Question
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हिमालयी व प्रायद्वीपीय नदियों के बीच प्रमुख अंतरों की चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द; 10 अंक ) Discuss the major differences between Himalayan and Peninsular rivers. (150-200 words; 10 mark)
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दृष्टिकोण : हिमालयी व प्रायद्वीपीय नदियों के संबंध में संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । बिंदवार रूप में दोनों के बीच के प्रमुख अंतरों की चर्चा कीजिये । दोनों नदी तंत्र के महत्व की संक्षिप्त चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : भारत में नदियों को मुख्यतः हिमालयी व प्रायद्वीपीय के रूप में वर्गीकृत किया गया है । हिमालयी अपवाह तंत्र दीर्घ भूगार्भीक इतिहास में विकसित हुआ है । हिमालयी नदी तंत्र का विकास मायोसीन कल्प में शिवालिक या इंडो ब्रह्म नदी से माना जाता है । प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र हिमालयी अपवाह तंत्र से पुराना माना जाता है । हिमालयी व प्रायद्वीपीय नदियों के बीच प्रमुख अंतर को हम निम्नलिखित रूपों में देख सकते हैं : उद्गम स्थल : हिमालयी नदियां हिम से ढके हिमालय पर्वत के ग्लेशियर से निकलती है जबकि प्रायद्वीपीय नदियां प्रायद्वीपीय पठार व मध्य उच्च भूमि से निकलती है । जल के स्रोत में अंतर : हिमालयी नदियों में वर्षा व हिमपिघलन दोनों स्रोतों से जल कीउपलब्धता सुनिश्चित होती है जबकि प्रायद्वीपीय नदियों में केवल वर्षा ही स्रोत है । प्रवाह प्रवृति : इस कारण हिमालयी नदियां सदानीरा होती हैं जबकि प्रायद्वीपीय नदियां ग्रीष्मऋतु में कुछ भागों में सूख जाती हैं । अप्रवाह के प्रकार : हिमालयी नदियां पूर्ववर्ती व अनुवर्ती हैं । मैदानी भाग में वृक्षाकार प्रारूप में जबकि प्रायद्वीपीय नदियां अध्यारोपित, पुनर्युवनित नदियां हैं जो अरीय व आयताकार प्रारूप बनाती हैं । नदी की प्रकृति : लंबा मार्ग, उबड़-खाबड़ पर्वतों से गुजरती नदियां , अभिशीर्ष अपरदन व नदी अपरदन , मैदानों में मार्ग बदलना तथा विसर्प बनाना हिमालयी नदियों की विशेषता है जबकि सुसमायोजित घाटियों के साथ छोटे निश्चित मार्ग प्रायद्वीपीय नदियों की विशेषता हैं जलग्रहण क्षेत्र : हिमालयी नदियों की द्रोणी काफी बड़ी जबकि प्रायद्वीपीय नदियों की द्रोणी अपेक्षाकृत छोटी । नदी की आयु : हिमालयी नदियां युवा, क्रियाशील हैं तथा घाटियों को गहरा करने का कार्य कर रही है जबकि प्रायद्वीपीय नदियाँ प्रवणित परिच्छेदिका वाली प्रौढ़ नदियां हैं , जो अपने आधार तल जा पहुंची है । उपरोक्त भिन्नताओं का प्रभाव इन दोनों नदियों से जुड़े आर्थिक व अन्य गतिविधियों पर भी स्पष्ट रूप में पड़ता है । जैसे - सिंचाई, जलमार्ग, जल विधुत उत्पादन , मत्स्य पालन आदि की दृष्टि से भी हिमालयी नदियां प्रायद्वीपीय नदियों की तुलना अधिक महत्वपूर्ण है ।
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##Question:हिमालयी व प्रायद्वीपीय नदियों के बीच प्रमुख अंतरों की चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द; 10 अंक ) Discuss the major differences between Himalayan and Peninsular rivers. (150-200 words; 10 mark)##Answer:दृष्टिकोण : हिमालयी व प्रायद्वीपीय नदियों के संबंध में संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । बिंदवार रूप में दोनों के बीच के प्रमुख अंतरों की चर्चा कीजिये । दोनों नदी तंत्र के महत्व की संक्षिप्त चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : भारत में नदियों को मुख्यतः हिमालयी व प्रायद्वीपीय के रूप में वर्गीकृत किया गया है । हिमालयी अपवाह तंत्र दीर्घ भूगार्भीक इतिहास में विकसित हुआ है । हिमालयी नदी तंत्र का विकास मायोसीन कल्प में शिवालिक या इंडो ब्रह्म नदी से माना जाता है । प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र हिमालयी अपवाह तंत्र से पुराना माना जाता है । हिमालयी व प्रायद्वीपीय नदियों के बीच प्रमुख अंतर को हम निम्नलिखित रूपों में देख सकते हैं : उद्गम स्थल : हिमालयी नदियां हिम से ढके हिमालय पर्वत के ग्लेशियर से निकलती है जबकि प्रायद्वीपीय नदियां प्रायद्वीपीय पठार व मध्य उच्च भूमि से निकलती है । जल के स्रोत में अंतर : हिमालयी नदियों में वर्षा व हिमपिघलन दोनों स्रोतों से जल कीउपलब्धता सुनिश्चित होती है जबकि प्रायद्वीपीय नदियों में केवल वर्षा ही स्रोत है । प्रवाह प्रवृति : इस कारण हिमालयी नदियां सदानीरा होती हैं जबकि प्रायद्वीपीय नदियां ग्रीष्मऋतु में कुछ भागों में सूख जाती हैं । अप्रवाह के प्रकार : हिमालयी नदियां पूर्ववर्ती व अनुवर्ती हैं । मैदानी भाग में वृक्षाकार प्रारूप में जबकि प्रायद्वीपीय नदियां अध्यारोपित, पुनर्युवनित नदियां हैं जो अरीय व आयताकार प्रारूप बनाती हैं । नदी की प्रकृति : लंबा मार्ग, उबड़-खाबड़ पर्वतों से गुजरती नदियां , अभिशीर्ष अपरदन व नदी अपरदन , मैदानों में मार्ग बदलना तथा विसर्प बनाना हिमालयी नदियों की विशेषता है जबकि सुसमायोजित घाटियों के साथ छोटे निश्चित मार्ग प्रायद्वीपीय नदियों की विशेषता हैं जलग्रहण क्षेत्र : हिमालयी नदियों की द्रोणी काफी बड़ी जबकि प्रायद्वीपीय नदियों की द्रोणी अपेक्षाकृत छोटी । नदी की आयु : हिमालयी नदियां युवा, क्रियाशील हैं तथा घाटियों को गहरा करने का कार्य कर रही है जबकि प्रायद्वीपीय नदियाँ प्रवणित परिच्छेदिका वाली प्रौढ़ नदियां हैं , जो अपने आधार तल जा पहुंची है । उपरोक्त भिन्नताओं का प्रभाव इन दोनों नदियों से जुड़े आर्थिक व अन्य गतिविधियों पर भी स्पष्ट रूप में पड़ता है । जैसे - सिंचाई, जलमार्ग, जल विधुत उत्पादन , मत्स्य पालन आदि की दृष्टि से भी हिमालयी नदियां प्रायद्वीपीय नदियों की तुलना अधिक महत्वपूर्ण है ।
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Classify the earthquake regions of India and suggest the measures to manage earthquakes in India? (150 words/10 Marks)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE EARTHQUAKE ZONES/ REGIONS OF INDIA - EARTHQUAKE MANAGEMENT- NDMA GUIDELINES -CONCLUSION - challenges and the government initiatives ANSWER:- Earthquakes are natural (as well as man-made) hazards, which occur due to tremors in the Earth’s crust (lithosphere). Rocks in the inner layers undergo stress due to the force and pressure of the neighbouring rocks. This leads to the breaking of rocks all of a sudden- The rocks release energy called strain energy, and seismic waves are formed, which travel all over the globe like ripples. The focus/ hypocenter is the point where energy is released. The epicenter is the point vertically over the focus, and one can find great destruction there and near to these places. 59% of the Indian land is vulnerable to earthquakes. THE EARTHQUAKE ZONES/ REGIONS OF INDIA India is divided on the basis of intensity of the earthquakes into the following zones. (Magnitude is the energy released at the epicenter, which is always the same; but the intensity differs from place to place.) There are 4 zones in India- Zone II to Zone V- 1) ZONE V It consists of the areas of/ in Srinagar/ Kashmir Valley, Dharamshala (Himachal Pradesh), Nanda Devi (Uttarakhand), the border of Nepal and Bihar, the entire North East, Kutch, Andaman (due to the Sunda trench which caused the 2004 tsunami) 2) Zone IV It consists of the entire Himalayas, the Ganga Plain, northern Gujarat and western Maharashtra 3) Zone II (comparatively the safest) It consists of Chhattisgarh, Odisha, Jharkhand, Rajasthan, MP, Karnataka plateau, TN plateau, Maharashtra, the eastern side (the Vidarbha region) i.e. the plateau region 4) Zone III It consists of the rest of the regions Out of the 5 earthquake zones, India has zones V to II. EARTHQUAKE MANAGEMENT- NDMA GUIDELINES THE 6 PILLARS OF EARTHQUAKE MANAGEMENT- The NDMA has provided the following guidelines to deal with earthquakes in India. 1) CONSTRUCTION OF EARTHQUAKE RESISTANT NEW STRUCTURES It involves developing new earthquake resistant structures. For this, we have the National Building Code (NBC), consisting of guidelines to construct new buildings, so that they can withstand the earthquakes 1.1) R & D (research and development): It also involves the development of such technology i.e. R&D related to earthquake resistant structures 2) SELECTIVE SEISMIC STRENGTHENING AND RETROFITTING OF EXISTING STRUCTURES It involves the retrofitting of existing priority structure and life-line structure- modification of the existing structures to make them earthquake proof 2.1) Safety Audit of Critical Lifeline Structures - It refers to the audit of existing buildings and seeing which need more attention- like government buildings etc.- where there is more interaction, along with heritage buildings 2.2) Retrofitting of public utility structures - like schools, hospitals, dams, reservoirs, heritage buildings, buildings of national importance. It means changing the existing structures 2.3) Institutions of local self government- The above work is to be done through the urban and rural local bodies 3) REGULATION AND ENFORCEMENT Regulation and implementation of the national building code’s safety measures is to be done by the respective state governments. 4) AWARENESS AND PREPAREDNESS It involves developing the safety standards- i.e. developing a handbook on safety, video-films on safety measures, awareness during movies, vulnerability mapping at the local level as well (it is already there at the national level), involvement of NGOs and community participation (which is very important for earthquakes which are sudden), structural safety audits and empowering the NGOs and voluntary groups. 5) CAPACITY DEVELOPMENT It involves R&D, training and education. 6) EMERGENCY RESPONSE NDMA says that emergency response should always be done by the local authorities. It should involve the local community and any specialized agencies. However, the inadequate enforcement of the national building code, the absence of earthquake resistant structures, the lack of adequate preparedness and response capacity, absence of system of licensing engineers, lack of formal training among professionals in earthquake resistant practice- are the main challenges that need to be dealt with, in order to improve our disaster preparedness for earthquakes in the country. For this, the government is taking measures like the National Earthquake Risk Mitigation Programme , which is a CSS (Centrally Sponsored Scheme) and implemented by the NDMA for capacity building and public awareness and sensitization. It is also preparing and upgrading the earthquake hazard maps of the country.
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##Question:Classify the earthquake regions of India and suggest the measures to manage earthquakes in India? (150 words/10 Marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE EARTHQUAKE ZONES/ REGIONS OF INDIA - EARTHQUAKE MANAGEMENT- NDMA GUIDELINES -CONCLUSION - challenges and the government initiatives ANSWER:- Earthquakes are natural (as well as man-made) hazards, which occur due to tremors in the Earth’s crust (lithosphere). Rocks in the inner layers undergo stress due to the force and pressure of the neighbouring rocks. This leads to the breaking of rocks all of a sudden- The rocks release energy called strain energy, and seismic waves are formed, which travel all over the globe like ripples. The focus/ hypocenter is the point where energy is released. The epicenter is the point vertically over the focus, and one can find great destruction there and near to these places. 59% of the Indian land is vulnerable to earthquakes. THE EARTHQUAKE ZONES/ REGIONS OF INDIA India is divided on the basis of intensity of the earthquakes into the following zones. (Magnitude is the energy released at the epicenter, which is always the same; but the intensity differs from place to place.) There are 4 zones in India- Zone II to Zone V- 1) ZONE V It consists of the areas of/ in Srinagar/ Kashmir Valley, Dharamshala (Himachal Pradesh), Nanda Devi (Uttarakhand), the border of Nepal and Bihar, the entire North East, Kutch, Andaman (due to the Sunda trench which caused the 2004 tsunami) 2) Zone IV It consists of the entire Himalayas, the Ganga Plain, northern Gujarat and western Maharashtra 3) Zone II (comparatively the safest) It consists of Chhattisgarh, Odisha, Jharkhand, Rajasthan, MP, Karnataka plateau, TN plateau, Maharashtra, the eastern side (the Vidarbha region) i.e. the plateau region 4) Zone III It consists of the rest of the regions Out of the 5 earthquake zones, India has zones V to II. EARTHQUAKE MANAGEMENT- NDMA GUIDELINES THE 6 PILLARS OF EARTHQUAKE MANAGEMENT- The NDMA has provided the following guidelines to deal with earthquakes in India. 1) CONSTRUCTION OF EARTHQUAKE RESISTANT NEW STRUCTURES It involves developing new earthquake resistant structures. For this, we have the National Building Code (NBC), consisting of guidelines to construct new buildings, so that they can withstand the earthquakes 1.1) R & D (research and development): It also involves the development of such technology i.e. R&D related to earthquake resistant structures 2) SELECTIVE SEISMIC STRENGTHENING AND RETROFITTING OF EXISTING STRUCTURES It involves the retrofitting of existing priority structure and life-line structure- modification of the existing structures to make them earthquake proof 2.1) Safety Audit of Critical Lifeline Structures - It refers to the audit of existing buildings and seeing which need more attention- like government buildings etc.- where there is more interaction, along with heritage buildings 2.2) Retrofitting of public utility structures - like schools, hospitals, dams, reservoirs, heritage buildings, buildings of national importance. It means changing the existing structures 2.3) Institutions of local self government- The above work is to be done through the urban and rural local bodies 3) REGULATION AND ENFORCEMENT Regulation and implementation of the national building code’s safety measures is to be done by the respective state governments. 4) AWARENESS AND PREPAREDNESS It involves developing the safety standards- i.e. developing a handbook on safety, video-films on safety measures, awareness during movies, vulnerability mapping at the local level as well (it is already there at the national level), involvement of NGOs and community participation (which is very important for earthquakes which are sudden), structural safety audits and empowering the NGOs and voluntary groups. 5) CAPACITY DEVELOPMENT It involves R&D, training and education. 6) EMERGENCY RESPONSE NDMA says that emergency response should always be done by the local authorities. It should involve the local community and any specialized agencies. However, the inadequate enforcement of the national building code, the absence of earthquake resistant structures, the lack of adequate preparedness and response capacity, absence of system of licensing engineers, lack of formal training among professionals in earthquake resistant practice- are the main challenges that need to be dealt with, in order to improve our disaster preparedness for earthquakes in the country. For this, the government is taking measures like the National Earthquake Risk Mitigation Programme , which is a CSS (Centrally Sponsored Scheme) and implemented by the NDMA for capacity building and public awareness and sensitization. It is also preparing and upgrading the earthquake hazard maps of the country.
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Discussing the earthquake regions of India, suggest the measures to manage earthquakes in India. (250 words/10 marks )
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE EARTHQUAKE ZONES/ REGIONS OF INDIA - EARTHQUAKE MANAGEMENT- NDMA GUIDELINES -CONCLUSION - challenges and the government initiatives ANSWER:- Earthquakes are natural (as well as man-made) hazards, which occur due to tremors in the Earth’s crust (lithosphere). Rocks in the inner layers undergo stress due to the force and pressure of the neighbouring rocks. This leads to the breaking of rocks all of a sudden- The rocks release energy called strain energy, and seismic waves are formed, which travel all over the globe like ripples. The focus/ hypocenter is the point where energy is released. The epicenter is the point vertically over the focus, and one can find great destruction there and near to these places. 59% of the Indian land is vulnerable to earthquakes. THE EARTHQUAKE ZONES/ REGIONS OF INDIA India is divided on the basis of intensity of the earthquakes into the following zones. (Magnitude is the energy released at the epicenter, which is always the same; but the intensity differs from place to place.) There are 4 zones in India- Zone II to Zone V- 1) ZONE V It consists of the areas of/ in Srinagar/ Kashmir Valley, Dharamshala (Himachal Pradesh), Nanda Devi (Uttarakhand), the border of Nepal and Bihar, the entire North East, Kutch, Andaman (due to the Sunda trench which caused the 2004 tsunami) 2) Zone IV It consists of the entire Himalayas, the Ganga Plain, northern Gujarat and western Maharashtra 3) Zone II (comparatively the safest) It consists of Chhattisgarh, Odisha, Jharkhand, Rajasthan, MP, Karnataka plateau, TN plateau, Maharashtra, the eastern side (the Vidarbha region) i.e. the plateau region 4) Zone III It consists of the rest of the regions Out of the 5 earthquake zones, India has zones V to II. EARTHQUAKE MANAGEMENT- NDMA GUIDELINES THE 6 PILLARS OF EARTHQUAKE MANAGEMENT- The NDMA has provided the following guidelines to deal with earthquakes in India. 1) CONSTRUCTION OF EARTHQUAKE RESISTANT NEW STRUCTURES It involves developing new earthquake resistant structures. For this, we have the National Building Code (NBC), consisting of guidelines to construct new buildings, so that they can withstand the earthquakes 1.1) R & D (research and development): It also involves the development of such technology i.e. R&D related to earthquake resistant structures 2) SELECTIVE SEISMIC STRENGTHENING AND RETROFITTING OF EXISTING STRUCTURES It involves the retrofitting of existing priority structure and life-line structure- modification of the existing structures to make them earthquake proof 2.1) Safety Audit of Critical Lifeline Structures- It refers to the audit of existing buildings and seeing which need more attention- like government buildings etc.- where there is more interaction, along with heritage buildings 2.2) Retrofitting of public utility structures- like schools, hospitals, dams, reservoirs, heritage buildings, buildings of national importance. It means changing the existing structures 2.3) Institutions of local self government-The above work is to be done through the urban and rural local bodies 3) REGULATION AND ENFORCEMENT Regulation and implementation of the national building code’s safety measures is to be done by the respective state governments. 4) AWARENESS AND PREPAREDNESS It involves developing the safety standards- i.e. developing a handbook on safety, video-films on safety measures, awareness during movies, vulnerability mapping at the local level as well (it is already there at the national level), involvement of NGOs and community participation (which is very important for earthquakes which are sudden), structural safety audits and empowering the NGOs and voluntary groups. 5) CAPACITY DEVELOPMENT It involves R&D, training and education. 6) EMERGENCY RESPONSE NDMA says that emergency response should always be done by the local authorities. It should involve the local community and any specialized agencies. However, the inadequate enforcement of the national building code, the absence of earthquake resistant structures, the lack of adequate preparedness and response capacity, absence of system of licensing engineers, lack of formal training among professionals in earthquake resistant practice- are the main challenges that need to be dealt with, in order to improve our disaster preparedness for earthquakes in the country. For this, the government is taking measures like the National Earthquake Risk Mitigation Programme , which is a CSS (Centrally Sponsored Scheme) and implemented by the NDMA for capacity building and public awareness and sensitization. It is also preparing and upgrading the earthquake hazard maps of the country.
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##Question:Discussing the earthquake regions of India, suggest the measures to manage earthquakes in India. (250 words/10 marks )##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE EARTHQUAKE ZONES/ REGIONS OF INDIA - EARTHQUAKE MANAGEMENT- NDMA GUIDELINES -CONCLUSION - challenges and the government initiatives ANSWER:- Earthquakes are natural (as well as man-made) hazards, which occur due to tremors in the Earth’s crust (lithosphere). Rocks in the inner layers undergo stress due to the force and pressure of the neighbouring rocks. This leads to the breaking of rocks all of a sudden- The rocks release energy called strain energy, and seismic waves are formed, which travel all over the globe like ripples. The focus/ hypocenter is the point where energy is released. The epicenter is the point vertically over the focus, and one can find great destruction there and near to these places. 59% of the Indian land is vulnerable to earthquakes. THE EARTHQUAKE ZONES/ REGIONS OF INDIA India is divided on the basis of intensity of the earthquakes into the following zones. (Magnitude is the energy released at the epicenter, which is always the same; but the intensity differs from place to place.) There are 4 zones in India- Zone II to Zone V- 1) ZONE V It consists of the areas of/ in Srinagar/ Kashmir Valley, Dharamshala (Himachal Pradesh), Nanda Devi (Uttarakhand), the border of Nepal and Bihar, the entire North East, Kutch, Andaman (due to the Sunda trench which caused the 2004 tsunami) 2) Zone IV It consists of the entire Himalayas, the Ganga Plain, northern Gujarat and western Maharashtra 3) Zone II (comparatively the safest) It consists of Chhattisgarh, Odisha, Jharkhand, Rajasthan, MP, Karnataka plateau, TN plateau, Maharashtra, the eastern side (the Vidarbha region) i.e. the plateau region 4) Zone III It consists of the rest of the regions Out of the 5 earthquake zones, India has zones V to II. EARTHQUAKE MANAGEMENT- NDMA GUIDELINES THE 6 PILLARS OF EARTHQUAKE MANAGEMENT- The NDMA has provided the following guidelines to deal with earthquakes in India. 1) CONSTRUCTION OF EARTHQUAKE RESISTANT NEW STRUCTURES It involves developing new earthquake resistant structures. For this, we have the National Building Code (NBC), consisting of guidelines to construct new buildings, so that they can withstand the earthquakes 1.1) R & D (research and development): It also involves the development of such technology i.e. R&D related to earthquake resistant structures 2) SELECTIVE SEISMIC STRENGTHENING AND RETROFITTING OF EXISTING STRUCTURES It involves the retrofitting of existing priority structure and life-line structure- modification of the existing structures to make them earthquake proof 2.1) Safety Audit of Critical Lifeline Structures- It refers to the audit of existing buildings and seeing which need more attention- like government buildings etc.- where there is more interaction, along with heritage buildings 2.2) Retrofitting of public utility structures- like schools, hospitals, dams, reservoirs, heritage buildings, buildings of national importance. It means changing the existing structures 2.3) Institutions of local self government-The above work is to be done through the urban and rural local bodies 3) REGULATION AND ENFORCEMENT Regulation and implementation of the national building code’s safety measures is to be done by the respective state governments. 4) AWARENESS AND PREPAREDNESS It involves developing the safety standards- i.e. developing a handbook on safety, video-films on safety measures, awareness during movies, vulnerability mapping at the local level as well (it is already there at the national level), involvement of NGOs and community participation (which is very important for earthquakes which are sudden), structural safety audits and empowering the NGOs and voluntary groups. 5) CAPACITY DEVELOPMENT It involves R&D, training and education. 6) EMERGENCY RESPONSE NDMA says that emergency response should always be done by the local authorities. It should involve the local community and any specialized agencies. However, the inadequate enforcement of the national building code, the absence of earthquake resistant structures, the lack of adequate preparedness and response capacity, absence of system of licensing engineers, lack of formal training among professionals in earthquake resistant practice- are the main challenges that need to be dealt with, in order to improve our disaster preparedness for earthquakes in the country. For this, the government is taking measures like the National Earthquake Risk Mitigation Programme , which is a CSS (Centrally Sponsored Scheme) and implemented by the NDMA for capacity building and public awareness and sensitization. It is also preparing and upgrading the earthquake hazard maps of the country.
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इटली के एकीकरण के सहायक कारकों का उल्लेख करते हुए, एकीकरण की प्रक्रिया में काबूर के योगदान की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) While citing the factors supporting the inegration of Italy, Mention the contribution of Cavour in the process of integration.(150-200 Words
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एप्रोच - उत्तर के प्रारंभ में इटली के एकीकरण में विभिन्न सहायक कारकों का उल्लेख कीजिये | इसके पश्चात इटली के एकीकरण की प्रक्रिया में काबूर का उल्लेख कीजिये | अंत में अन्य व्यक्तित्वों का इटली के एकीकरण में योगदानों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - इटली के एकीकरण के सहायक कारक 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के आरंभिक दशकों में यूरोप के मध्य भाग में इटली तथा जर्मनी जैसे नवीन राष्ट्रों का उदय हुआ जोकि राजनीतिक एकीकरण की प्रक्रिया का परिणाम था | इटली का एकीकरण राष्ट्रवाद तथा उदारवाद दोनों के ही विजय का प्रतीक है जबकि जर्मनी के एकीकरण में मुख्य रूप से राष्ट्रवादी शक्तियों की प्रधानता रही तथा उदारवादी प्रवृतियों का दमन भी दिखाई देता है | जर्मनी के एकीकरण उदारवाद पर राष्ट्रवाद के विजय के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है | इटली में एकीकरण की इच्छा पुनर्जागरण के काल में भी दिखाई देती है तथा इटली के अतीत जिसका सम्बन्ध रोमन साम्राज्य से था तथा इटली के सांस्कृतिक विरासत तथा समरूपता ने इन आकांक्षाओं को बल प्रदान किया था | फ्रांसीसी क्रांति के बाद तथा उसके आधुनिक विचारों की जिनमे राष्ट्रवाद भी शामिल था, के प्रसार के फलस्वरूप एकीकरण से सम्बंधित राष्ट्रवादी आकांक्षाओं को और बल मिला | इटली साम्राज्य के प्रगतिशील पक्षों ने जैसे राजनीतिक एकीकरण प्रशासनिक तथा कानूनी समानता विशेष रूप से नेपोलियन की विधि संहिता के लागू होने के कारण, पुरातन राजवंशों के विस्थापन, सामंतवादी व्यवस्थाओं तथा सुविधाओं का अंत तथा समानता के सिद्धांत की सामान्य स्वीकृति ने भी इटली के राष्ट्रवादी एवं उदारवादी भावनाओं को प्रबल किया | जब नेपोलियन ने स्वेच्छाचारी रूप से शासन करना प्रारंभ किया तथा इटली के संसाधनों का फ्रांस के हित में दोहन शुरू हुआ तो प्रतिक्रिया स्वरुप भी उदारवादी तथा राष्ट्रवादी भावनाओं को बल मिला | वियना व्यवस्था - नेपोलियन के साम्राज्य के पतन के बाद स्थापित वियना की व्यवस्था ने न केवल सामान्य रूप से उदारवादी एवं राष्ट्रवादी भावनाओं की अनदेखी की बल्कि इटली के एकीकरण के मार्ग में व्यावहारिक रूप से कठिनाइयाँ उत्पन्न की, जीमे से कुछ बाधाएं निम्नलिखित हैं - इटली के राज्यों ने पुराने राजवंशों से सम्बंधित प्रतिक्रिया वादी शासकों की पुनर्स्थापना, जिनकी स्थिति वियना व्यवस्था के अंतर्गत यूरोप के महान शक्तियों द्वारा सुनिश्चित की गयी | इन शासकों का निहित स्वार्थ इटली के एकीकरण में न होकर उसके विभाजन में था | इटली के बीचो-बीच पोप के प्रभुत्व की स्थापना, वह सिर्फ न केवल रोम का बल्कि तथाकथित पोप के राज्यों का प्रमुख बना | पोप की स्थिति में परिवर्तन किये बिना इटली का एकीकरण संभव नहीं था परन्तु उसकी स्थिति में परिवर्तन के लिए किया गया कोई भी प्रयास यूरोप के महाशक्तियों के हस्तक्षेप को आमंत्रित कर सकता था | सामान्य रूप से इटली के राज्यों पर ऑस्ट्रिया के प्रभाव की स्थापना जोकि वियना व्यवस्था के सबसे सक्रिय समर्थक के रूप में उभरा |राष्ट्रवादी एवं उदारवादी विचारों से सबसे ज्यादा खतरा ऑस्ट्रिया को ही था , जिसमे विभिन्न राष्ट्रीयताएँ शामिल थी | उत्तरी इटली के कुछ प्रमुख राज्यों जैसे - वेनेशिया तथा लोम्बार्डी पर ऑस्ट्रिया के शासन की स्थापना | वियना व्यवस्था के द्वारा उत्पन्न बाधाओं के अतिरिक्त भी इटली के एकीकरण में कुछ अन्य बाधाएं भी थी, जिनका संबंद्ध इटली के उदारवादी -राष्ट्रवादी समर्थकों से था | उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों का सहारा लिया जिन्हें निर्ममता पूर्वक कुचल दिया जाता रहा , इटली के एकीकरण में उन्होंने विदेशी सहायता को नकारा, जिसके बिना वियना की व्यवस्था में परिवर्तन करना असंभव था | इटली के क्रांतिकारियों ने इटली के भावी-भविष्य को लेकर भी एकता का अभाव था | उनमे से कुछ पीडमांट सार्दीनिया के राजतंत्र जोकि सबसे प्रगतिशील था तथा 1830-1848 के क्रांतियों के समय राष्ट्रवादियों का नेतृत्व किया था, के अधीन संवैधानिक राजतंत्र की व्यवस्था चाहते थे | अधिक उग्र मेजिनी एवं गैरीबाल्डी गंतात्रत्मक वयवस्था चाहते थे | कुछ क्रांतिकारियों ने केन्द्रीकृत व्यवस्था का समर्थन किया एवं कुछ ने इसका समर्थन नहीं किया | कुछ ने सार्डीनीय के शासक एवं कुछ ने पोप का समर्थन किया | प्रमुख भूमिका -काबूर जोकि सार्डीनिया का प्रमुख था, विक्टर इमैनुयल द्वितीय जोकि सार्डीनिया का शासक था, गैरीबाल्डी एवं मेजिनी ने इटली के एकीकरण में प्रमुख भूमिका निभाई | इसके अतिरिक्त इटली के एकीकरण में स्वतः स्फूर्त जन आन्दोलनों की भूमिका भी थी | मेजिनी को इटली के एकीकरण की आत्मा, काबूर को मस्तिष्क तथा गैरीबाल्डी को तलवार के रूप में देखा जाता है | इटली के एकीकरण में काबूर का योगदान - काबूर का योगदान सभी चरणों में दिखाई देता है | इस सन्दर्भ में उसके निम्नलिखित प्रयास महत्वपूर्ण हैं | इटली के क्रांतिकारियों के दृष्टिकोण परिवर्तन का प्रयास जिसके अंतर्गत उसने एकीकरण में विदेशी सहायता अपरिहार्य माना | सार्डीनिया के प्रधानमंत्री के रूप में उसने सार्डीनिया को एक आदर्श राज्य बनाने की चेष्टा की, जिसका नेतृत्व इटली के राष्ट्रवादी तथा उदारवादी महत्वाकांक्षाओं के अनुकूल हो सके | उसने संवैधानिक राजतंत्र को महत्व दिया तथा सार्डीनिया के आर्थिक विकास का प्रयत्न किया | क्रीमिया के युद्ध में भागीदारी के माध्यम से युद्ध के बाद पेरिस सम्मलेन में समस्त इटली के प्रतिनिधि के रूप में भागीदारी सुनिश्चित करना | पेरिस शांति सम्मलेन में इटली के एकीकरण के प्रश्न को उसने सफलता पूर्वक अंतररास्ट्रीय मुद्दा बनाने में सफलता प्राप्त की | ऑस्ट्रिया के विरुद्ध फ्रांस के शासक नेपोलियन तृतीय की सहायता देना तथा उसके सहयोग से इटली के एकीकरण के प्रथम चरण के रूप में लोम्बार्डी की प्राप्ति | इटली के एकीकरण के दूसरे चरण में उत्तरी इटली के राज्यों जैसे - पार्मा, मेडोना, रोमाना, तुस्किनी आदि के जन आन्दोलनों को समर्थन तथा उनकी सफलता के बाद जनमत संग्रह के माध्यम से उन राज्यों का सार्डीनिया में विलय | इटली के एकीकरण के तीसरे चरण में गैरीबाल्डी के प्रसिद्द मार्च को समर्थन तथा गैरीबाल्डी द्वारा अधिकृत दक्षिणी राज्यों जैसे - नेपल्स, सिसली आदि को विक्टर इमैनुअल के माध्यम से सार्डीनिया को समर्पित कराया | इस क्रम में उसने गैरीबाल्डी को पोप के राज्यों पर आक्रमण करने से रोका जोकि एक कूटनीतिक एवं सामरिक आवश्यकता थी | गैरीबाल्डी ने भी माहन त्याग का परिचय दिया तथा गणतांत्रिक विचारों के विरुद्ध जाकर भी इटली के एकीकरण को प्राथमिकता दी |इसके साथ ही काबूर की भूमिका उसकी मृत्यु के साथ समाप्त हो गयी, परन्तु तब तक सैनिक तथा कूटनीतिक आधार पर पोप के राज्यों तथा उत्तर के वेनेशिया को छोड़कर समस्त इटली का एकीकरण करने में सफल हो चुका था | इटली के एकीकरण के अंतिम दो चरणों में विक्टर इमैनुअल की भूमिका रही, जिसका भूमिका पहले के चरणों में भी देखि जा सकती है | ये दोनों चरण जर्मनी के एकीकरण की प्रक्रिया के साथ सम्बंधित हैं | जब विस्मार्क ने सैडोवा के युद्ध में ऑस्ट्रिया को पराजित किया तो विक्टर इमैनुअल ने विस्मार्क का साथ देते हुए वेनेशिया पर अधिकार कर लिया | जब बिस्मार्क ने सेडान के युद्ध में फ्रांस को पराजित किया तो उस स्थिति का लाभ उठाते हुए इमैनुअल ने रोम पर अधिकार कर कर लिया | रोम को एकीकृत इटली का राजधानी बनाया गया तथा पोप की संप्रभुता मात्र वेटिकन सिटी तक सीमित होकर रह गयी |
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##Question:इटली के एकीकरण के सहायक कारकों का उल्लेख करते हुए, एकीकरण की प्रक्रिया में काबूर के योगदान की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) While citing the factors supporting the inegration of Italy, Mention the contribution of Cavour in the process of integration.(150-200 Words##Answer:एप्रोच - उत्तर के प्रारंभ में इटली के एकीकरण में विभिन्न सहायक कारकों का उल्लेख कीजिये | इसके पश्चात इटली के एकीकरण की प्रक्रिया में काबूर का उल्लेख कीजिये | अंत में अन्य व्यक्तित्वों का इटली के एकीकरण में योगदानों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - इटली के एकीकरण के सहायक कारक 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के आरंभिक दशकों में यूरोप के मध्य भाग में इटली तथा जर्मनी जैसे नवीन राष्ट्रों का उदय हुआ जोकि राजनीतिक एकीकरण की प्रक्रिया का परिणाम था | इटली का एकीकरण राष्ट्रवाद तथा उदारवाद दोनों के ही विजय का प्रतीक है जबकि जर्मनी के एकीकरण में मुख्य रूप से राष्ट्रवादी शक्तियों की प्रधानता रही तथा उदारवादी प्रवृतियों का दमन भी दिखाई देता है | जर्मनी के एकीकरण उदारवाद पर राष्ट्रवाद के विजय के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है | इटली में एकीकरण की इच्छा पुनर्जागरण के काल में भी दिखाई देती है तथा इटली के अतीत जिसका सम्बन्ध रोमन साम्राज्य से था तथा इटली के सांस्कृतिक विरासत तथा समरूपता ने इन आकांक्षाओं को बल प्रदान किया था | फ्रांसीसी क्रांति के बाद तथा उसके आधुनिक विचारों की जिनमे राष्ट्रवाद भी शामिल था, के प्रसार के फलस्वरूप एकीकरण से सम्बंधित राष्ट्रवादी आकांक्षाओं को और बल मिला | इटली साम्राज्य के प्रगतिशील पक्षों ने जैसे राजनीतिक एकीकरण प्रशासनिक तथा कानूनी समानता विशेष रूप से नेपोलियन की विधि संहिता के लागू होने के कारण, पुरातन राजवंशों के विस्थापन, सामंतवादी व्यवस्थाओं तथा सुविधाओं का अंत तथा समानता के सिद्धांत की सामान्य स्वीकृति ने भी इटली के राष्ट्रवादी एवं उदारवादी भावनाओं को प्रबल किया | जब नेपोलियन ने स्वेच्छाचारी रूप से शासन करना प्रारंभ किया तथा इटली के संसाधनों का फ्रांस के हित में दोहन शुरू हुआ तो प्रतिक्रिया स्वरुप भी उदारवादी तथा राष्ट्रवादी भावनाओं को बल मिला | वियना व्यवस्था - नेपोलियन के साम्राज्य के पतन के बाद स्थापित वियना की व्यवस्था ने न केवल सामान्य रूप से उदारवादी एवं राष्ट्रवादी भावनाओं की अनदेखी की बल्कि इटली के एकीकरण के मार्ग में व्यावहारिक रूप से कठिनाइयाँ उत्पन्न की, जीमे से कुछ बाधाएं निम्नलिखित हैं - इटली के राज्यों ने पुराने राजवंशों से सम्बंधित प्रतिक्रिया वादी शासकों की पुनर्स्थापना, जिनकी स्थिति वियना व्यवस्था के अंतर्गत यूरोप के महान शक्तियों द्वारा सुनिश्चित की गयी | इन शासकों का निहित स्वार्थ इटली के एकीकरण में न होकर उसके विभाजन में था | इटली के बीचो-बीच पोप के प्रभुत्व की स्थापना, वह सिर्फ न केवल रोम का बल्कि तथाकथित पोप के राज्यों का प्रमुख बना | पोप की स्थिति में परिवर्तन किये बिना इटली का एकीकरण संभव नहीं था परन्तु उसकी स्थिति में परिवर्तन के लिए किया गया कोई भी प्रयास यूरोप के महाशक्तियों के हस्तक्षेप को आमंत्रित कर सकता था | सामान्य रूप से इटली के राज्यों पर ऑस्ट्रिया के प्रभाव की स्थापना जोकि वियना व्यवस्था के सबसे सक्रिय समर्थक के रूप में उभरा |राष्ट्रवादी एवं उदारवादी विचारों से सबसे ज्यादा खतरा ऑस्ट्रिया को ही था , जिसमे विभिन्न राष्ट्रीयताएँ शामिल थी | उत्तरी इटली के कुछ प्रमुख राज्यों जैसे - वेनेशिया तथा लोम्बार्डी पर ऑस्ट्रिया के शासन की स्थापना | वियना व्यवस्था के द्वारा उत्पन्न बाधाओं के अतिरिक्त भी इटली के एकीकरण में कुछ अन्य बाधाएं भी थी, जिनका संबंद्ध इटली के उदारवादी -राष्ट्रवादी समर्थकों से था | उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों का सहारा लिया जिन्हें निर्ममता पूर्वक कुचल दिया जाता रहा , इटली के एकीकरण में उन्होंने विदेशी सहायता को नकारा, जिसके बिना वियना की व्यवस्था में परिवर्तन करना असंभव था | इटली के क्रांतिकारियों ने इटली के भावी-भविष्य को लेकर भी एकता का अभाव था | उनमे से कुछ पीडमांट सार्दीनिया के राजतंत्र जोकि सबसे प्रगतिशील था तथा 1830-1848 के क्रांतियों के समय राष्ट्रवादियों का नेतृत्व किया था, के अधीन संवैधानिक राजतंत्र की व्यवस्था चाहते थे | अधिक उग्र मेजिनी एवं गैरीबाल्डी गंतात्रत्मक वयवस्था चाहते थे | कुछ क्रांतिकारियों ने केन्द्रीकृत व्यवस्था का समर्थन किया एवं कुछ ने इसका समर्थन नहीं किया | कुछ ने सार्डीनीय के शासक एवं कुछ ने पोप का समर्थन किया | प्रमुख भूमिका -काबूर जोकि सार्डीनिया का प्रमुख था, विक्टर इमैनुयल द्वितीय जोकि सार्डीनिया का शासक था, गैरीबाल्डी एवं मेजिनी ने इटली के एकीकरण में प्रमुख भूमिका निभाई | इसके अतिरिक्त इटली के एकीकरण में स्वतः स्फूर्त जन आन्दोलनों की भूमिका भी थी | मेजिनी को इटली के एकीकरण की आत्मा, काबूर को मस्तिष्क तथा गैरीबाल्डी को तलवार के रूप में देखा जाता है | इटली के एकीकरण में काबूर का योगदान - काबूर का योगदान सभी चरणों में दिखाई देता है | इस सन्दर्भ में उसके निम्नलिखित प्रयास महत्वपूर्ण हैं | इटली के क्रांतिकारियों के दृष्टिकोण परिवर्तन का प्रयास जिसके अंतर्गत उसने एकीकरण में विदेशी सहायता अपरिहार्य माना | सार्डीनिया के प्रधानमंत्री के रूप में उसने सार्डीनिया को एक आदर्श राज्य बनाने की चेष्टा की, जिसका नेतृत्व इटली के राष्ट्रवादी तथा उदारवादी महत्वाकांक्षाओं के अनुकूल हो सके | उसने संवैधानिक राजतंत्र को महत्व दिया तथा सार्डीनिया के आर्थिक विकास का प्रयत्न किया | क्रीमिया के युद्ध में भागीदारी के माध्यम से युद्ध के बाद पेरिस सम्मलेन में समस्त इटली के प्रतिनिधि के रूप में भागीदारी सुनिश्चित करना | पेरिस शांति सम्मलेन में इटली के एकीकरण के प्रश्न को उसने सफलता पूर्वक अंतररास्ट्रीय मुद्दा बनाने में सफलता प्राप्त की | ऑस्ट्रिया के विरुद्ध फ्रांस के शासक नेपोलियन तृतीय की सहायता देना तथा उसके सहयोग से इटली के एकीकरण के प्रथम चरण के रूप में लोम्बार्डी की प्राप्ति | इटली के एकीकरण के दूसरे चरण में उत्तरी इटली के राज्यों जैसे - पार्मा, मेडोना, रोमाना, तुस्किनी आदि के जन आन्दोलनों को समर्थन तथा उनकी सफलता के बाद जनमत संग्रह के माध्यम से उन राज्यों का सार्डीनिया में विलय | इटली के एकीकरण के तीसरे चरण में गैरीबाल्डी के प्रसिद्द मार्च को समर्थन तथा गैरीबाल्डी द्वारा अधिकृत दक्षिणी राज्यों जैसे - नेपल्स, सिसली आदि को विक्टर इमैनुअल के माध्यम से सार्डीनिया को समर्पित कराया | इस क्रम में उसने गैरीबाल्डी को पोप के राज्यों पर आक्रमण करने से रोका जोकि एक कूटनीतिक एवं सामरिक आवश्यकता थी | गैरीबाल्डी ने भी माहन त्याग का परिचय दिया तथा गणतांत्रिक विचारों के विरुद्ध जाकर भी इटली के एकीकरण को प्राथमिकता दी |इसके साथ ही काबूर की भूमिका उसकी मृत्यु के साथ समाप्त हो गयी, परन्तु तब तक सैनिक तथा कूटनीतिक आधार पर पोप के राज्यों तथा उत्तर के वेनेशिया को छोड़कर समस्त इटली का एकीकरण करने में सफल हो चुका था | इटली के एकीकरण के अंतिम दो चरणों में विक्टर इमैनुअल की भूमिका रही, जिसका भूमिका पहले के चरणों में भी देखि जा सकती है | ये दोनों चरण जर्मनी के एकीकरण की प्रक्रिया के साथ सम्बंधित हैं | जब विस्मार्क ने सैडोवा के युद्ध में ऑस्ट्रिया को पराजित किया तो विक्टर इमैनुअल ने विस्मार्क का साथ देते हुए वेनेशिया पर अधिकार कर लिया | जब बिस्मार्क ने सेडान के युद्ध में फ्रांस को पराजित किया तो उस स्थिति का लाभ उठाते हुए इमैनुअल ने रोम पर अधिकार कर कर लिया | रोम को एकीकृत इटली का राजधानी बनाया गया तथा पोप की संप्रभुता मात्र वेटिकन सिटी तक सीमित होकर रह गयी |
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हिमालयी अपवाह तंत्र व प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र के मध्य अंतर को स्पष्ट कीजिए। क्या कारण है कि पश्चिम की ओर प्रवाहित नदियां डेल्टा का निर्माण नहीं करती हैं? (150-200 शब्द) Explain the difference between the Himalayan and the peninsular drainage system. What is the reason that western flowing rivers do not form deltas? (150-200 words)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: अपवाह तंत्र को परिभाषित करते हुए उत्तर आरंभ कीजिए। इसके पश्चात अंतर लिखिए। कारण बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। हिमालयी नदियां तथा प्रायद्वीपीय नदियों के मध्य तुलना उद्गम स्थल के आधार पर- जहां हिमालय नदियां ग्लेशियर से ढके हिमालय पर्वत से निकलती है वही प्रायद्वीपीय नदियां प्रायद्वीपीय पठार एवं मध्य-उच्च भूमि के विभिन्न भागों से निकलती है| दोनों केभूगार्भिक संरचना में अंतर एवं ढ़ाल तथा चट्टान की प्रकृति में भिन्नता की वजह; प्रवाह की प्रवृत्ति-हिमालय नदियां बारहमासी होती हैं एवं हिमनदतथा वर्षा से जल की प्राप्ति करती हैं| वही प्रायद्वीपीय नदियां मौसमी होती है तथा ज्यादातर मानसूनी वर्षा पर निर्भर रहती हैं| अपवाह के प्रकार- हिमालय नदियां पूर्ववर्ती एवं अनुवर्ती अपवाह प्रणाली के उदाहरण है तथा मैदानी भागों मेंवे वृक्षाकारीय अपवाह प्रतिरूप बनाती है|वहीँ, प्रायद्वीपीय नदियांअध्यारोपित एवं पुनर्युवनित नदियाँ है जोअरीय एवं आयताकार अपवाह प्रतिरूप का निर्माण करती हैं| नदी की प्रकृति-हिमालयीनदियां लंबा मार्ग तय करती है जिसमें वे उबड़-खाबड़ पर्वतों से गुजरतीहैं तथाशीर्ष अपरदन एवं नदी अपहरण के अनेकों उदाहरण प्रस्तुत करती हैं| हिमालय नदियां मैदानों में जलमार्ग बदलती हैं तथा विसर्प का भी निर्माण करती हैं| वहीँ, प्रायद्वीपीय नदियां सुसमायोजित घाटियों के साथ छोटे एवं निश्चित मार्ग का अनुसरण करती है| भाभर, तराई, खादर, बांगर आदि का हिमालयी नदीतंत्र में विकास वहीँ प्रायद्वीपीय नदीतंत्र में अनुपस्थित; गुंफित सरिता, नदी-विसर्पण, गोखुर झील आदि हिमालयी नदीतंत्र में वहीँ प्रायद्वीपीय नदीतंत्र में अनुपस्थित; जल ग्रहण क्षेत्र- हिमालयी नदियां विशाल द्रोणी के जल ग्रहण क्षेत्रों के उदाहरणहैं वही प्रायद्वीपीय नदियां अपेक्षाकृत छोटी द्रोणी के उदाहरण हैं| ढ़ाल की तीव्रता-हिमालयी नदियाँ तेज ढ़ाल के क्षेत्रों से प्रवाहित होती हैं वहीँ प्रायद्वीपीय नदियाँ मंद ढ़ाल के क्षेत्रों से प्रवाहित होती हैं| इसकी वजह से हिमालयी नदियों की अवसादों को ढ़ोने की क्षमता प्रायद्वीपीय नदियों के मुकाबले ज्यादा होती है|साथ ही, अवसादों की मात्रा भी हिमालयी नदियों में प्रायद्वीपीय नदियों के मुकाबले ज्यादा होती है| नदी की आयु- हिमालय नदियां युवा एवं क्रियाशील हैं एवं अपने तेज रफ्तार से घाटियों को गहरा करते जा रही हैं वहीं प्रायद्वीपीय नदियां प्रवणित परिच्छेदिका वालीप्रौढ़ नदियां है जो अपने आधार तल तक पहुंच गई है| साथ ही, हिमालयी क्षेत्र में नर्म अवसादी चट्टानों की वजह से भी हिमालयी नदियों की कटाव शक्ति तीव्र होती है वहीँ प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में कठोर चट्टानों की वजह से प्रायद्वीपीय नदियों की कटाव शक्ति कम होती है| सिंचाई- हिमालय नदियां मैदानी भागों और नहर प्रणाली के माध्यम से बहती है वही प्रायद्वीपीय नदियां असमतल पठारी भागों के ऊपर बहती हैं तथा नहर केवल डेल्टा प्रदेशों में ही अवस्थित हैं| जल विद्युत- पूर्वोत्तर क्षेत्र में हिमालय नदियों के द्वारा जल विद्युत की संभावित क्षमता अधिक है वहीं प्रायद्वीपीय नदियां प्राकृतिक जलप्रपातों केमाध्यम से विद्युत उत्पादन में सहायक हैं| पश्चिम की ओर बहने वाली नदियों द्वारा डेल्टा का निर्माण न करने का कारण: पश्चिमी तटीय मैदान कम चौड़ा है छोटी छोटी सरिताएं अलग अलग स्थानों पर अवसादों का जमाव करती हैं। दक्षिणी पश्चिमी मानसून तट से लगभग लम्बवत टकराती है जिस कारण शक्तिशाली समुद्री तरंगों का निर्माण करती हैं जो अवसादों को समुद्र में खींच लेती है नर्मदा तापी दो बड़ी नदियाँ वे भ्रंश घाटी में बहने के कारण ज्वारनदमुख बनाती है परंतु डेल्टा का निर्माण नहीं करती हैं।
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##Question:हिमालयी अपवाह तंत्र व प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र के मध्य अंतर को स्पष्ट कीजिए। क्या कारण है कि पश्चिम की ओर प्रवाहित नदियां डेल्टा का निर्माण नहीं करती हैं? (150-200 शब्द) Explain the difference between the Himalayan and the peninsular drainage system. What is the reason that western flowing rivers do not form deltas? (150-200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: अपवाह तंत्र को परिभाषित करते हुए उत्तर आरंभ कीजिए। इसके पश्चात अंतर लिखिए। कारण बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। हिमालयी नदियां तथा प्रायद्वीपीय नदियों के मध्य तुलना उद्गम स्थल के आधार पर- जहां हिमालय नदियां ग्लेशियर से ढके हिमालय पर्वत से निकलती है वही प्रायद्वीपीय नदियां प्रायद्वीपीय पठार एवं मध्य-उच्च भूमि के विभिन्न भागों से निकलती है| दोनों केभूगार्भिक संरचना में अंतर एवं ढ़ाल तथा चट्टान की प्रकृति में भिन्नता की वजह; प्रवाह की प्रवृत्ति-हिमालय नदियां बारहमासी होती हैं एवं हिमनदतथा वर्षा से जल की प्राप्ति करती हैं| वही प्रायद्वीपीय नदियां मौसमी होती है तथा ज्यादातर मानसूनी वर्षा पर निर्भर रहती हैं| अपवाह के प्रकार- हिमालय नदियां पूर्ववर्ती एवं अनुवर्ती अपवाह प्रणाली के उदाहरण है तथा मैदानी भागों मेंवे वृक्षाकारीय अपवाह प्रतिरूप बनाती है|वहीँ, प्रायद्वीपीय नदियांअध्यारोपित एवं पुनर्युवनित नदियाँ है जोअरीय एवं आयताकार अपवाह प्रतिरूप का निर्माण करती हैं| नदी की प्रकृति-हिमालयीनदियां लंबा मार्ग तय करती है जिसमें वे उबड़-खाबड़ पर्वतों से गुजरतीहैं तथाशीर्ष अपरदन एवं नदी अपहरण के अनेकों उदाहरण प्रस्तुत करती हैं| हिमालय नदियां मैदानों में जलमार्ग बदलती हैं तथा विसर्प का भी निर्माण करती हैं| वहीँ, प्रायद्वीपीय नदियां सुसमायोजित घाटियों के साथ छोटे एवं निश्चित मार्ग का अनुसरण करती है| भाभर, तराई, खादर, बांगर आदि का हिमालयी नदीतंत्र में विकास वहीँ प्रायद्वीपीय नदीतंत्र में अनुपस्थित; गुंफित सरिता, नदी-विसर्पण, गोखुर झील आदि हिमालयी नदीतंत्र में वहीँ प्रायद्वीपीय नदीतंत्र में अनुपस्थित; जल ग्रहण क्षेत्र- हिमालयी नदियां विशाल द्रोणी के जल ग्रहण क्षेत्रों के उदाहरणहैं वही प्रायद्वीपीय नदियां अपेक्षाकृत छोटी द्रोणी के उदाहरण हैं| ढ़ाल की तीव्रता-हिमालयी नदियाँ तेज ढ़ाल के क्षेत्रों से प्रवाहित होती हैं वहीँ प्रायद्वीपीय नदियाँ मंद ढ़ाल के क्षेत्रों से प्रवाहित होती हैं| इसकी वजह से हिमालयी नदियों की अवसादों को ढ़ोने की क्षमता प्रायद्वीपीय नदियों के मुकाबले ज्यादा होती है|साथ ही, अवसादों की मात्रा भी हिमालयी नदियों में प्रायद्वीपीय नदियों के मुकाबले ज्यादा होती है| नदी की आयु- हिमालय नदियां युवा एवं क्रियाशील हैं एवं अपने तेज रफ्तार से घाटियों को गहरा करते जा रही हैं वहीं प्रायद्वीपीय नदियां प्रवणित परिच्छेदिका वालीप्रौढ़ नदियां है जो अपने आधार तल तक पहुंच गई है| साथ ही, हिमालयी क्षेत्र में नर्म अवसादी चट्टानों की वजह से भी हिमालयी नदियों की कटाव शक्ति तीव्र होती है वहीँ प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में कठोर चट्टानों की वजह से प्रायद्वीपीय नदियों की कटाव शक्ति कम होती है| सिंचाई- हिमालय नदियां मैदानी भागों और नहर प्रणाली के माध्यम से बहती है वही प्रायद्वीपीय नदियां असमतल पठारी भागों के ऊपर बहती हैं तथा नहर केवल डेल्टा प्रदेशों में ही अवस्थित हैं| जल विद्युत- पूर्वोत्तर क्षेत्र में हिमालय नदियों के द्वारा जल विद्युत की संभावित क्षमता अधिक है वहीं प्रायद्वीपीय नदियां प्राकृतिक जलप्रपातों केमाध्यम से विद्युत उत्पादन में सहायक हैं| पश्चिम की ओर बहने वाली नदियों द्वारा डेल्टा का निर्माण न करने का कारण: पश्चिमी तटीय मैदान कम चौड़ा है छोटी छोटी सरिताएं अलग अलग स्थानों पर अवसादों का जमाव करती हैं। दक्षिणी पश्चिमी मानसून तट से लगभग लम्बवत टकराती है जिस कारण शक्तिशाली समुद्री तरंगों का निर्माण करती हैं जो अवसादों को समुद्र में खींच लेती है नर्मदा तापी दो बड़ी नदियाँ वे भ्रंश घाटी में बहने के कारण ज्वारनदमुख बनाती है परंतु डेल्टा का निर्माण नहीं करती हैं।
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Discuss the provisions of the Indian Constitution for the reorganization of the States and Union Territories in India.(150 words/10 Marks)
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Approach: Introduce with provision for the reorganization of the States and UTs under Article 3 Explain the process of the State Reorganization. Bring the difference with the UTs as provided by the provision of Article 3 Conclude. Answer: As per the condition at the time of the Indian independence, the Constituent Assembly shaped the process of the state reorganization of the Indian States and UTs. Article 3 of the Indian Constitution talks about the reorganization of the States in India. It gives power to the Parliament of India for the reorganization of the states and territories provided under the First Schedule. As per Article 3 Parliament by law- form a new State by separation of territory from any State or by uniting two or more States or parts of States or by uniting any territory to a part of any State; increase the area of any State; diminish the area of any State; alter the boundaries of any State; alter the name of any State: The power of the Parliament to form new States includes the power to form a new State or Union territory by uniting a part of any State or Union territory to any other State or Union territory. Article 3 along with mentioning the power of the Parliament with regard to the reorganization of the States, talks about the procedure for the same; Procedure for the Reorganization of the States in India- Any such bill can be introduced in Parliament only on the prior recommendation of the President. The President before recommending the bill to the Parliament supposed to seek the opinion of the state legislature concern(s) where they are supposed to express their opinion on the bill within the time period specified by the President. If the state legislature does not provide its view within the specified period or gives a contrary view, the Parliament is free to proceed in the manner it may choose as the opinion of the state legislature is not binding on the Parliament. Further, it is not necessary to make a fresh reference to the State Legislature each time an amendment to the bill is moved and accepted in the Parliament. Article 4 of the Indian Constitution has been provided to declare that the laws made for the formation of new states and alteration of the areas, boundaries or names of the existing state under Article 3 are shall deem to be an amendment of this Constitution for the purposes of Article 368. Thus, such laws despite requiring the amendment of the Schedule 1 and Schedule 4 of the Indian Constitution, need the simple majority only, following the ordinary legislative process. The difference with Union Territories- As per Article 3, in the case of the Union territories, the prior recommendation of the President and referral to the legislature are not required. Thus, provisions provided under Article 3 and Article 4 of the Indian Constitution have helped in maintaining the Unity in Diversity of India. The reorganization of the States in India has remained successful in fulfilling the demand of the regional aspiration along with the prospect of development, governance, and administrative convenience.
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##Question:Discuss the provisions of the Indian Constitution for the reorganization of the States and Union Territories in India.(150 words/10 Marks)##Answer:Approach: Introduce with provision for the reorganization of the States and UTs under Article 3 Explain the process of the State Reorganization. Bring the difference with the UTs as provided by the provision of Article 3 Conclude. Answer: As per the condition at the time of the Indian independence, the Constituent Assembly shaped the process of the state reorganization of the Indian States and UTs. Article 3 of the Indian Constitution talks about the reorganization of the States in India. It gives power to the Parliament of India for the reorganization of the states and territories provided under the First Schedule. As per Article 3 Parliament by law- form a new State by separation of territory from any State or by uniting two or more States or parts of States or by uniting any territory to a part of any State; increase the area of any State; diminish the area of any State; alter the boundaries of any State; alter the name of any State: The power of the Parliament to form new States includes the power to form a new State or Union territory by uniting a part of any State or Union territory to any other State or Union territory. Article 3 along with mentioning the power of the Parliament with regard to the reorganization of the States, talks about the procedure for the same; Procedure for the Reorganization of the States in India- Any such bill can be introduced in Parliament only on the prior recommendation of the President. The President before recommending the bill to the Parliament supposed to seek the opinion of the state legislature concern(s) where they are supposed to express their opinion on the bill within the time period specified by the President. If the state legislature does not provide its view within the specified period or gives a contrary view, the Parliament is free to proceed in the manner it may choose as the opinion of the state legislature is not binding on the Parliament. Further, it is not necessary to make a fresh reference to the State Legislature each time an amendment to the bill is moved and accepted in the Parliament. Article 4 of the Indian Constitution has been provided to declare that the laws made for the formation of new states and alteration of the areas, boundaries or names of the existing state under Article 3 are shall deem to be an amendment of this Constitution for the purposes of Article 368. Thus, such laws despite requiring the amendment of the Schedule 1 and Schedule 4 of the Indian Constitution, need the simple majority only, following the ordinary legislative process. The difference with Union Territories- As per Article 3, in the case of the Union territories, the prior recommendation of the President and referral to the legislature are not required. Thus, provisions provided under Article 3 and Article 4 of the Indian Constitution have helped in maintaining the Unity in Diversity of India. The reorganization of the States in India has remained successful in fulfilling the demand of the regional aspiration along with the prospect of development, governance, and administrative convenience.
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भारत छोड़ो आंदोलन के कारणों को स्पष्ट करते हुए आंदोलन की प्रमुख विशेषताओं की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द , अंक -10 ) Listing the reasons for the Quit India movement discuss the main features of the movement,. (150-200 words , marks - 10 )
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Approach: भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि से भूमिका लिख सकते हैं। भारत छोड़ो आंदोलन के कारणों को स्पष्ट कीजिये। आंदोलन की विशेषताओं की चर्चा कीजिये। निष्कर्ष में आंदोलन के महत्व को लिख सकते हैं। उत्तर- 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारम्भ होने के पश्चात भारत के विभिन्न प्रान्तों में कोंग्रेसी मंत्रिमंडलों ने त्यागपत्र दे दिया था। संकटग्रस्त ब्रिटिश सरकार भारतीयों का सक्रिय सहयोग प्राप्त करने के लिए उत्सुक थी। इसलिए अगस्त प्रस्ताव, क्रिप्स मिशन आदि के माध्यम से प्रयास किए गए। लेकिन इसने ब्रिटिश के वास्तविक चरित्र को उभारा कि वे कभी भी भारत से अपना शासन हटाने के लिए तैयार ही नहीं है। इसी की प्रतिक्रिया में 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुवात हुई। भारत छोड़ो आंदोलन के कारण- अगस्त प्रस्ताव की विफलता - लिनलिथगो के प्रस्ताव ने संविधान के गतिरोध की स्थिति नहीं बदली। यह भारतीय मांगों को पूरा करने में असमर्थ था। क्रिप्स मिशन की असफलता- मार्च 1942 में ब्रिटिश सरकार ने कुछ हद तक अमेरिका के राष्ट्रपति के आग्रह के कारण क्रिप्स मिशन को भारत भेजा। इसके प्रस्तावों को कॉंग्रेस ने अस्वीकार कर दिया था क्योंकि यह भारत की एकता के लिए खतरनाक सिद्ध हो सकते थे। क्रिप्स के प्रस्तावों से कॉंग्रेस को गहरी निराशा हुई और सम्पूर्ण भारत में ब्रिटिश सरकार विरोधी भावनाएं तीव्र हुई। क्रिप्स मिशन ने भी तुरंत उत्तरदायी शासन को नहीं स्वीकारा इसीलिए इसे ऐसे बैंक के चेक की संज्ञा दी गयी जो डूबने वाला है। सरकार ने जापान के विरुद्ध युद्ध के पश्चात ब्रिटिश सेना की वापसी के दौरान भारतीय सैनिकों के साथ भेदभाव व्यक्तिगत सत्याग्रह का ब्रिटिश द्वारा तेजी से दमन भारतीयों से लगातार आंदोलन शुरू करने की मांग उठ रही थी विशेषकर समाजवादी खेमे से भारत छोड़ो आंदोलन की विशेषताएं- आंदोलन का लक्ष्य सविनय अवज्ञा आंदोलन की तरह ही पूर्ण स्वराज प्राप्त करना रखा गया। आंदोलन प्रारम्भ करने का लक्ष्य अंग्रेजों को भारत से निकालने के लिए बाध्य करना था। आंदोलन को अहिंसात्मक रखने की योजना थी लेकिन सरकार की कठोर नीतियों के कारण इसने हिंसात्मक रूप धारण किया। हिंसात्मक गतिविधियों की अभिव्यक्ति कई रूपों में दिखी। जैसे बलिया सतारा, मिदनापुर इत्यादि क्षेत्रों में समानान्तर सरकार का गठन किया गया। आंदोलन के दमन में सरकार ने सख्ती रखी। तेजी से आंदोलन को दबाया गया।सरकार ने गांधी जी पर आंदोलन की आलोचना पर दबाव बनाया। गांधी जी ने इसे सरकारी हिंसा का जवाब बताया तथा आंदोलनकारियों को प्रोत्साहित करने के लिए अनशन भी रखा। भौगोलिक स्तर पर इस आंदोलन में व्यापक भागीदारी देखी गयी। सम्पूर्ण देश में ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों का संचालन हुआ। छात्रों व किसानों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। छात्रों ने ब्रिटिश शिक्षण संस्थाओं का विरोध किया तथा किसानों ने कर अदायगी से इंकार किया। यद्यपि मार्क्सवादियों की नीतियों के कारण मजदूरों की नीतियों में उतार चढ़ाव दिखा किन्तु मजदूरों के एक वर्ग ने आंदोलन को सहयोग दिया। महिलाओं की भागीदारी भी आंदोलन में दिखी। महिलाओं ने बढ़ चढ़ कर आन्दोलन में हिस्सा लिया। इस आंदोलन का प्रभाव इतना अधिक था कि सरकार को अपनी नीतियों के पुनर्विचार के लिए बाध्य होना पड़ा। सरकार को आगामी वर्षों में भारत की स्वतन्त्रता के विषय में गंभीरता पूर्वक सोचना पड़ा। केबिनेट मिशन, माउण्टबेटन प्लान इसी आंदोलन के प्रभाव के अगले चरण थे।
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##Question:भारत छोड़ो आंदोलन के कारणों को स्पष्ट करते हुए आंदोलन की प्रमुख विशेषताओं की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द , अंक -10 ) Listing the reasons for the Quit India movement discuss the main features of the movement,. (150-200 words , marks - 10 )##Answer:Approach: भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि से भूमिका लिख सकते हैं। भारत छोड़ो आंदोलन के कारणों को स्पष्ट कीजिये। आंदोलन की विशेषताओं की चर्चा कीजिये। निष्कर्ष में आंदोलन के महत्व को लिख सकते हैं। उत्तर- 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारम्भ होने के पश्चात भारत के विभिन्न प्रान्तों में कोंग्रेसी मंत्रिमंडलों ने त्यागपत्र दे दिया था। संकटग्रस्त ब्रिटिश सरकार भारतीयों का सक्रिय सहयोग प्राप्त करने के लिए उत्सुक थी। इसलिए अगस्त प्रस्ताव, क्रिप्स मिशन आदि के माध्यम से प्रयास किए गए। लेकिन इसने ब्रिटिश के वास्तविक चरित्र को उभारा कि वे कभी भी भारत से अपना शासन हटाने के लिए तैयार ही नहीं है। इसी की प्रतिक्रिया में 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुवात हुई। भारत छोड़ो आंदोलन के कारण- अगस्त प्रस्ताव की विफलता - लिनलिथगो के प्रस्ताव ने संविधान के गतिरोध की स्थिति नहीं बदली। यह भारतीय मांगों को पूरा करने में असमर्थ था। क्रिप्स मिशन की असफलता- मार्च 1942 में ब्रिटिश सरकार ने कुछ हद तक अमेरिका के राष्ट्रपति के आग्रह के कारण क्रिप्स मिशन को भारत भेजा। इसके प्रस्तावों को कॉंग्रेस ने अस्वीकार कर दिया था क्योंकि यह भारत की एकता के लिए खतरनाक सिद्ध हो सकते थे। क्रिप्स के प्रस्तावों से कॉंग्रेस को गहरी निराशा हुई और सम्पूर्ण भारत में ब्रिटिश सरकार विरोधी भावनाएं तीव्र हुई। क्रिप्स मिशन ने भी तुरंत उत्तरदायी शासन को नहीं स्वीकारा इसीलिए इसे ऐसे बैंक के चेक की संज्ञा दी गयी जो डूबने वाला है। सरकार ने जापान के विरुद्ध युद्ध के पश्चात ब्रिटिश सेना की वापसी के दौरान भारतीय सैनिकों के साथ भेदभाव व्यक्तिगत सत्याग्रह का ब्रिटिश द्वारा तेजी से दमन भारतीयों से लगातार आंदोलन शुरू करने की मांग उठ रही थी विशेषकर समाजवादी खेमे से भारत छोड़ो आंदोलन की विशेषताएं- आंदोलन का लक्ष्य सविनय अवज्ञा आंदोलन की तरह ही पूर्ण स्वराज प्राप्त करना रखा गया। आंदोलन प्रारम्भ करने का लक्ष्य अंग्रेजों को भारत से निकालने के लिए बाध्य करना था। आंदोलन को अहिंसात्मक रखने की योजना थी लेकिन सरकार की कठोर नीतियों के कारण इसने हिंसात्मक रूप धारण किया। हिंसात्मक गतिविधियों की अभिव्यक्ति कई रूपों में दिखी। जैसे बलिया सतारा, मिदनापुर इत्यादि क्षेत्रों में समानान्तर सरकार का गठन किया गया। आंदोलन के दमन में सरकार ने सख्ती रखी। तेजी से आंदोलन को दबाया गया।सरकार ने गांधी जी पर आंदोलन की आलोचना पर दबाव बनाया। गांधी जी ने इसे सरकारी हिंसा का जवाब बताया तथा आंदोलनकारियों को प्रोत्साहित करने के लिए अनशन भी रखा। भौगोलिक स्तर पर इस आंदोलन में व्यापक भागीदारी देखी गयी। सम्पूर्ण देश में ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों का संचालन हुआ। छात्रों व किसानों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। छात्रों ने ब्रिटिश शिक्षण संस्थाओं का विरोध किया तथा किसानों ने कर अदायगी से इंकार किया। यद्यपि मार्क्सवादियों की नीतियों के कारण मजदूरों की नीतियों में उतार चढ़ाव दिखा किन्तु मजदूरों के एक वर्ग ने आंदोलन को सहयोग दिया। महिलाओं की भागीदारी भी आंदोलन में दिखी। महिलाओं ने बढ़ चढ़ कर आन्दोलन में हिस्सा लिया। इस आंदोलन का प्रभाव इतना अधिक था कि सरकार को अपनी नीतियों के पुनर्विचार के लिए बाध्य होना पड़ा। सरकार को आगामी वर्षों में भारत की स्वतन्त्रता के विषय में गंभीरता पूर्वक सोचना पड़ा। केबिनेट मिशन, माउण्टबेटन प्लान इसी आंदोलन के प्रभाव के अगले चरण थे।
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सामाजिक न्याय की अवधारणा तथा उसके विविध आयामों को स्पष्ट कीजिये| साथ ही, सामाजिक सुरक्षा के प्रमुख घटकों पर भी सामाजिक न्याय के संदर्भ में चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Explain the concept of Social Justice and its various dimensions. Also, Discuss the major components of Social Security in the context of Social Justice. (150-200 words, 10 marks)
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एप्रोच- सामाजिक न्याय की परिभाषा के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में, सामाजिक न्याय के विविध आयामों को स्पष्ट कीजिये| अगले भाग में,सामाजिक सुरक्षा के प्रमुख घटकों पर भी सामाजिक न्याय के संदर्भ में चर्चा कीजिये| उत्तर- सामाजिक न्याय का संदर्भ शासन व्यवस्था के समावेशी होने से है जिसमें सभी नागरिकों को एकसमान ढंग से सामाजिक सुरक्षा तथा न्याय मिलता हो| जॉन रॉल्स के अनुसार न्याय से तात्पर्य किसी व्यक्ति को समय रहते उन चीजों को सुनिश्चित करने से है जिसका वह उतराधिकारी हो| इसके 3 महत्वपूर्ण घटक हैं- विधि का शासन सुनिश्चित होना; किसी भी व्यक्ति को पुरस्कार/दंड देते समय(न्यायिक प्रक्रिया में) ना सिर्फ कृत्य बल्कि मंशा को भी संदर्भित किया जाना; बिना किसी पूर्वाग्रह के तथ्यों/साक्ष्यों के आधार पर पुरस्कार/दंड सुनिश्चित होना; कोई भी व्यक्ति किस संदर्भ का उतराधिकारी है यह समाज के नीति नियमों द्वारा सुनिश्चित होता है| इस आधार पर समाज के दृष्टिकोण को निम्न 3 संदर्भों में देखा जा सकता है- सामाजिक डार्विनवाद - इसके अंतर्गत इस बात की स्वीकृति होती है कि किस प्रकार जो शक्तिशाली हैं उन्हें शक्तिहीनों एवं प्राकृतिक स्रोतों पर अधिकार होना चाहिए; साम्यवादी/मार्क्सवादी दृष्टिकोण- इसके अंतर्गत सभी एक समान की परिकल्पना के द्वारा स्रोतों के समान वितरण को प्रोत्साहन; सामाजिक न्याय - यह समाज की सामूहिक जिम्मेदारी कि सभी घटकों के सहअस्तित्व को स्वीकारते हुए सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना; सैद्धांतिक रूप से सामाजिक सुरक्षा से तात्पर्य उन सभी प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष घटकों से है जो व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के साझा जीवन एवं प्रगति के अवसरों को सुनिश्चित करते हों| सामाजिक सुरक्षा के प्रमुख घटक खाद्य सुरक्षा- सभी नागरिकों को सार्वभौमिक रूप से खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना सामाजिक न्याय का प्रमुख घटक है| शिक्षा एवं कौशल-प्रशिक्षण के माध्यम से लोगों को आर्थिक एवं सामाजिक रूप से सशक्त बनाना जिससे सामाजिक न्याय सुनिश्चित होना; स्वास्थ्य एवं पोषण,स्वच्छता आदिके माध्यम से सामाजिक सुरक्षा को बढ़ावा; मानव संसाधन को प्रोत्साहित करते हुए विभिन्न नीतियों/कार्यक्रमों/योजनाओं आदि हेतु जागरूकता एवं सहभागिता को बढ़ावा; बीमा सुविधाओं के माध्यम से सबको सामाजिक न्याय प्रदान करना; सामाजिक न्याय के निम्न 3 संदर्भ- यह राज्य/समाज की जिम्मेदारी है कि विकास का लाभ समाज के सभी घटकों को मिलता हो; यह समाज की जिम्मेदारी है कि जो वंचित समूह हों, उन्हें आवश्यक सुरक्षात्मक भेदभाव द्वारा यह सुनिश्चित किया जाए कि उनका मुख्य धारा में वित्तीय एवं सामाजिक समावेश हो सके; यह राज्य की जिम्मेदारी है कि सभी के लिए मूलभूत आवश्यकताएं(भोजन, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि) सुनिश्चित हों; सामाजिक न्याय के घटक(अमर्त्य सेन के अनुसार) सतत आर्थिक प्रगति; राज्य का लोक कल्याणकारी नीतियों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण; स्वतंत्रता पश्चात भारतीय शासन व्यवस्था में जिस प्रकार सामाजिक न्याय के प्रयास किये गये उस आधार पर सामाजिक न्याय को निम्न चरणों में विभक्त किया जा सकता है- 1947-1991 का काल - यह चरण मुख्यतः समाजवादी दृष्टिकोण के साथ सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा आर्थिक प्रगति सुनिश्चित करना तथा केंद्र एवं राज्य सरकारों के सहयोग द्वारा लोककल्याण को सुनिश्चित करने का था| यद्यपि इस काल मेंवांक्षित परिणाम ना आ सकें परंतु सामाजिक न्याय हेतु आवश्यक आधारशिला अवश्य स्थापित हुयी| 1991-2005 का काल - इस काल में उदारवादी वैश्वीकरण एवं निजीकरण दृष्टिकोण के साथ आर्थिक प्रगति हेतु निजी उपक्रमों को प्रोत्साहित किया गया तथा शासन प्रणाली ने अपना पूरा ध्यान लोककल्याण को प्राथमिकता बनाने पर रखा| 2005-अभी तक - इस कालखंड में विकास उद्योगों को प्रोत्साहित करते हुए गवर्नमेंट से गवर्नेंस की सोच के आधार पर शासनप्रणाली में आधारभूत परिवर्तन किये गये|
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##Question:सामाजिक न्याय की अवधारणा तथा उसके विविध आयामों को स्पष्ट कीजिये| साथ ही, सामाजिक सुरक्षा के प्रमुख घटकों पर भी सामाजिक न्याय के संदर्भ में चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Explain the concept of Social Justice and its various dimensions. Also, Discuss the major components of Social Security in the context of Social Justice. (150-200 words, 10 marks)##Answer:एप्रोच- सामाजिक न्याय की परिभाषा के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में, सामाजिक न्याय के विविध आयामों को स्पष्ट कीजिये| अगले भाग में,सामाजिक सुरक्षा के प्रमुख घटकों पर भी सामाजिक न्याय के संदर्भ में चर्चा कीजिये| उत्तर- सामाजिक न्याय का संदर्भ शासन व्यवस्था के समावेशी होने से है जिसमें सभी नागरिकों को एकसमान ढंग से सामाजिक सुरक्षा तथा न्याय मिलता हो| जॉन रॉल्स के अनुसार न्याय से तात्पर्य किसी व्यक्ति को समय रहते उन चीजों को सुनिश्चित करने से है जिसका वह उतराधिकारी हो| इसके 3 महत्वपूर्ण घटक हैं- विधि का शासन सुनिश्चित होना; किसी भी व्यक्ति को पुरस्कार/दंड देते समय(न्यायिक प्रक्रिया में) ना सिर्फ कृत्य बल्कि मंशा को भी संदर्भित किया जाना; बिना किसी पूर्वाग्रह के तथ्यों/साक्ष्यों के आधार पर पुरस्कार/दंड सुनिश्चित होना; कोई भी व्यक्ति किस संदर्भ का उतराधिकारी है यह समाज के नीति नियमों द्वारा सुनिश्चित होता है| इस आधार पर समाज के दृष्टिकोण को निम्न 3 संदर्भों में देखा जा सकता है- सामाजिक डार्विनवाद - इसके अंतर्गत इस बात की स्वीकृति होती है कि किस प्रकार जो शक्तिशाली हैं उन्हें शक्तिहीनों एवं प्राकृतिक स्रोतों पर अधिकार होना चाहिए; साम्यवादी/मार्क्सवादी दृष्टिकोण- इसके अंतर्गत सभी एक समान की परिकल्पना के द्वारा स्रोतों के समान वितरण को प्रोत्साहन; सामाजिक न्याय - यह समाज की सामूहिक जिम्मेदारी कि सभी घटकों के सहअस्तित्व को स्वीकारते हुए सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना; सैद्धांतिक रूप से सामाजिक सुरक्षा से तात्पर्य उन सभी प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष घटकों से है जो व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के साझा जीवन एवं प्रगति के अवसरों को सुनिश्चित करते हों| सामाजिक सुरक्षा के प्रमुख घटक खाद्य सुरक्षा- सभी नागरिकों को सार्वभौमिक रूप से खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना सामाजिक न्याय का प्रमुख घटक है| शिक्षा एवं कौशल-प्रशिक्षण के माध्यम से लोगों को आर्थिक एवं सामाजिक रूप से सशक्त बनाना जिससे सामाजिक न्याय सुनिश्चित होना; स्वास्थ्य एवं पोषण,स्वच्छता आदिके माध्यम से सामाजिक सुरक्षा को बढ़ावा; मानव संसाधन को प्रोत्साहित करते हुए विभिन्न नीतियों/कार्यक्रमों/योजनाओं आदि हेतु जागरूकता एवं सहभागिता को बढ़ावा; बीमा सुविधाओं के माध्यम से सबको सामाजिक न्याय प्रदान करना; सामाजिक न्याय के निम्न 3 संदर्भ- यह राज्य/समाज की जिम्मेदारी है कि विकास का लाभ समाज के सभी घटकों को मिलता हो; यह समाज की जिम्मेदारी है कि जो वंचित समूह हों, उन्हें आवश्यक सुरक्षात्मक भेदभाव द्वारा यह सुनिश्चित किया जाए कि उनका मुख्य धारा में वित्तीय एवं सामाजिक समावेश हो सके; यह राज्य की जिम्मेदारी है कि सभी के लिए मूलभूत आवश्यकताएं(भोजन, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि) सुनिश्चित हों; सामाजिक न्याय के घटक(अमर्त्य सेन के अनुसार) सतत आर्थिक प्रगति; राज्य का लोक कल्याणकारी नीतियों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण; स्वतंत्रता पश्चात भारतीय शासन व्यवस्था में जिस प्रकार सामाजिक न्याय के प्रयास किये गये उस आधार पर सामाजिक न्याय को निम्न चरणों में विभक्त किया जा सकता है- 1947-1991 का काल - यह चरण मुख्यतः समाजवादी दृष्टिकोण के साथ सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा आर्थिक प्रगति सुनिश्चित करना तथा केंद्र एवं राज्य सरकारों के सहयोग द्वारा लोककल्याण को सुनिश्चित करने का था| यद्यपि इस काल मेंवांक्षित परिणाम ना आ सकें परंतु सामाजिक न्याय हेतु आवश्यक आधारशिला अवश्य स्थापित हुयी| 1991-2005 का काल - इस काल में उदारवादी वैश्वीकरण एवं निजीकरण दृष्टिकोण के साथ आर्थिक प्रगति हेतु निजी उपक्रमों को प्रोत्साहित किया गया तथा शासन प्रणाली ने अपना पूरा ध्यान लोककल्याण को प्राथमिकता बनाने पर रखा| 2005-अभी तक - इस कालखंड में विकास उद्योगों को प्रोत्साहित करते हुए गवर्नमेंट से गवर्नेंस की सोच के आधार पर शासनप्रणाली में आधारभूत परिवर्तन किये गये|
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मृदा क्षरण से आप क्या समझते हैं? मृदा क्षरण के विभिन्न प्रक्रियाओं की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । (150-200 शब्द , अंक - 10) What do you understand by soil erosion? Briefly discuss various processes of soil erosion. (150-200 words, Marks - 10)
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दृष्टिकोण : मृदा क्षरण को परिभाषित करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । मृदा क्षरण की विभिन्न प्रक्रियाओं की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । कुछ सुझावों के साथ संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : सामान्यतः मृदा क्षरण या मृदा अपरदन को प्राकृतिक कारकों द्वारा मृदा प्रतिस्थापन की तुलना में मृदा विनाश की तीव्र दर के रूप में परिभाषित किया जाता है । अपरदनात्मक प्रक्रियाएँ तथा मृदा निर्माणकारी प्रक्रियाएँ साथ-साथ चलते रहती है । सामान्यतः इन दोनों प्रक्रियाओं में एक संतुलन बना रहता है । जब इन दोनों प्रक्रियाओं में के मध्य प्राकृतिक अथवा मानवीय कारकों से संतुलन बिगड़ जाता है तो मृदा क्षरण/अपरदन प्रारंभ हो जाता है । मृदा क्षरण को प्रभावित करने वाले कारक : कुछ मृदा क्षरण मानवीय हस्तक्षेप के बिना भी हो सकता है लेकिन मानवीय कारक प्रायः प्राकृतिक प्रक्रियाओं की गति को बढ़ा देते हैं , उदाहरणस्वरूप निर्वनीकरण, अत्यधिक चराई , झूम कृषि, अवैज्ञानिक कृषि पद्धतियाँ , अवसंरचना निर्माण द्वारा प्राकृतिक अपवाह में अवरोध आदि । स्थलाकृति , वर्षा, वायु, वनस्पति आवरण का अभाव , आदि मृदा अपरदन के प्रमुख कारणों सम्मिलित हैं । उबड़-खाबड़ स्थलाकृतियां , खड़ी ढाल अपने आकृतिक विशेषताओं के कारण मृदा अपरदन के दर को प्रभावित करती है । मृदा क्षरण की विभिन्न प्रक्रियाएं : बूंद अपरदन अथवा स्पलैश अपरदन : मृदा अपरदन में बूंद प्रथम अवस्था है तथा इस तरह के अपरदन की शुरुआत तब होती है जब नग्न मृदा के ऊपर वर्षा की बूंदों की बौछार होती है । वर्षा बूंदों के प्रतिघात के कारण मृदा कण वियोजित हो जाते हैं एवं मृदा की ऊपरी परत विघटित होने लगती है । परत अपरदन : यह समतल भूमियों पर मूसलाधार वर्षा के पश्चात होता है और इसमें मृदा की सूक्ष्म और अधिक उर्वर ऊपरी परत का कटाव होने लगता है और यह विस्थापित हो जाती है । नलिका अथवा रील अपरदन : इसके अंतर्गत तेज गति से प्रवाहित जल समतल भूमि पर छोटी-छोटी नलिकाएं बनाकर प्रवाहित होने लगता है । इस प्रकार भूमि पर नलिकाओं अथवा रील के रूप में अपरदन होने लगता है । अवनालिका अपरदन : जब रील अपरदन की नालियाँ बड़ी और विस्तृत हो जाती हैं तो कृषि भूमियों को छोटे-छोटे टुकड़ों में खंडित कर देती हैं जिससे वो कृषि के लिए अनुपयुक्त हो जाती है । ऐसे क्षेत्रों की अधिकता वाले प्रदेशों को उत्खात भूमि कहते हैं । मृदा क्षरण एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने उपस्थित हो रहा है । इससे निपटने के लिए कुछ गंभीर कदम उठाए जाने की आवश्यकता है उदाहरण के लिए निर्वनीकरण को रोकना , अधिकाधिक पेड़ -पौधों को लगाना , कृषि की वैज्ञानिक विधियों का अनुसरण , प्राकृतिक अपवाह तंत्र को अवरुद्ध होने से सुरक्षित रखना इत्यादी ।
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##Question:मृदा क्षरण से आप क्या समझते हैं? मृदा क्षरण के विभिन्न प्रक्रियाओं की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । (150-200 शब्द , अंक - 10) What do you understand by soil erosion? Briefly discuss various processes of soil erosion. (150-200 words, Marks - 10)##Answer:दृष्टिकोण : मृदा क्षरण को परिभाषित करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । मृदा क्षरण की विभिन्न प्रक्रियाओं की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । कुछ सुझावों के साथ संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : सामान्यतः मृदा क्षरण या मृदा अपरदन को प्राकृतिक कारकों द्वारा मृदा प्रतिस्थापन की तुलना में मृदा विनाश की तीव्र दर के रूप में परिभाषित किया जाता है । अपरदनात्मक प्रक्रियाएँ तथा मृदा निर्माणकारी प्रक्रियाएँ साथ-साथ चलते रहती है । सामान्यतः इन दोनों प्रक्रियाओं में एक संतुलन बना रहता है । जब इन दोनों प्रक्रियाओं में के मध्य प्राकृतिक अथवा मानवीय कारकों से संतुलन बिगड़ जाता है तो मृदा क्षरण/अपरदन प्रारंभ हो जाता है । मृदा क्षरण को प्रभावित करने वाले कारक : कुछ मृदा क्षरण मानवीय हस्तक्षेप के बिना भी हो सकता है लेकिन मानवीय कारक प्रायः प्राकृतिक प्रक्रियाओं की गति को बढ़ा देते हैं , उदाहरणस्वरूप निर्वनीकरण, अत्यधिक चराई , झूम कृषि, अवैज्ञानिक कृषि पद्धतियाँ , अवसंरचना निर्माण द्वारा प्राकृतिक अपवाह में अवरोध आदि । स्थलाकृति , वर्षा, वायु, वनस्पति आवरण का अभाव , आदि मृदा अपरदन के प्रमुख कारणों सम्मिलित हैं । उबड़-खाबड़ स्थलाकृतियां , खड़ी ढाल अपने आकृतिक विशेषताओं के कारण मृदा अपरदन के दर को प्रभावित करती है । मृदा क्षरण की विभिन्न प्रक्रियाएं : बूंद अपरदन अथवा स्पलैश अपरदन : मृदा अपरदन में बूंद प्रथम अवस्था है तथा इस तरह के अपरदन की शुरुआत तब होती है जब नग्न मृदा के ऊपर वर्षा की बूंदों की बौछार होती है । वर्षा बूंदों के प्रतिघात के कारण मृदा कण वियोजित हो जाते हैं एवं मृदा की ऊपरी परत विघटित होने लगती है । परत अपरदन : यह समतल भूमियों पर मूसलाधार वर्षा के पश्चात होता है और इसमें मृदा की सूक्ष्म और अधिक उर्वर ऊपरी परत का कटाव होने लगता है और यह विस्थापित हो जाती है । नलिका अथवा रील अपरदन : इसके अंतर्गत तेज गति से प्रवाहित जल समतल भूमि पर छोटी-छोटी नलिकाएं बनाकर प्रवाहित होने लगता है । इस प्रकार भूमि पर नलिकाओं अथवा रील के रूप में अपरदन होने लगता है । अवनालिका अपरदन : जब रील अपरदन की नालियाँ बड़ी और विस्तृत हो जाती हैं तो कृषि भूमियों को छोटे-छोटे टुकड़ों में खंडित कर देती हैं जिससे वो कृषि के लिए अनुपयुक्त हो जाती है । ऐसे क्षेत्रों की अधिकता वाले प्रदेशों को उत्खात भूमि कहते हैं । मृदा क्षरण एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने उपस्थित हो रहा है । इससे निपटने के लिए कुछ गंभीर कदम उठाए जाने की आवश्यकता है उदाहरण के लिए निर्वनीकरण को रोकना , अधिकाधिक पेड़ -पौधों को लगाना , कृषि की वैज्ञानिक विधियों का अनुसरण , प्राकृतिक अपवाह तंत्र को अवरुद्ध होने से सुरक्षित रखना इत्यादी ।
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ब्रिटिश वाणिज्यवादी नीतियां ही नहीं बल्कि अन्य कारणों ने भी अमेरिकी क्रान्ति को सुनिश्चित किया था| संगत तर्कों के माध्यम से कथन की पुष्टि कीजिये| (150 से 200 शब्द/10 अंक) Not only British commercialist policies but other factors also ensured the American Revolution. Verify the statement through relevant arguments. (150 to 200 words/10 marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में अमेरिकी क्रांति के बारे में सामान्य जानकारियाँ दीजिये। 2- प्रथम भाग में अमेरिकी क्रान्ति के लिए उत्तरदायी कारणों के रूप में ब्रिटिश वाणिज्यवादी नीतियों को स्पष्ट कीजिए। 3- दुसरे भाग में अमेरिकी क्रान्ति के लिए उत्तरदायी अन्य सामाजिक, राजनीति, वैचारिक आदि कारणों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में संक्षेप में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये 17वीं सदी के मध्य तक उत्तर अमेरिका में अटलांटिक महासागर के पश्चिमी तटों पर अंग्रेजों के द्वारा 13 उपनिवेश की स्थापना की गयी थी| वणिज्यवादी पूँजीवाद ब्रिटिश सरकार की औपनिवेशिक नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी| इसका मुख्य उद्देश्य घरेलु अर्थव्यवस्था और उपनिवेश पर नियंत्रण स्थापित करना था जिसके कारण स्वेत अमेरिकियों में आक्रोश उत्पन्न हुआ और उसके परिणामस्वरूप ही अमेरिकी क्रांति की युगांतकारी घटना हुई| अमेरिकी क्रांति आधुनिक विश्व इतिहास की महान घटनाओं में से एक थी। यह न तो घोर गरीबी के कारण उत्पन्न असंतोष का परिणाम था और ना ही सामंती व्यवस्था के विरुद्ध एकजुट होने का परिणाम बल्कि यह संघर्ष अमेरिका में स्थित 13 ब्रिटिश उपनिवेशों द्वारा इंग्लैंड की इच्छा के विरुद्ध स्वतन्त्रता कायम रखने व गलत औपनिवेशिक नीतियों के विरुद्ध विद्रोह था। इस क्रांति के परिणामस्वरूप 1776 में अमेरिका स्वतंत्र हुआ। अमेरिकी क्रांति के कारण आर्थिक कारण 18 वीं सदी के उत्तरी अमेरिका के अधिकांशतः भूभाग पर ब्रिटेन का कब्जा ।जिससे यहाँ के अन्य यूरोपीय नागरिकों को संसाधनों के अधिकारों से वंचित कर दिया गया । वाणिज्यवादी विचारधारा से प्रभावित होकर ब्रिटेन ने कानून बनाया कि कुछ उत्पादों का निर्यात केवल ब्रिटेन को किया जाएगा जैसे कपास तम्बाकू आदि इसी प्रकार अमेरिका में आने वाली वस्तुओं पर ब्रिटिश सरकार सीमा शुल्क के जरिये भी लाभ कमाती थी नौपरिवहन कानूनों के माध्यम से अमेरिकी व्यापार को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया इन कानूनों के प्रति असंतोष तो था लेकिन कानूनों को कठोरता पूर्वक लागू नहीं किया गया था अतः अमेरिका में एक स्वतंत्र अर्थव्यवस्था का विकास शुरू हो गया था | सप्तवर्षीय युद्ध के कारण ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति चरमरा गयी थी वहीँ युद्ध के दौरान अमेरिका वासियों ने फ्रांस के साथ व्यापार व सहयोग किया जिससे ब्रिटेन नाराज था| इसी पृष्ठभूमि में ब्रिटेन ने पुराने कानूनों को कठोरता के साथ लागू करने का निर्णय लिया| तथा कुछ नए कानून भी लागू किये गए। जैसे-स्टाम्प एक्ट(व्यावसायिक करारों में स्टाम्प लेना अनिवार्य कर दिया गया), शुगर एक्ट, करेंसी एक्ट आदि। अमेरिका वासियों ने ब्रिटिश कानूनों का विरोध किया तथा विभिन्न शहरों में ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार किया गया|स्वतंत्रता के पुत्र एवं पुत्रियों के नाम से कई संस्थाओं की स्थापना हुई 1765 में मेसाच्युसेट्स में सभी बस्तियों के प्रतिनिधियों की एक सभा बुलाई गयी और यह नारा दिया गया और मांग की गई कि “प्रतिनिधित्व नहीं तो कर नहीं” इसी क्रम में अमेरिकी बस्तियों में राजनीतिक एकता स्थापित हुई और ब्रिटिश विरोध तथा अमेरिकी क्रान्ति को को एक सैद्धांतिक आधार मिला| किन्तु केवल वाणिज्यिक नीतियां ही नहीं बल्कि अमेरिकी क्रान्ति के लिए अन्य अनेक कारण भी उत्तरदायी थे| अन्य उत्तरदायी कारण राजनीतिक कारण 13 उपनिवेशी बस्तियां जिनके पास सीमित कानूनी अधिकार थे| अमेरिका में एक विकसित उपनिवेशिक ढांचा था , प्रत्येक राज्य में विधायिका थी और इसमे स्थानीय लोगों के भागीदारी भी । लेकिन गवर्नर के विशेषाधिकार के कारण इन्हे विधायी कार्यों में कठिनाई होती थी । इससे स्थानीय नेताओं में असंतोष रहता था| ब्रिटिश संसद के द्वारा कानून का निर्माण और उसमे अमेरिकी प्रतिनिधित्व का अभाव । सामाजिक कारण अमेरिकी समाज में प्रारम्भिक दौर में मुख्यतः 3 प्रकार के लोग दिखाई पड़ते हैं यथा यूरोपियन, इनमें सर्वाधिक आबादी अंग्रेजों की थी; इनके अतिरिक्त रेड इंडियन एवं अफ़्रीकी दास| किन्तु अमेरिकी सामाजिक संरचना में यूरोपीय विशेषकर ब्रिटेन से आने वाले आप्रवासियों का दबदबा अधिक था। समय के साथ अमेरिका में कुछ ऐसे वर्गों का उदय हुआ जिनके हित ब्रिटिश हितों से टकराते थे जैसे व्यापारी, भूमाफिया, तस्कर, शिक्षित वर्ग आदि 18 वीं सदी के मध्य तक शिक्षा का भी अपेक्षाकृत विकास हुआ जैसे- हावर्ड, प्रिंसटन, येल आदि लोकप्रिय शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना हुई |अमेरिकी समाज में भी आधुनिक शिक्षा व आधुनिक विचारों का प्रसार हुआ हावर्ड, प्रिंसटन विलियम एंड मेरी, येल आदि शैक्षणिक संस्थाओं की गिनती अमेरिका की लोकप्रिय संस्थाओं में होने लगी 18वीं सदी के मध्य तक अमेरिका के विभिन्न शहरों से लगभग 25 अखबारों का प्रकाशन होने लगा था जैसे न्यूयार्क गजट, बोस्टन न्यूजलेटर आदि आधुनिक विचारों वाले लोगों ने ब्रिटिश नीतियों का विरोध किया। वैचारिक कारण अमेरिकन समाज का यूरोपीय समाज से निकटतम सम्बन्ध। एक और विभिन्न कारणों से असंतोष की उपस्थिति थी तो दूसरी ओर जॉन लॉक, मोंटेस्क्यु, रूसो तथा वाल्टेयर जैसे दार्शनिकों का व्यापक प्रभाव भी था 18 वीं सदी के मध्य तक अमेरिकी समाज में भी बुद्धिजीवियों एवं राजनेताओं का एक ऐसा वर्ग निर्मित हुआ जो ब्रिटिश प्रभुत्व की खुल कर आलोचना करता था तथा वैकल्पिक व्यवस्था के समर्थन में लेख भी लिखता था जैसे एडम्स, जेफरसन, बेंजामिन फ्रैंकलिन, जैक्सन आदि यूरोपीय विचारकों जैसे -लॉक, रूसो, आदि का प्रभाव अमेरिकी बुद्धिजीवियों पर देखा गया। बुद्धिजीवियों के विचारों ने विरोध को तार्किक आधार प्रदान किया तथा लोगों को विकल्प भी उपलब्द्ध कराया | सप्त वर्षीय युद्ध इस युद्ध ने उपनिवेशवासियों और मातृदेश के बीच करों से सम्बंधित विवाद को तीव्र कर दिया इस युद्ध में ब्रिटेन, फ्रांस के विरुद्ध विजयी हुआ था परन्तु इंग्लैण्ड की अर्थव्यवस्था को चरमरा दिया था| सप्त वर्षीय युद्ध के कारण ब्रिटिश व्यय में वृद्धि हुई। जिसकी क्षतिपूर्ति के क्रम में ब्रिटेन ने अमेरिका पर पुराने कानूनों को कठोरता के साथ लागू करने का निर्णय लिया तथा कुछ नए कानून भी लागू किये गए। जैसे-स्टाम्प एक्ट(व्यावसायिक करारों में स्टाम्प लेना अनिवार्य कर दिया गया), शुगर एक्ट, करेंसी एक्ट आदि। अतः ब्रिटिश नीतियों के विरुद्ध फिलाडेल्फिया में 1774 में महाद्वीपीय सम्मलेन का आयोजन किया गया और करों को रद्द किये जाने की मांग की गयी| किन्तु सरकार के कठोर रवैये के कारण हिंसक संघर्ष की शुरुआत हुई| अंततः 4 जुलाई 1776 को ब्रिटेन से स्वतंत्रता की औपचारिक घोषणा की गयी| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि अमेरिकी क्रान्ति न केवल ब्रिटिश वाणिज्यवादी नीतियों बल्कि अन्य अनेक कारणों का परिणाम थी|
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##Question:ब्रिटिश वाणिज्यवादी नीतियां ही नहीं बल्कि अन्य कारणों ने भी अमेरिकी क्रान्ति को सुनिश्चित किया था| संगत तर्कों के माध्यम से कथन की पुष्टि कीजिये| (150 से 200 शब्द/10 अंक) Not only British commercialist policies but other factors also ensured the American Revolution. Verify the statement through relevant arguments. (150 to 200 words/10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में अमेरिकी क्रांति के बारे में सामान्य जानकारियाँ दीजिये। 2- प्रथम भाग में अमेरिकी क्रान्ति के लिए उत्तरदायी कारणों के रूप में ब्रिटिश वाणिज्यवादी नीतियों को स्पष्ट कीजिए। 3- दुसरे भाग में अमेरिकी क्रान्ति के लिए उत्तरदायी अन्य सामाजिक, राजनीति, वैचारिक आदि कारणों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में संक्षेप में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये 17वीं सदी के मध्य तक उत्तर अमेरिका में अटलांटिक महासागर के पश्चिमी तटों पर अंग्रेजों के द्वारा 13 उपनिवेश की स्थापना की गयी थी| वणिज्यवादी पूँजीवाद ब्रिटिश सरकार की औपनिवेशिक नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी| इसका मुख्य उद्देश्य घरेलु अर्थव्यवस्था और उपनिवेश पर नियंत्रण स्थापित करना था जिसके कारण स्वेत अमेरिकियों में आक्रोश उत्पन्न हुआ और उसके परिणामस्वरूप ही अमेरिकी क्रांति की युगांतकारी घटना हुई| अमेरिकी क्रांति आधुनिक विश्व इतिहास की महान घटनाओं में से एक थी। यह न तो घोर गरीबी के कारण उत्पन्न असंतोष का परिणाम था और ना ही सामंती व्यवस्था के विरुद्ध एकजुट होने का परिणाम बल्कि यह संघर्ष अमेरिका में स्थित 13 ब्रिटिश उपनिवेशों द्वारा इंग्लैंड की इच्छा के विरुद्ध स्वतन्त्रता कायम रखने व गलत औपनिवेशिक नीतियों के विरुद्ध विद्रोह था। इस क्रांति के परिणामस्वरूप 1776 में अमेरिका स्वतंत्र हुआ। अमेरिकी क्रांति के कारण आर्थिक कारण 18 वीं सदी के उत्तरी अमेरिका के अधिकांशतः भूभाग पर ब्रिटेन का कब्जा ।जिससे यहाँ के अन्य यूरोपीय नागरिकों को संसाधनों के अधिकारों से वंचित कर दिया गया । वाणिज्यवादी विचारधारा से प्रभावित होकर ब्रिटेन ने कानून बनाया कि कुछ उत्पादों का निर्यात केवल ब्रिटेन को किया जाएगा जैसे कपास तम्बाकू आदि इसी प्रकार अमेरिका में आने वाली वस्तुओं पर ब्रिटिश सरकार सीमा शुल्क के जरिये भी लाभ कमाती थी नौपरिवहन कानूनों के माध्यम से अमेरिकी व्यापार को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया इन कानूनों के प्रति असंतोष तो था लेकिन कानूनों को कठोरता पूर्वक लागू नहीं किया गया था अतः अमेरिका में एक स्वतंत्र अर्थव्यवस्था का विकास शुरू हो गया था | सप्तवर्षीय युद्ध के कारण ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति चरमरा गयी थी वहीँ युद्ध के दौरान अमेरिका वासियों ने फ्रांस के साथ व्यापार व सहयोग किया जिससे ब्रिटेन नाराज था| इसी पृष्ठभूमि में ब्रिटेन ने पुराने कानूनों को कठोरता के साथ लागू करने का निर्णय लिया| तथा कुछ नए कानून भी लागू किये गए। जैसे-स्टाम्प एक्ट(व्यावसायिक करारों में स्टाम्प लेना अनिवार्य कर दिया गया), शुगर एक्ट, करेंसी एक्ट आदि। अमेरिका वासियों ने ब्रिटिश कानूनों का विरोध किया तथा विभिन्न शहरों में ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार किया गया|स्वतंत्रता के पुत्र एवं पुत्रियों के नाम से कई संस्थाओं की स्थापना हुई 1765 में मेसाच्युसेट्स में सभी बस्तियों के प्रतिनिधियों की एक सभा बुलाई गयी और यह नारा दिया गया और मांग की गई कि “प्रतिनिधित्व नहीं तो कर नहीं” इसी क्रम में अमेरिकी बस्तियों में राजनीतिक एकता स्थापित हुई और ब्रिटिश विरोध तथा अमेरिकी क्रान्ति को को एक सैद्धांतिक आधार मिला| किन्तु केवल वाणिज्यिक नीतियां ही नहीं बल्कि अमेरिकी क्रान्ति के लिए अन्य अनेक कारण भी उत्तरदायी थे| अन्य उत्तरदायी कारण राजनीतिक कारण 13 उपनिवेशी बस्तियां जिनके पास सीमित कानूनी अधिकार थे| अमेरिका में एक विकसित उपनिवेशिक ढांचा था , प्रत्येक राज्य में विधायिका थी और इसमे स्थानीय लोगों के भागीदारी भी । लेकिन गवर्नर के विशेषाधिकार के कारण इन्हे विधायी कार्यों में कठिनाई होती थी । इससे स्थानीय नेताओं में असंतोष रहता था| ब्रिटिश संसद के द्वारा कानून का निर्माण और उसमे अमेरिकी प्रतिनिधित्व का अभाव । सामाजिक कारण अमेरिकी समाज में प्रारम्भिक दौर में मुख्यतः 3 प्रकार के लोग दिखाई पड़ते हैं यथा यूरोपियन, इनमें सर्वाधिक आबादी अंग्रेजों की थी; इनके अतिरिक्त रेड इंडियन एवं अफ़्रीकी दास| किन्तु अमेरिकी सामाजिक संरचना में यूरोपीय विशेषकर ब्रिटेन से आने वाले आप्रवासियों का दबदबा अधिक था। समय के साथ अमेरिका में कुछ ऐसे वर्गों का उदय हुआ जिनके हित ब्रिटिश हितों से टकराते थे जैसे व्यापारी, भूमाफिया, तस्कर, शिक्षित वर्ग आदि 18 वीं सदी के मध्य तक शिक्षा का भी अपेक्षाकृत विकास हुआ जैसे- हावर्ड, प्रिंसटन, येल आदि लोकप्रिय शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना हुई |अमेरिकी समाज में भी आधुनिक शिक्षा व आधुनिक विचारों का प्रसार हुआ हावर्ड, प्रिंसटन विलियम एंड मेरी, येल आदि शैक्षणिक संस्थाओं की गिनती अमेरिका की लोकप्रिय संस्थाओं में होने लगी 18वीं सदी के मध्य तक अमेरिका के विभिन्न शहरों से लगभग 25 अखबारों का प्रकाशन होने लगा था जैसे न्यूयार्क गजट, बोस्टन न्यूजलेटर आदि आधुनिक विचारों वाले लोगों ने ब्रिटिश नीतियों का विरोध किया। वैचारिक कारण अमेरिकन समाज का यूरोपीय समाज से निकटतम सम्बन्ध। एक और विभिन्न कारणों से असंतोष की उपस्थिति थी तो दूसरी ओर जॉन लॉक, मोंटेस्क्यु, रूसो तथा वाल्टेयर जैसे दार्शनिकों का व्यापक प्रभाव भी था 18 वीं सदी के मध्य तक अमेरिकी समाज में भी बुद्धिजीवियों एवं राजनेताओं का एक ऐसा वर्ग निर्मित हुआ जो ब्रिटिश प्रभुत्व की खुल कर आलोचना करता था तथा वैकल्पिक व्यवस्था के समर्थन में लेख भी लिखता था जैसे एडम्स, जेफरसन, बेंजामिन फ्रैंकलिन, जैक्सन आदि यूरोपीय विचारकों जैसे -लॉक, रूसो, आदि का प्रभाव अमेरिकी बुद्धिजीवियों पर देखा गया। बुद्धिजीवियों के विचारों ने विरोध को तार्किक आधार प्रदान किया तथा लोगों को विकल्प भी उपलब्द्ध कराया | सप्त वर्षीय युद्ध इस युद्ध ने उपनिवेशवासियों और मातृदेश के बीच करों से सम्बंधित विवाद को तीव्र कर दिया इस युद्ध में ब्रिटेन, फ्रांस के विरुद्ध विजयी हुआ था परन्तु इंग्लैण्ड की अर्थव्यवस्था को चरमरा दिया था| सप्त वर्षीय युद्ध के कारण ब्रिटिश व्यय में वृद्धि हुई। जिसकी क्षतिपूर्ति के क्रम में ब्रिटेन ने अमेरिका पर पुराने कानूनों को कठोरता के साथ लागू करने का निर्णय लिया तथा कुछ नए कानून भी लागू किये गए। जैसे-स्टाम्प एक्ट(व्यावसायिक करारों में स्टाम्प लेना अनिवार्य कर दिया गया), शुगर एक्ट, करेंसी एक्ट आदि। अतः ब्रिटिश नीतियों के विरुद्ध फिलाडेल्फिया में 1774 में महाद्वीपीय सम्मलेन का आयोजन किया गया और करों को रद्द किये जाने की मांग की गयी| किन्तु सरकार के कठोर रवैये के कारण हिंसक संघर्ष की शुरुआत हुई| अंततः 4 जुलाई 1776 को ब्रिटेन से स्वतंत्रता की औपचारिक घोषणा की गयी| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि अमेरिकी क्रान्ति न केवल ब्रिटिश वाणिज्यवादी नीतियों बल्कि अन्य अनेक कारणों का परिणाम थी|
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पूंजीवाद को परिभाषित करते हुए, इसकी विशेषताओं की चर्चा कीजिये | साथ ही पूँजीवाद के रूपांतरण के विभिन्न चरणों को भी रेखांकित कीजिये | (150-200 शब्द) While defining capitalism, discuss its characteristics. Also, underline the various stages of transformation of capitalism. (150-200 Words)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत पूँजीवाद को परिभाषित करते हुए कीजिये | इसके पश्चात पूंजीवाद की विशेषताओं को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | पुनः पूँजीवाद के विभिन्न चरणों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - पूँजीवाद पूँजीवाद को आर्थिक आधुनिकीकरण के पर्याय के रूप में देखा जाता है | जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था का स्वरुप सुनिश्चित करने में सबसे अधिक प्रभावी शक्ति के रूप में कार्य किया है | पूंजीवादी मान्यताओं का स्वरुप निरंतर गतिशील रहा है तथा विश्व के भिन्न-भिन्न भागों में पूंजीवादी रूपांतरण की प्रक्रिया एवं स्तर भी एक सामान नहीं रहे | पूँजीवाद को आर्थिक उदारवाद के रूप में भी देखा जाता है, जिसके सैद्धांतिक आधारों का निर्माण प्रबोधन के युग के आर्थिक चिंतकों ने किया , जिनमे तथाकथित शास्त्रीय अर्थशास्त्रियों जैसे - एडम स्मिथ, रिकार्डो, माल्थस इत्यादि की प्रमुख भूमिका रही | पूँजीवाद की विशेषताएं - उत्पादन तथा वितरण की एक व्यवस्था के रूप मेंपूजीवादी व्यवस्था की कुछ प्रमुख विशिष्टताएँनिम्नलिखित हैं - उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व संपत्ति के अधिकार पर बल आर्थिक व्यक्तिवाद जिसके अंतर्गत सभी मनुष्य को तार्किक मानते हुए तार्किक निर्णय लेने तथा अपने प्रबुद्ध हितों की सुरक्षा करने में सक्षम माना जाता है | अनुबंध आधारित सम्बन्ध व्यक्तिगत पहल अथवा उद्यम की स्वतंत्रता अधिशेष उत्पादन पर बल , लाभ की इच्छा, श्रम का विभाजन उद्योग आधारित उत्पादन, मुक्त व्यापार की संकल्पना - इसका आशय आर्थिक जीवन में राज्य के अहस्क्षेप से है | अर्थव्यवस्था के प्राकृतिक नियमों - मांग एवं पूर्ति के आधार पर स्वस्थ प्रतियोगिता का होना | पूंजीवादी रूपांतरण के चरण विश्व अर्थव्यवस्था के पूंजीवादी रूपांतरण के कुछ प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं - वाणिज्यवादी चरण - इस चरण का प्रारंभ पुँर्जागारण की संस्कृति से संचालित वाणिज्यिक क्रांति के दौरान हुआ | इस चरण का सम्बन्ध निम्नलिखित परिवर्तनों से है - बाजार का विस्तार, संयुक्त व्यापारिक निकायों का उदय, आधुनिक बैंकिंग एवं वित्तीय संस्थाओं का उदय, एकाधिकार प्राप्त व्यापारिक निकाय, आरंभिक पूँजी संचय -जिसका निवेश निर्माण या उत्पादन के क्षेत्र में किया जाने लगा, जिससे कि बढ़ती मांगों को पूर्ण किया जा सके | व्यापारिक पूँजी का कारीगरों पर नियंत्रण तथा इसमें पेशगी पर आधारित उत्पादन व्यवस्था | गृह आधारित उत्पादन व्यवस्था के स्थान पर कारखाना आधारित व्यवस्था का प्रारंभ | औद्योगिक चरण - औद्योगिक क्रांति का चरण में उद्योगों की प्रधानता रही | उत्तर औद्योगिक चरण -इस चरण का सम्बन्ध सेवा क्षेत्र के निरंतर विस्तार से है , जिसने वैश्वीकरण की प्रवृतियों को आगे बढ़ाया है | पूंजीवादी व्यवस्था के ये तीनों चरण अधिरोपित हैं, जिन्होंने वर्तमान विश्व की जटिल अर्थव्यवस्था का निर्माण किया है | इस चरण को नव -उदारवादी चरण के नाम से भी जाना जाता है, विशेषकर सोवियत संघ के पतन के बाद नए वैश्विक व्यवस्था के सन्दर्भ में |इन तीनों ही चरणों का घनिष्ठ सम्बन्ध आधुनिक उपनिवेशवाद व साम्राज्यवाद से भी है | जिनके चरणों का निर्धारण भी पूंजीवादी व्यवस्था के आधार पर किया गया है |
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##Question:पूंजीवाद को परिभाषित करते हुए, इसकी विशेषताओं की चर्चा कीजिये | साथ ही पूँजीवाद के रूपांतरण के विभिन्न चरणों को भी रेखांकित कीजिये | (150-200 शब्द) While defining capitalism, discuss its characteristics. Also, underline the various stages of transformation of capitalism. (150-200 Words)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत पूँजीवाद को परिभाषित करते हुए कीजिये | इसके पश्चात पूंजीवाद की विशेषताओं को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | पुनः पूँजीवाद के विभिन्न चरणों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - पूँजीवाद पूँजीवाद को आर्थिक आधुनिकीकरण के पर्याय के रूप में देखा जाता है | जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था का स्वरुप सुनिश्चित करने में सबसे अधिक प्रभावी शक्ति के रूप में कार्य किया है | पूंजीवादी मान्यताओं का स्वरुप निरंतर गतिशील रहा है तथा विश्व के भिन्न-भिन्न भागों में पूंजीवादी रूपांतरण की प्रक्रिया एवं स्तर भी एक सामान नहीं रहे | पूँजीवाद को आर्थिक उदारवाद के रूप में भी देखा जाता है, जिसके सैद्धांतिक आधारों का निर्माण प्रबोधन के युग के आर्थिक चिंतकों ने किया , जिनमे तथाकथित शास्त्रीय अर्थशास्त्रियों जैसे - एडम स्मिथ, रिकार्डो, माल्थस इत्यादि की प्रमुख भूमिका रही | पूँजीवाद की विशेषताएं - उत्पादन तथा वितरण की एक व्यवस्था के रूप मेंपूजीवादी व्यवस्था की कुछ प्रमुख विशिष्टताएँनिम्नलिखित हैं - उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व संपत्ति के अधिकार पर बल आर्थिक व्यक्तिवाद जिसके अंतर्गत सभी मनुष्य को तार्किक मानते हुए तार्किक निर्णय लेने तथा अपने प्रबुद्ध हितों की सुरक्षा करने में सक्षम माना जाता है | अनुबंध आधारित सम्बन्ध व्यक्तिगत पहल अथवा उद्यम की स्वतंत्रता अधिशेष उत्पादन पर बल , लाभ की इच्छा, श्रम का विभाजन उद्योग आधारित उत्पादन, मुक्त व्यापार की संकल्पना - इसका आशय आर्थिक जीवन में राज्य के अहस्क्षेप से है | अर्थव्यवस्था के प्राकृतिक नियमों - मांग एवं पूर्ति के आधार पर स्वस्थ प्रतियोगिता का होना | पूंजीवादी रूपांतरण के चरण विश्व अर्थव्यवस्था के पूंजीवादी रूपांतरण के कुछ प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं - वाणिज्यवादी चरण - इस चरण का प्रारंभ पुँर्जागारण की संस्कृति से संचालित वाणिज्यिक क्रांति के दौरान हुआ | इस चरण का सम्बन्ध निम्नलिखित परिवर्तनों से है - बाजार का विस्तार, संयुक्त व्यापारिक निकायों का उदय, आधुनिक बैंकिंग एवं वित्तीय संस्थाओं का उदय, एकाधिकार प्राप्त व्यापारिक निकाय, आरंभिक पूँजी संचय -जिसका निवेश निर्माण या उत्पादन के क्षेत्र में किया जाने लगा, जिससे कि बढ़ती मांगों को पूर्ण किया जा सके | व्यापारिक पूँजी का कारीगरों पर नियंत्रण तथा इसमें पेशगी पर आधारित उत्पादन व्यवस्था | गृह आधारित उत्पादन व्यवस्था के स्थान पर कारखाना आधारित व्यवस्था का प्रारंभ | औद्योगिक चरण - औद्योगिक क्रांति का चरण में उद्योगों की प्रधानता रही | उत्तर औद्योगिक चरण -इस चरण का सम्बन्ध सेवा क्षेत्र के निरंतर विस्तार से है , जिसने वैश्वीकरण की प्रवृतियों को आगे बढ़ाया है | पूंजीवादी व्यवस्था के ये तीनों चरण अधिरोपित हैं, जिन्होंने वर्तमान विश्व की जटिल अर्थव्यवस्था का निर्माण किया है | इस चरण को नव -उदारवादी चरण के नाम से भी जाना जाता है, विशेषकर सोवियत संघ के पतन के बाद नए वैश्विक व्यवस्था के सन्दर्भ में |इन तीनों ही चरणों का घनिष्ठ सम्बन्ध आधुनिक उपनिवेशवाद व साम्राज्यवाद से भी है | जिनके चरणों का निर्धारण भी पूंजीवादी व्यवस्था के आधार पर किया गया है |
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पूंजीवाद को परिभाषित करते हुए, इसकी विशेषताओं की चर्चा कीजिये | साथ ही पूँजीवाद के रूपांतरण के विभिन्न चरणों को भी रेखांकित कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) While defining capitalism, discuss its characteristics. Also, underline the various stages of transformation of capitalism. (150-200 Words/10 Marks)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत पूँजीवाद को परिभाषित करते हुए कीजिये | इसके पश्चात पूंजीवाद की विशेषताओं को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | पुनः पूँजीवाद के विभिन्न चरणों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - पूँजीवाद पूँजीवाद को आर्थिक आधुनिकीकरण के पर्याय के रूप में देखा जाता है | जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था का स्वरुप सुनिश्चित करने में सबसे अधिक प्रभावी शक्ति के रूप में कार्य किया है | पूंजीवादी मान्यताओं का स्वरुप निरंतर गतिशील रहा है तथा विश्व के भिन्न-भिन्न भागों में पूंजीवादी रूपांतरण की प्रक्रिया एवं स्तर भी एक सामान नहीं रहे | पूँजीवाद को आर्थिक उदारवाद के रूप में भी देखा जाता है, जिसके सैद्धांतिक आधारों का निर्माण प्रबोधन के युग के आर्थिक चिंतकों ने किया , जिनमे तथाकथित शास्त्रीय अर्थशास्त्रियों जैसे - एडम स्मिथ, रिकार्डो, माल्थस इत्यादि की प्रमुख भूमिका रही | पूँजीवाद की विशेषताएं - उत्पादन तथा वितरण की एक व्यवस्था के रूप मेंपूजीवादी व्यवस्था की कुछ प्रमुख विशिष्टताएँनिम्नलिखित हैं - उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व | संपत्ति के अधिकार पर बल | आर्थिक व्यक्तिवाद जिसके अंतर्गत सभी मनुष्य को तार्किक मानते हुए तार्किक निर्णय लेने तथा अपने प्रबुद्ध हितों की सुरक्षा करने में सक्षम माना जाता है | अनुबंध आधारित सम्बन्ध | व्यक्तिगत पहल अथवा उद्यम की स्वतंत्रता | अधिशेष उत्पादन पर बल , लाभ की इच्छा, श्रम का विभाजन | उद्योग आधारित उत्पादन | मुक्त व्यापार की संकल्पना - इसका आशय आर्थिक जीवन में राज्य के अहस्क्षेप से है | अर्थव्यवस्था के प्राकृतिक नियमों - मांग एवं पूर्ति के आधार पर स्वस्थ प्रतियोगिता का होना | पूंजीवादी रूपांतरण के चरण विश्व अर्थव्यवस्था के पूंजीवादी रूपांतरण के कुछ प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं - वाणिज्यवादी चरण- इस चरण का प्रारंभ पुँर्जागारण की संस्कृति से संचालित वाणिज्यिक क्रांति के दौरान हुआ | इस चरण का सम्बन्ध निम्नलिखित परिवर्तनों से है - बाजार का विस्तार, संयुक्त व्यापारिक निकायों का उदय, आधुनिक बैंकिंग एवं वित्तीय संस्थाओं का उदय, एकाधिकार प्राप्त व्यापारिक निकाय, आरंभिक पूँजी संचय -जिसका निवेश निर्माण या उत्पादन के क्षेत्र में किया जाने लगा, जिससे कि बढ़ती मांगों को पूर्ण किया जा सके | व्यापारिक पूँजी का कारीगरों पर नियंत्रण तथा इसमें पेशगी पर आधारित उत्पादन व्यवस्था | गृह आधारित उत्पादन व्यवस्था के स्थान पर कारखाना आधारित व्यवस्था का प्रारंभ | औद्योगिक चरण -औद्योगिक क्रांति का चरण में उद्योगों की प्रधानता रही | उत्तर औद्योगिक चरण-इस चरण का सम्बन्ध सेवा क्षेत्र के निरंतर विस्तार से है , जिसने वैश्वीकरण की प्रवृतियों को आगे बढ़ाया है | पूंजीवादी व्यवस्था के ये तीनों चरण अधिरोपित हैं, जिन्होंने वर्तमान विश्व की जटिल अर्थव्यवस्था का निर्माण किया है | इस चरण को नव -उदारवादी चरण के नाम से भी जाना जाता है, विशेषकर सोवियत संघ के पतन के बाद नए वैश्विक व्यवस्था के सन्दर्भ में |इन तीनों ही चरणों का घनिष्ठ सम्बन्ध आधुनिक उपनिवेशवाद व साम्राज्यवाद से भी है | जिनके चरणों का निर्धारण भी पूंजीवादी व्यवस्था के आधार पर किया गया है |
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##Question:पूंजीवाद को परिभाषित करते हुए, इसकी विशेषताओं की चर्चा कीजिये | साथ ही पूँजीवाद के रूपांतरण के विभिन्न चरणों को भी रेखांकित कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) While defining capitalism, discuss its characteristics. Also, underline the various stages of transformation of capitalism. (150-200 Words/10 Marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत पूँजीवाद को परिभाषित करते हुए कीजिये | इसके पश्चात पूंजीवाद की विशेषताओं को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | पुनः पूँजीवाद के विभिन्न चरणों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - पूँजीवाद पूँजीवाद को आर्थिक आधुनिकीकरण के पर्याय के रूप में देखा जाता है | जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था का स्वरुप सुनिश्चित करने में सबसे अधिक प्रभावी शक्ति के रूप में कार्य किया है | पूंजीवादी मान्यताओं का स्वरुप निरंतर गतिशील रहा है तथा विश्व के भिन्न-भिन्न भागों में पूंजीवादी रूपांतरण की प्रक्रिया एवं स्तर भी एक सामान नहीं रहे | पूँजीवाद को आर्थिक उदारवाद के रूप में भी देखा जाता है, जिसके सैद्धांतिक आधारों का निर्माण प्रबोधन के युग के आर्थिक चिंतकों ने किया , जिनमे तथाकथित शास्त्रीय अर्थशास्त्रियों जैसे - एडम स्मिथ, रिकार्डो, माल्थस इत्यादि की प्रमुख भूमिका रही | पूँजीवाद की विशेषताएं - उत्पादन तथा वितरण की एक व्यवस्था के रूप मेंपूजीवादी व्यवस्था की कुछ प्रमुख विशिष्टताएँनिम्नलिखित हैं - उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व | संपत्ति के अधिकार पर बल | आर्थिक व्यक्तिवाद जिसके अंतर्गत सभी मनुष्य को तार्किक मानते हुए तार्किक निर्णय लेने तथा अपने प्रबुद्ध हितों की सुरक्षा करने में सक्षम माना जाता है | अनुबंध आधारित सम्बन्ध | व्यक्तिगत पहल अथवा उद्यम की स्वतंत्रता | अधिशेष उत्पादन पर बल , लाभ की इच्छा, श्रम का विभाजन | उद्योग आधारित उत्पादन | मुक्त व्यापार की संकल्पना - इसका आशय आर्थिक जीवन में राज्य के अहस्क्षेप से है | अर्थव्यवस्था के प्राकृतिक नियमों - मांग एवं पूर्ति के आधार पर स्वस्थ प्रतियोगिता का होना | पूंजीवादी रूपांतरण के चरण विश्व अर्थव्यवस्था के पूंजीवादी रूपांतरण के कुछ प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं - वाणिज्यवादी चरण- इस चरण का प्रारंभ पुँर्जागारण की संस्कृति से संचालित वाणिज्यिक क्रांति के दौरान हुआ | इस चरण का सम्बन्ध निम्नलिखित परिवर्तनों से है - बाजार का विस्तार, संयुक्त व्यापारिक निकायों का उदय, आधुनिक बैंकिंग एवं वित्तीय संस्थाओं का उदय, एकाधिकार प्राप्त व्यापारिक निकाय, आरंभिक पूँजी संचय -जिसका निवेश निर्माण या उत्पादन के क्षेत्र में किया जाने लगा, जिससे कि बढ़ती मांगों को पूर्ण किया जा सके | व्यापारिक पूँजी का कारीगरों पर नियंत्रण तथा इसमें पेशगी पर आधारित उत्पादन व्यवस्था | गृह आधारित उत्पादन व्यवस्था के स्थान पर कारखाना आधारित व्यवस्था का प्रारंभ | औद्योगिक चरण -औद्योगिक क्रांति का चरण में उद्योगों की प्रधानता रही | उत्तर औद्योगिक चरण-इस चरण का सम्बन्ध सेवा क्षेत्र के निरंतर विस्तार से है , जिसने वैश्वीकरण की प्रवृतियों को आगे बढ़ाया है | पूंजीवादी व्यवस्था के ये तीनों चरण अधिरोपित हैं, जिन्होंने वर्तमान विश्व की जटिल अर्थव्यवस्था का निर्माण किया है | इस चरण को नव -उदारवादी चरण के नाम से भी जाना जाता है, विशेषकर सोवियत संघ के पतन के बाद नए वैश्विक व्यवस्था के सन्दर्भ में |इन तीनों ही चरणों का घनिष्ठ सम्बन्ध आधुनिक उपनिवेशवाद व साम्राज्यवाद से भी है | जिनके चरणों का निर्धारण भी पूंजीवादी व्यवस्था के आधार पर किया गया है |
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सांप्रदायिकता से आप क्या समझते हैं? भारत में स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान सांप्रदायिकता के क्रमिक विकास को स्पष्ट कीजिए। (10 अंक;150-200 शब्द) What do you understand by communalism? Explain the gradual development of communalism during the freedom struggle in India. (10 marks;150-200 words)
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Approach: सांप्रदायिकता को भूमिका में परिभाषित कीजिए। समरदायिकता की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान सांप्रदायिकता का क्रमिक विकास की बिंदुवत चर्चा कीजिए। सांप्रदायिकता के प्रभाव की चर्चा निष्कर्ष में कर सकते हैं। उत्तर- सांप्रदायिकता एक आधुनिक विचारधारा और राजनैतिक प्रवृति है। इसके अनुसार एक धर्म के अनुयायी व्यक्तियों के सांसारिक हित एक जैसे ही होते हैं और किसी अन्य धर्म का अनुसरण करने वाले ब्यक्तियों के सांसारिक हितों से भिन्न होते हैं। अत: सभी को अपने हितों के लिए धार्मिक आधार पर संगठित हो जाना चाहिए। इसके साथ ही इस विचारधारा के अनुसार लोगों को यह समझाया जाता है की अन्य समुदाय या धर्म के ब्यक्ति खतरनाक तथा हानिकारक हैं एवं वक्त्त आने पर वे अपने समुदाय के हित में ही निर्णय लेंगे। सांप्रदायिकता अपने चरम पर पहुँच जाती है जब यह मान लिया जाता है कि विभिन्न धर्मों के अनुयायियों या समुदायों के हित एक दूसरे के परस्पर विरोधी है। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान सांप्रदायिकता का क्रमिक विकास- 1887 में ब्रिटिश सरकार ने सर सैयद अहमद खान तथा राजा शिव प्रसाद को कोंगेस विरोधी मोर्चा बनाने के लिए प्रोत्साहित किया सर सैयद अहमद ने बुद्धिजीवी मुसलमानों से अपील की कि वे कॉंग्रेस से दूर रहें। 1906 में सर आगा खाँ के नेतृत्व में एक मुस्लिम शिष्टमंडल भारत के तत्कालीन वायसराय से मिला। इसने मुस्लिमों के लिए पृथक निर्वाचन की मांग की। 1907 में आल इंडिया मुस्लिम लीग की स्थापना हुई। 1909 मार्ले मिंटो सुधारों द्वारा पृथक निर्वाचन की शुरुवात हुई। 1915 में अखिल भारतीय हिन्दू महासभा का प्रथम अधिवेशन आयोजित हुआ। 1916 के लखनऊ पेक्ट में कॉंग्रेस ने मुस्लिमो के पृथक निर्वाचन की मांग को स्वीकार कर लिया। यद्यपि यह समझौता कई दृष्टियों में प्रगतिशील था किन्तु कॉंग्रेस ने इसके द्वारा सांप्रदायिक राजनीति को स्वीकार कर लिया। 1920 में आर्य समाज ने शुद्धि आंदोलन चलाया जिसका उद्देश्य इस्लाम स्वीकार कर चुके हिंदुओं को पुन: हिन्दू धर्म में वापस लाना था। 1928 में साइमन कमीशन की चुनौतियों को नेहरू रिपोर्ट से दूर करने का प्रयास किया गया। किन्तु इस रिपोर्ट को मुस्लिम लीग द्वारा अस्वीकार कर दिया गया। 1930-34 में हुए गोलमेज़ सम्मेलनों में संप्रदायवादियों ने भाग लिया। 1932- में सांप्रदायिक निर्णय में जिन्ना द्वारा प्रस्तुत चौदह सूत्रीय मांगों में से अधिकान्श को मान लिया गया। 1937 के पश्चात पृथक मुस्लिम राष्ट्र की अवधारणा का विकास 1937-39 जिन्ना द्वारा मुस्लिम लीग को मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि संस्था घोषित करने की मांग। मार्च 1940 में मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में भारत का बंटवारा मांगते हुए एक प्रस्ताव पारित किया गया। 15 अगस्त 1947 भारत शासन अधिनियम द्वारा भारत का सांप्रदायिक आधार पर विभाजन सांप्रदायिकता के विकास ने भारत को गहरे स्तर पर प्रभावित किया। आजादी के इतने वर्षों के बाद भी सांप्रदायिकता वर्तमान में भी भिन्न भिन्न रूपों में अपनी उपस्थिति दर्शाती है। यह भारत की सामासिक संस्कृति के सिद्धांतों के खिलाफ है।
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##Question:सांप्रदायिकता से आप क्या समझते हैं? भारत में स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान सांप्रदायिकता के क्रमिक विकास को स्पष्ट कीजिए। (10 अंक;150-200 शब्द) What do you understand by communalism? Explain the gradual development of communalism during the freedom struggle in India. (10 marks;150-200 words)##Answer: Approach: सांप्रदायिकता को भूमिका में परिभाषित कीजिए। समरदायिकता की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान सांप्रदायिकता का क्रमिक विकास की बिंदुवत चर्चा कीजिए। सांप्रदायिकता के प्रभाव की चर्चा निष्कर्ष में कर सकते हैं। उत्तर- सांप्रदायिकता एक आधुनिक विचारधारा और राजनैतिक प्रवृति है। इसके अनुसार एक धर्म के अनुयायी व्यक्तियों के सांसारिक हित एक जैसे ही होते हैं और किसी अन्य धर्म का अनुसरण करने वाले ब्यक्तियों के सांसारिक हितों से भिन्न होते हैं। अत: सभी को अपने हितों के लिए धार्मिक आधार पर संगठित हो जाना चाहिए। इसके साथ ही इस विचारधारा के अनुसार लोगों को यह समझाया जाता है की अन्य समुदाय या धर्म के ब्यक्ति खतरनाक तथा हानिकारक हैं एवं वक्त्त आने पर वे अपने समुदाय के हित में ही निर्णय लेंगे। सांप्रदायिकता अपने चरम पर पहुँच जाती है जब यह मान लिया जाता है कि विभिन्न धर्मों के अनुयायियों या समुदायों के हित एक दूसरे के परस्पर विरोधी है। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान सांप्रदायिकता का क्रमिक विकास- 1887 में ब्रिटिश सरकार ने सर सैयद अहमद खान तथा राजा शिव प्रसाद को कोंगेस विरोधी मोर्चा बनाने के लिए प्रोत्साहित किया सर सैयद अहमद ने बुद्धिजीवी मुसलमानों से अपील की कि वे कॉंग्रेस से दूर रहें। 1906 में सर आगा खाँ के नेतृत्व में एक मुस्लिम शिष्टमंडल भारत के तत्कालीन वायसराय से मिला। इसने मुस्लिमों के लिए पृथक निर्वाचन की मांग की। 1907 में आल इंडिया मुस्लिम लीग की स्थापना हुई। 1909 मार्ले मिंटो सुधारों द्वारा पृथक निर्वाचन की शुरुवात हुई। 1915 में अखिल भारतीय हिन्दू महासभा का प्रथम अधिवेशन आयोजित हुआ। 1916 के लखनऊ पेक्ट में कॉंग्रेस ने मुस्लिमो के पृथक निर्वाचन की मांग को स्वीकार कर लिया। यद्यपि यह समझौता कई दृष्टियों में प्रगतिशील था किन्तु कॉंग्रेस ने इसके द्वारा सांप्रदायिक राजनीति को स्वीकार कर लिया। 1920 में आर्य समाज ने शुद्धि आंदोलन चलाया जिसका उद्देश्य इस्लाम स्वीकार कर चुके हिंदुओं को पुन: हिन्दू धर्म में वापस लाना था। 1928 में साइमन कमीशन की चुनौतियों को नेहरू रिपोर्ट से दूर करने का प्रयास किया गया। किन्तु इस रिपोर्ट को मुस्लिम लीग द्वारा अस्वीकार कर दिया गया। 1930-34 में हुए गोलमेज़ सम्मेलनों में संप्रदायवादियों ने भाग लिया। 1932- में सांप्रदायिक निर्णय में जिन्ना द्वारा प्रस्तुत चौदह सूत्रीय मांगों में से अधिकान्श को मान लिया गया। 1937 के पश्चात पृथक मुस्लिम राष्ट्र की अवधारणा का विकास 1937-39 जिन्ना द्वारा मुस्लिम लीग को मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि संस्था घोषित करने की मांग। मार्च 1940 में मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में भारत का बंटवारा मांगते हुए एक प्रस्ताव पारित किया गया। 15 अगस्त 1947 भारत शासन अधिनियम द्वारा भारत का सांप्रदायिक आधार पर विभाजन सांप्रदायिकता के विकास ने भारत को गहरे स्तर पर प्रभावित किया। आजादी के इतने वर्षों के बाद भी सांप्रदायिकता वर्तमान में भी भिन्न भिन्न रूपों में अपनी उपस्थिति दर्शाती है। यह भारत की सामासिक संस्कृति के सिद्धांतों के खिलाफ है।
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The Battle of Plassey and the Battle of Buxar was an important milestone in the establishment of British Rule in India. In light of the above statement, discuss the causes of these battles and the significance of their outcomes for the British. (10 Marks/150 Words)
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The battle of Plassey happened in Bengal with the Nawab pitched against the east India company. In the Buxar there was the coalition of the Nawab of Bengal, Awadh and the Mughal emperor was also involved. Causes for Battle of Plassey The succession disputes that emerged after following Asif jahan I death and that were engineered in Carnatic with the assassination of Nawab Anwariddin provided a fertile ground for French and British interference in succession The Anglo French rivalry in South Asia, particularly in the Carnatic region became acute as Dupliex, the French Military Commander was keen on expanding the French presence in the region and especially keen on getting the British out The Anglo-French rivalry in North America and Europe in Austrian Succession dispute also triggered the break out of hostilities in Anglo-Carnatic War. For example in the Third Anglo Carnatic Wars. Causes for Battle of Buxar Consequences of the Battle of Plassey itself such as Plassey Plunder, loss to outside powers etc. led to resentment among the rulers. Hence they vowed to take revenge from British Mir Jafar, the new Nawab of Bengal, realised that it was impossible to meet the demands of the East India company and its officials. And hence stopped paying British. British forced Mir Jafar to renounce the throne for Mir Qasim. Mir Qasim was enthroned with the help of Englishmen and he rewarded them satisfactorily. While Mir Qasim wanted to see himself in the role of independent ruler, the English wanted to use him as a mere tool in their hands as they put him in his power. In this situation, the war was inevitable between Mir Qasim and the English. In 1763, Shah Alam 2 (Mughal emperor), Sujha-ud-Daula (Awadh) and Mir Qasim planned to form a grand alliance to fight against British. significance of these Battles for British It brought in the British Crown troops into India in large numbers, tilting the balance of power in the region in favour of British vis-à-vis Indian regional states. The treaty of Paris saw the eventual French withdrawal from the region and thus allowed the British to calmly focus upon the regional Indian states without any threat of French intervention. The Siege of Arcot of 1751 saw the (British assistance to M.Ali to capture Arcot against French) British dealing a decisive blow to French prestige in Carnatic in the Second Anglo-Carnatic War. Many historians argue that the Siege of Arcot was the historical Battle that could be seen as marking the British entry into the subcontinent. This also changed British mindset from mere traders to rulers. The possibility of French assistance to Indian princely states to overthrow British Presence now seemed distant following the French withdrawal. This became evident in case of Tipu Sultan where no substantial help came from French. 1765- Treaty of Allahabad: Shah Alam 2 was treated with respect after the defeat and the nominal rule of Mughal continued. In return, the British were granted revenue collecting rights for Bengal. Leading to a permanent source of Income to ECI, financing for further expansion. Hence, the British East India company became a dominant power in the region. This is considered the first step toward the British imperialism policy to conquer entire India.
