Question
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बिग बैंग सिद्धान्त ब्रह्मांड के विस्तार की व्याख्या करता है,स्पष्ट कीजिए। साथ ही इस सिद्धान्त के पक्ष में प्रमाणों को सूचीबद्ध कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) The Big Bang theory explains the expansion of the universe, explain. Also, list the evidence in favor of this principle. (150-200 Words/10 Marks)
Approach: भूमिका में बिग बैंग सिद्धान्त का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत कर सकते हैं। बिग बैंग सिद्धान्त को स्पष्ट कीजिए। ब्रह्मांड के विस्तार की व्याख्या के रूप में बिग बैंग सिद्धान्त को स्पष्ट कीजिए। सिद्धान्त के पक्ष में प्रमाणों को सूचीबद्ध कीजिए। संक्षिप्त निष्कर्ष में सिद्धान्त के महत्व की चर्चा कर सकते हैं। उत्तर: हमारे चारों ओर विस्तृत विशाल अन्तरिक्ष ब्रह्मांड कहलाता है। ब्रह्मांड की उत्पत्ति संबंधी सर्वमान्य सिद्धान्त बिग बैंग सिद्धान्त है। इसे विस्तारित ब्रह्मांड परिकल्पना भीकहा जाता है। 1920 ई. में एडविन हब्बल ने प्रमाण दिया कि ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है। समय बीतने के साथ आकाशगंगाएँ एक दूसरे से दूर जा रही हैं। यहाँ ब्रह्मांड के विस्तार का अर्थ आकाशगंगाओं के बीच दूरी बढ्ने से है। वैज्ञानिकों का मानना है कि आकाशगंगाओं के मध्य की दूरी बढ़ रही है। ब्रह्मांड के विस्तार के रूप में बिग बैंग सिद्धान्त- आरंभ में सभी पदार्थ, जिनसे ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई है एकाकी परमाणु के रूप में ही स्थान पर अवस्थित थे। जिनका आयतन अत्यधिक निम्न तथा तापमान व घनत्व अनंत था। बिग बैंग की प्रक्रिया में इस अति छोटे गोलक में भीषण विस्फोट हुआ। इस प्रकार की विस्फोट की प्रक्रिया से इसमें व्यापक विस्तार हुआ। अब खगोलविदों के बीच इस तथ्य के विषय में आप सहमति है कि बिग बैंग की घटना आज से 13.7 अरब वर्ष पूर्व घटित हुई थी। ब्रह्मांड का विस्तार आज भी जारी है। विस्तार के कारण कुछ ऊर्जा पदार्थ में परिवर्तित हो गई। विस्फोट के बाद एक सेकंड के अल्पांश के अंतर्गत ही वृहद विस्तार हुआ। इसके बाद विस्तार की गति धीमी पड़ गयी। बिग बैंग होने के आरंभिक तीन मिनट के अंतर्गत ही पहले परमाणु का निर्माण हुआ। बिग बैंग से 3 लाख वर्षों के दौरान, तापमान 4500 डिग्री केल्विन तक गिर गया और परमाण्वीय पदार्थों क निर्माण हुआ। बिग बैंग सिद्धान्त के समर्थन में प्रमाण- आकाशगंगाओं के संबंध में रेड शिफ्ट (Red Shift) परिघटना: यदि प्रकाश स्रोत की दूरी हमसे बढ़ती जाए तो प्राप्त प्रकाश की आवृति में आभासी ह्वास होगा और यह आवृति दृश्य स्पेक्ट्रम के लाल वर्ण की ओर विस्थापित होगी। इसकी व्याख्या इस आधार पर की जाती है कि अन्य आकाशगंगाएँ तेजी से हमसे दूर जा रही हैं। आकाशगंगाओं के बीच दूरी बढ्ने से इसके प्रकाश का रेड शिफ्ट अधिक होना इसका सबसे अच्छा विवरण यह है कि पूरे ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है। यह इस सिद्धान्त का समर्थन करता है कि ब्रह्मांड का आरंभ एक विस्फोट से हो सकता है। कॉस्मिक माइक्रोवेव रेडीएशन बैकग्राउंड अपेक्षाकृत समान रूप से होने वाला कॉस्मिक माइक्रोवेव रेडियशन बिग बैंग के तुरंत बाद उत्पन्न ऊर्जा का अवशेष है। ब्रह्मांड के विषय में जानकारी तथा इसकी उत्पत्ति की व्याख्या वैज्ञानिकों के लिए चुनौती भरा कार्य रहा है। बिग बैंग सिद्धान्त कुछ मात्रा में इस चुनौती को दूर करते हुए एक प्रामाणिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। इस सिद्धान्त की महत्ता इसलिए भी है क्योंकि यह न केवल प्रामाणिक बल्कि अब तक का सर्वमान्य सिद्धान्त है।
##Question:बिग बैंग सिद्धान्त ब्रह्मांड के विस्तार की व्याख्या करता है,स्पष्ट कीजिए। साथ ही इस सिद्धान्त के पक्ष में प्रमाणों को सूचीबद्ध कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) The Big Bang theory explains the expansion of the universe, explain. Also, list the evidence in favor of this principle. (150-200 Words/10 Marks)##Answer:Approach: भूमिका में बिग बैंग सिद्धान्त का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत कर सकते हैं। बिग बैंग सिद्धान्त को स्पष्ट कीजिए। ब्रह्मांड के विस्तार की व्याख्या के रूप में बिग बैंग सिद्धान्त को स्पष्ट कीजिए। सिद्धान्त के पक्ष में प्रमाणों को सूचीबद्ध कीजिए। संक्षिप्त निष्कर्ष में सिद्धान्त के महत्व की चर्चा कर सकते हैं। उत्तर: हमारे चारों ओर विस्तृत विशाल अन्तरिक्ष ब्रह्मांड कहलाता है। ब्रह्मांड की उत्पत्ति संबंधी सर्वमान्य सिद्धान्त बिग बैंग सिद्धान्त है। इसे विस्तारित ब्रह्मांड परिकल्पना भीकहा जाता है। 1920 ई. में एडविन हब्बल ने प्रमाण दिया कि ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है। समय बीतने के साथ आकाशगंगाएँ एक दूसरे से दूर जा रही हैं। यहाँ ब्रह्मांड के विस्तार का अर्थ आकाशगंगाओं के बीच दूरी बढ्ने से है। वैज्ञानिकों का मानना है कि आकाशगंगाओं के मध्य की दूरी बढ़ रही है। ब्रह्मांड के विस्तार के रूप में बिग बैंग सिद्धान्त- आरंभ में सभी पदार्थ, जिनसे ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई है एकाकी परमाणु के रूप में ही स्थान पर अवस्थित थे। जिनका आयतन अत्यधिक निम्न तथा तापमान व घनत्व अनंत था। बिग बैंग की प्रक्रिया में इस अति छोटे गोलक में भीषण विस्फोट हुआ। इस प्रकार की विस्फोट की प्रक्रिया से इसमें व्यापक विस्तार हुआ। अब खगोलविदों के बीच इस तथ्य के विषय में आप सहमति है कि बिग बैंग की घटना आज से 13.7 अरब वर्ष पूर्व घटित हुई थी। ब्रह्मांड का विस्तार आज भी जारी है। विस्तार के कारण कुछ ऊर्जा पदार्थ में परिवर्तित हो गई। विस्फोट के बाद एक सेकंड के अल्पांश के अंतर्गत ही वृहद विस्तार हुआ। इसके बाद विस्तार की गति धीमी पड़ गयी। बिग बैंग होने के आरंभिक तीन मिनट के अंतर्गत ही पहले परमाणु का निर्माण हुआ। बिग बैंग से 3 लाख वर्षों के दौरान, तापमान 4500 डिग्री केल्विन तक गिर गया और परमाण्वीय पदार्थों क निर्माण हुआ। बिग बैंग सिद्धान्त के समर्थन में प्रमाण- आकाशगंगाओं के संबंध में रेड शिफ्ट (Red Shift) परिघटना: यदि प्रकाश स्रोत की दूरी हमसे बढ़ती जाए तो प्राप्त प्रकाश की आवृति में आभासी ह्वास होगा और यह आवृति दृश्य स्पेक्ट्रम के लाल वर्ण की ओर विस्थापित होगी। इसकी व्याख्या इस आधार पर की जाती है कि अन्य आकाशगंगाएँ तेजी से हमसे दूर जा रही हैं। आकाशगंगाओं के बीच दूरी बढ्ने से इसके प्रकाश का रेड शिफ्ट अधिक होना इसका सबसे अच्छा विवरण यह है कि पूरे ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है। यह इस सिद्धान्त का समर्थन करता है कि ब्रह्मांड का आरंभ एक विस्फोट से हो सकता है। कॉस्मिक माइक्रोवेव रेडीएशन बैकग्राउंड अपेक्षाकृत समान रूप से होने वाला कॉस्मिक माइक्रोवेव रेडियशन बिग बैंग के तुरंत बाद उत्पन्न ऊर्जा का अवशेष है। ब्रह्मांड के विषय में जानकारी तथा इसकी उत्पत्ति की व्याख्या वैज्ञानिकों के लिए चुनौती भरा कार्य रहा है। बिग बैंग सिद्धान्त कुछ मात्रा में इस चुनौती को दूर करते हुए एक प्रामाणिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। इस सिद्धान्त की महत्ता इसलिए भी है क्योंकि यह न केवल प्रामाणिक बल्कि अब तक का सर्वमान्य सिद्धान्त है।
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खगोलिकी विज्ञान के सन्दर्भ में इसरो के एस्ट्रोसैट मिशन तथा आदित्य L1 मिशन पर चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द/ 10 अंक) In the context of astronomy, discuss ISRO"s Astrosat mission and Aditya L1 mission. (150-200 words/10 marks)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत खगोलिकी विज्ञान का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात एस्ट्रोसैट मिशन के बारे चर्चा कीजिये | पुनः आदित्य मिशन की चर्चा करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - खगोलिकी विज्ञान - खगोलिकी अध्ययन के अनुसार ब्रह्माण्ड या अंतरिक्ष में निरंतर या अकस्मात चलने वाली घटनाओं का अध्ययन शामिल है, जिसमे ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, नए तारों का बनना, आदि जैसी घटनाओं का अध्ययन किया जाता है | एस्ट्रोसैट खगोलिकी अध्ययन के लिए भारत ने पहला प्रयास 2015 में PSLVC -30 द्वारा एस्ट्रोसैट को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित करके शुरू किया | एस्ट्रोसैट को निम्न कक्षा में स्थापित किया गया है | यह भारत का बहु तरंग दैर्ध्य वेधशाला है, जिसमे एक्स-रे, यू.वी. स्पेक्ट्रम प्रकाशिकी है | इसको पांच उपकरणों के साथ लांच किया गया | आदित्य मिशन - आदित्य L1 आदित्य L1 मिशन भारत (इसरो) का तीसरा चुनौतीपूर्ण मिशन है | इस मिशन का लक्ष्य उपग्रह को सूर्य तथा पृथ्वी के बीच स्थित L1 क्षेत्र में पृथ्वी से 15 लाख की दूरी पर स्थापित करना है | वर्तमान समय में नासा तथा यूरोपियन स्पेस एजेंसी की मदद से सोहो मिशन को लांच किया गया है | यह 400 किग्रा का उपग्रह है | इसको PSLV की सहयता से लांच किया जाएगा | इसे लेगरंज पॉइंट 1 के हेलो orbit में रखा जाएगा | नासा और ESA का सोहो के समान वेधशाला है | अध्ययन - सूर्य के बाहरी कोरोना के अत्यधिक तापमान के कारण का पता लगाना | सौर कालिक के चुम्बकीय फ्लक्स का अध्ययन किया जाएगा | कोरोनल मॉस इंजेक्शन तथा सौर तूफ़ान का अध्ययन करेगा | सौर तूफ़ान का अंतरिक्ष मौसम पर प्रभावों का अध्ययन करेगा | इसमें 7 उपकरण होंगे जो इन चार उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहयोगी होगा | निसार - नासा-इसरो सिंथेटिक अपर्चर रडार के सन्दर्भ में सामान्य चर्चा भारत ने खगोलीय अध्ययन को नियमित करने के लिए नयी वेधशाला बनाने का कार्य प्रारम्भ कर दिया | पूर्व में इसी अध्ययन के द्वारा भारतीय वैज्ञानिकों ने सरस्वती निहारिका की खोज की थी, जिसमे अब तक ज्ञात सर्वाधिक तारे हैं |
##Question:खगोलिकी विज्ञान के सन्दर्भ में इसरो के एस्ट्रोसैट मिशन तथा आदित्य L1 मिशन पर चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द/ 10 अंक) In the context of astronomy, discuss ISRO"s Astrosat mission and Aditya L1 mission. (150-200 words/10 marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत खगोलिकी विज्ञान का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात एस्ट्रोसैट मिशन के बारे चर्चा कीजिये | पुनः आदित्य मिशन की चर्चा करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - खगोलिकी विज्ञान - खगोलिकी अध्ययन के अनुसार ब्रह्माण्ड या अंतरिक्ष में निरंतर या अकस्मात चलने वाली घटनाओं का अध्ययन शामिल है, जिसमे ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, नए तारों का बनना, आदि जैसी घटनाओं का अध्ययन किया जाता है | एस्ट्रोसैट खगोलिकी अध्ययन के लिए भारत ने पहला प्रयास 2015 में PSLVC -30 द्वारा एस्ट्रोसैट को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित करके शुरू किया | एस्ट्रोसैट को निम्न कक्षा में स्थापित किया गया है | यह भारत का बहु तरंग दैर्ध्य वेधशाला है, जिसमे एक्स-रे, यू.वी. स्पेक्ट्रम प्रकाशिकी है | इसको पांच उपकरणों के साथ लांच किया गया | आदित्य मिशन - आदित्य L1 आदित्य L1 मिशन भारत (इसरो) का तीसरा चुनौतीपूर्ण मिशन है | इस मिशन का लक्ष्य उपग्रह को सूर्य तथा पृथ्वी के बीच स्थित L1 क्षेत्र में पृथ्वी से 15 लाख की दूरी पर स्थापित करना है | वर्तमान समय में नासा तथा यूरोपियन स्पेस एजेंसी की मदद से सोहो मिशन को लांच किया गया है | यह 400 किग्रा का उपग्रह है | इसको PSLV की सहयता से लांच किया जाएगा | इसे लेगरंज पॉइंट 1 के हेलो orbit में रखा जाएगा | नासा और ESA का सोहो के समान वेधशाला है | अध्ययन - सूर्य के बाहरी कोरोना के अत्यधिक तापमान के कारण का पता लगाना | सौर कालिक के चुम्बकीय फ्लक्स का अध्ययन किया जाएगा | कोरोनल मॉस इंजेक्शन तथा सौर तूफ़ान का अध्ययन करेगा | सौर तूफ़ान का अंतरिक्ष मौसम पर प्रभावों का अध्ययन करेगा | इसमें 7 उपकरण होंगे जो इन चार उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहयोगी होगा | निसार - नासा-इसरो सिंथेटिक अपर्चर रडार के सन्दर्भ में सामान्य चर्चा भारत ने खगोलीय अध्ययन को नियमित करने के लिए नयी वेधशाला बनाने का कार्य प्रारम्भ कर दिया | पूर्व में इसी अध्ययन के द्वारा भारतीय वैज्ञानिकों ने सरस्वती निहारिका की खोज की थी, जिसमे अब तक ज्ञात सर्वाधिक तारे हैं |
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भारत में ब्रिटिश शिक्षा नीति के विकास का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये ( 150-200 शब्द; 10 अंक ) Critically examine the development of British education policy in India (150–200 words; 10 marks)
दृष्टिकोण : अंग्रेजों द्वारा भारत में शिक्षा के विकास के उद्देशों की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति के क्रमिक चरणों के अनुरूप शिक्षा नीति के क्रमिक विकास की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । उन कारकों की चर्चा संक्षिप्त चर्चा कीजिये जिसने भारत में ब्रिटिश शिक्षा नीति के स्वरूप को दिशा देने का कार्य किया । भारत में ब्रिटिश शिक्षा नीति के प्रभावों की संक्षिप्त चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : भारत में ब्रिटिश नीति मूल रूप से औपनिवेशिक हितों से परिचालित होती थी । ब्रिटिश शिक्षा नीति को भी हमें इसी अनुरूप देखने की आवश्यकता है । भारत में अंग्रेजों ने शिक्षा के विकास को उसी रूप में आगे बढ़ाया जिस रूप में शिक्षा उनके औपनिवेशिक हितों की पूर्ति में सहायक थी । भारत में ब्रिटिश शिक्षा नीति को हम क्रमिक रूप में विकसित होते निम्न रूपों में देख व समझ सकते हैं : 1. उपनिवेशवाद का प्रथम चरण ( 1757-1813 ) : उपनिवेशवाद के प्रथम चरण में अंग्रेजों का लक्ष्य अधिकाधिक राजस्व एकत्रित कर व्यापार के क्षेत्र में निवेश करना था । इसलिए हमें इस चरण में शिक्षा के क्षेत्र में कोई स्पष्ट नीतिगत विकास देखने को नहीं मिलता है । इस चरण में सीमित सरकारी सहयोग तथा मूल रूप से व्यक्तिगत प्रयासों से कुछ शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना की गयी ।उदाहरण के लिए कलकत्ता मदरसा की स्थापना 1781 में वारेन हेस्टिंग्स द्वारा, 1884 में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल की स्थापना विलियम जोन्स द्वारा, तथा 1791 में जोनाथन डंकन द्वारा बनारस संस्कृत कॉलेज आदि की स्थापना की गयी । तथापि इन शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना का मूल उद्देशभारतीय भाषा एवं संस्कृति की समझ को बेहतर करना था, जिससे भारत पर प्रभावी ढंग से शासन किया जा सके । इस चरण में शिक्षा के विकास के लिए कंपनी के द्वारा कोई विशेष कोशिश नहीं की गयी तथा कंपनी सामाजिक जीवन में स्थानीय विरोध की संभावना को देखते हुए हस्तक्षेप से बचती थी ।साथ ही इस चरण में कंपनी का मुख्य लक्ष्य व्यापार संतुलन को अनुकूल बनाना था और इस दृष्टिकोण से शिक्षा में निवेश बहुत उपयोगी नहीं था । 2. उपनिवेशवाद का द्वितीय चरण ( 1813-1858 ) : इस चरण में शिक्षा के विकास के लिए कुछ महत्वपूर्ण पहल किए गए । 1813 के चार्टर में एक महत्वपूर्ण नीतिगत पहल की गयी और प्रतिवर्ष शिक्षा पर 1 लाख रुपये व्यय का प्रावधान किया गया । हालांकि इस राशि को भारतीय शिक्षा पद्धति पर खर्च किया जाए या फिर अँग्रेजी भाषा में पाश्चात्य शिक्षा पद्धति पर । इस बात को लेकर विवाद की स्थिति रही और इस कारण यह बेहद संक्षिप्त राशि भी लंबे समय तक शिक्षा पर खर्चा नहीं किया जा सका। 1823 शिक्षा के विकास के लिए जनरल कमिटी ऑफ पब्लिक इंस्ट्रक्सन की स्थापना की गयी । बैंटिग के काल में मैकाले को इसका अध्यक्ष बनाया गया । मैकाले ने अँग्रेजी शिक्षा का समर्थन किया और इस प्रकार पाश्चात्य शिक्षा व अँग्रेजी माध्यम को स्वीकृति मिली । इस काल में वुड्स डिस्पैच को हम शिक्षा के विकास की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण कदम मान सकते हैं । इसके माध्यम से सीमित स्तर पर ही सही परंतु उच्च शिक्षा में भी आधुनिक तत्वों को समाहित किया गया । स्कूली शिक्षा के संदर्भ में भी अधोगामी निस्यंदन नीति अपनाई गयी । इसके अंतर्गत कुछ लोगों को सरकार शिक्षा प्रदान करेगी और वे लोग समाज के अन्य लोगों को शिक्षा प्रदान करेंगे । हालांकि दूसरे चरण में शिक्षा के विकास के लिए कुछ नीतिगत पहल की गयी तथा कुछ शैक्षणिक संस्थाओं की भी स्थापना हुई ।आधुनिक विचारों का प्रसार प्रारम्भ हुआ लेकिन इन परिवर्तनों के पीछे औपनिवेशिक हित ही मुख्य प्रेरक शक्ति थी । 1813 में नीतिगत बदलाव के पीछे औद्योगिक क्रान्ति का दबाव कार्य कर रहा था , अर्थात अँग्रेजी जानने वाले एक ऐसे वर्ग की जरूरत जो भारत में अनुवादक तथा सस्ते क्लर्क का कार्य कर सके एवं ब्रिटिश वस्तुओं का प्रसार-प्रचार कर सके । शिक्षा के लिए जो प्रारम्भिक राशि निर्धारित की गयी , उससे भी शिक्षा के प्रति सरकारी प्रतिबद्धता के वास्तविक चरित्र को समझ सकते हैं और दुर्भाग्यवश यह राशि भी लंबे समय तक खर्च नहीं की गयी । 3. उपनिवेशवाद का तृतीय चरण ( 1858-1947 ) : इस काल में अंग्रेजों द्वारा शिक्षा के विकास के लिए सीमित प्रयास ही किए गए क्योंकि 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों की नीति रूढ़िवाद के विकास को बढ़ावा देने की रही थी । हालांकि इस काल में हंटर शिक्षा आयोग , सैडलर आयोग , हार्टोंग समिति जैसे कई महत्वपूर्ण समितियों का निर्माण शिक्षा के लिए किया गया तथापि सरकारी प्रयास वास्तविक रूप में सीमित ही रहे । इस काल में सरकारी शिक्षण संस्थाओं पर सरकारी नियंत्रण को भी काफी बढ़ाने का प्रयास किया गया क्योंकि ये आधुनिक शिक्षण संस्थान राष्ट्रीय चेतना के विकास के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हुए । इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत में अँग्रेजी शिक्षा नीति मूल रूप से औपनिवेशिक हितों के संवर्द्धन से ही प्रेरित व प्रभावित थी । अँग्रेजी शिक्षा नीति ने भारत में भेदभाव को भी गहरे स्तर पर जन्म दिया । अधोगामी निस्यंदन नीति ने भारत में शिक्षा को बेहद कम लोगों तक सीमित रखा और ब्रिटिश नीतियों के कारण स्वदेशी शिक्षा को भी नुकसान हुआ तथा शहरों एवं गांवों और अमीरों व गरीबों के बीच भेदभाव बढ़ता गया । ऐसी बात नहीं है कि अँग्रेजी शिक्षा से कोई लाभ नहीं हुआ । अँग्रेजी शिक्षा ने अप्रत्यक्ष ढंग से ही सही भारत के विभिन्न क्षेत्रों में शिक्षित लोगों का एक ऐसा वर्ग तैयार किया जो राष्ट्रवाद के विचारों से प्रेरित होकर स्वतंत्रता के लिए आगे आए ।
##Question:भारत में ब्रिटिश शिक्षा नीति के विकास का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये ( 150-200 शब्द; 10 अंक ) Critically examine the development of British education policy in India (150–200 words; 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण : अंग्रेजों द्वारा भारत में शिक्षा के विकास के उद्देशों की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति के क्रमिक चरणों के अनुरूप शिक्षा नीति के क्रमिक विकास की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । उन कारकों की चर्चा संक्षिप्त चर्चा कीजिये जिसने भारत में ब्रिटिश शिक्षा नीति के स्वरूप को दिशा देने का कार्य किया । भारत में ब्रिटिश शिक्षा नीति के प्रभावों की संक्षिप्त चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : भारत में ब्रिटिश नीति मूल रूप से औपनिवेशिक हितों से परिचालित होती थी । ब्रिटिश शिक्षा नीति को भी हमें इसी अनुरूप देखने की आवश्यकता है । भारत में अंग्रेजों ने शिक्षा के विकास को उसी रूप में आगे बढ़ाया जिस रूप में शिक्षा उनके औपनिवेशिक हितों की पूर्ति में सहायक थी । भारत में ब्रिटिश शिक्षा नीति को हम क्रमिक रूप में विकसित होते निम्न रूपों में देख व समझ सकते हैं : 1. उपनिवेशवाद का प्रथम चरण ( 1757-1813 ) : उपनिवेशवाद के प्रथम चरण में अंग्रेजों का लक्ष्य अधिकाधिक राजस्व एकत्रित कर व्यापार के क्षेत्र में निवेश करना था । इसलिए हमें इस चरण में शिक्षा के क्षेत्र में कोई स्पष्ट नीतिगत विकास देखने को नहीं मिलता है । इस चरण में सीमित सरकारी सहयोग तथा मूल रूप से व्यक्तिगत प्रयासों से कुछ शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना की गयी ।उदाहरण के लिए कलकत्ता मदरसा की स्थापना 1781 में वारेन हेस्टिंग्स द्वारा, 1884 में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल की स्थापना विलियम जोन्स द्वारा, तथा 1791 में जोनाथन डंकन द्वारा बनारस संस्कृत कॉलेज आदि की स्थापना की गयी । तथापि इन शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना का मूल उद्देशभारतीय भाषा एवं संस्कृति की समझ को बेहतर करना था, जिससे भारत पर प्रभावी ढंग से शासन किया जा सके । इस चरण में शिक्षा के विकास के लिए कंपनी के द्वारा कोई विशेष कोशिश नहीं की गयी तथा कंपनी सामाजिक जीवन में स्थानीय विरोध की संभावना को देखते हुए हस्तक्षेप से बचती थी ।साथ ही इस चरण में कंपनी का मुख्य लक्ष्य व्यापार संतुलन को अनुकूल बनाना था और इस दृष्टिकोण से शिक्षा में निवेश बहुत उपयोगी नहीं था । 2. उपनिवेशवाद का द्वितीय चरण ( 1813-1858 ) : इस चरण में शिक्षा के विकास के लिए कुछ महत्वपूर्ण पहल किए गए । 1813 के चार्टर में एक महत्वपूर्ण नीतिगत पहल की गयी और प्रतिवर्ष शिक्षा पर 1 लाख रुपये व्यय का प्रावधान किया गया । हालांकि इस राशि को भारतीय शिक्षा पद्धति पर खर्च किया जाए या फिर अँग्रेजी भाषा में पाश्चात्य शिक्षा पद्धति पर । इस बात को लेकर विवाद की स्थिति रही और इस कारण यह बेहद संक्षिप्त राशि भी लंबे समय तक शिक्षा पर खर्चा नहीं किया जा सका। 1823 शिक्षा के विकास के लिए जनरल कमिटी ऑफ पब्लिक इंस्ट्रक्सन की स्थापना की गयी । बैंटिग के काल में मैकाले को इसका अध्यक्ष बनाया गया । मैकाले ने अँग्रेजी शिक्षा का समर्थन किया और इस प्रकार पाश्चात्य शिक्षा व अँग्रेजी माध्यम को स्वीकृति मिली । इस काल में वुड्स डिस्पैच को हम शिक्षा के विकास की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण कदम मान सकते हैं । इसके माध्यम से सीमित स्तर पर ही सही परंतु उच्च शिक्षा में भी आधुनिक तत्वों को समाहित किया गया । स्कूली शिक्षा के संदर्भ में भी अधोगामी निस्यंदन नीति अपनाई गयी । इसके अंतर्गत कुछ लोगों को सरकार शिक्षा प्रदान करेगी और वे लोग समाज के अन्य लोगों को शिक्षा प्रदान करेंगे । हालांकि दूसरे चरण में शिक्षा के विकास के लिए कुछ नीतिगत पहल की गयी तथा कुछ शैक्षणिक संस्थाओं की भी स्थापना हुई ।आधुनिक विचारों का प्रसार प्रारम्भ हुआ लेकिन इन परिवर्तनों के पीछे औपनिवेशिक हित ही मुख्य प्रेरक शक्ति थी । 1813 में नीतिगत बदलाव के पीछे औद्योगिक क्रान्ति का दबाव कार्य कर रहा था , अर्थात अँग्रेजी जानने वाले एक ऐसे वर्ग की जरूरत जो भारत में अनुवादक तथा सस्ते क्लर्क का कार्य कर सके एवं ब्रिटिश वस्तुओं का प्रसार-प्रचार कर सके । शिक्षा के लिए जो प्रारम्भिक राशि निर्धारित की गयी , उससे भी शिक्षा के प्रति सरकारी प्रतिबद्धता के वास्तविक चरित्र को समझ सकते हैं और दुर्भाग्यवश यह राशि भी लंबे समय तक खर्च नहीं की गयी । 3. उपनिवेशवाद का तृतीय चरण ( 1858-1947 ) : इस काल में अंग्रेजों द्वारा शिक्षा के विकास के लिए सीमित प्रयास ही किए गए क्योंकि 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों की नीति रूढ़िवाद के विकास को बढ़ावा देने की रही थी । हालांकि इस काल में हंटर शिक्षा आयोग , सैडलर आयोग , हार्टोंग समिति जैसे कई महत्वपूर्ण समितियों का निर्माण शिक्षा के लिए किया गया तथापि सरकारी प्रयास वास्तविक रूप में सीमित ही रहे । इस काल में सरकारी शिक्षण संस्थाओं पर सरकारी नियंत्रण को भी काफी बढ़ाने का प्रयास किया गया क्योंकि ये आधुनिक शिक्षण संस्थान राष्ट्रीय चेतना के विकास के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हुए । इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत में अँग्रेजी शिक्षा नीति मूल रूप से औपनिवेशिक हितों के संवर्द्धन से ही प्रेरित व प्रभावित थी । अँग्रेजी शिक्षा नीति ने भारत में भेदभाव को भी गहरे स्तर पर जन्म दिया । अधोगामी निस्यंदन नीति ने भारत में शिक्षा को बेहद कम लोगों तक सीमित रखा और ब्रिटिश नीतियों के कारण स्वदेशी शिक्षा को भी नुकसान हुआ तथा शहरों एवं गांवों और अमीरों व गरीबों के बीच भेदभाव बढ़ता गया । ऐसी बात नहीं है कि अँग्रेजी शिक्षा से कोई लाभ नहीं हुआ । अँग्रेजी शिक्षा ने अप्रत्यक्ष ढंग से ही सही भारत के विभिन्न क्षेत्रों में शिक्षित लोगों का एक ऐसा वर्ग तैयार किया जो राष्ट्रवाद के विचारों से प्रेरित होकर स्वतंत्रता के लिए आगे आए ।
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भारत-बांग्लादेश सीमा की जटिल प्रकृति, सीमा प्रबंधन की आवश्यकता स्पष्ट करती है| इस सन्दर्भ में भारत-बांग्लादेश सीमा की जटिलता एवं सीमा प्रबंधन के सन्दर्भ में भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों का मूल्यांकन कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) The complex nature of the India-Bangladesh border illustrates the need for border management. In this context, evaluate the complexity of the Indo-Bangladesh border and the efforts made by the Government of India in the context of border management. (150 to 200 words, 10 marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत-बांग्लादेश सम्बन्धों एवं सीमा विवादों की सूचना दीजिये 2- प्रथम भाग में सीमाओं की जटिलता को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की जानकारी दीजिये 4- अंतिम में सुझावात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये बांग्लादेश की स्वतंत्रता के साथ ही उसको एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने वाला प्रथम देश भारत प्रथम राष्ट्र था| उसके बाद से ही भारत एवं बांग्ला देश के मध्य कूटनीतिक सम्बन्धों की स्थापना हुई| तब से ले कर भारत बांग्लादेश सम्बन्ध उतार-चढाव युक्त रहे हैं| भारत और बांग्लादेश, सहयोग के नए आयाम स्थापित करने में प्राप्त सफलता के बावजूद दोनों के मध्य विभिन्न कारणों से सीमा विवादों का सामना कर रहे हैं| भारत-बांग्लादेश समा विवाद का प्रमुख कारण सीमा की जटिल प्रकृति को माना जाता है जिसे निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है :- सीमा की जटिलता दोनों देशों के मध्य स्थलाकृतियों की जटिलता है अर्थात नदियों की उपस्थिति, अन्तस्थ क्षेत्रों आदि की उपस्थिति के कारण दोनों देशों के मध्य सीमा छिद्रिल(पोरस) प्रकृति की है दोनों देशों के मध्य सीमा रेखा की स्पष्टता का अभाव है जिसके परिणाम स्वरुप उन क्षेत्रों में लोगों को सरकार की सेवाओं का लाभ प्राप्त नहीं हो पाता है नदियों के जल क्षेत्र का निर्धारण न हो पाने से मत्स्ययन सम्बन्धी विवाद निरंतर रूप से बने रहते हैं दोनों देश एक दुसरे की भूमि पर कब्जे के आरोप लगाते रहते हैं सीमा क्षेत्र केदोनों ओर नागरिकों का प्रवास था दोनों देशों के मध्य 54 अंतर्राष्ट्रीय नदियाँ प्रवाहित होती हैं दोनों देशों में द्वीपनुमा क्षेत्रों (एन्क्लेव) की प्रचुरता पायी जाती है| अन्तस्थ क्षेत्रों में आवागमन के कारण नागरिकों की पहचान नहीं हो पाना एक अलग प्रकार का विवाद है हालांकि इसे सुलझा लिया गया है विषम भौगोलिक परिस्थितियां होने कारण मजबूत बाड़बंदी करना मुश्किल होता है सांस्कृतिक, नृजातीय समानता के कारण सीमावर्ती क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में अवैध अप्रवासन होता है ऐसी भौगोलिक स्थलाकृतियों के कारण अवैध अप्रवासन की समस्या विकराल हो गयी है औरभारत को अपनी सीमा की सुरक्षा एवं प्रबंधन में समस्याएं उत्पन हो रही हैं उपरोक्त जटिलताएं भारत बांग्लादेश सीमा विवादों को बढ़ाती हैं अतः बांग्लादेश सीमा पर बेहतर सीमा प्रबंधन की आवश्यकता है| इसी आवश्यकता को समझते हुए भारत सरकार ने कई कदम उठाये हैं| भारत सरकार द्वारा उठाये गए कदम भारत ने अगस्त 2011 से सीमांकन प्रक्रिया को तेजी प्रदान की है जनवरी 2013 में भारत और बांग्लादेश के मध्य प्रत्यर्पण संधि संपन्न की गयी भारत ऐसे जलीय क्षेत्रों में जहाँ सामान्य बाडबंदी करना संभव नहीं है वहां स्किनमरीन हेज मॉडल के आधार पर बाडबंदी कर रहा है सीमा प्रबंधन के लिए दोनों देशों ने संस्थागत ढाँचे का निर्माण एवं उनका विकास किया है जैसे सितम्बर 2011 में भारत बांग्लादेश संयुक्त सलाहकार आयोग, जुलाई 2011 में समन्वित सीमा प्रबंधन योजना और अगस्त 2014 में BSF एवं बांग्लादेश सेना(BGB) के बीच सहयोगात्मक संगठन का निर्माण किया गया है वर्ष 2015 में भारत और बांग्लादेश ने भूमि सीमा समझौते पर हस्ताक्षर किये जिसके माध्यम से लगभग 51 अन्तस्थ क्षेत्रों (एन्क्लेव) भारत में शामिल किये गए और 100 से अधिक एन्क्लेव बांग्लादेश में शामिल किये गए हैं| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत सरकार, बांग्लादेश सीमा के बेहतर प्रबंधन के लिए गंभीर है| इन प्रयासों के साथ ही साथ सीमा प्रबंधन के तकनीकी पहलुओं पर विशेष बल दिया जाना चाहिए ताकि दोनों देशों के मध्य सीमा विवाद को नियंत्रित करते हुए पारस्परिक सम्बन्धों को नयी दिशा दी जा सके और भारत की आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके|
##Question:भारत-बांग्लादेश सीमा की जटिल प्रकृति, सीमा प्रबंधन की आवश्यकता स्पष्ट करती है| इस सन्दर्भ में भारत-बांग्लादेश सीमा की जटिलता एवं सीमा प्रबंधन के सन्दर्भ में भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों का मूल्यांकन कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) The complex nature of the India-Bangladesh border illustrates the need for border management. In this context, evaluate the complexity of the Indo-Bangladesh border and the efforts made by the Government of India in the context of border management. (150 to 200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत-बांग्लादेश सम्बन्धों एवं सीमा विवादों की सूचना दीजिये 2- प्रथम भाग में सीमाओं की जटिलता को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की जानकारी दीजिये 4- अंतिम में सुझावात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये बांग्लादेश की स्वतंत्रता के साथ ही उसको एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने वाला प्रथम देश भारत प्रथम राष्ट्र था| उसके बाद से ही भारत एवं बांग्ला देश के मध्य कूटनीतिक सम्बन्धों की स्थापना हुई| तब से ले कर भारत बांग्लादेश सम्बन्ध उतार-चढाव युक्त रहे हैं| भारत और बांग्लादेश, सहयोग के नए आयाम स्थापित करने में प्राप्त सफलता के बावजूद दोनों के मध्य विभिन्न कारणों से सीमा विवादों का सामना कर रहे हैं| भारत-बांग्लादेश समा विवाद का प्रमुख कारण सीमा की जटिल प्रकृति को माना जाता है जिसे निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है :- सीमा की जटिलता दोनों देशों के मध्य स्थलाकृतियों की जटिलता है अर्थात नदियों की उपस्थिति, अन्तस्थ क्षेत्रों आदि की उपस्थिति के कारण दोनों देशों के मध्य सीमा छिद्रिल(पोरस) प्रकृति की है दोनों देशों के मध्य सीमा रेखा की स्पष्टता का अभाव है जिसके परिणाम स्वरुप उन क्षेत्रों में लोगों को सरकार की सेवाओं का लाभ प्राप्त नहीं हो पाता है नदियों के जल क्षेत्र का निर्धारण न हो पाने से मत्स्ययन सम्बन्धी विवाद निरंतर रूप से बने रहते हैं दोनों देश एक दुसरे की भूमि पर कब्जे के आरोप लगाते रहते हैं सीमा क्षेत्र केदोनों ओर नागरिकों का प्रवास था दोनों देशों के मध्य 54 अंतर्राष्ट्रीय नदियाँ प्रवाहित होती हैं दोनों देशों में द्वीपनुमा क्षेत्रों (एन्क्लेव) की प्रचुरता पायी जाती है| अन्तस्थ क्षेत्रों में आवागमन के कारण नागरिकों की पहचान नहीं हो पाना एक अलग प्रकार का विवाद है हालांकि इसे सुलझा लिया गया है विषम भौगोलिक परिस्थितियां होने कारण मजबूत बाड़बंदी करना मुश्किल होता है सांस्कृतिक, नृजातीय समानता के कारण सीमावर्ती क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में अवैध अप्रवासन होता है ऐसी भौगोलिक स्थलाकृतियों के कारण अवैध अप्रवासन की समस्या विकराल हो गयी है औरभारत को अपनी सीमा की सुरक्षा एवं प्रबंधन में समस्याएं उत्पन हो रही हैं उपरोक्त जटिलताएं भारत बांग्लादेश सीमा विवादों को बढ़ाती हैं अतः बांग्लादेश सीमा पर बेहतर सीमा प्रबंधन की आवश्यकता है| इसी आवश्यकता को समझते हुए भारत सरकार ने कई कदम उठाये हैं| भारत सरकार द्वारा उठाये गए कदम भारत ने अगस्त 2011 से सीमांकन प्रक्रिया को तेजी प्रदान की है जनवरी 2013 में भारत और बांग्लादेश के मध्य प्रत्यर्पण संधि संपन्न की गयी भारत ऐसे जलीय क्षेत्रों में जहाँ सामान्य बाडबंदी करना संभव नहीं है वहां स्किनमरीन हेज मॉडल के आधार पर बाडबंदी कर रहा है सीमा प्रबंधन के लिए दोनों देशों ने संस्थागत ढाँचे का निर्माण एवं उनका विकास किया है जैसे सितम्बर 2011 में भारत बांग्लादेश संयुक्त सलाहकार आयोग, जुलाई 2011 में समन्वित सीमा प्रबंधन योजना और अगस्त 2014 में BSF एवं बांग्लादेश सेना(BGB) के बीच सहयोगात्मक संगठन का निर्माण किया गया है वर्ष 2015 में भारत और बांग्लादेश ने भूमि सीमा समझौते पर हस्ताक्षर किये जिसके माध्यम से लगभग 51 अन्तस्थ क्षेत्रों (एन्क्लेव) भारत में शामिल किये गए और 100 से अधिक एन्क्लेव बांग्लादेश में शामिल किये गए हैं| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत सरकार, बांग्लादेश सीमा के बेहतर प्रबंधन के लिए गंभीर है| इन प्रयासों के साथ ही साथ सीमा प्रबंधन के तकनीकी पहलुओं पर विशेष बल दिया जाना चाहिए ताकि दोनों देशों के मध्य सीमा विवाद को नियंत्रित करते हुए पारस्परिक सम्बन्धों को नयी दिशा दी जा सके और भारत की आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके|
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Illustrate various stages of the process of star formation with suitable diagrams. (200 Words/10 Marks)
Approach: ब्रह्मांड में तारों की चर्चा कर उत्तर की शुरुवात कर सकते हैं। तारा निर्माण के विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए। वर्णन के क्रम में उचित डाइग्राम शामिल कीजिए। ब्रह्मांड में तारों के महत्व की चर्चा कर निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर- तारों का निर्माण मुख्य रूप से हाइड्रोजन और हीलियम गैस से हुआ है। आकाशगंगाओं में उपस्थित हाइड्रोजन और हीलियम गैसों के घने बादलों के रूप में एकत्रित होने के साथ इसके जीवन चक्र का आरंभ होता है। तारा निर्माण के विभिन्न चरण प्रोटो स्टार का निर्माण- प्रारम्भ में, आकाशगंगाओं में मुख्य रूप से हाइड्रोजन के साथ कुछ हीलियम गैस थी। हालांकि उनका तापमान बहुत कम (-173 डिग्री) था। चूंकि गैस बहुत ठंडी थी, निहारिका में धूल और गैस के कणों ने एक स्थान पर संघनित होकर सघन बादलों का निर्माण किया। इसके अतिरिक्त गैस से बने बादल अत्यधिक विशाल थे इसलिए विभिन्न गैस के अणुओं के मध्य गुरुत्वाकर्षण बल भी अत्यधिक था। अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण बल के कारण, नीहारिका में सिकुड़न प्रारम्भ हुई और अंत में नीहारिका में इतना संकुचन हुआ कि वे एक अत्यधिक सघन पिंड में बदल गयी जिसे प्रोटोस्टार कहा गया। प्रोटोस्टार से तारे का निर्माण– प्रोटोस्टार एक अत्यंत सघन गैसीय पिंड है, जिसमें अधिक गुरुत्वाकर्षण बल के कारण आगे संकुचन जारी रहता है और प्रोटोस्टार का संकुचन प्रारम्भ होता है। संकुचन की प्रक्रिया लाखों वर्षों तक जारी रहती है। हाइड्रोजन के नाभिकीय संलयन की अभिक्रिया आरंभ होती है। हाइड्रोजन से हीलियम बनने के दौरान उत्पन्न ऊर्जा प्रोटोस्टार को चमक प्रदान करती है और वह तारा बन जाता है। तारे के जीवन का अंतिम चरण- रेड जाइंट चरण समय बीतने के साथ हाइड्रोजन केंद्र से बाहर की ओर हीलियम में परिवर्तित होती है। जब तारे के क्रोड में उपस्थित सम्पूर्ण हाइड्रोजन का परिवर्तन हीलियम में हो जाता है तो तारे के क्रोड में संलयन अभिक्रिया बंद हो जाती है। जिससे तारे के केंद्र में केवल हीलियम शेष रेहता है। क्रोड अपने स्वयं के गुरुत्व के कारण संकुचित होने लगता है। इन परिवर्तनों के कारण सामान्य तौर पर तारों में संतुलन बिगड़ जाता है और इसे दोबारा संतुलित करने के लिए तारा अपने बाहरी क्षेत्र में फैलाव कर लेता है। इस प्रकार तारे का आकार बड़ा (विशालकाय) और इसका रंग लाल हो जाता है। इस स्तर पर तारा रेड जाइंट चरण में प्रवेश करता है। जब तारा रेड जाइण्ट चरण तक पहुँच जाता है तो इसका भविष्य इसके द्रव्यमान पर निर्भर करता है। इससे दो अवस्थाएँ उत्पन्न हो सकती हैं – यदि तारे का द्रव्यमान सूर्य के बराबर है तो रेड जाइण्ट तारे के बाहरी आवरण का विस्तार नहीं होता है और इसका केंद्र सिकुड़ने से एक व्हाइट ड्वार्फ स्टार (श्वेत वामन तारा) बंता है जो अंतत: अन्तरिक्ष में पदार्ध के सघन पिंड के रूप में नष्ट हो जाता है। यदि तारे का प्रारम्भिक द्रव्यमान सूर्य की तुलना में बहुत अधिक है, तो उससे बना रेड जाइण्ट स्टार, सुपरनोवा तारा के रूप में विस्फोट करता है और इस विस्फोटित सुपरनोवा तारे का क्रोड संकुचित होकर न्यूट्रॉन तारा या ब्लैक होल बना सकता है। श्वेत वामन तारे का निर्माण जब रेड जाइण्ट तारे का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के तुल्य होगा तो वह अपना प्रसारित बाह्य आवरण खो देगा, केवल उसका क्रोड बचा रहेगा। गुरुत्वाकर्षण के कारण संकुचन से इसके तापमान में वृद्धि होगी और नाभिकीय संलयन अभिक्रियाओं का एक दूसरा दौर प्रारम्भ हो जाएगा, जिसमें हीलियम भारी तत्वों जैसे कार्बन में परिवर्तित होगा और ऊर्जा की विशाल मात्रा निर्मुक्त होगी। अब ज्योंही तारे के भीतर उत्पन्न हो रही ऊर्जा बंद हो जाएगी तारे का क्रोड उसके अपने भार के कारण सिकुड़ने लगेगा और वह श्वेत वामन तारा बन जाएगा सुपरनोवा तारे और न्यूट्रॉन तारे का निर्माण- रेड जाइण्ट चरण में तारे के केंद्र में हीलियम अधिक होता है और यह केंद्र गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में संकुचित होकर ताप उत्सर्जित करता है। चूंकि तारा अत्यधिक विशाल और अत्यधिक मात्रा में परमाणु ईंधन हीलियम से युक्त होता है इसलिए कम समय में तीव्र परमाणु ऊर्जा उत्पन्न होती है जिससे रेड जाइण्ट तारे का बाहरी आवरण एक चमकीले टिमटिमाते हुए कण के साथ परमाणु बम की भांति विस्फोटित हुआ। इन विस्फोटों को सुपरनोवा कहा जाता है। सुपरनोवा विस्फोट के बाद उसका अति तप्त केंद्र सुरक्षित बच जाता है जिसमें लगातार संकुचन जारी रहता है और अंतत: यह न्यूट्रॉन तारे या ब्लैक होल में परिवर्तित हो जाता है। तारा निर्माण की प्रक्रिया के चरणबद्ध प्रक्रिया है। यह मुख्य रूप से इसके द्रव्यमान पर निर्भर करती है। ब्रह्मांड का एक बड़ा भाग तारों से निर्मित है जो अन्य खगोलीय पिंडों के लिए ऊर्जा के स्रोत होते हैं।
