी क्षेत्र को सौपें जा रहे हैं ।
50,000
उपयुक्त उदाहरणों के माध्यम से सल्तनत युगीन अर्थव्यवस्था के प्रमुख अभिलक्षणों को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Explain the salient features of the Sultanate era economy through suitable examples. (150 to 200 words, 10 marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में दिल्ली सल्तनत के बारे में संक्षिप्त जानकारी दीजिये 2- मुख्य भाग में विभिन्न उपशीर्षकों के अंतर्गत सल्तनत युगीन अर्थव्यवस्था के अभिलक्षणों को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये पूर्व मध्यकाल के बाद भारत में स्थापित होने होने वाली सम्पूर्ण प्रणाली को सल्तनत काल की संज्ञा दी जाती है| सल्तनत युग की स्थापना 1206 AD में मानी जाती है| पूर्ववर्ती सामंतवादी राजनीति प्रणाली के विपरीत दिल्ली सल्तनत मुख्यतः एक केंद्रीकृत राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत संचालित होती है| राजनीतिक प्रणाली में हुए उपरोक्त परिवर्तन के परिणामस्वरूप तत्कालीन प्रशासनिक, आर्थिक एवं सामाजिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण परिवर्तनों को सम्भव बनाया| इस काल में एक उन्नत अर्थव्यवस्था का विकास हुआ जिसे हम निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत समझ सकते हैं| कर प्रणाली राज्य की आय का मुख्य स्रोत खराज़ था जोकि भू-राजस्व के रूप में लिया जाता था| अलाउद्दीन खिलजी ने दिल्ली सल्तनत के इतिहास में पहली बार कर की राशि में पूर्व के 1/6 से बढाकर 1/2 कर दिया था. जबकि पूरे सल्तनत काल में किसानों से उनकी पैदावार का 1/3 भाग लिया जाता था. गैर-मुसलमानों से भी इस काल में कर वसूला जाता था जिसे जजिया कहते थे. इसी तरह ज़कात नामक एक कर भी लिया जाता था| यह कर वस्तुतः निर्धनों की सहायता के लिए संपन्न वर्ग से लिया जाता था| खुम्स लूट का धन होता था. इस धन का 1/5 राजकोष में तथा 4/5 भाग सैनिकों में बाँट दिया जाता था, लेकिन अलाउद्दीन ख़िलजी एवंमुहम्मद तुग़लक़लूट के धन का 4/5 भाग राजकोष में जमा करवाते थे तथा शेष 1/5 भाग सैनिकों में वितरित कर दिया जाता था| कृषि अर्थव्यवस्था सल्तनत काल में कृषि के विकास के लिए शासकों के द्वारा नहरों का निर्माण कराया गया फलों की कृषि तथा शस्यावर्तन की पद्धति पर बल दिया गया सिंचाई के क्षेत्र में रहट का प्रचलन देखा जा सकता है, इसे ईरानी प्रभाव माना जाता है रहट गहरे कुओं तथा तालाबों से पानी निकालने के काम आता था, इसे चलाने के लिए पशु शक्ति का प्रयोग किया जाता था शिल्पकारी धागे के निर्माण के लिए अब चरखे का प्रयोग किया जाने लगा रुई को साफ़ करने के लिए अब धनुक नामक यंत्र का प्रयोग किया जाने लगा अब कागज़ का बड़े पैमाने पर प्रचलन हो गया था तथा जिल्दसाजी की कला का विकास हुआ बर्तनों में कलई करने की विधा का प्रचलन था सल्तनत काल में आसवन विधि से शराब एवं इत्र का निर्माण किया जाता था व्यापार-वाणिज्य इस समय ग्रामीण क्षेत्र की अर्थव्यवस्था का स्वरुप बदला और यह वाणिज्य आधारित अर्थव्यवस्था के रूप में ढलती गयी पश्चिम व मध्य एशिया, पूर्वी अफ्रीका तथा दक्षिण पूर्वी एशिया के साथ व्यापार होता था कपडे, मसाले, अनाज, लौह उपकरण आदिनिर्यात की प्रमुख मदें थीं जबकिघोड़े, शराब, दास आदि आयात की प्रमुख मदें थीं इस समय पश्चिमी तट पर लाहरीबंदर( सिंध में), देवल, खम्भात, गोवा, भटकल, कालीकट आदि महत्वपूर्ण बंदरगाह थे जबकि सतगांव, मसुलीपत्तनं, पुलिकट आदि पूर्वी तट के महत्वपूर्ण बन्दरगाह थे इस समय विदेश व्यापार में खुरासानी एवं ईरानी व्यापारियों की महत्वपूर्ण भूमिका थी मुद्रा विनिमय पूर्व मध्य काल की तुलना में अब क्रमशः अधिकाधिक सिक्कों का प्रचलन होने लगा था मुहम्मद गौरी ने देहलीवाल नामक सिक्के(सिक्कों पर लक्ष्मी की आकृति) जारी किये जबकि इल्तुतमिश ने चांदी का टंका और तांबे का जीतल नामक सिक्के चलाये| दाम एवं दिरहम नामक कम मूल्य के तांबे के सिक्कों का प्रचलन भी दिखाई देता है| फिरोजशाह तुगलक के काल में शसगनी नामक कम मूल्य वाले चांदी के सिक्के जारी किये गए शहरीकरण तुर्कों की सत्ता के पश्चात विभिन्न कारणों से शहरों का तेजी से विकास देखने को मिलता है इस शहरीकरण के लिए राजनीतिक-प्रशासनिक, व्यापारिक केंद्र, धार्मिक तीर्थ आदिकारण प्रमुख रूप से उत्तरदायी थे आर्थिक कारणों में अभिजात्य वर्ग की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए शहर शिल्प निर्माण के केंद्र बनते गए अजमेर, नागौर, दिल्ली का निजामुद्दीन क्षेत्र धार्मिक कारणों से विकसित नगरीय क्षेत्र थे इस समय विभिन्न शासकों द्वारा कई नगरों को विकसित किया गया जैसे जौनपुर, हिसार-फिरोजा, आगरा आदि| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि सल्तनत युगीन अर्थव्यवस्था, पूर्व मध्यकालीन आर्थिक परिस्थितियों से अनेक अर्थों में भिन्न थी| पूर्ववर्ती सामंतवादी अर्थव्यवस्था से महत्वपूर्ण अंतरों को देखते हुए विभिन्न इतिहासकारों द्वारा सल्तनत युगीन परिवर्तनों को शहरी क्रान्ति अथवा तृतीय नगरीय क्रान्ति के रूप में माना गया है|