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##Question:The Battle of Plassey and the Battle of Buxar was an important milestone in the establishment of British Rule in India. In light of the above statement, discuss the causes of these battles and the significance of their outcomes for the British. (10 Marks/150 Words)##Answer:The battle of Plassey happened in Bengal with the Nawab pitched against the east India company. In the Buxar there was the coalition of the Nawab of Bengal, Awadh and the Mughal emperor was also involved. Causes for Battle of Plassey The succession disputes that emerged after following Asif jahan I death and that were engineered in Carnatic with the assassination of Nawab Anwariddin provided a fertile ground for French and British interference in succession The Anglo French rivalry in South Asia, particularly in the Carnatic region became acute as Dupliex, the French Military Commander was keen on expanding the French presence in the region and especially keen on getting the British out The Anglo-French rivalry in North America and Europe in Austrian Succession dispute also triggered the break out of hostilities in Anglo-Carnatic War. For example in the Third Anglo Carnatic Wars. Causes for Battle of Buxar Consequences of the Battle of Plassey itself such as Plassey Plunder, loss to outside powers etc. led to resentment among the rulers. Hence they vowed to take revenge from British Mir Jafar, the new Nawab of Bengal, realised that it was impossible to meet the demands of the East India company and its officials. And hence stopped paying British. British forced Mir Jafar to renounce the throne for Mir Qasim. Mir Qasim was enthroned with the help of Englishmen and he rewarded them satisfactorily. While Mir Qasim wanted to see himself in the role of independent ruler, the English wanted to use him as a mere tool in their hands as they put him in his power. In this situation, the war was inevitable between Mir Qasim and the English. In 1763, Shah Alam 2 (Mughal emperor), Sujha-ud-Daula (Awadh) and Mir Qasim planned to form a grand alliance to fight against British. significance of these Battles for British It brought in the British Crown troops into India in large numbers, tilting the balance of power in the region in favour of British vis-à-vis Indian regional states. The treaty of Paris saw the eventual French withdrawal from the region and thus allowed the British to calmly focus upon the regional Indian states without any threat of French intervention. The Siege of Arcot of 1751 saw the (British assistance to M.Ali to capture Arcot against French) British dealing a decisive blow to French prestige in Carnatic in the Second Anglo-Carnatic War. Many historians argue that the Siege of Arcot was the historical Battle that could be seen as marking the British entry into the subcontinent. This also changed British mindset from mere traders to rulers. The possibility of French assistance to Indian princely states to overthrow British Presence now seemed distant following the French withdrawal. This became evident in case of Tipu Sultan where no substantial help came from French. 1765- Treaty of Allahabad: Shah Alam 2 was treated with respect after the defeat and the nominal rule of Mughal continued. In return, the British were granted revenue collecting rights for Bengal. Leading to a permanent source of Income to ECI, financing for further expansion. Hence, the British East India company became a dominant power in the region. This is considered the first step toward the British imperialism policy to conquer entire India.
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विकास उद्योग से आप क्या समझते हैं? भारतीय परिप्रेक्ष्य में, गैर सरकारी संगठनों की विकास उद्योग में भूमिका स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by the Development Industry? In the Indian perspective, Explain the role of NGOs in the Development Industry. (150-200 words/10 Marks)
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एप्रोच- पहले भाग में, विकास, विकास प्रक्रियाएं तथा विकास उद्योग को समझाईये| अगले भाग में,गैर सरकारी संगठनों को समझाते हुए,भारतीय परिप्रेक्ष्य में, उनकी विकास उद्योग में भूमिका स्पष्ट कीजिये| उत्तर- विकास को व्यापक संदर्भों में आर्थिक संवृद्धि के साथ-साथ सामाजिक विकास, संधारणीय विकास और मानव विकास जैसे आयामों से जोड़कर देखा जाता है| दूसरे शब्दों में कहा जाए तो, विकास का तात्पर्य एक ऐसा सामाजिक परिवर्तन लाना है जो लोगों को उनकी मानवीय क्षमता प्राप्त करने में सहायक हो| विकास को सैद्धांतिक स्तर पर सतत आर्थिक प्रगति एवं उससे लाभान्वित हो रहे जनसमूह, जो समावेशी क्रम में प्रगतिशील हों, से समझा जा सकता है| विकास प्रक्रियाएं तथा विकास उद्योग किसी भी समाज का राजनीतिक दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करता है कि दिए गये समाज में विकासात्मक प्रक्रियाओं जिसके अंतर्गत सामाजिक सुरक्षा के विभिन्न घटकों को प्रोत्साहन सम्मिलित हो, के प्रतिशतता एवं दिशा कैसी हो| भारतीय संदर्भ में, संविधान स्वंय ही सामाजिक न्याय को संकल्पित है तथा नीति-निर्देशक तत्वों में विकासात्मक प्रक्रियाओं के सभी संदर्भों को समेकित किया गया है| विकास प्रक्रिया को हम एक राजनीतिक प्रक्रिया के साथ-साथ मानव विकास(अमर्त्य सेन); संधारणीय विकास(ब्रटलैंड आयोग); आर्थिक विकास तथा सामाजिक विकास की प्रक्रिया के रूप में समझ सकते हैं| विकास उद्योग से तात्पर्य को मात्रात्मक एवं गुणात्मक संदर्भों में देखा जा सकता है| गुणात्मक संदर्भ में विकास उद्योग से तात्पर्य राजनीतिक व्यवस्था के उस उपखंड से है जो शासन प्रणाली में विकास लक्ष्यों को प्राथमिकता देता है| मात्रात्मक संदर्भों में, विकास उद्योग से तात्पर्य विकास एवं समावेश को एक प्रोफेशनल दृष्टिकोण के साथ लागू करने से है| ऐतिहासिक संदर्भों में इसका प्रारंभ अमेरिकी प्रशासनिक सुधारों में माना जाता है| भारतीय परिप्रेक्ष्य में 2005 से परिवर्तित हुए दृष्टिकोण जिसमें गवर्नमेंट से गवर्नेंस की सोच के अंतर्गत विकास उद्योग प्रोत्साहित किये गये जिसमें निम्न 3 बिन्दुओं को रेखांकित किया गया- सामाजिक विकास एवं सुरक्षा के घटकों के प्रति प्रोफेशनल दृष्टिकोण के साथ कौशल प्रशिक्षण आदि माध्यमों से उचित मानव संसाधन सृजित किये जाएँ; जिसमें गैर सरकारी संगठनों एवं सिविल सोसाइटी की भूमिका बढ़ी है| सामाजिक समावेश के संदर्भों में माइक्रोफाइनेंस को विस्तारित करते हुए आय के स्रोतों को सृजित किया जाए; इस संदर्भ में स्वंय सहायता समूहों ने अतिमहत्वपूर्ण भूमिका निभाई है;लोगों के पास सूक्ष्म वित्तीय संस्थानों तक पहुँच हो सके; नवाचार एवं नियामकों के माध्यम से विकासात्मक प्रक्रियायों को त्वरित एवं दक्षता संवर्धन किया जाए; गैर सरकारी संगठनों की विकास उद्योग में भूमिका गैर सरकारी संगठनों से तात्पर्य उन सभी संगठनों से है जो शासन व्यवस्था एवं आम नागरिक के मध्य एक सेतु का कार्य करते हैं| गैर सरकारी संगठन भी एक प्रकार के सिविल सोसाइटी ही होते हैं| भारतीय परिप्रेक्ष्य में सिविल सोसाइटी से तात्पर्य उन सभी संस्थानों से है जो शासन व्यवस्था एवं आम नागरिक के मध्य एक कड़ी की तरह दोनों घटकों को जोड़ रहे होते हैं| ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में इन गैर सरकारी संगठनों का इतिहास 1860 के दशक से है जब ब्रिटिश शासन व्यवस्था ने सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के अंतर्गत ऐसे समूहों को प्रोत्साहित किया जो सामाजिक कार्यों में शासन व्यवस्था का सहयोग करना चाहते हों| स्वतंत्रता संघर्ष के समय सामाजिक कार्यों में गैर सरकारी संगठनों की सक्रीय भूमिका का सुपरिणाम यह रहा कि स्वतंत्रता पश्चात ना सिर्फ सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट को निरंतर रखा गया एवं साथ ही, कंपनी एक्ट के अंतर्गत ट्रस्ट निर्माण द्वारा सामाजिक कार्य को भी प्रोत्साहन(वर्ष के 1956 के कंपनी एक्ट में यह प्रावधान धारा 25 के अंतर्गत एवं 2013 में संशोधित कंपनी एक्ट में धारा 8 के अंतर्गत)दिया गया| 2007 में लघु गैर सरकारी संगठनों को प्रोत्साहित करने हेतु नियमावली को सरलीकृत करते हुए स्वैच्छिक समूह नियमन के अंतर्गत प्रावधान बनाया गया|इन गैर सरकारी संगठनों के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को सरल रखा गया है जिसके अंतर्गत दिए गये प्रारूप में आवश्यक सूचनाओं को संदर्भित अधिकारियों को बताना होता है जिसमें मुख्यतः संगठन के सदस्य, कार्यक्षेत्र, उद्देश्य, आय के संभावित स्रोत एवं नियमावली प्रमुख हैं| भारत जैसे विकासशील देश में, विकास प्रक्रियाओं में सरकार द्वारा अनेक कार्य अधूरे छोड़ दिए जाते हैं जिससे एक गैप का निर्माण होता है| इस गैप को भरने में एनजीओ द्वारा अहम् भूमिका निभाई जाती है- ऐसे कार्य करना जिसे करने हेतु राज्य की अनिच्छा जैसे- सामाजिक विकास हेतु जाति व्यवस्था के खिलाफ सोच का निर्माण; ऐसे कार्य जिन्हें पूरा करने के लिए राज्य के संसाधन अपर्याप्त हों जिसे- शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल आदि क्षेत्रक; सामाजिक बुराईयों के प्रति जागरूकता फैलाना तथा इनसे संघर्ष को प्रोत्साहन जैसे- लिंग परिक्षण का विरोध आदि; बेघरों हेतु आवास सुविधा एवं मूलभूत बुनियादी सुविधाएँ प्रदान करने हेतु कार्य करना; सूचना के अधिकार को वास्तविकता प्रदान करने में अहम् भूमिका; जनजातियों, आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा हेतु संघर्ष बहुराष्ट्रीय कंपनियों के द्वारा भेदभाव तथा संसाधनों के अतिदोहन के खिलाफ इनकी आवाज को समर्थन; वन अधिकार अधिनियम, CAMPA(क्षतिपूरक वनरोपण निधि प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण) आदि अधिनियमों के उचित क्रियान्वयन के लिए ग्राम पंचायतों के साथ भागीदारी; सामुदायिक विकास गतिविधियों में प्रमुख कर्ता एवं भागीदार के रूप में स्थानीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर आवाज उठाना; आपदा राहत कार्यों में सरकार की सहायता; सामान्य जनता से निकटता के कारण सरकार तथा अंतिम उपयोगकर्ताओं के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य करना; सरकार को कल्याणकारी योजनाओं के कार्यान्वयन में कार्यान्वयक; उत्प्रेरक तथा भागीदार के रूप में समर्थन देकर विकास को सुनिश्चित करना;
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##Question:विकास उद्योग से आप क्या समझते हैं? भारतीय परिप्रेक्ष्य में, गैर सरकारी संगठनों की विकास उद्योग में भूमिका स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by the Development Industry? In the Indian perspective, Explain the role of NGOs in the Development Industry. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच- पहले भाग में, विकास, विकास प्रक्रियाएं तथा विकास उद्योग को समझाईये| अगले भाग में,गैर सरकारी संगठनों को समझाते हुए,भारतीय परिप्रेक्ष्य में, उनकी विकास उद्योग में भूमिका स्पष्ट कीजिये| उत्तर- विकास को व्यापक संदर्भों में आर्थिक संवृद्धि के साथ-साथ सामाजिक विकास, संधारणीय विकास और मानव विकास जैसे आयामों से जोड़कर देखा जाता है| दूसरे शब्दों में कहा जाए तो, विकास का तात्पर्य एक ऐसा सामाजिक परिवर्तन लाना है जो लोगों को उनकी मानवीय क्षमता प्राप्त करने में सहायक हो| विकास को सैद्धांतिक स्तर पर सतत आर्थिक प्रगति एवं उससे लाभान्वित हो रहे जनसमूह, जो समावेशी क्रम में प्रगतिशील हों, से समझा जा सकता है| विकास प्रक्रियाएं तथा विकास उद्योग किसी भी समाज का राजनीतिक दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करता है कि दिए गये समाज में विकासात्मक प्रक्रियाओं जिसके अंतर्गत सामाजिक सुरक्षा के विभिन्न घटकों को प्रोत्साहन सम्मिलित हो, के प्रतिशतता एवं दिशा कैसी हो| भारतीय संदर्भ में, संविधान स्वंय ही सामाजिक न्याय को संकल्पित है तथा नीति-निर्देशक तत्वों में विकासात्मक प्रक्रियाओं के सभी संदर्भों को समेकित किया गया है| विकास प्रक्रिया को हम एक राजनीतिक प्रक्रिया के साथ-साथ मानव विकास(अमर्त्य सेन); संधारणीय विकास(ब्रटलैंड आयोग); आर्थिक विकास तथा सामाजिक विकास की प्रक्रिया के रूप में समझ सकते हैं| विकास उद्योग से तात्पर्य को मात्रात्मक एवं गुणात्मक संदर्भों में देखा जा सकता है| गुणात्मक संदर्भ में विकास उद्योग से तात्पर्य राजनीतिक व्यवस्था के उस उपखंड से है जो शासन प्रणाली में विकास लक्ष्यों को प्राथमिकता देता है| मात्रात्मक संदर्भों में, विकास उद्योग से तात्पर्य विकास एवं समावेश को एक प्रोफेशनल दृष्टिकोण के साथ लागू करने से है| ऐतिहासिक संदर्भों में इसका प्रारंभ अमेरिकी प्रशासनिक सुधारों में माना जाता है| भारतीय परिप्रेक्ष्य में 2005 से परिवर्तित हुए दृष्टिकोण जिसमें गवर्नमेंट से गवर्नेंस की सोच के अंतर्गत विकास उद्योग प्रोत्साहित किये गये जिसमें निम्न 3 बिन्दुओं को रेखांकित किया गया- सामाजिक विकास एवं सुरक्षा के घटकों के प्रति प्रोफेशनल दृष्टिकोण के साथ कौशल प्रशिक्षण आदि माध्यमों से उचित मानव संसाधन सृजित किये जाएँ; जिसमें गैर सरकारी संगठनों एवं सिविल सोसाइटी की भूमिका बढ़ी है| सामाजिक समावेश के संदर्भों में माइक्रोफाइनेंस को विस्तारित करते हुए आय के स्रोतों को सृजित किया जाए; इस संदर्भ में स्वंय सहायता समूहों ने अतिमहत्वपूर्ण भूमिका निभाई है;लोगों के पास सूक्ष्म वित्तीय संस्थानों तक पहुँच हो सके; नवाचार एवं नियामकों के माध्यम से विकासात्मक प्रक्रियायों को त्वरित एवं दक्षता संवर्धन किया जाए; गैर सरकारी संगठनों की विकास उद्योग में भूमिका गैर सरकारी संगठनों से तात्पर्य उन सभी संगठनों से है जो शासन व्यवस्था एवं आम नागरिक के मध्य एक सेतु का कार्य करते हैं| गैर सरकारी संगठन भी एक प्रकार के सिविल सोसाइटी ही होते हैं| भारतीय परिप्रेक्ष्य में सिविल सोसाइटी से तात्पर्य उन सभी संस्थानों से है जो शासन व्यवस्था एवं आम नागरिक के मध्य एक कड़ी की तरह दोनों घटकों को जोड़ रहे होते हैं| ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में इन गैर सरकारी संगठनों का इतिहास 1860 के दशक से है जब ब्रिटिश शासन व्यवस्था ने सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के अंतर्गत ऐसे समूहों को प्रोत्साहित किया जो सामाजिक कार्यों में शासन व्यवस्था का सहयोग करना चाहते हों| स्वतंत्रता संघर्ष के समय सामाजिक कार्यों में गैर सरकारी संगठनों की सक्रीय भूमिका का सुपरिणाम यह रहा कि स्वतंत्रता पश्चात ना सिर्फ सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट को निरंतर रखा गया एवं साथ ही, कंपनी एक्ट के अंतर्गत ट्रस्ट निर्माण द्वारा सामाजिक कार्य को भी प्रोत्साहन(वर्ष के 1956 के कंपनी एक्ट में यह प्रावधान धारा 25 के अंतर्गत एवं 2013 में संशोधित कंपनी एक्ट में धारा 8 के अंतर्गत)दिया गया| 2007 में लघु गैर सरकारी संगठनों को प्रोत्साहित करने हेतु नियमावली को सरलीकृत करते हुए स्वैच्छिक समूह नियमन के अंतर्गत प्रावधान बनाया गया|इन गैर सरकारी संगठनों के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को सरल रखा गया है जिसके अंतर्गत दिए गये प्रारूप में आवश्यक सूचनाओं को संदर्भित अधिकारियों को बताना होता है जिसमें मुख्यतः संगठन के सदस्य, कार्यक्षेत्र, उद्देश्य, आय के संभावित स्रोत एवं नियमावली प्रमुख हैं| भारत जैसे विकासशील देश में, विकास प्रक्रियाओं में सरकार द्वारा अनेक कार्य अधूरे छोड़ दिए जाते हैं जिससे एक गैप का निर्माण होता है| इस गैप को भरने में एनजीओ द्वारा अहम् भूमिका निभाई जाती है- ऐसे कार्य करना जिसे करने हेतु राज्य की अनिच्छा जैसे- सामाजिक विकास हेतु जाति व्यवस्था के खिलाफ सोच का निर्माण; ऐसे कार्य जिन्हें पूरा करने के लिए राज्य के संसाधन अपर्याप्त हों जिसे- शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल आदि क्षेत्रक; सामाजिक बुराईयों के प्रति जागरूकता फैलाना तथा इनसे संघर्ष को प्रोत्साहन जैसे- लिंग परिक्षण का विरोध आदि; बेघरों हेतु आवास सुविधा एवं मूलभूत बुनियादी सुविधाएँ प्रदान करने हेतु कार्य करना; सूचना के अधिकार को वास्तविकता प्रदान करने में अहम् भूमिका; जनजातियों, आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा हेतु संघर्ष बहुराष्ट्रीय कंपनियों के द्वारा भेदभाव तथा संसाधनों के अतिदोहन के खिलाफ इनकी आवाज को समर्थन; वन अधिकार अधिनियम, CAMPA(क्षतिपूरक वनरोपण निधि प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण) आदि अधिनियमों के उचित क्रियान्वयन के लिए ग्राम पंचायतों के साथ भागीदारी; सामुदायिक विकास गतिविधियों में प्रमुख कर्ता एवं भागीदार के रूप में स्थानीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर आवाज उठाना; आपदा राहत कार्यों में सरकार की सहायता; सामान्य जनता से निकटता के कारण सरकार तथा अंतिम उपयोगकर्ताओं के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य करना; सरकार को कल्याणकारी योजनाओं के कार्यान्वयन में कार्यान्वयक; उत्प्रेरक तथा भागीदार के रूप में समर्थन देकर विकास को सुनिश्चित करना;
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उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारकों की उदाहरण सहित चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Discuss the factors affecting the location of industries with examples. (150-200 words)
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Approach: भूमिका में उद्योगों के महत्व की चर्चा कर सकते हैं। उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारकों को स्पष्ट कीजिये। उचित उदाहरणों को शामिल कर सकते हैं। निष्कर्ष में बदलते परिदृश्य के संदर्भ में अवस्थिति की संक्षिप्त चर्चा कर सकते हैं। उत्तर- औद्योगिक विकास कोआधुनिक आर्थिक विकास की पूर्वापेक्षा के तौर पर माना जाता है। आधुनिक औद्योगिक विकास से पहले भारत विश्व भर में अपने कुटीर तथा घरेलू उद्योगों के लिए प्रसिद्ध था। भारत में औद्योगिक विकास 1854 के बाद प्रारम्भ हुआ जब अंग्रेजों द्वारा मुंबई में कपास तथा कोलकाता में जुट की मिलें स्थापित की गयी। उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारक- उद्योगों की अवस्थिति कई कारकों जैसे कच्चे माल की उपलबद्धता, ऊर्जा बाज़ार, पूंजी, यातायात और श्रम आदि द्वारा प्रभावित होती है। इन कारकों के सापेक्षित महत्व समय और स्थान के साथ बदल जाता है। औद्योगिक अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारकों को दो व्यापक श्रेणियों में बांटा जा सकता है। भौगोलिक कारक एवं गैर भौगोलिक कारक भौगोलिक कारक- कच्चा माल- कच्चा माल जो निर्माण की प्रक्रिया में भार ह्वास वाला होता है या जिनकी परिवहन लागत अधिक होती है या जल्द खराब होने की प्रकृति होने के कारण जिनका लंबी दूरी तक परिवहन नहीं किया जा सकता ऐसे उद्योग अधिकांशत: कच्चे माल की आपूर्ति के पास स्थापित किए जाते हैं। इस तरह के उद्योगों का उदाहरण चीनी उद्योग, लुगदी उद्योग, तांबा प्रगलन उद्योग आदि हैं। ऊर्जा के स्रोत- ऊर्जा की नियमित आपूर्ति एक पूर्व आवश्यकता है। ऊर्जा के तीन महत्वपूर्ण स्रोत कोयला, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस और जल विद्युत है । अधिकांश उद्योगों को ऊर्जा स्रोतों के निकट ही स्थापित किया जाता है। जैसे, जमशेदपुर लौह इस्पात केंद्र झरिया तथा रानीगंज की कोयला खानों के निकट स्थित है। श्रम- सस्ता व कुशल श्रम की उपलब्धता कई उद्योगों के लिए पूर्व निर्धारित शर्त है। श्रम की आपूर्ति बड़ी संख्या में उपलब्ध होनी चाहिए और इन्हे आवश्यकतानुसार कौशल और तकनीकी विशेषज्ञता प्राप्त होनी चाहिए। हल्की उपभोक्ता सामग्री और कृषि आधारित उद्योगों को श्रम की आपूर्ति की बहुत अधिक आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए लुधियाना का हौजरी उद्योग, स्विट्ज़रलैंड का घड़ी उद्योग आदि वहाँ के सस्ते व विशिष्ट श्रम के कारण ही संभव हो सके हैं। परिवहन तथा संचार साधन- कच्चे माल को उद्योग केंद्र तक लाने और निर्मित माल को खपत क्षेत्रों तक ले जाने लिए सस्ते तथा कुशल परिवहन की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि सड़क, रेल्वे जंक्शन, बन्दरगाह के निकट औद्योगिक केंद्र विकसित होते हैं। बाज़ार- विनिर्मित वस्तुओं के त्वरित निष्पादन के लिए बाज़ार का आसपास होना अनिवार्य है। यह परिवहन लागत को कम करने में मदद करता है और उपभोक्ताओं को उचित दर पर उत्पादों को प्राप्त करने में सक्षम बनाता है। उदाहरण के लिए सूती वस्त्र उद्योगों में शुद्ध कच्चे माल का उपयोग होता है ये प्राय: बड़े नगरीय केन्द्रों में स्थापित किए जाते हैं। जैसे मुंबई, अहमदाबाद, सूरत आदि। स्थान- आमतौर पर स्थान को पर्याप्त परिवहन सुविधाओं से युक्त समतल भूमि होना चाहिए। कारखानों के निर्माण के लिए बड़े क्षेत्रों की आवश्यकता होती है। जलवायु- कुछ उद्योगों के लिए उचित जलवायु का होना भी आवश्यक है स्थान विशेष की जलवायु औद्योगिक कच्चे माल, इसके प्रसंस्करण या तैयार माल के साथ साथ श्रमिकों के स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है। उदाहरण के लिए अधिकतर सूती वस्त्र उद्योग आर्द्र जलवायु (तटीय) वाले क्षेत्रों में स्थापित होते हैं। गैर-भौगोलिक कारक- पूंजी- आधुनिक उद्योग पूंजी गहन होते हैं, इनमें अत्यधिक निवेश की आवश्यकता होती है जो आमतौर पर शहरी केन्द्रों में उपलब्ध होते हैं। इसलिए कई शहर देश के प्रमुख उद्योगों के लिए केंद्र बन गए हैं। सरकारी नीतियाँ एवं राजनैतिक स्थिरता- ऐसे क्षेत्र में उद्योग स्थापित करने की प्रवृति बढ़ती जा रही है जहां सरकार की नीतियाँ उद्योग अनुकूल परिवेश को बढ़ावा देती है। वर्तमान के युग में राजनैतिक उथल पुथल की कम संभावनाओं के साथ स्थिर राजनैतिक भविष्य वाले देश में उद्योगों की संभावना अधिक होती है। बैंकिंग एवं बीमा की सुविधाएं- बेहतर बैंकिंग सुविधा वाले क्षेत्र अच्छे उद्योगों की स्थापना के लिए अनुकूल होते हैं। इसके साथ ही बड़े बड़े उद्योगों में भारी मशीनों में होने वाली क्षति व अन्य औद्योगिक दुर्घटनाएँ बीमे के महत्व को बढ़ा देती है। यद्यपि मुख्य रूप से उद्योगों की अवस्थिति के लिए ये कारक जिम्मेदार हैं किन्तु बदले वैश्विक परिदृश्य में सामाजिक कारकों का भी महत्व बढ़ा है जैसे महिलाओं की भागीदारी, शिक्षा व कौशल का स्तर आदि।
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##Question:उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारकों की उदाहरण सहित चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Discuss the factors affecting the location of industries with examples. (150-200 words)##Answer:Approach: भूमिका में उद्योगों के महत्व की चर्चा कर सकते हैं। उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारकों को स्पष्ट कीजिये। उचित उदाहरणों को शामिल कर सकते हैं। निष्कर्ष में बदलते परिदृश्य के संदर्भ में अवस्थिति की संक्षिप्त चर्चा कर सकते हैं। उत्तर- औद्योगिक विकास कोआधुनिक आर्थिक विकास की पूर्वापेक्षा के तौर पर माना जाता है। आधुनिक औद्योगिक विकास से पहले भारत विश्व भर में अपने कुटीर तथा घरेलू उद्योगों के लिए प्रसिद्ध था। भारत में औद्योगिक विकास 1854 के बाद प्रारम्भ हुआ जब अंग्रेजों द्वारा मुंबई में कपास तथा कोलकाता में जुट की मिलें स्थापित की गयी। उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारक- उद्योगों की अवस्थिति कई कारकों जैसे कच्चे माल की उपलबद्धता, ऊर्जा बाज़ार, पूंजी, यातायात और श्रम आदि द्वारा प्रभावित होती है। इन कारकों के सापेक्षित महत्व समय और स्थान के साथ बदल जाता है। औद्योगिक अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारकों को दो व्यापक श्रेणियों में बांटा जा सकता है। भौगोलिक कारक एवं गैर भौगोलिक कारक भौगोलिक कारक- कच्चा माल- कच्चा माल जो निर्माण की प्रक्रिया में भार ह्वास वाला होता है या जिनकी परिवहन लागत अधिक होती है या जल्द खराब होने की प्रकृति होने के कारण जिनका लंबी दूरी तक परिवहन नहीं किया जा सकता ऐसे उद्योग अधिकांशत: कच्चे माल की आपूर्ति के पास स्थापित किए जाते हैं। इस तरह के उद्योगों का उदाहरण चीनी उद्योग, लुगदी उद्योग, तांबा प्रगलन उद्योग आदि हैं। ऊर्जा के स्रोत- ऊर्जा की नियमित आपूर्ति एक पूर्व आवश्यकता है। ऊर्जा के तीन महत्वपूर्ण स्रोत कोयला, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस और जल विद्युत है । अधिकांश उद्योगों को ऊर्जा स्रोतों के निकट ही स्थापित किया जाता है। जैसे, जमशेदपुर लौह इस्पात केंद्र झरिया तथा रानीगंज की कोयला खानों के निकट स्थित है। श्रम- सस्ता व कुशल श्रम की उपलब्धता कई उद्योगों के लिए पूर्व निर्धारित शर्त है। श्रम की आपूर्ति बड़ी संख्या में उपलब्ध होनी चाहिए और इन्हे आवश्यकतानुसार कौशल और तकनीकी विशेषज्ञता प्राप्त होनी चाहिए। हल्की उपभोक्ता सामग्री और कृषि आधारित उद्योगों को श्रम की आपूर्ति की बहुत अधिक आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए लुधियाना का हौजरी उद्योग, स्विट्ज़रलैंड का घड़ी उद्योग आदि वहाँ के सस्ते व विशिष्ट श्रम के कारण ही संभव हो सके हैं। परिवहन तथा संचार साधन- कच्चे माल को उद्योग केंद्र तक लाने और निर्मित माल को खपत क्षेत्रों तक ले जाने लिए सस्ते तथा कुशल परिवहन की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि सड़क, रेल्वे जंक्शन, बन्दरगाह के निकट औद्योगिक केंद्र विकसित होते हैं। बाज़ार- विनिर्मित वस्तुओं के त्वरित निष्पादन के लिए बाज़ार का आसपास होना अनिवार्य है। यह परिवहन लागत को कम करने में मदद करता है और उपभोक्ताओं को उचित दर पर उत्पादों को प्राप्त करने में सक्षम बनाता है। उदाहरण के लिए सूती वस्त्र उद्योगों में शुद्ध कच्चे माल का उपयोग होता है ये प्राय: बड़े नगरीय केन्द्रों में स्थापित किए जाते हैं। जैसे मुंबई, अहमदाबाद, सूरत आदि। स्थान- आमतौर पर स्थान को पर्याप्त परिवहन सुविधाओं से युक्त समतल भूमि होना चाहिए। कारखानों के निर्माण के लिए बड़े क्षेत्रों की आवश्यकता होती है। जलवायु- कुछ उद्योगों के लिए उचित जलवायु का होना भी आवश्यक है स्थान विशेष की जलवायु औद्योगिक कच्चे माल, इसके प्रसंस्करण या तैयार माल के साथ साथ श्रमिकों के स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है। उदाहरण के लिए अधिकतर सूती वस्त्र उद्योग आर्द्र जलवायु (तटीय) वाले क्षेत्रों में स्थापित होते हैं। गैर-भौगोलिक कारक- पूंजी- आधुनिक उद्योग पूंजी गहन होते हैं, इनमें अत्यधिक निवेश की आवश्यकता होती है जो आमतौर पर शहरी केन्द्रों में उपलब्ध होते हैं। इसलिए कई शहर देश के प्रमुख उद्योगों के लिए केंद्र बन गए हैं। सरकारी नीतियाँ एवं राजनैतिक स्थिरता- ऐसे क्षेत्र में उद्योग स्थापित करने की प्रवृति बढ़ती जा रही है जहां सरकार की नीतियाँ उद्योग अनुकूल परिवेश को बढ़ावा देती है। वर्तमान के युग में राजनैतिक उथल पुथल की कम संभावनाओं के साथ स्थिर राजनैतिक भविष्य वाले देश में उद्योगों की संभावना अधिक होती है। बैंकिंग एवं बीमा की सुविधाएं- बेहतर बैंकिंग सुविधा वाले क्षेत्र अच्छे उद्योगों की स्थापना के लिए अनुकूल होते हैं। इसके साथ ही बड़े बड़े उद्योगों में भारी मशीनों में होने वाली क्षति व अन्य औद्योगिक दुर्घटनाएँ बीमे के महत्व को बढ़ा देती है। यद्यपि मुख्य रूप से उद्योगों की अवस्थिति के लिए ये कारक जिम्मेदार हैं किन्तु बदले वैश्विक परिदृश्य में सामाजिक कारकों का भी महत्व बढ़ा है जैसे महिलाओं की भागीदारी, शिक्षा व कौशल का स्तर आदि।
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मेईजी पुनर्स्थापना से आप क्या समझते हैं ? किस तरह से इसने जापान के औद्योगीकरण का मार्ग प्रशस्त किया ? चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) What do you understand by Meiji restoration ? How did it pave way for Japan"s industrialization? Discuss. (150-200 words)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत मेईजी पुनर्स्थापना का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात जापान के औद्योगीकरण के किये उपजी परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में जापान का औद्योगीकरण बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - मेईजी पुनर्स्थापना इसका अभिप्राय जापान के शासक (मेईजी) की शक्तियों की पुनर्स्थापना से है | मेईजी पुनर्स्थापना को 19वीं शताब्दी के मध्य से अमेरिका के नेतृत्व में प्रारंभ होने वाले पश्चिमी औपनिवेशिक हस्तक्षेप के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाता है | 17 वीं तथा 18 वीं शताब्दी में होने वाले पश्चिमी हस्तक्षेपों के प्रति जापान ने चीन की तरह ही सुरक्षात्मक दृष्टिकोण का पालन करते हुए स्वयं को अलग-थलग कर लिया था तथा अपने बंदरगाहों को विदेशी व्यापार के लिए बैंड कर लिया था | परिस्थितियाँ 19 वीं शताब्दी में जापान ने अपने दृष्टिकोण को बदला जोकि निम्नलिखित था - जापान एक राजतंत्रात्मक देश रहा था, जहाँ का शासक देवता तुल्य माना जाता था | राजनीतिक तथा सामाजिक व्यवस्था सामंतवादी थी जिसमें विभिन्न सामन्ती परिवारों का भिन्न-भिन्न क्षेत्रों पर नियंत्रण था | सैनिक प्रवृत्ति प्रबल थी -जिसका आधार समुराई व्यवस्था थी, जिसमें स्वामी भक्ति तथा समर्पण की भावनाओं की प्रधानता थी | समुराई, सैनिक थे जोकि विविध सामन्ती परिवारों से सम्बंधित थे तथा उनकी तुलना यूरोप के नाईटों के साथ की जा सकती है | युद्ध में हारने के पश्चात आत्म-हत्या करने की प्रवृत्ति "हराकीरी" का प्रचलन था | परन्तु 19 वीं शताब्दी के मध्य तक आते-आते वास्तविक सत्ता सामंती सरदारों में से एक जिसे शोगून कहा जाता था, के हाथों में केन्द्रित हो चुकी थी तथा जापान का शासक एकांगी एवं पवित्र जीवन जीने को बाध्य हो चुका था | अन्य सामन्ती सरदार जैसे- चोउसू , शा-जुमा आदि शोगून के प्रतिद्वंदी थे तथा सामन्ती परिवारों में टकराव सामान्य बात हो चुकी थी | इन्ही परिस्थितियों में 19 वीं शताब्दी के मध्य में पश्चिमी हसक्षेप हुआ जिसका नेतृत्व अमेरिका ने किया | यह हस्तक्षेप तथाकथित नव-साम्राज्यवाद का हिस्सा माना जाता है | पश्चिमी औपनिवेशिक शक्तियों ने बलपूर्वक न सिर्फ जापान को अपने बंदरगाह खोलने पर बाध्य किया बल्कि बलपूर्वक ही गैर-आर्थिक व्यापारिक सुविधाएं भी प्राप्त की | पश्चिमी लोगों को जापान में बसने तथा व्यापर करने की छोट भी मिली जिससे कि उनका तथा जापान के सैनिकों से दैनिक टकराव बढ़ने लगा | यहाँ तक कि पश्चिमी शक्तियों ने जापान में गैर-क्षेत्रीय अधिकार भी प्राप्त किये | इन सब के प्रति जापान में काफी असंतोष फैला तथा राष्ट्रवादी भावनाएं प्रबल हो उठी | जापान के राष्ट्रवादियों ने जिनका नेतृत्व सामन्ती वर्ग ने ही किया , जापान की दुर्दशा के लिए न सिर्फ पश्चिमी देशों को बल्कि शोगून को भी ठहराया | सामंती सरदारों ने मिलकर शोगून को विस्थापित किया तथा राजा को पुनः स्थापित किया , यह घटना मेईजी पुनर्स्थापना के नाम से जानी जाती है | मेईजी पुनर्स्थापना के जापान में राजनीतिक एकता की स्थापना की गयी | एक केंद्रीकृत शासन व्यवस्था की स्थापना की गयी, जिसका आधार नयी नौकरशाही थी, जिसमे राष्ट्रवादी तत्वों का बोल-बाला था | इससे राष्ट्रीय स्तर पर नीति निर्धारण तथा क्रियान्वयन संभव हो सका | जापान के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती स्वयं को उपनिवेशवाद के चंगुल से बचाना था तथा जापान के राष्ट्रवादी इस बात पे सहमत थे कि ऐसा सिर्फ सैनिक शक्ति के माध्यम से ही किया जा सकता है | जापान का औद्योगीकरण एशियाई देशों में जापान का औद्योगीकरण सबसे पहले हुआ | जापान का औद्योगीकरण, जापान के आधुनिकीकरण का वृहत्तम हिस्सा था | जापान का आधुनिकीकरण 1860 के दशक में होने वाले मेईजी पुनर्स्थापना के बाद प्रारंभ हुआ | जापान के आधुनिक रूपांतरण का सबसे आकर्षक एवं आधुनिक पक्ष उसकी तीव्र गति थी , जिसके कारण शदी के आते-आते पश्चिमी औपनिवेशिक देशों का सामना करने और यहाँ तक कि उन्हें पराजित करने में भी सक्षम हो चुका था | शीघ्र ही जापान ने अपनी साम्राज्यवादी यात्रा प्रारंभ की तथा चीन को अपना मुख्य निशाना बनाया | जापान के साम्राज्यवाद और सैन्यवाद को प्रथम विश्व युद्ध के कारणों में भी शामिल किया जाता है |
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##Question:मेईजी पुनर्स्थापना से आप क्या समझते हैं ? किस तरह से इसने जापान के औद्योगीकरण का मार्ग प्रशस्त किया ? चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) What do you understand by Meiji restoration ? How did it pave way for Japan"s industrialization? Discuss. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत मेईजी पुनर्स्थापना का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात जापान के औद्योगीकरण के किये उपजी परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में जापान का औद्योगीकरण बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - मेईजी पुनर्स्थापना इसका अभिप्राय जापान के शासक (मेईजी) की शक्तियों की पुनर्स्थापना से है | मेईजी पुनर्स्थापना को 19वीं शताब्दी के मध्य से अमेरिका के नेतृत्व में प्रारंभ होने वाले पश्चिमी औपनिवेशिक हस्तक्षेप के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाता है | 17 वीं तथा 18 वीं शताब्दी में होने वाले पश्चिमी हस्तक्षेपों के प्रति जापान ने चीन की तरह ही सुरक्षात्मक दृष्टिकोण का पालन करते हुए स्वयं को अलग-थलग कर लिया था तथा अपने बंदरगाहों को विदेशी व्यापार के लिए बैंड कर लिया था | परिस्थितियाँ 19 वीं शताब्दी में जापान ने अपने दृष्टिकोण को बदला जोकि निम्नलिखित था - जापान एक राजतंत्रात्मक देश रहा था, जहाँ का शासक देवता तुल्य माना जाता था | राजनीतिक तथा सामाजिक व्यवस्था सामंतवादी थी जिसमें विभिन्न सामन्ती परिवारों का भिन्न-भिन्न क्षेत्रों पर नियंत्रण था | सैनिक प्रवृत्ति प्रबल थी -जिसका आधार समुराई व्यवस्था थी, जिसमें स्वामी भक्ति तथा समर्पण की भावनाओं की प्रधानता थी | समुराई, सैनिक थे जोकि विविध सामन्ती परिवारों से सम्बंधित थे तथा उनकी तुलना यूरोप के नाईटों के साथ की जा सकती है | युद्ध में हारने के पश्चात आत्म-हत्या करने की प्रवृत्ति "हराकीरी" का प्रचलन था | परन्तु 19 वीं शताब्दी के मध्य तक आते-आते वास्तविक सत्ता सामंती सरदारों में से एक जिसे शोगून कहा जाता था, के हाथों में केन्द्रित हो चुकी थी तथा जापान का शासक एकांगी एवं पवित्र जीवन जीने को बाध्य हो चुका था | अन्य सामन्ती सरदार जैसे- चोउसू , शा-जुमा आदि शोगून के प्रतिद्वंदी थे तथा सामन्ती परिवारों में टकराव सामान्य बात हो चुकी थी | इन्ही परिस्थितियों में 19 वीं शताब्दी के मध्य में पश्चिमी हसक्षेप हुआ जिसका नेतृत्व अमेरिका ने किया | यह हस्तक्षेप तथाकथित नव-साम्राज्यवाद का हिस्सा माना जाता है | पश्चिमी औपनिवेशिक शक्तियों ने बलपूर्वक न सिर्फ जापान को अपने बंदरगाह खोलने पर बाध्य किया बल्कि बलपूर्वक ही गैर-आर्थिक व्यापारिक सुविधाएं भी प्राप्त की | पश्चिमी लोगों को जापान में बसने तथा व्यापर करने की छोट भी मिली जिससे कि उनका तथा जापान के सैनिकों से दैनिक टकराव बढ़ने लगा | यहाँ तक कि पश्चिमी शक्तियों ने जापान में गैर-क्षेत्रीय अधिकार भी प्राप्त किये | इन सब के प्रति जापान में काफी असंतोष फैला तथा राष्ट्रवादी भावनाएं प्रबल हो उठी | जापान के राष्ट्रवादियों ने जिनका नेतृत्व सामन्ती वर्ग ने ही किया , जापान की दुर्दशा के लिए न सिर्फ पश्चिमी देशों को बल्कि शोगून को भी ठहराया | सामंती सरदारों ने मिलकर शोगून को विस्थापित किया तथा राजा को पुनः स्थापित किया , यह घटना मेईजी पुनर्स्थापना के नाम से जानी जाती है | मेईजी पुनर्स्थापना के जापान में राजनीतिक एकता की स्थापना की गयी | एक केंद्रीकृत शासन व्यवस्था की स्थापना की गयी, जिसका आधार नयी नौकरशाही थी, जिसमे राष्ट्रवादी तत्वों का बोल-बाला था | इससे राष्ट्रीय स्तर पर नीति निर्धारण तथा क्रियान्वयन संभव हो सका | जापान के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती स्वयं को उपनिवेशवाद के चंगुल से बचाना था तथा जापान के राष्ट्रवादी इस बात पे सहमत थे कि ऐसा सिर्फ सैनिक शक्ति के माध्यम से ही किया जा सकता है | जापान का औद्योगीकरण एशियाई देशों में जापान का औद्योगीकरण सबसे पहले हुआ | जापान का औद्योगीकरण, जापान के आधुनिकीकरण का वृहत्तम हिस्सा था | जापान का आधुनिकीकरण 1860 के दशक में होने वाले मेईजी पुनर्स्थापना के बाद प्रारंभ हुआ | जापान के आधुनिक रूपांतरण का सबसे आकर्षक एवं आधुनिक पक्ष उसकी तीव्र गति थी , जिसके कारण शदी के आते-आते पश्चिमी औपनिवेशिक देशों का सामना करने और यहाँ तक कि उन्हें पराजित करने में भी सक्षम हो चुका था | शीघ्र ही जापान ने अपनी साम्राज्यवादी यात्रा प्रारंभ की तथा चीन को अपना मुख्य निशाना बनाया | जापान के साम्राज्यवाद और सैन्यवाद को प्रथम विश्व युद्ध के कारणों में भी शामिल किया जाता है |
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हाल के वर्षों में यूएई के साथ भारत के जुड़ाव में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इन संबंधों के प्रमुख पहलुओं की पहचान हाल के दिनों में हुई पहलों के परिप्रेक्ष्य में कीजिये|(150-200 शब्द; 10 अंक) India"s engagement with the UAE has increased significantly in recent years. Identify the key aspects of these relationships in the context of the recent initiatives. (150-200 words;10 Marks)
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दृष्टिकोण 1. भूमिका में भारत-UAE संबंधों की पृष्ठभूमि संक्षेप में लिखिए| 2. भारत-UAE संबंधों के विकास हेतु हाल में हुई पहलों की चर्चा कीजिये| 3. निष्कर्ष मेंभारत-UAE संबंधोंसे सम्बंधित आगे की राह की चर्चाकीजिये| उत्तर: भारत ने संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के साथ पारंपरिक रूप से अच्छे संबंधों और मजबूत संबंधों को साझा किया है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान, संबंधों में अच्छी प्रगति हुई है। यूएई वर्ष 1966 में एक आधुनिक राष्ट्र बना। 1971 में, यह एक महासंघ बन गया। 1972 में, भारत ने वहां अपना दूतावास स्थापित किया। 2015 में, दोनों देशों ने पहली बार अपने संबंधों को व्यापक और सामरिक भागीदारी को बढ़ाने के बारे में बात की। उसके बाद, दोनों देशों के राज्य प्रमुखों के बीच कई दौरे हुए। उदाहरण के लिए, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने 2017 और 2018 में यूएई का दौरा किया। भारत-UAE संबंधों के विकास हेतुप्रयास: भारत-UAE संबंध परस्पर सहयोग एवं विश्वास पर आधारित हैं एवं इन दोनों के मध्य बहुक्षेत्रीय विकास सहयोग स्थापित हुआ है| सुरक्षा •दोनों देश नियमित रणनीतिक संवादों में शामिल रहे हैं।सहयोग की व्यापक श्रेणी यथा- काउंटर टेररिज्म, काउंटर रेडिकलाइजेशन, इंटेलिजेंस शेयरिंग, सुरक्षा पहलुओं पर नियमित बातचीत सहयोग के व्यापक क्षेत्र हैं। वे आतंकवाद के प्रति एक आम दृष्टिकोण भी साझा करते हैं। • UAE ने उरी हमले और पुलवामा हमले के मामले में भारत का समर्थन किया है। • ओआईसी के लिए आमंत्रण यूएई ने भारत को ओआईसी (इस्लामिक सहयोग संगठन) के लिए विदेश मंत्रियों की बैठक में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया। ऊर्जा • तेल आपूर्ति- यूएई भारत में तेल का पांचवा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है।भारत यूएई के कच्चे तेल (जापान का पहला) का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार भी है। • तेल भंडारण-अबू धाबी मैंगलोर में हमारे सामरिक रिजर्व सुविधा में अपने तेल का भंडारण करने जा रहा है। • नवीकरणीय ऊर्जा सहयोग -भारत सौर ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में यूएई के साथ सहयोग कर रहा है। व्यापार •वर्तमान में दोनों देशों के मध्य लगभग 52 बिलियन डॉलर (2016-17) का व्यापार होता है। यूएई भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है|(चीन और अमेरिका के बाद)। यह हमारे निर्यात का दूसरा सबसे बड़ा बाजार है| (पहला अमेरिका है) • 2018 में, मुद्रा स्वैप समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे जो भारतीय रुपए में आयात के लिए भुगतान की सुविधा प्रदान करेगा। • व्यापार अधिशेष- भारत का संयुक्त अरब अमीरात के साथ व्यापार अधिशेष है। निवेश • रचनात्मक निवेश- यूएई ने अब तक भारत में $ 8 बिलियन का संचयी निवेश किया है। इसके अलावा, यह मूल्य निरंतर बढ़ रहा है। • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश- यूएई भारत में एफडीआई का 10 वां सबसे बड़ा स्रोत है। •आबू-धाबीनिवेश प्राधिकरण- यह 1 बिलियन डॉलर के निवेश के साथ NIIF के मास्टर फंड में पहला संस्थागत निवेशक है। पीपुल टू पीपुल सम्बन्ध: • यूएई में लगभग 30 लाख भारतीय रहते हैं। •विप्रेषण- इस देश से विप्रेषण के रूप में लगभग 13 बिलियन डॉलर कीधनराशि प्राप्त होती है। •आबू-धाबी मेंमंदिर- 2018 में, प्रधान मंत्री, श्री नरेंद्र मोदी ने, अबू धाबी में एक मंदिर के निर्माण के लिए नीवं रखी। यह वहां का पहला मंदिर होगा। • उड़ानें- वर्तमान में भारत और यूएई के बीच 1,000 से अधिक उड़ानें हैं। यूएई एक ट्रांजिट हब है। यूएई ने भारत में $ 75 बिलियन का निवेश करने की प्रतिबद्धता जताई है। मुख्य रूप से लालफीताशाही के कारण इस पहलू पर धीमी प्रगति हुई है। इसलिए, इस क्षेत्र में संबंधों को और प्रस्फुटित करने के लिए विस्तार की गुंजाइश है। जम्मू और कश्मीर में उपस्कर यूएई एकमात्र ऐसा विदेशी निवेशक है जिसे जम्मू-कश्मीर में लॉजिस्टिक हब में निवेश करने की अनुमति दी गई है। इससे पता चलता है कि हम अपने रिश्ते में कितना भरोसा करते हैं| उपर्युक्त बहु-आयामी संबंधों के आधार पर एवंसामरिक और सुरक्षादृष्टिकोणप्रमुखता प्राप्त करने के साथ, यह अधिक मुखर रूप से कहा जा सकता है कि भारत-यूएई संबंध रणनीतिक आयाम ले रहा है।
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##Question:हाल के वर्षों में यूएई के साथ भारत के जुड़ाव में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इन संबंधों के प्रमुख पहलुओं की पहचान हाल के दिनों में हुई पहलों के परिप्रेक्ष्य में कीजिये|(150-200 शब्द; 10 अंक) India"s engagement with the UAE has increased significantly in recent years. Identify the key aspects of these relationships in the context of the recent initiatives. (150-200 words;10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1. भूमिका में भारत-UAE संबंधों की पृष्ठभूमि संक्षेप में लिखिए| 2. भारत-UAE संबंधों के विकास हेतु हाल में हुई पहलों की चर्चा कीजिये| 3. निष्कर्ष मेंभारत-UAE संबंधोंसे सम्बंधित आगे की राह की चर्चाकीजिये| उत्तर: भारत ने संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के साथ पारंपरिक रूप से अच्छे संबंधों और मजबूत संबंधों को साझा किया है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान, संबंधों में अच्छी प्रगति हुई है। यूएई वर्ष 1966 में एक आधुनिक राष्ट्र बना। 1971 में, यह एक महासंघ बन गया। 1972 में, भारत ने वहां अपना दूतावास स्थापित किया। 2015 में, दोनों देशों ने पहली बार अपने संबंधों को व्यापक और सामरिक भागीदारी को बढ़ाने के बारे में बात की। उसके बाद, दोनों देशों के राज्य प्रमुखों के बीच कई दौरे हुए। उदाहरण के लिए, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने 2017 और 2018 में यूएई का दौरा किया। भारत-UAE संबंधों के विकास हेतुप्रयास: भारत-UAE संबंध परस्पर सहयोग एवं विश्वास पर आधारित हैं एवं इन दोनों के मध्य बहुक्षेत्रीय विकास सहयोग स्थापित हुआ है| सुरक्षा •दोनों देश नियमित रणनीतिक संवादों में शामिल रहे हैं।सहयोग की व्यापक श्रेणी यथा- काउंटर टेररिज्म, काउंटर रेडिकलाइजेशन, इंटेलिजेंस शेयरिंग, सुरक्षा पहलुओं पर नियमित बातचीत सहयोग के व्यापक क्षेत्र हैं। वे आतंकवाद के प्रति एक आम दृष्टिकोण भी साझा करते हैं। • UAE ने उरी हमले और पुलवामा हमले के मामले में भारत का समर्थन किया है। • ओआईसी के लिए आमंत्रण यूएई ने भारत को ओआईसी (इस्लामिक सहयोग संगठन) के लिए विदेश मंत्रियों की बैठक में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया। ऊर्जा • तेल आपूर्ति- यूएई भारत में तेल का पांचवा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है।भारत यूएई के कच्चे तेल (जापान का पहला) का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार भी है। • तेल भंडारण-अबू धाबी मैंगलोर में हमारे सामरिक रिजर्व सुविधा में अपने तेल का भंडारण करने जा रहा है। • नवीकरणीय ऊर्जा सहयोग -भारत सौर ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में यूएई के साथ सहयोग कर रहा है। व्यापार •वर्तमान में दोनों देशों के मध्य लगभग 52 बिलियन डॉलर (2016-17) का व्यापार होता है। यूएई भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है|(चीन और अमेरिका के बाद)। यह हमारे निर्यात का दूसरा सबसे बड़ा बाजार है| (पहला अमेरिका है) • 2018 में, मुद्रा स्वैप समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे जो भारतीय रुपए में आयात के लिए भुगतान की सुविधा प्रदान करेगा। • व्यापार अधिशेष- भारत का संयुक्त अरब अमीरात के साथ व्यापार अधिशेष है। निवेश • रचनात्मक निवेश- यूएई ने अब तक भारत में $ 8 बिलियन का संचयी निवेश किया है। इसके अलावा, यह मूल्य निरंतर बढ़ रहा है। • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश- यूएई भारत में एफडीआई का 10 वां सबसे बड़ा स्रोत है। •आबू-धाबीनिवेश प्राधिकरण- यह 1 बिलियन डॉलर के निवेश के साथ NIIF के मास्टर फंड में पहला संस्थागत निवेशक है। पीपुल टू पीपुल सम्बन्ध: • यूएई में लगभग 30 लाख भारतीय रहते हैं। •विप्रेषण- इस देश से विप्रेषण के रूप में लगभग 13 बिलियन डॉलर कीधनराशि प्राप्त होती है। •आबू-धाबी मेंमंदिर- 2018 में, प्रधान मंत्री, श्री नरेंद्र मोदी ने, अबू धाबी में एक मंदिर के निर्माण के लिए नीवं रखी। यह वहां का पहला मंदिर होगा। • उड़ानें- वर्तमान में भारत और यूएई के बीच 1,000 से अधिक उड़ानें हैं। यूएई एक ट्रांजिट हब है। यूएई ने भारत में $ 75 बिलियन का निवेश करने की प्रतिबद्धता जताई है। मुख्य रूप से लालफीताशाही के कारण इस पहलू पर धीमी प्रगति हुई है। इसलिए, इस क्षेत्र में संबंधों को और प्रस्फुटित करने के लिए विस्तार की गुंजाइश है। जम्मू और कश्मीर में उपस्कर यूएई एकमात्र ऐसा विदेशी निवेशक है जिसे जम्मू-कश्मीर में लॉजिस्टिक हब में निवेश करने की अनुमति दी गई है। इससे पता चलता है कि हम अपने रिश्ते में कितना भरोसा करते हैं| उपर्युक्त बहु-आयामी संबंधों के आधार पर एवंसामरिक और सुरक्षादृष्टिकोणप्रमुखता प्राप्त करने के साथ, यह अधिक मुखर रूप से कहा जा सकता है कि भारत-यूएई संबंध रणनीतिक आयाम ले रहा है।
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मेईजी पुनर्स्थापना से आप क्या समझते हैं ? किस तरह से इसने जापान के औद्योगीकरण का मार्ग प्रशस्त किया ? चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) What do you understand by Meiji restoration ? How did it pave way for Japan"s industrialization? Discuss. (150-200 words)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत मेईजी पुनर्स्थापना का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात जापान के औद्योगीकरण के किये उपजी परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में जापान का औद्योगीकरण बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - मेईजी पुनर्स्थापना इसका अभिप्राय जापान के शासक (मेईजी) की शक्तियों की पुनर्स्थापना से है | मेईजी पुनर्स्थापना को 19वीं शताब्दी के मध्य से अमेरिका के नेतृत्व में प्रारंभ होने वाले पश्चिमी औपनिवेशिक हस्तक्षेप के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाता है | 17 वीं तथा 18 वीं शताब्दी में होने वाले पश्चिमी हस्तक्षेपों के प्रति जापान ने चीन की तरह ही सुरक्षात्मक दृष्टिकोण का पालन करते हुए स्वयं को अलग-थलग कर लिया था तथा अपने बंदरगाहों को विदेशी व्यापार के लिए बैंड कर लिया था | परिस्थितियाँ 19 वीं शताब्दी में जापान ने अपने दृष्टिकोण को बदला जोकि निम्नलिखित था - जापान एक राजतंत्रात्मक देश रहा था, जहाँ का शासक देवता तुल्य माना जाता था | राजनीतिक तथा सामाजिक व्यवस्था सामंतवादी थी जिसमें विभिन्न सामन्ती परिवारों का भिन्न-भिन्न क्षेत्रों पर नियंत्रण था | सैनिक प्रवृत्ति प्रबल थी -जिसका आधार समुराई व्यवस्था थी, जिसमें स्वामी भक्ति तथा समर्पण की भावनाओं की प्रधानता थी | समुराई, सैनिक थे जोकि विविध सामन्ती परिवारों से सम्बंधित थे तथा उनकी तुलना यूरोप के नाईटों के साथ की जा सकती है | युद्ध में हारने के पश्चात आत्म-हत्या करने की प्रवृत्ति "हराकीरी" का प्रचलन था | परन्तु 19 वीं शताब्दी के मध्य तक आते-आते वास्तविक सत्ता सामंती सरदारों में से एक जिसे शोगून कहा जाता था, के हाथों में केन्द्रित हो चुकी थी तथा जापान का शासक एकांगी एवं पवित्र जीवन जीने को बाध्य हो चुका था | अन्य सामन्ती सरदार जैसे- चोउसू , शा-जुमा आदि शोगून के प्रतिद्वंदी थे तथा सामन्ती परिवारों में टकराव सामान्य बात हो चुकी थी | इन्ही परिस्थितियों में 19 वीं शताब्दी के मध्य में पश्चिमी हसक्षेप हुआ जिसका नेतृत्व अमेरिका ने किया | यह हस्तक्षेप तथाकथित नव-साम्राज्यवाद का हिस्सा माना जाता है | पश्चिमी औपनिवेशिक शक्तियों ने बलपूर्वक न सिर्फ जापान को अपने बंदरगाह खोलने पर बाध्य किया बल्कि बलपूर्वक ही गैर-आर्थिक व्यापारिक सुविधाएं भी प्राप्त की | पश्चिमी लोगों को जापान में बसने तथा व्यापर करने की छोट भी मिली जिससे कि उनका तथा जापान के सैनिकों से दैनिक टकराव बढ़ने लगा | यहाँ तक कि पश्चिमी शक्तियों ने जापान में गैर-क्षेत्रीय अधिकार भी प्राप्त किये | इन सब के प्रति जापान में काफी असंतोष फैला तथा राष्ट्रवादी भावनाएं प्रबल हो उठी | जापान के राष्ट्रवादियों ने जिनका नेतृत्व सामन्ती वर्ग ने ही किया , जापान की दुर्दशा के लिए न सिर्फ पश्चिमी देशों को बल्कि शोगून को भी ठहराया | सामंती सरदारों ने मिलकर शोगून को विस्थापित किया तथा राजा को पुनः स्थापित किया , यह घटना मेईजी पुनर्स्थापना के नाम से जानी जाती है | मेईजी पुनर्स्थापना के जापान में राजनीतिक एकता की स्थापना की गयी | एक केंद्रीकृत शासन व्यवस्था की स्थापना की गयी, जिसका आधार नयी नौकरशाही थी, जिसमे राष्ट्रवादी तत्वों का बोल-बाला था | इससे राष्ट्रीय स्तर पर नीति निर्धारण तथा क्रियान्वयन संभव हो सका | जापान के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती स्वयं को उपनिवेशवाद के चंगुल से बचाना था तथा जापान के राष्ट्रवादी इस बात पे सहमत थे कि ऐसा सिर्फ सैनिक शक्ति के माध्यम से ही किया जा सकता है | जापान का औद्योगीकरण एशियाई देशों में जापान का औद्योगीकरण सबसे पहले हुआ | जापान का औद्योगीकरण, जापान के आधुनिकीकरण का वृहत्तम हिस्सा था | जापान का आधुनिकीकरण 1860 के दशक में होने वाले मेईजी पुनर्स्थापना के बाद प्रारंभ हुआ | जापान के आधुनिक रूपांतरण का सबसे आकर्षक एवं आधुनिक पक्ष उसकी तीव्र गति थी , जिसके कारण शदी के आते-आते पश्चिमी औपनिवेशिक देशों का सामना करने और यहाँ तक कि उन्हें पराजित करने में भी सक्षम हो चुका था | शीघ्र ही जापान ने अपनी साम्राज्यवादी यात्रा प्रारंभ की तथा चीन को अपना मुख्य निशाना बनाया | जापान के साम्राज्यवाद और सैन्यवाद को प्रथम विश्व युद्ध के कारणों में भी शामिल किया जाता है |
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##Question:मेईजी पुनर्स्थापना से आप क्या समझते हैं ? किस तरह से इसने जापान के औद्योगीकरण का मार्ग प्रशस्त किया ? चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) What do you understand by Meiji restoration ? How did it pave way for Japan"s industrialization? Discuss. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत मेईजी पुनर्स्थापना का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात जापान के औद्योगीकरण के किये उपजी परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में जापान का औद्योगीकरण बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - मेईजी पुनर्स्थापना इसका अभिप्राय जापान के शासक (मेईजी) की शक्तियों की पुनर्स्थापना से है | मेईजी पुनर्स्थापना को 19वीं शताब्दी के मध्य से अमेरिका के नेतृत्व में प्रारंभ होने वाले पश्चिमी औपनिवेशिक हस्तक्षेप के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाता है | 17 वीं तथा 18 वीं शताब्दी में होने वाले पश्चिमी हस्तक्षेपों के प्रति जापान ने चीन की तरह ही सुरक्षात्मक दृष्टिकोण का पालन करते हुए स्वयं को अलग-थलग कर लिया था तथा अपने बंदरगाहों को विदेशी व्यापार के लिए बैंड कर लिया था | परिस्थितियाँ 19 वीं शताब्दी में जापान ने अपने दृष्टिकोण को बदला जोकि निम्नलिखित था - जापान एक राजतंत्रात्मक देश रहा था, जहाँ का शासक देवता तुल्य माना जाता था | राजनीतिक तथा सामाजिक व्यवस्था सामंतवादी थी जिसमें विभिन्न सामन्ती परिवारों का भिन्न-भिन्न क्षेत्रों पर नियंत्रण था | सैनिक प्रवृत्ति प्रबल थी -जिसका आधार समुराई व्यवस्था थी, जिसमें स्वामी भक्ति तथा समर्पण की भावनाओं की प्रधानता थी | समुराई, सैनिक थे जोकि विविध सामन्ती परिवारों से सम्बंधित थे तथा उनकी तुलना यूरोप के नाईटों के साथ की जा सकती है | युद्ध में हारने के पश्चात आत्म-हत्या करने की प्रवृत्ति "हराकीरी" का प्रचलन था | परन्तु 19 वीं शताब्दी के मध्य तक आते-आते वास्तविक सत्ता सामंती सरदारों में से एक जिसे शोगून कहा जाता था, के हाथों में केन्द्रित हो चुकी थी तथा जापान का शासक एकांगी एवं पवित्र जीवन जीने को बाध्य हो चुका था | अन्य सामन्ती सरदार जैसे- चोउसू , शा-जुमा आदि शोगून के प्रतिद्वंदी थे तथा सामन्ती परिवारों में टकराव सामान्य बात हो चुकी थी | इन्ही परिस्थितियों में 19 वीं शताब्दी के मध्य में पश्चिमी हसक्षेप हुआ जिसका नेतृत्व अमेरिका ने किया | यह हस्तक्षेप तथाकथित नव-साम्राज्यवाद का हिस्सा माना जाता है | पश्चिमी औपनिवेशिक शक्तियों ने बलपूर्वक न सिर्फ जापान को अपने बंदरगाह खोलने पर बाध्य किया बल्कि बलपूर्वक ही गैर-आर्थिक व्यापारिक सुविधाएं भी प्राप्त की | पश्चिमी लोगों को जापान में बसने तथा व्यापर करने की छोट भी मिली जिससे कि उनका तथा जापान के सैनिकों से दैनिक टकराव बढ़ने लगा | यहाँ तक कि पश्चिमी शक्तियों ने जापान में गैर-क्षेत्रीय अधिकार भी प्राप्त किये | इन सब के प्रति जापान में काफी असंतोष फैला तथा राष्ट्रवादी भावनाएं प्रबल हो उठी | जापान के राष्ट्रवादियों ने जिनका नेतृत्व सामन्ती वर्ग ने ही किया , जापान की दुर्दशा के लिए न सिर्फ पश्चिमी देशों को बल्कि शोगून को भी ठहराया | सामंती सरदारों ने मिलकर शोगून को विस्थापित किया तथा राजा को पुनः स्थापित किया , यह घटना मेईजी पुनर्स्थापना के नाम से जानी जाती है | मेईजी पुनर्स्थापना के जापान में राजनीतिक एकता की स्थापना की गयी | एक केंद्रीकृत शासन व्यवस्था की स्थापना की गयी, जिसका आधार नयी नौकरशाही थी, जिसमे राष्ट्रवादी तत्वों का बोल-बाला था | इससे राष्ट्रीय स्तर पर नीति निर्धारण तथा क्रियान्वयन संभव हो सका | जापान के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती स्वयं को उपनिवेशवाद के चंगुल से बचाना था तथा जापान के राष्ट्रवादी इस बात पे सहमत थे कि ऐसा सिर्फ सैनिक शक्ति के माध्यम से ही किया जा सकता है | जापान का औद्योगीकरण एशियाई देशों में जापान का औद्योगीकरण सबसे पहले हुआ | जापान का औद्योगीकरण, जापान के आधुनिकीकरण का वृहत्तम हिस्सा था | जापान का आधुनिकीकरण 1860 के दशक में होने वाले मेईजी पुनर्स्थापना के बाद प्रारंभ हुआ | जापान के आधुनिक रूपांतरण का सबसे आकर्षक एवं आधुनिक पक्ष उसकी तीव्र गति थी , जिसके कारण शदी के आते-आते पश्चिमी औपनिवेशिक देशों का सामना करने और यहाँ तक कि उन्हें पराजित करने में भी सक्षम हो चुका था | शीघ्र ही जापान ने अपनी साम्राज्यवादी यात्रा प्रारंभ की तथा चीन को अपना मुख्य निशाना बनाया | जापान के साम्राज्यवाद और सैन्यवाद को प्रथम विश्व युद्ध के कारणों में भी शामिल किया जाता है |
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सहायक संधि से आप क्या समझते हैं? वेलेजली की सहायक संधि की नीति के मुख्य प्रावधानों को स्पष्ट करते हुए कंपनी के लिए इसके महत्त्व की चर्चा कीजिये|(150-200 शब्द) What do you understand bysubsidiaryalliance? Explain the main provisions of the policy of subsidiaryallianceof Wellesley and discuss its importance for the company. (150-200 words)
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दृष्टिकोण 1. भूमिका में सहायक संधि को स्पष्ट कीजिये| 2. सहायक संधि की नीति के मुख्य प्रावधानों कोसूचीबद्धकीजिये| 3. कंपनी के लिए इसके महत्त्व की चर्चा कीजिये| 4. निष्कर्ष में सहायक संधि में शामिल होने वाले राज्यों की संक्षेप में चर्चा कीजिये| उत्तर: भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना के लिएगवर्नर-जनरल लॉर्ड वेलेजली(1798-1805) द्वारा उपयोग की जाने वाली सहायकसंधि नीति"गैर-हस्तक्षेप नीति" थी। इस प्रणाली के अनुसार, भारत के सहायक संधि करने वालेशासक को ब्रिटिश सेना के रखरखाव के लिए अंग्रेजों कोधनदेना स्वीकार करना पड़ता था। बदले में, ब्रिटिश उन्हें दुश्मनों से सुरक्षित रखने का वचन देते थे| सहायक संधि की नीति नेब्रिटिश साम्राज्य को बहुत विस्तार दिया। सहायक संधि की नीति के मुख्य प्रावधान: रियासतों को स्वतंत्र सशस्त्र बल रखने की अनुमति नहीं थी। स्थानीय शासकों के खर्च पर एक ब्रिटिश सेनाका निर्माण किया जाना था| शासक अपने राज्य में एक ब्रिटिशरेजिडेंटको स्वीकार करेगा। यह राज्य के आतंरिक मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा| शासक जिसने एक सहायकसंधिमें प्रवेश किया है, वह किसी अन्य शक्ति के साथ किसी भी गठबंधन में शामिल नहीं होगा| शासक अंग्रेजों के अलावा किसी भी यूरोपीय को अपने राज्य में नियुक्त नहीं करेगा| शासक ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में सर्वोपरि शक्ति के रूप में स्वीकार करेगा। शासक का राज्य कंपनी द्वारा बाहरी खतरों और आंतरिकखतरोंसे सुरक्षित होगा। यदि शासकसंधिद्वारा निर्धारित आवश्यक भुगतान करने में विफल रहे, तो उनके क्षेत्र का हिस्सा दंड के रूप में ले लिया जाएगा। कंपनी के लिए सहायक संधि का महत्त्व: सहायक संधिने कंपनी की शक्ति और संसाधनों में वृद्धि की| कंपनी नेदेशी शक्तियोंके खर्चपर एक विशाल सेना का निर्माण किया जिसने कंपनी को सुरक्षा प्रदान की साथ ही इस सेना ने स्थानीय रियासतों में होने वाले विद्रोहों का दमन भी किया| ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा कमांड की गई कंपनी के सैनिकों को देशी राजकुमारों के क्षेत्रों पर स्थापित किया गया था जिससे रियासतों में कम्पनी के विरोध की संभावनाएं समाप्त हो गई| विदेश सम्बन्ध कंपनी ने अपने हाथ में रखे जिससे स्थानीय शासकों के परस्पर सहयोग की सभी सम्भावनायें समाप्त हो गई| भारतीय शासकों द्वारा अपनी सेनाओं को भंगकरना पड़ापरिणामस्वरूप सुरक्षा हेतु वह पूरी तरह से कंपनी पर निर्भर हो गए| वस्तुतः सहायक संधि ने बिना युद्ध के ही कम्पनी के साम्राज्य को अत्यधिक विस्तार प्रदान किया| बहुत ही अल्प-समय मेंहैदराबाद (1798); मैसूर (1799); तंजौर (1799); अवध (1801); मराठा(1802); सिंधिया(1803); गायकवाड़(1803) आदि; जैसी बड़ी रियासतें ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल हो गई|
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##Question:सहायक संधि से आप क्या समझते हैं? वेलेजली की सहायक संधि की नीति के मुख्य प्रावधानों को स्पष्ट करते हुए कंपनी के लिए इसके महत्त्व की चर्चा कीजिये|(150-200 शब्द) What do you understand bysubsidiaryalliance? Explain the main provisions of the policy of subsidiaryallianceof Wellesley and discuss its importance for the company. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1. भूमिका में सहायक संधि को स्पष्ट कीजिये| 2. सहायक संधि की नीति के मुख्य प्रावधानों कोसूचीबद्धकीजिये| 3. कंपनी के लिए इसके महत्त्व की चर्चा कीजिये| 4. निष्कर्ष में सहायक संधि में शामिल होने वाले राज्यों की संक्षेप में चर्चा कीजिये| उत्तर: भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना के लिएगवर्नर-जनरल लॉर्ड वेलेजली(1798-1805) द्वारा उपयोग की जाने वाली सहायकसंधि नीति"गैर-हस्तक्षेप नीति" थी। इस प्रणाली के अनुसार, भारत के सहायक संधि करने वालेशासक को ब्रिटिश सेना के रखरखाव के लिए अंग्रेजों कोधनदेना स्वीकार करना पड़ता था। बदले में, ब्रिटिश उन्हें दुश्मनों से सुरक्षित रखने का वचन देते थे| सहायक संधि की नीति नेब्रिटिश साम्राज्य को बहुत विस्तार दिया। सहायक संधि की नीति के मुख्य प्रावधान: रियासतों को स्वतंत्र सशस्त्र बल रखने की अनुमति नहीं थी। स्थानीय शासकों के खर्च पर एक ब्रिटिश सेनाका निर्माण किया जाना था| शासक अपने राज्य में एक ब्रिटिशरेजिडेंटको स्वीकार करेगा। यह राज्य के आतंरिक मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा| शासक जिसने एक सहायकसंधिमें प्रवेश किया है, वह किसी अन्य शक्ति के साथ किसी भी गठबंधन में शामिल नहीं होगा| शासक अंग्रेजों के अलावा किसी भी यूरोपीय को अपने राज्य में नियुक्त नहीं करेगा| शासक ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में सर्वोपरि शक्ति के रूप में स्वीकार करेगा। शासक का राज्य कंपनी द्वारा बाहरी खतरों और आंतरिकखतरोंसे सुरक्षित होगा। यदि शासकसंधिद्वारा निर्धारित आवश्यक भुगतान करने में विफल रहे, तो उनके क्षेत्र का हिस्सा दंड के रूप में ले लिया जाएगा। कंपनी के लिए सहायक संधि का महत्त्व: सहायक संधिने कंपनी की शक्ति और संसाधनों में वृद्धि की| कंपनी नेदेशी शक्तियोंके खर्चपर एक विशाल सेना का निर्माण किया जिसने कंपनी को सुरक्षा प्रदान की साथ ही इस सेना ने स्थानीय रियासतों में होने वाले विद्रोहों का दमन भी किया| ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा कमांड की गई कंपनी के सैनिकों को देशी राजकुमारों के क्षेत्रों पर स्थापित किया गया था जिससे रियासतों में कम्पनी के विरोध की संभावनाएं समाप्त हो गई| विदेश सम्बन्ध कंपनी ने अपने हाथ में रखे जिससे स्थानीय शासकों के परस्पर सहयोग की सभी सम्भावनायें समाप्त हो गई| भारतीय शासकों द्वारा अपनी सेनाओं को भंगकरना पड़ापरिणामस्वरूप सुरक्षा हेतु वह पूरी तरह से कंपनी पर निर्भर हो गए| वस्तुतः सहायक संधि ने बिना युद्ध के ही कम्पनी के साम्राज्य को अत्यधिक विस्तार प्रदान किया| बहुत ही अल्प-समय मेंहैदराबाद (1798); मैसूर (1799); तंजौर (1799); अवध (1801); मराठा(1802); सिंधिया(1803); गायकवाड़(1803) आदि; जैसी बड़ी रियासतें ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल हो गई|
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महासागरीय धाराओं का सामान्य परिचय देते हुए, इसके प्रभाव का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) While giving a general introduction to oceanic currents, describe their effects in detail. (150-200 words/10 Marks)
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एप्रोच - महासागरीय धाराओं का सामान्य परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात महासागरीय धाराओं को प्रभाव को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - महासागरीय धारा जब महासागरों के जल की बहुत बड़ी मात्रा एक निश्चित दिशा में लम्बी दूरी तक सामान्य गति से चलने लगती है, तो उसे महासागरीय धाराएँ कहते हैं । जब धाराएँ सुनिश्चित दिशा में अत्यधिक वेग से चलती हैं तो इन्हें स्ट्रीम (streams) कहा जाता है। जबकि अनिश्चित स्वरूप एवं घीमी गति से बहने वाले सागर जल की चौड़ी धारा को प्रवाह (Drift) कहते हैं। महासागरीय धाराओं का प्रभाव पृथ्वी का क्षैतिज ऊष्मा संतुलन क्षैतिज ऊष्मा संतुलन को स्थापित करने में धारायें पर्याप्त सहयोग करती हैं | आर्कटिक व अंटार्कटिक क्षेत्रों की ठंडी जलधाराएँ ऊष्ण कटिबंधीय व विषुवतीय क्षेत्रों की तरफ प्रवाहित होती हैं, जबकि यहाँ की गर्म जलधाराएँ ध्रुवों की तरफ प्रवाहित होती है | इससे तापमान का निरंतर स्थानांतरण होता रहता है | उत्तर पश्चिमी यूरोप के तटवर्ती देशों की आदर्श जलवायु का प्रमुख कारण गल्फस्ट्रीम का विस्तृत भाग उत्तरी अटलांटिक प्रवाह ही है | इस प्रकार गर्म धाराएँ ऊष्ण कटिबंधीय उच्च तापमान को उच्च अक्षांशों की ओर ले जाकर तापमान के वितरण में समानता लाने का प्रयास करती है | वर्षा गर्म धाराओं के ऊपर से प्रवाहित वायु नमी धारण कर लेती है तथा प्रभावित क्षेत्रों को वर्षा प्रदान करती है | उत्तरी पश्चिमी यूरोप के तटीय भागों में उत्तरी अटलांटिक धारा तथा जापान के पूर्वी भाग में क्यूरोशियो धारा के कारण वर्षा होती है | इसके विपरीत ठंडी धाराएँ वातावरण में शुष्कता प्रदान करती है, जैसे- दक्षिण अफ्रीका के पश्चिम तट पर कालाहारी तथा दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर अटाकामा मरूस्थलों के आविर्भाव में क्रमशः बेंगुला तथा पेरू की ठंडी धाराओं का पर्याप्त योगदान है | इसी प्रकार फाकलैंड धारा के कारण पेंटागोनिया मरूस्थल का निर्माण हुआ है | तटीय भागों की जलवायु पर प्रभाव ऊष्ण व उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में गर्म जलधाराएँ महाद्वीपों के पूर्वी तटों के समानान्तर प्रवाहित होती है | इसी कारण यहाँ जलवायु गर्म व आर्द्र होती है | मध्य व उच्च अक्षांशों में महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर गर्म जलधाराएँ बहती हैं, जिसके कारण वहां एक विशेष प्रकार की जलवायु पायी जाती है | इन क्षेत्रों में ग्रीष्मऋतु अपेक्षाकृत कम गर्म और शीत्रितु अपेक्षाकृत मृदु होती है | यहाँ वार्षिक तापान्तर भी कम होता है | भारत में मानसून को निर्धारित करने में समुद्री धाराओं की महत्वपूर्ण भूमिका है | इसी प्रकार पश्चिमी यूरोपीय तुल्य जलवायु प्रदेश के निर्माण में उत्तरी अटलांटिक प्रवाह की महत्वपूर्ण भूमिका है | आदि मत्स्य उद्योग पर प्रभाव जहाँ गर्म व ठंडी जलधाराएँ आपस में मिलती हैं, वहां आक्सीजन की आपूर्ति बढ़ने से प्लैंकटन की मात्रा में में वृद्धि हो जाती है जो मछलियों के लिए आदर्श स्थिति पैदा करता है | संसार के प्रमुख मत्स्य क्षेत्र इन्ही क्षेत्रों में पाए जाते हैं | गल्फस्ट्रीम द्वारा प्लैंकटन न्यूफाउंडलैंड तथा उत्तर पश्चिमी यूरोपीय तट पर पहुंचाया जाता है, जिस कारण वहां पर मत्स्य उद्योग अत्यधिक विकसित हो गया है | परन्तु पेरू तट पर एलनीनो धारा के कारण प्लैंकटन के कम हो जाने पर मछलियों की मृत्यु हो जाती है और मत्स्य उद्योग को क्षति उठानी पड़ती है | आदि व्यापार पर प्रभाव गर्म जलधाराओं के कारण ही ध्रुवीय क्षेत्र के बंदरगाह पर हिम नहीं जम पाता एवं वे सम्पूर्ण वर्ष खुले रहते हैं | जैसे - उत्तरी अटलांटिक प्रवाह एवं उनकी शाखाओं के प्रभाव से पश्चिमी यूरोप के अधिकतर बंदरगाह वर्ष भर खुले रहते हैं | नार्वे इस धारा से सर्वाधिक लाभ की स्थिति में रहता है | न्यूफाउंडलैंड तथा जापान तट के पास इसी तरह के कोहरे के कारण जलयानों को अपार क्षति उठानी पड़ती है | सामुद्रिक जीव-जंतुओं पर प्रभाव धाराएँ सामुद्रिक जीवन का आवश्यक घटक हैं , सामुद्रिक जीवन को बनाए रखने और उसको प्रश्रय देने में धाराएँ महत्वपूर्ण योगदान देती हैं | धाराओं के कारण ही समुद्रों में आवश्यक जीवन तत्व एवं प्लैंकटन का संतुलित वितरण होता है | कई जीवों के लिए भोजन का आधार भी ये धाराएँ ही हैं | नौसंचालन पर प्रभाव , आदि
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##Question:महासागरीय धाराओं का सामान्य परिचय देते हुए, इसके प्रभाव का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) While giving a general introduction to oceanic currents, describe their effects in detail. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच - महासागरीय धाराओं का सामान्य परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात महासागरीय धाराओं को प्रभाव को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - महासागरीय धारा जब महासागरों के जल की बहुत बड़ी मात्रा एक निश्चित दिशा में लम्बी दूरी तक सामान्य गति से चलने लगती है, तो उसे महासागरीय धाराएँ कहते हैं । जब धाराएँ सुनिश्चित दिशा में अत्यधिक वेग से चलती हैं तो इन्हें स्ट्रीम (streams) कहा जाता है। जबकि अनिश्चित स्वरूप एवं घीमी गति से बहने वाले सागर जल की चौड़ी धारा को प्रवाह (Drift) कहते हैं। महासागरीय धाराओं का प्रभाव पृथ्वी का क्षैतिज ऊष्मा संतुलन क्षैतिज ऊष्मा संतुलन को स्थापित करने में धारायें पर्याप्त सहयोग करती हैं | आर्कटिक व अंटार्कटिक क्षेत्रों की ठंडी जलधाराएँ ऊष्ण कटिबंधीय व विषुवतीय क्षेत्रों की तरफ प्रवाहित होती हैं, जबकि यहाँ की गर्म जलधाराएँ ध्रुवों की तरफ प्रवाहित होती है | इससे तापमान का निरंतर स्थानांतरण होता रहता है | उत्तर पश्चिमी यूरोप के तटवर्ती देशों की आदर्श जलवायु का प्रमुख कारण गल्फस्ट्रीम का विस्तृत भाग उत्तरी अटलांटिक प्रवाह ही है | इस प्रकार गर्म धाराएँ ऊष्ण कटिबंधीय उच्च तापमान को उच्च अक्षांशों की ओर ले जाकर तापमान के वितरण में समानता लाने का प्रयास करती है | वर्षा गर्म धाराओं के ऊपर से प्रवाहित वायु नमी धारण कर लेती है तथा प्रभावित क्षेत्रों को वर्षा प्रदान करती है | उत्तरी पश्चिमी यूरोप के तटीय भागों में उत्तरी अटलांटिक धारा तथा जापान के पूर्वी भाग में क्यूरोशियो धारा के कारण वर्षा होती है | इसके विपरीत ठंडी धाराएँ वातावरण में शुष्कता प्रदान करती है, जैसे- दक्षिण अफ्रीका के पश्चिम तट पर कालाहारी तथा दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर अटाकामा मरूस्थलों के आविर्भाव में क्रमशः बेंगुला तथा पेरू की ठंडी धाराओं का पर्याप्त योगदान है | इसी प्रकार फाकलैंड धारा के कारण पेंटागोनिया मरूस्थल का निर्माण हुआ है | तटीय भागों की जलवायु पर प्रभाव ऊष्ण व उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में गर्म जलधाराएँ महाद्वीपों के पूर्वी तटों के समानान्तर प्रवाहित होती है | इसी कारण यहाँ जलवायु गर्म व आर्द्र होती है | मध्य व उच्च अक्षांशों में महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर गर्म जलधाराएँ बहती हैं, जिसके कारण वहां एक विशेष प्रकार की जलवायु पायी जाती है | इन क्षेत्रों में ग्रीष्मऋतु अपेक्षाकृत कम गर्म और शीत्रितु अपेक्षाकृत मृदु होती है | यहाँ वार्षिक तापान्तर भी कम होता है | भारत में मानसून को निर्धारित करने में समुद्री धाराओं की महत्वपूर्ण भूमिका है | इसी प्रकार पश्चिमी यूरोपीय तुल्य जलवायु प्रदेश के निर्माण में उत्तरी अटलांटिक प्रवाह की महत्वपूर्ण भूमिका है | आदि मत्स्य उद्योग पर प्रभाव जहाँ गर्म व ठंडी जलधाराएँ आपस में मिलती हैं, वहां आक्सीजन की आपूर्ति बढ़ने से प्लैंकटन की मात्रा में में वृद्धि हो जाती है जो मछलियों के लिए आदर्श स्थिति पैदा करता है | संसार के प्रमुख मत्स्य क्षेत्र इन्ही क्षेत्रों में पाए जाते हैं | गल्फस्ट्रीम द्वारा प्लैंकटन न्यूफाउंडलैंड तथा उत्तर पश्चिमी यूरोपीय तट पर पहुंचाया जाता है, जिस कारण वहां पर मत्स्य उद्योग अत्यधिक विकसित हो गया है | परन्तु पेरू तट पर एलनीनो धारा के कारण प्लैंकटन के कम हो जाने पर मछलियों की मृत्यु हो जाती है और मत्स्य उद्योग को क्षति उठानी पड़ती है | आदि व्यापार पर प्रभाव गर्म जलधाराओं के कारण ही ध्रुवीय क्षेत्र के बंदरगाह पर हिम नहीं जम पाता एवं वे सम्पूर्ण वर्ष खुले रहते हैं | जैसे - उत्तरी अटलांटिक प्रवाह एवं उनकी शाखाओं के प्रभाव से पश्चिमी यूरोप के अधिकतर बंदरगाह वर्ष भर खुले रहते हैं | नार्वे इस धारा से सर्वाधिक लाभ की स्थिति में रहता है | न्यूफाउंडलैंड तथा जापान तट के पास इसी तरह के कोहरे के कारण जलयानों को अपार क्षति उठानी पड़ती है | सामुद्रिक जीव-जंतुओं पर प्रभाव धाराएँ सामुद्रिक जीवन का आवश्यक घटक हैं , सामुद्रिक जीवन को बनाए रखने और उसको प्रश्रय देने में धाराएँ महत्वपूर्ण योगदान देती हैं | धाराओं के कारण ही समुद्रों में आवश्यक जीवन तत्व एवं प्लैंकटन का संतुलित वितरण होता है | कई जीवों के लिए भोजन का आधार भी ये धाराएँ ही हैं | नौसंचालन पर प्रभाव , आदि
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आर्थिक असमानता को परिभाषित करते हुए इसके लिए उत्तरदायी कारकों की विस्तार से व्याख्या कीजिये | इसके साथ ही आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए सरकार द्वारा किये गए प्रयासों का उल्लेख कीजिये (150 से 200 शब्द) Define economic inequality and explain in detail the factors responsible for it. Also, mention the efforts made by the government to reduce economic inequality (150 to 200 words).