##Question:Illustrate various stages of the process of star formation with suitable diagrams. (200 Words/10 Marks)##Answer:Approach: ब्रह्मांड में तारों की चर्चा कर उत्तर की शुरुवात कर सकते हैं। तारा निर्माण के विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए। वर्णन के क्रम में उचित डाइग्राम शामिल कीजिए। ब्रह्मांड में तारों के महत्व की चर्चा कर निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर- तारों का निर्माण मुख्य रूप से हाइड्रोजन और हीलियम गैस से हुआ है। आकाशगंगाओं में उपस्थित हाइड्रोजन और हीलियम गैसों के घने बादलों के रूप में एकत्रित होने के साथ इसके जीवन चक्र का आरंभ होता है। तारा निर्माण के विभिन्न चरण प्रोटो स्टार का निर्माण- प्रारम्भ में, आकाशगंगाओं में मुख्य रूप से हाइड्रोजन के साथ कुछ हीलियम गैस थी। हालांकि उनका तापमान बहुत कम (-173 डिग्री) था। चूंकि गैस बहुत ठंडी थी, निहारिका में धूल और गैस के कणों ने एक स्थान पर संघनित होकर सघन बादलों का निर्माण किया। इसके अतिरिक्त गैस से बने बादल अत्यधिक विशाल थे इसलिए विभिन्न गैस के अणुओं के मध्य गुरुत्वाकर्षण बल भी अत्यधिक था। अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण बल के कारण, नीहारिका में सिकुड़न प्रारम्भ हुई और अंत में नीहारिका में इतना संकुचन हुआ कि वे एक अत्यधिक सघन पिंड में बदल गयी जिसे प्रोटोस्टार कहा गया। प्रोटोस्टार से तारे का निर्माण– प्रोटोस्टार एक अत्यंत सघन गैसीय पिंड है, जिसमें अधिक गुरुत्वाकर्षण बल के कारण आगे संकुचन जारी रहता है और प्रोटोस्टार का संकुचन प्रारम्भ होता है। संकुचन की प्रक्रिया लाखों वर्षों तक जारी रहती है। हाइड्रोजन के नाभिकीय संलयन की अभिक्रिया आरंभ होती है। हाइड्रोजन से हीलियम बनने के दौरान उत्पन्न ऊर्जा प्रोटोस्टार को चमक प्रदान करती है और वह तारा बन जाता है। तारे के जीवन का अंतिम चरण- रेड जाइंट चरण समय बीतने के साथ हाइड्रोजन केंद्र से बाहर की ओर हीलियम में परिवर्तित होती है। जब तारे के क्रोड में उपस्थित सम्पूर्ण हाइड्रोजन का परिवर्तन हीलियम में हो जाता है तो तारे के क्रोड में संलयन अभिक्रिया बंद हो जाती है। जिससे तारे के केंद्र में केवल हीलियम शेष रेहता है। क्रोड अपने स्वयं के गुरुत्व के कारण संकुचित होने लगता है। इन परिवर्तनों के कारण सामान्य तौर पर तारों में संतुलन बिगड़ जाता है और इसे दोबारा संतुलित करने के लिए तारा अपने बाहरी क्षेत्र में फैलाव कर लेता है। इस प्रकार तारे का आकार बड़ा (विशालकाय) और इसका रंग लाल हो जाता है। इस स्तर पर तारा रेड जाइंट चरण में प्रवेश करता है। जब तारा रेड जाइण्ट चरण तक पहुँच जाता है तो इसका भविष्य इसके द्रव्यमान पर निर्भर करता है। इससे दो अवस्थाएँ उत्पन्न हो सकती हैं – यदि तारे का द्रव्यमान सूर्य के बराबर है तो रेड जाइण्ट तारे के बाहरी आवरण का विस्तार नहीं होता है और इसका केंद्र सिकुड़ने से एक व्हाइट ड्वार्फ स्टार (श्वेत वामन तारा) बंता है जो अंतत: अन्तरिक्ष में पदार्ध के सघन पिंड के रूप में नष्ट हो जाता है। यदि तारे का प्रारम्भिक द्रव्यमान सूर्य की तुलना में बहुत अधिक है, तो उससे बना रेड जाइण्ट स्टार, सुपरनोवा तारा के रूप में विस्फोट करता है और इस विस्फोटित सुपरनोवा तारे का क्रोड संकुचित होकर न्यूट्रॉन तारा या ब्लैक होल बना सकता है। श्वेत वामन तारे का निर्माण जब रेड जाइण्ट तारे का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के तुल्य होगा तो वह अपना प्रसारित बाह्य आवरण खो देगा, केवल उसका क्रोड बचा रहेगा। गुरुत्वाकर्षण के कारण संकुचन से इसके तापमान में वृद्धि होगी और नाभिकीय संलयन अभिक्रियाओं का एक दूसरा दौर प्रारम्भ हो जाएगा, जिसमें हीलियम भारी तत्वों जैसे कार्बन में परिवर्तित होगा और ऊर्जा की विशाल मात्रा निर्मुक्त होगी। अब ज्योंही तारे के भीतर उत्पन्न हो रही ऊर्जा बंद हो जाएगी तारे का क्रोड उसके अपने भार के कारण सिकुड़ने लगेगा और वह श्वेत वामन तारा बन जाएगा सुपरनोवा तारे और न्यूट्रॉन तारे का निर्माण- रेड जाइण्ट चरण में तारे के केंद्र में हीलियम अधिक होता है और यह केंद्र गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में संकुचित होकर ताप उत्सर्जित करता है। चूंकि तारा अत्यधिक विशाल और अत्यधिक मात्रा में परमाणु ईंधन हीलियम से युक्त होता है इसलिए कम समय में तीव्र परमाणु ऊर्जा उत्पन्न होती है जिससे रेड जाइण्ट तारे का बाहरी आवरण एक चमकीले टिमटिमाते हुए कण के साथ परमाणु बम की भांति विस्फोटित हुआ। इन विस्फोटों को सुपरनोवा कहा जाता है। सुपरनोवा विस्फोट के बाद उसका अति तप्त केंद्र सुरक्षित बच जाता है जिसमें लगातार संकुचन जारी रहता है और अंतत: यह न्यूट्रॉन तारे या ब्लैक होल में परिवर्तित हो जाता है। तारा निर्माण की प्रक्रिया के चरणबद्ध प्रक्रिया है। यह मुख्य रूप से इसके द्रव्यमान पर निर्भर करती है। ब्रह्मांड का एक बड़ा भाग तारों से निर्मित है जो अन्य खगोलीय पिंडों के लिए ऊर्जा के स्रोत होते हैं।
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मांग की कीमत लोच से आप क्या समझते हैं?कृषि वस्तुओं की कीमत लोच और कृषक निर्धनता के विरोधभास का विश्लेषण कीजिये| (150 से 200 शब्द) What do you understand by price elasticity of demand? Analyze contradiction of the price elasticity of agricultural commodities and the agricultural poverty. (150 to 200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में मांग की कीमत लोच को परिभाषित करते हुए कुछ विशेषताएं बताएं 2- प्रथम भाग में कीमत लोच के निर्धारण को कुछ उदाहरणों से स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में कृषि वस्तुओं की कीमत लोच और किसानों की निर्धनता के विरोधाभास को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में सरकार की भूमिका को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये मांग की कीमत लोच किसी वस्तु के मूल्य में परिवर्तन होने से उसकी मांग की मात्रा में परिवर्तन को दर्शाता है| दूसरे शब्दों में यह मांग की मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन एवं उसके मूल्य में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन का अनुपात है|अधिक परिवर्तन लोचशीलता को जबकि कम परिवर्तन कम लोचशीलता को दर्शाता है| मूल्य कम होने पर मांग बढ़ जाने पर उस वस्तु को लोचदार मांग कहेंगे| यदि मूल्य की मात्रा के बराबर मांग में परिवर्तन होता है तो उसे इकाई लोच मांग कहते हैं| यदि मूल्य में थोड़ी भी कमी आये और मांग अनंत रूप से बढ़ जाए पूर्ण लोचदार मांग कहते हैं| जब मूल्य में परिवर्तन होने पर मांग में कोई परिवर्तन न आये तो उसे पूर्ण बलोचदार मांग कहते हैं उदाहरणार्थ नमक| कीमत लोच का निर्धारण आवश्यक वस्तुओं की मांग बेलोचदार होगी| विलासिता की वस्तुओं की मांग लोचदार होती है प्रतिस्थापित वस्तुएं /विकल्पों/ पूरकों की उपलब्धता पर मांग लोचदार होगी,जबकि अनुपलब्धता पर बेलोचदार होगी| बहुत निर्धन की मांग बेलोचदार होगी क्योंकि आवश्यक वस्तुओं की मांग बेलोचदार होती है बहुत धनी वर्ग की मांग बेलोचदार होगी क्योंकि मूल्य वृद्धि का प्रभाव नहीं पड़ता है| मध्य वर्ग की मांग लोचदार होती है कृषि वस्तुओं की कीमत लोच कृषि वस्तुओं(आवश्यक वस्तु) की मांग एवं पूर्ति दोनों बलोचदार होती है| फसल कटाई के बाद पूर्ति बढ़ जाती है जिससे मूल्य गिर जाता है क्योंकि कृषि वस्तुओं की मांग बेलोचदार होती है ऋण ब्याज, आवश्यक खर्चों के लिए धन की आवश्यकता और भंडारण के विकल्प न होने कारण किसान को अनिवार्य रूप से बेचना ही पड़ता है, इस कारण किसान की मोलभाव की क्षमता घट जाती है जिसके कारण दुकानदार खरीद मूल्य को कम कर देता है| अतः कृषि वस्तुओं की पूर्ति भी बेलोचदार होती है| कृषि वस्तुओं की कीमत लोच औरकिसानों की निर्धनता के विरोधाभास का विश्लेषण यदि किसी कारण से फसल नष्ट हो गयी हो तो किसानों की आय घट जायेगी किन्तु यदि पूरे क्षेत्र का कृषि उत्पादन बहुत अधिक हो जाता है आय बढ़ने की जगह किसानों की आय कम हो जाती है और हानि का सामना करना पड़ता है| क्योंकि कृषक वस्तुओं की पूर्ति बेलोचदार होती है| NSSO के अनुसार भारत में किसानों कि मासिक आय मात्र 1600 रुपये है| अर्थात किसानों में व्यापक निर्धनता पायी जाती है| कृषि वस्तुओं की कीमत लोच और किसानों की निर्धनता का विरोधाभास इस समस्या को और बढ़ा देता है उपरोक्त विरोधाभाष के कारण अगले वर्ष में किसान उस फसल की कृषि करने के लिए हतोत्साहित होता है| अतः उस फसल का उत्पादन कम होता है और उसका मूल्य बढ़ने लगता है जिसका दबाव उपभोक्ता पर पड़ता है| अतः इस स्थिति पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य का प्रयोग करती है| न्यूनतम समर्थन मूल्यों के माध्यम से सरकार मूल्य स्थिरता लाने का प्रयास करती है| ताकि किसानों के साथ साथ उपभोक्ताओं के हितों को संरक्षित किया जा सके|
##Question:मांग की कीमत लोच से आप क्या समझते हैं?कृषि वस्तुओं की कीमत लोच और कृषक निर्धनता के विरोधभास का विश्लेषण कीजिये| (150 से 200 शब्द) What do you understand by price elasticity of demand? Analyze contradiction of the price elasticity of agricultural commodities and the agricultural poverty. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में मांग की कीमत लोच को परिभाषित करते हुए कुछ विशेषताएं बताएं 2- प्रथम भाग में कीमत लोच के निर्धारण को कुछ उदाहरणों से स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में कृषि वस्तुओं की कीमत लोच और किसानों की निर्धनता के विरोधाभास को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में सरकार की भूमिका को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये मांग की कीमत लोच किसी वस्तु के मूल्य में परिवर्तन होने से उसकी मांग की मात्रा में परिवर्तन को दर्शाता है| दूसरे शब्दों में यह मांग की मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन एवं उसके मूल्य में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन का अनुपात है|अधिक परिवर्तन लोचशीलता को जबकि कम परिवर्तन कम लोचशीलता को दर्शाता है| मूल्य कम होने पर मांग बढ़ जाने पर उस वस्तु को लोचदार मांग कहेंगे| यदि मूल्य की मात्रा के बराबर मांग में परिवर्तन होता है तो उसे इकाई लोच मांग कहते हैं| यदि मूल्य में थोड़ी भी कमी आये और मांग अनंत रूप से बढ़ जाए पूर्ण लोचदार मांग कहते हैं| जब मूल्य में परिवर्तन होने पर मांग में कोई परिवर्तन न आये तो उसे पूर्ण बलोचदार मांग कहते हैं उदाहरणार्थ नमक| कीमत लोच का निर्धारण आवश्यक वस्तुओं की मांग बेलोचदार होगी| विलासिता की वस्तुओं की मांग लोचदार होती है प्रतिस्थापित वस्तुएं /विकल्पों/ पूरकों की उपलब्धता पर मांग लोचदार होगी,जबकि अनुपलब्धता पर बेलोचदार होगी| बहुत निर्धन की मांग बेलोचदार होगी क्योंकि आवश्यक वस्तुओं की मांग बेलोचदार होती है बहुत धनी वर्ग की मांग बेलोचदार होगी क्योंकि मूल्य वृद्धि का प्रभाव नहीं पड़ता है| मध्य वर्ग की मांग लोचदार होती है कृषि वस्तुओं की कीमत लोच कृषि वस्तुओं(आवश्यक वस्तु) की मांग एवं पूर्ति दोनों बलोचदार होती है| फसल कटाई के बाद पूर्ति बढ़ जाती है जिससे मूल्य गिर जाता है क्योंकि कृषि वस्तुओं की मांग बेलोचदार होती है ऋण ब्याज, आवश्यक खर्चों के लिए धन की आवश्यकता और भंडारण के विकल्प न होने कारण किसान को अनिवार्य रूप से बेचना ही पड़ता है, इस कारण किसान की मोलभाव की क्षमता घट जाती है जिसके कारण दुकानदार खरीद मूल्य को कम कर देता है| अतः कृषि वस्तुओं की पूर्ति भी बेलोचदार होती है| कृषि वस्तुओं की कीमत लोच औरकिसानों की निर्धनता के विरोधाभास का विश्लेषण यदि किसी कारण से फसल नष्ट हो गयी हो तो किसानों की आय घट जायेगी किन्तु यदि पूरे क्षेत्र का कृषि उत्पादन बहुत अधिक हो जाता है आय बढ़ने की जगह किसानों की आय कम हो जाती है और हानि का सामना करना पड़ता है| क्योंकि कृषक वस्तुओं की पूर्ति बेलोचदार होती है| NSSO के अनुसार भारत में किसानों कि मासिक आय मात्र 1600 रुपये है| अर्थात किसानों में व्यापक निर्धनता पायी जाती है| कृषि वस्तुओं की कीमत लोच और किसानों की निर्धनता का विरोधाभास इस समस्या को और बढ़ा देता है उपरोक्त विरोधाभाष के कारण अगले वर्ष में किसान उस फसल की कृषि करने के लिए हतोत्साहित होता है| अतः उस फसल का उत्पादन कम होता है और उसका मूल्य बढ़ने लगता है जिसका दबाव उपभोक्ता पर पड़ता है| अतः इस स्थिति पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य का प्रयोग करती है| न्यूनतम समर्थन मूल्यों के माध्यम से सरकार मूल्य स्थिरता लाने का प्रयास करती है| ताकि किसानों के साथ साथ उपभोक्ताओं के हितों को संरक्षित किया जा सके|
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1857 के विद्रोह के विभिन्न कारणों का संक्षिप्त विश्लेषण प्रस्तुत कीजिए । ( 150-200 शब्द /10 अंक) Give a brief analysis of the various causes of the Revolt of 1857. (150-200 words/10 Marks)
दृष्टिकोण : 1857 के विद्रोह का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । विद्रोह के प्रमुख कारणों की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । विद्रोह के घटनाक्रम की संक्षिप्त चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : 1857 का विद्रोह आधुनिक भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ है । यह ब्रिटिश औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध हुए विद्रोहों का चरमोत्कर्ष है । इसने जहां एकओर ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता की जड़ों को हिलाकर उनकी नीतियों में भी परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय आंदोलन के विकास यात्रा में भी यह एक युग की शुरुआत का द्योतक है । इसके प्रमुख कारणों को हम निम्नलिखित रूपों में देख सकते हैं - 1. आर्थिक कारण : ब्रिटिश आर्थिक नीतियों के कारण समाज के एक बड़े वर्ग में असंतोष जैसे -भूराजस्व नीति से किसानों में असंतोष , उद्योगों के पतन से कारीगरों में असंतोष । विस्तारवादी नीति से शासक वर्ग तथा राजदरबार पर निर्भर विभिन्न वर्गों की दयनीय दशा । 2. राजनीतिक कारण : अंग्रेजों की विस्तारवादी नीतियों के कारण भारतीय शासक वर्ग भयभीत तो था ही । डलहौजी की नीतियों ने भय को और बढ़ाया । जैसे- डॉक्ट्रिन ऑफ लेप्स ने नाममात्र के शासकों की प्रतिष्ठा पर भी प्रहार किया । डलहौजी ने एकतरफ बाजीराव द्वितीय के उत्तराधिकारी पेशवा नाना साहब को पेंशन देने से इंकार किया तो दूसरी तरफ यह घोषणा की कि बहादुरशाह के उत्तराधिकारी को लाल किले से बाहर रहना होगा ।कैनिंग ने यह कहा कि इनसे सम्राट कि उपाधि छीन ली जाएगी । भारतीय राज्यों में मुगलों एवं मराठों का एक सांकेतिक महत्व था और इस घोषणा से इनकी नाममात्र की प्रतिष्ठा को चोट पहुंची तथा भारतीय शासकों की बेचैनी बढ़ी । राजनीतिक असंतोष को चरम पर पहुंचाने में अवध विलय की महत्वपूर्ण भूमिका रही । इस विलय के कारण सेना , जमींदार तथा आमलोगों में भी व्यापक रोष था क्योंकि इससे इनकी प्रतिष्ठा और जीवन भी प्रभावित हुआ । उपरोक्त असंतोष की पृष्टभूमि में प्रथम अफगानिस्तान युद्ध में ब्रिटिश सैनिकों को नुकसान तथा 1855-56 में संथालों के द्वारा ब्रिटिश सेना का साहसपूर्ण विरोध ने असंतुष्ट लोगों को विरोध के लिए प्रेरित किया । 3. प्रशासनिक कारण : ब्रिटिश प्रशासनिक मशीनरी से आम लोगों में असंतोष तो था ही , जानबूझकर भारतीयों के साथ भेदभाव, कम वेतन , निम्न पदों पर नियुक्ति, अमानवीय व्यवहार जैसे गतिविधियों से लोगों में असंतोष था । 4. सामाजिक कारण : सरकार के द्वारा समाज सुधार के लिए उठाए गए कदम जैसे- विधवा विवाह से संबंधित कानून, आदि के कारण रूढ़िवादी भारतीयों के मन में यह धारणा मजबूत हुई कि सरकार जानबूझकर सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप कर रही है । 5. धार्मिक कारण : सरकार के द्वारा ईसाई मिशनरियों को समर्थन तथा मिशनरियों के द्वारा धर्मांतरण के प्रयासों से भी लोग चिंतित थे । सरकारी सहयोग से सेना , प्रशासन , शैक्षणिक संस्थाओं में धर्मांतरण का प्रयास से लोगों में गुस्सा । 1850 में एक कानून बना कि ईसाई धर्म अपनाने पर भी पैतृक संपत्ति में अधिकार बना रहेगा ( धार्मिक निर्योग्यता कानून ) । इससे लोगों में काफी असंतोष बढ़ा । 6. सैनिकों में असंतोष : विभिन्न कारणों से सेना में भी असंतोष था , जैसे- कम वेतन , अंग्रेजों के द्वारा अमानवीय व्यवहार, जाति तथा धर्मसूचक प्रतिकों पर प्रतिबंध इत्यादि । किसानों की दयनीय दशा तथा सैनिकों की स्थिति के बीच एक गहरा संबंध था क्योंकि सैनिक एक प्रकार से वर्दिधारी किसान थे । 1850 के दशक में कुछ क़ानूनों से इनके आर्थिक एवं धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची । जैसे-1854 में निःशुल्क डाक की सुविधा समाप्त कर दी गयी । 7. तात्कालिक कारण : इसी पृष्टभूमि में चर्बी वाले कारतूस के मुद्दे को लेकर सैनिकों ने विद्रोह किया और सैनिक विद्रोह के साथ ही 1857 के विद्रोह की शुरुआत हुई । विद्रोह की शुरुआत बैरकपुर के सैनिक छावनी से हुई तथापि इसे जल्द ही दबा दिया गया । आगे मेरठ से सैनिकों द्वारा वास्तविक रूप में विद्रोह को आगे बढ़ाया गया और यह 1858 के अंत तक छोटे बड़े स्तर पर विद्रोह जारी रहा परंतु अंग्रेजों द्वारा अंततः कठोरता पूर्वक इसका दमन किया गया ।
##Question:1857 के विद्रोह के विभिन्न कारणों का संक्षिप्त विश्लेषण प्रस्तुत कीजिए । ( 150-200 शब्द /10 अंक) Give a brief analysis of the various causes of the Revolt of 1857. (150-200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण : 1857 के विद्रोह का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । विद्रोह के प्रमुख कारणों की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । विद्रोह के घटनाक्रम की संक्षिप्त चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : 1857 का विद्रोह आधुनिक भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ है । यह ब्रिटिश औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध हुए विद्रोहों का चरमोत्कर्ष है । इसने जहां एकओर ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता की जड़ों को हिलाकर उनकी नीतियों में भी परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय आंदोलन के विकास यात्रा में भी यह एक युग की शुरुआत का द्योतक है । इसके प्रमुख कारणों को हम निम्नलिखित रूपों में देख सकते हैं - 1. आर्थिक कारण : ब्रिटिश आर्थिक नीतियों के कारण समाज के एक बड़े वर्ग में असंतोष जैसे -भूराजस्व नीति से किसानों में असंतोष , उद्योगों के पतन से कारीगरों में असंतोष । विस्तारवादी नीति से शासक वर्ग तथा राजदरबार पर निर्भर विभिन्न वर्गों की दयनीय दशा । 2. राजनीतिक कारण : अंग्रेजों की विस्तारवादी नीतियों के कारण भारतीय शासक वर्ग भयभीत तो था ही । डलहौजी की नीतियों ने भय को और बढ़ाया । जैसे- डॉक्ट्रिन ऑफ लेप्स ने नाममात्र के शासकों की प्रतिष्ठा पर भी प्रहार किया । डलहौजी ने एकतरफ बाजीराव द्वितीय के उत्तराधिकारी पेशवा नाना साहब को पेंशन देने से इंकार किया तो दूसरी तरफ यह घोषणा की कि बहादुरशाह के उत्तराधिकारी को लाल किले से बाहर रहना होगा ।कैनिंग ने यह कहा कि इनसे सम्राट कि उपाधि छीन ली जाएगी । भारतीय राज्यों में मुगलों एवं मराठों का एक सांकेतिक महत्व था और इस घोषणा से इनकी नाममात्र की प्रतिष्ठा को चोट पहुंची तथा भारतीय शासकों की बेचैनी बढ़ी । राजनीतिक असंतोष को चरम पर पहुंचाने में अवध विलय की महत्वपूर्ण भूमिका रही । इस विलय के कारण सेना , जमींदार तथा आमलोगों में भी व्यापक रोष था क्योंकि इससे इनकी प्रतिष्ठा और जीवन भी प्रभावित हुआ । उपरोक्त असंतोष की पृष्टभूमि में प्रथम अफगानिस्तान युद्ध में ब्रिटिश सैनिकों को नुकसान तथा 1855-56 में संथालों के द्वारा ब्रिटिश सेना का साहसपूर्ण विरोध ने असंतुष्ट लोगों को विरोध के लिए प्रेरित किया । 3. प्रशासनिक कारण : ब्रिटिश प्रशासनिक मशीनरी से आम लोगों में असंतोष तो था ही , जानबूझकर भारतीयों के साथ भेदभाव, कम वेतन , निम्न पदों पर नियुक्ति, अमानवीय व्यवहार जैसे गतिविधियों से लोगों में असंतोष था । 4. सामाजिक कारण : सरकार के द्वारा समाज सुधार के लिए उठाए गए कदम जैसे- विधवा विवाह से संबंधित कानून, आदि के कारण रूढ़िवादी भारतीयों के मन में यह धारणा मजबूत हुई कि सरकार जानबूझकर सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप कर रही है । 5. धार्मिक कारण : सरकार के द्वारा ईसाई मिशनरियों को समर्थन तथा मिशनरियों के द्वारा धर्मांतरण के प्रयासों से भी लोग चिंतित थे । सरकारी सहयोग से सेना , प्रशासन , शैक्षणिक संस्थाओं में धर्मांतरण का प्रयास से लोगों में गुस्सा । 1850 में एक कानून बना कि ईसाई धर्म अपनाने पर भी पैतृक संपत्ति में अधिकार बना रहेगा ( धार्मिक निर्योग्यता कानून ) । इससे लोगों में काफी असंतोष बढ़ा । 6. सैनिकों में असंतोष : विभिन्न कारणों से सेना में भी असंतोष था , जैसे- कम वेतन , अंग्रेजों के द्वारा अमानवीय व्यवहार, जाति तथा धर्मसूचक प्रतिकों पर प्रतिबंध इत्यादि । किसानों की दयनीय दशा तथा सैनिकों की स्थिति के बीच एक गहरा संबंध था क्योंकि सैनिक एक प्रकार से वर्दिधारी किसान थे । 1850 के दशक में कुछ क़ानूनों से इनके आर्थिक एवं धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची । जैसे-1854 में निःशुल्क डाक की सुविधा समाप्त कर दी गयी । 7. तात्कालिक कारण : इसी पृष्टभूमि में चर्बी वाले कारतूस के मुद्दे को लेकर सैनिकों ने विद्रोह किया और सैनिक विद्रोह के साथ ही 1857 के विद्रोह की शुरुआत हुई । विद्रोह की शुरुआत बैरकपुर के सैनिक छावनी से हुई तथापि इसे जल्द ही दबा दिया गया । आगे मेरठ से सैनिकों द्वारा वास्तविक रूप में विद्रोह को आगे बढ़ाया गया और यह 1858 के अंत तक छोटे बड़े स्तर पर विद्रोह जारी रहा परंतु अंग्रेजों द्वारा अंततः कठोरता पूर्वक इसका दमन किया गया ।
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Discuss the impact of state efforts on caste system in India.(200 words)
The Indian Government has enacted laws to remove untouchability and has also brought in many reforms to improve the quality of life for the weaker sections of society. Few among them are: Constitutionally guaranteed fundamental human rights Abolition of ‘ untouchability’ in 1950 Scheduled Caste and Scheduled Tribe (Prevention of Atrocities) Act, 1989 Provision of reservation in places like educational institutions, for employment opportunities etc. Establishing social welfare departments and national commissions for the welfare of scheduled castes and tribes These measures adopted by the government have brought some relief to the weaker sections of society. The urban areas have shown good amount of impact and some improvement. However, people in rural areas and villages still face extreme discrimination. We indeed have a long way to go in achieving the objectives set to eradicate and abolish discrimination, on the basis of caste and creed. It now depends on our efforts and a change in our mindset is sure to see a perpetual change, bringing about equality for all.
##Question:Discuss the impact of state efforts on caste system in India.(200 words)##Answer:The Indian Government has enacted laws to remove untouchability and has also brought in many reforms to improve the quality of life for the weaker sections of society. Few among them are: Constitutionally guaranteed fundamental human rights Abolition of ‘ untouchability’ in 1950 Scheduled Caste and Scheduled Tribe (Prevention of Atrocities) Act, 1989 Provision of reservation in places like educational institutions, for employment opportunities etc. Establishing social welfare departments and national commissions for the welfare of scheduled castes and tribes These measures adopted by the government have brought some relief to the weaker sections of society. The urban areas have shown good amount of impact and some improvement. However, people in rural areas and villages still face extreme discrimination. We indeed have a long way to go in achieving the objectives set to eradicate and abolish discrimination, on the basis of caste and creed. It now depends on our efforts and a change in our mindset is sure to see a perpetual change, bringing about equality for all.
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Discuss the impact of state efforts on caste system in India.(200 words)
Approach : Introduction: Briefly introduce the concept of the caste system in Indian society. Body: Giving the state efforts to eliminate the caste system, briefly discuss the impacts of those efforts on the caste system. Conclusion: Give a balanced conclusion with some way forward. Model Answer: The caste system, which is unique to Indian society, is a social system where the hereditary occupational division was sanctioned by rituals. Members of the same caste group were supposed to form a social community that practiced the same or similar occupation, married within the caste group and did not eat with members from other caste groups. The Indian Government has enacted laws to eradicate the caste system and also to remove untouchability through the following efforts: Constitutionally guaranteed fundamental human rights; Abolition of ‘ untouchability’ in 1950; Scheduled Caste and Scheduled Tribe (Prevention of Atrocities) Act, 1989; Affirmative policies with respect to education and employment. Setting up of social welfare departments and national commissions for the welfare of scheduled castes and tribes etc. Impact of state efforts on the caste system: Positive impacts: Untouchability is not exhibited publicly and declined to a large extent, especially in urban areas. Affirmative actions have helped the lower castes to access to the higher education and employment of opportunities previously prohibited by the caste system. Education and employment, in turn, helped to promote inter-dining and inter-caste marriages to a certain extent. However, Untouchability has not ended completely, despite constitutional prohibition.to reverse the injustices of the caste system. Caste has not disappeared from contemporary India. Some of the older aspects of caste have persisted. Even now most people marry within their own caste or tribe.in fact, the Caste systemhas been assuming new identities and associational forms in the following ways: The emergence of Caste associations like Kayastha Samaj, Kshatriya Sabha, Teli association, Vaishya Mahasabha, Jat Sabha, Kurmi Mahasabha, Koeri Mahasabha, Bhumihar-Brahmin Mahasabha. The emergence of lower caste-based political parties such as B.S.P., I.P.F. S.P., D.M.K., etc. . The politicization of castes is so much that in order to be politically powerful distinct caste groups come together and act collectively. The matrimonial advertisements in the newspapers. News stories of caste-based discrimination and prohibition and also from the presence of manual scavenging and honor killings. The idea of the caste system has been so deeply ingrained in the Indian mind that, contrary to popular belief it still exists in many parts of India in different forms which need be addressed by the attitudinal changes as well as legislative actions and their enforcement.
##Question:Discuss the impact of state efforts on caste system in India.(200 words)##Answer:Approach : Introduction: Briefly introduce the concept of the caste system in Indian society. Body: Giving the state efforts to eliminate the caste system, briefly discuss the impacts of those efforts on the caste system. Conclusion: Give a balanced conclusion with some way forward. Model Answer: The caste system, which is unique to Indian society, is a social system where the hereditary occupational division was sanctioned by rituals. Members of the same caste group were supposed to form a social community that practiced the same or similar occupation, married within the caste group and did not eat with members from other caste groups. The Indian Government has enacted laws to eradicate the caste system and also to remove untouchability through the following efforts: Constitutionally guaranteed fundamental human rights; Abolition of ‘ untouchability’ in 1950; Scheduled Caste and Scheduled Tribe (Prevention of Atrocities) Act, 1989; Affirmative policies with respect to education and employment. Setting up of social welfare departments and national commissions for the welfare of scheduled castes and tribes etc. Impact of state efforts on the caste system: Positive impacts: Untouchability is not exhibited publicly and declined to a large extent, especially in urban areas. Affirmative actions have helped the lower castes to access to the higher education and employment of opportunities previously prohibited by the caste system. Education and employment, in turn, helped to promote inter-dining and inter-caste marriages to a certain extent. However, Untouchability has not ended completely, despite constitutional prohibition.to reverse the injustices of the caste system. Caste has not disappeared from contemporary India. Some of the older aspects of caste have persisted. Even now most people marry within their own caste or tribe.in fact, the Caste systemhas been assuming new identities and associational forms in the following ways: The emergence of Caste associations like Kayastha Samaj, Kshatriya Sabha, Teli association, Vaishya Mahasabha, Jat Sabha, Kurmi Mahasabha, Koeri Mahasabha, Bhumihar-Brahmin Mahasabha. The emergence of lower caste-based political parties such as B.S.P., I.P.F. S.P., D.M.K., etc. . The politicization of castes is so much that in order to be politically powerful distinct caste groups come together and act collectively. The matrimonial advertisements in the newspapers. News stories of caste-based discrimination and prohibition and also from the presence of manual scavenging and honor killings. The idea of the caste system has been so deeply ingrained in the Indian mind that, contrary to popular belief it still exists in many parts of India in different forms which need be addressed by the attitudinal changes as well as legislative actions and their enforcement.
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मांग की (कीमत) लोच से आप क्या समझते हैं? इसके निर्धारक तत्वों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by the (price) elasticity of demand? Discuss its determinant elements. (150-200 words/ 10 marks)
Approach: भूमिका में मांग की लोच को परिभाषित करने का प्रयास कर सकते हैं। मांग की लोच की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। इसके निर्धारक तत्वों की चर्चा कीजिए। मांग की लोच के आधार पर कृषि वस्तुओं के मूल्य में स्थिरता को स्पष्ट कीजिए। निष्कर्ष में मांग की लोच से कृषि की असंगति को दूर करने के उपायों की संक्षिप्त चर्चा कर सकते हैं। उत्तर- मांग की (कीमत) लोच (Price elasticity of demand)अर्थव्यवस्था की वह अवधारणा है जोकिसी वस्तु के मूल्य में परिवर्तन होने से उसकी मांग की मात्रा में होने वाले परिवर्तन को दर्शाता है। इसे मांग में परिवर्तन तथा मूल्य में परिवर्तन के अनुपात से परिवर्तन से प्रदर्शित किया जाता है। यदि मांग की लोच 1 से ज्यादा हो तो मांग में परिवर्तन मूल्य में परिवर्तन से अधिक होता है।इसे लोचदार मांग कहा जाता है। यदि मांग की लोच 1 से कम हो तो मांग में परिवर्तन मूल्य में परिवर्तन से कम होता है।इसे बेलोचदार मांग कहा जाता है। यदि मांग की लोच 1 हो तो इसे इकाई लोच कहते हैं। मांग की लोच अनंत होने पर इसे पूर्ण लोचदार (perfectly Elastic)कहा जाता है। मांग की लोच शून्य होने पर इसे पूर्ण बेलोचदार मांग कहा जाता है। मांग की लोच के निर्धारक तत्व मांग की लोच कई तत्वों पर निर्भर होती है जिसमें सबसे प्रमुख वस्तुओं का प्रकार है। विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के लिए मांग की लोच अलग अलग होती है। यदि वस्तुओं की प्रकृति आवश्यक वस्तु के रूप में होती है तो मांग की लोच बेलोचदार होती है क्योंकि कीमत परिवर्तन का असर ऐसी वस्तुओं पर नहीं पड़ता है। यदि वस्तुओं की प्रकृति विलासिता वस्तु के रूप में हो तो मांग की लोच लोचदार होती है क्योंकि कीमत बढ्ने पर ऐसी वस्तुओं के उपभोग में कमी आती है। प्रतिस्थापित वस्तु की उपलब्धता होने पर मांग की लोच लोचदार होती है क्योंकि वैकल्पिक वस्तुओं के उपभोग में वृद्धि होती है। प्रतिस्थापित वस्तु की उपलब्धता न होने पर मांग की लोच बेलोचदार होती है। कृषि वस्तुओं के मूल्यों में अस्थिरता कृषि वस्तुओं में मांग बेलोचदार होती है क्योंकि अधिकांश कृषि वस्तुएँ आवश्यक वस्तुओं के रूप में होती है जिन पर कीमत परिवर्तन का प्रभाव कम होता है। कृषि वस्तुओं की पूर्ति भी बेलोचदार होती है क्योंकि बदलती मांग कोपूरित करने के लिए भंडारण की क्षमताएं भी कम होती है। ऐसी स्थिति में कृषि मूल्य में अस्थिरता बनी रहती है। यह स्थिति किसान की निर्धनता के विरोधाभास को जन्म देती है। क्योंकि कृषि उत्पादन में कमी होने पर किसान को उपज के रूप में हानि होती है। साथ ही कृषि उत्पादन में बहुत अधिक वृद्धि होने पर भी हानि क्योंकि बाज़ार में मूल्य में कमी होती है। औसत उत्पादन होने पर भी उचित कीमत के ना मिलने पर आय असंगतता बनी रहती है। कृषि मूल्यों में अस्थिरता को MSP सुधार, बाज़ार सुधार, भंडारण क्षमताओं के विकास, फॉरवर्ड बैकवर्ड जुड़ाव से कम किया जा सकता है।
##Question:मांग की (कीमत) लोच से आप क्या समझते हैं? इसके निर्धारक तत्वों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by the (price) elasticity of demand? Discuss its determinant elements. (150-200 words/ 10 marks)##Answer:Approach: भूमिका में मांग की लोच को परिभाषित करने का प्रयास कर सकते हैं। मांग की लोच की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। इसके निर्धारक तत्वों की चर्चा कीजिए। मांग की लोच के आधार पर कृषि वस्तुओं के मूल्य में स्थिरता को स्पष्ट कीजिए। निष्कर्ष में मांग की लोच से कृषि की असंगति को दूर करने के उपायों की संक्षिप्त चर्चा कर सकते हैं। उत्तर- मांग की (कीमत) लोच (Price elasticity of demand)अर्थव्यवस्था की वह अवधारणा है जोकिसी वस्तु के मूल्य में परिवर्तन होने से उसकी मांग की मात्रा में होने वाले परिवर्तन को दर्शाता है। इसे मांग में परिवर्तन तथा मूल्य में परिवर्तन के अनुपात से परिवर्तन से प्रदर्शित किया जाता है। यदि मांग की लोच 1 से ज्यादा हो तो मांग में परिवर्तन मूल्य में परिवर्तन से अधिक होता है।इसे लोचदार मांग कहा जाता है। यदि मांग की लोच 1 से कम हो तो मांग में परिवर्तन मूल्य में परिवर्तन से कम होता है।इसे बेलोचदार मांग कहा जाता है। यदि मांग की लोच 1 हो तो इसे इकाई लोच कहते हैं। मांग की लोच अनंत होने पर इसे पूर्ण लोचदार (perfectly Elastic)कहा जाता है। मांग की लोच शून्य होने पर इसे पूर्ण बेलोचदार मांग कहा जाता है। मांग की लोच के निर्धारक तत्व मांग की लोच कई तत्वों पर निर्भर होती है जिसमें सबसे प्रमुख वस्तुओं का प्रकार है। विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के लिए मांग की लोच अलग अलग होती है। यदि वस्तुओं की प्रकृति आवश्यक वस्तु के रूप में होती है तो मांग की लोच बेलोचदार होती है क्योंकि कीमत परिवर्तन का असर ऐसी वस्तुओं पर नहीं पड़ता है। यदि वस्तुओं की प्रकृति विलासिता वस्तु के रूप में हो तो मांग की लोच लोचदार होती है क्योंकि कीमत बढ्ने पर ऐसी वस्तुओं के उपभोग में कमी आती है। प्रतिस्थापित वस्तु की उपलब्धता होने पर मांग की लोच लोचदार होती है क्योंकि वैकल्पिक वस्तुओं के उपभोग में वृद्धि होती है। प्रतिस्थापित वस्तु की उपलब्धता न होने पर मांग की लोच बेलोचदार होती है। कृषि वस्तुओं के मूल्यों में अस्थिरता कृषि वस्तुओं में मांग बेलोचदार होती है क्योंकि अधिकांश कृषि वस्तुएँ आवश्यक वस्तुओं के रूप में होती है जिन पर कीमत परिवर्तन का प्रभाव कम होता है। कृषि वस्तुओं की पूर्ति भी बेलोचदार होती है क्योंकि बदलती मांग कोपूरित करने के लिए भंडारण की क्षमताएं भी कम होती है। ऐसी स्थिति में कृषि मूल्य में अस्थिरता बनी रहती है। यह स्थिति किसान की निर्धनता के विरोधाभास को जन्म देती है। क्योंकि कृषि उत्पादन में कमी होने पर किसान को उपज के रूप में हानि होती है। साथ ही कृषि उत्पादन में बहुत अधिक वृद्धि होने पर भी हानि क्योंकि बाज़ार में मूल्य में कमी होती है। औसत उत्पादन होने पर भी उचित कीमत के ना मिलने पर आय असंगतता बनी रहती है। कृषि मूल्यों में अस्थिरता को MSP सुधार, बाज़ार सुधार, भंडारण क्षमताओं के विकास, फॉरवर्ड बैकवर्ड जुड़ाव से कम किया जा सकता है।
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भारत-अमेरिका के मध्य सुरक्षा एवं सामरिकक्षेत्रोंमेंसहयोग निरंतर बढ़ रहा है| भारत-अमेरिका के मध्य हुए सहयोग समझौतों के परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट कीजिये|(150-200 शब्द, 10 अंक) Cooperation in security and strategic areas between India and America is continuously increasing. Explain in the context of cooperation agreements between India and America (150-200 Words, 10 Marks).