##Question:उपयुक्त उदाहरणों के माध्यम से सल्तनत युगीन अर्थव्यवस्था के प्रमुख अभिलक्षणों को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Explain the salient features of the Sultanate era economy through suitable examples. (150 to 200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में दिल्ली सल्तनत के बारे में संक्षिप्त जानकारी दीजिये 2- मुख्य भाग में विभिन्न उपशीर्षकों के अंतर्गत सल्तनत युगीन अर्थव्यवस्था के अभिलक्षणों को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये पूर्व मध्यकाल के बाद भारत में स्थापित होने होने वाली सम्पूर्ण प्रणाली को सल्तनत काल की संज्ञा दी जाती है| सल्तनत युग की स्थापना 1206 AD में मानी जाती है| पूर्ववर्ती सामंतवादी राजनीति प्रणाली के विपरीत दिल्ली सल्तनत मुख्यतः एक केंद्रीकृत राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत संचालित होती है| राजनीतिक प्रणाली में हुए उपरोक्त परिवर्तन के परिणामस्वरूप तत्कालीन प्रशासनिक, आर्थिक एवं सामाजिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण परिवर्तनों को सम्भव बनाया| इस काल में एक उन्नत अर्थव्यवस्था का विकास हुआ जिसे हम निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत समझ सकते हैं| कर प्रणाली राज्य की आय का मुख्य स्रोत खराज़ था जोकि भू-राजस्व के रूप में लिया जाता था| अलाउद्दीन खिलजी ने दिल्ली सल्तनत के इतिहास में पहली बार कर की राशि में पूर्व के 1/6 से बढाकर 1/2 कर दिया था. जबकि पूरे सल्तनत काल में किसानों से उनकी पैदावार का 1/3 भाग लिया जाता था. गैर-मुसलमानों से भी इस काल में कर वसूला जाता था जिसे जजिया कहते थे. इसी तरह ज़कात नामक एक कर भी लिया जाता था| यह कर वस्तुतः निर्धनों की सहायता के लिए संपन्न वर्ग से लिया जाता था| खुम्स लूट का धन होता था. इस धन का 1/5 राजकोष में तथा 4/5 भाग सैनिकों में बाँट दिया जाता था, लेकिन अलाउद्दीन ख़िलजी एवंमुहम्मद तुग़लक़लूट के धन का 4/5 भाग राजकोष में जमा करवाते थे तथा शेष 1/5 भाग सैनिकों में वितरित कर दिया जाता था| कृषि अर्थव्यवस्था सल्तनत काल में कृषि के विकास के लिए शासकों के द्वारा नहरों का निर्माण कराया गया फलों की कृषि तथा शस्यावर्तन की पद्धति पर बल दिया गया सिंचाई के क्षेत्र में रहट का प्रचलन देखा जा सकता है, इसे ईरानी प्रभाव माना जाता है रहट गहरे कुओं तथा तालाबों से पानी निकालने के काम आता था, इसे चलाने के लिए पशु शक्ति का प्रयोग किया जाता था शिल्पकारी धागे के निर्माण के लिए अब चरखे का प्रयोग किया जाने लगा रुई को साफ़ करने के लिए अब धनुक नामक यंत्र का प्रयोग किया जाने लगा अब कागज़ का बड़े पैमाने पर प्रचलन हो गया था तथा जिल्दसाजी की कला का विकास हुआ बर्तनों में कलई करने की विधा का प्रचलन था सल्तनत काल में आसवन विधि से शराब एवं इत्र का निर्माण किया जाता था व्यापार-वाणिज्य इस समय ग्रामीण क्षेत्र की अर्थव्यवस्था का स्वरुप बदला और यह वाणिज्य आधारित अर्थव्यवस्था के रूप में ढलती गयी पश्चिम व मध्य एशिया, पूर्वी अफ्रीका तथा दक्षिण पूर्वी एशिया के साथ व्यापार होता था कपडे, मसाले, अनाज, लौह उपकरण आदिनिर्यात की प्रमुख मदें थीं जबकिघोड़े, शराब, दास आदि आयात की प्रमुख मदें थीं इस समय पश्चिमी तट पर लाहरीबंदर( सिंध में), देवल, खम्भात, गोवा, भटकल, कालीकट आदि महत्वपूर्ण बंदरगाह थे जबकि सतगांव, मसुलीपत्तनं, पुलिकट आदि पूर्वी तट के महत्वपूर्ण बन्दरगाह थे इस समय विदेश व्यापार में खुरासानी एवं ईरानी व्यापारियों की महत्वपूर्ण भूमिका थी मुद्रा विनिमय पूर्व मध्य काल की तुलना में अब क्रमशः अधिकाधिक सिक्कों का प्रचलन होने लगा था मुहम्मद गौरी ने देहलीवाल नामक सिक्के(सिक्कों पर लक्ष्मी की आकृति) जारी किये जबकि इल्तुतमिश ने चांदी का टंका और तांबे का जीतल नामक सिक्के चलाये| दाम एवं दिरहम नामक कम मूल्य के तांबे के सिक्कों का प्रचलन भी दिखाई देता है| फिरोजशाह तुगलक के काल में शसगनी नामक कम मूल्य वाले चांदी के सिक्के जारी किये गए शहरीकरण तुर्कों की सत्ता के पश्चात विभिन्न कारणों से शहरों का तेजी से विकास देखने को मिलता है इस शहरीकरण के लिए राजनीतिक-प्रशासनिक, व्यापारिक केंद्र, धार्मिक तीर्थ आदिकारण प्रमुख रूप से उत्तरदायी थे आर्थिक कारणों में अभिजात्य वर्ग की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए शहर शिल्प निर्माण के केंद्र बनते गए अजमेर, नागौर, दिल्ली का निजामुद्दीन क्षेत्र धार्मिक कारणों से विकसित नगरीय क्षेत्र थे इस समय विभिन्न शासकों द्वारा कई नगरों को विकसित किया गया जैसे जौनपुर, हिसार-फिरोजा, आगरा आदि| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि सल्तनत युगीन अर्थव्यवस्था, पूर्व मध्यकालीन आर्थिक परिस्थितियों से अनेक अर्थों में भिन्न थी| पूर्ववर्ती सामंतवादी अर्थव्यवस्था से महत्वपूर्ण अंतरों को देखते हुए विभिन्न इतिहासकारों द्वारा सल्तनत युगीन परिवर्तनों को शहरी क्रान्ति अथवा तृतीय नगरीय क्रान्ति के रूप में माना गया है|