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में आर्थिक असमानता की परिभाषा तथा भारत की स्थिति स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में आर्थिक असमानता के लिए उत्तरदायी कारकों को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में असमानता को कम करने के लिए सरकार द्वारा किये गए प्रयासों को स्पष्ट कीजिये 4- अपेक्षित उपायों की दिशा में निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये आर्थिक असमानता धारित संपत्ति, प्राप्त आय अथवा किये गए व्ययों में अंतर के रूप में परिभाषित की जाती है| इन्ही चरों के आधार पर आर्थिक असमानता को प्रदर्शित भी किया जाता है| ऑक्सफेम ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि भारत में आर्थिक असमानता पिछले तीन दशकों से बढ़ रही है| रिपोर्ट के अनुसार 2017 में देश में अर्जित कुल संपत्ति का 73 प्रतिशत भाग देश की एक प्रतिशत जनसंख्या के खाते में गया है| इसी सर्वे में यह भी बताया गया है की 67 करोड़ भारतीयों की संपत्ति में केवल 1 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है| इन आंकड़ों से भारत में व्यापक आर्थिक असमानता की स्थिति का पता चलता है| भारत में व्यापक आर्थिक असमानता के लिए उत्तरदायीकारक भारत में भूमि एवं संपत्ति के स्वामित्व में व्यापक असमानता देखने को मिलती है| स्वामित्व में असमानता के कारण लोगों की आय और व्यय में व्यापक अंतर देखने को मिलता है| इसके कारण आर्थिक असमानता में वृद्धि हुई है| आय अंतराल लोगों की शिक्षा तथा प्रशिक्षण तक पहुँच को भी प्रभावित करता है| अधिक आय वर्ग के लोगों की उचित एवं आवश्यक शिक्षा तक आसानी से पहुँच होती है जबकि निम्न आय वर्ग के लोग अपेक्षित शिक्षा & प्रशिक्षण को नहीं प्राप्त कर पाते| इसका प्रभाव उनके द्वारा अवसरों तक पहुँच पर पड़ता है| अवसरों तक पहुँच में असमानता आर्थिक असमानता का रूप धारण कर लेती है| भारत में पूँजी संसाधन की कमी का प्रभाव भारत की अवसंरचना पर पड़ता है जो अंततः विकास प्रक्रिया को बाधित करता है| कुछ क्षेत्रों में बेहतर अवसंरचना का विकास जबकि कुछ क्षेत्रों में अवसंरचना का निम्न विकास लोगों की आय में अंतर को उत्पन्न करता है जिससे आर्थिक असमानता बढ़ने लगती है| भारत की अधिकाँश जनसंख्या कृषि कार्यों में लगी हुई है| कृषि उत्पादन में अन्तर, भूमि की उत्पादकता में अंतर, आगतों की उपलब्धता आदि कारणों से कृषि आय में अंतर आता है| इससे आर्थिक असमानता बढ़ती है| भारत एक विकासशील अर्थव्यवस्था है| भारतीय अर्थव्यवस्था के अनेकों क्षेत्रों में अभी तकनीकी पिछड़ेपन को देखा जा सकता है| तकनीकी पिछडापन उत्पादन में कमी के लिए उत्तरदायी है| इसके साथ ही कुछ क्षेत्रों में अत्याधुनिक तकनीकों का भी प्रयोग किया जा रहा है| तकनीकी प्रयोग में अंतर भी आर्थिक असमानता के प्रमुख कारणों में से एक है| भारत में विभिन्न आय वर्ग हैं| इन वर्गों की क्षमताएं इनकी आय के अनुरूप हैं| क्षमताओं में अंतर आर्थिक असमानता की वृद्धि में सहायक है विकासात्मक व्ययों में रिसाव की समस्या, समावेशी विकास को बाधित करती है| सरकारी सुविधाओं तक पहुँच में असमानता आर्थिक असमानता की वृद्धि के लिए उत्तरदायी कारकों में से एक है, इसी प्रकार भारत में बेरोजगारी और गरीबी की समस्या भी व्यापक आर्थिक असमानता के लिए उत्तरदायी हैं| आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए सरकार द्वारा किये गए प्रयास भूमि सुधार कार्यक्रम के माध्यम से संपत्ति एवं भूमि पर स्वामित्व की असमानता को कम करने का प्रयास किया गया है| कल्याणकारी स्वरुप के अंतर्गत भारत सरकार ने कल्याण के दृष्टिकोण से सार्वजनिक क्षेत्रक की स्थापना की है| यह आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए सहायक है| संसाधनों के संकेन्द्रण को रोकने के लिए तथा गरीबों की सहज वित्त की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार द्वारा बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया है| सामाजिक-आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए भारत सरकार ने सकारात्मक भेदभाव की नीति अपनाई है और इसके अंतर्गत वंचित अथवा कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गयी है| भारत एक कल्याणकारी राज्य है| कल्याण कार्यों के सुचारू संचालन के लिए राजस्व की आवाश्यकता होती है| राजस्व प्राप्ति के लिए भारत सरकार ने प्रगतिशील कराधान की प्रणाली अपनाई है| सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों में अधिकतम रोजगार सृजन की क्षमता होती है| अधिकतम रोजगार सृजन लोगों के आय स्तर में वृद्धि करने में सहायक होगा| इसी उद्देश्य से भारत सरकार MSME का संरक्षण और प्रोत्साहन कर रही है| इनके अतिरिक्त भारत सरकार विभिन्न विकासात्मक कार्यक्रम,वित्तीय समावेशन, कृषि विकास, सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम,कौशल विकास कार्यक्रम तथा निर्धनता उन्मूलन एवं रोजगार सृजन कार्यक्रमों का संचालन कर रही है| उपरोक्त प्रयासों के बाद भी भारत में अभी भी व्यापक आर्थिक असमानता देखने को मिलती है| इससे स्पष्ट होता है कि आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए भारत सरकार को और प्रभावी प्रयास करने की आवश्यकता है|इस दिशा में कौशल विकास, क्षमता संवर्धन, सशक्तिकरण आदि उपाय प्रभावी हो सकते हैं|
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##Question:आर्थिक असमानता को परिभाषित करते हुए इसके लिए उत्तरदायी कारकों की विस्तार से व्याख्या कीजिये | इसके साथ ही आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए सरकार द्वारा किये गए प्रयासों का उल्लेख कीजिये (150 से 200 शब्द) Define economic inequality and explain in detail the factors responsible for it. Also, mention the efforts made by the government to reduce economic inequality (150 to 200 words).##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में आर्थिक असमानता की परिभाषा तथा भारत की स्थिति स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में आर्थिक असमानता के लिए उत्तरदायी कारकों को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में असमानता को कम करने के लिए सरकार द्वारा किये गए प्रयासों को स्पष्ट कीजिये 4- अपेक्षित उपायों की दिशा में निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये आर्थिक असमानता धारित संपत्ति, प्राप्त आय अथवा किये गए व्ययों में अंतर के रूप में परिभाषित की जाती है| इन्ही चरों के आधार पर आर्थिक असमानता को प्रदर्शित भी किया जाता है| ऑक्सफेम ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि भारत में आर्थिक असमानता पिछले तीन दशकों से बढ़ रही है| रिपोर्ट के अनुसार 2017 में देश में अर्जित कुल संपत्ति का 73 प्रतिशत भाग देश की एक प्रतिशत जनसंख्या के खाते में गया है| इसी सर्वे में यह भी बताया गया है की 67 करोड़ भारतीयों की संपत्ति में केवल 1 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है| इन आंकड़ों से भारत में व्यापक आर्थिक असमानता की स्थिति का पता चलता है| भारत में व्यापक आर्थिक असमानता के लिए उत्तरदायीकारक भारत में भूमि एवं संपत्ति के स्वामित्व में व्यापक असमानता देखने को मिलती है| स्वामित्व में असमानता के कारण लोगों की आय और व्यय में व्यापक अंतर देखने को मिलता है| इसके कारण आर्थिक असमानता में वृद्धि हुई है| आय अंतराल लोगों की शिक्षा तथा प्रशिक्षण तक पहुँच को भी प्रभावित करता है| अधिक आय वर्ग के लोगों की उचित एवं आवश्यक शिक्षा तक आसानी से पहुँच होती है जबकि निम्न आय वर्ग के लोग अपेक्षित शिक्षा & प्रशिक्षण को नहीं प्राप्त कर पाते| इसका प्रभाव उनके द्वारा अवसरों तक पहुँच पर पड़ता है| अवसरों तक पहुँच में असमानता आर्थिक असमानता का रूप धारण कर लेती है| भारत में पूँजी संसाधन की कमी का प्रभाव भारत की अवसंरचना पर पड़ता है जो अंततः विकास प्रक्रिया को बाधित करता है| कुछ क्षेत्रों में बेहतर अवसंरचना का विकास जबकि कुछ क्षेत्रों में अवसंरचना का निम्न विकास लोगों की आय में अंतर को उत्पन्न करता है जिससे आर्थिक असमानता बढ़ने लगती है| भारत की अधिकाँश जनसंख्या कृषि कार्यों में लगी हुई है| कृषि उत्पादन में अन्तर, भूमि की उत्पादकता में अंतर, आगतों की उपलब्धता आदि कारणों से कृषि आय में अंतर आता है| इससे आर्थिक असमानता बढ़ती है| भारत एक विकासशील अर्थव्यवस्था है| भारतीय अर्थव्यवस्था के अनेकों क्षेत्रों में अभी तकनीकी पिछड़ेपन को देखा जा सकता है| तकनीकी पिछडापन उत्पादन में कमी के लिए उत्तरदायी है| इसके साथ ही कुछ क्षेत्रों में अत्याधुनिक तकनीकों का भी प्रयोग किया जा रहा है| तकनीकी प्रयोग में अंतर भी आर्थिक असमानता के प्रमुख कारणों में से एक है| भारत में विभिन्न आय वर्ग हैं| इन वर्गों की क्षमताएं इनकी आय के अनुरूप हैं| क्षमताओं में अंतर आर्थिक असमानता की वृद्धि में सहायक है विकासात्मक व्ययों में रिसाव की समस्या, समावेशी विकास को बाधित करती है| सरकारी सुविधाओं तक पहुँच में असमानता आर्थिक असमानता की वृद्धि के लिए उत्तरदायी कारकों में से एक है, इसी प्रकार भारत में बेरोजगारी और गरीबी की समस्या भी व्यापक आर्थिक असमानता के लिए उत्तरदायी हैं| आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए सरकार द्वारा किये गए प्रयास भूमि सुधार कार्यक्रम के माध्यम से संपत्ति एवं भूमि पर स्वामित्व की असमानता को कम करने का प्रयास किया गया है| कल्याणकारी स्वरुप के अंतर्गत भारत सरकार ने कल्याण के दृष्टिकोण से सार्वजनिक क्षेत्रक की स्थापना की है| यह आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए सहायक है| संसाधनों के संकेन्द्रण को रोकने के लिए तथा गरीबों की सहज वित्त की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार द्वारा बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया है| सामाजिक-आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए भारत सरकार ने सकारात्मक भेदभाव की नीति अपनाई है और इसके अंतर्गत वंचित अथवा कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गयी है| भारत एक कल्याणकारी राज्य है| कल्याण कार्यों के सुचारू संचालन के लिए राजस्व की आवाश्यकता होती है| राजस्व प्राप्ति के लिए भारत सरकार ने प्रगतिशील कराधान की प्रणाली अपनाई है| सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों में अधिकतम रोजगार सृजन की क्षमता होती है| अधिकतम रोजगार सृजन लोगों के आय स्तर में वृद्धि करने में सहायक होगा| इसी उद्देश्य से भारत सरकार MSME का संरक्षण और प्रोत्साहन कर रही है| इनके अतिरिक्त भारत सरकार विभिन्न विकासात्मक कार्यक्रम,वित्तीय समावेशन, कृषि विकास, सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम,कौशल विकास कार्यक्रम तथा निर्धनता उन्मूलन एवं रोजगार सृजन कार्यक्रमों का संचालन कर रही है| उपरोक्त प्रयासों के बाद भी भारत में अभी भी व्यापक आर्थिक असमानता देखने को मिलती है| इससे स्पष्ट होता है कि आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए भारत सरकार को और प्रभावी प्रयास करने की आवश्यकता है|इस दिशा में कौशल विकास, क्षमता संवर्धन, सशक्तिकरण आदि उपाय प्रभावी हो सकते हैं|
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डलहौजी के पूर्ववर्तियों ने जहाँ तक संभव था समामेलन(विलय) से बचने का प्रयास किया, जबकि वो ऐसा कर सकते थे|किन्तु डलहौजी ने युद्ध एवं शांति दोनों ही उपायों के द्वारा समामेलन किया| विश्लेषण कीजिये। (150-200 शब्द; 10 अंक) Dalhousie"s predecessors tried to avoid amalgamation (merger) as far as possible, while they could do so, but Dalhousie did amalgamation through both war and peace measures. Analyze. (150-200 words; 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1. भूमिका में डलहौजीकेपूर्ववर्तियों के समय की परिस्थितियों को स्पष्ट कीजिये| 2. डलहौजी द्वारासाम्राज्य-विस्तार हेतु अपनाई गई युद्ध एवं शांति की नीति की चर्चा कीजिये| 3.निष्कर्ष में संक्षेप में स्पष्टकीजिये कि डलहौजी ने किन कारणों से साम्राज्य-विस्तार पर जोर दिया| उत्तर: लॉर्ड डलहौजी 1848 में भारत आया| उससे पहले के गवर्नर जनरल देशी रियासतों के ब्रिटिश साम्राज्य में विलय से बचते रहे| वस्तुतः पहले के गवर्नर जनरलों का आरंभिक ध्यान कम्पनी प्रशासन की सुदृढ़ता एवं स्थिरता पर था| साथ ही मराठा, सिख आदि मजबूत राज्यों की उपस्थिति ने भी अंग्रेजों को विलय की नीति अपनाने से रोका| किन्तुडलहौजीके आगमन तक कंपनी प्रभावी रूप से स्थापित हो चुकी थी एवं डलहौजी के द्वारा प्रभावी विलय एवं विस्तार की नीति अपनाई| डलहौजी से पूर्व भी कार्नवालिस, वेलेजली(आंग्ल-मराठा युद्ध एवं आंग्ल-मैसूर युद्ध ), लार्ड हेस्टिंग्स(आंग्ल-नेपाल युद्ध,तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध ),लार्ड हार्डिंग(आंग्ल-सिख युद्ध) आदि ने निर्णायक युद्ध लडे किन्तु उन्होंने देशी राज्यों का विलय नहीं किया| वेलेजली ने सहायक संधि के माध्यम से ब्रिटिश साम्राज्य को एक नया विस्तार प्रदान किया किन्तु विलय की नीति का अनुपालन उसने भी नहीं किया| डलहौजी द्वारा साम्राज्य-विस्तार हेतु अपनाई गई युद्ध एवं शांति की नीति: डलहौजी ने प्रभावी रूप से साम्राज्य विलय एवं विस्तार की नीति अपनाई| वस्तुतः डलहौजी के समय तक ब्रिटिश शासन सुदृढ़ता एवं स्थिरता प्राप्त कर चुका था| अंग्रेजों का पूरा ध्यान अब राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने की ओर था| - अपनी सैन्य शक्ति को मजबूत करने के लिए इसने गोरखा रेजिमेंट की स्थापना की| - डलहौजी ने युद्ध नीति के तहत द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध के द्वारा 1849 में पंजाब के ऊपर अधिकार कर लिया| द्वितीय आंग्ल-बर्मा युद्ध के उपरांत बर्मा पर अधिकार किया गया एवं 1853 में बरार क्षेत्र पर भी अधिकार कर लिया गया| - शांति पूर्ण प्रयासों के रूप डलहौजी ने व्यपगत का सिद्दांत लागू किया जिसके अंतर्गत गोद निषेध प्रणाली को लागू किया गया| इस नीति के द्वारा सतारा, झाँसी, जयपुर, उदयपुर, संभलपुर, नागपुर आदि को हस्तगत किया गया| - 1856 में इसने अवध को कुशासन के आरोप के आधार पर हस्तगत किया| इस प्रकार डलहौजी ने भारतीय रियासतों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण की नीति अपनाई एवं ब्रिटिश साम्राज्य को विस्तार प्रदान किया| डलहौजी का अत्यधिक हस्तक्षेप 1857 की क्रांति के महत्वपूर्ण कारण के रूप में स्वीकार किया गया था|
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##Question:डलहौजी के पूर्ववर्तियों ने जहाँ तक संभव था समामेलन(विलय) से बचने का प्रयास किया, जबकि वो ऐसा कर सकते थे|किन्तु डलहौजी ने युद्ध एवं शांति दोनों ही उपायों के द्वारा समामेलन किया| विश्लेषण कीजिये। (150-200 शब्द; 10 अंक) Dalhousie"s predecessors tried to avoid amalgamation (merger) as far as possible, while they could do so, but Dalhousie did amalgamation through both war and peace measures. Analyze. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1. भूमिका में डलहौजीकेपूर्ववर्तियों के समय की परिस्थितियों को स्पष्ट कीजिये| 2. डलहौजी द्वारासाम्राज्य-विस्तार हेतु अपनाई गई युद्ध एवं शांति की नीति की चर्चा कीजिये| 3.निष्कर्ष में संक्षेप में स्पष्टकीजिये कि डलहौजी ने किन कारणों से साम्राज्य-विस्तार पर जोर दिया| उत्तर: लॉर्ड डलहौजी 1848 में भारत आया| उससे पहले के गवर्नर जनरल देशी रियासतों के ब्रिटिश साम्राज्य में विलय से बचते रहे| वस्तुतः पहले के गवर्नर जनरलों का आरंभिक ध्यान कम्पनी प्रशासन की सुदृढ़ता एवं स्थिरता पर था| साथ ही मराठा, सिख आदि मजबूत राज्यों की उपस्थिति ने भी अंग्रेजों को विलय की नीति अपनाने से रोका| किन्तुडलहौजीके आगमन तक कंपनी प्रभावी रूप से स्थापित हो चुकी थी एवं डलहौजी के द्वारा प्रभावी विलय एवं विस्तार की नीति अपनाई| डलहौजी से पूर्व भी कार्नवालिस, वेलेजली(आंग्ल-मराठा युद्ध एवं आंग्ल-मैसूर युद्ध ), लार्ड हेस्टिंग्स(आंग्ल-नेपाल युद्ध,तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध ),लार्ड हार्डिंग(आंग्ल-सिख युद्ध) आदि ने निर्णायक युद्ध लडे किन्तु उन्होंने देशी राज्यों का विलय नहीं किया| वेलेजली ने सहायक संधि के माध्यम से ब्रिटिश साम्राज्य को एक नया विस्तार प्रदान किया किन्तु विलय की नीति का अनुपालन उसने भी नहीं किया| डलहौजी द्वारा साम्राज्य-विस्तार हेतु अपनाई गई युद्ध एवं शांति की नीति: डलहौजी ने प्रभावी रूप से साम्राज्य विलय एवं विस्तार की नीति अपनाई| वस्तुतः डलहौजी के समय तक ब्रिटिश शासन सुदृढ़ता एवं स्थिरता प्राप्त कर चुका था| अंग्रेजों का पूरा ध्यान अब राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने की ओर था| - अपनी सैन्य शक्ति को मजबूत करने के लिए इसने गोरखा रेजिमेंट की स्थापना की| - डलहौजी ने युद्ध नीति के तहत द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध के द्वारा 1849 में पंजाब के ऊपर अधिकार कर लिया| द्वितीय आंग्ल-बर्मा युद्ध के उपरांत बर्मा पर अधिकार किया गया एवं 1853 में बरार क्षेत्र पर भी अधिकार कर लिया गया| - शांति पूर्ण प्रयासों के रूप डलहौजी ने व्यपगत का सिद्दांत लागू किया जिसके अंतर्गत गोद निषेध प्रणाली को लागू किया गया| इस नीति के द्वारा सतारा, झाँसी, जयपुर, उदयपुर, संभलपुर, नागपुर आदि को हस्तगत किया गया| - 1856 में इसने अवध को कुशासन के आरोप के आधार पर हस्तगत किया| इस प्रकार डलहौजी ने भारतीय रियासतों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण की नीति अपनाई एवं ब्रिटिश साम्राज्य को विस्तार प्रदान किया| डलहौजी का अत्यधिक हस्तक्षेप 1857 की क्रांति के महत्वपूर्ण कारण के रूप में स्वीकार किया गया था|
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आर्थिक असमानता कल्याणकारी राज्य की बड़ी समस्या है। विभिन्न रिपोर्ट ने भारत में आर्थिक असमानता की स्थिति को संवेदनशील मुद्दे के रूप में चिन्हित किया है। इस कथन के संदर्भ को स्पष्ट करते हुए भारत में विद्यमान इस समस्या के कारणों और सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों का विवरण दीजिए। (150-200 शब्द) Economic inequality is a major problem of the welfare state. Various reports have identified the situation of economic inequality in India as a sensitive issue. Explain the context of this statement and describe the reasons for this problem in India and the efforts being made by the government. (150-200 words)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: विभिन्न रिपोर्ट का संदर्भ देते हुए उत्तर आरंभ कीजिए। इसके बाद भारत में आर्थिक असमानता के कारणों को लिखिए अंत में सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों पर चर्चा कीजिए। आर्थिक असमानता धारित संपत्ति, प्राप्त आय अथवा किये गए व्ययों में अंतर के रूप में परिभाषित की जाती है| इन्ही चरों के आधार पर आर्थिक असमानता को प्रदर्शित भी किया जाता है| ऑक्सफेम ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि भारत में आर्थिक असमानता पिछले तीन दशकों से बढ़ रही है| रिपोर्ट के अनुसार 2017 में देश में अर्जित कुल संपत्ति का 73 प्रतिशत भाग देश की एक प्रतिशत जनसंख्या के खाते में गया है| इसी सर्वे में यह भी बताया गया है की 67 करोड़ भारतीयों की संपत्ति में केवल 1 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है| इन आंकड़ों से भारत में व्यापक आर्थिक असमानता की स्थिति का पता चलता है| भारत में व्यापक आर्थिक असमानता के लिए उत्तरदायीकारक भारत में भूमि एवं संपत्ति के स्वामित्व में व्यापक असमानता देखने को मिलती है| स्वामित्व में असमानता के कारण लोगों की आय और व्यय में व्यापक अंतर देखने को मिलता है| इसके कारण आर्थिक असमानता में वृद्धि हुई है| आय अंतराल लोगों की शिक्षा तथा प्रशिक्षण तक पहुँच को भी प्रभावित करता है| अधिक आय वर्ग के लोगों की उचित एवं आवश्यक शिक्षा तक आसानी से पहुँच होती है जबकि निम्न आय वर्ग के लोग अपेक्षित शिक्षा & प्रशिक्षण को नहीं प्राप्त कर पाते| इसका प्रभाव उनके द्वारा अवसरों तक पहुँच पर पड़ता है| अवसरों तक पहुँच में असमानता आर्थिक असमानता का रूप धारण कर लेती है| भारत में पूँजी संसाधन की कमी का प्रभाव भारत की अवसंरचना पर पड़ता है जो अंततः विकास प्रक्रिया को बाधित करता है| कुछ क्षेत्रों में बेहतर अवसंरचना का विकास जबकि कुछ क्षेत्रों में अवसंरचना का निम्न विकास लोगों की आय में अंतर को उत्पन्न करता है जिससे आर्थिक असमानता बढ़ने लगती है| भारत की अधिकाँश जनसंख्या कृषि कार्यों में लगी हुई है| कृषि उत्पादन में अन्तर, भूमि की उत्पादकता में अंतर, आगतों की उपलब्धता आदि कारणों से कृषि आय में अंतर आता है| इससे आर्थिक असमानता बढ़ती है| भारत एक विकासशील अर्थव्यवस्था है| भारतीय अर्थव्यवस्था के अनेकों क्षेत्रों में अभी तकनीकी पिछड़ेपन को देखा जा सकता है| तकनीकी पिछडापन उत्पादन में कमी के लिए उत्तरदायी है| इसके साथ ही कुछ क्षेत्रों में अत्याधुनिक तकनीकों का भी प्रयोग किया जा रहा है| तकनीकी प्रयोग में अंतर भी आर्थिक असमानता के प्रमुख कारणों में से एक है| भारत में विभिन्न आय वर्ग हैं| इन वर्गों की क्षमताएं इनकी आय के अनुरूप हैं| क्षमताओं में अंतर आर्थिक असमानता की वृद्धि में सहायक है विकासात्मक व्ययों में रिसाव की समस्या, समावेशी विकास को बाधित करती है| सरकारी सुविधाओं तक पहुँच में असमानता आर्थिक असमानता की वृद्धि के लिए उत्तरदायी कारकों में से एक है, इसी प्रकार भारत में बेरोजगारी और गरीबी की समस्या भी व्यापक आर्थिक असमानता के लिए उत्तरदायी हैं| आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए सरकार द्वारा किये गए प्रयास भूमि सुधार कार्यक्रम के माध्यम से संपत्ति एवं भूमि पर स्वामित्व की असमानता को कम करने का प्रयास किया गया है| कल्याणकारी स्वरुप के अंतर्गत भारत सरकार ने कल्याण के दृष्टिकोण से सार्वजनिक क्षेत्रक की स्थापना की है| यह आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए सहायक है| संसाधनों के संकेन्द्रण को रोकने के लिए तथा गरीबों की सहज वित्त की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार द्वारा बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया है| सामाजिक-आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए भारत सरकार ने सकारात्मक भेदभाव की नीति अपनाई है और इसके अंतर्गत वंचित अथवा कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गयी है| भारत एक कल्याणकारी राज्य है| कल्याण कार्यों के सुचारू संचालन के लिए राजस्व की आवाश्यकता होती है| राजस्व प्राप्ति के लिए भारत सरकार ने प्रगतिशील कराधान की प्रणाली अपनाई है| सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों में अधिकतम रोजगार सृजन की क्षमता होती है| अधिकतम रोजगार सृजन लोगों के आय स्तर में वृद्धि करने में सहायक होगा| इसी उद्देश्य से भारत सरकार MSME का संरक्षण और प्रोत्साहन कर रही है| इनके अतिरिक्त भारत सरकार विभिन्न विकासात्मक कार्यक्रम,वित्तीय समावेशन, कृषि विकास, सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम,कौशल विकास कार्यक्रम तथा निर्धनता उन्मूलन एवं रोजगार सृजन कार्यक्रमों का संचालन कर रही है। उपरोक्त प्रयासों के बाद भी भारत में अभी भी व्यापक आर्थिक असमानता देखने को मिलती है| इससे स्पष्ट होता है कि आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए भारत सरकार को और प्रभावी प्रयास करने की आवश्यकता है|इस दिशा में कौशल विकास, क्षमता संवर्धन, सशक्तिकरण आदि उपाय प्रभावी हो सकते हैं|
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##Question:आर्थिक असमानता कल्याणकारी राज्य की बड़ी समस्या है। विभिन्न रिपोर्ट ने भारत में आर्थिक असमानता की स्थिति को संवेदनशील मुद्दे के रूप में चिन्हित किया है। इस कथन के संदर्भ को स्पष्ट करते हुए भारत में विद्यमान इस समस्या के कारणों और सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों का विवरण दीजिए। (150-200 शब्द) Economic inequality is a major problem of the welfare state. Various reports have identified the situation of economic inequality in India as a sensitive issue. Explain the context of this statement and describe the reasons for this problem in India and the efforts being made by the government. (150-200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: विभिन्न रिपोर्ट का संदर्भ देते हुए उत्तर आरंभ कीजिए। इसके बाद भारत में आर्थिक असमानता के कारणों को लिखिए अंत में सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों पर चर्चा कीजिए। आर्थिक असमानता धारित संपत्ति, प्राप्त आय अथवा किये गए व्ययों में अंतर के रूप में परिभाषित की जाती है| इन्ही चरों के आधार पर आर्थिक असमानता को प्रदर्शित भी किया जाता है| ऑक्सफेम ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि भारत में आर्थिक असमानता पिछले तीन दशकों से बढ़ रही है| रिपोर्ट के अनुसार 2017 में देश में अर्जित कुल संपत्ति का 73 प्रतिशत भाग देश की एक प्रतिशत जनसंख्या के खाते में गया है| इसी सर्वे में यह भी बताया गया है की 67 करोड़ भारतीयों की संपत्ति में केवल 1 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है| इन आंकड़ों से भारत में व्यापक आर्थिक असमानता की स्थिति का पता चलता है| भारत में व्यापक आर्थिक असमानता के लिए उत्तरदायीकारक भारत में भूमि एवं संपत्ति के स्वामित्व में व्यापक असमानता देखने को मिलती है| स्वामित्व में असमानता के कारण लोगों की आय और व्यय में व्यापक अंतर देखने को मिलता है| इसके कारण आर्थिक असमानता में वृद्धि हुई है| आय अंतराल लोगों की शिक्षा तथा प्रशिक्षण तक पहुँच को भी प्रभावित करता है| अधिक आय वर्ग के लोगों की उचित एवं आवश्यक शिक्षा तक आसानी से पहुँच होती है जबकि निम्न आय वर्ग के लोग अपेक्षित शिक्षा & प्रशिक्षण को नहीं प्राप्त कर पाते| इसका प्रभाव उनके द्वारा अवसरों तक पहुँच पर पड़ता है| अवसरों तक पहुँच में असमानता आर्थिक असमानता का रूप धारण कर लेती है| भारत में पूँजी संसाधन की कमी का प्रभाव भारत की अवसंरचना पर पड़ता है जो अंततः विकास प्रक्रिया को बाधित करता है| कुछ क्षेत्रों में बेहतर अवसंरचना का विकास जबकि कुछ क्षेत्रों में अवसंरचना का निम्न विकास लोगों की आय में अंतर को उत्पन्न करता है जिससे आर्थिक असमानता बढ़ने लगती है| भारत की अधिकाँश जनसंख्या कृषि कार्यों में लगी हुई है| कृषि उत्पादन में अन्तर, भूमि की उत्पादकता में अंतर, आगतों की उपलब्धता आदि कारणों से कृषि आय में अंतर आता है| इससे आर्थिक असमानता बढ़ती है| भारत एक विकासशील अर्थव्यवस्था है| भारतीय अर्थव्यवस्था के अनेकों क्षेत्रों में अभी तकनीकी पिछड़ेपन को देखा जा सकता है| तकनीकी पिछडापन उत्पादन में कमी के लिए उत्तरदायी है| इसके साथ ही कुछ क्षेत्रों में अत्याधुनिक तकनीकों का भी प्रयोग किया जा रहा है| तकनीकी प्रयोग में अंतर भी आर्थिक असमानता के प्रमुख कारणों में से एक है| भारत में विभिन्न आय वर्ग हैं| इन वर्गों की क्षमताएं इनकी आय के अनुरूप हैं| क्षमताओं में अंतर आर्थिक असमानता की वृद्धि में सहायक है विकासात्मक व्ययों में रिसाव की समस्या, समावेशी विकास को बाधित करती है| सरकारी सुविधाओं तक पहुँच में असमानता आर्थिक असमानता की वृद्धि के लिए उत्तरदायी कारकों में से एक है, इसी प्रकार भारत में बेरोजगारी और गरीबी की समस्या भी व्यापक आर्थिक असमानता के लिए उत्तरदायी हैं| आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए सरकार द्वारा किये गए प्रयास भूमि सुधार कार्यक्रम के माध्यम से संपत्ति एवं भूमि पर स्वामित्व की असमानता को कम करने का प्रयास किया गया है| कल्याणकारी स्वरुप के अंतर्गत भारत सरकार ने कल्याण के दृष्टिकोण से सार्वजनिक क्षेत्रक की स्थापना की है| यह आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए सहायक है| संसाधनों के संकेन्द्रण को रोकने के लिए तथा गरीबों की सहज वित्त की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार द्वारा बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया है| सामाजिक-आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए भारत सरकार ने सकारात्मक भेदभाव की नीति अपनाई है और इसके अंतर्गत वंचित अथवा कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गयी है| भारत एक कल्याणकारी राज्य है| कल्याण कार्यों के सुचारू संचालन के लिए राजस्व की आवाश्यकता होती है| राजस्व प्राप्ति के लिए भारत सरकार ने प्रगतिशील कराधान की प्रणाली अपनाई है| सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों में अधिकतम रोजगार सृजन की क्षमता होती है| अधिकतम रोजगार सृजन लोगों के आय स्तर में वृद्धि करने में सहायक होगा| इसी उद्देश्य से भारत सरकार MSME का संरक्षण और प्रोत्साहन कर रही है| इनके अतिरिक्त भारत सरकार विभिन्न विकासात्मक कार्यक्रम,वित्तीय समावेशन, कृषि विकास, सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम,कौशल विकास कार्यक्रम तथा निर्धनता उन्मूलन एवं रोजगार सृजन कार्यक्रमों का संचालन कर रही है। उपरोक्त प्रयासों के बाद भी भारत में अभी भी व्यापक आर्थिक असमानता देखने को मिलती है| इससे स्पष्ट होता है कि आर्थिक असमानता में कमी लाने के लिए भारत सरकार को और प्रभावी प्रयास करने की आवश्यकता है|इस दिशा में कौशल विकास, क्षमता संवर्धन, सशक्तिकरण आदि उपाय प्रभावी हो सकते हैं|
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Discuss the Vedanta philosophy in brief. And also give an account of Adi Sankaracharya’s contribution towards Vedanta philosophy. (150 words) 10 marks
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Approach: · Introduction – brief discussion about the origin of Vedanta philosophy · Discuss the principles of Vedanta philosophy · Give points about the contribution of Adi Shankaracharya’s contribution · Conclusion Answer: The origin of the Vedanta philosophy can be traced back to the 2nd century BCE. Badrayan is considered as the propounder of the Vedanta philosophy. According to him, there is only one reality that is Brahma and everything else is a myth. According to the Vedanta philosophy, Atma or consciousness is similar to the Brahma. It implies that both are equal. It also established that salvation can be achieved only through self- knowledge. There are two important streams of Vedanta philosophy: Advaita Vedanta: It was established by Adi Sankaracharya. According to it, there is no special attribute of Brahma. He suggested the path of knowledge for the achievement of salvation. Vishishta Advaitvada: It was established by Ramanuja during the 12th century BCE. According to him, Brahma has special attributes. He considers loving the faith and practicing the devotion as the means to attain salvation. Contribution of Adi Sankaracharya The advent of Adi Sankara is a landmark event in the history of Indian philosophy and religion. His teachings reveal the truth of the Supreme Brahman. Among his major contributions are: Shankaracharya explained the basic ideas of Upanishads. He helped in the evolution of the Vedanta philosophy by adding new dimensions to the Vedanta philosophy. His idea of Adaitvada was recognised all over India. He advocated the oldest concept of Hinduism which explains the unification of the soul (atman) with the Supreme Soul (Nirguna Brahman). One of Shankaracharya’s most important works is his efforts to synthesize the six sub-sects, known as ‘Shanmata.’ ‘Shanmata’ meaning ‘six religions,’ is the worship of six supreme deities. Shankaracharya explained the existence of one Supreme Being (Brahman) and that the six supreme deities are part of one divine power. He also founded ‘Dashanami Sampradaya,’ which talks about leading a monastic life. While Shankaracharya was a firm believer in ancient Hinduism, he condemned the ‘Mimamsa school of Hinduism’ which was purely based on ritual practices. He wrote many commentaries on the Upanishads and the Bhagavad Gita. This helped in propagating his ideas. Throughout the course of his journey, Shankaracharya discussed his ideas with various other philosophers and fine-tuned his own teachings from time to time. Shankaracharya founded four monasteries (mathas) that continue to spread his teachings. Hence, Adi Sankaracharya led to the revival of the Vedanta philosophy in India. The Advaita Siddhanta he established has inspired many schools of thought, Visishtadvaita, Dvaita, Suddhadvaita, and so on. Though each of these schools is aligned to Vedanta, the paths adopted differ; but they concur that the ultimate goal of human existence is to get a release from the cycle of birth.
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##Question:Discuss the Vedanta philosophy in brief. And also give an account of Adi Sankaracharya’s contribution towards Vedanta philosophy. (150 words) 10 marks##Answer:Approach: · Introduction – brief discussion about the origin of Vedanta philosophy · Discuss the principles of Vedanta philosophy · Give points about the contribution of Adi Shankaracharya’s contribution · Conclusion Answer: The origin of the Vedanta philosophy can be traced back to the 2nd century BCE. Badrayan is considered as the propounder of the Vedanta philosophy. According to him, there is only one reality that is Brahma and everything else is a myth. According to the Vedanta philosophy, Atma or consciousness is similar to the Brahma. It implies that both are equal. It also established that salvation can be achieved only through self- knowledge. There are two important streams of Vedanta philosophy: Advaita Vedanta: It was established by Adi Sankaracharya. According to it, there is no special attribute of Brahma. He suggested the path of knowledge for the achievement of salvation. Vishishta Advaitvada: It was established by Ramanuja during the 12th century BCE. According to him, Brahma has special attributes. He considers loving the faith and practicing the devotion as the means to attain salvation. Contribution of Adi Sankaracharya The advent of Adi Sankara is a landmark event in the history of Indian philosophy and religion. His teachings reveal the truth of the Supreme Brahman. Among his major contributions are: Shankaracharya explained the basic ideas of Upanishads. He helped in the evolution of the Vedanta philosophy by adding new dimensions to the Vedanta philosophy. His idea of Adaitvada was recognised all over India. He advocated the oldest concept of Hinduism which explains the unification of the soul (atman) with the Supreme Soul (Nirguna Brahman). One of Shankaracharya’s most important works is his efforts to synthesize the six sub-sects, known as ‘Shanmata.’ ‘Shanmata’ meaning ‘six religions,’ is the worship of six supreme deities. Shankaracharya explained the existence of one Supreme Being (Brahman) and that the six supreme deities are part of one divine power. He also founded ‘Dashanami Sampradaya,’ which talks about leading a monastic life. While Shankaracharya was a firm believer in ancient Hinduism, he condemned the ‘Mimamsa school of Hinduism’ which was purely based on ritual practices. He wrote many commentaries on the Upanishads and the Bhagavad Gita. This helped in propagating his ideas. Throughout the course of his journey, Shankaracharya discussed his ideas with various other philosophers and fine-tuned his own teachings from time to time. Shankaracharya founded four monasteries (mathas) that continue to spread his teachings. Hence, Adi Sankaracharya led to the revival of the Vedanta philosophy in India. The Advaita Siddhanta he established has inspired many schools of thought, Visishtadvaita, Dvaita, Suddhadvaita, and so on. Though each of these schools is aligned to Vedanta, the paths adopted differ; but they concur that the ultimate goal of human existence is to get a release from the cycle of birth.
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वेलेजली द्वारा साम्राज्य-विस्तार हेतु अपनाई गई नीतियों की संक्षेप में चर्चा करते हुए वेलेजली के समय भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के विस्तार पर प्रकाश डालिए|(150-200 शब्द) Briefly discuss the policies adopted for the expansion of empire by Wellesley, throw light on the expansion of English empire in India at the time of Wellesley. (150-200 words)
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दृष्टिकोण 1. भूमिका में वेलेजली के समय की स्थितियों को स्पष्ट कीजिये| 2. वेलेजली द्वारा साम्राज्य-विस्तार हेतु अपनाई गई युद्ध एवं संधि नीति की संक्षेप में चर्चा कीजिये| 3. वेलेजली के समय भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के विस्तार की चर्चा कीजिये| उत्तर: भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की सुदृढ़ताएवं विस्तार के लिएगवर्नर-जनरल लॉर्ड वेलेजली 1798 में भारत आया एवं 1805 तक उसनेब्रिटिश भारत का मानचित्र ही बदल दिया| वेलेजली के द्वाराब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार हेतुयुद्ध एवं संधि दोनों नीतियां अपनाई| वस्तुतः वेलेजली के आगमन के समय सम्पूर्ण यूरोप में नेपोलियन का खतरा व्याप्त था एवं अंग्रेज अपने उपनिवेशों को सुरक्षित रखना चाहते थे इसी क्रम में वेलेजली भारत आया एवंब्रिटिश साम्राज्य की सुदृढ़ता एवं विस्तार की दिशा में नीति अपनाना शुरू किया| वेलेजली द्वारा साम्राज्य-विस्तार हेतु अपनाई गई नीतियां: वेलेजली द्वाराब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार हेतु ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार हेतु युद्ध एवं संधि दोनों नीतियां अपनाई एवं संधि दोनों नीतियां अपनाई| युद्ध नीति: 1. चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध: इस युद्ध के समय टीपू ने अंग्रेजों से मुकाबले के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग लेने की दिशा में प्रयास किया, इसने नेपोलियन से भी पत्र व्यवहार किया। चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध के परिणाम के रूप में अंग्रेजों की विजय हुई।1799 ई. में अंग्रेजों ने मैसूर के साथ सहायक संधि की। अंग्रेजों ने मैसूर की गद्दी पर फिर से आड्यार वंश के एक बालक कृष्णराय को बिठा दिया तथा कनारा,कोयंबटूर और श्रीरंगपट्टनम् को अपने राज्य में मिला लिया। 2. द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध: बाजीराव द्वितीय द्वारा अंग्रेजों के साथ बसीन की संधि कर ली गई जोकि एक सहायक संधि थी| उसे अंग्रेजों के संरक्षण में पुनः पेशवा बना दिया गया। किन्तु बसीन की संधि से मराठा सरदारों के आत्मगौरव पर भारी आघात पहुँचा,क्योंकि पेशवा ने मराठों की इज्जत व स्वतंत्रता बेची दी थी।मराठा सरदार इसे सहन नहीं कर सके। सिंधिया और भोंसले ने एक होकर अंग्रेजों के विरुद्ध सैनिक अभियान की तैयारी आरंभ की। जब वेलेजली को इसकी सूचना मिली तो उसने 7 अगस्त,1803 को मराठों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी| संधि नीति: अंग्रेजों द्वारा उपयोग की जाने वाली सहायकसंधि नीति"गैर-हस्तक्षेप नीति" थी। इस प्रणाली के अनुसार, भारत के सहायक संधि करने वालेशासक को ब्रिटिश सेना के रखरखाव के लिए अंग्रेजों कोधनदेना स्वीकार करना पड़ता था।रियासतों को स्वतंत्र सशस्त्र बल रखने की अनुमति नहीं थी।शासक अपने राज्य में एक ब्रिटिशरेजिडेंटको स्वीकार करते थे| बदले में, ब्रिटिश उन्हें दुश्मनों से सुरक्षित रखने का वचन देते थे| सहायक संधि की नीति नेब्रिटिश साम्राज्य को बहुत विस्तार दिया। सहायक संधिने कंपनी की शक्ति और संसाधनों में वृद्धि की| कंपनी नेदेशी शक्तियोंके खर्चपर एक विशाल सेना का निर्माण किया जिसने कंपनी को सुरक्षा प्रदान की साथ ही इस सेना ने स्थानीय रियासतों में होने वाले विद्रोहों का दमन भी किया| ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा कमांड की गई कंपनी के सैनिकों को देशी राजकुमारों के क्षेत्रों पर स्थापित किया गया था जिससे रियासतों में कम्पनी के विरोध की संभावनाएं समाप्त हो गई| विदेश सम्बन्ध कंपनी ने अपने हाथ में रखे जिससे स्थानीय शासकों के परस्पर सहयोग की सभी सम्भावनायें समाप्त हो गई| भारतीय शासकों द्वारा अपनी सेनाओं को भंगकरना पड़ापरिणामस्वरूप सुरक्षा हेतु वह पूरी तरह से कंपनी पर निर्भर हो गए| वस्तुतः सहायक संधि ने बिना युद्ध के ही कम्पनी के साम्राज्य को अत्यधिक विस्तार प्रदान किया| बहुत ही अल्प-समय मेंहैदराबाद (1798); मैसूर (1799); तंजौर (1799); अवध (1801); मराठा(1802); सिंधिया(1803); गायकवाड़(1803) आदि; जैसी बड़ी रियासतें ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल हो गई| इस प्रकार वेलेजली नेयुद्ध एवं संधि की नीति के द्वाराब्रिटिश साम्राज्य को सुदृढ़ता प्रदान की एवं महत्वपूर्ण रूप से विस्तार प्रदान किया|
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##Question:वेलेजली द्वारा साम्राज्य-विस्तार हेतु अपनाई गई नीतियों की संक्षेप में चर्चा करते हुए वेलेजली के समय भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के विस्तार पर प्रकाश डालिए|(150-200 शब्द) Briefly discuss the policies adopted for the expansion of empire by Wellesley, throw light on the expansion of English empire in India at the time of Wellesley. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1. भूमिका में वेलेजली के समय की स्थितियों को स्पष्ट कीजिये| 2. वेलेजली द्वारा साम्राज्य-विस्तार हेतु अपनाई गई युद्ध एवं संधि नीति की संक्षेप में चर्चा कीजिये| 3. वेलेजली के समय भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के विस्तार की चर्चा कीजिये| उत्तर: भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की सुदृढ़ताएवं विस्तार के लिएगवर्नर-जनरल लॉर्ड वेलेजली 1798 में भारत आया एवं 1805 तक उसनेब्रिटिश भारत का मानचित्र ही बदल दिया| वेलेजली के द्वाराब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार हेतुयुद्ध एवं संधि दोनों नीतियां अपनाई| वस्तुतः वेलेजली के आगमन के समय सम्पूर्ण यूरोप में नेपोलियन का खतरा व्याप्त था एवं अंग्रेज अपने उपनिवेशों को सुरक्षित रखना चाहते थे इसी क्रम में वेलेजली भारत आया एवंब्रिटिश साम्राज्य की सुदृढ़ता एवं विस्तार की दिशा में नीति अपनाना शुरू किया| वेलेजली द्वारा साम्राज्य-विस्तार हेतु अपनाई गई नीतियां: वेलेजली द्वाराब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार हेतु ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार हेतु युद्ध एवं संधि दोनों नीतियां अपनाई एवं संधि दोनों नीतियां अपनाई| युद्ध नीति: 1. चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध: इस युद्ध के समय टीपू ने अंग्रेजों से मुकाबले के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग लेने की दिशा में प्रयास किया, इसने नेपोलियन से भी पत्र व्यवहार किया। चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध के परिणाम के रूप में अंग्रेजों की विजय हुई।1799 ई. में अंग्रेजों ने मैसूर के साथ सहायक संधि की। अंग्रेजों ने मैसूर की गद्दी पर फिर से आड्यार वंश के एक बालक कृष्णराय को बिठा दिया तथा कनारा,कोयंबटूर और श्रीरंगपट्टनम् को अपने राज्य में मिला लिया। 2. द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध: बाजीराव द्वितीय द्वारा अंग्रेजों के साथ बसीन की संधि कर ली गई जोकि एक सहायक संधि थी| उसे अंग्रेजों के संरक्षण में पुनः पेशवा बना दिया गया। किन्तु बसीन की संधि से मराठा सरदारों के आत्मगौरव पर भारी आघात पहुँचा,क्योंकि पेशवा ने मराठों की इज्जत व स्वतंत्रता बेची दी थी।मराठा सरदार इसे सहन नहीं कर सके। सिंधिया और भोंसले ने एक होकर अंग्रेजों के विरुद्ध सैनिक अभियान की तैयारी आरंभ की। जब वेलेजली को इसकी सूचना मिली तो उसने 7 अगस्त,1803 को मराठों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी| संधि नीति: अंग्रेजों द्वारा उपयोग की जाने वाली सहायकसंधि नीति"गैर-हस्तक्षेप नीति" थी। इस प्रणाली के अनुसार, भारत के सहायक संधि करने वालेशासक को ब्रिटिश सेना के रखरखाव के लिए अंग्रेजों कोधनदेना स्वीकार करना पड़ता था।रियासतों को स्वतंत्र सशस्त्र बल रखने की अनुमति नहीं थी।शासक अपने राज्य में एक ब्रिटिशरेजिडेंटको स्वीकार करते थे| बदले में, ब्रिटिश उन्हें दुश्मनों से सुरक्षित रखने का वचन देते थे| सहायक संधि की नीति नेब्रिटिश साम्राज्य को बहुत विस्तार दिया। सहायक संधिने कंपनी की शक्ति और संसाधनों में वृद्धि की| कंपनी नेदेशी शक्तियोंके खर्चपर एक विशाल सेना का निर्माण किया जिसने कंपनी को सुरक्षा प्रदान की साथ ही इस सेना ने स्थानीय रियासतों में होने वाले विद्रोहों का दमन भी किया| ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा कमांड की गई कंपनी के सैनिकों को देशी राजकुमारों के क्षेत्रों पर स्थापित किया गया था जिससे रियासतों में कम्पनी के विरोध की संभावनाएं समाप्त हो गई| विदेश सम्बन्ध कंपनी ने अपने हाथ में रखे जिससे स्थानीय शासकों के परस्पर सहयोग की सभी सम्भावनायें समाप्त हो गई| भारतीय शासकों द्वारा अपनी सेनाओं को भंगकरना पड़ापरिणामस्वरूप सुरक्षा हेतु वह पूरी तरह से कंपनी पर निर्भर हो गए| वस्तुतः सहायक संधि ने बिना युद्ध के ही कम्पनी के साम्राज्य को अत्यधिक विस्तार प्रदान किया| बहुत ही अल्प-समय मेंहैदराबाद (1798); मैसूर (1799); तंजौर (1799); अवध (1801); मराठा(1802); सिंधिया(1803); गायकवाड़(1803) आदि; जैसी बड़ी रियासतें ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल हो गई| इस प्रकार वेलेजली नेयुद्ध एवं संधि की नीति के द्वाराब्रिटिश साम्राज्य को सुदृढ़ता प्रदान की एवं महत्वपूर्ण रूप से विस्तार प्रदान किया|
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NSSO के अनुसार, भारत में श्रम का अनौपचारीकरण बढा है| इसके लिए उत्तरदायी कारणों के रूप में श्रम कानूनों की सीमाएं स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही श्रम सुधार के सन्दर्भ में सरकार की पहलों का वर्णन कीजिये| (150 से 200 शब्द) According to NSSO, informalization of labor has increased in India. Explain the limitations of labor laws as the responsible reasons for this. Also, describe the initiatives of the government in the context of labor reform. (150 to 200 words)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में NSSO आंकड़ों के माध्यम से श्रम के अनौपचारीकरण को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में श्रम के अनौपचारीकरण के कारण के रूप में श्रम कानूनों की सीमाओं को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में श्रम सुधार की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये 4- तीसरे भाग में श्रम सुधार के सन्दर्भ में सरकार की पहलों का वर्णन कीजिये 5- अंतिम में सुधारों का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये NSSO के वर्ष 2011-12 रोजगार सम्बन्धी आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि भारत की रोजगार संरचना में औपचारिक रोजगार का योगदान कुल 8 % है | इसमें 7.7 % रोजगार संगठित क्षेत्र में था जबकि 0.3 % रोजगार असंगठित क्षेत्र था| कुल रोजगार में अनौपचारिक रोजगार 92 % था जिसमें 9.3% संगठित क्षेत्र में था जबकि 82.7 % रोजगार असंगठित क्षेत्र में था| आंकड़ों का विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि अल्प विकसित देश होने कारण भारत में संगठित क्षेत्र छोटा है | भारत में कुल 17 % लोग संगठित क्षेत्र में कार्यरत है| संगठित क्षेत्र में भी अधिकाँश रोजगार(9.3%) अनौपचारिक है इसके कारण रोजगार/श्रमबल का अनौपचारीकरण हो गया है| संगठित क्षेत्र अनौपचारिक रोजगार अधिक सृजित हो रहा है और औपचारिक रोजगार का सृजन नहीं हो पा रहा है| श्रम का अनौपचारीकरण श्रमिकों और नियोक्ताओं दोनों पर नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करता है| श्रम के अनौपचारीकरण का प्रमुख कारण श्रम कानूनों को माना जाता है क्योंकि श्रम कानूनों के कारण भारत की संगठित क्षेत्र (बड़ी फर्में) औपचारिक रोजगार का सृजन नहीं कर पा रही हैं| श्रम अधिनियम की सीमाएं नियुक्ति एवं निष्कासन के लिए जटिल कानूनों की उपस्थिति निष्कासन की प्रक्रिया अपेक्षाकृत रूप से अधिक जटिल है जिसके कारण नियोक्ता औपचारिक रोजगार देने से बचता है| इसी कारण हमारा श्रम अधिनियम केवल 8 % श्रम बल का संरक्षण कर पा रहा है अतः श्रम कानूनों को श्रमिक एवं नियोक्ता दोनों के हितों के साथ संतुलित किये जाने की आवश्यकता है अति विनियमन एवं जटिलता श्रम कानूनों के अंतर्गत 44 अधिनियमों की उपस्थिति है इसके साथ ही कानूनों की भाषा एवं उनका स्वरुप जटिल है इसके कारण के कारण अधिनियमों का अनुपालन कठिन हो जाता है और इंस्पेक्टर राज एवं भ्रष्टाचार की समस्या बढती है इसके साथ ही कार्य की स्थिति एवं कर्मचारियों की सुरक्षा के उच्च मानदंड होने के कारण अधिकाँश फर्में इन मानदंडों को पूर्ण नहीं कर पाती हैं इसके कारण नियोक्ता औपचारिक रोजगार के लिए हतोत्साहित होता है श्रम कानूनों की सीमाओं के परिणाम श्रम कानूनों की उपरोक्त सीमाओं के कारण व्यावसायिक सुगमता में ह्रास, निवेश में कमी, कम रोजगार सृजन आदि परिणाम देखने को मिलते हैं| इससे निवेश में कमी आएगी और आने वाला निवेश पूँजी प्रधान निवेश होता है अथवा स्वचालन को प्रेरित होता है| इससे स्पष्ट होता है कि भारत में श्रम सुधार आवश्यक हैं| इसी सन्दर्भ में मेक इन इंडिया पहल में सरकार ने श्रम कानूनों में सुधार के निम्नलिखित प्रयास किये हैं श्रम सुधार के पहलू श्रम अधिनियमों में चार पहलुओं पर विशेष बल दिया गया है यथा वेतन सम्बन्धी, सामाजिक सुरक्षा(PF पेंशन, बीमा) कर्मचारियों की सुरक्षा एवं कार्य की स्थिति/पर्यावरण के मानदंड एवं औद्योगिक/श्रमिक विवाद| अतः 44 अधिनियमों को घटा कर उपरोक्त चार पहलुओं के अंतर्गत 4 संहिताओं में बदल दिया जाएगा इसके अतिरिक्त सरकार ने वर्ष 2018 स्थिर समयावधि रोजगार के लिए कानून बनाया है| इसमें कोई फर्म कर्मचारियों को एक निर्धारित समयावधि हेतु नियुक्त कर सकती है परन्तु उनका वेतन स्थायी कर्मचारियों से कम नहीं होना चाहिए| वेतन में समानता होने के कारण स्थायी एवं औपचारिक रोजगार के सृजन को प्रोत्साहन मिलेगा| इसमें अनुबंधित समयावधि समाप्त होने पर कर्मचारी को बिना नोटिस दिए एवं बिना जटिलता के निष्कासित किया जा सकेगा| जो कर्मचारी 3 महीने या अधिक से अनौपचारिक रोजगार के रूप में काम कर रहे हैं उन्हें 15 दिन की नोटिस पर निकाला जा सकता है| इससे अति विनियमन की समस्या के समाधान के साथ ही कानूनों में अस्पष्टता की समस्या समाप्त होगी| इसके साथ ही स्थायी एवं औपचारिक रोजगार के सृजन को प्रोत्साहन मिलेगा| जिससे रोजगार के अवसरों को बढाने में सहायता मिलेगी और भारत से बेरोजगारी की समस्या को कम करने में सहायता मिलेगी|
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##Question:NSSO के अनुसार, भारत में श्रम का अनौपचारीकरण बढा है| इसके लिए उत्तरदायी कारणों के रूप में श्रम कानूनों की सीमाएं स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही श्रम सुधार के सन्दर्भ में सरकार की पहलों का वर्णन कीजिये| (150 से 200 शब्द) According to NSSO, informalization of labor has increased in India. Explain the limitations of labor laws as the responsible reasons for this. Also, describe the initiatives of the government in the context of labor reform. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में NSSO आंकड़ों के माध्यम से श्रम के अनौपचारीकरण को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में श्रम के अनौपचारीकरण के कारण के रूप में श्रम कानूनों की सीमाओं को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में श्रम सुधार की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये 4- तीसरे भाग में श्रम सुधार के सन्दर्भ में सरकार की पहलों का वर्णन कीजिये 5- अंतिम में सुधारों का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये NSSO के वर्ष 2011-12 रोजगार सम्बन्धी आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि भारत की रोजगार संरचना में औपचारिक रोजगार का योगदान कुल 8 % है | इसमें 7.7 % रोजगार संगठित क्षेत्र में था जबकि 0.3 % रोजगार असंगठित क्षेत्र था| कुल रोजगार में अनौपचारिक रोजगार 92 % था जिसमें 9.3% संगठित क्षेत्र में था जबकि 82.7 % रोजगार असंगठित क्षेत्र में था| आंकड़ों का विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि अल्प विकसित देश होने कारण भारत में संगठित क्षेत्र छोटा है | भारत में कुल 17 % लोग संगठित क्षेत्र में कार्यरत है| संगठित क्षेत्र में भी अधिकाँश रोजगार(9.3%) अनौपचारिक है इसके कारण रोजगार/श्रमबल का अनौपचारीकरण हो गया है| संगठित क्षेत्र अनौपचारिक रोजगार अधिक सृजित हो रहा है और औपचारिक रोजगार का सृजन नहीं हो पा रहा है| श्रम का अनौपचारीकरण श्रमिकों और नियोक्ताओं दोनों पर नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करता है| श्रम के अनौपचारीकरण का प्रमुख कारण श्रम कानूनों को माना जाता है क्योंकि श्रम कानूनों के कारण भारत की संगठित क्षेत्र (बड़ी फर्में) औपचारिक रोजगार का सृजन नहीं कर पा रही हैं| श्रम अधिनियम की सीमाएं नियुक्ति एवं निष्कासन के लिए जटिल कानूनों की उपस्थिति निष्कासन की प्रक्रिया अपेक्षाकृत रूप से अधिक जटिल है जिसके कारण नियोक्ता औपचारिक रोजगार देने से बचता है| इसी कारण हमारा श्रम अधिनियम केवल 8 % श्रम बल का संरक्षण कर पा रहा है अतः श्रम कानूनों को श्रमिक एवं नियोक्ता दोनों के हितों के साथ संतुलित किये जाने की आवश्यकता है अति विनियमन एवं जटिलता श्रम कानूनों के अंतर्गत 44 अधिनियमों की उपस्थिति है इसके साथ ही कानूनों की भाषा एवं उनका स्वरुप जटिल है इसके कारण के कारण अधिनियमों का अनुपालन कठिन हो जाता है और इंस्पेक्टर राज एवं भ्रष्टाचार की समस्या बढती है इसके साथ ही कार्य की स्थिति एवं कर्मचारियों की सुरक्षा के उच्च मानदंड होने के कारण अधिकाँश फर्में इन मानदंडों को पूर्ण नहीं कर पाती हैं इसके कारण नियोक्ता औपचारिक रोजगार के लिए हतोत्साहित होता है श्रम कानूनों की सीमाओं के परिणाम श्रम कानूनों की उपरोक्त सीमाओं के कारण व्यावसायिक सुगमता में ह्रास, निवेश में कमी, कम रोजगार सृजन आदि परिणाम देखने को मिलते हैं| इससे निवेश में कमी आएगी और आने वाला निवेश पूँजी प्रधान निवेश होता है अथवा स्वचालन को प्रेरित होता है| इससे स्पष्ट होता है कि भारत में श्रम सुधार आवश्यक हैं| इसी सन्दर्भ में मेक इन इंडिया पहल में सरकार ने श्रम कानूनों में सुधार के निम्नलिखित प्रयास किये हैं श्रम सुधार के पहलू श्रम अधिनियमों में चार पहलुओं पर विशेष बल दिया गया है यथा वेतन सम्बन्धी, सामाजिक सुरक्षा(PF पेंशन, बीमा) कर्मचारियों की सुरक्षा एवं कार्य की स्थिति/पर्यावरण के मानदंड एवं औद्योगिक/श्रमिक विवाद| अतः 44 अधिनियमों को घटा कर उपरोक्त चार पहलुओं के अंतर्गत 4 संहिताओं में बदल दिया जाएगा इसके अतिरिक्त सरकार ने वर्ष 2018 स्थिर समयावधि रोजगार के लिए कानून बनाया है| इसमें कोई फर्म कर्मचारियों को एक निर्धारित समयावधि हेतु नियुक्त कर सकती है परन्तु उनका वेतन स्थायी कर्मचारियों से कम नहीं होना चाहिए| वेतन में समानता होने के कारण स्थायी एवं औपचारिक रोजगार के सृजन को प्रोत्साहन मिलेगा| इसमें अनुबंधित समयावधि समाप्त होने पर कर्मचारी को बिना नोटिस दिए एवं बिना जटिलता के निष्कासित किया जा सकेगा| जो कर्मचारी 3 महीने या अधिक से अनौपचारिक रोजगार के रूप में काम कर रहे हैं उन्हें 15 दिन की नोटिस पर निकाला जा सकता है| इससे अति विनियमन की समस्या के समाधान के साथ ही कानूनों में अस्पष्टता की समस्या समाप्त होगी| इसके साथ ही स्थायी एवं औपचारिक रोजगार के सृजन को प्रोत्साहन मिलेगा| जिससे रोजगार के अवसरों को बढाने में सहायता मिलेगी और भारत से बेरोजगारी की समस्या को कम करने में सहायता मिलेगी|
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Stating what is a drought, explain some ways of managing them. (10 Marks/150 words)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE MANAGEMENT OF DROUGHTS -CONCLUSION ANSWER:- Drought refers to a serious shortfall in the availability of water but not exclusively due to deficiency of rains. It results from a long period of dry weather and insufficient precipitation, which causes acute dry conditions. They can be caused due to both anthropogenic as well as natural causes such as delays in monsoons (even a 15 days delay causes huge disturbances), variation in its amount (even a 10% variation is announced as a deficiency), a negative Indian Ocean Dipole, the mismanagement between the supply and demand of water resources etc. THE MANAGEMENT OF DROUGHTS As per the NDMA Guidelines , the following measures are to be taken to manage droughts. The efforts to reduce the same should include measures to mitigate the anthropogenic effects. 1) RAIN-WATER HARVESTING AND CONSERVATION This to be done through the collection and channelling of rainwater. 2) SUSTAINABLE AGRICULTURE Practices such as growing coarse cereals, construction of check dams, ponds etc. should be inculcated. 2.1) The crops should be chosen depending on the rain availability- It should not like sugarcane in Vidarbha. 2.2) Mulching could be done where the soil is covered with organic residue 3) IDENTIFICATION OF GROUNDWATER POTENTIAL This is to be done through aquifer mapping, planning for interlinking of rivers. 4) DRIP AND SPRINKLER IRRIGATION This should also be promoted. 5) DROUGHT MONITORING It involves preparedness and response efforts. 6) DROUGHT MAPPING It involves the continuous observation of rainfall. If they are able to gauge the overall rain predictability, then the measures can be taken at the right time so important for mitigation. Example-Tamil Nadu grows 3 rice crops per year (in the Cauvery basin)- even grown when water is deficient. So, they can grow 2 crops with millets- There should be a change in livelihood and not too much dependency on agriculture, by giving them alternative employment 7) LIVELIHOOD PLANNING It involves identifying livelihoods that would be least affected by droughts such as cattle rearing etc. 8) CLOUD SEEDING This was done in Karnataka but it was not very successful- because proper monitoring of the atmosphere is needed. In this silver iodide is sprayed- It binds the water molecules to cause precipitation. The Drought Crisis Management Plan, 2015 is a suggestion made by the NDMA to the states. The suggestions involve providing employment through MGNREGA, strengthening of PDS- so that there is timely supply of food grains, recharge of groundwater- by building check dams (these are constructed on the small rivers for storage of water for sometimes at least, so that there will be some percolation of water- it will get overflowed on its own after some time), farm loan waivers or arranging for crop loss compensation.
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##Question:Stating what is a drought, explain some ways of managing them. (10 Marks/150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE MANAGEMENT OF DROUGHTS -CONCLUSION ANSWER:- Drought refers to a serious shortfall in the availability of water but not exclusively due to deficiency of rains. It results from a long period of dry weather and insufficient precipitation, which causes acute dry conditions. They can be caused due to both anthropogenic as well as natural causes such as delays in monsoons (even a 15 days delay causes huge disturbances), variation in its amount (even a 10% variation is announced as a deficiency), a negative Indian Ocean Dipole, the mismanagement between the supply and demand of water resources etc. THE MANAGEMENT OF DROUGHTS As per the NDMA Guidelines , the following measures are to be taken to manage droughts. The efforts to reduce the same should include measures to mitigate the anthropogenic effects. 1) RAIN-WATER HARVESTING AND CONSERVATION This to be done through the collection and channelling of rainwater. 2) SUSTAINABLE AGRICULTURE Practices such as growing coarse cereals, construction of check dams, ponds etc. should be inculcated. 2.1) The crops should be chosen depending on the rain availability- It should not like sugarcane in Vidarbha. 2.2) Mulching could be done where the soil is covered with organic residue 3) IDENTIFICATION OF GROUNDWATER POTENTIAL This is to be done through aquifer mapping, planning for interlinking of rivers. 4) DRIP AND SPRINKLER IRRIGATION This should also be promoted. 5) DROUGHT MONITORING It involves preparedness and response efforts. 6) DROUGHT MAPPING It involves the continuous observation of rainfall. If they are able to gauge the overall rain predictability, then the measures can be taken at the right time so important for mitigation. Example-Tamil Nadu grows 3 rice crops per year (in the Cauvery basin)- even grown when water is deficient. So, they can grow 2 crops with millets- There should be a change in livelihood and not too much dependency on agriculture, by giving them alternative employment 7) LIVELIHOOD PLANNING It involves identifying livelihoods that would be least affected by droughts such as cattle rearing etc. 8) CLOUD SEEDING This was done in Karnataka but it was not very successful- because proper monitoring of the atmosphere is needed. In this silver iodide is sprayed- It binds the water molecules to cause precipitation. The Drought Crisis Management Plan, 2015 is a suggestion made by the NDMA to the states. The suggestions involve providing employment through MGNREGA, strengthening of PDS- so that there is timely supply of food grains, recharge of groundwater- by building check dams (these are constructed on the small rivers for storage of water for sometimes at least, so that there will be some percolation of water- it will get overflowed on its own after some time), farm loan waivers or arranging for crop loss compensation.
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प्रवाल भित्ति से आप क्या समझते हैं ? प्रवाल भित्ति के निर्माण में सहायक कारकों की भूमिका का वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by a coral reefs? Describe the role of ancillary factors in the construction of coral reefs. (150-200 words, 10 Marks)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत प्रवाल भित्ति के आशय को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात प्रवाल भित्ति के निर्माण में सहायक कारको का उल्लेख करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - प्रवाल भित्तियां (Coral Reefs) प्रवाल भित्ति जैव विविधतापूर्ण अन्तः सागरीय स्थलाकृति हैं | ये विश्व के प्रमुख विविधतापूर्ण पारिस्थितिक तंत्रों में से एक हैं | इसलिए इन्हें सामुद्रिक वर्षावन भी कहा जाता है | इनका निर्माण सागरीय जंतु प्रवाल या कोरल पालिप के अस्थिपंजरों के समेकन तथा संयोजन द्वारा होता है | ये अस्थिपंजर कैल्शियम कार्बोनेट से बने होते हैं | सभी कोरल पालिप निदेरिया संघ से सम्बंधित होते हैं | प्रवाल ऊष्णकटिबंधीय महासागरों में, उथले गर्म जल में पाए जाते हैं | ये अधिकांशतः जूजैन्थेली के नाम से जाने वाले एक-कोशिकीय शैवालों के साथ सहोपकारी सम्बन्ध बनाते हैं | प्रायः प्रवाल, भीत्तियों के निर्माण हेतु अन्तः सागरीय चबूतरे का प्रयोग करते हैं | प्रवाल एकल पालिप के रूप में या समुदायों में सैकड़ों से लेकर करोड़ों की संख्या में कालोनी बनाकर रहते हैं | प्रवाल भित्ति के विकास के लिए आवश्यक दशाएं प्रवाल सम्पूर्ण ऊष्णकटिबंधीय महासागरों में गहरे ठन्डे जल से लेकर उथले गर्म जल तक, पाए जाते हैं | समुद्री जल का तापमान प्रवाल मुख्य रूप से ऊष्ण कटिबंधीय महासागरों में पाए जाते हैं , क्योंकि इनको जीवित रहने के लिए 20-21 डिग्री तापक्रम आवश्यक होता है | ज्ञातव्य है कि प्रवाल न तो अति ऊष्ण जल और न अति ठन्डे जल में पनप पाते हैं | अवसाद या तलछट जमाव प्रवाल के विकास के लिए जल अवसाद रहित होना चाहिए | अवसादों के कारण प्रवाल का मुख बंद हो जाता है और वे मर जाते हैं | स्मरणीय है कि जहाँ पर अवसाद का जल के साथ मिश्रण नियमित रूप से होता रहता है, वहां पर प्रवाल का विकास हो सकता है, परन्तु जहाँ अचानक अवसाद लाया जाता है और जल गन्दला हो जाता है, वहां प्रवाल की मृत्यु हो जाती है | समुद्री गहराई प्रवाल कम गहराई तक ही पाए जाते हैं | 200 से 250 फीट से अधिक गहराई में प्रवाल मर जाते हैं | क्योंकि इसके नीचे सूर्य का प्रकाश प्रविष्ट नहीं हो पाता है एवं साथ ही प्रवाल के लिए यथोचित आक्सीजन नहीं मिल पाती है | समुद्री जल की लवणता अत्यधिक तथा अत्यल्प सागरीय लवणता प्रवाल के विकास के लिए हानिकारक होती है | प्रवाल के समुचित विकास के लिए समुद्री लवणता लगभग 30 से 40 प्रतिशत के मध्य होनी चाहिए | स्वच्छ जल नदी के मुहाने के निकट जहाँ जल की प्राप्ति होती है , प्रवाल का विकास कम होता है, क्योंकि यहाँ पर प्रवाल के समुचित विकास हेतु आवश्यक लवणता औसत समुद्री लवणता से कम होती है | वायु की दिशा ऊष्ण कटिबन्धों में, जिन तटों पर ठंडी पवनें चला करती हैं, उन तटों पर प्रवालों का विकास नहीं होता है | मह्द्वीपों के पूर्वी तट पर व्यापारिक पवन ऊष्ण महासागरीय जल को एकत्रित करती है, अतः इन तटों पर प्रवाल अधिक संख्या में विकसित होते हैं | समुद्री धाराएँ ठंडी समुद्री धाराएं प्रवालों के विकास में अवरोध उत्पन्न करती हैं | जिन तटों पर ठंडी जल धाराएं प्रवाहित होती हैं वहां प्रवालों का विकास नहीं होता है | गर्म धाराएँ प्रवालों के लिए लाभकारी हैं | अन्तः समुद्री चबूतरे प्रवाल भित्तियों के विकास की प्राथमिक आवश्यकता यह है कि उनके निर्माण के लिए अन्तः समुद्री चबूतरे विद्यमान हों | ये चबूतरे प्रवाल को कालोनी बनाने में सहयोग करते हैं | इसके अतिरिक्त प्रवाल भित्तियों के लिए खुला सागर तथा वनस्पति - जूजैन्थेली का होना आवश्यक माना जाता है | आदि
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##Question:प्रवाल भित्ति से आप क्या समझते हैं ? प्रवाल भित्ति के निर्माण में सहायक कारकों की भूमिका का वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by a coral reefs? Describe the role of ancillary factors in the construction of coral reefs. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत प्रवाल भित्ति के आशय को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात प्रवाल भित्ति के निर्माण में सहायक कारको का उल्लेख करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - प्रवाल भित्तियां (Coral Reefs) प्रवाल भित्ति जैव विविधतापूर्ण अन्तः सागरीय स्थलाकृति हैं | ये विश्व के प्रमुख विविधतापूर्ण पारिस्थितिक तंत्रों में से एक हैं | इसलिए इन्हें सामुद्रिक वर्षावन भी कहा जाता है | इनका निर्माण सागरीय जंतु प्रवाल या कोरल पालिप के अस्थिपंजरों के समेकन तथा संयोजन द्वारा होता है | ये अस्थिपंजर कैल्शियम कार्बोनेट से बने होते हैं | सभी कोरल पालिप निदेरिया संघ से सम्बंधित होते हैं | प्रवाल ऊष्णकटिबंधीय महासागरों में, उथले गर्म जल में पाए जाते हैं | ये अधिकांशतः जूजैन्थेली के नाम से जाने वाले एक-कोशिकीय शैवालों के साथ सहोपकारी सम्बन्ध बनाते हैं | प्रायः प्रवाल, भीत्तियों के निर्माण हेतु अन्तः सागरीय चबूतरे का प्रयोग करते हैं | प्रवाल एकल पालिप के रूप में या समुदायों में सैकड़ों से लेकर करोड़ों की संख्या में कालोनी बनाकर रहते हैं | प्रवाल भित्ति के विकास के लिए आवश्यक दशाएं प्रवाल सम्पूर्ण ऊष्णकटिबंधीय महासागरों में गहरे ठन्डे जल से लेकर उथले गर्म जल तक, पाए जाते हैं | समुद्री जल का तापमान प्रवाल मुख्य रूप से ऊष्ण कटिबंधीय महासागरों में पाए जाते हैं , क्योंकि इनको जीवित रहने के लिए 20-21 डिग्री तापक्रम आवश्यक होता है | ज्ञातव्य है कि प्रवाल न तो अति ऊष्ण जल और न अति ठन्डे जल में पनप पाते हैं | अवसाद या तलछट जमाव प्रवाल के विकास के लिए जल अवसाद रहित होना चाहिए | अवसादों के कारण प्रवाल का मुख बंद हो जाता है और वे मर जाते हैं | स्मरणीय है कि जहाँ पर अवसाद का जल के साथ मिश्रण नियमित रूप से होता रहता है, वहां पर प्रवाल का विकास हो सकता है, परन्तु जहाँ अचानक अवसाद लाया जाता है और जल गन्दला हो जाता है, वहां प्रवाल की मृत्यु हो जाती है | समुद्री गहराई प्रवाल कम गहराई तक ही पाए जाते हैं | 200 से 250 फीट से अधिक गहराई में प्रवाल मर जाते हैं | क्योंकि इसके नीचे सूर्य का प्रकाश प्रविष्ट नहीं हो पाता है एवं साथ ही प्रवाल के लिए यथोचित आक्सीजन नहीं मिल पाती है | समुद्री जल की लवणता अत्यधिक तथा अत्यल्प सागरीय लवणता प्रवाल के विकास के लिए हानिकारक होती है | प्रवाल के समुचित विकास के लिए समुद्री लवणता लगभग 30 से 40 प्रतिशत के मध्य होनी चाहिए | स्वच्छ जल नदी के मुहाने के निकट जहाँ जल की प्राप्ति होती है , प्रवाल का विकास कम होता है, क्योंकि यहाँ पर प्रवाल के समुचित विकास हेतु आवश्यक लवणता औसत समुद्री लवणता से कम होती है | वायु की दिशा ऊष्ण कटिबन्धों में, जिन तटों पर ठंडी पवनें चला करती हैं, उन तटों पर प्रवालों का विकास नहीं होता है | मह्द्वीपों के पूर्वी तट पर व्यापारिक पवन ऊष्ण महासागरीय जल को एकत्रित करती है, अतः इन तटों पर प्रवाल अधिक संख्या में विकसित होते हैं | समुद्री धाराएँ ठंडी समुद्री धाराएं प्रवालों के विकास में अवरोध उत्पन्न करती हैं | जिन तटों पर ठंडी जल धाराएं प्रवाहित होती हैं वहां प्रवालों का विकास नहीं होता है | गर्म धाराएँ प्रवालों के लिए लाभकारी हैं | अन्तः समुद्री चबूतरे प्रवाल भित्तियों के विकास की प्राथमिक आवश्यकता यह है कि उनके निर्माण के लिए अन्तः समुद्री चबूतरे विद्यमान हों | ये चबूतरे प्रवाल को कालोनी बनाने में सहयोग करते हैं | इसके अतिरिक्त प्रवाल भित्तियों के लिए खुला सागर तथा वनस्पति - जूजैन्थेली का होना आवश्यक माना जाता है | आदि
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Stating what is a drought, explain some ways of managing them. (150 words/10 marks)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE MANAGEMENT OF DROUGHTS -CONCLUSION ANSWER:- Drought refers to a serious shortfall in the availability of water but not exclusively due to deficiency of rains. It results from a long period of dry weather and insufficient precipitation, which causes acute dry conditions. They can be caused due to both anthropogenic as well as natural causes such as delays in monsoons (even a 15 days delay causes huge disturbances), variation in its amount (even a 10% variation is announced as a deficiency), a negative Indian Ocean Dipole, the mismanagement between the supply and demand of water resources etc. THE MANAGEMENT OF DROUGHTS As per the NDMA Guidelines , the following measures are to be taken to manage droughts. The efforts to reduce the same should include measures to mitigate the anthropogenic effects. 1) RAIN-WATER HARVESTING AND CONSERVATION This to be done through the collection and channelling of rainwater. 2) SUSTAINABLE AGRICULTURE Practices such as growing coarse cereals, construction of check dams, ponds etc. should be inculcated. 2.1) The crops should be chosen depending on the rain availability- It should not like sugarcane in Vidarbha. 2.2) Mulching could be done where the soil is covered with organic residue 3) IDENTIFICATION OF GROUNDWATER POTENTIAL This is to be done through aquifer mapping, planning for interlinking of rivers. 4) DRIP AND SPRINKLER IRRIGATION This should also be promoted. 5) DROUGHT MONITORING It involves preparedness and response efforts. 6) DROUGHT MAPPING It involves the continuous observation of rainfall. If they are able to gauge the overall rain predictability, then the measures can be taken at the right time so important for mitigation. Example- Tamil Nadu grows 3 rice crops per year (in the Cauvery basin)- even grown when water is deficient. So, they can grow 2 crops with millets- There should be a change in livelihood and not too much dependency on agriculture, by giving them alternative employment 7) LIVELIHOOD PLANNING It involves identifying livelihoods that would be least affected by droughts such as cattle rearing etc. 8) CLOUD SEEDING This was done in Karnataka but it was not very successful- because proper monitoring of the atmosphere is needed. In this silver iodide is sprayed- It binds the water molecules to cause precipitation The Drought Crisis Management Plan, 2015 is a suggestion made by the NDMA to the states. The suggestions involve providing employment through MGNREGA, strengthening of PDS- so that there is timely supply of food grains, recharge of groundwater- by building check dams (these are constructed on the small rivers for storage of water for sometimes at least, so that there will be some percolation of water- it will get overflowed on its own after some time), farm loan waivers or arranging for crop loss compensation.
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##Question:Stating what is a drought, explain some ways of managing them. (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE MANAGEMENT OF DROUGHTS -CONCLUSION ANSWER:- Drought refers to a serious shortfall in the availability of water but not exclusively due to deficiency of rains. It results from a long period of dry weather and insufficient precipitation, which causes acute dry conditions. They can be caused due to both anthropogenic as well as natural causes such as delays in monsoons (even a 15 days delay causes huge disturbances), variation in its amount (even a 10% variation is announced as a deficiency), a negative Indian Ocean Dipole, the mismanagement between the supply and demand of water resources etc. THE MANAGEMENT OF DROUGHTS As per the NDMA Guidelines , the following measures are to be taken to manage droughts. The efforts to reduce the same should include measures to mitigate the anthropogenic effects. 1) RAIN-WATER HARVESTING AND CONSERVATION This to be done through the collection and channelling of rainwater. 2) SUSTAINABLE AGRICULTURE Practices such as growing coarse cereals, construction of check dams, ponds etc. should be inculcated. 2.1) The crops should be chosen depending on the rain availability- It should not like sugarcane in Vidarbha. 2.2) Mulching could be done where the soil is covered with organic residue 3) IDENTIFICATION OF GROUNDWATER POTENTIAL This is to be done through aquifer mapping, planning for interlinking of rivers. 4) DRIP AND SPRINKLER IRRIGATION This should also be promoted. 5) DROUGHT MONITORING It involves preparedness and response efforts. 6) DROUGHT MAPPING It involves the continuous observation of rainfall. If they are able to gauge the overall rain predictability, then the measures can be taken at the right time so important for mitigation. Example- Tamil Nadu grows 3 rice crops per year (in the Cauvery basin)- even grown when water is deficient. So, they can grow 2 crops with millets- There should be a change in livelihood and not too much dependency on agriculture, by giving them alternative employment 7) LIVELIHOOD PLANNING It involves identifying livelihoods that would be least affected by droughts such as cattle rearing etc. 8) CLOUD SEEDING This was done in Karnataka but it was not very successful- because proper monitoring of the atmosphere is needed. In this silver iodide is sprayed- It binds the water molecules to cause precipitation The Drought Crisis Management Plan, 2015 is a suggestion made by the NDMA to the states. The suggestions involve providing employment through MGNREGA, strengthening of PDS- so that there is timely supply of food grains, recharge of groundwater- by building check dams (these are constructed on the small rivers for storage of water for sometimes at least, so that there will be some percolation of water- it will get overflowed on its own after some time), farm loan waivers or arranging for crop loss compensation.
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अर्थव्यवस्था के महालनोबिस मॉडल से आप क्या समझते हैं? महालनोबिस मॉडल की विशेषताओं की भारत के संदर्भ में चर्चा कीजिए (150-200 शब्द) What do you understand by the Mahalnobis model of economy? Discuss the characteristics of the Mahalnobis model in the context of India (150-200 words).
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में विनिवेश को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में भारत में विनिवेश नीति और उसके विकास की चर्चा कीजिये 3- दूसरे भाग में विनिवेश से सम्बन्धित मुद्दे स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में समाधानात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) में सरकार की हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया विनिवेश कहलाती है। परंतु विनिवेश के अंतर्गत सरकार उस उपक्रम पर अपना स्वामित्व अथवा मालिकाना हक बनाए रखती है। आमतौर पर विनिवेश को एक बजट के रूप में ही देखा जाता है, जिसके तहत सरकार चयनित सार्वजनिक उपक्रमों में विनिवेश के लिये वार्षिक लक्ष्य निर्धारित करती है।जबकि रणनीतिक बिक्री में सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई के शेयर्स के साथ ही प्रबंधन नियंत्रण का हस्तांतरण भी किया जाता है अर्थात् स्वामित्व और नियंत्रण को किसी निजी क्षेत्र की इकाई को स्थानांतरित कर दिया जाता है।साधारण विनिवेश के विपरीत रणनीतिक विनिवेश एक प्रकार से निजीकरण होता है। भारत में विनिवेश नीति और उसके विकास 1991 में इस प्रक्रिया की शुरुआत हुई |इस चरण में सरकार ने वित्तीय संस्थानों को कुछ कंपनियों के अधिकतम 2-10 % तक अंश बेचे गए 1999 में सरकार ने विनिवेश मंत्रालय का गठन किया, IPCL और VSNL को पूर्णतः विनिवेशित कर दिया गया 2004 में विनिवेश मंत्रालय को समाप्त कर दिया गया और विनिवेश विभाग (वित्त मंत्रालय) के रूप में स्थापित किया गया 1992 में डॉ रंगराजन समिति की अनुशंसा के अनुरूप 2005 में एक कोष (राष्ट्रीय निवेश कोष) का गठन किया गया 2014 में पुनः NDA सरकार आयी और विनिवेश की नीति महत्वपूर्ण विकास हुआ विनिवेश विभाग को दीपम (विनिवेश एवं सार्वजनिक संपत्ति प्रबंधन विभाग) नाम दिया गया है विनिवेश दो प्रकार से किया जाता है अल्पसंख्यक अंश बिक्री 50 % से कम विनिवेश इसमें प्रबंधन सरकार के पास रहता है| इसके अंश आम जनता को बेचे जायेंगे लाभकारी इकाइयों को सूचीबद्ध कर दिया जाएगा सूचीबद्ध इकाइयों के कम से कम 10 % अंश जनता को बेचना अनिवार्य कर दिया गया| वर्तमान वित्तीय वर्ष में सरकार ने उपरोक्त जनता अंशों को बढ़ा कर 25 % कर दिया गया है वर्ष 2019 में सरकार ने निर्णय लिया कि जनता को 50 % से अधिक अंशो की बिक्री का जा सकती है किन्तु प्रबंधन सरकार के पास ही बना रहेगा रणनीतिक विनिवेश इसमें PSU के अंश किसी ऐसी निजी कंपनी को बेचे जायेंगे जिसे उस क्षेत्र का अनुभव हो इसमें न्यूनतम 26 % तक अंशों का विक्रय किया जाएगा, इसमें प्रबंधन अधिकांशतः निजी क्षेत्र में चला जाता है रणनीतिक विनिवेश हेतु कंपनियों का चयन नीति आयोग द्वारा किया जाएगा अब रणनीतिक क्षेत्र वाले PSU को भी बेचे जाने का प्रवाधान किया गया है किन्तु उसमें सबसे प्रमुख PSU को सरकार अपने पास रखेगी विनिवेश प्राप्तियां राष्ट्रीय निवेश कोष में जायेंगी| राष्ट्रीय निवेश कोष, लोक लेखा का भाग है राष्ट्रीय निवेश कोष का धन चयनित पूंजीगत व्यय में खर्च किया जाएगा जैसे रेलवे में निवेश, PSBs का पुनर्पूंजीकरण आदि विवाद और मुद्दे सरकार, संपत्ति बेच कर रोजमर्रा के व्ययों की पूर्ति कर रही है| इससे सार्वजनिक संपत्ति में कमी आ रही है|एक समय ऐसा आ सकता है जब सम्पूर्ण सार्वजनिक संपत्ति समाप्त हो जायेगी| सरकारी परिसंपत्तियां संकट के समय बहुत काम आती हैं किन्तु इस गति में विनिवेश से सरकार को भविष्य में अस्थिरता का सामना करना पड़ सकता है सरकार का मुख्य उद्देश्य गैर रणनीतिक क्षेत्र का विनिवेश करना था किन्तु वर्तमान में विनिवेश नीति में रणनीतिक क्षेत्रों को भी शामिल कर लिया गया है और लाभप्रद PSU का भी विनिवेश किया जा रहा है जो कि भारत की भावी आर्थिक स्थिरता के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता है| इससे लाभप्रद PSU निजी क्षेत्र में चले जायेंगे और उसी अनुपात में सरकार के लाभ में कमी आएगी जिसका प्रभाव सरकार के विकासात्मक व्ययों में कमी के रूप में देखा जा सकता है भ्रष्टाचार की समस्या जैसे सरकारी अधिकारियों द्वारा इकाइयों के मूल्य में हेराफेरी करना आदि PSU की स्वायत्तता में निरंतर कमी आ रही है पुनर्खरीद के माध्यम से विनिवेश का मुद्दा जो कि विवादास्पद रहा है क्योंकि इससे PSU की कार्यशील पूँजी पर प्रभाव पडेगा और इसकी प्रतिस्पर्धात्मकता पर दुष्प्रभाव पडेगा इस प्रकार स्पष्ट होता है कि विनिवेश भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए भविष्य में जोखिमपूर्ण हो सकता है अतः इसे कमजोर PSU तक सीमित किया जा सकता है और रणनीतिक विनिवेश नीति में भी कुछ विशिष्ट PSU को सरकार को अपने पास बनाए रखना आवश्यक है|
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##Question:अर्थव्यवस्था के महालनोबिस मॉडल से आप क्या समझते हैं? महालनोबिस मॉडल की विशेषताओं की भारत के संदर्भ में चर्चा कीजिए (150-200 शब्द) What do you understand by the Mahalnobis model of economy? Discuss the characteristics of the Mahalnobis model in the context of India (150-200 words).##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में विनिवेश को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में भारत में विनिवेश नीति और उसके विकास की चर्चा कीजिये 3- दूसरे भाग में विनिवेश से सम्बन्धित मुद्दे स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में समाधानात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) में सरकार की हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया विनिवेश कहलाती है। परंतु विनिवेश के अंतर्गत सरकार उस उपक्रम पर अपना स्वामित्व अथवा मालिकाना हक बनाए रखती है। आमतौर पर विनिवेश को एक बजट के रूप में ही देखा जाता है, जिसके तहत सरकार चयनित सार्वजनिक उपक्रमों में विनिवेश के लिये वार्षिक लक्ष्य निर्धारित करती है।जबकि रणनीतिक बिक्री में सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई के शेयर्स के साथ ही प्रबंधन नियंत्रण का हस्तांतरण भी किया जाता है अर्थात् स्वामित्व और नियंत्रण को किसी निजी क्षेत्र की इकाई को स्थानांतरित कर दिया जाता है।साधारण विनिवेश के विपरीत रणनीतिक विनिवेश एक प्रकार से निजीकरण होता है। भारत में विनिवेश नीति और उसके विकास 1991 में इस प्रक्रिया की शुरुआत हुई |इस चरण में सरकार ने वित्तीय संस्थानों को कुछ कंपनियों के अधिकतम 2-10 % तक अंश बेचे गए 1999 में सरकार ने विनिवेश मंत्रालय का गठन किया, IPCL और VSNL को पूर्णतः विनिवेशित कर दिया गया 2004 में विनिवेश मंत्रालय को समाप्त कर दिया गया और विनिवेश विभाग (वित्त मंत्रालय) के रूप में स्थापित किया गया 1992 में डॉ रंगराजन समिति की अनुशंसा के अनुरूप 2005 में एक कोष (राष्ट्रीय निवेश कोष) का गठन किया गया 2014 में पुनः NDA सरकार आयी और विनिवेश की नीति महत्वपूर्ण विकास हुआ विनिवेश विभाग को दीपम (विनिवेश एवं सार्वजनिक संपत्ति प्रबंधन विभाग) नाम दिया गया है विनिवेश दो प्रकार से किया जाता है अल्पसंख्यक अंश बिक्री 50 % से कम विनिवेश इसमें प्रबंधन सरकार के पास रहता है| इसके अंश आम जनता को बेचे जायेंगे लाभकारी इकाइयों को सूचीबद्ध कर दिया जाएगा सूचीबद्ध इकाइयों के कम से कम 10 % अंश जनता को बेचना अनिवार्य कर दिया गया| वर्तमान वित्तीय वर्ष में सरकार ने उपरोक्त जनता अंशों को बढ़ा कर 25 % कर दिया गया है वर्ष 2019 में सरकार ने निर्णय लिया कि जनता को 50 % से अधिक अंशो की बिक्री का जा सकती है किन्तु प्रबंधन सरकार के पास ही बना रहेगा रणनीतिक विनिवेश इसमें PSU के अंश किसी ऐसी निजी कंपनी को बेचे जायेंगे जिसे उस क्षेत्र का अनुभव हो इसमें न्यूनतम 26 % तक अंशों का विक्रय किया जाएगा, इसमें प्रबंधन अधिकांशतः निजी क्षेत्र में चला जाता है रणनीतिक विनिवेश हेतु कंपनियों का चयन नीति आयोग द्वारा किया जाएगा अब रणनीतिक क्षेत्र वाले PSU को भी बेचे जाने का प्रवाधान किया गया है किन्तु उसमें सबसे प्रमुख PSU को सरकार अपने पास रखेगी विनिवेश प्राप्तियां राष्ट्रीय निवेश कोष में जायेंगी| राष्ट्रीय निवेश कोष, लोक लेखा का भाग है राष्ट्रीय निवेश कोष का धन चयनित पूंजीगत व्यय में खर्च किया जाएगा जैसे रेलवे में निवेश, PSBs का पुनर्पूंजीकरण आदि विवाद और मुद्दे सरकार, संपत्ति बेच कर रोजमर्रा के व्ययों की पूर्ति कर रही है| इससे सार्वजनिक संपत्ति में कमी आ रही है|एक समय ऐसा आ सकता है जब सम्पूर्ण सार्वजनिक संपत्ति समाप्त हो जायेगी| सरकारी परिसंपत्तियां संकट के समय बहुत काम आती हैं किन्तु इस गति में विनिवेश से सरकार को भविष्य में अस्थिरता का सामना करना पड़ सकता है सरकार का मुख्य उद्देश्य गैर रणनीतिक क्षेत्र का विनिवेश करना था किन्तु वर्तमान में विनिवेश नीति में रणनीतिक क्षेत्रों को भी शामिल कर लिया गया है और लाभप्रद PSU का भी विनिवेश किया जा रहा है जो कि भारत की भावी आर्थिक स्थिरता के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता है| इससे लाभप्रद PSU निजी क्षेत्र में चले जायेंगे और उसी अनुपात में सरकार के लाभ में कमी आएगी जिसका प्रभाव सरकार के विकासात्मक व्ययों में कमी के रूप में देखा जा सकता है भ्रष्टाचार की समस्या जैसे सरकारी अधिकारियों द्वारा इकाइयों के मूल्य में हेराफेरी करना आदि PSU की स्वायत्तता में निरंतर कमी आ रही है पुनर्खरीद के माध्यम से विनिवेश का मुद्दा जो कि विवादास्पद रहा है क्योंकि इससे PSU की कार्यशील पूँजी पर प्रभाव पडेगा और इसकी प्रतिस्पर्धात्मकता पर दुष्प्रभाव पडेगा इस प्रकार स्पष्ट होता है कि विनिवेश भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए भविष्य में जोखिमपूर्ण हो सकता है अतः इसे कमजोर PSU तक सीमित किया जा सकता है और रणनीतिक विनिवेश नीति में भी कुछ विशिष्ट PSU को सरकार को अपने पास बनाए रखना आवश्यक है|
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श्रम क़ानूनों की जटिलताओं ने रोजगार में अनौपचारीकरण को बढ़ावा दिया है। इस कथन की व्याख्या कीजिये तथा अनौपचारीकरण के पड़ने वाले प्रभावों पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Complications of the labour laws have led to informalization in employment. Explain this statement and discuss the implications of informalization. (150-200 words)
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दृष्टिकोण: भूमिका में रोजगार संबंधी आकड़ें लिखिए। श्रम क़ानूनों की जटिलता से अनौपचारीकरण में वृद्धि को समझाईए। बढ़ते अनौपचारिकरण के प्रभावों को लिखिए। श्रम कानून में सुधार के लिए सुझाव देते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। NSSO के वर्ष 2011-12 रोजगार सम्बन्धी आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि भारत की रोजगार संरचना में औपचारिक रोजगार का योगदान कुल 8 % है। इसमें 7.7 % रोजगार संगठित क्षेत्र में था जबकि 0.3 % रोजगार असंगठित क्षेत्र था। कुल रोजगार में अनौपचारिक रोजगार 92 % था जिसमें 9.3% संगठित क्षेत्र में था जबकि 82.7 % रोजगार असंगठित क्षेत्र में था| भारत में कुल 17 % लोग संगठित क्षेत्र में कार्यरत है| संगठित क्षेत्र में भी अधिकाँश रोजगार(9.3%) अनौपचारिक है इसके कारण रोजगार/श्रमबल का अनौपचारीकरण हो गया है| संगठित क्षेत्र अनौपचारिक रोजगार अधिक सृजित हो रहा है और औपचारिक रोजगार का सृजन नहीं हो पा रहा है| श्रम का अनौपचारीकरण श्रमिकों और नियोक्ताओं दोनों पर नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करता है| श्रम के अनौपचारीकरण का प्रमुख कारण श्रम कानूनों को माना जाता है क्योंकि श्रम कानूनों के कारण भारत की संगठित क्षेत्र (बड़ी फर्में) औपचारिक रोजगार का सृजन नहीं कर पा रही हैं। श्रम क़ानूनों की जटिलताओं ने रोजगार में अनौपचारीकरण को निम्नलिखित प्रकार से बढ़ावा दिया है: श्रम कानूनों की उपरोक्त सीमाओं के कारण व्यावसायिक सुगमता में ह्रास, निवेश में कमी, कम रोजगार सृजन आदि परिणाम देखने को मिलते हैं। इससे निवेश में कमी आएगी और आने वाला निवेश पूँजी प्रधान निवेश होता है अथवा स्वचालन को प्रेरित होता है। निष्कासन की प्रक्रिया अपेक्षाकृत रूप से अधिक जटिल है जिसके कारण नियोक्ता औपचारिक रोजगार देने से बचता है इसके कारण के कारण अधिनियमों का अनुपालन कठिन हो जाता है और इंस्पेक्टर राज एवं भ्रष्टाचार की समस्या बढती है अनौपचारिकरण के प्रभाव: सामाजिक न्याय संबंधी नीतियों का लाभ प्राप्त नहीं हो पाता है। आर्थिक विकास का वास्तविक मूल्यांकन नहीं किया जा सकता है। नियोक्ताओं द्वारा शोषण किया जाता है। सरकारी नियंत्रण का अभाव रोजगार में सुरक्षा का अभाव होता है नियोक्ताओं के दृष्टिकोण से सकारात्मक प्रभाव भी होता है क्योंकि इससे नियुक्ति, प्रशिक्षण लागत आदि में कमी आती है। श्रम कानून की जटिलताओं ने निश्चित अनौपचारिकरण को बढ़ावा दिया है। इसके नकारात्मक प्रभावों को कम करने के लिए सरकार द्वारा कई प्रयास किए गए हैं जैसे- श्रम संहिता का निर्माण डिजिटल भुगतान की सुविधा निश्चित अवधि के रोजगार बीमा सुविधाएं
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##Question:श्रम क़ानूनों की जटिलताओं ने रोजगार में अनौपचारीकरण को बढ़ावा दिया है। इस कथन की व्याख्या कीजिये तथा अनौपचारीकरण के पड़ने वाले प्रभावों पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Complications of the labour laws have led to informalization in employment. Explain this statement and discuss the implications of informalization. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण: भूमिका में रोजगार संबंधी आकड़ें लिखिए। श्रम क़ानूनों की जटिलता से अनौपचारीकरण में वृद्धि को समझाईए। बढ़ते अनौपचारिकरण के प्रभावों को लिखिए। श्रम कानून में सुधार के लिए सुझाव देते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। NSSO के वर्ष 2011-12 रोजगार सम्बन्धी आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि भारत की रोजगार संरचना में औपचारिक रोजगार का योगदान कुल 8 % है। इसमें 7.7 % रोजगार संगठित क्षेत्र में था जबकि 0.3 % रोजगार असंगठित क्षेत्र था। कुल रोजगार में अनौपचारिक रोजगार 92 % था जिसमें 9.3% संगठित क्षेत्र में था जबकि 82.7 % रोजगार असंगठित क्षेत्र में था| भारत में कुल 17 % लोग संगठित क्षेत्र में कार्यरत है| संगठित क्षेत्र में भी अधिकाँश रोजगार(9.3%) अनौपचारिक है इसके कारण रोजगार/श्रमबल का अनौपचारीकरण हो गया है| संगठित क्षेत्र अनौपचारिक रोजगार अधिक सृजित हो रहा है और औपचारिक रोजगार का सृजन नहीं हो पा रहा है| श्रम का अनौपचारीकरण श्रमिकों और नियोक्ताओं दोनों पर नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करता है| श्रम के अनौपचारीकरण का प्रमुख कारण श्रम कानूनों को माना जाता है क्योंकि श्रम कानूनों के कारण भारत की संगठित क्षेत्र (बड़ी फर्में) औपचारिक रोजगार का सृजन नहीं कर पा रही हैं। श्रम क़ानूनों की जटिलताओं ने रोजगार में अनौपचारीकरण को निम्नलिखित प्रकार से बढ़ावा दिया है: श्रम कानूनों की उपरोक्त सीमाओं के कारण व्यावसायिक सुगमता में ह्रास, निवेश में कमी, कम रोजगार सृजन आदि परिणाम देखने को मिलते हैं। इससे निवेश में कमी आएगी और आने वाला निवेश पूँजी प्रधान निवेश होता है अथवा स्वचालन को प्रेरित होता है। निष्कासन की प्रक्रिया अपेक्षाकृत रूप से अधिक जटिल है जिसके कारण नियोक्ता औपचारिक रोजगार देने से बचता है इसके कारण के कारण अधिनियमों का अनुपालन कठिन हो जाता है और इंस्पेक्टर राज एवं भ्रष्टाचार की समस्या बढती है अनौपचारिकरण के प्रभाव: सामाजिक न्याय संबंधी नीतियों का लाभ प्राप्त नहीं हो पाता है। आर्थिक विकास का वास्तविक मूल्यांकन नहीं किया जा सकता है। नियोक्ताओं द्वारा शोषण किया जाता है। सरकारी नियंत्रण का अभाव रोजगार में सुरक्षा का अभाव होता है नियोक्ताओं के दृष्टिकोण से सकारात्मक प्रभाव भी होता है क्योंकि इससे नियुक्ति, प्रशिक्षण लागत आदि में कमी आती है। श्रम कानून की जटिलताओं ने निश्चित अनौपचारिकरण को बढ़ावा दिया है। इसके नकारात्मक प्रभावों को कम करने के लिए सरकार द्वारा कई प्रयास किए गए हैं जैसे- श्रम संहिता का निर्माण डिजिटल भुगतान की सुविधा निश्चित अवधि के रोजगार बीमा सुविधाएं
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आर्थिक सुधारों के बाद भारत ने रोजगार रहित वृद्धि का सामना किया है| इसके कारणों को स्पष्ट करते हुए रोजगार सृजन के उपायों को सुझाइए| (150 से 200 शब्द) After the economic reforms, India has faced jobless growth. Explain the reasons for this and suggest measures for employment generation. (150 to 200 words)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में आर्थिक सुधारों के बाद भारत ने रोजगार रहित वृद्धि की स्थिति को स्पष्ट कीजिये| 2- प्रथम भाग में आर्थिक सुधारों के बाद भारत ने रोजगार रहित वृद्धि के कारणों को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में भारत में रोजगार सृजन के उपाय सुझाइए 4- अंतिम में रोजगार सृजन का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भुगतान संतुलन संकट के कारण भारत ने वर्ष 1991 में आर्थिक सुधार लागू किये| जिसके सकारात्मक परिणाम के रूप में देखा गया कि 1991 के बाद भारत की वृद्धि दर औसतन 7 % से उपर रही है| किन्तु इसी काल में भारत में रोजगार सृजन कम हुआ है| ध्यातव्य है कि रोजगार की लोच, यह आर्थिक वृद्धि और रोजगार सृजन के मध्य सम्बन्ध दर्शाता है| रोजगार की लोच यदि 1 होगी तो इसे बेहतर माना जाएगा किन्तु 1 से कम होने पर बेरोजगारी का पता चलता है| रोजगार की लोच जितनी अधिक है उतनी ही अच्छी मानी जाती है जबकि जितनी ही कम होती है उतनी ही खराब स्थिति मानी जाती है| भारत में रोजगार की लोच में भारी गिरावट आई है, इस सन्दर्भ में NSSO के आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि1980 के दशक में रोजगार सृजन दर 2.5 % औररोजगार की लोच लगभग 0.47 रही है| 1990 के दशक मेंरोजगार सृजन दर 1.1% औररोजगार की लोच लगभग 0.17 रही है| जबकि2000 के दशक में रोजगार सृजन दर1.4% औररोजगार की लोच लगभग0.2 रही है| रोजगार रहित वृद्धि के कारण रोजगार रहित वृद्धि, आर्थिक वृद्धि के बढ़ने किन्तु रोजगार वृद्धि में कमी आने की स्थिति है आर्थिक सुधार के बाद सेवा क्षेत्र में तीव्र वृद्धि हुई जो उस अनुपात में रोजगार सृजन नही कर पायाइसके कारण बेरोजगारी बढ़ी है जटिल श्रम बल एवं जटिल श्रम कानूनों के कारण निजी क्षेत्र एवं विदेशियों द्वारा पूँजी गहन निवेश तथा स्वचालन पर विशेष बल होने कारण भारत में रोजगार सृजन बाधित हुआ है IMF की शर्तों के अनुसार भारत सरकार को अपने बजट घाटे को कम करना था| अतः सरकार द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में निवेश की समाप्ति एवं PSUs का विनिवेश किया गया| इससे बेरोजगारी बढ़ी| आर्थिक सुधारों के बाद बजटीय घाटे पर नियंत्रण के लिए 1990 के दशक में अपने विकासात्मक व्ययों को कम करना पड़ा इसके कारण भी बेरोजगारी बढ़ी| 2004 के बाद ही इसे बढाया जाने लगा MSME श्रम गहन होते हैं| MSME क्षेत्र पर आर्थिक सुधारों का नकारात्मक प्रभाव पड़ा क्योंकि आर्थिक सुधारों के बाद इनका संरक्षण कम/समाप्त हुआ तथा प्रतिस्पर्धा में वृद्धि हुई| अतः आर्थिक सुधार के कारण इसके माध्यम से बेरोजगारी बढ़ी| उपरोक्त के अतिरिक्त भारत में बेरोजगारी के लिए अन्य अनेक कारण भी उत्तरदायी हैं जो निम्नवत हैं पूँजी का अभाव तथा आधारिक संरचना के अभाव का कारण रोजगार सृजन प्रभावित हुआ है और बेरोजगारी बढ़ी है त्रुटिपूर्ण शिक्षा प्रणाली जैसे कौशल विकास,व्याव्सायिक शिक्षा आदि को कम महत्त्व देने के कारण कुशल श्रम का विकास कम हुआ है जिसके कारण बेरोजगारी बढ़ी है त्रुटिपूर्ण रोजगार सृजन नीतियां जैसे टपकन के सिद्धांत पर अधिक निर्भरता आदि के कारण बेरोजगारी बढती गयी है पहले जनसंख्या वृद्धि दर अधिक होने कारण एवं वर्तमान में जनांकिकीय लाभांश के कारण श्रम बल में सामान्य तौर पर अधिक वृद्धि दर का होना और इसके अनुपात में रोजगार सृजन न हो पाने के कारण बेरोजगारी बढ़ी है| रोजगार सृजन के उपाय निवेश बढ़ाना जैसे मेक इन इंडिया श्रम गहन क्षेत्र जैसे चमड़ा, कपड़ा क्षेत्रों का विकास उद्यमिता को बढ़ाना जैसे स्टार्ट अप इंडिया, स्टैंड अप इंडिया, मुद्रा कौशल विकास को बढ़ाना श्रम अधिनियम में त्वरित सुधार करना निर्धनता उन्मूलन एवं रोजगार सृजन कार्यक्रम आदि इसके अंतर्गत दो प्रकार के रोजगार सृजित होते हैं यथा वेतन रोजगार एवं स्वरोजगार वेतन रोजगार में अकुशल श्रमिकों के नियोजन के माध्यम से सड़क, सिंचाई नहर अवसंरचना का विकास करने के साथ ही रोजगार दिया जाता है उदाहरण के तौर पर मनरेगा आदि स्वरोजगार, जिस में पहले प्रशिक्षण(सरकार या NGO) दिया जाएगा फिर वित्त(सरकार एवं बैंक) दिया जाएगा| सरकार सब्सिडी के रूप में जबकि बैंक ऋण के रूप में वित्त उपलब्ध कराते हैं| इनका उद्देश्य स्वरोजगार उत्पन्न करना होता है जैसे दीन दयाल अन्त्योदय योजना आदि| भारत में रोजगार सृजन न केवल विकास सुनिश्चित करने बल्कि गरीबी उन्मूलन के सन्दर्भ में भी महत्वपूर्ण है| यदि भारत उपरोक्त उपायों से रोजगार सृजन करने में सफल रहेगा तो भारत जनांकिकीय लाभांश का लाभ ले सकेगा| ध्यातव्य है कि जनांकिकीय लाभांश का तात्पर्य कुल जनसंख्या में युवा वर्ग अथवा कार्यबल में होने वाली वृद्धि के कारण आर्थिक वृद्धि की संभावना के बढ़ने से है|
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##Question:आर्थिक सुधारों के बाद भारत ने रोजगार रहित वृद्धि का सामना किया है| इसके कारणों को स्पष्ट करते हुए रोजगार सृजन के उपायों को सुझाइए| (150 से 200 शब्द) After the economic reforms, India has faced jobless growth. Explain the reasons for this and suggest measures for employment generation. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में आर्थिक सुधारों के बाद भारत ने रोजगार रहित वृद्धि की स्थिति को स्पष्ट कीजिये| 2- प्रथम भाग में आर्थिक सुधारों के बाद भारत ने रोजगार रहित वृद्धि के कारणों को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में भारत में रोजगार सृजन के उपाय सुझाइए 4- अंतिम में रोजगार सृजन का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भुगतान संतुलन संकट के कारण भारत ने वर्ष 1991 में आर्थिक सुधार लागू किये| जिसके सकारात्मक परिणाम के रूप में देखा गया कि 1991 के बाद भारत की वृद्धि दर औसतन 7 % से उपर रही है| किन्तु इसी काल में भारत में रोजगार सृजन कम हुआ है| ध्यातव्य है कि रोजगार की लोच, यह आर्थिक वृद्धि और रोजगार सृजन के मध्य सम्बन्ध दर्शाता है| रोजगार की लोच यदि 1 होगी तो इसे बेहतर माना जाएगा किन्तु 1 से कम होने पर बेरोजगारी का पता चलता है| रोजगार की लोच जितनी अधिक है उतनी ही अच्छी मानी जाती है जबकि जितनी ही कम होती है उतनी ही खराब स्थिति मानी जाती है| भारत में रोजगार की लोच में भारी गिरावट आई है, इस सन्दर्भ में NSSO के आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि1980 के दशक में रोजगार सृजन दर 2.5 % औररोजगार की लोच लगभग 0.47 रही है| 1990 के दशक मेंरोजगार सृजन दर 1.1% औररोजगार की लोच लगभग 0.17 रही है| जबकि2000 के दशक में रोजगार सृजन दर1.4% औररोजगार की लोच लगभग0.2 रही है| रोजगार रहित वृद्धि के कारण रोजगार रहित वृद्धि, आर्थिक वृद्धि के बढ़ने किन्तु रोजगार वृद्धि में कमी आने की स्थिति है आर्थिक सुधार के बाद सेवा क्षेत्र में तीव्र वृद्धि हुई जो उस अनुपात में रोजगार सृजन नही कर पायाइसके कारण बेरोजगारी बढ़ी है जटिल श्रम बल एवं जटिल श्रम कानूनों के कारण निजी क्षेत्र एवं विदेशियों द्वारा पूँजी गहन निवेश तथा स्वचालन पर विशेष बल होने कारण भारत में रोजगार सृजन बाधित हुआ है IMF की शर्तों के अनुसार भारत सरकार को अपने बजट घाटे को कम करना था| अतः सरकार द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में निवेश की समाप्ति एवं PSUs का विनिवेश किया गया| इससे बेरोजगारी बढ़ी| आर्थिक सुधारों के बाद बजटीय घाटे पर नियंत्रण के लिए 1990 के दशक में अपने विकासात्मक व्ययों को कम करना पड़ा इसके कारण भी बेरोजगारी बढ़ी| 2004 के बाद ही इसे बढाया जाने लगा MSME श्रम गहन होते हैं| MSME क्षेत्र पर आर्थिक सुधारों का नकारात्मक प्रभाव पड़ा क्योंकि आर्थिक सुधारों के बाद इनका संरक्षण कम/समाप्त हुआ तथा प्रतिस्पर्धा में वृद्धि हुई| अतः आर्थिक सुधार के कारण इसके माध्यम से बेरोजगारी बढ़ी| उपरोक्त के अतिरिक्त भारत में बेरोजगारी के लिए अन्य अनेक कारण भी उत्तरदायी हैं जो निम्नवत हैं पूँजी का अभाव तथा आधारिक संरचना के अभाव का कारण रोजगार सृजन प्रभावित हुआ है और बेरोजगारी बढ़ी है त्रुटिपूर्ण शिक्षा प्रणाली जैसे कौशल विकास,व्याव्सायिक शिक्षा आदि को कम महत्त्व देने के कारण कुशल श्रम का विकास कम हुआ है जिसके कारण बेरोजगारी बढ़ी है त्रुटिपूर्ण रोजगार सृजन नीतियां जैसे टपकन के सिद्धांत पर अधिक निर्भरता आदि के कारण बेरोजगारी बढती गयी है पहले जनसंख्या वृद्धि दर अधिक होने कारण एवं वर्तमान में जनांकिकीय लाभांश के कारण श्रम बल में सामान्य तौर पर अधिक वृद्धि दर का होना और इसके अनुपात में रोजगार सृजन न हो पाने के कारण बेरोजगारी बढ़ी है| रोजगार सृजन के उपाय निवेश बढ़ाना जैसे मेक इन इंडिया श्रम गहन क्षेत्र जैसे चमड़ा, कपड़ा क्षेत्रों का विकास उद्यमिता को बढ़ाना जैसे स्टार्ट अप इंडिया, स्टैंड अप इंडिया, मुद्रा कौशल विकास को बढ़ाना श्रम अधिनियम में त्वरित सुधार करना निर्धनता उन्मूलन एवं रोजगार सृजन कार्यक्रम आदि इसके अंतर्गत दो प्रकार के रोजगार सृजित होते हैं यथा वेतन रोजगार एवं स्वरोजगार वेतन रोजगार में अकुशल श्रमिकों के नियोजन के माध्यम से सड़क, सिंचाई नहर अवसंरचना का विकास करने के साथ ही रोजगार दिया जाता है उदाहरण के तौर पर मनरेगा आदि स्वरोजगार, जिस में पहले प्रशिक्षण(सरकार या NGO) दिया जाएगा फिर वित्त(सरकार एवं बैंक) दिया जाएगा| सरकार सब्सिडी के रूप में जबकि बैंक ऋण के रूप में वित्त उपलब्ध कराते हैं| इनका उद्देश्य स्वरोजगार उत्पन्न करना होता है जैसे दीन दयाल अन्त्योदय योजना आदि| भारत में रोजगार सृजन न केवल विकास सुनिश्चित करने बल्कि गरीबी उन्मूलन के सन्दर्भ में भी महत्वपूर्ण है| यदि भारत उपरोक्त उपायों से रोजगार सृजन करने में सफल रहेगा तो भारत जनांकिकीय लाभांश का लाभ ले सकेगा| ध्यातव्य है कि जनांकिकीय लाभांश का तात्पर्य कुल जनसंख्या में युवा वर्ग अथवा कार्यबल में होने वाली वृद्धि के कारण आर्थिक वृद्धि की संभावना के बढ़ने से है|
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कृषि के वाणिज्यीकरण से आप क्या समझते हैं ? ब्रिटिश भारत में कृषि के वाणिज्यीकरण के प्रभावों का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए । ( 150-200 शब्द , अंक -10 ) What do you understand by commercialization of agriculture? Critically analyze the effects of commercialization of agriculture in British India. (150-200 words , marks - 10 )
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दृष्टिकोण : कृषि के वाणिज्यिकरण को परिभाषित करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । ब्रिटिश काल में कृषि के वाणिज्यिकरण के कारणों की चर्चा कीजिए । कृषि के वाणिज्यिकरण के सकारात्मक व नकारात्मक प्रभावों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए । उत्तर : सामान्य अर्थों में मुनाफा या बाजार को ध्यान में रखकर की गई कृषि को वाणिज्यिक कृषि कहते हैं । विशिष्ट अर्थों में पूंजीवादी कृषि के संदर्भ में इस शब्द का प्रयोग किया जाता है । इसके अंतर्गत मुनाफे को ध्यान में रखकर कृषि , कृषि का आधुनिकीकरण, राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय बाजार को ध्यान में रखकर कृषि तथा कृषि से संबंधित विभिन्न बाजारों का विकास इत्यादि लक्षण सम्मिलित होते हैं । ब्रिटिश काल में कृषि के वाणिज्यिकरण को प्रेरित करने वाले कारक : ब्रिटिश काल में कई अप्रत्यक्ष कारणों से तथा ब्रिटिश सरकार की नीतियों के कारण भारत में वाणिज्यिक कृषि के विकास को बल मिला । इसके प्रमुख कारणों में हम निम्नलिखीत को देख सकते हैं : भू राजस्व की नगद में वसूली । ब्रिटिश औद्योगिक क्रांति के कारण कपास, नील, रेशम, जूट इत्यादि का निर्यात । ब्रिटिश व्यापार संतुलन को ध्यान में रखते हुए जैसे अफीम एवं चाय की खेती । 19 वीं सदी में यूरोप में जनसंख्या में तीव्र वृद्धि हुई और भारत से खादान का भी निर्यात हुआ । नए व्यापारिक मार्गों तथा परिवहन के उन्नत साधनों ने भी वाणिज्यिकरण की प्रक्रिया को प्रभावित किया । जैसे- स्वेज नहर का खुलना , भारत में रेलवे का विकास । ब्रिटिश काल में हुए कृषि के वाणिज्यिकरण का सकारात्मक प्रभाव : भारत में कुछ नए फसलों की कृषि जैसे- चाय, कॉफी, । राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय बाजार को ध्यान में रखकर कृषि । परिवहन के उन्नत साधनों का विकास । अपेक्षाकृत बड़े किसानों या समृद्ध कृषकों को इसका लाभ मिला । ब्रिटिश काल में हुए कृषि के वाणिज्यिकरण का नकारात्मक प्रभाव : वाणिज्यिकरण की प्रक्रिया स्वाभाविक न होकर एक थोपी गई प्रक्रिया थी ।अतः वास्तविक पूंजीवादी कृषि का विकास नहीं हुआ बल्कि ब्रिटिश आर्थिक जरूरतों के अनुसार यह प्रक्रिया आगे बढ़ी । कृषि के क्षेत्र में देखें तो कृषि के आधुनिकीकरण की पूरी तरह से उपेक्षा की गई अर्थात अच्छे बीज, खाद , मशीन , अनुसंधान इत्यादि को महत्व नहीं दिया गया , बल्कि मुनाफे के लिए प्राथमिक किसानों का शोषण किया गया । राष्ट्रीय , अंतर्राष्ट्रीय बाजार तक पहुँच का लाभ भी अंग्रेज व्यापारियों को ही मिला न कि भारतीय व्यापारियों को । कृषि के वाणिज्यिकरण ने आम किसानों को गरीबी के दुश्चक्र में फँसाया । वाणिज्यिकरण ने व्यापार की प्रकृति को भी प्रभावित किया तथा तैयार मालों के स्थान पर कच्चे मालों का बड़े पैमाने पर निर्यात होने लगा ।कच्चे मालों के निर्यात के कारण औद्योगीकरण की प्रक्रिया भी प्रभावित हुई । कच्चे मालों की कीमतें बढ़ीं और इससे स्वदेशी उत्पादों की लागत भी बढ़ी । परिवहन के साधनों का भी विकास हुआ तो ब्रिटिश जरूरतों को देखते हुए न कि भारतीयों के हितों को ध्यान में रखते हुए । अतः उपरोक्त चर्चा के आधार पर हम कह सकते हैं भारत में कृषि का वाणिज्यिकरण स्वैच्छिक व स्वाभाविक न होकर ब्रिटिश हितों से परिचालित होकर ब्रिटिश दबाव में हुआ जिससे इसका पर्याप्त लाभ भारतीय कृषकों को नहीं मिल सका और यह शोषण का ही एक उपकरण सिद्ध हुआ ।
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##Question:कृषि के वाणिज्यीकरण से आप क्या समझते हैं ? ब्रिटिश भारत में कृषि के वाणिज्यीकरण के प्रभावों का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए । ( 150-200 शब्द , अंक -10 ) What do you understand by commercialization of agriculture? Critically analyze the effects of commercialization of agriculture in British India. (150-200 words , marks - 10 )##Answer:दृष्टिकोण : कृषि के वाणिज्यिकरण को परिभाषित करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । ब्रिटिश काल में कृषि के वाणिज्यिकरण के कारणों की चर्चा कीजिए । कृषि के वाणिज्यिकरण के सकारात्मक व नकारात्मक प्रभावों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए । उत्तर : सामान्य अर्थों में मुनाफा या बाजार को ध्यान में रखकर की गई कृषि को वाणिज्यिक कृषि कहते हैं । विशिष्ट अर्थों में पूंजीवादी कृषि के संदर्भ में इस शब्द का प्रयोग किया जाता है । इसके अंतर्गत मुनाफे को ध्यान में रखकर कृषि , कृषि का आधुनिकीकरण, राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय बाजार को ध्यान में रखकर कृषि तथा कृषि से संबंधित विभिन्न बाजारों का विकास इत्यादि लक्षण सम्मिलित होते हैं । ब्रिटिश काल में कृषि के वाणिज्यिकरण को प्रेरित करने वाले कारक : ब्रिटिश काल में कई अप्रत्यक्ष कारणों से तथा ब्रिटिश सरकार की नीतियों के कारण भारत में वाणिज्यिक कृषि के विकास को बल मिला । इसके प्रमुख कारणों में हम निम्नलिखीत को देख सकते हैं : भू राजस्व की नगद में वसूली । ब्रिटिश औद्योगिक क्रांति के कारण कपास, नील, रेशम, जूट इत्यादि का निर्यात । ब्रिटिश व्यापार संतुलन को ध्यान में रखते हुए जैसे अफीम एवं चाय की खेती । 19 वीं सदी में यूरोप में जनसंख्या में तीव्र वृद्धि हुई और भारत से खादान का भी निर्यात हुआ । नए व्यापारिक मार्गों तथा परिवहन के उन्नत साधनों ने भी वाणिज्यिकरण की प्रक्रिया को प्रभावित किया । जैसे- स्वेज नहर का खुलना , भारत में रेलवे का विकास । ब्रिटिश काल में हुए कृषि के वाणिज्यिकरण का सकारात्मक प्रभाव : भारत में कुछ नए फसलों की कृषि जैसे- चाय, कॉफी, । राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय बाजार को ध्यान में रखकर कृषि । परिवहन के उन्नत साधनों का विकास । अपेक्षाकृत बड़े किसानों या समृद्ध कृषकों को इसका लाभ मिला । ब्रिटिश काल में हुए कृषि के वाणिज्यिकरण का नकारात्मक प्रभाव : वाणिज्यिकरण की प्रक्रिया स्वाभाविक न होकर एक थोपी गई प्रक्रिया थी ।अतः वास्तविक पूंजीवादी कृषि का विकास नहीं हुआ बल्कि ब्रिटिश आर्थिक जरूरतों के अनुसार यह प्रक्रिया आगे बढ़ी । कृषि के क्षेत्र में देखें तो कृषि के आधुनिकीकरण की पूरी तरह से उपेक्षा की गई अर्थात अच्छे बीज, खाद , मशीन , अनुसंधान इत्यादि को महत्व नहीं दिया गया , बल्कि मुनाफे के लिए प्राथमिक किसानों का शोषण किया गया । राष्ट्रीय , अंतर्राष्ट्रीय बाजार तक पहुँच का लाभ भी अंग्रेज व्यापारियों को ही मिला न कि भारतीय व्यापारियों को । कृषि के वाणिज्यिकरण ने आम किसानों को गरीबी के दुश्चक्र में फँसाया । वाणिज्यिकरण ने व्यापार की प्रकृति को भी प्रभावित किया तथा तैयार मालों के स्थान पर कच्चे मालों का बड़े पैमाने पर निर्यात होने लगा ।कच्चे मालों के निर्यात के कारण औद्योगीकरण की प्रक्रिया भी प्रभावित हुई । कच्चे मालों की कीमतें बढ़ीं और इससे स्वदेशी उत्पादों की लागत भी बढ़ी । परिवहन के साधनों का भी विकास हुआ तो ब्रिटिश जरूरतों को देखते हुए न कि भारतीयों के हितों को ध्यान में रखते हुए । अतः उपरोक्त चर्चा के आधार पर हम कह सकते हैं भारत में कृषि का वाणिज्यिकरण स्वैच्छिक व स्वाभाविक न होकर ब्रिटिश हितों से परिचालित होकर ब्रिटिश दबाव में हुआ जिससे इसका पर्याप्त लाभ भारतीय कृषकों को नहीं मिल सका और यह शोषण का ही एक उपकरण सिद्ध हुआ ।
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Communalism arises either due to power struggle or relative deprivation. Discuss (150 words/10 marks)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION The meaning of communalism (The meaning provided in the answer, is as per that that is written in NCERT). - I COMMUNALISM AS A RESULT OF POWER STRUGGLE - II COMMUNALISM AS A RESULT OF RELATIVE DEPRIVATION - CONCLUSION (The conclusion provided here is that that was provided by Smriti Ma’am in class).Ma’am stated that, in the conclusion, if someone wants, they may provide specific suggestions, however, it is not the requirement of this question. ANSWER:- In everyday language, the word ‘communalism’ means aggressive chauvinism based on religious identity. Chauvinism refers to an attitude that sees one’s own group as the only legitimate or worthy group, with other groups being seen as inferior, illegitimate and opposed. Therefore, communalism is an aggressive political ideology linked to religion. This is a peculiarly Indian, or perhaps a South Asian concept. The roots of communalism, in India, were laid down by the Britishers. The main reason for communalism, has been the power struggle(s) or relative deprivation. I COMMUNALISM AS A RESULT OF POWER STRUGGLE The power struggle between the upper strata also manufactured communalism. It manifests due to/ as: 1) IMPLICIT ACCEPTANCE OF DIFFERENCES There was an implicit acceptance that the communities only shared economic and political interests and that they were, however, socially and culturally different. 2) HINDU TOUCH WAS GIVEN TO THE NATIONAL AGENDA For example, the celebration of the Ganesh festival, Shivaji festival, taking a dip in the Ganga etc. provided a Hindu, rather than a secular tinch to the freedom struggle of India. 3) OVER-EMPHASISING THE ANCIENT INDIAN CULTURE Along with the under-mining of medieval Indian culture, the over-emphasis on the ancient Indian culture led to resentment, among educated Muslims and led to their alienation from the freedom struggle. History was divided along communal lines, such as the Hindu Rule (Ancient Indian History) and the Muslim Rule (Medieval Indian History). Even post-independence, the government failed to come to terms with communalism, due to lack of cultural integration, lack of socio-economic opportunities etc. II COMMUNALISM AS A RESULT OF RELATIVE DEPRIVATION Relative deprivation may not be real deprivation. It is a perceived deprivation- because one community may possess more wealth and economic resources/ materialistic wealth than another community. So, the community having lesser access to materialistic wealth tends to feel deprived. Therefore, relative is always in comparison to someone (or something) else. India preached a socialistic pattern of development, but practiced capitalism. Hence, development was 2 fold:- 1) IT FAILED TO ADDRESS THE PROBLEMS OF POVERTY AND UNEMPLOYMENT COMPLETELY This breeded frustration, apathy etc. in the country. 2) IT AGGRAVATED THE ALREADY EXISTING INEQUALITY The have"s- If the government works forthe welfare of the "have nots", it is perceived as a sign of "minority appeasement" Have not"s - If the government does not work for the welfare of the ‘have nots, then they come to believe that they are marginalised and dominated by the majority class. 2.1) According to Sachar Committee (it is a very old community, but no community has sat on the issue so there have been no recent findings), the Muslims constitute the most deprived section vis-à-vis employment, literacy, administrative and political representation in the country. Communalism is acting as the biggest threat to the fabric of our nation. Hence, the government, as well as the communities have to take pro-active steps to control it.
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##Question:Communalism arises either due to power struggle or relative deprivation. Discuss (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION The meaning of communalism (The meaning provided in the answer, is as per that that is written in NCERT). - I COMMUNALISM AS A RESULT OF POWER STRUGGLE - II COMMUNALISM AS A RESULT OF RELATIVE DEPRIVATION - CONCLUSION (The conclusion provided here is that that was provided by Smriti Ma’am in class).Ma’am stated that, in the conclusion, if someone wants, they may provide specific suggestions, however, it is not the requirement of this question. ANSWER:- In everyday language, the word ‘communalism’ means aggressive chauvinism based on religious identity. Chauvinism refers to an attitude that sees one’s own group as the only legitimate or worthy group, with other groups being seen as inferior, illegitimate and opposed. Therefore, communalism is an aggressive political ideology linked to religion. This is a peculiarly Indian, or perhaps a South Asian concept. The roots of communalism, in India, were laid down by the Britishers. The main reason for communalism, has been the power struggle(s) or relative deprivation. I COMMUNALISM AS A RESULT OF POWER STRUGGLE The power struggle between the upper strata also manufactured communalism. It manifests due to/ as: 1) IMPLICIT ACCEPTANCE OF DIFFERENCES There was an implicit acceptance that the communities only shared economic and political interests and that they were, however, socially and culturally different. 2) HINDU TOUCH WAS GIVEN TO THE NATIONAL AGENDA For example, the celebration of the Ganesh festival, Shivaji festival, taking a dip in the Ganga etc. provided a Hindu, rather than a secular tinch to the freedom struggle of India. 3) OVER-EMPHASISING THE ANCIENT INDIAN CULTURE Along with the under-mining of medieval Indian culture, the over-emphasis on the ancient Indian culture led to resentment, among educated Muslims and led to their alienation from the freedom struggle. History was divided along communal lines, such as the Hindu Rule (Ancient Indian History) and the Muslim Rule (Medieval Indian History). Even post-independence, the government failed to come to terms with communalism, due to lack of cultural integration, lack of socio-economic opportunities etc. II COMMUNALISM AS A RESULT OF RELATIVE DEPRIVATION Relative deprivation may not be real deprivation. It is a perceived deprivation- because one community may possess more wealth and economic resources/ materialistic wealth than another community. So, the community having lesser access to materialistic wealth tends to feel deprived. Therefore, relative is always in comparison to someone (or something) else. India preached a socialistic pattern of development, but practiced capitalism. Hence, development was 2 fold:- 1) IT FAILED TO ADDRESS THE PROBLEMS OF POVERTY AND UNEMPLOYMENT COMPLETELY This breeded frustration, apathy etc. in the country. 2) IT AGGRAVATED THE ALREADY EXISTING INEQUALITY The have"s- If the government works forthe welfare of the "have nots", it is perceived as a sign of "minority appeasement" Have not"s - If the government does not work for the welfare of the ‘have nots, then they come to believe that they are marginalised and dominated by the majority class. 2.1) According to Sachar Committee (it is a very old community, but no community has sat on the issue so there have been no recent findings), the Muslims constitute the most deprived section vis-à-vis employment, literacy, administrative and political representation in the country. Communalism is acting as the biggest threat to the fabric of our nation. Hence, the government, as well as the communities have to take pro-active steps to control it.