दृष्टिकोण 1. भूमिका में भारत अमेरिका सम्बन्धों की प्रवृत्ति को स्पष्ट कीजिये 2. मुख्य भाग में भारत-अमेरिका सुरक्षात्मक एवं सामरिक सहयोग की पहलों को स्पष्ट कीजिये 3. अंतिम में दोनों के सम्बन्धों की चुनौतियों और उनके समाधान प्रस्तुत करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये उत्तर- भारत की स्वतंत्रता के बाद से लेकर 1990 के दशक तक भारत-अमेरिका सम्बन्ध उतार चढ़ाव भरे रहे हैं| कश्मीर का मुद्दा, बग़दाद पैक्ट, गुटनिरपेक्ष आन्दोलन, बांग्लादेश की स्वतंत्रता आदि कारकों ने भारत अमेरिका सम्बन्धों को मजबूत नहीं होने दिया था| भारत द्वारा 1990 में LPG मॉडल अपनाने, USSR के विघटन, तालिबान के उदय आदि कारकों ने भारत अमेरिका के मध्य सम्बन्धों को मजबूत किया है| इसके बाद से भारत और अमेरिका के मध्य सुरक्षा एवं सामरिक सहयोग बढ़ता गया है| सामरिक सहयोग: भारत अमेरिका रक्षा सहयोग के तीन आयाम हैं यथा LEMOA, CISMOA एवं BECA. पिवोट ऑफ़ एशिया पालिसी (यह वस्तुतः एशिया पेसिफिक नीति है ) इसी नीति को ट्रम्प ने 2016 में इंडो-पेसिफिक की नीति के रूप में संबोधित किया है| इस नीति के माध्यम से अमेरिका भारत के सहयोग से अपने हितों की सुरक्षा करने का प्रयास कर रहा है| इसके अतिरिक्त मालाबार अभ्यास, क्वाड के माध्यम से सामरिक सहयोग बना हुआ है| US के सहयोग से भारत MTCR, ऑस्ट्रेलिया ग्रुप एवं वासेनार का सदस्य बन गया है, इन समूहों का सदस्य चीन नही है|NSG में भारत की सदस्यता के सन्दर्भ में चीन के साथ सौदेबाजी में सहायक होगा| डिफेन्स टेक्नोलॉजी एवं ट्रेड इनिशिएटिव भारत अमेरिका के मध्य वर्ष 2012 में डिफेन्स टेक्नोलॉजी एवं ट्रेड इनिशिएटिव आरम्भ किया गया है| इस पहल के अंतर्गत दोनों देशों द्वारा संयुक्त रूप से रक्षा उत्पादन किया जाएगा | LEMOA के माध्यम से दोनों देश एक दूसरे के नौसैनिक अड्डों का पारपरिक उपयोग कर सकेंगे, यह ब्लू अर्थव्यवस्था बनने में सहायक होगा, LEMOA का यह अर्थ नहीं है कि भारत US की युद्ध नीति का विरोध नहीं कर सकता है| दोनों देशों के मध्य CISMOA संचार-सूचना सुरक्षा सहमति समझौता हुआ है यह नौवहन आदि में भारत के लिए सहायक होगा| BECA अभी तक हस्ताक्षरित नहीं हुआ है, इस के माध्यम से भारत को यह बताना पडेगा कि US द्वारा दी गयी आधुनिक तकनीकों को भारत ने कहाँ कहाँ प्रयुक्त किया है| डिफेन्स ऑथराईजेशन एक्ट अभी हाल ही में US की सीनेट नेडिफेन्स ऑथराईजेशन एक्ट कानून पारित किया है और यह प्रावधान किया है कि भारत को सुरक्षा के सन्दर्भ में इजराइल एवं अन्य नाटो देशों के जैसा दर्जा दिया जाए| अर्थातUS, भारत को उसी तरह सहयोग करेगा जैसा वह नाटो देशों के साथ करता है| इस स्टेटस से भारत को रक्षा क्षेत्र में शोध एवं विकास,बेहतर समुद्री सुरक्षा, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में सहयोग मिलेगा| भारत के समक्ष युद्द जैसी स्थिति में अमेरिका से मदद प्राप्त होगी| यह अधिनियम भारत को युरेनियम एंटी टैंक राउंड्स को खरीदने के लिए भारत को सक्षम बनाता है| इस एक्ट के माध्यम से दोनों के सहयोग के संदर्भ में कोई अस्पष्टता नहीं आएगी| यह अधिनियम भारत को पाकिस्तान पर बढ़त प्रदान करता है| यह एक्ट भारत के बढ़ते वैश्विक कद का सूचक है| यह अधिनियम भारत पर किसी भी प्रकार की प्रतिबद्धताएं नहीं हैं अर्थात भारत को किसी भी प्रकार का वित्तपोषण आदि नहीं करना पडेगा| यह अधिनियम भारत को सामरिक रूप से स्वायत्त रखते हुए भारत को नाटो लाइक स्टेटस दर्जा प्रदान करता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि विगत दो दशकों में भारत एवं अमेरिका के मध्य सुरक्षा एवं सामरिक मामलों में सहयोग बढ़ता गया है किन्तु इसके साथ ही दोनों के मध्य पेटेंट विवाद, H1B वीजा विवाद, जलवायु के मुद्दे पर विरोधी मत, CAATSA JCPOA जैसे मुद्दे बने हुए हैं| दोनों को एक दूसरे के हितों को ध्यान में रखते हुए इन मुद्दों को शीघ्रातिशीघ्र समाधानित करने का प्रयास करना चाहिए|
##Question:भारत-अमेरिका के मध्य सुरक्षा एवं सामरिकक्षेत्रोंमेंसहयोग निरंतर बढ़ रहा है| भारत-अमेरिका के मध्य हुए सहयोग समझौतों के परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट कीजिये|(150-200 शब्द, 10 अंक) Cooperation in security and strategic areas between India and America is continuously increasing. Explain in the context of cooperation agreements between India and America (150-200 Words, 10 Marks).##Answer:दृष्टिकोण 1. भूमिका में भारत अमेरिका सम्बन्धों की प्रवृत्ति को स्पष्ट कीजिये 2. मुख्य भाग में भारत-अमेरिका सुरक्षात्मक एवं सामरिक सहयोग की पहलों को स्पष्ट कीजिये 3. अंतिम में दोनों के सम्बन्धों की चुनौतियों और उनके समाधान प्रस्तुत करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये उत्तर- भारत की स्वतंत्रता के बाद से लेकर 1990 के दशक तक भारत-अमेरिका सम्बन्ध उतार चढ़ाव भरे रहे हैं| कश्मीर का मुद्दा, बग़दाद पैक्ट, गुटनिरपेक्ष आन्दोलन, बांग्लादेश की स्वतंत्रता आदि कारकों ने भारत अमेरिका सम्बन्धों को मजबूत नहीं होने दिया था| भारत द्वारा 1990 में LPG मॉडल अपनाने, USSR के विघटन, तालिबान के उदय आदि कारकों ने भारत अमेरिका के मध्य सम्बन्धों को मजबूत किया है| इसके बाद से भारत और अमेरिका के मध्य सुरक्षा एवं सामरिक सहयोग बढ़ता गया है| सामरिक सहयोग: भारत अमेरिका रक्षा सहयोग के तीन आयाम हैं यथा LEMOA, CISMOA एवं BECA. पिवोट ऑफ़ एशिया पालिसी (यह वस्तुतः एशिया पेसिफिक नीति है ) इसी नीति को ट्रम्प ने 2016 में इंडो-पेसिफिक की नीति के रूप में संबोधित किया है| इस नीति के माध्यम से अमेरिका भारत के सहयोग से अपने हितों की सुरक्षा करने का प्रयास कर रहा है| इसके अतिरिक्त मालाबार अभ्यास, क्वाड के माध्यम से सामरिक सहयोग बना हुआ है| US के सहयोग से भारत MTCR, ऑस्ट्रेलिया ग्रुप एवं वासेनार का सदस्य बन गया है, इन समूहों का सदस्य चीन नही है|NSG में भारत की सदस्यता के सन्दर्भ में चीन के साथ सौदेबाजी में सहायक होगा| डिफेन्स टेक्नोलॉजी एवं ट्रेड इनिशिएटिव भारत अमेरिका के मध्य वर्ष 2012 में डिफेन्स टेक्नोलॉजी एवं ट्रेड इनिशिएटिव आरम्भ किया गया है| इस पहल के अंतर्गत दोनों देशों द्वारा संयुक्त रूप से रक्षा उत्पादन किया जाएगा | LEMOA के माध्यम से दोनों देश एक दूसरे के नौसैनिक अड्डों का पारपरिक उपयोग कर सकेंगे, यह ब्लू अर्थव्यवस्था बनने में सहायक होगा, LEMOA का यह अर्थ नहीं है कि भारत US की युद्ध नीति का विरोध नहीं कर सकता है| दोनों देशों के मध्य CISMOA संचार-सूचना सुरक्षा सहमति समझौता हुआ है यह नौवहन आदि में भारत के लिए सहायक होगा| BECA अभी तक हस्ताक्षरित नहीं हुआ है, इस के माध्यम से भारत को यह बताना पडेगा कि US द्वारा दी गयी आधुनिक तकनीकों को भारत ने कहाँ कहाँ प्रयुक्त किया है| डिफेन्स ऑथराईजेशन एक्ट अभी हाल ही में US की सीनेट नेडिफेन्स ऑथराईजेशन एक्ट कानून पारित किया है और यह प्रावधान किया है कि भारत को सुरक्षा के सन्दर्भ में इजराइल एवं अन्य नाटो देशों के जैसा दर्जा दिया जाए| अर्थातUS, भारत को उसी तरह सहयोग करेगा जैसा वह नाटो देशों के साथ करता है| इस स्टेटस से भारत को रक्षा क्षेत्र में शोध एवं विकास,बेहतर समुद्री सुरक्षा, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में सहयोग मिलेगा| भारत के समक्ष युद्द जैसी स्थिति में अमेरिका से मदद प्राप्त होगी| यह अधिनियम भारत को युरेनियम एंटी टैंक राउंड्स को खरीदने के लिए भारत को सक्षम बनाता है| इस एक्ट के माध्यम से दोनों के सहयोग के संदर्भ में कोई अस्पष्टता नहीं आएगी| यह अधिनियम भारत को पाकिस्तान पर बढ़त प्रदान करता है| यह एक्ट भारत के बढ़ते वैश्विक कद का सूचक है| यह अधिनियम भारत पर किसी भी प्रकार की प्रतिबद्धताएं नहीं हैं अर्थात भारत को किसी भी प्रकार का वित्तपोषण आदि नहीं करना पडेगा| यह अधिनियम भारत को सामरिक रूप से स्वायत्त रखते हुए भारत को नाटो लाइक स्टेटस दर्जा प्रदान करता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि विगत दो दशकों में भारत एवं अमेरिका के मध्य सुरक्षा एवं सामरिक मामलों में सहयोग बढ़ता गया है किन्तु इसके साथ ही दोनों के मध्य पेटेंट विवाद, H1B वीजा विवाद, जलवायु के मुद्दे पर विरोधी मत, CAATSA JCPOA जैसे मुद्दे बने हुए हैं| दोनों को एक दूसरे के हितों को ध्यान में रखते हुए इन मुद्दों को शीघ्रातिशीघ्र समाधानित करने का प्रयास करना चाहिए|
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10वीं कृषि संगणना के तथ्यों का विश्लेषण कीजिए तथा खेत के आकार और उत्पादन के बीच सम्बन्धों पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Analyze the facts of the tenth agricultural census and discuss the relationship between farm size and production. (150-200 words)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में 10वीं कृषि संगणना के बारे में लिखिए। इसके पश्चात 10वीं कृषि संगणना के आकड़ों का विश्लेषण कीजिये। अंत में कृषि उत्पादकता और खेत के आकार की तुलना प्रस्तुत कीजिये। कृषि मंत्रालय द्वारा प्रत्येक पाँच वर्ष के अंतराल में कृषि संगणना संबंधी आकड़ें प्रस्तुत किए जाते हैं। हाल ही में 10वीं संगणना 2015-16 जारी की गयी। इस संगणना के आकड़ों का विश्लेषण इस प्रकार है: कृषि जोतों की कुल संख्या में 5.33% की वृद्धि हुई है। जो 2010-11 के 138 मिलियन से बढ़कर 2015-16 में 146 मिलियन हो गया है। कुल कृषि क्षेत्र में 1.53% की कमी हुई है। कृषि जोतो के औसत आकार में कमीन हुई है। कृषि जोतो में महिलाओं की हिस्सेदारी में वृद्धि हुई है। जो 2011-12 के 12.79% से बढ़कर 13.87% हो गया है। लघु और सीमांत किसानों की संख्या 84.97% हो गया है। वृहत जोतों में वृद्धि हुई है। 2015-16 में बढ़कर 0.57% हो गया है। खेत के आकार और उत्पादन के बीच संबंध : खेत के आकार उत्पादकता के बीच व्युत्क्रमानुपाती संबंध होता है। जब बड़े खेत पर खेती की जाती है तो उत्पादन उस स्तर तक किया जाता है जब सीमांत उत्पादन मजदूरी के बराबर हो जाता है। छोटे खेतों में उत्पादन पारिवारिक कृषि के अंतर्गत किया जाता है, जहां उत्पादन उस स्थिति में किया जाता है जब तक कि अंतिम श्रम का सीमांत उत्पादन शून्य न हो जाए। इस प्रकार प्रति एकड़ उत्पादकता के आधार पर छोटे खेत अधिक कुशल होते हैं। बड़े खेत कम उपजाऊ होते हैं क्योंकि छोटे किसान संकट के दिनों में बड़े किसानों को अपनी भूमि बेंच देते हैं यदि संकट की परिकल्पना को सही माना जाए कि गरीब किसान संकट दौरान अपने खेतों को बड़े किसानों को बेच देते हैं इसलिए बिखरे हुए खेतों में ठीक से खेती नहीं हो पाती है। छोटे किसान खेतों का प्रभावी दर से उपयोग करते हैं क्योंकि यह खेत उनकी आय का एकमात्र स्रोत होते हैं बड़े खेतों पर खेती श्रमिकों द्वारा कि जाती है जबकि बड़े खेतों पर खेती मालिकों द्वारा की जाती है बड़े खेतों के मालिक अनुपस्थित जमींदार या राजनीति से जुड़े लोग होते हैं बड़े खेतधारक मुनाफे के अधिकतमकरण के सिद्धान्त का पालन करते हैं जबकि छोटे किसान अपने उत्पादन को अधिकतम करने का प्रयास करते हैं हालांकि यह अवधारणा पूर्ण रूप से सत्य नहीं है। विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने विश्लेषण से यह माना है कि श्रमिकों के सीमांत लागत के आधार पर यह व्याख्या पूर्ण रूप से सही नहीं है। श्रमिकों का सीमांत लागत केवल एक कारण है। इसके मौसम की प्रकृति, क्षेत्रीय विकास, तकनीकी आदि कारक है जो खेत के आकार और उत्पादकता के बीच संबंध को निर्धारित करते हैं।
##Question:10वीं कृषि संगणना के तथ्यों का विश्लेषण कीजिए तथा खेत के आकार और उत्पादन के बीच सम्बन्धों पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Analyze the facts of the tenth agricultural census and discuss the relationship between farm size and production. (150-200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में 10वीं कृषि संगणना के बारे में लिखिए। इसके पश्चात 10वीं कृषि संगणना के आकड़ों का विश्लेषण कीजिये। अंत में कृषि उत्पादकता और खेत के आकार की तुलना प्रस्तुत कीजिये। कृषि मंत्रालय द्वारा प्रत्येक पाँच वर्ष के अंतराल में कृषि संगणना संबंधी आकड़ें प्रस्तुत किए जाते हैं। हाल ही में 10वीं संगणना 2015-16 जारी की गयी। इस संगणना के आकड़ों का विश्लेषण इस प्रकार है: कृषि जोतों की कुल संख्या में 5.33% की वृद्धि हुई है। जो 2010-11 के 138 मिलियन से बढ़कर 2015-16 में 146 मिलियन हो गया है। कुल कृषि क्षेत्र में 1.53% की कमी हुई है। कृषि जोतो के औसत आकार में कमीन हुई है। कृषि जोतो में महिलाओं की हिस्सेदारी में वृद्धि हुई है। जो 2011-12 के 12.79% से बढ़कर 13.87% हो गया है। लघु और सीमांत किसानों की संख्या 84.97% हो गया है। वृहत जोतों में वृद्धि हुई है। 2015-16 में बढ़कर 0.57% हो गया है। खेत के आकार और उत्पादन के बीच संबंध : खेत के आकार उत्पादकता के बीच व्युत्क्रमानुपाती संबंध होता है। जब बड़े खेत पर खेती की जाती है तो उत्पादन उस स्तर तक किया जाता है जब सीमांत उत्पादन मजदूरी के बराबर हो जाता है। छोटे खेतों में उत्पादन पारिवारिक कृषि के अंतर्गत किया जाता है, जहां उत्पादन उस स्थिति में किया जाता है जब तक कि अंतिम श्रम का सीमांत उत्पादन शून्य न हो जाए। इस प्रकार प्रति एकड़ उत्पादकता के आधार पर छोटे खेत अधिक कुशल होते हैं। बड़े खेत कम उपजाऊ होते हैं क्योंकि छोटे किसान संकट के दिनों में बड़े किसानों को अपनी भूमि बेंच देते हैं यदि संकट की परिकल्पना को सही माना जाए कि गरीब किसान संकट दौरान अपने खेतों को बड़े किसानों को बेच देते हैं इसलिए बिखरे हुए खेतों में ठीक से खेती नहीं हो पाती है। छोटे किसान खेतों का प्रभावी दर से उपयोग करते हैं क्योंकि यह खेत उनकी आय का एकमात्र स्रोत होते हैं बड़े खेतों पर खेती श्रमिकों द्वारा कि जाती है जबकि बड़े खेतों पर खेती मालिकों द्वारा की जाती है बड़े खेतों के मालिक अनुपस्थित जमींदार या राजनीति से जुड़े लोग होते हैं बड़े खेतधारक मुनाफे के अधिकतमकरण के सिद्धान्त का पालन करते हैं जबकि छोटे किसान अपने उत्पादन को अधिकतम करने का प्रयास करते हैं हालांकि यह अवधारणा पूर्ण रूप से सत्य नहीं है। विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने विश्लेषण से यह माना है कि श्रमिकों के सीमांत लागत के आधार पर यह व्याख्या पूर्ण रूप से सही नहीं है। श्रमिकों का सीमांत लागत केवल एक कारण है। इसके मौसम की प्रकृति, क्षेत्रीय विकास, तकनीकी आदि कारक है जो खेत के आकार और उत्पादकता के बीच संबंध को निर्धारित करते हैं।
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आर्थिक नियोजन क्या है ? संसाधन आवंटन में पूंजीवादी आर्थिक प्रणाली की सीमाओं को बताते हुए मिश्रित आर्थिक प्रणाली की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द ) What is economic planning? Explain the need for a mixed economic system, stating the limitations of the capitalist economic system in resource allocation. (150-200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में आर्थिक नियोजन को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में संसाधन आवंटन में पूंजीवादी आर्थिक प्रणाली अर्थात बाजार तंत्र की सीमाएं बताइए 3- दूसरे भाग में मिश्रित आर्थिक प्रणाली अर्थात सार्वजनिक आर्थिक नियोजन की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये 4- मिश्रित आर्थिक प्रणाली की उपयोगिता के संदर्भ में निष्कर्ष दीजिये आर्थिक नियोजन से अभिप्राय, एक केन्द्रीय सत्ता द्वारा देश में उपलब्ध प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधनों को सन्तुलित ढगं से आवंटन करने से है जिससे एक निश्चित अवधि के अंतर्गत निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सके, जिससे देश का तीव्र आर्थिक विकास किया जा सके।आर्थिक नियोजन के अंतर्गत विकास याजेनाओं के अन्तर्गत भावी विकास के उद्देश्यों को निर्धारित किया जाता है और उनकी प्राप्ति के लिए आर्थिक गतिविधियों का एक केन्द्रीय सत्ता द्वारा नियमन एवं संचालन होता है।नियोजन सदैव किन्ही निश्चित उद्देश्यों के लिए किया जाता है। आर्थिक नियोजन के सामाजिक-आर्थिक एवं राजनीतिक उद्देश्य होते हैं| ससांधनों का समुचित उपयोग कर उत्पादन की मात्रा में अधिकतम वृद्धि करना, समाज के विभिन्न वर्गों में आय की समानता बनाए रखना,उपलब्ध संसाधनों का उचित उपयोग कर उत्पादन को बढ़ाना, समान अवसर, अधिकतम रोजगार सृजन तथा संतुलित विकास सुनिश्चित करना आर्थिक नियोजन के आर्थिक उद्देश्य होते हैं| इसी प्रकार सामाजिक सुरक्षा एवं सामाजिक न्याय नियोजन के सामाजिक उद्देश्य होते हैं| देश का शान्तिपूर्ण विकास, सुरक्षा, समरसता और शान्ति स्थापना आर्थिक नियोजन के राजनीतिक उद्देश्य होते हैं| स्पष्ट है की व्यापक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए आर्थिक नियोजन के अंतर्गत उद्देश्यों के बीच प्राथमिकताएं निर्धारित कर संसाधनों का उचित आवंटन किया जाता है | आर्थिक नियोजन अथवा संसाधन आवंटन दो विधियों से हो सकता है| प्रथम, बाजार तंत्र के माध्यम से इसे पूंजीवादी आर्थिक प्रणाली के रूप में जाना जाता है; द्वितीय, बाजार तंत्र में सार्वजनिक क्षेत्र के हस्तक्षेप माध्यम से संसाधन आवंटन, इसे मिश्रित आर्थिक प्रणाली के रूप में जाना जाता है| बाजार तंत्र द्वारा आर्थिक गतिविधियों के निर्धारण के कुछ सकारात्मक पहलू हैं जैसे बाजार तंत्र निहित लाभ की प्रेरणा पर कार्य करता है,अतः यहाँ तीव्र उत्पादन की संभावना बनती है| इसके साथ ही लाभ को अधिकतम करने के लिए बाजार द्वारा निरंतर नवाचार, बाजार में प्रतिस्पर्धा की उपस्थिति के समक्ष स्वयं को लगातार प्रतिस्पर्धा में बनाए रखने के लिए कार्यकुशलता को उच्चतम स्तर पर बनाए रखने का प्रयास किया जाता है| दूसरी ओर बाजार तंत्र सामूहिक इच्छाओं एवं अभिरुचियों के आधार पर उचित आवंटन करता है| किन्तु बाजार तंत्र की निहित सीमाएं इसे संसाधन आवंटन का योग्य अभिकरण बनने से रोकती हैं| पूंजीवादी आर्थिक प्रणाली की सीमाएं बाजार तंत्र लाभ की प्रेरणा से संचालित होता है| अतः बाजार की रूचि केवल विकसित क्षेत्रों में उच्च वर्ग की अल्पकालिक आवश्यकताओं की ही पूर्ति करने में होती है| इस तरह बाजार एक संकीर्ण दृष्टिकोण अथवा दायरे वाला अभिकरण होता है बाजार तंत्र मांग-पूर्ति के अन्तराल को समाप्त करता है किन्तु यह आवश्यकता एवं पूर्ति के अन्तराल को समाप्त नही कर सकता| अर्थात यह वंचित वर्गों तक अपनी पहुँच नही बना पाता, इससे संसाधन आवंटन की प्रक्रिया बाधित होती है और समान अवसरों का उद्देश्य नहीं प्राप्त हो पाता| एक आर्थिक गतिविधि का अन्य आर्थिक गतिविधियों पर पड़ने वाले प्रभाव अर्थात बाह्यताओं की स्थिति में बाजार तंत्र संसाधनों के उचित आवंटन में विफल रहता है| अर्थात आर्थिक गतिविधियों में उतार-चढ़ाव आने पर बाजार तंत्र मांग एवं पूर्ति का विनियमन करने और अर्थव्यवस्था में स्थिरता लाने में अक्षम होता है| चूँकि बाजार तंत्र का दृष्टिकोण केवल लाभ तक सीमित होता है अतः अर्थव्यवस्था की समष्टिगत आर्थिक समस्याओं यथा दीर्घकालिक वृद्धि, सतत विकास, पर्यारण संरक्षण, मूल्य स्थिरता, निर्धनता उन्मूलन आदि राष्ट्रीय उद्देश्यों को प्राप्त करने में बाजार तंत्र सक्षम नहीं होता है| किसी राष्ट्र का उद्देश्य कल्याण स्तर का निरंतर संवर्धन होता है| कल्याण के क्षेत्र में सामान्यतः सार्वजनिक क्षेत्र ही संलग्न होता है| अब चूँकि बाजार तंत्र केवल प्रतिस्पर्धा की स्थिति में ही सक्रिय होता है अतः कल्याण स्तर को संवर्धित करने में बाजार तंत्र पूर्णतः उपयोगी अभिकरण नहीं बन पाता| बाजार तंत्र की उपरोक्त सीमाएं सार्वजनिक आर्थिक नियोजन अथवा मिश्रित आर्थिक प्रणाली की आवश्यकता स्पष्ट करती हैं| मिश्रित आर्थिक प्रणाली की आवश्यकता आर्थिक नियोजन के उद्देश्यों में आर्थिक विकास को बढ़ावा देना गरीबी एवं बेरोजगारी की समस्या का निवारण करना, सामाजिक न्याय एवं आत्मनिर्भरता प्राप्त करना, निवेश एवं पूंजी निर्माण में वृद्धि करना, मानव संसाधन का विकास करना एवं समावेशी विकास सुनिश्चित करना है। सार्वजनिक क्षेत्र केवल लाभ की प्रेरणा से संचालित नहीं होता है| राज्य की नीतियों का अंतिम उद्देश्य कल्याण स्तर को उच्च करना होता है| नागरिकों की संसाधनों तक समान पहुच सुनिश्चित करते हुए समावेशी विकास करना किसी राष्ट्र का उद्देश्य होता है| इसमें सार्वजनिक क्षेत्र व्यापक दृष्टिकोण रखते हुए आर्थिक गतिविधियों का निर्धारण कर सकता है| राज्य न केवल संसाधनों का समतापूर्ण आवंटन कर सकता है बल्कि समष्टिगत आर्थिक समस्याओं यथा दीर्घकालिक वृद्धि, सतत विकास, पर्यारण संरक्षण, मूल्य स्थिरता, निर्धनता उन्मूलन आदि राष्ट्रीय उद्देश्यों को भी प्राप्त करने के प्रयत्न करता है| बाह्यताओं की स्थिति में अथवा आर्थिक गतिविधियों में उतार-चढ़ाव आने पर राज्य करारोपण, सब्सिडी,लाइसेंस, कोटा, MSP आदि उपकरणों तथा राजकोषीय नीति एवं मौद्रिक नीति के माध्यम से मांग-पूर्ति का विनियमन कर अर्थव्यवस्था में स्थिरता लाने का प्रयास करता है| राज्य न केवल वंचित वर्गों की पहचान करता है बल्कि उनकी आवश्यकताओं का अध्ययन भी करता है| इस तरह राज्य उत्थान को दृष्टि में रखते हुए आर्थिक नियोजन में सक्षम होता है| यहाँ राज्य ने केवल मांग-पूर्ति का बल्कि आवश्यकता और पूर्ति को सुनिश्चित करने का प्रयास करता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है की संसाधनों के इष्टतम आवंटन के संदर्भ में राज्य एक सक्षम अभिकरण होता है| राजकीय गतिविधियों के निरंतर विस्तार को देखते हुए, सार्वजनिक क्षेत्र की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए तथा बाजार तंत्र की कुछ क्षेत्रों में उपयोगिता को देखते हुए मिश्रित प्रणाली के साथ आर्थिक नियोजन की आवश्यकता है| 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारतीय आर्थिक नियोजन में मिश्रित प्रवृत्ति को देखा जा सकता है|
##Question:आर्थिक नियोजन क्या है ? संसाधन आवंटन में पूंजीवादी आर्थिक प्रणाली की सीमाओं को बताते हुए मिश्रित आर्थिक प्रणाली की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द ) What is economic planning? Explain the need for a mixed economic system, stating the limitations of the capitalist economic system in resource allocation. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में आर्थिक नियोजन को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में संसाधन आवंटन में पूंजीवादी आर्थिक प्रणाली अर्थात बाजार तंत्र की सीमाएं बताइए 3- दूसरे भाग में मिश्रित आर्थिक प्रणाली अर्थात सार्वजनिक आर्थिक नियोजन की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये 4- मिश्रित आर्थिक प्रणाली की उपयोगिता के संदर्भ में निष्कर्ष दीजिये आर्थिक नियोजन से अभिप्राय, एक केन्द्रीय सत्ता द्वारा देश में उपलब्ध प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधनों को सन्तुलित ढगं से आवंटन करने से है जिससे एक निश्चित अवधि के अंतर्गत निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सके, जिससे देश का तीव्र आर्थिक विकास किया जा सके।आर्थिक नियोजन के अंतर्गत विकास याजेनाओं के अन्तर्गत भावी विकास के उद्देश्यों को निर्धारित किया जाता है और उनकी प्राप्ति के लिए आर्थिक गतिविधियों का एक केन्द्रीय सत्ता द्वारा नियमन एवं संचालन होता है।नियोजन सदैव किन्ही निश्चित उद्देश्यों के लिए किया जाता है। आर्थिक नियोजन के सामाजिक-आर्थिक एवं राजनीतिक उद्देश्य होते हैं| ससांधनों का समुचित उपयोग कर उत्पादन की मात्रा में अधिकतम वृद्धि करना, समाज के विभिन्न वर्गों में आय की समानता बनाए रखना,उपलब्ध संसाधनों का उचित उपयोग कर उत्पादन को बढ़ाना, समान अवसर, अधिकतम रोजगार सृजन तथा संतुलित विकास सुनिश्चित करना आर्थिक नियोजन के आर्थिक उद्देश्य होते हैं| इसी प्रकार सामाजिक सुरक्षा एवं सामाजिक न्याय नियोजन के सामाजिक उद्देश्य होते हैं| देश का शान्तिपूर्ण विकास, सुरक्षा, समरसता और शान्ति स्थापना आर्थिक नियोजन के राजनीतिक उद्देश्य होते हैं| स्पष्ट है की व्यापक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए आर्थिक नियोजन के अंतर्गत उद्देश्यों के बीच प्राथमिकताएं निर्धारित कर संसाधनों का उचित आवंटन किया जाता है | आर्थिक नियोजन अथवा संसाधन आवंटन दो विधियों से हो सकता है| प्रथम, बाजार तंत्र के माध्यम से इसे पूंजीवादी आर्थिक प्रणाली के रूप में जाना जाता है; द्वितीय, बाजार तंत्र में सार्वजनिक क्षेत्र के हस्तक्षेप माध्यम से संसाधन आवंटन, इसे मिश्रित आर्थिक प्रणाली के रूप में जाना जाता है| बाजार तंत्र द्वारा आर्थिक गतिविधियों के निर्धारण के कुछ सकारात्मक पहलू हैं जैसे बाजार तंत्र निहित लाभ की प्रेरणा पर कार्य करता है,अतः यहाँ तीव्र उत्पादन की संभावना बनती है| इसके साथ ही लाभ को अधिकतम करने के लिए बाजार द्वारा निरंतर नवाचार, बाजार में प्रतिस्पर्धा की उपस्थिति के समक्ष स्वयं को लगातार प्रतिस्पर्धा में बनाए रखने के लिए कार्यकुशलता को उच्चतम स्तर पर बनाए रखने का प्रयास किया जाता है| दूसरी ओर बाजार तंत्र सामूहिक इच्छाओं एवं अभिरुचियों के आधार पर उचित आवंटन करता है| किन्तु बाजार तंत्र की निहित सीमाएं इसे संसाधन आवंटन का योग्य अभिकरण बनने से रोकती हैं| पूंजीवादी आर्थिक प्रणाली की सीमाएं बाजार तंत्र लाभ की प्रेरणा से संचालित होता है| अतः बाजार की रूचि केवल विकसित क्षेत्रों में उच्च वर्ग की अल्पकालिक आवश्यकताओं की ही पूर्ति करने में होती है| इस तरह बाजार एक संकीर्ण दृष्टिकोण अथवा दायरे वाला अभिकरण होता है बाजार तंत्र मांग-पूर्ति के अन्तराल को समाप्त करता है किन्तु यह आवश्यकता एवं पूर्ति के अन्तराल को समाप्त नही कर सकता| अर्थात यह वंचित वर्गों तक अपनी पहुँच नही बना पाता, इससे संसाधन आवंटन की प्रक्रिया बाधित होती है और समान अवसरों का उद्देश्य नहीं प्राप्त हो पाता| एक आर्थिक गतिविधि का अन्य आर्थिक गतिविधियों पर पड़ने वाले प्रभाव अर्थात बाह्यताओं की स्थिति में बाजार तंत्र संसाधनों के उचित आवंटन में विफल रहता है| अर्थात आर्थिक गतिविधियों में उतार-चढ़ाव आने पर बाजार तंत्र मांग एवं पूर्ति का विनियमन करने और अर्थव्यवस्था में स्थिरता लाने में अक्षम होता है| चूँकि बाजार तंत्र का दृष्टिकोण केवल लाभ तक सीमित होता है अतः अर्थव्यवस्था की समष्टिगत आर्थिक समस्याओं यथा दीर्घकालिक वृद्धि, सतत विकास, पर्यारण संरक्षण, मूल्य स्थिरता, निर्धनता उन्मूलन आदि राष्ट्रीय उद्देश्यों को प्राप्त करने में बाजार तंत्र सक्षम नहीं होता है| किसी राष्ट्र का उद्देश्य कल्याण स्तर का निरंतर संवर्धन होता है| कल्याण के क्षेत्र में सामान्यतः सार्वजनिक क्षेत्र ही संलग्न होता है| अब चूँकि बाजार तंत्र केवल प्रतिस्पर्धा की स्थिति में ही सक्रिय होता है अतः कल्याण स्तर को संवर्धित करने में बाजार तंत्र पूर्णतः उपयोगी अभिकरण नहीं बन पाता| बाजार तंत्र की उपरोक्त सीमाएं सार्वजनिक आर्थिक नियोजन अथवा मिश्रित आर्थिक प्रणाली की आवश्यकता स्पष्ट करती हैं| मिश्रित आर्थिक प्रणाली की आवश्यकता आर्थिक नियोजन के उद्देश्यों में आर्थिक विकास को बढ़ावा देना गरीबी एवं बेरोजगारी की समस्या का निवारण करना, सामाजिक न्याय एवं आत्मनिर्भरता प्राप्त करना, निवेश एवं पूंजी निर्माण में वृद्धि करना, मानव संसाधन का विकास करना एवं समावेशी विकास सुनिश्चित करना है। सार्वजनिक क्षेत्र केवल लाभ की प्रेरणा से संचालित नहीं होता है| राज्य की नीतियों का अंतिम उद्देश्य कल्याण स्तर को उच्च करना होता है| नागरिकों की संसाधनों तक समान पहुच सुनिश्चित करते हुए समावेशी विकास करना किसी राष्ट्र का उद्देश्य होता है| इसमें सार्वजनिक क्षेत्र व्यापक दृष्टिकोण रखते हुए आर्थिक गतिविधियों का निर्धारण कर सकता है| राज्य न केवल संसाधनों का समतापूर्ण आवंटन कर सकता है बल्कि समष्टिगत आर्थिक समस्याओं यथा दीर्घकालिक वृद्धि, सतत विकास, पर्यारण संरक्षण, मूल्य स्थिरता, निर्धनता उन्मूलन आदि राष्ट्रीय उद्देश्यों को भी प्राप्त करने के प्रयत्न करता है| बाह्यताओं की स्थिति में अथवा आर्थिक गतिविधियों में उतार-चढ़ाव आने पर राज्य करारोपण, सब्सिडी,लाइसेंस, कोटा, MSP आदि उपकरणों तथा राजकोषीय नीति एवं मौद्रिक नीति के माध्यम से मांग-पूर्ति का विनियमन कर अर्थव्यवस्था में स्थिरता लाने का प्रयास करता है| राज्य न केवल वंचित वर्गों की पहचान करता है बल्कि उनकी आवश्यकताओं का अध्ययन भी करता है| इस तरह राज्य उत्थान को दृष्टि में रखते हुए आर्थिक नियोजन में सक्षम होता है| यहाँ राज्य ने केवल मांग-पूर्ति का बल्कि आवश्यकता और पूर्ति को सुनिश्चित करने का प्रयास करता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है की संसाधनों के इष्टतम आवंटन के संदर्भ में राज्य एक सक्षम अभिकरण होता है| राजकीय गतिविधियों के निरंतर विस्तार को देखते हुए, सार्वजनिक क्षेत्र की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए तथा बाजार तंत्र की कुछ क्षेत्रों में उपयोगिता को देखते हुए मिश्रित प्रणाली के साथ आर्थिक नियोजन की आवश्यकता है| 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारतीय आर्थिक नियोजन में मिश्रित प्रवृत्ति को देखा जा सकता है|
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नाभिकीय संयंत्र प्रौद्योगिकी का सामान्य परिचय दीजिये | साथ ही भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की भी चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द, 10 अंक) Give a general introduction to nuclear plant technology. Also, discuss India"s nuclear energy program. (150-200 Words, 10 marks)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत नाभिकीय संयत्र प्रौद्योगिकी का परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | पुनः भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के तीन चरणीय कार्यक्रम को संक्षेप में बताइए | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - नाभिकीय संयत्र प्रौद्योगिकी नाभिकीय संयत्र , नाभिकीय विखंडन प्रक्रिया द्वारा ऊर्जा उत्पन्न करने वाला विद्युतीय संयत्र है | ऐसे संयत्र में धीमी गति के न्यूट्रान की सहयता से U-235 का नियंत्रित श्रृंखला अभिक्रिया द्वारा ऊष्मा उत्पन्न किया जाता है | जिससे जल वाष्प बनकर टर्बाइन जनेरटर से विद्युत उत्पादन किया जाता है | इसके चार घटक होते हैं - ईंधन - प्राकृतिक यूरेनियम को ईंधन रोड असेम्बली को संयंत्र के क्रोड़ में रखा जाता है | मंदक - भारी जल का उपयोग तेज गति के न्यूट्रान को धीमा/कम करने के लिए किया जाता है | शीतलक - इसकी सहायता से क्रोड़ का तापमान नियंत्रित किया जाता है और ऊष्मा को अवशोषित किया जाता है | सामान्य जल को वाष्प बनाकर टरबाइन जेनरेटर द्वारा विद्युत उत्पादन किया जाता है | नियंत्रक रोड -बोरोन या कैडमियम इसके द्वारा न्यूट्रान को अवशोषित किया जाता है | क्रोड़ में न्यूट्रान की संख्या को नियंत्रित किया जाता है | भारत का परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE ) की स्थापना वर्ष 1954 में किया गया | वर्तमान में परमाणु ऊर्जा विभाग के द्वारा नाभिकीय रिएक्टर अनुसंधान, अनुसंधान रिएक्टर, साइक्लोटोन, रेडियो आइसोटोप का उत्पादन किया जाता है | DEA के द्वारा सामजिक आर्थिक विकास के लिए नाभिकीय चिकित्सा, नाभिकीय कृषि, नाभिकीय विकिरण प्रौद्योगिकी का उद्योग में उपयोग, पर्यावरण संरक्षण, आदि क्षेत्रों में कार्य किया जा रहा है | वर्तमान में भारत में 8 न्यूक्लियर पार्क में 22 रिएक्टरों की सहायता से 6780 MW विद्युत उत्पादन किया जा रहा है | कैबिनेट द्वारा अतिरिक्त 10700 रिएक्टरों को बनाने की अनुमति दी गयी है | भारत में नए न्यूक्लियर पार्को को बनाया जा रहा है, जिसमे प्रमुख जैतपुर, कोवाडा, कुम्हारिया, भीमपुर, हरिपुर, आदि है | भारत में यूरेनियम सीमित है लेकिन थोरियम का भण्डार विश्व का 25 प्रतिशत भारत में मौजूद है | सीमित संसाधनों के कारण डॉ.होमी जहाँगीर भाभा, परमाणु ऊर्जा के जनक, द्वारा परमाणु ऊर्जा के तीन चरणीय कार्यक्रम की संकल्पना दी गयी | भारत के परमाणु ऊर्जा के तीन चरणीय कार्यक्रम चरण प्रथम- दाबित भारी जल संयत्र (PHWR)- ईंधन - U-235 एवं U-238 मंदक और शीतलक का प्रयोग - भारी जल के रूप में इसमें U -235 की खपत हो जाती है किन्तु U-238 की कुछ मात्रा प्लूटोनियम-239 में परिवर्तित हो जाता है | खपत ईंधन के प्रसंस्करण द्वारा U-238 एवं प्लूटोनियम 239 को निकाल लिया जाता है | भारत में यह 700 MW विद्युत उत्पादन कर सकता है | द्वितीय चरण- तीव्र प्रजनन संयत्र (FBR)- ईंधन - U -238 एवं प्लूटोनियम -239 इस रिएक्टर में मंदक नहीं होता है | शीतलक का प्रयोग होता है - द्रव सोडियम का प्रयोग यह रिएक्टर थोरियम 232 को U-233 में बदला जा सकता है | तमिलनाडु के कलपक्कम के इंदिरा गाँधी परमाणु ऊर्जा केंद्र द्वारा FBR तैयार किया गया है | भारत में यह 500 MW विद्युत उत्पादन कर सकता है | तृतीय चरण- उन्नत भारी जल संयत्र (AHWR) ईंधन - थोरियम 232 को प्लूटोनियम 239 तथा थोरियम को यूरेनियम के साथ मिक्स करके उपयोग में लाया जाएगा | इस रिएक्टर में मंदक भारी जल तथा शीतलक सामान्य जल होगा | BARC द्वारा प्रोटोटाइप AHWR विकसित किया गया है | भारत में यह 300 MW विद्युत उत्पादन कर सकता है | भारतीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य (शांतिपूर्वक) ऊर्जा उत्पन्न करना, कृषि तथा चिकित्सा के क्षेत्र में कार्य करना है, जिससे भविष्य की चुनौतियों से निपटा जा सके |
##Question:नाभिकीय संयंत्र प्रौद्योगिकी का सामान्य परिचय दीजिये | साथ ही भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की भी चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द, 10 अंक) Give a general introduction to nuclear plant technology. Also, discuss India"s nuclear energy program. (150-200 Words, 10 marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत नाभिकीय संयत्र प्रौद्योगिकी का परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | पुनः भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के तीन चरणीय कार्यक्रम को संक्षेप में बताइए | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - नाभिकीय संयत्र प्रौद्योगिकी नाभिकीय संयत्र , नाभिकीय विखंडन प्रक्रिया द्वारा ऊर्जा उत्पन्न करने वाला विद्युतीय संयत्र है | ऐसे संयत्र में धीमी गति के न्यूट्रान की सहयता से U-235 का नियंत्रित श्रृंखला अभिक्रिया द्वारा ऊष्मा उत्पन्न किया जाता है | जिससे जल वाष्प बनकर टर्बाइन जनेरटर से विद्युत उत्पादन किया जाता है | इसके चार घटक होते हैं - ईंधन - प्राकृतिक यूरेनियम को ईंधन रोड असेम्बली को संयंत्र के क्रोड़ में रखा जाता है | मंदक - भारी जल का उपयोग तेज गति के न्यूट्रान को धीमा/कम करने के लिए किया जाता है | शीतलक - इसकी सहायता से क्रोड़ का तापमान नियंत्रित किया जाता है और ऊष्मा को अवशोषित किया जाता है | सामान्य जल को वाष्प बनाकर टरबाइन जेनरेटर द्वारा विद्युत उत्पादन किया जाता है | नियंत्रक रोड -बोरोन या कैडमियम इसके द्वारा न्यूट्रान को अवशोषित किया जाता है | क्रोड़ में न्यूट्रान की संख्या को नियंत्रित किया जाता है | भारत का परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE ) की स्थापना वर्ष 1954 में किया गया | वर्तमान में परमाणु ऊर्जा विभाग के द्वारा नाभिकीय रिएक्टर अनुसंधान, अनुसंधान रिएक्टर, साइक्लोटोन, रेडियो आइसोटोप का उत्पादन किया जाता है | DEA के द्वारा सामजिक आर्थिक विकास के लिए नाभिकीय चिकित्सा, नाभिकीय कृषि, नाभिकीय विकिरण प्रौद्योगिकी का उद्योग में उपयोग, पर्यावरण संरक्षण, आदि क्षेत्रों में कार्य किया जा रहा है | वर्तमान में भारत में 8 न्यूक्लियर पार्क में 22 रिएक्टरों की सहायता से 6780 MW विद्युत उत्पादन किया जा रहा है | कैबिनेट द्वारा अतिरिक्त 10700 रिएक्टरों को बनाने की अनुमति दी गयी है | भारत में नए न्यूक्लियर पार्को को बनाया जा रहा है, जिसमे प्रमुख जैतपुर, कोवाडा, कुम्हारिया, भीमपुर, हरिपुर, आदि है | भारत में यूरेनियम सीमित है लेकिन थोरियम का भण्डार विश्व का 25 प्रतिशत भारत में मौजूद है | सीमित संसाधनों के कारण डॉ.होमी जहाँगीर भाभा, परमाणु ऊर्जा के जनक, द्वारा परमाणु ऊर्जा के तीन चरणीय कार्यक्रम की संकल्पना दी गयी | भारत के परमाणु ऊर्जा के तीन चरणीय कार्यक्रम चरण प्रथम- दाबित भारी जल संयत्र (PHWR)- ईंधन - U-235 एवं U-238 मंदक और शीतलक का प्रयोग - भारी जल के रूप में इसमें U -235 की खपत हो जाती है किन्तु U-238 की कुछ मात्रा प्लूटोनियम-239 में परिवर्तित हो जाता है | खपत ईंधन के प्रसंस्करण द्वारा U-238 एवं प्लूटोनियम 239 को निकाल लिया जाता है | भारत में यह 700 MW विद्युत उत्पादन कर सकता है | द्वितीय चरण- तीव्र प्रजनन संयत्र (FBR)- ईंधन - U -238 एवं प्लूटोनियम -239 इस रिएक्टर में मंदक नहीं होता है | शीतलक का प्रयोग होता है - द्रव सोडियम का प्रयोग यह रिएक्टर थोरियम 232 को U-233 में बदला जा सकता है | तमिलनाडु के कलपक्कम के इंदिरा गाँधी परमाणु ऊर्जा केंद्र द्वारा FBR तैयार किया गया है | भारत में यह 500 MW विद्युत उत्पादन कर सकता है | तृतीय चरण- उन्नत भारी जल संयत्र (AHWR) ईंधन - थोरियम 232 को प्लूटोनियम 239 तथा थोरियम को यूरेनियम के साथ मिक्स करके उपयोग में लाया जाएगा | इस रिएक्टर में मंदक भारी जल तथा शीतलक सामान्य जल होगा | BARC द्वारा प्रोटोटाइप AHWR विकसित किया गया है | भारत में यह 300 MW विद्युत उत्पादन कर सकता है | भारतीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य (शांतिपूर्वक) ऊर्जा उत्पन्न करना, कृषि तथा चिकित्सा के क्षेत्र में कार्य करना है, जिससे भविष्य की चुनौतियों से निपटा जा सके |
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यह स्पष्ट कीजिए कि 1857 का विद्रोह किस प्रकार औपनिवेशिक भारत के प्रति ब्रिटिश नीतियों के विकास क्रम में एक ऐतिहासिक मोड़ था ?( 150-200 शब्द, 10 अंक ) Explain how the revolt of 1857 was a historic turning point in the development of British policies towards colonial India? (150-200 words, 10 marks)