50,002
वाताग्र से आप क्या समझते हैं? वाताग्र के विभिन्न प्रकारों का विस्तृत उल्लेख कीजिए। (150-200 शब्द ) What do you understand by the fronts? Describe in detail the different types of fronts. (150-200 Words)
एप्रोच:- सर्वप्रथम, वाताग्र का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,वाताग्र के विभिन्न प्रकारों का विस्तृत उल्लेख कीजिए। अंत में निष्कर्षतः संक्षेप में वाताग्र के महत्त्व का उल्लेख करते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- वाताग्र निम्नवायुदाब के क्षेत्र में तब विकसितहोता हैजब दो विपरीत प्रकृति की वायुराशी विपरीत दिशा से आकर आपस में मिलती है। वाताग्र के विकास के लिएएक वायुराशिठंडी,शुष्क एवं भारी तथा दूसरी वायुराशिगर्म, हल्की एवं आर्द्र होनी चाहिए।इन वाताग्रों पर ठंडी एवं सघन वायुराशि, गर्म एवं हल्की वायुराशि को ऊपर उठा देती है। वाताग्र आसानी से परस्पर मिश्रित नहीं होते हैं। यह न तो धरातलीय सतहके समानांतर होता है और न ही उसके ऊपर लम्बवत होता है बल्कि ढलुआ सीमा के साथ एक दूसरे के सम्पर्क में आते हैं। ढलुआ सीमा एक संक्रमण का क्षेत्र होता है जिसके आर पार मौसम की दशाओं में काफी अंतर होता है।वाताग्र मध्य अक्षाशों में निर्मित होते हैं और तीव्र वायुदाब और तापमान प्रवणता इनकी विशेषताएंहोती हैं। ये तापमान में अचानक बदलाव लातेहैं जिसके कारण वायु ऊपर उठती है और बादल का निर्माण करती है। वाताग्र के प्रकार:- उष्ण वाताग्र: -उष्णकटिबंधीय क्षेत्र की ओर जहाँ गर्म पछुआ वायु आक्रामक होती है वहां उष्ण वाताग्र का विकास होता है। इसमें उष्ण वायुराशियाँ सक्रिय रूप से ठंडी और भारी वायुराशियों के ऊपर आरोहित हो जाती हैं। यह गर्म वायुराशि नीचे से ठंडी होती है जिससेसंघनन के बाद बादलों का निर्माण तथा वर्षा होनी शुरू हो जाती है। उष्ण वाताग्र में मंद ढाल के सहारे बड़े क्षेत्रों में और अपेक्षाकृत अधिक समय तक वर्षा प्राप्त होती है। यहाँ वर्षा मुख्यतः वर्षा स्तरी बादलों से होती है। बादलों का क्षैतिज विस्तार अधिक क्षेत्र में होने के कारण वर्षा उष्ण वाताग्र के प्रभाव वाले सभी क्षेत्रों में प्राप्त हो जातीहै। शीत वाताग्र:- शीत वाताग्र में ठंडी वायु के आक्रामक होने के कारण यह गर्म वायु को तीव्रता से उपर उठा देता है जिससे तीव्र ढाल वाले सीमाग्र का निर्माण होता है। यहाँ मुख्यतः वर्षा कपासी बादलों द्वारा वर्षा होती है। वर्षा अपेक्षाकृत तूफानी मौसम के साथ मुसलाधार होती है, जिससे कम समय में अधिक वर्षा प्राप्त होती है।इसमें तड़ितझंझा की भी उत्पत्ति होती है। तीव्र गति के कारण यह हजारों किलोमीटर दूर तक प्रवेश कर जाती है। शीतोष्ण चक्रवात की तूफानी वर्षा शीत वाताग्रों से ही संबंधित है। स्थाई वाताग्र: -जब वायुराशियों में किसी प्रकार की गति नहीं होती है तो उनके मध्य का वाताग्र कुछ समय के लिए स्थिर रहता है। जब शीतवाताग्र और उष्ण वाताग्र स्थिर हो जाएँ तो स्थाई वाताग्र का निर्माण होता है। जिस क्षेत्र में ऐसे वाताग्र का निर्माण हो जाता है वहां लगातार कई दिनों तक आकाश मेघाच्छादित रहता है। ऐसीदशा में मौसम लम्बे समय तक स्थिर बना रहता है,जिससे कई दिनों तक हल्की बूंदा-बूंदी होतीरहती है। अधिविष्ट वाताग्र :-यदि एक वायुराशि पूर्णतः धरातल के ऊपर उठ जाये तो ऐसे वाताग्र को अधिविष्ट वाताग्र कहते हैं। जब शीत वाताग्र अपनी तीव्र गति के कारण उष्ण वाताग्र तक पहुँच कर उससे मिल जाता है तो धरातल के साथ उष्ण वायुराशि का सम्पर्क समाप्त हो जाता है एवं अधिविष्ट वाताग्र का का निर्माण होता है। यह सामान्तया निम्न वायुदाब वाले क्षेत्रों के आसपास निर्मित होता है। इस प्रकार मौसम में परिवर्तन एवं वर्षा के संदर्भ में सभी वाताग्रों का अपना अपना महत्व है। ये सभी वाताग्र भिन्न भिन्न प्रदेशों में वहां मौसम में बदलाव द्वारा वहां के जीवन को प्रभावितकरते हैं।