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"भारत में 1991 के आर्थिक सुधारों ने अब तक चली आ रही औद्योगिक नीतियों में आमूलचूल परिवर्तन स्थापित किया।" चर्चा कीजिए। (10 अंक /150-200 शब्द) "The 1991 economic reforms in India marked a paradigm shift in the industrial policies of the past." Discuss (10 Marks /150-200 words)
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Approach: भूमिका में 1991 के आर्थिक सुधारों की पृष्ठभूमि की संक्षिप्त चर्चा कीजिए। 1991 के आर्थिक सुधारों से पहले भारत में औद्योगिक नीतियों की विशेषताओं की चर्चा कीजिए। इन नीतियों में 1991 के आर्थिक सुधारों से किस प्रकार परिवर्तन हुआ स्पष्ट कीजिए। निष्कर्ष में इन सुधाओं के महत्व की चर्चा कर सकते हैं। उत्तर- भारत 1990 में आर्थिक संकट से गुजर रहा था। देश भुगतान संतुलन,निम्न आर्थिक विकास दर, निम्न औद्योगिक विकास, उच्च ऋण के दौर से गुजर रहा था। भारत को इस अर्थव्यवस्था संकट से निकालने के लिए बड़े स्तर पर आर्थिक सुधार किए गए। इन्हे एलपीजी (उदारीकरण, निजीकरण व वैश्वीकरण) सुधार भी कहा जाता है। इन सुधारों ने अब तक चली आ रही नीतियों में एक बड़ा बदलाव करते हुए न केवल घरेलू बाज़ार को निजी क्षेत्रक के लिए खोला बल्कि विदेशी निवेश के लिए भी बाज़ार खोले। 1991 से पहले की औद्योगिक नीतियों की कुछ मुख्य विशेषताएँ 1991 से पहले की पहले की नीतियाँ सार्वजनिक क्षेत्र के पक्ष में अत्यधिक पक्षपाती थी क्योंकि 17 औद्योगिक क्षेत्र विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित थे। शेष क्षेत्रों में भी अर्थव्यवस्था के हित में सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई स्थापित कर सकती थी। शेष क्षेत्रों को हालांकि निजी क्षेत्रों के लिए खोल दिया गया था। लेकिन व्यवसाय शुरू होने से पहले निजी कंपनी को लाइसेन्स नीति व पंजीकरण प्रक्रिया को पूरा करना होता था। इस प्रकार औद्योगिक क्षेत्र सरकार द्वारा अत्यधिक विनियमित था। यह राष्ट्रीयकरण का भी युग था जैसे कि बैंकिंग क्षेत्र बीमा क्षेत्र कोयला क्षेत्रक आदि को सरकार ने अपने अधीन कर लिया था। साथ ही साथ सरकार द्वारा औद्योगिक उत्पादों की कीमतें भी सरकार द्वारा नियंत्रित कर दी गयी थी। सभी नीतियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को एक मिश्रित अर्थव्यवस्था के रूप में उल्लेख किया था जो कि निजी क्षेत्रों पर नियंत्रण के कारण वास्तविकता की बजाय एक दर्शन मात्र से अधिक नहीं था। 1969 का MRTP एक्ट कंपनियों की अवधारणा लाया जो कि वह कंपनियाँ थी जिनके पास 100 करोड़ से अधिक की निवल संपत्तियाँ थी। अधिनियम का मानना था कि जैसे जैसे इन कंपनियों का आकार बढ़ता जाएगा यह अनुचित व्यापार प्रथाओं और उपभोक्ताओं के शोषण का सहारा ले सकते हैं। इसलिए इन कंपनियों की सभी गतिविधियाँ सरकार के संदेह के घेरे में आ गयी। सरकार की भूमिका एक नियामक और औद्योगिक क्षेत्र के निर्माता के रूप में उभर कर आई। सभी नीतियों ने लघु उद्योगों के लिए आरक्षण का समर्थन किया। कुल मिलाकर 1991 के पहले की नीतियों में सार्वजनिक क्षेत्र का प्रभुत्व था और साथ ही साथ निजी क्षेत्र को प्रशासित करना और एक सख्त लाइसेन्स प्रणाली का इस्तेमाल शामिल था। 1991 की औद्योगिक नीति से हुए बदलाव: लाइसेन्स प्रणाली का सरलीकरण -लाइसेन्स राज परमिट राज, कोटा राज, इंस्पेक्टर राज की समाप्ति करते हुए लाइसेन्स को केवल 4 क्षेत्रकों तक सीमित कर दिया गया। केवल डृग एवं फर्मास्यूटिकल, विस्फोटक; किसी भी प्रकार की वाइन, स्पिरिट, सिगरेट; खतरनाक रसायन को छोडकर अन्य के लिए लाइसेन्स की समाप्ति। सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित क्षेत्रकों में कमी – आर्थिक सुधारों से पहले जहां अधिकतर क्षेत्रक सार्वजनिक क्षेत्रक के लिए सुरक्षित थे और निजी क्षेत्रक बहुत ही सीमित रूप में मौजूद था। इसमें ढील देते हुए सार्वजनिक क्षेत्रक के लिए सुरक्षित क्षेत्रकों की संख्या को 17 से घटाकर 5 (रक्षा क्षेत्रक, हथियार निर्माण, परमाणु ऊर्जा, रेल्वे, कुछ खनिज पदार्थ) अब इन क्षेत्रकों को छोडकर सभी क्षेत्रकों को निजी क्षेत्रकों के लिए खोल दिया गया। MRTP एक्ट में संशोधन व 2007 में प्रतिस्पर्द्धा अधिनियम 2002 से प्रतिस्थापित कर दिया विदेशी निवेश में सुधार - इन सुधारों को वैश्वीकरण के माध्यम से लागू किया गया। देश में निवेश अब तक बहुत ही सीमित था। इसमें सुधार करते हुए करीब 33 औद्योगिक क्षेत्रकों में विदेशी निवेश की अनुमति दी। विदेशी तकनीकी समझौता – भारतीय कंपनियों को विदेशो से तकनीकी आयात करने की अनुमति प्रदान की। 1991 के आर्थिक सुधार भारतीय अर्थव्यवस्था में एक बड़ा बदलाव था। यह इन्हीं आर्थिक सुधारों का ही परिणाम था की भारत 21 वीं सदी के प्रथम दशक में तीव्र संवृद्धि वाली विकासशील अर्थव्यवस्था में शामिल हुई और भारत अब एक वृहत अर्थव्यवस्था बन चुका है।
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##Question:"भारत में 1991 के आर्थिक सुधारों ने अब तक चली आ रही औद्योगिक नीतियों में आमूलचूल परिवर्तन स्थापित किया।" चर्चा कीजिए। (10 अंक /150-200 शब्द) "The 1991 economic reforms in India marked a paradigm shift in the industrial policies of the past." Discuss (10 Marks /150-200 words)##Answer:Approach: भूमिका में 1991 के आर्थिक सुधारों की पृष्ठभूमि की संक्षिप्त चर्चा कीजिए। 1991 के आर्थिक सुधारों से पहले भारत में औद्योगिक नीतियों की विशेषताओं की चर्चा कीजिए। इन नीतियों में 1991 के आर्थिक सुधारों से किस प्रकार परिवर्तन हुआ स्पष्ट कीजिए। निष्कर्ष में इन सुधाओं के महत्व की चर्चा कर सकते हैं। उत्तर- भारत 1990 में आर्थिक संकट से गुजर रहा था। देश भुगतान संतुलन,निम्न आर्थिक विकास दर, निम्न औद्योगिक विकास, उच्च ऋण के दौर से गुजर रहा था। भारत को इस अर्थव्यवस्था संकट से निकालने के लिए बड़े स्तर पर आर्थिक सुधार किए गए। इन्हे एलपीजी (उदारीकरण, निजीकरण व वैश्वीकरण) सुधार भी कहा जाता है। इन सुधारों ने अब तक चली आ रही नीतियों में एक बड़ा बदलाव करते हुए न केवल घरेलू बाज़ार को निजी क्षेत्रक के लिए खोला बल्कि विदेशी निवेश के लिए भी बाज़ार खोले। 1991 से पहले की औद्योगिक नीतियों की कुछ मुख्य विशेषताएँ 1991 से पहले की पहले की नीतियाँ सार्वजनिक क्षेत्र के पक्ष में अत्यधिक पक्षपाती थी क्योंकि 17 औद्योगिक क्षेत्र विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित थे। शेष क्षेत्रों में भी अर्थव्यवस्था के हित में सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई स्थापित कर सकती थी। शेष क्षेत्रों को हालांकि निजी क्षेत्रों के लिए खोल दिया गया था। लेकिन व्यवसाय शुरू होने से पहले निजी कंपनी को लाइसेन्स नीति व पंजीकरण प्रक्रिया को पूरा करना होता था। इस प्रकार औद्योगिक क्षेत्र सरकार द्वारा अत्यधिक विनियमित था। यह राष्ट्रीयकरण का भी युग था जैसे कि बैंकिंग क्षेत्र बीमा क्षेत्र कोयला क्षेत्रक आदि को सरकार ने अपने अधीन कर लिया था। साथ ही साथ सरकार द्वारा औद्योगिक उत्पादों की कीमतें भी सरकार द्वारा नियंत्रित कर दी गयी थी। सभी नीतियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को एक मिश्रित अर्थव्यवस्था के रूप में उल्लेख किया था जो कि निजी क्षेत्रों पर नियंत्रण के कारण वास्तविकता की बजाय एक दर्शन मात्र से अधिक नहीं था। 1969 का MRTP एक्ट कंपनियों की अवधारणा लाया जो कि वह कंपनियाँ थी जिनके पास 100 करोड़ से अधिक की निवल संपत्तियाँ थी। अधिनियम का मानना था कि जैसे जैसे इन कंपनियों का आकार बढ़ता जाएगा यह अनुचित व्यापार प्रथाओं और उपभोक्ताओं के शोषण का सहारा ले सकते हैं। इसलिए इन कंपनियों की सभी गतिविधियाँ सरकार के संदेह के घेरे में आ गयी। सरकार की भूमिका एक नियामक और औद्योगिक क्षेत्र के निर्माता के रूप में उभर कर आई। सभी नीतियों ने लघु उद्योगों के लिए आरक्षण का समर्थन किया। कुल मिलाकर 1991 के पहले की नीतियों में सार्वजनिक क्षेत्र का प्रभुत्व था और साथ ही साथ निजी क्षेत्र को प्रशासित करना और एक सख्त लाइसेन्स प्रणाली का इस्तेमाल शामिल था। 1991 की औद्योगिक नीति से हुए बदलाव: लाइसेन्स प्रणाली का सरलीकरण -लाइसेन्स राज परमिट राज, कोटा राज, इंस्पेक्टर राज की समाप्ति करते हुए लाइसेन्स को केवल 4 क्षेत्रकों तक सीमित कर दिया गया। केवल डृग एवं फर्मास्यूटिकल, विस्फोटक; किसी भी प्रकार की वाइन, स्पिरिट, सिगरेट; खतरनाक रसायन को छोडकर अन्य के लिए लाइसेन्स की समाप्ति। सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित क्षेत्रकों में कमी – आर्थिक सुधारों से पहले जहां अधिकतर क्षेत्रक सार्वजनिक क्षेत्रक के लिए सुरक्षित थे और निजी क्षेत्रक बहुत ही सीमित रूप में मौजूद था। इसमें ढील देते हुए सार्वजनिक क्षेत्रक के लिए सुरक्षित क्षेत्रकों की संख्या को 17 से घटाकर 5 (रक्षा क्षेत्रक, हथियार निर्माण, परमाणु ऊर्जा, रेल्वे, कुछ खनिज पदार्थ) अब इन क्षेत्रकों को छोडकर सभी क्षेत्रकों को निजी क्षेत्रकों के लिए खोल दिया गया। MRTP एक्ट में संशोधन व 2007 में प्रतिस्पर्द्धा अधिनियम 2002 से प्रतिस्थापित कर दिया विदेशी निवेश में सुधार - इन सुधारों को वैश्वीकरण के माध्यम से लागू किया गया। देश में निवेश अब तक बहुत ही सीमित था। इसमें सुधार करते हुए करीब 33 औद्योगिक क्षेत्रकों में विदेशी निवेश की अनुमति दी। विदेशी तकनीकी समझौता – भारतीय कंपनियों को विदेशो से तकनीकी आयात करने की अनुमति प्रदान की। 1991 के आर्थिक सुधार भारतीय अर्थव्यवस्था में एक बड़ा बदलाव था। यह इन्हीं आर्थिक सुधारों का ही परिणाम था की भारत 21 वीं सदी के प्रथम दशक में तीव्र संवृद्धि वाली विकासशील अर्थव्यवस्था में शामिल हुई और भारत अब एक वृहत अर्थव्यवस्था बन चुका है।
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विभिन्न तथ्यों एवं आकड़ों के माध्यम से भारत में वर्तमान रोजगार परिदृश्य का विश्लेषण करते हुए रोजगार सृजन के लिए उठाए जा सकने वाले कदमों की व्याख्या कीजिए। (150-200 शब्द, अंक-10) Through various facts and figures analyze the present employment scenario in India and explain the steps that can be taken for employment generation.(150-200 words, Words-10)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: उत्तर के पहले भाग में आकड़ों एवं तथ्यों के माध्यम से रोजगार परिदृश्य को स्पष्ट कीजिए। इन आकड़ों के माध्यम से बेरोजगारी की स्थिति को स्पष्ट कीजिए अंत में रोजगार सृजन के लिए सुझाव दीजिए। भारत में एनएसएसओ, श्रम ब्यूरो, आर्थिक सर्वेक्षण आदि स्रोत हैं जिसके माध्यम से रोजगार संबंधी आकड़ें प्राप्त होते हैं। हाल ही में जारी आकडें जो विगत दशक के नमूनों पर आधारित है का विश्लेषण करने पर रोजगार का निम्नलिखित परिदृश्य प्राप्त होता है: भारत में श्रम बल भागीदारी 2011-12 के 39.5% से घटकर 2017-18 में 39.6 रह गयी है। 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के कार्यबल में 22% महिलाओं की तुलना में पुरुषों की भागीदारी 71% है। श्रमिक जनसंख्या अनुपात ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में गिरावट गैर कृषि क्षेत्र में संलग्न श्रमिकों की भागीदारी 40.9% से घटकर 28.9% हो गयी है। ग्रामीण क्षेत्र में महिलाओं की तुलना में पुरुष अधिक संख्या में बेरोजगार हैं आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार बेरोजगारी दर 6.1 % है उपर्युक्त तथ्यों/आकड़ों से स्पष्ट है कि श्रम बल भागीदारी में कमी हुई है। रोजगार में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है परंतु सम्पूर्ण रूप अभी जनसंख्या का बहुत बड़ा भाग बेरोजगार है। इस प्रकार की स्थिति में योगदान देने वाले कारक: उद्योग अकादमी सामंजस्य का अभाव विमुद्रीकरण के कारण छोटे उद्यमों को नुकसान स्वैछिक रोजगार को वरीयता कृषि का पिछड़ापन रोजगार के सृजन के लिए उठाए जा सकने वाले कदम: श्रम गहन क्षेत्रों के विकास की ओर ध्यान केन्द्रित करना कार्यबल का औपचारिकरण जीएसटी संबंधी अनुपलन प्रक्रिया को सरल करना सरकारी नौकरियों के सृजन हेतु स्वास्थ्य, शिक्षा, पुलिस और न्यायपालिका जैसे क्षेत्रों में सार्वजनिक निवेश को बढ़ाया जाना सरकार द्वारा वेतन संबंधी अंतरों को कम करने और देश के कार्यबल में अधिक से अधिक महिलाओं को शामिल करने हेतु सुधार करना। MSME क्षेत्रक में रोजगार सृजन के लिए निवेश को बढ़ावा देना।
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##Question:विभिन्न तथ्यों एवं आकड़ों के माध्यम से भारत में वर्तमान रोजगार परिदृश्य का विश्लेषण करते हुए रोजगार सृजन के लिए उठाए जा सकने वाले कदमों की व्याख्या कीजिए। (150-200 शब्द, अंक-10) Through various facts and figures analyze the present employment scenario in India and explain the steps that can be taken for employment generation.(150-200 words, Words-10)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: उत्तर के पहले भाग में आकड़ों एवं तथ्यों के माध्यम से रोजगार परिदृश्य को स्पष्ट कीजिए। इन आकड़ों के माध्यम से बेरोजगारी की स्थिति को स्पष्ट कीजिए अंत में रोजगार सृजन के लिए सुझाव दीजिए। भारत में एनएसएसओ, श्रम ब्यूरो, आर्थिक सर्वेक्षण आदि स्रोत हैं जिसके माध्यम से रोजगार संबंधी आकड़ें प्राप्त होते हैं। हाल ही में जारी आकडें जो विगत दशक के नमूनों पर आधारित है का विश्लेषण करने पर रोजगार का निम्नलिखित परिदृश्य प्राप्त होता है: भारत में श्रम बल भागीदारी 2011-12 के 39.5% से घटकर 2017-18 में 39.6 रह गयी है। 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के कार्यबल में 22% महिलाओं की तुलना में पुरुषों की भागीदारी 71% है। श्रमिक जनसंख्या अनुपात ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में गिरावट गैर कृषि क्षेत्र में संलग्न श्रमिकों की भागीदारी 40.9% से घटकर 28.9% हो गयी है। ग्रामीण क्षेत्र में महिलाओं की तुलना में पुरुष अधिक संख्या में बेरोजगार हैं आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार बेरोजगारी दर 6.1 % है उपर्युक्त तथ्यों/आकड़ों से स्पष्ट है कि श्रम बल भागीदारी में कमी हुई है। रोजगार में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है परंतु सम्पूर्ण रूप अभी जनसंख्या का बहुत बड़ा भाग बेरोजगार है। इस प्रकार की स्थिति में योगदान देने वाले कारक: उद्योग अकादमी सामंजस्य का अभाव विमुद्रीकरण के कारण छोटे उद्यमों को नुकसान स्वैछिक रोजगार को वरीयता कृषि का पिछड़ापन रोजगार के सृजन के लिए उठाए जा सकने वाले कदम: श्रम गहन क्षेत्रों के विकास की ओर ध्यान केन्द्रित करना कार्यबल का औपचारिकरण जीएसटी संबंधी अनुपलन प्रक्रिया को सरल करना सरकारी नौकरियों के सृजन हेतु स्वास्थ्य, शिक्षा, पुलिस और न्यायपालिका जैसे क्षेत्रों में सार्वजनिक निवेश को बढ़ाया जाना सरकार द्वारा वेतन संबंधी अंतरों को कम करने और देश के कार्यबल में अधिक से अधिक महिलाओं को शामिल करने हेतु सुधार करना। MSME क्षेत्रक में रोजगार सृजन के लिए निवेश को बढ़ावा देना।
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Discuss the various view points regarding starting or beginning of modern India. (150 words | 10 marks)
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Approach- Introduction –give an overview regarding different views of the beginning of modern India. Discuss the different views and related important aspects. Conclude with the most accepted view. Answer- Different scholars have different views regarding the beginning of modern India. The viewpoints can be divided into various heads such as - theadvent of Europeans, the death of Aurangzeb, Plassey, Battle of Buxar, end of dual government in Bengal in 1772, and the First war of independence in 1857 and the start of the crown rule in 1858. The advent of European companies – According to some schools of historian modern India started with the advent of European companies. Portuguese, Dutch, English, Danes, and French came with new modern ideas and they impacted the social, political, economic structure of India. They introduce a secular type of administration, rule of law, new dresses outfits, cultivation of new crops, printing press and new religious outlook, etc. Death of Aurangzeb – He was the last powerful emperor of the Mughal empire bur after his death in the 1707 Mughal empire was started to decline. The declining process which was started in 1707 ended in 1748 Battle of Plassey – According to JN Sarkar, modern India was started in India just after the battle of Plassey as the merchant became ruler and the company got its own land in India in the form of 24 Pargana. It became the source of revenue and drain of wealth started Battle of Buxar – According to some historians, modern India was started just after the battle of Buxar as Mughal Emperor Shah Alam II was defeated by the company and got Diwani right of Bengal, Bihar, and Orrisa along with Faujdari. The year 1772 end of Dual government in Bengal– The company became Nawab of Bengal in 1772 after ending the dual system and the company started making policies for the whole of India for a long time such as Judicial policies, civil policies, etc. These policies have long impacted the whole socio-economic and political structure of India. Rule of law started. The year 1858 – After the revolt of 1857 company rule was ended and the crown rule was started in India and entire India became a part of British administration. This was seen as the new paradigm in modern India. The most accepted view is given by Sir J.N. Sarkar, he was of the view that modern Indian history started after the battle of Plassey. This was seen as the important event which firmly established the British in India and paved the way for British raj which ended in 1947.
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##Question:Discuss the various view points regarding starting or beginning of modern India. (150 words | 10 marks)##Answer:Approach- Introduction –give an overview regarding different views of the beginning of modern India. Discuss the different views and related important aspects. Conclude with the most accepted view. Answer- Different scholars have different views regarding the beginning of modern India. The viewpoints can be divided into various heads such as - theadvent of Europeans, the death of Aurangzeb, Plassey, Battle of Buxar, end of dual government in Bengal in 1772, and the First war of independence in 1857 and the start of the crown rule in 1858. The advent of European companies – According to some schools of historian modern India started with the advent of European companies. Portuguese, Dutch, English, Danes, and French came with new modern ideas and they impacted the social, political, economic structure of India. They introduce a secular type of administration, rule of law, new dresses outfits, cultivation of new crops, printing press and new religious outlook, etc. Death of Aurangzeb – He was the last powerful emperor of the Mughal empire bur after his death in the 1707 Mughal empire was started to decline. The declining process which was started in 1707 ended in 1748 Battle of Plassey – According to JN Sarkar, modern India was started in India just after the battle of Plassey as the merchant became ruler and the company got its own land in India in the form of 24 Pargana. It became the source of revenue and drain of wealth started Battle of Buxar – According to some historians, modern India was started just after the battle of Buxar as Mughal Emperor Shah Alam II was defeated by the company and got Diwani right of Bengal, Bihar, and Orrisa along with Faujdari. The year 1772 end of Dual government in Bengal– The company became Nawab of Bengal in 1772 after ending the dual system and the company started making policies for the whole of India for a long time such as Judicial policies, civil policies, etc. These policies have long impacted the whole socio-economic and political structure of India. Rule of law started. The year 1858 – After the revolt of 1857 company rule was ended and the crown rule was started in India and entire India became a part of British administration. This was seen as the new paradigm in modern India. The most accepted view is given by Sir J.N. Sarkar, he was of the view that modern Indian history started after the battle of Plassey. This was seen as the important event which firmly established the British in India and paved the way for British raj which ended in 1947.
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The Rajya Sabha is merely a secondary house rather than a second house in the Indian Parliamentary system. Analyze the statement. (150 words|10 marks)
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Approach : Introduce an answer by referring to the parliament. Highlight the powers of Rajya Sabha which are equal to Lok Sabha. List the circumstances where Rajya Sabha are not having equal power to Lok Sabha. Answer : Parliament has two houses one Lok Sabha and the second Rajya Sabha. Rajya Sabha has been created on the principle of equality between two houses which can be seen in the following points except for a few circumstances. Both houses have equal powers in the following ways - Passing of ordinary bills, constitutional amendments bill, a financial bill involving expenditure from the Consolidated Fund of India and election and impeachment of the president. Making recommendations to the President for the removal of Chief Justice and judges of Supreme Court and high courts, chief election commissioner and comptroller and auditor general. Approval of ordinances issued by the president and also of all three types of emergencies. Consideration of the reports of the constitutional bodies like Finance Commission, Union Public Service Commission, comptroller and auditor general, etc. Enlargement of the jurisdiction of the Supreme Court and the Union Public Service Commission. By seeing the above-mentioned provisions it is clear that Rajya Sabha is as crucial as Lok Sabha and it is the second house for carrying out many constitutional duties. It is not the secondary house. But there are various instances where Rajya Sabha doesn’t have equal power with Lok Sabha - Regarding all aspects of a Money, Bill Rajya Sabha has no power as Lok Sabha can reject all the recommendation of Rajya Sabha and pass money bill also Speaker of Lok Sabha decides which bill is a money bill. The Speaker of Lok Sabha presides over the joint sitting of both the Houses. RajyaSabha can only discuss the budget but cannot vote on the demands for grants (which is the exclusive privilege of the Lok Sabha). A resolution for the discontinuance of the national emergency can be passed only by the LokSabha and not by the Rajya Sabha. A Chamber not Concerned with Government Formation: The Government of the day is collectively responsible to the House of People, the directly elected House. Rajya Sabha being an indirectly elected House has no role in the making or unmaking of the Government. It also can pass No-Confidence Motion. But same time as Rajya Sabha was designed for the purpose of representing the interests of States but there have been various instances in contemporary functioning of parliament that this role has been questioned. It can be seen by the following analysis - As a Second Chamber, it has the mandate to secure a second sober look at hasty legislation. RajyaSabha had recommended changes in the Bills passed by LokSabha and those changes were, in fact, carried out eventually. Among some of the important Bills revised are the Income Tax Amendment) Bill, 1961 and the National Honour Bill, 1971 wherein some substantial amendments suggested by the RajyaSabha were accepted by the LokSabha. But recently in various cases, it has been seen changes suggested are ignored by Lok Sabha as in the case of Financial Bill 2016, etc. As a Federal Chamber - As Rajya Sabha was to represent states but the problem has been exacerbated by the Kuldip Nayar judgment which removed the requirement of domicile. It has now been misinterpreted for political expediency. As the recent Rajya Sabha elections show, we now have MPs who are representing a State to which they do not belong. Many instances when the ruling party does not enjoy a majority in Rajya Sabha have passed legislation bypassing Rajya Sabha. It was done recently in the case of the Aadhaar bill which was introduced as a money bill. It actually violates the constitution, as according to the definition of money bill given under article 110, Aadhar bill didn’t meet criteria to be declared as a money bill. Also, the speaker is a soul decision maker whether a bill is a money bill or not and also his decision is beyond judicial review this has exacerbated the situation and allowed bypassing Rajya Sabha. This way it can be said clearly that Rajya Sabha plays a significant role in the parliamentary democratic framework of the country. It should be allowed to fulfill its role and function as it was desired by our constitutional makers. It should not be allowed to be diluted as the secondary chamber and regarding this necessary reform should be done.
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##Question:The Rajya Sabha is merely a secondary house rather than a second house in the Indian Parliamentary system. Analyze the statement. (150 words|10 marks)##Answer:Approach : Introduce an answer by referring to the parliament. Highlight the powers of Rajya Sabha which are equal to Lok Sabha. List the circumstances where Rajya Sabha are not having equal power to Lok Sabha. Answer : Parliament has two houses one Lok Sabha and the second Rajya Sabha. Rajya Sabha has been created on the principle of equality between two houses which can be seen in the following points except for a few circumstances. Both houses have equal powers in the following ways - Passing of ordinary bills, constitutional amendments bill, a financial bill involving expenditure from the Consolidated Fund of India and election and impeachment of the president. Making recommendations to the President for the removal of Chief Justice and judges of Supreme Court and high courts, chief election commissioner and comptroller and auditor general. Approval of ordinances issued by the president and also of all three types of emergencies. Consideration of the reports of the constitutional bodies like Finance Commission, Union Public Service Commission, comptroller and auditor general, etc. Enlargement of the jurisdiction of the Supreme Court and the Union Public Service Commission. By seeing the above-mentioned provisions it is clear that Rajya Sabha is as crucial as Lok Sabha and it is the second house for carrying out many constitutional duties. It is not the secondary house. But there are various instances where Rajya Sabha doesn’t have equal power with Lok Sabha - Regarding all aspects of a Money, Bill Rajya Sabha has no power as Lok Sabha can reject all the recommendation of Rajya Sabha and pass money bill also Speaker of Lok Sabha decides which bill is a money bill. The Speaker of Lok Sabha presides over the joint sitting of both the Houses. RajyaSabha can only discuss the budget but cannot vote on the demands for grants (which is the exclusive privilege of the Lok Sabha). A resolution for the discontinuance of the national emergency can be passed only by the LokSabha and not by the Rajya Sabha. A Chamber not Concerned with Government Formation: The Government of the day is collectively responsible to the House of People, the directly elected House. Rajya Sabha being an indirectly elected House has no role in the making or unmaking of the Government. It also can pass No-Confidence Motion. But same time as Rajya Sabha was designed for the purpose of representing the interests of States but there have been various instances in contemporary functioning of parliament that this role has been questioned. It can be seen by the following analysis - As a Second Chamber, it has the mandate to secure a second sober look at hasty legislation. RajyaSabha had recommended changes in the Bills passed by LokSabha and those changes were, in fact, carried out eventually. Among some of the important Bills revised are the Income Tax Amendment) Bill, 1961 and the National Honour Bill, 1971 wherein some substantial amendments suggested by the RajyaSabha were accepted by the LokSabha. But recently in various cases, it has been seen changes suggested are ignored by Lok Sabha as in the case of Financial Bill 2016, etc. As a Federal Chamber - As Rajya Sabha was to represent states but the problem has been exacerbated by the Kuldip Nayar judgment which removed the requirement of domicile. It has now been misinterpreted for political expediency. As the recent Rajya Sabha elections show, we now have MPs who are representing a State to which they do not belong. Many instances when the ruling party does not enjoy a majority in Rajya Sabha have passed legislation bypassing Rajya Sabha. It was done recently in the case of the Aadhaar bill which was introduced as a money bill. It actually violates the constitution, as according to the definition of money bill given under article 110, Aadhar bill didn’t meet criteria to be declared as a money bill. Also, the speaker is a soul decision maker whether a bill is a money bill or not and also his decision is beyond judicial review this has exacerbated the situation and allowed bypassing Rajya Sabha. This way it can be said clearly that Rajya Sabha plays a significant role in the parliamentary democratic framework of the country. It should be allowed to fulfill its role and function as it was desired by our constitutional makers. It should not be allowed to be diluted as the secondary chamber and regarding this necessary reform should be done.
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विऔद्योगीकरण से आप क्या समझते हैं ? ब्रिटिश भारत में विऔद्योगीकरण के कारणों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द; 10 अंक ) What do you understand by de-industrialization? Briefly discuss the reasons for de-industrialization in British India. (150-200 words; 10 marks)
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दृष्टिकोण : विऔद्योगीकरण को परिभाषित करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । ब्रिटिश भारत में विऔद्योगीकरण को प्रेरित करने वाले प्रमुख कारणों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । विऔद्योगीकरण के प्रभावों की चर्चा करते हुए संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : विऔद्योगीकरण का अर्थ है किसी देश या क्षेत्र में औद्योगिक क्रियाकलापों का क्रमशः कम होना तथा उससे सम्बन्धित सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन। यह औद्योगीकरण की विपरीत प्रक्रिया है। भारत के विशेष संदर्भ में विऔद्योगीकरण से तात्पर्य है ब्रिटिश काल में ब्रिटिश नीतियों के कारण भारतीय हस्तशिल्प उद्योगों का पतन व इसके बदले आधुनिक उद्योगों का विकास न होना । ब्रिटिश भारत में विऔद्योगीकरण के कारण : ईस्ट इंडिया कंपनी का राजनीतिक शक्ति के रूप में उदय : कंपनी ने लगभग 100 वर्षों में हिंदुस्तान के एक बड़े भूभाग पर नियंत्रण स्थापित किया । जैसे जैसे कंपनी का विकास हुआ वैसे वैसे भारतीय उद्योगों को नुकसान भी ।कंपनी के विस्तार के साथ भारतीय राज्यों का पतन हुआ । ये राज्य स्वदेशी उद्योगों के बड़े खरीदार थे । जैसे - हथियार उद्योग, विलासिता संबंधी उद्योग । इनके पतन के साथ इन उद्योगों का भी पतन हुआ । कारीगरों पर अत्याचार : कंपनी ने राजनीतिक शक्ति का दुरुपयोग कर आर्थिक लाभ के लिए कारीगरों पर अत्याचार किया ।जैसे - कम कीमत पर उत्पादों को बेचने के लिए बाध्य करना , कम मजदूरी पर कार्य कराना, प्रतिद्वंदीयों के यहाँ कार्य करने से रोकना इत्यादि । इससे तंग आकर कई कारीगरों ने काम छोड़ दिया । औद्योगिक क्रांति एवं भारतीय उद्योगों को नुकसान : भारत में विऔद्योगीकरण का यह सर्वप्रमुख कारण था । 18 वीं सदी के उतरार्द्ध में ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति हुई । ब्रिटिश समाज में उद्योगपतियों का महत्व बढ़ा ।ये उपनिवेशों को बाजार एवं कच्चे मालों के स्रोतों के रूप में स्थापित करना चाहते थे । इनके दबाव में उपनिवेश संबंधी नीतियों में परिवर्तन हुआ और इसका व्यापक नुकसान भारतीय उद्योगों को हुआ । मुक्त व्यापार की नीति : 1813 में न केवल कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार समाप्त किया गया बल्कि मुक्त व्यापार की नीति भी भारत में लागू की गई ।अर्थात ब्रिटिश वस्तुओं को भारत में सीमा शुल्क नहीं देने थे । मशीनी वस्तुओं से भारतीय उत्पादों को आसमान प्रतियोगिता का सामना करना पड़ा और भारतीय उत्पाद प्रतियोगिता में पिछड़ गए । एकतरफा मुक्त व्यापार की नीति : एक तरफ भारतीय वस्तुओं को भारतीय बाजारों से वंचित किया गया तो दूसरी तरफ भारतीय उत्पादों पर ब्रिटेन में सीमा शुल्क आरोपित किये गए और ब्रिटिश बाजारों से भी वंचित होना पड़ा । कच्चे मालों का निर्यात : औद्योगिक क्रांति के कारण भारत से बड़े पैमाने पर कच्चे मालों का निर्यात भी किया जाने लगा । जैसे - कपास, नील , इत्यादि । इससे कच्चे मालों का अभाव एवं कीमतें बढ़ी तथा भारतीय उत्पाद महंगे हुए । अन्तर्देशीय सीमा शुल्क : भारत में कंपनी की सरकार ने अन्तर्देशीय सीमा शुल्क की नीति का पालन कर भी भारतीय उद्योगों को हतोत्साहित किया । ब्रिटिश वस्तुओं की खरीद : 1813 के पश्चात विशेषकर भारतीय सरकार ने प्राथमिकता के आधार पर ब्रिटिश उत्पादों को खरीदना प्रारंभ किया । जैसे - कागज , हथियार , आदि । 1813 तक भारतीय उद्योगों का पतन अवश्य हुआ । फिर भी भारतीय कपड़ों का निर्यात कंपनी की आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत था । लेकिन 1813 से 1860 के बीच भारतीय उद्योगों को सर्वाधिक नुकसान हुआ । उद्योगों का पतन क्रमश हुआ । 1855-60 के पश्चात रेलवे के कारण ग्रामीण उद्योगों को भी नुकसान हुआ क्योंकि रेलवे से पूर्व ब्रिटिश वस्तुओं की पहुँच शहरों तक थी । इस प्रकार हम देखते हैं कि ब्रिटिश नीतियों के प्रभाव में भारतीय उद्योगों का पतन हुआ और अंग्रेजों के आगमन के पूर्व जो भारत संपूर्ण विश्व की फैक्ट्री था , उसे अंग्रेजों ने कच्चे माल का निर्यातक व तैयार माल का आयतक बना दिया ।
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##Question:विऔद्योगीकरण से आप क्या समझते हैं ? ब्रिटिश भारत में विऔद्योगीकरण के कारणों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द; 10 अंक ) What do you understand by de-industrialization? Briefly discuss the reasons for de-industrialization in British India. (150-200 words; 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण : विऔद्योगीकरण को परिभाषित करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । ब्रिटिश भारत में विऔद्योगीकरण को प्रेरित करने वाले प्रमुख कारणों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । विऔद्योगीकरण के प्रभावों की चर्चा करते हुए संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : विऔद्योगीकरण का अर्थ है किसी देश या क्षेत्र में औद्योगिक क्रियाकलापों का क्रमशः कम होना तथा उससे सम्बन्धित सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन। यह औद्योगीकरण की विपरीत प्रक्रिया है। भारत के विशेष संदर्भ में विऔद्योगीकरण से तात्पर्य है ब्रिटिश काल में ब्रिटिश नीतियों के कारण भारतीय हस्तशिल्प उद्योगों का पतन व इसके बदले आधुनिक उद्योगों का विकास न होना । ब्रिटिश भारत में विऔद्योगीकरण के कारण : ईस्ट इंडिया कंपनी का राजनीतिक शक्ति के रूप में उदय : कंपनी ने लगभग 100 वर्षों में हिंदुस्तान के एक बड़े भूभाग पर नियंत्रण स्थापित किया । जैसे जैसे कंपनी का विकास हुआ वैसे वैसे भारतीय उद्योगों को नुकसान भी ।कंपनी के विस्तार के साथ भारतीय राज्यों का पतन हुआ । ये राज्य स्वदेशी उद्योगों के बड़े खरीदार थे । जैसे - हथियार उद्योग, विलासिता संबंधी उद्योग । इनके पतन के साथ इन उद्योगों का भी पतन हुआ । कारीगरों पर अत्याचार : कंपनी ने राजनीतिक शक्ति का दुरुपयोग कर आर्थिक लाभ के लिए कारीगरों पर अत्याचार किया ।जैसे - कम कीमत पर उत्पादों को बेचने के लिए बाध्य करना , कम मजदूरी पर कार्य कराना, प्रतिद्वंदीयों के यहाँ कार्य करने से रोकना इत्यादि । इससे तंग आकर कई कारीगरों ने काम छोड़ दिया । औद्योगिक क्रांति एवं भारतीय उद्योगों को नुकसान : भारत में विऔद्योगीकरण का यह सर्वप्रमुख कारण था । 18 वीं सदी के उतरार्द्ध में ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति हुई । ब्रिटिश समाज में उद्योगपतियों का महत्व बढ़ा ।ये उपनिवेशों को बाजार एवं कच्चे मालों के स्रोतों के रूप में स्थापित करना चाहते थे । इनके दबाव में उपनिवेश संबंधी नीतियों में परिवर्तन हुआ और इसका व्यापक नुकसान भारतीय उद्योगों को हुआ । मुक्त व्यापार की नीति : 1813 में न केवल कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार समाप्त किया गया बल्कि मुक्त व्यापार की नीति भी भारत में लागू की गई ।अर्थात ब्रिटिश वस्तुओं को भारत में सीमा शुल्क नहीं देने थे । मशीनी वस्तुओं से भारतीय उत्पादों को आसमान प्रतियोगिता का सामना करना पड़ा और भारतीय उत्पाद प्रतियोगिता में पिछड़ गए । एकतरफा मुक्त व्यापार की नीति : एक तरफ भारतीय वस्तुओं को भारतीय बाजारों से वंचित किया गया तो दूसरी तरफ भारतीय उत्पादों पर ब्रिटेन में सीमा शुल्क आरोपित किये गए और ब्रिटिश बाजारों से भी वंचित होना पड़ा । कच्चे मालों का निर्यात : औद्योगिक क्रांति के कारण भारत से बड़े पैमाने पर कच्चे मालों का निर्यात भी किया जाने लगा । जैसे - कपास, नील , इत्यादि । इससे कच्चे मालों का अभाव एवं कीमतें बढ़ी तथा भारतीय उत्पाद महंगे हुए । अन्तर्देशीय सीमा शुल्क : भारत में कंपनी की सरकार ने अन्तर्देशीय सीमा शुल्क की नीति का पालन कर भी भारतीय उद्योगों को हतोत्साहित किया । ब्रिटिश वस्तुओं की खरीद : 1813 के पश्चात विशेषकर भारतीय सरकार ने प्राथमिकता के आधार पर ब्रिटिश उत्पादों को खरीदना प्रारंभ किया । जैसे - कागज , हथियार , आदि । 1813 तक भारतीय उद्योगों का पतन अवश्य हुआ । फिर भी भारतीय कपड़ों का निर्यात कंपनी की आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत था । लेकिन 1813 से 1860 के बीच भारतीय उद्योगों को सर्वाधिक नुकसान हुआ । उद्योगों का पतन क्रमश हुआ । 1855-60 के पश्चात रेलवे के कारण ग्रामीण उद्योगों को भी नुकसान हुआ क्योंकि रेलवे से पूर्व ब्रिटिश वस्तुओं की पहुँच शहरों तक थी । इस प्रकार हम देखते हैं कि ब्रिटिश नीतियों के प्रभाव में भारतीय उद्योगों का पतन हुआ और अंग्रेजों के आगमन के पूर्व जो भारत संपूर्ण विश्व की फैक्ट्री था , उसे अंग्रेजों ने कच्चे माल का निर्यातक व तैयार माल का आयतक बना दिया ।
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What do you understand by Quantum computing? Briefly discuss the working of Quantum Computers and how it is different from classic computers?(150 words/10 marks)
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Approach: Introduction: Define quantum computing and why it was in the news Main Body: Discuss the working of Quantum Computers Difference between quantum computers and classic computers Conclusion : Write about India’s status related to Quantum Computing Answer: Quantum computing is the area of study focused on developing computer technology based on the principles of quantum theory, which explains the nature and behavior of energy and matter on the quantum (atomic and subatomic) level. Google’s quantum computer, named Sycamore, reportedly does the task in 200 seconds that would have apparently taken a supercomputer 10,000 years to complete. Working of Quantum Computers Quantum Computers encode information as quantum bits, or qubits, which can exist in superposition. Qubits represent atoms, ions, photons or electrons, and their respective control devices that are working together to act as computer memory and a processor. Because a quantum computer can contain these multiple states simultaneously, it has the potential to be millions of times more powerful than today"s most powerful supercomputers Application : Quantum computers could spur the development of new breakthroughs in science, medications to save lives, machine learning methods to diagnose illnesses sooner, materials to make more efficient devices and structures, financial strategies to live well in retirement, and algorithms to quickly direct resources such as ambulances. Quantum computers vs classical computer • Classical computers process information in a binary format, called bits, which can represent either a 0 or 1. Quantum computers, in contrast, use logical units called quantum bits, or qubits for short, that can be put into a quantum state where they can simultaneously represent both 0 and 1 and their correlations. • While the bits in a classical computer all operate independently from one another, in a quantum computer, the status of one qubit affects the status of all the other qubits in the system, so they can all work together to achieve a solution. There are no quantum computers in India yet. In 2018, the Department of Science & Technology unveiled a program called Quantum-Enabled Science & Technology (QuST) to accelerate research on Quantum computing.
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##Question:What do you understand by Quantum computing? Briefly discuss the working of Quantum Computers and how it is different from classic computers?(150 words/10 marks)##Answer:Approach: Introduction: Define quantum computing and why it was in the news Main Body: Discuss the working of Quantum Computers Difference between quantum computers and classic computers Conclusion : Write about India’s status related to Quantum Computing Answer: Quantum computing is the area of study focused on developing computer technology based on the principles of quantum theory, which explains the nature and behavior of energy and matter on the quantum (atomic and subatomic) level. Google’s quantum computer, named Sycamore, reportedly does the task in 200 seconds that would have apparently taken a supercomputer 10,000 years to complete. Working of Quantum Computers Quantum Computers encode information as quantum bits, or qubits, which can exist in superposition. Qubits represent atoms, ions, photons or electrons, and their respective control devices that are working together to act as computer memory and a processor. Because a quantum computer can contain these multiple states simultaneously, it has the potential to be millions of times more powerful than today"s most powerful supercomputers Application : Quantum computers could spur the development of new breakthroughs in science, medications to save lives, machine learning methods to diagnose illnesses sooner, materials to make more efficient devices and structures, financial strategies to live well in retirement, and algorithms to quickly direct resources such as ambulances. Quantum computers vs classical computer • Classical computers process information in a binary format, called bits, which can represent either a 0 or 1. Quantum computers, in contrast, use logical units called quantum bits, or qubits for short, that can be put into a quantum state where they can simultaneously represent both 0 and 1 and their correlations. • While the bits in a classical computer all operate independently from one another, in a quantum computer, the status of one qubit affects the status of all the other qubits in the system, so they can all work together to achieve a solution. There are no quantum computers in India yet. In 2018, the Department of Science & Technology unveiled a program called Quantum-Enabled Science & Technology (QuST) to accelerate research on Quantum computing.
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निर्धनता रेखा को परिभाषित कीजिये| भारत में स्वतंत्रता पश्चात, निर्धनता रेखा के निर्धारण के सबंध में बनी विभिन्न समितियों के दृष्टिकोण को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द, अंक-10 ) Define the poverty line. After the independence in India, clarify the view of various committees in relation to the determination of poverty line. (150 to 200 words, Marks-10 )
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दृष्टिकोण- 1- भूमिका में निर्धनता तथा निर्धनता रेखा को परिभाषित कीजिये| 2- मुख्य भाग में गरीबी रेखा के संदर्भ में विभिन्न समितियों की सिफारिशों को क्रमबद्धता के साथ बताएं| 3- अंतिम में सुझावात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये निर्धनता वह स्थिति है जिसमे व्यक्ति अपने जीवन निर्वाह हेतु आवश्यक न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति करने में अक्षम होता है| अर्थात निर्धनता का तात्पर्य मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के न्यूनतम संसाधनों को न जुटा पाने से है| निर्धनता की अवधारणा आर्थिक विकास, प्रति व्यक्ति आय, क्रयशक्ति एवं जनसंख्या से सम्बन्धित है| निर्धनता के 2 प्रकार होते हैं| प्रथम, निरपेक्ष निर्धनता एवं द्वितीय, सापेक्ष निर्धनता| राष्ट्रीय विकास के स्तर का आकलन, विकासात्मक योजनाओं के निर्माण तथा उनके निष्पादन के आकलन और योग्य लाभार्थियों की पहचान आदि उद्देश्यों की पूर्ति के लिए निर्धनता का मापन किया जाता है| निरपेक्ष निर्धनता के मापन के संदर्भ में निर्धनता रेखा की अवधारणा प्रस्तुत की जाती है| निर्धनता रेखा उस आय स्तर को कहते हैं जिससे कम आय होने पर व्यक्ति अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम नहीं होता है| निर्धनता रेखा अलग-अलग राष्ट्रों में अलग-अलग होती है| भारत में निर्धनता रेखा का आकलन मासिक उपभोग व्यय के संदर्भ में NSSO के आंकड़ों के आधार पर नीति आयोग द्वारा किया जाता है| यह निर्धारण विशेषज्ञ समिति द्वारा सुझाए गए मानदंडों के आधार पर किया जाता है| भारत में निर्धनता रेखा का रुपये में निर्धारण न्यूनतम पोषण प्राप्त करने हेतु खाद्य वस्तुओं पर किये जाने वाले व्यय के आधार पर किया जाता है|गरीबी रेखा तय करने की शुरुआत योजना आयोग ने 1962 में एक कार्यकारी समूह बनाकर की थी।इसने प्रचलित मूल्यों के आधार पर प्रति व्यक्ति 20 रुपये मासिक उपभोग व्यय को गरीबी रेखा माना था। भारत में गरीबी रेखा के निर्धारक मानदंडों की संस्तुति के लिए योजना आयोग/ नीति आयोग द्वारा अब तक विभिन्न विशेषज्ञ समितियां गठित की जा चुकी हैं| इन विशेषज्ञ समितियों और इनके द्वारा की गयी संस्तुतियों का क्रमबद्ध विवरण निम्नलिखित है वाई के अलघ समिति इस समिति का गठन योजना आयोग 1979 में किया गया था| अलघ समिति ने न्यूनतम पोषण आवश्यकता के आधार पर निर्धनता रेखा के निर्धारण की सिफारिश की थी| समिति ने ICMR द्वारा सुझाए गए नगरीय & ग्रामीण पोषण स्तरों को आधार बना कर नगरीय एवं ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अलग अलग पोषण मानक सुझाए| अलघ समिति की सिफारिशों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी तथा नगरीय क्षेत्रों में 2100 कैलोरी से कम उपभोग करने वाले को BPL माना था| कैलोरी उपभोग के आधार पर निर्धारित गरीबी रेखा ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 49 रूपये और नगरीय क्षेत्रों के लिए 56.64 रूपये मासिक थी डी टी लकडावाला समिति 1989 में योजना आयोग द्वारा डी टी लकडावाला की अध्यक्षता में पुनः एक कार्यदल का गठन किया गया| लकड़ावाला समिति ने भी वाई के अलघ समिति के अनुरूप न्यूनतम पोषण आवश्यकता को गरीबी रेखा के निर्धारण का मानदंड माना| इस कार्यदल ने प्रत्येक राज्य के लिए अलग-अलग निर्धनता रेखा निर्धारित की| लकडावाला समिति ने मूल्य निर्धारण के लिए मूल्य सूचकांकों को आधार बनाया| कैलोरी मानकों को समान रखा गया किन्तु मूल्यों में परिवर्तन किया गया| अब गरीबी रेखा नगरीय क्षेत्रों के लिए 281 तथा ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 205 रूपये निर्धारित की गयी थी| तेंदुलकर समिति योजना आयोग द्वारा गरीबी रेखा के पुनर्निर्धारण के संदर्भ में सुझाव देने के लिए वर्ष 2005 में प्रो.सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता में एक नई समिति का गठन किया| तेंदुलकर समिति ने न्यूनतम पोषण आवश्यकता के मानक को अस्वीकार कर आवश्यक वस्तुओं पर व्यय के आधार पर पर गरीबी रेखा का निर्धारण किया| तेंदुलकर समिति द्वारा गरीबी बास्केट की अवधारणा प्रस्तुत की गयी| समिति ने ग्रामीण क्षेत्रों में न्यूनतम व्यय 27 रूपये प्रति व्यक्ति प्रतिदिन को गरीबी रेखा माना जबकि नगरीय क्षेत्रों के लिए यह 33 रूपये प्रति व्यक्ति प्रतिदिन था| रंगराजन समिति तेंदुलकर समीति द्वारा निर्धारित गरीबी रेखा विभिन्न कारणों से विवादित रही| अतः गरीबी आकलन पद्धतियों की समीक्षा के लिए भारत सरकार द्वारा सी. रंगराजन की अध्यक्षता में एक समीक्षा समिति का गठन किया गया| समिति ने चयनित आवश्यक वस्तुओं पर किये गए न्यूनतम व्यय को ही आधार माना किन्तु तेंदुलकर समिति द्वारा सुझाए गए मूल्यों को बढ़ा कर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 32 रूपये और नगरीय क्षेत्रों के लिए 47 रूपये कर दिया| इसी के आधार पर वर्ष 2011-12 में भारत में 30% जनसंख्या को गरीब माना गया| अन्य समितियों की तरह ही रंगराजन फार्मूला भी विवादित रहा| अतः वास्तविक गरीबी रेखा के आकलन के वर्ष 2015 में अरविन्द पनगढ़िया की अध्यक्षता में एक 14 सदस्यीय टास्कफ़ोर्स का गठन किया गया|किन्तु यह दल गरीबी रेखा के निर्धारण के संदर्भ में अनिर्णीत रहा तथापि टास्कफ़ोर्स ने नई निर्धनता रेखा के निर्धारण तक नीति आयोग/सरकार द्वारा तेंदुलकर समिति द्वारा प्रदत्त निर्धनता रेखा मानदंडों को अपनाने की सलाह दी है|उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि चूँकि गरीबी रेखा निर्धारण मामले के व्यापक राजनीतिक एवं राजकोषीय निहितार्थ हैं| अतः गरीबी रेखा निर्धारण का मामला भारत में लगातार विवादित रहा है|साथ ही गरीबी रेखा के संदर्भ में सर्वसम्मति का अभाव है| अतः वास्तविक गरीबी रेखा की पहचान के लिए भारत सरकार को विश्व के अन्य देशों में अपनाई जा रही विधियों का अध्ययन एवं शोध का प्रयास करना चाहिए|
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##Question:निर्धनता रेखा को परिभाषित कीजिये| भारत में स्वतंत्रता पश्चात, निर्धनता रेखा के निर्धारण के सबंध में बनी विभिन्न समितियों के दृष्टिकोण को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द, अंक-10 ) Define the poverty line. After the independence in India, clarify the view of various committees in relation to the determination of poverty line. (150 to 200 words, Marks-10 )##Answer:दृष्टिकोण- 1- भूमिका में निर्धनता तथा निर्धनता रेखा को परिभाषित कीजिये| 2- मुख्य भाग में गरीबी रेखा के संदर्भ में विभिन्न समितियों की सिफारिशों को क्रमबद्धता के साथ बताएं| 3- अंतिम में सुझावात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये निर्धनता वह स्थिति है जिसमे व्यक्ति अपने जीवन निर्वाह हेतु आवश्यक न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति करने में अक्षम होता है| अर्थात निर्धनता का तात्पर्य मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के न्यूनतम संसाधनों को न जुटा पाने से है| निर्धनता की अवधारणा आर्थिक विकास, प्रति व्यक्ति आय, क्रयशक्ति एवं जनसंख्या से सम्बन्धित है| निर्धनता के 2 प्रकार होते हैं| प्रथम, निरपेक्ष निर्धनता एवं द्वितीय, सापेक्ष निर्धनता| राष्ट्रीय विकास के स्तर का आकलन, विकासात्मक योजनाओं के निर्माण तथा उनके निष्पादन के आकलन और योग्य लाभार्थियों की पहचान आदि उद्देश्यों की पूर्ति के लिए निर्धनता का मापन किया जाता है| निरपेक्ष निर्धनता के मापन के संदर्भ में निर्धनता रेखा की अवधारणा प्रस्तुत की जाती है| निर्धनता रेखा उस आय स्तर को कहते हैं जिससे कम आय होने पर व्यक्ति अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम नहीं होता है| निर्धनता रेखा अलग-अलग राष्ट्रों में अलग-अलग होती है| भारत में निर्धनता रेखा का आकलन मासिक उपभोग व्यय के संदर्भ में NSSO के आंकड़ों के आधार पर नीति आयोग द्वारा किया जाता है| यह निर्धारण विशेषज्ञ समिति द्वारा सुझाए गए मानदंडों के आधार पर किया जाता है| भारत में निर्धनता रेखा का रुपये में निर्धारण न्यूनतम पोषण प्राप्त करने हेतु खाद्य वस्तुओं पर किये जाने वाले व्यय के आधार पर किया जाता है|गरीबी रेखा तय करने की शुरुआत योजना आयोग ने 1962 में एक कार्यकारी समूह बनाकर की थी।इसने प्रचलित मूल्यों के आधार पर प्रति व्यक्ति 20 रुपये मासिक उपभोग व्यय को गरीबी रेखा माना था। भारत में गरीबी रेखा के निर्धारक मानदंडों की संस्तुति के लिए योजना आयोग/ नीति आयोग द्वारा अब तक विभिन्न विशेषज्ञ समितियां गठित की जा चुकी हैं| इन विशेषज्ञ समितियों और इनके द्वारा की गयी संस्तुतियों का क्रमबद्ध विवरण निम्नलिखित है वाई के अलघ समिति इस समिति का गठन योजना आयोग 1979 में किया गया था| अलघ समिति ने न्यूनतम पोषण आवश्यकता के आधार पर निर्धनता रेखा के निर्धारण की सिफारिश की थी| समिति ने ICMR द्वारा सुझाए गए नगरीय & ग्रामीण पोषण स्तरों को आधार बना कर नगरीय एवं ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अलग अलग पोषण मानक सुझाए| अलघ समिति की सिफारिशों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी तथा नगरीय क्षेत्रों में 2100 कैलोरी से कम उपभोग करने वाले को BPL माना था| कैलोरी उपभोग के आधार पर निर्धारित गरीबी रेखा ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 49 रूपये और नगरीय क्षेत्रों के लिए 56.64 रूपये मासिक थी डी टी लकडावाला समिति 1989 में योजना आयोग द्वारा डी टी लकडावाला की अध्यक्षता में पुनः एक कार्यदल का गठन किया गया| लकड़ावाला समिति ने भी वाई के अलघ समिति के अनुरूप न्यूनतम पोषण आवश्यकता को गरीबी रेखा के निर्धारण का मानदंड माना| इस कार्यदल ने प्रत्येक राज्य के लिए अलग-अलग निर्धनता रेखा निर्धारित की| लकडावाला समिति ने मूल्य निर्धारण के लिए मूल्य सूचकांकों को आधार बनाया| कैलोरी मानकों को समान रखा गया किन्तु मूल्यों में परिवर्तन किया गया| अब गरीबी रेखा नगरीय क्षेत्रों के लिए 281 तथा ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 205 रूपये निर्धारित की गयी थी| तेंदुलकर समिति योजना आयोग द्वारा गरीबी रेखा के पुनर्निर्धारण के संदर्भ में सुझाव देने के लिए वर्ष 2005 में प्रो.सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता में एक नई समिति का गठन किया| तेंदुलकर समिति ने न्यूनतम पोषण आवश्यकता के मानक को अस्वीकार कर आवश्यक वस्तुओं पर व्यय के आधार पर पर गरीबी रेखा का निर्धारण किया| तेंदुलकर समिति द्वारा गरीबी बास्केट की अवधारणा प्रस्तुत की गयी| समिति ने ग्रामीण क्षेत्रों में न्यूनतम व्यय 27 रूपये प्रति व्यक्ति प्रतिदिन को गरीबी रेखा माना जबकि नगरीय क्षेत्रों के लिए यह 33 रूपये प्रति व्यक्ति प्रतिदिन था| रंगराजन समिति तेंदुलकर समीति द्वारा निर्धारित गरीबी रेखा विभिन्न कारणों से विवादित रही| अतः गरीबी आकलन पद्धतियों की समीक्षा के लिए भारत सरकार द्वारा सी. रंगराजन की अध्यक्षता में एक समीक्षा समिति का गठन किया गया| समिति ने चयनित आवश्यक वस्तुओं पर किये गए न्यूनतम व्यय को ही आधार माना किन्तु तेंदुलकर समिति द्वारा सुझाए गए मूल्यों को बढ़ा कर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 32 रूपये और नगरीय क्षेत्रों के लिए 47 रूपये कर दिया| इसी के आधार पर वर्ष 2011-12 में भारत में 30% जनसंख्या को गरीब माना गया| अन्य समितियों की तरह ही रंगराजन फार्मूला भी विवादित रहा| अतः वास्तविक गरीबी रेखा के आकलन के वर्ष 2015 में अरविन्द पनगढ़िया की अध्यक्षता में एक 14 सदस्यीय टास्कफ़ोर्स का गठन किया गया|किन्तु यह दल गरीबी रेखा के निर्धारण के संदर्भ में अनिर्णीत रहा तथापि टास्कफ़ोर्स ने नई निर्धनता रेखा के निर्धारण तक नीति आयोग/सरकार द्वारा तेंदुलकर समिति द्वारा प्रदत्त निर्धनता रेखा मानदंडों को अपनाने की सलाह दी है|उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि चूँकि गरीबी रेखा निर्धारण मामले के व्यापक राजनीतिक एवं राजकोषीय निहितार्थ हैं| अतः गरीबी रेखा निर्धारण का मामला भारत में लगातार विवादित रहा है|साथ ही गरीबी रेखा के संदर्भ में सर्वसम्मति का अभाव है| अतः वास्तविक गरीबी रेखा की पहचान के लिए भारत सरकार को विश्व के अन्य देशों में अपनाई जा रही विधियों का अध्ययन एवं शोध का प्रयास करना चाहिए|
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अर्थशास्त्र को परिभाषित कीजिये | साथ ही अर्थव्यस्थाओं के विकासक्रम को रेख्नाकित कीजिये | (150-200 शब्द) Define the Economics.Also underline the development of economies. (150-200 words)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत अर्थशास्त्र का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात अर्थवयवस्था के विकासक्रम को विस्तारपूर्वक बताइए | अंत में अर्थव्यवस्था के प्रकार को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - अर्थशास्त्र एक परिचय एडम स्मिथ के अनुसार – अर्थशास्त्र सामाजिक विज्ञान की वह शाखा है, जो उन सभी स्रोतों के उत्पादन एवं विनिमय से सम्बंधित मांग एवं आपूर्ति का वैज्ञानिक विश्लेषण करती है, जो सीमित है एवं सततता हेतु अनिवार्य है | ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में मानव समाज के विकास क्रम में प्रारंभिक अवस्था में परंपरागत अर्थव्यवस्था का जन्म हुआ, जो मुख्यतः मांगों के आधार पर आपूर्ति को सुनिश्चित करती थी, कालांतर में जिस प्रकार मांगों एवं उत्पादन में विविधता आई, अर्थव्यस्थाओं में विनिमय के साधनों का मानकीकरण अनिवार्य हो गया | (भारतीय अर्थवयवस्था में प्रारंभिक विनिमय को जजमानी व्यवस्था कहा जाता था) अर्थव्यवस्था का विकासक्रम फलस्वरूप मुद्रा प्रणाली का प्रारंभ हुआ | इस घटनाक्रम का सुपरिणाम यह रहा कि आर्थिक गतिविधियों में तेजी आई तथा विभिन्न समाजों के बीच में भी आर्थिक गतिविधियाँ त्वरित हुई | प्रारम्भ में मुद्राओं को उनके वास्तविक मूल्य द्वारा मानकीकृत किया गया परन्तु कालांतर में सांकेतिक मुद्राओं का जन्म हुआ, जो तभी संभव था जब इन मुद्राओं के निर्माण में राजव्यवस्थाओं का एकाधिकार हो | 20 वीं सदी में वैश्विक अर्थव्यवस्था के बढ़ने के साथ अमेरिकी डालर को मानक बनाते हुए विश्व स्तर पर विनिमय को त्वरित किया गया | 21 वीं सदी में बढ़ रहे डिजिटलीकरण के परिणामस्वरूप क्रिप्टो मुद्राओं का भी जन्म हुआ | अर्थव्यस्थाओं के विकासक्रम में एक महत्वपूर्ण एवं निर्णायक पड़ाव तब आया जब औद्योगिक क्रांति के परिणाम स्वरुप वस्तुओं एवं सेवाओं की आपूर्ति सहज हुई , जिससे बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का जन्म हुआ | फलस्वरूप जमीन, श्रम, उद्यमिता एवं पूजी के सहयोग से आपूर्ति बढ़ाई गयी, जिसने नयी मांग को जन्म दिया | इसके परिणामस्वरूप विकास का सुचक्र बनना प्रारंभ हुआ | इस विकास के सुचक्र की सततता हेतु यह अनिवार्य था कि मांग एवं आपूर्ति के संतुलन को बनाए रखा जाय | तो जहाँ एक तरफ आपूर्ति हेतु उद्यमिता एवं पूँजी के महत्व को समझा गया वहीँ दूसरी तरफ मांग बनाए रखने हेतु जीविकोपार्जन के अवसर, शिक्षा एवं कौशल प्रशिक्षण के द्वारा मांग को सुनिश्चित एवं सतत किया गया | यही कारण है कि अर्थव्यवस्थाओं में उन सभी घटकों को रेखांकित किया जाता है, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मांग एवं आपूर्ति को प्रभावित करते हैं, जिन्हें क्रमशः आर्थिक एवं अनार्थिक तत्व कहा जाता है | कुछ मुख्य आर्थिक तत्वों में प्राकृतिक साधन, श्रम शक्ति एवं जनसँख्या, पूँजी निर्माण, तकनीकी एवं नवाचार, पूँजी उत्पाद अनुपात इत्यादि शामिल होते हैं | वहीँ अनार्थिक तत्वों में सामाजिक घटक, धार्मिक घटक, राजनीतिक घटक, अंतरराष्ट्रीय घटक एवं वैज्ञानिक घटक शामिल होते हैं | अर्थव्यवस्था के प्रकार - सैद्धांतिक रूप से यदि वस्तु एवं सेवाओं के मांग एवं आपूर्ति के संतुलन के क्रियान्वयन एवं नियंत्रण राजव्यवस्था के अंतर्गत हो तो उसे राज्य आधारित अर्थव्यवस्था कहा जाता है | उदहारण के लिए विभिन्न वामपंथी राजव्यवस्थाएं | परन्तु बाद में यह समझा गया कि अर्थव्यवस्था का सम्पूर्ण नियंत्रण सतत नहीं होगा अतः यदि किसी अर्थवयवस्था में मूलभूत स्तंभों को राज्य द्वारा नियंत्रित करते हुए अन्य क्षेत्रों में निजी उपक्रमों को प्रोत्साहित किया जाय तो उसे मिश्रित अर्थव्यवस्था कहा जाता है | एवं यदि राज्य अपनी नियंत्रण को कम करके सिर्फ उन सन्दर्भों तक सीमित कर दे जिसमे लोक कल्याण में उसका हस्तक्षेप सुनिश्चित होता हो तो उसे उदारवादी अर्थव्यवस्था की संज्ञा दी जाती है | यदि राजव्यवस्था का हस्तक्षेप न के बराबर होते हुए अर्थव्यवस्था पूर्ण रूप से बाजार आधारित घटकों से संचालित हो, तो उसे पूंजीवादी अर्थव्यवस्था कहा जाता है |
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##Question:अर्थशास्त्र को परिभाषित कीजिये | साथ ही अर्थव्यस्थाओं के विकासक्रम को रेख्नाकित कीजिये | (150-200 शब्द) Define the Economics.Also underline the development of economies. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत अर्थशास्त्र का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात अर्थवयवस्था के विकासक्रम को विस्तारपूर्वक बताइए | अंत में अर्थव्यवस्था के प्रकार को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - अर्थशास्त्र एक परिचय एडम स्मिथ के अनुसार – अर्थशास्त्र सामाजिक विज्ञान की वह शाखा है, जो उन सभी स्रोतों के उत्पादन एवं विनिमय से सम्बंधित मांग एवं आपूर्ति का वैज्ञानिक विश्लेषण करती है, जो सीमित है एवं सततता हेतु अनिवार्य है | ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में मानव समाज के विकास क्रम में प्रारंभिक अवस्था में परंपरागत अर्थव्यवस्था का जन्म हुआ, जो मुख्यतः मांगों के आधार पर आपूर्ति को सुनिश्चित करती थी, कालांतर में जिस प्रकार मांगों एवं उत्पादन में विविधता आई, अर्थव्यस्थाओं में विनिमय के साधनों का मानकीकरण अनिवार्य हो गया | (भारतीय अर्थवयवस्था में प्रारंभिक विनिमय को जजमानी व्यवस्था कहा जाता था) अर्थव्यवस्था का विकासक्रम फलस्वरूप मुद्रा प्रणाली का प्रारंभ हुआ | इस घटनाक्रम का सुपरिणाम यह रहा कि आर्थिक गतिविधियों में तेजी आई तथा विभिन्न समाजों के बीच में भी आर्थिक गतिविधियाँ त्वरित हुई | प्रारम्भ में मुद्राओं को उनके वास्तविक मूल्य द्वारा मानकीकृत किया गया परन्तु कालांतर में सांकेतिक मुद्राओं का जन्म हुआ, जो तभी संभव था जब इन मुद्राओं के निर्माण में राजव्यवस्थाओं का एकाधिकार हो | 20 वीं सदी में वैश्विक अर्थव्यवस्था के बढ़ने के साथ अमेरिकी डालर को मानक बनाते हुए विश्व स्तर पर विनिमय को त्वरित किया गया | 21 वीं सदी में बढ़ रहे डिजिटलीकरण के परिणामस्वरूप क्रिप्टो मुद्राओं का भी जन्म हुआ | अर्थव्यस्थाओं के विकासक्रम में एक महत्वपूर्ण एवं निर्णायक पड़ाव तब आया जब औद्योगिक क्रांति के परिणाम स्वरुप वस्तुओं एवं सेवाओं की आपूर्ति सहज हुई , जिससे बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का जन्म हुआ | फलस्वरूप जमीन, श्रम, उद्यमिता एवं पूजी के सहयोग से आपूर्ति बढ़ाई गयी, जिसने नयी मांग को जन्म दिया | इसके परिणामस्वरूप विकास का सुचक्र बनना प्रारंभ हुआ | इस विकास के सुचक्र की सततता हेतु यह अनिवार्य था कि मांग एवं आपूर्ति के संतुलन को बनाए रखा जाय | तो जहाँ एक तरफ आपूर्ति हेतु उद्यमिता एवं पूँजी के महत्व को समझा गया वहीँ दूसरी तरफ मांग बनाए रखने हेतु जीविकोपार्जन के अवसर, शिक्षा एवं कौशल प्रशिक्षण के द्वारा मांग को सुनिश्चित एवं सतत किया गया | यही कारण है कि अर्थव्यवस्थाओं में उन सभी घटकों को रेखांकित किया जाता है, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मांग एवं आपूर्ति को प्रभावित करते हैं, जिन्हें क्रमशः आर्थिक एवं अनार्थिक तत्व कहा जाता है | कुछ मुख्य आर्थिक तत्वों में प्राकृतिक साधन, श्रम शक्ति एवं जनसँख्या, पूँजी निर्माण, तकनीकी एवं नवाचार, पूँजी उत्पाद अनुपात इत्यादि शामिल होते हैं | वहीँ अनार्थिक तत्वों में सामाजिक घटक, धार्मिक घटक, राजनीतिक घटक, अंतरराष्ट्रीय घटक एवं वैज्ञानिक घटक शामिल होते हैं | अर्थव्यवस्था के प्रकार - सैद्धांतिक रूप से यदि वस्तु एवं सेवाओं के मांग एवं आपूर्ति के संतुलन के क्रियान्वयन एवं नियंत्रण राजव्यवस्था के अंतर्गत हो तो उसे राज्य आधारित अर्थव्यवस्था कहा जाता है | उदहारण के लिए विभिन्न वामपंथी राजव्यवस्थाएं | परन्तु बाद में यह समझा गया कि अर्थव्यवस्था का सम्पूर्ण नियंत्रण सतत नहीं होगा अतः यदि किसी अर्थवयवस्था में मूलभूत स्तंभों को राज्य द्वारा नियंत्रित करते हुए अन्य क्षेत्रों में निजी उपक्रमों को प्रोत्साहित किया जाय तो उसे मिश्रित अर्थव्यवस्था कहा जाता है | एवं यदि राज्य अपनी नियंत्रण को कम करके सिर्फ उन सन्दर्भों तक सीमित कर दे जिसमे लोक कल्याण में उसका हस्तक्षेप सुनिश्चित होता हो तो उसे उदारवादी अर्थव्यवस्था की संज्ञा दी जाती है | यदि राजव्यवस्था का हस्तक्षेप न के बराबर होते हुए अर्थव्यवस्था पूर्ण रूप से बाजार आधारित घटकों से संचालित हो, तो उसे पूंजीवादी अर्थव्यवस्था कहा जाता है |
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Longer gestation periods for infrastructure projects can have a negative ripple effect by transferring unsuitable liabilities to the future. What arrangements need to be put in place to ensure sustainability in the infrastructure development of the country? Discuss. (250 words)
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APPROACH : Briefly Introduce by mentioning the meaning and status of Infrastructural development in India. Highlight the negative ripple effects of a long gestation period for infrastructural projects. Discuss the reforms needed to ensure sustainability in the infrastructure development of the country. Conclude accordingly. ANSWER- To achieve the vision of making India a $5 trillion economy by 2024-25, India needs to spend about $1.4 trillion over these years on infrastructure. It is well-accepted that investment in infrastructure is necessary for growth. The provision of adequate infrastructure is essential for growth and for making growth inclusive. According to the 11th five-year plan, the central government financed around 45% of the total investment in infrastructure, the remaining 55% was divided between debt financing (41%) and equity financing (14%). The negative ripple effects of a long gestation period for infrastructural projects- The informal gestation period, the time from when the project is first announced to when the formal planning process actually begins, is the main reason for the majority of delays. Stalling of projects- According to the 2017 economic survey, stalling is 7-8% of GDP. Challenges of increased market risk-prediction of the market have become a challenge. Problems of regulatory cholesterol- that is excessive regulation, led to the failure of SEZs - crony capitalism. Lack of easy existing mechanism - also called Chakravayuha challenge. The reforms needed to ensure sustainability in the infrastructure development in India- 1) PPP projects in infrastructure, As the government faces tight budgetary constraints in the context of a rule-based fiscal policy framework( FRBM). It was important to encourage the private sector to invest in infrastructure. 2) Viability Gap Funding - It was introduced in 2006 where the central government provides up to 20% of the total capital cost with respect to PPP. (20% +20% by sponsoring authority) 3) FDI in infrastructure development - To facilitate infrastructure financing 100% FDI is allowed under automatic route in some of the sectors like mining, power, and SEZs. 4) setting up of infrastructure debt fund- RBI and SEBI notify guidelines for setting up of IDFs in the form of NBFCs and Mutual Fund companies. The government of India has reduced withholding tax on interest payments, from 20% to 5%. IDFs are expected to channel funds from insurance companies, pension fund companies, and other long-term sources. 5) Liberalization and Rationalization of ECBs. 6) Introduction of Credit Default Swaps - It will strengthen the baking sector. For sustainable Infrastructure development, there is a need to implement Vijay Kelkar Committee Key recommendations- Contracts need to focus more on service delivery instead of fiscal benefits. Better identification and allocation of risks between stakeholders Prudent utilization of viability gap funds where user charges cannot guarantee a robust revenue stream. Improved fiscal reporting practices and careful monitoring of performance. Given the urgency of India’s demographic transition and the experience India has already gathered in managing PPPs, the government must move the PPP model to the next level of maturity and sophistication. Cost-effectiveness of managing the risk needs to be evaluated. An Infrastructure PPP Adjudication Tribunal (“IPAT”) chaired by a Judicial Member (former Judge SC/Chief Justice HC) with a Technical and/or a Financial member, where benches will be constituted by the Chairperson as per needs of the matter in question. Projects that have not achieved a prescribed percentage of progress on the ground should be scrapped. Re-bid them once issues have been resolved or complete them through public funds and if viable, bid out for Operations and Maintenance. For smooth and fast development, India needs adequate and timely investment in quality infrastructure. Well-developed infrastructure enhances the level of economic activity, creates additional fiscal space by improving the revenue base of the government, and ensures the quality of expenditure focused on productive areas. There is a need to develop a robust bond market for infrastructure companies, speedy resolution of infrastructure disputes, optimal risk sharing through better and balanced PPP contracts, and sanctity and enforceability of contracts. India needs to ensure that infrastructure and infrastructure-related businesses have ease of access to inputs at appropriate price levels.
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##Question:Longer gestation periods for infrastructure projects can have a negative ripple effect by transferring unsuitable liabilities to the future. What arrangements need to be put in place to ensure sustainability in the infrastructure development of the country? Discuss. (250 words)##Answer:APPROACH : Briefly Introduce by mentioning the meaning and status of Infrastructural development in India. Highlight the negative ripple effects of a long gestation period for infrastructural projects. Discuss the reforms needed to ensure sustainability in the infrastructure development of the country. Conclude accordingly. ANSWER- To achieve the vision of making India a $5 trillion economy by 2024-25, India needs to spend about $1.4 trillion over these years on infrastructure. It is well-accepted that investment in infrastructure is necessary for growth. The provision of adequate infrastructure is essential for growth and for making growth inclusive. According to the 11th five-year plan, the central government financed around 45% of the total investment in infrastructure, the remaining 55% was divided between debt financing (41%) and equity financing (14%). The negative ripple effects of a long gestation period for infrastructural projects- The informal gestation period, the time from when the project is first announced to when the formal planning process actually begins, is the main reason for the majority of delays. Stalling of projects- According to the 2017 economic survey, stalling is 7-8% of GDP. Challenges of increased market risk-prediction of the market have become a challenge. Problems of regulatory cholesterol- that is excessive regulation, led to the failure of SEZs - crony capitalism. Lack of easy existing mechanism - also called Chakravayuha challenge. The reforms needed to ensure sustainability in the infrastructure development in India- 1) PPP projects in infrastructure, As the government faces tight budgetary constraints in the context of a rule-based fiscal policy framework( FRBM). It was important to encourage the private sector to invest in infrastructure. 2) Viability Gap Funding - It was introduced in 2006 where the central government provides up to 20% of the total capital cost with respect to PPP. (20% +20% by sponsoring authority) 3) FDI in infrastructure development - To facilitate infrastructure financing 100% FDI is allowed under automatic route in some of the sectors like mining, power, and SEZs. 4) setting up of infrastructure debt fund- RBI and SEBI notify guidelines for setting up of IDFs in the form of NBFCs and Mutual Fund companies. The government of India has reduced withholding tax on interest payments, from 20% to 5%. IDFs are expected to channel funds from insurance companies, pension fund companies, and other long-term sources. 5) Liberalization and Rationalization of ECBs. 6) Introduction of Credit Default Swaps - It will strengthen the baking sector. For sustainable Infrastructure development, there is a need to implement Vijay Kelkar Committee Key recommendations- Contracts need to focus more on service delivery instead of fiscal benefits. Better identification and allocation of risks between stakeholders Prudent utilization of viability gap funds where user charges cannot guarantee a robust revenue stream. Improved fiscal reporting practices and careful monitoring of performance. Given the urgency of India’s demographic transition and the experience India has already gathered in managing PPPs, the government must move the PPP model to the next level of maturity and sophistication. Cost-effectiveness of managing the risk needs to be evaluated. An Infrastructure PPP Adjudication Tribunal (“IPAT”) chaired by a Judicial Member (former Judge SC/Chief Justice HC) with a Technical and/or a Financial member, where benches will be constituted by the Chairperson as per needs of the matter in question. Projects that have not achieved a prescribed percentage of progress on the ground should be scrapped. Re-bid them once issues have been resolved or complete them through public funds and if viable, bid out for Operations and Maintenance. For smooth and fast development, India needs adequate and timely investment in quality infrastructure. Well-developed infrastructure enhances the level of economic activity, creates additional fiscal space by improving the revenue base of the government, and ensures the quality of expenditure focused on productive areas. There is a need to develop a robust bond market for infrastructure companies, speedy resolution of infrastructure disputes, optimal risk sharing through better and balanced PPP contracts, and sanctity and enforceability of contracts. India needs to ensure that infrastructure and infrastructure-related businesses have ease of access to inputs at appropriate price levels.
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कॉर्पोरेट गवर्नेंस से आप क्या समझते हैं? कॉर्पोरेट गवर्नेंस हेतु गठित की गयी कोटक समिति द्वारा दी गयी सिफ़ारिशों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by corporate governance? Discuss the recommendations made by the Kotak Committee set up for Corporate Governance. (150-200 words; 10 Marks)
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Approach: भूमिका में कॉर्पोरेट गवर्नेंस को परिभाषित कीजिए। कॉर्पोरेट गवर्नेंस की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। उदय कोटक समिति द्वारा प्रस्तुत सिफ़ारिशों की बिंदुवत चर्चा कीजिए। भारत में कॉर्पोरेट गवर्नेंस के महत्व को इंगित करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर- कॉर्पोरेट गवर्नेंस उन सिद्धांतों या दिशानिर्देशों पर आधारित होता है जिसके आधार पर एक कंपनी कार्य करती है। कॉर्पोरेट गवर्नेंस यहसुनिश्चित करता है कि कॉर्पोरेट वांछित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कार्यरत होने चाहिए। वृहद स्तर पर कॉर्पोरेट गवर्नेंस से तात्पर्य उन नियम और प्रथाओं से हैं जिनके द्वारा बोर्ड ऑफ डाइरेक्टर कंपनी के सभी हितधारकों के साथ सम्बन्धों में जवाबदेही निष्पक्षता व पारदर्शिता सुनिश्चित करते है।भारत में कॉर्पोरेट गवर्नेंस शब्द 1991 में उदारीकरण की नीति के बाद प्रकाश में आया। वर्तमान में कंपनी अधिनियम 2013 और सेबी के विनियमों अंतर्गत अनिवार्य है साथ ही इनअधिनियमों में इसके संदर्भ में प्रावधान किए गए हैं। भारत में कॉर्पोरेट गवर्नेंस को और प्रभावी बनाने के लिए उदय कोटक की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गयी थी। भारत में कॉर्पोरेट गवर्नेंस वातावरण सुधार हेतु समिति द्वारा सिफ़ारिशें प्रस्तुत की गयी हैं। कोटक समिति द्वारा प्रस्तुत की गयी सिफ़ारिशें बाज़ार नियामक सेबी द्वारा नियुक्त इस समिति ने देश में कॉर्पोरेट संचालन में सुधार और बेहतरी से संबन्धित रिपोर्ट सौंपी। कंपनी बोर्ड का संचालन करने वाले नियमों पारदर्शिता तथा खुलासों से संबन्धित मुद्दों को लेकर सुधारों की अनुषंशा की है निदेशकों की विशेषज्ञता/ कौशल का प्रकटीकरण पर बल दिया गया है। वित्त वर्ष 2019-20 से तिमाही परिणामों का अनिवार्य प्रकटीकरण किया जाना चाहिए। समिति ने छोटे छोटे निवेशकों के हितों को सुरक्षित करने हेतु सुधार सुझाए हैं। सूचीबद्ध संस्थाओं और इनकी सहायक कंपनियों के लिए सचिवीय ऑडिट अनिवार्य होगी। ऑडिट कमेटी को सहायक कंपनी में उपयोग किए गए धन की भी समीक्षा करनी होगी। सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के लिये पारदर्शी कामकाज तय करने हेतु प्रेरित किया गया है। सरकार कोसार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के लिये उनके उद्देश्य और प्रतिबद्धताओं का भी खुलासा करना चाहिये। देश का कॉर्पोरेट जगत लंबे समय से कारोबारी समस्याओं से ग्रसित है। साथ ही घरेलू व विदेशी निवेशकों के मध्य भी कॉर्पोरेट गवर्नेंस में निहित खामियों की वजह से भय व्याप्त है। देश में कॉर्पोरेट वातावरण में सुधार हेतु इन सिफ़ारिशों को जल्द से जल्द लागू किया जाना चाहिए।
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##Question:कॉर्पोरेट गवर्नेंस से आप क्या समझते हैं? कॉर्पोरेट गवर्नेंस हेतु गठित की गयी कोटक समिति द्वारा दी गयी सिफ़ारिशों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by corporate governance? Discuss the recommendations made by the Kotak Committee set up for Corporate Governance. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:Approach: भूमिका में कॉर्पोरेट गवर्नेंस को परिभाषित कीजिए। कॉर्पोरेट गवर्नेंस की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। उदय कोटक समिति द्वारा प्रस्तुत सिफ़ारिशों की बिंदुवत चर्चा कीजिए। भारत में कॉर्पोरेट गवर्नेंस के महत्व को इंगित करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर- कॉर्पोरेट गवर्नेंस उन सिद्धांतों या दिशानिर्देशों पर आधारित होता है जिसके आधार पर एक कंपनी कार्य करती है। कॉर्पोरेट गवर्नेंस यहसुनिश्चित करता है कि कॉर्पोरेट वांछित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कार्यरत होने चाहिए। वृहद स्तर पर कॉर्पोरेट गवर्नेंस से तात्पर्य उन नियम और प्रथाओं से हैं जिनके द्वारा बोर्ड ऑफ डाइरेक्टर कंपनी के सभी हितधारकों के साथ सम्बन्धों में जवाबदेही निष्पक्षता व पारदर्शिता सुनिश्चित करते है।भारत में कॉर्पोरेट गवर्नेंस शब्द 1991 में उदारीकरण की नीति के बाद प्रकाश में आया। वर्तमान में कंपनी अधिनियम 2013 और सेबी के विनियमों अंतर्गत अनिवार्य है साथ ही इनअधिनियमों में इसके संदर्भ में प्रावधान किए गए हैं। भारत में कॉर्पोरेट गवर्नेंस को और प्रभावी बनाने के लिए उदय कोटक की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गयी थी। भारत में कॉर्पोरेट गवर्नेंस वातावरण सुधार हेतु समिति द्वारा सिफ़ारिशें प्रस्तुत की गयी हैं। कोटक समिति द्वारा प्रस्तुत की गयी सिफ़ारिशें बाज़ार नियामक सेबी द्वारा नियुक्त इस समिति ने देश में कॉर्पोरेट संचालन में सुधार और बेहतरी से संबन्धित रिपोर्ट सौंपी। कंपनी बोर्ड का संचालन करने वाले नियमों पारदर्शिता तथा खुलासों से संबन्धित मुद्दों को लेकर सुधारों की अनुषंशा की है निदेशकों की विशेषज्ञता/ कौशल का प्रकटीकरण पर बल दिया गया है। वित्त वर्ष 2019-20 से तिमाही परिणामों का अनिवार्य प्रकटीकरण किया जाना चाहिए। समिति ने छोटे छोटे निवेशकों के हितों को सुरक्षित करने हेतु सुधार सुझाए हैं। सूचीबद्ध संस्थाओं और इनकी सहायक कंपनियों के लिए सचिवीय ऑडिट अनिवार्य होगी। ऑडिट कमेटी को सहायक कंपनी में उपयोग किए गए धन की भी समीक्षा करनी होगी। सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के लिये पारदर्शी कामकाज तय करने हेतु प्रेरित किया गया है। सरकार कोसार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के लिये उनके उद्देश्य और प्रतिबद्धताओं का भी खुलासा करना चाहिये। देश का कॉर्पोरेट जगत लंबे समय से कारोबारी समस्याओं से ग्रसित है। साथ ही घरेलू व विदेशी निवेशकों के मध्य भी कॉर्पोरेट गवर्नेंस में निहित खामियों की वजह से भय व्याप्त है। देश में कॉर्पोरेट वातावरण में सुधार हेतु इन सिफ़ारिशों को जल्द से जल्द लागू किया जाना चाहिए।
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Discuss the impact of Poutuguese on the Indian society and culture. (150 words)
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Approach 1.Introduction- Explain the advent of Portuguese in India 2.Body- Discuss the impact of Portuguese under different heads. 3.Conclude with the feature of Indian society of accepting different traditions and cultures through history. Answer Portuguese were the first to come in India, they have opened the sea route from Europe to India, as a result, a wave of Europeans came into India, and they set up their factories, trading centers, and later empire, the impact of Portuguese can be seen in religion,politics, economy, and culture. Impact on religion – In the medieval period, Christianity was reintroduced in India by the Portuguese. Two Christian missionaries were sent in Mughal court (father Aqua viva and Morcent) in the court of Akbar. from here we have seen a new wave of Christian missionaries coming into India. Later Christianisation and acculturation served as the dominant themes of Portuguese imperialism.The Portuguese rule in Goa in the sixteenth, seventeenth and eighteenth centuries was marked by a close collaboration between the State and the Church. As they had ventured into the Indian Ocean in search of "Christians and Spices" the Portuguese Estado da India (State of India), while promoting commerce, also made determined efforts to ensure that the religion of the king became the religion of their subjects in India. Music and Dance - With the advent of the Portuguese, Christianity and western music became an integral part of the life of the local converts. The missionaries got a free hand in the evangelical, social, educational and other activities. With the founding of religious centres, the Church authority undertook the task of imparting primary education to the local youngsters and further prepared a curriculum of the parochial schools indicating an important plate for music in it. Political – The administration was secular in nature and Europeans as well as Indians were part of the administration. Though Portuguese were known for there anti-activities against Hindu and Muslims yet Albuquerque gave them equal opportunity in his administration. The administration was run on the basis of the European model. Well trained discipline army was used by Portuguese. Portuguese were the first who started showing imperialistic tendencies, they captured Goa from the Sultan of Bijapur.Relations between the Portuguese and the Marathas could hardly remain cordial there was a mutual hostility between them. The Portuguese government had promulgated a Civil Code in 1867 with more liberal amendments after the establishment of the Republic in 1910, which had a far-reaching impact on the lives of the people. Economic impact – Portuguese opened the door of European powers to India, it provided trade opportunities to Europeans with India via sea-route. With the advent of Portuguese European as well as Indian traders were benefited especially south Indians. Portuguese introduced various crops, Cereals, Cash crops, fruits, etc. such as tobacco, potato, almond, orange, etc.Along with other crops, the Portuguese brought cashew and pineapple into Goa in the 16th century. Others – The Gothic architecture was seen with there advent in which huge premises were used in front of the monument. Due to the westernized style, the Christian males adopted the European costume. They used trousers, shirts, western cap and at times, knickers and shoes. The Anjidiv island was known for weaving of handmade stockings which were the best in India. Another impact is clearly visible on the spoken language of the Christians, which has absorbed a number of Portuguese words in their daily use. The regular use of wine and liquor, as a part of daily food, changed the traditional lifestyle entirely. Wine became a part of divine offering which was to be consumed by all family members of the Christian faith. It was also an important commodity used on festive occasions along with pork and beef. One of the major impacts on the social habits of the people of Goa was the use of tobacco.Soon after the arrival of Afonso de Albuquerque, he established a mint and issued gold and silver coins followed by copper. India is the land of diversity. This diversity is achieved by incorporating different cultures, traditions, etc. throughout history. In this process, Portuguese impacted Indian society in almost every walk of life such as religion, administration, trade, music, dress, architecture, etc.
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##Question:Discuss the impact of Poutuguese on the Indian society and culture. (150 words)##Answer:Approach 1.Introduction- Explain the advent of Portuguese in India 2.Body- Discuss the impact of Portuguese under different heads. 3.Conclude with the feature of Indian society of accepting different traditions and cultures through history. Answer Portuguese were the first to come in India, they have opened the sea route from Europe to India, as a result, a wave of Europeans came into India, and they set up their factories, trading centers, and later empire, the impact of Portuguese can be seen in religion,politics, economy, and culture. Impact on religion – In the medieval period, Christianity was reintroduced in India by the Portuguese. Two Christian missionaries were sent in Mughal court (father Aqua viva and Morcent) in the court of Akbar. from here we have seen a new wave of Christian missionaries coming into India. Later Christianisation and acculturation served as the dominant themes of Portuguese imperialism.The Portuguese rule in Goa in the sixteenth, seventeenth and eighteenth centuries was marked by a close collaboration between the State and the Church. As they had ventured into the Indian Ocean in search of "Christians and Spices" the Portuguese Estado da India (State of India), while promoting commerce, also made determined efforts to ensure that the religion of the king became the religion of their subjects in India. Music and Dance - With the advent of the Portuguese, Christianity and western music became an integral part of the life of the local converts. The missionaries got a free hand in the evangelical, social, educational and other activities. With the founding of religious centres, the Church authority undertook the task of imparting primary education to the local youngsters and further prepared a curriculum of the parochial schools indicating an important plate for music in it. Political – The administration was secular in nature and Europeans as well as Indians were part of the administration. Though Portuguese were known for there anti-activities against Hindu and Muslims yet Albuquerque gave them equal opportunity in his administration. The administration was run on the basis of the European model. Well trained discipline army was used by Portuguese. Portuguese were the first who started showing imperialistic tendencies, they captured Goa from the Sultan of Bijapur.Relations between the Portuguese and the Marathas could hardly remain cordial there was a mutual hostility between them. The Portuguese government had promulgated a Civil Code in 1867 with more liberal amendments after the establishment of the Republic in 1910, which had a far-reaching impact on the lives of the people. Economic impact – Portuguese opened the door of European powers to India, it provided trade opportunities to Europeans with India via sea-route. With the advent of Portuguese European as well as Indian traders were benefited especially south Indians. Portuguese introduced various crops, Cereals, Cash crops, fruits, etc. such as tobacco, potato, almond, orange, etc.Along with other crops, the Portuguese brought cashew and pineapple into Goa in the 16th century. Others – The Gothic architecture was seen with there advent in which huge premises were used in front of the monument. Due to the westernized style, the Christian males adopted the European costume. They used trousers, shirts, western cap and at times, knickers and shoes. The Anjidiv island was known for weaving of handmade stockings which were the best in India. Another impact is clearly visible on the spoken language of the Christians, which has absorbed a number of Portuguese words in their daily use. The regular use of wine and liquor, as a part of daily food, changed the traditional lifestyle entirely. Wine became a part of divine offering which was to be consumed by all family members of the Christian faith. It was also an important commodity used on festive occasions along with pork and beef. One of the major impacts on the social habits of the people of Goa was the use of tobacco.Soon after the arrival of Afonso de Albuquerque, he established a mint and issued gold and silver coins followed by copper. India is the land of diversity. This diversity is achieved by incorporating different cultures, traditions, etc. throughout history. In this process, Portuguese impacted Indian society in almost every walk of life such as religion, administration, trade, music, dress, architecture, etc.
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उपयुक्त उदाहरणों के माध्यम से मुग़ल कालीन समाज का एक संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कीजिये| (150-200 शब्द/ 10 अंक) Give a brief description of the Mughal society through appropriate examples. (150-200 words/10 Marks)
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एप्रोच- मुग़ल काल की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग में उदाहरणों के साथ मुगलकालीन समाज के विभिन्न पक्षों को बिंदुबार प्रस्तुत कीजिये| उत्तर- बाबर ने पानीपत के प्रथम युद्ध(1526) में इब्राहीम लोदी को हराकर जिस मुग़ल वंश की नींव रखी थी, वह लगभग 170 वर्षों तक मजबूत अवस्था में पुरे भारत पर राज करते रही| औरंगजेब की मृत्यु(1707) के बाद भी केंद्रीय सत्ता के रूप में सांकेतिक तौर पर मुग़ल साम्राज्य ने 1857 तक अस्तित्व बनाए रखा| इतने लंबे शासनकाल में इस राजवंश के अधीन समाज में व्यापक अभिलक्षण दृष्टिगोचर हुए| मुग़लकालीन समाज अन्य संप्रदायों के अलावा सिख तथा ईसाई संप्रदाय के भी उपस्थिति के भी साक्ष्य; शासक वर्ग में अफगानों, भारतीय मुसलमानों तथा हिंदुओं का महत्व बढ़ना; मुग़ल सरदार वर्ग में मराठों का प्रवेश; हालाँकि अभी भी, तूरानी तथा ईरानी गुट का दरबार में विशेष महत्व; दरबार में चित्रकारों, संगीतज्ञों, कवियों और विद्वानों को प्रश्रय; शासक वर्गों में सरदारों के साथ जमींदार भी शामिल; राजनीति में उच्च वर्ग की महिलाओं के बढ़ते महत्व के अधिक प्रमाण; जैसे- नूरजहाँ, चाँद बीबी, रानी दुर्गावती आदि; दासों का राजनीतिक महत्व कम होना; हिंदू समाज की वर्ण व्यवस्था, जाति-प्रथा, छुआछूत, महिलाओं की दयनीय दशा आदि पहलु पूर्ववर्ती काल की तरह ही प्रचलित; वाणिज्य तथा व्यापार का महत्व बढ़ना तथा बड़ी संख्या में विभिन्न प्रकार के व्यापारी वर्ग की उपस्थिति की जानकारी; जैसे- वोहरा, खोजा, मेनन, खत्री, बंजारा आदि; यूरोपियन व्यापारी भी; आर्थिक गतिविधियों के संदर्भ में,सर्राफनामक एक वर्ग का विशेष उल्लेख;इनके द्वारा मुद्रा की गुणवता की जाँच करना और हुंडी जारी करना; भाषा, खानपान, मनोरंजन, आवास आदि पूर्ववर्ती काल की तरह; शिक्षा में भी धार्मिक विषयों के साथ-साथ गणित, दर्शन आदि की पढ़ाई; विभिन्न व्यापारियों एवं यात्रियों से माध्यम से यह ज्ञात होना कि शासक वर्गों की ऐशोआराम भरी जिंदगी तथा आम लोगों(किसानों, कारीगरों, श्रमिकों आदि) की घोर दरिद्रता; ग्रामीण समाज का मिट्टी के बने घरों में रहना तथा मिट्टी के बर्तन तथा बाँस की चटाइयां, खाट आदि का प्रयोग; ग्रामीण समाज में चावल, मोटे अनाज और दाल मुख्य आहार; चरागाहों की अधिकता होने से मवेशियों की अधिक संख्या तथा दूध एवं उससे बने उत्पादों का प्रचलन; गाँव में असमानता व्याप्त; गाँवों को कारीगरों का भुगतान जिंसों में मिलना; हल या बैल नहीं होने पर किसानों को जमींदारों/उच्च जाति के खेतों में काम करना; ग्रामीण स्तर पर मध्यस्थ वर्ग ही एक प्रकार से अभिजात्य वर्ग; जमींदार शब्द का व्यापक प्रचलन; सरदारों की तुलना में जमींदारों की आय सीमित; छोटे जमींदार कमोबेश किसानों की तरह वहीँ बड़े जमींदारों का जीवनस्तर छोटे राजाओं या सरदारों के समान; किसानों के मुख्यतः 2 वर्ग की जानकारी; खुद्खास्त(वैसे किसान जिनकी अपनी जमीन तथा उसे स्वंय जोतना-बोना) तथा पाहिकास्त; भूमिहीन किसान और मजदुर अक्सर अस्पृश्य जातियों के लोग- कमीन; अकाल पड़ने पर निम्न वर्ग के किसानों तथा कारीगरों को ज्यादा नुकसान; जमीन पर वंशानुगत अधिकार तथा भूराजस्व अदा करते रहने पर बेदखली नहीं; नगरों में बड़ी संख्या गरीबों की(कारीगर, नौकर-चाकर, गुलाम, सिपाही, शारीरिक श्रम करने वाले लोग आदि);
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##Question:उपयुक्त उदाहरणों के माध्यम से मुग़ल कालीन समाज का एक संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कीजिये| (150-200 शब्द/ 10 अंक) Give a brief description of the Mughal society through appropriate examples. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच- मुग़ल काल की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग में उदाहरणों के साथ मुगलकालीन समाज के विभिन्न पक्षों को बिंदुबार प्रस्तुत कीजिये| उत्तर- बाबर ने पानीपत के प्रथम युद्ध(1526) में इब्राहीम लोदी को हराकर जिस मुग़ल वंश की नींव रखी थी, वह लगभग 170 वर्षों तक मजबूत अवस्था में पुरे भारत पर राज करते रही| औरंगजेब की मृत्यु(1707) के बाद भी केंद्रीय सत्ता के रूप में सांकेतिक तौर पर मुग़ल साम्राज्य ने 1857 तक अस्तित्व बनाए रखा| इतने लंबे शासनकाल में इस राजवंश के अधीन समाज में व्यापक अभिलक्षण दृष्टिगोचर हुए| मुग़लकालीन समाज अन्य संप्रदायों के अलावा सिख तथा ईसाई संप्रदाय के भी उपस्थिति के भी साक्ष्य; शासक वर्ग में अफगानों, भारतीय मुसलमानों तथा हिंदुओं का महत्व बढ़ना; मुग़ल सरदार वर्ग में मराठों का प्रवेश; हालाँकि अभी भी, तूरानी तथा ईरानी गुट का दरबार में विशेष महत्व; दरबार में चित्रकारों, संगीतज्ञों, कवियों और विद्वानों को प्रश्रय; शासक वर्गों में सरदारों के साथ जमींदार भी शामिल; राजनीति में उच्च वर्ग की महिलाओं के बढ़ते महत्व के अधिक प्रमाण; जैसे- नूरजहाँ, चाँद बीबी, रानी दुर्गावती आदि; दासों का राजनीतिक महत्व कम होना; हिंदू समाज की वर्ण व्यवस्था, जाति-प्रथा, छुआछूत, महिलाओं की दयनीय दशा आदि पहलु पूर्ववर्ती काल की तरह ही प्रचलित; वाणिज्य तथा व्यापार का महत्व बढ़ना तथा बड़ी संख्या में विभिन्न प्रकार के व्यापारी वर्ग की उपस्थिति की जानकारी; जैसे- वोहरा, खोजा, मेनन, खत्री, बंजारा आदि; यूरोपियन व्यापारी भी; आर्थिक गतिविधियों के संदर्भ में,सर्राफनामक एक वर्ग का विशेष उल्लेख;इनके द्वारा मुद्रा की गुणवता की जाँच करना और हुंडी जारी करना; भाषा, खानपान, मनोरंजन, आवास आदि पूर्ववर्ती काल की तरह; शिक्षा में भी धार्मिक विषयों के साथ-साथ गणित, दर्शन आदि की पढ़ाई; विभिन्न व्यापारियों एवं यात्रियों से माध्यम से यह ज्ञात होना कि शासक वर्गों की ऐशोआराम भरी जिंदगी तथा आम लोगों(किसानों, कारीगरों, श्रमिकों आदि) की घोर दरिद्रता; ग्रामीण समाज का मिट्टी के बने घरों में रहना तथा मिट्टी के बर्तन तथा बाँस की चटाइयां, खाट आदि का प्रयोग; ग्रामीण समाज में चावल, मोटे अनाज और दाल मुख्य आहार; चरागाहों की अधिकता होने से मवेशियों की अधिक संख्या तथा दूध एवं उससे बने उत्पादों का प्रचलन; गाँव में असमानता व्याप्त; गाँवों को कारीगरों का भुगतान जिंसों में मिलना; हल या बैल नहीं होने पर किसानों को जमींदारों/उच्च जाति के खेतों में काम करना; ग्रामीण स्तर पर मध्यस्थ वर्ग ही एक प्रकार से अभिजात्य वर्ग; जमींदार शब्द का व्यापक प्रचलन; सरदारों की तुलना में जमींदारों की आय सीमित; छोटे जमींदार कमोबेश किसानों की तरह वहीँ बड़े जमींदारों का जीवनस्तर छोटे राजाओं या सरदारों के समान; किसानों के मुख्यतः 2 वर्ग की जानकारी; खुद्खास्त(वैसे किसान जिनकी अपनी जमीन तथा उसे स्वंय जोतना-बोना) तथा पाहिकास्त; भूमिहीन किसान और मजदुर अक्सर अस्पृश्य जातियों के लोग- कमीन; अकाल पड़ने पर निम्न वर्ग के किसानों तथा कारीगरों को ज्यादा नुकसान; जमीन पर वंशानुगत अधिकार तथा भूराजस्व अदा करते रहने पर बेदखली नहीं; नगरों में बड़ी संख्या गरीबों की(कारीगर, नौकर-चाकर, गुलाम, सिपाही, शारीरिक श्रम करने वाले लोग आदि);
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सार्वजनिक नीति से आप क्या समझते हैं? स्वतंत्रता पश्चात भारत में सार्वजनिक नीतियों के दृष्टिकोण में क्रमिक रूप से परिवर्तन देखने को मिलते हैं। चर्चा कीजिये। (150 से 200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by public policy? After independence, there are gradual changes in the approach of public policies in India. Discuss (150 to 200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में नीतियों, उनके तत्वों और स्वरुप को स्पष्ट कीजिये 2- मुख्य भाग में विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत सार्वजनिक नीतियों में आये क्रमिक परिवर्तनों को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में परिवर्तन के कारकों को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| नीति, सोचसमझकर बनाये गये सिद्धान्तों की प्रणाली है जो उचित निर्णय लेने और सम्यक परिणाम पाने में मदद करती है।संसाधन, सामान्य उद्देश्य(संवृद्धि, आधुनिकीकरण, आत्म निर्भरता एवं समता), विशिष्ट लक्ष्य(यह विभिन्न योजनाओं का अलग अलग हो सकता है), समयावधिआदि तत्व नीति निर्माण में शामिल होते हैं| नीति निर्माण प्रक्रिया में नीति का आधार, नीति का सिद्धांत, नीति का उद्देश्य, नीति के क्रियान्वयन का विश्लेषण किया जाता है| भारत की सभी नीतियों का सामान्य लक्ष्य भारत के सभी समुदायों का समतामूलक विकासकरना होता है| नीति के माध्यम से समाज के संसाधनों का उपयुक्त एवं अनुकूलतम उपयोग करते हुए सामाजिक आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना, अधिकारों का प्रोत्साहन, कल्याणकारी स्वरुप बनाए रखनाहोता है| भारत में नीति निर्माण भारतीय संविधान की प्रस्तावना, मूल अधिकार, नीति निदेशक तत्व नीति निर्माण का संवैधानिक आधार प्रस्तुत करते हैं भारतीय संविधान में लोगों को सुरक्षित करने एवं सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्रदान करने हेतु लोकतांत्रिक सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने के लिए राज्य को अधिकृत किया है राज्य ने इस अधिकार का प्रयोग करते हुए योजनाबद्ध तरीके से नीतियों का निर्माण किया है हालांकि समय एवं परिस्थितियों के आधार पर नीतियों में परिवर्तन होते रहे है| नीतियों में क्रमिक परिवर्तन नियोजन आधारित विकास नीति(1950-80) विकास की दिशा निर्धारित करने के लिए योजना बनाने हेतु 1950 में योजना आयोग का गठन इस चरण में नियोजन तथा नीति निर्माण में प्रान्तों की भागीदारी लगभग नगण्य थी वस्तुतः सार्वजनिक नीतियाँ दो प्रकार की हो सकती हैं यथा केंद्रीकृत एवं विकेंद्रीकृत केंद्रीकृत नीतियां समान विकास के माध्यम से एकीकरण को प्रोत्साहित करती हैं किन्तु विविध समाजों में यह उपयुक्त नही मानी जाती है क्योंकि इससे विभिन्न वर्गों में असंतोष उत्पन्न होने की संभावना होती है इसीलिए वर्ष 1980 के बाद नीति निर्माण के उपागम में बदलाव दिखता है जबकि विकेंद्रीकृत नीति निर्माण प्रारम्भ किया गया| 1980 के पूर्व लगभग 6 पंच वर्षीय योजनायें आयीं इनके सामान्य उद्देश्य कृषि अथवा उद्योगों का विकास हुआ करते थे इन योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए राष्ट्रीकरण की नीति अपनाई गयी थी अतः राज्य पर कार्य का बोझ बढ़ गया था जबकि राज्य के पास पर्याप्त संसाधन नहीं थे जिसका परिणाम हिन्दू विकास दर के रूप में देखा गया|| विकेंद्रीकृत नीति निर्माण में केंद्र के साथ ही प्रान्तों द्वारा भी नीतियाँ बनायी जाती है, इसे विविध समाजों के लिए उपयुक्त माना जाता है किन्तु इसमें विवाद/कनफ्लिक्ट उत्पन्न होने की संभावना होती है भारत ने उपरोक्त दोनों दृष्टिकोणों का समावेश करते हुए सहकारी नीति निर्माण तंत्र के दृष्टिकोण को क्रमशः अपना लिया| LPG आधारित नीतियां (1990 से 2005) इस चरण में उद्योगों पर से अब तक जारी विभिन्न सरकारी प्रतिबन्ध समाप्त कर दिए गए और नियमों को उदार बनाया गया आर्थिक गतिविधियों में तेजी, उद्योगों के विकास और रोजगार सृजन के लिए निजीकरण की नीति अपनाई गयी पूँजी और तकनीक का अंतर्प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए वैश्वीकरण की नीति को अपनाया गया LPG नीति के व्यापक लाभ मिले किन्तु समाज में आर्थिक असमानता बढ़ी इस चरण में नकारात्मक प्रवृत्ति के रूप में क्रोनी कैपिटलिज्म को देखा जा सकता है इससे भारत के लोकतांत्रिक समाजवादी स्वरुप पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा था अतः दृष्टिकोण में बदलाव लाया गया| नागरिक समाज आधारित नीतियाँ (2005 के बाद) 2005 से 2012 तक बिना गुणवत्ता पर ध्यान दिए कल्याण एवं विकासात्मक योजनाओं को प्रारम्भ किया गया इस चरण में न्यूनतम आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए नीतियों का निर्माण किया गया जैसे मनरेगा, अस्पताल, MDM आदि सामाजिक नीति के प्रति कल्याण से ऊपर उठते हुए अधिकार आधारित दृष्टिकोण अपनाया जाने लगा| जैसे खाद्य सुरक्षा, शिक्षा का अधिकार तथा सूचना का अधिकार आदि वर्ष 2012 के बाद आवश्यकताओं की गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए नीतियाँ बनायी जाने लगीं जैसे MDM में पोषकों का निर्धारण करना, नगरीकरण की जगह नगरीकरण की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान (स्मार्ट सिटी) आदि वर्तमान में लागत प्रभावी एवं निरोधक नीतियों का निर्माण किया जा रहा है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि विचारधाराओं के प्रभाव, संसाधनों की उपलब्धता, जनचेतना के स्तर आदि कारकों ने भारत में सार्वजनिक नीति निर्माण के दृष्टिकोण में क्रमिक रूप से परिवर्तन सुनिश्चित किया है|
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##Question:सार्वजनिक नीति से आप क्या समझते हैं? स्वतंत्रता पश्चात भारत में सार्वजनिक नीतियों के दृष्टिकोण में क्रमिक रूप से परिवर्तन देखने को मिलते हैं। चर्चा कीजिये। (150 से 200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by public policy? After independence, there are gradual changes in the approach of public policies in India. Discuss (150 to 200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में नीतियों, उनके तत्वों और स्वरुप को स्पष्ट कीजिये 2- मुख्य भाग में विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत सार्वजनिक नीतियों में आये क्रमिक परिवर्तनों को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में परिवर्तन के कारकों को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| नीति, सोचसमझकर बनाये गये सिद्धान्तों की प्रणाली है जो उचित निर्णय लेने और सम्यक परिणाम पाने में मदद करती है।संसाधन, सामान्य उद्देश्य(संवृद्धि, आधुनिकीकरण, आत्म निर्भरता एवं समता), विशिष्ट लक्ष्य(यह विभिन्न योजनाओं का अलग अलग हो सकता है), समयावधिआदि तत्व नीति निर्माण में शामिल होते हैं| नीति निर्माण प्रक्रिया में नीति का आधार, नीति का सिद्धांत, नीति का उद्देश्य, नीति के क्रियान्वयन का विश्लेषण किया जाता है| भारत की सभी नीतियों का सामान्य लक्ष्य भारत के सभी समुदायों का समतामूलक विकासकरना होता है| नीति के माध्यम से समाज के संसाधनों का उपयुक्त एवं अनुकूलतम उपयोग करते हुए सामाजिक आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना, अधिकारों का प्रोत्साहन, कल्याणकारी स्वरुप बनाए रखनाहोता है| भारत में नीति निर्माण भारतीय संविधान की प्रस्तावना, मूल अधिकार, नीति निदेशक तत्व नीति निर्माण का संवैधानिक आधार प्रस्तुत करते हैं भारतीय संविधान में लोगों को सुरक्षित करने एवं सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्रदान करने हेतु लोकतांत्रिक सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने के लिए राज्य को अधिकृत किया है राज्य ने इस अधिकार का प्रयोग करते हुए योजनाबद्ध तरीके से नीतियों का निर्माण किया है हालांकि समय एवं परिस्थितियों के आधार पर नीतियों में परिवर्तन होते रहे है| नीतियों में क्रमिक परिवर्तन नियोजन आधारित विकास नीति(1950-80) विकास की दिशा निर्धारित करने के लिए योजना बनाने हेतु 1950 में योजना आयोग का गठन इस चरण में नियोजन तथा नीति निर्माण में प्रान्तों की भागीदारी लगभग नगण्य थी वस्तुतः सार्वजनिक नीतियाँ दो प्रकार की हो सकती हैं यथा केंद्रीकृत एवं विकेंद्रीकृत केंद्रीकृत नीतियां समान विकास के माध्यम से एकीकरण को प्रोत्साहित करती हैं किन्तु विविध समाजों में यह उपयुक्त नही मानी जाती है क्योंकि इससे विभिन्न वर्गों में असंतोष उत्पन्न होने की संभावना होती है इसीलिए वर्ष 1980 के बाद नीति निर्माण के उपागम में बदलाव दिखता है जबकि विकेंद्रीकृत नीति निर्माण प्रारम्भ किया गया| 1980 के पूर्व लगभग 6 पंच वर्षीय योजनायें आयीं इनके सामान्य उद्देश्य कृषि अथवा उद्योगों का विकास हुआ करते थे इन योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए राष्ट्रीकरण की नीति अपनाई गयी थी अतः राज्य पर कार्य का बोझ बढ़ गया था जबकि राज्य के पास पर्याप्त संसाधन नहीं थे जिसका परिणाम हिन्दू विकास दर के रूप में देखा गया|| विकेंद्रीकृत नीति निर्माण में केंद्र के साथ ही प्रान्तों द्वारा भी नीतियाँ बनायी जाती है, इसे विविध समाजों के लिए उपयुक्त माना जाता है किन्तु इसमें विवाद/कनफ्लिक्ट उत्पन्न होने की संभावना होती है भारत ने उपरोक्त दोनों दृष्टिकोणों का समावेश करते हुए सहकारी नीति निर्माण तंत्र के दृष्टिकोण को क्रमशः अपना लिया| LPG आधारित नीतियां (1990 से 2005) इस चरण में उद्योगों पर से अब तक जारी विभिन्न सरकारी प्रतिबन्ध समाप्त कर दिए गए और नियमों को उदार बनाया गया आर्थिक गतिविधियों में तेजी, उद्योगों के विकास और रोजगार सृजन के लिए निजीकरण की नीति अपनाई गयी पूँजी और तकनीक का अंतर्प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए वैश्वीकरण की नीति को अपनाया गया LPG नीति के व्यापक लाभ मिले किन्तु समाज में आर्थिक असमानता बढ़ी इस चरण में नकारात्मक प्रवृत्ति के रूप में क्रोनी कैपिटलिज्म को देखा जा सकता है इससे भारत के लोकतांत्रिक समाजवादी स्वरुप पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा था अतः दृष्टिकोण में बदलाव लाया गया| नागरिक समाज आधारित नीतियाँ (2005 के बाद) 2005 से 2012 तक बिना गुणवत्ता पर ध्यान दिए कल्याण एवं विकासात्मक योजनाओं को प्रारम्भ किया गया इस चरण में न्यूनतम आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए नीतियों का निर्माण किया गया जैसे मनरेगा, अस्पताल, MDM आदि सामाजिक नीति के प्रति कल्याण से ऊपर उठते हुए अधिकार आधारित दृष्टिकोण अपनाया जाने लगा| जैसे खाद्य सुरक्षा, शिक्षा का अधिकार तथा सूचना का अधिकार आदि वर्ष 2012 के बाद आवश्यकताओं की गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए नीतियाँ बनायी जाने लगीं जैसे MDM में पोषकों का निर्धारण करना, नगरीकरण की जगह नगरीकरण की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान (स्मार्ट सिटी) आदि वर्तमान में लागत प्रभावी एवं निरोधक नीतियों का निर्माण किया जा रहा है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि विचारधाराओं के प्रभाव, संसाधनों की उपलब्धता, जनचेतना के स्तर आदि कारकों ने भारत में सार्वजनिक नीति निर्माण के दृष्टिकोण में क्रमिक रूप से परिवर्तन सुनिश्चित किया है|
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रेलवे के विकास ने भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रत्येक आयाम को गहरे स्तर पर प्रभावित किया । सोदाहरण व्याख्या कीजिए । ( 150-200 शब्द/10 अंक ) The development of railways affected every dimension of the Indian economy at a deep level. Explain with examples. (150-200 words/10 Marks)
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दृष्टिकोण : रेलवे के विकास का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । रेलवे का ब्रिटिशकालीन भारतीय भारतीय अर्थव्यवस्था के विविध आयामों पर प्रभाव दर्शाइए । संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : भारत में रेलवे का विकास 1850 के दशक में प्रारंभ हुआ और पहली रेल का परिचालन बॉम्बे से ठाणे के बीच 1853 में हुआ । भारत में रेलवे का विकास ब्रिटिश उपनिवेशवाद के वित्तीय पूंजीवादी चरण का क्लासिकल उदाहरण प्रस्तुत करता है । 5% की गारंटीशुदा लाभांश ने ब्रिटिश पूँजीपतियों को आकर्षित करने का कार्य किया और भारत में रेलवे के विकास ने मंदी के प्रभाव में आए ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को गति देने का कार्य किया । रेलवे का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव को हम निम्नलिखीत रूपों में देख सकते हैं : 1. उद्योग पर प्रभाव : रेलवे के विकास के कारण ब्रिटिश उद्योगों को अत्यधिक लाभ हुआ ।एक तरफ इस्पात एवं इंजीनियरिंग गुड्स की मांग बढ़ी तो दूसरी तरफ कपड़ा एवं अन्य उपभोक्ता वस्तुओं के बाजार का विस्तार हुआ और ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को मंदी से निकलने का अवसर मिला । रेलवे के भौगोलिक विन्यास तथा भारा नीति में ब्रिटिश हितों को प्राथमिकता दी गई । रेलवे का विकास मुख्य रूप से उन्हीं क्षेत्रों में किया गया , जहां से कच्चे माल के दोहन की पर्याप्त संभावना थी । साथ ही रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में रेलवे के विकास को प्राथमिकता दी गई , जिससे कि आपात समय में तीव्रता से सैनिकों की पहुँच सुनिश्चित की जा सके । रेलवे से भारत के ग्रामीण उद्योगों को नुकसान हुआ । रेलवे के विकास ने सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों तक तैयार मालों को पहुंचाया और वहाँ से कच्चे मालों को बंदरगाह तक पहुंचाने में मदद की । इससे ग्रामीण उद्योगों का विनाश हुआ । सीमित स्वरूप में रेलवे ने भारत में आधुनिक उद्योगों को जन्म दिया । 2. कृषि पर प्रभाव : कृषि के वाणिज्यिकरण की प्रक्रिया को और गति मिली । नगदी फसलों का उत्पादन बढ़ा व कृषि का स्वरूप परिवर्तित हुआ । 3. व्यापार पर प्रभाव : 1813 के पश्चात ही भारत में ब्रिटिश औद्योगिक क्रांति के दबाव में व्यापार की प्रकृति परिवर्तित होने लागी थी । भारत को तैयार माल के आयातक और कच्चे माल के निर्यातक के रूप में स्थापित किया जाने लगा । इस प्रक्रिया को रेलवे ने नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया । 4. परिवहन : रेलवे के साथ भारत में परिवहन के द्रुतगामी साधन की शुरुआत । रेलवे ने रोजगार का अवसर भी सृजित किया हालांकि उच्च पदों पर अंग्रेजों की नियुक्ति की गई ।उन्हें अच्छे वेतन व पेंशन दिए गए तथा श्रमिकों एवं निम्न स्तर पर भारतीयों को भी रोजगार मिला । 5. अकाल : अकाल के दौरान रेलवे की एक विरोधाभाषी भूमिका दिखाई देती है ।एक तरफ रेलवे ने रोजगार का सृजन किया तथा अकाल प्रभावित क्षेत्रों में राहत सामग्री को पहुंचाया तो दूसरी तरफ अकाल के दिनों में भी खाद्यान का निर्यात जारी रहा । साथ ही रेलवे के कारण गैर-खाद फसलों की कृषि को बढ़ावा मिला इससे खादान की उपज कम हुई और अकाल के दिनों में इससे भूखमरी बढ़ी । कुल मिलाकर रेलवे ने भारत से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप में धन के दोहन की प्रक्रिया को ही गति प्रदान की ।जैसे- रेलवे में कार्यरत कर्मचारियों को अच्छे वेतन व पेंशन , निवेश पर 5% लाभ की गारंटी प्रत्यक्ष दोहन का उदाहरण है ।दूसरी तरफ भारत से बाजार एवं कच्चे माल से होने वाली आय जो कि प्रत्यक्ष की तुलना में कई गुना अधिक होती थी, अप्रत्यक्ष दोहन के उदाहरण हैं ।रेलवे ने भारत में भारी उद्योगों का विकास भी नहीं किया जैसा कि इसने यूरोपीय देशों में किया क्योंकि सभी सामग्रियाँ ब्रिटेन से आयात की गई । भारत में रेलवे के कुछ सकारात्मक सामाजिक तथा राजनीतिक परिणाम दिखते हैं तथापि आर्थिक क्षेत्रों में सकारात्मक परिणाम बेहद सीमित रहे ।
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##Question:रेलवे के विकास ने भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रत्येक आयाम को गहरे स्तर पर प्रभावित किया । सोदाहरण व्याख्या कीजिए । ( 150-200 शब्द/10 अंक ) The development of railways affected every dimension of the Indian economy at a deep level. Explain with examples. (150-200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण : रेलवे के विकास का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । रेलवे का ब्रिटिशकालीन भारतीय भारतीय अर्थव्यवस्था के विविध आयामों पर प्रभाव दर्शाइए । संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : भारत में रेलवे का विकास 1850 के दशक में प्रारंभ हुआ और पहली रेल का परिचालन बॉम्बे से ठाणे के बीच 1853 में हुआ । भारत में रेलवे का विकास ब्रिटिश उपनिवेशवाद के वित्तीय पूंजीवादी चरण का क्लासिकल उदाहरण प्रस्तुत करता है । 5% की गारंटीशुदा लाभांश ने ब्रिटिश पूँजीपतियों को आकर्षित करने का कार्य किया और भारत में रेलवे के विकास ने मंदी के प्रभाव में आए ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को गति देने का कार्य किया । रेलवे का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव को हम निम्नलिखीत रूपों में देख सकते हैं : 1. उद्योग पर प्रभाव : रेलवे के विकास के कारण ब्रिटिश उद्योगों को अत्यधिक लाभ हुआ ।एक तरफ इस्पात एवं इंजीनियरिंग गुड्स की मांग बढ़ी तो दूसरी तरफ कपड़ा एवं अन्य उपभोक्ता वस्तुओं के बाजार का विस्तार हुआ और ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को मंदी से निकलने का अवसर मिला । रेलवे के भौगोलिक विन्यास तथा भारा नीति में ब्रिटिश हितों को प्राथमिकता दी गई । रेलवे का विकास मुख्य रूप से उन्हीं क्षेत्रों में किया गया , जहां से कच्चे माल के दोहन की पर्याप्त संभावना थी । साथ ही रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में रेलवे के विकास को प्राथमिकता दी गई , जिससे कि आपात समय में तीव्रता से सैनिकों की पहुँच सुनिश्चित की जा सके । रेलवे से भारत के ग्रामीण उद्योगों को नुकसान हुआ । रेलवे के विकास ने सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों तक तैयार मालों को पहुंचाया और वहाँ से कच्चे मालों को बंदरगाह तक पहुंचाने में मदद की । इससे ग्रामीण उद्योगों का विनाश हुआ । सीमित स्वरूप में रेलवे ने भारत में आधुनिक उद्योगों को जन्म दिया । 2. कृषि पर प्रभाव : कृषि के वाणिज्यिकरण की प्रक्रिया को और गति मिली । नगदी फसलों का उत्पादन बढ़ा व कृषि का स्वरूप परिवर्तित हुआ । 3. व्यापार पर प्रभाव : 1813 के पश्चात ही भारत में ब्रिटिश औद्योगिक क्रांति के दबाव में व्यापार की प्रकृति परिवर्तित होने लागी थी । भारत को तैयार माल के आयातक और कच्चे माल के निर्यातक के रूप में स्थापित किया जाने लगा । इस प्रक्रिया को रेलवे ने नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया । 4. परिवहन : रेलवे के साथ भारत में परिवहन के द्रुतगामी साधन की शुरुआत । रेलवे ने रोजगार का अवसर भी सृजित किया हालांकि उच्च पदों पर अंग्रेजों की नियुक्ति की गई ।उन्हें अच्छे वेतन व पेंशन दिए गए तथा श्रमिकों एवं निम्न स्तर पर भारतीयों को भी रोजगार मिला । 5. अकाल : अकाल के दौरान रेलवे की एक विरोधाभाषी भूमिका दिखाई देती है ।एक तरफ रेलवे ने रोजगार का सृजन किया तथा अकाल प्रभावित क्षेत्रों में राहत सामग्री को पहुंचाया तो दूसरी तरफ अकाल के दिनों में भी खाद्यान का निर्यात जारी रहा । साथ ही रेलवे के कारण गैर-खाद फसलों की कृषि को बढ़ावा मिला इससे खादान की उपज कम हुई और अकाल के दिनों में इससे भूखमरी बढ़ी । कुल मिलाकर रेलवे ने भारत से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप में धन के दोहन की प्रक्रिया को ही गति प्रदान की ।जैसे- रेलवे में कार्यरत कर्मचारियों को अच्छे वेतन व पेंशन , निवेश पर 5% लाभ की गारंटी प्रत्यक्ष दोहन का उदाहरण है ।दूसरी तरफ भारत से बाजार एवं कच्चे माल से होने वाली आय जो कि प्रत्यक्ष की तुलना में कई गुना अधिक होती थी, अप्रत्यक्ष दोहन के उदाहरण हैं ।रेलवे ने भारत में भारी उद्योगों का विकास भी नहीं किया जैसा कि इसने यूरोपीय देशों में किया क्योंकि सभी सामग्रियाँ ब्रिटेन से आयात की गई । भारत में रेलवे के कुछ सकारात्मक सामाजिक तथा राजनीतिक परिणाम दिखते हैं तथापि आर्थिक क्षेत्रों में सकारात्मक परिणाम बेहद सीमित रहे ।
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While India has pursued a look east policy involving South East Asia for a long time now, there seems to be a "look west" policy in the making involving West Asia. Discuss in the context of India"s engagement with West Asia in recent years. (10 Marks/150 words)
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Approach: • As Introduction, quote Former PM stating the need of having Look West Policy • Highlight the areas of India’s engagement in West Asia • Also, discuss the challenges in formulation Look West Policy. Ans: According to the Former Prime Minister of India, "the Gulf region, like South-East and South Asia, is part of our natural economic hinterland. We must pursue closer economic relations with all our neighbours in our wider Asian neighbourhood. India has successfully pursued a Look East policy to come closer to the countries of South-East Asia. We must, similarly, come closer to our western a Strong ties between the west Asian countries. The statement clearly indicates the demand of Look West policy especially in light of recent visits by the Prime Minister of India to various Middle East countries from Iran to Israel. Areas of India’s engagement in West Asia 1. The major area of Complementarity is Energy Resources, India is deficient on this front and Middle East countries are abundant Eg. 70 per cent of India’s imported energy needs come from West Asia 2. India is a big market for Middle East countries for their products. 3. Amid a slump in global oil prices and rising aspirations of the youth in the Gulf region, the monarchies find in India an attractive destination and partner to diversify into non-oil sectors. The key Gulf States of Saudi Arabia and the United Arab Emirates (UAE) are emerging as key investors in India. 4. They are important partners in anti-terrorism and de-radicalisation initiatives like UAE and Saudi Arabia 5. India’s diaspora in the Gulf, numbering between around 7 and 8 million, has of course always been important to the country’s economy and its policy objective of alleviating poverty. The Gulf is India’s main source of expat remittances. In 2015-2016, Indian workers sent back $35.9 billion in valuable foreign exchange. 6. Not only Economic advantage, but Indian diaspora also provides a unique soft power advantage that improves India’s image as it competes with more powerful states in the region like USA, Russia, China etc. 7. Iran is India’s faster gateway to Afghanistan, Central Asia, Russia and beyond. Several connectivity projects via Iran will expand India’s footprints in the Eurasian region. 8. India’s maritime doctrine of 2009 and 2015 state that the Gulf and the Arabian Sea are vital to India’s interests, including securing choke points. Despite having such a wide area of interest in the region, there exist significant challenges, which make the formulation of Look west policy a tedious task: 1. First and foremost challenge is to define the area covered under the policy, as there are large no. of countries lying west to India. 2. In the Middle East region, there is a major divide on the lines of Shia and Sunni and long history of rivalry between countries like Iran with Saudi Arabia and Israel, Israel and Palestine etc. In such circumstances, taking a stance through the policy would upset relations with some of the countries. Besides, India’s Look West Policy will prove fruitful when GCC’s Look East” policy gives India an equal scope of assimilating its interests in the region.