दृष्टिकोण : 1857 के विद्रोह का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । ब्रिटिश नीतियों पर 1857 के विद्रोह के प्रभावों की चर्चा कीजिए । भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन पर 1857 के विद्रोह के प्रभावों की चर्चा करते हुए संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : 1857 का विद्रोह आधुनिक भारत के इतिहास का एक महत्वपूर्ण परिवर्तन बिन्दु है । इस विद्रोह ने जहां एक ओर पहली बार ब्रिटिश उपनिवेशवाद को सशक्त चुनौती प्रस्तुत की वहीं दूसरी ओर इसके परिणाम स्वरूप भारत में ब्रिटिश नीति के सभी आयामों पर महत्वपूर्ण बदलाव दृष्टिगत होते हैं । साथ ही साथ इसने राष्ट्रीय आंदोलन की धारा को भी महत्वपूर्ण ढंग से प्रभावित किया । 1857 के विद्रोह के परिणामों को हम निम्नलिखित रूपों में देख सकते हैं : 1. ब्रिटिश नीतियों के दृष्टिकोण से : सेना के प्रति नीति : ब्रिटिश सैनिकों की संख्या बढ़ाई गयी । जैसे- बंगाल में 1:2 में ब्रिटिश व भारतीय सैनिक की संख्या सुनिश्चित की गयी । बंगाल के सैनिकों को गैर-लड़ाकू तथा सिख एवं गोरखा सैनिकों को लड़ाकू सैनिक के रूप में चित्रित किया जाने लगा । महत्वपूर्ण संगठनों पर जैसे- शस्त्रागार आदि पर अंग्रेज़ सैनिकों का नियंत्रण । शासकों के प्रति नीति : विद्रोह के दमन में भारतीय शासकों ने अंग्रेजों का साथ दिया । अतः सरकार ने स्पष्ट शब्दों में साम्राज्य विस्तार की नीति को छोड़ने की घोषणा की । साथ ही शासकों को गोद लेने का भी अधिकार दिया गया । जमींदारों के प्रति नीति : शासकों की तरह जमींदारों के साथ भी मित्रवत सम्बन्धों को बनाए रखने पर बल दिया । प्रशासन के क्षेत्र में : प्रशासन के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए । जैसे -ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर दिया गया और औपचारिक तौर पर भारत में ब्रिटिश संसद का प्रत्यक्ष शासन प्रारम्भ किया । भारतीयों के साथ भेदभाव न करने का आश्वाशन , केंद्रीय विधायिका में भारतीयों को प्रवेश जैसे पहल लोगों के असंतोष को कम करने के लिए उठाए गए । विद्रोह के पश्चात तथा वित्तीय विकेन्द्रीकरण को भी महत्व दिया जाने लगा और स्थानीय शासन में भारतीयों की भागीदारी का भी ध्यान रखा गया । समाज सुधार : 1857 के विद्रोह के पश्चात अंग्रेजों ने सामाजिक मुद्दों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया तथा राष्ट्रीय चेतना को कमजोर करने के लिए जाति एवं धर्म के नाम पर भारतीयों को लड़ाए जाने की योजना बनाए जाने लगी । शिक्षित भारतीयों के प्रति : विद्रोह के पश्चात अंग्रेज़ शिक्षित भारतीयों तथा प्रेस को लेकर विशेष तौर पर सावधान थे । सिविल सेवा में प्रवेश के लिए न्यूनतम आयु को 23 वर्ष से 21 वर्ष और फिर 19 वर्ष कर दिया गया । प्रेस पर सरकारी नियंत्रण जैसे उपायों के द्वारा उभरते हुए शिक्षित वर्ग को नियंत्रित करने की कोशिश । आर्थिक क्षेत्र : 1857 के पश्चात या 1850 के दशक में आर्थिक क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई पड़ने लगे , जैसे- आधुनिक उद्योगों व रेलवे की शुरुआत ।इन परिवर्तनों को अंग्रेजों ने भारत के लिए लाभ के रूप में चित्रित किया जबकि यह ब्रिटिश हितों से परिचालित था । 2. राष्ट्रीय आंदोलन पर प्रभाव : 1857 के विद्रोह की विफलता से शिक्षित भारतीयों ने संगठन ,समन्वय तथा नेतृत्व के महत्व को समझा । शिक्षित भारतीयों ने इस तथ्य को भी समझा कि केवल हिंसात्मक तरीके से सरकार को चुनौती नहीं दी जा सकती बल्कि आधुनिक विचारों को आधार बनाकर सरकार के विरुद्ध संघर्ष करना होगा । संघर्ष के लिए प्रगतिशील कार्यक्रम का होना भी आवश्यक है जिससे समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चला जा सके । विद्रोह में आमलोगों की व्यापक भागीदारी ने न केवल सरकारी नीतियों की सीमाओं को उजागर किया बल्कि लोगों में असंतोष तथा संचित ऊर्जा को भी रेखांकित किया । इसी असंतोष व ऊर्जा को आधार बनाकर आगे राष्ट्रीय आंदोलन के अंतर्गत जन आंदोलन की बुनियाद रखी गयी । राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान, गदर आंदोलन , 1940 के दशक में आजाद हिन्द फौज का आंदोलन इत्यादि पर इसका प्रत्यक्ष प्रभाव दिखा । राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान 1857 की क्रान्ति व क्रांतिकारियों के किस्से लोगों में प्रेरणा का संचार करने का काम किया । उपरोक्त चर्चा के आधार पर हम कह सकते हैं कि 1857 की क्रान्ति ने आधुनिक भारत के इतिहास में एक युग का अंत कर दिया और नए युग का बीजारोपन हुआ । एक ओर अंग्रेजों ने प्रत्यक्ष विस्तार की नीति को त्याग कर अधिकाधिक आर्थिक शोषण पर ध्यान केन्द्रित किया तो दूसरी ओर राष्ट्रीय आंदोलन में भी आधुनिक विचारों समागम हुआ और देश के शिक्षित मध्यवर्ग ने बदलाव की ज़िम्मेदारी ली और वास्तविक अर्थों में भारत में राष्ट्रवाद व राष्ट्रीय आंदोलन का विकास हुआ ।
##Question:यह स्पष्ट कीजिए कि 1857 का विद्रोह किस प्रकार औपनिवेशिक भारत के प्रति ब्रिटिश नीतियों के विकास क्रम में एक ऐतिहासिक मोड़ था ?( 150-200 शब्द, 10 अंक ) Explain how the revolt of 1857 was a historic turning point in the development of British policies towards colonial India? (150-200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण : 1857 के विद्रोह का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । ब्रिटिश नीतियों पर 1857 के विद्रोह के प्रभावों की चर्चा कीजिए । भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन पर 1857 के विद्रोह के प्रभावों की चर्चा करते हुए संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : 1857 का विद्रोह आधुनिक भारत के इतिहास का एक महत्वपूर्ण परिवर्तन बिन्दु है । इस विद्रोह ने जहां एक ओर पहली बार ब्रिटिश उपनिवेशवाद को सशक्त चुनौती प्रस्तुत की वहीं दूसरी ओर इसके परिणाम स्वरूप भारत में ब्रिटिश नीति के सभी आयामों पर महत्वपूर्ण बदलाव दृष्टिगत होते हैं । साथ ही साथ इसने राष्ट्रीय आंदोलन की धारा को भी महत्वपूर्ण ढंग से प्रभावित किया । 1857 के विद्रोह के परिणामों को हम निम्नलिखित रूपों में देख सकते हैं : 1. ब्रिटिश नीतियों के दृष्टिकोण से : सेना के प्रति नीति : ब्रिटिश सैनिकों की संख्या बढ़ाई गयी । जैसे- बंगाल में 1:2 में ब्रिटिश व भारतीय सैनिक की संख्या सुनिश्चित की गयी । बंगाल के सैनिकों को गैर-लड़ाकू तथा सिख एवं गोरखा सैनिकों को लड़ाकू सैनिक के रूप में चित्रित किया जाने लगा । महत्वपूर्ण संगठनों पर जैसे- शस्त्रागार आदि पर अंग्रेज़ सैनिकों का नियंत्रण । शासकों के प्रति नीति : विद्रोह के दमन में भारतीय शासकों ने अंग्रेजों का साथ दिया । अतः सरकार ने स्पष्ट शब्दों में साम्राज्य विस्तार की नीति को छोड़ने की घोषणा की । साथ ही शासकों को गोद लेने का भी अधिकार दिया गया । जमींदारों के प्रति नीति : शासकों की तरह जमींदारों के साथ भी मित्रवत सम्बन्धों को बनाए रखने पर बल दिया । प्रशासन के क्षेत्र में : प्रशासन के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए । जैसे -ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर दिया गया और औपचारिक तौर पर भारत में ब्रिटिश संसद का प्रत्यक्ष शासन प्रारम्भ किया । भारतीयों के साथ भेदभाव न करने का आश्वाशन , केंद्रीय विधायिका में भारतीयों को प्रवेश जैसे पहल लोगों के असंतोष को कम करने के लिए उठाए गए । विद्रोह के पश्चात तथा वित्तीय विकेन्द्रीकरण को भी महत्व दिया जाने लगा और स्थानीय शासन में भारतीयों की भागीदारी का भी ध्यान रखा गया । समाज सुधार : 1857 के विद्रोह के पश्चात अंग्रेजों ने सामाजिक मुद्दों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया तथा राष्ट्रीय चेतना को कमजोर करने के लिए जाति एवं धर्म के नाम पर भारतीयों को लड़ाए जाने की योजना बनाए जाने लगी । शिक्षित भारतीयों के प्रति : विद्रोह के पश्चात अंग्रेज़ शिक्षित भारतीयों तथा प्रेस को लेकर विशेष तौर पर सावधान थे । सिविल सेवा में प्रवेश के लिए न्यूनतम आयु को 23 वर्ष से 21 वर्ष और फिर 19 वर्ष कर दिया गया । प्रेस पर सरकारी नियंत्रण जैसे उपायों के द्वारा उभरते हुए शिक्षित वर्ग को नियंत्रित करने की कोशिश । आर्थिक क्षेत्र : 1857 के पश्चात या 1850 के दशक में आर्थिक क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई पड़ने लगे , जैसे- आधुनिक उद्योगों व रेलवे की शुरुआत ।इन परिवर्तनों को अंग्रेजों ने भारत के लिए लाभ के रूप में चित्रित किया जबकि यह ब्रिटिश हितों से परिचालित था । 2. राष्ट्रीय आंदोलन पर प्रभाव : 1857 के विद्रोह की विफलता से शिक्षित भारतीयों ने संगठन ,समन्वय तथा नेतृत्व के महत्व को समझा । शिक्षित भारतीयों ने इस तथ्य को भी समझा कि केवल हिंसात्मक तरीके से सरकार को चुनौती नहीं दी जा सकती बल्कि आधुनिक विचारों को आधार बनाकर सरकार के विरुद्ध संघर्ष करना होगा । संघर्ष के लिए प्रगतिशील कार्यक्रम का होना भी आवश्यक है जिससे समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चला जा सके । विद्रोह में आमलोगों की व्यापक भागीदारी ने न केवल सरकारी नीतियों की सीमाओं को उजागर किया बल्कि लोगों में असंतोष तथा संचित ऊर्जा को भी रेखांकित किया । इसी असंतोष व ऊर्जा को आधार बनाकर आगे राष्ट्रीय आंदोलन के अंतर्गत जन आंदोलन की बुनियाद रखी गयी । राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान, गदर आंदोलन , 1940 के दशक में आजाद हिन्द फौज का आंदोलन इत्यादि पर इसका प्रत्यक्ष प्रभाव दिखा । राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान 1857 की क्रान्ति व क्रांतिकारियों के किस्से लोगों में प्रेरणा का संचार करने का काम किया । उपरोक्त चर्चा के आधार पर हम कह सकते हैं कि 1857 की क्रान्ति ने आधुनिक भारत के इतिहास में एक युग का अंत कर दिया और नए युग का बीजारोपन हुआ । एक ओर अंग्रेजों ने प्रत्यक्ष विस्तार की नीति को त्याग कर अधिकाधिक आर्थिक शोषण पर ध्यान केन्द्रित किया तो दूसरी ओर राष्ट्रीय आंदोलन में भी आधुनिक विचारों समागम हुआ और देश के शिक्षित मध्यवर्ग ने बदलाव की ज़िम्मेदारी ली और वास्तविक अर्थों में भारत में राष्ट्रवाद व राष्ट्रीय आंदोलन का विकास हुआ ।
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What do you mean by Naxalism? Write the causes for the rise of Naxalism in India? (10 Marks/150 words)
Approach Introduce in brief about Left-Wing Extremism (LWE)/Naxalism In the body, causes for the rise of Naxalism in India Conclude briefly with steps taken by govt. Answer Left-Wing Extremism (LWE)/Naxalism is a powerful extremist movement targetted against the Indian state and has been referred to as the gravest internal security threat by the former PM of India As per the reports of the Ministry of Home Affairs, more than 13,000 people have lost their lives since the year 2000 as a result of Naxal violence. Naxalism as a movement slowly and gradually expanded from Naxalbari to more than 200 districts This region is affected by Naxal violence that extends from Andhra Pradesh in the South to Nepal bordering districts in Uttar Pradesh and Bihar is infamously referred to as Red Corridor ie from Tirupati to Pashupati, etc. The objective of Naxalism is a violent revolution to overthrow the Indian state and establishment of Communist rule in India. Also, the annihilation of class enemies and to overthrow of Paramilitary democracy. Left-Wing Extremism (LWE)/Naxalism emerged after two decades of independence. The people of Naxalbari, a small village in Darjeeling District were facing hardships in the form of exploitation by the Zamindars, moneylenders and petty officials. During the struggle for independence, land reforms were high on the agenda of the government but the Government failed in its task of bringing the land reforms. This fuelled the discontent against the state among the people of Naxalbari in addition to their exploitation by the rich and the powerful. It is this discontent and continued exploitation that led to the evolution of a left-wing extremist movement referred to as the Naxalbari Movement. It was a violent movement that was agrarian in nature and was supported by the communist revolutionaries. The leaders of this movement including Charu Majumdar believed in violence and were inspired by the philosophy of Mao Zedong of China Causes for the rise of Naxalism in India: Land related issues - Failure of implementation of land reforms, forced evictions and displacement for developmental projects, mining; exploitation by money lenders and zamindars, etc Also implementation of strict forest laws such as the Forest Conservation Act, 1980, etc More than 40% of tribals/Adivasis were displaced as a result of mega power projects which comprise nearly 8% of the population Non-implementation of Constitutional measures related to affairs of Tribals - The provisions of Schedule 5, Article 244, Tribal Advisory Councils (TAC), etc have not been able to protect the rights of tribals as not implemented properly Also, violation of fundamental rights such as Article 14, 15, etc Denial of Social Justice - In Bihar specifically there was a rise to exploitation by the upper-caste; lack of justice and grievance redressal mechanism Vaccum of Governance - Lack of basic necessities are missing for example in Dantewada only around 15% of households have access to tap waters Educational facilities are abysmal and seem as if the government has abdicated its responsibility Absence of Physical and social infrastructure - Most of Naxal affected areas are remotely located with poor accessibility; Lack of hospitals, schools, etc Law and order - Vested interests of anti-social elements; support from external state actors like China such as arms, ammunition and funds Also, there is a criminal nexus between politicians, bureaucrats and Naxalites which has promoted Naxalism in India, etc Steps were taken by the government in this regard: SAMADHAN - stands for Smart leadership, Aggressive strategy, Motivation and training, Actionable Intelligence, Dashboard Based KPIs (key performance indicators) and KRAs (key result areas), Harnessing technology, an Action plan for each theatre, and No access to financing. Police Modernization Scheme in areas affected by Naxal movements. Mine Protected Vehicles (MPV) to reduce the number of casualties due to the use of IEDs by the Naxalites. Special Infrastructure Scheme for funds to the States of Bihar, Chhattisgarh, Jharkhand and Odisha to raise Special Task Force to combat LWE. Security Related Expenditure (SRE) Scheme: Under this the central Govt. reimburses security-related expenditure to the LWE affected state Governments. Aspirational District: Monitoring of Aspirational districts programme in 35 LWE affected districts, etc Apart from plugging all the above-mentioned loopholes in the present strategy of fighting Naxalism in India, this needs to be recognised by the civil society and the media to build pressure on the Left Wing Extremists to eschew violence, join the mainstream and recognise the fact that the socio-economic and political dynamics and aspirations of 21st Century India are far removed from the Maoist world-view.
##Question:What do you mean by Naxalism? Write the causes for the rise of Naxalism in India? (10 Marks/150 words)##Answer:Approach Introduce in brief about Left-Wing Extremism (LWE)/Naxalism In the body, causes for the rise of Naxalism in India Conclude briefly with steps taken by govt. Answer Left-Wing Extremism (LWE)/Naxalism is a powerful extremist movement targetted against the Indian state and has been referred to as the gravest internal security threat by the former PM of India As per the reports of the Ministry of Home Affairs, more than 13,000 people have lost their lives since the year 2000 as a result of Naxal violence. Naxalism as a movement slowly and gradually expanded from Naxalbari to more than 200 districts This region is affected by Naxal violence that extends from Andhra Pradesh in the South to Nepal bordering districts in Uttar Pradesh and Bihar is infamously referred to as Red Corridor ie from Tirupati to Pashupati, etc. The objective of Naxalism is a violent revolution to overthrow the Indian state and establishment of Communist rule in India. Also, the annihilation of class enemies and to overthrow of Paramilitary democracy. Left-Wing Extremism (LWE)/Naxalism emerged after two decades of independence. The people of Naxalbari, a small village in Darjeeling District were facing hardships in the form of exploitation by the Zamindars, moneylenders and petty officials. During the struggle for independence, land reforms were high on the agenda of the government but the Government failed in its task of bringing the land reforms. This fuelled the discontent against the state among the people of Naxalbari in addition to their exploitation by the rich and the powerful. It is this discontent and continued exploitation that led to the evolution of a left-wing extremist movement referred to as the Naxalbari Movement. It was a violent movement that was agrarian in nature and was supported by the communist revolutionaries. The leaders of this movement including Charu Majumdar believed in violence and were inspired by the philosophy of Mao Zedong of China Causes for the rise of Naxalism in India: Land related issues - Failure of implementation of land reforms, forced evictions and displacement for developmental projects, mining; exploitation by money lenders and zamindars, etc Also implementation of strict forest laws such as the Forest Conservation Act, 1980, etc More than 40% of tribals/Adivasis were displaced as a result of mega power projects which comprise nearly 8% of the population Non-implementation of Constitutional measures related to affairs of Tribals - The provisions of Schedule 5, Article 244, Tribal Advisory Councils (TAC), etc have not been able to protect the rights of tribals as not implemented properly Also, violation of fundamental rights such as Article 14, 15, etc Denial of Social Justice - In Bihar specifically there was a rise to exploitation by the upper-caste; lack of justice and grievance redressal mechanism Vaccum of Governance - Lack of basic necessities are missing for example in Dantewada only around 15% of households have access to tap waters Educational facilities are abysmal and seem as if the government has abdicated its responsibility Absence of Physical and social infrastructure - Most of Naxal affected areas are remotely located with poor accessibility; Lack of hospitals, schools, etc Law and order - Vested interests of anti-social elements; support from external state actors like China such as arms, ammunition and funds Also, there is a criminal nexus between politicians, bureaucrats and Naxalites which has promoted Naxalism in India, etc Steps were taken by the government in this regard: SAMADHAN - stands for Smart leadership, Aggressive strategy, Motivation and training, Actionable Intelligence, Dashboard Based KPIs (key performance indicators) and KRAs (key result areas), Harnessing technology, an Action plan for each theatre, and No access to financing. Police Modernization Scheme in areas affected by Naxal movements. Mine Protected Vehicles (MPV) to reduce the number of casualties due to the use of IEDs by the Naxalites. Special Infrastructure Scheme for funds to the States of Bihar, Chhattisgarh, Jharkhand and Odisha to raise Special Task Force to combat LWE. Security Related Expenditure (SRE) Scheme: Under this the central Govt. reimburses security-related expenditure to the LWE affected state Governments. Aspirational District: Monitoring of Aspirational districts programme in 35 LWE affected districts, etc Apart from plugging all the above-mentioned loopholes in the present strategy of fighting Naxalism in India, this needs to be recognised by the civil society and the media to build pressure on the Left Wing Extremists to eschew violence, join the mainstream and recognise the fact that the socio-economic and political dynamics and aspirations of 21st Century India are far removed from the Maoist world-view.
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संसाधनों के आबंटन से आप क्या समझते हैं? बाज़ार द्वारा संसाधनों के आबंटन के लाभ एवं चुनौतियों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) What do you understand by the allocation of resources? Discuss the benefits and challenges of allocation of resources by the market. (150-200 words)
Approach: भूमिका में संसाधनों के आबंटन को परिभाषित कीजिए। संसाधनों के आबंटन की प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए। बाज़ार द्वारा संसाधनों के आबंटन के लाभों की चर्चा कीजिए। इससे जुड़ी चुनौतियों को रेखांकित कीजिए। विशेषण कर संक्षिप्त निष्कर्ष प्रस्तुत कीजिए। उत्तर- किसी अर्थव्यवस्था में संसाधनों के आबंटन से तात्पर्य किस वस्तु एवं सेवा का कितनी मात्रा में उत्पादन किया जाये। संसाधनों का आबंटन किसी देश के आर्थिक विकास, कल्याण के स्तर तथा नागरिकों के विकास को निर्धारित करता है। संसाधनों का आबंटन मुख्य रूप से दो प्रकार से होता है – बाज़ार द्वारा संसाधनों का आबंटन -सरकार आर्थिक नियोजन के उपायों (यथा कर लाइसेन्स कोटा) द्वारा नियंत्रित करती है। सरकार द्वारा संसाधनों का आबंटन -बाज़ार तंत्र मांग पूर्ति के माध्यम से भी संसाधनों का आबंटन स्वत: होता है। बाज़ार तंत्र द्वारा संसाधनों के आबंटन के लाभ संसाधनों का उचित आबंटन होता है। संसाधनों का आबंटन समाज की समूहिक आवश्यकताओं या इच्छाओं के अनुसार होता है। संसाधनों के प्रयोग में कार्य कुशलता का समावेश होता है क्यूंकि तंत्र बाज़ार संचालित होता है। बाज़ार तंत्र प्रतिस्पर्धा की स्थिति में कार्यरत होता है जो फ़र्मों को कार्य कुशलता बढ़ाने हेतु बाध्य कर देता है। प्रतिस्पर्द्धा की स्थिति में अकुशल फ़र्में नहीं टिक पाती। बाज़ार तंत्र के अंतर्गत आर्थिक गतिविधियां निजी क्षेत्र में होती है जो स्वयं स्वार्थ से प्रेरित होता है अर्थात लाभ प्रेरित उत्पादन होता है। बाज़ार तंत्र द्वारा संसाधनों के आबंटन की चुनौतियाँ यह सामाजिक न्याय स्थापित नहीं कर सकता अर्थात बेरोजगारी निर्धनता असमानताओं आदि को कम नहीं कर सकता यह केवल मांग एवं पूर्ति के अंतराल को समाप्त कर सकता है। परंतु यह आवश्यकता एवं पूर्ति के अंतराल को दूर नहीं कर सकता। यह समष्टिगत आर्थिक समस्याओं जैसे कि दीर्घकालिक वृद्धि, सतत विकास, पर्यावरण संरक्षण, मूल्य स्थिरता, निर्धनता उन्मूलन आदि का समाधान नहीं कर सकता। बाज़ार तंत्र का एक संकीर्ण दृष्टिकोण होता है। अर्थात यह केवल विकसित क्षेत्रों में उच्च वर्ग की अल्पकालिक आवशयकताओं की ही पूर्ति कर पाता है। यह केवल प्रतिस्पर्द्धा की स्थिति में ही सक्रिय होता है जो सरकारी हस्तक्षेप के बिना स्थापित नहीं हो पाती। कुछ परिस्थितियों में जैसे कि बाहयताओं, अपूर्ण सूचना, नैसर्गिक एकाधिकार आदि की स्थिति में बाज़ार तंत्र संसाधनों का उचित आबंटन करने में विफल हो जाता है। पूर्ण रूप से बाज़ार तंत्र द्वारा संसाधनों के आबंटन की प्रक्रिया कल्याणकारी देशों में समावेशी विकास को बाधित करती है इसलिए कुछ संसाधनों के आबंटन में सरकार द्वारा हस्तक्षेप किया जाता है। उदाहरण के लिए भारत में मिश्रित रूप को अपनाया गया है।
##Question:संसाधनों के आबंटन से आप क्या समझते हैं? बाज़ार द्वारा संसाधनों के आबंटन के लाभ एवं चुनौतियों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) What do you understand by the allocation of resources? Discuss the benefits and challenges of allocation of resources by the market. (150-200 words)##Answer:Approach: भूमिका में संसाधनों के आबंटन को परिभाषित कीजिए। संसाधनों के आबंटन की प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए। बाज़ार द्वारा संसाधनों के आबंटन के लाभों की चर्चा कीजिए। इससे जुड़ी चुनौतियों को रेखांकित कीजिए। विशेषण कर संक्षिप्त निष्कर्ष प्रस्तुत कीजिए। उत्तर- किसी अर्थव्यवस्था में संसाधनों के आबंटन से तात्पर्य किस वस्तु एवं सेवा का कितनी मात्रा में उत्पादन किया जाये। संसाधनों का आबंटन किसी देश के आर्थिक विकास, कल्याण के स्तर तथा नागरिकों के विकास को निर्धारित करता है। संसाधनों का आबंटन मुख्य रूप से दो प्रकार से होता है – बाज़ार द्वारा संसाधनों का आबंटन -सरकार आर्थिक नियोजन के उपायों (यथा कर लाइसेन्स कोटा) द्वारा नियंत्रित करती है। सरकार द्वारा संसाधनों का आबंटन -बाज़ार तंत्र मांग पूर्ति के माध्यम से भी संसाधनों का आबंटन स्वत: होता है। बाज़ार तंत्र द्वारा संसाधनों के आबंटन के लाभ संसाधनों का उचित आबंटन होता है। संसाधनों का आबंटन समाज की समूहिक आवश्यकताओं या इच्छाओं के अनुसार होता है। संसाधनों के प्रयोग में कार्य कुशलता का समावेश होता है क्यूंकि तंत्र बाज़ार संचालित होता है। बाज़ार तंत्र प्रतिस्पर्धा की स्थिति में कार्यरत होता है जो फ़र्मों को कार्य कुशलता बढ़ाने हेतु बाध्य कर देता है। प्रतिस्पर्द्धा की स्थिति में अकुशल फ़र्में नहीं टिक पाती। बाज़ार तंत्र के अंतर्गत आर्थिक गतिविधियां निजी क्षेत्र में होती है जो स्वयं स्वार्थ से प्रेरित होता है अर्थात लाभ प्रेरित उत्पादन होता है। बाज़ार तंत्र द्वारा संसाधनों के आबंटन की चुनौतियाँ यह सामाजिक न्याय स्थापित नहीं कर सकता अर्थात बेरोजगारी निर्धनता असमानताओं आदि को कम नहीं कर सकता यह केवल मांग एवं पूर्ति के अंतराल को समाप्त कर सकता है। परंतु यह आवश्यकता एवं पूर्ति के अंतराल को दूर नहीं कर सकता। यह समष्टिगत आर्थिक समस्याओं जैसे कि दीर्घकालिक वृद्धि, सतत विकास, पर्यावरण संरक्षण, मूल्य स्थिरता, निर्धनता उन्मूलन आदि का समाधान नहीं कर सकता। बाज़ार तंत्र का एक संकीर्ण दृष्टिकोण होता है। अर्थात यह केवल विकसित क्षेत्रों में उच्च वर्ग की अल्पकालिक आवशयकताओं की ही पूर्ति कर पाता है। यह केवल प्रतिस्पर्द्धा की स्थिति में ही सक्रिय होता है जो सरकारी हस्तक्षेप के बिना स्थापित नहीं हो पाती। कुछ परिस्थितियों में जैसे कि बाहयताओं, अपूर्ण सूचना, नैसर्गिक एकाधिकार आदि की स्थिति में बाज़ार तंत्र संसाधनों का उचित आबंटन करने में विफल हो जाता है। पूर्ण रूप से बाज़ार तंत्र द्वारा संसाधनों के आबंटन की प्रक्रिया कल्याणकारी देशों में समावेशी विकास को बाधित करती है इसलिए कुछ संसाधनों के आबंटन में सरकार द्वारा हस्तक्षेप किया जाता है। उदाहरण के लिए भारत में मिश्रित रूप को अपनाया गया है।
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व्यापार और निवेश भारत और यूरोपीय संघ के बीच रणनीतिक साझेदारी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, फिर भी, इनके बीच व्यापक आधारित व्यापार और निवेश समझौता (BTIA) काफी समय से लंबित रहा है| इस संदर्भ में दोनों पक्षों के मध्य गतिरोध के विभिन्न मुद्दों को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द/10 अंक) Trade and investment is an important part of the strategic partnership between India and the European Union, yet the Broad-based Trade and Investment Agreement (BTIA) between them has been pending for a long time. In this context, Clarify the various issues of deadlock between the two sides. (150-200 words/10 Marks)
एप्रोच- भारत तथा यूरोपीय संघ के मध्य रणनीतिक साझेदारी के विभिन्न आयामों को बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में,व्यापक आधारित व्यापार और निवेश समझौता (BTIA) की पृष्ठभूमि को दर्शाते हुए, इस संदर्भ मेंदोनों पक्षों के मध्य गतिरोध के विभिन्न मुद्दों को स्पष्ट कीजिये| निष्कर्षतः, इस संदर्भ में आगे की राह के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- भारत तथा यूरोपीय संघ के मध्य संबंध 1960 के दशक से ही है तथा भारत यूरोपीय आर्थिक समुदाय के साथ आरंभिक राजनयिक संबंध स्थापित करने वाले आरंभिक राष्ट्रों में से एक है| 1994 में हस्ताक्षरित एक सहयोग समझौते ने द्विपक्षीय संबंधों को व्यापार और आर्थिक सहयोग से आगे पहुंचा दिया है| पहला भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन वर्ष 2000 में हुआ था तब से नियमित अंतराल पर कई ऐसे शिखर सम्मेलन होते आये हैं| भारतीय निर्यात के लिए यूरोपीय संघ एक बड़ा गंतव्य है तथा निवेश एवं अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों का एक प्रमुख स्रोत भी है|भारत-यूरोपीय संघ संबंधों की महता निम्न बिंदुओं से समझा जा सकता है- भारत के लिए यूरोपीय संघ की महत्ता सुरक्षा; ईरान,अफगानिस्तान के मुद्दे पर; व्यापार और निवेश; ऊर्जा सहयोग; जलवायु परिवर्तन; अनुसंधान और विकास; बहुध्रुवीय विश्व; संयुक्त राष्ट्र सुधार एजेंडे पर बल; यूरोपीय संघ के लिए भारत की महत्ता जनसँख्या के कारण वैश्विक ग्रोथ इंजन; निवेश के माध्यम से आधुनिक बनाने में सहयोग; सतत विकास सुनिश्चित करने में आर्थिक-तकनीकी सहयोग; जलवायु परिवर्तन- पेरिस समझौते का क्रियान्वयन; वैश्विक जैवविविधता फ्रेमवर्क(2020); नवीन तथा नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में; व्यापार तथा निवेश- बैलेंस्ड तथा परस्पर रूप से लाभकारी; इनोवेशन; भारत तथा यूरोपीय संघ के मध्य सहयोग के क्षेत्र EU-भारत सहयोग समझौता(1994); रणनीतिक साझेदार(2004 से); विदेश नीति एवं सुरक्षा सहयोग; शिखर सम्मेलन; नियमित मंत्रिस्तरीय बैठकें; साईबर सुरक्षा; नाभिकीय अप्रसार; निरस्त्रीकरण; आतंकवाद तथा पायरेसी के विरुद्ध कार्यवाही; व्यापार तथा निवेश सबसे बड़े व्यापारिक भागीदारों में से एक(भारत के कुल व्यापार में 13.2% हिस्सेदारी); EU भारत में दूसरा सबसे बड़ा निवेशक; EU भारतीय निर्यात हेतु प्रमुख गंतव्य; निवेश तथा प्रौद्योगिकी हेतु प्रमुख स्रोत; व्यापक क्षेत्रीय सहयोग एवं लोगों के मध्य संपर्क; ऊर्जा एवं जलवायु परिवर्तन; पर्यावरण; अनुसंधान एवं नवाचार; जैव प्रौद्योगिकी; डिजिटल अर्थव्यवस्था; संधारणीय शहरी विकास;सिटी टू सिटी सहयोग; जी-20 में घनिष्ट सहयोग; प्रवास एवं संचरण- EU-इंडिया कॉमन एजेंडा ऑन माइग्रेशन एंड मोबिलिटी(CAMM); इस संदर्भ में, भारत-EU 14वां वार्षिक शिखर सम्मेलन काफी महत्वपूर्ण स्थान रखता है| भारत-यूरोपीय संघ संबंधों के संदर्भ में महत्वपूर्ण चुनौतियाँ व्यापार रुकावटें(ट्रेड बैरियर) तथा बाजार पहुँच(मार्केट एक्सेस) पर EU का कम लचीला रुख; ब्रेक्जिट तथा EU में अनिश्चितता; सार्क, अफगानिस्तान, INSTC, संरक्षणवाद रुख को बढ़ावा; नो डील ब्रेक्जिट से व्यापार पर प्रभाव; ब्रिटेन में सबसे बड़ा निवेश जिससे अगर टैक्स लगाया जाए तो भारतीय व्यापार पर प्रतिकूल प्रभाव; भारत का पक्ष कि डील के साथब्रेक्जिट ताकि भारतीय हितों की रक्षा; ब्रॉड आधारित व्यापार और निवेश समझौते(BTIA) एवं भारत तथा यूरोपीय संघ के मध्य असहमति के विभिन्न आयाम डाटा संरक्षण तथा प्राइवेसी का मुद्दा; भारत द्वारा डाटा सुरक्षित राष्ट्र का दर्जा की मांग; उदार वीजानियमों को लेकर गतिरोध; सेवा में यूरोप का इच्छुक नहीं होना; फार्मास्यूटिकल्स; भारत का कुछ क्षेत्रों में वस्तु क्षेत्र में मुक्त व्यापार करने को इच्छुक नहीं जैसे- एल्कोहोल; ऑटोमोबाइल क्षेत्र आदि; यूरोपीय संघ द्वारा ऑटोमोबाइल के आयात शुल्क में उचित कटौती की मांग; वाइन, शराब और डेयरी उत्पादों पर कर कटौती; भारत द्वारा विभिन्न द्विपक्षीय निवेश समझौते रद्द करना; भारतीय कृषि उत्पादों के लिए टैरिफ बैरियर; EU का पक्ष तथा भारत का उसपर रुख; भारत की मांगे; यूरोपीय संघ द्वारा निवेशक राज्य विवाद निपटान(ISDS) और सैनिटरी एंड फाईटो सैनिटरी(SPS) मानकों पर कड़े मानदंड की मांग; भारत द्वारा कई द्विपक्षीय निवेश संधियों(BIT) को एकतरफा समाप्त करने से यूरोपियन निवेशकों में अपने निवेश के संदर्भ में असुरक्षा की भावना; भारत के मॉडलद्विपक्षीय निवेश संधि(BIT) परयूरोपियन निवेशकों की चिंताएं; बौद्धिक संपदा अधिकार(IPR) से जुड़ा मुद्दा; ब्रॉड आधारित व्यापार और निवेश समझौते(BTIA)के लाभ भारत को बड़ा बाजार मिलना; वीजा नियमों में आसानी; यूरोपियन निवेश में बढ़ोतरी; तकनीक तक पहुँच आदि; ब्रॉड आधारित व्यापार और निवेश समझौते(BTIA)के संदर्भ मेंआगे की राह ब्रेक्जिट के बाद EU के साथ वार्ता में ज्यादा नेगोशिएशन; सभी देशों के साथ अलग-अलग सहयोग आदि;
##Question:व्यापार और निवेश भारत और यूरोपीय संघ के बीच रणनीतिक साझेदारी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, फिर भी, इनके बीच व्यापक आधारित व्यापार और निवेश समझौता (BTIA) काफी समय से लंबित रहा है| इस संदर्भ में दोनों पक्षों के मध्य गतिरोध के विभिन्न मुद्दों को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द/10 अंक) Trade and investment is an important part of the strategic partnership between India and the European Union, yet the Broad-based Trade and Investment Agreement (BTIA) between them has been pending for a long time. In this context, Clarify the various issues of deadlock between the two sides. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच- भारत तथा यूरोपीय संघ के मध्य रणनीतिक साझेदारी के विभिन्न आयामों को बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में,व्यापक आधारित व्यापार और निवेश समझौता (BTIA) की पृष्ठभूमि को दर्शाते हुए, इस संदर्भ मेंदोनों पक्षों के मध्य गतिरोध के विभिन्न मुद्दों को स्पष्ट कीजिये| निष्कर्षतः, इस संदर्भ में आगे की राह के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- भारत तथा यूरोपीय संघ के मध्य संबंध 1960 के दशक से ही है तथा भारत यूरोपीय आर्थिक समुदाय के साथ आरंभिक राजनयिक संबंध स्थापित करने वाले आरंभिक राष्ट्रों में से एक है| 1994 में हस्ताक्षरित एक सहयोग समझौते ने द्विपक्षीय संबंधों को व्यापार और आर्थिक सहयोग से आगे पहुंचा दिया है| पहला भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन वर्ष 2000 में हुआ था तब से नियमित अंतराल पर कई ऐसे शिखर सम्मेलन होते आये हैं| भारतीय निर्यात के लिए यूरोपीय संघ एक बड़ा गंतव्य है तथा निवेश एवं अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों का एक प्रमुख स्रोत भी है|भारत-यूरोपीय संघ संबंधों की महता निम्न बिंदुओं से समझा जा सकता है- भारत के लिए यूरोपीय संघ की महत्ता सुरक्षा; ईरान,अफगानिस्तान के मुद्दे पर; व्यापार और निवेश; ऊर्जा सहयोग; जलवायु परिवर्तन; अनुसंधान और विकास; बहुध्रुवीय विश्व; संयुक्त राष्ट्र सुधार एजेंडे पर बल; यूरोपीय संघ के लिए भारत की महत्ता जनसँख्या के कारण वैश्विक ग्रोथ इंजन; निवेश के माध्यम से आधुनिक बनाने में सहयोग; सतत विकास सुनिश्चित करने में आर्थिक-तकनीकी सहयोग; जलवायु परिवर्तन- पेरिस समझौते का क्रियान्वयन; वैश्विक जैवविविधता फ्रेमवर्क(2020); नवीन तथा नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में; व्यापार तथा निवेश- बैलेंस्ड तथा परस्पर रूप से लाभकारी; इनोवेशन; भारत तथा यूरोपीय संघ के मध्य सहयोग के क्षेत्र EU-भारत सहयोग समझौता(1994); रणनीतिक साझेदार(2004 से); विदेश नीति एवं सुरक्षा सहयोग; शिखर सम्मेलन; नियमित मंत्रिस्तरीय बैठकें; साईबर सुरक्षा; नाभिकीय अप्रसार; निरस्त्रीकरण; आतंकवाद तथा पायरेसी के विरुद्ध कार्यवाही; व्यापार तथा निवेश सबसे बड़े व्यापारिक भागीदारों में से एक(भारत के कुल व्यापार में 13.2% हिस्सेदारी); EU भारत में दूसरा सबसे बड़ा निवेशक; EU भारतीय निर्यात हेतु प्रमुख गंतव्य; निवेश तथा प्रौद्योगिकी हेतु प्रमुख स्रोत; व्यापक क्षेत्रीय सहयोग एवं लोगों के मध्य संपर्क; ऊर्जा एवं जलवायु परिवर्तन; पर्यावरण; अनुसंधान एवं नवाचार; जैव प्रौद्योगिकी; डिजिटल अर्थव्यवस्था; संधारणीय शहरी विकास;सिटी टू सिटी सहयोग; जी-20 में घनिष्ट सहयोग; प्रवास एवं संचरण- EU-इंडिया कॉमन एजेंडा ऑन माइग्रेशन एंड मोबिलिटी(CAMM); इस संदर्भ में, भारत-EU 14वां वार्षिक शिखर सम्मेलन काफी महत्वपूर्ण स्थान रखता है| भारत-यूरोपीय संघ संबंधों के संदर्भ में महत्वपूर्ण चुनौतियाँ व्यापार रुकावटें(ट्रेड बैरियर) तथा बाजार पहुँच(मार्केट एक्सेस) पर EU का कम लचीला रुख; ब्रेक्जिट तथा EU में अनिश्चितता; सार्क, अफगानिस्तान, INSTC, संरक्षणवाद रुख को बढ़ावा; नो डील ब्रेक्जिट से व्यापार पर प्रभाव; ब्रिटेन में सबसे बड़ा निवेश जिससे अगर टैक्स लगाया जाए तो भारतीय व्यापार पर प्रतिकूल प्रभाव; भारत का पक्ष कि डील के साथब्रेक्जिट ताकि भारतीय हितों की रक्षा; ब्रॉड आधारित व्यापार और निवेश समझौते(BTIA) एवं भारत तथा यूरोपीय संघ के मध्य असहमति के विभिन्न आयाम डाटा संरक्षण तथा प्राइवेसी का मुद्दा; भारत द्वारा डाटा सुरक्षित राष्ट्र का दर्जा की मांग; उदार वीजानियमों को लेकर गतिरोध; सेवा में यूरोप का इच्छुक नहीं होना; फार्मास्यूटिकल्स; भारत का कुछ क्षेत्रों में वस्तु क्षेत्र में मुक्त व्यापार करने को इच्छुक नहीं जैसे- एल्कोहोल; ऑटोमोबाइल क्षेत्र आदि; यूरोपीय संघ द्वारा ऑटोमोबाइल के आयात शुल्क में उचित कटौती की मांग; वाइन, शराब और डेयरी उत्पादों पर कर कटौती; भारत द्वारा विभिन्न द्विपक्षीय निवेश समझौते रद्द करना; भारतीय कृषि उत्पादों के लिए टैरिफ बैरियर; EU का पक्ष तथा भारत का उसपर रुख; भारत की मांगे; यूरोपीय संघ द्वारा निवेशक राज्य विवाद निपटान(ISDS) और सैनिटरी एंड फाईटो सैनिटरी(SPS) मानकों पर कड़े मानदंड की मांग; भारत द्वारा कई द्विपक्षीय निवेश संधियों(BIT) को एकतरफा समाप्त करने से यूरोपियन निवेशकों में अपने निवेश के संदर्भ में असुरक्षा की भावना; भारत के मॉडलद्विपक्षीय निवेश संधि(BIT) परयूरोपियन निवेशकों की चिंताएं; बौद्धिक संपदा अधिकार(IPR) से जुड़ा मुद्दा; ब्रॉड आधारित व्यापार और निवेश समझौते(BTIA)के लाभ भारत को बड़ा बाजार मिलना; वीजा नियमों में आसानी; यूरोपियन निवेश में बढ़ोतरी; तकनीक तक पहुँच आदि; ब्रॉड आधारित व्यापार और निवेश समझौते(BTIA)के संदर्भ मेंआगे की राह ब्रेक्जिट के बाद EU के साथ वार्ता में ज्यादा नेगोशिएशन; सभी देशों के साथ अलग-अलग सहयोग आदि;
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"Indian National Congress was the culmination of other political movements in India." Explain. (10 marks/150 Words)