##Question:वाताग्र से आप क्या समझते हैं? वाताग्र के विभिन्न प्रकारों का विस्तृत उल्लेख कीजिए। (150-200 शब्द ) What do you understand by the fronts? Describe in detail the different types of fronts. (150-200 Words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, वाताग्र का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,वाताग्र के विभिन्न प्रकारों का विस्तृत उल्लेख कीजिए। अंत में निष्कर्षतः संक्षेप में वाताग्र के महत्त्व का उल्लेख करते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- वाताग्र निम्नवायुदाब के क्षेत्र में तब विकसितहोता हैजब दो विपरीत प्रकृति की वायुराशी विपरीत दिशा से आकर आपस में मिलती है। वाताग्र के विकास के लिएएक वायुराशिठंडी,शुष्क एवं भारी तथा दूसरी वायुराशिगर्म, हल्की एवं आर्द्र होनी चाहिए।इन वाताग्रों पर ठंडी एवं सघन वायुराशि, गर्म एवं हल्की वायुराशि को ऊपर उठा देती है। वाताग्र आसानी से परस्पर मिश्रित नहीं होते हैं। यह न तो धरातलीय सतहके समानांतर होता है और न ही उसके ऊपर लम्बवत होता है बल्कि ढलुआ सीमा के साथ एक दूसरे के सम्पर्क में आते हैं। ढलुआ सीमा एक संक्रमण का क्षेत्र होता है जिसके आर पार मौसम की दशाओं में काफी अंतर होता है।वाताग्र मध्य अक्षाशों में निर्मित होते हैं और तीव्र वायुदाब और तापमान प्रवणता इनकी विशेषताएंहोती हैं। ये तापमान में अचानक बदलाव लातेहैं जिसके कारण वायु ऊपर उठती है और बादल का निर्माण करती है। वाताग्र के प्रकार:- उष्ण वाताग्र: -उष्णकटिबंधीय क्षेत्र की ओर जहाँ गर्म पछुआ वायु आक्रामक होती है वहां उष्ण वाताग्र का विकास होता है। इसमें उष्ण वायुराशियाँ सक्रिय रूप से ठंडी और भारी वायुराशियों के ऊपर आरोहित हो जाती हैं। यह गर्म वायुराशि नीचे से ठंडी होती है जिससेसंघनन के बाद बादलों का निर्माण तथा वर्षा होनी शुरू हो जाती है। उष्ण वाताग्र में मंद ढाल के सहारे बड़े क्षेत्रों में और अपेक्षाकृत अधिक समय तक वर्षा प्राप्त होती है। यहाँ वर्षा मुख्यतः वर्षा स्तरी बादलों से होती है। बादलों का क्षैतिज विस्तार अधिक क्षेत्र में होने के कारण वर्षा उष्ण वाताग्र के प्रभाव वाले सभी क्षेत्रों में प्राप्त हो जातीहै। शीत वाताग्र:- शीत वाताग्र में ठंडी वायु के आक्रामक होने के कारण यह गर्म वायु को तीव्रता से उपर उठा देता है जिससे तीव्र ढाल वाले सीमाग्र का निर्माण होता है। यहाँ मुख्यतः वर्षा कपासी बादलों द्वारा वर्षा होती है। वर्षा अपेक्षाकृत तूफानी मौसम के साथ मुसलाधार होती है, जिससे कम समय में अधिक वर्षा प्राप्त होती है।इसमें तड़ितझंझा की भी उत्पत्ति होती है। तीव्र गति के कारण यह हजारों किलोमीटर दूर तक प्रवेश कर जाती है। शीतोष्ण चक्रवात की तूफानी वर्षा शीत वाताग्रों से ही संबंधित है। स्थाई वाताग्र: -जब वायुराशियों में किसी प्रकार की गति नहीं होती है तो उनके मध्य का वाताग्र कुछ समय के लिए स्थिर रहता है। जब शीतवाताग्र और उष्ण वाताग्र स्थिर हो जाएँ तो स्थाई वाताग्र का निर्माण होता है। जिस क्षेत्र में ऐसे वाताग्र का निर्माण हो जाता है वहां लगातार कई दिनों तक आकाश मेघाच्छादित रहता है। ऐसीदशा में मौसम लम्बे समय तक स्थिर बना रहता है,जिससे कई दिनों तक हल्की बूंदा-बूंदी होतीरहती है। अधिविष्ट वाताग्र :-यदि एक वायुराशि पूर्णतः धरातल के ऊपर उठ जाये तो ऐसे वाताग्र को अधिविष्ट वाताग्र कहते हैं। जब शीत वाताग्र अपनी तीव्र गति के कारण उष्ण वाताग्र तक पहुँच कर उससे मिल जाता है तो धरातल के साथ उष्ण वायुराशि का सम्पर्क समाप्त हो जाता है एवं अधिविष्ट वाताग्र का का निर्माण होता है। यह सामान्तया निम्न वायुदाब वाले क्षेत्रों के आसपास निर्मित होता है। इस प्रकार मौसम में परिवर्तन एवं वर्षा के संदर्भ में सभी वाताग्रों का अपना अपना महत्व है। ये सभी वाताग्र भिन्न भिन्न प्रदेशों में वहां मौसम में बदलाव द्वारा वहां के जीवन को प्रभावितकरते हैं।
50,008
ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल के ईमानदारी सूचकांक में भारत की स्थिति अतिदयनीय है, ऐसी स्थिति का कारण बताते हुए भारत सरकार को किस दिशा में काम करना चाहिए? क्या यह कहना तर्क संगत होगा कि भ्रष्टाचार के बीज भारतीय समाज और प्रशासन तंत्र में पहले से ही विद्यमान है? (150-200 शब्द; 10 अंक) India"s position in Transparency International"s Integrity Index is pathetic, explain the reason for such a situation, in which direction should the Government of India work? Would it be logical to say that the seeds of corruption are already present in Indian society and governance system? (150-200 words; 10 Marks)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में प्रश्न के संदर्भ को स्पष्ट कीजिए। इसके बाद भारत में भ्रष्टाचार के कारण लिखिए। इस समस्या के समाधान के लिए सरकार द्वारा उठाए जा सकने वाले कदमों का भी विवरण दीजिए। आखिरी भाग में किसी एक पक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिए। ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार भ्रष्टाचार सूचकांक में भारत 78वें स्थान पर है। भारत की यह रैंकिंग चीन, अमेरिका, ब्राज़ील आदि प्रतिस्पर्द्धि देशों की तुलना में बहुत ही खराब है। इसके साथ ही भ्रष्टाचार की यह स्थिति सभी स्तरों, क्षेत्रों में विद्यमान है। भ्रष्टाचार के कारण: द्वितीय ARC की रिपोर्ट्स में यह स्पष्ट किया गया है कि नैतिकता मानक नियमों का एक समुच्चय है जिनके अभाव में भ्रष्टाचार बढ़ हो रहा है औपनिवेशिक काल की पैतृक संपत्ति की उपलब्धता से कुछ अधिकारी या राज्य से सम्बन्धित कर्मचारी, भ्रष्टाचार के द्वारा अर्जित की गयी संपत्ति की आसानी से खपत कर लेते हैं भारतीय समाज में विद्यमान सत्ता में अनेक विषमताएं हैं| यहाँ तक कि असंगठित क्षेत्रों, शिक्षा प्रणालियों आदि में नैतिकता में मानदंडों को भी सत्तासीन वर्ग द्वारा बदल दिया जाता है| उदाहरण के लिए कुछ राजनीतिक दल एवं अधिकारी समूह है जो पूँजी के केन्द्रीयकरण को अनिवार्य मानते हैं और इसके लिए तर्क देते हैं कि केंद्रीकृत पूँजी से ही औद्योगीकरण को बढ़ावा दिया जा सकता है| जबकि दूसरी ओर कुछ राजनीति दल एवं अधिकारी नागरिकों की क्रय क्षमता को विकसित करना ही आर्थिक नैतिकता का आधार मानते हैं| राजनीतिक विचारधाराओं एवं दृष्टिकोण में अंतर दिखता है संघ या राज्यों के द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी एवं उसमें विद्यमान विवेकाधिकार मनमानेपन को जन्म देता है जो भ्रष्टाचार का एक बहुत बड़ा कारण है नागरिक सेवकों के स्थानान्तरण में मंत्रियों का एकाधिकार एवं विवेकाधिकार भ्रष्टाचार की जड़ है| यहाँ तक भारत में इसे स्थानान्तरण उद्योग की संज्ञा दी गयी है विद्यमान पदसोपानीयता ने अति केन्द्रीकरण का रूप धारण कर लिया है| जिसके कारण व्यवस्था में भ्रष्टाचार पनपता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार स्वरूपतः परिवेशीय है जो कि ऐतिहासिक, राजनीतिक, प्रशासनिक, आर्थिक, विधिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों के अंतःक्रिया का एक सम्मिलित परिणाम है|अतः भ्रष्टाचार विविध एवं बहुल कारकों का एक सम्मिलित परिणाम होता है। भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए सरकार को निम्न दिशा में कार्य करना चाहिए: भ्रष्टाचार एवं सत्ता के दुरुपयोग से निकलने के लिए अधिकारियों के मूल्यों और चरित्र पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए सूचना प्रौद्योगिकी तंत्र का अधिकाधिक मात्रा में प्रयोग किया जाना चाहिए ताकि अधिकारी के द्वारा किये गए प्रत्येक कार्य को सार्वजनिक किया जा सके| भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के दायरे में विस्तार किया जाना चाहिएतथा ऐसे कामों को जो संविधान, लोकतंत्र में बाधक हों, न्याय के विपरीत हों या अनुचित रूप से पक्षपातपूर्ण हों आदि को अधिनियम के तहत अपराध घोषित किया जाना चाहिए कपटपूर्ण रिश्वतखोरी (राज्य, जनता या जनता के हितों को हानि पहुचाते हुए रिश्वत खोरी करना) को अपराध की श्रेणी में लाना चाहिए| ऐसी किसी लोकसेवक के विरुद्ध जो भ्रष्टाचार में रंगे हाथों पकड़ा गया हो अथवा उसके पास आय से अधिक संपत्ति हो, के ऊपर कार्यवाही करने के लिए किसी भी पूर्वानुमति की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए| यदि किसी मामले में भारत सरकार की स्वीकृति अनिवार्य हो तो ऐसी स्वीकृति केन्द्रीय सतर्कता आयोग और विभागीय सचिव की आधिकारिक समिति द्वारा दी जानी चाहिए ऐसे लोकसेवकों के लिए दंड के अतिरिक्त प्रावधान होने चाहिए जो राज्य और नागरिकों को हानि पहुचाते हैं भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत सुनवाई करने वाले न्यायाधीशों को दैनिक आधार पर कार्यवाही करनी चाहिए और अवांछित विलम्ब से बचना चाहिए सार्वजनिक महत्त्व से जुड़े निजी क्षेत्रों को भ्रष्टाचार अधिनियम के दायरे में लाना चाहिए भ्रष्ट लोकसेवक(संपत्ति जब्ती) विधेयक शीघ्र ही पारित किया जाना चाहिए बेनामी लेन देन प्रतिषेध अधिनियम का सख्ती से पालन होना चाहिए व्हिसल ब्लोविंग करने वाले अधिकारियों को पर्याप्त सुरक्षा दी जानी चाहिए विशेषाधिकार से सम्बन्धित संविधान के अनुच्छेद 105(2) और 194(2) को संशोधित किये जाने की आवश्यकता है ऐसे अधिकारी जो अच्छा बर्ताव करते हैं उन्हें समय समय पर पुरस्कृत किया जाना चाहिए जबकि अच्छा बर्ताव न करने वालों को दण्डित करने का प्रावधान होना चाहिए। भ्रष्टाचार के कारणों और वर्तमान प्रवृत्ति को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इसके बीज पहले से ही विद्यमान हैं: स्वतंत्रता के समय विशेषकर उच्चतर स्तर पर सरकारी अधिकारियों की संख्या में भारी कमी का होना एवं इस कमी को पूरा करने हेतु सरकार के द्वारा भर्ती करते समय सत्यनिष्ठा जैसे पहलुओं पर विशेष बल नहीं दिया गया भारतीय शिक्षा व्यवस्था में मूल्यों का अभाव। समाज में कुलीनता की भावना ने एक ऐसी प्रतिस्पर्द्धा को जन्म दिया जो एक दूसरे से आगे बढ्ने के लिए गलत साधनों का प्रयोग सामान्य सी बात हो गयी। समान्यतः ऐसा देखा गया है कि व्यक्तिगत प्रवृत्ति जो आवश्यकता से अधिक अर्जन को प्रेरित करती है उसके कारण भी भ्रष्टाचार के बीज विकसित हुए।