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##Question:While India has pursued a look east policy involving South East Asia for a long time now, there seems to be a "look west" policy in the making involving West Asia. Discuss in the context of India"s engagement with West Asia in recent years. (10 Marks/150 words)##Answer:Approach: • As Introduction, quote Former PM stating the need of having Look West Policy • Highlight the areas of India’s engagement in West Asia • Also, discuss the challenges in formulation Look West Policy. Ans: According to the Former Prime Minister of India, "the Gulf region, like South-East and South Asia, is part of our natural economic hinterland. We must pursue closer economic relations with all our neighbours in our wider Asian neighbourhood. India has successfully pursued a Look East policy to come closer to the countries of South-East Asia. We must, similarly, come closer to our western a Strong ties between the west Asian countries. The statement clearly indicates the demand of Look West policy especially in light of recent visits by the Prime Minister of India to various Middle East countries from Iran to Israel. Areas of India’s engagement in West Asia 1. The major area of Complementarity is Energy Resources, India is deficient on this front and Middle East countries are abundant Eg. 70 per cent of India’s imported energy needs come from West Asia 2. India is a big market for Middle East countries for their products. 3. Amid a slump in global oil prices and rising aspirations of the youth in the Gulf region, the monarchies find in India an attractive destination and partner to diversify into non-oil sectors. The key Gulf States of Saudi Arabia and the United Arab Emirates (UAE) are emerging as key investors in India. 4. They are important partners in anti-terrorism and de-radicalisation initiatives like UAE and Saudi Arabia 5. India’s diaspora in the Gulf, numbering between around 7 and 8 million, has of course always been important to the country’s economy and its policy objective of alleviating poverty. The Gulf is India’s main source of expat remittances. In 2015-2016, Indian workers sent back $35.9 billion in valuable foreign exchange. 6. Not only Economic advantage, but Indian diaspora also provides a unique soft power advantage that improves India’s image as it competes with more powerful states in the region like USA, Russia, China etc. 7. Iran is India’s faster gateway to Afghanistan, Central Asia, Russia and beyond. Several connectivity projects via Iran will expand India’s footprints in the Eurasian region. 8. India’s maritime doctrine of 2009 and 2015 state that the Gulf and the Arabian Sea are vital to India’s interests, including securing choke points. Despite having such a wide area of interest in the region, there exist significant challenges, which make the formulation of Look west policy a tedious task: 1. First and foremost challenge is to define the area covered under the policy, as there are large no. of countries lying west to India. 2. In the Middle East region, there is a major divide on the lines of Shia and Sunni and long history of rivalry between countries like Iran with Saudi Arabia and Israel, Israel and Palestine etc. In such circumstances, taking a stance through the policy would upset relations with some of the countries. Besides, India’s Look West Policy will prove fruitful when GCC’s Look East” policy gives India an equal scope of assimilating its interests in the region.
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सामाजिक अंकेक्षण या सोशल ऑडिट के व्यापक लाभों को प्राप्त करने हेतु इसकी सीमाओं या बाधाओं से पार पाना अतिमहत्वपूर्ण है| चर्चा कीजिये| साथ ही, सामाजिक अंकेक्षण या लेखांकन को अधिक प्रभावी बनाने हेतु कुछ सुझाव प्रस्तुत कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) To get the comprehensive benefits of social audit, it is very important to overcome its limitations or obstacles. Discuss. Also, give some suggestions to make social audit or social accounting more effective. (150-200 words, 10 Marks)
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एप्रोच- सामाजिक अंकेक्षण या सोशल ऑडिट के अर्थ को बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में,सोशल ऑडिट के व्यापक लाभों एवं महत्वों को इसके उद्देश्यों के साथ जोड़ते हुए बिंदुबार लिखिए| अगले भाग में,सोशल ऑडिट के संदर्भ में सीमाओं या बाधाओं का उल्लेख कीजिये| अंतिम भाग में, इन सीमाओं से पार करने की जरुरत बताते हुए इसे अधिक प्रभावी बनाने हेतु कुछ सुझाव प्रस्तुत कीजिये| उत्तर- सामाजिक ऑडिट का तात्पर्य है एक ऐसी प्रक्रिया जिसके द्वारा एक संगठन/सरकार अपने हितधारकों के सामाजिक प्रदर्शन के लिए एवं भविष्य में सामाजिक प्रदर्शन में सुधार के लिए अपनाती है| यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत सार्वजनिक पहलों के लिए उपयोग किये गये संसाधनों के विवरणों को प्रायःसार्वजनिक मंचों के माध्यम से जनसाधारण के साथ साझा किया जाता है| यह अंतिम उपयोगकर्ताओं को विकास कार्यक्रमों के प्रभाव की जाँच करने की अनुमति देता है| |यह दृष्टिपत्र/विजन,लक्ष्य और वास्तविकता सिद्धांत पर आधारित है|सामाजिक ऑडिट बहुपरिप्रेक्ष्य, व्यापक, सहभागी, बहुआयामी, नियमित, तुलनात्मक,सत्यापन तथा पारदर्शी जैसे सिद्धांतों पर आधारित होता है| भारत में सामाजिक ऑडिट की शुरुआतमनरेगा के तहत 2011 में की गयी थी जिसमें निम्न चरणों के माध्यम से सोशल ऑडिट के उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है- सामाजिक अंकेक्षण कैलेंडर; विलेज रिसोर्स पर्सन्स(VRP) का चयन; वीआरपी का प्रशिक्षण; अभिलेखों का समेकन; सत्यापन; रिपोर्ट तैयार करना; सोशल ऑडिट तथा ग्राम सभा; सार्वजनिक सुनवाई| सामाजिक ऑडिट के उद्देश्य प्रशासन(विशेषकर स्थानीय प्रशासन) को बढ़ावा देना एवं उससे जुड़े हुए निकायों में जवाबदेहिता और पारदर्शिता को मजबूत करना; स्थानीय विकास के लिए उपलब्ध जरूरतों एवं संसाधनों के बीच भौतिक एवं वित्तीय अंतराल का आकलन करना; स्थानीय सामाजिक और उत्पादन सेवाओं के लाभार्थियों एवं सेवा प्रदान करने वालों के बीच समन्वयता और जागरूकता को विकसित करना; स्थानीय विकास कार्यक्रमों को प्रभावी बनाना; हितधारकों के हितों में प्राथमिकताएं निर्धारित करना; सार्वजनिक सेवाओं को समयबद्ध करना; सामाजिक ऑडिट का महत्व तथा लाभ सामाजिक ऑडिट तथा प्रशिक्षण के माध्यम से समस्या क्षेत्रों की पहचान करने में विधायिका तथा कार्यपालिका की सहायता करना; अग्रसक्रिय दृष्टिकोण अपनाकर तथा समाधानों का निर्माण करने का अवसर प्रदान करना; अधिकारों के प्रति जागरूकता; सामुदायिक भागीदारी; नियोजन का विकेंद्रीकरण; सकारात्मक संगठनात्मक परिवर्तन को प्रभावित करना; लोकतंत्र का विकास; वंचित समूहों को लाभ; संसाधनों का अनुकूलतम दोहन; अपव्यय में कमी तथा भ्रष्टाचार के उन्मूलन के माध्यम से सरकारी विभागों/संस्थाओं के उत्तरदायित्व में वृद्धि; प्राथमिकताओं के अनुरूप लोगों की अपेक्षाओं तथा प्राथमिकताओं को पुनः आकार देने में विभागों की सहायता; सामाजिक ऑडिट की विशेषताएं तथ्यों की जानकारी एवं गलतियों को पकड़ने में सहयोगी; जागरूकता निर्माण एवं अवसर में वृद्धि करना; हितधारकों के विभिन्न स्तरों के बीच संवाद के लिए स्थान और मंच प्रदान करना; समय पर शिकायत निवारण के लिए तंत्र की व्यवस्था करना; कार्यक्रम के बेहतर क्रियान्वयन के लिए लोगों के दबाव का निर्माण; सामाजिक अंकेक्षण/सोशल ऑडिट करने में आ रही बाधाएं/सीमाएँ लोगों के अंदर जागरूकता एवं अपने अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता की कमी; भारत में, योजनाओं के निर्माण में, आज भी राज्य की भूमिका समाज की अपेक्षा अधिक; ऑडिट की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि एक सामान्य व्यक्ति ऑडिट को करने में सक्षम नहीं होता है| ऑडिट करवाने के बावजूद ऑडिट से प्राप्त हुयी जानकारियों एवं ऑडिट के दौरान उजागर हुए दोषों को दंडित करने के उपयुक्त प्रावधानों के स्पष्टीकरण का अभाव; कार्यक्षेत्र अधिक स्थानीय तथा कुछ चयनित पहलुओं का ही समेकन; जाँच अनौपचारिक तथा अपरिष्कृत; योजनाओं के विविधीकरण के कारण एक प्रतिमान के माध्यम से सोशल ऑडिट कर पाना संभव नहीं; विद्यमान भ्रष्टाचार सोशल ऑडिट कर्मियों एवं अधिकारियों को भी स्वंय में समेट लेता है| प्रशिक्षित लेखापरीक्षकों का अभाव; सामाजिक ऑडिट के लिए सुझाव सोशल ऑडिट के अर्थ, कार्यक्षेत्र, उद्देश्य आदि के बारे में सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाने के लिए एक बड़े अभियान/संगठन को निर्मित किया जाना; प्रत्येक जिले में सोशल ऑडिट विशेषज्ञों की एक टीम बनाया जाना जिसके द्वारा सामाजिक लेखापरीक्षण से जुड़े सदस्यों/वीआरपी(VRPs) को प्रशिक्षण देना; सोशल ऑडिट विधियों का आयोजन और रिपोर्ट तैयार करने एवं उसका प्रस्तुतीकरण करने तक भागीदारी एवं पारदर्शिता को बढ़ावा देना; प्रतिबद्ध तथा सक्षम गैरसरकारी संगठनों को संचालन तथा उत्प्रेरक के रूप में भूमिका के लिए समर्थन देना; मीडिया को ग्रामीण तथा विकासोन्मुख दिशा की ओर अग्रसर करके सूचना भंडारण तथा वितरण को सुदृढ़ करना; सूचना के अग्रसक्रिय प्रकटीकरण को बढ़ावा देना;
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##Question:सामाजिक अंकेक्षण या सोशल ऑडिट के व्यापक लाभों को प्राप्त करने हेतु इसकी सीमाओं या बाधाओं से पार पाना अतिमहत्वपूर्ण है| चर्चा कीजिये| साथ ही, सामाजिक अंकेक्षण या लेखांकन को अधिक प्रभावी बनाने हेतु कुछ सुझाव प्रस्तुत कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) To get the comprehensive benefits of social audit, it is very important to overcome its limitations or obstacles. Discuss. Also, give some suggestions to make social audit or social accounting more effective. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:एप्रोच- सामाजिक अंकेक्षण या सोशल ऑडिट के अर्थ को बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में,सोशल ऑडिट के व्यापक लाभों एवं महत्वों को इसके उद्देश्यों के साथ जोड़ते हुए बिंदुबार लिखिए| अगले भाग में,सोशल ऑडिट के संदर्भ में सीमाओं या बाधाओं का उल्लेख कीजिये| अंतिम भाग में, इन सीमाओं से पार करने की जरुरत बताते हुए इसे अधिक प्रभावी बनाने हेतु कुछ सुझाव प्रस्तुत कीजिये| उत्तर- सामाजिक ऑडिट का तात्पर्य है एक ऐसी प्रक्रिया जिसके द्वारा एक संगठन/सरकार अपने हितधारकों के सामाजिक प्रदर्शन के लिए एवं भविष्य में सामाजिक प्रदर्शन में सुधार के लिए अपनाती है| यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत सार्वजनिक पहलों के लिए उपयोग किये गये संसाधनों के विवरणों को प्रायःसार्वजनिक मंचों के माध्यम से जनसाधारण के साथ साझा किया जाता है| यह अंतिम उपयोगकर्ताओं को विकास कार्यक्रमों के प्रभाव की जाँच करने की अनुमति देता है| |यह दृष्टिपत्र/विजन,लक्ष्य और वास्तविकता सिद्धांत पर आधारित है|सामाजिक ऑडिट बहुपरिप्रेक्ष्य, व्यापक, सहभागी, बहुआयामी, नियमित, तुलनात्मक,सत्यापन तथा पारदर्शी जैसे सिद्धांतों पर आधारित होता है| भारत में सामाजिक ऑडिट की शुरुआतमनरेगा के तहत 2011 में की गयी थी जिसमें निम्न चरणों के माध्यम से सोशल ऑडिट के उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है- सामाजिक अंकेक्षण कैलेंडर; विलेज रिसोर्स पर्सन्स(VRP) का चयन; वीआरपी का प्रशिक्षण; अभिलेखों का समेकन; सत्यापन; रिपोर्ट तैयार करना; सोशल ऑडिट तथा ग्राम सभा; सार्वजनिक सुनवाई| सामाजिक ऑडिट के उद्देश्य प्रशासन(विशेषकर स्थानीय प्रशासन) को बढ़ावा देना एवं उससे जुड़े हुए निकायों में जवाबदेहिता और पारदर्शिता को मजबूत करना; स्थानीय विकास के लिए उपलब्ध जरूरतों एवं संसाधनों के बीच भौतिक एवं वित्तीय अंतराल का आकलन करना; स्थानीय सामाजिक और उत्पादन सेवाओं के लाभार्थियों एवं सेवा प्रदान करने वालों के बीच समन्वयता और जागरूकता को विकसित करना; स्थानीय विकास कार्यक्रमों को प्रभावी बनाना; हितधारकों के हितों में प्राथमिकताएं निर्धारित करना; सार्वजनिक सेवाओं को समयबद्ध करना; सामाजिक ऑडिट का महत्व तथा लाभ सामाजिक ऑडिट तथा प्रशिक्षण के माध्यम से समस्या क्षेत्रों की पहचान करने में विधायिका तथा कार्यपालिका की सहायता करना; अग्रसक्रिय दृष्टिकोण अपनाकर तथा समाधानों का निर्माण करने का अवसर प्रदान करना; अधिकारों के प्रति जागरूकता; सामुदायिक भागीदारी; नियोजन का विकेंद्रीकरण; सकारात्मक संगठनात्मक परिवर्तन को प्रभावित करना; लोकतंत्र का विकास; वंचित समूहों को लाभ; संसाधनों का अनुकूलतम दोहन; अपव्यय में कमी तथा भ्रष्टाचार के उन्मूलन के माध्यम से सरकारी विभागों/संस्थाओं के उत्तरदायित्व में वृद्धि; प्राथमिकताओं के अनुरूप लोगों की अपेक्षाओं तथा प्राथमिकताओं को पुनः आकार देने में विभागों की सहायता; सामाजिक ऑडिट की विशेषताएं तथ्यों की जानकारी एवं गलतियों को पकड़ने में सहयोगी; जागरूकता निर्माण एवं अवसर में वृद्धि करना; हितधारकों के विभिन्न स्तरों के बीच संवाद के लिए स्थान और मंच प्रदान करना; समय पर शिकायत निवारण के लिए तंत्र की व्यवस्था करना; कार्यक्रम के बेहतर क्रियान्वयन के लिए लोगों के दबाव का निर्माण; सामाजिक अंकेक्षण/सोशल ऑडिट करने में आ रही बाधाएं/सीमाएँ लोगों के अंदर जागरूकता एवं अपने अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता की कमी; भारत में, योजनाओं के निर्माण में, आज भी राज्य की भूमिका समाज की अपेक्षा अधिक; ऑडिट की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि एक सामान्य व्यक्ति ऑडिट को करने में सक्षम नहीं होता है| ऑडिट करवाने के बावजूद ऑडिट से प्राप्त हुयी जानकारियों एवं ऑडिट के दौरान उजागर हुए दोषों को दंडित करने के उपयुक्त प्रावधानों के स्पष्टीकरण का अभाव; कार्यक्षेत्र अधिक स्थानीय तथा कुछ चयनित पहलुओं का ही समेकन; जाँच अनौपचारिक तथा अपरिष्कृत; योजनाओं के विविधीकरण के कारण एक प्रतिमान के माध्यम से सोशल ऑडिट कर पाना संभव नहीं; विद्यमान भ्रष्टाचार सोशल ऑडिट कर्मियों एवं अधिकारियों को भी स्वंय में समेट लेता है| प्रशिक्षित लेखापरीक्षकों का अभाव; सामाजिक ऑडिट के लिए सुझाव सोशल ऑडिट के अर्थ, कार्यक्षेत्र, उद्देश्य आदि के बारे में सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाने के लिए एक बड़े अभियान/संगठन को निर्मित किया जाना; प्रत्येक जिले में सोशल ऑडिट विशेषज्ञों की एक टीम बनाया जाना जिसके द्वारा सामाजिक लेखापरीक्षण से जुड़े सदस्यों/वीआरपी(VRPs) को प्रशिक्षण देना; सोशल ऑडिट विधियों का आयोजन और रिपोर्ट तैयार करने एवं उसका प्रस्तुतीकरण करने तक भागीदारी एवं पारदर्शिता को बढ़ावा देना; प्रतिबद्ध तथा सक्षम गैरसरकारी संगठनों को संचालन तथा उत्प्रेरक के रूप में भूमिका के लिए समर्थन देना; मीडिया को ग्रामीण तथा विकासोन्मुख दिशा की ओर अग्रसर करके सूचना भंडारण तथा वितरण को सुदृढ़ करना; सूचना के अग्रसक्रिय प्रकटीकरण को बढ़ावा देना;
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कल्याण का उद्देश्य जहां तक संभव हो अपने अस्तित्व की आवश्यकता का स्वयं में युक्त उन्मूलन होना चाहिए। (600-700 शब्दों में ) Welfare"s purpose should be to eliminate as for as possible the need for its own existence. (600-700 words)
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दृष्टिकोण: इस निबंध की मांग इस प्रकार है: कल्याण ऐसा होना चाहिए कि उसकी बार-बार आवश्यकता न हो। अर्थात जो भी नीतियाँ, योजनाएँ बनाई जा रही हैं उसका जो वास्तविक उद्देश्य प्राप्त किया जाना चाहिए। इससे व्यक्ति आत्मनिर्भर हो जिससे कल्याण की आवश्यकता ही न हो। नोट: इसमें व्यक्ति की आवश्यकता के उन्मूलन की बात नहीं कही गयी है। यह आयाम इस निबंध में गौण है। प्रस्तावना: निबंध के कथन को स्पष्ट कर सकते हैं, मुख्य शब्दों की व्याख्या- कल्या ऐसा कोई दृष्टांत दे सकते हैं जिस क्षेत्र में नीतियाँ लागू की जा रही हैं परंतु उसका प्रभाव नहीं दिख रहा है। बार-बार नए प्रयास करने पड़ रहे। मुख्य भाग: वैश्विक परिप्रेक्ष्य: ट्रिकल डाउन सिद्धांत का विवरण देते हुए भारत के संदर्भ में : सामाजिक आर्थिक, राजनीतिक, पर्यावरणीय आयाम को शामिल करते हुए ऐसे बिन्दुओं को लिखिए जिसमें भारत बहुत समय से प्रयास कर रहा है परंतु वांछित सफलता नहीं मिली है, इसके कारण क्या थे और वर्तमान में क्या किया आजा रहा है, आगे क्या किया जाना चाहिए जिससे कल्याण का उद्देश्य प्राप्त किया जा सके। जैसे: राजनीतिक आयाम:
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##Question:कल्याण का उद्देश्य जहां तक संभव हो अपने अस्तित्व की आवश्यकता का स्वयं में युक्त उन्मूलन होना चाहिए। (600-700 शब्दों में ) Welfare"s purpose should be to eliminate as for as possible the need for its own existence. (600-700 words)##Answer:दृष्टिकोण: इस निबंध की मांग इस प्रकार है: कल्याण ऐसा होना चाहिए कि उसकी बार-बार आवश्यकता न हो। अर्थात जो भी नीतियाँ, योजनाएँ बनाई जा रही हैं उसका जो वास्तविक उद्देश्य प्राप्त किया जाना चाहिए। इससे व्यक्ति आत्मनिर्भर हो जिससे कल्याण की आवश्यकता ही न हो। नोट: इसमें व्यक्ति की आवश्यकता के उन्मूलन की बात नहीं कही गयी है। यह आयाम इस निबंध में गौण है। प्रस्तावना: निबंध के कथन को स्पष्ट कर सकते हैं, मुख्य शब्दों की व्याख्या- कल्या ऐसा कोई दृष्टांत दे सकते हैं जिस क्षेत्र में नीतियाँ लागू की जा रही हैं परंतु उसका प्रभाव नहीं दिख रहा है। बार-बार नए प्रयास करने पड़ रहे। मुख्य भाग: वैश्विक परिप्रेक्ष्य: ट्रिकल डाउन सिद्धांत का विवरण देते हुए भारत के संदर्भ में : सामाजिक आर्थिक, राजनीतिक, पर्यावरणीय आयाम को शामिल करते हुए ऐसे बिन्दुओं को लिखिए जिसमें भारत बहुत समय से प्रयास कर रहा है परंतु वांछित सफलता नहीं मिली है, इसके कारण क्या थे और वर्तमान में क्या किया आजा रहा है, आगे क्या किया जाना चाहिए जिससे कल्याण का उद्देश्य प्राप्त किया जा सके। जैसे: राजनीतिक आयाम:
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How globalization has led to the reduction of employment in the formal sector of the Indian economy? Is increased informalization detrimental to the development of the country? (150 words | 10 marks )
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APPROACH- 1. In introduction give the definition of globalization along with data on informalisation in the economy. 2. List the reasons for informalisation in the economy 3. Explain the impact of increased informalisation on the economy 4. Conclude with the initiatives of government including what more can be done. ANSWER- Globalization refers to the economic exchange of goods and services internationally and international financial flows. India opened its economy in 1991 through LPG reforms. Indian economy shot to the 7-8% GDP growth from the Hindu rate of growth i.e. 2-3%. But globalization led to the problem of flexible employment and informalisation in the Indian economy because India has moved from crony socialism to stigmatized capitalism. According to Economic Survey 2018-19, "almost 93%" of the total workforce is informal. Reasons for Informalization in the economy - 1. Open market for Multi-National Companies- Big corporates are driven by profit motive. They try to reduce labour cost which led to more contract-based employment and Hire and fire policy. 2. Service Sector led growth- It requires skilled labour which is not radially available in the developing country like India. 3. Technology-driven growth – It creates more high skill service sector jobs than lower skill manufacturing jobs. It reduces the bargaining power of the lower-skilled labours and hence more informalization in the economy. 4. Negligence of manufacturing sector- Manufacturing sector was neglected due to the growth in service sector. Manufacturing sector could create formal jobs for those who looking to move away from agriculture sector. 5. Due to Privatisation and disinvestment in PSUs - Informal economy tends to expand. When public enterprises are closed downsized, retrenched workers move into the informal economy. 6. Shifting of labour intensive firms to other countries- Globalization has led to increasing free trade agreement between countries. But in case of India it was not able to fully harness the potential of FTA. It is argued that trade agreement causes shifting of labour intensive firms such as textile and leather to Bangladesh and Vietnam. This shifting has caused increased informalization in the economy. 7. Dwarf firms- Even after India stepped into the era of globalization, it has retained the complex labour laws and bureaucratic apathy toward entrepreneurship it has caused the problem of Dwarf firms in the Indian economy. These Dwarf firms have been causing informalization. 8. Effect of Artificial Intelligence- This possess a new challenge to the existing formal workforce because reorientation of skill is required to remain relevant in the market. Impact of increased Informalization on the development of the economy 1. Reduced tax collection- tax to GDP ratio remains low in the economy. 2. Lack of Social Security benefits- Almost all the government social sector schemes is available for the formal sector workers. So, informal workers remain out of the ambit of benefits. 3. Cash-based transaction- Transactions in the informal sector is mostly cash-based. It will contribute to the generation of black money in the economy, and the creation of a parallel shadow economy. 4. Decreased productivity in the economy- Companies usually do not invest in the skill development of the employees due to informalization which leads to the decreased productivity in the economy. 5. Increased inequality- Informal workers usually get lower wages, which leads to increasing inequality in the economy. Formal employment is very important for the development of the country and for arresting trend of informalisation. Government intervenes to tackle the problem of informalisation through initiatives like Make in India, Skill India, etc. It could also bring in place credible labour regulatory body to ensure social security of both formal and informal workers.
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##Question:How globalization has led to the reduction of employment in the formal sector of the Indian economy? Is increased informalization detrimental to the development of the country? (150 words | 10 marks )##Answer:APPROACH- 1. In introduction give the definition of globalization along with data on informalisation in the economy. 2. List the reasons for informalisation in the economy 3. Explain the impact of increased informalisation on the economy 4. Conclude with the initiatives of government including what more can be done. ANSWER- Globalization refers to the economic exchange of goods and services internationally and international financial flows. India opened its economy in 1991 through LPG reforms. Indian economy shot to the 7-8% GDP growth from the Hindu rate of growth i.e. 2-3%. But globalization led to the problem of flexible employment and informalisation in the Indian economy because India has moved from crony socialism to stigmatized capitalism. According to Economic Survey 2018-19, "almost 93%" of the total workforce is informal. Reasons for Informalization in the economy - 1. Open market for Multi-National Companies- Big corporates are driven by profit motive. They try to reduce labour cost which led to more contract-based employment and Hire and fire policy. 2. Service Sector led growth- It requires skilled labour which is not radially available in the developing country like India. 3. Technology-driven growth – It creates more high skill service sector jobs than lower skill manufacturing jobs. It reduces the bargaining power of the lower-skilled labours and hence more informalization in the economy. 4. Negligence of manufacturing sector- Manufacturing sector was neglected due to the growth in service sector. Manufacturing sector could create formal jobs for those who looking to move away from agriculture sector. 5. Due to Privatisation and disinvestment in PSUs - Informal economy tends to expand. When public enterprises are closed downsized, retrenched workers move into the informal economy. 6. Shifting of labour intensive firms to other countries- Globalization has led to increasing free trade agreement between countries. But in case of India it was not able to fully harness the potential of FTA. It is argued that trade agreement causes shifting of labour intensive firms such as textile and leather to Bangladesh and Vietnam. This shifting has caused increased informalization in the economy. 7. Dwarf firms- Even after India stepped into the era of globalization, it has retained the complex labour laws and bureaucratic apathy toward entrepreneurship it has caused the problem of Dwarf firms in the Indian economy. These Dwarf firms have been causing informalization. 8. Effect of Artificial Intelligence- This possess a new challenge to the existing formal workforce because reorientation of skill is required to remain relevant in the market. Impact of increased Informalization on the development of the economy 1. Reduced tax collection- tax to GDP ratio remains low in the economy. 2. Lack of Social Security benefits- Almost all the government social sector schemes is available for the formal sector workers. So, informal workers remain out of the ambit of benefits. 3. Cash-based transaction- Transactions in the informal sector is mostly cash-based. It will contribute to the generation of black money in the economy, and the creation of a parallel shadow economy. 4. Decreased productivity in the economy- Companies usually do not invest in the skill development of the employees due to informalization which leads to the decreased productivity in the economy. 5. Increased inequality- Informal workers usually get lower wages, which leads to increasing inequality in the economy. Formal employment is very important for the development of the country and for arresting trend of informalisation. Government intervenes to tackle the problem of informalisation through initiatives like Make in India, Skill India, etc. It could also bring in place credible labour regulatory body to ensure social security of both formal and informal workers.
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आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक विकास की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये | साथ ही आर्थिक विकास के मापन में विभिन्न सूचकांकों का भी संक्षिप्त परिचय दीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) Explain the concept of economic growth and economic development. Also, give a brief introduction to various indexes in the measurement of economic development. (150-200 Words/10 marks)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक विकास की अवधारणा को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात विभिन्न प्रकार के सूचकांकों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - आर्थिक संवृद्धि बनाम आर्थिक विकास आर्थिक संवृद्धि मात्रात्मक अवधारणा है जबकि आर्थिक विकास एक गुणात्मक अवधारणा है | किसी भी राष्ट्र के प्रगति हेतु यह अनिवार्य है कि आर्थिक संवृद्धि के साथ-साथ लोगों के जीवन स्तर , शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार इत्यादि विकल्प भी तेजी से बढ़ रहे हों | 1990 के पश्चात भारत में यद्यपि आर्थिक प्रगति तो तीव्र हुई परन्तु विकास के विभिन्न सूचकांकों में स्थिति उत्साहवर्धक नहीं थी, यही कारण है कि आलोचकों ने इसे रोजगार विहीन संवृद्धि की संज्ञा दी थी | 1990 के दशक में ही यह समझा जाने लगा था कि विकास के भी सूचकांक बनने चाहिए | जिसमे सर्वप्रथम मानव विकास सूचकांक तथा कालांतर में असमानता समायोजित मानव विकास सूचकांक बहुआयामी गरीबी सूचकांक, लिंग असमानता सूचकांक, तकनीकी उपलब्धि सूचकांक आदि का प्रयोग किया गया | परन्तु इन सबसे इतर 2008 में भूटान ने आर्थिक विकास का एक वैकल्पिक मानक देते हुए सकल राष्ट्रीय ख़ुशहाली सूचकांक की बात भी की, जो विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं द्वारा संदर्भित किया किया जा रहा है | आर्थिक विकास को मापने के लिए प्रमुख सूचकांक मानव विकास सूचकांक संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने 1990 में अपनी प्रथम मानव विकास रिपोर्ट प्रकाशित की थी | इस सूचकांक का निर्माण पाकिस्तानी अर्थशास्त्री महबूब -उल-हक़ भारतीय अर्थशास्त्री मेघनाद देसाई, आदि द्वारा किया किया गया | यह सूचकांक स्वास्थ्य, शिक्षा एवं जीवन स्तर को मानक मानते हुए 0-1 के स्केल पर विकास को रेख्नाकित करता करता है | वर्ष 2010 में इसके आंकलन के तरीकों में परिवर्तन किया गया तथा इसे निम्नलिखित प्रकार से आंकलित किया जाता है | स्वास्थ्य के सन्दर्भ में जीवन प्रत्याशा सूचकांक जिसे एक तिहाई महत्व दिया जाता है, की गणना 85 वर्ष को अधिकतम तथा 20 वर्ष को न्यूनतम मानकर की जाती है | शिक्षा के सन्दर्भ में शिक्षा सूचकांक को निम्न दो घटकों में बांटा जाता है - 25 वर्ष या उससे अधिक के वयस्कों के द्वारा स्कूल जाने का माध्य, जिसकी अधिकतम मूल्य 15 और न्यूनतम 0 है | जीवन स्तर - जन्म के समय जीवन प्रत्याशा की गणना की जाती है | इसे दशमलव के तीन अंकों तक जोड़ा जाता है | असमानता समायोजित मानव विकास सूचकांक इस सूचकांक में किसी भी राष्ट्र में सामाजिक वंचित लोगों को अलग से निकालते हुए मानव विकास की सापेक्षिक गणना की जाती है | वर्ष 2019 की रिपोर्ट के अनुसार .477 के अंकों के साथ 151 देशों में भारत का स्थान 99वां है | बहुआयामी गरीबी सूचकांक यह सूचकांक वर्ष 2010 से आक्सफेम संस्था के सहयोग से निकला जाता है | वर्तमान में इसे गरीबी मापन में सबसे उपयुक्त माना जा रहा है | इस सूचकांक के तीन प्रमुख घटक - शिक्षा, स्वास्थ्य एवं जीवन स्तर हैं | स्वास्थ्य के संदर्भ में पोषण एवं शिशु मृत्यु दर को 1/6 व 1/6 का महत्व देते हुए आंकलित किया जाता है | शिक्षा के सन्दर्भ में विद्यालय जाने वालों की संख्या तथा विद्यालय उपस्थिति को क्रमशः 1/6 व 1/6 का महत्व देते हुए आंकलित किया जाता है | जीवन स्तर के सन्दर्भ में कुकिंग गैस, विद्युत आपूर्ति, शुद्ध पेय जल, स्वच्छता, आवास आदि को 1/18 का महत्व देते आंकलित किया जाता है | लैंगिक विषमता सूचकांक जीआईआई एक विषमता सूचकांक है | यह दो आयामों सशक्तीकरण एवं आर्थिक स्थिति में महिलाओं और पुरुषों की उपलब्धियों के मध्य असमानता को दर्शाता है | साथ ही जीआईआई महिला स्वास्थ्य के प्रमुख आयाम के मानक आदर्शों के सापेक्ष किसी देश की स्थिति को प्रदर्शित करता है, आदि सकल राष्ट्रीय खुशहाली सूचकांक वर्ष 2008 में भूटान ने आर्थिक विकास की प्रचलित मानकों से अलग एक वैकल्पिक मानक की बात की | इसमें सामाजिक स्तर पर हर्ष एवं आनंद को विकास का संकेत माना गया | इसके मुख्य घटक निम्न चार हैं - समावेशी विकास, पर्यावरणीय संरक्षण, सुशासन, संस्कृति का संरक्षण एवं संवर्धन, आदि जीवन का भौतिक गुणवत्ता सूचकांक (PQLI) यह किसी देश के लोगों के औसत स्वास्थ्य के सूचकांक को दर्शाता है |
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##Question:आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक विकास की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये | साथ ही आर्थिक विकास के मापन में विभिन्न सूचकांकों का भी संक्षिप्त परिचय दीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) Explain the concept of economic growth and economic development. Also, give a brief introduction to various indexes in the measurement of economic development. (150-200 Words/10 marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक विकास की अवधारणा को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात विभिन्न प्रकार के सूचकांकों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - आर्थिक संवृद्धि बनाम आर्थिक विकास आर्थिक संवृद्धि मात्रात्मक अवधारणा है जबकि आर्थिक विकास एक गुणात्मक अवधारणा है | किसी भी राष्ट्र के प्रगति हेतु यह अनिवार्य है कि आर्थिक संवृद्धि के साथ-साथ लोगों के जीवन स्तर , शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार इत्यादि विकल्प भी तेजी से बढ़ रहे हों | 1990 के पश्चात भारत में यद्यपि आर्थिक प्रगति तो तीव्र हुई परन्तु विकास के विभिन्न सूचकांकों में स्थिति उत्साहवर्धक नहीं थी, यही कारण है कि आलोचकों ने इसे रोजगार विहीन संवृद्धि की संज्ञा दी थी | 1990 के दशक में ही यह समझा जाने लगा था कि विकास के भी सूचकांक बनने चाहिए | जिसमे सर्वप्रथम मानव विकास सूचकांक तथा कालांतर में असमानता समायोजित मानव विकास सूचकांक बहुआयामी गरीबी सूचकांक, लिंग असमानता सूचकांक, तकनीकी उपलब्धि सूचकांक आदि का प्रयोग किया गया | परन्तु इन सबसे इतर 2008 में भूटान ने आर्थिक विकास का एक वैकल्पिक मानक देते हुए सकल राष्ट्रीय ख़ुशहाली सूचकांक की बात भी की, जो विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं द्वारा संदर्भित किया किया जा रहा है | आर्थिक विकास को मापने के लिए प्रमुख सूचकांक मानव विकास सूचकांक संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने 1990 में अपनी प्रथम मानव विकास रिपोर्ट प्रकाशित की थी | इस सूचकांक का निर्माण पाकिस्तानी अर्थशास्त्री महबूब -उल-हक़ भारतीय अर्थशास्त्री मेघनाद देसाई, आदि द्वारा किया किया गया | यह सूचकांक स्वास्थ्य, शिक्षा एवं जीवन स्तर को मानक मानते हुए 0-1 के स्केल पर विकास को रेख्नाकित करता करता है | वर्ष 2010 में इसके आंकलन के तरीकों में परिवर्तन किया गया तथा इसे निम्नलिखित प्रकार से आंकलित किया जाता है | स्वास्थ्य के सन्दर्भ में जीवन प्रत्याशा सूचकांक जिसे एक तिहाई महत्व दिया जाता है, की गणना 85 वर्ष को अधिकतम तथा 20 वर्ष को न्यूनतम मानकर की जाती है | शिक्षा के सन्दर्भ में शिक्षा सूचकांक को निम्न दो घटकों में बांटा जाता है - 25 वर्ष या उससे अधिक के वयस्कों के द्वारा स्कूल जाने का माध्य, जिसकी अधिकतम मूल्य 15 और न्यूनतम 0 है | जीवन स्तर - जन्म के समय जीवन प्रत्याशा की गणना की जाती है | इसे दशमलव के तीन अंकों तक जोड़ा जाता है | असमानता समायोजित मानव विकास सूचकांक इस सूचकांक में किसी भी राष्ट्र में सामाजिक वंचित लोगों को अलग से निकालते हुए मानव विकास की सापेक्षिक गणना की जाती है | वर्ष 2019 की रिपोर्ट के अनुसार .477 के अंकों के साथ 151 देशों में भारत का स्थान 99वां है | बहुआयामी गरीबी सूचकांक यह सूचकांक वर्ष 2010 से आक्सफेम संस्था के सहयोग से निकला जाता है | वर्तमान में इसे गरीबी मापन में सबसे उपयुक्त माना जा रहा है | इस सूचकांक के तीन प्रमुख घटक - शिक्षा, स्वास्थ्य एवं जीवन स्तर हैं | स्वास्थ्य के संदर्भ में पोषण एवं शिशु मृत्यु दर को 1/6 व 1/6 का महत्व देते हुए आंकलित किया जाता है | शिक्षा के सन्दर्भ में विद्यालय जाने वालों की संख्या तथा विद्यालय उपस्थिति को क्रमशः 1/6 व 1/6 का महत्व देते हुए आंकलित किया जाता है | जीवन स्तर के सन्दर्भ में कुकिंग गैस, विद्युत आपूर्ति, शुद्ध पेय जल, स्वच्छता, आवास आदि को 1/18 का महत्व देते आंकलित किया जाता है | लैंगिक विषमता सूचकांक जीआईआई एक विषमता सूचकांक है | यह दो आयामों सशक्तीकरण एवं आर्थिक स्थिति में महिलाओं और पुरुषों की उपलब्धियों के मध्य असमानता को दर्शाता है | साथ ही जीआईआई महिला स्वास्थ्य के प्रमुख आयाम के मानक आदर्शों के सापेक्ष किसी देश की स्थिति को प्रदर्शित करता है, आदि सकल राष्ट्रीय खुशहाली सूचकांक वर्ष 2008 में भूटान ने आर्थिक विकास की प्रचलित मानकों से अलग एक वैकल्पिक मानक की बात की | इसमें सामाजिक स्तर पर हर्ष एवं आनंद को विकास का संकेत माना गया | इसके मुख्य घटक निम्न चार हैं - समावेशी विकास, पर्यावरणीय संरक्षण, सुशासन, संस्कृति का संरक्षण एवं संवर्धन, आदि जीवन का भौतिक गुणवत्ता सूचकांक (PQLI) यह किसी देश के लोगों के औसत स्वास्थ्य के सूचकांक को दर्शाता है |
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How is the government of India protecting the traditional knowledge of medicine from patenting by pharmaceutical companies? (150 words/10 Marks)
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Approach- 1. What do we mean by traditional knowledge? Explain it in brief. 2.Give 1-2 examples of how India’s traditional knowledge has been misused by foreign companies. 3.. Then, Highlight out the steps which GOI is taking to protect the knowledge from the pharmaceuticals company Answer Traditional Knowledge (TK) is a living body of knowledge that is developed, sustained and passed on from generation to generation within a community , often forming part of its cultural or spiritual identity. Traditional Knowledge per se that is the knowledge that has ancient roots and is often informal and oral, is not protected by conventional intellectual property protection systems. This scenario has prompted many developing countries to develop their own specific and special systems for protecting traditional knowledge. It has been observed that international pharma companies have been applying and obtaining patents for medicinal use of prevalent Indian medicinal plants. After going through the records of the global trademark offices, officials found 2,000 patents had been issued — at a cost of millions for “medical plants and traditional systems” that are prevalent in India. For instance - In 1995, the United States awarded patent on turmeric to the University of Mississippi medical center for wound healing property. The claimed subject matter was the use of "turmeric powder and its administration", both oral as well as topical, for wound healing. An exclusive right has been granted to sell and distribute. The Indian Council for Scientific and Industrial Research (CSIR) had objected to the patent granted and provided documented pieces of evidence of the prior art to USPTO. Though it was a well-known fact that the use of turmeric was known in every household since ages in India, it was a herculean task to find published information on the use of turmeric powder through oral as well as topical route for wound healing. Due to extensive researches, 32 references were located in different languages namely Sanskrit, Urdu, and Hindi. Though the USPTO revoked the patent, stating that the claims made in the patent were obvious and anticipated, and agreeing that the use of turmeric was an old art of healing wounds. But this highlights out the vulnerability of the traditional knowledge if not protected. How India is protecting traditional knowledge of medicine: AYUSH has been made a separate Ministry. In 2001 India initiated the formation of Traditional Knowledge Digital Library (TKDL ) a database in which traditional medicinal information is digitized with accessibility in five major international languages to patent offices across the globe so that examiner may conduct a patent search to check the novelty of the invention.TKDL has converted and structured ancient texts into 34 million A4-sized pages and translated them into English, French, German, Japanese and Spanish the major international languages. The Indian government has effectively licensed 200,000 local treatments as “public property” free for anyone to use but no one to sell as a “brand”. India has been trying to revive WTO talks to strengthen global norms to protect traditional knowledge from reckless patenting by corporate. Awareness creation among tribals about the provision of patenting traditional knowledge. Help is being provided to document their claims so as to oppose any such bioprospecting in the future. India has signed and ratified the Nagoya Protocol on Access to Genetic Resources and the Fair and Equitable Sharing of Benefits Arising from their Utilization (ABS). India is the only country in the world to have set up an institutional mechanism – the TKDL – to protect its Traditional Knowledge. The TKDL enables prompt and almost cost-free cancellation or withdrawal of patent applications relating to India’s Traditional Knowledge. Traditional knowledge of medicinal plants can solve many of the problems of healthcare in India by providing cheap and sustainable remedies. The Government should try to marketize this knowledge before MNC pharma companies misuse them.
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##Question:How is the government of India protecting the traditional knowledge of medicine from patenting by pharmaceutical companies? (150 words/10 Marks)##Answer:Approach- 1. What do we mean by traditional knowledge? Explain it in brief. 2.Give 1-2 examples of how India’s traditional knowledge has been misused by foreign companies. 3.. Then, Highlight out the steps which GOI is taking to protect the knowledge from the pharmaceuticals company Answer Traditional Knowledge (TK) is a living body of knowledge that is developed, sustained and passed on from generation to generation within a community , often forming part of its cultural or spiritual identity. Traditional Knowledge per se that is the knowledge that has ancient roots and is often informal and oral, is not protected by conventional intellectual property protection systems. This scenario has prompted many developing countries to develop their own specific and special systems for protecting traditional knowledge. It has been observed that international pharma companies have been applying and obtaining patents for medicinal use of prevalent Indian medicinal plants. After going through the records of the global trademark offices, officials found 2,000 patents had been issued — at a cost of millions for “medical plants and traditional systems” that are prevalent in India. For instance - In 1995, the United States awarded patent on turmeric to the University of Mississippi medical center for wound healing property. The claimed subject matter was the use of "turmeric powder and its administration", both oral as well as topical, for wound healing. An exclusive right has been granted to sell and distribute. The Indian Council for Scientific and Industrial Research (CSIR) had objected to the patent granted and provided documented pieces of evidence of the prior art to USPTO. Though it was a well-known fact that the use of turmeric was known in every household since ages in India, it was a herculean task to find published information on the use of turmeric powder through oral as well as topical route for wound healing. Due to extensive researches, 32 references were located in different languages namely Sanskrit, Urdu, and Hindi. Though the USPTO revoked the patent, stating that the claims made in the patent were obvious and anticipated, and agreeing that the use of turmeric was an old art of healing wounds. But this highlights out the vulnerability of the traditional knowledge if not protected. How India is protecting traditional knowledge of medicine: AYUSH has been made a separate Ministry. In 2001 India initiated the formation of Traditional Knowledge Digital Library (TKDL ) a database in which traditional medicinal information is digitized with accessibility in five major international languages to patent offices across the globe so that examiner may conduct a patent search to check the novelty of the invention.TKDL has converted and structured ancient texts into 34 million A4-sized pages and translated them into English, French, German, Japanese and Spanish the major international languages. The Indian government has effectively licensed 200,000 local treatments as “public property” free for anyone to use but no one to sell as a “brand”. India has been trying to revive WTO talks to strengthen global norms to protect traditional knowledge from reckless patenting by corporate. Awareness creation among tribals about the provision of patenting traditional knowledge. Help is being provided to document their claims so as to oppose any such bioprospecting in the future. India has signed and ratified the Nagoya Protocol on Access to Genetic Resources and the Fair and Equitable Sharing of Benefits Arising from their Utilization (ABS). India is the only country in the world to have set up an institutional mechanism – the TKDL – to protect its Traditional Knowledge. The TKDL enables prompt and almost cost-free cancellation or withdrawal of patent applications relating to India’s Traditional Knowledge. Traditional knowledge of medicinal plants can solve many of the problems of healthcare in India by providing cheap and sustainable remedies. The Government should try to marketize this knowledge before MNC pharma companies misuse them.
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सतत विकास की अवधारणा को बताते हुए,सतत विकास लक्ष्यों को भी रेखांकित कीजिये | (150-200 शब्द) While outlining the concept of sustainable development, also outline thesustainable Development Goals. (150-200 words)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत सतत विकास की अवधारणा को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात एमडीजी एवं एसडीजी लक्ष्यों को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - सतत विकास की अवधारणा सतत विकास से तात्पर्य संरक्षण को प्रोत्साहित करते हुए उन सभी घटकों को रेखांकित करने से है | जो किसी समाज की आर्थिक एवं सामाजिक विकास को सुनिश्चित करते हों | नीतिगत सन्दर्भों में सतत विकास की अवधारणा 1970 के दशक में बलवती हुई | जब स्टाकहोम अधिवेशन में यह रेखांकित किया गया कि किसी भी समाज की सततता के लिए संधारणीय उपभोग एवं उत्पादन , सामाजिक न्याय तथा समावेशी विकास, पर्यावरणीय संरक्षण एवं संतुलन महत्वपूर्ण घटक है | वर्ष 2000 के प्रारम्भ में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस सन्दर्भ में 8 प्रमुख उद्देश्यों को संज्ञानित करते हुए सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्यों को निर्धारित किया गया | जो 2000-15 तक लागू रहे, तदोपरांत सतत विकास लक्ष्य के अंतर्गत निम्नलिखित 17 मुख्य उद्देश्यों को रखा गया | सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य सभी सन्दर्भों में निर्धनता के सभी रूपों को समाप्त करना शून्य भूखमरी बेहतर स्वास्थ्य एवं कल्याण गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा - रोजगार परक हो लैंगिक समानता पेयजल - स्वच्छ पेयजल एवं स्वच्छता वहनीय एवं स्वच्छ ऊर्जा - नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोतों पर महत्व दिए जाने की जरूरत सम्माननीय कार्य एवं आर्थिक वृद्धि उद्योग एवं नवाचार तथा अवसंरचना विकास असमानता में कमी लाना संधारणीय शहर और समुदाय संधारणीय उपभोग एवं उत्पादन जलवायु कार्यवाई जलीय जीव संरक्षण, स्थलीय जीव संरक्षण शांति, न्याय एवं सशक्त संस्थाएं अंतरराष्ट्रीय सहयोग, | इस प्रकार हम देखते हैं कि 1990 के बाद से विश्व भर में 1 अरब से अधिक लोगों को गरीबी से बाहर निकाला गया जिसमे चीन व भारत अग्रणी है | एमडीजी लक्ष्य में भूखमरी की समस्या को कम करने में प्रभावी कार्य किये गए हैं ,लेकिन इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए की अभी भी सबसे गरीब व कमजोर व्यक्ति पीछे न छूट जाय | संयुक्त राष्ट्र ने 2015 में एमडीजी लक्ष्यों की सफलता से उत्साहित होकर ही विश्व के लिए 17 ऐसे लक्ष्यों को लाया जिनको एसडीजी कहा गया |
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##Question:सतत विकास की अवधारणा को बताते हुए,सतत विकास लक्ष्यों को भी रेखांकित कीजिये | (150-200 शब्द) While outlining the concept of sustainable development, also outline thesustainable Development Goals. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत सतत विकास की अवधारणा को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात एमडीजी एवं एसडीजी लक्ष्यों को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - सतत विकास की अवधारणा सतत विकास से तात्पर्य संरक्षण को प्रोत्साहित करते हुए उन सभी घटकों को रेखांकित करने से है | जो किसी समाज की आर्थिक एवं सामाजिक विकास को सुनिश्चित करते हों | नीतिगत सन्दर्भों में सतत विकास की अवधारणा 1970 के दशक में बलवती हुई | जब स्टाकहोम अधिवेशन में यह रेखांकित किया गया कि किसी भी समाज की सततता के लिए संधारणीय उपभोग एवं उत्पादन , सामाजिक न्याय तथा समावेशी विकास, पर्यावरणीय संरक्षण एवं संतुलन महत्वपूर्ण घटक है | वर्ष 2000 के प्रारम्भ में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस सन्दर्भ में 8 प्रमुख उद्देश्यों को संज्ञानित करते हुए सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्यों को निर्धारित किया गया | जो 2000-15 तक लागू रहे, तदोपरांत सतत विकास लक्ष्य के अंतर्गत निम्नलिखित 17 मुख्य उद्देश्यों को रखा गया | सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य सभी सन्दर्भों में निर्धनता के सभी रूपों को समाप्त करना शून्य भूखमरी बेहतर स्वास्थ्य एवं कल्याण गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा - रोजगार परक हो लैंगिक समानता पेयजल - स्वच्छ पेयजल एवं स्वच्छता वहनीय एवं स्वच्छ ऊर्जा - नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोतों पर महत्व दिए जाने की जरूरत सम्माननीय कार्य एवं आर्थिक वृद्धि उद्योग एवं नवाचार तथा अवसंरचना विकास असमानता में कमी लाना संधारणीय शहर और समुदाय संधारणीय उपभोग एवं उत्पादन जलवायु कार्यवाई जलीय जीव संरक्षण, स्थलीय जीव संरक्षण शांति, न्याय एवं सशक्त संस्थाएं अंतरराष्ट्रीय सहयोग, | इस प्रकार हम देखते हैं कि 1990 के बाद से विश्व भर में 1 अरब से अधिक लोगों को गरीबी से बाहर निकाला गया जिसमे चीन व भारत अग्रणी है | एमडीजी लक्ष्य में भूखमरी की समस्या को कम करने में प्रभावी कार्य किये गए हैं ,लेकिन इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए की अभी भी सबसे गरीब व कमजोर व्यक्ति पीछे न छूट जाय | संयुक्त राष्ट्र ने 2015 में एमडीजी लक्ष्यों की सफलता से उत्साहित होकर ही विश्व के लिए 17 ऐसे लक्ष्यों को लाया जिनको एसडीजी कहा गया |
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Defining demand and supply, mention their laws. Along with this, explain the factors affecting demand and supply. (150 words/10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में मांग और पूर्ति की अवधारणाओं को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में मांग और पूर्ति के नियमों का उल्लेख कीजिये 3- दूसरे भाग में मांग एवं पूर्ति को प्रभावित करने वाले कारकों की व्याख्या कीजिये 4- अंतिम में बाजार एवं मूल्य संतुलन के बारे में बताते हुए उतर समाप्त कीजिये मांग और पूर्ति, अर्थशास्त्र के अंतर्गत बाजार सम्बन्धी अवधारणायें हैं| किसी वस्तु की वह मात्रा, जिसे उपभोक्ता, किसी निश्चित मूल्य पर खरीदने का इच्छुक & योग्य हो| सभी उपभोक्ताओं की व्यक्तिगत मांगों के योग को बाजार मांग कहते हैं| जबकि पूर्ति किसी वास्तु की वह मात्रा है जिसे कोई उत्पादक किसी निश्चित मूल्य पर विक्रय करने का इच्छुक एवं योग्य हो| सभी उत्पादक की इकाइयों द्वारा उत्पादन/पूर्ति का योग बाजार पूर्ति कहते हैं| बाजार मांग और पूर्ति के नियमों से संचालित होते हैं| मांग का नियम अन्य तत्व(मांग के निर्धारक तत्व) समान रहने पर(other things being constant/ ceteris Paribus) किसी वस्तु के मूल्य में गिरावट आने से उसकी मांग की मात्रा में वृद्धि होती है| एवं इसके ठीक विपरीत उस वस्तु के मूल्य में वृद्धि होगी तो उसकी मांग की मात्रा में गिरावट होगी| इस तरह स्पष्ट होता है कि सामान्य तौर पर मूल्य और मांग में व्युत्क्रमानुपाती सम्बन्ध होता है| इस मांग वक्र के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है किसी मूल्य स्तर पर उपभोक्ता कितनी मात्रा खरीदने का इच्छुक होगा इसका स्पष्टीकरण मांग वक्र से होता है पूर्ति का नियम अन्य तत्व(पूर्ति के निर्धारक तत्व) समान रहने पर(other things being constant/ ceteris Paribus) किसी वस्तु के मूल्य में वृद्धि होने से उसकी पूर्ति की मात्रा में वृद्धि होती है| इसके ठीक विपरीत किसी वस्तु के मूल्य में गिरावट आने से उसकी पूर्ति की मात्रा में गिरावट आती है| मांग के निर्धारक तत्व मूल्य(मांग का नियम),किसी वस्तु के मूल्य में गिरावट आने से उसकी मांग की मात्रा में वृद्धि होती है| एवं इसके ठीक विपरीत उस वस्तु के मूल्य में वृद्धि होगी तो उसकी मांग की मात्रा में गिरावट होगी| आय बढने पर मांग की मात्रा(QD) बढ़ जाती है| (Y अक्ष पर मांग, X अक्ष पर मांग की मात्रा) इसके वक्र में वक्र का ढाल मांग वक्र की तरह ही नीचे की और होगा| जब आय बढ़ेगी तो मांग वक्र दायीं दिशा में खिसक जाएगा| अर्थात पूर्व के मूल्य पर ही वह ज्यादा मात्रा में खरीदने लगेगा| सम्बन्धित वस्तुओं (प्रतिस्थापित एवं पूरक वस्तुओं) के मूल्य के कम ज्यादा होने से मांग में कमी या वृद्धि हो सकती है | प्रतिस्थापित वस्तुएं जो एक दुसरे के स्थान पर प्रयुक्त हो सकती है| जैसे सलाद में प्याज की जगह मूली, चाय की जगह काफी/शीतल पेय आदि|काफी का मूल्य बढ़ने पर चाय की मांग बढ़ जायेगी| पूरक वस्तुएं ऐसी वस्तुएं होती हैं जिन्हें एक साथ प्रयोग किया जाता है जैसे कार एवं पेट्रोल | पेट्रोल के मूल्य में वृद्धि होगी तो कार की मांग में कमी आएगी| 2010 से 2014 तक कच्चे तेल के दामों में वृद्धि हुई थी इसी समय डीजल का मूल्य नही बढ़ा था (सब्सिडी के कारण) इसलिए डीजल कारों की अपेक्षा पेट्रोल कारों की मांग में कमी आई थी उपभोक्ता अभिरुचि, यदि अभिरुचि में सकारात्मक परिवर्तन होगा तो मांग बढ़ेगी जबकि नकारात्मक परिवर्तन होगा तो मांग घटेगी उपरोक्त के अतिरिक्त भविष्य में मूल्य परिवर्तन की संभावना तथा मौसम आदि मांग के निर्धारक तत्व हैं पूर्ति के निर्धारक कारक मूल्य परिवर्तन, किसी वस्तु के मूल्य में वृद्धि होने से उसकी पूर्ति की मात्रा में वृद्धि होती है| उत्पादन लागत, यदि लागत बढ़ेगी तो पूर्ति घटेगी| यदि मूल्य पूर्ववत है और कुल लागत में वृद्धि होती है तब आय/लाभ में कमी आएगी| इससे उत्पादक या तो मूल्य बढ़ाएगा या फिर उत्पादन के लिए हतोत्साहित होगा अतः पूर्ति में कमी आएगी| इसके ठीक विपरीत यदि मूल्य पूर्ववत है और कुल लागत में कमी होती है तब आय/लाभ में वृद्धि होगी| इससे उत्पादक, उत्पादन के लिए प्रोत्साहित होगा अतः पूर्ति में वृद्धि होगी| कर की दर में परिवर्तन,सरकार द्वारा कर की दरें बढाने पर उत्पादक की लागत बढ़ जायेगी इससे पूर्ति में कमी आएगी| यदि सरकार द्वारा कर की दरें कम करने पर उत्पादक की लागत घट जायेगी इससे पूर्ति में वृद्धि होगी| इसी लिए उत्पादन में वृद्धि के लिए सरकार को कर की दरें कम रखनी चाहिए| राजकोषीय प्रोत्साहन इसी सन्दर्भ में दिए जाते हैं| तकनीक में परिवर्तन से फर्म की उत्पादकता बढती है इससे उत्पादक की लागत में कमी आती है इसके अतिरिक्त कच्चे माल की उपलब्धता, मौसमी प्रभाव आदि पूर्ति को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं| किसी भी वस्तु का मूल्य उस वस्तु के सन्दर्भ में मांग और पूर्ति से निर्धारित होता है|मांग में कमी आने पर कीमतों में कमी आएगी जैसे लीन सीजन में हिल स्टेशन पर होटल के दाम कम हो जाना, बर्ड फ़्लू की स्थिति में चिकेन की मांग कम और मांग के बढ़ने पर कीमतों में वृद्धि होगी जैसे नवरात्रि में केले का मूल्य का बढना| इसी प्रकारपूर्ति बढ़ने पर मूल्य कम हो जाएगा, जैसे किसी फल का सीजन आने पर पूर्ति बढ़ जाती है| अतः अधिकाधिक विक्रय के लिए मूल्य में कमी लायी जाती है| मांग और पूर्ति को बाजार के अदृश्य हाथ माना जाता है ये अपने प्रभावों से बाजार में स्वतः ही संतुलन मूल्य को निर्धारित करते हैं|
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##Question:Defining demand and supply, mention their laws. Along with this, explain the factors affecting demand and supply. (150 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में मांग और पूर्ति की अवधारणाओं को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में मांग और पूर्ति के नियमों का उल्लेख कीजिये 3- दूसरे भाग में मांग एवं पूर्ति को प्रभावित करने वाले कारकों की व्याख्या कीजिये 4- अंतिम में बाजार एवं मूल्य संतुलन के बारे में बताते हुए उतर समाप्त कीजिये मांग और पूर्ति, अर्थशास्त्र के अंतर्गत बाजार सम्बन्धी अवधारणायें हैं| किसी वस्तु की वह मात्रा, जिसे उपभोक्ता, किसी निश्चित मूल्य पर खरीदने का इच्छुक & योग्य हो| सभी उपभोक्ताओं की व्यक्तिगत मांगों के योग को बाजार मांग कहते हैं| जबकि पूर्ति किसी वास्तु की वह मात्रा है जिसे कोई उत्पादक किसी निश्चित मूल्य पर विक्रय करने का इच्छुक एवं योग्य हो| सभी उत्पादक की इकाइयों द्वारा उत्पादन/पूर्ति का योग बाजार पूर्ति कहते हैं| बाजार मांग और पूर्ति के नियमों से संचालित होते हैं| मांग का नियम अन्य तत्व(मांग के निर्धारक तत्व) समान रहने पर(other things being constant/ ceteris Paribus) किसी वस्तु के मूल्य में गिरावट आने से उसकी मांग की मात्रा में वृद्धि होती है| एवं इसके ठीक विपरीत उस वस्तु के मूल्य में वृद्धि होगी तो उसकी मांग की मात्रा में गिरावट होगी| इस तरह स्पष्ट होता है कि सामान्य तौर पर मूल्य और मांग में व्युत्क्रमानुपाती सम्बन्ध होता है| इस मांग वक्र के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है किसी मूल्य स्तर पर उपभोक्ता कितनी मात्रा खरीदने का इच्छुक होगा इसका स्पष्टीकरण मांग वक्र से होता है पूर्ति का नियम अन्य तत्व(पूर्ति के निर्धारक तत्व) समान रहने पर(other things being constant/ ceteris Paribus) किसी वस्तु के मूल्य में वृद्धि होने से उसकी पूर्ति की मात्रा में वृद्धि होती है| इसके ठीक विपरीत किसी वस्तु के मूल्य में गिरावट आने से उसकी पूर्ति की मात्रा में गिरावट आती है| मांग के निर्धारक तत्व मूल्य(मांग का नियम),किसी वस्तु के मूल्य में गिरावट आने से उसकी मांग की मात्रा में वृद्धि होती है| एवं इसके ठीक विपरीत उस वस्तु के मूल्य में वृद्धि होगी तो उसकी मांग की मात्रा में गिरावट होगी| आय बढने पर मांग की मात्रा(QD) बढ़ जाती है| (Y अक्ष पर मांग, X अक्ष पर मांग की मात्रा) इसके वक्र में वक्र का ढाल मांग वक्र की तरह ही नीचे की और होगा| जब आय बढ़ेगी तो मांग वक्र दायीं दिशा में खिसक जाएगा| अर्थात पूर्व के मूल्य पर ही वह ज्यादा मात्रा में खरीदने लगेगा| सम्बन्धित वस्तुओं (प्रतिस्थापित एवं पूरक वस्तुओं) के मूल्य के कम ज्यादा होने से मांग में कमी या वृद्धि हो सकती है | प्रतिस्थापित वस्तुएं जो एक दुसरे के स्थान पर प्रयुक्त हो सकती है| जैसे सलाद में प्याज की जगह मूली, चाय की जगह काफी/शीतल पेय आदि|काफी का मूल्य बढ़ने पर चाय की मांग बढ़ जायेगी| पूरक वस्तुएं ऐसी वस्तुएं होती हैं जिन्हें एक साथ प्रयोग किया जाता है जैसे कार एवं पेट्रोल | पेट्रोल के मूल्य में वृद्धि होगी तो कार की मांग में कमी आएगी| 2010 से 2014 तक कच्चे तेल के दामों में वृद्धि हुई थी इसी समय डीजल का मूल्य नही बढ़ा था (सब्सिडी के कारण) इसलिए डीजल कारों की अपेक्षा पेट्रोल कारों की मांग में कमी आई थी उपभोक्ता अभिरुचि, यदि अभिरुचि में सकारात्मक परिवर्तन होगा तो मांग बढ़ेगी जबकि नकारात्मक परिवर्तन होगा तो मांग घटेगी उपरोक्त के अतिरिक्त भविष्य में मूल्य परिवर्तन की संभावना तथा मौसम आदि मांग के निर्धारक तत्व हैं पूर्ति के निर्धारक कारक मूल्य परिवर्तन, किसी वस्तु के मूल्य में वृद्धि होने से उसकी पूर्ति की मात्रा में वृद्धि होती है| उत्पादन लागत, यदि लागत बढ़ेगी तो पूर्ति घटेगी| यदि मूल्य पूर्ववत है और कुल लागत में वृद्धि होती है तब आय/लाभ में कमी आएगी| इससे उत्पादक या तो मूल्य बढ़ाएगा या फिर उत्पादन के लिए हतोत्साहित होगा अतः पूर्ति में कमी आएगी| इसके ठीक विपरीत यदि मूल्य पूर्ववत है और कुल लागत में कमी होती है तब आय/लाभ में वृद्धि होगी| इससे उत्पादक, उत्पादन के लिए प्रोत्साहित होगा अतः पूर्ति में वृद्धि होगी| कर की दर में परिवर्तन,सरकार द्वारा कर की दरें बढाने पर उत्पादक की लागत बढ़ जायेगी इससे पूर्ति में कमी आएगी| यदि सरकार द्वारा कर की दरें कम करने पर उत्पादक की लागत घट जायेगी इससे पूर्ति में वृद्धि होगी| इसी लिए उत्पादन में वृद्धि के लिए सरकार को कर की दरें कम रखनी चाहिए| राजकोषीय प्रोत्साहन इसी सन्दर्भ में दिए जाते हैं| तकनीक में परिवर्तन से फर्म की उत्पादकता बढती है इससे उत्पादक की लागत में कमी आती है इसके अतिरिक्त कच्चे माल की उपलब्धता, मौसमी प्रभाव आदि पूर्ति को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं| किसी भी वस्तु का मूल्य उस वस्तु के सन्दर्भ में मांग और पूर्ति से निर्धारित होता है|मांग में कमी आने पर कीमतों में कमी आएगी जैसे लीन सीजन में हिल स्टेशन पर होटल के दाम कम हो जाना, बर्ड फ़्लू की स्थिति में चिकेन की मांग कम और मांग के बढ़ने पर कीमतों में वृद्धि होगी जैसे नवरात्रि में केले का मूल्य का बढना| इसी प्रकारपूर्ति बढ़ने पर मूल्य कम हो जाएगा, जैसे किसी फल का सीजन आने पर पूर्ति बढ़ जाती है| अतः अधिकाधिक विक्रय के लिए मूल्य में कमी लायी जाती है| मांग और पूर्ति को बाजार के अदृश्य हाथ माना जाता है ये अपने प्रभावों से बाजार में स्वतः ही संतुलन मूल्य को निर्धारित करते हैं|
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Defining demand and supply, mention their laws. Along with this, explain the factors affecting demand and supply. (150 words/10 Marks)
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Defining demand and supply, mention their laws. Along with this, explain the factors affecting demand and supply. (150 words/10 Marks) APPROACH: Define Demand an d Supply Briefly discuss the law of Demand and Supply Point out factors affecting Law and Supply Write a brief conclusion DEMAND Demand is the quantity of a good that consumers are willing and able to purchase at various prices during a given period of time. The law of Demand The law of demand states that the quantity purchased varies inversely with price. In other words, the higher the price, the lower the quantity demanded. This occurs because of diminishing marginal utility. That is, consumers use the first units of an economic good they purchase to serve their most urgent needs first and use each additional unit of the good to serve successively lower-valued ends. Factors Affecting Demand 1. Rising incomes tend to increase demand for normal economic goods, as people are willing to spend more. 2. The availability of close substitute products that compete with given economic goodwill tends to reduce demand for that good since they can satisfy the same kinds of consumer wants and needs. 3. The availability of closely complementary goods will tend to increase demand for economic good because the use of two goods together can be even more valuable to consumers than using them separately, 4. Future expectations 5. Changes in background environmental conditions 6. change in the actual or perceived quality of a good because they alter the pattern of consumer preferences for how the good can be used and how urgently it is needed. SUPPLY Supply is a fundamental economic concept that describes the total amount of a specific good or service that is available to consumers. The law of the Supply The law of supply says that as the price of an item goes up, suppliers will attempt to maximize their profits by increasing the quantity offered for sale. Factors determining Supply: 1. Input costs 2. Price of the commodity 3. The state of technology at a given time, 4. Taxation, 5. Prices of other goods, 6. The objective of the seller, 7. A number of firms selling the same commodity among others. Conclusion These two laws interact to determine the actual market prices and volume of goods that are traded on a market. Several independent factors can affect the shape of market supply and demand, influencing both the prices and quantities that we observe in markets.
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##Question:Defining demand and supply, mention their laws. Along with this, explain the factors affecting demand and supply. (150 words/10 Marks)##Answer:Defining demand and supply, mention their laws. Along with this, explain the factors affecting demand and supply. (150 words/10 Marks) APPROACH: Define Demand an d Supply Briefly discuss the law of Demand and Supply Point out factors affecting Law and Supply Write a brief conclusion DEMAND Demand is the quantity of a good that consumers are willing and able to purchase at various prices during a given period of time. The law of Demand The law of demand states that the quantity purchased varies inversely with price. In other words, the higher the price, the lower the quantity demanded. This occurs because of diminishing marginal utility. That is, consumers use the first units of an economic good they purchase to serve their most urgent needs first and use each additional unit of the good to serve successively lower-valued ends. Factors Affecting Demand 1. Rising incomes tend to increase demand for normal economic goods, as people are willing to spend more. 2. The availability of close substitute products that compete with given economic goodwill tends to reduce demand for that good since they can satisfy the same kinds of consumer wants and needs. 3. The availability of closely complementary goods will tend to increase demand for economic good because the use of two goods together can be even more valuable to consumers than using them separately, 4. Future expectations 5. Changes in background environmental conditions 6. change in the actual or perceived quality of a good because they alter the pattern of consumer preferences for how the good can be used and how urgently it is needed. SUPPLY Supply is a fundamental economic concept that describes the total amount of a specific good or service that is available to consumers. The law of the Supply The law of supply says that as the price of an item goes up, suppliers will attempt to maximize their profits by increasing the quantity offered for sale. Factors determining Supply: 1. Input costs 2. Price of the commodity 3. The state of technology at a given time, 4. Taxation, 5. Prices of other goods, 6. The objective of the seller, 7. A number of firms selling the same commodity among others. Conclusion These two laws interact to determine the actual market prices and volume of goods that are traded on a market. Several independent factors can affect the shape of market supply and demand, influencing both the prices and quantities that we observe in markets.
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Compare the Wildlife Sanctuary, National Park and the Biosphere Reserves. (10 Marks/150 Words)
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Approach: Introduction: write down the intro of these keywords. Body: write down the comparison between these in a point-wise manner. Conclude: Conclude accordingly. Answer: A wildlife sanctuary is an area of nature owned by the government or a private agency for the protection of particular species of flora or fauna during a part of the year or in its entirety. A national park is a reserved area of land owned by the government which is protected from industrialization, human exploitation, and pollution. A biosphere reserve is a term given to an area for the conservation of the resources of the biosphere and the improvement of the relationship between man and the environment. Differences between Wildlife Sanctuary, Biosphere Reserves and National Parks: Wildlife Sanctuary It is a natural habitat, owned by the government or private agency, that safeguards a particular species of birds and animals, birds, insects, reptiles, etc Restrictions are less and open to visitations by the general public International Union for Conservation of Nature (IUCN) has defined it as a Category IV type of protected areas Biosphere Reserves A reserved area of land established by the government to protect the environment as a whole Meant to preserve the biodiversity of a specified area, a typical biosphere reserve is divided into the following- Core (no human activity is there); Buffer (limited human activity is permitted; Manipulation zone (several human activities can occur in this zone). It is internationally recognized within the framework of UNESCO’s Man and Biosphere (MAB) program and nominated by national governments. National Parks Notified areas that cover a larger area of land which may cover multiple National Parks, Sanctuaries, and reserves as well. Flora, fauna, landscape, historical objects, etc Highly restricted, random access to the general public is not allowed; Permission is required. International Union for Conservation of Nature (IUCN), and its World Commission on Protected Areas, has defined it as a Category II type of protected areas Preservation of biodiversity is a must for the continued functioning of the planet as a whole. Any imbalance on account of human activity will lead to the extinction of species that are necessary for human survival. Thus, wildlife sanctuaries, biosphere reserves, and national parks are designated places for protecting wild plants, animals, and natural habitats.
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##Question:Compare the Wildlife Sanctuary, National Park and the Biosphere Reserves. (10 Marks/150 Words)##Answer:Approach: Introduction: write down the intro of these keywords. Body: write down the comparison between these in a point-wise manner. Conclude: Conclude accordingly. Answer: A wildlife sanctuary is an area of nature owned by the government or a private agency for the protection of particular species of flora or fauna during a part of the year or in its entirety. A national park is a reserved area of land owned by the government which is protected from industrialization, human exploitation, and pollution. A biosphere reserve is a term given to an area for the conservation of the resources of the biosphere and the improvement of the relationship between man and the environment. Differences between Wildlife Sanctuary, Biosphere Reserves and National Parks: Wildlife Sanctuary It is a natural habitat, owned by the government or private agency, that safeguards a particular species of birds and animals, birds, insects, reptiles, etc Restrictions are less and open to visitations by the general public International Union for Conservation of Nature (IUCN) has defined it as a Category IV type of protected areas Biosphere Reserves A reserved area of land established by the government to protect the environment as a whole Meant to preserve the biodiversity of a specified area, a typical biosphere reserve is divided into the following- Core (no human activity is there); Buffer (limited human activity is permitted; Manipulation zone (several human activities can occur in this zone). It is internationally recognized within the framework of UNESCO’s Man and Biosphere (MAB) program and nominated by national governments. National Parks Notified areas that cover a larger area of land which may cover multiple National Parks, Sanctuaries, and reserves as well. Flora, fauna, landscape, historical objects, etc Highly restricted, random access to the general public is not allowed; Permission is required. International Union for Conservation of Nature (IUCN), and its World Commission on Protected Areas, has defined it as a Category II type of protected areas Preservation of biodiversity is a must for the continued functioning of the planet as a whole. Any imbalance on account of human activity will lead to the extinction of species that are necessary for human survival. Thus, wildlife sanctuaries, biosphere reserves, and national parks are designated places for protecting wild plants, animals, and natural habitats.
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व्यष्टि अर्थव्यवस्था के अंतर्गत मांग व आपूर्ति से आप क्या समझते हैं? मांग एवं आपूर्ति के निर्धारक तत्वों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by demand and supply within the micro economy? Discuss the determinant elements of demand and supply. (150-200 words/ 10 marks)
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Approach : उत्तर के प्रथम भाग में मांग व आपूर्ति को परिभाषित करते हुए स्पष्ट कीजिए। द्वितीय भाग में मांग के निर्धारक तत्वों को रेखांकित कीजिए। इसके पश्चात आपूर्ति के निर्धारक तत्वों की चर्चा कीजिए। अंत में मांग आपूर्ति के संबंध अंतर्संबंध व महत्व के साथ उत्तर समाप्त कर सकते हैं। उत्तर- माँग (Demand) व्यष्टि अर्थव्यवस्था के अंतर्गत माँग से तात्पर्य किसी वस्तु की उस मात्रा से है जो एक एक निश्चित मूल्य पर एक उपभोक्ता क्रय करने के योग्य एवं इच्छुक होती है। इसके अंतर्गत माँग का नियम लागू होता है जिसके अनुसार अन्य तत्व समान रहने पर किसी वस्तु के मूल्य मेंकमी होने से उसकी माँग में वृद्धि होती है। पूर्ति (supply) व्यष्टि अर्थव्यवस्था के अंतर्गत पूर्ति से तात्पर्य किसी वस्तु की उस मात्रा से है जो एक एक निश्चित मूल्य पर एक फ़र्म विक्रय करने के योग्य एवं इच्छुक होती है। इसके अंतर्गत पूर्ति का नियम होता है जिसके अनुसार अन्य तत्व समान रहने पर किसी वस्तु के मूल्य में वृद्धि होने से उसकी पूर्ति में वृद्धि होती है। मांग के निर्धारक तत्व- मूल्य - वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि होने पर मांग में कमी आती है। इसी प्रकार मूल्य में कमी आने पर मांग में वृद्धि होती है। उपभोक्ता की आय- यदि उपभोक्ताओं की आय में वृद्धि होती है तो मांग में वृद्धि होती है। समान मूल्य पर आय बढ्ने पर मांग में वृद्धि होती है। उपभोक्ताओं की अभिरुचि - उभोक्ताओं की अभिरुचि में सकारात्मक परिवर्तन होने पर मांग में वृद्धि होगी। विपरीत होने पर मांग में कमी आती है। संबन्धित वस्तुओं के मूल्य - किसी वस्तु की कीमते बढ्ने पर प्रतिस्थापित वस्तुओं की मांग में वृद्धि होती है। उदाहरण के लिए कॉफी की कीमतें बढ्ने पर चाय की मांग में वृद्धि होती है। इसी प्रकार एक वस्तु की मांग में कमी या वृद्धि होने पर पूरक वस्तुओं की मांग में भी कमी या वृद्धि होती है। उदाहरण पेट्रोल/डीजल की कीमतों में वृद्धि होने से इनकी मांग में कमी आने से वाहनों की मांग में भी कमी आती है। भविष्य में मूल्य परिवर्तन की संभावना – भविष्य में कीमतें बढ्ने की संभावना होने पर मांग में वृद्धि होती है। पूर्ति के निर्धारक तत्व- मूल्य - वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि होने पर फ़र्मों में उत्पादन के प्रोत्साहन के कारण पूर्ति में वृद्धि होती है। इसी प्रकार मूल्य कम होने पर पूर्ति में कमी आती है। उत्पादन की लागत - यदि उत्पादन की लागत में वृद्धि होती है तो पूर्ति में कमी आती है। करों की दरों में परिवर्तन – यदि सरकार कर की दरों को बढ़ाती है तो पूर्ति में कमी आती है। करों की दरों में कटौती होने पर पूर्ति में भी वृद्धि होती है। तकनीक में परिवर्तन - तकनीकी संवर्धन होने पर लागत में कमी आती है जिससे पूर्ति में वृद्धि होती है। प्राकृतिक कारक – प्राकृतिक कारक भी पूर्ति को प्रभावित होती है। यदि प्राकृतिक कारक सकारात्मक हों तो पूर्ति में वृद्धि हो सकती है। नकारात्मक कारक होने पर पूर्ति में कमी आती है। माँग व पूर्ति के बीच संतुलन की स्थिति बाजार संतुलन कहलाती है। जिसमें माँग व आपूर्ति समान होती है। बाज़ार इसी बाज़ार तंत्र नामक स्वचालित प्रणाली के द्वारा संचालित होता है।मांग व आपूर्ति में परिवर्तन होने पर स्वत: परिवर्तन होते हैं और बाज़ार पुन: संतुलन की अवस्था प्राप्त कर लेता है।
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##Question:व्यष्टि अर्थव्यवस्था के अंतर्गत मांग व आपूर्ति से आप क्या समझते हैं? मांग एवं आपूर्ति के निर्धारक तत्वों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by demand and supply within the micro economy? Discuss the determinant elements of demand and supply. (150-200 words/ 10 marks)##Answer:Approach : उत्तर के प्रथम भाग में मांग व आपूर्ति को परिभाषित करते हुए स्पष्ट कीजिए। द्वितीय भाग में मांग के निर्धारक तत्वों को रेखांकित कीजिए। इसके पश्चात आपूर्ति के निर्धारक तत्वों की चर्चा कीजिए। अंत में मांग आपूर्ति के संबंध अंतर्संबंध व महत्व के साथ उत्तर समाप्त कर सकते हैं। उत्तर- माँग (Demand) व्यष्टि अर्थव्यवस्था के अंतर्गत माँग से तात्पर्य किसी वस्तु की उस मात्रा से है जो एक एक निश्चित मूल्य पर एक उपभोक्ता क्रय करने के योग्य एवं इच्छुक होती है। इसके अंतर्गत माँग का नियम लागू होता है जिसके अनुसार अन्य तत्व समान रहने पर किसी वस्तु के मूल्य मेंकमी होने से उसकी माँग में वृद्धि होती है। पूर्ति (supply) व्यष्टि अर्थव्यवस्था के अंतर्गत पूर्ति से तात्पर्य किसी वस्तु की उस मात्रा से है जो एक एक निश्चित मूल्य पर एक फ़र्म विक्रय करने के योग्य एवं इच्छुक होती है। इसके अंतर्गत पूर्ति का नियम होता है जिसके अनुसार अन्य तत्व समान रहने पर किसी वस्तु के मूल्य में वृद्धि होने से उसकी पूर्ति में वृद्धि होती है। मांग के निर्धारक तत्व- मूल्य - वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि होने पर मांग में कमी आती है। इसी प्रकार मूल्य में कमी आने पर मांग में वृद्धि होती है। उपभोक्ता की आय- यदि उपभोक्ताओं की आय में वृद्धि होती है तो मांग में वृद्धि होती है। समान मूल्य पर आय बढ्ने पर मांग में वृद्धि होती है। उपभोक्ताओं की अभिरुचि - उभोक्ताओं की अभिरुचि में सकारात्मक परिवर्तन होने पर मांग में वृद्धि होगी। विपरीत होने पर मांग में कमी आती है। संबन्धित वस्तुओं के मूल्य - किसी वस्तु की कीमते बढ्ने पर प्रतिस्थापित वस्तुओं की मांग में वृद्धि होती है। उदाहरण के लिए कॉफी की कीमतें बढ्ने पर चाय की मांग में वृद्धि होती है। इसी प्रकार एक वस्तु की मांग में कमी या वृद्धि होने पर पूरक वस्तुओं की मांग में भी कमी या वृद्धि होती है। उदाहरण पेट्रोल/डीजल की कीमतों में वृद्धि होने से इनकी मांग में कमी आने से वाहनों की मांग में भी कमी आती है। भविष्य में मूल्य परिवर्तन की संभावना – भविष्य में कीमतें बढ्ने की संभावना होने पर मांग में वृद्धि होती है। पूर्ति के निर्धारक तत्व- मूल्य - वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि होने पर फ़र्मों में उत्पादन के प्रोत्साहन के कारण पूर्ति में वृद्धि होती है। इसी प्रकार मूल्य कम होने पर पूर्ति में कमी आती है। उत्पादन की लागत - यदि उत्पादन की लागत में वृद्धि होती है तो पूर्ति में कमी आती है। करों की दरों में परिवर्तन – यदि सरकार कर की दरों को बढ़ाती है तो पूर्ति में कमी आती है। करों की दरों में कटौती होने पर पूर्ति में भी वृद्धि होती है। तकनीक में परिवर्तन - तकनीकी संवर्धन होने पर लागत में कमी आती है जिससे पूर्ति में वृद्धि होती है। प्राकृतिक कारक – प्राकृतिक कारक भी पूर्ति को प्रभावित होती है। यदि प्राकृतिक कारक सकारात्मक हों तो पूर्ति में वृद्धि हो सकती है। नकारात्मक कारक होने पर पूर्ति में कमी आती है। माँग व पूर्ति के बीच संतुलन की स्थिति बाजार संतुलन कहलाती है। जिसमें माँग व आपूर्ति समान होती है। बाज़ार इसी बाज़ार तंत्र नामक स्वचालित प्रणाली के द्वारा संचालित होता है।मांग व आपूर्ति में परिवर्तन होने पर स्वत: परिवर्तन होते हैं और बाज़ार पुन: संतुलन की अवस्था प्राप्त कर लेता है।
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भारतीय रंगमंच की पृष्ठभूमि को दर्शाते हुए इसके विभिन्न चरणों का संक्षिप्त परिचय दीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Give background and a brief introduction to the various phases of Indian Drama/Theater. (150-200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच- भारतीय रंगमंच की पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग में, इसके विभिन्न चरणों का संक्षिप्त परिचय दीजिये| उत्तर- भारतीय रंगमंच की परंपरा लगभग 5000 वर्ष पुरानी है| संपूर्ण विश्व में, नाट्यकला पर प्रथम पुस्तक भारत में ही लिखी गयी थी जो कि भरतमुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र थी| साथ ही, रामायण तथा महाकाव्य जैसे महाकाव्यों में भी इसके साक्ष्य तथा संदर्भ उपलब्ध होते हैं| भारत में रंगमंच का प्रारंभ कथात्मक रूप में हुआ था तथा समय के साथ पाठन, गायन तथा नृत्य इसके अभिन्न तत्व बन गएँ| भारत में रंगमंच जीवन की निरंतरता को दर्शाता है तथा आदर्शवादी संदर्भ में अधिक व्याख्यायित किया गया है| नाटक/रंगमंच के विभिन्न चरण प्राचीन काल(पहला चरण) 1000 ई. तक के लेखन तथा अभ्यास शामिल; भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के नियमों, विनियमों तथा संशोधनों पर आधारित; संस्कृत, प्राकृत आदि भाषाओँ में; शास्त्रीय नाटक; प्रमुख नाटककार - कालिदास; शूद्रक; भास; विशाखदत; भवभूति आदि; महाकाव्यों, इतिहास, लोककथाओं और किवदंतियों आदि स्रोतों से कथानकों का आधार; सुखांत नाटक; शहर केंद्रित; द्वितीय चरण(1000 ई. से 1750 ई.) मनोरंजन के उद्देश्य से नाटकों का मंचन; धार्मिक एवं धर्मेत्तर दोनों ही विषयों पर नाटकों का मंचन जैसे- रामलीला; रासलीला; नौटंकी; तमाशा आदि; भारत में राजनीतिक तंत्र के परिवर्तन तथा देश के सभी भागों में विविध क्षेत्रीय भाषाओँ के अस्तित्व में आने के साथ उद्भव का जुड़ना; संपूर्ण काल को लोक या पारंपरिक काल के रूप में जाना जाना; शास्त्रीय रंगमंच जो कि नाट्यशास्त्र पर आधारित था तथा अपनी रूप-प्रकृति में अधिक परिष्कृत तथा शहरी था उसके विपरीत इस काल में, पारंपरिक रंगमच ग्रामीण पृष्ठभूमि से विकसित; रंगमंच के अन्य तत्वों जैसे- संगीत, मूक अभिनय, नृत्य, गति, कथाओं का उपयोग आदि का उपयोग लगभग समान बने रहना; नृत्य तथा गायन पर अत्यधिक बल; अधिक सरल, तात्कालिक तथा समकालीन सीमा में; हास्य की भूमिका; स्थानीय वेशभूषा का प्रयोग; तृतीय चरण(ब्रिटिशकाल) भारत में राजनीतिक व्यवस्था के परिवर्तन के साथ जुड़ा होना; आम जनजीवन से संबंधित मुद्दों को उठाया जाना; क्षेत्रीय भाषाओँ में भी नाटकों का मंचन; नाटकों पर यूरोपीय प्रभावों में वृद्धि; रंगमंच के लेखन तथा अभ्यास कार्य पूर्णतः वास्तविक या यथार्थ प्रस्तुतीकरण की दिशा में गतिमान; बड़े नायकों और देवताओं के आसपास विषय बुना ना होकर आम आदमी के साथ जुड़ा होना; नाटकों का व्यवसायीकरण भी प्रारंभ; प्रमुख नाटककार- भारतेंदु हरिश्चन्द्र तथा जयशंकर प्रसाद आदि; इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतीय नाट्यशास्त्र ने एक लंबी दूरी तय की है| आज के संदर्भों में देखा जाए तो रंगमंच से फिल्मों की ओर पलायन बहुत तेजी से हुआ है| डीटीएच तथा इंटरनेट के इस दौर में हालाँकि कुछ समय तक इसपर काफी व्यापक बुरा प्रभाव पड़ा लेकिन एक जीवित तथा प्रत्यक्ष माध्यम होने के चलते रंगमंच आज पुनः अपनी पहचान स्थापित करने की दिशा में अग्रसर है| राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से पढ़े अनेकों प्रतिभाशाली कलाकारों की फिल्मों में बढ़ती भूमिका को आप इससे जोड़कर देख सकते हैं|
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##Question:भारतीय रंगमंच की पृष्ठभूमि को दर्शाते हुए इसके विभिन्न चरणों का संक्षिप्त परिचय दीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Give background and a brief introduction to the various phases of Indian Drama/Theater. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- भारतीय रंगमंच की पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग में, इसके विभिन्न चरणों का संक्षिप्त परिचय दीजिये| उत्तर- भारतीय रंगमंच की परंपरा लगभग 5000 वर्ष पुरानी है| संपूर्ण विश्व में, नाट्यकला पर प्रथम पुस्तक भारत में ही लिखी गयी थी जो कि भरतमुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र थी| साथ ही, रामायण तथा महाकाव्य जैसे महाकाव्यों में भी इसके साक्ष्य तथा संदर्भ उपलब्ध होते हैं| भारत में रंगमंच का प्रारंभ कथात्मक रूप में हुआ था तथा समय के साथ पाठन, गायन तथा नृत्य इसके अभिन्न तत्व बन गएँ| भारत में रंगमंच जीवन की निरंतरता को दर्शाता है तथा आदर्शवादी संदर्भ में अधिक व्याख्यायित किया गया है| नाटक/रंगमंच के विभिन्न चरण प्राचीन काल(पहला चरण) 1000 ई. तक के लेखन तथा अभ्यास शामिल; भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के नियमों, विनियमों तथा संशोधनों पर आधारित; संस्कृत, प्राकृत आदि भाषाओँ में; शास्त्रीय नाटक; प्रमुख नाटककार - कालिदास; शूद्रक; भास; विशाखदत; भवभूति आदि; महाकाव्यों, इतिहास, लोककथाओं और किवदंतियों आदि स्रोतों से कथानकों का आधार; सुखांत नाटक; शहर केंद्रित; द्वितीय चरण(1000 ई. से 1750 ई.) मनोरंजन के उद्देश्य से नाटकों का मंचन; धार्मिक एवं धर्मेत्तर दोनों ही विषयों पर नाटकों का मंचन जैसे- रामलीला; रासलीला; नौटंकी; तमाशा आदि; भारत में राजनीतिक तंत्र के परिवर्तन तथा देश के सभी भागों में विविध क्षेत्रीय भाषाओँ के अस्तित्व में आने के साथ उद्भव का जुड़ना; संपूर्ण काल को लोक या पारंपरिक काल के रूप में जाना जाना; शास्त्रीय रंगमंच जो कि नाट्यशास्त्र पर आधारित था तथा अपनी रूप-प्रकृति में अधिक परिष्कृत तथा शहरी था उसके विपरीत इस काल में, पारंपरिक रंगमच ग्रामीण पृष्ठभूमि से विकसित; रंगमंच के अन्य तत्वों जैसे- संगीत, मूक अभिनय, नृत्य, गति, कथाओं का उपयोग आदि का उपयोग लगभग समान बने रहना; नृत्य तथा गायन पर अत्यधिक बल; अधिक सरल, तात्कालिक तथा समकालीन सीमा में; हास्य की भूमिका; स्थानीय वेशभूषा का प्रयोग; तृतीय चरण(ब्रिटिशकाल) भारत में राजनीतिक व्यवस्था के परिवर्तन के साथ जुड़ा होना; आम जनजीवन से संबंधित मुद्दों को उठाया जाना; क्षेत्रीय भाषाओँ में भी नाटकों का मंचन; नाटकों पर यूरोपीय प्रभावों में वृद्धि; रंगमंच के लेखन तथा अभ्यास कार्य पूर्णतः वास्तविक या यथार्थ प्रस्तुतीकरण की दिशा में गतिमान; बड़े नायकों और देवताओं के आसपास विषय बुना ना होकर आम आदमी के साथ जुड़ा होना; नाटकों का व्यवसायीकरण भी प्रारंभ; प्रमुख नाटककार- भारतेंदु हरिश्चन्द्र तथा जयशंकर प्रसाद आदि; इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतीय नाट्यशास्त्र ने एक लंबी दूरी तय की है| आज के संदर्भों में देखा जाए तो रंगमंच से फिल्मों की ओर पलायन बहुत तेजी से हुआ है| डीटीएच तथा इंटरनेट के इस दौर में हालाँकि कुछ समय तक इसपर काफी व्यापक बुरा प्रभाव पड़ा लेकिन एक जीवित तथा प्रत्यक्ष माध्यम होने के चलते रंगमंच आज पुनः अपनी पहचान स्थापित करने की दिशा में अग्रसर है| राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से पढ़े अनेकों प्रतिभाशाली कलाकारों की फिल्मों में बढ़ती भूमिका को आप इससे जोड़कर देख सकते हैं|
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Discuss the Socio-Economic conditions of India in the eighteenth century. (150 words)
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APPROACH 1. Give a brief introduction of prevailing political and economic conditions in India. 2. Explain the prevailing social condition in 18th C India 3. Highlight the economic condition 4. Conclude with mentioning British policies in the last of 18th C. ANSWER- After the death of Aurangzeb, Mughal empire was on decline. Due to fragmentation of empire, lack of unity, Mughals lost its control to the British in the second half of 18th C. Eighteenth century India failed to make progress economically, socially or culturally, at an adequate pace. India became a land of contrasts with extreme poverty and extreme luxury existed side by side. Social Conditions- The society of 18th C India was characterised by traditional outlook and stagnation. Though there existed a certain degree of broad cultural unity, people were divided. Basic Characteristics 1. Society of 18th C was based on traditional values and orthodoxy. 2. Society was divided on the lines of religion, region, tribe, language, caste, etc. 3. There was a stark difference of class in the society, upper class, who formed tiny minority of the population was in many respect different from the life and culture of lower class. Hindus- 1. Caste was the central feature of the social life of the Hindus 2. Apart from the four vanes, Hindus were divided into numerous castes (Jatis). 3. The caste system rigidly divided people and permanently fixed their place in the social scale. 4. The higher castes, headed by the Brahmins, monopolized all social prestige and privileges. 5. Inter caste social mobility was restricted such as- Inter-caste marriages were forbidden, inter-dining among members of different castes was also restricted. Muslims- 1. Muslims were no less divided by considerations of caste, race, tribe, and status, even though their religion enjoined social equality. 2. The Shia and Sunni (two sects of Muslim religion) nobles were sometimes at loggerheads on account of their religious differences. 3. The Irani, Afghan, Turani, and Hindustani Muslim nobles, and officials often stood apart from each other. 4. Religious conversions occurred 5. Moreover, the sharif Muslims consisting of nobles, scholars, priests, and army officers, looked down upon the ajlaf Muslims or the lower class Muslims in a manner similar that prevalent in Hindus. Family System and Position of women in society 1. The family system was primarily patriarchal. 2. Women possessed little individuality of their own. 3. While upper class women remained at home, lower class women worked in fields and supports the family income. 4. Certain outdated and exploitative social customs and traditions such as Purdah, Satii, Child marriage, polygemy, dowery did exist which hindered the progress of women. 5. Condition of Hindu widow was usually miserable in the society. Education 1. Education in 18th C India was traditional which could not match with the rapid developments in the West. 2. Knowledge was confined to literature, law, religion, philosophy and excluded the study of physical and natural sciences, technology and geography. 3. Due to over reliance placed on ancient learning, any original thought got discouraged. 4. Elementary education among the Hindus and Muslims was quite widespread. 5. Children from the lower caste sometimes attended the schools, but female presence was rare. Economic Conditions: The increasing revenue demands of the state, the oppression of the officials, the greed and rapacity of the nobles, revenue-farmers, and Zamindars, loot and plunder of the foreign invaders during the first half of the 18th century made the life of the people quite despicable. Agriculture: 1. Indian agriculture during the 18th century was technically backward and stagnant. The techniques of production had remained stationary for centuries. 2. The peasants tried to make up for technical backwardness by working very hard. 3. Even though it was peasants’ produce that supported the rest of society, their own reward was miserably inadequate. 4. After the decline of Mughals the exploitation of peasants was continued by Sikhs, Marathas, Rajputs, Zamindars. Trade 1. Even though the Indian villages were largely self-sufficient and imported little from outside. 2. Extensive trade within the country and between India and other countries of Asia and Europe was there under the Mughals. 3. Export was more than the imports and India was surplus in terms of Balance of payments. 4. India imported − pearls, raw silk, wool, dates, dried fruits, and rose water from the Persian Gulf region; coffee, gold, drugs, and honey from Arabia; tea, sugar, porcelain, and silk from China; 5. India’s most important article of export was cotton textiles, which were famous all over the world for their excellence and were in demand everywhere. 6. India also exported raw silk and silk fabrics, hardware, indigo, saltpetre, opium, rice, wheat, sugar, pepper and other spices, precious stones, and drugs. 7. Constant warfare and disruption of law and order, in many areas during the 18th century, banned the country’s internal trade and disrupted its foreign trade to some extent and in some directions. 8. The decline of internal and foreign trade also hit the industries hard in some parts of the country. 9. Nevertheless, some industries in other parts of the country gained as a result of expansion in trade with Europe due to the activities of the European trading companies. From the end of the 18th C British started to consolidate its empire in India. They intervened with exploitative economic policies, support to social reform in its initial phase, and new spur in missionary activities. Which had long-lasting impact on the Indian socioeconomic conditions.
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##Question:Discuss the Socio-Economic conditions of India in the eighteenth century. (150 words)##Answer:APPROACH 1. Give a brief introduction of prevailing political and economic conditions in India. 2. Explain the prevailing social condition in 18th C India 3. Highlight the economic condition 4. Conclude with mentioning British policies in the last of 18th C. ANSWER- After the death of Aurangzeb, Mughal empire was on decline. Due to fragmentation of empire, lack of unity, Mughals lost its control to the British in the second half of 18th C. Eighteenth century India failed to make progress economically, socially or culturally, at an adequate pace. India became a land of contrasts with extreme poverty and extreme luxury existed side by side. Social Conditions- The society of 18th C India was characterised by traditional outlook and stagnation. Though there existed a certain degree of broad cultural unity, people were divided. Basic Characteristics 1. Society of 18th C was based on traditional values and orthodoxy. 2. Society was divided on the lines of religion, region, tribe, language, caste, etc. 3. There was a stark difference of class in the society, upper class, who formed tiny minority of the population was in many respect different from the life and culture of lower class. Hindus- 1. Caste was the central feature of the social life of the Hindus 2. Apart from the four vanes, Hindus were divided into numerous castes (Jatis). 3. The caste system rigidly divided people and permanently fixed their place in the social scale. 4. The higher castes, headed by the Brahmins, monopolized all social prestige and privileges. 5. Inter caste social mobility was restricted such as- Inter-caste marriages were forbidden, inter-dining among members of different castes was also restricted. Muslims- 1. Muslims were no less divided by considerations of caste, race, tribe, and status, even though their religion enjoined social equality. 2. The Shia and Sunni (two sects of Muslim religion) nobles were sometimes at loggerheads on account of their religious differences. 3. The Irani, Afghan, Turani, and Hindustani Muslim nobles, and officials often stood apart from each other. 4. Religious conversions occurred 5. Moreover, the sharif Muslims consisting of nobles, scholars, priests, and army officers, looked down upon the ajlaf Muslims or the lower class Muslims in a manner similar that prevalent in Hindus. Family System and Position of women in society 1. The family system was primarily patriarchal. 2. Women possessed little individuality of their own. 3. While upper class women remained at home, lower class women worked in fields and supports the family income. 4. Certain outdated and exploitative social customs and traditions such as Purdah, Satii, Child marriage, polygemy, dowery did exist which hindered the progress of women. 5. Condition of Hindu widow was usually miserable in the society. Education 1. Education in 18th C India was traditional which could not match with the rapid developments in the West. 2. Knowledge was confined to literature, law, religion, philosophy and excluded the study of physical and natural sciences, technology and geography. 3. Due to over reliance placed on ancient learning, any original thought got discouraged. 4. Elementary education among the Hindus and Muslims was quite widespread. 5. Children from the lower caste sometimes attended the schools, but female presence was rare. Economic Conditions: The increasing revenue demands of the state, the oppression of the officials, the greed and rapacity of the nobles, revenue-farmers, and Zamindars, loot and plunder of the foreign invaders during the first half of the 18th century made the life of the people quite despicable. Agriculture: 1. Indian agriculture during the 18th century was technically backward and stagnant. The techniques of production had remained stationary for centuries. 2. The peasants tried to make up for technical backwardness by working very hard. 3. Even though it was peasants’ produce that supported the rest of society, their own reward was miserably inadequate. 4. After the decline of Mughals the exploitation of peasants was continued by Sikhs, Marathas, Rajputs, Zamindars. Trade 1. Even though the Indian villages were largely self-sufficient and imported little from outside. 2. Extensive trade within the country and between India and other countries of Asia and Europe was there under the Mughals. 3. Export was more than the imports and India was surplus in terms of Balance of payments. 4. India imported − pearls, raw silk, wool, dates, dried fruits, and rose water from the Persian Gulf region; coffee, gold, drugs, and honey from Arabia; tea, sugar, porcelain, and silk from China; 5. India’s most important article of export was cotton textiles, which were famous all over the world for their excellence and were in demand everywhere. 6. India also exported raw silk and silk fabrics, hardware, indigo, saltpetre, opium, rice, wheat, sugar, pepper and other spices, precious stones, and drugs. 7. Constant warfare and disruption of law and order, in many areas during the 18th century, banned the country’s internal trade and disrupted its foreign trade to some extent and in some directions. 8. The decline of internal and foreign trade also hit the industries hard in some parts of the country. 9. Nevertheless, some industries in other parts of the country gained as a result of expansion in trade with Europe due to the activities of the European trading companies. From the end of the 18th C British started to consolidate its empire in India. They intervened with exploitative economic policies, support to social reform in its initial phase, and new spur in missionary activities. Which had long-lasting impact on the Indian socioeconomic conditions.
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Elaborate how classical dances evolved in India. Also discuss the features of Bharat Natyam. (250 words/15 Marks)
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Approach : Introduce the answer by linking the evolution of dances to mythology. Discuss the evolution of the classical dances in India. Highlight features of Bharat Natyam. Answer : The evolution of Indian classical dances has its roots in the ancient period and is closely linked to mythology in many ways. Evolution of the classical dances Natya Shastra by Bharat Muni is one of the first doctrines on dance. It describes " Rasanubhuti". There are 9 Rasas in all but 8 mentioned in Natya Shashtra. Classical dances have 2 aspects - Tandava (Masculine) and Lasya (Feminine) They also have 3 elements : 1) Nritta (Pada Sanchalan) – footwork 2) Nritya (Anga Sanchalan) – body movements 3) Natya (Abhinaya) – facial expressions Acharya Nandikeshawara’s ‘Abhinaya Darpan’ and Sharangdev’s ‘Sangeeth Ratnakar’ (Nartanadhyaya) are other treatises that evolved the technical aspects of classical dances. Various evidence of dance and dance forms are available-drawings of prehistoric caves like Bhimbetika and the bronze statue of the Dancing girl from Harappan times. From these premises, dance forms developed in different regions, being inspired by different religions, cultures and patronized by various rulers. Features of Bharatnatyam : It is one of the oldest dance forms of India. It developed in Tamil Nadu with the temple tradition of a devadasi. Carnatic music is associated with this dance form. Bharatnatyam leans heavily on the abhinaya or mime aspect of dance – the nritya, where the dancer expresses the Sahitya through movement and mime. It is practiced by male and female dancers. Rukmini Devi Arundale, Mallika Sarabhai, Yamini Krishnamurthy are famous Bharat Natyam dancers.
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##Question:Elaborate how classical dances evolved in India. Also discuss the features of Bharat Natyam. (250 words/15 Marks)##Answer:Approach : Introduce the answer by linking the evolution of dances to mythology. Discuss the evolution of the classical dances in India. Highlight features of Bharat Natyam. Answer : The evolution of Indian classical dances has its roots in the ancient period and is closely linked to mythology in many ways. Evolution of the classical dances Natya Shastra by Bharat Muni is one of the first doctrines on dance. It describes " Rasanubhuti". There are 9 Rasas in all but 8 mentioned in Natya Shashtra. Classical dances have 2 aspects - Tandava (Masculine) and Lasya (Feminine) They also have 3 elements : 1) Nritta (Pada Sanchalan) – footwork 2) Nritya (Anga Sanchalan) – body movements 3) Natya (Abhinaya) – facial expressions Acharya Nandikeshawara’s ‘Abhinaya Darpan’ and Sharangdev’s ‘Sangeeth Ratnakar’ (Nartanadhyaya) are other treatises that evolved the technical aspects of classical dances. Various evidence of dance and dance forms are available-drawings of prehistoric caves like Bhimbetika and the bronze statue of the Dancing girl from Harappan times. From these premises, dance forms developed in different regions, being inspired by different religions, cultures and patronized by various rulers. Features of Bharatnatyam : It is one of the oldest dance forms of India. It developed in Tamil Nadu with the temple tradition of a devadasi. Carnatic music is associated with this dance form. Bharatnatyam leans heavily on the abhinaya or mime aspect of dance – the nritya, where the dancer expresses the Sahitya through movement and mime. It is practiced by male and female dancers. Rukmini Devi Arundale, Mallika Sarabhai, Yamini Krishnamurthy are famous Bharat Natyam dancers.