Structure:- 1. Introduction- Some background of political movements before INC 2. With examples, explain some political movements before the establishment of INC 3. How these political movements led to the establishments of INC Answer:- Though the Indian National Congress (INC) turned out to be the most influential political organization after 1885, yet there were many other political movements before that which paved the way for a pan Indian movement in the form of INC. Political movements before 1885:- 1. Bengal Landholder"s Society,1838:- It was the first political organization which introduced organized efforts and constitutional remedies for complaints. Its main purpose was to secure the interests of landlords. Other aims were-(1) securing a halt to the resumption of rent-free tenures (2)the grant of lease of wasteland to their occupants. Though Landholders" Society failed in areas, where the Permanent Settlement was not implemented.( except Bengal 2. The Bengal British India Society:-It was founded in 1843 and the main object was to collect and disseminate the information relating to the actual condition of the people of British India and to secure the welfare, extend the just rights and advance the interests of all classes of our fellow-subjects” 3. Bombay Presidency Association- Started by Firoz Shah Mehta in 1885 which later merged in Indian National Congress. 4. Poona Sarvajanik Sabha:- It was founded in 1867 by Mahadeo Govind Ranade and others. The main objective of this was to serve as a bridge between the Government on the one hand and the people on the other. There were few other political organizations in Madras as well such as Madras Mahajan Sabha, The East Indian Association etc. The sole objective of these was to work in the direction of the welfare of Indian masses. All the above-mentioned organizations were regional in their character and area of influence. Hence they witnessed limited successes only. In 1885, many leaders from all over India came together and formed a new Pan Indian Party known as the Indian National Congress with the pioneer efforts of A.O. Hume. The main objectives of INC in initial years were (1) To eradicate all the prevailing cast, creed, race or province related prejudices from the country.(2)To strengthen the feelings of National unity (3) To formulate guidelines for future plan of action in the public interest. As can be seen that the objective of these movements was to take steps for the welfare of Indian citizens in constitutional manners only. INC was a wider representation of all other regional movements to serve the larger interest. Hence, it is also called the Culmination of other political movements in India
##Question:"Indian National Congress was the culmination of other political movements in India." Explain. (10 marks/150 Words)##Answer:Structure:- 1. Introduction- Some background of political movements before INC 2. With examples, explain some political movements before the establishment of INC 3. How these political movements led to the establishments of INC Answer:- Though the Indian National Congress (INC) turned out to be the most influential political organization after 1885, yet there were many other political movements before that which paved the way for a pan Indian movement in the form of INC. Political movements before 1885:- 1. Bengal Landholder"s Society,1838:- It was the first political organization which introduced organized efforts and constitutional remedies for complaints. Its main purpose was to secure the interests of landlords. Other aims were-(1) securing a halt to the resumption of rent-free tenures (2)the grant of lease of wasteland to their occupants. Though Landholders" Society failed in areas, where the Permanent Settlement was not implemented.( except Bengal 2. The Bengal British India Society:-It was founded in 1843 and the main object was to collect and disseminate the information relating to the actual condition of the people of British India and to secure the welfare, extend the just rights and advance the interests of all classes of our fellow-subjects” 3. Bombay Presidency Association- Started by Firoz Shah Mehta in 1885 which later merged in Indian National Congress. 4. Poona Sarvajanik Sabha:- It was founded in 1867 by Mahadeo Govind Ranade and others. The main objective of this was to serve as a bridge between the Government on the one hand and the people on the other. There were few other political organizations in Madras as well such as Madras Mahajan Sabha, The East Indian Association etc. The sole objective of these was to work in the direction of the welfare of Indian masses. All the above-mentioned organizations were regional in their character and area of influence. Hence they witnessed limited successes only. In 1885, many leaders from all over India came together and formed a new Pan Indian Party known as the Indian National Congress with the pioneer efforts of A.O. Hume. The main objectives of INC in initial years were (1) To eradicate all the prevailing cast, creed, race or province related prejudices from the country.(2)To strengthen the feelings of National unity (3) To formulate guidelines for future plan of action in the public interest. As can be seen that the objective of these movements was to take steps for the welfare of Indian citizens in constitutional manners only. INC was a wider representation of all other regional movements to serve the larger interest. Hence, it is also called the Culmination of other political movements in India
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नाभिकीय प्रौद्योगिकी के विभिन्न सामाजिक-आर्थिक अनुप्रयोगों की चर्चा करते हुए, इसके उपयोग से होने वाले लाभों का संक्षिप्त विवरण दीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक ) While discussing various socio-economic applications of nuclear technology, briefly explain the benefits of its use. (150-200 words/10 marks)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत नाभिकीय प्रौद्योगिकी के बारे में बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात नाभिकीय प्रौद्योगिकी के विभिन्न लाभों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत में परमाणु ऊर्जा विभाग के अंतर्गत नाभिकीय प्रौद्योगिकी का प्रयोग भविष्य के ऊर्जा संबंधी चुनौतियों, कृषि क्षेत्र, चिकित्सा क्षेत्र, उद्योगों, अवशिष्ट निपटान, आदि समस्या के समाधान के लिए अनुसंधान कार्य को आगे बढ़ाने के लिए किया गया है | नाभिकीय प्रौद्योगिकी के सामाजिक -आर्थिक लाभ एवं अनुप्रयोग चिकित्सा क्षेत्र में - रेडियो ट्रेसर द्वारा रोगों का पता लगाना | उदहारण - कैंसर का पता लगाना, उदर अल्सर, ह्रदय रोग, थायरायड रोग, हड्डियों का रोग, आदि | PET- पॉज़िट्रान एमिसन टोमोग्राफी तथा सिंगल फोटोन एमिसन कंप्यूटेड टोमोग्राफी, स्कैनिंग मशीनों की सहायता से कैंसर अथवा अन्य रोगों का पता लगाना | कैंसर के इलाज के लिए भाभाट्रोंन टेली -थेरेपी मशीन जोकि कोबाल्ट-60 रेडियो आइसोटोप के माध्यम से गामा-विकिरण उत्पन्न करता है | ग्रीन लेजर द्वारा डायबेटिक रेटिनोपैथी का इलाज | कृषि क्षेत्र में- गामा- विकिरण द्वारा खाद्य प्रसंस्करण | इससे लाभ- खाद्य खराब नहीं होता, कीटाणुनाशक होता है, लम्बे समय तक संग्रह किया जा सकता है | उदहारण - गरम मसाला, रवा, सूजी, आम, मांस, मछली, आदि | उच्च पैदावार/उत्पादन फसलों को विकिरण तकनीक द्वारा विकसित करना | उदाहरण- मूंगफली, दूबराज, चावल, सरसों, जूट, दाल, आदि | सेस्बनिया रोस्ट्राटा - दलहनी पौधा है, जिसकी जड़ों की गांठों में सहजीवी राइजोबियम जीवाणु पाया जाता है | इसका उपयोग जैव-उर्वरक के रूप में किया जाता है | उद्योग क्षेत्र में - रोलि कैमरा के उपयोग द्वारा धातुओं में किसी प्रकार का छोटा से छोटा क्षिद्र अथवा कच्चा तेल एवं गैस पाइपलाइन में रिसाव का पता लगाना | लेजर का औद्योगिक उपयोग | त्वरक एवं साइक्लोट्रोंन द्वारा इलेक्ट्रान/प्रोटान बीम उत्पन्न करना | रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी की सहायता से धातुओं अथवा धातु रसायन/ रसायन मिश्रण का अध्ययन | साथ ही बंदरगाह में अवसाद/गाद का निक्षेपण का अध्ययन किया जाता है | पर्यावरण के क्षेत्र में - IREMON - इंडियन रेडिएशन मोनिटरिंग नेटवर्क भारतीय विकिरण निगरानी नेटवर्क - नाभिकीय रिएक्टरों के आस-पास विकिरण सम्बंधित आंकड़ों का संग्रह करना एवं जानकारी उपलब्ध कराना | निसर्ण रूणा - नगरपालिका जैविक ठोस अपशिष्ट शुद्धिकरण - बायो-मिथिनेशन प्लांट जिससे मीथेन गैस बनता है, जिसका खाना पकाने में, पानी गर्म करने में, भाप द्वारा टरबाइन चलाकर विद्युत उत्पादन, आदि में उपयोग किया जा सकता है | इसके आलावा मीथेन गैस को वाहन के ईंधन के लिए उपयोग किया जा सकता है | शुद्धिकरण के बाद बचे हुए अवशिष्ट मलबा का खेती में खाद के रूप में उपयोग किया जा सकता है | नाभिकीय प्रौद्योगिकी का विकास तथा अनुसंधान सावधानीपूर्वक करने से भविष्य की कई समस्यायों का समाधान किया जा सकता है | किन्तु शर्त यह है कि अनुसंधान कार्य मानव कल्याण के लिए किये जाए न कि अत्याधुनिक हथियारों के निर्माण कार्य में |
##Question:नाभिकीय प्रौद्योगिकी के विभिन्न सामाजिक-आर्थिक अनुप्रयोगों की चर्चा करते हुए, इसके उपयोग से होने वाले लाभों का संक्षिप्त विवरण दीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक ) While discussing various socio-economic applications of nuclear technology, briefly explain the benefits of its use. (150-200 words/10 marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत नाभिकीय प्रौद्योगिकी के बारे में बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात नाभिकीय प्रौद्योगिकी के विभिन्न लाभों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत में परमाणु ऊर्जा विभाग के अंतर्गत नाभिकीय प्रौद्योगिकी का प्रयोग भविष्य के ऊर्जा संबंधी चुनौतियों, कृषि क्षेत्र, चिकित्सा क्षेत्र, उद्योगों, अवशिष्ट निपटान, आदि समस्या के समाधान के लिए अनुसंधान कार्य को आगे बढ़ाने के लिए किया गया है | नाभिकीय प्रौद्योगिकी के सामाजिक -आर्थिक लाभ एवं अनुप्रयोग चिकित्सा क्षेत्र में - रेडियो ट्रेसर द्वारा रोगों का पता लगाना | उदहारण - कैंसर का पता लगाना, उदर अल्सर, ह्रदय रोग, थायरायड रोग, हड्डियों का रोग, आदि | PET- पॉज़िट्रान एमिसन टोमोग्राफी तथा सिंगल फोटोन एमिसन कंप्यूटेड टोमोग्राफी, स्कैनिंग मशीनों की सहायता से कैंसर अथवा अन्य रोगों का पता लगाना | कैंसर के इलाज के लिए भाभाट्रोंन टेली -थेरेपी मशीन जोकि कोबाल्ट-60 रेडियो आइसोटोप के माध्यम से गामा-विकिरण उत्पन्न करता है | ग्रीन लेजर द्वारा डायबेटिक रेटिनोपैथी का इलाज | कृषि क्षेत्र में- गामा- विकिरण द्वारा खाद्य प्रसंस्करण | इससे लाभ- खाद्य खराब नहीं होता, कीटाणुनाशक होता है, लम्बे समय तक संग्रह किया जा सकता है | उदहारण - गरम मसाला, रवा, सूजी, आम, मांस, मछली, आदि | उच्च पैदावार/उत्पादन फसलों को विकिरण तकनीक द्वारा विकसित करना | उदाहरण- मूंगफली, दूबराज, चावल, सरसों, जूट, दाल, आदि | सेस्बनिया रोस्ट्राटा - दलहनी पौधा है, जिसकी जड़ों की गांठों में सहजीवी राइजोबियम जीवाणु पाया जाता है | इसका उपयोग जैव-उर्वरक के रूप में किया जाता है | उद्योग क्षेत्र में - रोलि कैमरा के उपयोग द्वारा धातुओं में किसी प्रकार का छोटा से छोटा क्षिद्र अथवा कच्चा तेल एवं गैस पाइपलाइन में रिसाव का पता लगाना | लेजर का औद्योगिक उपयोग | त्वरक एवं साइक्लोट्रोंन द्वारा इलेक्ट्रान/प्रोटान बीम उत्पन्न करना | रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी की सहायता से धातुओं अथवा धातु रसायन/ रसायन मिश्रण का अध्ययन | साथ ही बंदरगाह में अवसाद/गाद का निक्षेपण का अध्ययन किया जाता है | पर्यावरण के क्षेत्र में - IREMON - इंडियन रेडिएशन मोनिटरिंग नेटवर्क भारतीय विकिरण निगरानी नेटवर्क - नाभिकीय रिएक्टरों के आस-पास विकिरण सम्बंधित आंकड़ों का संग्रह करना एवं जानकारी उपलब्ध कराना | निसर्ण रूणा - नगरपालिका जैविक ठोस अपशिष्ट शुद्धिकरण - बायो-मिथिनेशन प्लांट जिससे मीथेन गैस बनता है, जिसका खाना पकाने में, पानी गर्म करने में, भाप द्वारा टरबाइन चलाकर विद्युत उत्पादन, आदि में उपयोग किया जा सकता है | इसके आलावा मीथेन गैस को वाहन के ईंधन के लिए उपयोग किया जा सकता है | शुद्धिकरण के बाद बचे हुए अवशिष्ट मलबा का खेती में खाद के रूप में उपयोग किया जा सकता है | नाभिकीय प्रौद्योगिकी का विकास तथा अनुसंधान सावधानीपूर्वक करने से भविष्य की कई समस्यायों का समाधान किया जा सकता है | किन्तु शर्त यह है कि अनुसंधान कार्य मानव कल्याण के लिए किये जाए न कि अत्याधुनिक हथियारों के निर्माण कार्य में |
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The issues in the economic engagement between India- USA can be identified as a result of the respective interests of both sides and the transactional approach adopted by the USA. Comment (150 words/ 10 marks)
Approach:- In the introduction, mention the economic engagement between India-USA Then mention some potential/facts related to the India-USA In the body part, mention the issues related to India-USA economic engagement Then suggest a way forward Answer :- The USA is India"s largest trading partner and also its largest export market. India- USA trade in 2021 stood close to $160bn with $102 bn US of export by India of both goods and services to the US market. Economic engagement Between India-USA The potential for trade between these two economies is high given the substantial size of the market on both sides. The economic ties spanning across investments through FDI and development corporation is also substantial. The aim in this context is to expand trade for instance according to commerce minister Mr. Piyush Goyal, India- USA trade can easily achieve the level of 500-600 bn dollars by 2030. Issues can be identified as a part of broader economic engagement between the two sides Issues arising out of the previous administration in the USA- Withdrawing the GSP benefits according to India, and re-classification of India out of the developing states category by the USTR The issue regarding market access difficulties and resultant trade deficit highlighted by the USA from time to time- Capping off the prices of medical devices, High tariff Issues pertaining to the IPR regime where the USTR report called "Special 301 report" has kept India on its priority watch list consistently Over the years India and USA have taken their concerns to WTO.- In 2013, the USA complained about the domestic procurement of solar panels Given the large no. of Indian professionals moving to the US for work, the impact of changing the immigration policy of the US on the migration and mobility of Indians has been an area of importance for India. Going forward, the issue of data flow and data governance as well as regulation of e-commerce and taxation in this context would require greater clarity on both sides. Way forward Issues between India and US have to be seen in the larger context of their growing convergence and the strategic nature of their relations In the above context, dialogue in the spirit of friendly difference at a platform such as a trade policy forum needs to continue Both sides would need to understand and adjust to some of the differences like on data and IPR as long-term The economic element should not be reduced to trade figures alone rather these should be seen in the terms of newer issues that emerged such as increasing defense trade, energy purchases by India from the US, growing investments, development corporations, etc The WTO has been an important part of the rules-based trading order supported by both sides. In this context, working to improve and sustain this order is a responsibility of both, but the onus lies more with the USA.
##Question:The issues in the economic engagement between India- USA can be identified as a result of the respective interests of both sides and the transactional approach adopted by the USA. Comment (150 words/ 10 marks)##Answer:Approach:- In the introduction, mention the economic engagement between India-USA Then mention some potential/facts related to the India-USA In the body part, mention the issues related to India-USA economic engagement Then suggest a way forward Answer :- The USA is India"s largest trading partner and also its largest export market. India- USA trade in 2021 stood close to $160bn with $102 bn US of export by India of both goods and services to the US market. Economic engagement Between India-USA The potential for trade between these two economies is high given the substantial size of the market on both sides. The economic ties spanning across investments through FDI and development corporation is also substantial. The aim in this context is to expand trade for instance according to commerce minister Mr. Piyush Goyal, India- USA trade can easily achieve the level of 500-600 bn dollars by 2030. Issues can be identified as a part of broader economic engagement between the two sides Issues arising out of the previous administration in the USA- Withdrawing the GSP benefits according to India, and re-classification of India out of the developing states category by the USTR The issue regarding market access difficulties and resultant trade deficit highlighted by the USA from time to time- Capping off the prices of medical devices, High tariff Issues pertaining to the IPR regime where the USTR report called "Special 301 report" has kept India on its priority watch list consistently Over the years India and USA have taken their concerns to WTO.- In 2013, the USA complained about the domestic procurement of solar panels Given the large no. of Indian professionals moving to the US for work, the impact of changing the immigration policy of the US on the migration and mobility of Indians has been an area of importance for India. Going forward, the issue of data flow and data governance as well as regulation of e-commerce and taxation in this context would require greater clarity on both sides. Way forward Issues between India and US have to be seen in the larger context of their growing convergence and the strategic nature of their relations In the above context, dialogue in the spirit of friendly difference at a platform such as a trade policy forum needs to continue Both sides would need to understand and adjust to some of the differences like on data and IPR as long-term The economic element should not be reduced to trade figures alone rather these should be seen in the terms of newer issues that emerged such as increasing defense trade, energy purchases by India from the US, growing investments, development corporations, etc The WTO has been an important part of the rules-based trading order supported by both sides. In this context, working to improve and sustain this order is a responsibility of both, but the onus lies more with the USA.
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Oceanic Crustal rocks are much younger than the continental crust rocks. Explain with the help of the concept of sea floor spreading. (200 words)
Approach 1. Introduction: Briefly discuss the earlier ideas related to the age of oceanic and continental crust. 2. Central Body: (a) Explain the Seafloor spreading theory very briefly. (b)Show how Oceanic crust is younger than continental crust with the help of seafloor spreading. 3. Conclusion: Conclude with a closing line about the renewal of oceanic crust. Answer Earlier it was believed that Continental crust is floating over Oceanic crust hence oceanic crust must be older than the continental crust. But Seafloor spreading theory sheds more light on the age of the oceanic and continental crust. The seafloor spreading hypothesis was proposed by the American geophysicist Harry H. Hess in 1960.By the use of the sonar, Hess was able to map the ocean floor and discovered the mid-Atlantic ridge (mid-ocean ridge). Pieces of evidence in support of Seafloor spreading - 1.Molten material - Hess’s discovery on the warmer temperature near the mid-Atlantic ridge when he began the ocean mapping, led to his evidence about the molten material underneath the ocean. 2.Seafloor drill - The samples obtained from the seafloor drill reveals that the rocks away from the mid-oceanic ridge were relatively older than the rocks near to it. The old rocks were also denser and thicker compared to the thinner and less dense rocks in the mid-oceanic ridge. 3.Radiometric age dating and fossil ages 4.Magnetic stripes- The patterns of the magnetic field were compared to the rocks to determine its approximate ages. The investigation of the mid-ocean-ridge, using the magnetic stripes resulted in the three discoveries. First, stripes of normal and reversed polarity were alternate across the bottom of the ocean. Second, the alternate stripes of normal and reversed polarity formed a mirror image to the other side of the ridge. The third is the abrupt ending of stripes when it reached the edge of the continent or an ocean trench. Hess postulatedthat The mid-ocean ridge is the region where new oceanic crust is created.The oceanic crust is composed ofrocksthat move away from the ridge as new crust is being formed.The formation of the new crust is due to the rising of the molten material (magma) from the mantle by convection current.When the molten magma reaches the oceanic crust, it cools and pushes away the existing rocks from the ridge equally in both directions. A younger oceanic crustis then formed, causing the spread of the ocean floor.The new rock is dense but not as dense as the old rock that moves away from the ridge.As the rock moves, further, it becomes colder and denser until it reaches an ocean trench or continues spreading. It is believed that the successive movement of the rocks from the ridge progressively increases the ocean depth and have greater depths in the ocean trenches.Seafloor spreading leads to the renewal of the ocean floor in every 200 million years, a period of time for building a mid-ocean ridge, moving away across the ocean and subduction into a trench. Hence the cyclic construction of the crust at the mid-oceanic ridge and destruction at the trenches cause renewal of the Oceanic crust and because of this, the oceanic crust is much younger than the continental crust.
##Question:Oceanic Crustal rocks are much younger than the continental crust rocks. Explain with the help of the concept of sea floor spreading. (200 words)##Answer: Approach 1. Introduction: Briefly discuss the earlier ideas related to the age of oceanic and continental crust. 2. Central Body: (a) Explain the Seafloor spreading theory very briefly. (b)Show how Oceanic crust is younger than continental crust with the help of seafloor spreading. 3. Conclusion: Conclude with a closing line about the renewal of oceanic crust. Answer Earlier it was believed that Continental crust is floating over Oceanic crust hence oceanic crust must be older than the continental crust. But Seafloor spreading theory sheds more light on the age of the oceanic and continental crust. The seafloor spreading hypothesis was proposed by the American geophysicist Harry H. Hess in 1960.By the use of the sonar, Hess was able to map the ocean floor and discovered the mid-Atlantic ridge (mid-ocean ridge). Pieces of evidence in support of Seafloor spreading - 1.Molten material - Hess’s discovery on the warmer temperature near the mid-Atlantic ridge when he began the ocean mapping, led to his evidence about the molten material underneath the ocean. 2.Seafloor drill - The samples obtained from the seafloor drill reveals that the rocks away from the mid-oceanic ridge were relatively older than the rocks near to it. The old rocks were also denser and thicker compared to the thinner and less dense rocks in the mid-oceanic ridge. 3.Radiometric age dating and fossil ages 4.Magnetic stripes- The patterns of the magnetic field were compared to the rocks to determine its approximate ages. The investigation of the mid-ocean-ridge, using the magnetic stripes resulted in the three discoveries. First, stripes of normal and reversed polarity were alternate across the bottom of the ocean. Second, the alternate stripes of normal and reversed polarity formed a mirror image to the other side of the ridge. The third is the abrupt ending of stripes when it reached the edge of the continent or an ocean trench. Hess postulatedthat The mid-ocean ridge is the region where new oceanic crust is created.The oceanic crust is composed ofrocksthat move away from the ridge as new crust is being formed.The formation of the new crust is due to the rising of the molten material (magma) from the mantle by convection current.When the molten magma reaches the oceanic crust, it cools and pushes away the existing rocks from the ridge equally in both directions. A younger oceanic crustis then formed, causing the spread of the ocean floor.The new rock is dense but not as dense as the old rock that moves away from the ridge.As the rock moves, further, it becomes colder and denser until it reaches an ocean trench or continues spreading. It is believed that the successive movement of the rocks from the ridge progressively increases the ocean depth and have greater depths in the ocean trenches.Seafloor spreading leads to the renewal of the ocean floor in every 200 million years, a period of time for building a mid-ocean ridge, moving away across the ocean and subduction into a trench. Hence the cyclic construction of the crust at the mid-oceanic ridge and destruction at the trenches cause renewal of the Oceanic crust and because of this, the oceanic crust is much younger than the continental crust.
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19वीं शताब्दी के भारतीय सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन का संक्षिप्त परिचय देते हुए इसके उदय के कारणों की चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द/10 अंक ) Give a brief introduction of the 19th-century Indian socio-religious reform movement and discuss the reasons for its rise. (150-200 words/ 10 Marks)
दृष्टिकोण : 19वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन के उदय के कारणों की चर्चा कीजिये । इसके महत्व की संक्षिप्त चर्चा करते हुए संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : आधुनिक भारत के इतिहास में 19वीं शताब्दी का सामाजिक-धार्मिक आंदोलन एक परिवर्तन बिन्दु के समान है । वास्तविक अर्थों में एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में भारत निर्माण की प्रक्रिया इसी सामाजिक-धार्मिक आंदोलन के साथ प्रारम्भ होती है । 19वीं सदी के प्रारंभिक दशकों में ही व्यक्तिगत रूप से पहले क्षेत्रीय स्तर पर और आगे चलकर राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक धार्मिक सुधार के मुद्दों के लिए कदम उठाए गए । इसके अंतर्गत अशिक्षा, छुआछूत, महिलों से संबन्धित समस्याएँ एवं पुरोहितवाद, अंधविश्वास, कर्मकांड इत्यादि सामाजिक-धार्मिक कुरीतियों को दूर करने के लिए कदम उठाए गए । इन कुरीतियों का संबंध भारत में स्थापित कई धर्मों से था । अतः हिन्दू धर्म के साथ इस्लाम, पारसी , सिख आदि धर्मों में भी सुधारों के लिए प्रयास किए गए । सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन के उदय के कारण : शिक्षा व आधुनिक विचारों का प्रभाव : ब्रिटिश सरकार के द्वारा साम्राज्यवादी हितों से प्रभावित होकर आधुनिक शिक्षा की शुरुआत की गयी । साथ ही ईसाई मिशनरियों तथा भारतीय बुद्धिजीवियों ने भी शिक्षा के विकास के लिए प्रयास किया ।शिक्षा के साथ ही आधुनिक विचारों का प्रसार हुआ । जैसे- समानता,स्वतंत्रता , मानववाद, व्यक्तिवाद, पंथनिरपेक्ष दृष्टिकोण , वैज्ञानिक व तार्किक चिंतन , इत्यादि । इन्हीं विचारों के प्रभाव में भारतीय सामाजिक-धार्मिक जीवन का आलोचनात्मक विश्लेषण प्रारम्भ हुआ तथा सुधारों की बुनियाद रखी गयी । ब्रिटिश सरकार की श्रेष्ठता की नीति का प्रभाव : शिक्षा के साथ-साथ पाश्चात्य श्रेष्ठता तथा रंगभेद की नीति ने भी भारतीयों को चिंतन के लिए बाध्य किया तथा पाश्चात्य प्रभावों ने सुधार के लिए प्रेरित किया । सुधारों में कुछ अन्य सहयोगी कारकों की भी भूमिका थी । जैसे- भारतीय धर्मग्रंथों का अँग्रेजी भाषा में अनुवाद तथा अधिकाधिक पुस्तकों की उपलब्धत्ता , प्राच्यवादियों का दृष्टिकोण, प्रेस की भूमिका इत्यादि । इन कारकों ने एकतरफ सामाजिक-धार्मिक कुरीतियों तथा धर्मग्रंथों के बीच सम्बन्धों को समझने में योगदान दिया तो दूसरी तरफ अतित की उपलब्धियों से परिचय कराया और आत्मगौरव की भावना का संचार किया । इससे भारतीय अपनी वर्तमान की दुर्दशा को सुधारने के लिए आगे आए । ब्रिटिश सरकार के साथ क्रमशः कानून का शासन एवं कानून के समक्ष समानता की अवधारणा लोकप्रिय हुई । इसके अतिरिक्त रेलवे तथा परिवहन के अन्य साधनों ने भी जनमानस के सामाजिक दृष्टिकोण को प्रभावित किया । प्रारंभिक दौर में राममोहन राय, हेनरी वीवियन डेरीजियों, ज्योतिबा फुले जैसे सुधारकों ने सुधारों के लिए साहासिक पहल की और आगामी पीढ़ी को प्रेरित व प्रभावित किया । भारत में आधुनिक राष्ट्रवाद का उदय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में हुआ और सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन ने इस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के उदय में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । इस सुधार आंदोलन और इसके प्रमुख नेताओं ने धर्म व समाज के साथ-साथ शिक्षा, राजनीति , राष्ट्रीयता आदि के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । अतः इसे आधुनिक भारत का एक महत्वपूर्ण प्रस्थान बिन्दु स्वीकार करना उचित प्रतीत होता है ।
##Question:19वीं शताब्दी के भारतीय सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन का संक्षिप्त परिचय देते हुए इसके उदय के कारणों की चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द/10 अंक ) Give a brief introduction of the 19th-century Indian socio-religious reform movement and discuss the reasons for its rise. (150-200 words/ 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण : 19वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन के उदय के कारणों की चर्चा कीजिये । इसके महत्व की संक्षिप्त चर्चा करते हुए संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : आधुनिक भारत के इतिहास में 19वीं शताब्दी का सामाजिक-धार्मिक आंदोलन एक परिवर्तन बिन्दु के समान है । वास्तविक अर्थों में एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में भारत निर्माण की प्रक्रिया इसी सामाजिक-धार्मिक आंदोलन के साथ प्रारम्भ होती है । 19वीं सदी के प्रारंभिक दशकों में ही व्यक्तिगत रूप से पहले क्षेत्रीय स्तर पर और आगे चलकर राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक धार्मिक सुधार के मुद्दों के लिए कदम उठाए गए । इसके अंतर्गत अशिक्षा, छुआछूत, महिलों से संबन्धित समस्याएँ एवं पुरोहितवाद, अंधविश्वास, कर्मकांड इत्यादि सामाजिक-धार्मिक कुरीतियों को दूर करने के लिए कदम उठाए गए । इन कुरीतियों का संबंध भारत में स्थापित कई धर्मों से था । अतः हिन्दू धर्म के साथ इस्लाम, पारसी , सिख आदि धर्मों में भी सुधारों के लिए प्रयास किए गए । सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन के उदय के कारण : शिक्षा व आधुनिक विचारों का प्रभाव : ब्रिटिश सरकार के द्वारा साम्राज्यवादी हितों से प्रभावित होकर आधुनिक शिक्षा की शुरुआत की गयी । साथ ही ईसाई मिशनरियों तथा भारतीय बुद्धिजीवियों ने भी शिक्षा के विकास के लिए प्रयास किया ।शिक्षा के साथ ही आधुनिक विचारों का प्रसार हुआ । जैसे- समानता,स्वतंत्रता , मानववाद, व्यक्तिवाद, पंथनिरपेक्ष दृष्टिकोण , वैज्ञानिक व तार्किक चिंतन , इत्यादि । इन्हीं विचारों के प्रभाव में भारतीय सामाजिक-धार्मिक जीवन का आलोचनात्मक विश्लेषण प्रारम्भ हुआ तथा सुधारों की बुनियाद रखी गयी । ब्रिटिश सरकार की श्रेष्ठता की नीति का प्रभाव : शिक्षा के साथ-साथ पाश्चात्य श्रेष्ठता तथा रंगभेद की नीति ने भी भारतीयों को चिंतन के लिए बाध्य किया तथा पाश्चात्य प्रभावों ने सुधार के लिए प्रेरित किया । सुधारों में कुछ अन्य सहयोगी कारकों की भी भूमिका थी । जैसे- भारतीय धर्मग्रंथों का अँग्रेजी भाषा में अनुवाद तथा अधिकाधिक पुस्तकों की उपलब्धत्ता , प्राच्यवादियों का दृष्टिकोण, प्रेस की भूमिका इत्यादि । इन कारकों ने एकतरफ सामाजिक-धार्मिक कुरीतियों तथा धर्मग्रंथों के बीच सम्बन्धों को समझने में योगदान दिया तो दूसरी तरफ अतित की उपलब्धियों से परिचय कराया और आत्मगौरव की भावना का संचार किया । इससे भारतीय अपनी वर्तमान की दुर्दशा को सुधारने के लिए आगे आए । ब्रिटिश सरकार के साथ क्रमशः कानून का शासन एवं कानून के समक्ष समानता की अवधारणा लोकप्रिय हुई । इसके अतिरिक्त रेलवे तथा परिवहन के अन्य साधनों ने भी जनमानस के सामाजिक दृष्टिकोण को प्रभावित किया । प्रारंभिक दौर में राममोहन राय, हेनरी वीवियन डेरीजियों, ज्योतिबा फुले जैसे सुधारकों ने सुधारों के लिए साहासिक पहल की और आगामी पीढ़ी को प्रेरित व प्रभावित किया । भारत में आधुनिक राष्ट्रवाद का उदय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में हुआ और सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन ने इस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के उदय में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । इस सुधार आंदोलन और इसके प्रमुख नेताओं ने धर्म व समाज के साथ-साथ शिक्षा, राजनीति , राष्ट्रीयता आदि के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । अतः इसे आधुनिक भारत का एक महत्वपूर्ण प्रस्थान बिन्दु स्वीकार करना उचित प्रतीत होता है ।
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Define National income. Analyze the concepts of gross domestic product and gross national income used in the context of national income (200 words/10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में राष्ट्रीय आय को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में कल घरेलू उत्पाद की परिभाषा एवं विश्लेषण कीजिये 3- सकल राष्ट्रीय आय की परिभाषा एवं विश्लेषण 4- अंतिम खंड में मापन का महत्त्व बताते हुए निष्कर्ष दीजिये| किसी देश की श्रम एवं पूंजी, उस देश के प्राकृतिक संसाधनों के साथ मिलकर प्रतिवर्ष कुछ भौतिक एवं अभौतिक वस्तुओं का उत्पादन करता है जिसमें सेवाएँ भी शामिल होती है इसी के बाजार मूल्य को राष्ट्रीय आय कहते हैं जिसमें विदेशों से प्राप्त शुद्ध आय भी शामिल होती हैं।दुसरे शब्दों में, किसी वर्ष में किसी अर्थव्यवस्था में संपादित समस्त आर्थिक गतिविधियों से उत्पन्न आय को राष्ट्रीय आय कहा जाता है इसमें लाभ, किराया, ब्याज अथवा श्रममूल्य के संदर्भ में किये गए भुगतानों को भी शामिल किया जाता है| इस तरह राष्ट्रीय आय किसी देश की अर्थव्यवस्था का आर्थिक आकार दर्शाती है,इसमें हुआ परिवर्तन आर्थिक वृद्धि दर्शाता है|राष्ट्रीय आय को विविध अवधारणाओं के माध्यम से मापा जाता है| राष्ट्रीय आय के मापन की प्रमुख अवधारणायें निम्नलिखित हैं सकल घरेलू उत्पाद (GDP) किसी वित्तीय वर्ष में किसी अर्थव्यवस्था के घरेलू क्षेत्र में उत्पादित सभी वस्तुओं/ सेवाओं के मौद्रिक मूल्य को GDP कहते हैं | दूसरे शब्दों में, देश की घरेलू सीमा के अंतर्गत एक वर्ष में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के मौद्रिक मूल्य को मापने का पैमाना सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी) कहलाता है।सकल घरेलू उत्पाद की अवधारणा का स्पष्टीकरण निम्नलिखित शब्दावलियों के विश्लेषण के आधार पर किया जा सकता है- वितीय वर्ष, सामान्यतः यह एक दिया गया समय होता है | भारत में 1 अप्रैल से 31 मार्च के बीच के समय को एक वित्तीय वर्ष के रूप में ग्रहण किया जाता है| घरेलू क्षेत्र- घरेलू क्षेत्र एक आर्थिक अवधारणा हैं| इसके अंतर्गत प्रादेशिक जल क्षेत्र सहित राजनीतिक सीमाओं के अंतर्गत क्षेत्र को शामिल किया जाता है| इसके अतिरिक्त विदेशों में स्थिति स्वदेशी दूतावास, विदेशों में स्थित वाणिज्यिक दूतावास एवं विदेशों में स्थित स्वदेशी सैन्य अड्डे एवं संगठन को शामिल किया जाता है| इसी तरह घरेलू क्षेत्र के अंतर्गत देश के निवासियों के स्वामित्व में संचालित जलयान, वायुयान, तेल के कुओं द्वारा अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र से अर्जित आय को भी शामिल किया जाता है| इस तरह से स्पष्ट है कि घरेलू क्षेत्र की अवधारणा भौगोलिक सीमा क्षेत्र से व्यापक अवधारणा है| वस्तुएं एवं सेवायें- सकल घरेलू उत्पाद उत्पाद की गणना में केवल अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं को ही शामिल किया जाता है| ध्यातव्य है कि अर्थशास्त्र में वस्तुओं को दो रूपों में वर्गीकृत किया जाता है यथा अंतिम वस्तुएं एवं मध्यवर्ती वस्तुएं| अंतिम वस्तुएं अथवा सेवायें वे हैं जो उत्पादन और वितरण की प्रक्रिया से बाहर हो जाती हैं| अंतिम वस्तुओं के अंतर्गत उपभोक्ता द्वारा प्रत्यक्षतः उपभोग की जाने वाली वस्तुओं को उपभोक्ता वस्तुएं कहते हैं जबकि उत्पादन प्रक्रिया में सहायता करने वाली वस्तुएं यथा मशीन, उपकरण, फैक्ट्री आदि को पूंजीगत वस्तु कहा जाता है| इनके अतिरिक्त मध्यवर्ती वस्तु/सेवा उन्हें कहते हैं जो किसी वस्तु अथवा सेवा के उत्पादन में प्रयुक्त होती हैं| ध्यातव्य है कि दोहरी गणना से बचने के लिएइन वस्तुओं को सकल घरेलू उत्पाद/राष्ट्रीय आय में शामिल नहीं किया जाता है| सकल राष्ट्रीय आय (GNP) अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का महत्त्व बढ़ता जा रहा है| इसलिए अब आय की गणना को घरेलू सीमा के अंदर मापने पर वास्तविक आय का नहीं किया जा सकता| इसलिए जीडीपी के सही माप के लिए सकल राष्ट्रीय उत्पाद यानी जीएनपी का मापन किया जाता है। इसमें उस देश में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के मूल्यों को भी जोड़ा जाता है, भले ही इन का उत्पादन देश के बाहर हो रहा हो या देश के भीतर| सकल राष्ट्रीय आय किसी वित्तीय वर्ष में किसी देश के निवासियों/नागरिकों द्वारा उत्पादित अंतिम वस्तुओं/सेवाओं का मौद्रिक मूल्यहोता है| इसमें देश के नागरिकों द्वारा घरेलू क्षेत्र एवं विदेशों से प्राप्त आय को जोड़ा जाता है| हालांकि सकल राष्ट्रीय आय में देश में स्थित विदेशियों द्वारा अर्जित आय की गणना नहीं करता है। इस प्रकार सकल राष्ट्रीय आय जीडीपी की तुलना में अधिक वास्तविक आय को स्पष्ट करने वाली आर्थिक अवधारणा है| इन मापको के आधार पर देश में विकास की स्थिति, संसाधन वितरण, आय वृद्धि, विकास और संवृद्धि की गति/तीव्रता तथा आगामी समय में होने वाली संवृद्धि का आकलन करने में सहजता होती है| इसके साथ ही इन अवधारणाओं की गणना से नियोजन की दिशा, पूँजी-उत्पाद अनुपात का आकलन, निवेश की दिशा आदि के निर्धारण में भी सहायता मिलती है|अतः उपरोक्त अवधारणायें अर्थव्यवस्था के अध्ययन में उपयोगी हैं|