##Question:ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल के ईमानदारी सूचकांक में भारत की स्थिति अतिदयनीय है, ऐसी स्थिति का कारण बताते हुए भारत सरकार को किस दिशा में काम करना चाहिए? क्या यह कहना तर्क संगत होगा कि भ्रष्टाचार के बीज भारतीय समाज और प्रशासन तंत्र में पहले से ही विद्यमान है? (150-200 शब्द; 10 अंक) India"s position in Transparency International"s Integrity Index is pathetic, explain the reason for such a situation, in which direction should the Government of India work? Would it be logical to say that the seeds of corruption are already present in Indian society and governance system? (150-200 words; 10 Marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में प्रश्न के संदर्भ को स्पष्ट कीजिए। इसके बाद भारत में भ्रष्टाचार के कारण लिखिए। इस समस्या के समाधान के लिए सरकार द्वारा उठाए जा सकने वाले कदमों का भी विवरण दीजिए। आखिरी भाग में किसी एक पक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिए। ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार भ्रष्टाचार सूचकांक में भारत 78वें स्थान पर है। भारत की यह रैंकिंग चीन, अमेरिका, ब्राज़ील आदि प्रतिस्पर्द्धि देशों की तुलना में बहुत ही खराब है। इसके साथ ही भ्रष्टाचार की यह स्थिति सभी स्तरों, क्षेत्रों में विद्यमान है। भ्रष्टाचार के कारण: द्वितीय ARC की रिपोर्ट्स में यह स्पष्ट किया गया है कि नैतिकता मानक नियमों का एक समुच्चय है जिनके अभाव में भ्रष्टाचार बढ़ हो रहा है औपनिवेशिक काल की पैतृक संपत्ति की उपलब्धता से कुछ अधिकारी या राज्य से सम्बन्धित कर्मचारी, भ्रष्टाचार के द्वारा अर्जित की गयी संपत्ति की आसानी से खपत कर लेते हैं भारतीय समाज में विद्यमान सत्ता में अनेक विषमताएं हैं| यहाँ तक कि असंगठित क्षेत्रों, शिक्षा प्रणालियों आदि में नैतिकता में मानदंडों को भी सत्तासीन वर्ग द्वारा बदल दिया जाता है| उदाहरण के लिए कुछ राजनीतिक दल एवं अधिकारी समूह है जो पूँजी के केन्द्रीयकरण को अनिवार्य मानते हैं और इसके लिए तर्क देते हैं कि केंद्रीकृत पूँजी से ही औद्योगीकरण को बढ़ावा दिया जा सकता है| जबकि दूसरी ओर कुछ राजनीति दल एवं अधिकारी नागरिकों की क्रय क्षमता को विकसित करना ही आर्थिक नैतिकता का आधार मानते हैं| राजनीतिक विचारधाराओं एवं दृष्टिकोण में अंतर दिखता है संघ या राज्यों के द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी एवं उसमें विद्यमान विवेकाधिकार मनमानेपन को जन्म देता है जो भ्रष्टाचार का एक बहुत बड़ा कारण है नागरिक सेवकों के स्थानान्तरण में मंत्रियों का एकाधिकार एवं विवेकाधिकार भ्रष्टाचार की जड़ है| यहाँ तक भारत में इसे स्थानान्तरण उद्योग की संज्ञा दी गयी है विद्यमान पदसोपानीयता ने अति केन्द्रीकरण का रूप धारण कर लिया है| जिसके कारण व्यवस्था में भ्रष्टाचार पनपता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार स्वरूपतः परिवेशीय है जो कि ऐतिहासिक, राजनीतिक, प्रशासनिक, आर्थिक, विधिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों के अंतःक्रिया का एक सम्मिलित परिणाम है|अतः भ्रष्टाचार विविध एवं बहुल कारकों का एक सम्मिलित परिणाम होता है। भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए सरकार को निम्न दिशा में कार्य करना चाहिए: भ्रष्टाचार एवं सत्ता के दुरुपयोग से निकलने के लिए अधिकारियों के मूल्यों और चरित्र पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए सूचना प्रौद्योगिकी तंत्र का अधिकाधिक मात्रा में प्रयोग किया जाना चाहिए ताकि अधिकारी के द्वारा किये गए प्रत्येक कार्य को सार्वजनिक किया जा सके| भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के दायरे में विस्तार किया जाना चाहिएतथा ऐसे कामों को जो संविधान, लोकतंत्र में बाधक हों, न्याय के विपरीत हों या अनुचित रूप से पक्षपातपूर्ण हों आदि को अधिनियम के तहत अपराध घोषित किया जाना चाहिए कपटपूर्ण रिश्वतखोरी (राज्य, जनता या जनता के हितों को हानि पहुचाते हुए रिश्वत खोरी करना) को अपराध की श्रेणी में लाना चाहिए| ऐसी किसी लोकसेवक के विरुद्ध जो