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भारत में नियोजन के इतिहास का सामान्य परिचय दीजिये | साथ ही प्रथम चार पंचवर्षीय योजनाओं की संक्षिप्त चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द; 10 शब्द) Give a general introduction to the history of planning in India. Also briefly discuss the first four five-year plans. (150-200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत भारत में नियोजन के इतिहास को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चातभारत में विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं के बारे में संक्षेप में बताइए | अंत में पंचवर्षीय योजना के सकारात्मकता को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत में नियोजन का इतिहास भारत में 1930 के दशक में नियोजन के महत्व को सर्वप्रथम वर्ष 1934 में एम. विश्वेशरैया द्वारा उनकी प्रसिद्द पुस्तक प्लांड इकॉनमी फॉर इंडिया में दिया गया | इस पुस्तक में औद्योगीकरण पर बल देते हुए एक दशक में राष्ट्रीय आय को दुगुना करने का लक्ष्य रखा गया | वर्ष 1938 में राष्ट्रीय आयोजना समिति जो हरिपुरा सत्र में नेहरु जी की अध्यक्षता में बनी | इसके अंतर्गत अर्थव्यवस्था की रूपरेखा तैयार की गयी तथा औद्योगीकरण एवं कृषि को संतुलित करते हुए विकास की परिकल्पना प्रस्तुत की गयी | इस समिति को कांग्रेस योजना के नाम से भी जाना जाता है | वर्ष 1944-45 में 8 उद्योगपतियों जिसमे प्रमुख पुरुषोत्तम दास, जे आर डी टाटा, घनश्याम दास बिड़ला, लाला श्री राम, जान मथाई , आदि थे, बाम्बे प्लान बनाया गया | इस बाम्बे प्लान के अंतर्गत अगले 15 वर्ष तक 10 ह़जार करोड़ के लागत के साथ प्रति व्यक्ति आय को दुगुना करने का लक्ष्य था | इसी समय श्रीमन्ननारायण द्वारा गाँधी योजना की बात की गयी तथा 1949 में जय प्रकाश नारायण द्वारा सर्वोदय योजना की भी बात की गयी | इस कालखंड में सैद्धांतिक स्तर पर नेहरूवादी अर्थव्यवस्था बनाम गाँधीवादी अर्थव्यवस्था की चर्चा प्रारम्भ हुई | जहाँ एक तरफ नेहरु जी पूंजी आधारित उत्पादन, जिससे आयत निर्भरता को कम किया जा सके तथा उपभोग की वस्तुओं में आत्मनिर्भरता लायी जा सके, के पक्षधर थे | साथ ही राज्य की जिम्मेदारियों को बढाते हुए प्रारम्भिक स्तर पर व्यक्तिगत वितरण के प्राथमिकता के समर्थक थे | इस मॉडल को आयात प्रतिस्थापन मॉडल कहा गया | वहीँ गांधीजी का यह मत था कि श्रम आधारित अर्थव्यवस्था तथा उपभोग संबंधी अनुशासन को प्राथमिकता देते हुए प्रकार्याताम्क वितरण पर बल दिया जाय | भारत में पंचवर्षीय योजनायें - मार्च 1950 में नियोजन को क्रमबद्ध तरीके से करने हेतु योजना आयोग की स्थापना की गया | जिसमे विभिन्न थिंक टैंक द्वारा आंकडों के आधार पर नियोजन को बल दिया गया तथा जिसने पञ्चवर्षीय योजना की संस्तुति की | प्रथम पञ्चवर्षीय योजना (1951-56)- विकास दर लक्ष्य- 2.1, विकास दर अर्जित -3.6 यह योजना हेराड डोमर मॉडल पर आधारित थी, इसमें कृषि पर बल दिया गया, सामुदायिक विकास कार्यक्रम की शरुआत, आदि द्वितीय पञ्चवर्षीय योजना (1956-61) - विकास दर लक्ष्य -4.5 अर्जित -4.1 यह योजना महालनोबिस मॉडल पर आधारित था, इसमें - भारी उद्योगों पर बल तथा आधारभूत अवसंरचना के विकास का लक्ष्य रखा गया | राउरकेला, भिलाई, दुर्गापुर जैसे इस्पात संयत्र भी इस योजना के मुख्य आकर्षण थे | इसी योजना में सबसे पहले समाजवादी दृष्टिकोण द्वारा असमानता को कम करने पर जोर दिया गया | तृतीय पंचवर्षीय योजना (1961-66) - विकास दर लक्ष्य -5.6 , अर्जित दर - 2.1, सुखमय चक्रवर्ती एवं जे.सैंडी द्वारा प्रस्तावित | मुख्य लक्ष्यों में- कृषि पर बल, राष्ट्रीय आय में 5 प्रतिशत की वृद्धि तथा खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्म-निर्भरता इसी पंचवर्षीय योजना में "टेकऑफ सिद्धांत" की बात की गयी | यह पंचवर्षीय योजना विफल रही -कारण -युद्धआधारित कारण एवं अकाल के कारण | इस पंचवर्षीय योजना की विफलता की वजह से 1966-69 तक वार्षिक योजनायें बनायी गयी | चतुर्थ पंचवर्षीय योजना (1969-74) - विकास दर लक्ष्य - 5.5 , अर्जित विकास दर -3.5 इस मॉडल को आगत-निर्गत मॉडल की संज्ञा दी दी गयी | इसे अशोक रूद्र एवं माने द्वारा तैयार किया किया गया था | इस योजना में अवसंरचना विकास हेतु आवश्यक निवेश पर अतिरिक्त बल दिया गया | इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रथम से लेकर चतुर्थ पंचवर्षीय योजनाओं में भारत द्वारा कृषि को उन्नत बनाते हुए भारी उद्योगों पर ध्यान दिया गया , साथ ही आत्मनिर्भरता के सिद्धांत का अनुपालन करते हुए अवसंरचनात्मक विकास की ओर अर्थव्यवस्था को गतिमान अवस्था में बनाये रखने का प्रयास किया गया |
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##Question:भारत में नियोजन के इतिहास का सामान्य परिचय दीजिये | साथ ही प्रथम चार पंचवर्षीय योजनाओं की संक्षिप्त चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द; 10 शब्द) Give a general introduction to the history of planning in India. Also briefly discuss the first four five-year plans. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत भारत में नियोजन के इतिहास को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चातभारत में विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं के बारे में संक्षेप में बताइए | अंत में पंचवर्षीय योजना के सकारात्मकता को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत में नियोजन का इतिहास भारत में 1930 के दशक में नियोजन के महत्व को सर्वप्रथम वर्ष 1934 में एम. विश्वेशरैया द्वारा उनकी प्रसिद्द पुस्तक प्लांड इकॉनमी फॉर इंडिया में दिया गया | इस पुस्तक में औद्योगीकरण पर बल देते हुए एक दशक में राष्ट्रीय आय को दुगुना करने का लक्ष्य रखा गया | वर्ष 1938 में राष्ट्रीय आयोजना समिति जो हरिपुरा सत्र में नेहरु जी की अध्यक्षता में बनी | इसके अंतर्गत अर्थव्यवस्था की रूपरेखा तैयार की गयी तथा औद्योगीकरण एवं कृषि को संतुलित करते हुए विकास की परिकल्पना प्रस्तुत की गयी | इस समिति को कांग्रेस योजना के नाम से भी जाना जाता है | वर्ष 1944-45 में 8 उद्योगपतियों जिसमे प्रमुख पुरुषोत्तम दास, जे आर डी टाटा, घनश्याम दास बिड़ला, लाला श्री राम, जान मथाई , आदि थे, बाम्बे प्लान बनाया गया | इस बाम्बे प्लान के अंतर्गत अगले 15 वर्ष तक 10 ह़जार करोड़ के लागत के साथ प्रति व्यक्ति आय को दुगुना करने का लक्ष्य था | इसी समय श्रीमन्ननारायण द्वारा गाँधी योजना की बात की गयी तथा 1949 में जय प्रकाश नारायण द्वारा सर्वोदय योजना की भी बात की गयी | इस कालखंड में सैद्धांतिक स्तर पर नेहरूवादी अर्थव्यवस्था बनाम गाँधीवादी अर्थव्यवस्था की चर्चा प्रारम्भ हुई | जहाँ एक तरफ नेहरु जी पूंजी आधारित उत्पादन, जिससे आयत निर्भरता को कम किया जा सके तथा उपभोग की वस्तुओं में आत्मनिर्भरता लायी जा सके, के पक्षधर थे | साथ ही राज्य की जिम्मेदारियों को बढाते हुए प्रारम्भिक स्तर पर व्यक्तिगत वितरण के प्राथमिकता के समर्थक थे | इस मॉडल को आयात प्रतिस्थापन मॉडल कहा गया | वहीँ गांधीजी का यह मत था कि श्रम आधारित अर्थव्यवस्था तथा उपभोग संबंधी अनुशासन को प्राथमिकता देते हुए प्रकार्याताम्क वितरण पर बल दिया जाय | भारत में पंचवर्षीय योजनायें - मार्च 1950 में नियोजन को क्रमबद्ध तरीके से करने हेतु योजना आयोग की स्थापना की गया | जिसमे विभिन्न थिंक टैंक द्वारा आंकडों के आधार पर नियोजन को बल दिया गया तथा जिसने पञ्चवर्षीय योजना की संस्तुति की | प्रथम पञ्चवर्षीय योजना (1951-56)- विकास दर लक्ष्य- 2.1, विकास दर अर्जित -3.6 यह योजना हेराड डोमर मॉडल पर आधारित थी, इसमें कृषि पर बल दिया गया, सामुदायिक विकास कार्यक्रम की शरुआत, आदि द्वितीय पञ्चवर्षीय योजना (1956-61) - विकास दर लक्ष्य -4.5 अर्जित -4.1 यह योजना महालनोबिस मॉडल पर आधारित था, इसमें - भारी उद्योगों पर बल तथा आधारभूत अवसंरचना के विकास का लक्ष्य रखा गया | राउरकेला, भिलाई, दुर्गापुर जैसे इस्पात संयत्र भी इस योजना के मुख्य आकर्षण थे | इसी योजना में सबसे पहले समाजवादी दृष्टिकोण द्वारा असमानता को कम करने पर जोर दिया गया | तृतीय पंचवर्षीय योजना (1961-66) - विकास दर लक्ष्य -5.6 , अर्जित दर - 2.1, सुखमय चक्रवर्ती एवं जे.सैंडी द्वारा प्रस्तावित | मुख्य लक्ष्यों में- कृषि पर बल, राष्ट्रीय आय में 5 प्रतिशत की वृद्धि तथा खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्म-निर्भरता इसी पंचवर्षीय योजना में "टेकऑफ सिद्धांत" की बात की गयी | यह पंचवर्षीय योजना विफल रही -कारण -युद्धआधारित कारण एवं अकाल के कारण | इस पंचवर्षीय योजना की विफलता की वजह से 1966-69 तक वार्षिक योजनायें बनायी गयी | चतुर्थ पंचवर्षीय योजना (1969-74) - विकास दर लक्ष्य - 5.5 , अर्जित विकास दर -3.5 इस मॉडल को आगत-निर्गत मॉडल की संज्ञा दी दी गयी | इसे अशोक रूद्र एवं माने द्वारा तैयार किया किया गया था | इस योजना में अवसंरचना विकास हेतु आवश्यक निवेश पर अतिरिक्त बल दिया गया | इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रथम से लेकर चतुर्थ पंचवर्षीय योजनाओं में भारत द्वारा कृषि को उन्नत बनाते हुए भारी उद्योगों पर ध्यान दिया गया , साथ ही आत्मनिर्भरता के सिद्धांत का अनुपालन करते हुए अवसंरचनात्मक विकास की ओर अर्थव्यवस्था को गतिमान अवस्था में बनाये रखने का प्रयास किया गया |
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“नेपोलियन के विभिन्न कार्यों में फ्रांसीसी क्रान्ति के विचारों की प्रतिध्वनि मिलती है लेकिन कुछ कार्य इन विचारों के विरुद्ध थे|” चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द/10 अंक) "Napoleon"s various works echo the ideas of the French Revolution, but some actions were against these ideas." Discuss. (150 to 200 words/10 Marks)
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दृष्टिकोण प्रस्तावना में फ्रांसीसी क्रांति से उत्पन्न महत्वपूर्ण विचार और नेपोलियन के उदय की चर्चा कीजिये प्रथम खंड में नेपोलियन के उन कार्यों की चर्चा कीजिये जिनपर पर क्रांति के प्रभाव स्पष्टतः परिलक्षित होते थे दूसरे खंड में नेपोलियन द्वारा क्रांति से उत्पन्न इन विचारों के उल्लंघन की चर्चा कीजिये अंतिम में मूल्यों का उल्लंघन और नेपोलियन के पतन में सम्बन्ध स्थापित करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये नेपोलियन का उदय फ्रांसीसी क्रांति के केन्द्रीय तत्व जिनमें मुक्ति ,स्वतंत्रता व समानता मुख्य थे उन्हें लेकर हुआ| इसलिए इसे कुछ इतिहासकारों के द्वारा क्रांति पुत्र कहकर भी संबोधित किया गया है| नेपोलियन ने पुरातन राजतंत्रीय व विशेषाधिकार युक्त व्यवस्था के स्थान पर कानून के शासन को तत्कालीन राजनीति की मुख्य धारा में शामिल किया|| क्रान्ति विरोधियों की उपस्थिति से क्रान्ति के समक्ष खतरा था, सैनिक अभियानों की सफलता, किसी महत्वपूर्ण प्रतिद्वंदी की अनुपस्थिति के साथ ही साथ नेतृत्व के गुण, सैनिक प्रतिभा, निर्णय लेने की क्षमता, साहस जैसे कारकों ने नेपोलियन को सत्ता के शिखर पर पहुंचाया | 1799 में फ्रांसीसी संविधान में परिवर्तन, तीन पार्षदों को कार्यपालिका की जिम्मेदारी, प्रथम पार्षद को अधिक अधिकार तथा नेपोलियन प्रथम पार्षद बना| 1802 में संविधान संशोधन कर आजीवन अपने पद पर बने रहने की व्यवस्था की| 1804 में एक जनमत संग्रह कराया और नेपोलियन को फ्रांसीसी गणतंत्र का सम्राट कहा जाने लगा| क्रान्ति के विचारों की प्रतिध्वनि क्रान्ति का विस्तार एक छोटी ही अवधि में यूरोप के बड़े भूभाग पर नियंत्रण की स्थापना की गयी जैसे इटली,जर्मनी,पोलैंड आदि| विजित क्षेत्रों में पुरानी व्यवस्था समाप्त कर आधुनिक राजनीति से सम्बंधित विभिन्न तत्वों की स्थापना की गयी जर्मनी, इटली जो कि कई भागों में विभक्त थे उन्हें एक शक्ति के अधीन लाया| आधुनिक कानूनों के आधार पर शासन की नींव रखी| राजतंत्रात्मक व्यवस्था तथा विशेषाधिकारों पर प्रहार किया| इस पूरी प्रक्रिया में इन राष्ट्रों के मध्य वर्ग तथा आम लोगों का भी समर्थन मिला दक्षिण पूर्वी यूरोप में भी नेपोलियन के अभियानों के कारण एक राजनीतिक हलचल प्रारम्भ हुई| इस प्रकार नेपोलियन ने न केवल यूरोपीय राजनीतिक नक़्शे को परिवर्तित किया बल्कि समानता, स्वतंत्रता एवं बंधुत्व जैसे विचारों को भी यूरोप में चर्चा का विषय बनाया| प्रशासन के क्षेत्र में क्रांति काल की प्रमुख विशेषताएं थी - निर्वाचन,योग्यता के आधार पर चुनाव आदि जिसे नेपोलियन ने स्वीकार किया और निर्वाचन प्रणाली की प्रारंभ की गयी| फ्रांस में प्रशासन के क्षेत्र में क्रान्तिकालीन परिवर्तनों को बनाए रखने(जैसे संविधान का शासन, प्रशासनिक विभाजन) के साथ ही सभी महत्त्वपूर्ण पदों पर परिवार के सदस्यों तथा कृपापात्र लोगों की नियुक्ति की कानून केक्षेत्र में नेपोलियन के द्वारा ही वर्त्तमान आधुनिक समाज के कानूनी आधार निर्मित किये गए जो विभिन्न रूपों में आज भी यूरोप में और उसके बाहर भी लागू हैं| नेपोलियन ने सिविल कोड(नागरिक संहिता), पीनल कोड(दंड संहिता) व्यावसायिक संहिता आदि विभिन्न कानूनों का संकलन कराया| इस प्रक्रिया में नेपोलियन की व्यक्तिगत रूचि थी इन कानूनों के कारण न केवल फ्रांस का विधिक एकीकरण हुआ बल्कि यूरोप में भी इन कानूनों को लागू किया| यह नेपोलियन का एक स्थायी कार्य था जिसका प्रभाव आज भी फ्रांस पर देख सकते हैं|इससे कानून के शासन की अवधारणा को मजबूती मिली| धर्म के क्षेत्रमें इसके साथ ही 1801 में पोप के साथ समझौता किया| इस समझौते के माध्यम से नेपोलियन ने धार्मिक तनावों को कम करने की कोशिश की पोप ने क्रान्तिकाल के दौरान धर्म के क्षेत्र में हुए परिवर्तनों को स्वीकार किया कैथोलिक धर्म को नेपोलियन ने बहुमत का धर्म माना इससे धर्म के निरंकुशता और नियंत्रण का दौर ख़त्म हुआ और राज्य की अवधारणा को मजबूती प्रदान की गयी | शिक्षा केक्षेत्र में क्रान्तिकाल की तरह नेपोलियन ने भी शिक्षा को चर्च के प्रभाव से मुक्त रखा प्राथमिक, माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा के विकास के लिए नीति बनायी शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए नार्मन स्कूल की स्थापना की आर्थिक क्षेत्र में नेपोलियन ने आर्थिक विकास के लिए कुछ कार्य किये जैसेसडकों, नहरों इत्यादि आधारभूत ढाँचे के विकास को महत्त्व दिया गया बैंक ऑफ़ फ्रांस की स्थापना की गयी, स्वदेशी वस्त्रों के प्रोत्साहन के लिए प्रदर्शनी का आयोजन किया जाने लगा| क्रान्ति के विचारों का उल्लंघन नेपोलियन ने साम्राज्य विस्तार के माध्यम से क्रान्ति के विचारों का प्रसार किया किन्तु इसकी कुछ सीमाएं भी थीं जैसे इन राष्ट्रों में सत्ता के शीर्ष पर अपने परिवार के लोगों को बैठाया तथा यदा कदा इन राष्ट्रों के साथ उपनिवेशों के जैसा व्यवहार करने लगा| इससे भाई-भतीजावाद को प्रश्रय मिला क्रांति काल में प्रारंभ निर्वाचन व योग्यता के आधार पर चुनाव की प्रक्रिया को स्वयं नेपोलियन के द्वारा ही थोड़े समय के बाद नकार दिया गया तथा शहरों तथा स्वायत्तशासी इकाइयों मेंनिर्वाचन के स्थान पर मनोनयन को महत्त्व दिया और महत्वपूर्ण पदों पर अपने रिश्तेदारों को बिठाने की राजतंत्रीय व्यवहार्य प्रारंभ हो गए| नेपोलियन ने निर्वाचन के स्थान पर मनोनयन को महत्त्व दिया तथा स्वयं भी आजीवन अपने पद पर बना रहा| ये परिवर्तन कहीं न कहीं क्रान्ति के मूल्यों के विपरीत थे क्रान्ति के मूल्यों से प्रभावित हो कर नेपोलियन ने विधि के शासन की स्थापना के लिए विभिन्न कानूनों को संहिताबद्ध करवाया हालांकि इन कानूनों की सीमाएं भी थीं जैसे संपत्ति में केवल पुत्रों को अधिकार दिया जाना तथा व्यावसायिक विवादों की स्थिति में पूंजीपतियों के पक्ष में निर्णय का प्रावधान करना आदि विशेषाधिकार को दर्शाता है जो क्रांति के सिद्धांतों का स्पष्ट तौर पर उल्लंघन था| शिक्षा में सुधार के अंतर्गत शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर नेपोलियन का महिमामंडन, सैनिक शिक्षा पर बल, उच्च शिक्षा एवं प्रेस पर कठोर सरकारी नियंत्रण स्थापित करना इन शैक्षणिक प्रयासों की सीमाएं थीं| ज्ञातव्य है कि फ्रांस की क्रांति में राजा की आर्थिक विफलता को मुख्य मुद्दा बनाया गया था परन्तु नेपोलियन के द्वारा भी उसके कोई ठोस उपाय नहीं ढूंढें गए| तत्कालीन परिस्थितियों पर ध्यान न देते हुए नेपोलियन ने औद्योगीकरण पर बल नहीं दिया| इससे ब्रिटेन की बनी औद्योगिक वस्तुओं पर फ्रांस निर्भरता बनी रही| इसके साथ ही महाद्वीपीय व्यवस्था के कारण पूँजीवाद की गति को रोकने की कोशिश की| यह स्वतंत्रता के मूल्य के विपरीत प्रयास था| इस प्रकार नेपोलियन का उदय क्रांति से उत्पन्न सिद्धांतों को हीलेकर हुआ | परन्तु आगे चलकर उसी के द्वारा इन सिद्धांतों विपरीत कार्य किये गए और नेपोलियन स्वयं एकनिरंकुश सम्राट की तरह बन गया| नेपोलियन नेकमोबेश राजतंत्रात्मक व्यवस्था के समान राजनीतिक प्रणाली की स्थापना करने का प्रयास किया| किन्तु क्रान्ति के मूल्यों के साथ समझौता करना ही नेपोलियन के पतन का निहित कारण बना |
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##Question:“नेपोलियन के विभिन्न कार्यों में फ्रांसीसी क्रान्ति के विचारों की प्रतिध्वनि मिलती है लेकिन कुछ कार्य इन विचारों के विरुद्ध थे|” चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द/10 अंक) "Napoleon"s various works echo the ideas of the French Revolution, but some actions were against these ideas." Discuss. (150 to 200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण प्रस्तावना में फ्रांसीसी क्रांति से उत्पन्न महत्वपूर्ण विचार और नेपोलियन के उदय की चर्चा कीजिये प्रथम खंड में नेपोलियन के उन कार्यों की चर्चा कीजिये जिनपर पर क्रांति के प्रभाव स्पष्टतः परिलक्षित होते थे दूसरे खंड में नेपोलियन द्वारा क्रांति से उत्पन्न इन विचारों के उल्लंघन की चर्चा कीजिये अंतिम में मूल्यों का उल्लंघन और नेपोलियन के पतन में सम्बन्ध स्थापित करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये नेपोलियन का उदय फ्रांसीसी क्रांति के केन्द्रीय तत्व जिनमें मुक्ति ,स्वतंत्रता व समानता मुख्य थे उन्हें लेकर हुआ| इसलिए इसे कुछ इतिहासकारों के द्वारा क्रांति पुत्र कहकर भी संबोधित किया गया है| नेपोलियन ने पुरातन राजतंत्रीय व विशेषाधिकार युक्त व्यवस्था के स्थान पर कानून के शासन को तत्कालीन राजनीति की मुख्य धारा में शामिल किया|| क्रान्ति विरोधियों की उपस्थिति से क्रान्ति के समक्ष खतरा था, सैनिक अभियानों की सफलता, किसी महत्वपूर्ण प्रतिद्वंदी की अनुपस्थिति के साथ ही साथ नेतृत्व के गुण, सैनिक प्रतिभा, निर्णय लेने की क्षमता, साहस जैसे कारकों ने नेपोलियन को सत्ता के शिखर पर पहुंचाया | 1799 में फ्रांसीसी संविधान में परिवर्तन, तीन पार्षदों को कार्यपालिका की जिम्मेदारी, प्रथम पार्षद को अधिक अधिकार तथा नेपोलियन प्रथम पार्षद बना| 1802 में संविधान संशोधन कर आजीवन अपने पद पर बने रहने की व्यवस्था की| 1804 में एक जनमत संग्रह कराया और नेपोलियन को फ्रांसीसी गणतंत्र का सम्राट कहा जाने लगा| क्रान्ति के विचारों की प्रतिध्वनि क्रान्ति का विस्तार एक छोटी ही अवधि में यूरोप के बड़े भूभाग पर नियंत्रण की स्थापना की गयी जैसे इटली,जर्मनी,पोलैंड आदि| विजित क्षेत्रों में पुरानी व्यवस्था समाप्त कर आधुनिक राजनीति से सम्बंधित विभिन्न तत्वों की स्थापना की गयी जर्मनी, इटली जो कि कई भागों में विभक्त थे उन्हें एक शक्ति के अधीन लाया| आधुनिक कानूनों के आधार पर शासन की नींव रखी| राजतंत्रात्मक व्यवस्था तथा विशेषाधिकारों पर प्रहार किया| इस पूरी प्रक्रिया में इन राष्ट्रों के मध्य वर्ग तथा आम लोगों का भी समर्थन मिला दक्षिण पूर्वी यूरोप में भी नेपोलियन के अभियानों के कारण एक राजनीतिक हलचल प्रारम्भ हुई| इस प्रकार नेपोलियन ने न केवल यूरोपीय राजनीतिक नक़्शे को परिवर्तित किया बल्कि समानता, स्वतंत्रता एवं बंधुत्व जैसे विचारों को भी यूरोप में चर्चा का विषय बनाया| प्रशासन के क्षेत्र में क्रांति काल की प्रमुख विशेषताएं थी - निर्वाचन,योग्यता के आधार पर चुनाव आदि जिसे नेपोलियन ने स्वीकार किया और निर्वाचन प्रणाली की प्रारंभ की गयी| फ्रांस में प्रशासन के क्षेत्र में क्रान्तिकालीन परिवर्तनों को बनाए रखने(जैसे संविधान का शासन, प्रशासनिक विभाजन) के साथ ही सभी महत्त्वपूर्ण पदों पर परिवार के सदस्यों तथा कृपापात्र लोगों की नियुक्ति की कानून केक्षेत्र में नेपोलियन के द्वारा ही वर्त्तमान आधुनिक समाज के कानूनी आधार निर्मित किये गए जो विभिन्न रूपों में आज भी यूरोप में और उसके बाहर भी लागू हैं| नेपोलियन ने सिविल कोड(नागरिक संहिता), पीनल कोड(दंड संहिता) व्यावसायिक संहिता आदि विभिन्न कानूनों का संकलन कराया| इस प्रक्रिया में नेपोलियन की व्यक्तिगत रूचि थी इन कानूनों के कारण न केवल फ्रांस का विधिक एकीकरण हुआ बल्कि यूरोप में भी इन कानूनों को लागू किया| यह नेपोलियन का एक स्थायी कार्य था जिसका प्रभाव आज भी फ्रांस पर देख सकते हैं|इससे कानून के शासन की अवधारणा को मजबूती मिली| धर्म के क्षेत्रमें इसके साथ ही 1801 में पोप के साथ समझौता किया| इस समझौते के माध्यम से नेपोलियन ने धार्मिक तनावों को कम करने की कोशिश की पोप ने क्रान्तिकाल के दौरान धर्म के क्षेत्र में हुए परिवर्तनों को स्वीकार किया कैथोलिक धर्म को नेपोलियन ने बहुमत का धर्म माना इससे धर्म के निरंकुशता और नियंत्रण का दौर ख़त्म हुआ और राज्य की अवधारणा को मजबूती प्रदान की गयी | शिक्षा केक्षेत्र में क्रान्तिकाल की तरह नेपोलियन ने भी शिक्षा को चर्च के प्रभाव से मुक्त रखा प्राथमिक, माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा के विकास के लिए नीति बनायी शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए नार्मन स्कूल की स्थापना की आर्थिक क्षेत्र में नेपोलियन ने आर्थिक विकास के लिए कुछ कार्य किये जैसेसडकों, नहरों इत्यादि आधारभूत ढाँचे के विकास को महत्त्व दिया गया बैंक ऑफ़ फ्रांस की स्थापना की गयी, स्वदेशी वस्त्रों के प्रोत्साहन के लिए प्रदर्शनी का आयोजन किया जाने लगा| क्रान्ति के विचारों का उल्लंघन नेपोलियन ने साम्राज्य विस्तार के माध्यम से क्रान्ति के विचारों का प्रसार किया किन्तु इसकी कुछ सीमाएं भी थीं जैसे इन राष्ट्रों में सत्ता के शीर्ष पर अपने परिवार के लोगों को बैठाया तथा यदा कदा इन राष्ट्रों के साथ उपनिवेशों के जैसा व्यवहार करने लगा| इससे भाई-भतीजावाद को प्रश्रय मिला क्रांति काल में प्रारंभ निर्वाचन व योग्यता के आधार पर चुनाव की प्रक्रिया को स्वयं नेपोलियन के द्वारा ही थोड़े समय के बाद नकार दिया गया तथा शहरों तथा स्वायत्तशासी इकाइयों मेंनिर्वाचन के स्थान पर मनोनयन को महत्त्व दिया और महत्वपूर्ण पदों पर अपने रिश्तेदारों को बिठाने की राजतंत्रीय व्यवहार्य प्रारंभ हो गए| नेपोलियन ने निर्वाचन के स्थान पर मनोनयन को महत्त्व दिया तथा स्वयं भी आजीवन अपने पद पर बना रहा| ये परिवर्तन कहीं न कहीं क्रान्ति के मूल्यों के विपरीत थे क्रान्ति के मूल्यों से प्रभावित हो कर नेपोलियन ने विधि के शासन की स्थापना के लिए विभिन्न कानूनों को संहिताबद्ध करवाया हालांकि इन कानूनों की सीमाएं भी थीं जैसे संपत्ति में केवल पुत्रों को अधिकार दिया जाना तथा व्यावसायिक विवादों की स्थिति में पूंजीपतियों के पक्ष में निर्णय का प्रावधान करना आदि विशेषाधिकार को दर्शाता है जो क्रांति के सिद्धांतों का स्पष्ट तौर पर उल्लंघन था| शिक्षा में सुधार के अंतर्गत शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर नेपोलियन का महिमामंडन, सैनिक शिक्षा पर बल, उच्च शिक्षा एवं प्रेस पर कठोर सरकारी नियंत्रण स्थापित करना इन शैक्षणिक प्रयासों की सीमाएं थीं| ज्ञातव्य है कि फ्रांस की क्रांति में राजा की आर्थिक विफलता को मुख्य मुद्दा बनाया गया था परन्तु नेपोलियन के द्वारा भी उसके कोई ठोस उपाय नहीं ढूंढें गए| तत्कालीन परिस्थितियों पर ध्यान न देते हुए नेपोलियन ने औद्योगीकरण पर बल नहीं दिया| इससे ब्रिटेन की बनी औद्योगिक वस्तुओं पर फ्रांस निर्भरता बनी रही| इसके साथ ही महाद्वीपीय व्यवस्था के कारण पूँजीवाद की गति को रोकने की कोशिश की| यह स्वतंत्रता के मूल्य के विपरीत प्रयास था| इस प्रकार नेपोलियन का उदय क्रांति से उत्पन्न सिद्धांतों को हीलेकर हुआ | परन्तु आगे चलकर उसी के द्वारा इन सिद्धांतों विपरीत कार्य किये गए और नेपोलियन स्वयं एकनिरंकुश सम्राट की तरह बन गया| नेपोलियन नेकमोबेश राजतंत्रात्मक व्यवस्था के समान राजनीतिक प्रणाली की स्थापना करने का प्रयास किया| किन्तु क्रान्ति के मूल्यों के साथ समझौता करना ही नेपोलियन के पतन का निहित कारण बना |
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"India needs modernisation and not westernisation". Critically analyse the statement. (150 words)
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BRIEF APPROACH: - INTRODUCTION - REASONS WHY INDIA NEEDS MODERNISATION RATHER THAN WESTERNISATION - CONCLUSION A critique of the argument made in the question/ A qualifying argument. ANSWER: Westernisation refers to the blind imitation of the culture of the West (MN Srinivas) . However, modernization is the progressive transformation of social, economic, political and attitudinal system of society.Given the socio-economic situation of the country, the statement that India needs modernization, rather than westernization is well justified. This is due to the following reasons: 1) TASTE PREFERENCES VERSUS DEVELOPMENT While westernisation includes food, clothing, speech, music preferences etc., modernisation includes industrialization, urbanization, increasing level of literacy (/education) etc. 2) SUITABILITY FOR THE MASSES Westernisation is an elite concept, confined to the upper and middle class. Not everyone can afford westernization. Whereas, modernization is a mass affair. 3) WESTERNISATION RESULTS IN CULTURAL LAG Westernisation is a peripheral concept. Therefore, westernization results in only the peripheral values changing, while the core values remain the same. For example, western music is preferred by many in society, mobile phones are used by all. However, the patriarchal values still remain. However, modernization penetrates at all levels of society 4) PRESERVING THE RICH INDIAN TRADITION Modernisation is not anti-tradition. It only targets the regressive norms. However, westernization tends to target and erode the native, local traditions, in favour of western traditions. For example , in the current times, sarees and lungis are seldom worn by the Indian folk, though jeans are very common and widely worn. 5) EXAMPLES Japan is modernized without being westernized. India is westernized without being modernized. Westernisation per se (prima facie) is not wrong. However, restricting only to westernization in the name of modernization is wrong.
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##Question:"India needs modernisation and not westernisation". Critically analyse the statement. (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: - INTRODUCTION - REASONS WHY INDIA NEEDS MODERNISATION RATHER THAN WESTERNISATION - CONCLUSION A critique of the argument made in the question/ A qualifying argument. ANSWER: Westernisation refers to the blind imitation of the culture of the West (MN Srinivas) . However, modernization is the progressive transformation of social, economic, political and attitudinal system of society.Given the socio-economic situation of the country, the statement that India needs modernization, rather than westernization is well justified. This is due to the following reasons: 1) TASTE PREFERENCES VERSUS DEVELOPMENT While westernisation includes food, clothing, speech, music preferences etc., modernisation includes industrialization, urbanization, increasing level of literacy (/education) etc. 2) SUITABILITY FOR THE MASSES Westernisation is an elite concept, confined to the upper and middle class. Not everyone can afford westernization. Whereas, modernization is a mass affair. 3) WESTERNISATION RESULTS IN CULTURAL LAG Westernisation is a peripheral concept. Therefore, westernization results in only the peripheral values changing, while the core values remain the same. For example, western music is preferred by many in society, mobile phones are used by all. However, the patriarchal values still remain. However, modernization penetrates at all levels of society 4) PRESERVING THE RICH INDIAN TRADITION Modernisation is not anti-tradition. It only targets the regressive norms. However, westernization tends to target and erode the native, local traditions, in favour of western traditions. For example , in the current times, sarees and lungis are seldom worn by the Indian folk, though jeans are very common and widely worn. 5) EXAMPLES Japan is modernized without being westernized. India is westernized without being modernized. Westernisation per se (prima facie) is not wrong. However, restricting only to westernization in the name of modernization is wrong.
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जब हम भारत के अतीत में हुए विज्ञान प्रौद्योगिकी की समीक्षा करते हैं, तो हम पाते हैं कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का विकास मध्यकाल की अपेक्षा प्राचीन काल में अधिक हुआ है | टिप्पणी कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) When we review the science and technology of India in the past, we find that the development of science and technology has happened more in the ancient times than in the medieval period. Comment. (150-200 words/ 10 marks)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत प्राचीन काल में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की स्थिति को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात मध्यकाल में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की कमजोर स्थिति के कारणों की चर्चा कीजिये | अंत में सकारात्मक निष्कर्ष के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का विकास प्राचीन कालीन भारत में हमें विविध क्षेत्रों में विज्ञान व प्रौद्योगिकी का विकसित स्वरुप दिखायी देता है - जैसे चिकित्सा के क्षेत्र में - चरक संहिता में चरक, सुश्रुत आदि, आज के भारत का आयुष क्षेत्र इसी से प्रभावित रहा है | गणित के क्षेत्र में - आर्यभट्ट द्वारा शून्य का आविष्कार, ज्यामिति का प्रयोग प्राचीन काल से | खगोलिकी क्षेत्र में - आर्यभट्ट के अतिरिक्त भास्कराचार्य, ब्रह्मगुप्त, वराहमिहिर आदि का नाम प्रसिद्द है | नगर निर्माण - सिन्धु घाटी की सभ्यता का नगर-नियोजन, सडकों का समकोण पर काटना, बंदरगाह आदि का प्रमुख स्थान रहा है भारत में विज्ञान एवं प्रद्योगिकी का विकास प्राचीन काल से है, जिसके अनगिनत साक्ष्य हैं - उदाहरण - मेहरौली का लौह स्तम्भ, आदि प्राचीन काल के वैज्ञानिकों के महत्वपूर्ण योगदानों को दर्शाता है | भारत में विज्ञान प्रौद्योगिकी का अध्ययन तीन प्रमुख विश्वविद्यालयों - नालन्दा, विक्रमशिला एवं तक्षशिला में होता था | मध्यकालीन भारत में विज्ञान प्रौद्योगिकी का विकास प्राचीन काल की अपेक्षा में कम हुआ है | प्राचीन कालीन भारत में हमें विविध क्षेत्रों में विज्ञान व प्रौद्योगिकी का विकसित स्वरुप दिखायी देता है | मध्यकाल में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की स्थिति विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विकास की यह प्रवृत्ति मध्यकाल तक आते -आते कमजोर पड़ने लगी , जिसके कारण निम्नलिखित हैं - विज्ञान प्रौद्योगिकी के स्थान पर इस काल में वास्तुकला एवं चित्रकला आदि पर अधिक जोर दिया गया , जिसमे स्थापत्य कला पर शासकों को विशेष जोर | शासक वर्ग की विलासिता ने भी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को हतोत्साहित किया | मध्यकाल में प्राचीन काल की तुलना में धर्म को लेकर असुरक्षा की भावना अधिक बलवती हुई, परिणामस्वरूप धर्म पर अधिक जोर दिया गया तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की उपेक्षा हुई | इस काल में रक्षा आवश्यकताओं पर अधिक ध्यान केन्द्रित किया गया , फलस्वरूप विज्ञान की प्रगति बाधित हुई | यद्यपि मध्यकाल में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विकास की रफ़्तार मंद तो अवश्य पड़ी परन्तु वास्तुकला के क्षेत्र में इस काल की वैज्ञानिक प्रगति सराहनीय रही | जबकि सवाई जय सिंह के द्वारा करवाया गया जंतर -मंतर का निर्माण भी विज्ञान -प्रौद्योगिकी की विकसित मनोदशा का प्रतीक है |संचार के माध्यम के रूप में - शेरशाह सूरी द्वारा ग्रैंड टैंक रोड का निर्माण भी अपनी एक अलग पहचान रखता है | अतः मध्यकाल को वैज्ञानिक उपलब्धियों से वंचित करार नहीं दिया जा सकता |
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##Question:जब हम भारत के अतीत में हुए विज्ञान प्रौद्योगिकी की समीक्षा करते हैं, तो हम पाते हैं कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का विकास मध्यकाल की अपेक्षा प्राचीन काल में अधिक हुआ है | टिप्पणी कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) When we review the science and technology of India in the past, we find that the development of science and technology has happened more in the ancient times than in the medieval period. Comment. (150-200 words/ 10 marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत प्राचीन काल में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की स्थिति को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात मध्यकाल में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की कमजोर स्थिति के कारणों की चर्चा कीजिये | अंत में सकारात्मक निष्कर्ष के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का विकास प्राचीन कालीन भारत में हमें विविध क्षेत्रों में विज्ञान व प्रौद्योगिकी का विकसित स्वरुप दिखायी देता है - जैसे चिकित्सा के क्षेत्र में - चरक संहिता में चरक, सुश्रुत आदि, आज के भारत का आयुष क्षेत्र इसी से प्रभावित रहा है | गणित के क्षेत्र में - आर्यभट्ट द्वारा शून्य का आविष्कार, ज्यामिति का प्रयोग प्राचीन काल से | खगोलिकी क्षेत्र में - आर्यभट्ट के अतिरिक्त भास्कराचार्य, ब्रह्मगुप्त, वराहमिहिर आदि का नाम प्रसिद्द है | नगर निर्माण - सिन्धु घाटी की सभ्यता का नगर-नियोजन, सडकों का समकोण पर काटना, बंदरगाह आदि का प्रमुख स्थान रहा है भारत में विज्ञान एवं प्रद्योगिकी का विकास प्राचीन काल से है, जिसके अनगिनत साक्ष्य हैं - उदाहरण - मेहरौली का लौह स्तम्भ, आदि प्राचीन काल के वैज्ञानिकों के महत्वपूर्ण योगदानों को दर्शाता है | भारत में विज्ञान प्रौद्योगिकी का अध्ययन तीन प्रमुख विश्वविद्यालयों - नालन्दा, विक्रमशिला एवं तक्षशिला में होता था | मध्यकालीन भारत में विज्ञान प्रौद्योगिकी का विकास प्राचीन काल की अपेक्षा में कम हुआ है | प्राचीन कालीन भारत में हमें विविध क्षेत्रों में विज्ञान व प्रौद्योगिकी का विकसित स्वरुप दिखायी देता है | मध्यकाल में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की स्थिति विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विकास की यह प्रवृत्ति मध्यकाल तक आते -आते कमजोर पड़ने लगी , जिसके कारण निम्नलिखित हैं - विज्ञान प्रौद्योगिकी के स्थान पर इस काल में वास्तुकला एवं चित्रकला आदि पर अधिक जोर दिया गया , जिसमे स्थापत्य कला पर शासकों को विशेष जोर | शासक वर्ग की विलासिता ने भी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को हतोत्साहित किया | मध्यकाल में प्राचीन काल की तुलना में धर्म को लेकर असुरक्षा की भावना अधिक बलवती हुई, परिणामस्वरूप धर्म पर अधिक जोर दिया गया तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की उपेक्षा हुई | इस काल में रक्षा आवश्यकताओं पर अधिक ध्यान केन्द्रित किया गया , फलस्वरूप विज्ञान की प्रगति बाधित हुई | यद्यपि मध्यकाल में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विकास की रफ़्तार मंद तो अवश्य पड़ी परन्तु वास्तुकला के क्षेत्र में इस काल की वैज्ञानिक प्रगति सराहनीय रही | जबकि सवाई जय सिंह के द्वारा करवाया गया जंतर -मंतर का निर्माण भी विज्ञान -प्रौद्योगिकी की विकसित मनोदशा का प्रतीक है |संचार के माध्यम के रूप में - शेरशाह सूरी द्वारा ग्रैंड टैंक रोड का निर्माण भी अपनी एक अलग पहचान रखता है | अतः मध्यकाल को वैज्ञानिक उपलब्धियों से वंचित करार नहीं दिया जा सकता |
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भारतीय नीति निर्माण के विभिन्न सैद्धांतिक आधारों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द ) Briefly discuss the various theoretical underpinnings of Indian policy making. (150-200 words)
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दृष्टिकोण : नीति व नीति निर्माण पर संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । भारतीय नीति निर्माण के विभिन्न संवैधानिक आधारों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ भूमिका लिखिए । उत्तर : नीति वह मार्गदर्शिका है जिसके द्वारा सिद्धांतों , मांगों, उद्देशों और उपलब्धताओं को आधार बनाकर नियोजन को संचालित किया जाता है । बेहतर नीति निर्माण व उनका प्रभावी क्रियान्वयन सुशासन के लिए एक अनिवार्य शर्त है । स्वतंत्र भारत में हमें नीति निर्माण का क्रमिक विकास देखने को मिलता है । भारतीय नीति निर्माण में सैद्धांतिक आधार : भारत जब स्वतंत्र हुआ , उस समय विश्व में कल्याणकारी राज्य और समाजवाद से संबद्ध अवधारणाएं प्रभावी रूप धारण कर रही थी ।स्वभवतः भारत में इनका प्रभाव पड़ा - उदाहरण के लिए प्रस्तवाना में उल्लिखित सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की अवधारणा कल्याणकारी राज्य और समाजवाद से प्रभावित है । भाग 3 में उल्लिखित मूल अधिकार जहाँ व्यक्तिगत तौर पर लोगों के व्यक्तित्व विकास की गारंटी देते हैं वहीं अनुच्छेद 14-18 तक समतामूलक विकास को ही वास्तविक विकास मानते हैं । नीति निदेशक तत्वों के माध्यम से राज्य को यह दायित्व सौंपा गया है कि वह ऐसी नीतियों का निर्माण करे जिससे समाज के सभी लोगों विशेषकर कमजोर व अभावग्रस्त का हित पोषित हो सके । जिससे इन वंचित समूहों को समाज की मुख्यधारा में शामिल किया जा सके । कल्याणकारी राज्य की उपरोक्त अवधारणा को समय-समय पर परिवर्तित करने एवं राज्य की नीतियों को समाज अनुकूल बनाए रखने के लिए अनेक सिद्धांतों ने प्रभावित किया : भारतीय कल्याणकारी राज्य को आधुनिक व्यक्तिवाद या नवबहुलवाद प्रभावित करता है , जिसका तर्क है कि " राज्य जिन नीतियों का निर्माण करे वे समूहों के हितों को ध्यान में रखकर,समूहों के सहयोग से निर्मित करे" । उदाहरण के लिए यदि नीतियों का निर्माण किसानों के लिए किया जाना है तो कृषक समूहों की भागीदारी होनी चाहिए । भारतीय कल्याणकारी राज्य को नवउदारवाद भी प्रभावित करता है जो लोगों को स्वायत्ता, स्वतंत्रता और अधिकाधिक अधिकार प्रदान करने की सिफारिश करता है । इस सिद्धांत का मत है कि मनुष्य को अपनी उन्नति और समृद्धि बढ़ाने के लिए उपयुक्त मात्रा में अवसर मिलना चाहिए ।राज्य का दायित्व है कि वह सामाजिक न्याय,समतातमूलकता और पोस्ट लिबरल डेमोक्रेटिक इकोनोमी के अनुकूल अपनी नीतियों को निर्मित करे ।ऐसा दायित्व राज्य को समतावाद की अवधारणा देती है । विखंडनवादियों का तर्क है कि कल्याणकारी राज्य एक अच्छी अवधारणा है किन्तु संपूर्ण शक्तियां राज्य पर केंद्रित होने के कारण कभी-कभी कुछ अनियमितताएं उपस्थित होती रहती हैं ।अतः उन्हें टुकरों-टुकरों में अभियांत्रिकी करने की आवश्यकता है ।भारत जैसे देश में जहां सामुदायिक विविधता विधमान है वहाँ राज्य को विविधता को ध्यान में रखते हुए नीतियाँ निर्मित करनी चाहिए ।जब कभी ऐसी नीतियाँ उसके विपरीत हो तो लोगों को इसके विरोध का अधिकार होना चाहिए । समुदायवाद कहता है कि राज्य का उद्देश लोगों की भलाई या अच्छाई करना मात्र नहीं है अपितु ऐसी नीतियों का निर्माण करना है जो आदर्श नागरिक समाज का गठन करती हो । इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत में नीति निर्माण पर किसी एक सिद्धांत या विचारधारा का प्रभाव नहीं रहा है बल्कि यह समय-समय पर अनेक सिद्धांतों से प्रभावित रहा है और इसका क्रमिक विकास हुआ है जिसमें यहाँ की विविधता का स्पष्ट प्रभाव पड़ा है ।
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##Question:भारतीय नीति निर्माण के विभिन्न सैद्धांतिक आधारों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द ) Briefly discuss the various theoretical underpinnings of Indian policy making. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण : नीति व नीति निर्माण पर संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । भारतीय नीति निर्माण के विभिन्न संवैधानिक आधारों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ भूमिका लिखिए । उत्तर : नीति वह मार्गदर्शिका है जिसके द्वारा सिद्धांतों , मांगों, उद्देशों और उपलब्धताओं को आधार बनाकर नियोजन को संचालित किया जाता है । बेहतर नीति निर्माण व उनका प्रभावी क्रियान्वयन सुशासन के लिए एक अनिवार्य शर्त है । स्वतंत्र भारत में हमें नीति निर्माण का क्रमिक विकास देखने को मिलता है । भारतीय नीति निर्माण में सैद्धांतिक आधार : भारत जब स्वतंत्र हुआ , उस समय विश्व में कल्याणकारी राज्य और समाजवाद से संबद्ध अवधारणाएं प्रभावी रूप धारण कर रही थी ।स्वभवतः भारत में इनका प्रभाव पड़ा - उदाहरण के लिए प्रस्तवाना में उल्लिखित सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की अवधारणा कल्याणकारी राज्य और समाजवाद से प्रभावित है । भाग 3 में उल्लिखित मूल अधिकार जहाँ व्यक्तिगत तौर पर लोगों के व्यक्तित्व विकास की गारंटी देते हैं वहीं अनुच्छेद 14-18 तक समतामूलक विकास को ही वास्तविक विकास मानते हैं । नीति निदेशक तत्वों के माध्यम से राज्य को यह दायित्व सौंपा गया है कि वह ऐसी नीतियों का निर्माण करे जिससे समाज के सभी लोगों विशेषकर कमजोर व अभावग्रस्त का हित पोषित हो सके । जिससे इन वंचित समूहों को समाज की मुख्यधारा में शामिल किया जा सके । कल्याणकारी राज्य की उपरोक्त अवधारणा को समय-समय पर परिवर्तित करने एवं राज्य की नीतियों को समाज अनुकूल बनाए रखने के लिए अनेक सिद्धांतों ने प्रभावित किया : भारतीय कल्याणकारी राज्य को आधुनिक व्यक्तिवाद या नवबहुलवाद प्रभावित करता है , जिसका तर्क है कि " राज्य जिन नीतियों का निर्माण करे वे समूहों के हितों को ध्यान में रखकर,समूहों के सहयोग से निर्मित करे" । उदाहरण के लिए यदि नीतियों का निर्माण किसानों के लिए किया जाना है तो कृषक समूहों की भागीदारी होनी चाहिए । भारतीय कल्याणकारी राज्य को नवउदारवाद भी प्रभावित करता है जो लोगों को स्वायत्ता, स्वतंत्रता और अधिकाधिक अधिकार प्रदान करने की सिफारिश करता है । इस सिद्धांत का मत है कि मनुष्य को अपनी उन्नति और समृद्धि बढ़ाने के लिए उपयुक्त मात्रा में अवसर मिलना चाहिए ।राज्य का दायित्व है कि वह सामाजिक न्याय,समतातमूलकता और पोस्ट लिबरल डेमोक्रेटिक इकोनोमी के अनुकूल अपनी नीतियों को निर्मित करे ।ऐसा दायित्व राज्य को समतावाद की अवधारणा देती है । विखंडनवादियों का तर्क है कि कल्याणकारी राज्य एक अच्छी अवधारणा है किन्तु संपूर्ण शक्तियां राज्य पर केंद्रित होने के कारण कभी-कभी कुछ अनियमितताएं उपस्थित होती रहती हैं ।अतः उन्हें टुकरों-टुकरों में अभियांत्रिकी करने की आवश्यकता है ।भारत जैसे देश में जहां सामुदायिक विविधता विधमान है वहाँ राज्य को विविधता को ध्यान में रखते हुए नीतियाँ निर्मित करनी चाहिए ।जब कभी ऐसी नीतियाँ उसके विपरीत हो तो लोगों को इसके विरोध का अधिकार होना चाहिए । समुदायवाद कहता है कि राज्य का उद्देश लोगों की भलाई या अच्छाई करना मात्र नहीं है अपितु ऐसी नीतियों का निर्माण करना है जो आदर्श नागरिक समाज का गठन करती हो । इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत में नीति निर्माण पर किसी एक सिद्धांत या विचारधारा का प्रभाव नहीं रहा है बल्कि यह समय-समय पर अनेक सिद्धांतों से प्रभावित रहा है और इसका क्रमिक विकास हुआ है जिसमें यहाँ की विविधता का स्पष्ट प्रभाव पड़ा है ।
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"India needs modernisation and not westernisation". Critically analyse the statement. (150 words)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - REASONS WHY INDIA NEEDS MODERNISATION RATHER THAN WESTERNISATION - CONCLUSION A critique of the argument made in the question/ A qualifying argument. ANSWER: Westernisation refers to theblind imitation of the culture of the West (MN Srinivas).However, modernization is theprogressive transformationof social, economic, political and attitudinal system of society. Given the socio-economic situation of the country, the statement that India needs modernization, rather than westernization is well justified. This is due to the following reasons: 1) TASTE PREFERENCES VERSUS DEVELOPMENT While westernisation includes food, clothing, speech, music preferences etc., modernisation includes industrialization, urbanization, increasing level of literacy (/education) etc. 2) SUITABILITY FOR THE MASSES Westernisation is an elite concept, confined to the upper and middle class. Not everyone can afford westernization. Whereas, modernization is a mass affair. 3) WESTERNISATION RESULTS IN CULTURAL LAG Westernisation is a peripheral concept. Therefore, westernization results in only the peripheral values changing, while the core values remain the same. For example, western music is preferred by many in society, mobile phones are used by all. However, patriarchal values still remain. However, modernization penetrates at all levels of society 4) PRESERVING THE RICH INDIAN TRADITION Modernisation is not anti-tradition. It only targets the regressive norms. However, westernization tends to target and erode the native, local traditions, in favour of western traditions. For example, in the current times, sarees and lungis are seldom worn by the Indian folk, though jeans are very common and widely worn. 5) EXAMPLES Japan is modernized without being westernized. India is westernized without being modernized. Westernisation per se (prima facie) is not wrong. However, restricting only to westernization in the name of modernization is wrong.
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##Question:"India needs modernisation and not westernisation". Critically analyse the statement. (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - REASONS WHY INDIA NEEDS MODERNISATION RATHER THAN WESTERNISATION - CONCLUSION A critique of the argument made in the question/ A qualifying argument. ANSWER: Westernisation refers to theblind imitation of the culture of the West (MN Srinivas).However, modernization is theprogressive transformationof social, economic, political and attitudinal system of society. Given the socio-economic situation of the country, the statement that India needs modernization, rather than westernization is well justified. This is due to the following reasons: 1) TASTE PREFERENCES VERSUS DEVELOPMENT While westernisation includes food, clothing, speech, music preferences etc., modernisation includes industrialization, urbanization, increasing level of literacy (/education) etc. 2) SUITABILITY FOR THE MASSES Westernisation is an elite concept, confined to the upper and middle class. Not everyone can afford westernization. Whereas, modernization is a mass affair. 3) WESTERNISATION RESULTS IN CULTURAL LAG Westernisation is a peripheral concept. Therefore, westernization results in only the peripheral values changing, while the core values remain the same. For example, western music is preferred by many in society, mobile phones are used by all. However, patriarchal values still remain. However, modernization penetrates at all levels of society 4) PRESERVING THE RICH INDIAN TRADITION Modernisation is not anti-tradition. It only targets the regressive norms. However, westernization tends to target and erode the native, local traditions, in favour of western traditions. For example, in the current times, sarees and lungis are seldom worn by the Indian folk, though jeans are very common and widely worn. 5) EXAMPLES Japan is modernized without being westernized. India is westernized without being modernized. Westernisation per se (prima facie) is not wrong. However, restricting only to westernization in the name of modernization is wrong.
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धर्म निरपेक्षता से आप क्या समझते हैं?धर्म निरपेक्षता की विभिन्न अवधारणाओं की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) What do you understand by secularism? Discuss the various concepts of secularism. (150-200 words)
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Approach : भूमिका में धर्म निरपेक्षता की परिभाषा लिख सकते हैं। धर्म निरपेक्षता की अवधारणा तथा इसके प्रकार लिखिए। सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता की उदाहरण सहित चर्चा कीजिए। नकारात्मक धर्मनिरपेक्षता को स्पष्ट कीजिए। निष्कर्ष में धर्म निरपेक्षताकी भारतीय संदर्भों में चर्चा कर सकते हैं। उत्तर: साधारण शब्दों में धर्म निरपेक्षता एक सिद्धांत है जो राजनीति से धर्म के पृथककरण का समर्थन करता है। यह सरकारी संस्थानों एवं राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिदेशित अधिकारियों को धार्मिक संस्थानों और धार्मिक पदाधिकारियों से पृथक करने संबंधी सिद्धान्त है। धर्म निरपेक्षता एक आदर्श सिद्धान्त है जो एक धर्मनिरपेक्ष समाज को यह अनुभव करने का आर्यस करता है कि किसी भी व्यक्ति को अंतर-धार्मिक वर्चस्व या अंत: धार्मिक वर्चस्व से रहित होना चाहिए। यह धर्मों के मध्य समानता को प्रोत्साहित करता है। यह राज्य व धर्म के मध्य पृथककरण को सम्मिलित करता है। धर्म निरपेक्षता दो प्रकार की होती है- सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता, नकारात्मक धर्मनिरपेक्षता सकारात्मक धर्म निरपेक्षता - इसके अंतर्गत यद्यपि सामाजिक व्यवस्था मूलभूत मानवीय मूल्यों पर आधारित होती है। राज्य/समाज सभी धर्मों के प्रति सम्मान के साथ साथ उसके संरक्षण व संवर्द्धन हेतु प्रयास करता है। ऐसे समाज में सभी धर्मों एवं उनकी मान्यताओं की स्वीकार्यता होती है अल्पसंख्यकों हेतु अतिरिक्त प्रबंध भी किए जाते हैं। सभी धमों को राज्य द्वारा समान संरक्षण प्रदान किया जाता चाहिए। यह विशिष्ट महत्व को प्रदर्शित करता है। राज्य सभी धर्मों को संरक्षण प्रदान करता है। अन्य धर्म कि कीमत पर किसी एक धर्म का पक्ष नहीं लेता तथा यह किसी भी धर्म को राज्य धर्म के रूप में स्वीकारता नहीं है। यह अवधारणा धार्मिक क्षेत्र में समान स्तर पर राज्य प्रायोजित सुधारों को प्रोत्साहित करती है। भारत में सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता को अपनाया गया है। नकारात्मक धर्मनिरपेक्षता एक ऐसी राजव्यवस्था/समाज जहां पर धर्म को किसी व्यक्ति या समुदाय का बेहद निजी संदर्भ माना जाता है। राज्य धार्मिक मामलों में तटस्थ होता है। परस्परिक निषेध के रूप में धर्म और राज्य के पृथककरण का तात्पर्य दोनों अपने अपने कार्यक्षेत्रों में पारंपरिक रूप से अनन्य हैं। ऐसे समाज में व्यक्तियों को धार्मिक अधिकार नहीं दिये जाते एवं इन संदर्भों को मानवाधिकार के रूप में देखा जाता है। समुदाय आधारित अधिकारों अथवा अल्पसंख्यक संबंधी अधिकारों की बहुत कम संभावना है। अधिकांश पश्चिमी देश इसी अवधारणा का पालन करते हैं। धर्म निरपेक्षता की इस पश्चिमी अवधारणा में अंत: धार्मिक समानता हेतु एक तंत्र विद्यमान होता है जबकि अंतर धार्मिक समानता के लिए नहीं है। इस प्रकार राज्य सभी मामलों में धर्म से एक निश्चित दूरी बनाए रखता है। धर्म निरपेक्षता एक आधुनिक अवधारणा है। सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता को अधिक महत्व दिया जाता है इसीलिए भारत में भी इसी को अपनाया गया। भारत में यह शांतिपूर्ण सेह-अस्तित्व पर आधारित है। जिसे भारतीय संविधान की प्रस्तावना में स्थान दिया गया है तथा भारतीय नागरिकों को मूलाधिकार के रूप में मान्यता प्रदान की गयी है।
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##Question:धर्म निरपेक्षता से आप क्या समझते हैं?धर्म निरपेक्षता की विभिन्न अवधारणाओं की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) What do you understand by secularism? Discuss the various concepts of secularism. (150-200 words)##Answer:Approach : भूमिका में धर्म निरपेक्षता की परिभाषा लिख सकते हैं। धर्म निरपेक्षता की अवधारणा तथा इसके प्रकार लिखिए। सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता की उदाहरण सहित चर्चा कीजिए। नकारात्मक धर्मनिरपेक्षता को स्पष्ट कीजिए। निष्कर्ष में धर्म निरपेक्षताकी भारतीय संदर्भों में चर्चा कर सकते हैं। उत्तर: साधारण शब्दों में धर्म निरपेक्षता एक सिद्धांत है जो राजनीति से धर्म के पृथककरण का समर्थन करता है। यह सरकारी संस्थानों एवं राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिदेशित अधिकारियों को धार्मिक संस्थानों और धार्मिक पदाधिकारियों से पृथक करने संबंधी सिद्धान्त है। धर्म निरपेक्षता एक आदर्श सिद्धान्त है जो एक धर्मनिरपेक्ष समाज को यह अनुभव करने का आर्यस करता है कि किसी भी व्यक्ति को अंतर-धार्मिक वर्चस्व या अंत: धार्मिक वर्चस्व से रहित होना चाहिए। यह धर्मों के मध्य समानता को प्रोत्साहित करता है। यह राज्य व धर्म के मध्य पृथककरण को सम्मिलित करता है। धर्म निरपेक्षता दो प्रकार की होती है- सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता, नकारात्मक धर्मनिरपेक्षता सकारात्मक धर्म निरपेक्षता - इसके अंतर्गत यद्यपि सामाजिक व्यवस्था मूलभूत मानवीय मूल्यों पर आधारित होती है। राज्य/समाज सभी धर्मों के प्रति सम्मान के साथ साथ उसके संरक्षण व संवर्द्धन हेतु प्रयास करता है। ऐसे समाज में सभी धर्मों एवं उनकी मान्यताओं की स्वीकार्यता होती है अल्पसंख्यकों हेतु अतिरिक्त प्रबंध भी किए जाते हैं। सभी धमों को राज्य द्वारा समान संरक्षण प्रदान किया जाता चाहिए। यह विशिष्ट महत्व को प्रदर्शित करता है। राज्य सभी धर्मों को संरक्षण प्रदान करता है। अन्य धर्म कि कीमत पर किसी एक धर्म का पक्ष नहीं लेता तथा यह किसी भी धर्म को राज्य धर्म के रूप में स्वीकारता नहीं है। यह अवधारणा धार्मिक क्षेत्र में समान स्तर पर राज्य प्रायोजित सुधारों को प्रोत्साहित करती है। भारत में सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता को अपनाया गया है। नकारात्मक धर्मनिरपेक्षता एक ऐसी राजव्यवस्था/समाज जहां पर धर्म को किसी व्यक्ति या समुदाय का बेहद निजी संदर्भ माना जाता है। राज्य धार्मिक मामलों में तटस्थ होता है। परस्परिक निषेध के रूप में धर्म और राज्य के पृथककरण का तात्पर्य दोनों अपने अपने कार्यक्षेत्रों में पारंपरिक रूप से अनन्य हैं। ऐसे समाज में व्यक्तियों को धार्मिक अधिकार नहीं दिये जाते एवं इन संदर्भों को मानवाधिकार के रूप में देखा जाता है। समुदाय आधारित अधिकारों अथवा अल्पसंख्यक संबंधी अधिकारों की बहुत कम संभावना है। अधिकांश पश्चिमी देश इसी अवधारणा का पालन करते हैं। धर्म निरपेक्षता की इस पश्चिमी अवधारणा में अंत: धार्मिक समानता हेतु एक तंत्र विद्यमान होता है जबकि अंतर धार्मिक समानता के लिए नहीं है। इस प्रकार राज्य सभी मामलों में धर्म से एक निश्चित दूरी बनाए रखता है। धर्म निरपेक्षता एक आधुनिक अवधारणा है। सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता को अधिक महत्व दिया जाता है इसीलिए भारत में भी इसी को अपनाया गया। भारत में यह शांतिपूर्ण सेह-अस्तित्व पर आधारित है। जिसे भारतीय संविधान की प्रस्तावना में स्थान दिया गया है तथा भारतीय नागरिकों को मूलाधिकार के रूप में मान्यता प्रदान की गयी है।
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भारत से ब्रिटिश शासन का अंत एक बहुत बड़ी कीमत के साथ हुआ था| इस संदर्भ में, तत्कालीन भारत के समक्ष उत्पन समस्याओं तथा चुनौतियों का जिक्र कीजिये| इन चुनौतियों से पार करके, आज़ादी के पश्चात, राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया किस प्रकार आगे बढ़ी थी? (150-200 शब्द; 10 अंक) The end of british rule in india came with very huge cost. In this context, mention the emerging problems and challenges faced by newly independent india. Overcoming these challenges, how did the process of nation building proceed after independence? (150-200 words; 10 Marks)
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एप्रोच- भारत से ब्रिटिश शासन की समाप्ति तथा भारत विभाजन की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में,तत्कालीन भारत के समक्ष उत्पन समस्याओं तथा चुनौतियों का जिक्र कीजिये| अगले भाग में, चुनौतियों से किस प्रकारपार पाकर राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ी, इसका तात्कालिक संदर्भों में जिक्र कीजिये| निष्कर्षतः, विभाजन से उत्पन परिणामों तथा नवस्वतंत्र भारत द्वारा उसे निपटने के प्रयासों को संक्षिप्तता से दर्शाते हुए उत्तर का अंत कीजिये| उत्तर- एक लंबे स्वतंत्रता आंदोलन तथा अन्य कारणों के परिणामस्वरूप 15 अगस्त,1947 को भारत से अंग्रेजी साम्राज्य का अंत हो गया तथा भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की| हालांकि यह स्वतंत्रता हमें देश के विभाजन की कीमत पर प्राप्त हुयी थी| कांग्रेस तथा राष्ट्रवादी नेताओं के तमाम प्रयासों के बावजूदमुस्लिम लीग तथा जिन्ना की हठधर्मिता ने धार्मिक आधार पर भारत के विभाजन का मार्ग प्रशस्तकिया तथा पाकिस्तान के रूप में भारत के साथ ही एक नएराष्ट्र का जन्म हुआ|नवस्वतंत्रभारत के समक्ष विभाजन से उत्पन समस्याओं के साथ-साथ अन्य समस्याएं तथा चुनौतियाँ भी विद्यमान थी- धर्म के आधार पर दो राष्ट्रों का निर्माणएक जटिल मुद्दा था क्योंकि कुछ क्षेत्रों को छोड़कर धार्मिक अंतर स्पष्ट नहीं था जैसे- पश्चिमी पाकिस्तान एवं पूर्वी पाकिस्तान का संदर्भ; जनसँख्या का विस्थापन तथा पाकिस्तान से आये 60 लाख शरणार्थियों का पुनर्वास; ब्रिटिश नकारात्मक विरासत का प्रभाव; सीमा का निर्धारण; कानून-व्यवस्था पर नियंत्रण; विस्थापन के साथ चल रहे सांप्रदायिक दंगो पर नियंत्रण तथा अल्पसंख्यकों में सुरक्षा का भाव उत्पन करना; देशी रियासतों का विलय तथा क्षेत्रीय एवं प्रशासनिक एकीकरण; पाकिस्तान के साथ संबंध सुधार तथा कम्युनिस्ट विद्रोहों पर नियंत्रण; संविधान के निर्माण के साथ-साथ प्रतिनिधिमूलक जनवाद तथा नागरिक स्वतंत्रता पर आधारित राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण; इतने बड़े तथा भौगोलिक विविधता से भरे देश में पहले चुनावों का आयोजन; भूमि सुधारके माध्यम से अर्ध-सामंती कृषि व्यवस्था का उन्मूलन; राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहन तथा राष्ट्र का सुदृढ़ीकरण; गरीबी निवारण तथा नियोजन प्रक्रिया के माध्यम से आर्थिक विकास को प्रोत्साहन; सामाजिक अन्याय, असमानता तथा शोषण का उन्मूलन; एकस्वतंत्र विदेश नीति का निर्माण; राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को जारी रखना; नवस्वतंत्र भारत को इन चुनौतियों से पार करते हुए राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को आगे जारी रखना था जिसे निम्न तरीके से अंजाम दिया गया- आज़ादी से पूर्व राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया राजनीतिक/आर्थिक/प्रशासनिक/विविध एकीकरण में अंग्रेजों की महत्वपूर्ण भूमिका; ब्रिटिश शासन के दौरान ही समस्याओं का एकीकरण; विभिन्न कारणों से आधुनिक राष्ट्रवाद की नींव; आज़ादी से पूर्व इसकी पराकाष्ठा भारत छोड़ो आंदोलन, आज़ाद हिंद फौज के सैनिकों पर मुकदमें आदि के दौरान दिखना; आज़ादी के बाद राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया राष्ट्रीय भावनाओं को बनाए रखना भारतीय नेतृत्व के समक्ष एक बड़ी चुनौती थी क्योंकि अधिकांशतः यूरोपीय विशेषज्ञों का यह मानना कि भारत का एक राष्ट्र के रूप में ज्यादा दिनों तक अस्तित्व विद्यमान नहीं रहेगा तथा जल्द ही भारत विभिन्न टुकड़ों में विखंडित हो जाएगा| उपरोक्त कारण से राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा सावधानीपूर्वक राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाना; आज़ादी के पश्चातप्रथम मंत्रिमंडल में 5 गैर-कांग्रेसी मंत्रीशामिल; विभिन्न धर्मों/वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व; इससे व्यापक तौर पर यह संकेत गया कि भले ही कांग्रेस का बहुमत हो लेकिन राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया सभी वर्गों/संगठनों को साथ लेकर चला जाएगा| संविधान सभा मेंबड़ी संख्या में समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों को कांग्रेस द्वारा मनोनीत करना; अम्बेडकर जी को प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया जाना| यह एक व्यापक सांकेतिक कदम था क्योंकि अम्बेडकर जी कई मुद्दों पर कांग्रेस के मुखर आलोचक थें| संविधान के प्रावधानोंके माध्यम से राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को महत्व जैसे- मजबूत केंद्र; संघात्मक ढाँचा; अल्पसंख्यकों एवं सभी वंचित तबकों के लिए विशेष प्रावधान; कुछ राज्यों/क्षेत्रों को विशेष प्रावधान आदि; अखिल भारतीय सेवा तथा सेना की भूमिका; राष्ट्रीय प्रतीक, राष्ट्रगान एवं राष्ट्रीय अवकाश; योजना आयोग तथा संतुलित विकास की रणनीति; विभाजन के पश्चात साम्प्रदायिकता के मुद्दे को भारत सरकार ने गंभीरता से लिया तथा वैचारिक स्तर के साथ-साथ कानून-व्यवस्था के स्तर पर भी नेहरु एवं पटेल ने कठोरता बरती तथा शीघ्र ही सांप्रदायिक दंगों पर नियंत्रण पा लिया गया| साथ ही, संविधान में अल्पसंख्यकों को विशेष प्रावधानों के माध्यम से सुरक्षा का आश्वासन दिया गया| पश्चिमी सीमा में शरणार्थियों की समस्या को सुगम तरीके से पुनर्वास के माध्यम से समाधान का प्रयास किया गया| इन उपायों के साथ-साथ विभिन्न सरकारों एवं समाज के विभिन्न वर्गों/संगठनों के सम्मिलित प्रयासों से राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ी|
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##Question:भारत से ब्रिटिश शासन का अंत एक बहुत बड़ी कीमत के साथ हुआ था| इस संदर्भ में, तत्कालीन भारत के समक्ष उत्पन समस्याओं तथा चुनौतियों का जिक्र कीजिये| इन चुनौतियों से पार करके, आज़ादी के पश्चात, राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया किस प्रकार आगे बढ़ी थी? (150-200 शब्द; 10 अंक) The end of british rule in india came with very huge cost. In this context, mention the emerging problems and challenges faced by newly independent india. Overcoming these challenges, how did the process of nation building proceed after independence? (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- भारत से ब्रिटिश शासन की समाप्ति तथा भारत विभाजन की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में,तत्कालीन भारत के समक्ष उत्पन समस्याओं तथा चुनौतियों का जिक्र कीजिये| अगले भाग में, चुनौतियों से किस प्रकारपार पाकर राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ी, इसका तात्कालिक संदर्भों में जिक्र कीजिये| निष्कर्षतः, विभाजन से उत्पन परिणामों तथा नवस्वतंत्र भारत द्वारा उसे निपटने के प्रयासों को संक्षिप्तता से दर्शाते हुए उत्तर का अंत कीजिये| उत्तर- एक लंबे स्वतंत्रता आंदोलन तथा अन्य कारणों के परिणामस्वरूप 15 अगस्त,1947 को भारत से अंग्रेजी साम्राज्य का अंत हो गया तथा भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की| हालांकि यह स्वतंत्रता हमें देश के विभाजन की कीमत पर प्राप्त हुयी थी| कांग्रेस तथा राष्ट्रवादी नेताओं के तमाम प्रयासों के बावजूदमुस्लिम लीग तथा जिन्ना की हठधर्मिता ने धार्मिक आधार पर भारत के विभाजन का मार्ग प्रशस्तकिया तथा पाकिस्तान के रूप में भारत के साथ ही एक नएराष्ट्र का जन्म हुआ|नवस्वतंत्रभारत के समक्ष विभाजन से उत्पन समस्याओं के साथ-साथ अन्य समस्याएं तथा चुनौतियाँ भी विद्यमान थी- धर्म के आधार पर दो राष्ट्रों का निर्माणएक जटिल मुद्दा था क्योंकि कुछ क्षेत्रों को छोड़कर धार्मिक अंतर स्पष्ट नहीं था जैसे- पश्चिमी पाकिस्तान एवं पूर्वी पाकिस्तान का संदर्भ; जनसँख्या का विस्थापन तथा पाकिस्तान से आये 60 लाख शरणार्थियों का पुनर्वास; ब्रिटिश नकारात्मक विरासत का प्रभाव; सीमा का निर्धारण; कानून-व्यवस्था पर नियंत्रण; विस्थापन के साथ चल रहे सांप्रदायिक दंगो पर नियंत्रण तथा अल्पसंख्यकों में सुरक्षा का भाव उत्पन करना; देशी रियासतों का विलय तथा क्षेत्रीय एवं प्रशासनिक एकीकरण; पाकिस्तान के साथ संबंध सुधार तथा कम्युनिस्ट विद्रोहों पर नियंत्रण; संविधान के निर्माण के साथ-साथ प्रतिनिधिमूलक जनवाद तथा नागरिक स्वतंत्रता पर आधारित राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण; इतने बड़े तथा भौगोलिक विविधता से भरे देश में पहले चुनावों का आयोजन; भूमि सुधारके माध्यम से अर्ध-सामंती कृषि व्यवस्था का उन्मूलन; राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहन तथा राष्ट्र का सुदृढ़ीकरण; गरीबी निवारण तथा नियोजन प्रक्रिया के माध्यम से आर्थिक विकास को प्रोत्साहन; सामाजिक अन्याय, असमानता तथा शोषण का उन्मूलन; एकस्वतंत्र विदेश नीति का निर्माण; राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को जारी रखना; नवस्वतंत्र भारत को इन चुनौतियों से पार करते हुए राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को आगे जारी रखना था जिसे निम्न तरीके से अंजाम दिया गया- आज़ादी से पूर्व राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया राजनीतिक/आर्थिक/प्रशासनिक/विविध एकीकरण में अंग्रेजों की महत्वपूर्ण भूमिका; ब्रिटिश शासन के दौरान ही समस्याओं का एकीकरण; विभिन्न कारणों से आधुनिक राष्ट्रवाद की नींव; आज़ादी से पूर्व इसकी पराकाष्ठा भारत छोड़ो आंदोलन, आज़ाद हिंद फौज के सैनिकों पर मुकदमें आदि के दौरान दिखना; आज़ादी के बाद राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया राष्ट्रीय भावनाओं को बनाए रखना भारतीय नेतृत्व के समक्ष एक बड़ी चुनौती थी क्योंकि अधिकांशतः यूरोपीय विशेषज्ञों का यह मानना कि भारत का एक राष्ट्र के रूप में ज्यादा दिनों तक अस्तित्व विद्यमान नहीं रहेगा तथा जल्द ही भारत विभिन्न टुकड़ों में विखंडित हो जाएगा| उपरोक्त कारण से राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा सावधानीपूर्वक राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाना; आज़ादी के पश्चातप्रथम मंत्रिमंडल में 5 गैर-कांग्रेसी मंत्रीशामिल; विभिन्न धर्मों/वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व; इससे व्यापक तौर पर यह संकेत गया कि भले ही कांग्रेस का बहुमत हो लेकिन राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया सभी वर्गों/संगठनों को साथ लेकर चला जाएगा| संविधान सभा मेंबड़ी संख्या में समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों को कांग्रेस द्वारा मनोनीत करना; अम्बेडकर जी को प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया जाना| यह एक व्यापक सांकेतिक कदम था क्योंकि अम्बेडकर जी कई मुद्दों पर कांग्रेस के मुखर आलोचक थें| संविधान के प्रावधानोंके माध्यम से राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को महत्व जैसे- मजबूत केंद्र; संघात्मक ढाँचा; अल्पसंख्यकों एवं सभी वंचित तबकों के लिए विशेष प्रावधान; कुछ राज्यों/क्षेत्रों को विशेष प्रावधान आदि; अखिल भारतीय सेवा तथा सेना की भूमिका; राष्ट्रीय प्रतीक, राष्ट्रगान एवं राष्ट्रीय अवकाश; योजना आयोग तथा संतुलित विकास की रणनीति; विभाजन के पश्चात साम्प्रदायिकता के मुद्दे को भारत सरकार ने गंभीरता से लिया तथा वैचारिक स्तर के साथ-साथ कानून-व्यवस्था के स्तर पर भी नेहरु एवं पटेल ने कठोरता बरती तथा शीघ्र ही सांप्रदायिक दंगों पर नियंत्रण पा लिया गया| साथ ही, संविधान में अल्पसंख्यकों को विशेष प्रावधानों के माध्यम से सुरक्षा का आश्वासन दिया गया| पश्चिमी सीमा में शरणार्थियों की समस्या को सुगम तरीके से पुनर्वास के माध्यम से समाधान का प्रयास किया गया| इन उपायों के साथ-साथ विभिन्न सरकारों एवं समाज के विभिन्न वर्गों/संगठनों के सम्मिलित प्रयासों से राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ी|
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सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज को प्राप्त करने के लिए प्रारम्भ की गयी प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना(PMJAY) के प्रदर्शन का मूल्यांकन कीजिए। इसके और प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सुझाव दीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) To achieve universal health coverage Pradhan Mantri Jan Arogya Yojana (PMJAY) was started, evaluate the performance. Give suggestion for its more effective implementation. (150-200 words; 10 marks)
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दृष्टिकोण: भौमिक में योजना के प्रारम्भ करने का संदर्भ दीजिए। इसके बाद हाल ही में जारी रिपोर्ट के आधार पर इस योजना के सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों लिखिए। इसमें सुधार के लिए सुधार दीजिए। सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के उद्देश्य इस योजना को प्रारम्भ किया गया जिसका लक्ष्य द्वितीयक और तृतीयक उपचार उपलब्ध कराकर स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों का प्रभावी समाधान किया जाना है। यह योजना आयुष्मान भारत का दूसरा घटक है। हाल ही में जारी रिपोर्ट के अनुसार कुछ राज्यों जैसे- केरल, गुजरात, तमिलनाडु, छतीसगढ़ ने इस योजना के क्रियान्वयन में बेहतर प्रयास किया है। सकारात्मक प्रदर्शन: इस योजना के तहत लगभग 445 लाख लोगों का इलाज किया गया है। कर्नाटक और केरल राज्य ने राष्ट्रिय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत विभिन्न योजनाओं का समेकन किया है जिससे इस योजना के तहत लाभार्थियों का बेहतर रूप से चयन हो सका है। बीमा धोखाधड़ी की शिथिल निगरानी से ग्रस्त RSBY के विपरित इस योजना के तहत सूचना प्रद्योगिकी की एक सुदृढ़ संरचना का वियक्स हुआ है। कई अस्पतालों को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है।न निरंतर विकसित हो रही धोखाधड़ी- नियंत्रण प्रणाली में जैसे-जैसे सुधा र्होता जाएगा इस योजना को सुव्यवस्थित करने में प्रमुख भूमिखा निभाएगी। आयुष्मान भारत योजना के कार्यान्वयन के प्रथम वर्ष के दौरान 16 भारतीय राज्यों के 341 अस्पतालों में धोखाधड़ी के मामलों का पता चला है। नकारात्मक प्रदर्शन: धोखाधड़ी के प्रयासों पर अंकुश लगाने के बावजूद भी अनियमितता पायी गयी है। सार्वजनिक और साथ ही निजी क्षेत्र में द्वितीयक एवं तृतीयक देखभाल स्तर के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार तथा वितरण अत्यंत आसमान है। इस योजना के तहत किए जाने रोगों के इलाज संबंधी डाटा पूर्णतः उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। इस योजना के तहत प्रमाणित अस्पताल अल्प संख्या में सूचीबद्ध हैं। इस योजना के बेहतर क्रियान्वयन के लिए सुझाव: इस योजना से संबन्धित रियल टाइम डेटा की उपलब्धता के लिए प्रयास किया जाना चाहिए। अभी केंद्र सरकार स्वास्थ्य पर जीडीपी का 2 प्रतिशत से भी कम खर्च कर रही है। इस योजना के विस्तार केलिए स्वास्थ्य क्षेत्र में व्यय को और बढ़ाने के आवश्यकता है। इस योजना में सरकारी अस्पतालों को बाहर रखना चाहिए क्योंकि ये पहले से ही निशुल्क इलाज प्रदान करते हैं। नियमों के पालन में विफल रहने वाले अस्पतालों को राष्ट्रीय अस्पताल और स्वास्थ्य सेवा प्रदाता प्रत्यायन बोर्ड द्वारा अप्रत्यातीत करने की आवश्यकता है।
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##Question:सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज को प्राप्त करने के लिए प्रारम्भ की गयी प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना(PMJAY) के प्रदर्शन का मूल्यांकन कीजिए। इसके और प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सुझाव दीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) To achieve universal health coverage Pradhan Mantri Jan Arogya Yojana (PMJAY) was started, evaluate the performance. Give suggestion for its more effective implementation. (150-200 words; 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण: भौमिक में योजना के प्रारम्भ करने का संदर्भ दीजिए। इसके बाद हाल ही में जारी रिपोर्ट के आधार पर इस योजना के सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों लिखिए। इसमें सुधार के लिए सुधार दीजिए। सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के उद्देश्य इस योजना को प्रारम्भ किया गया जिसका लक्ष्य द्वितीयक और तृतीयक उपचार उपलब्ध कराकर स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों का प्रभावी समाधान किया जाना है। यह योजना आयुष्मान भारत का दूसरा घटक है। हाल ही में जारी रिपोर्ट के अनुसार कुछ राज्यों जैसे- केरल, गुजरात, तमिलनाडु, छतीसगढ़ ने इस योजना के क्रियान्वयन में बेहतर प्रयास किया है। सकारात्मक प्रदर्शन: इस योजना के तहत लगभग 445 लाख लोगों का इलाज किया गया है। कर्नाटक और केरल राज्य ने राष्ट्रिय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत विभिन्न योजनाओं का समेकन किया है जिससे इस योजना के तहत लाभार्थियों का बेहतर रूप से चयन हो सका है। बीमा धोखाधड़ी की शिथिल निगरानी से ग्रस्त RSBY के विपरित इस योजना के तहत सूचना प्रद्योगिकी की एक सुदृढ़ संरचना का वियक्स हुआ है। कई अस्पतालों को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है।न निरंतर विकसित हो रही धोखाधड़ी- नियंत्रण प्रणाली में जैसे-जैसे सुधा र्होता जाएगा इस योजना को सुव्यवस्थित करने में प्रमुख भूमिखा निभाएगी। आयुष्मान भारत योजना के कार्यान्वयन के प्रथम वर्ष के दौरान 16 भारतीय राज्यों के 341 अस्पतालों में धोखाधड़ी के मामलों का पता चला है। नकारात्मक प्रदर्शन: धोखाधड़ी के प्रयासों पर अंकुश लगाने के बावजूद भी अनियमितता पायी गयी है। सार्वजनिक और साथ ही निजी क्षेत्र में द्वितीयक एवं तृतीयक देखभाल स्तर के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार तथा वितरण अत्यंत आसमान है। इस योजना के तहत किए जाने रोगों के इलाज संबंधी डाटा पूर्णतः उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। इस योजना के तहत प्रमाणित अस्पताल अल्प संख्या में सूचीबद्ध हैं। इस योजना के बेहतर क्रियान्वयन के लिए सुझाव: इस योजना से संबन्धित रियल टाइम डेटा की उपलब्धता के लिए प्रयास किया जाना चाहिए। अभी केंद्र सरकार स्वास्थ्य पर जीडीपी का 2 प्रतिशत से भी कम खर्च कर रही है। इस योजना के विस्तार केलिए स्वास्थ्य क्षेत्र में व्यय को और बढ़ाने के आवश्यकता है। इस योजना में सरकारी अस्पतालों को बाहर रखना चाहिए क्योंकि ये पहले से ही निशुल्क इलाज प्रदान करते हैं। नियमों के पालन में विफल रहने वाले अस्पतालों को राष्ट्रीय अस्पताल और स्वास्थ्य सेवा प्रदाता प्रत्यायन बोर्ड द्वारा अप्रत्यातीत करने की आवश्यकता है।
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स्वदेशीकारण से आप क्या समझते हैं ? प्रौद्योगिकी स्वदेशीकरण के लाभों एवं चुनौतियों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by Indigenisation? Briefly discuss the benefits and challenges of indigenization of technology. (150-200 words/10 marks)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत स्वदेशीकरण को परिभाषित करते हुए कीजिये | इसके पश्चात स्वदेशीकरण के लाभों का संक्षेप में वर्णन कीजिये | पुनः प्रौद्योगिकी स्वदेशीकरण की चुनौतियों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - स्वदेशीकरण इससे तात्त्पर्य देश में विकसित स्वदेशी उत्पाद/उपकरण/प्रक्रिया से है जिसे देश के संसाधनों द्वारा निर्मित किया जाता हैं | संसाधन - कच्चा माल एवं मानव संसाधन मानव संसाधन के अंतर्गत - वैज्ञानिक एवं अनुसंधान एवं विकास शामिल होते हैं | प्रौद्योगिकी स्वदेशीकरण का आशय देश में विकसित तकनीक जिसे "प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौता" के माध्यम से किया जाना से है | स्वदेशीकरण की प्रक्रिया देश के परिस्थितियों के अनुसार किया जाता है | उदाहरणस्वरुप - हल्का लड़ाकू विमान (LCA)- तेजस, आईएनएस अरिहंत, GSLV के तीसरे चरण में क्रायोजेनिक इंजन का प्रयोग आईएनएस कोलकाता युद्धपोत , हल्का लड़ाकू हेलीकाप्टर ध्रुव, आदि स्वदेशीकरण के उदहारण हैं | नीतियां - टेक्नोलॉजी पालिसी स्टेटमेंट -1983 के अंतर्गत स्वदेशीकरण पर बल दिया गया | स्वदेशीकरण के लाभ अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा मिलता है | वाणिज्यिक बाजार को प्रोत्साहन मिलता है | विनिर्माण प्रक्रिया को बल मिलता है तथा बेहतर एवं उन्नत प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जा सकता है | खर्च में कमी आती है | प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को प्रोत्साहन मिलता है |आदि स्वदेशीकरण में चुनौतियां अंतरराष्ट्रीय तौर पर चुनौती - MTCR, NSG आदि के द्वारा प्रौद्योगिकी के व्यापर पर प्रतिबन्ध लगाता है | बौद्धिक सम्पदा अधिकार से सम्बंधित TOT समझौता में प्रतिबन्ध, जैसे- मिराज 2000 का TOT डिजाईन और इन्जन के पेटेंट के लिए केवल विनिर्माण का लाइसेंस दिया जाना | राष्ट्रीय तौर पर चुनौती - अनुसंधान एवं विकास कार्य में स्वदेशीकरण में कमी हो सकती है | विशेषज्ञ वैज्ञानिकों की कमी केंद्र सरकार द्वारा स्वदेशीकरण में कम वितीय सहायता प्रदान करना, जैसे- तेजस के निर्माण में लगभग 25 वर्ष लग गए | स्वदेशीकरण परियोजनाओं में विलम्ब अनुसंधान एवं विकास के क्षेत्र में केंद्र/संस्थान को कम स्वायत्तता | इस प्रकार किसी राष्ट्र के विकास हेतु प्रौद्योगिकी श्रेष्ठता/उन्नति एक अनिवार्य शर्त है , जिसके लिए प्रौद्योगिकी का स्वदेशीकरण आवश्यक है | यही कारण है कि "टेक्नोलॉजी पालिसी स्टेटमेंट" में भी बल दिया गया | प्रौद्योगिकी स्वदेशीकरण भारत जैसे विकासशील देशों के लिए लाभप्रद है और भारत सरकार द्वारा "मेक इन इंडिया" जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से इसे आगे बढ़ाया जा रहा है |
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##Question:स्वदेशीकारण से आप क्या समझते हैं ? प्रौद्योगिकी स्वदेशीकरण के लाभों एवं चुनौतियों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by Indigenisation? Briefly discuss the benefits and challenges of indigenization of technology. (150-200 words/10 marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत स्वदेशीकरण को परिभाषित करते हुए कीजिये | इसके पश्चात स्वदेशीकरण के लाभों का संक्षेप में वर्णन कीजिये | पुनः प्रौद्योगिकी स्वदेशीकरण की चुनौतियों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - स्वदेशीकरण इससे तात्त्पर्य देश में विकसित स्वदेशी उत्पाद/उपकरण/प्रक्रिया से है जिसे देश के संसाधनों द्वारा निर्मित किया जाता हैं | संसाधन - कच्चा माल एवं मानव संसाधन मानव संसाधन के अंतर्गत - वैज्ञानिक एवं अनुसंधान एवं विकास शामिल होते हैं | प्रौद्योगिकी स्वदेशीकरण का आशय देश में विकसित तकनीक जिसे "प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौता" के माध्यम से किया जाना से है | स्वदेशीकरण की प्रक्रिया देश के परिस्थितियों के अनुसार किया जाता है | उदाहरणस्वरुप - हल्का लड़ाकू विमान (LCA)- तेजस, आईएनएस अरिहंत, GSLV के तीसरे चरण में क्रायोजेनिक इंजन का प्रयोग आईएनएस कोलकाता युद्धपोत , हल्का लड़ाकू हेलीकाप्टर ध्रुव, आदि स्वदेशीकरण के उदहारण हैं | नीतियां - टेक्नोलॉजी पालिसी स्टेटमेंट -1983 के अंतर्गत स्वदेशीकरण पर बल दिया गया | स्वदेशीकरण के लाभ अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा मिलता है | वाणिज्यिक बाजार को प्रोत्साहन मिलता है | विनिर्माण प्रक्रिया को बल मिलता है तथा बेहतर एवं उन्नत प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जा सकता है | खर्च में कमी आती है | प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को प्रोत्साहन मिलता है |आदि स्वदेशीकरण में चुनौतियां अंतरराष्ट्रीय तौर पर चुनौती - MTCR, NSG आदि के द्वारा प्रौद्योगिकी के व्यापर पर प्रतिबन्ध लगाता है | बौद्धिक सम्पदा अधिकार से सम्बंधित TOT समझौता में प्रतिबन्ध, जैसे- मिराज 2000 का TOT डिजाईन और इन्जन के पेटेंट के लिए केवल विनिर्माण का लाइसेंस दिया जाना | राष्ट्रीय तौर पर चुनौती - अनुसंधान एवं विकास कार्य में स्वदेशीकरण में कमी हो सकती है | विशेषज्ञ वैज्ञानिकों की कमी केंद्र सरकार द्वारा स्वदेशीकरण में कम वितीय सहायता प्रदान करना, जैसे- तेजस के निर्माण में लगभग 25 वर्ष लग गए | स्वदेशीकरण परियोजनाओं में विलम्ब अनुसंधान एवं विकास के क्षेत्र में केंद्र/संस्थान को कम स्वायत्तता | इस प्रकार किसी राष्ट्र के विकास हेतु प्रौद्योगिकी श्रेष्ठता/उन्नति एक अनिवार्य शर्त है , जिसके लिए प्रौद्योगिकी का स्वदेशीकरण आवश्यक है | यही कारण है कि "टेक्नोलॉजी पालिसी स्टेटमेंट" में भी बल दिया गया | प्रौद्योगिकी स्वदेशीकरण भारत जैसे विकासशील देशों के लिए लाभप्रद है और भारत सरकार द्वारा "मेक इन इंडिया" जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से इसे आगे बढ़ाया जा रहा है |
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The lifecycle of a joint family depend upon economic factors rather than social factors. Discuss (150 words)
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BRIEF APPROACH: - INTRODUCTION The introduction must be followed by an inter-linking paragraph (it makes the answer more effective that way- as per Smriti Ma’am) - THE SOCIAL FACTORS I THE SOCIAL FACTORS CAUSING THE DISINTEGRATION OF JOINT FAMILIES II THE SOCIAL FACTORS CAUSING THE RE-INTEGRATION OF JOINT FAMILIES - THE ECONOMIC FACTORS I THE ECONOMIC FACTORS CAUSING THE DISINTEGRATION OF JOINT FAMILIES II THE ECONOMIC FACTORS CAUSING THE RE-INTEGRATION OF JOINT FAMILIES - CONCLUSION - (The viewpoint of the sociologists) ANSWER: A joint family is a social group consisting of people united by ties of blood, marriage or adoption. It extends for 2 or more generations. It is characterized by common residence, economic cooperation and performs the function of sexual gratification. However, not all families remain joint forever. They undergo a transition/ life-cycle- from a joint family to a nuclear family (disintegration) and then from a nuclear family to a joint family (re-integration). There are mainly two factors behind this, economic and social. THE SOCIAL FACTORS I THE SOCIAL FACTORS CAUSING THE DISINTEGRATION OF JOINT FAMILIES 1) URBANISATION It leads to a new family system, compatible with the urban value systems. 2) MIGRATION Urbanisation also leads to migration. 2.1) Better status of women, patriarchy in the villages forces people to migrate to the cities. II THE SOCIAL FACTORS CAUSING THE RE-INTEGRATION OF JOINT FAMILIES 1) RETENTION OF THE JOINT FAMILY ETHICS The joint family ethics are still retained even after moving into the cities. For example, the involvement of family members in functions and ceremonies. 2) THE ‘HOUSEHOLD’ THEORY When joint families disintegrate into nuclear ones, only the common residence and commonsality (inter-dining) i.e. two characteristics of joint families, go missing. There is still much dependence on the joint families- they still have the right to inheritance etc. Hence, sociologists got confused and then evolved a term ‘households’ which include only these 2 factors. Hence, we can conclude that it is the joint households which are getting disintegrated and not the joint families. 3) BETTER VALUES IN THE CHILD The parents, aspiring to inculcate better value systems in their children, prefer that their parents (read the child’s grandparents) come and live with them in the cities. Although social factors affect the life-cycle of a joint family, yet, the economic factors dominate. THE ECONOMIC FACTORS I THE ECONOMIC FACTORS CAUSING THE DISINTEGRATION OF JOINT FAMILIES 1) LACK OF OPPORTUNITIES The lack of opportunities wrt skilled development, opportunities and jobs forces people to move apart from their bigger joint families, and live separately as small nuclear families wherever the economic opportunities attract them. 2) MIGRATION Urbanisation also leads to migration. There are basically 2 types of factors: 2.1) Push factors- Agricultural distress- the per-capita availability of cultivable land is declining, lack of remunerative character of the agricultural sector, lack of alternative employment opportunities, lack of basic infra wrt education, health and skills, population pressure push the people out of the villages. 2.2) Pull factors- Urbanisation, globalization, industrialization pull the people to the cities and force them to live as nuclear families. II THE ECONOMIC FACTORS CAUSING THE RE-INTEGRATION OF JOINT FAMILIES 1) CHAIN MIGRATION ALONG WITH A HIGH COST OF LIVING If one person migrates in the family, then eventually the entire family ends up migrating. This way, they are unable to afford separate households. Hence, they live together as joint families. 2) CHILD REARING IN A DUAL CAREER FAMILY The cost of being able to afford domestic labour is quite high in the cities. Hence, parents prefer that in the wake of both the parents working, the grandparents come and look after the child. 3) THE ECONOMIC FACTOR Industrialisation provides an economic basis for sustaining the joint family. Therefore, rather than the joint families breaking, it is just the households that disintegrate. This leads to the re-integration of the joint families that had disintegrated.
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##Question:The lifecycle of a joint family depend upon economic factors rather than social factors. Discuss (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: - INTRODUCTION The introduction must be followed by an inter-linking paragraph (it makes the answer more effective that way- as per Smriti Ma’am) - THE SOCIAL FACTORS I THE SOCIAL FACTORS CAUSING THE DISINTEGRATION OF JOINT FAMILIES II THE SOCIAL FACTORS CAUSING THE RE-INTEGRATION OF JOINT FAMILIES - THE ECONOMIC FACTORS I THE ECONOMIC FACTORS CAUSING THE DISINTEGRATION OF JOINT FAMILIES II THE ECONOMIC FACTORS CAUSING THE RE-INTEGRATION OF JOINT FAMILIES - CONCLUSION - (The viewpoint of the sociologists) ANSWER: A joint family is a social group consisting of people united by ties of blood, marriage or adoption. It extends for 2 or more generations. It is characterized by common residence, economic cooperation and performs the function of sexual gratification. However, not all families remain joint forever. They undergo a transition/ life-cycle- from a joint family to a nuclear family (disintegration) and then from a nuclear family to a joint family (re-integration). There are mainly two factors behind this, economic and social. THE SOCIAL FACTORS I THE SOCIAL FACTORS CAUSING THE DISINTEGRATION OF JOINT FAMILIES 1) URBANISATION It leads to a new family system, compatible with the urban value systems. 2) MIGRATION Urbanisation also leads to migration. 2.1) Better status of women, patriarchy in the villages forces people to migrate to the cities. II THE SOCIAL FACTORS CAUSING THE RE-INTEGRATION OF JOINT FAMILIES 1) RETENTION OF THE JOINT FAMILY ETHICS The joint family ethics are still retained even after moving into the cities. For example, the involvement of family members in functions and ceremonies. 2) THE ‘HOUSEHOLD’ THEORY When joint families disintegrate into nuclear ones, only the common residence and commonsality (inter-dining) i.e. two characteristics of joint families, go missing. There is still much dependence on the joint families- they still have the right to inheritance etc. Hence, sociologists got confused and then evolved a term ‘households’ which include only these 2 factors. Hence, we can conclude that it is the joint households which are getting disintegrated and not the joint families. 3) BETTER VALUES IN THE CHILD The parents, aspiring to inculcate better value systems in their children, prefer that their parents (read the child’s grandparents) come and live with them in the cities. Although social factors affect the life-cycle of a joint family, yet, the economic factors dominate. THE ECONOMIC FACTORS I THE ECONOMIC FACTORS CAUSING THE DISINTEGRATION OF JOINT FAMILIES 1) LACK OF OPPORTUNITIES The lack of opportunities wrt skilled development, opportunities and jobs forces people to move apart from their bigger joint families, and live separately as small nuclear families wherever the economic opportunities attract them. 2) MIGRATION Urbanisation also leads to migration. There are basically 2 types of factors: 2.1) Push factors- Agricultural distress- the per-capita availability of cultivable land is declining, lack of remunerative character of the agricultural sector, lack of alternative employment opportunities, lack of basic infra wrt education, health and skills, population pressure push the people out of the villages. 2.2) Pull factors- Urbanisation, globalization, industrialization pull the people to the cities and force them to live as nuclear families. II THE ECONOMIC FACTORS CAUSING THE RE-INTEGRATION OF JOINT FAMILIES 1) CHAIN MIGRATION ALONG WITH A HIGH COST OF LIVING If one person migrates in the family, then eventually the entire family ends up migrating. This way, they are unable to afford separate households. Hence, they live together as joint families. 2) CHILD REARING IN A DUAL CAREER FAMILY The cost of being able to afford domestic labour is quite high in the cities. Hence, parents prefer that in the wake of both the parents working, the grandparents come and look after the child. 3) THE ECONOMIC FACTOR Industrialisation provides an economic basis for sustaining the joint family. Therefore, rather than the joint families breaking, it is just the households that disintegrate. This leads to the re-integration of the joint families that had disintegrated.
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Why Sanskrit is considered a transboundary language? Write about the evolution of the Sanskrit language in India. (150 words/10 marks)
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Approach : Introduce an answer by highlighting the importance of Sanskrit language. Briefly discuss the influences of Sanskrit outside India which makes it a transboundary language. The second part of the answer should include the reference to different texts created in the course of the evolution of the language. Answer : Sanskrit is the first Aryan language which is considered the mother of many Indian Languages. It cannot be confined to one region or religion. The Sanskrit language was brought to India by the Aryans from Central Asia, who made it a part of their literature. This language was thus incorporated to become the most prominent in Hindu text and religion. The reference of Sanskrit can also be found in Zoroastrianism of Iran i.e. the Parsi religion. Latin and Greek languages are also influenced by Sanskrit and one can find common roots of certain words in these languages.One of theoldest in the world is, therefore, a transboundary language. Sanskrit as a language developed through the vast literature- Vedic and classical literature. VEDIC LITERATURE Rig Veda - written in the early Vedic period contains 1028 hymns. Most of the hymns spoke of a beautiful description of nature, universally recognized values. Yajur Veda - It gives the guidelines for performing the rites and rituals including sacrifices. Sama Veda - It the Veda of music containing 16000 ragas and raginis. Atharvaveda - It is a text containing a cure of 99 diseases and also contains spells and charms. The extended texts of Vedas were written to explain the Vedas. Brahmanas - Brief account of the Vedic rituals Aranyakas - Philosophy behind rituals Upanishad - Philosophical Concepts of Hinduism Puranas - a collection of Mythology and legend CLASSICAL LITERATURE Initial books of Sanskrit grammar - Astadhyayi by Panini; Books on Sanskrit grammar helped refine the Sanskrit language. Literature of Kalidasa - one of the most prominent writers of Sanskrit. He developed a number of plays and stories like Meghadootam, Malvikagnimitra Along with these, a number of authors developed Sanskrit by using diversified themes in literature. * Brihatsamhita - Varahmihira - cloud theory * Aryabhatiya- Aryabhatta - helio-centric theory * Lilavati- Bhaskaracharya - Mathematics The language evolved through this literature and has influenced religion, language, and culture of India.
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##Question:Why Sanskrit is considered a transboundary language? Write about the evolution of the Sanskrit language in India. (150 words/10 marks)##Answer:Approach : Introduce an answer by highlighting the importance of Sanskrit language. Briefly discuss the influences of Sanskrit outside India which makes it a transboundary language. The second part of the answer should include the reference to different texts created in the course of the evolution of the language. Answer : Sanskrit is the first Aryan language which is considered the mother of many Indian Languages. It cannot be confined to one region or religion. The Sanskrit language was brought to India by the Aryans from Central Asia, who made it a part of their literature. This language was thus incorporated to become the most prominent in Hindu text and religion. The reference of Sanskrit can also be found in Zoroastrianism of Iran i.e. the Parsi religion. Latin and Greek languages are also influenced by Sanskrit and one can find common roots of certain words in these languages.One of theoldest in the world is, therefore, a transboundary language. Sanskrit as a language developed through the vast literature- Vedic and classical literature. VEDIC LITERATURE Rig Veda - written in the early Vedic period contains 1028 hymns. Most of the hymns spoke of a beautiful description of nature, universally recognized values. Yajur Veda - It gives the guidelines for performing the rites and rituals including sacrifices. Sama Veda - It the Veda of music containing 16000 ragas and raginis. Atharvaveda - It is a text containing a cure of 99 diseases and also contains spells and charms. The extended texts of Vedas were written to explain the Vedas. Brahmanas - Brief account of the Vedic rituals Aranyakas - Philosophy behind rituals Upanishad - Philosophical Concepts of Hinduism Puranas - a collection of Mythology and legend CLASSICAL LITERATURE Initial books of Sanskrit grammar - Astadhyayi by Panini; Books on Sanskrit grammar helped refine the Sanskrit language. Literature of Kalidasa - one of the most prominent writers of Sanskrit. He developed a number of plays and stories like Meghadootam, Malvikagnimitra Along with these, a number of authors developed Sanskrit by using diversified themes in literature. * Brihatsamhita - Varahmihira - cloud theory * Aryabhatiya- Aryabhatta - helio-centric theory * Lilavati- Bhaskaracharya - Mathematics The language evolved through this literature and has influenced religion, language, and culture of India.
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सुरक्षा के विभिन्न आयामों की सूचना देते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा को परिभाषित कीजिये| इसके साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा के विभिन्न सैद्धांतिक आधारों का वर्णन कीजिये| (150 से 200 शब्द) Define national security by giving information about various dimensions of security. Along with this, describe the various theoretical bases of national security. (150 to 200 words)
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दृष्टिकोण 1- भुमिका में सुरक्षा को परिभाषित करते हुए सुरक्षा के विभिन्न आयामों की सूचना दीजिये 2- मुख्य भाग में, राष्ट्रीय सुरक्षा के विभिन्न सिद्धांतों का वर्णन कीजिए| 3- अंतिम में भारत द्वारा अपनाए गए सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए तथा इस संदर्भ में, सुझाव देते हुए उत्तर का समापन कीजिए| सुरक्षा(security) हानि से बचाव करने की क्रिया और व्यवस्था को कहते हैं। यह व्यक्ति, स्थान, वस्तु, निर्माण, निवास, देश, संगठन या ऐसी किसी भी अन्य चीज़ के सन्दर्भ में प्रयोग हो सकती है जिसे नुकसान पहुँचाया जा सकता हो। सुरक्षा को राष्ट्रीय, क्षेत्रीय एवं सामूहिक सुरक्षा के अंतर्गत वर्गीकृत किया जा सकता है| राष्ट्रीय सुरक्षा के अंतर्गत बाह्य सुरक्षा एवं आंतरिक सुरक्षा को शामिल किया जाता है| वैश्विक परिस्थितियों से सुरक्षा तथा परिधीय परिस्थितियों से सुरक्षा को बाह्य सुरक्षा का भाग माना जाता है जबकि आतंकवाद, अपराध, विकास बनाम उग्रवाद, नक्सलवाद आदि को आंतरिक सुरक्षा के अंतर्गत शामिल किया जाता है| आक्रामक सुरक्षा बनाम सुरक्षात्मक स्थिति का अध्ययन क्षेत्रीय सुरक्षा के अंतर्गत किया जाता है जबकि सामूहिक सुरक्षा का अध्ययन विदेश नीति के अंतर्गत किया जाता है| सुरक्षा के उपरोक्त आयामों के संदर्भ में भारत द्वारा उठाए गए विभिन्न क़दमों को हम राष्ट्रीय सुरक्षा के अंतर्गत रख सकते हैं|राष्ट्रीयसुरक्षा का राष्ट्रीय हित से काफी नजदीकी रिश्ताहै| राष्ट्रीय हित के अंतर्गत किसी भी संप्रभुसंपन्न राष्ट्र की वे अभिलाषाएं रखी जा सकती हैं जिन्हें वह किसी अन्य राष्ट्र के सापेक्ष में प्राप्त करना चाहता है अबतक संजोए गए मूल्यों की सुरक्षाही राष्ट्रीय सुरक्षा कहलाती है| किसी राष्ट्र के आधुनिक स्वरुप में आने में सैकड़ों वर्षों का समय लगता है जिसमें वह विभिन्न राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों से गुजरता है| इस विकास प्रक्रिया में वह निरंतर नए-नए सांस्कृतिक तथा सामाजिक मूल्यों को समाहित करते जाता है| साथ ही, अपने ऐतिहासिक मूल्यों तथा विरासत को भी निरंतर रूप से आने वाली पीढ़ियों को देने हेतु संजोकर रखता है| राष्ट्रीय सुरक्षा के अंतर्गत बाह्य सुरक्षा तथा आतंरिक परिस्थितियों से सुरक्षा को रखा जा सकता है| किसी भी देश की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति विभिन्न सिधान्तों पर आधारित हो सकती है| राष्ट्रीय सुरक्षा के सैद्धांतिक आधार यथार्थवादी सिद्धांत यह सिद्धांत, राष्ट्रीय सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए शक्ति के संचय को अनिवार्य मानता है अर्थात इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक देश को यथासंभव शक्ति संचय का प्रयास करना चाहिए यह सिद्धांत परिस्थितियों पर आधारित होता है और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए शक्तियों का विस्तार करता है इस सिद्धांत के अनुसार मानव स्वभाव मूलतः आक्रामक, ईर्ष्यालु, और महत्वाकांक्षी होता है|ऐसी स्थिति में वो विस्तार करना चाहता है| जिसके लिए यह अनिवार्य है कि वह अपनी वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन करे और तत्पश्चात अपनी सुरक्षा को सुनिश्चित करे| यथार्थवादी सिद्धांत को भी हम दो भागों में बाँट सकते हैं सुरक्षात्मक यथार्थवाद इसके अनुसार कोई राष्ट्र केवल उतनी ही सुरक्षा-शक्ति प्राप्त करना चाहेगा जिससे वह अपनी सुरक्षा कर सके|शक्ति साध्य भी हो सकती है तथा साधन भी| कमजोर राष्ट्रों के लिए शक्ति साध्य होती हैतथा उसी के अनुरूप वह अपने राष्ट्रीयसुरक्षा के विभिन्न उपायों को अपनाता है आक्रामक यथार्थवाद ताकतवर राष्ट्रों के लिए शक्ति साध्य ना होकर साधन होती है|अमेरिका के लिए शक्ति साधन है तथा उस शक्ति का प्रयोग करके वह अपनी सीमाओं की सुरक्षा मिसाइल कवच से सुनिश्चित करने के बाद दुनिया मेंअपने प्रभाव का विस्तार कर रहा है| 2000 के बाद अपनी रणनीति को बदलकर उसने संघर्षरत राष्ट्रों के मध्य हस्तक्षेप किया जैसे- ईराक पर आक्रमण| हाइड्रोकार्बन पर आधिपत्य को लेकर; व्यापार तथा दोहन को लेकर उसने मध्य एशिया में तथा अफगानिस्तान में प्रवेश किया| इसी के अनुरूप उसने राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु सिद्धांतों को बनाया| वहीँ दूसरे आयाम के रूप में हम उत्तर कोरिया को देख सकते हैं| हाइड्रोजन बम होने के बावजूद भी आर्थिक तथा सामरिक रूप से कमजोरहोने से विश्व के राष्ट्रों पर उसका कोई खास प्रभाव नहीं है| आदर्शवादी/उदारवादी सिद्धांत इसमेंसुरक्षा को मजबूत करने के लिए मानवीय मूल्यों पर बलदिया जाता है इसमें ऐसे नियमों को प्रोत्साहन दिया जाता है जिससे आपसी संघर्ष ही उत्पन ना हो| इसमें संयुक्त राष्ट्र को शक्तिशाली बनाने के आयाम ढूंढे जाते हैं ताकि राष्ट्रों के मध्य संघर्ष नहीं हो ताकि सभी राष्ट्रों काफोकस सामाजिक तथा आर्थिक विकास की ओरहो| इसमें ऐसी संरचनाएं विकसित करने पर जोर दिया जाता है जिससे पूरी दुनिया के राष्ट्र नियमित तौर पर आपसी सौहाद्र को बढ़ावा दे सकें| इसमेंवैश्विक संरचना, नियमों, मूल्यों, और मान्यताओं के विकास को प्रोत्साहितकिया जाता है जिससे राष्ट्रीय संघर्षों को कमजोर किया जा सके| शुरुआत में भारत की नीतियाँ भी आदर्शवादी सिद्धांतों को ज्यादा बढ़ावादेती थी जिसके उदाहरण के रूप में हम निम्न आयामों को देख सकते हैं- कश्मीर मामलों पर फॉरवर्ड पोजीशन में रहते हुए भी उसे संयुक्तराष्ट्र ले जाना; तिब्बत पर चीन के रुख को देखते हुए भी चीन के साथ पंचशील का सिद्धांत; पाकिस्तान की आक्रामक नीतियों के बावजूद भी सिंधु जल समझौता जैस उदारवादी कदम आदि| नारीवादी सिद्धांत आधुनिक समय के इस दृष्टिकोण के अनुसार महिलाओं की भागीदारी को राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में ज्यादा महत्व दिया गया है| राष्ट्रीय सुरक्षा के विभिन्न आयामों में महिलाओं को पुरुषों के समकक्ष बराबरी का दर्जा देना इस सिद्धांत का मूल है| आलोचनात्मक सिद्धांत किसी राष्ट्र में किसी भी वर्ग द्वारा दुसरे वर्ग का शोषण न हो सके शोषण से सुरक्षा सुनिश्चित करना ही राष्ट्रीय सुरक्षा को सुनिश्चित कर सकता है मानवीय सिद्धांत प्रत्येक प्रकार की हताशा, निराशा, व्याधि आदि से उन्मुक्ति ही राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करती है यह सिद्धांत सामाजिक आर्थिक कल्याण को महत्त्व देता है राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए मानवीय मूल्यों पर भी उतना ही जोर देना; पर्यावरणवादी सिद्धांत आज जलवायु परिवर्तन तथा वैश्विक तापन के इस दौर में राष्ट्रीय सुरक्षा को तय करते समय पर्यावरण के विभिन्न आयामों का भी महत्वपूर्ण स्थान हो गया है| इस दिशा में यूरोपीय देश काफी आगे हैं जहाँ राष्ट्रीय सुरक्षा को तय करते समय पर्यावरणीय मूल्यों तथा उसके संरक्षण को भी एक मानक के तौर पर मान्यता दी जाती है| कोई भी राष्ट्र अपनी आतंरिक तथा बाह्य परिस्थितियों के अनुसार उपरोक्त में से कोई/एक से ज्यादा सिद्धांत अपनाता है| भारत द्वारा भी विभिन्न समय में अलग-अलग सिद्धांतों को अपनाया गया है| भारत को शीतयुद्ध के दौर में महाशक्तियों द्वारा अपने पाले में लाने का प्रयास किया गया था| साथ ही,भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा भी आरंभिक तौर पर महाशक्तियों के द्वारा प्रभावित की गयी थी|
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##Question:सुरक्षा के विभिन्न आयामों की सूचना देते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा को परिभाषित कीजिये| इसके साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा के विभिन्न सैद्धांतिक आधारों का वर्णन कीजिये| (150 से 200 शब्द) Define national security by giving information about various dimensions of security. Along with this, describe the various theoretical bases of national security. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भुमिका में सुरक्षा को परिभाषित करते हुए सुरक्षा के विभिन्न आयामों की सूचना दीजिये 2- मुख्य भाग में, राष्ट्रीय सुरक्षा के विभिन्न सिद्धांतों का वर्णन कीजिए| 3- अंतिम में भारत द्वारा अपनाए गए सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए तथा इस संदर्भ में, सुझाव देते हुए उत्तर का समापन कीजिए| सुरक्षा(security) हानि से बचाव करने की क्रिया और व्यवस्था को कहते हैं। यह व्यक्ति, स्थान, वस्तु, निर्माण, निवास, देश, संगठन या ऐसी किसी भी अन्य चीज़ के सन्दर्भ में प्रयोग हो सकती है जिसे नुकसान पहुँचाया जा सकता हो। सुरक्षा को राष्ट्रीय, क्षेत्रीय एवं सामूहिक सुरक्षा के अंतर्गत वर्गीकृत किया जा सकता है| राष्ट्रीय सुरक्षा के अंतर्गत बाह्य सुरक्षा एवं आंतरिक सुरक्षा को शामिल किया जाता है| वैश्विक परिस्थितियों से सुरक्षा तथा परिधीय परिस्थितियों से सुरक्षा को बाह्य सुरक्षा का भाग माना जाता है जबकि आतंकवाद, अपराध, विकास बनाम उग्रवाद, नक्सलवाद आदि को आंतरिक सुरक्षा के अंतर्गत शामिल किया जाता है| आक्रामक सुरक्षा बनाम सुरक्षात्मक स्थिति का अध्ययन क्षेत्रीय सुरक्षा के अंतर्गत किया जाता है जबकि सामूहिक सुरक्षा का अध्ययन विदेश नीति के अंतर्गत किया जाता है| सुरक्षा के उपरोक्त आयामों के संदर्भ में भारत द्वारा उठाए गए विभिन्न क़दमों को हम राष्ट्रीय सुरक्षा के अंतर्गत रख सकते हैं|राष्ट्रीयसुरक्षा का राष्ट्रीय हित से काफी नजदीकी रिश्ताहै| राष्ट्रीय हित के अंतर्गत किसी भी संप्रभुसंपन्न राष्ट्र की वे अभिलाषाएं रखी जा सकती हैं जिन्हें वह किसी अन्य राष्ट्र के सापेक्ष में प्राप्त करना चाहता है अबतक संजोए गए मूल्यों की सुरक्षाही राष्ट्रीय सुरक्षा कहलाती है| किसी राष्ट्र के आधुनिक स्वरुप में आने में सैकड़ों वर्षों का समय लगता है जिसमें वह विभिन्न राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों से गुजरता है| इस विकास प्रक्रिया में वह निरंतर नए-नए सांस्कृतिक तथा सामाजिक मूल्यों को समाहित करते जाता है| साथ ही, अपने ऐतिहासिक मूल्यों तथा विरासत को भी निरंतर रूप से आने वाली पीढ़ियों को देने हेतु संजोकर रखता है| राष्ट्रीय सुरक्षा के अंतर्गत बाह्य सुरक्षा तथा आतंरिक परिस्थितियों से सुरक्षा को रखा जा सकता है| किसी भी देश की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति विभिन्न सिधान्तों पर आधारित हो सकती है| राष्ट्रीय सुरक्षा के सैद्धांतिक आधार यथार्थवादी सिद्धांत यह सिद्धांत, राष्ट्रीय सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए शक्ति के संचय को अनिवार्य मानता है अर्थात इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक देश को यथासंभव शक्ति संचय का प्रयास करना चाहिए यह सिद्धांत परिस्थितियों पर आधारित होता है और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए शक्तियों का विस्तार करता है इस सिद्धांत के अनुसार मानव स्वभाव मूलतः आक्रामक, ईर्ष्यालु, और महत्वाकांक्षी होता है|ऐसी स्थिति में वो विस्तार करना चाहता है| जिसके लिए यह अनिवार्य है कि वह अपनी वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन करे और तत्पश्चात अपनी सुरक्षा को सुनिश्चित करे| यथार्थवादी सिद्धांत को भी हम दो भागों में बाँट सकते हैं सुरक्षात्मक यथार्थवाद इसके अनुसार कोई राष्ट्र केवल उतनी ही सुरक्षा-शक्ति प्राप्त करना चाहेगा जिससे वह अपनी सुरक्षा कर सके|शक्ति साध्य भी हो सकती है तथा साधन भी| कमजोर राष्ट्रों के लिए शक्ति साध्य होती हैतथा उसी के अनुरूप वह अपने राष्ट्रीयसुरक्षा के विभिन्न उपायों को अपनाता है आक्रामक यथार्थवाद ताकतवर राष्ट्रों के लिए शक्ति साध्य ना होकर साधन होती है|अमेरिका के लिए शक्ति साधन है तथा उस शक्ति का प्रयोग करके वह अपनी सीमाओं की सुरक्षा मिसाइल कवच से सुनिश्चित करने के बाद दुनिया मेंअपने प्रभाव का विस्तार कर रहा है| 2000 के बाद अपनी रणनीति को बदलकर उसने संघर्षरत राष्ट्रों के मध्य हस्तक्षेप किया जैसे- ईराक पर आक्रमण| हाइड्रोकार्बन पर आधिपत्य को लेकर; व्यापार तथा दोहन को लेकर उसने मध्य एशिया में तथा अफगानिस्तान में प्रवेश किया| इसी के अनुरूप उसने राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु सिद्धांतों को बनाया| वहीँ दूसरे आयाम के रूप में हम उत्तर कोरिया को देख सकते हैं| हाइड्रोजन बम होने के बावजूद भी आर्थिक तथा सामरिक रूप से कमजोरहोने से विश्व के राष्ट्रों पर उसका कोई खास प्रभाव नहीं है| आदर्शवादी/उदारवादी सिद्धांत इसमेंसुरक्षा को मजबूत करने के लिए मानवीय मूल्यों पर बलदिया जाता है इसमें ऐसे नियमों को प्रोत्साहन दिया जाता है जिससे आपसी संघर्ष ही उत्पन ना हो| इसमें संयुक्त राष्ट्र को शक्तिशाली बनाने के आयाम ढूंढे जाते हैं ताकि राष्ट्रों के मध्य संघर्ष नहीं हो ताकि सभी राष्ट्रों काफोकस सामाजिक तथा आर्थिक विकास की ओरहो| इसमें ऐसी संरचनाएं विकसित करने पर जोर दिया जाता है जिससे पूरी दुनिया के राष्ट्र नियमित तौर पर आपसी सौहाद्र को बढ़ावा दे सकें| इसमेंवैश्विक संरचना, नियमों, मूल्यों, और मान्यताओं के विकास को प्रोत्साहितकिया जाता है जिससे राष्ट्रीय संघर्षों को कमजोर किया जा सके| शुरुआत में भारत की नीतियाँ भी आदर्शवादी सिद्धांतों को ज्यादा बढ़ावादेती थी जिसके उदाहरण के रूप में हम निम्न आयामों को देख सकते हैं- कश्मीर मामलों पर फॉरवर्ड पोजीशन में रहते हुए भी उसे संयुक्तराष्ट्र ले जाना; तिब्बत पर चीन के रुख को देखते हुए भी चीन के साथ पंचशील का सिद्धांत; पाकिस्तान की आक्रामक नीतियों के बावजूद भी सिंधु जल समझौता जैस उदारवादी कदम आदि| नारीवादी सिद्धांत आधुनिक समय के इस दृष्टिकोण के अनुसार महिलाओं की भागीदारी को राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में ज्यादा महत्व दिया गया है| राष्ट्रीय सुरक्षा के विभिन्न आयामों में महिलाओं को पुरुषों के समकक्ष बराबरी का दर्जा देना इस सिद्धांत का मूल है| आलोचनात्मक सिद्धांत किसी राष्ट्र में किसी भी वर्ग द्वारा दुसरे वर्ग का शोषण न हो सके शोषण से सुरक्षा सुनिश्चित करना ही राष्ट्रीय सुरक्षा को सुनिश्चित कर सकता है मानवीय सिद्धांत प्रत्येक प्रकार की हताशा, निराशा, व्याधि आदि से उन्मुक्ति ही राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करती है यह सिद्धांत सामाजिक आर्थिक कल्याण को महत्त्व देता है राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए मानवीय मूल्यों पर भी उतना ही जोर देना; पर्यावरणवादी सिद्धांत आज जलवायु परिवर्तन तथा वैश्विक तापन के इस दौर में राष्ट्रीय सुरक्षा को तय करते समय पर्यावरण के विभिन्न आयामों का भी महत्वपूर्ण स्थान हो गया है| इस दिशा में यूरोपीय देश काफी आगे हैं जहाँ राष्ट्रीय सुरक्षा को तय करते समय पर्यावरणीय मूल्यों तथा उसके संरक्षण को भी एक मानक के तौर पर मान्यता दी जाती है| कोई भी राष्ट्र अपनी आतंरिक तथा बाह्य परिस्थितियों के अनुसार उपरोक्त में से कोई/एक से ज्यादा सिद्धांत अपनाता है| भारत द्वारा भी विभिन्न समय में अलग-अलग सिद्धांतों को अपनाया गया है| भारत को शीतयुद्ध के दौर में महाशक्तियों द्वारा अपने पाले में लाने का प्रयास किया गया था| साथ ही,भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा भी आरंभिक तौर पर महाशक्तियों के द्वारा प्रभावित की गयी थी|
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क्या पर्यावरण संरक्षण व आर्थिक विकास साथ-साथ हो सकते हैं ?( 600 शब्द ) Can environmental protection and economic development go simultaneously ? ( 600 words )
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दृष्टिकोण : भूमिका में आर्थिक विकास व पर्यावरण के बीच के द्वंद की चर्चा कीजिये । कुछ उदाहरणों के माध्यम से समझाइए कि किस प्रकार अंधाधुन आर्थिक विकास ने पर्यावरण को क्षति पहुंचाया है । प्रश्न उपस्थित कीजिये कि क्या पर्यावरण संरक्षण व आर्थिक विकास साथ-साथ चल सकता है ? आर्थिक विकास व पर्यावरण संरक्षण दोनों को साथ-साथ चलाने से संबंधित चुनौतियों की चर्चा कीजिये । संधारणीय विकास की संकल्पना को समझाइए । संधारणीय विकास का मॉडल वर्तमान समय की आवश्यकता है , स्पष्ट कीजिये । संधारणीय विकास के कुछ प्रमुख उपकरणों की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । कुछ महान व्यक्तियों की प्रासंगिक उक्तियों की चर्चा करते हुए इस बात को संपुष्ट करें कि आर्थिक विकास व पर्यावरण संरक्षण दोनों साथ-साथ संभव है । उदाहरण के लिए महात्मा गांधी का कथन कि " प्रकृति सभी की आवश्यकता पूर्ण कर सकती है परंतु किसी के लालच की पूर्ति नहीं कर सकती " । आर्थिक विकास को बनाए हुए पर्यावरण संरक्षण की दिशा में किए जा रहे कुछ अभिनव प्रयोगों की चर्चा कीजिये । पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कुछ राष्ट्रों द्वारा किए जा रहे प्रभावी कार्यों की भी संक्षिप्त चर्चा कीजिये । निष्कर्ष में यह बताइये कि यद्पि आर्थिक विकास व पर्यावरण संरक्षण का कार्य साथ-साथ कर पाना चुनौतीपूर्ण परंतु असंभव नहीं । साथ ही यह भी स्पष्ट कीजिये कि यदि अब भी पर्यावरण संरक्षण के महत्व को समझते हुए विकास का संधारणीय मॉडल नहीं अपनाया गया तो पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा ।
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##Question:क्या पर्यावरण संरक्षण व आर्थिक विकास साथ-साथ हो सकते हैं ?( 600 शब्द ) Can environmental protection and economic development go simultaneously ? ( 600 words ) ##Answer:दृष्टिकोण : भूमिका में आर्थिक विकास व पर्यावरण के बीच के द्वंद की चर्चा कीजिये । कुछ उदाहरणों के माध्यम से समझाइए कि किस प्रकार अंधाधुन आर्थिक विकास ने पर्यावरण को क्षति पहुंचाया है । प्रश्न उपस्थित कीजिये कि क्या पर्यावरण संरक्षण व आर्थिक विकास साथ-साथ चल सकता है ? आर्थिक विकास व पर्यावरण संरक्षण दोनों को साथ-साथ चलाने से संबंधित चुनौतियों की चर्चा कीजिये । संधारणीय विकास की संकल्पना को समझाइए । संधारणीय विकास का मॉडल वर्तमान समय की आवश्यकता है , स्पष्ट कीजिये । संधारणीय विकास के कुछ प्रमुख उपकरणों की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । कुछ महान व्यक्तियों की प्रासंगिक उक्तियों की चर्चा करते हुए इस बात को संपुष्ट करें कि आर्थिक विकास व पर्यावरण संरक्षण दोनों साथ-साथ संभव है । उदाहरण के लिए महात्मा गांधी का कथन कि " प्रकृति सभी की आवश्यकता पूर्ण कर सकती है परंतु किसी के लालच की पूर्ति नहीं कर सकती " । आर्थिक विकास को बनाए हुए पर्यावरण संरक्षण की दिशा में किए जा रहे कुछ अभिनव प्रयोगों की चर्चा कीजिये । पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कुछ राष्ट्रों द्वारा किए जा रहे प्रभावी कार्यों की भी संक्षिप्त चर्चा कीजिये । निष्कर्ष में यह बताइये कि यद्पि आर्थिक विकास व पर्यावरण संरक्षण का कार्य साथ-साथ कर पाना चुनौतीपूर्ण परंतु असंभव नहीं । साथ ही यह भी स्पष्ट कीजिये कि यदि अब भी पर्यावरण संरक्षण के महत्व को समझते हुए विकास का संधारणीय मॉडल नहीं अपनाया गया तो पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा ।
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The lifecycle of a joint family depend upon economic factors rather than social factors. Discuss (150 words)
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BRIEF APPROACH: - INTRODUCTION The introduction must be followed by an inter-linking paragraph (it makes the answer more effective that way- as per Smriti Ma’am) - THE SOCIAL FACTORS I THE SOCIAL FACTORS CAUSING THE DISINTEGRATION OF JOINT FAMILIES II THE SOCIAL FACTORS CAUSING THE RE-INTEGRATION OF JOINT FAMILIES - THE ECONOMIC FACTORS I THE ECONOMIC FACTORS CAUSING THE DISINTEGRATION OF JOINT FAMILIES II THE ECONOMIC FACTORS CAUSING THE RE-INTEGRATION OF JOINT FAMILIES - CONCLUSION - (The viewpoint of the sociologists) ANSWER: A joint family is a social group consisting of people united by ties of blood, marriage or adoption. It extends for 2 or more generations. It is characterized by common residence, economic cooperation and performs the function of sexual gratification.However, not all families remain joint forever. They undergo a transition/ life-cycle- from a joint family to a nuclear family (disintegration) and then from a nuclear family to a joint family (re-integration).There are mainly two factors behind this, economic and social. THE SOCIAL FACTORS I THE SOCIAL FACTORS CAUSING THE DISINTEGRATION OF JOINT FAMILIES 1)URBANISATION - It leads to a new family system, compatible with the urban value systems. 2)MIGRATION - Urbanisation also leads to migration. 2.1) Better status of women, patriarchy in the villages forces people to migrate to the cities. II THE SOCIAL FACTORS CAUSING THE RE-INTEGRATION OF JOINT FAMILIES 1 )RETENTION OF THE JOINT FAMILY ETHICS- The joint family ethics are still retained even after moving into the cities. For example, the involvement of family members in functions and ceremonies. 2)THE ‘HOUSEHOLD’ THEORY - When joint families disintegrate into nuclear ones, only the common residence and commonsality (inter-dining) i.e. two characteristics of joint families, go missing. There is still much dependence on the joint families- they still have the right to inheritance etc. Hence, sociologists got confused and then evolved a term ‘households’ which include only these 2 factors. Hence, we can conclude that it is the joint households which are getting disintegrated and not the joint families. 3)BETTER VALUES IN THE CHILD - The parents, aspiring to inculcate better value systems in their children, prefer that their parents (read the child’s grandparents) come and live with them in the cities. Although social factors affect the life-cycle of a joint family, yet, the economic factors dominate. THE ECONOMIC FACTORS I THE ECONOMIC FACTORS CAUSING THE DISINTEGRATION OF JOINT FAMILIES 1)LACK OF OPPORTUNITIES - The lack of opportunities wrt skilled development, opportunities and jobs forces people to move apart from their bigger joint families, and live separately as small nuclear families wherever the economic opportunities attract them. 2)MIGRATION - Urbanisation also leads to migration. There are basically 2 types of factors: 2.1) Push factors - Agricultural distress- the per-capita availability of cultivable land is declining, lack of remunerative character of the agricultural sector, lack of alternative employment opportunities, lack of basic infra wrt education, health and skills, population pressure push the people out of the villages. 2.2) Pull factors - Urbanisation, globalization, industrialization pull the people to the cities and force them to live as nuclear families. II THE ECONOMIC FACTORS CAUSING THE RE-INTEGRATION OF JOINT FAMILIES 1)CHAIN MIGRATION ALONG WITH A HIGH COST OF LIVING - If one person migrates in the family, then eventually the entire family ends up migrating. This way, they are unable to afford separate households. Hence, they live together as joint families. 2)CHILD REARING IN A DUAL CAREER FAMILY - The cost of being able to afford domestic labour is quite high in the cities. Hence, parents prefer that in the wake of both the parents working, the grandparents come and look after the child. 3)THE ECONOMIC FACTOR - Industrialisation provides an economic basis for sustaining the joint family. Therefore, rather than the joint families breaking, it is just the households that disintegrate. This leads to the re-integration of the joint families that had disintegrated.