##Question:Define National income. Analyze the concepts of gross domestic product and gross national income used in the context of national income (200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में राष्ट्रीय आय को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में कल घरेलू उत्पाद की परिभाषा एवं विश्लेषण कीजिये 3- सकल राष्ट्रीय आय की परिभाषा एवं विश्लेषण 4- अंतिम खंड में मापन का महत्त्व बताते हुए निष्कर्ष दीजिये| किसी देश की श्रम एवं पूंजी, उस देश के प्राकृतिक संसाधनों के साथ मिलकर प्रतिवर्ष कुछ भौतिक एवं अभौतिक वस्तुओं का उत्पादन करता है जिसमें सेवाएँ भी शामिल होती है इसी के बाजार मूल्य को राष्ट्रीय आय कहते हैं जिसमें विदेशों से प्राप्त शुद्ध आय भी शामिल होती हैं।दुसरे शब्दों में, किसी वर्ष में किसी अर्थव्यवस्था में संपादित समस्त आर्थिक गतिविधियों से उत्पन्न आय को राष्ट्रीय आय कहा जाता है इसमें लाभ, किराया, ब्याज अथवा श्रममूल्य के संदर्भ में किये गए भुगतानों को भी शामिल किया जाता है| इस तरह राष्ट्रीय आय किसी देश की अर्थव्यवस्था का आर्थिक आकार दर्शाती है,इसमें हुआ परिवर्तन आर्थिक वृद्धि दर्शाता है|राष्ट्रीय आय को विविध अवधारणाओं के माध्यम से मापा जाता है| राष्ट्रीय आय के मापन की प्रमुख अवधारणायें निम्नलिखित हैं सकल घरेलू उत्पाद (GDP) किसी वित्तीय वर्ष में किसी अर्थव्यवस्था के घरेलू क्षेत्र में उत्पादित सभी वस्तुओं/ सेवाओं के मौद्रिक मूल्य को GDP कहते हैं | दूसरे शब्दों में, देश की घरेलू सीमा के अंतर्गत एक वर्ष में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के मौद्रिक मूल्य को मापने का पैमाना सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी) कहलाता है।सकल घरेलू उत्पाद की अवधारणा का स्पष्टीकरण निम्नलिखित शब्दावलियों के विश्लेषण के आधार पर किया जा सकता है- वितीय वर्ष, सामान्यतः यह एक दिया गया समय होता है | भारत में 1 अप्रैल से 31 मार्च के बीच के समय को एक वित्तीय वर्ष के रूप में ग्रहण किया जाता है| घरेलू क्षेत्र- घरेलू क्षेत्र एक आर्थिक अवधारणा हैं| इसके अंतर्गत प्रादेशिक जल क्षेत्र सहित राजनीतिक सीमाओं के अंतर्गत क्षेत्र को शामिल किया जाता है| इसके अतिरिक्त विदेशों में स्थिति स्वदेशी दूतावास, विदेशों में स्थित वाणिज्यिक दूतावास एवं विदेशों में स्थित स्वदेशी सैन्य अड्डे एवं संगठन को शामिल किया जाता है| इसी तरह घरेलू क्षेत्र के अंतर्गत देश के निवासियों के स्वामित्व में संचालित जलयान, वायुयान, तेल के कुओं द्वारा अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र से अर्जित आय को भी शामिल किया जाता है| इस तरह से स्पष्ट है कि घरेलू क्षेत्र की अवधारणा भौगोलिक सीमा क्षेत्र से व्यापक अवधारणा है| वस्तुएं एवं सेवायें- सकल घरेलू उत्पाद उत्पाद की गणना में केवल अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं को ही शामिल किया जाता है| ध्यातव्य है कि अर्थशास्त्र में वस्तुओं को दो रूपों में वर्गीकृत किया जाता है यथा अंतिम वस्तुएं एवं मध्यवर्ती वस्तुएं| अंतिम वस्तुएं अथवा सेवायें वे हैं जो उत्पादन और वितरण की प्रक्रिया से बाहर हो जाती हैं| अंतिम वस्तुओं के अंतर्गत उपभोक्ता द्वारा प्रत्यक्षतः उपभोग की जाने वाली वस्तुओं को उपभोक्ता वस्तुएं कहते हैं जबकि उत्पादन प्रक्रिया में सहायता करने वाली वस्तुएं यथा मशीन, उपकरण, फैक्ट्री आदि को पूंजीगत वस्तु कहा जाता है| इनके अतिरिक्त मध्यवर्ती वस्तु/सेवा उन्हें कहते हैं जो किसी वस्तु अथवा सेवा के उत्पादन में प्रयुक्त होती हैं| ध्यातव्य है कि दोहरी गणना से बचने के लिएइन वस्तुओं को सकल घरेलू उत्पाद/राष्ट्रीय आय में शामिल नहीं किया जाता है| सकल राष्ट्रीय आय (GNP) अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का महत्त्व बढ़ता जा रहा है| इसलिए अब आय की गणना को घरेलू सीमा के अंदर मापने पर वास्तविक आय का नहीं किया जा सकता| इसलिए जीडीपी के सही माप के लिए सकल राष्ट्रीय उत्पाद यानी जीएनपी का मापन किया जाता है। इसमें उस देश में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के मूल्यों को भी जोड़ा जाता है, भले ही इन का उत्पादन देश के बाहर हो रहा हो या देश के भीतर| सकल राष्ट्रीय आय किसी वित्तीय वर्ष में किसी देश के निवासियों/नागरिकों द्वारा उत्पादित अंतिम वस्तुओं/सेवाओं का मौद्रिक मूल्यहोता है| इसमें देश के नागरिकों द्वारा घरेलू क्षेत्र एवं विदेशों से प्राप्त आय को जोड़ा जाता है| हालांकि सकल राष्ट्रीय आय में देश में स्थित विदेशियों द्वारा अर्जित आय की गणना नहीं करता है। इस प्रकार सकल राष्ट्रीय आय जीडीपी की तुलना में अधिक वास्तविक आय को स्पष्ट करने वाली आर्थिक अवधारणा है| इन मापको के आधार पर देश में विकास की स्थिति, संसाधन वितरण, आय वृद्धि, विकास और संवृद्धि की गति/तीव्रता तथा आगामी समय में होने वाली संवृद्धि का आकलन करने में सहजता होती है| इसके साथ ही इन अवधारणाओं की गणना से नियोजन की दिशा, पूँजी-उत्पाद अनुपात का आकलन, निवेश की दिशा आदि के निर्धारण में भी सहायता मिलती है|अतः उपरोक्त अवधारणायें अर्थव्यवस्था के अध्ययन में उपयोगी हैं|
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भारत में रेलवे का विकास आधुनिकीकरण के लिए नहीं, अंग्रेजों के औपनिवेशिक एवं साम्राज्यवादी उद्देश्यों की पूर्ति करने हेतु किया गया था। टिप्पणी कीजिए। (150- 200 शब्द; 10 अंक) The railway in India was developed not to modernize, but to fulfill the colonial and imperialist objectives of the British. Comment. (150-200 words; 10 Marks)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में रेलवे के विकास की पृष्ठभूमि लिखिए। इसके पश्चात रेलवे प्रणाली के विकास के औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी उद्देश्यों को लिखिए। इसके बाद उन पक्षों को भी लिखिए जिनसे सकारात्मक प्रभाव पड़ा और आधुनिकता के कुछ प्रयास हुआ सारांश रूप में निष्कर्ष लिखिए। भारत में रेलवे का विकास विभिन्न कारकों का परिणाम था। 19वीं सदी के मध्य में ब्रिटिश अर्थव्यवस्था पर मंदी का प्रभाव था। मुख्यतः इस्पात एवं कपड़ा उद्योग के द्वारा भारत में बाजार के विस्तार के लिए उत्पन्न दबाव था। ब्रिटिश पूंजीपति भी मुनाफे को ध्यान में रख कर निवेश के लिए प्रेरित थे। इसके साथ ही ब्रिटिश भारत की सरकार भी सामरिक-राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए रेलवे के विकास का समर्थन करती थी। अतः विभिन्न कारकों ने ब्रिटिश भारत में रेलवे के विकास को प्रोत्साहित किया था। रेलवे के विकास ने भारत पर विभिन्न सामाजिक-आर्थिक एवं राजनीतिक प्रभाव उत्पन्न किये जो नकारात्मक एवं सकारात्मक दोनों अर्थात मिश्रित प्रकृति के थे। रेलवे प्रणाली को स्थापित करने के पीछे के उद्देश्य जिससे स्पष्ट होता है कि इसका उद्देश्य औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी था: उद्योगों औरपरिवहनपर प्रभाव सरकार ने भाडा/किराया नीति, भौगोलिक विन्यास आदि क्षेत्रों में ब्रिटिश हितों का ध्यान रखा सरकार के असहयोग के बावजूद स्वदेशी उद्यमशीलता विकसित हुईकिन्तु रेलवे ने ग्रामीण उद्योगों को व्यापक क्षति पहुचाई ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को मंदी से उबारना भारत में रेलवे को प्रारम्भ करने का एक प्रमुख उद्देश्य था, रेलवे ने कपड़ा एवं इस्पात उद्योगों को गति प्रदान की परिवहन के क्षेत्र में भी रेलवे का आगमन एक नए युग की शुरुआत थी हालांकि इस पूरी प्रक्रिया में औपनिवेशिक हितों को ही महत्त्व दिया गया कृषि पर प्रभाव रेलवे के कारण भारत में वाणिज्यीकरण की प्रक्रिया को गति मिली इसके साथ ही बड़ी मात्रा में अखाद्य फसलों के साथ-साथ खाद्य फसलों का भी निर्यात किया गया व्यापार पर प्रभाव रेलवे ने भारत को खेतिहर उपनिवेश के रूप में परिवर्तित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया एक ओर कच्चे माल के निर्यात की मात्रा बढ़ी तो दूसरी ओर तैयार मालों के आयात की मात्रा भी बढ़ी रोजगार पर प्रभाव रेलवे के विकास की प्रक्रिया में बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर भी उपलब्ध हुए हालांकि उच्च पदों पर मुख्यतः अंग्रेजों की नियुक्ति की गयी एवं निम्नस्तरीय कर्मचारी के रूप में भारतीयों की नियुक्ति की गयी कुल मिलाकर रेलवे ने भारतीय अर्थव्यवस्था के उपनिवेशीकरण तथा धन के दोहन को गति प्रदान की हालांकि इन नकारात्मक पक्षों के अतिरिक्त कुछ ऐसे भी कारक थे जिससे कह सकते हैं कि इससे अधिनिकता का विकास हुआ: आर्थिक दृष्टिकोण से सरकार के असहयोगी रवैये के बाद भी आधुनिक उद्योगों का भारत में विकास, रेलवे के विकास के साथ ही भारत में आधुनिक उद्योगों की शुरुआत हुई। देशी एवं विदेशी दोनों पूजीपतियों ने उद्योगों में निवेश किया परिवहन के द्रुतगामी साधन की शुरुआत हुई रोजगार के अवसरों की उपलब्धता बढ़ी आदि सामाजिक दृष्टिकोण से जाति-प्रथा, छुआछूत, धार्मिक अलगाव, लिंग असमानता जैसी सामाजिक समस्याओं को कमजोर करने मेंमें रेलवे की महत्वपूर्ण भूमिका थी उपरोक्त समस्याओं के सन्दर्भ में लोगों के दृष्टिकोण को परिवर्तित करने में भी रेलवे की महत्वपूर्ण भूमिका थी उपरोक्त चर्चा से स्पष्ट है कि भारत में रेलवे का बहुआयामी प्रभाव रहा। हालांकि इस व्यवस्था में साम्राज्यवादी उद्देश्य भारतीय हितों की तुलना में अधिक प्रभावी थे।
##Question:भारत में रेलवे का विकास आधुनिकीकरण के लिए नहीं, अंग्रेजों के औपनिवेशिक एवं साम्राज्यवादी उद्देश्यों की पूर्ति करने हेतु किया गया था। टिप्पणी कीजिए। (150- 200 शब्द; 10 अंक) The railway in India was developed not to modernize, but to fulfill the colonial and imperialist objectives of the British. Comment. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में रेलवे के विकास की पृष्ठभूमि लिखिए। इसके पश्चात रेलवे प्रणाली के विकास के औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी उद्देश्यों को लिखिए। इसके बाद उन पक्षों को भी लिखिए जिनसे सकारात्मक प्रभाव पड़ा और आधुनिकता के कुछ प्रयास हुआ सारांश रूप में निष्कर्ष लिखिए। भारत में रेलवे का विकास विभिन्न कारकों का परिणाम था। 19वीं सदी के मध्य में ब्रिटिश अर्थव्यवस्था पर मंदी का प्रभाव था। मुख्यतः इस्पात एवं कपड़ा उद्योग के द्वारा भारत में बाजार के विस्तार के लिए उत्पन्न दबाव था। ब्रिटिश पूंजीपति भी मुनाफे को ध्यान में रख कर निवेश के लिए प्रेरित थे। इसके साथ ही ब्रिटिश भारत की सरकार भी सामरिक-राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए रेलवे के विकास का समर्थन करती थी। अतः विभिन्न कारकों ने ब्रिटिश भारत में रेलवे के विकास को प्रोत्साहित किया था। रेलवे के विकास ने भारत पर विभिन्न सामाजिक-आर्थिक एवं राजनीतिक प्रभाव उत्पन्न किये जो नकारात्मक एवं सकारात्मक दोनों अर्थात मिश्रित प्रकृति के थे। रेलवे प्रणाली को स्थापित करने के पीछे के उद्देश्य जिससे स्पष्ट होता है कि इसका उद्देश्य औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी था: उद्योगों औरपरिवहनपर प्रभाव सरकार ने भाडा/किराया नीति, भौगोलिक विन्यास आदि क्षेत्रों में ब्रिटिश हितों का ध्यान रखा सरकार के असहयोग के बावजूद स्वदेशी उद्यमशीलता विकसित हुईकिन्तु रेलवे ने ग्रामीण उद्योगों को व्यापक क्षति पहुचाई ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को मंदी से उबारना भारत में रेलवे को प्रारम्भ करने का एक प्रमुख उद्देश्य था, रेलवे ने कपड़ा एवं इस्पात उद्योगों को गति प्रदान की परिवहन के क्षेत्र में भी रेलवे का आगमन एक नए युग की शुरुआत थी हालांकि इस पूरी प्रक्रिया में औपनिवेशिक हितों को ही महत्त्व दिया गया कृषि पर प्रभाव रेलवे के कारण भारत में वाणिज्यीकरण की प्रक्रिया को गति मिली इसके साथ ही बड़ी मात्रा में अखाद्य फसलों के साथ-साथ खाद्य फसलों का भी निर्यात किया गया व्यापार पर प्रभाव रेलवे ने भारत को खेतिहर उपनिवेश के रूप में परिवर्तित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया एक ओर कच्चे माल के निर्यात की मात्रा बढ़ी तो दूसरी ओर तैयार मालों के आयात की मात्रा भी बढ़ी रोजगार पर प्रभाव रेलवे के विकास की प्रक्रिया में बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर भी उपलब्ध हुए हालांकि उच्च पदों पर मुख्यतः अंग्रेजों की नियुक्ति की गयी एवं निम्नस्तरीय कर्मचारी के रूप में भारतीयों की नियुक्ति की गयी कुल मिलाकर रेलवे ने भारतीय अर्थव्यवस्था के उपनिवेशीकरण तथा धन के दोहन को गति प्रदान की हालांकि इन नकारात्मक पक्षों के अतिरिक्त कुछ ऐसे भी कारक थे जिससे कह सकते हैं कि इससे अधिनिकता का विकास हुआ: आर्थिक दृष्टिकोण से सरकार के असहयोगी रवैये के बाद भी आधुनिक उद्योगों का भारत में विकास, रेलवे के विकास के साथ ही भारत में आधुनिक उद्योगों की शुरुआत हुई। देशी एवं विदेशी दोनों पूजीपतियों ने उद्योगों में निवेश किया परिवहन के द्रुतगामी साधन की शुरुआत हुई रोजगार के अवसरों की उपलब्धता बढ़ी आदि सामाजिक दृष्टिकोण से जाति-प्रथा, छुआछूत, धार्मिक अलगाव, लिंग असमानता जैसी सामाजिक समस्याओं को कमजोर करने मेंमें रेलवे की महत्वपूर्ण भूमिका थी उपरोक्त समस्याओं के सन्दर्भ में लोगों के दृष्टिकोण को परिवर्तित करने में भी रेलवे की महत्वपूर्ण भूमिका थी उपरोक्त चर्चा से स्पष्ट है कि भारत में रेलवे का बहुआयामी प्रभाव रहा। हालांकि इस व्यवस्था में साम्राज्यवादी उद्देश्य भारतीय हितों की तुलना में अधिक प्रभावी थे।
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राष्ट्रीय आय लेखांकन से आप क्या समझते हैं? राष्ट्रीय आय गणना की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) व सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीएनपी) की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by National Income Accounting? Explain the concept of Gross Domestic Product (GDP) and Gross National Product (GNP) of national income calculation. (150-200 words, 10 marks)
Approach: भूमिका में राष्ट्रीय आय लेखांकन को परिभाषित कीजिए। राष्ट्रीय आय लेखांकन का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत कीजिए। जीडीपी की अवधारणा को स्पष्ट करने का प्रयास कीजिए। जीएनपी की अवधारणा को भी स्पष्ट कीजिए। निष्कर्ष में राष्ट्रीय आय लेखांकन के महत्व की संक्षिप्त चर्चा कर सकते हैं। उत्तर- राष्ट्रीय आय लेखांकन का तात्पर्य उन विधियों या तकनीकों से है जिनका उपयोग किसी भी अर्थव्यवस्था के समग्र रूप से आर्थिक गतिविधियों के मापन के लिए होता है। साइमन कुजनेट्स को राष्ट्रीय आय लेखांकन का जनक माना जाता है। राष्ट्रीय आय लेखांकन में उत्पादन, उपभोग और निवेश जैसी अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण गतिविधियों को शामिल किया जाता है। गणना में आय व व्यय के चक्रीय स्वरूप को आधार बनाया जाता है। राष्ट्रीय आय लेखांकन की कई विधियाँ हैं जिनमें जीडीपी व जीएनपी महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय आय लेखांकन की जीडीपी अवधारणा- किसी अर्थव्यवस्था में एक निश्चित समयावधि में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के कुल बाज़ार मूल्य को सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं। भारत के लिए यह अवधि 1 अप्रैल से 31 मार्च तक है। अत: यह किसी देश की घरेलू सीमा के अंतर्गत निवासियों या गैर-निवासियों या फर्मों द्वारा एक वित्तीय वर्ष में उत्पादित समस्त अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं का मौद्रिक मूल्य होता है। सरल शब्दों में यह किसी व्यक्ति या फर्म की राष्ट्रीयता पर विचार किए बिना देश की घरेलू सीमा के भीतर उत्पादित अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्यों का मापन करता है। जीडीपी केवल वस्तुओं एवं सेवाओं के अंतिम उत्पादन को ही संदर्भित करता है। इसमें केवल पूर्ण या अंतिम वस्तुओं को इसलिए सम्मिलित करते हैं ताकि कच्चे माल, मध्यवर्ती उत्पाद और अंतिम उत्पादों की दोहरी या टिहरी गणना से बचा जा सके। यहाँ अंतिम उत्पाद का अर्थ है "अंतिम उपभोग के लिए क्रय की गयी वस्तुएँ एवं सेवाएं। जीडीपी का आकलन सांकेतिक जीडीपी व वास्तविक जीडीपी के रूप में किया जाता है। यहाँ सांकेतिक जीडीपी में गणना चालू वर्ष की कीमतों पर की जाती है वहीं वास्तविक जीडीपी में गणना आधार वर्ष पर की जाती है। राष्ट्रीय आय लेखांकन की जीएनपी अवधारणा- घरेलू सीमा के भीतर या बाहर एक देश के निवासियों द्वारा उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के कुल मूल्य को जीएनपी कहते हैं। जब भारत के लिए जीएनपी के गणना की जाती है तो इसके अंतर्गत भारत के भीतर तथा विश्व के अन्य देशों में भारतीय नागरिकों द्वारा उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के कुल मूल्य की गणना की जाती है। जीडीपी जहां उत्पादन होता है उससे संबन्धित है वहीं दूसरी ओर जीएनपी जो उत्पादन करते हैं से संबन्धित हैं। यदि किसी देश में एफ़डीआई का अंतर्प्रवाह काफी अधिक है तथा बहिर्प्रवाह अत्यल्प है तो ऐसी स्थिति में समान्यतया उक्त देश की जीडीपी जीएनपी से अधिक होती है। वहीं दूसरी ओर यदि किसी देश के नागरिक अत्यधिक संख्या में विदेश जाते हैं और वहाँ आर्थिक गतिविधियों में संलग्न होकर अपने गृह देश में बहुत अधिक पैसा भेजते हैं तो उस देश का जीएनपी जीडीपी से अधिक होता है। भारत में जीएनपी इसके जीडीपी की तुलना में कम है क्योंकि भारत में विदेशों से प्रपट निवल आय सदैव नकारात्मक रहती है। किसी देश की अर्थव्यवस्था के आकार, आर्थिक गतिविधियों, आर्थिक संवृद्धि की गणना हेतु राष्ट्रीय आय लेखांकन अत्यधिक महत्वपूर्ण है जिसमें जीडीपी व जीएनपी की अवधारणा सरल व सर्वमान्य है।
##Question:राष्ट्रीय आय लेखांकन से आप क्या समझते हैं? राष्ट्रीय आय गणना की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) व सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीएनपी) की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by National Income Accounting? Explain the concept of Gross Domestic Product (GDP) and Gross National Product (GNP) of national income calculation. (150-200 words, 10 marks)##Answer:Approach: भूमिका में राष्ट्रीय आय लेखांकन को परिभाषित कीजिए। राष्ट्रीय आय लेखांकन का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत कीजिए। जीडीपी की अवधारणा को स्पष्ट करने का प्रयास कीजिए। जीएनपी की अवधारणा को भी स्पष्ट कीजिए। निष्कर्ष में राष्ट्रीय आय लेखांकन के महत्व की संक्षिप्त चर्चा कर सकते हैं। उत्तर- राष्ट्रीय आय लेखांकन का तात्पर्य उन विधियों या तकनीकों से है जिनका उपयोग किसी भी अर्थव्यवस्था के समग्र रूप से आर्थिक गतिविधियों के मापन के लिए होता है। साइमन कुजनेट्स को राष्ट्रीय आय लेखांकन का जनक माना जाता है। राष्ट्रीय आय लेखांकन में उत्पादन, उपभोग और निवेश जैसी अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण गतिविधियों को शामिल किया जाता है। गणना में आय व व्यय के चक्रीय स्वरूप को आधार बनाया जाता है। राष्ट्रीय आय लेखांकन की कई विधियाँ हैं जिनमें जीडीपी व जीएनपी महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय आय लेखांकन की जीडीपी अवधारणा- किसी अर्थव्यवस्था में एक निश्चित समयावधि में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के कुल बाज़ार मूल्य को सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं। भारत के लिए यह अवधि 1 अप्रैल से 31 मार्च तक है। अत: यह किसी देश की घरेलू सीमा के अंतर्गत निवासियों या गैर-निवासियों या फर्मों द्वारा एक वित्तीय वर्ष में उत्पादित समस्त अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं का मौद्रिक मूल्य होता है। सरल शब्दों में यह किसी व्यक्ति या फर्म की राष्ट्रीयता पर विचार किए बिना देश की घरेलू सीमा के भीतर उत्पादित अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्यों का मापन करता है। जीडीपी केवल वस्तुओं एवं सेवाओं के अंतिम उत्पादन को ही संदर्भित करता है। इसमें केवल पूर्ण या अंतिम वस्तुओं को इसलिए सम्मिलित करते हैं ताकि कच्चे माल, मध्यवर्ती उत्पाद और अंतिम उत्पादों की दोहरी या टिहरी गणना से बचा जा सके। यहाँ अंतिम उत्पाद का अर्थ है "अंतिम उपभोग के लिए क्रय की गयी वस्तुएँ एवं सेवाएं। जीडीपी का आकलन सांकेतिक जीडीपी व वास्तविक जीडीपी के रूप में किया जाता है। यहाँ सांकेतिक जीडीपी में गणना चालू वर्ष की कीमतों पर की जाती है वहीं वास्तविक जीडीपी में गणना आधार वर्ष पर की जाती है। राष्ट्रीय आय लेखांकन की जीएनपी अवधारणा- घरेलू सीमा के भीतर या बाहर एक देश के निवासियों द्वारा उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के कुल मूल्य को जीएनपी कहते हैं। जब भारत के लिए जीएनपी के गणना की जाती है तो इसके अंतर्गत भारत के भीतर तथा विश्व के अन्य देशों में भारतीय नागरिकों द्वारा उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के कुल मूल्य की गणना की जाती है। जीडीपी जहां उत्पादन होता है उससे संबन्धित है वहीं दूसरी ओर जीएनपी जो उत्पादन करते हैं से संबन्धित हैं। यदि किसी देश में एफ़डीआई का अंतर्प्रवाह काफी अधिक है तथा बहिर्प्रवाह अत्यल्प है तो ऐसी स्थिति में समान्यतया उक्त देश की जीडीपी जीएनपी से अधिक होती है। वहीं दूसरी ओर यदि किसी देश के नागरिक अत्यधिक संख्या में विदेश जाते हैं और वहाँ आर्थिक गतिविधियों में संलग्न होकर अपने गृह देश में बहुत अधिक पैसा भेजते हैं तो उस देश का जीएनपी जीडीपी से अधिक होता है। भारत में जीएनपी इसके जीडीपी की तुलना में कम है क्योंकि भारत में विदेशों से प्रपट निवल आय सदैव नकारात्मक रहती है। किसी देश की अर्थव्यवस्था के आकार, आर्थिक गतिविधियों, आर्थिक संवृद्धि की गणना हेतु राष्ट्रीय आय लेखांकन अत्यधिक महत्वपूर्ण है जिसमें जीडीपी व जीएनपी की अवधारणा सरल व सर्वमान्य है।
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सीमा प्रबंधन के लिए सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयासों के बाद भी भारत को विविध चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है| इस सन्दर्भ में माधव गोडबोले समिति की सिफारिशें प्रभावी सीमा प्रबंधन सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी| चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Despite the efforts being made by the government for border management, India is facing various challenges. In this context, the recommendations of the Madhav Godbole Committee will play an important role in ensuring effective border management. Discuss (150 to 200 words, 10 marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में सीमा सुरक्षा सम्बन्धी मुद्दों को बताते हुए सीमा प्रबंधन को परिभाषित कीजिये 2-सीमा प्रबंधन के लिए भारत द्वारा जा रहे उठाये जा रहे सामान्य कदम 3- वर्तमान में उपस्थित चुनौतियों को स्पष्ट कीजिये 4- बेहतर सीमा प्रबंधन के लिए माधव गोडबोले समिति की सिफारिशों को प्रस्तुत कीजिये 5- अंतिम में सुरक्षा का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत चीन सहित दक्षिण एशिया के लगभग सभी देशों के साथ अपनी सीमाएँ साझा करता है। इसके अतिरिक्त हिंद महासागर से लगी भारत की एक लंबी समुद्री सीमा भी है।अवैध अप्रवासन, सीमा पार आतंकवाद में वृद्धि, बाह्य ताकतों द्वारा समर्थित अलगाववादी आंदोलन, जाली मुद्रा प्रवाह, अवैध हथियारों एवं मादक द्रव्यों की तस्करी, अपराधियों की शरणस्थली बनना आदि भारत में सीमा विवाद एवं सीमावर्ती क्षेत्रों में जनित प्रमुख चुनौतियाँ हैं। प्रवासन किसी भी देश की अर्थव्यवस्था, सामाजिक व्यवस्था को मजबूत करता है किन्तु अनियमित अप्रवासन बाधाएं भी उत्पन्न करता है| इसी सन्दर्भ में सीमा प्रबंधन किया जाता है|सीमा प्रबंधन एक ऐसी समग्र प्रणाली है जो प्रवासन का प्रबंधन करती है|भारत के लिये सुदृढ़ सीमा प्रबंधन राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक विकास के लिये भी आवश्यक है। अतः भारत सरकार द्वारा इस दिशा में अनेक प्रयास किये जा रहे हैं| सीमा प्रबंधन के लिए भारत द्वारा जा रहे उठाये जा रहे सामान्य कदम सम्पूर्ण स्थलीय सीमाओं यथा पाकिस्तान, म्यांमार, बांग्लादेश के मध्य डबल लेयर फेंसिंग, फ्लडलाइट्स, बॉर्डर आउटपोस्ट एवं स्मार्ट फेंसिंग की व्यवस्था की जा रही है भारत ने वर्ष 2016 में व्यापक एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली(CIBMS) को आरम्भ किया है जिसके तहत नए हाईटेक सर्विलांस डिवाइस, सेंसर, डिटेक्टर, कैमरा, ग्राउंड बेस्ड राडार सिस्टम और लेसर तकनीक को स्थापित किया जा रहा है भारत सरकार ने 2018 में सैनिकों की संतुष्टि स्तर पर विशेष बल दिया है ताकि उनके जीवन को मानवीय बनाया जा सके| अर्धसैनिक बलों की क्षमता का विस्तार करना एवं उन्हें एक दुसरे के साथ एकीकृत करने के प्रयास किये जा रहे हैं सीमा क्षेत्रों में सीमा सुरक्षा सम्मेलनों का आयोजन किया जाने लगा है| उदाहरणार्थ वर्ष 2017 में यह म्यांमार सीमा पर जबकि 2018 में कच्छ के रण क्षेत्र में किया गया था सितम्बर 2019 को भारतीय रक्षा मंत्रालय ने सीमाओं का इतिहास लिखने की योजना बनायी है| इसका उद्देश्य नगरों एवं आंतरिक क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों को सीमान्त क्षेत्रों की संस्कृति, इतिहास तथा भौगोलिक स्थलाकृतियों के सम्बन्ध में जागरूक करना है| उपरोक्त क़दमों के बावजूद भारत निम्नलिखित चुनौतियों का सामना कर रहा है सीमा प्रबंधन की चुनौतियाँ भारत को सीमा प्रबंधन में शत्रु देशों की उपस्थिति, सीमाओं की जटिलता, पायरेसी की समस्या, लंबा समुद्री तट, परिधीय क्षेत्रों में सामाजिक आर्थिक असंतोष, मादक पदार्थों एवं मानव तस्करी की समस्या तथा जाली मुद्रा की समस्या का सामना करना पड़ रहा है| इसके अतरिक्त अधिकाँश पडोसी देशों के साथ सीमा विवाद अतः सीमा प्रबंधन में पडोसी देशों का सहयोग नहीं प्राप्त हो पाता है पाकिस्तान के साथ आतंकवाद, नेपाल के साथ मधेशियों की समस्या, म्यांमार एवं बांग्लादेश के साथ घुसपैठ की समस्याएं विद्यमान है भारतीय सीमाओं में सांस्कृतिक विविधता एक अलग चुनौती बनी हुई है अपर्याप्त बुनियादी ढांचा सीमाओं के प्रबंधन को कमजोर कर देता है सेना, सीमा सुरक्षा बलों, अर्धसैनिक बलों और सम्बद्ध प्रान्तों की पुलिस के मध्य समन्वय की कमी पायी जाती है| सीमा प्रबंधन के लिए सामान्य सुझाव उपरोक्त चुनौतियों को देखते हुए भारत सरकार ने इस दिशा में प्रयास करते हुए संस्थागत प्रयास किये हैं और माधव गोडबोले समिति का गठन किया गया है| समिति ने अपनी सिफारिश में कहा है कि सीमाओं की स्थलाकृतियों और कृत्रिम विवादों के कारण प्रबंधन जटिल हो जाता हैअतः सरकार को निम्नलिखित सक्रिय कदम उठाने चाहिए पडोसी देशों के साथ लंबित सीमा विवादों का शीघ्रता से निपटारा किया जाना चाहिए सीमा प्रबंधन में सूचना प्रौद्योगिकी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए बड़ी संख्या में हेलीकाप्टर यूनिट का निर्माण किया जाना चाहिए ताकि सीमाओं पर नजर रखी जा सके और आवश्यकता अनुसार प्रबंधन किया जा सके प्रभावित आबादी के बीच विश्वास बहाली के लिए राष्ट्रीय भावना को विकसित किया जाना चाहिए ताकि उग्रवादी संगठनों के विस्तार को रोका जा सके स्थानीय निवासियों की गरीबी का उन्मूलन किया जाना चाहिए अर्थात सामाजिक आर्थिक पहल अधिक अनिवार्य है भारत को इन चुनौतियों से निपटने के लिये व्यापक रणनीति बनाने की आवश्यकता है। भारत को अभी अपने सीमावर्ती क्षेत्रों में आधारभूत संरचना का निर्माण, जैसे- सड़कों का निर्माण, सामाजिक अवसंरचना आदि करने की आवश्यकता है। वांछित सैन्य आधुनिकीकरण हेतु सरकार को पर्याप्त निधियां करना चाहिये। सीमा पर उत्पन्न चुनौतियों से निपटने का दायित्व केवल सेना का ही नहीं है, अतः नागरिकों, पुलिस, केंद्र एवं राज्य के अधिकारियों तथा खुफिया एजेंसियों को भी इसमें सहयोग करना चाहिये।ताकि सीमाओं की सुरक्षा की जा सके| सुरक्षित सीमाएं भारत के सामाजिक आर्थिक विकास के लिए अति आवश्यक हैं|
##Question:सीमा प्रबंधन के लिए सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयासों के बाद भी भारत को विविध चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है| इस सन्दर्भ में माधव गोडबोले समिति की सिफारिशें प्रभावी सीमा प्रबंधन सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी| चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Despite the efforts being made by the government for border management, India is facing various challenges. In this context, the recommendations of the Madhav Godbole Committee will play an important role in ensuring effective border management. Discuss (150 to 200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में सीमा सुरक्षा सम्बन्धी मुद्दों को बताते हुए सीमा प्रबंधन को परिभाषित कीजिये 2-सीमा प्रबंधन के लिए भारत द्वारा जा रहे उठाये जा रहे सामान्य कदम 3- वर्तमान में उपस्थित चुनौतियों को स्पष्ट कीजिये 4- बेहतर सीमा प्रबंधन के लिए माधव गोडबोले समिति की सिफारिशों को प्रस्तुत कीजिये 5- अंतिम में सुरक्षा का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत चीन सहित दक्षिण एशिया के लगभग सभी देशों के साथ अपनी सीमाएँ साझा करता है। इसके अतिरिक्त हिंद महासागर से लगी भारत की एक लंबी समुद्री सीमा भी है।अवैध अप्रवासन, सीमा पार आतंकवाद में वृद्धि, बाह्य ताकतों द्वारा समर्थित अलगाववादी आंदोलन, जाली मुद्रा प्रवाह, अवैध हथियारों एवं मादक द्रव्यों की तस्करी, अपराधियों की शरणस्थली बनना आदि भारत में सीमा विवाद एवं सीमावर्ती क्षेत्रों में जनित प्रमुख चुनौतियाँ हैं। प्रवासन किसी भी देश की अर्थव्यवस्था, सामाजिक व्यवस्था को मजबूत करता है किन्तु अनियमित अप्रवासन बाधाएं भी उत्पन्न करता है| इसी सन्दर्भ में सीमा प्रबंधन किया जाता है|सीमा प्रबंधन एक ऐसी समग्र प्रणाली है जो प्रवासन का प्रबंधन करती है|भारत के लिये सुदृढ़ सीमा प्रबंधन राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक विकास के लिये भी आवश्यक है। अतः भारत सरकार द्वारा इस दिशा में अनेक प्रयास किये जा रहे हैं| सीमा प्रबंधन के लिए भारत द्वारा जा रहे उठाये जा रहे सामान्य कदम सम्पूर्ण स्थलीय सीमाओं यथा पाकिस्तान, म्यांमार, बांग्लादेश के मध्य डबल लेयर फेंसिंग, फ्लडलाइट्स, बॉर्डर आउटपोस्ट एवं स्मार्ट फेंसिंग की व्यवस्था की जा रही है भारत ने वर्ष 2016 में व्यापक एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली(CIBMS) को आरम्भ किया है जिसके तहत नए हाईटेक सर्विलांस डिवाइस, सेंसर, डिटेक्टर, कैमरा, ग्राउंड बेस्ड राडार सिस्टम और लेसर तकनीक को स्थापित किया जा रहा है भारत सरकार ने 2018 में सैनिकों की संतुष्टि स्तर पर विशेष बल दिया है ताकि उनके जीवन को मानवीय बनाया जा सके| अर्धसैनिक बलों की क्षमता का विस्तार करना एवं उन्हें एक दुसरे के साथ एकीकृत करने के प्रयास किये जा रहे हैं सीमा क्षेत्रों में सीमा सुरक्षा सम्मेलनों का आयोजन किया जाने लगा है| उदाहरणार्थ वर्ष 2017 में यह म्यांमार सीमा पर जबकि 2018 में कच्छ के रण क्षेत्र में किया गया था सितम्बर 2019 को भारतीय रक्षा मंत्रालय ने सीमाओं का इतिहास लिखने की योजना बनायी है| इसका उद्देश्य नगरों एवं आंतरिक क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों को सीमान्त क्षेत्रों की संस्कृति, इतिहास तथा भौगोलिक स्थलाकृतियों के सम्बन्ध में जागरूक करना है| उपरोक्त क़दमों के बावजूद भारत निम्नलिखित चुनौतियों का सामना कर रहा है सीमा प्रबंधन की चुनौतियाँ भारत को सीमा प्रबंधन में शत्रु देशों की उपस्थिति, सीमाओं की जटिलता, पायरेसी की समस्या, लंबा समुद्री तट, परिधीय क्षेत्रों में सामाजिक आर्थिक असंतोष, मादक पदार्थों एवं मानव तस्करी की समस्या तथा जाली मुद्रा की समस्या का सामना करना पड़ रहा है| इसके अतरिक्त अधिकाँश पडोसी देशों के साथ सीमा विवाद अतः सीमा प्रबंधन में पडोसी देशों का सहयोग नहीं प्राप्त हो पाता है पाकिस्तान के साथ आतंकवाद, नेपाल के साथ मधेशियों की समस्या, म्यांमार एवं बांग्लादेश के साथ घुसपैठ की समस्याएं विद्यमान है भारतीय सीमाओं में सांस्कृतिक विविधता एक अलग चुनौती बनी हुई है अपर्याप्त बुनियादी ढांचा सीमाओं के प्रबंधन को कमजोर कर देता है सेना, सीमा सुरक्षा बलों, अर्धसैनिक बलों और सम्बद्ध प्रान्तों की पुलिस के मध्य समन्वय की कमी पायी जाती है| सीमा प्रबंधन के लिए सामान्य सुझाव उपरोक्त चुनौतियों को देखते हुए भारत सरकार ने इस दिशा में प्रयास करते हुए संस्थागत प्रयास किये हैं और माधव गोडबोले समिति का गठन किया गया है| समिति ने अपनी सिफारिश में कहा है कि सीमाओं की स्थलाकृतियों और कृत्रिम विवादों के कारण प्रबंधन जटिल हो जाता हैअतः सरकार को निम्नलिखित सक्रिय कदम उठाने चाहिए पडोसी देशों के साथ लंबित सीमा विवादों का शीघ्रता से निपटारा किया जाना चाहिए सीमा प्रबंधन में सूचना प्रौद्योगिकी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए बड़ी संख्या में हेलीकाप्टर यूनिट का निर्माण किया जाना चाहिए ताकि सीमाओं पर नजर रखी जा सके और आवश्यकता अनुसार प्रबंधन किया जा सके प्रभावित आबादी के बीच विश्वास बहाली के लिए राष्ट्रीय भावना को विकसित किया जाना चाहिए ताकि उग्रवादी संगठनों के विस्तार को रोका जा सके स्थानीय निवासियों की गरीबी का उन्मूलन किया जाना चाहिए अर्थात सामाजिक आर्थिक पहल अधिक अनिवार्य है भारत को इन चुनौतियों से निपटने के लिये व्यापक रणनीति बनाने की आवश्यकता है। भारत को अभी अपने सीमावर्ती क्षेत्रों में आधारभूत संरचना का निर्माण, जैसे- सड़कों का निर्माण, सामाजिक अवसंरचना आदि करने की आवश्यकता है। वांछित सैन्य आधुनिकीकरण हेतु सरकार को पर्याप्त निधियां करना चाहिये। सीमा पर उत्पन्न चुनौतियों से निपटने का दायित्व केवल सेना का ही नहीं है, अतः नागरिकों, पुलिस, केंद्र एवं राज्य के अधिकारियों तथा खुफिया एजेंसियों को भी इसमें सहयोग करना चाहिये।ताकि सीमाओं की सुरक्षा की जा सके| सुरक्षित सीमाएं भारत के सामाजिक आर्थिक विकास के लिए अति आवश्यक हैं|
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What are the different types of plate boundaries?Explain the divergent plate boundary movements. (150 Words/10 Marks)
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE TYPES OF PLATE BOUNDARIES - CONVERGENT PLATE BOUNDARY MOVEMENTS -CONCLUSION Answer:- The lithosphere is made up of the crust and upper mantle. It extends from the surface of the Earth till a depth of about a 100 km. Plates refer to the broken pieces of the Lithosphere and their movement is called tectonics. As the broken lithospheric pieces i.e. plates cannot stay firm over a liquid (read semi-liquid/ plastic like) material, they move just like boats do over the waters, on the asthenosphere. The plates while so moving to interact with the other plates and the activity that takes place at the boundaries is of great interest for the geologists. THE TYPES OF PLATE BOUNDARIES There are 3 types of plate boundaries 1) CONVERGENT PLATE BOUNDARIES: The plates move towards each other (or one plate moves towards the other plate) and destruction of material takes place. 2) DIVERGENT PLATE BOUNDARIES: The plates move away from each other. Magma erupts to fill in the void and new rocks are formed. 3) TRANSFORM PLATE BOUNDARIES: The plates simply slide against each other, without much construction or destruction. DIVERGENT PLATE BOUNDARIES When the two plates move apart from each other, new crust will be constructed due to the eruption of magma onto the surface which naturally leads to the following landforms in the sequential order. A divergent boundary is formed by tectonic plates pulling apart from each other. They are known as constructive boundaries. Divergent boundaries are the site of seafloor spreading and rift valleys. At divergent boundaries in the oceans, magma from deep in the Earth"s mantle rises toward the surface and pushes apart two or more plates. Mountains and volcanoes rise along the seam. The process renews the ocean floor and widens the giant basins. The best-known example of divergent boundaries is the Mid-Atlantic Ridge where the American Plates are separated from the Eurasian and African Plates. This single mid-ocean ridge system connects the world"s oceans, making the ridge the longest mountain range in the world (10,000 miles). On land, giant troughs such as the Great Rift Valley in Africa form where plates are tugged apart. If the plates there continue to diverge, millions of years from now eastern Africa will split from the continent to form a new landmass. A mid-ocean ridge would then mark the boundary between the plates.