भ्रष्टाचार में रंगे हाथों पकड़ा गया हो अथवा उसके पास आय से अधिक संपत्ति हो, के ऊपर कार्यवाही करने के लिए किसी भी पूर्वानुमति की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए| यदि किसी मामले में भारत सरकार की स्वीकृति अनिवार्य हो तो ऐसी स्वीकृति केन्द्रीय सतर्कता आयोग और विभागीय सचिव की आधिकारिक समिति द्वारा दी जानी चाहिए ऐसे लोकसेवकों के लिए दंड के अतिरिक्त प्रावधान होने चाहिए जो राज्य और नागरिकों को हानि पहुचाते हैं भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत सुनवाई करने वाले न्यायाधीशों को दैनिक आधार पर कार्यवाही करनी चाहिए और अवांछित विलम्ब से बचना चाहिए सार्वजनिक महत्त्व से जुड़े निजी क्षेत्रों को भ्रष्टाचार अधिनियम के दायरे में लाना चाहिए भ्रष्ट लोकसेवक(संपत्ति जब्ती) विधेयक शीघ्र ही पारित किया जाना चाहिए बेनामी लेन देन प्रतिषेध अधिनियम का सख्ती से पालन होना चाहिए व्हिसल ब्लोविंग करने वाले अधिकारियों को पर्याप्त सुरक्षा दी जानी चाहिए विशेषाधिकार से सम्बन्धित संविधान के अनुच्छेद 105(2) और 194(2) को संशोधित किये जाने की आवश्यकता है ऐसे अधिकारी जो अच्छा बर्ताव करते हैं उन्हें समय समय पर पुरस्कृत किया जाना चाहिए जबकि अच्छा बर्ताव न करने वालों को दण्डित करने का प्रावधान होना चाहिए। भ्रष्टाचार के कारणों और वर्तमान प्रवृत्ति को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इसके बीज पहले से ही विद्यमान हैं: स्वतंत्रता के समय विशेषकर उच्चतर स्तर पर सरकारी अधिकारियों की संख्या में भारी कमी का होना एवं इस कमी को पूरा करने हेतु सरकार के द्वारा भर्ती करते समय सत्यनिष्ठा जैसे पहलुओं पर विशेष बल नहीं दिया गया भारतीय शिक्षा व्यवस्था में मूल्यों का अभाव। समाज में कुलीनता की भावना ने एक ऐसी प्रतिस्पर्द्धा को जन्म दिया जो एक दूसरे से आगे बढ्ने के लिए गलत साधनों का प्रयोग सामान्य सी बात हो गयी। समान्यतः ऐसा देखा गया है कि व्यक्तिगत प्रवृत्ति जो आवश्यकता से अधिक अर्जन को प्रेरित करती है उसके कारण भी भ्रष्टाचार के बीज विकसित हुए।
50,015
महिलाओं के पोषण एवं स्वास्थ्य सुधार हेतु सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द; 10 अंक) Discuss the efforts being made by the government to improve the nutrition and health of women. (150-200 words; 10 Marks)
Approach: महिलाओं के स्वास्थ्य एवं पोषण के प्रमुख मुद्दों को संक्षिप्त में लिखते हुए भूमिका लिख सकते हैं। भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य व पोषण की स्थिति पर चर्चा कीजिये। इस संदर्भ में भारत सरकार द्वारा चलायी जा रही योजनाओं व कार्यक्रमों की बिंदुवत चर्चा कीजिये। निष्कर्ष में इन्हें प्रभावी रूप से लागू करने हेतु सुझाव दे सकते हैं। उत्तर: विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्वास्थ्य से तात्पर्य महज रोगों के ना होने से नहीं हैं अपितु किसी व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक एवं दार्शनिक संदर्भों में गुणवत्तापूर्ण शैली से है। भारत में महिलाओं के बचपन से पोषण एवं स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ मौजूद हैं। बालिका अवस्था में शुद्ध खाद्य, पेयजल, विद्यालयों में शौचालय आदि, किशोरियों में मासिक धर्म, सेनेटरी से जुड़ी चिंताएँ, गर्भवती महिलाओं के पोषण व सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ मौजूद हैं। भारत में गरीबी के उच्च स्तर, लैंगिक असमानता, वेतन असमानता, सामाजिक असमानता के उच्च स्तर को देखते हुए महिलाओं के पोषण व स्वास्थ्य की स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है जिसे दूर करने के लिए सरकार द्वारा विभिन्न कार्यक्रम व योजनाएँ संचालित की जा रही हैं। भारत सरकार द्वारा महिलाओं के स्वास्थ्य की दिशा में चलाये जा रहे प्रमुख कार्यक्रम राजीव गांधी किशोरी सशक्तिकरण कार्यक्रम (सबला) जननी सुरक्षा योजना 2005 संस्थागत प्रसव को सुनिश्चित करना गर्भवती महिलाओं तथा नवजात शिशुओं के पोषण एवं टीकाकरण को सुनिश्चित करना जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम सार्वभौमिक स्तर पर सभी महिलाओं को संस्थागत प्रसव का लाभ लेने हेतु न सिर्फ नि:शुल्क संस्थागत प्रसव बल्कि सामान्य प्रसव में 3 दिन तक एवं ऑपरेशन वाले प्रसव में 8 दिन तक आवश्यक पोषण एवं दवाएं भी उपलब्ध करायी जाती है। मदर एवं चाइल्ड ट्रेकिंग सिस्टम इस कार्यक्रम के अंतर्गत गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं से संबन्धित सभी आंकड़ों को एकीकृत करते हुए डिजिटलीकृत किया जा रहा है। प्रधानमंत्री मातृत्व वंदन योजना गर्भवती महिलाओं को आर्थिक सहायता के साथ साथ उचित पोषण एवं टीकाकरण हेतु विभिन्न कैंपों के माध्यम से निरीक्षित किया जा रहा है। राष्ट्रीय पोषण मिशन वर्ल्ड बैंक के सहयोग से 50% की आर्थिक मदद द्वारा महिलाओं एवं बच्चों में कुपोषण की समस्या को दूर करना बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना की तीन मुख्य लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए शुरुआत की गयी। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना के यह लक्ष्य कुछ इस प्रकार से हैं: कन्या भ्रूण हत्या का रोकथाम कन्याओं की सुरक्षा व समृद्धि बालिकाओं की शिक्षा और भागीदारी सुनिश्चित करना सभी योजनाओं का लक्ष्य महिलाओ के पोषण व स्वास्थ्य सुधार द्वारा सामाजिक-आर्थिक संकेतकों में सुधार करना है। शिशु मृत्यु दर, मातृ मृत्यु दर में सुधार होना अपेक्षित है। महिलाओं को लक्षित करते हुए, ICT के प्रभावी प्रयोग, जन जागरूकता में वृद्धि कर, पुरुषों में संवेदनशीलता में वृद्धि कर इन योजनाओं के अपेक्षित लाभों को प्राप्त किया जा सकता है।
##Question:महिलाओं के पोषण एवं स्वास्थ्य सुधार हेतु सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द; 10 अंक) Discuss the efforts being made by the government to improve the nutrition and health of women. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:Approach: महिलाओं के स्वास्थ्य एवं पोषण के प्रमुख मुद्दों को संक्षिप्त में लिखते हुए भूमिका लिख सकते हैं। भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य व पोषण की स्थिति पर चर्चा कीजिये। इस संदर्भ में भारत सरकार द्वारा चलायी जा रही योजनाओं व कार्यक्रमों की बिंदुवत चर्चा कीजिये। निष्कर्ष में इन्हें प्रभावी रूप से लागू करने हेतु सुझाव दे सकते हैं। उत्तर: विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्वास्थ्य से तात्पर्य महज रोगों के ना होने से नहीं हैं अपितु किसी व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक एवं दार्शनिक संदर्भों में गुणवत्तापूर्ण शैली से है। भारत में महिलाओं के बचपन से पोषण एवं स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ मौजूद हैं। बालिका अवस्था में शुद्ध खाद्य, पेयजल, विद्यालयों में शौचालय आदि, किशोरियों में मासिक धर्म, सेनेटरी से जुड़ी चिंताएँ, गर्भवती महिलाओं के पोषण व सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ मौजूद हैं। भारत में गरीबी के उच्च स्तर, लैंगिक असमानता, वेतन असमानता, सामाजिक असमानता के उच्च स्तर को देखते हुए महिलाओं के पोषण व स्वास्थ्य की स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है जिसे दूर करने के लिए सरकार द्वारा विभिन्न कार्यक्रम व योजनाएँ संचालित की जा रही हैं। भारत सरकार द्वारा महिलाओं के स्वास्थ्य की दिशा में चलाये जा रहे प्रमुख कार्यक्रम राजीव गांधी किशोरी सशक्तिकरण कार्यक्रम (सबला) जननी सुरक्षा योजना 2005 संस्थागत प्रसव को सुनिश्चित करना गर्भवती महिलाओं तथा नवजात शिशुओं के पोषण एवं टीकाकरण को सुनिश्चित करना जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम सार्वभौमिक स्तर पर सभी महिलाओं को संस्थागत प्रसव का लाभ लेने हेतु न सिर्फ नि:शुल्क संस्थागत प्रसव बल्कि सामान्य प्रसव में 3 दिन तक एवं ऑपरेशन वाले प्रसव में 8 दिन तक आवश्यक पोषण एवं दवाएं भी उपलब्ध करायी जाती है। मदर एवं चाइल्ड ट्रेकिंग सिस्टम इस कार्यक्रम के अंतर्गत गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं से संबन्धित सभी आंकड़ों को एकीकृत करते हुए डिजिटलीकृत किया जा रहा है। प्रधानमंत्री मातृत्व वंदन योजना गर्भवती महिलाओं को आर्थिक सहायता के साथ साथ उचित पोषण एवं टीकाकरण हेतु विभिन्न कैंपों के माध्यम से निरीक्षित किया जा रहा है। राष्ट्रीय पोषण मिशन वर्ल्ड बैंक के सहयोग से 50% की आर्थिक मदद द्वारा महिलाओं एवं बच्चों में कुपोषण की समस्या को दूर करना बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना की तीन मुख्य लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए शुरुआत की गयी। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना के यह लक्ष्य कुछ इस प्रकार से हैं: कन्या भ्रूण हत्या का रोकथाम कन्याओं की सुरक्षा व समृद्धि बालिकाओं की शिक्षा और भागीदारी सुनिश्चित करना सभी योजनाओं का लक्ष्य महिलाओ के पोषण व स्वास्थ्य सुधार द्वारा सामाजिक-आर्थिक संकेतकों में सुधार करना है। शिशु मृत्यु दर, मातृ मृत्यु दर में सुधार होना अपेक्षित है। महिलाओं को लक्षित करते हुए, ICT के प्रभावी प्रयोग, जन जागरूकता में वृद्धि कर, पुरुषों में संवेदनशीलता में वृद्धि कर इन योजनाओं के अपेक्षित लाभों को प्राप्त किया जा सकता है।
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