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##Question:The lifecycle of a joint family depend upon economic factors rather than social factors. Discuss (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: - INTRODUCTION The introduction must be followed by an inter-linking paragraph (it makes the answer more effective that way- as per Smriti Ma’am) - THE SOCIAL FACTORS I THE SOCIAL FACTORS CAUSING THE DISINTEGRATION OF JOINT FAMILIES II THE SOCIAL FACTORS CAUSING THE RE-INTEGRATION OF JOINT FAMILIES - THE ECONOMIC FACTORS I THE ECONOMIC FACTORS CAUSING THE DISINTEGRATION OF JOINT FAMILIES II THE ECONOMIC FACTORS CAUSING THE RE-INTEGRATION OF JOINT FAMILIES - CONCLUSION - (The viewpoint of the sociologists) ANSWER: A joint family is a social group consisting of people united by ties of blood, marriage or adoption. It extends for 2 or more generations. It is characterized by common residence, economic cooperation and performs the function of sexual gratification.However, not all families remain joint forever. They undergo a transition/ life-cycle- from a joint family to a nuclear family (disintegration) and then from a nuclear family to a joint family (re-integration).There are mainly two factors behind this, economic and social. THE SOCIAL FACTORS I THE SOCIAL FACTORS CAUSING THE DISINTEGRATION OF JOINT FAMILIES 1)URBANISATION - It leads to a new family system, compatible with the urban value systems. 2)MIGRATION - Urbanisation also leads to migration. 2.1) Better status of women, patriarchy in the villages forces people to migrate to the cities. II THE SOCIAL FACTORS CAUSING THE RE-INTEGRATION OF JOINT FAMILIES 1 )RETENTION OF THE JOINT FAMILY ETHICS- The joint family ethics are still retained even after moving into the cities. For example, the involvement of family members in functions and ceremonies. 2)THE ‘HOUSEHOLD’ THEORY - When joint families disintegrate into nuclear ones, only the common residence and commonsality (inter-dining) i.e. two characteristics of joint families, go missing. There is still much dependence on the joint families- they still have the right to inheritance etc. Hence, sociologists got confused and then evolved a term ‘households’ which include only these 2 factors. Hence, we can conclude that it is the joint households which are getting disintegrated and not the joint families. 3)BETTER VALUES IN THE CHILD - The parents, aspiring to inculcate better value systems in their children, prefer that their parents (read the child’s grandparents) come and live with them in the cities. Although social factors affect the life-cycle of a joint family, yet, the economic factors dominate. THE ECONOMIC FACTORS I THE ECONOMIC FACTORS CAUSING THE DISINTEGRATION OF JOINT FAMILIES 1)LACK OF OPPORTUNITIES - The lack of opportunities wrt skilled development, opportunities and jobs forces people to move apart from their bigger joint families, and live separately as small nuclear families wherever the economic opportunities attract them. 2)MIGRATION - Urbanisation also leads to migration. There are basically 2 types of factors: 2.1) Push factors - Agricultural distress- the per-capita availability of cultivable land is declining, lack of remunerative character of the agricultural sector, lack of alternative employment opportunities, lack of basic infra wrt education, health and skills, population pressure push the people out of the villages. 2.2) Pull factors - Urbanisation, globalization, industrialization pull the people to the cities and force them to live as nuclear families. II THE ECONOMIC FACTORS CAUSING THE RE-INTEGRATION OF JOINT FAMILIES 1)CHAIN MIGRATION ALONG WITH A HIGH COST OF LIVING - If one person migrates in the family, then eventually the entire family ends up migrating. This way, they are unable to afford separate households. Hence, they live together as joint families. 2)CHILD REARING IN A DUAL CAREER FAMILY - The cost of being able to afford domestic labour is quite high in the cities. Hence, parents prefer that in the wake of both the parents working, the grandparents come and look after the child. 3)THE ECONOMIC FACTOR - Industrialisation provides an economic basis for sustaining the joint family. Therefore, rather than the joint families breaking, it is just the households that disintegrate. This leads to the re-integration of the joint families that had disintegrated.
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क्षेत्रवाद से आप क्या समझते हैं? भारतीय संदर्भों में क्षेत्रवाद का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (150-200 शब्द) What do you understand by regionalism? Critically examine regionalism in Indian contexts. (150-200 words)
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Approach: भूमिका में क्षेत्रवाद को परिभाषित कर सकते हैं। क्षेत्रवाद की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। भारतीय संदर्भ में क्षेत्रवाद के सकारात्मकमहत्व चर्चा कीजिए। क्षेत्रवाद से उत्पन्न खतरों की उदाहरण सहित चर्चा कीजिए। निष्कर्ष में क्षेत्रवाद से चर्चा खतरों को कम करनेके उपायोंकी चर्चा कर सकते हैं। उत्तर - साधारण शब्दों मेंक्षेत्रवादअपने क्षेत्र के पृथक अस्तित्व के लिए जन्मी भावना है। क्षेत्रवाद अपने क्षेत्र के प्रति उच्च भावना तथा निम्न भावना से जन्म सकता है।उच्च भावना से आर्थिक, राजनैतिक व सामाजिक कारणों से क्षेत्रवाद का जन्म हो सकता है।क्षेत्रवाद से तात्पर्य किसी दिये गए क्षेत्र के समाज के लोगों में अन्य समाजों के प्रति पूर्वगृह आधारित नकारात्मक दृष्टिकोण से है।इसके परिणामस्वरूप संवादहीनता एवं सामाजिक दूरी पनपती है। यद्यपि क्षेत्रवाद का उपयोग नकारात्मक संदर्भों में किया जाता है परंतु कभी कभी कुछ विचारक इसे सकारात्मक व नकारात्मक क्षेत्रवाद में भी विभक्त करते हैं। भारत में भी क्षेत्रवाद सकारात्मक व नकारात्मक अर्थों में विद्यमान है। भारत में सकारात्मक अर्थों में क्षेत्रवाद- सकारात्मक क्षेत्रवाद से तात्पर्य किसी क्षेत्र विशेष में रहने वाले लोगों का स्वयं की संस्कृति एवं भाषा के संवर्द्धन एवं संरक्षण की प्रवृति से है। कभी कभी इसे उपराष्ट्रवाद की संज्ञा भी दी जाती है। सकारात्मक पहलुओं के संदर्भ में इसमें नृजातीय, भाषा, धर्म इत्यादि पहचान को सुदृढ़ करने की तीव्र इच्छा अंतर्निहित होती है। उदाहरण के लिए बिहार, उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल तथा मध्य प्रदेश के दूरस्थ क्षेत्रों तक विस्तृत भूतपूर्व झारखंड आंदोलन ने स्वयं को सामाजिक-आर्थिक तथा राजनीतिक हितों की रक्षा और प्रोत्साहन के लिए एक एकीकृत समूह के रूप में संगठित किया। अंतत: आंदोलन सरकार को राज्यों का पुनर्गठन करने हेतु विवश करने में सफल रहा। नकारात्मक क्षेत्रवाद वहीं नकारात्मक क्षेत्रवाद से तात्पर्य पूर्वागृह आधारित सामाजिक दूरी एवं द्वैष से है जिसके अंतर्गत एक क्षेत्र विशेष के लोग अन्य के प्रति असहिष्णुता का भाव रखते हों। यह क्षेत्रवाद निम्न 6 कारणों से प्रकट हो सकता है - आर्थिक उच्च भावना से जन्म क्षेत्रवाद - खालिस्तान आर्थिक निम्न भावना से जन्मा क्षेत्रवाद - तेलंगाना, उत्तराखंड, झारखंड राजनैतिक उच्च भावना से जन्मा क्षेत्रवाद - मराठवाड़, गौरखालैंड राजनैतिक हीन भावना से जन्म क्षेत्रवाद - जम्मू कश्मीर सामाजिक उच्च भावना से जन्मा क्षेत्रवाद - तमिल नाडु में हिंदी विरोधी दृष्टिकोण सामाजिक स्तर पर हीन भावना से जन्मा क्षेत्रवाद - पूर्वोत्तर राज्यों में किसी भी समाज के लिए यद्यपि सकारात्मक क्षेत्रवाद जिसमें विविधता की स्वीकार्यता हो, लाभदायक होता है। नकारात्मक क्षेत्रवाद सदैव आर्थिक सामाजिक प्रगति में बाधक होते हैं। क्षेत्रवाद के नकारात्मक एवं राष्ट्रीय एकता में बाधक तत्व के रूप में रूप में प्रभाव कम करने हेतु राष्ट्रीय पहचान के साथ साथ क्षेत्रीय पहचान को पर्याप्त महत्व दिया जाना चाहिए। राष्ट्रीयता एवं राष्ट्रीय एकता के नाम पर क्षेत्रीय पहचान से दूरी बनाने हेतु प्रेरित करने की बजाय क्षेत्रीय पहचान के अखिल भारतीय संस्कारण पर महत्व दिया जाना चाहिए। एक क्षेत्र की पहचान को अन्य क्षेत्रों में भी महत्व मिलने पर परस्परिक समन्वय में वृद्धि होगी।
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##Question:क्षेत्रवाद से आप क्या समझते हैं? भारतीय संदर्भों में क्षेत्रवाद का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (150-200 शब्द) What do you understand by regionalism? Critically examine regionalism in Indian contexts. (150-200 words)##Answer:Approach: भूमिका में क्षेत्रवाद को परिभाषित कर सकते हैं। क्षेत्रवाद की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। भारतीय संदर्भ में क्षेत्रवाद के सकारात्मकमहत्व चर्चा कीजिए। क्षेत्रवाद से उत्पन्न खतरों की उदाहरण सहित चर्चा कीजिए। निष्कर्ष में क्षेत्रवाद से चर्चा खतरों को कम करनेके उपायोंकी चर्चा कर सकते हैं। उत्तर - साधारण शब्दों मेंक्षेत्रवादअपने क्षेत्र के पृथक अस्तित्व के लिए जन्मी भावना है। क्षेत्रवाद अपने क्षेत्र के प्रति उच्च भावना तथा निम्न भावना से जन्म सकता है।उच्च भावना से आर्थिक, राजनैतिक व सामाजिक कारणों से क्षेत्रवाद का जन्म हो सकता है।क्षेत्रवाद से तात्पर्य किसी दिये गए क्षेत्र के समाज के लोगों में अन्य समाजों के प्रति पूर्वगृह आधारित नकारात्मक दृष्टिकोण से है।इसके परिणामस्वरूप संवादहीनता एवं सामाजिक दूरी पनपती है। यद्यपि क्षेत्रवाद का उपयोग नकारात्मक संदर्भों में किया जाता है परंतु कभी कभी कुछ विचारक इसे सकारात्मक व नकारात्मक क्षेत्रवाद में भी विभक्त करते हैं। भारत में भी क्षेत्रवाद सकारात्मक व नकारात्मक अर्थों में विद्यमान है। भारत में सकारात्मक अर्थों में क्षेत्रवाद- सकारात्मक क्षेत्रवाद से तात्पर्य किसी क्षेत्र विशेष में रहने वाले लोगों का स्वयं की संस्कृति एवं भाषा के संवर्द्धन एवं संरक्षण की प्रवृति से है। कभी कभी इसे उपराष्ट्रवाद की संज्ञा भी दी जाती है। सकारात्मक पहलुओं के संदर्भ में इसमें नृजातीय, भाषा, धर्म इत्यादि पहचान को सुदृढ़ करने की तीव्र इच्छा अंतर्निहित होती है। उदाहरण के लिए बिहार, उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल तथा मध्य प्रदेश के दूरस्थ क्षेत्रों तक विस्तृत भूतपूर्व झारखंड आंदोलन ने स्वयं को सामाजिक-आर्थिक तथा राजनीतिक हितों की रक्षा और प्रोत्साहन के लिए एक एकीकृत समूह के रूप में संगठित किया। अंतत: आंदोलन सरकार को राज्यों का पुनर्गठन करने हेतु विवश करने में सफल रहा। नकारात्मक क्षेत्रवाद वहीं नकारात्मक क्षेत्रवाद से तात्पर्य पूर्वागृह आधारित सामाजिक दूरी एवं द्वैष से है जिसके अंतर्गत एक क्षेत्र विशेष के लोग अन्य के प्रति असहिष्णुता का भाव रखते हों। यह क्षेत्रवाद निम्न 6 कारणों से प्रकट हो सकता है - आर्थिक उच्च भावना से जन्म क्षेत्रवाद - खालिस्तान आर्थिक निम्न भावना से जन्मा क्षेत्रवाद - तेलंगाना, उत्तराखंड, झारखंड राजनैतिक उच्च भावना से जन्मा क्षेत्रवाद - मराठवाड़, गौरखालैंड राजनैतिक हीन भावना से जन्म क्षेत्रवाद - जम्मू कश्मीर सामाजिक उच्च भावना से जन्मा क्षेत्रवाद - तमिल नाडु में हिंदी विरोधी दृष्टिकोण सामाजिक स्तर पर हीन भावना से जन्मा क्षेत्रवाद - पूर्वोत्तर राज्यों में किसी भी समाज के लिए यद्यपि सकारात्मक क्षेत्रवाद जिसमें विविधता की स्वीकार्यता हो, लाभदायक होता है। नकारात्मक क्षेत्रवाद सदैव आर्थिक सामाजिक प्रगति में बाधक होते हैं। क्षेत्रवाद के नकारात्मक एवं राष्ट्रीय एकता में बाधक तत्व के रूप में रूप में प्रभाव कम करने हेतु राष्ट्रीय पहचान के साथ साथ क्षेत्रीय पहचान को पर्याप्त महत्व दिया जाना चाहिए। राष्ट्रीयता एवं राष्ट्रीय एकता के नाम पर क्षेत्रीय पहचान से दूरी बनाने हेतु प्रेरित करने की बजाय क्षेत्रीय पहचान के अखिल भारतीय संस्कारण पर महत्व दिया जाना चाहिए। एक क्षेत्र की पहचान को अन्य क्षेत्रों में भी महत्व मिलने पर परस्परिक समन्वय में वृद्धि होगी।
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Relations between India and Russia have witnessed a transformation in recent years. However many argue that these ties are not as formidable as traditionally they were. Critically Discuss. (150 words/10 Marks)
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Approach: Introduction: A brief introduction to India and Russia relations. Body: Discuss the cooperation between India and Russia in different sectors. Explain the decline in India and Russia relations in the present context. Conclusion: Give a balanced conclusion suggesting a way forward. Model Answer: Relations with Russia are a key pillar of India"s foreign policy, and Russia has been a longstanding time-tested partner of India. With thesigning of “Declaration on the India-Russia Strategic Partnership” in 2000, India-Russia ties have acquired a qualitatively new character with enhanced levels of cooperation in almost all areas of the bilateral relationship including political, security, trade and economy, defense, science and technology, and culture. India and Russia as formidable partners: Nuclear cooperation: Russia is an important partner in peaceful uses of nuclear energy and it recognizes India as a country with advanced nuclear technology with an impeccable non-proliferation record. For example, Russia is associated with building the Kudankulam nuclear power project, Space Cooperation: India-Russia cooperation in the field of peaceful uses of outer space dates back to about four decades. For example, the launch of India’s first satellite “Aryabhatt” was on a Russian (then USSR) launch vehicle ‘Soyuz.’ Energy Cooperation: Indo-Russian energy cooperation acquired new dimensions in the post-Soviet period, particularly in the hydrocarbon and nuclear sectors. For example, India has invested $2.8 billion in the Sakhalin-1 project, controlling 20 percent stakes in the venture and has purchased Imperial Energy, London-listed oil major in the Tomsk region. Defense Cooperation: India-Russia military-technical cooperation has evolved from a simple buyer-seller framework to one involving joint research, development, and production of advanced defense technologies and systems like BrahMos Missile System, Joint development of the Fifth-Generation Fighter Aircraft and the Multi Transport Aircraft, as well as the licensed production in India of SU-30 aircraft and T-90 tanks. Cultural Cooperation: Indian Community in the Russian Federation is estimated at about 14,500. There are regular cultural initiatives to promote people-to-people contacts between India and Russia, including reciprocal Years of each other’s’ culture. About 500 Indian businessmen reside in Russia out of which around 200 work in Moscow. An estimated 300 registered Indian companies operate in Russia. However, there was a decline in Indo-Russia cooperation in the present context as observed from the following: Russia downgrading its military-technical relationship with India from that of an exclusive partner to a preferred partner. Russian military export overtures towards Pakistan are now perceptible. In a noteworthy development, Russia recently decided to supply Mi-35 Hind attack helicopters to Pakistan. Prior to this, Moscow had refrained from supplying lethal military equipment to Pakistan on account of New Delhi’s strained relationship with Islamabad-the legacy of this Indo-Russian military exclusivity can be traced all the way back to the Indo-Soviet Treaty of Friendship, Cooperation, and Peace of 1971. India conducts more military exercises with the U.S than any other country. The common apprehension that India and Russia shared with regards to the long borders they shared with China seems to have lost its significance for Russia, as Russia expands its economic, political, and security ties with China. The changing geopolitical scenario in the present day world bound to increase such shifting of affinities. Despite this, India and Russia should work on improving their economic and cultural cooperations along with other potential areas like the exploration of the hydrocarbons in Russia"s the Far East. The recent announcement of India"s line of credit worth $1 billion to Russia"s the Far East is a step in the right direction.
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##Question:Relations between India and Russia have witnessed a transformation in recent years. However many argue that these ties are not as formidable as traditionally they were. Critically Discuss. (150 words/10 Marks)##Answer:Approach: Introduction: A brief introduction to India and Russia relations. Body: Discuss the cooperation between India and Russia in different sectors. Explain the decline in India and Russia relations in the present context. Conclusion: Give a balanced conclusion suggesting a way forward. Model Answer: Relations with Russia are a key pillar of India"s foreign policy, and Russia has been a longstanding time-tested partner of India. With thesigning of “Declaration on the India-Russia Strategic Partnership” in 2000, India-Russia ties have acquired a qualitatively new character with enhanced levels of cooperation in almost all areas of the bilateral relationship including political, security, trade and economy, defense, science and technology, and culture. India and Russia as formidable partners: Nuclear cooperation: Russia is an important partner in peaceful uses of nuclear energy and it recognizes India as a country with advanced nuclear technology with an impeccable non-proliferation record. For example, Russia is associated with building the Kudankulam nuclear power project, Space Cooperation: India-Russia cooperation in the field of peaceful uses of outer space dates back to about four decades. For example, the launch of India’s first satellite “Aryabhatt” was on a Russian (then USSR) launch vehicle ‘Soyuz.’ Energy Cooperation: Indo-Russian energy cooperation acquired new dimensions in the post-Soviet period, particularly in the hydrocarbon and nuclear sectors. For example, India has invested $2.8 billion in the Sakhalin-1 project, controlling 20 percent stakes in the venture and has purchased Imperial Energy, London-listed oil major in the Tomsk region. Defense Cooperation: India-Russia military-technical cooperation has evolved from a simple buyer-seller framework to one involving joint research, development, and production of advanced defense technologies and systems like BrahMos Missile System, Joint development of the Fifth-Generation Fighter Aircraft and the Multi Transport Aircraft, as well as the licensed production in India of SU-30 aircraft and T-90 tanks. Cultural Cooperation: Indian Community in the Russian Federation is estimated at about 14,500. There are regular cultural initiatives to promote people-to-people contacts between India and Russia, including reciprocal Years of each other’s’ culture. About 500 Indian businessmen reside in Russia out of which around 200 work in Moscow. An estimated 300 registered Indian companies operate in Russia. However, there was a decline in Indo-Russia cooperation in the present context as observed from the following: Russia downgrading its military-technical relationship with India from that of an exclusive partner to a preferred partner. Russian military export overtures towards Pakistan are now perceptible. In a noteworthy development, Russia recently decided to supply Mi-35 Hind attack helicopters to Pakistan. Prior to this, Moscow had refrained from supplying lethal military equipment to Pakistan on account of New Delhi’s strained relationship with Islamabad-the legacy of this Indo-Russian military exclusivity can be traced all the way back to the Indo-Soviet Treaty of Friendship, Cooperation, and Peace of 1971. India conducts more military exercises with the U.S than any other country. The common apprehension that India and Russia shared with regards to the long borders they shared with China seems to have lost its significance for Russia, as Russia expands its economic, political, and security ties with China. The changing geopolitical scenario in the present day world bound to increase such shifting of affinities. Despite this, India and Russia should work on improving their economic and cultural cooperations along with other potential areas like the exploration of the hydrocarbons in Russia"s the Far East. The recent announcement of India"s line of credit worth $1 billion to Russia"s the Far East is a step in the right direction.
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सरक्रीक क्षेत्र के बढ़ते सामरिक-आर्थिक महत्त्व ने भारत को सरक्रीक क्षेत्र में बेहतर सीमा प्रबंधन के लिए सक्रिय किया है| चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द/10 अंक) The increasing strategic-economic importance of the Sir Creek region has enabled India to have better border management in the Sir Creek region. Discuss (150 to 200 Words/ 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में सरक्रीक क्षेत्र के बारे जानकारी देते हुए विवाद को समझाइये 2- प्रथम भाग में सरक्रीक क्षेत्र के सामारिक आर्थिक महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में सरक्रीक सीमा प्रबंधन में भारत की बढ़ती सक्रियता को कुछ तथ्यों के साथ प्रस्तुत कीजिए| 4- उपरोक्त संदर्भ में सुझाव देते हुए उत्तर का समापन कीजिए| सरक्रीक क्षेत्र भारत केगुजरात एवं पाकिस्तान के सिंध प्रांत के मध्य 96 किलोमीटर लंबी एस्चुयरीक्षेत्र है| इस विवाद की जड़ मेंआज़ादी पूर्व बंबई सरकार का एक निर्णयथा| आज़ादी से पहले बंबई प्रेसिडेंसी में हीकच्छ तथा सिंध प्रोविंसशामिल थें| सरक्रीक(तत्कालीन वाणगंगा क्षेत्र) पर दोनों के मध्य विवाद होने पर1914 में बंबई प्रेसिडेंसी को मध्यस्थताकरनी पड़ी थी|1914 में बंबई सरकार के एक निर्णय केदो विरोधाभासी अनुच्छेदोंके प्रावधान के कारण भारत एवं पाकिस्तान सरक्रीक के हिस्से पर अपनी दावेदारी जताते हैं| इस निर्णय केअनुच्छेद 9में कहा गया था किकच्छ एवं सिंध केबीच की सीमा क्रीक के पूर्वमें है जिसका तात्पर्य है कि यह क्रीक सिंध से संबंधित है| अतः यह पाकिस्तान के अधिकार क्षेत्र में आता है| वहीं दूसरी ओर,अनुच्छेद 10में कहा गया है कि चूँकि सर क्रीक वर्षभर नौगम्य/जहाजों के चलने योग्य है अतःअंतरराष्ट्रीय कानून एवं थालवेग के सिद्धांतके अनुसारयह सीमा नौगम्य चैनल के बीच सेतय की जा सकती है| इसका अर्थ यह हुआ कि इसे सिंध एवं कच्छ के बीच विभाजित किया गया है अर्थात भारत एवं पाकिस्तान के मध्य| यही भारत के दावे का आधार है जिसकी 1925 केएक मानचित्र से भी पुष्टि होती है| सरक्रीक क्षेत्र का बढ़ता सामरिक आर्थिक महत्त्व मत्स्यन क्षेत्र सरक्रीक क्षेत्र भारत व पाकिस्तान दोनों देश के मछुआरों के लिए मछली पकड़ने का एक बड़ा स्थान है| सर क्रीक को एशिया के सबसे बड़े मत्स्यन क्षेत्रों में से एक माना जाता है| अत्यधिक मछलियों की लालसा में उनकी नौकाएं सीमाओं के आर-पार चली जाती हैं तथा दूसरे देश के सीमारक्षकों के द्वारा पकड़ ली जाती हैं| हाइड्रोकार्बन की उपलब्धता दोनों देशों के लिए इसक्षेत्र पर विवाद में उलझने का एक महत्वपूर्ण कारण समुद्र के नीचे प्रचुर मात्रा में तेल एवं गैस का संभावित संकेंद्रण है| हालांकि विवादों के कारण इसका वर्तमान में उपयोग नहीं हो पा रहा है| नशीली दवाओं की तस्करी सरक्रीक के विवादित समुद्री क्षेत्र में टेलीफोन वार्तालापों से इस क्षेत्र में नशीली दवाओं के उत्पादक संघों के सक्रिय होने का संकेत मिलता है| यह क्षेत्र दुनिया के सबसे सक्रिय नशीली दवाओं के व्यापार केंद्र के रूप में भी एक हो सकता है| सामरिक सुरक्षा तथा सुरक्षा संबंधी मुद्दे सरक्रीक क्षेत्र की भौतिक अवस्थिति में भी हाल के समय में परिवर्तन आया है| नवंबर 2008 में मुंबई आतंकवादी हमलेके बाद से समुद्री सुरक्षा की चिंताएं भी बढ़ी है| मुंबई में हमला करने के लिए इसका उपयोग किया गया था| भारत द्वाराचाबहार बंदरगाह को सुरक्षित करने हेतुभी यह क्षेत्र काफी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है| ग्वादर बंदरगाह में चीन की बढ़ती भूमिका तथा अरब सागर में चीन के बढ़ रहे हस्तक्षेपको देखते हुए भी सरक्रीक क्षेत्र की महता और ज्यादा बढ़ जाती है| उपरोक्त महत्त्व को देखते हुए भारत सरकार ने सीमा प्रबंधन में अनेक चुनौतियों के होते हुए भी बेहतर सीमा प्रबंधन करने के प्रयास किये हैं| सरक्रीक सीमा प्रबंधन में भारत की बढती सक्रियता 2004 में अटल बिहारी वाजपेई सरकार के नेतृत्व में आरंभ होने वाले भारत-पाकिस्तान समग्र वार्ता के दौरान यह महत्वपूर्ण विषयों में से एक था| सर क्रीक के संदर्भ में दोनों देशों के बीच कई दौर की वार्ता भी हुई है तथा दोनों देशों ने संयुक्त सर्वेक्षण भी किया है| साथ ही,अपने संबंधित स्थितियों को दिखाते हुए दोनों देशों ने मानचित्रों का आदान प्रदानभी किया है| भारत वर्ष 2015 के बाद से यहाँसंरचनात्मक विकास को बढ़ावादे रहा है| BSF जवानों के आवागमन हेतु रोड, रेल की सुविधाएँ और संचार हेतु फ़ोन लिंक्स बढ़ाये जा रहे हैं| यहाँ लगभग50 नए हेलिपैड बनाने की योजनाहै और एकत्वरित लैंडिंग एयरपोर्टबनाया जा रहा है| सैनिकों के संतुष्टि स्तर को मजबूत करने के लिए समस्त आवश्यक सुविधाओं से गेस्टहाउस बनाए जा रहे हैं| बॉर्डर पर ऑब्जरवेशन पोस्ट रूमबनाए जा रहें हैं ताकि सैनिकों को लू जैसी समस्याओं से मुक्त रखा जाए| वर्ष 2015 में यह घोषणा की गयी थी किआधुनिक मानवरहित हवाई वाहन तथा ऑल टेरन वाहनशीघ्र ही सुरक्षा बलों को उपलब्ध करवाए जायेंगे ताकि वे दलदली भूमि की निगरानी में अधिक सक्षम हो पाएं सीमा प्रबंधन तथा आतंरिक सुरक्षा की दृष्टि से होने वालेसम्मेलनों को सीमावर्ती क्षेत्रों में आयोजित किया जा रहा है| जुलाई 2018 में कच्छ में शीर्ष पुलिस अधिकारियों का अखिल भारतीय सम्मेलनबुलाया गया जिसमें प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के साथ सीबीआई, आईबी, बीएसएफ, सीआरपीएफ जैसे अर्धसैनिक बल भी उपस्थित रहें| इस सम्मेलन का उद्देश्य आइएस के विस्तार को रोकना और भारतीय मुसलमानों तक इसकी पहुँच को बढ़ने से रोकना था| सरक्रीक क्षेत्र के आर्थिक, सामरिक तथा रणनीतिक महत्व को देखते हुए भारत को और ज्यादा प्रो-एक्टिव रहने की आवश्यकता है| इस मुद्दे के अभी भी अनसुलझा रहने के कारण भारत को यहाँ सीमा-प्रबंधन में नवीनतम उपायों को शामिल करना होगा जैसे- रिमोट सेंसिंग का उपयोग; उपग्रहों का उपयोग; क्षेत्र की मौसमी स्थितियों को देखते हुए एक स्थानीय रणनीति बनाना आदि|
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##Question:सरक्रीक क्षेत्र के बढ़ते सामरिक-आर्थिक महत्त्व ने भारत को सरक्रीक क्षेत्र में बेहतर सीमा प्रबंधन के लिए सक्रिय किया है| चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द/10 अंक) The increasing strategic-economic importance of the Sir Creek region has enabled India to have better border management in the Sir Creek region. Discuss (150 to 200 Words/ 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में सरक्रीक क्षेत्र के बारे जानकारी देते हुए विवाद को समझाइये 2- प्रथम भाग में सरक्रीक क्षेत्र के सामारिक आर्थिक महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में सरक्रीक सीमा प्रबंधन में भारत की बढ़ती सक्रियता को कुछ तथ्यों के साथ प्रस्तुत कीजिए| 4- उपरोक्त संदर्भ में सुझाव देते हुए उत्तर का समापन कीजिए| सरक्रीक क्षेत्र भारत केगुजरात एवं पाकिस्तान के सिंध प्रांत के मध्य 96 किलोमीटर लंबी एस्चुयरीक्षेत्र है| इस विवाद की जड़ मेंआज़ादी पूर्व बंबई सरकार का एक निर्णयथा| आज़ादी से पहले बंबई प्रेसिडेंसी में हीकच्छ तथा सिंध प्रोविंसशामिल थें| सरक्रीक(तत्कालीन वाणगंगा क्षेत्र) पर दोनों के मध्य विवाद होने पर1914 में बंबई प्रेसिडेंसी को मध्यस्थताकरनी पड़ी थी|1914 में बंबई सरकार के एक निर्णय केदो विरोधाभासी अनुच्छेदोंके प्रावधान के कारण भारत एवं पाकिस्तान सरक्रीक के हिस्से पर अपनी दावेदारी जताते हैं| इस निर्णय केअनुच्छेद 9में कहा गया था किकच्छ एवं सिंध केबीच की सीमा क्रीक के पूर्वमें है जिसका तात्पर्य है कि यह क्रीक सिंध से संबंधित है| अतः यह पाकिस्तान के अधिकार क्षेत्र में आता है| वहीं दूसरी ओर,अनुच्छेद 10में कहा गया है कि चूँकि सर क्रीक वर्षभर नौगम्य/जहाजों के चलने योग्य है अतःअंतरराष्ट्रीय कानून एवं थालवेग के सिद्धांतके अनुसारयह सीमा नौगम्य चैनल के बीच सेतय की जा सकती है| इसका अर्थ यह हुआ कि इसे सिंध एवं कच्छ के बीच विभाजित किया गया है अर्थात भारत एवं पाकिस्तान के मध्य| यही भारत के दावे का आधार है जिसकी 1925 केएक मानचित्र से भी पुष्टि होती है| सरक्रीक क्षेत्र का बढ़ता सामरिक आर्थिक महत्त्व मत्स्यन क्षेत्र सरक्रीक क्षेत्र भारत व पाकिस्तान दोनों देश के मछुआरों के लिए मछली पकड़ने का एक बड़ा स्थान है| सर क्रीक को एशिया के सबसे बड़े मत्स्यन क्षेत्रों में से एक माना जाता है| अत्यधिक मछलियों की लालसा में उनकी नौकाएं सीमाओं के आर-पार चली जाती हैं तथा दूसरे देश के सीमारक्षकों के द्वारा पकड़ ली जाती हैं| हाइड्रोकार्बन की उपलब्धता दोनों देशों के लिए इसक्षेत्र पर विवाद में उलझने का एक महत्वपूर्ण कारण समुद्र के नीचे प्रचुर मात्रा में तेल एवं गैस का संभावित संकेंद्रण है| हालांकि विवादों के कारण इसका वर्तमान में उपयोग नहीं हो पा रहा है| नशीली दवाओं की तस्करी सरक्रीक के विवादित समुद्री क्षेत्र में टेलीफोन वार्तालापों से इस क्षेत्र में नशीली दवाओं के उत्पादक संघों के सक्रिय होने का संकेत मिलता है| यह क्षेत्र दुनिया के सबसे सक्रिय नशीली दवाओं के व्यापार केंद्र के रूप में भी एक हो सकता है| सामरिक सुरक्षा तथा सुरक्षा संबंधी मुद्दे सरक्रीक क्षेत्र की भौतिक अवस्थिति में भी हाल के समय में परिवर्तन आया है| नवंबर 2008 में मुंबई आतंकवादी हमलेके बाद से समुद्री सुरक्षा की चिंताएं भी बढ़ी है| मुंबई में हमला करने के लिए इसका उपयोग किया गया था| भारत द्वाराचाबहार बंदरगाह को सुरक्षित करने हेतुभी यह क्षेत्र काफी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है| ग्वादर बंदरगाह में चीन की बढ़ती भूमिका तथा अरब सागर में चीन के बढ़ रहे हस्तक्षेपको देखते हुए भी सरक्रीक क्षेत्र की महता और ज्यादा बढ़ जाती है| उपरोक्त महत्त्व को देखते हुए भारत सरकार ने सीमा प्रबंधन में अनेक चुनौतियों के होते हुए भी बेहतर सीमा प्रबंधन करने के प्रयास किये हैं| सरक्रीक सीमा प्रबंधन में भारत की बढती सक्रियता 2004 में अटल बिहारी वाजपेई सरकार के नेतृत्व में आरंभ होने वाले भारत-पाकिस्तान समग्र वार्ता के दौरान यह महत्वपूर्ण विषयों में से एक था| सर क्रीक के संदर्भ में दोनों देशों के बीच कई दौर की वार्ता भी हुई है तथा दोनों देशों ने संयुक्त सर्वेक्षण भी किया है| साथ ही,अपने संबंधित स्थितियों को दिखाते हुए दोनों देशों ने मानचित्रों का आदान प्रदानभी किया है| भारत वर्ष 2015 के बाद से यहाँसंरचनात्मक विकास को बढ़ावादे रहा है| BSF जवानों के आवागमन हेतु रोड, रेल की सुविधाएँ और संचार हेतु फ़ोन लिंक्स बढ़ाये जा रहे हैं| यहाँ लगभग50 नए हेलिपैड बनाने की योजनाहै और एकत्वरित लैंडिंग एयरपोर्टबनाया जा रहा है| सैनिकों के संतुष्टि स्तर को मजबूत करने के लिए समस्त आवश्यक सुविधाओं से गेस्टहाउस बनाए जा रहे हैं| बॉर्डर पर ऑब्जरवेशन पोस्ट रूमबनाए जा रहें हैं ताकि सैनिकों को लू जैसी समस्याओं से मुक्त रखा जाए| वर्ष 2015 में यह घोषणा की गयी थी किआधुनिक मानवरहित हवाई वाहन तथा ऑल टेरन वाहनशीघ्र ही सुरक्षा बलों को उपलब्ध करवाए जायेंगे ताकि वे दलदली भूमि की निगरानी में अधिक सक्षम हो पाएं सीमा प्रबंधन तथा आतंरिक सुरक्षा की दृष्टि से होने वालेसम्मेलनों को सीमावर्ती क्षेत्रों में आयोजित किया जा रहा है| जुलाई 2018 में कच्छ में शीर्ष पुलिस अधिकारियों का अखिल भारतीय सम्मेलनबुलाया गया जिसमें प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के साथ सीबीआई, आईबी, बीएसएफ, सीआरपीएफ जैसे अर्धसैनिक बल भी उपस्थित रहें| इस सम्मेलन का उद्देश्य आइएस के विस्तार को रोकना और भारतीय मुसलमानों तक इसकी पहुँच को बढ़ने से रोकना था| सरक्रीक क्षेत्र के आर्थिक, सामरिक तथा रणनीतिक महत्व को देखते हुए भारत को और ज्यादा प्रो-एक्टिव रहने की आवश्यकता है| इस मुद्दे के अभी भी अनसुलझा रहने के कारण भारत को यहाँ सीमा-प्रबंधन में नवीनतम उपायों को शामिल करना होगा जैसे- रिमोट सेंसिंग का उपयोग; उपग्रहों का उपयोग; क्षेत्र की मौसमी स्थितियों को देखते हुए एक स्थानीय रणनीति बनाना आदि|
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भू-स्थिर कक्षा की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये। साथ ही पृथ्वी की विभिन्न कक्षाओं की स्थिति तथा उनके अनुप्रयोगों का भी वर्णन कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) Explain the concept of geostationary orbit. Also describe the position and applications of different orbits of the earth. (150-200 words/10 marks)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत भू-स्थिर कक्षा के बारे में बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात पृथ्वी की विभिन्न कक्षाओं के बारे में विस्तारपूर्वक बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में भारत का उदाहरण देते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भू-स्थिर कक्षा (Geo-stationary orbit) उपग्रह भू-स्थिर कक्षा में पृथ्वी से किसी स्थान से सदैव आकाश में एक ही स्थान पर स्थिर देखा जाता है | यह कक्षा दीर्घवृत्ताकार होता है | (उपग्रह की दूरी पृथ्वी से एक समान होती है) इसकी पृथ्वी से दूरी - 35,784 किमी. होती है | उपग्रह का वेग पृथ्वी के घूर्णन के सामान होता है | समय 24 घंटा और दिशा -पश्चिम से पूर्व होती है | यह कक्षा विषुवतीय रेखा पर मौजूद होता है | पृथ्वी की विभिन्न कक्षाएं निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) अनुप्रयोग - दूर संवेदी उपयोग , मौसम विज्ञान सम्बंधित अध्ययन के लिए | खगोलिकी अध्ययन के लिए - उपग्रह अथवा टेलिस्कोप द्वारा इसरो का एस्ट्रोसैट को 650 किमी. की ऊंचाई वाला कक्षा में स्थापित किया गया | नासा का हब्बल स्पेस टेलीस्कोप 400 किमी. दूरी कक्षा में स्थापित किया गया | स्पेस स्टेशन - 70 के दशक में सोवियत संघ द्वारा "मिर" तथा अमेरिका द्वारा "स्काईलैब" बनाया गया | वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन का उपयोग नासा, रोसकोसमोस जेक्सा, ईएसए, आदि द्वारा किया जा रहा है | चीन द्वारा त्यांगगोंग नामक स्पेस स्टेशन विकसित किया जा रहा है | स्पेस स्टेशन का उपयोग - माइक्रोग्रेविटी प्रयोग, अंतरिक्ष प्रयोगशाला,| ब्रह्माण्ड तथा खगोलिकी विज्ञान सम्बंधित अध्ययन, अंतरिक्ष यात्रा का टर्मिनल | ख़राब उपग्रह/टेलीस्कोप की मरम्मत या रखरखाव, अंतरिक्ष पर्यटन - स्पेस X तथा फाल्कन | रक्षा सम्बंधित मिशन, आदि का प्रयोग किया जा सकता है | मध्य पृथ्वी कक्षा (MEO) अनुप्रयोग - नौवहन का प्रयोग , USA का जीपीएस प्रणाली तथा रूस का GLONASS यूरोपीय राष्ट्रों का गैलिलियो नौवहन प्रणाली, चीन का BEIDOU तथा भारत का NAVIC (IRNSS), आदि जीपीएस का अनुप्रयोग - किसी भौगोलिक स्थान के पोजीशन (स्थिति) के बारे में जानकारी प्रदान करता है | पोजीशन के दो प्रकार - स्टैण्डर्ड पोजीशन - आम तौर पर नागरिक उपयोग के लिए होता है | दूसरा पोजीशन - किसी भी स्थान का सटीक जानकारी - देशांतर, अक्षांश, ऊंचाई, गहराई के बारे में सटीक जानकारी,आम तौर पर सैन्य सेवा अथवा विशेष अनुमति वाले क्षेत्रों में उपयोग किया जाता है | समय आधारित सेवाएँ - पार्सल डिलीवरी, रेल नेट, गंतव्य सम्बंधित समय आदि की जानकारी (एटॉमिक क्लॉक के माध्यम से) | उच्च पृथ्वी कक्षा (HEO) अनुप्रयोग - दूरसंचार उपग्रहों का भू-स्थिर कक्षा द्वारा उपयोग हाहमैंन ऑर्बिट - यह एक अस्थाई स्थानान्तरण कक्षा होता है, यह कक्षा दीर्घवृत्ताकार आकृति का होता है | उपग्रह में मौजूद मोटर अथवा इन्जन द्वारा PERIGEE में अधिक गति गति प्रदान किया जाता है जिसके कारण उपग्रह उच्च कक्षा में चला जाता है | लेगरांज पॉइंट - यह संकल्पना फ्रेंच गणितज्ञ जोसेफ लेगरांज द्वारा दिया गया | दो खगोलीय पिंडो के 5 लेगरांज पॉइंट होते हैं जहाँ तीसरे पिण्ड को दोनों खगोलीय पिंडो के गुरुत्वाकर्षण बल संतुलित करता है | हेलो ऑर्बिट एक प्रकार का 3-D कक्षा होता है, आदि | भारत निरंतर ही अंतरिक्ष के क्षेत्र में नयी उपलब्धियां अर्जित करा रहा है | हाल ही में इसरो ने चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर जाने वाला पहला देश बना | तथा 2022 में मानव उपग्रह के क्षेत्र में भी भारत कार्य कर रहा है |
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##Question:भू-स्थिर कक्षा की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये। साथ ही पृथ्वी की विभिन्न कक्षाओं की स्थिति तथा उनके अनुप्रयोगों का भी वर्णन कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) Explain the concept of geostationary orbit. Also describe the position and applications of different orbits of the earth. (150-200 words/10 marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत भू-स्थिर कक्षा के बारे में बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात पृथ्वी की विभिन्न कक्षाओं के बारे में विस्तारपूर्वक बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में भारत का उदाहरण देते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भू-स्थिर कक्षा (Geo-stationary orbit) उपग्रह भू-स्थिर कक्षा में पृथ्वी से किसी स्थान से सदैव आकाश में एक ही स्थान पर स्थिर देखा जाता है | यह कक्षा दीर्घवृत्ताकार होता है | (उपग्रह की दूरी पृथ्वी से एक समान होती है) इसकी पृथ्वी से दूरी - 35,784 किमी. होती है | उपग्रह का वेग पृथ्वी के घूर्णन के सामान होता है | समय 24 घंटा और दिशा -पश्चिम से पूर्व होती है | यह कक्षा विषुवतीय रेखा पर मौजूद होता है | पृथ्वी की विभिन्न कक्षाएं निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) अनुप्रयोग - दूर संवेदी उपयोग , मौसम विज्ञान सम्बंधित अध्ययन के लिए | खगोलिकी अध्ययन के लिए - उपग्रह अथवा टेलिस्कोप द्वारा इसरो का एस्ट्रोसैट को 650 किमी. की ऊंचाई वाला कक्षा में स्थापित किया गया | नासा का हब्बल स्पेस टेलीस्कोप 400 किमी. दूरी कक्षा में स्थापित किया गया | स्पेस स्टेशन - 70 के दशक में सोवियत संघ द्वारा "मिर" तथा अमेरिका द्वारा "स्काईलैब" बनाया गया | वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन का उपयोग नासा, रोसकोसमोस जेक्सा, ईएसए, आदि द्वारा किया जा रहा है | चीन द्वारा त्यांगगोंग नामक स्पेस स्टेशन विकसित किया जा रहा है | स्पेस स्टेशन का उपयोग - माइक्रोग्रेविटी प्रयोग, अंतरिक्ष प्रयोगशाला,| ब्रह्माण्ड तथा खगोलिकी विज्ञान सम्बंधित अध्ययन, अंतरिक्ष यात्रा का टर्मिनल | ख़राब उपग्रह/टेलीस्कोप की मरम्मत या रखरखाव, अंतरिक्ष पर्यटन - स्पेस X तथा फाल्कन | रक्षा सम्बंधित मिशन, आदि का प्रयोग किया जा सकता है | मध्य पृथ्वी कक्षा (MEO) अनुप्रयोग - नौवहन का प्रयोग , USA का जीपीएस प्रणाली तथा रूस का GLONASS यूरोपीय राष्ट्रों का गैलिलियो नौवहन प्रणाली, चीन का BEIDOU तथा भारत का NAVIC (IRNSS), आदि जीपीएस का अनुप्रयोग - किसी भौगोलिक स्थान के पोजीशन (स्थिति) के बारे में जानकारी प्रदान करता है | पोजीशन के दो प्रकार - स्टैण्डर्ड पोजीशन - आम तौर पर नागरिक उपयोग के लिए होता है | दूसरा पोजीशन - किसी भी स्थान का सटीक जानकारी - देशांतर, अक्षांश, ऊंचाई, गहराई के बारे में सटीक जानकारी,आम तौर पर सैन्य सेवा अथवा विशेष अनुमति वाले क्षेत्रों में उपयोग किया जाता है | समय आधारित सेवाएँ - पार्सल डिलीवरी, रेल नेट, गंतव्य सम्बंधित समय आदि की जानकारी (एटॉमिक क्लॉक के माध्यम से) | उच्च पृथ्वी कक्षा (HEO) अनुप्रयोग - दूरसंचार उपग्रहों का भू-स्थिर कक्षा द्वारा उपयोग हाहमैंन ऑर्बिट - यह एक अस्थाई स्थानान्तरण कक्षा होता है, यह कक्षा दीर्घवृत्ताकार आकृति का होता है | उपग्रह में मौजूद मोटर अथवा इन्जन द्वारा PERIGEE में अधिक गति गति प्रदान किया जाता है जिसके कारण उपग्रह उच्च कक्षा में चला जाता है | लेगरांज पॉइंट - यह संकल्पना फ्रेंच गणितज्ञ जोसेफ लेगरांज द्वारा दिया गया | दो खगोलीय पिंडो के 5 लेगरांज पॉइंट होते हैं जहाँ तीसरे पिण्ड को दोनों खगोलीय पिंडो के गुरुत्वाकर्षण बल संतुलित करता है | हेलो ऑर्बिट एक प्रकार का 3-D कक्षा होता है, आदि | भारत निरंतर ही अंतरिक्ष के क्षेत्र में नयी उपलब्धियां अर्जित करा रहा है | हाल ही में इसरो ने चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर जाने वाला पहला देश बना | तथा 2022 में मानव उपग्रह के क्षेत्र में भी भारत कार्य कर रहा है |
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प्रतिमाओं नहीं, आदर्शों के प्रति प्रतिबद्धता ही समय की मांग है। (600-700 शब्द) Commitment to ideals, not idols is the need of the hour.(600-700 words)
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दृष्टिकोण: प्रस्तावना: निबंध की मांग को स्पष्ट कर सकते हैं: यहाँ मांग यह है कि वास्तविकता में प्रत्येकी सरकार/संगठन महान व्यक्तियों को उनके नाम से याद रखती है न कि उनके द्वारा किए कार्य, दिये गए संदेश जो वर्तमान में भी प्रासंगिक हैं उस रूप में। कोई ऐसा दृष्टांत दे सकते हैं जिसमें यह प्रकट हो की सुधार के प्रयास अपने व्यक्तिगत हित के लिए हुए हों और उसका प्रयोगिक रूप न देखने को मिल रहा हो। जैसे गांधी जी का चित्र/मूर्ति प्रत्येक स्थान पर होता है परंतु उनके आदर्शों को कोई नहीं पालन करता। मुख्य भाग: मुख्य भाग के अंतर्गत ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक आयाम के अंतर्गत ऐसे तर्क दीजिये जिसमें यदि किसी व्यक्ति के स्थान पर उसके व्यक्तित्व को अपनाया जाता तो वर्तमान समय समय की समस्याएँ व्याप्त नहीं होती और भविष्य में उसका समाधान किया जा सके। मुखी भाग की संरचना इस प्रकार होनी चाहिए कि निबंध का जो भी तरीका हो लिखने का परंतु उसमें वर्तमान समस्या, सुधार के नकारात्मक पक्ष( केवल नीतिगत दस्तावेज़, विचारों में ही सुधार कि कल्पना दिखे), अगर वास्तव में आदर्शों का पालन किया जाता तो उसका क्या प्रभाव होता। इस प्रकार से प्रवाह अवश्य होना चाहिए। सामाजिक: समस्या: भेदभाव, छुआछूत, सुभेद्य वर्गों का शोषण आदि नकारात्मक पक्ष: केवल यह बोलना कि हमारा देश महिलाओं, वृद्धों का सम्मान करता था, समानता, सहिष्णुता का संदेश ग्रन्थों में है आदि। राजा राम मोहन राय, दयानन्द सरस्वती, विद्यासागर, पेरियार आदि को याद तो करते हैं परंतु उनके आदर्शों को नहीं जिसके कारण- जाति प्रथा, अंधविश्वास, कट्टरता जैसी समस्या सुझाव: विभिन्न सामाजिक सुधारकों के विचारों को लिखते हुए इसे व्यावहारिक रूप में लाने के लिए किए जा सकने वाले प्रयासों को लिखिए। राजनीतिक: लोकतन्त्र, समाजवाद, साम्यवाद आदि के समर्थन और तानाशाही, राजशाही आदि के विरुद्ध प्रमुख व्यक्तियों के आदर्शों को न मानने पर आने वाली समस्याएँ- कार्ल मार्क्स, मोंटेन्स्क़ु, लूथर किंग, जवाहर लाल नेहरू, गांधी के आदर्शों का विवरण भारतीय राजनीति में सुधार के लिए किए गए प्रयासों जैसे- टीएन शेषन, दिनेश गोस्वामी आदि का उदाहरण न्यायिक: समस्या: अपराध की बदलती प्रकृति, विचाराधीन मामले, भ्रष्टाचार आदि सुधार के नकारात्मक पक्ष: गरीबों को न्याय नहीं मिल रहा, महंगी प्रणाली, नियुक्ति में परिवारवाद, IPC, सीआरपीसी से संबन्धित चिंता आदि सुधार के प्रयास के बावजूद भी जारी विक्रमादित्य की न्याय व्यवस्था, न्याय के संबंध में अरस्तू, बेंथम, मिल, जॉन रोल्स, njac, अपराधिक न्याय प्रणाली-वर्मा समिति, प्रकाश सिंह वाद पुलिस सुधार के दिये गए सुझाव आर्थिक: आर्थिक असमानता, शोषण, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, गरीबी आदि समस्याओं का विवरण इस संदर्भ में किए जा रहे प्रयास के नकारात्मक पक्षों को दिखाईए सुझाव दीजिये- साम्यवादी विचार, गांधी का ट्रश्टीशिप, सर्वोदय; कर प्रणाली, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व आदि पर्यावरणीय: वर्तमान समस्याएँ: जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जीव जंतुओं की हत्या आदि इस संबंध में किए जा रहे प्रयासों का नकारात्मक पक्ष: जलवायु परिवर्तन के लिए पूर्ण सहयोग नहीं, आर्थिक संवृद्धि बनाम पर्यावरण, संवेदनशीलता का अभाव आदि उपाय: प्राचीन भारत का उदाहरण जिसमें प्रकृति की पूजा, पर्यावरण संरक्षण के प्रयास, वर्तमान के पर्यावरणीय आंदोलन, वैश्विक स्तर पर- जलवायु परिवर्तन सम्मेलन, कार्यकर्ताओं (ग्रेटा थनबर्ग...) कृषि: समस्या: सुधार के प्रयास के नकारात्मक पक्ष सुझाव: गांधी के विचार, स्वामीनाथन आयोग आदि नैतिक: सार्वजनिक और व्यक्तिगत जीवन में जो भी समस्याएँ हैं उसे लिखिए विभिन्न आदर्शों से समाधान: बेंथम मिल, सुशासन के उद्देश्य, गांधी, विवेकानंद आदि के आदर्शों को लिखिए। निष्कर्ष: मुख्य रूप से प्रत्येक आयाम में दिये गए सुझावों का सारांश प्रस्तुत कर सकते हैं। नोट:य ह निबंध लेखन का एक तरीका है। यदि छात्र किसी और भी प्रकार से लिखता है तो भी लेखन का प्रवाह और संरचना में समस्या और आदर्शों को लागू करने के प्रयासों का विवरण होना चाहिए। उसी के अनुरूप मूल्यांकन होना चाहिए।
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##Question:प्रतिमाओं नहीं, आदर्शों के प्रति प्रतिबद्धता ही समय की मांग है। (600-700 शब्द) Commitment to ideals, not idols is the need of the hour.(600-700 words)##Answer:दृष्टिकोण: प्रस्तावना: निबंध की मांग को स्पष्ट कर सकते हैं: यहाँ मांग यह है कि वास्तविकता में प्रत्येकी सरकार/संगठन महान व्यक्तियों को उनके नाम से याद रखती है न कि उनके द्वारा किए कार्य, दिये गए संदेश जो वर्तमान में भी प्रासंगिक हैं उस रूप में। कोई ऐसा दृष्टांत दे सकते हैं जिसमें यह प्रकट हो की सुधार के प्रयास अपने व्यक्तिगत हित के लिए हुए हों और उसका प्रयोगिक रूप न देखने को मिल रहा हो। जैसे गांधी जी का चित्र/मूर्ति प्रत्येक स्थान पर होता है परंतु उनके आदर्शों को कोई नहीं पालन करता। मुख्य भाग: मुख्य भाग के अंतर्गत ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक आयाम के अंतर्गत ऐसे तर्क दीजिये जिसमें यदि किसी व्यक्ति के स्थान पर उसके व्यक्तित्व को अपनाया जाता तो वर्तमान समय समय की समस्याएँ व्याप्त नहीं होती और भविष्य में उसका समाधान किया जा सके। मुखी भाग की संरचना इस प्रकार होनी चाहिए कि निबंध का जो भी तरीका हो लिखने का परंतु उसमें वर्तमान समस्या, सुधार के नकारात्मक पक्ष( केवल नीतिगत दस्तावेज़, विचारों में ही सुधार कि कल्पना दिखे), अगर वास्तव में आदर्शों का पालन किया जाता तो उसका क्या प्रभाव होता। इस प्रकार से प्रवाह अवश्य होना चाहिए। सामाजिक: समस्या: भेदभाव, छुआछूत, सुभेद्य वर्गों का शोषण आदि नकारात्मक पक्ष: केवल यह बोलना कि हमारा देश महिलाओं, वृद्धों का सम्मान करता था, समानता, सहिष्णुता का संदेश ग्रन्थों में है आदि। राजा राम मोहन राय, दयानन्द सरस्वती, विद्यासागर, पेरियार आदि को याद तो करते हैं परंतु उनके आदर्शों को नहीं जिसके कारण- जाति प्रथा, अंधविश्वास, कट्टरता जैसी समस्या सुझाव: विभिन्न सामाजिक सुधारकों के विचारों को लिखते हुए इसे व्यावहारिक रूप में लाने के लिए किए जा सकने वाले प्रयासों को लिखिए। राजनीतिक: लोकतन्त्र, समाजवाद, साम्यवाद आदि के समर्थन और तानाशाही, राजशाही आदि के विरुद्ध प्रमुख व्यक्तियों के आदर्शों को न मानने पर आने वाली समस्याएँ- कार्ल मार्क्स, मोंटेन्स्क़ु, लूथर किंग, जवाहर लाल नेहरू, गांधी के आदर्शों का विवरण भारतीय राजनीति में सुधार के लिए किए गए प्रयासों जैसे- टीएन शेषन, दिनेश गोस्वामी आदि का उदाहरण न्यायिक: समस्या: अपराध की बदलती प्रकृति, विचाराधीन मामले, भ्रष्टाचार आदि सुधार के नकारात्मक पक्ष: गरीबों को न्याय नहीं मिल रहा, महंगी प्रणाली, नियुक्ति में परिवारवाद, IPC, सीआरपीसी से संबन्धित चिंता आदि सुधार के प्रयास के बावजूद भी जारी विक्रमादित्य की न्याय व्यवस्था, न्याय के संबंध में अरस्तू, बेंथम, मिल, जॉन रोल्स, njac, अपराधिक न्याय प्रणाली-वर्मा समिति, प्रकाश सिंह वाद पुलिस सुधार के दिये गए सुझाव आर्थिक: आर्थिक असमानता, शोषण, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, गरीबी आदि समस्याओं का विवरण इस संदर्भ में किए जा रहे प्रयास के नकारात्मक पक्षों को दिखाईए सुझाव दीजिये- साम्यवादी विचार, गांधी का ट्रश्टीशिप, सर्वोदय; कर प्रणाली, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व आदि पर्यावरणीय: वर्तमान समस्याएँ: जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जीव जंतुओं की हत्या आदि इस संबंध में किए जा रहे प्रयासों का नकारात्मक पक्ष: जलवायु परिवर्तन के लिए पूर्ण सहयोग नहीं, आर्थिक संवृद्धि बनाम पर्यावरण, संवेदनशीलता का अभाव आदि उपाय: प्राचीन भारत का उदाहरण जिसमें प्रकृति की पूजा, पर्यावरण संरक्षण के प्रयास, वर्तमान के पर्यावरणीय आंदोलन, वैश्विक स्तर पर- जलवायु परिवर्तन सम्मेलन, कार्यकर्ताओं (ग्रेटा थनबर्ग...) कृषि: समस्या: सुधार के प्रयास के नकारात्मक पक्ष सुझाव: गांधी के विचार, स्वामीनाथन आयोग आदि नैतिक: सार्वजनिक और व्यक्तिगत जीवन में जो भी समस्याएँ हैं उसे लिखिए विभिन्न आदर्शों से समाधान: बेंथम मिल, सुशासन के उद्देश्य, गांधी, विवेकानंद आदि के आदर्शों को लिखिए। निष्कर्ष: मुख्य रूप से प्रत्येक आयाम में दिये गए सुझावों का सारांश प्रस्तुत कर सकते हैं। नोट:य ह निबंध लेखन का एक तरीका है। यदि छात्र किसी और भी प्रकार से लिखता है तो भी लेखन का प्रवाह और संरचना में समस्या और आदर्शों को लागू करने के प्रयासों का विवरण होना चाहिए। उसी के अनुरूप मूल्यांकन होना चाहिए।
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स्वंय सहायता समूहों (SHGs) का परिचय देते हुए, इनके लाभों को सूचीबद्ध कीजिये| भारतीय संदर्भ में, ये समूह किन प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं? (150-200 शब्द; 10 अंक) Give introduction of self help groups (SHGs) and list their benefits. In the indian context, what kind of challenges are these groups facing? (150-200 words; 10 Marks)
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एप्रोच- स्वंय सहायता समूहों(SHGs) का परिचय देते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, इनके लाभों को बिंदुबार लिखिए| अगले भाग में, भारतीय संदर्भ में इनके द्वारा सामना की जा रही चुनौतियों का उल्लेख कीजिये| निष्कर्षतः, भारत में इनको बढ़ावा देने के लिए उठाये गये कुछ क़दमों के साथ-साथ इनकी कार्यप्रणाली में सुधार हेतु कुछ सुझावों को संक्षिप्तता से बताईये| उत्तर- स्वंय सहायता समूहों से तात्पर्य उन समूहों से है जो लगभग एक जैसे आर्थिक-सामाजिक स्टेटस वाले लोगों द्वारा बनाया गया हो जिससे वे छोटे-छोटे सहयोग राशि को एकत्रित कर पूंजी का निर्माण कर रहे हों| दूसरे शब्दों में कहें तो, एक समान आर्थिक पृष्ठभूमि वाले और साझे उद्देश्यों के लिए सामूहिक रूप से कार्य करने को इच्छुक लोगों के स्वंय-शासित और समकक्ष द्वारा नियंत्रित सूचना समूह को स्वंय सहायता समूह कहा जा सकता है| यद्यपि भारतीय संदर्भ में यह विचारधारा प्राचीनकाल से ही दृष्टिगोच़र होती है परंतु आधुनिक समय में इसका श्रेय मोहम्मद यूनिस की ग्रामीण बैंक की सफलता से जोड़ा जाता है जिसके अंतर्गत ग्रामीणों के द्वारा दिए गये छोटी-छोटी धनराशि द्वारा अर्जित पूंजी ने बांग्लादेश के वस्त्र उद्योगों को पुनर्जीवित कर दिया गया| स्वंय सहायता समूहों की कुछ मुख्य विशेषताएं किन्हीं भी कम से कम 20 सदस्यों का ऐसा समूह जो एक जैसी आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि का हो, यदि स्वरोजगार का विकल्प ढूंढ रहा है तो SHG बनाते हुए नाबार्ड से संबद्ध बैंकों से सबप्राइम लोन हेतु आवेदन कर सकता है| जो भी प्रोजेक्ट की कीमत होगी उसके 90% तक ऋण स्वंय सहायता समूह को नाबार्ड द्वारा द्वारा दिए जा सकते हैं तथा शेष 10% समूह को स्वंय एकत्रित करना होता है| इनस्वंय सहायता समूहों के नाम से एक बचत खाता खोला जाता है जिसमें समूह के कोई भी 3 व्यक्ति के संयुक्त हस्ताक्षर द्वारा धन को निष्कासित किया जा सकता है| 1992 में स्वंय सहायता समूहों के परिच्छेदों को बढ़ाते हुए वाणिज्यिक बैंकों को छोड़कर अन्य वित्तीय संस्थानों द्वारा स्वंय सहायता समूहों को ऋण उपलब्ध कराना सुनिश्चित कराया गया| स्वंय सहायता समूहों के लाभ बैंकों से असम्बद्ध महिलाओं को वित्तीय मध्यस्थता समाधान प्रदान करने के प्रभावी साधन; विभिन्न प्रकार के सामाजिक-आर्थिक लाभ जैसे- आर्थिक आत्मनिर्भरता; ग्रामीण मामलों में सहभागिता और शैक्षिक जागरूकता; राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन सेस्वंय सहायता समूहों(SHGs) के जुड़ने से इनके क्षमता निर्माण तथा संस्थागत बनाने पर भी ध्यान जिससे सामाजिक लामबंदी, संस्था निर्माण, समुदायीकरण और मानव संसाधन को बेहतर बनाने में सहायता; SHGs की बैठकों की नियमित प्रक्रिया से महिलाओं को सामाजिक पूंजी जुटाने में सहायता जिससे परिवार तथा समाज में उनकी हैसियत बढ़ना; इनके माध्यम से महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण जिससे परिवार में इनकी निर्णायक भुमिका को प्रोत्साहन जिससे पितृसत्तात्मक चुनौतियों का सामना करने में सक्षमता; साथ ही, अन्य अप्रत्यक्ष लाभ जैसे- मातृ मृत्युदर तथा बाल मृत्युदर में कमी; स्वंय सहायता समूहों के संदर्भ में कुछ प्रमुख चुनौतियाँ समाज में स्वंय सहायता समूहों के संदर्भ में जागरूकता का अभाव जिससे जिन्हें इनकी आवश्यकता है वे इसके संबंध में अनभिज्ञ हैं| स्वंय सहायता समूहों के निर्माण तथा प्रोत्साहन के संदर्भ में, बैंकिंग प्रणाली एवं कोऑपरेटिव का दृष्टिकोण अधिकांशतः नकारात्मक है| अधिकांश SHGs का कृषि गतिविधियों में ही संलग्न होना; अधिकांश SHGs अल्पविकसित तथा प्रौद्योगिकी एवं बाजार तक उनकी कम पहुँच; अधिकांश SHGs का ग्रामीण तथा सुदूर क्षेत्रों में अवस्थित होना जिससे खराब अवसंरचना का मुद्दा जैसे- सड़क/रेल संपर्क का अभाव या विद्युत् की पहुँच नहीं आदि| प्रशिक्षण तथा क्षमता निर्माण एवं कौशल विकास का अभाव क्योंकि ज्यादातरSHGs को राज्य की सहायता ना मिलना या कम मिलना; SHGs का राजनीतिकरण जिससे सामूहिक संघर्ष को बढ़ावा; स्वंय सहायता समूहों के संदर्भ में समाज में व्यापत स्तरीकरण(जो जेंडर, जाति, क्षेत्र इत्यादि पर आधारित है), इनके विकास की दिशा में एक बड़ा अवरोधक; स्वंय सहायता समूहों में सबप्राइम लोन के दुरूपयोग के दोहरे दुष्परिणाम होते हैं| जहाँ एक तरफ इसके परिणामस्वरूप बैंकों के एनपीए(NPA) बढ़ रहे हैं वहीँ दूसरी तरफ स्वंय सहायता समूहों के प्रति दृष्टिकोण भी नकारात्मक हो रहा है| भारत में इनको बढ़ावा देने के लिए उठाये गये कुछ क़दम भारतीय संदर्भ में ग्रामीण बैंक से प्रेरित होते हुए वर्ष 1986 में नाबार्ड ने स्वंय सहायता समूह बैंक लिंक कार्यक्रम प्रारंभ किया जिसके अंतर्गत कोई भी स्वंय सहायता समूह यदि स्वरोजगार के विकल्प ढूंढ रहा हो तो उसे अतिनिम्न दरों पर सबप्राइम लोन उपलब्ध कराया जाएगा| भारत सरकार द्वारा SHGs को प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र उधारी के अंतर्गत शामिल करना; प्रियदर्शनी योजना(नोडल एजेंसी- नाबार्ड); राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत किये जा रहे प्रयास; स्वंय सहायता समूहों की कार्यप्रणाली में सुधार हेतु कुछ सुझाव स्वंय सहायता समूहों में सबप्राइम लोन के दुरूपयोग के रोकने का समाधान यह है कि स्वंय सहायता समूह के संदर्भ में बायोमेट्रिक जाँच को अनिवार्य किया जाए तथा साथ ही, नियामकों के माध्यम से इनके प्रति जागरूकता एवं उचित प्रबंधन को सुनिश्चित किया जाए| प्रौद्योगिकी के साथ बैकवर्ड लिंकेज तथा प्रसंस्करण एवं बाजार संगठनों के साथ फॉरवर्ड लिंकेज के संदर्भ में एक समेकित दृष्टिकोण विकसित करना; विविधतापूर्ण गतिविधियों के लिए ऋण प्रदान करना जैसे- आय वृद्धि वाली आजीविका गतिविधियाँ आदि; इनके वित्तीय प्रबंधन, उत्पादन तथा विपणन गतिविधियों से संबंधित प्रशिक्षण तथा क्षमता निर्माण को प्रोत्साहन;
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##Question:स्वंय सहायता समूहों (SHGs) का परिचय देते हुए, इनके लाभों को सूचीबद्ध कीजिये| भारतीय संदर्भ में, ये समूह किन प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं? (150-200 शब्द; 10 अंक) Give introduction of self help groups (SHGs) and list their benefits. In the indian context, what kind of challenges are these groups facing? (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- स्वंय सहायता समूहों(SHGs) का परिचय देते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, इनके लाभों को बिंदुबार लिखिए| अगले भाग में, भारतीय संदर्भ में इनके द्वारा सामना की जा रही चुनौतियों का उल्लेख कीजिये| निष्कर्षतः, भारत में इनको बढ़ावा देने के लिए उठाये गये कुछ क़दमों के साथ-साथ इनकी कार्यप्रणाली में सुधार हेतु कुछ सुझावों को संक्षिप्तता से बताईये| उत्तर- स्वंय सहायता समूहों से तात्पर्य उन समूहों से है जो लगभग एक जैसे आर्थिक-सामाजिक स्टेटस वाले लोगों द्वारा बनाया गया हो जिससे वे छोटे-छोटे सहयोग राशि को एकत्रित कर पूंजी का निर्माण कर रहे हों| दूसरे शब्दों में कहें तो, एक समान आर्थिक पृष्ठभूमि वाले और साझे उद्देश्यों के लिए सामूहिक रूप से कार्य करने को इच्छुक लोगों के स्वंय-शासित और समकक्ष द्वारा नियंत्रित सूचना समूह को स्वंय सहायता समूह कहा जा सकता है| यद्यपि भारतीय संदर्भ में यह विचारधारा प्राचीनकाल से ही दृष्टिगोच़र होती है परंतु आधुनिक समय में इसका श्रेय मोहम्मद यूनिस की ग्रामीण बैंक की सफलता से जोड़ा जाता है जिसके अंतर्गत ग्रामीणों के द्वारा दिए गये छोटी-छोटी धनराशि द्वारा अर्जित पूंजी ने बांग्लादेश के वस्त्र उद्योगों को पुनर्जीवित कर दिया गया| स्वंय सहायता समूहों की कुछ मुख्य विशेषताएं किन्हीं भी कम से कम 20 सदस्यों का ऐसा समूह जो एक जैसी आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि का हो, यदि स्वरोजगार का विकल्प ढूंढ रहा है तो SHG बनाते हुए नाबार्ड से संबद्ध बैंकों से सबप्राइम लोन हेतु आवेदन कर सकता है| जो भी प्रोजेक्ट की कीमत होगी उसके 90% तक ऋण स्वंय सहायता समूह को नाबार्ड द्वारा द्वारा दिए जा सकते हैं तथा शेष 10% समूह को स्वंय एकत्रित करना होता है| इनस्वंय सहायता समूहों के नाम से एक बचत खाता खोला जाता है जिसमें समूह के कोई भी 3 व्यक्ति के संयुक्त हस्ताक्षर द्वारा धन को निष्कासित किया जा सकता है| 1992 में स्वंय सहायता समूहों के परिच्छेदों को बढ़ाते हुए वाणिज्यिक बैंकों को छोड़कर अन्य वित्तीय संस्थानों द्वारा स्वंय सहायता समूहों को ऋण उपलब्ध कराना सुनिश्चित कराया गया| स्वंय सहायता समूहों के लाभ बैंकों से असम्बद्ध महिलाओं को वित्तीय मध्यस्थता समाधान प्रदान करने के प्रभावी साधन; विभिन्न प्रकार के सामाजिक-आर्थिक लाभ जैसे- आर्थिक आत्मनिर्भरता; ग्रामीण मामलों में सहभागिता और शैक्षिक जागरूकता; राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन सेस्वंय सहायता समूहों(SHGs) के जुड़ने से इनके क्षमता निर्माण तथा संस्थागत बनाने पर भी ध्यान जिससे सामाजिक लामबंदी, संस्था निर्माण, समुदायीकरण और मानव संसाधन को बेहतर बनाने में सहायता; SHGs की बैठकों की नियमित प्रक्रिया से महिलाओं को सामाजिक पूंजी जुटाने में सहायता जिससे परिवार तथा समाज में उनकी हैसियत बढ़ना; इनके माध्यम से महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण जिससे परिवार में इनकी निर्णायक भुमिका को प्रोत्साहन जिससे पितृसत्तात्मक चुनौतियों का सामना करने में सक्षमता; साथ ही, अन्य अप्रत्यक्ष लाभ जैसे- मातृ मृत्युदर तथा बाल मृत्युदर में कमी; स्वंय सहायता समूहों के संदर्भ में कुछ प्रमुख चुनौतियाँ समाज में स्वंय सहायता समूहों के संदर्भ में जागरूकता का अभाव जिससे जिन्हें इनकी आवश्यकता है वे इसके संबंध में अनभिज्ञ हैं| स्वंय सहायता समूहों के निर्माण तथा प्रोत्साहन के संदर्भ में, बैंकिंग प्रणाली एवं कोऑपरेटिव का दृष्टिकोण अधिकांशतः नकारात्मक है| अधिकांश SHGs का कृषि गतिविधियों में ही संलग्न होना; अधिकांश SHGs अल्पविकसित तथा प्रौद्योगिकी एवं बाजार तक उनकी कम पहुँच; अधिकांश SHGs का ग्रामीण तथा सुदूर क्षेत्रों में अवस्थित होना जिससे खराब अवसंरचना का मुद्दा जैसे- सड़क/रेल संपर्क का अभाव या विद्युत् की पहुँच नहीं आदि| प्रशिक्षण तथा क्षमता निर्माण एवं कौशल विकास का अभाव क्योंकि ज्यादातरSHGs को राज्य की सहायता ना मिलना या कम मिलना; SHGs का राजनीतिकरण जिससे सामूहिक संघर्ष को बढ़ावा; स्वंय सहायता समूहों के संदर्भ में समाज में व्यापत स्तरीकरण(जो जेंडर, जाति, क्षेत्र इत्यादि पर आधारित है), इनके विकास की दिशा में एक बड़ा अवरोधक; स्वंय सहायता समूहों में सबप्राइम लोन के दुरूपयोग के दोहरे दुष्परिणाम होते हैं| जहाँ एक तरफ इसके परिणामस्वरूप बैंकों के एनपीए(NPA) बढ़ रहे हैं वहीँ दूसरी तरफ स्वंय सहायता समूहों के प्रति दृष्टिकोण भी नकारात्मक हो रहा है| भारत में इनको बढ़ावा देने के लिए उठाये गये कुछ क़दम भारतीय संदर्भ में ग्रामीण बैंक से प्रेरित होते हुए वर्ष 1986 में नाबार्ड ने स्वंय सहायता समूह बैंक लिंक कार्यक्रम प्रारंभ किया जिसके अंतर्गत कोई भी स्वंय सहायता समूह यदि स्वरोजगार के विकल्प ढूंढ रहा हो तो उसे अतिनिम्न दरों पर सबप्राइम लोन उपलब्ध कराया जाएगा| भारत सरकार द्वारा SHGs को प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र उधारी के अंतर्गत शामिल करना; प्रियदर्शनी योजना(नोडल एजेंसी- नाबार्ड); राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत किये जा रहे प्रयास; स्वंय सहायता समूहों की कार्यप्रणाली में सुधार हेतु कुछ सुझाव स्वंय सहायता समूहों में सबप्राइम लोन के दुरूपयोग के रोकने का समाधान यह है कि स्वंय सहायता समूह के संदर्भ में बायोमेट्रिक जाँच को अनिवार्य किया जाए तथा साथ ही, नियामकों के माध्यम से इनके प्रति जागरूकता एवं उचित प्रबंधन को सुनिश्चित किया जाए| प्रौद्योगिकी के साथ बैकवर्ड लिंकेज तथा प्रसंस्करण एवं बाजार संगठनों के साथ फॉरवर्ड लिंकेज के संदर्भ में एक समेकित दृष्टिकोण विकसित करना; विविधतापूर्ण गतिविधियों के लिए ऋण प्रदान करना जैसे- आय वृद्धि वाली आजीविका गतिविधियाँ आदि; इनके वित्तीय प्रबंधन, उत्पादन तथा विपणन गतिविधियों से संबंधित प्रशिक्षण तथा क्षमता निर्माण को प्रोत्साहन;
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What do you understand by the Meiji restoration? How did it pave way for Japan"s industrialization? Discuss. (150 words/10 Marks)
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A pproach: Introduction : Write about the Meiji Restoration Main body: 1. In this part, state the conditions in Japan before the Meiji Restoration. 2. Highlight the reasons why the Meiji restoration paved the way for Japan’s industrialization. Conclusion: State the effects of the Industrialisation of Japan in brief. Answer: The Meiji Restoration was a political and social revolution in Japan in 1866-69, which ended the power of the Tokugawa shogun and returned the Emperor. It intended to strengthen Japan against the threat represented by the colonial powers of the day. The Meiji restoration was a crucial period of transition of Japan from a pre-modern to a modern society. Japan before Meiji Restoration The nation was a militarily weak country, The feudal system was prevalent and was primarily agricultural, and had little technological development. The Western powers — Europe and the United States — had forced Japan to sign treaties that limited its control over its own foreign trade. It paved the way for Japan’s industrialization in the following ways:- 1. It ended the old feudal regime. The abolition of feudalism made possible tremendous social and political changes. Millions of people were suddenly free to choose their occupations and move about without restrictions. By providing a new environment of political and financial security, the government made a possible investment in new industries and technologies. 2. Although the economy still depended on agriculture, industrialization was the primary goal of the government, which directed the development of strategic industries, transportation, and communications. 3. Private firms were also encouraged by government financial support and aided by the institution of a European-style banking system in 1882. 4. A national land tax system was established that required payment in money instead of rice, which allowed the government to stabilize the national budget. This gave the government money to spend to build up the strength of the industries. 5. The government also introduced a national educational system and a constitution, creating an elected parliament called the Diet. They did this to provide a good environment for national growth and build support for the modern state. The death of emperor Meiji in 1912 marked the end of the period. However, by this time, Japan enjoyed record-breaking economic prosperity. The Japanese people had more money to spend, more leisure, and better education, supplemented by the development of mass media.
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##Question:What do you understand by the Meiji restoration? How did it pave way for Japan"s industrialization? Discuss. (150 words/10 Marks)##Answer:A pproach: Introduction : Write about the Meiji Restoration Main body: 1. In this part, state the conditions in Japan before the Meiji Restoration. 2. Highlight the reasons why the Meiji restoration paved the way for Japan’s industrialization. Conclusion: State the effects of the Industrialisation of Japan in brief. Answer: The Meiji Restoration was a political and social revolution in Japan in 1866-69, which ended the power of the Tokugawa shogun and returned the Emperor. It intended to strengthen Japan against the threat represented by the colonial powers of the day. The Meiji restoration was a crucial period of transition of Japan from a pre-modern to a modern society. Japan before Meiji Restoration The nation was a militarily weak country, The feudal system was prevalent and was primarily agricultural, and had little technological development. The Western powers — Europe and the United States — had forced Japan to sign treaties that limited its control over its own foreign trade. It paved the way for Japan’s industrialization in the following ways:- 1. It ended the old feudal regime. The abolition of feudalism made possible tremendous social and political changes. Millions of people were suddenly free to choose their occupations and move about without restrictions. By providing a new environment of political and financial security, the government made a possible investment in new industries and technologies. 2. Although the economy still depended on agriculture, industrialization was the primary goal of the government, which directed the development of strategic industries, transportation, and communications. 3. Private firms were also encouraged by government financial support and aided by the institution of a European-style banking system in 1882. 4. A national land tax system was established that required payment in money instead of rice, which allowed the government to stabilize the national budget. This gave the government money to spend to build up the strength of the industries. 5. The government also introduced a national educational system and a constitution, creating an elected parliament called the Diet. They did this to provide a good environment for national growth and build support for the modern state. The death of emperor Meiji in 1912 marked the end of the period. However, by this time, Japan enjoyed record-breaking economic prosperity. The Japanese people had more money to spend, more leisure, and better education, supplemented by the development of mass media.
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भारत के प्रक्षेपण यान विकास कार्यक्रम पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिये | साथ ही GSLV एवं PSLV की प्रमुख विशेषताओं को रेखांकित कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) Make a brief comment on India"s launch vehicle development program. Also ,highlight the key features of GSLV and PSLV. (150-200 words/10 marks)
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एप्रोच - भूमिका में प्रक्षेपण यान तकनीक के बारे में बताइये | प्रथम भाग में भारत के प्रक्षेपण यान विकास कार्यक्रम पर टिप्पणी कीजिये | दूसरे भाग में GSLV एवं PSLV की प्रमुख विशेषताओं को रेखांकित कीजिये | अंतिम में प्रक्षेपण यान सम्बन्धी कुछ उपलब्धियों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये | उत्तर - एक प्रक्षेपण यान अथवा वाहक राकेट वस्तुतः एक राकेट होता है जो किसी कृत्रिम उपग्रह अथवा पेलोड को पृथ्वी की सतह से बाह्य अन्तरिक्ष में ले जाता है | प्रक्षेपण यान मुख्यतः दो वर्गों में बांटे जाते हैं यथा ELV- विस्तार करने योग्य प्रक्षेपण यान,जो पारंपरिक तकनीक पर आधारित होते हैं | ये सिंगल स्टेज यान होते हैं, इनका प्रयोग मानव रहित अन्तरिक्ष मिशनों में किया जाता है| इनमें थ्रस्टर का उपयोग किया जाता है, इसमें वापसी के लिए विंगड वायुयान नहीं होता उदाहरणार्थ PSLV एवं GSLV|दूसरे वर्ग में RLV(पुनर्प्रयोग के योग्य प्रक्षेपण यान)आते हैं | इनमें ELV के सापेक्ष उन्नत तकनीक का प्रयोग किया जाता है,इनका प्रयोग मानवयुक्त अन्तरिक्ष मिशनों में किया जाता है | इनमे बूस्टर का उपयोग किया जाता है और इनके वापस प्रथ्वी पर लौटने के लिए विंग वायुयान होता है | इन्हें सामान्यतः स्पेश शटल कहा जाता है उदाहरणार्थ नासा का अटलांटिस, इंडेवर, कोलंबिया,आदि रूस का सोयुज, चीन का शेनझाऊ आदि | भारत में प्रक्षेपण यानों के विकास के लिए एक समर्पित कार्यक्रम चलाया जा रहा है| इसके अंतर्गत भारत ने अनेक उपलब्धियां अर्जित की हैं | भारत का प्रक्षेपण यान विकास कार्यक्रम भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रमडॉ विक्रम साराभाईकी संकल्पना है| वर्तमान प्रारूप में इस कार्यक्रम की कमानभारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन(इसरो) के हाथों में है | भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत 1962 में की गयी | इसके अंतर्गत प्रक्षेपण यान विकास कार्यक्रम चलाया जा रहा है | 1979 मेंभारत सर्वप्रथम उपग्रह प्रक्षेपण यान(SLV) विकसित किया गया| इसका अंतिम रूप से सफल प्रक्षेपण 1980 में किया गया| इसके माध्यम से रोहिणी श्रृंखला के उपग्रह RS 1 को प्रक्षेपित किया गया था | विकास के अगले चरण में 1980 से 90 के दशक में संवर्धित उपग्रह प्रक्षेपण यान (ASLV) का विकास किया गया| वर्ष 1992 में एएसएलवी-डी3 का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया गया और इसके माध्यम से SROSS-C को कक्षा में स्थापित किया गया | वर्तमान में भारत में कार्यरत प्रक्षेपण यानों यथा PSLV( ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान) एवं GSLV (भू स्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपण यानों का विकास प्रक्षेपण यान विकास कार्यक्रम का अगला चरण है | PSLV की प्रमुख विशेषताएं ध्रुवीय कक्षा में दूर संवेदी उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए | कम वजन(1700 Kg तक) के दूर संचार उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए | यह चार चरण वाला प्रक्षेपण यान होता है | तरल इंधन का उपयोगसर्वप्रथम इसी में किया गया | इसमें क्रमशः ठोस इंधन/प्रणोदक/HTPB, तरल इंधन/UDMH, पुनः ठोस इंधन/प्रणोदक/HTPB, तरल/UDMH इंधन का प्रयोग किया जाता है | PSLV के तीन संस्करण हैं यथा; कोर अलोन(बूस्टर रहित), मानक कॉन्फीग्रेशन(6 स्ट्रैपओन मोटर लगे होते हैं) एवं एक्स्ट्रालार्ज(6 भारी स्ट्रैपओन बूस्टर लगे होते हैं) | GSLV की प्रमुख विशेषताएं इसका विकास अधिक वजन( 2 से 4 टन तक) वाले दूर संचार उपग्रहों के भू-स्थैतिक स्थानान्तरण कक्षा(GTO) में प्रक्षेपण के लिए किया गया है | यह तीन चरणों वाला प्रक्षेपण यान होता है | इसमें क्रमश: ठोस इंधन/प्रणोदक/HTPB, तरल/UDMH एवं अंतिम में क्रायोजेनिक इंधन का प्रयोग किया जाता है | क्रायोजेनिक चरण में इंधन/प्रणोदक के रूप में द्रव हाइड्रोजन(20 केल्विन) का प्रयोग किया जाता है जिसका आक्सीकरण द्रव ऑक्सीजन(90 केल्विन) के द्वारा किया जाता है | क्रायोजेनिक तकनीक अधिक कुशल होती है क्योंकि इसमें थ्रस्ट अधिक होता है और यह अधिक भारी उपग्रहों को ले जाने में सक्षम होता है | हाइड्रोजन के अधिक ज्वलनशील होने के कारण इसे प्रथम चरण में उपयोग नहीं किया जाता है| वायुमंडल को पार करने पर इसका उपयोग किया जाता है | GSLV के भी तीन संस्करण है यथा; GSLV-MK1 (2 टन के उपग्रहों के लांच के लिए), GSLV-MK2 (3 टन तक के उपग्रह के लांच के लिए, इसमें 4 स्ट्रैपओन मोटर लगे होते हैं) एवं GSLV-MK3( 4 टन तक के उपग्रह के लांच के लिए, इसमें 2 बड़े सॉलिड बूस्टर लगे होते हैं | उपरोक्त इस प्रकार स्पष्ट होता है कार्यरत दोनों प्रक्षेपण यान महत्वपूर्ण क्षमता से युक्त विश्वस्तरीय प्रक्षेपण यान हैं| इनके माध्यम से भारत ने वैश्विक अन्तरिक्ष बाजार में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बनाया है | PSLV एवं GSLV के कारण वर्तमान में भारत न केवल स्वदेशी उपग्रहों के प्रक्षेपण में आत्मनिर्भर हुआ है बल्कि अब भारत द्वारा इनका व्यावसायिक उपयोग भी किया जा रहा है |
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##Question:भारत के प्रक्षेपण यान विकास कार्यक्रम पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिये | साथ ही GSLV एवं PSLV की प्रमुख विशेषताओं को रेखांकित कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) Make a brief comment on India"s launch vehicle development program. Also ,highlight the key features of GSLV and PSLV. (150-200 words/10 marks)##Answer:एप्रोच - भूमिका में प्रक्षेपण यान तकनीक के बारे में बताइये | प्रथम भाग में भारत के प्रक्षेपण यान विकास कार्यक्रम पर टिप्पणी कीजिये | दूसरे भाग में GSLV एवं PSLV की प्रमुख विशेषताओं को रेखांकित कीजिये | अंतिम में प्रक्षेपण यान सम्बन्धी कुछ उपलब्धियों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये | उत्तर - एक प्रक्षेपण यान अथवा वाहक राकेट वस्तुतः एक राकेट होता है जो किसी कृत्रिम उपग्रह अथवा पेलोड को पृथ्वी की सतह से बाह्य अन्तरिक्ष में ले जाता है | प्रक्षेपण यान मुख्यतः दो वर्गों में बांटे जाते हैं यथा ELV- विस्तार करने योग्य प्रक्षेपण यान,जो पारंपरिक तकनीक पर आधारित होते हैं | ये सिंगल स्टेज यान होते हैं, इनका प्रयोग मानव रहित अन्तरिक्ष मिशनों में किया जाता है| इनमें थ्रस्टर का उपयोग किया जाता है, इसमें वापसी के लिए विंगड वायुयान नहीं होता उदाहरणार्थ PSLV एवं GSLV|दूसरे वर्ग में RLV(पुनर्प्रयोग के योग्य प्रक्षेपण यान)आते हैं | इनमें ELV के सापेक्ष उन्नत तकनीक का प्रयोग किया जाता है,इनका प्रयोग मानवयुक्त अन्तरिक्ष मिशनों में किया जाता है | इनमे बूस्टर का उपयोग किया जाता है और इनके वापस प्रथ्वी पर लौटने के लिए विंग वायुयान होता है | इन्हें सामान्यतः स्पेश शटल कहा जाता है उदाहरणार्थ नासा का अटलांटिस, इंडेवर, कोलंबिया,आदि रूस का सोयुज, चीन का शेनझाऊ आदि | भारत में प्रक्षेपण यानों के विकास के लिए एक समर्पित कार्यक्रम चलाया जा रहा है| इसके अंतर्गत भारत ने अनेक उपलब्धियां अर्जित की हैं | भारत का प्रक्षेपण यान विकास कार्यक्रम भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रमडॉ विक्रम साराभाईकी संकल्पना है| वर्तमान प्रारूप में इस कार्यक्रम की कमानभारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन(इसरो) के हाथों में है | भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत 1962 में की गयी | इसके अंतर्गत प्रक्षेपण यान विकास कार्यक्रम चलाया जा रहा है | 1979 मेंभारत सर्वप्रथम उपग्रह प्रक्षेपण यान(SLV) विकसित किया गया| इसका अंतिम रूप से सफल प्रक्षेपण 1980 में किया गया| इसके माध्यम से रोहिणी श्रृंखला के उपग्रह RS 1 को प्रक्षेपित किया गया था | विकास के अगले चरण में 1980 से 90 के दशक में संवर्धित उपग्रह प्रक्षेपण यान (ASLV) का विकास किया गया| वर्ष 1992 में एएसएलवी-डी3 का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया गया और इसके माध्यम से SROSS-C को कक्षा में स्थापित किया गया | वर्तमान में भारत में कार्यरत प्रक्षेपण यानों यथा PSLV( ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान) एवं GSLV (भू स्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपण यानों का विकास प्रक्षेपण यान विकास कार्यक्रम का अगला चरण है | PSLV की प्रमुख विशेषताएं ध्रुवीय कक्षा में दूर संवेदी उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए | कम वजन(1700 Kg तक) के दूर संचार उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए | यह चार चरण वाला प्रक्षेपण यान होता है | तरल इंधन का उपयोगसर्वप्रथम इसी में किया गया | इसमें क्रमशः ठोस इंधन/प्रणोदक/HTPB, तरल इंधन/UDMH, पुनः ठोस इंधन/प्रणोदक/HTPB, तरल/UDMH इंधन का प्रयोग किया जाता है | PSLV के तीन संस्करण हैं यथा; कोर अलोन(बूस्टर रहित), मानक कॉन्फीग्रेशन(6 स्ट्रैपओन मोटर लगे होते हैं) एवं एक्स्ट्रालार्ज(6 भारी स्ट्रैपओन बूस्टर लगे होते हैं) | GSLV की प्रमुख विशेषताएं इसका विकास अधिक वजन( 2 से 4 टन तक) वाले दूर संचार उपग्रहों के भू-स्थैतिक स्थानान्तरण कक्षा(GTO) में प्रक्षेपण के लिए किया गया है | यह तीन चरणों वाला प्रक्षेपण यान होता है | इसमें क्रमश: ठोस इंधन/प्रणोदक/HTPB, तरल/UDMH एवं अंतिम में क्रायोजेनिक इंधन का प्रयोग किया जाता है | क्रायोजेनिक चरण में इंधन/प्रणोदक के रूप में द्रव हाइड्रोजन(20 केल्विन) का प्रयोग किया जाता है जिसका आक्सीकरण द्रव ऑक्सीजन(90 केल्विन) के द्वारा किया जाता है | क्रायोजेनिक तकनीक अधिक कुशल होती है क्योंकि इसमें थ्रस्ट अधिक होता है और यह अधिक भारी उपग्रहों को ले जाने में सक्षम होता है | हाइड्रोजन के अधिक ज्वलनशील होने के कारण इसे प्रथम चरण में उपयोग नहीं किया जाता है| वायुमंडल को पार करने पर इसका उपयोग किया जाता है | GSLV के भी तीन संस्करण है यथा; GSLV-MK1 (2 टन के उपग्रहों के लांच के लिए), GSLV-MK2 (3 टन तक के उपग्रह के लांच के लिए, इसमें 4 स्ट्रैपओन मोटर लगे होते हैं) एवं GSLV-MK3( 4 टन तक के उपग्रह के लांच के लिए, इसमें 2 बड़े सॉलिड बूस्टर लगे होते हैं | उपरोक्त इस प्रकार स्पष्ट होता है कार्यरत दोनों प्रक्षेपण यान महत्वपूर्ण क्षमता से युक्त विश्वस्तरीय प्रक्षेपण यान हैं| इनके माध्यम से भारत ने वैश्विक अन्तरिक्ष बाजार में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बनाया है | PSLV एवं GSLV के कारण वर्तमान में भारत न केवल स्वदेशी उपग्रहों के प्रक्षेपण में आत्मनिर्भर हुआ है बल्कि अब भारत द्वारा इनका व्यावसायिक उपयोग भी किया जा रहा है |
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Care for the elderly is fast emerging as a critical element of both public and private concerns. Discuss in the context of India"s increasing population of old age. (150 words/10 Marks)
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Approach: Introduction- Statistics to exemplify the increasing population of Old Age along with facts about linking statements about increasing concern Problems in the public sphere Concerns at a private place Government efforts to address concern (briefly) Suggest a way forward Briefly Answer: According to Census 2011, the population of old age is approximately 8.6% which is expected to increase to 20% by 2050. The elderly, being one of the most vulnerable section of society needs proper care and concern, but unfortunately are facing challenges both in the private and public arena. India has seen a 35.5% increase in the old age population from 2001 to 2011 and by 2050 elderly population will be entering the phase of Longevity Dividend. According to data released by United Nations Population Fund (UNPF), the elderly population in India will increase by 360% by 2050. Care for the elderly is a public concern because of the following reasons: -Lack of healthcare infrastructure -Lack of accessibility to proper and efficient resources. -Insufficient and dilapidated old age homes. -Unavailability and awareness about social security benefits. -Abuse in various forms. Care for the elderly is a private concern because of the following reasons: -Breaking down of family value systems -Negligence in the family resulting in isolation and neglect within the family -Financial dependence on basic needs -Various forms of abuse faced by the elderly(be it physical, mental, financial, etc) Government Efforts(only names of schemes to be written) - Integrated program for older persons - Indira Gandhi National Old Age Pension Scheme - National Programme for Health Care of the Elderly (NPHCE) - Efforts by various Ministries of Finance, Civil Aviation, Railways, etc. Way Forward Hence, with the growing old age population, India needs to get ready and reap the benefits of longevity dividends by bringing inclusive tailored social security benefits, creating awareness about the same and removing the hindrances associated in the effective implementation of the concerned policy. Behavioral change for the elderly among all is also the need of the hour.
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##Question:Care for the elderly is fast emerging as a critical element of both public and private concerns. Discuss in the context of India"s increasing population of old age. (150 words/10 Marks)##Answer:Approach: Introduction- Statistics to exemplify the increasing population of Old Age along with facts about linking statements about increasing concern Problems in the public sphere Concerns at a private place Government efforts to address concern (briefly) Suggest a way forward Briefly Answer: According to Census 2011, the population of old age is approximately 8.6% which is expected to increase to 20% by 2050. The elderly, being one of the most vulnerable section of society needs proper care and concern, but unfortunately are facing challenges both in the private and public arena. India has seen a 35.5% increase in the old age population from 2001 to 2011 and by 2050 elderly population will be entering the phase of Longevity Dividend. According to data released by United Nations Population Fund (UNPF), the elderly population in India will increase by 360% by 2050. Care for the elderly is a public concern because of the following reasons: -Lack of healthcare infrastructure -Lack of accessibility to proper and efficient resources. -Insufficient and dilapidated old age homes. -Unavailability and awareness about social security benefits. -Abuse in various forms. Care for the elderly is a private concern because of the following reasons: -Breaking down of family value systems -Negligence in the family resulting in isolation and neglect within the family -Financial dependence on basic needs -Various forms of abuse faced by the elderly(be it physical, mental, financial, etc) Government Efforts(only names of schemes to be written) - Integrated program for older persons - Indira Gandhi National Old Age Pension Scheme - National Programme for Health Care of the Elderly (NPHCE) - Efforts by various Ministries of Finance, Civil Aviation, Railways, etc. Way Forward Hence, with the growing old age population, India needs to get ready and reap the benefits of longevity dividends by bringing inclusive tailored social security benefits, creating awareness about the same and removing the hindrances associated in the effective implementation of the concerned policy. Behavioral change for the elderly among all is also the need of the hour.