##Question:What are the different types of plate boundaries?Explain the divergent plate boundary movements. (150 Words/10 Marks)##Answer: BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE TYPES OF PLATE BOUNDARIES - CONVERGENT PLATE BOUNDARY MOVEMENTS -CONCLUSION Answer:- The lithosphere is made up of the crust and upper mantle. It extends from the surface of the Earth till a depth of about a 100 km. Plates refer to the broken pieces of the Lithosphere and their movement is called tectonics. As the broken lithospheric pieces i.e. plates cannot stay firm over a liquid (read semi-liquid/ plastic like) material, they move just like boats do over the waters, on the asthenosphere. The plates while so moving to interact with the other plates and the activity that takes place at the boundaries is of great interest for the geologists. THE TYPES OF PLATE BOUNDARIES There are 3 types of plate boundaries 1) CONVERGENT PLATE BOUNDARIES: The plates move towards each other (or one plate moves towards the other plate) and destruction of material takes place. 2) DIVERGENT PLATE BOUNDARIES: The plates move away from each other. Magma erupts to fill in the void and new rocks are formed. 3) TRANSFORM PLATE BOUNDARIES: The plates simply slide against each other, without much construction or destruction. DIVERGENT PLATE BOUNDARIES When the two plates move apart from each other, new crust will be constructed due to the eruption of magma onto the surface which naturally leads to the following landforms in the sequential order. A divergent boundary is formed by tectonic plates pulling apart from each other. They are known as constructive boundaries. Divergent boundaries are the site of seafloor spreading and rift valleys. At divergent boundaries in the oceans, magma from deep in the Earth"s mantle rises toward the surface and pushes apart two or more plates. Mountains and volcanoes rise along the seam. The process renews the ocean floor and widens the giant basins. The best-known example of divergent boundaries is the Mid-Atlantic Ridge where the American Plates are separated from the Eurasian and African Plates. This single mid-ocean ridge system connects the world"s oceans, making the ridge the longest mountain range in the world (10,000 miles). On land, giant troughs such as the Great Rift Valley in Africa form where plates are tugged apart. If the plates there continue to diverge, millions of years from now eastern Africa will split from the continent to form a new landmass. A mid-ocean ridge would then mark the boundary between the plates.
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19वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन के स्वरूप का संक्षिप्त परिचय देते हुए इसके महत्व पर आलोचनात्मक टिप्पणी कीजिये । ( 150-200 शब्द; 10 अंक ) Giving a brief introduction to the form of the socio-religious reform movement of the 19th century, make critical remarks on its importance. (150-200 words; 10 marks)
दृष्टिकोण : 19 वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक आंदोलन की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन के स्वरूप की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । विभिन्न क्षेत्रों में इस सुधार आंदोलन के सकारात्मक प्रभावों की चर्चा कीजिये । सुधार आंदोलन के सीमाओं की चर्चा कीजिए । आधुनिक भारत के निर्माण में इसके महत्व की चर्चा करते हुए संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : 19वीं शताब्दी का भारत कई अर्थों में बड़े परिवर्तनों का काल रहा और सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों ने वास्तविक अर्थों में आधुनिक भारत के निर्माण की बुनियाद रखी । राममोहन राय से लेकर स्वामी विवेकानंद तक सभी सुधारकों ने सामाजिक जड़ता व धार्मिक कुरीतियों को दूर करने का प्रयास करते हुए एक नए भारत की कल्पना को साकार रूप देने का प्रयास किया । सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन का स्वरूप : 19वीं शताब्दी में भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग कालखंडों में समाज एवं धार्मिक जीवन में सुधार हेतु प्रयास प्रायः सभी धर्मों में दिखाई देती है । जैसे-हिन्दू, मुस्लिम,सिख, पारसी धर्म में सुधार । प्रायः सभी धर्मों में सुधारकों ने संगठित तरीके से प्रयास किया जैसे- संगठित स्वरूप, एक निश्चित कार्य प्रणाली तथा सामाजिक-धार्मिक मुद्दों पर केन्द्रित । धार्मिक क्षेत्र में ईश्वर आत्मा, मोक्ष, पुनर्जन्म जैसे मुद्दों को महत्व न देकर अंधविश्वास जैसी कुरीतियों को दूर करने का प्रयास । अधिकांशतः सुधारक धार्मिक सार्वभौमवादी , सुधारवादी, तथा तर्कबुद्धिवादी थे ।तथापि धर्म सुधार आंदोलन की एक मजबूत धारा पुनरोत्थानवाद भी रहा था , जैसे- आर्य समाज का आंदोलन । सामाजिक क्षेत्र में सभी सुधारकों ने एक स्वर में सामाजिक असमानताओं पर प्रहार किया । जैसे- जाति प्रथा, छुआछूत आदि का सबों ने पुरजोर विरोध किया । महिलाओं की दशा में सुधार पर सर्वाधिक बल दिया । सभी सुधारकों ने सामाजिक क्षेत्र में आधुनिक शिक्षा को परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण माध्यम माना । सुधार आंदोलनों का प्रसार मुख्यतः शहरों में दिखा हालांकि आर्य समाज, देबबंद जैसे आंदोलनों का ग्रामीण क्षेत्रों में भी जनाधार दिखा । सुधार आंदोलनों में शिक्षित मध्यवर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका थी लेकिन सुधारकों ने समाज के सभी वर्गों की दशा में सुधार व उत्थान की बात कही । सुधारकों ने लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन का संचालन किया जैसे- जागरूकता अभियान, वाद-विवाद, क़ानूनों के द्वारा सुधार इत्यादि । सुधार आंदोलन ने क्रमशः ही सही सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक जीवन को व्यापक तौर पर प्रभावित किया । विभिन्न क्षेत्रों में इस सुधार आंदोलन के सकारात्मक प्रभावों को हम निम्नलिखित रूप में देख सकते हैं : 1. सामाजिक क्षेत्र : सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार कर न केवल सामाजिक जड़ता को तोड़ा बल्कि बदलाव या प्रगति का भी संदेश सुधारकों ने दिया । महिलाओं की मुक्ति के दृष्टिकोण से भी इस आंदोलन का अत्यधिक महत्व है ।सुधारकों ने महिला शिक्षा का समर्थन कर महिलाओं को आत्मनिर्भरता के लिए प्रेरित किया ।आगे चलकर सामाजिक राजनीतिक गतिविधियों में महिलाओं की व्यापक भागीदारी का महत्वपूर्ण श्रेय इन सुधारकों को भी जाता है । आधुनिक शिक्षा के विकास में भी इस आंदोलन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । समाज में आधुनिक विचारों के प्रसार में भी इसका महत्वपूर्ण योगदान रहा । 2. धार्मिक क्षेत्र : धार्मिक आडंबरों आदि को दूर कर धर्म के सरलीकरण का प्रयास किया । विभिन्न धर्मों के बीच समन्वय तथा सहअस्तित्व पर बल । शिक्षा एवं समाज को धर्म के प्रभाव से मुक्त करने का प्रयास । 3. राजनीतिक क्षेत्र : लोकतांत्रिक कार्यशैली तथा विचारों को समाज में लोकप्रिय बनाया । भारत में राष्ट्रीय चेतना को भी प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष रूप में प्रभावित किया । आलोचनात्मक दृष्टिकोण के कारण न केवल सामाजिक-धार्मिक कुरीतियों की आलोचना बल्कि आगे चलकर राजनीतिक नीतियों का भी आलोचनात्मक विश्लेषण प्रारंभ । सरकार के असहयोगात्मक दृष्टिकोण ने स्वदेशी की भावना को मजबूत किया । सुधारों के लिए प्रेस को महत्वपूर्ण हथियार बनाया और राजनीतिक लड़ाई में भी यह हथियार अत्यंत ही उपयोगी रहा । 19वीं सदी के उतरार्ध में कई सुधारकों ने सामाजिक-धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभानी प्रारम्भ की । जैसे- दादा भाई नौरोजी , एम. जी. रानाडे । सुधार आंदोलन की सीमाएं : मुख्यतः शहरी आंदोलन रहा और इसका प्रमुख केंद्र व प्रभाव शहरों तक ही मुख्यतः सीमित रहा । यह आंदोलन मुख्यतः मध्यवर्गी आंदोलन ही रहा । एक बड़ी निम्नवर्गीय आबादी इससे अछूती रही । सुधारकों के प्रयासों के बाद भी सामाजिक-धार्मिक कुरीतियाँ बनी रही । पुनरोत्थानवादी सुधारकों की गतिविधियों ने साम्प्रादायिक तनाव की पृष्टभूमि तैयार की । उपरोक्त सीमाओं के बावजूद इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इसी सुधार आंदोलन ने एक राष्ट्र के रूप में भारत के निर्माण को प्रारंभ किया । वस्तुतः भारत में आरंभिक राष्ट्रवाद सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में ही प्रारंभ हुआ और इसी आंदोलन ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को जन्म दिया ।
##Question:19वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन के स्वरूप का संक्षिप्त परिचय देते हुए इसके महत्व पर आलोचनात्मक टिप्पणी कीजिये । ( 150-200 शब्द; 10 अंक ) Giving a brief introduction to the form of the socio-religious reform movement of the 19th century, make critical remarks on its importance. (150-200 words; 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण : 19 वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक आंदोलन की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन के स्वरूप की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । विभिन्न क्षेत्रों में इस सुधार आंदोलन के सकारात्मक प्रभावों की चर्चा कीजिये । सुधार आंदोलन के सीमाओं की चर्चा कीजिए । आधुनिक भारत के निर्माण में इसके महत्व की चर्चा करते हुए संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : 19वीं शताब्दी का भारत कई अर्थों में बड़े परिवर्तनों का काल रहा और सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों ने वास्तविक अर्थों में आधुनिक भारत के निर्माण की बुनियाद रखी । राममोहन राय से लेकर स्वामी विवेकानंद तक सभी सुधारकों ने सामाजिक जड़ता व धार्मिक कुरीतियों को दूर करने का प्रयास करते हुए एक नए भारत की कल्पना को साकार रूप देने का प्रयास किया । सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन का स्वरूप : 19वीं शताब्दी में भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग कालखंडों में समाज एवं धार्मिक जीवन में सुधार हेतु प्रयास प्रायः सभी धर्मों में दिखाई देती है । जैसे-हिन्दू, मुस्लिम,सिख, पारसी धर्म में सुधार । प्रायः सभी धर्मों में सुधारकों ने संगठित तरीके से प्रयास किया जैसे- संगठित स्वरूप, एक निश्चित कार्य प्रणाली तथा सामाजिक-धार्मिक मुद्दों पर केन्द्रित । धार्मिक क्षेत्र में ईश्वर आत्मा, मोक्ष, पुनर्जन्म जैसे मुद्दों को महत्व न देकर अंधविश्वास जैसी कुरीतियों को दूर करने का प्रयास । अधिकांशतः सुधारक धार्मिक सार्वभौमवादी , सुधारवादी, तथा तर्कबुद्धिवादी थे ।तथापि धर्म सुधार आंदोलन की एक मजबूत धारा पुनरोत्थानवाद भी रहा था , जैसे- आर्य समाज का आंदोलन । सामाजिक क्षेत्र में सभी सुधारकों ने एक स्वर में सामाजिक असमानताओं पर प्रहार किया । जैसे- जाति प्रथा, छुआछूत आदि का सबों ने पुरजोर विरोध किया । महिलाओं की दशा में सुधार पर सर्वाधिक बल दिया । सभी सुधारकों ने सामाजिक क्षेत्र में आधुनिक शिक्षा को परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण माध्यम माना । सुधार आंदोलनों का प्रसार मुख्यतः शहरों में दिखा हालांकि आर्य समाज, देबबंद जैसे आंदोलनों का ग्रामीण क्षेत्रों में भी जनाधार दिखा । सुधार आंदोलनों में शिक्षित मध्यवर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका थी लेकिन सुधारकों ने समाज के सभी वर्गों की दशा में सुधार व उत्थान की बात कही । सुधारकों ने लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन का संचालन किया जैसे- जागरूकता अभियान, वाद-विवाद, क़ानूनों के द्वारा सुधार इत्यादि । सुधार आंदोलन ने क्रमशः ही सही सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक जीवन को व्यापक तौर पर प्रभावित किया । विभिन्न क्षेत्रों में इस सुधार आंदोलन के सकारात्मक प्रभावों को हम निम्नलिखित रूप में देख सकते हैं : 1. सामाजिक क्षेत्र : सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार कर न केवल सामाजिक जड़ता को तोड़ा बल्कि बदलाव या प्रगति का भी संदेश सुधारकों ने दिया । महिलाओं की मुक्ति के दृष्टिकोण से भी इस आंदोलन का अत्यधिक महत्व है ।सुधारकों ने महिला शिक्षा का समर्थन कर महिलाओं को आत्मनिर्भरता के लिए प्रेरित किया ।आगे चलकर सामाजिक राजनीतिक गतिविधियों में महिलाओं की व्यापक भागीदारी का महत्वपूर्ण श्रेय इन सुधारकों को भी जाता है । आधुनिक शिक्षा के विकास में भी इस आंदोलन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । समाज में आधुनिक विचारों के प्रसार में भी इसका महत्वपूर्ण योगदान रहा । 2. धार्मिक क्षेत्र : धार्मिक आडंबरों आदि को दूर कर धर्म के सरलीकरण का प्रयास किया । विभिन्न धर्मों के बीच समन्वय तथा सहअस्तित्व पर बल । शिक्षा एवं समाज को धर्म के प्रभाव से मुक्त करने का प्रयास । 3. राजनीतिक क्षेत्र : लोकतांत्रिक कार्यशैली तथा विचारों को समाज में लोकप्रिय बनाया । भारत में राष्ट्रीय चेतना को भी प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष रूप में प्रभावित किया । आलोचनात्मक दृष्टिकोण के कारण न केवल सामाजिक-धार्मिक कुरीतियों की आलोचना बल्कि आगे चलकर राजनीतिक नीतियों का भी आलोचनात्मक विश्लेषण प्रारंभ । सरकार के असहयोगात्मक दृष्टिकोण ने स्वदेशी की भावना को मजबूत किया । सुधारों के लिए प्रेस को महत्वपूर्ण हथियार बनाया और राजनीतिक लड़ाई में भी यह हथियार अत्यंत ही उपयोगी रहा । 19वीं सदी के उतरार्ध में कई सुधारकों ने सामाजिक-धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभानी प्रारम्भ की । जैसे- दादा भाई नौरोजी , एम. जी. रानाडे । सुधार आंदोलन की सीमाएं : मुख्यतः शहरी आंदोलन रहा और इसका प्रमुख केंद्र व प्रभाव शहरों तक ही मुख्यतः सीमित रहा । यह आंदोलन मुख्यतः मध्यवर्गी आंदोलन ही रहा । एक बड़ी निम्नवर्गीय आबादी इससे अछूती रही । सुधारकों के प्रयासों के बाद भी सामाजिक-धार्मिक कुरीतियाँ बनी रही । पुनरोत्थानवादी सुधारकों की गतिविधियों ने साम्प्रादायिक तनाव की पृष्टभूमि तैयार की । उपरोक्त सीमाओं के बावजूद इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इसी सुधार आंदोलन ने एक राष्ट्र के रूप में भारत के निर्माण को प्रारंभ किया । वस्तुतः भारत में आरंभिक राष्ट्रवाद सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में ही प्रारंभ हुआ और इसी आंदोलन ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को जन्म दिया ।
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पृथ्वी के गोलाकार होने के साक्ष्यों की चर्चा कीजिये| साथ ही, पृथ्वी ग्रह की विशिष्टताओं को सूचीबद्ध कीजिये| (150-200 शब्द, अंक - 10 ) Discuss the evidence of the Earth being circular. Also, list the characteristics of the planet Earth.(150-200 Words, Marks - 10 )
Approach: सौरमण्डल के ग्रह के रूप में पृथ्वी का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करते हुए उत्तर की शुरुवात कर सकते हैं। पृथ्वी के गोलाकार होने के साक्ष्यों की चर्चा कीजिए। ग्रह की विशिष्टताओं को सूचीबद्ध कीजिए। सौरमंडल में पृथ्वी के महत्व की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर- पृथ्वी सौरमंडल का एकमात्र ऐसा ग्रह है जिस पर जीवन का अस्तित्व है। प्रचुर मात्रा में जल की उपस्थित के कारण इसे नीला ग्रह भी कहा जाता है। सूर्य से दूरी के आधार पर यह तीसरे स्थान पर है जबकि आकार के आधार पर सभी ग्रहों में इसका स्थान पांचवा है। रेडियोएक्टिव डेटिंग और साक्ष्य के अन्य स्रोतों के अनुसार, पृथ्वी की आयु लगभग 4.54 बिलियन वर्ष है। चंद्रमा पृथ्वी का एकमात्र उपग्रह है। पृथ्वी के गोलाकार होने के साक्ष्य: सूर्य और सौरमंडल के अन्य सभी ग्रह गोल हैं। यदि पृथ्वी समतल होती तो पृथ्वी पर सभी स्थानों पर सूर्योदय एवं सूर्यास्त वास्तव में एक समय में होने चाहिए थे। यदि हम जहाज को समुद्र से निकट पहुँचते हुए देखते हैं, तो पहले हमें जहाज का धुआँ दिखाई देता है और जब यह पूर्ण रूप से क्षैतिज पर आता है तो धीरे धीरे पूरा जहाज दिखाई देता है। यदि पृथ्वी समतल होती, तो हम एक समय में पूरे जहाज को देखने में सक्षम होते। चन्द्र ग्रहण के दौरान देखि गयी वृत्ताकार छाया केवल एक गोलाकार पिंड द्वारा ही बनाई जा सकती है। यदि हम किसी भी स्थान से चारों ओर देखते हैं चाहे एक पहाड़, समतल मैदान या एक बहुत लमभी इमारत का शीर्ष, क्षितिज हमेशा वृत्ताकार ही दिखाई देगा। यह केवल एक गोलाकार पिंड के संदर्भ में ही संभव है। 1520 में मैगलन द्वारा की गयी परि-महासागरीय जलयात्रा ने यह सिद्ध किया था कि पृथ्वी गोलाकार है। जब इंजीनियर भूमि पर अनियंत्रित अंतराल पर समान लंबाई के खंभे लगाते हैं तो यह पाया जाता है कि वे एक आदर्श क्षैतिज स्तर पर नहीं बन पाते हैं। पृथ्वी की वक्रता के कारण मध्यवर्ती खंभा दोनों तरफ के खंभे से थोड़ा ऊंचा रह जाता है। जब बाह्य अन्तरिक्ष से पृथ्वी के वास्तविक स्वरूप को देखते हैं तो यह पाते हैं कि पृथ्वी का आकार गोल है। पृथ्वी की विशिष्टताएँ- पृथ्वी, शुक्र और मंगल ग्रह की कक्षाओं के मध्य स्थित है तथा सूर्य से इसकी औसत दूरी लगभग 148 मिलियन किमी है। सूर्य से पृथ्वी की यह दूरी, पृथ्वी को आदर्श स्थिति प्रदान करती है। यह न तो शुक्र के समान अधिक गरम है ना ही मंगल और अन्य बाहरी ग्रहों के समान ठंडी है। सूर्य के सन्मुख रहने वाले भाग का औसत तापमान लगभग 17 डिग्री सेल्सियस होता है। पृथ्वी पर अनुकूल पर्यावरण विद्यमान है उयर यह जीवन के विभिन्न रूपों के उद्भव, विकास और अस्तित्व हेतु आदर्श परिस्थितियाँ प्रस्तुत करता है। यदि सूर्यातप में 10% की वृद्धि या कमी होती है तो पृथ्वी का एक बहुत बड़ा भाग जैविक घटकों के लिए अनुपयुक्त हो जाएगा। पृथ्वी का अपनी अक्ष पर घूर्णन, दिन और रात के बीच अधिकतम तापमान को सहनीय सीमा के अंदर बनाए रखने में मदद करता है। महासागरों, समुद्रों, खाड़ियों, नदियों, झीलों आदि में जल की पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता, हमारे ग्रह की अनूठी विशेषता है। जल पृथ्वी के कुल भू-क्षेत्र के 71 प्रतिशत भाग पर विद्यमान है। यह जलराशि जाईवान के विभिन्न रूपों के विकास हेतु आदर्श स्थिति प्रदान करती है। वायुमंडल एक कवच के रूप में कार्य करता है और सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों से हमारे ग्रह की रक्षा करता है। वायुमंडल पृथ्वी की सतह से पार्थिव विकिरण को अवशोषित कर लेता है और इस प्रकार पृथ्वी को रात के समय और शीट ऋतु के दौरान अपेक्षाकृत गर्म बनाए रखता है। वायुमंडल में ऑक्सिजन की उपस्थिति ने पृथ्वी पर जीवन को संभव बनाया है, चूंकि यह सभी जीवित जीवों के श्वसन एवं अस्तित्व के लिए आवश्यक है। ब्रह्मांड में सौरमंडल विद्यमान है जिसमें केवल पृथ्वी ऐसा ग्रह है जिस पर जीवन की संभावना है। पृथ्वी पर जीवन की संभावना ही इसकी सबसे बड़ी विशिष्टता है। वैज्ञानिकों द्वारा अन्य ग्रहों पर भी जीवन की संभावना की तलाश की जा रही है।
##Question:पृथ्वी के गोलाकार होने के साक्ष्यों की चर्चा कीजिये| साथ ही, पृथ्वी ग्रह की विशिष्टताओं को सूचीबद्ध कीजिये| (150-200 शब्द, अंक - 10 ) Discuss the evidence of the Earth being circular. Also, list the characteristics of the planet Earth.(150-200 Words, Marks - 10 )##Answer:Approach: सौरमण्डल के ग्रह के रूप में पृथ्वी का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करते हुए उत्तर की शुरुवात कर सकते हैं। पृथ्वी के गोलाकार होने के साक्ष्यों की चर्चा कीजिए। ग्रह की विशिष्टताओं को सूचीबद्ध कीजिए। सौरमंडल में पृथ्वी के महत्व की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर- पृथ्वी सौरमंडल का एकमात्र ऐसा ग्रह है जिस पर जीवन का अस्तित्व है। प्रचुर मात्रा में जल की उपस्थित के कारण इसे नीला ग्रह भी कहा जाता है। सूर्य से दूरी के आधार पर यह तीसरे स्थान पर है जबकि आकार के आधार पर सभी ग्रहों में इसका स्थान पांचवा है। रेडियोएक्टिव डेटिंग और साक्ष्य के अन्य स्रोतों के अनुसार, पृथ्वी की आयु लगभग 4.54 बिलियन वर्ष है। चंद्रमा पृथ्वी का एकमात्र उपग्रह है। पृथ्वी के गोलाकार होने के साक्ष्य: सूर्य और सौरमंडल के अन्य सभी ग्रह गोल हैं। यदि पृथ्वी समतल होती तो पृथ्वी पर सभी स्थानों पर सूर्योदय एवं सूर्यास्त वास्तव में एक समय में होने चाहिए थे। यदि हम जहाज को समुद्र से निकट पहुँचते हुए देखते हैं, तो पहले हमें जहाज का धुआँ दिखाई देता है और जब यह पूर्ण रूप से क्षैतिज पर आता है तो धीरे धीरे पूरा जहाज दिखाई देता है। यदि पृथ्वी समतल होती, तो हम एक समय में पूरे जहाज को देखने में सक्षम होते। चन्द्र ग्रहण के दौरान देखि गयी वृत्ताकार छाया केवल एक गोलाकार पिंड द्वारा ही बनाई जा सकती है। यदि हम किसी भी स्थान से चारों ओर देखते हैं चाहे एक पहाड़, समतल मैदान या एक बहुत लमभी इमारत का शीर्ष, क्षितिज हमेशा वृत्ताकार ही दिखाई देगा। यह केवल एक गोलाकार पिंड के संदर्भ में ही संभव है। 1520 में मैगलन द्वारा की गयी परि-महासागरीय जलयात्रा ने यह सिद्ध किया था कि पृथ्वी गोलाकार है। जब इंजीनियर भूमि पर अनियंत्रित अंतराल पर समान लंबाई के खंभे लगाते हैं तो यह पाया जाता है कि वे एक आदर्श क्षैतिज स्तर पर नहीं बन पाते हैं। पृथ्वी की वक्रता के कारण मध्यवर्ती खंभा दोनों तरफ के खंभे से थोड़ा ऊंचा रह जाता है। जब बाह्य अन्तरिक्ष से पृथ्वी के वास्तविक स्वरूप को देखते हैं तो यह पाते हैं कि पृथ्वी का आकार गोल है। पृथ्वी की विशिष्टताएँ- पृथ्वी, शुक्र और मंगल ग्रह की कक्षाओं के मध्य स्थित है तथा सूर्य से इसकी औसत दूरी लगभग 148 मिलियन किमी है। सूर्य से पृथ्वी की यह दूरी, पृथ्वी को आदर्श स्थिति प्रदान करती है। यह न तो शुक्र के समान अधिक गरम है ना ही मंगल और अन्य बाहरी ग्रहों के समान ठंडी है। सूर्य के सन्मुख रहने वाले भाग का औसत तापमान लगभग 17 डिग्री सेल्सियस होता है। पृथ्वी पर अनुकूल पर्यावरण विद्यमान है उयर यह जीवन के विभिन्न रूपों के उद्भव, विकास और अस्तित्व हेतु आदर्श परिस्थितियाँ प्रस्तुत करता है। यदि सूर्यातप में 10% की वृद्धि या कमी होती है तो पृथ्वी का एक बहुत बड़ा भाग जैविक घटकों के लिए अनुपयुक्त हो जाएगा। पृथ्वी का अपनी अक्ष पर घूर्णन, दिन और रात के बीच अधिकतम तापमान को सहनीय सीमा के अंदर बनाए रखने में मदद करता है। महासागरों, समुद्रों, खाड़ियों, नदियों, झीलों आदि में जल की पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता, हमारे ग्रह की अनूठी विशेषता है। जल पृथ्वी के कुल भू-क्षेत्र के 71 प्रतिशत भाग पर विद्यमान है। यह जलराशि जाईवान के विभिन्न रूपों के विकास हेतु आदर्श स्थिति प्रदान करती है। वायुमंडल एक कवच के रूप में कार्य करता है और सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों से हमारे ग्रह की रक्षा करता है। वायुमंडल पृथ्वी की सतह से पार्थिव विकिरण को अवशोषित कर लेता है और इस प्रकार पृथ्वी को रात के समय और शीट ऋतु के दौरान अपेक्षाकृत गर्म बनाए रखता है। वायुमंडल में ऑक्सिजन की उपस्थिति ने पृथ्वी पर जीवन को संभव बनाया है, चूंकि यह सभी जीवित जीवों के श्वसन एवं अस्तित्व के लिए आवश्यक है। ब्रह्मांड में सौरमंडल विद्यमान है जिसमें केवल पृथ्वी ऐसा ग्रह है जिस पर जीवन की संभावना है। पृथ्वी पर जीवन की संभावना ही इसकी सबसे बड़ी विशिष्टता है। वैज्ञानिकों द्वारा अन्य ग्रहों पर भी जीवन की संभावना की तलाश की जा रही है।
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अंतर्राष्ट्रीय संबंध से आप क्या समझते हैं ? अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के आधार व इसे स्थापित करने के विभिन्न साधनों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द ) What do you understand by international relations? Briefly discuss the basis of international relations and the various means of establishing it. (150-200 words)
दृष्टिकोण : अंतर्राष्ट्रीय संबंध को परिभाषित करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के विभिन्न आधारों की चर्चा कीजिए । अंतर्राष्ट्रीय संबंध स्थापित करने लिए प्रयुक्त विभिन्न साधनों की चर्चा कीजिए । वर्तमान विश्व में अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के महत्व की चर्चा करते हुए संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : जब दो या दो से अधिक राष्ट्र राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक आदि क्षेत्रों में अंतः क्रिया करते हैं एवं संबंधों को सकारात्मकता प्रदान करते हैं तो ऐसी स्थिति को अंतर्राष्ट्रीय संबंध कहा जाता है । सामान्यतः दो या दो से अधिक संप्रभु सम्पन्न राष्ट्र अपने हितों की प्राप्ति के लिए आपस में संबंध स्थापित करते हैं ऐसे सम्बन्धों को अंतर्राष्ट्रीय संबंध के रूप में परिभाषित किया जाता है । इसके अंतर्गत अंतर-सरकारी संगठनों (IGOs), अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संगठनों (INGOs), गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) की भूमिका का भी अध्ययन किया जाता है । वस्तुतः विभिन्न राष्ट्र व संगठन निम्न कारणों से एक दूसरे के साथ जुड़ने का प्रयास करते हैं : आत्मनिर्भरता का अभाव : वस्तुतः वर्तमान समय में कोई भी राष्ट्र या संगठन आत्मनिर्भर नहीं हो सकता है । वैश्वीकरण का यह समय परस्पर निर्भरता का काल है । इसलिए राष्ट्र व संगठन एक दूसरे के साथ बेहतर ढंग से जुडने का प्रयास करते हैं । महत्वाकांक्षा व प्रभुत्व की लालसा : कई राष्ट्र व संगठन अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति व विश्व पर अपने प्रभुत्व की धाक जामने के लिए भी एक दूसरे के साथ बेहतर ढंग से जुड़ने का प्रयास करते हैं । अपनी संस्कृति को संरक्षित करना व अन्य संस्कृतियों को प्रभावित करना भी अलग-अलग राष्ट्रों के बीच संबंध बनाने के लिए प्रेरित करता है । मानवीय मूल्यों को संरक्षित करना भी वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में सम्बन्धों के आधार को प्रभावित करने वाला एक प्रमुख कारक है । बेहतर अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को स्थापित करने के लिए राष्ट्रों द्वारा कुछ प्रमुख साधनों का प्रयोग किया जाता है जिसे हम निम्नलिखित रूप में देख सकते हैं : कूटनीति : इसके अंतर्गत हम आर्थिक कूटनीति, सैनिक कूटनीति, सांस्कृतिक कूटनीति व धार्मिक कूटनीति के रूप में राष्ट्रों के प्रयासों को देख व समझ सकते हैं । आर्थिक कूटनीति : विभिन्न राष्ट्र अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए दूसरे राष्ट्रों पर निर्भर होता है । सामान्यतः विकसित राष्ट्र अपनी आर्थिक कूटनीति का प्रयोग विकासशील राष्ट्रों को अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर अपने पक्ष में करने के लिए करता है । वहीं विकासशील राष्ट्रों का उद्देश विकसित राष्ट्रों से आर्थिक व तकनीकी मदद प्राप्त करने की होती है । डॉलरीकरण, सहयोगात्मक कूटनीति, संयुक्त आर्थिक कूटनीति, मुद्रा स्फीति व अवस्फीति कूटनीति आदि आर्थिक कूटनीति के विभिन्न रूप हैं । सैनिक कूटनीति : अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को प्रभावित करने में सैनिक कूटनीति की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है । इसके अंतर्गतयुद्धप्रिय कूटनीति, शांतिप्रिय कूटनीति, समन्वयात्मक कूटनीतिआदि विभिन्न प्रकार के स्वरूप देखने को मिलते हैं । वर्तमान बहुध्रुवीय युग में सैनिक कूटनीति का महत्व कम हुआ है । सांस्कृतिक कूटनीति : इसके माध्यम से एक राष्ट्र अपनी सॉफ्ट पावर इमेज को बढ़ाता है और दूसरे राष्ट्र पर अपने प्रभाव को निर्मित करने का प्रयास करता है । इसके अंतर्गत कला, साहित्य, फिल्म, जीवनशैली जैसे आयामों को सम्मिलित किया जाता है । सांस्कृतिक कूटनीति ट्रैक टु कूटनीति के अंतर्गत सम्मिलित किया जाता है । धार्मिक कूटनीति : इसी प्रकार धार्मिक कूटनीति भी अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण पहलू है । भारत का कई देशों के संबंधों में धार्मिक कूटनीति एक महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करता है । जैसे- भारत जापान संबंध । इसके अलावा क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के द्वारा तथा विभिन्न समझौतों, वार्ता आदि के माध्यम से भी अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को आगे बढ़ाने का कार्य किया जाता है । वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में कोई भी राष्ट्र एकाकी नहीं चल सकता है । अपने विविध हितों की पूर्ति के लिए राष्ट्रों की परस्पर निर्भरता बढ़ी है । ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का दायरा काफी बढ़ा है । साथ ही वर्तमान बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था में सैनिक कूटनीति की तुलना में सांस्कृतिक कूटनीति व आर्थिक कूटनीति का महत्व तुलनात्मक रूप से काफी अधिका है ।
##Question:अंतर्राष्ट्रीय संबंध से आप क्या समझते हैं ? अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के आधार व इसे स्थापित करने के विभिन्न साधनों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द ) What do you understand by international relations? Briefly discuss the basis of international relations and the various means of establishing it. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण : अंतर्राष्ट्रीय संबंध को परिभाषित करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के विभिन्न आधारों की चर्चा कीजिए । अंतर्राष्ट्रीय संबंध स्थापित करने लिए प्रयुक्त विभिन्न साधनों की चर्चा कीजिए । वर्तमान विश्व में अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के महत्व की चर्चा करते हुए संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : जब दो या दो से अधिक राष्ट्र राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक आदि क्षेत्रों में अंतः क्रिया करते हैं एवं संबंधों को सकारात्मकता प्रदान करते हैं तो ऐसी स्थिति को अंतर्राष्ट्रीय संबंध कहा जाता है । सामान्यतः दो या दो से अधिक संप्रभु सम्पन्न राष्ट्र अपने हितों की प्राप्ति के लिए आपस में संबंध स्थापित करते हैं ऐसे सम्बन्धों को अंतर्राष्ट्रीय संबंध के रूप में परिभाषित किया जाता है । इसके अंतर्गत अंतर-सरकारी संगठनों (IGOs), अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संगठनों (INGOs), गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) की भूमिका का भी अध्ययन किया जाता है । वस्तुतः विभिन्न राष्ट्र व संगठन निम्न कारणों से एक दूसरे के साथ जुड़ने का प्रयास करते हैं : आत्मनिर्भरता का अभाव : वस्तुतः वर्तमान समय में कोई भी राष्ट्र या संगठन आत्मनिर्भर नहीं हो सकता है । वैश्वीकरण का यह समय परस्पर निर्भरता का काल है । इसलिए राष्ट्र व संगठन एक दूसरे के साथ बेहतर ढंग से जुडने का प्रयास करते हैं । महत्वाकांक्षा व प्रभुत्व की लालसा : कई राष्ट्र व संगठन अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति व विश्व पर अपने प्रभुत्व की धाक जामने के लिए भी एक दूसरे के साथ बेहतर ढंग से जुड़ने का प्रयास करते हैं । अपनी संस्कृति को संरक्षित करना व अन्य संस्कृतियों को प्रभावित करना भी अलग-अलग राष्ट्रों के बीच संबंध बनाने के लिए प्रेरित करता है । मानवीय मूल्यों को संरक्षित करना भी वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में सम्बन्धों के आधार को प्रभावित करने वाला एक प्रमुख कारक है । बेहतर अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को स्थापित करने के लिए राष्ट्रों द्वारा कुछ प्रमुख साधनों का प्रयोग किया जाता है जिसे हम निम्नलिखित रूप में देख सकते हैं : कूटनीति : इसके अंतर्गत हम आर्थिक कूटनीति, सैनिक कूटनीति, सांस्कृतिक कूटनीति व धार्मिक कूटनीति के रूप में राष्ट्रों के प्रयासों को देख व समझ सकते हैं । आर्थिक कूटनीति : विभिन्न राष्ट्र अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए दूसरे राष्ट्रों पर निर्भर होता है । सामान्यतः विकसित राष्ट्र अपनी आर्थिक कूटनीति का प्रयोग विकासशील राष्ट्रों को अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर अपने पक्ष में करने के लिए करता है । वहीं विकासशील राष्ट्रों का उद्देश विकसित राष्ट्रों से आर्थिक व तकनीकी मदद प्राप्त करने की होती है । डॉलरीकरण, सहयोगात्मक कूटनीति, संयुक्त आर्थिक कूटनीति, मुद्रा स्फीति व अवस्फीति कूटनीति आदि आर्थिक कूटनीति के विभिन्न रूप हैं । सैनिक कूटनीति : अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को प्रभावित करने में सैनिक कूटनीति की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है । इसके अंतर्गतयुद्धप्रिय कूटनीति, शांतिप्रिय कूटनीति, समन्वयात्मक कूटनीतिआदि विभिन्न प्रकार के स्वरूप देखने को मिलते हैं । वर्तमान बहुध्रुवीय युग में सैनिक कूटनीति का महत्व कम हुआ है । सांस्कृतिक कूटनीति : इसके माध्यम से एक राष्ट्र अपनी सॉफ्ट पावर इमेज को बढ़ाता है और दूसरे राष्ट्र पर अपने प्रभाव को निर्मित करने का प्रयास करता है । इसके अंतर्गत कला, साहित्य, फिल्म, जीवनशैली जैसे आयामों को सम्मिलित किया जाता है । सांस्कृतिक कूटनीति ट्रैक टु कूटनीति के अंतर्गत सम्मिलित किया जाता है । धार्मिक कूटनीति : इसी प्रकार धार्मिक कूटनीति भी अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण पहलू है । भारत का कई देशों के संबंधों में धार्मिक कूटनीति एक महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करता है । जैसे- भारत जापान संबंध । इसके अलावा क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के द्वारा तथा विभिन्न समझौतों, वार्ता आदि के माध्यम से भी अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को आगे बढ़ाने का कार्य किया जाता है । वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में कोई भी राष्ट्र एकाकी नहीं चल सकता है । अपने विविध हितों की पूर्ति के लिए राष्ट्रों की परस्पर निर्भरता बढ़ी है । ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का दायरा काफी बढ़ा है । साथ ही वर्तमान बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था में सैनिक कूटनीति की तुलना में सांस्कृतिक कूटनीति व आर्थिक कूटनीति का महत्व तुलनात्मक रूप से काफी अधिका है ।
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एकीकृत भारत के निर्माण के संदर्भ में, स्वतंत्रता के समय रियासतों के विलय/एकीकरण में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा ? इस संदर्भ में सरदार पटेल की भूमिका पर प्रकाश डालिए| (150-200 शब्द/10 अंक) In the context of making a unified India, what were the challenges faced in the merger/integration of the princely states during independence? In this context, throw light on the role played by Sardar Patel? (150-200 words/10 Marks)
एप्रोच- भूमिका में, भारत के विभाजन के समय ब्रिटिश भारत एवं देशी रियासतों के बीच देश के बंटे होनेकासंक्षिप्त उल्लेख कीजिये| अगले भाग में, देशी रियासतों के विलय के मार्ग में आने वाली चुनौतियों को बिन्दुबार लिखिए| इस संदर्भ में, सरदार पटेलद्वारा गृहमंत्री तथा रियासत विभाग के प्रमुख के रूप में एकीकरण के किये गये प्रयासों पर चर्चा कीजिये| उत्तर- विभाजन के पश्चात स्वतंत्र भारत मुख्यतः 2 हिस्सों में बंटा हुआ था- सीधे ब्रिटिश नियंत्रण वाले क्षेत्र तथा देशी रियासतें| सीधे नियंत्रण वाले क्षेत्र के एकीकरण को लेकर तो कोई समस्या नहीं थी लेकिन ब्रिटिश पैरामाउंटेसी के तहत स्वायत्तता प्रदान एवं राजाओं द्वारा शासित देशी रियासतों का भारत में विलय एक गंभीर चुनौती थी| आज़ादी के समय ब्रिटिश भारत के कुल 40% भाग पर लगभग 565 देशी रियासतों का शासन था| जैसे ही अंग्रेज भारत छोड़ने वाले थें तो इनमें से कइयों ने अपनी संप्रभुता तथा आज़ादी के स्वपन देखने चालू कर दिए थें| रियासतों के विलय में बाधक तत्व या चुनौतियाँ रियासतों के प्रति अंग्रेजों का दृष्टिकोण- लंबे समय तक अंग्रेजों द्वारा बांटो एवं राज करो की नीति; क्रिप्स मिशन में रियासतों को अलग रहने का विकल्प; 1947 में एटली की यह घोषणा कि ब्रिटिश सरकार पैरामाउंटेसी के तहत अपनी शक्तियों और कर्तव्यों को भारत या पकिस्तान किसी भी सरकार को सौंपने का इरादा नहीं रखती है| इससे कई रियासतों ने यह दावा करना चालू कर दिया कि 15 अगस्त 1947 के बाद वे स्वतंत्र बने रह जायेंगे| आजादी से पूर्वजिन्ना द्वारा खुलकर रियासतों की स्वतंत्रता का समर्थन; साम्यवादी भी रियासतों की स्वतंत्रता के समर्थक; कई रियासतों द्वारा स्वतंत्र रहने की इच्छाजैसे- कश्मीर, हैदराबाद, त्रावनकोर, भोपाल आदि; रियासतों कीसंख्या तथा भौगोलिक अवस्थिति; कई रियासतों द्वारापाकिस्तान में विलय की इच्छाजैसे- जोधपुर, भोपाल आदि; ब्रिटिश प्रान्त तथा देशी रियासतों मेंराजनीतिक आर्थिक असमानता; हालाँकि राष्ट्रवादी आन्दोलन के नेताओं तथा कांग्रेस ने उपरोक्त चुनौतियों से पार करने की दिशा में अनेकों कदम उठायें तथा यह दृष्टिकोण रखा कि देशी रियासतें अपनी जनता की इच्छा एवं भौगोलिक स्थिति के माध्यम से या तो पाकिस्तान में शामिल हो सकती हैं या भारत में| साथ ही, रियासतों की जनता भी प्रजा समितियों के नेतृत्व में स्वतंत्र बने रहने को इच्छुक नहीं थी| साथ ही, रियासतों के विलय में कुछ अन्य सहायक तत्व भी थें जैसे- रियासतोंमें राजनीतिक चेतना का प्रसार; भारत छोड़ो आंदोलन तक रियासतों एवं ब्रिटिश प्रान्तों में भावनात्मक एकता का विकास; अखिल भारतीय रियासती प्रजामंडल तथा प्रजामंडल आंदोलनों का प्रभाव; कॉंग्रेस द्वारा रियासतों के लोकतांत्रीकरण तथा आज़ादी को समर्थन; पटेल, मेनन, माऊंटबेटेन आदि का योगदान; काफी रियासतों ने अप्रैल 1947 की संविधान सभा में शामिल होकर एकीकरण की प्रक्रिया में अपना योगदान दिया परन्तु कई रियासतें इससे अलग रहीं| एकीकरण के चरण तथा सरदार पटेल की भूमिका चरण 1 जून 1947 में पटेल के नेतृत्व में रियासती विभाग का गठन; सचिव- वीपी मेनन; विलयपत्र(इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेसन) के माध्यम से आग्रह; रक्षा, संचार तथा विदेश मामलें भारतीय संघ को सौंपे जाने का प्रावधान; पटेल द्वारा प्रलोभन तथा चेतावनीका भी सहारा जैसे- 15 अगस्त 1947 के पश्चात विलय की शर्तों का कठोर होना; जनता की उग्रता की आशंका आदि| विलय करने वाले शासकों को महल, संपति पर नियंत्रण, सलामी लेने का अधिकार, टाइटल रखने का अधिकार; प्रिवी पर्सआदि सुविधाएँ; पटेल द्वारा रियासतों के राजाओं के मनाने के कार्य में माउंटबेटन का भी सहयोग लेना जैसे- चैम्बर ऑफ प्रिंसेज में उनके भाषण के द्वारा सहमति बनाने की कोशिश; अपनी रियासतों में जनता के विद्रोह, पटेल तथा भारत के राष्ट्रवादी नेताओं के कठोर दबाव तथा पटेल की धमकियों के फलस्वरूप 15 अगस्त 1947 से पूर्वकश्मीर(अक्टूबर 1947 में विलय पत्र पर हस्ताक्षर), हैदराबाद(नवंबर 1949 में सैन्य कार्रवाई के माध्यम से विलय) तथा जूनागढ़(फ़रवरी 1948 में जनमत संग्रह के माध्यम से विलय) के अतिरिक्त सभी रियासतेंभारत में शामिलहो गयी थीं| गृहमंत्री की हैसियत से जूनागढ़ में जनता की इच्छा के अनुरूप जनमत संग्रह करवाकर उसे भारत में शामिल करना; हैदराबाद के निजाम के साथ चली लंबी शांतिवार्ता का कोई निष्कर्ष होता ना देखकर सितंबर 1948 में सेना की कार्रवाई द्वारा उसे भारत में विलय करवाना; चरण-2(15 अगस्त 1947-1950) एकीकरण के दृष्टिकोण से यह चरण भी महत्वपूर्ण थी जिसमें प्रमुख समस्या देशी रियासतों के पुनर्गठन की थी| सरदार पटेल द्वारा कुशलतापूर्वक इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाना; अपेक्षाकृत छोटी रियासतों का ब्रिटिश प्रांतों में विलय; अपेक्षाकृत बड़े रियासतों को स्वतंत्र/यथास्थिति रहने देना(कश्मीर, हैदराबाद, मैसूर आदि); कुछ रियासतों का संघ बनाया जाना; जैसे- सौराष्ट्र, त्रावनकोर-कोचीन; पेप्सू आदि; उपरोक्त आयामों को देखकर सरदार पटेल की अखंड तथा वर्तमान भारत के निर्माण में अहम् भूमिका को समझा जा सकता है| यही कारण है कि उन्हें आधुनिक भारत के शिल्पीकार तथा लौह पुरुष की भी संज्ञा दी जाती है|