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भारत के लिए रूस का विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक महत्व का उल्लेख कीजिए| साथ ही स्पष्ट कीजिये कि दोनों देशों के मध्य संबंधों में कौन-कौन सी चुनौतियाँ विद्यमान है? (150-200 शब्द/10 अंक) Mention that russia has wide importance in various fields for India. Also, explain that what are the challenges in the relationship between the two countries? (150-200 words/10 Marks)
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एप्रोच- भारत-रूस संबंधों की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में, भारत के लिए रूस के व्यापक महत्व को विभिन्न क्षेत्रों के अंतर्गत बिंदुबार लिखिए| अगले भाग में,वर्तमान परिदृश्य में, दोनों देशों के मध्य संबंधों में विद्यमान चुनौती के आयामों का उल्लेख कीजिये| निष्कर्षतः, इस संबंध में आगे की राह बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- भारत तथा रूस एक दूसरे के पारंपरिक सहयोगी तथा घनिष्ट मित्र रहे हैं| 2017 में दोनों देशों ने राजनयिक संबंधों के 70 वर्ष पुरे कर लिए| इसके पहले 2000 में "भारत-रूस सामरिक सहभागिता पर घोषणा" दस्तावेज पर हस्ताक्षर होने के बाद से भारत-रूस ने द्विपक्षीय संबंधों के लगभग सभी आयामों जैसे- राजनीतिक, सुरक्षा, व्यापार एवं अर्थव्यवस्था, रक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा संस्कृति में सहयोग के संवर्धित स्तर के साथ ही, गुणात्मक रूप से एक नया चरित्र भी हासिल किया है| भारत के लिए रूस का महत्व ऊर्जा सुरक्षा भारत अपना 70% उर्जा जरुरत अलग-अलग क्षेत्रों से पूरा करता है| ईरान पर हालिया अमेरिकी दबाव से भारत के ऊर्जा जरूरतों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा| साथ ही, अगर सऊदी अरब भी विवाद में शामिल हुआ तो पश्चिम एशिया के तनावग्रस्त होने से रूस का महत्व बढेगा क्योंकि इसके पास तेल-गैस का विशाल भंडार मौजूद है| सखालिन क्षेत्र में भारतीय निवेश को इसी कड़ी से जोड़कर देखा जाना चाहिए| आर्कटिक क्षेत्र- लंबा तथा बड़ा महाद्वीपीय शेल्फ; रूस के पूर्वी क्षेत्र में भारत द्वारा 1 बिलियन डॉलर का लाइन ऑफ क्रेडिट देकर ऊर्जा जरूरतों के आगामी पहलुओं को ध्यान में रखना; विभिन्न मुद्दों पर रूस का सहयोग संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में सुधार; बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था(मल्टीपोलर वर्ल्ड आर्डर) को प्रोत्साहन अमेरिका के आक्रामक होने से पश्चिम एशिया में तनाव जिससे भारत के सामने चुनौती तथा रूस का सहयोग महत्वपूर्ण; कोई भी एक ताकत द्वारा अपनी मनमानी करने से रोकना; रूस की क्षमता तथा अमेरिका की क्षमता में अंतर तथा रूस द्वारा वैश्विक भूमिका बढ़ाने में भारत जैसे उभरती शक्तियों का सहयोग लेने की लालसा; विभिन्न क्षेत्रीय मंचों पर सहयोग ब्रिक्स- न्यू डेवलपमेंट बैंक- लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर सभी का बराबर महत्व; इब्सा में रूस को भी सदस्य बनाया जाना; RIC फोरम- रूस-इंडिया-चाइना; अंतर्राष्ट्रीय विश्व व्यवस्था को मजबूत बनाने हेतु नियमों/व्यवस्थाओं पर बल; शांति एवं सुरक्षा हेतु अंतर्राष्ट्रीय एवं मल्टीपोलर सहयोग को बढ़ावा; वैश्विक व्यापार को बढ़ावा देने हेतु एकपक्षीय एक्शन को रोकने में सहयोग; डब्लूटीओ सुधारों हेतु सहयोग; शंघाई सहयोग संगठन- सुरक्षा मुद्दों पर सहयोग; आतंकवाद के विरुद्ध समान सहयोग; जी-20 में विकासशील देशों के मुद्दों पर आर्थिक सहयोग को बढ़ावा; डब्लूटीओ में सहयोग- विवाद निपटान तंत्र में सदस्यों का मुद्दा; INSTC- भारत-ईरान-रूस का अवसंरचना में सहयोग; रूस द्वारा परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह(NSG) एवं एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग(APEC) में भारत की सदस्यता को समर्थन; रक्षा सहयोग 1991 तक 90% रक्षा उपकरण आयात; आज भी 60-70% आयात; यह सिर्फ पैसों का लेनदेन नहीं बल्कि जॉइंट वेंचर के माध्यम से ट्रान्सफर ऑफ टेक्नोलॉजी पर भी आधारित; रक्षा क्षमता बढ़ाने में सहयोग- मेक इन इंडिया में सहयोग; पाकिस्तान को एडवांस डिफेंस सिस्टम नहीं देना जो कि भारत के राजनीतिक हितों के साथ; दोनों देशों का एक दूसरे के लिए महत्व; सुखोई के रूप में पांचवीं पीढ़ी के विमान का मिलकर बनाना;सुखोई -30; एस-400 मिसाईल डिफेंस सिस्टम; ब्रह्मोस; मिग विमान; आइनएस विक्रमादित्य आदि; ट्रेनिंग तथा मिलिट्री एक्सरसाइज- इंद्र; एक बड़ा बाजार तथा विकसित तथा उच्च उपभोग अर्थव्यवस्था के कारण भारत के लिए संभावनाएं; कृषि उत्पादों तथा खाद्य प्रसंस्करण; लौह-इस्पात; सॉफ्टवेर प्रौद्योगिकी आदि में भारत के लिए संभावनाएं; सिनेमा में सहयोग; चीन तथा पाकिस्तान के विरुद्ध भूराजनीतिक एवं भूसामरिक बैलेंस बल के रूप में भूमिका; 1971 से समय से ही रूस द्वारा यह भूमिका का निर्वहन; कनेक्टिविटी में सहयोग अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण ट्रांसपोर्ट गलियारा(INSTC); ईरान के रास्ते रूस तथा यूरोप तक पहुँच का मार्ग; चीन के OBOR का संभावित विकल्प; हाई स्पीड रेलवे- नागपुर-सिकंदराबाद; ग्रीन कॉरिडोर प्रोजेक्ट में सहयोग; टाइम टेस्टेड रिलेशन - संबंधों का समय के साथ परीक्षा तथा उनपर खरा उतरना; बांग्लादेश निर्माण के समय पूरी दुनिया द्वारा सहयोग ना करने पर ही रूस के द्वारा सहयोग; अंतरिक्ष तथा स्पेस प्रोग्राम में सहयोग- आर्यभट्ट; अंतरिक्ष यात्री प्रोग्राम; नाभिकीय संयत्रों की स्थापना में सहयोग जैसे- कुडानकुलम; अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में सहयोग जी-20 में सहयोग; कश्मीर पर भारत के रुख का समर्थन; भारत-चीन विवाद को हल करने में महत्वपूर्ण भूमिका; रूस-चीन-भारत त्रिपक्षीय गुट के माध्यम से; स्पेस तथा विज्ञान एवं तकनीक क्षेत्र में सहयोग ग्लोनास(GLONASS); नाविक(NAVIC); ROSPATENT और ट्रेडिशनल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी(TKDL); भारत-रूस संबंधों में चुनौतियाँ रूस-चीन सहयोग तथा इससे भारत पर प्रभाव ओबोर तथा CPEC को लेकर; सुरक्षा परिषद् में; SCO एवं ब्रिक्स में; सैन्य, आर्थिक एवं ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग; मध्य एशिया तथा मध्यपूर्व क्षेत्र में एकसमान हित; कुछ क्षेत्रों के संदर्भ में पश्चिमी जगत से अलग वैकल्पिक सोच- ईरान; सीरिया; इससे प्रभाव - भारत की सामरिक स्वायतत्ता सीमित; आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई का कमजोर होना; भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव; अगर रूस द्वारा उच्च रक्षा तकनीकी का चीन को हस्तातंरण तो भारत की सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव; भारतीय विदेश नीति के सामने में रूस तथा अमेरिका में से किसी एक को चुनने का प्रश्न; रूस तथा पाकिस्तान के मध्य सहयोग रूस का पाकिस्तान की तरफ झुकाव - ओबोर तथा CPEC से लाभ लेने की मंशा; गर्म जल के बंदरगाहों(ग्वादर) तक पहुँच की मंशा; अफगानिस्तान से अमेरिका के बाहर निकलने से रूस की रणनीतिक संभावनाएं; भारत का मिलिट्री साजोसामान बास्केट में विविधता लाने का प्रयास के कारण रूस का सशंकित होना आदि; पाकिस्तान का रूस की तरफ झुकाव- चीन के सहयोगी के कारण; रूस का CASA-1000 से संभावित जुड़ाव; अमेरिका पर निर्भरता कम करना तथा उससे मोलतोल करना; अमेरिका से हालिया विवादों से रणनीतिक विकल्प ढूँढना; भारत-रूस संबंधों में जटिलता लाना; आर्थिक तथा अवसंरचनात्मक सहयोग एवं मिलिट्री सप्लाइज तथा तकनीक प्राप्त करने हेतु पाक का रूस के साथ सहयोग; भारत पर इसका प्रभाव - हालाँकि भारत-रूस के बहुआयामी तथा गहरे संबंधों से रूस-पाकिस्तान सहयोग का कम प्रभाव पड़ेगा लेकिन निम्न चिंताएँ भी सामने आती हैं-रूस-चीन-पाकिस्तान धुरी बनने की आशंका; पाकिस्तान के साथ उच्च रक्षा तकनीकी सहयोग होने पर भारत-रूस संबंधों पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव; तालिबान तथा अफगानिस्तान में आतंकवाद पर अलग-अलग विचार; भारत का अमेरिका की ओर बढ़ता झुकाव जिससे रूस का सशंकित होना; उपरोक्त चिंताओं को देखते हुए भारतीय कूटनीति को सावधानीपूर्वक एक व्यापक नीति बनाने की आवश्यकता है क्योंकि मित्र तो अनेक नए बनाए जा सकते हैं लेकिन एक पुराना मित्र कई नए मित्रों से ज्यादा भरोसेमंद तथा विश्वासी होता है| साथ ही, हर पहलुओं में भारतीय हितों को भी प्राथमिकता देने का सिद्धांत भी अवश्य याद रखना चाहिए| इसके लिए कई उपाय आजमाए जा सकते हैं जैसे-रूस के साथ सहयोग में प्रगाढ़ता लाना;परस्पर त्रिपक्षीय सहयोग को बढ़ावा(रूस-चीन-भारत) आदि|कूटनीतिक संबंधों के 70 वर्ष पूरा होने परसेंट पीटसबर्ग डिक्लेरेशन(2017) में इन्हीं पहलुओं की ओर रेखांकित किया गया है|किसी भी देश के साथ सहयोग बढ़ाना सही कदम है किंतु रूस के साथ सहयोग को कभी नजरअंदाज नहीं करना ही लंबे समय में लाभकारी रहेगा|
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##Question:भारत के लिए रूस का विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक महत्व का उल्लेख कीजिए| साथ ही स्पष्ट कीजिये कि दोनों देशों के मध्य संबंधों में कौन-कौन सी चुनौतियाँ विद्यमान है? (150-200 शब्द/10 अंक) Mention that russia has wide importance in various fields for India. Also, explain that what are the challenges in the relationship between the two countries? (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच- भारत-रूस संबंधों की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में, भारत के लिए रूस के व्यापक महत्व को विभिन्न क्षेत्रों के अंतर्गत बिंदुबार लिखिए| अगले भाग में,वर्तमान परिदृश्य में, दोनों देशों के मध्य संबंधों में विद्यमान चुनौती के आयामों का उल्लेख कीजिये| निष्कर्षतः, इस संबंध में आगे की राह बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- भारत तथा रूस एक दूसरे के पारंपरिक सहयोगी तथा घनिष्ट मित्र रहे हैं| 2017 में दोनों देशों ने राजनयिक संबंधों के 70 वर्ष पुरे कर लिए| इसके पहले 2000 में "भारत-रूस सामरिक सहभागिता पर घोषणा" दस्तावेज पर हस्ताक्षर होने के बाद से भारत-रूस ने द्विपक्षीय संबंधों के लगभग सभी आयामों जैसे- राजनीतिक, सुरक्षा, व्यापार एवं अर्थव्यवस्था, रक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा संस्कृति में सहयोग के संवर्धित स्तर के साथ ही, गुणात्मक रूप से एक नया चरित्र भी हासिल किया है| भारत के लिए रूस का महत्व ऊर्जा सुरक्षा भारत अपना 70% उर्जा जरुरत अलग-अलग क्षेत्रों से पूरा करता है| ईरान पर हालिया अमेरिकी दबाव से भारत के ऊर्जा जरूरतों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा| साथ ही, अगर सऊदी अरब भी विवाद में शामिल हुआ तो पश्चिम एशिया के तनावग्रस्त होने से रूस का महत्व बढेगा क्योंकि इसके पास तेल-गैस का विशाल भंडार मौजूद है| सखालिन क्षेत्र में भारतीय निवेश को इसी कड़ी से जोड़कर देखा जाना चाहिए| आर्कटिक क्षेत्र- लंबा तथा बड़ा महाद्वीपीय शेल्फ; रूस के पूर्वी क्षेत्र में भारत द्वारा 1 बिलियन डॉलर का लाइन ऑफ क्रेडिट देकर ऊर्जा जरूरतों के आगामी पहलुओं को ध्यान में रखना; विभिन्न मुद्दों पर रूस का सहयोग संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में सुधार; बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था(मल्टीपोलर वर्ल्ड आर्डर) को प्रोत्साहन अमेरिका के आक्रामक होने से पश्चिम एशिया में तनाव जिससे भारत के सामने चुनौती तथा रूस का सहयोग महत्वपूर्ण; कोई भी एक ताकत द्वारा अपनी मनमानी करने से रोकना; रूस की क्षमता तथा अमेरिका की क्षमता में अंतर तथा रूस द्वारा वैश्विक भूमिका बढ़ाने में भारत जैसे उभरती शक्तियों का सहयोग लेने की लालसा; विभिन्न क्षेत्रीय मंचों पर सहयोग ब्रिक्स- न्यू डेवलपमेंट बैंक- लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर सभी का बराबर महत्व; इब्सा में रूस को भी सदस्य बनाया जाना; RIC फोरम- रूस-इंडिया-चाइना; अंतर्राष्ट्रीय विश्व व्यवस्था को मजबूत बनाने हेतु नियमों/व्यवस्थाओं पर बल; शांति एवं सुरक्षा हेतु अंतर्राष्ट्रीय एवं मल्टीपोलर सहयोग को बढ़ावा; वैश्विक व्यापार को बढ़ावा देने हेतु एकपक्षीय एक्शन को रोकने में सहयोग; डब्लूटीओ सुधारों हेतु सहयोग; शंघाई सहयोग संगठन- सुरक्षा मुद्दों पर सहयोग; आतंकवाद के विरुद्ध समान सहयोग; जी-20 में विकासशील देशों के मुद्दों पर आर्थिक सहयोग को बढ़ावा; डब्लूटीओ में सहयोग- विवाद निपटान तंत्र में सदस्यों का मुद्दा; INSTC- भारत-ईरान-रूस का अवसंरचना में सहयोग; रूस द्वारा परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह(NSG) एवं एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग(APEC) में भारत की सदस्यता को समर्थन; रक्षा सहयोग 1991 तक 90% रक्षा उपकरण आयात; आज भी 60-70% आयात; यह सिर्फ पैसों का लेनदेन नहीं बल्कि जॉइंट वेंचर के माध्यम से ट्रान्सफर ऑफ टेक्नोलॉजी पर भी आधारित; रक्षा क्षमता बढ़ाने में सहयोग- मेक इन इंडिया में सहयोग; पाकिस्तान को एडवांस डिफेंस सिस्टम नहीं देना जो कि भारत के राजनीतिक हितों के साथ; दोनों देशों का एक दूसरे के लिए महत्व; सुखोई के रूप में पांचवीं पीढ़ी के विमान का मिलकर बनाना;सुखोई -30; एस-400 मिसाईल डिफेंस सिस्टम; ब्रह्मोस; मिग विमान; आइनएस विक्रमादित्य आदि; ट्रेनिंग तथा मिलिट्री एक्सरसाइज- इंद्र; एक बड़ा बाजार तथा विकसित तथा उच्च उपभोग अर्थव्यवस्था के कारण भारत के लिए संभावनाएं; कृषि उत्पादों तथा खाद्य प्रसंस्करण; लौह-इस्पात; सॉफ्टवेर प्रौद्योगिकी आदि में भारत के लिए संभावनाएं; सिनेमा में सहयोग; चीन तथा पाकिस्तान के विरुद्ध भूराजनीतिक एवं भूसामरिक बैलेंस बल के रूप में भूमिका; 1971 से समय से ही रूस द्वारा यह भूमिका का निर्वहन; कनेक्टिविटी में सहयोग अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण ट्रांसपोर्ट गलियारा(INSTC); ईरान के रास्ते रूस तथा यूरोप तक पहुँच का मार्ग; चीन के OBOR का संभावित विकल्प; हाई स्पीड रेलवे- नागपुर-सिकंदराबाद; ग्रीन कॉरिडोर प्रोजेक्ट में सहयोग; टाइम टेस्टेड रिलेशन - संबंधों का समय के साथ परीक्षा तथा उनपर खरा उतरना; बांग्लादेश निर्माण के समय पूरी दुनिया द्वारा सहयोग ना करने पर ही रूस के द्वारा सहयोग; अंतरिक्ष तथा स्पेस प्रोग्राम में सहयोग- आर्यभट्ट; अंतरिक्ष यात्री प्रोग्राम; नाभिकीय संयत्रों की स्थापना में सहयोग जैसे- कुडानकुलम; अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में सहयोग जी-20 में सहयोग; कश्मीर पर भारत के रुख का समर्थन; भारत-चीन विवाद को हल करने में महत्वपूर्ण भूमिका; रूस-चीन-भारत त्रिपक्षीय गुट के माध्यम से; स्पेस तथा विज्ञान एवं तकनीक क्षेत्र में सहयोग ग्लोनास(GLONASS); नाविक(NAVIC); ROSPATENT और ट्रेडिशनल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी(TKDL); भारत-रूस संबंधों में चुनौतियाँ रूस-चीन सहयोग तथा इससे भारत पर प्रभाव ओबोर तथा CPEC को लेकर; सुरक्षा परिषद् में; SCO एवं ब्रिक्स में; सैन्य, आर्थिक एवं ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग; मध्य एशिया तथा मध्यपूर्व क्षेत्र में एकसमान हित; कुछ क्षेत्रों के संदर्भ में पश्चिमी जगत से अलग वैकल्पिक सोच- ईरान; सीरिया; इससे प्रभाव - भारत की सामरिक स्वायतत्ता सीमित; आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई का कमजोर होना; भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव; अगर रूस द्वारा उच्च रक्षा तकनीकी का चीन को हस्तातंरण तो भारत की सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव; भारतीय विदेश नीति के सामने में रूस तथा अमेरिका में से किसी एक को चुनने का प्रश्न; रूस तथा पाकिस्तान के मध्य सहयोग रूस का पाकिस्तान की तरफ झुकाव - ओबोर तथा CPEC से लाभ लेने की मंशा; गर्म जल के बंदरगाहों(ग्वादर) तक पहुँच की मंशा; अफगानिस्तान से अमेरिका के बाहर निकलने से रूस की रणनीतिक संभावनाएं; भारत का मिलिट्री साजोसामान बास्केट में विविधता लाने का प्रयास के कारण रूस का सशंकित होना आदि; पाकिस्तान का रूस की तरफ झुकाव- चीन के सहयोगी के कारण; रूस का CASA-1000 से संभावित जुड़ाव; अमेरिका पर निर्भरता कम करना तथा उससे मोलतोल करना; अमेरिका से हालिया विवादों से रणनीतिक विकल्प ढूँढना; भारत-रूस संबंधों में जटिलता लाना; आर्थिक तथा अवसंरचनात्मक सहयोग एवं मिलिट्री सप्लाइज तथा तकनीक प्राप्त करने हेतु पाक का रूस के साथ सहयोग; भारत पर इसका प्रभाव - हालाँकि भारत-रूस के बहुआयामी तथा गहरे संबंधों से रूस-पाकिस्तान सहयोग का कम प्रभाव पड़ेगा लेकिन निम्न चिंताएँ भी सामने आती हैं-रूस-चीन-पाकिस्तान धुरी बनने की आशंका; पाकिस्तान के साथ उच्च रक्षा तकनीकी सहयोग होने पर भारत-रूस संबंधों पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव; तालिबान तथा अफगानिस्तान में आतंकवाद पर अलग-अलग विचार; भारत का अमेरिका की ओर बढ़ता झुकाव जिससे रूस का सशंकित होना; उपरोक्त चिंताओं को देखते हुए भारतीय कूटनीति को सावधानीपूर्वक एक व्यापक नीति बनाने की आवश्यकता है क्योंकि मित्र तो अनेक नए बनाए जा सकते हैं लेकिन एक पुराना मित्र कई नए मित्रों से ज्यादा भरोसेमंद तथा विश्वासी होता है| साथ ही, हर पहलुओं में भारतीय हितों को भी प्राथमिकता देने का सिद्धांत भी अवश्य याद रखना चाहिए| इसके लिए कई उपाय आजमाए जा सकते हैं जैसे-रूस के साथ सहयोग में प्रगाढ़ता लाना;परस्पर त्रिपक्षीय सहयोग को बढ़ावा(रूस-चीन-भारत) आदि|कूटनीतिक संबंधों के 70 वर्ष पूरा होने परसेंट पीटसबर्ग डिक्लेरेशन(2017) में इन्हीं पहलुओं की ओर रेखांकित किया गया है|किसी भी देश के साथ सहयोग बढ़ाना सही कदम है किंतु रूस के साथ सहयोग को कभी नजरअंदाज नहीं करना ही लंबे समय में लाभकारी रहेगा|
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कश्मीर में सीमा प्रबंधन के संदर्भ में सरकार का दृष्टिकोण व्यापक हुआ है किन्तु कुछ समस्याएं अभी भी बनी हुई हैं| अतः कुछ ऐसे उपाय सुझाइए जिनसे बेहतर सीमा प्रबंधन करते हुए कश्मीर में शान्ति एवं स्थिरता स्थापित की जा सके| (150 से 200 शब्द/10 अंक) The Government"s approach of border management in Kashmir has been broadened, but some problems still remain. Therefore, suggest some measures by which peace and stability can be established in Kashmir by better border management. (150 to 200 words/10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में कश्मीर सीमा विवाद को समझाते हुए भारत के लिए कश्मीर का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में सीमा प्रबंधन के सन्दर्भ में सरकार का दृष्टिकोण और उपस्थित समस्याओं को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में कश्मीर में शान्ति और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए सीमा प्रबंधन रणनीति को सुझाइए 4- अंतिम में सीमा प्रबंधन का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| स्वतंत्रता के बाद से ही पाकिस्तान कश्मीर को विवादित क्षेत्र मानता है| इसी के कारण कश्मीर सीमा विवाद की पृष्ठभूमि निर्मित होती है| इसी पृष्ठभूमि में 1972 में दोनों देशों ने शिमला समझौते पर हस्ताक्षर किये और सितम्बर 1971 में निर्धारित युद्ध विराम रेखा को LOC के रूप में मान्यता प्रदान की| LOC 776 किमी लम्बी है जो कि जम्मू के कुछ भागों से निकल कर राजौरी, पुंछ, बारामौला, कुपवाड़ा, द्रास, कारगिल और लेह से हो कर गुजरती है| 1972 से लेकर वर्ष 2000 तक कुछ प्रत्यक्ष हस्तक्षेपों जैसे ऑपरेशन मेघदूत और कारगिल युद्ध को छोड़ कर अन्य कोई अन्य महत्वपूर्ण घटना नहीं हुई|| किन्तु इस दौरान छद्म युद्दों को आधार बना कर पाकिस्तान ने भारतीय सीमाओं की सुरक्षा को आहत किया| ऐसे छद्म युद्धों में पाकिस्तान ने घुसपैठ, अलगाववादी संगठनों को सहयोग, भारत में वहाबी विचारधारा का प्रसार, हथियारों, मादक पदार्थों एवं नकली नोटों की तस्करी को बढ़ावा दिया है| पाकिस्तान की इन गतिविधियों से भारत की जटिलताएं अपेक्षाकृत अधिक बढ़ गयीं| किन्तु CPEC और चीन के प्रतिसंतुलन, बाखान गलियारा तक सशक्त उपस्थिति, कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास,वहाबी विचारधारा के प्रसार को रोकने के लिए, अलगाववाद को रोकने के लिएकश्मीर में बेहतर सीमा प्रबंधन की आवश्यकता महसूस की गयी कश्मीर में सीमा प्रबंधन के लिए भारत सरकार का दृष्टिकोण 1980 से 2003 के मध्य कश्मीर में निगरानी के माध्यम से अवैध घुसपैठ रोकने के प्रयास किया गया 2003 के बाद से सीमावर्ती क्षेत्रों में अवसंरचना विकास के साथ साथ सीमा बलों को सशक्त करने के प्रयास किये गए नवम्बर 2018 में त्रिसूत्रीय कार्यक्रम अपनाया गया है इसके अंतर्गत भौतिक अवसंरचना के माध्यम से सीमा की मजबूती, सीमाबलों का सशक्तिकरण एवं संतुष्टि स्तर बढ़ाना तथा कश्मीरी नागरिकों की संतुष्टि स्तर को बढ़ाना अवसंरचना विकास के अंतर्गत भौतिक संरचना का विकास जैसे सीमावर्ती सड़क निर्माण इससे सेना की गतिशीलता बढ़ेगी, सीमावर्ती क्षेत्रों में सामाजिक संरचना ताकि स्थानीय नागरिकों के संतुष्टि स्तर को बढ़ाया जा सके और अलगाववाद को रोका जा सके, राजनीतिक संरचना का विकास जैसे जन भागीदारी, संघीय नियंत्रण को मजबूत करना ताकि राजनीतिक समावेशन किया जा सके| सीमा को मजबूत करने के लिए भारत सरकार द्वारा द्विपंक्ति बाड़बंदी एवं सेंसरयुक्त बाड़बंदी की जा रही है| ध्यातव्य है कि ये सेंसर भूमि के नीचे की गतिविधियों को भी सेन्स कर सकते हैं| पूरी सीमा पर फ्लडलाइट स्थापित की जा रही हैं तथा सीमा सुरक्षाबल चौकियों की स्थापना की जा रही हैंतथा सैनिकों को पास पास तैनात किया जा रहा है| अलगाववाद पर नियंत्रण स्थापित करने हेतु संविधान द्वारा प्रदत्त विशिष्ट स्थिति को समाप्त करके कश्मीर को संघ शासित राज्य बनाया गया है | उपरोक्त के अतिरिक्त कश्मीर की सामाजिक अवसंरचना के विकास के प्रयास किये जा रहे हैं| सीमा प्रबंधन में आ रही समस्याएं हालांकि कुछ कमी आई है किन्तु अवैध अप्रवासन अभी भी हो रहा है सीमापार आतंकवाद की समस्या अभी भी बनी हुई है मादक पदार्थों, हथियारों की तस्करी एवंजाली नोटों के माध्यम से अलगाववादियों का वित्तीयन भारत विरोधी विचारधाराओं को सोशल मीडिया के माध्यम से प्रसारित किया जा रहा है| बेहतर सीमा प्रबंधन के लिए सुझाव सीमा बलों के उत्तरदायित्व में विस्तार किया जाना चाहिए जैसे बलों के द्वारा सीमावर्ती क्षेत्र में राष्ट्रीय भावना को मजबूत करने का प्रयास किया जाना चाहिए कश्मीर के अलगाववादियों को सीमापार से मिलने वाले आर्थिक, सैनिक एवं मनोवैज्ञानिक सहयोग को रोकने की आवश्यकता है सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास के माध्यम से स्थानीय नागरिकों के असंतोष में कमी लाने के प्रयास किये जाने चाहिए शेष भारत के साथ अंतःक्रिया को मजबूत करने के प्रयास किये जा सकते हैं| राजनीतिक समाजीकरण करने के लिए कश्मीर में शेष भारत के बुद्धिजीवी वर्ग का नियोजन किया जा सकता है ताकि वैचारिक आधार का विकास किया जा सके| पाठ्यक्रम में बदलाव के माध्यम से राष्ट्रीयता की भावना का विकास करने का प्रयास किया जा सकता है| इसके साथ ही धार्मिक शिक्षा के साथ ही लौकिक एवं व्यावसायिक शिक्षा का भी समावेश किया जाना चाहिए विकासात्मक कार्यक्रमों के प्रेरण के माध्यम से सापेक्षिक वंचना की भावना को कम करने के लिए अधिकाधिक मात्रा में रोजगार सृजन किया जाना चाहिए इसके लिए सिनेमा उद्योग, कुटीर उद्योग, पर्यटन उद्योग का विकास किया जा सकता है पाकिस्तान पर अंतर्राष्ट्रीय दबावों के माध्यम से नियंत्रण करने की आवश्यकता है उपरोक्त के अतरिक्त सोशल मीडिया पर उचित दिशा में नियंत्रण करना आवश्यक है ताकि राष्ट्रविरोधी भावना के प्रसार को रोका जा सके और बेहतर तथा प्रभावी सीमा प्रबंधन के माध्यम से भारत की अख्नाद्ता को सुनिश्चित किया जा सके|
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##Question:कश्मीर में सीमा प्रबंधन के संदर्भ में सरकार का दृष्टिकोण व्यापक हुआ है किन्तु कुछ समस्याएं अभी भी बनी हुई हैं| अतः कुछ ऐसे उपाय सुझाइए जिनसे बेहतर सीमा प्रबंधन करते हुए कश्मीर में शान्ति एवं स्थिरता स्थापित की जा सके| (150 से 200 शब्द/10 अंक) The Government"s approach of border management in Kashmir has been broadened, but some problems still remain. Therefore, suggest some measures by which peace and stability can be established in Kashmir by better border management. (150 to 200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में कश्मीर सीमा विवाद को समझाते हुए भारत के लिए कश्मीर का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में सीमा प्रबंधन के सन्दर्भ में सरकार का दृष्टिकोण और उपस्थित समस्याओं को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में कश्मीर में शान्ति और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए सीमा प्रबंधन रणनीति को सुझाइए 4- अंतिम में सीमा प्रबंधन का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| स्वतंत्रता के बाद से ही पाकिस्तान कश्मीर को विवादित क्षेत्र मानता है| इसी के कारण कश्मीर सीमा विवाद की पृष्ठभूमि निर्मित होती है| इसी पृष्ठभूमि में 1972 में दोनों देशों ने शिमला समझौते पर हस्ताक्षर किये और सितम्बर 1971 में निर्धारित युद्ध विराम रेखा को LOC के रूप में मान्यता प्रदान की| LOC 776 किमी लम्बी है जो कि जम्मू के कुछ भागों से निकल कर राजौरी, पुंछ, बारामौला, कुपवाड़ा, द्रास, कारगिल और लेह से हो कर गुजरती है| 1972 से लेकर वर्ष 2000 तक कुछ प्रत्यक्ष हस्तक्षेपों जैसे ऑपरेशन मेघदूत और कारगिल युद्ध को छोड़ कर अन्य कोई अन्य महत्वपूर्ण घटना नहीं हुई|| किन्तु इस दौरान छद्म युद्दों को आधार बना कर पाकिस्तान ने भारतीय सीमाओं की सुरक्षा को आहत किया| ऐसे छद्म युद्धों में पाकिस्तान ने घुसपैठ, अलगाववादी संगठनों को सहयोग, भारत में वहाबी विचारधारा का प्रसार, हथियारों, मादक पदार्थों एवं नकली नोटों की तस्करी को बढ़ावा दिया है| पाकिस्तान की इन गतिविधियों से भारत की जटिलताएं अपेक्षाकृत अधिक बढ़ गयीं| किन्तु CPEC और चीन के प्रतिसंतुलन, बाखान गलियारा तक सशक्त उपस्थिति, कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास,वहाबी विचारधारा के प्रसार को रोकने के लिए, अलगाववाद को रोकने के लिएकश्मीर में बेहतर सीमा प्रबंधन की आवश्यकता महसूस की गयी कश्मीर में सीमा प्रबंधन के लिए भारत सरकार का दृष्टिकोण 1980 से 2003 के मध्य कश्मीर में निगरानी के माध्यम से अवैध घुसपैठ रोकने के प्रयास किया गया 2003 के बाद से सीमावर्ती क्षेत्रों में अवसंरचना विकास के साथ साथ सीमा बलों को सशक्त करने के प्रयास किये गए नवम्बर 2018 में त्रिसूत्रीय कार्यक्रम अपनाया गया है इसके अंतर्गत भौतिक अवसंरचना के माध्यम से सीमा की मजबूती, सीमाबलों का सशक्तिकरण एवं संतुष्टि स्तर बढ़ाना तथा कश्मीरी नागरिकों की संतुष्टि स्तर को बढ़ाना अवसंरचना विकास के अंतर्गत भौतिक संरचना का विकास जैसे सीमावर्ती सड़क निर्माण इससे सेना की गतिशीलता बढ़ेगी, सीमावर्ती क्षेत्रों में सामाजिक संरचना ताकि स्थानीय नागरिकों के संतुष्टि स्तर को बढ़ाया जा सके और अलगाववाद को रोका जा सके, राजनीतिक संरचना का विकास जैसे जन भागीदारी, संघीय नियंत्रण को मजबूत करना ताकि राजनीतिक समावेशन किया जा सके| सीमा को मजबूत करने के लिए भारत सरकार द्वारा द्विपंक्ति बाड़बंदी एवं सेंसरयुक्त बाड़बंदी की जा रही है| ध्यातव्य है कि ये सेंसर भूमि के नीचे की गतिविधियों को भी सेन्स कर सकते हैं| पूरी सीमा पर फ्लडलाइट स्थापित की जा रही हैं तथा सीमा सुरक्षाबल चौकियों की स्थापना की जा रही हैंतथा सैनिकों को पास पास तैनात किया जा रहा है| अलगाववाद पर नियंत्रण स्थापित करने हेतु संविधान द्वारा प्रदत्त विशिष्ट स्थिति को समाप्त करके कश्मीर को संघ शासित राज्य बनाया गया है | उपरोक्त के अतिरिक्त कश्मीर की सामाजिक अवसंरचना के विकास के प्रयास किये जा रहे हैं| सीमा प्रबंधन में आ रही समस्याएं हालांकि कुछ कमी आई है किन्तु अवैध अप्रवासन अभी भी हो रहा है सीमापार आतंकवाद की समस्या अभी भी बनी हुई है मादक पदार्थों, हथियारों की तस्करी एवंजाली नोटों के माध्यम से अलगाववादियों का वित्तीयन भारत विरोधी विचारधाराओं को सोशल मीडिया के माध्यम से प्रसारित किया जा रहा है| बेहतर सीमा प्रबंधन के लिए सुझाव सीमा बलों के उत्तरदायित्व में विस्तार किया जाना चाहिए जैसे बलों के द्वारा सीमावर्ती क्षेत्र में राष्ट्रीय भावना को मजबूत करने का प्रयास किया जाना चाहिए कश्मीर के अलगाववादियों को सीमापार से मिलने वाले आर्थिक, सैनिक एवं मनोवैज्ञानिक सहयोग को रोकने की आवश्यकता है सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास के माध्यम से स्थानीय नागरिकों के असंतोष में कमी लाने के प्रयास किये जाने चाहिए शेष भारत के साथ अंतःक्रिया को मजबूत करने के प्रयास किये जा सकते हैं| राजनीतिक समाजीकरण करने के लिए कश्मीर में शेष भारत के बुद्धिजीवी वर्ग का नियोजन किया जा सकता है ताकि वैचारिक आधार का विकास किया जा सके| पाठ्यक्रम में बदलाव के माध्यम से राष्ट्रीयता की भावना का विकास करने का प्रयास किया जा सकता है| इसके साथ ही धार्मिक शिक्षा के साथ ही लौकिक एवं व्यावसायिक शिक्षा का भी समावेश किया जाना चाहिए विकासात्मक कार्यक्रमों के प्रेरण के माध्यम से सापेक्षिक वंचना की भावना को कम करने के लिए अधिकाधिक मात्रा में रोजगार सृजन किया जाना चाहिए इसके लिए सिनेमा उद्योग, कुटीर उद्योग, पर्यटन उद्योग का विकास किया जा सकता है पाकिस्तान पर अंतर्राष्ट्रीय दबावों के माध्यम से नियंत्रण करने की आवश्यकता है उपरोक्त के अतरिक्त सोशल मीडिया पर उचित दिशा में नियंत्रण करना आवश्यक है ताकि राष्ट्रविरोधी भावना के प्रसार को रोका जा सके और बेहतर तथा प्रभावी सीमा प्रबंधन के माध्यम से भारत की अख्नाद्ता को सुनिश्चित किया जा सके|
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Scientific research in Indian Universities is declining, because a career in science is not as attractive as our business operations, engineering or administration and the universities are becoming consumer-oriented. Critically Comment. ( 150 words/10 marks)
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Basic Approach- 1. Briefly list down the reasons for students opting for engineering, administration and business operations more than that of scientific research 2. Suggest way forward to resolve the above issues Answer - Every year in newspaper and media we come across the news of graduates from IIT"s, IIM"s being placed with a huge salary of eight figures. Which made our understanding limited to jobs, placement and pay scale. This is also observed in students who are increasingly emphasizing on prestige, influence and monetary compensations. As of now all of these factors are fulfilled by engineering, administration or MBA courses. Because of this over the years the lesser and lesser emphasis is being given on courses related to scientific research, rarely do we see students opting there the first preference to research domain. This can also be verified by interviews of board toppers when they are asked about their future plans. This has made a shift in the scale as now India is producing more engineers, MBA"s then it really needs. At the same time, there is a dearth of researchers in India. This has also resulted in a lesser number of patients filled by India in comparison to the US, China, and Japan. Where, as per the figure of WIPO the patents filledwere 56,142 for the US, followed by China (53,345) and Japan (49,702), in comparison to India which has filled just1,583 patents in 2018. This itself is the indicator that India needs to stress more on its scientific research institutes. Another major reason for such a situation is the funding of universities in India. where they heavily rely on government funding, which makes them function like business enterprises, focussing on early results. In other comparable countries like the US. Europe, Japan, etc. The research institutes and universities collaborate with corporate organizations for their fundings. Who not only finance their projects but also donate a substantial amount for functioning on institutes. This reason has severely restricted the development of Indian institutes. Another reason for such a scenario is a low fee in Indian universities which makesstudents the ‘consumer’, and the university the ‘corporation’ fulfilling the demand for certain courses. There is also the issue of rote learning in India, where from the beginning of education we focus on rot learning then the practical applications. Wayforward - Allowing universities and research institutes to find there own fundings through collaboration with corporations. Making institutes free to design course and fee structure. Creating an ecosystem wherein innovations are rewarded monetarily. Encouraging institutes to file more patent.
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##Question:Scientific research in Indian Universities is declining, because a career in science is not as attractive as our business operations, engineering or administration and the universities are becoming consumer-oriented. Critically Comment. ( 150 words/10 marks)##Answer:Basic Approach- 1. Briefly list down the reasons for students opting for engineering, administration and business operations more than that of scientific research 2. Suggest way forward to resolve the above issues Answer - Every year in newspaper and media we come across the news of graduates from IIT"s, IIM"s being placed with a huge salary of eight figures. Which made our understanding limited to jobs, placement and pay scale. This is also observed in students who are increasingly emphasizing on prestige, influence and monetary compensations. As of now all of these factors are fulfilled by engineering, administration or MBA courses. Because of this over the years the lesser and lesser emphasis is being given on courses related to scientific research, rarely do we see students opting there the first preference to research domain. This can also be verified by interviews of board toppers when they are asked about their future plans. This has made a shift in the scale as now India is producing more engineers, MBA"s then it really needs. At the same time, there is a dearth of researchers in India. This has also resulted in a lesser number of patients filled by India in comparison to the US, China, and Japan. Where, as per the figure of WIPO the patents filledwere 56,142 for the US, followed by China (53,345) and Japan (49,702), in comparison to India which has filled just1,583 patents in 2018. This itself is the indicator that India needs to stress more on its scientific research institutes. Another major reason for such a situation is the funding of universities in India. where they heavily rely on government funding, which makes them function like business enterprises, focussing on early results. In other comparable countries like the US. Europe, Japan, etc. The research institutes and universities collaborate with corporate organizations for their fundings. Who not only finance their projects but also donate a substantial amount for functioning on institutes. This reason has severely restricted the development of Indian institutes. Another reason for such a scenario is a low fee in Indian universities which makesstudents the ‘consumer’, and the university the ‘corporation’ fulfilling the demand for certain courses. There is also the issue of rote learning in India, where from the beginning of education we focus on rot learning then the practical applications. Wayforward - Allowing universities and research institutes to find there own fundings through collaboration with corporations. Making institutes free to design course and fee structure. Creating an ecosystem wherein innovations are rewarded monetarily. Encouraging institutes to file more patent.
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"The caste system has assumed new identities and associational forms. Hence it cannot be eradicated in India." Comment (10 Marks/150 words)
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Approach: Introduction: Briefly introduce the concept of caste system in Indian society. Body: Explain the new forms in which the caste system persists in contemporary India. Conclusion: Give a balanced conclusion with some way forward. Model Answer: The caste system, which is unique to Indian society, is a social system where the hereditary occupational division was sanctioned by rituals. Members of the same caste group were supposed to form a social community that practiced the same or similar occupation, married within the caste group and did not eat with members from other caste groups. Partly due to the government efforts and partly due to other socio-economic changes, castes and the caste system in modern India have undergone great changes. With economic development, large scale Urbanization, growth of literacy and education, OCCUPATIONAL MOBILITY and the weakening of the position of landlords in the villages, the old notions of caste hierarchy are breaking down. Yet caste has not disappeared from contemporary India and in fact, the Caste system is assuming new identities and associational forms in the following ways: The emergence of Caste associations likeKayastha Samaj, Kshatriya Sabha, Teli association, Vaishya Mahasabha, Jat Sabha, Kurmi Mahasabha, Koeri Mahasabha, Bhumihar-Brahmin Mahasabha. The main purpose of these caste associations has always been to safeguard the interests of their members by building hostels, hospitals, colleges, schools, houses on a cooperative basis, banks, and by founding journals and endowing scholarships. Therefore, after Independence caste associations tended to become political pressure groups demanding for their members" electoral tickets from the political parties. posts in the cabinet. Licenses for undertaking various economic activities, concessions and privileges in education and appointment to government jobs, and a variety of other benefits. The process of democratization bestows political power and activity upon groups that have numerical strength provided that strength could be politically mobilized, which is possible if the existential situation of the group as such is homogenous and uniform. These conditions are fulfilled more in the case of lower or subaltern castes. The emergenceof lower caste-based political parties such as B.S.P., I.P.F. S.P., D.M.K., etc. are some good examples. The politicizationof castes is so much that in order to be politically powerful distinct caste groups come together and act collectively. Their coming together sometimes takes the form of a political party or a faction or a pressure group. B.S.P., S.P., R.J.D., and D.M.K. are some of the examples. Even now most people marry within their own caste or tribe. The matrimonial advertisements in the newspaper are evidence of this. Untouchability has not ended completely, despite the constitutional prohibition. It tends to be visible from news stories of caste-based discrimination and prohibition and also from the presence of manual scavenging and honor killings. The caste system has always interacted with and responded to the economic and political forces of society. Changes in the economic and political structures and processes during the modem period have liquidated many traditional characteristics of the caste system and added new features and functions to it. The idea of the caste system has been so deeply ingrained in the Indian mind that, contrary to popular belief it still exists in many parts of India in different forms which need be addressed by the attitudinal changes as well as legislative actions.
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##Question:"The caste system has assumed new identities and associational forms. Hence it cannot be eradicated in India." Comment (10 Marks/150 words)##Answer:Approach: Introduction: Briefly introduce the concept of caste system in Indian society. Body: Explain the new forms in which the caste system persists in contemporary India. Conclusion: Give a balanced conclusion with some way forward. Model Answer: The caste system, which is unique to Indian society, is a social system where the hereditary occupational division was sanctioned by rituals. Members of the same caste group were supposed to form a social community that practiced the same or similar occupation, married within the caste group and did not eat with members from other caste groups. Partly due to the government efforts and partly due to other socio-economic changes, castes and the caste system in modern India have undergone great changes. With economic development, large scale Urbanization, growth of literacy and education, OCCUPATIONAL MOBILITY and the weakening of the position of landlords in the villages, the old notions of caste hierarchy are breaking down. Yet caste has not disappeared from contemporary India and in fact, the Caste system is assuming new identities and associational forms in the following ways: The emergence of Caste associations likeKayastha Samaj, Kshatriya Sabha, Teli association, Vaishya Mahasabha, Jat Sabha, Kurmi Mahasabha, Koeri Mahasabha, Bhumihar-Brahmin Mahasabha. The main purpose of these caste associations has always been to safeguard the interests of their members by building hostels, hospitals, colleges, schools, houses on a cooperative basis, banks, and by founding journals and endowing scholarships. Therefore, after Independence caste associations tended to become political pressure groups demanding for their members" electoral tickets from the political parties. posts in the cabinet. Licenses for undertaking various economic activities, concessions and privileges in education and appointment to government jobs, and a variety of other benefits. The process of democratization bestows political power and activity upon groups that have numerical strength provided that strength could be politically mobilized, which is possible if the existential situation of the group as such is homogenous and uniform. These conditions are fulfilled more in the case of lower or subaltern castes. The emergenceof lower caste-based political parties such as B.S.P., I.P.F. S.P., D.M.K., etc. are some good examples. The politicizationof castes is so much that in order to be politically powerful distinct caste groups come together and act collectively. Their coming together sometimes takes the form of a political party or a faction or a pressure group. B.S.P., S.P., R.J.D., and D.M.K. are some of the examples. Even now most people marry within their own caste or tribe. The matrimonial advertisements in the newspaper are evidence of this. Untouchability has not ended completely, despite the constitutional prohibition. It tends to be visible from news stories of caste-based discrimination and prohibition and also from the presence of manual scavenging and honor killings. The caste system has always interacted with and responded to the economic and political forces of society. Changes in the economic and political structures and processes during the modem period have liquidated many traditional characteristics of the caste system and added new features and functions to it. The idea of the caste system has been so deeply ingrained in the Indian mind that, contrary to popular belief it still exists in many parts of India in different forms which need be addressed by the attitudinal changes as well as legislative actions.
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चर्चा कीजिए कि भारत और रूस के बीच सम्बन्धों का निर्धारण वैश्विक परिस्थितियों की परिवर्तनीयता पर आधारित होता है। (10अंक/150-200 शब्द) Discuss that the relationship between India and Russia is determined by the variability of global conditions. (10marks/150-200 words)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भारत और रूस सम्बन्धों की पृष्ठभूमि पर चर्चा करते हुए उत्तर आरंभ कीजिए। रूस के साथ सम्बन्धों का ऐतिहासिक विवरण दीजिये। समय के साथ भारत द्वारा रूस से समीपता और दूरी को स्पष्ट कीजिए। सबन्धों को और बेहतर बनाने के लिए सुझाव दीजिये। भारत तथा रूस एक दूसरे के पारंपरिक सहयोगी तथा घनिष्ट मित्र रहे हैं। 2017 में दोनों देशों ने राजनयिक संबंधों के 70 वर्ष पुरे कर लिए, इसके पहले 2000 में "भारत-रूस सामरिक सहभागिता पर घोषणा" दस्तावेज पर हस्ताक्षर होने के बाद से भारत-रूस ने द्विपक्षीय संबंधों के लगभग सभी आयामों जैसे- राजनीतिक, सुरक्षा, व्यापार एवं अर्थव्यवस्था, रक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा संस्कृति में सहयोग के संवर्धित स्तर के साथ ही, गुणात्मक रूप से एक नया चरित्र भी हासिल किया है। भारत और रूस के मध्य 1947 से ही बेहतर संबंध है। रूस ने भारी -मशीन निर्माण, खनन, ऊर्जा उत्पादन और इस्पात सयंत्रों के क्षेत्र में निवेश के माध्यम से आर्थिक आत्मनिर्भरता के पाने लक्ष्य को प्राप्त करने में भारत को सहायता प्रदान की थी। अगस्त 1971 में भारत और सोवियत संघ ने शांति, मैत्री एवं सहयोग संधि पर हस्ताक्षर किए थे। यह दोनों देशों के साझा लक्ष्यों की अभिव्यक्ति थी। सोवियत संघ के विघटन के बाद दोनों देशों द्वारा जनवरी 1993 में शांति, मैत्री एवं सहयोग की एक नई संधि को अपनाया गया था। तत्पश्चात 1994 में द्विपक्षीय सैन्य तकनीक समझौते पर हस्ताक्षर किए । वर्ष 2000 में दोनों देशों ने एक रणनीतिक साझेदारी आरंभ की। इसके साथ ही दोनों देशों द्वारा वर्ष 2017 को राजनयिक सम्बन्धों की स्थापना की 70वीं वर्षगांठ के रूप में चिन्हित किया गया है। भारत और रूस सम्बन्धों में वैश्विक परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन: भारत और अमेरिका के साथ बढ़ती निकटता के कारण रूस ने भारत के प्रति अपनी विदेश नीति में रणनीतिक परिवर्तन किए हैं। रूस हेतु यह पश्चित्म के साथ अत्यधिक शत्रुतापूर्ण सम्बन्धों का काल रहा है, इस प्रकार यह रूस को चीन के साथ संबंध स्थापित करने हेतु प्रेरित करता है। जैसे जैसे भारत की रक्षा आवश्यकता बढ़ रही है वैसे वैसे भारत ने दूसरी देश की तरफ़ रुख किया है भारतीय रक्षा आयात में रूस का भाग 2008-2012 के 79 प्रतिशत से घटकर 2013-17 की अवधि में 62 प्रतिशत रह गया है। भारत ने रूस के साथ 5वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान संबंधी परियोजना से स्वयं को हटा लिया है। अपनी सैनिक दक्षता में प्रसार के लिए अमेरिका के साथ LMEO, LSA जैसे समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। भारत ने आर्थिक विकास के लिए चीन, अमेरिका, यूरोप के देशों को महत्व दिया है। रूस के साथ व्यापार की मात्र केवल 10.7 बिलियन डॉलर के स्तर पर ही पहुँच सकी। रूस ने पाकिस्तान के ऊपर से हथियारों के विक्रय संबंधी प्रतिबंध हटा लिया है। पाकिस्तान के साथ सैन्य तकनीक सहयोग समझौते पर भी हस्ताक्षर किए गए थे। रूस ने चीन के OBOR का समर्थन किया है। हालांकि दोनों देशों में अभी भी वैश्विक परिस्थितियों में बदलाव के अनुरूप कूटनीति में सकारात्मक बदलाव किया है: सोची औपचारिक शिखर सम्मेलन में सामरिक साझेदारी पुनः प्रमुखता दी गयी है CAATSA के तहत अमेरिका द्वारा प्रतिबंधों की धमकी के बावजूद S-400 वायु रक्षा प्रणाली और परमाणु ऊर्जा चालित पनडुब्बी खरीद समझौता संपादित किया। मेक इंडिया पहल के तहत Ka-226 हेलीकाप्टर के निर्माण हेतु भी सहमत हुआ है। दोनों देशों के मध्य इंद्रा 2017 सैन्य अभ्यास दोनों देश रेलवे, ऊर्जा एवं अन्य क्षेत्रों में व्यापार को बढ़ावा दे रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा(INSTC) का विकास भारत द्वारा यूरेशियन इकनॉमिक यूनियन(EEU) के मध्य एक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के लिए वार्ता चल रही है। उपरोक्त चर्चा से स्पष्ट है कि समय के साथ साथ भारत और रूस के सम्बन्धों में उतार-चढ़ाव की प्रकृति दिखाई देती है। भारत और रूस ने अपनी अपनी आवश्यकता के अनुसार सम्बन्धों में बदलाव किया है। वर्तमान में भारत का झुकाव अमेरिका, इजराइएल की तरफ बढ़ा रहा है जो रूस के हितों को किसी न किसी रूप से प्रभावित करता है। इसी के परिणामस्वरूप रूस ने चीन और पाकिस्तान की तरफ अपने सम्बन्धों का प्रसार किया है। अतः इस बदलती परिस्थिति में सम्बन्धों को भी नया मोड़ देने की आवश्यकता है। इसके अंतर्गत वर्तमान में SCO, BRICS, आरआईसी जैसे संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
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##Question:चर्चा कीजिए कि भारत और रूस के बीच सम्बन्धों का निर्धारण वैश्विक परिस्थितियों की परिवर्तनीयता पर आधारित होता है। (10अंक/150-200 शब्द) Discuss that the relationship between India and Russia is determined by the variability of global conditions. (10marks/150-200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भारत और रूस सम्बन्धों की पृष्ठभूमि पर चर्चा करते हुए उत्तर आरंभ कीजिए। रूस के साथ सम्बन्धों का ऐतिहासिक विवरण दीजिये। समय के साथ भारत द्वारा रूस से समीपता और दूरी को स्पष्ट कीजिए। सबन्धों को और बेहतर बनाने के लिए सुझाव दीजिये। भारत तथा रूस एक दूसरे के पारंपरिक सहयोगी तथा घनिष्ट मित्र रहे हैं। 2017 में दोनों देशों ने राजनयिक संबंधों के 70 वर्ष पुरे कर लिए, इसके पहले 2000 में "भारत-रूस सामरिक सहभागिता पर घोषणा" दस्तावेज पर हस्ताक्षर होने के बाद से भारत-रूस ने द्विपक्षीय संबंधों के लगभग सभी आयामों जैसे- राजनीतिक, सुरक्षा, व्यापार एवं अर्थव्यवस्था, रक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा संस्कृति में सहयोग के संवर्धित स्तर के साथ ही, गुणात्मक रूप से एक नया चरित्र भी हासिल किया है। भारत और रूस के मध्य 1947 से ही बेहतर संबंध है। रूस ने भारी -मशीन निर्माण, खनन, ऊर्जा उत्पादन और इस्पात सयंत्रों के क्षेत्र में निवेश के माध्यम से आर्थिक आत्मनिर्भरता के पाने लक्ष्य को प्राप्त करने में भारत को सहायता प्रदान की थी। अगस्त 1971 में भारत और सोवियत संघ ने शांति, मैत्री एवं सहयोग संधि पर हस्ताक्षर किए थे। यह दोनों देशों के साझा लक्ष्यों की अभिव्यक्ति थी। सोवियत संघ के विघटन के बाद दोनों देशों द्वारा जनवरी 1993 में शांति, मैत्री एवं सहयोग की एक नई संधि को अपनाया गया था। तत्पश्चात 1994 में द्विपक्षीय सैन्य तकनीक समझौते पर हस्ताक्षर किए । वर्ष 2000 में दोनों देशों ने एक रणनीतिक साझेदारी आरंभ की। इसके साथ ही दोनों देशों द्वारा वर्ष 2017 को राजनयिक सम्बन्धों की स्थापना की 70वीं वर्षगांठ के रूप में चिन्हित किया गया है। भारत और रूस सम्बन्धों में वैश्विक परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन: भारत और अमेरिका के साथ बढ़ती निकटता के कारण रूस ने भारत के प्रति अपनी विदेश नीति में रणनीतिक परिवर्तन किए हैं। रूस हेतु यह पश्चित्म के साथ अत्यधिक शत्रुतापूर्ण सम्बन्धों का काल रहा है, इस प्रकार यह रूस को चीन के साथ संबंध स्थापित करने हेतु प्रेरित करता है। जैसे जैसे भारत की रक्षा आवश्यकता बढ़ रही है वैसे वैसे भारत ने दूसरी देश की तरफ़ रुख किया है भारतीय रक्षा आयात में रूस का भाग 2008-2012 के 79 प्रतिशत से घटकर 2013-17 की अवधि में 62 प्रतिशत रह गया है। भारत ने रूस के साथ 5वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान संबंधी परियोजना से स्वयं को हटा लिया है। अपनी सैनिक दक्षता में प्रसार के लिए अमेरिका के साथ LMEO, LSA जैसे समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। भारत ने आर्थिक विकास के लिए चीन, अमेरिका, यूरोप के देशों को महत्व दिया है। रूस के साथ व्यापार की मात्र केवल 10.7 बिलियन डॉलर के स्तर पर ही पहुँच सकी। रूस ने पाकिस्तान के ऊपर से हथियारों के विक्रय संबंधी प्रतिबंध हटा लिया है। पाकिस्तान के साथ सैन्य तकनीक सहयोग समझौते पर भी हस्ताक्षर किए गए थे। रूस ने चीन के OBOR का समर्थन किया है। हालांकि दोनों देशों में अभी भी वैश्विक परिस्थितियों में बदलाव के अनुरूप कूटनीति में सकारात्मक बदलाव किया है: सोची औपचारिक शिखर सम्मेलन में सामरिक साझेदारी पुनः प्रमुखता दी गयी है CAATSA के तहत अमेरिका द्वारा प्रतिबंधों की धमकी के बावजूद S-400 वायु रक्षा प्रणाली और परमाणु ऊर्जा चालित पनडुब्बी खरीद समझौता संपादित किया। मेक इंडिया पहल के तहत Ka-226 हेलीकाप्टर के निर्माण हेतु भी सहमत हुआ है। दोनों देशों के मध्य इंद्रा 2017 सैन्य अभ्यास दोनों देश रेलवे, ऊर्जा एवं अन्य क्षेत्रों में व्यापार को बढ़ावा दे रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा(INSTC) का विकास भारत द्वारा यूरेशियन इकनॉमिक यूनियन(EEU) के मध्य एक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के लिए वार्ता चल रही है। उपरोक्त चर्चा से स्पष्ट है कि समय के साथ साथ भारत और रूस के सम्बन्धों में उतार-चढ़ाव की प्रकृति दिखाई देती है। भारत और रूस ने अपनी अपनी आवश्यकता के अनुसार सम्बन्धों में बदलाव किया है। वर्तमान में भारत का झुकाव अमेरिका, इजराइएल की तरफ बढ़ा रहा है जो रूस के हितों को किसी न किसी रूप से प्रभावित करता है। इसी के परिणामस्वरूप रूस ने चीन और पाकिस्तान की तरफ अपने सम्बन्धों का प्रसार किया है। अतः इस बदलती परिस्थिति में सम्बन्धों को भी नया मोड़ देने की आवश्यकता है। इसके अंतर्गत वर्तमान में SCO, BRICS, आरआईसी जैसे संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
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“Caste system is assuming new identities and associational forms. Hence, caste system cannot be eradicated in India.” Comment. (150 words)
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Approach: Introduction: Briefly introduce the concept of caste system in Indian society. Body: Explain the new forms in which the caste system persists in contemporary India. Conclusion: Give a balanced conclusion with some way forward. Model Answer: The caste system, which is unique to Indian society, is a social system where the hereditary occupational division was sanctioned by rituals. Members of the same caste group were supposed to form a social community that practiced the same or similar occupation, married within the caste group and did not eat with members from other caste groups. Partly due to the government efforts and partly due to other socio-economic changes, castes and the caste system in modern India have undergone great changes. With economic development, large scale Urbanization, growth of literacy and education, OCCUPATIONAL MOBILITY and the weakening of the position of landlords in the villages, the old notions of caste hierarchy are breaking down. Yet caste has not disappeared from contemporary India and in fact, the Caste system is assuming new identities and associational forms in the following ways: The emergence of Caste associations like Kayastha Samaj, Kshatriya Sabha, Teli association, Vaishya Mahasabha, Jat Sabha, Kurmi Mahasabha, Koeri Mahasabha, Bhumihar-Brahmin Mahasabha. The main purpose of these caste associations has always been to safeguard the interests of their members by building hostels, hospitals, colleges, schools, houses on a cooperative basis, banks, and by founding journals and endowing scholarships. Therefore, after Independence caste associations tended to become political pressure groups demanding for their members" electoral tickets from the political parties. posts in the cabinet. Licenses for undertaking various economic activities, concessions and privileges in education and appointment to government jobs, and a variety of other benefits. The process of democratization bestows political power and activity upon groups that have numerical strength provided that strength could be politically mobilized, which is possible if the existential situation of the group as such is homogenous and uniform. These conditions are fulfilled more in the case of lower or subaltern castes. The emergence of lower caste-based political parties such as B.S.P., I.P.F. S.P., D.M.K., etc. are some good examples. The politicization of castes is so much that in order to be politically powerful distinct caste groups come together and act collectively. Their coming together sometimes takes the form of a political party or a faction or a pressure group. B.S.P., S.P., R.J.D., and D.M.K. are some of the examples. Even now most people marry within their own caste or tribe. The matrimonial advertisements in the newspaper are evidence of this. Untouchability has not ended completely, despite the constitutional prohibition. It tends to be visible from news stories of caste-based discrimination and prohibition and also from the presence of manual scavenging and honor killings. The caste system has always interacted with and responded to the economic and political forces of society. Changes in the economic and political structures and processes during the modem period have liquidated many traditional characteristics of the caste system and added new features and functions to it. The idea of the caste system has been so deeply ingrained in the Indian mind that, contrary to popular belief it still exists in many parts of India in different forms which need be addressed by the attitudinal changes as well as legislative actions.
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##Question:“Caste system is assuming new identities and associational forms. Hence, caste system cannot be eradicated in India.” Comment. (150 words)##Answer:Approach: Introduction: Briefly introduce the concept of caste system in Indian society. Body: Explain the new forms in which the caste system persists in contemporary India. Conclusion: Give a balanced conclusion with some way forward. Model Answer: The caste system, which is unique to Indian society, is a social system where the hereditary occupational division was sanctioned by rituals. Members of the same caste group were supposed to form a social community that practiced the same or similar occupation, married within the caste group and did not eat with members from other caste groups. Partly due to the government efforts and partly due to other socio-economic changes, castes and the caste system in modern India have undergone great changes. With economic development, large scale Urbanization, growth of literacy and education, OCCUPATIONAL MOBILITY and the weakening of the position of landlords in the villages, the old notions of caste hierarchy are breaking down. Yet caste has not disappeared from contemporary India and in fact, the Caste system is assuming new identities and associational forms in the following ways: The emergence of Caste associations like Kayastha Samaj, Kshatriya Sabha, Teli association, Vaishya Mahasabha, Jat Sabha, Kurmi Mahasabha, Koeri Mahasabha, Bhumihar-Brahmin Mahasabha. The main purpose of these caste associations has always been to safeguard the interests of their members by building hostels, hospitals, colleges, schools, houses on a cooperative basis, banks, and by founding journals and endowing scholarships. Therefore, after Independence caste associations tended to become political pressure groups demanding for their members" electoral tickets from the political parties. posts in the cabinet. Licenses for undertaking various economic activities, concessions and privileges in education and appointment to government jobs, and a variety of other benefits. The process of democratization bestows political power and activity upon groups that have numerical strength provided that strength could be politically mobilized, which is possible if the existential situation of the group as such is homogenous and uniform. These conditions are fulfilled more in the case of lower or subaltern castes. The emergence of lower caste-based political parties such as B.S.P., I.P.F. S.P., D.M.K., etc. are some good examples. The politicization of castes is so much that in order to be politically powerful distinct caste groups come together and act collectively. Their coming together sometimes takes the form of a political party or a faction or a pressure group. B.S.P., S.P., R.J.D., and D.M.K. are some of the examples. Even now most people marry within their own caste or tribe. The matrimonial advertisements in the newspaper are evidence of this. Untouchability has not ended completely, despite the constitutional prohibition. It tends to be visible from news stories of caste-based discrimination and prohibition and also from the presence of manual scavenging and honor killings. The caste system has always interacted with and responded to the economic and political forces of society. Changes in the economic and political structures and processes during the modem period have liquidated many traditional characteristics of the caste system and added new features and functions to it. The idea of the caste system has been so deeply ingrained in the Indian mind that, contrary to popular belief it still exists in many parts of India in different forms which need be addressed by the attitudinal changes as well as legislative actions.
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Indian Foreign policy is never uniquely determined by any one factor, but it is the result of interplay of a large number of factors that affect the formulation of Indian foreign policy in different ways in different circumstances. Elaborate. (200 words)
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Approach : In introduction, briefly define the term Foreign Policy. Explain various determinants of Foreign policy. (Student is expected to give specific examples from India as these were discussed in class.) Brief conclusion in the end Answer : Foreign Policy is a strategy or a planned course of action by the decision makers of a state vis a vis other states or international entities aimed at achieving specific goals defined in terms of national interests. The foreign policy of a country is the sum total of the principles, interests and objectives which it seeks to promote through its relations with other countries. Indian Foreign policy is never uniquely determined by any one factor or set of factors, but it is the result of interplay of a large number of factors that affect the formulation of Indian foreign policy in different ways in different circumstances Foreign Policy Determinants Foreign policy of a country is shaped not by one or one set of factors rather it is shaped by multiple factors which are referred to as determinants of foreign policy. Geographical factors: Size (population and area), location and resources determine a country’s foreign policy:India’s strategic location at the centre of the asian arc extending from Aden to Tokyo makes it a gateway to Southeast Asia, Central Asia and West Asia. It was because if this that USA and USSR initially competed to bring India within their sphere of influence during the cold war. India’s location at the head of Indian ocean, along with other determinant of power make India a net security provider in the region. India’s vast coastline necessitates a strong naval diplomacy with the rim countries. India shares man made frontiers with Pakistan, Bangladesh, Myanmar, which requires a strategic approach towards the security of its borders. India unlike USA and UK has to focus on continent as well as its coast in its foreign policy formulation. India’s look East Policy and Look West Policy are determined by geography and also expressed in geographical terms. India’s size and population makes it a contender to UNSC membership Distance is the prime inhibiting factor in development of close relations between India and Latin America. Role of Culture: There are very few civilization states and India is one of them. Therefore India’s world view cannot be separated from its culture. Infact J.Nehru, not only India’s first Prime Minister but the key architect of India’s foreign policy had commented that he is not inventing India’s foreign policy rather merely rediscovering it from its past.India’s commitment to International peace as evident in Art. 51 of the constitution reflects its cultural values of tolerance, non-violance, Vasudeva Kutumbakam etc. While other countries use military powers to gain influence in international sphere, India has sought to leverage its cultural relations be it with Southeast Asia or even Afghanistan to develop mutually beneficial partnerships. India’s culture forms the basis of soft power or the power of attraction. For example, Yoga, Ayurveda, Indian Cuisines etc. Though India’s culture has been pacifist, but it does have realist traditions in the form of Kautilya’s Mandal Siddhants. In fact we see greater influence of realist tradition on the foreign policies of BJP, unlike the pacifist importance given to the foreign policies of INC. Civilizational States like India are not satisfied by merely pursuing foreign policies to achieve national interests. They seek to shape the world order by their foreign policies which in turn are shaped by their cultural barriers. Historical Factors: India’s full support to freedom struggle movements in Afro Asian and Latin American countries reflect its long history of colonialism and imperialism. Even the support for Apartheid movement in South Africa is reflection of its colonial legacy. Ideals of foreign policy in its first phase were unpinned by its colonial experience. Even the history of bloody partition continues to impact India-Pakistan relations even in the present times. The military factor:India could secure its national interest and emerge as a major power only after conducting the nuclear tests in 1998 (Operation Shakti). Economic factor: It was after the economic reforms of 1991 and adoption of LPG strategy that India could acquire a major power status in the world. In the present era, the importance of economic strengthis underlined by the fact that today the foreign policy goals seek to achieve country’s economic objective. World Order:When the world was bipolar, India sought to carve a place for itself in the international order by suggesting non-alignment, the third way. With the disintegration of USSR the immediate world order was unipolar. In such a scenario India for the first time took active steps to improve India-US relations. The landmark of the same was signing of India-US civil nuclear deal In the present era of complex interdependence, India is following the policy of multiple alignments as evident in it strategic partnerships with more than 35 countries and simultaneous close partnerships with US Japan Australia on on ehand and Russia and China on the other. As most of these significant factors are of changing nature, so with their evolution or transformation, foreign policy of India also keeps on changing. The multifarious objectives of India’s foreign policy achieve a blend of national and international interests.
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##Question:Indian Foreign policy is never uniquely determined by any one factor, but it is the result of interplay of a large number of factors that affect the formulation of Indian foreign policy in different ways in different circumstances. Elaborate. (200 words)##Answer:Approach : In introduction, briefly define the term Foreign Policy. Explain various determinants of Foreign policy. (Student is expected to give specific examples from India as these were discussed in class.) Brief conclusion in the end Answer : Foreign Policy is a strategy or a planned course of action by the decision makers of a state vis a vis other states or international entities aimed at achieving specific goals defined in terms of national interests. The foreign policy of a country is the sum total of the principles, interests and objectives which it seeks to promote through its relations with other countries. Indian Foreign policy is never uniquely determined by any one factor or set of factors, but it is the result of interplay of a large number of factors that affect the formulation of Indian foreign policy in different ways in different circumstances Foreign Policy Determinants Foreign policy of a country is shaped not by one or one set of factors rather it is shaped by multiple factors which are referred to as determinants of foreign policy. Geographical factors: Size (population and area), location and resources determine a country’s foreign policy:India’s strategic location at the centre of the asian arc extending from Aden to Tokyo makes it a gateway to Southeast Asia, Central Asia and West Asia. It was because if this that USA and USSR initially competed to bring India within their sphere of influence during the cold war. India’s location at the head of Indian ocean, along with other determinant of power make India a net security provider in the region. India’s vast coastline necessitates a strong naval diplomacy with the rim countries. India shares man made frontiers with Pakistan, Bangladesh, Myanmar, which requires a strategic approach towards the security of its borders. India unlike USA and UK has to focus on continent as well as its coast in its foreign policy formulation. India’s look East Policy and Look West Policy are determined by geography and also expressed in geographical terms. India’s size and population makes it a contender to UNSC membership Distance is the prime inhibiting factor in development of close relations between India and Latin America. Role of Culture: There are very few civilization states and India is one of them. Therefore India’s world view cannot be separated from its culture. Infact J.Nehru, not only India’s first Prime Minister but the key architect of India’s foreign policy had commented that he is not inventing India’s foreign policy rather merely rediscovering it from its past.India’s commitment to International peace as evident in Art. 51 of the constitution reflects its cultural values of tolerance, non-violance, Vasudeva Kutumbakam etc. While other countries use military powers to gain influence in international sphere, India has sought to leverage its cultural relations be it with Southeast Asia or even Afghanistan to develop mutually beneficial partnerships. India’s culture forms the basis of soft power or the power of attraction. For example, Yoga, Ayurveda, Indian Cuisines etc. Though India’s culture has been pacifist, but it does have realist traditions in the form of Kautilya’s Mandal Siddhants. In fact we see greater influence of realist tradition on the foreign policies of BJP, unlike the pacifist importance given to the foreign policies of INC. Civilizational States like India are not satisfied by merely pursuing foreign policies to achieve national interests. They seek to shape the world order by their foreign policies which in turn are shaped by their cultural barriers. Historical Factors: India’s full support to freedom struggle movements in Afro Asian and Latin American countries reflect its long history of colonialism and imperialism. Even the support for Apartheid movement in South Africa is reflection of its colonial legacy. Ideals of foreign policy in its first phase were unpinned by its colonial experience. Even the history of bloody partition continues to impact India-Pakistan relations even in the present times. The military factor:India could secure its national interest and emerge as a major power only after conducting the nuclear tests in 1998 (Operation Shakti). Economic factor: It was after the economic reforms of 1991 and adoption of LPG strategy that India could acquire a major power status in the world. In the present era, the importance of economic strengthis underlined by the fact that today the foreign policy goals seek to achieve country’s economic objective. World Order:When the world was bipolar, India sought to carve a place for itself in the international order by suggesting non-alignment, the third way. With the disintegration of USSR the immediate world order was unipolar. In such a scenario India for the first time took active steps to improve India-US relations. The landmark of the same was signing of India-US civil nuclear deal In the present era of complex interdependence, India is following the policy of multiple alignments as evident in it strategic partnerships with more than 35 countries and simultaneous close partnerships with US Japan Australia on on ehand and Russia and China on the other. As most of these significant factors are of changing nature, so with their evolution or transformation, foreign policy of India also keeps on changing. The multifarious objectives of India’s foreign policy achieve a blend of national and international interests.
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उपग्रह से आप क्या समझते हैं? उपग्रहों के सामान्य अनुप्रयोगों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द/ 10 अंक) What do you understand by satellite? Briefly discuss general applications of satellites. (150-200 Words/10 marks)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत उपग्रह को परिभाषित करते हुए कीजिये | इसके पश्चात उपग्रहों के सामान्य अनुप्रयोगों की संक्षिप्त जानकारी दीजिये | अंत में निष्कर्षात्मक वाक्य के साथ उत्तर का समापन कीजिए | उत्तर - ऐसे पिंड जो गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव में ग्रह के चारों और चक्कर लगाते रहते हैं या परिक्रमण करते रहते हैं उन्हें उपग्रह कहा जाता है | दूसरे शब्दों में, किसी ग्रह के चारों ओर परिक्रमा करने वाले पिंड को उस ग्रह का उपग्रह कहते हैं | उपग्रह एक निश्चित कक्षा में और निश्चित वेग से घूमते हैं| उपग्रह प्राकृतिक और कृत्रिम दोनों प्रकार के होते हैं | जैसे चंद्रमा पृथ्वी का एक प्राकृतिक उपग्रह है| इसी प्रकार ऐसे पिंड जो मानव द्वारा निर्मित हैं और ग्रहों के चारों ओर परिक्रमा करते है उन्हें कृत्रिम उपग्रह कहते हैं उदाहरणार्थ आर्यभट्ट, रोहिणी, INSAT आदि | उपग्रहों के विविध अनुप्रयोग होते हैं जिनके कारण सामाजिक-आर्थिक विकास में इनका महत्वपूर्ण योगदान होता है | उपग्रहों के सामान्य अनुप्रयोग उपग्रहों के माध्यम से ही दूरसंचार प्रणाली स्थापित की जाती है जैसे भारत का G-SAT उपग्रह संचार प्रणाली के सुचारू संचालन में सहायक है | दूर संवेदन उपग्रह तटीय क्षेत्रों का सर्वेक्षण,प्राकृतिक संसाधनों यथा मृदा, वन, जल आदि का आकलन करने में सहायक होते हैं जैसे भारत के कार्टोसैट, रिसोर्ससैट, ओशियनसैट, रडार इमेजिंग सैटेलाइट(रिसैट) आदि का प्रयोग इन्ही संदर्भों में किया जा रहा है | इसके अतिरिक्त उपग्रहों का अनुप्रयोग मौसम पूर्वानुमान में भी किया जा सकता है | भारत के कल्पना, INSAT 3D एवंINSAT 3DR, मेघाट्रॉपिक्स (भारत-फ़्रांस), चक्रवात/वर्षा के अध्ययन के लिए स्काटसैट का प्रयोग किया जा रहा है | उपग्रहों का प्रयोग अन्तरिक्ष अध्ययन के लिए किया जा सकता है जैसे दृश्य प्रकाश, एक्सरे एवं पराबैगनी किरणों के अध्ययन के माध्यम से तारों के अध्ययन के लिए भारत द्वारा एस्ट्रोसैट भेजा गया है, इसी प्रकार मंगलयान, चंद्रयान, आदित्य L1का भी अन्तरिक्ष के अध्ययन में महत्वपूर्ण योगदान है | उपग्रहों को सैन्य सेवा के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है जैसे सीमा क्षेत्रों की निगरानी के लिए भारत-इजराइल द्वारा निर्मित रडार इमेजिंग सैटेलाइट-रीसैट, वायु सेना के लिए GSAT-7Aआदि के सैन्य अनुप्रयोग को समझ सक्गते हैं | उपरोक्त के अतिरिक्त उपग्रहों का प्रयोग नेविगेशन के लिए भी किया जा सकता है जैसे- भारत में नाविक/IRNSS एवं गगन/GAGAN प्रणालियाँ नौवहन के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं |
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##Question:उपग्रह से आप क्या समझते हैं? उपग्रहों के सामान्य अनुप्रयोगों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द/ 10 अंक) What do you understand by satellite? Briefly discuss general applications of satellites. (150-200 Words/10 marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत उपग्रह को परिभाषित करते हुए कीजिये | इसके पश्चात उपग्रहों के सामान्य अनुप्रयोगों की संक्षिप्त जानकारी दीजिये | अंत में निष्कर्षात्मक वाक्य के साथ उत्तर का समापन कीजिए | उत्तर - ऐसे पिंड जो गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव में ग्रह के चारों और चक्कर लगाते रहते हैं या परिक्रमण करते रहते हैं उन्हें उपग्रह कहा जाता है | दूसरे शब्दों में, किसी ग्रह के चारों ओर परिक्रमा करने वाले पिंड को उस ग्रह का उपग्रह कहते हैं | उपग्रह एक निश्चित कक्षा में और निश्चित वेग से घूमते हैं| उपग्रह प्राकृतिक और कृत्रिम दोनों प्रकार के होते हैं | जैसे चंद्रमा पृथ्वी का एक प्राकृतिक उपग्रह है| इसी प्रकार ऐसे पिंड जो मानव द्वारा निर्मित हैं और ग्रहों के चारों ओर परिक्रमा करते है उन्हें कृत्रिम उपग्रह कहते हैं उदाहरणार्थ आर्यभट्ट, रोहिणी, INSAT आदि | उपग्रहों के विविध अनुप्रयोग होते हैं जिनके कारण सामाजिक-आर्थिक विकास में इनका महत्वपूर्ण योगदान होता है | उपग्रहों के सामान्य अनुप्रयोग उपग्रहों के माध्यम से ही दूरसंचार प्रणाली स्थापित की जाती है जैसे भारत का G-SAT उपग्रह संचार प्रणाली के सुचारू संचालन में सहायक है | दूर संवेदन उपग्रह तटीय क्षेत्रों का सर्वेक्षण,प्राकृतिक संसाधनों यथा मृदा, वन, जल आदि का आकलन करने में सहायक होते हैं जैसे भारत के कार्टोसैट, रिसोर्ससैट, ओशियनसैट, रडार इमेजिंग सैटेलाइट(रिसैट) आदि का प्रयोग इन्ही संदर्भों में किया जा रहा है | इसके अतिरिक्त उपग्रहों का अनुप्रयोग मौसम पूर्वानुमान में भी किया जा सकता है | भारत के कल्पना, INSAT 3D एवंINSAT 3DR, मेघाट्रॉपिक्स (भारत-फ़्रांस), चक्रवात/वर्षा के अध्ययन के लिए स्काटसैट का प्रयोग किया जा रहा है | उपग्रहों का प्रयोग अन्तरिक्ष अध्ययन के लिए किया जा सकता है जैसे दृश्य प्रकाश, एक्सरे एवं पराबैगनी किरणों के अध्ययन के माध्यम से तारों के अध्ययन के लिए भारत द्वारा एस्ट्रोसैट भेजा गया है, इसी प्रकार मंगलयान, चंद्रयान, आदित्य L1का भी अन्तरिक्ष के अध्ययन में महत्वपूर्ण योगदान है | उपग्रहों को सैन्य सेवा के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है जैसे सीमा क्षेत्रों की निगरानी के लिए भारत-इजराइल द्वारा निर्मित रडार इमेजिंग सैटेलाइट-रीसैट, वायु सेना के लिए GSAT-7Aआदि के सैन्य अनुप्रयोग को समझ सक्गते हैं | उपरोक्त के अतिरिक्त उपग्रहों का प्रयोग नेविगेशन के लिए भी किया जा सकता है जैसे- भारत में नाविक/IRNSS एवं गगन/GAGAN प्रणालियाँ नौवहन के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं |
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भारत में ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था के योगदानों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए । ( 150-200 शब्द/10 अंक ) Critically examine the contributions of the British administrative system in India. (150-200 words/10 Marks)
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दृष्टिकोण : भारत में ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था के विकास की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था के विकास के वास्तविक उद्देशों की चर्चा कीजिये । ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था के सकारात्मक पक्षों की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था के नकारात्मक पक्षों की बिन्दुवार चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : भारत में ब्रिटिश विजय के बाद क्रमिक ढंग से अंग्रेजों द्वारा आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था का विकास किया गया । इसके अंतर्गत सेना, पुलिस, सिविल सेवा व न्यायिक व्यवस्था का आधुनिक ढंग से विकास किया गया । अंग्रेजों द्वारा विकसित यह प्रशासनिक व्यवस्था भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद का आधार स्तंभ बना और परवर्ती काल में स्वतंत्र भारत के प्रशासनिक व्यवस्था को भी इसने दिशा प्रदान किया । ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था के विकास का वास्तविक उद्देश : अधिकांशतः ब्रिटिश विद्वानों का मानना है कि भारत में आधुनिक प्रशासनिक ढांचे की नींव ब्रिटिश काल में रखी गयी जैसे पुलिस, सेना , सिविल सेवा , न्यायपालिका आदि और इसका मुख्य उद्देश भारत को एक आधुनिक राष्ट्र बनाना था तथापि हम इससे सहमत नहीं हो सकते हैं । आधुनिक प्राशासनिक व्यवस्था के तत्वो के विकास का मुख्य उद्देश ब्रिटिश औपनिवेशिक हितों का संवर्धन करना था । अंग्रेजों द्वारा प्रारंभ में उन्हीं क्षेत्रों में कार्य किया गया जिनसे उनका हित प्रत्यक्षतः प्रभावित होता था । उदाहरण के लिए शुरू में उन्होने केवल भूराजस्व व्यवस्था में सुधार व इससे संबंधित न्याय व्यवस्था में सुधार के प्रयास किए । आगे चलकर पुलिस सुधार भी इसी से संबंधित रहा । सिविल सेवा का विकास भी मुख्य रूप से अधिकाधिक राजस्व संग्रह के लिए ही किया गया था । इसी प्रकार पुलिस का विकास कानून व्यवस्था बनाए रखते हुए लोगों को डराकर रखने के लिए किया गया था । सेना का भी प्रमुख उद्देश था विद्रोहों का दमन, साम्राज्य विस्तार, साम्राज्य की सुरक्षा इत्यादि ही रहा था । ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था के सकारात्मक पहलू : ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था का सबसे सकारात्मक पक्ष यही माना जा सकता है कि अंग्रेजों ने अनचाहे रूप में ही भारत में आधुनिक व्यवस्था को प्रारंभ कर दिया । आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था की कई विशेषताओं का हमें क्रमिक विकास देखने को मिलता है । कॉर्नवालिस द्वारा न्याय के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण सुधार किए , जैसे- कलक्टर से न्यायिक कार्यों को अलग करना , अमानवीय फ़ौजदारी क़ानूनों में संशोधन आदि । इसी प्रकार वारेन हेस्टिंग्स के समय बंगाल में सदर दीवानी एवं फ़ौजदारी अदालत की स्थापना तथा जिला स्तर पर दीवानी एवं फ़ौजदारी अदालत की स्थापना की गयी । सैद्धांतिक रूप में ही सही भारत में कानून के शासन की परंपरा को स्थापित किया । प्रशासनिक सेवाओं में योग्यता के आधार पर नियुक्ति, प्रमोशन, स्थानांतरण, अनुशासन , राष्ट्र के प्रति निष्ठा , कानून का शासन जैसे मूल्यों को सैद्धांतिक रूप में शामिल किया गया । ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था के नकारात्मक पहलू : सेना के सभी क्षेत्रों में उच्च पदों पर अंग्रेजों की नियुक्ति की गयी तथा जान-बुझकर भारतीयों को अलग रखने की रणनीति अपनाई गयी । साथ ही सिविल सेवा में भी व्यावहारिक रूप में भारतीयों के प्रवेश को प्रतिबंधित करने का प्रयास किया गया । प्रशासन में निचले स्तर पर जाति, धर्म तथा क्षेत्र के नाम पर भारतीयों को बाँट कर रखा जाता था और यथासंभव यह कोशिश की गयी कि आधुनिक विचारों का प्रभाव भारतीयों पर तथा भारतीय प्रशासनिक कर्मचारियों पर न पड़े । आज भी हम प्रशासन में औपनिवेशिक चरित्र को पाते हैं । उदाहरण के लिए प्रशासनिक अधिकारी वर्तमान में आमजन से अलग रहते हुए अपने को श्रेष्ठ मानने की मानसिकता से ग्रसित हैं । अंततः निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि यह सही है कि अंग्रेजों ने आधुनिक प्रशासनिक ढांचे की नींव रखी । साथ ही यह भी सच है कि इसका विकास क्रमशः हुआ और अंग्रेजों द्वारा इसका विकास अपने औपनिवेशिक हित में किया गया था । परंतु अंग्रेजों के तमाम प्रयासों के बावजूद आधुनिक शिक्षा तथा अन्य कारणों से प्रशासनिक ढांचे में राष्ट्रीय चेतना का प्रसार हुआ और 1940 का दशक आते-आते भारतीय ब्रिटिश प्रशासन में भारतीयों की प्रभावी संख्या हो गयी । परिणामस्वरूप अँग्रेजी शासन के ये स्तंभ चरमरा गए और हमने अँग्रेजी हथोड़े से ही अँग्रेजी जंजीर को तोड़ दिया ।
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##Question:भारत में ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था के योगदानों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए । ( 150-200 शब्द/10 अंक ) Critically examine the contributions of the British administrative system in India. (150-200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण : भारत में ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था के विकास की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था के विकास के वास्तविक उद्देशों की चर्चा कीजिये । ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था के सकारात्मक पक्षों की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था के नकारात्मक पक्षों की बिन्दुवार चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : भारत में ब्रिटिश विजय के बाद क्रमिक ढंग से अंग्रेजों द्वारा आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था का विकास किया गया । इसके अंतर्गत सेना, पुलिस, सिविल सेवा व न्यायिक व्यवस्था का आधुनिक ढंग से विकास किया गया । अंग्रेजों द्वारा विकसित यह प्रशासनिक व्यवस्था भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद का आधार स्तंभ बना और परवर्ती काल में स्वतंत्र भारत के प्रशासनिक व्यवस्था को भी इसने दिशा प्रदान किया । ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था के विकास का वास्तविक उद्देश : अधिकांशतः ब्रिटिश विद्वानों का मानना है कि भारत में आधुनिक प्रशासनिक ढांचे की नींव ब्रिटिश काल में रखी गयी जैसे पुलिस, सेना , सिविल सेवा , न्यायपालिका आदि और इसका मुख्य उद्देश भारत को एक आधुनिक राष्ट्र बनाना था तथापि हम इससे सहमत नहीं हो सकते हैं । आधुनिक प्राशासनिक व्यवस्था के तत्वो के विकास का मुख्य उद्देश ब्रिटिश औपनिवेशिक हितों का संवर्धन करना था । अंग्रेजों द्वारा प्रारंभ में उन्हीं क्षेत्रों में कार्य किया गया जिनसे उनका हित प्रत्यक्षतः प्रभावित होता था । उदाहरण के लिए शुरू में उन्होने केवल भूराजस्व व्यवस्था में सुधार व इससे संबंधित न्याय व्यवस्था में सुधार के प्रयास किए । आगे चलकर पुलिस सुधार भी इसी से संबंधित रहा । सिविल सेवा का विकास भी मुख्य रूप से अधिकाधिक राजस्व संग्रह के लिए ही किया गया था । इसी प्रकार पुलिस का विकास कानून व्यवस्था बनाए रखते हुए लोगों को डराकर रखने के लिए किया गया था । सेना का भी प्रमुख उद्देश था विद्रोहों का दमन, साम्राज्य विस्तार, साम्राज्य की सुरक्षा इत्यादि ही रहा था । ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था के सकारात्मक पहलू : ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था का सबसे सकारात्मक पक्ष यही माना जा सकता है कि अंग्रेजों ने अनचाहे रूप में ही भारत में आधुनिक व्यवस्था को प्रारंभ कर दिया । आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था की कई विशेषताओं का हमें क्रमिक विकास देखने को मिलता है । कॉर्नवालिस द्वारा न्याय के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण सुधार किए , जैसे- कलक्टर से न्यायिक कार्यों को अलग करना , अमानवीय फ़ौजदारी क़ानूनों में संशोधन आदि । इसी प्रकार वारेन हेस्टिंग्स के समय बंगाल में सदर दीवानी एवं फ़ौजदारी अदालत की स्थापना तथा जिला स्तर पर दीवानी एवं फ़ौजदारी अदालत की स्थापना की गयी । सैद्धांतिक रूप में ही सही भारत में कानून के शासन की परंपरा को स्थापित किया । प्रशासनिक सेवाओं में योग्यता के आधार पर नियुक्ति, प्रमोशन, स्थानांतरण, अनुशासन , राष्ट्र के प्रति निष्ठा , कानून का शासन जैसे मूल्यों को सैद्धांतिक रूप में शामिल किया गया । ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था के नकारात्मक पहलू : सेना के सभी क्षेत्रों में उच्च पदों पर अंग्रेजों की नियुक्ति की गयी तथा जान-बुझकर भारतीयों को अलग रखने की रणनीति अपनाई गयी । साथ ही सिविल सेवा में भी व्यावहारिक रूप में भारतीयों के प्रवेश को प्रतिबंधित करने का प्रयास किया गया । प्रशासन में निचले स्तर पर जाति, धर्म तथा क्षेत्र के नाम पर भारतीयों को बाँट कर रखा जाता था और यथासंभव यह कोशिश की गयी कि आधुनिक विचारों का प्रभाव भारतीयों पर तथा भारतीय प्रशासनिक कर्मचारियों पर न पड़े । आज भी हम प्रशासन में औपनिवेशिक चरित्र को पाते हैं । उदाहरण के लिए प्रशासनिक अधिकारी वर्तमान में आमजन से अलग रहते हुए अपने को श्रेष्ठ मानने की मानसिकता से ग्रसित हैं । अंततः निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि यह सही है कि अंग्रेजों ने आधुनिक प्रशासनिक ढांचे की नींव रखी । साथ ही यह भी सच है कि इसका विकास क्रमशः हुआ और अंग्रेजों द्वारा इसका विकास अपने औपनिवेशिक हित में किया गया था । परंतु अंग्रेजों के तमाम प्रयासों के बावजूद आधुनिक शिक्षा तथा अन्य कारणों से प्रशासनिक ढांचे में राष्ट्रीय चेतना का प्रसार हुआ और 1940 का दशक आते-आते भारतीय ब्रिटिश प्रशासन में भारतीयों की प्रभावी संख्या हो गयी । परिणामस्वरूप अँग्रेजी शासन के ये स्तंभ चरमरा गए और हमने अँग्रेजी हथोड़े से ही अँग्रेजी जंजीर को तोड़ दिया ।
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What is the function and mandate of public debt management agency? Why there is a need of public debt management agency in India? (10 marks/150 words)
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Approach 1. Introduce the answer by briefly explaining Public debt management agency. 2. Then, mention functions of PDMA 3.Followed by highlighting the need for PDMA 4.Conclude accordingly Answer Public Debt Management Agency (PDMA) is a proposed specialized independent agency that manages the internal and external liabilities of the Central Government in a holistic manner. In other words, PDMA is the Investment Banker or Merchant Banker to the Government and manages the issue, reissue, and trading of Government Securities, manages and advises the Central Government on its contingent liabilities, etc. It was proposed to be established in India through the Finance Bill, 2015. PDMA is mandated to strengthen the quality of public debt management and reduce country"s vulnerability to international financial shocks, to bring both India’s external borrowings and domestic debt under one roof and bringing the Indian Bond Market at the same level as India’s world-class equity market Functions of PDMA 1. Collecting and publishing information about public debt, including borrowings by the central government. 2. Issue of government securities and maintenance and management of the registry of holders and making payments to them. 3. Purchasing, re-issuing, and trading in Government Securities. 4. Managing Contingent liabilities of the Central Government including developing ways for its measurement, reduction in quantum and cost of such liabilities. Further, advising central Government on its contingent liabilities 5. Undertaking Cash management of the Central Government including acquiring information about its cash assets, predicting the future cash requirements and issuing and redeeming such short term securities required to meet the cash requirements, etc. 6. Advising the Central Government on the management of cash assets. Need for PDMA 1. Fragmented jurisdiction in public debt management: Before the creation of PDMA, the Central Bank or RBI used to manage the market borrowing programmes of Central and State Governments. On the other hand, external debt was managed directly by the Central Government. Establishing a debt management office would consolidate all debt management functions in a single agency and bring in holistic management of the internal and external liabilities. 2. Some functions that are crucial to managing public debt were not carried out. For instance, no agency used to undertake cash and investment management and information relating to contingent and other liabilities were not consolidated. Hence, there was no comprehensive picture of the liabilities of the Central Government, which impeded informed decision making regarding both domestic and foreign borrowing. 3. An autonomous PDMA can be the catalyst for wider institutional reform, including building a government securities market and bring in transparency about public debt. 4. It is considered as an internationally accepted best practice that debt management should be disaggregated from monetary policy, and taken out of the realm of the central bank. Most advanced economies have dedicated debt management offices. 5. There is a severe conflict of interest between setting the short term interest rate (i.e. the task of monetary policy) and selling bonds for the government. If the Central Bank tries to be an effective debt manager, it would lean towards selling bonds at high prices, i.e. keeping interest rates low. This leads to an inflationary bias in monetary policy. PDMA will bring both India’s external borrowings and domestic debt under one roof and would usher in better debt management practices such as creating a "medium-term debt strategy framework", just as the case for fiscal deficit. Thus, the Union government would need to work on a roadmap for the PDMA and unified financial market regulator in consultation with the RBI.
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##Question:What is the function and mandate of public debt management agency? Why there is a need of public debt management agency in India? (10 marks/150 words)##Answer:Approach 1. Introduce the answer by briefly explaining Public debt management agency. 2. Then, mention functions of PDMA 3.Followed by highlighting the need for PDMA 4.Conclude accordingly Answer Public Debt Management Agency (PDMA) is a proposed specialized independent agency that manages the internal and external liabilities of the Central Government in a holistic manner. In other words, PDMA is the Investment Banker or Merchant Banker to the Government and manages the issue, reissue, and trading of Government Securities, manages and advises the Central Government on its contingent liabilities, etc. It was proposed to be established in India through the Finance Bill, 2015. PDMA is mandated to strengthen the quality of public debt management and reduce country"s vulnerability to international financial shocks, to bring both India’s external borrowings and domestic debt under one roof and bringing the Indian Bond Market at the same level as India’s world-class equity market Functions of PDMA 1. Collecting and publishing information about public debt, including borrowings by the central government. 2. Issue of government securities and maintenance and management of the registry of holders and making payments to them. 3. Purchasing, re-issuing, and trading in Government Securities. 4. Managing Contingent liabilities of the Central Government including developing ways for its measurement, reduction in quantum and cost of such liabilities. Further, advising central Government on its contingent liabilities 5. Undertaking Cash management of the Central Government including acquiring information about its cash assets, predicting the future cash requirements and issuing and redeeming such short term securities required to meet the cash requirements, etc. 6. Advising the Central Government on the management of cash assets. Need for PDMA 1. Fragmented jurisdiction in public debt management: Before the creation of PDMA, the Central Bank or RBI used to manage the market borrowing programmes of Central and State Governments. On the other hand, external debt was managed directly by the Central Government. Establishing a debt management office would consolidate all debt management functions in a single agency and bring in holistic management of the internal and external liabilities. 2. Some functions that are crucial to managing public debt were not carried out. For instance, no agency used to undertake cash and investment management and information relating to contingent and other liabilities were not consolidated. Hence, there was no comprehensive picture of the liabilities of the Central Government, which impeded informed decision making regarding both domestic and foreign borrowing. 3. An autonomous PDMA can be the catalyst for wider institutional reform, including building a government securities market and bring in transparency about public debt. 4. It is considered as an internationally accepted best practice that debt management should be disaggregated from monetary policy, and taken out of the realm of the central bank. Most advanced economies have dedicated debt management offices. 5. There is a severe conflict of interest between setting the short term interest rate (i.e. the task of monetary policy) and selling bonds for the government. If the Central Bank tries to be an effective debt manager, it would lean towards selling bonds at high prices, i.e. keeping interest rates low. This leads to an inflationary bias in monetary policy. PDMA will bring both India’s external borrowings and domestic debt under one roof and would usher in better debt management practices such as creating a "medium-term debt strategy framework", just as the case for fiscal deficit. Thus, the Union government would need to work on a roadmap for the PDMA and unified financial market regulator in consultation with the RBI.
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समाज में दिव्यांगजनों या विकलांगों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु उनके द्वारा गरिमापूर्ण जीवन जीने के मार्ग में आने वाली चुनौतियों का समाधान करना अतिमहत्वपूर्ण है| चर्चा कीजिये| साथ ही, समाज में दिव्यांगजनों या विकलांगों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु सरकार द्वारा कौन-कौन से कदम उठाये गये हैं? (150-200 शब्द; 10 अंक) To ensure effective participation of the disabled persons in the society, It is very important to address the challenges faced by them in the path of leading a dignified life. Discuss. Also, what steps have been taken by the government to ensure effective participation of disabled persons in the society? (150-200 words; 10 marks)
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एप्रोच- दिव्यांगजनों को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में, दिव्यांगजनों द्वारागरिमापूर्ण जीवन जीने के मार्ग में आने वाली चुनौतियों का उल्लेख कीजिये| समाज में उनकी प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु कुछ उपायों का सुझाव दीजिये| अंतिम भाग में,समाज में दिव्यांगजनों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु सरकार द्वारा उठाये गये क़दमों का जिक्र कीजिये| उत्तर- विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र घोषणा के अनुसार "कोई भी व्यक्ति जो स्वंय पूर्णतः या आंशिक रूप से किसी सामान्य व्यक्ति या सामाजिक जीवन की आवश्यकताओं को जन्मजात या गैर जन्मजात शारीरिक या मानसिक अक्षमताओं के कारण सुनिश्चित करने में असमर्थ है" उसे विकलांग व्यक्ति के रूप में वर्णित किया जा सकता है| विकलांगता वस्तुतः मानव के लिए सामान्य माने जाने वाली किसी गतिविधि को करने में प्रतिबंध या अक्षमता को दर्शाती है| 2011 की जनसँख्या के अनुसार हमारे देश में विकलांग व्यक्तियों की जनसँख्या का प्रतिशत 2.2% है| लगभग एक तिहाई विकलांग जनसँख्या जन्म से ही विकलांगता का सामना करती है| भारत सरकार उनके सम्मान को सुनिश्चित करने हेतु विकलांग शब्द की जगह दिव्यांग शब्द का चयन करने लगी है| दिव्यांगजनों द्वारा गरिमापूर्ण जीवन जीने के मार्ग में आने वाली चुनौतियाँ उन्हें जैविक रूप से अलग समझा जाना तथा प्रायः कमजोर तथा बेकार माना जाना; किसी समस्या से घिरने पर विकलांगता को ही उसका कारण मानना; विकलांग व्यक्तियों को पीड़ित के रूप में देखा जाना; उनके निवास स्थानों के आसपास के लोगों से उन्हें सामाजिक कलंक तथा भेदभाव का सामना; बेचारा जैसे अपमानबोधक संबोधनों से हीनता का एहसास कराना; समाज के साथ घुलने-मिलने में कठिनाई का सामना जिससे उनमें आत्मग्लानि तथा अवसाद की भावना का विकास; समाज में कुछ लोगों के द्वारा विकलांगता को पिछले जन्मों के कर्मों का फल मानना जिससे दिव्यांगों के मन में अपराधबोध की भावना का विकास; पारिवारिक स्तर पर भी इनके समक्ष शारीरिक-मानसिक भेदभाव जिससे इनके अंदर हीनभावना का विकास; शिक्षा, रोजगार तथा अन्य सामाजिक-आर्थिक अवसरों तक कम पहुँच जिससे इनकी जीवन की गुणता प्रभावित; परिवहन साधनों के सुगम पहुँच का मुद्दा; कार्यालयों, घरों तथा अन्य भौतिक अवसंरचनाओं में बाधारहित प्रवेश में कठिनाई का सामना; उपरोक्त बाधाएं सिर्फ शारीरिक-मानसिक अक्षमता के कारण नहीं हैं बल्कि समाज में बहिष्कृत एवं निंदित करने की प्रवृत्ति भी उतनी ही जिम्मेदार है| दिव्यांगजन भी हमारे समाज के एक महत्वपूर्ण अंग हैं अतः समाज में उनकी प्रभावी भूमिका सुनिश्चित करना तथा उनको गरिमापूर्ण जीवन जीने देना समाज तथा सरकार दोनों का कर्तव्य होना चाहिए| समाज में उनकी प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु कुछ उपाय उनकी बेहतरी हेतु बनाए गये योजनाओं/कार्यक्रमों/नीतियों हेतु पर्याप्त धन आवंटन; उनका उचित क्रियान्वयन, समन्वय तथा निगरानी रखना; बेहतर बुनियादी ढाँचा का विकास जिसमें दिव्यांगों के समस्याओं के प्रति जागरूकता दिखाई पड़ना; वैश्विक प्रयासों के साथ संरेखन तथा एकीकृत करना; सामाजिक सोच को उनके प्रति बेहतर बनाना ताकि कलंक तथा अन्य दुर्भावना भरे सोचों कों दूर किया जा सके| विकलांगों के मन में हीनभावना दूर करने हेतु समाज तथा सरकार को मिलकर प्रयास करने की आवश्यकता; शिक्षा तथा रोजगार तक आसान पहुँच सुनिश्चित करके उन्हें आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाना क्योंकि विकलांगता तथा गरीबी के मध्य घनिष्ठ है| बुनियादी तथा भौतिक अवसंरचनाओं तक उनकी पहुँच को सुगम बनाने के उपाय करना; परिवहन साधनों तक आसन पहुँच सुनिश्चित करना; इस संदर्भ में शुद्ध आंकड़ों की उपलब्धता सुनिश्चित करना ताकि नीति निर्माण में मदद मिले; इन उपायों से उनके गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार की रक्षा करना बेहतर तरीके से संभव हो पायेगा| समाज में दिव्यांगजनों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु सरकार द्वारा उठाये गये क़दम संवैधानिक प्रावधान - अनुच्छेद 14; अनुच्छेद 21 तथा राज्य के नीति निदेशक तत्वों में दिव्यांगों सहित सभी के लिए समानता, न्याय और गरिमा का अधिकार; सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के अंतर्गत दिव्यांगजन अधिकारिता विभाग ; भारतीय पुनर्वास परिषद् एक्ट, 1992; दिव्यांगजन(समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण तथा पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995; ऑटिज्म, सेरेब्रल पाल्सी, मानसिक विकलांगता और एकाधिक विकलांगता वाले व्यक्तियों के कल्याण के लिए राष्ट्रीय न्यास अधिनियम, 1999; दीनदयाल विकलांग पुनर्वास योजना; विकलांग व्यक्तियों का अधिकार अधिनियम, 2016 ; मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 2017; राष्ट्रीय दिव्यांगजन वित्त और विकास निगम; सुगम्य भारत अभियान(2015-16) - निर्मित वातावरण सुगम्यता; परिवहन प्रणाली सुगम्यता; सूचना तथा संचार प्रणाली सुगम्यता; सुगम्य पुस्तकालय; मर्राकेश संधि(2013)के साथ संरेखन; विभिन्न मंत्रालय जैसे- रेलवे आदि द्वारा इन दिव्यांगजनों हेतु सकारात्मक सुरक्षात्मक भेदभाव भी करना जिसके अंतर्गत विभिन्न निःशुल्क सुविधाएँ; रेलवे सीटों के आरक्षण में वरीयता आदि का प्रयास; सुप्रीमकोर्ट के आदेशानुसार दिव्यांगजनों हेतु 3% क्षैतिज आरक्षण की भी व्यवस्था; आवश्यकता पड़ने पर बेंचमार्क संदर्भों में 5% तक संभव; इनके स्वास्थ्य, कृत्रिम अंगों आदि को सहज सुलभ कराने हेतु विभिन्न प्रकार के शोध संस्थान; दिव्यांगजनों के संदर्भ में सर्वाधिक चिंता का विषय ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में सुविधाओं में अंतर है क्योंकि दिव्यांगजन ग्रामीण क्षेत्र में अधिक हैं वहीँ सुविधाएँ सापेक्षिक रूप से शहरों में अधिक है| सरकार को इस दिशा में आगे कार्य करने की आवश्यकता है|
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##Question:समाज में दिव्यांगजनों या विकलांगों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु उनके द्वारा गरिमापूर्ण जीवन जीने के मार्ग में आने वाली चुनौतियों का समाधान करना अतिमहत्वपूर्ण है| चर्चा कीजिये| साथ ही, समाज में दिव्यांगजनों या विकलांगों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु सरकार द्वारा कौन-कौन से कदम उठाये गये हैं? (150-200 शब्द; 10 अंक) To ensure effective participation of the disabled persons in the society, It is very important to address the challenges faced by them in the path of leading a dignified life. Discuss. Also, what steps have been taken by the government to ensure effective participation of disabled persons in the society? (150-200 words; 10 marks)##Answer:एप्रोच- दिव्यांगजनों को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में, दिव्यांगजनों द्वारागरिमापूर्ण जीवन जीने के मार्ग में आने वाली चुनौतियों का उल्लेख कीजिये| समाज में उनकी प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु कुछ उपायों का सुझाव दीजिये| अंतिम भाग में,समाज में दिव्यांगजनों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु सरकार द्वारा उठाये गये क़दमों का जिक्र कीजिये| उत्तर- विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र घोषणा के अनुसार "कोई भी व्यक्ति जो स्वंय पूर्णतः या आंशिक रूप से किसी सामान्य व्यक्ति या सामाजिक जीवन की आवश्यकताओं को जन्मजात या गैर जन्मजात शारीरिक या मानसिक अक्षमताओं के कारण सुनिश्चित करने में असमर्थ है" उसे विकलांग व्यक्ति के रूप में वर्णित किया जा सकता है| विकलांगता वस्तुतः मानव के लिए सामान्य माने जाने वाली किसी गतिविधि को करने में प्रतिबंध या अक्षमता को दर्शाती है| 2011 की जनसँख्या के अनुसार हमारे देश में विकलांग व्यक्तियों की जनसँख्या का प्रतिशत 2.2% है| लगभग एक तिहाई विकलांग जनसँख्या जन्म से ही विकलांगता का सामना करती है| भारत सरकार उनके सम्मान को सुनिश्चित करने हेतु विकलांग शब्द की जगह दिव्यांग शब्द का चयन करने लगी है| दिव्यांगजनों द्वारा गरिमापूर्ण जीवन जीने के मार्ग में आने वाली चुनौतियाँ उन्हें जैविक रूप से अलग समझा जाना तथा प्रायः कमजोर तथा बेकार माना जाना; किसी समस्या से घिरने पर विकलांगता को ही उसका कारण मानना; विकलांग व्यक्तियों को पीड़ित के रूप में देखा जाना; उनके निवास स्थानों के आसपास के लोगों से उन्हें सामाजिक कलंक तथा भेदभाव का सामना; बेचारा जैसे अपमानबोधक संबोधनों से हीनता का एहसास कराना; समाज के साथ घुलने-मिलने में कठिनाई का सामना जिससे उनमें आत्मग्लानि तथा अवसाद की भावना का विकास; समाज में कुछ लोगों के द्वारा विकलांगता को पिछले जन्मों के कर्मों का फल मानना जिससे दिव्यांगों के मन में अपराधबोध की भावना का विकास; पारिवारिक स्तर पर भी इनके समक्ष शारीरिक-मानसिक भेदभाव जिससे इनके अंदर हीनभावना का विकास; शिक्षा, रोजगार तथा अन्य सामाजिक-आर्थिक अवसरों तक कम पहुँच जिससे इनकी जीवन की गुणता प्रभावित; परिवहन साधनों के सुगम पहुँच का मुद्दा; कार्यालयों, घरों तथा अन्य भौतिक अवसंरचनाओं में बाधारहित प्रवेश में कठिनाई का सामना; उपरोक्त बाधाएं सिर्फ शारीरिक-मानसिक अक्षमता के कारण नहीं हैं बल्कि समाज में बहिष्कृत एवं निंदित करने की प्रवृत्ति भी उतनी ही जिम्मेदार है| दिव्यांगजन भी हमारे समाज के एक महत्वपूर्ण अंग हैं अतः समाज में उनकी प्रभावी भूमिका सुनिश्चित करना तथा उनको गरिमापूर्ण जीवन जीने देना समाज तथा सरकार दोनों का कर्तव्य होना चाहिए| समाज में उनकी प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु कुछ उपाय उनकी बेहतरी हेतु बनाए गये योजनाओं/कार्यक्रमों/नीतियों हेतु पर्याप्त धन आवंटन; उनका उचित क्रियान्वयन, समन्वय तथा निगरानी रखना; बेहतर बुनियादी ढाँचा का विकास जिसमें दिव्यांगों के समस्याओं के प्रति जागरूकता दिखाई पड़ना; वैश्विक प्रयासों के साथ संरेखन तथा एकीकृत करना; सामाजिक सोच को उनके प्रति बेहतर बनाना ताकि कलंक तथा अन्य दुर्भावना भरे सोचों कों दूर किया जा सके| विकलांगों के मन में हीनभावना दूर करने हेतु समाज तथा सरकार को मिलकर प्रयास करने की आवश्यकता; शिक्षा तथा रोजगार तक आसान पहुँच सुनिश्चित करके उन्हें आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाना क्योंकि विकलांगता तथा गरीबी के मध्य घनिष्ठ है| बुनियादी तथा भौतिक अवसंरचनाओं तक उनकी पहुँच को सुगम बनाने के उपाय करना; परिवहन साधनों तक आसन पहुँच सुनिश्चित करना; इस संदर्भ में शुद्ध आंकड़ों की उपलब्धता सुनिश्चित करना ताकि नीति निर्माण में मदद मिले; इन उपायों से उनके गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार की रक्षा करना बेहतर तरीके से संभव हो पायेगा| समाज में दिव्यांगजनों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु सरकार द्वारा उठाये गये क़दम संवैधानिक प्रावधान - अनुच्छेद 14; अनुच्छेद 21 तथा राज्य के नीति निदेशक तत्वों में दिव्यांगों सहित सभी के लिए समानता, न्याय और गरिमा का अधिकार; सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के अंतर्गत दिव्यांगजन अधिकारिता विभाग ; भारतीय पुनर्वास परिषद् एक्ट, 1992; दिव्यांगजन(समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण तथा पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995; ऑटिज्म, सेरेब्रल पाल्सी, मानसिक विकलांगता और एकाधिक विकलांगता वाले व्यक्तियों के कल्याण के लिए राष्ट्रीय न्यास अधिनियम, 1999; दीनदयाल विकलांग पुनर्वास योजना; विकलांग व्यक्तियों का अधिकार अधिनियम, 2016 ; मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 2017; राष्ट्रीय दिव्यांगजन वित्त और विकास निगम; सुगम्य भारत अभियान(2015-16) - निर्मित वातावरण सुगम्यता; परिवहन प्रणाली सुगम्यता; सूचना तथा संचार प्रणाली सुगम्यता; सुगम्य पुस्तकालय; मर्राकेश संधि(2013)के साथ संरेखन; विभिन्न मंत्रालय जैसे- रेलवे आदि द्वारा इन दिव्यांगजनों हेतु सकारात्मक सुरक्षात्मक भेदभाव भी करना जिसके अंतर्गत विभिन्न निःशुल्क सुविधाएँ; रेलवे सीटों के आरक्षण में वरीयता आदि का प्रयास; सुप्रीमकोर्ट के आदेशानुसार दिव्यांगजनों हेतु 3% क्षैतिज आरक्षण की भी व्यवस्था; आवश्यकता पड़ने पर बेंचमार्क संदर्भों में 5% तक संभव; इनके स्वास्थ्य, कृत्रिम अंगों आदि को सहज सुलभ कराने हेतु विभिन्न प्रकार के शोध संस्थान; दिव्यांगजनों के संदर्भ में सर्वाधिक चिंता का विषय ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में सुविधाओं में अंतर है क्योंकि दिव्यांगजन ग्रामीण क्षेत्र में अधिक हैं वहीँ सुविधाएँ सापेक्षिक रूप से शहरों में अधिक है| सरकार को इस दिशा में आगे कार्य करने की आवश्यकता है|
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बंगाल में अंग्रेजों द्वारा स्थायी बंदोबस्त की शुरुआत करने के पीछे निहित अपेक्षाएँ क्या थीं? साथ ही, इस प्रणाली को बंगाल से दूर विस्तारित नहीं करने के कारणों को भी बताइये। (150- 200 शब्द; 10 अंक) What were the expectations behind the introduction of permanent settlement by the British in Bengal? Also provide reasons for the system not being extended much beyond Bengal. (150-200 words; 10 marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था के बारे में लिखिए। इसे लागू करने के कारणों का विवरण दीजिए। इसके पश्चात बंगाल से बाहर इसे ना लागू करने के कारणों का उल्लेख कीजिये। 1793 में लॉर्ड कार्नवालिस ने सर जॉन शोर की अध्यक्षता वाली समिति की अनुशंसाओं के आधार पर बंगाल बिहार उड़ीसा में लागू किया। इस प्रणाली के अंतर्गत जमींदारों द्वारा प्राप्त राजस्व में कंपनी की हिस्सेदारी को स्थायी रूप से निश्चित कर दिया गया था। इसके अंतर्गत जमींदारों को भूमि का वंशानुगत स्वामी बना दिया गया था। प्रणाली के आरंभ के पीछे निहित अपेक्षाएँ निम्नलिखित थीं: भू राजस्वामियों का एक ऐसा वर्ग तैयार करना जो ब्रिटिश हितों के प्रति निष्ठावान हो। ईस्ट इंडिया कंपनी हेतु राजस्व सुनिश्चित करना: यह आशा की गयी थी कि एक गारंटीकृत आय सुनिश्चित होने से सरकार राजस्व संग्रहण के बजाय प्रशासन पर अधिक ध्यान केन्द्रित करने में सक्षम हो जाएगी यह भी आशा की गयी थी कि संपत्ति का स्वामित्व प्राप्त होने से जमींदार कृषि में व्यापक पूंजी का निवेश करने हेतु प्रेरित होंगे। भारत की कृषि क्रांति, इंग्लैंड में अद्योगिक क्रांति में सहायता प्रदान करेगी। इसके अर्थव्यवस्था में सुधार होगा। प्रशासनिक सुविधाओं के बावजूद स्थायी बंदोबस्त बंगाल से दूर विस्तारित नहीं किया गया क्योंकि: कंपनी का राजस्व 1793 के स्तर पर निर्धारित था और इसमें अधिक विस्तार करने की संभावना नहीं थी। जमींदारों ने जानबूझकर भुगतनों में विलंब के परिणामस्वरूप चालाकीपूर्ण नीलामियों के माध्यम से तथा अपनी भूमि की काल्पनिक बिक्री के अमध्य से पूर्ण राजस्व मांगों के भुगतान से बचने हेतु रणनीतियाँ विकसित कर ली थी। सरकारी राजस्व के व्यय पर मध्यस्थों की संख्या में वृद्धि हुई। अनुपस्थित जमींदारी की प्रणाली ने ग्रामीण क्षेत्रों में सृजित होने वाले धन का नगरीय केन्द्रों की ओर निर्गमन आरंभ किया। इसके अतिरिक्त रैयतवाड़ी और महालवारी जैसी वैकल्पिक प्रणालियों की शुरुआत हुई।
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##Question:बंगाल में अंग्रेजों द्वारा स्थायी बंदोबस्त की शुरुआत करने के पीछे निहित अपेक्षाएँ क्या थीं? साथ ही, इस प्रणाली को बंगाल से दूर विस्तारित नहीं करने के कारणों को भी बताइये। (150- 200 शब्द; 10 अंक) What were the expectations behind the introduction of permanent settlement by the British in Bengal? Also provide reasons for the system not being extended much beyond Bengal. (150-200 words; 10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था के बारे में लिखिए। इसे लागू करने के कारणों का विवरण दीजिए। इसके पश्चात बंगाल से बाहर इसे ना लागू करने के कारणों का उल्लेख कीजिये। 1793 में लॉर्ड कार्नवालिस ने सर जॉन शोर की अध्यक्षता वाली समिति की अनुशंसाओं के आधार पर बंगाल बिहार उड़ीसा में लागू किया। इस प्रणाली के अंतर्गत जमींदारों द्वारा प्राप्त राजस्व में कंपनी की हिस्सेदारी को स्थायी रूप से निश्चित कर दिया गया था। इसके अंतर्गत जमींदारों को भूमि का वंशानुगत स्वामी बना दिया गया था। प्रणाली के आरंभ के पीछे निहित अपेक्षाएँ निम्नलिखित थीं: भू राजस्वामियों का एक ऐसा वर्ग तैयार करना जो ब्रिटिश हितों के प्रति निष्ठावान हो। ईस्ट इंडिया कंपनी हेतु राजस्व सुनिश्चित करना: यह आशा की गयी थी कि एक गारंटीकृत आय सुनिश्चित होने से सरकार राजस्व संग्रहण के बजाय प्रशासन पर अधिक ध्यान केन्द्रित करने में सक्षम हो जाएगी यह भी आशा की गयी थी कि संपत्ति का स्वामित्व प्राप्त होने से जमींदार कृषि में व्यापक पूंजी का निवेश करने हेतु प्रेरित होंगे। भारत की कृषि क्रांति, इंग्लैंड में अद्योगिक क्रांति में सहायता प्रदान करेगी। इसके अर्थव्यवस्था में सुधार होगा। प्रशासनिक सुविधाओं के बावजूद स्थायी बंदोबस्त बंगाल से दूर विस्तारित नहीं किया गया क्योंकि: कंपनी का राजस्व 1793 के स्तर पर निर्धारित था और इसमें अधिक विस्तार करने की संभावना नहीं थी। जमींदारों ने जानबूझकर भुगतनों में विलंब के परिणामस्वरूप चालाकीपूर्ण नीलामियों के माध्यम से तथा अपनी भूमि की काल्पनिक बिक्री के अमध्य से पूर्ण राजस्व मांगों के भुगतान से बचने हेतु रणनीतियाँ विकसित कर ली थी। सरकारी राजस्व के व्यय पर मध्यस्थों की संख्या में वृद्धि हुई। अनुपस्थित जमींदारी की प्रणाली ने ग्रामीण क्षेत्रों में सृजित होने वाले धन का नगरीय केन्द्रों की ओर निर्गमन आरंभ किया। इसके अतिरिक्त रैयतवाड़ी और महालवारी जैसी वैकल्पिक प्रणालियों की शुरुआत हुई।
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Although India has been successful in developing indigenous defence technologies but still continues to be one of the biggest buyer of defence weapons systems in world. Critically examine the statement and suggest solutions to increase self-reliance in defence sector. (250 words)
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Approach 1. Give an introduction by defining Indigenization. 2. List the developments in indigenization along with giving data regarding imports in the defence sector 3. Reasons for growing imports. 4. List the solutions for more indigenization. 5. Give a conclusion by giving recent steps taken by the government. Answer Indigenisation is the capability of developing and producing any defence equipment within the country for the dual purpose of achieving self-reliance and reducing the burden of imports. Indigenisation is necessary for reducing the fiscal deficit, increasing security, employment generation, and strategic capability. The beginning in defence indigenisation was made in 1983, when the government-sanctioned the Integrated Guided Missile Development Programme (IGMDP) to develop five missile systems, Prithvi (surface-to-surface), Akash (surface-to-air), Trishul (the naval version of Prithvi), Nag (anti-tank), Agni Ballistic missiles. India has developed Tejas aircraft, INS Vikrant, Long-range artillery gun Dhanush, Arihant: first indigenous nuclear submarine, The Pinaka Multi Barrel Rocket Launcher, Supersonic cruise missile BRAHMOS. Still, after all these efforts, India is one of the biggest importers of the Arms in the world. “India was the world’s second-largest importer of major arms in 2014–18 and accounted for 9.5% of the global total,” according to the report published by the Stockholm International Peace Research Institute (SIPRI) . In between 2004-08 and 2009-13 and India’s share of the volume of international arms imports increased from 7% to 14%. However, Indian imports decreased by 24% between 2009-13 and 2014-18, partly due to delays in deliveries of arms produced under licence from foreign suppliers, such as combat aircraft ordered from Russia in 2001 and submarines ordered from France in 2008. USA, Russia, Israel, France are the biggest exporters of the arms to India. The S-400 air defence systems, four stealth frigates, AK-203 assault rifles, a second nuclear attack submarine on the lease, and deals for Kamov-226T utility helicopters, Mi-17 helicopters and short-range air defence systems are on the pipeline. In 1990 Self Reliance Review Committee (SRRV) under A.P.J. Abdul Kalam, had formulated a 10-year self-reliance plan under which, the self-reliance index (SRI), (defined as the percentage share of indigenous content in total procurement expenditure), was to be increased from 30% in 1992-1993 to 70 % by 2005. But this target has not been achieved till today. Imports are increasing because India faces a number of dilemmas in trying to reform its defence industry: the normal rules of market economics do not apply; ideal objectives of quality, cost, and timeframes cannot be achieved simultaneously; defence budgets remain susceptible to cuts; the nature of defence supply chains is changing, and little heed has been paid to policies to maximise technological absorption. Moreover, major stakeholders confront their own challenges: India’s powerful defence public sector faces conflicts of interest and is resistant to change; the armed services provide unrealistic qualitative requirements; the Ministry of Defence lacks specialisation; the Finance Ministry discourages long-term spending, and the political leadership lacks expertise and is reluctant to make decisions due to political perceptions. To address these diverse challenges, following efforts can be taken – 1. Efforts should be made to ensure predictable long-term requirements and create a more level playing field between the public and private sectors. 2. Co-development and Co-manufacturing between the Indian entities and the foreign entities can make Indian manufacturing on par with the global giants. Government has notified the ‘Strategic Partnership (SP)’ Model which envisages the establishment of long-term strategic partnerships with Indian entities through a transparent and competitive process, wherein they would tie-up with global Original Equipment Manufacturers (OEMs) to seek technology transfers to set up domestic manufacturing infrastructure and supply chains. 3. Defence industry needs to build a growing pool of talent to meet the demands of the industry. 4. Defence Offsets: Offset guidelines have been made flexible by allowing change of Indian Offset Partners (IOPs) and offset components, even in signed contracts. Foreign Original Equipment Manufacturers (OEMs) are now not required to indicate the details of IOPs and products at the time of signing of contracts. 5. Adequate infrastructure is needed to increase the countries competitiveness and efficiency. 6. Preference to Buy (Indian), Buy and Make (Indian), and Make categories of capital acquisition over Buy and Make (Global) and Make (Global) categories in the defence procurement procedure. 7. Foreign direct investment (FDI) policy under which a foreign investment cap of up to 49% is allowed through the automatic route and above 49% under the government route on case to case basis. FDI regime needs to be further relaxed. 8. Mission Raksha Gyan Shakti: The Ministry has instituted a new framework titled ‘Mission Raksha Gyan Shakti’ which aims to provide a boost to the IPR culture in the indigenous defence industry. 9. Indian licencing regime for Indian manufacturers needs to be more liberalized. Recently India has taken various steps such as - Liberalisation of FDI, new defence procurement policy, Make procedure etc. these all steps are in the direction of increasing self-reliance in the defence sector. Because Self-reliance is a major corner-stone on which the military capability of any nation rests, and if India wants to be a net security provider in the region and effectively maintain its border and national security, self-sufficiency in the area of defence production is necessary.
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##Question:Although India has been successful in developing indigenous defence technologies but still continues to be one of the biggest buyer of defence weapons systems in world. Critically examine the statement and suggest solutions to increase self-reliance in defence sector. (250 words)##Answer:Approach 1. Give an introduction by defining Indigenization. 2. List the developments in indigenization along with giving data regarding imports in the defence sector 3. Reasons for growing imports. 4. List the solutions for more indigenization. 5. Give a conclusion by giving recent steps taken by the government. Answer Indigenisation is the capability of developing and producing any defence equipment within the country for the dual purpose of achieving self-reliance and reducing the burden of imports. Indigenisation is necessary for reducing the fiscal deficit, increasing security, employment generation, and strategic capability. The beginning in defence indigenisation was made in 1983, when the government-sanctioned the Integrated Guided Missile Development Programme (IGMDP) to develop five missile systems, Prithvi (surface-to-surface), Akash (surface-to-air), Trishul (the naval version of Prithvi), Nag (anti-tank), Agni Ballistic missiles. India has developed Tejas aircraft, INS Vikrant, Long-range artillery gun Dhanush, Arihant: first indigenous nuclear submarine, The Pinaka Multi Barrel Rocket Launcher, Supersonic cruise missile BRAHMOS. Still, after all these efforts, India is one of the biggest importers of the Arms in the world. “India was the world’s second-largest importer of major arms in 2014–18 and accounted for 9.5% of the global total,” according to the report published by the Stockholm International Peace Research Institute (SIPRI) . In between 2004-08 and 2009-13 and India’s share of the volume of international arms imports increased from 7% to 14%. However, Indian imports decreased by 24% between 2009-13 and 2014-18, partly due to delays in deliveries of arms produced under licence from foreign suppliers, such as combat aircraft ordered from Russia in 2001 and submarines ordered from France in 2008. USA, Russia, Israel, France are the biggest exporters of the arms to India. The S-400 air defence systems, four stealth frigates, AK-203 assault rifles, a second nuclear attack submarine on the lease, and deals for Kamov-226T utility helicopters, Mi-17 helicopters and short-range air defence systems are on the pipeline. In 1990 Self Reliance Review Committee (SRRV) under A.P.J. Abdul Kalam, had formulated a 10-year self-reliance plan under which, the self-reliance index (SRI), (defined as the percentage share of indigenous content in total procurement expenditure), was to be increased from 30% in 1992-1993 to 70 % by 2005. But this target has not been achieved till today. Imports are increasing because India faces a number of dilemmas in trying to reform its defence industry: the normal rules of market economics do not apply; ideal objectives of quality, cost, and timeframes cannot be achieved simultaneously; defence budgets remain susceptible to cuts; the nature of defence supply chains is changing, and little heed has been paid to policies to maximise technological absorption. Moreover, major stakeholders confront their own challenges: India’s powerful defence public sector faces conflicts of interest and is resistant to change; the armed services provide unrealistic qualitative requirements; the Ministry of Defence lacks specialisation; the Finance Ministry discourages long-term spending, and the political leadership lacks expertise and is reluctant to make decisions due to political perceptions. To address these diverse challenges, following efforts can be taken – 1. Efforts should be made to ensure predictable long-term requirements and create a more level playing field between the public and private sectors. 2. Co-development and Co-manufacturing between the Indian entities and the foreign entities can make Indian manufacturing on par with the global giants. Government has notified the ‘Strategic Partnership (SP)’ Model which envisages the establishment of long-term strategic partnerships with Indian entities through a transparent and competitive process, wherein they would tie-up with global Original Equipment Manufacturers (OEMs) to seek technology transfers to set up domestic manufacturing infrastructure and supply chains. 3. Defence industry needs to build a growing pool of talent to meet the demands of the industry. 4. Defence Offsets: Offset guidelines have been made flexible by allowing change of Indian Offset Partners (IOPs) and offset components, even in signed contracts. Foreign Original Equipment Manufacturers (OEMs) are now not required to indicate the details of IOPs and products at the time of signing of contracts. 5. Adequate infrastructure is needed to increase the countries competitiveness and efficiency. 6. Preference to Buy (Indian), Buy and Make (Indian), and Make categories of capital acquisition over Buy and Make (Global) and Make (Global) categories in the defence procurement procedure. 7. Foreign direct investment (FDI) policy under which a foreign investment cap of up to 49% is allowed through the automatic route and above 49% under the government route on case to case basis. FDI regime needs to be further relaxed. 8. Mission Raksha Gyan Shakti: The Ministry has instituted a new framework titled ‘Mission Raksha Gyan Shakti’ which aims to provide a boost to the IPR culture in the indigenous defence industry. 9. Indian licencing regime for Indian manufacturers needs to be more liberalized. Recently India has taken various steps such as - Liberalisation of FDI, new defence procurement policy, Make procedure etc. these all steps are in the direction of increasing self-reliance in the defence sector. Because Self-reliance is a major corner-stone on which the military capability of any nation rests, and if India wants to be a net security provider in the region and effectively maintain its border and national security, self-sufficiency in the area of defence production is necessary.
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