##Question:एकीकृत भारत के निर्माण के संदर्भ में, स्वतंत्रता के समय रियासतों के विलय/एकीकरण में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा ? इस संदर्भ में सरदार पटेल की भूमिका पर प्रकाश डालिए| (150-200 शब्द/10 अंक) In the context of making a unified India, what were the challenges faced in the merger/integration of the princely states during independence? In this context, throw light on the role played by Sardar Patel? (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच- भूमिका में, भारत के विभाजन के समय ब्रिटिश भारत एवं देशी रियासतों के बीच देश के बंटे होनेकासंक्षिप्त उल्लेख कीजिये| अगले भाग में, देशी रियासतों के विलय के मार्ग में आने वाली चुनौतियों को बिन्दुबार लिखिए| इस संदर्भ में, सरदार पटेलद्वारा गृहमंत्री तथा रियासत विभाग के प्रमुख के रूप में एकीकरण के किये गये प्रयासों पर चर्चा कीजिये| उत्तर- विभाजन के पश्चात स्वतंत्र भारत मुख्यतः 2 हिस्सों में बंटा हुआ था- सीधे ब्रिटिश नियंत्रण वाले क्षेत्र तथा देशी रियासतें| सीधे नियंत्रण वाले क्षेत्र के एकीकरण को लेकर तो कोई समस्या नहीं थी लेकिन ब्रिटिश पैरामाउंटेसी के तहत स्वायत्तता प्रदान एवं राजाओं द्वारा शासित देशी रियासतों का भारत में विलय एक गंभीर चुनौती थी| आज़ादी के समय ब्रिटिश भारत के कुल 40% भाग पर लगभग 565 देशी रियासतों का शासन था| जैसे ही अंग्रेज भारत छोड़ने वाले थें तो इनमें से कइयों ने अपनी संप्रभुता तथा आज़ादी के स्वपन देखने चालू कर दिए थें| रियासतों के विलय में बाधक तत्व या चुनौतियाँ रियासतों के प्रति अंग्रेजों का दृष्टिकोण- लंबे समय तक अंग्रेजों द्वारा बांटो एवं राज करो की नीति; क्रिप्स मिशन में रियासतों को अलग रहने का विकल्प; 1947 में एटली की यह घोषणा कि ब्रिटिश सरकार पैरामाउंटेसी के तहत अपनी शक्तियों और कर्तव्यों को भारत या पकिस्तान किसी भी सरकार को सौंपने का इरादा नहीं रखती है| इससे कई रियासतों ने यह दावा करना चालू कर दिया कि 15 अगस्त 1947 के बाद वे स्वतंत्र बने रह जायेंगे| आजादी से पूर्वजिन्ना द्वारा खुलकर रियासतों की स्वतंत्रता का समर्थन; साम्यवादी भी रियासतों की स्वतंत्रता के समर्थक; कई रियासतों द्वारा स्वतंत्र रहने की इच्छाजैसे- कश्मीर, हैदराबाद, त्रावनकोर, भोपाल आदि; रियासतों कीसंख्या तथा भौगोलिक अवस्थिति; कई रियासतों द्वारापाकिस्तान में विलय की इच्छाजैसे- जोधपुर, भोपाल आदि; ब्रिटिश प्रान्त तथा देशी रियासतों मेंराजनीतिक आर्थिक असमानता; हालाँकि राष्ट्रवादी आन्दोलन के नेताओं तथा कांग्रेस ने उपरोक्त चुनौतियों से पार करने की दिशा में अनेकों कदम उठायें तथा यह दृष्टिकोण रखा कि देशी रियासतें अपनी जनता की इच्छा एवं भौगोलिक स्थिति के माध्यम से या तो पाकिस्तान में शामिल हो सकती हैं या भारत में| साथ ही, रियासतों की जनता भी प्रजा समितियों के नेतृत्व में स्वतंत्र बने रहने को इच्छुक नहीं थी| साथ ही, रियासतों के विलय में कुछ अन्य सहायक तत्व भी थें जैसे- रियासतोंमें राजनीतिक चेतना का प्रसार; भारत छोड़ो आंदोलन तक रियासतों एवं ब्रिटिश प्रान्तों में भावनात्मक एकता का विकास; अखिल भारतीय रियासती प्रजामंडल तथा प्रजामंडल आंदोलनों का प्रभाव; कॉंग्रेस द्वारा रियासतों के लोकतांत्रीकरण तथा आज़ादी को समर्थन; पटेल, मेनन, माऊंटबेटेन आदि का योगदान; काफी रियासतों ने अप्रैल 1947 की संविधान सभा में शामिल होकर एकीकरण की प्रक्रिया में अपना योगदान दिया परन्तु कई रियासतें इससे अलग रहीं| एकीकरण के चरण तथा सरदार पटेल की भूमिका चरण 1 जून 1947 में पटेल के नेतृत्व में रियासती विभाग का गठन; सचिव- वीपी मेनन; विलयपत्र(इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेसन) के माध्यम से आग्रह; रक्षा, संचार तथा विदेश मामलें भारतीय संघ को सौंपे जाने का प्रावधान; पटेल द्वारा प्रलोभन तथा चेतावनीका भी सहारा जैसे- 15 अगस्त 1947 के पश्चात विलय की शर्तों का कठोर होना; जनता की उग्रता की आशंका आदि| विलय करने वाले शासकों को महल, संपति पर नियंत्रण, सलामी लेने का अधिकार, टाइटल रखने का अधिकार; प्रिवी पर्सआदि सुविधाएँ; पटेल द्वारा रियासतों के राजाओं के मनाने के कार्य में माउंटबेटन का भी सहयोग लेना जैसे- चैम्बर ऑफ प्रिंसेज में उनके भाषण के द्वारा सहमति बनाने की कोशिश; अपनी रियासतों में जनता के विद्रोह, पटेल तथा भारत के राष्ट्रवादी नेताओं के कठोर दबाव तथा पटेल की धमकियों के फलस्वरूप 15 अगस्त 1947 से पूर्वकश्मीर(अक्टूबर 1947 में विलय पत्र पर हस्ताक्षर), हैदराबाद(नवंबर 1949 में सैन्य कार्रवाई के माध्यम से विलय) तथा जूनागढ़(फ़रवरी 1948 में जनमत संग्रह के माध्यम से विलय) के अतिरिक्त सभी रियासतेंभारत में शामिलहो गयी थीं| गृहमंत्री की हैसियत से जूनागढ़ में जनता की इच्छा के अनुरूप जनमत संग्रह करवाकर उसे भारत में शामिल करना; हैदराबाद के निजाम के साथ चली लंबी शांतिवार्ता का कोई निष्कर्ष होता ना देखकर सितंबर 1948 में सेना की कार्रवाई द्वारा उसे भारत में विलय करवाना; चरण-2(15 अगस्त 1947-1950) एकीकरण के दृष्टिकोण से यह चरण भी महत्वपूर्ण थी जिसमें प्रमुख समस्या देशी रियासतों के पुनर्गठन की थी| सरदार पटेल द्वारा कुशलतापूर्वक इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाना; अपेक्षाकृत छोटी रियासतों का ब्रिटिश प्रांतों में विलय; अपेक्षाकृत बड़े रियासतों को स्वतंत्र/यथास्थिति रहने देना(कश्मीर, हैदराबाद, मैसूर आदि); कुछ रियासतों का संघ बनाया जाना; जैसे- सौराष्ट्र, त्रावनकोर-कोचीन; पेप्सू आदि; उपरोक्त आयामों को देखकर सरदार पटेल की अखंड तथा वर्तमान भारत के निर्माण में अहम् भूमिका को समझा जा सकता है| यही कारण है कि उन्हें आधुनिक भारत के शिल्पीकार तथा लौह पुरुष की भी संज्ञा दी जाती है|
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There is a growing divergence in the relationship between poverty and hunger in India. The shrinking social sector expenditure by the government is forcing the poor to spend more on the non-food essential items. Elucidate? (250 words | 15 marks )
Approach - A brief introduction addressing the context - Poverty, as a multi-dimensional concept. Explaining the growing divergence in the relationship between poverty and hunger. Presenting the counter-argument that hunger still persists and is the cause and effect of poverty. Why the food budget is shrinking Way forward - Measures the government needs to implement. Poverty, as a multi-dimensional concept - Poverty as a socio-economic phenomenon is defined based on different methodologies, basic needs approach and capability approach. The methodologies for defining poverty line are based upon different consumption expenditure basket consisting of various goods and services. The basic needs and capability approach define poverty as deprivation of resources (goods and services - food, housing, piped water, electricity, education, health, etc .) and opportunities (safe working environment, immobility, etc ) respectively. Thus, poverty is a multi-dimensional concept and is not just restricted to food and nutritional security. As per a recent study, there is a significant squeeze in food consumption expenditure in India despite increases in per capita income; due to shrinking government’s role and expenditure in the social sector, inflation, expensive private sector social services, rising migration, etc. However, hunger still remains a significant cause and effect of poverty. Growing divergence in the relationship between poverty and hunger - Multi-dimensional poverty - eliminating poverty in all its dimensions, poverty is not just about food but living standards — sanitation, housing, piped water, electricity, education, health, and jobs, etc Considerable progress in addressing food security - The government has a multi-pronged programme laid down under the National Food Security Act, 2013 to address the food and nutritional security. 67% of the poorest section of the Indian population is provided with subsidised food grain under the Public Distribution System (PDS), Mid-day Meal Scheme (MDM) that targets around 100 million students in government schools and a supplementary nutrition programme through the ICDS network. Further, in 2018, POSHAN Abhiyaan or National Nutrition Mission , a flagship programme launched to improve nutritional outcomes for children, pregnant women and lactating mothers. However, hunger, food and nutrition security still remains a distant dream- India’s rank in the Global Hunger Index which measures hunger in various forms - malnutrition, wasting, stunting and the infant mortality rate is 103 out of 119 countries. Women are the most important section of the demography for achieving food and nutritional security, however, they are the biggest sufferers due to the patriarchal mindset and social strains on them. For eg- 52% of women are Anaemic. Similarly, Anaemia affects every second child in the country. The country is home to the largest number of malnourished children in the world. Shrinking Government"s social expenditure and non-food items - During the last few years, govt spending has largely increased on the industrial front, so as to gain economic development as fast as possible. This has led to a neglect of the social sector reforms , like the health sector, pollution, education, sanitation and housing problems in urban areas. In terms of social sector spending as a percentage of GDP, India comes last among the BRICS nations. That Bangladesh performs better than India in this segment, is a telling sign. Health and Education - problems of accessibility, affordability, and availability due to low state capacity, profit-oriented private sector. Thus, high out of pocket expenditure. Lack of Basic Amenities - like drinking water, public transport is also resulting in additional burden on the people. Social Security- 90% of the workforce is in the informal sector lacking social security like health benefits, pension etc. Increasing burden on the poor and marginalised section. Way forward - Measures to improve food and nutritional security - Food fortification for diet diversity and nutritional security Integration of nutrition-related intervention across sectors like women and child development, health, food, and public distribution, sanitation, drinking water, rural development. Nutrition and Health counselling under ICDS -a low-cost measure that offers lifelong benefits. Making PDS facilities available for migrants in all states End to end computerization of the system, automation of fair price shops - important to bring in transparency - check leakages and diversion of foodgrains. The government needs to increase its social sector expenditure on health, education, etc. , build basic amenities infrastructure and provide universal social security coverage (insurance, old-age benefits, pension ) to both organised and unorganised sector to address the multi-dimensional aspects of poverty.
##Question:There is a growing divergence in the relationship between poverty and hunger in India. The shrinking social sector expenditure by the government is forcing the poor to spend more on the non-food essential items. Elucidate? (250 words | 15 marks )##Answer:Approach - A brief introduction addressing the context - Poverty, as a multi-dimensional concept. Explaining the growing divergence in the relationship between poverty and hunger. Presenting the counter-argument that hunger still persists and is the cause and effect of poverty. Why the food budget is shrinking Way forward - Measures the government needs to implement. Poverty, as a multi-dimensional concept - Poverty as a socio-economic phenomenon is defined based on different methodologies, basic needs approach and capability approach. The methodologies for defining poverty line are based upon different consumption expenditure basket consisting of various goods and services. The basic needs and capability approach define poverty as deprivation of resources (goods and services - food, housing, piped water, electricity, education, health, etc .) and opportunities (safe working environment, immobility, etc ) respectively. Thus, poverty is a multi-dimensional concept and is not just restricted to food and nutritional security. As per a recent study, there is a significant squeeze in food consumption expenditure in India despite increases in per capita income; due to shrinking government’s role and expenditure in the social sector, inflation, expensive private sector social services, rising migration, etc. However, hunger still remains a significant cause and effect of poverty. Growing divergence in the relationship between poverty and hunger - Multi-dimensional poverty - eliminating poverty in all its dimensions, poverty is not just about food but living standards — sanitation, housing, piped water, electricity, education, health, and jobs, etc Considerable progress in addressing food security - The government has a multi-pronged programme laid down under the National Food Security Act, 2013 to address the food and nutritional security. 67% of the poorest section of the Indian population is provided with subsidised food grain under the Public Distribution System (PDS), Mid-day Meal Scheme (MDM) that targets around 100 million students in government schools and a supplementary nutrition programme through the ICDS network. Further, in 2018, POSHAN Abhiyaan or National Nutrition Mission , a flagship programme launched to improve nutritional outcomes for children, pregnant women and lactating mothers. However, hunger, food and nutrition security still remains a distant dream- India’s rank in the Global Hunger Index which measures hunger in various forms - malnutrition, wasting, stunting and the infant mortality rate is 103 out of 119 countries. Women are the most important section of the demography for achieving food and nutritional security, however, they are the biggest sufferers due to the patriarchal mindset and social strains on them. For eg- 52% of women are Anaemic. Similarly, Anaemia affects every second child in the country. The country is home to the largest number of malnourished children in the world. Shrinking Government"s social expenditure and non-food items - During the last few years, govt spending has largely increased on the industrial front, so as to gain economic development as fast as possible. This has led to a neglect of the social sector reforms , like the health sector, pollution, education, sanitation and housing problems in urban areas. In terms of social sector spending as a percentage of GDP, India comes last among the BRICS nations. That Bangladesh performs better than India in this segment, is a telling sign. Health and Education - problems of accessibility, affordability, and availability due to low state capacity, profit-oriented private sector. Thus, high out of pocket expenditure. Lack of Basic Amenities - like drinking water, public transport is also resulting in additional burden on the people. Social Security- 90% of the workforce is in the informal sector lacking social security like health benefits, pension etc. Increasing burden on the poor and marginalised section. Way forward - Measures to improve food and nutritional security - Food fortification for diet diversity and nutritional security Integration of nutrition-related intervention across sectors like women and child development, health, food, and public distribution, sanitation, drinking water, rural development. Nutrition and Health counselling under ICDS -a low-cost measure that offers lifelong benefits. Making PDS facilities available for migrants in all states End to end computerization of the system, automation of fair price shops - important to bring in transparency - check leakages and diversion of foodgrains. The government needs to increase its social sector expenditure on health, education, etc. , build basic amenities infrastructure and provide universal social security coverage (insurance, old-age benefits, pension ) to both organised and unorganised sector to address the multi-dimensional aspects of poverty.
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हम प्राकृतिक संकटों को तो रोक नहीं सकते हैं लेकिन प्राकृतिक संकटोंके फलस्वरूपआपदाके प्रभावों को जरुर न्यूनीकृत कर सकते हैं| प्राकृतिक आपदाओं के प्रति भारत की सुभेद्यता के सन्दर्भ में चर्चा कीजिये| (10 अंक; 150-200 शब्द) We cannot stop Natural Hazards, but we can definitely mitigate the effects of the disaster as a result of natural Hazards. Discuss with reference to India"s vulnerability to Natural Hazards. (10 marks;150-200 words)
एप्रोच- प्राकृतिक संकट तथा आपदा का परिचय देते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में,प्राकृतिक आपदाओं के प्रति भारत की सुभेद्यता को दर्शायिये| NOTE- यहाँ भारत का मानचित्र देते हुए विभिन्न प्राकृतिक आपदा प्रवण क्षेत्रों को दिखाना प्रभावी रहेगा| अगले भाग में, प्राकृतिक संकटों केफलस्वरूप आपदा के प्रभावों को जरुर न्यूनीकृत करने के उपायों पर संक्षिप्त चर्चा कीजिये| अंतिम भाग में, इस संदर्भ में कुछ सरकारी प्रयासों तथा अपने सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- संकट को एक ऐसी खतरनाक स्थिति/घटना के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसमें जीवन को नुकसान पहुंचाने अथवा संपति एवं पर्यावरण को क्षति पहुंचाने की क्षमता हो| प्राकृतिक संकट एक संभावित आपदा होती है जो प्राकृतिक कारणों से उत्पन होती है| जबतक भूकंप, बाढ़, ज्वालामुखी विस्फोट, भूस्खलन, सूखा, सुनामी आदि प्राकृतिक घटनाओं के द्वारा जानमाल को भारी क्षति नहीं पहुंचती है तबतक इन्हें प्राकृतिक संकट कहा जाता है| आपदा किसी समुदाय/समाज के सुचारू रूप से कार्य करने में एक ऐसी गंभीर बाधा है जो व्यापक भौतिक, आर्थिक, सामाजिक या पर्यावरणीय क्षति उत्पन करती है तथा जिसके प्रभावों से निपटना समाज द्वारा अपने संसाधनों का उपयोग करते हुए संभव नहीं होता है| आपदा के दौरान या आपदा के तुरंत पश्चात व्यापक तौर पर आपदा क्षति होती है वहीँ आपदा के नकारात्मक प्रभाव काफी समय तक दृष्टिगोचर होते हैं| कोई भी प्राकृतिक संकट अपेक्षाकृत अधिक सुभेद्यता जैसे- संसाधनों तक अपर्याप्त पहुँच, बीमार तथा वृद्ध लोगों तक उपस्थिति, जागरूकता का अभाव आदि वाले कारकों के साथ मिलकर आपदा का कारण बन सकती है| प्राकृतिक संकट प्राकृतिक परिघटनाओं जैसे- मौसम संबंधी, भूगर्भीय या जैविक मूल आदि के कारण घटित होती हैं| चक्रवात, सुनामी, भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट आदि प्राकृतिक आपदाएं हैं जिन्हें हम रोक नहीं सकते हैं वहीँ भूस्खलन, बाढ़, सूखा, आग आदि सामाजिक-प्राकृतिक आपदाएं हैं क्योंकि ये प्राकृतिक तथा मानवजन्य दोनों कारणों से होती हैं|सामाजिक-प्राकृतिक आपदाओं को एक सीमा तक रोका जा सकता है| प्राकृतिक संकटों के फलस्वरूप घटित आपदा के प्रभावों को न्यूनीकृत करना हमारे प्रबंधन तथा तैयारी पर काफी हद तक निर्भर करता है| जैसे- चक्रवात आने से तो मानव नहीं रोक सकता है लेकिन चक्रवात आने के पूर्व तथा चक्रवात के दौरान एवं चक्रवात जाने के पश्चात हम तैयारी एवं प्रबंधन के द्वारा इस आपदा के प्रभावों को जरुर न्यूनीकृत कर सकते हैं| प्राकृतिक आपदाओं के प्रति भारत की सुभेद्यता तथा आपदा के फलस्वरूप होने वाली क्षति को न्यूनीकृत करने के उपाय भारत विश्व में प्राकृतिक संकटों के जोखिम के प्रति सुभेद्यता के मामले में शीर्ष स्थान पर है| भारत विश्व के दस सर्वाधिक आपदा प्रवण देशों में से एक है| भारत अपनी विशिष्ट भू-जलवायवीय तथा सामाजिक आर्थिक स्थितियों के कारण बहुत सारी प्राकृतिक एवं मानवनिर्मित आपदाओं के प्रति सुभेद्य है| भारत के 5 अलग-अलग क्षेत्रों जैसे- हिमालयी क्षेत्र, जलोढ़ मैदानों, प्रायद्वीपीय क्षेत्र के पहाड़ी भागों तथा तटीय क्षेत्र की अपनी विशिष्ट समस्याएं हैं| एक और जहाँ हिमालयी क्षेत्र में भूकंप तथा भूस्खलन जैसी आपदाओं की प्रवणता है वहीँ दूसरी और मैदानी क्षेत्र में बाढ़ गंभीर समस्या है| तटीय भागों में चक्रवात तथा समुद्री तूफानों की बारम्बारता पिछले कुछ समय से अत्यधिक बढ़ गयी है| भूकंप की अधिक तीव्रता हिमालयी क्षेत्रों, गंगा-ब्रह्मपुत्र-सिन्धु के मैदानी भागों में अधिक है जहाँ एक बड़ी जनसँख्या निवास करती है| भूकंप आने से पूर्व एक अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करना एक प्राथमिक कदम होना चाहिए| साथ ही, मानवनिर्मित संरचनाओं एवं भवनों को भूकंपरोधी बनाने के प्रति गाइडलाइन्स, सुभेद्यता का मानचित्रण जैसे कदम उठाना भी आवश्यक है ताकि भूकंप के प्रभावों को कम किया जा सके| साथ ही, अलग-अलग प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अलग-अलग विशिष्ट दृष्टिकोण के साथ-साथ कुछ सामान्यीकृत उपायों को भी गंभीरता से अमल करने की आवश्यकता है जैसे- आपदा पूर्व जोखिम प्रबंधन चरण- रोकथाम, शमन और तैयारी; सामुदायिक तैयारी एवं सार्वजनिक शिक्षा; आपदा से पूर्व जनता को तैयार करने का दृष्टिकोण ताकि समयपूर्व उसके प्रभावों का सामना करना संभव हो सके| विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर कोआर्डिनेशन विकसित करना; गाइडलाइन्स/नीतियों/कार्यक्रमों आदि का बेहतर विनियमन तथा प्रवर्तन; शिक्षा, प्रशिक्षण, अनुसंधान एवं विकास, क्षमता निर्माण आदि के माध्यम से समुदायों को बेहतर रूप से तैयार करना; आपदा के समय बेहतर प्रबंधन के माध्यम से क्षति को न्यून करना; आपदा पश्चात संकटकालीन प्रबंधन चरण- राहत, अनुक्रिया, पुनर्वास, पुनर्निर्माण तथा सामान्य स्थिति की बहाली आदि| आपदा पश्चात क्षति को तुरंत बेहतर तरीके से न्यूनीकृत करने के उपाय; प्राकृतिक संकटों के प्रति भारत की सुभेद्यता को देखते हुए हमें उपरोक्त आयामों पर ध्यान देकर उनके प्रभावों का न्यूनीकरण करने की आवश्यकता है| इस संदर्भ में, आपदा प्रबंधन एक्ट(2005) के तहत राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण(NDMA);राज्यआपदा प्रबंधन प्राधिकरण(SDMA); जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण(DDMA) की भूमिका अतिमहत्वपूर्ण है| इसके अतिरिक्त, गृह मंत्रालय का आपदा प्रबंधन प्रभाग(DMD); राष्ट्रीय कार्यकारी समिति(NEC); सुरक्षा मामलों पर मंत्रीमंडलीय समिति(CCS); राष्ट्रीय संकट प्रबंधन समिति(NCMC); राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण मंच(NPDRR); राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण(NDMA); राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान(NIDM); राष्ट्रीय आपदा मोचन बल(NDRF) आदि का भी अहम् रोल है| राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना, 2016 के माध्यम से भी आपदा जोखिम न्यूनीकरण हेतु सेन्डाई फ्रेमवर्क , सतत्त विकास लक्ष्य(2015-30) एवं कोप-21 में जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते में निर्धारित लक्ष्यों और प्राथमिकताओं का ध्यान रखा गया है|
##Question:हम प्राकृतिक संकटों को तो रोक नहीं सकते हैं लेकिन प्राकृतिक संकटोंके फलस्वरूपआपदाके प्रभावों को जरुर न्यूनीकृत कर सकते हैं| प्राकृतिक आपदाओं के प्रति भारत की सुभेद्यता के सन्दर्भ में चर्चा कीजिये| (10 अंक; 150-200 शब्द) We cannot stop Natural Hazards, but we can definitely mitigate the effects of the disaster as a result of natural Hazards. Discuss with reference to India"s vulnerability to Natural Hazards. (10 marks;150-200 words)##Answer:एप्रोच- प्राकृतिक संकट तथा आपदा का परिचय देते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में,प्राकृतिक आपदाओं के प्रति भारत की सुभेद्यता को दर्शायिये| NOTE- यहाँ भारत का मानचित्र देते हुए विभिन्न प्राकृतिक आपदा प्रवण क्षेत्रों को दिखाना प्रभावी रहेगा| अगले भाग में, प्राकृतिक संकटों केफलस्वरूप आपदा के प्रभावों को जरुर न्यूनीकृत करने के उपायों पर संक्षिप्त चर्चा कीजिये| अंतिम भाग में, इस संदर्भ में कुछ सरकारी प्रयासों तथा अपने सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- संकट को एक ऐसी खतरनाक स्थिति/घटना के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसमें जीवन को नुकसान पहुंचाने अथवा संपति एवं पर्यावरण को क्षति पहुंचाने की क्षमता हो| प्राकृतिक संकट एक संभावित आपदा होती है जो प्राकृतिक कारणों से उत्पन होती है| जबतक भूकंप, बाढ़, ज्वालामुखी विस्फोट, भूस्खलन, सूखा, सुनामी आदि प्राकृतिक घटनाओं के द्वारा जानमाल को भारी क्षति नहीं पहुंचती है तबतक इन्हें प्राकृतिक संकट कहा जाता है| आपदा किसी समुदाय/समाज के सुचारू रूप से कार्य करने में एक ऐसी गंभीर बाधा है जो व्यापक भौतिक, आर्थिक, सामाजिक या पर्यावरणीय क्षति उत्पन करती है तथा जिसके प्रभावों से निपटना समाज द्वारा अपने संसाधनों का उपयोग करते हुए संभव नहीं होता है| आपदा के दौरान या आपदा के तुरंत पश्चात व्यापक तौर पर आपदा क्षति होती है वहीँ आपदा के नकारात्मक प्रभाव काफी समय तक दृष्टिगोचर होते हैं| कोई भी प्राकृतिक संकट अपेक्षाकृत अधिक सुभेद्यता जैसे- संसाधनों तक अपर्याप्त पहुँच, बीमार तथा वृद्ध लोगों तक उपस्थिति, जागरूकता का अभाव आदि वाले कारकों के साथ मिलकर आपदा का कारण बन सकती है| प्राकृतिक संकट प्राकृतिक परिघटनाओं जैसे- मौसम संबंधी, भूगर्भीय या जैविक मूल आदि के कारण घटित होती हैं| चक्रवात, सुनामी, भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट आदि प्राकृतिक आपदाएं हैं जिन्हें हम रोक नहीं सकते हैं वहीँ भूस्खलन, बाढ़, सूखा, आग आदि सामाजिक-प्राकृतिक आपदाएं हैं क्योंकि ये प्राकृतिक तथा मानवजन्य दोनों कारणों से होती हैं|सामाजिक-प्राकृतिक आपदाओं को एक सीमा तक रोका जा सकता है| प्राकृतिक संकटों के फलस्वरूप घटित आपदा के प्रभावों को न्यूनीकृत करना हमारे प्रबंधन तथा तैयारी पर काफी हद तक निर्भर करता है| जैसे- चक्रवात आने से तो मानव नहीं रोक सकता है लेकिन चक्रवात आने के पूर्व तथा चक्रवात के दौरान एवं चक्रवात जाने के पश्चात हम तैयारी एवं प्रबंधन के द्वारा इस आपदा के प्रभावों को जरुर न्यूनीकृत कर सकते हैं| प्राकृतिक आपदाओं के प्रति भारत की सुभेद्यता तथा आपदा के फलस्वरूप होने वाली क्षति को न्यूनीकृत करने के उपाय भारत विश्व में प्राकृतिक संकटों के जोखिम के प्रति सुभेद्यता के मामले में शीर्ष स्थान पर है| भारत विश्व के दस सर्वाधिक आपदा प्रवण देशों में से एक है| भारत अपनी विशिष्ट भू-जलवायवीय तथा सामाजिक आर्थिक स्थितियों के कारण बहुत सारी प्राकृतिक एवं मानवनिर्मित आपदाओं के प्रति सुभेद्य है| भारत के 5 अलग-अलग क्षेत्रों जैसे- हिमालयी क्षेत्र, जलोढ़ मैदानों, प्रायद्वीपीय क्षेत्र के पहाड़ी भागों तथा तटीय क्षेत्र की अपनी विशिष्ट समस्याएं हैं| एक और जहाँ हिमालयी क्षेत्र में भूकंप तथा भूस्खलन जैसी आपदाओं की प्रवणता है वहीँ दूसरी और मैदानी क्षेत्र में बाढ़ गंभीर समस्या है| तटीय भागों में चक्रवात तथा समुद्री तूफानों की बारम्बारता पिछले कुछ समय से अत्यधिक बढ़ गयी है| भूकंप की अधिक तीव्रता हिमालयी क्षेत्रों, गंगा-ब्रह्मपुत्र-सिन्धु के मैदानी भागों में अधिक है जहाँ एक बड़ी जनसँख्या निवास करती है| भूकंप आने से पूर्व एक अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करना एक प्राथमिक कदम होना चाहिए| साथ ही, मानवनिर्मित संरचनाओं एवं भवनों को भूकंपरोधी बनाने के प्रति गाइडलाइन्स, सुभेद्यता का मानचित्रण जैसे कदम उठाना भी आवश्यक है ताकि भूकंप के प्रभावों को कम किया जा सके| साथ ही, अलग-अलग प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अलग-अलग विशिष्ट दृष्टिकोण के साथ-साथ कुछ सामान्यीकृत उपायों को भी गंभीरता से अमल करने की आवश्यकता है जैसे- आपदा पूर्व जोखिम प्रबंधन चरण- रोकथाम, शमन और तैयारी; सामुदायिक तैयारी एवं सार्वजनिक शिक्षा; आपदा से पूर्व जनता को तैयार करने का दृष्टिकोण ताकि समयपूर्व उसके प्रभावों का सामना करना संभव हो सके| विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर कोआर्डिनेशन विकसित करना; गाइडलाइन्स/नीतियों/कार्यक्रमों आदि का बेहतर विनियमन तथा प्रवर्तन; शिक्षा, प्रशिक्षण, अनुसंधान एवं विकास, क्षमता निर्माण आदि के माध्यम से समुदायों को बेहतर रूप से तैयार करना; आपदा के समय बेहतर प्रबंधन के माध्यम से क्षति को न्यून करना; आपदा पश्चात संकटकालीन प्रबंधन चरण- राहत, अनुक्रिया, पुनर्वास, पुनर्निर्माण तथा सामान्य स्थिति की बहाली आदि| आपदा पश्चात क्षति को तुरंत बेहतर तरीके से न्यूनीकृत करने के उपाय; प्राकृतिक संकटों के प्रति भारत की सुभेद्यता को देखते हुए हमें उपरोक्त आयामों पर ध्यान देकर उनके प्रभावों का न्यूनीकरण करने की आवश्यकता है| इस संदर्भ में, आपदा प्रबंधन एक्ट(2005) के तहत राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण(NDMA);राज्यआपदा प्रबंधन प्राधिकरण(SDMA); जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण(DDMA) की भूमिका अतिमहत्वपूर्ण है| इसके अतिरिक्त, गृह मंत्रालय का आपदा प्रबंधन प्रभाग(DMD); राष्ट्रीय कार्यकारी समिति(NEC); सुरक्षा मामलों पर मंत्रीमंडलीय समिति(CCS); राष्ट्रीय संकट प्रबंधन समिति(NCMC); राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण मंच(NPDRR); राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण(NDMA); राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान(NIDM); राष्ट्रीय आपदा मोचन बल(NDRF) आदि का भी अहम् रोल है| राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना, 2016 के माध्यम से भी आपदा जोखिम न्यूनीकरण हेतु सेन्डाई फ्रेमवर्क , सतत्त विकास लक्ष्य(2015-30) एवं कोप-21 में जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते में निर्धारित लक्ष्यों और प्राथमिकताओं का ध्यान रखा गया है|
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Communalism arises either due to power struggle or relative deprevation. Argue by giving suitable examples. (200 words)
Approach : Introduction an answer by defining communalism. First illustrate how it is power struggle: different communities vying for political power, suppression of minorities, perceived as well as real Then relative deprivation: Muslims vs rest of the communities, for example, have a vast difference in socio-economic development Answer : Communalism in the Indian context refers to the ideology which states that society is divided into different religious communities whose interests differ from, and at times oppose, each other. Historically, the Indian society has been regarded as a melting pot ofvarious religions that have been tolerant of each other. However, the British policy of divide and rule laid the foundations of communalism which the Indian state has found hard totackle post-independence. Communalism indeed arises due to power struggle and relative deprivation Power struggle - A power strugglebetween political parties leading to voting bank politics with each trying to garner votes based onidentitymarkers such as religion. Eg. Congress and BJP both trying to appease Muslims and in turn strengthening the Hindu Muslim divide. - Between majority and minority groups. Eg. Sikhs and Hindus. Relative deprivation Deprivation makes groups fight for limited resources. - Case with Assamese and Non-Assamese. Deprivation of the native groups led to movements throughout the state.Deprivation makes it easier to influence a group. Rather than self-introspect, they blame others for their condition. It causes them to support anyone who can help them marginally move above their misery. - Vice President Ansari had pointed out the relativedeprivation among Muslims to be the biggest causes of communal tension. Long-Term Remedy for Communalism 1. There is a need to initiate the process of de-communalization of the people at all levels, say, by exposing communal assumptions, by explaining to them the socio-economic and political roots of communalism, and by letting them know that what the communalists project as problems are not the real problem and what they suggest as remedies are not the real remedies. 2. Communalism of state and of the political elite in power has to be checked because it leads to inaction against communal violence and covert or overt political and ideological support to communalism by the state apparatuses, including the media under state control. 3. Communalization of civil society also needs to be checked because it leads to more communal roots and other forms of communal violence. It is here that intellectuals, political parties, and voluntary organizations can be the most effective. 4. The role of education, particularly value-oriented education, both in schools and colleges is important in preventing communal feelings. 5. The media can prove to be significant in preventing communal feelings. The communal press can be banned and legal action can be taken against communal writers. 6. The ideology that economic development, industrialization, the growth of capitalism and the growth of the working class would automatically weaken andultimately eliminate communalism should not be overplayed.
##Question:Communalism arises either due to power struggle or relative deprevation. Argue by giving suitable examples. (200 words)##Answer:Approach : Introduction an answer by defining communalism. First illustrate how it is power struggle: different communities vying for political power, suppression of minorities, perceived as well as real Then relative deprivation: Muslims vs rest of the communities, for example, have a vast difference in socio-economic development Answer : Communalism in the Indian context refers to the ideology which states that society is divided into different religious communities whose interests differ from, and at times oppose, each other. Historically, the Indian society has been regarded as a melting pot ofvarious religions that have been tolerant of each other. However, the British policy of divide and rule laid the foundations of communalism which the Indian state has found hard totackle post-independence. Communalism indeed arises due to power struggle and relative deprivation Power struggle - A power strugglebetween political parties leading to voting bank politics with each trying to garner votes based onidentitymarkers such as religion. Eg. Congress and BJP both trying to appease Muslims and in turn strengthening the Hindu Muslim divide. - Between majority and minority groups. Eg. Sikhs and Hindus. Relative deprivation Deprivation makes groups fight for limited resources. - Case with Assamese and Non-Assamese. Deprivation of the native groups led to movements throughout the state.Deprivation makes it easier to influence a group. Rather than self-introspect, they blame others for their condition. It causes them to support anyone who can help them marginally move above their misery. - Vice President Ansari had pointed out the relativedeprivation among Muslims to be the biggest causes of communal tension. Long-Term Remedy for Communalism 1. There is a need to initiate the process of de-communalization of the people at all levels, say, by exposing communal assumptions, by explaining to them the socio-economic and political roots of communalism, and by letting them know that what the communalists project as problems are not the real problem and what they suggest as remedies are not the real remedies. 2. Communalism of state and of the political elite in power has to be checked because it leads to inaction against communal violence and covert or overt political and ideological support to communalism by the state apparatuses, including the media under state control. 3. Communalization of civil society also needs to be checked because it leads to more communal roots and other forms of communal violence. It is here that intellectuals, political parties, and voluntary organizations can be the most effective. 4. The role of education, particularly value-oriented education, both in schools and colleges is important in preventing communal feelings. 5. The media can prove to be significant in preventing communal feelings. The communal press can be banned and legal action can be taken against communal writers. 6. The ideology that economic development, industrialization, the growth of capitalism and the growth of the working class would automatically weaken andultimately eliminate communalism should not be overplayed.
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महासागरीय ऊर्जा से आप क्या समझते हैं ? भारत में महासागरीय ऊर्जा की स्थिति को बताते हुए ज्वारीय ऊर्जा एवं ओटेक तकनीक पर चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक ) What do you understand by ocean energy? Describe the status of ocean energy in India and discuss tidal energy and otech technology. (150-200 words/ 10 marks)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत महासागरीय ऊर्जा के बारे में बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात भारत में महासागरीय ऊर्जा की वर्तमान चिंता की चर्चा कीजिये | पुनः ज्वारीय ऊर्जा के बारे में बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में ओटेक तकनीक को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - महासागरीय ऊर्जा महासागर पृथ्वी की सतह का 70 प्रतिशत भाग है | महासागरों के लहर, ज्वार, समुद्री तापमान आदि का उपयोग ऊर्जा स्रोत के रूप में किया जा सकता है, इसे ही महासागरीय ऊर्जा कहा जाता है | भारत सरकार ने अक्षय ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन से लड़ने के उद्देश्यों के सन्दर्भ में 2022 तक कई ऊर्जा स्रोतों के उपयोग के रणनीति पर कार्य कर रहा है | 100 से अधिक विभिन्न महासागर ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के 30 से अधिक देशों में अनुसन्धान एवं विकास कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं | भारत में महासागरीय ऊर्जा की वर्तमान चिंता ज्वारीय ऊर्जा की कुल पहचान छमता 9000 MW खम्भात की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी व सुंदरवन डेल्टा में ज्वारीय ऊर्जा को क्रियान्वित किया जा सकता है | भारत के तट के 7516 में तरंग ऊर्जा की कुल उपलब्ध क्षमता 40 हजार MW होने का अनुमान है | 2010 में खम्भात की खाड़ी में "कल्पसर" टाइडल पॉवर परियोजना UNDP की सहायता से किया जा रहा है | भारत में लक्षद्वीप के कवरत्ती में विश्व का प्रथम ओटेक प्लांट की स्थापना की गयी है | ज्वारीय ऊर्जा विश्व का सबसे बड़ा टाइडल प्लांट - सिहवा लैगून प्लांट (दक्षिण कोरिया) ज्वार सूर्य एवं चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण प्रत्येक 12 घंटों में होता है | निम्न ज्वार और उच्च ज्वार में जल की ऊँचाई में अन्तर्निहित ऊर्जा क्षमता होती है | जिस प्रकार नदियों में बांधों से जल विद्युत उत्पन्न किया जाता है, उसी प्रकार नदी के मुहाने में ज्वारीय बाँध द्वारा बिजली उत्पादन किया जा सकता है | ज्वारीय बाँध में टरबाइन की सहायता से बिजली उत्पादन किया जाता है | जब उच्च ज्वार होता है , समुद्र के जल का स्तर, नदी के जल के स्तर से ऊंचा होता है, जिसके कारण समुद्री जल का नदी की तरफ प्रवाह होता है | इस दौरान जल को ज्वारीय बाँध में एक जलशाय में संगृहीत कर लिया जाता है | निम्न ज्वार के दौरान इस जलाशय से जल को समुद्र की ओर छोड़ा जाता है, जो टरबाइन जनरेटर से बिजली उत्पादन करने में सहायक होता है | ओटेक (OTEC) भारत में ओटेक की 1 लाख 80 हजार MW की क्षमता है | पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन कार्यरत राष्ट्रीय समुद्री प्रौद्योगिकी संस्थान (NIOT) चेन्नई के वैज्ञानिकों द्वारा ओटेक तकनीकि विकसित किया गया है | ओटेक तकनीक में समुद्री सतह का गर्म पानी तथा 1 हजार मीटर की गहराई के ठन्डे जल के तापमान अंतर का उपयोग किया जाता है | इस तकनीक में एक तरल पदार्थ जैसे कि अमोनिया को हीट एक्सचेंजर के माध्यम से वाष्पीकृत किया जाता है | अमोनिया गैस द्वारा टरबाइन जेनेरटर चलाया जाता है, जिससे विद्युत उत्पादन होता है | इस अमोनिया गैस को पुनः तरल में परिवर्तित कंडेंसर में किया जाता है, जिसे ठंडा गहरे जल से किया जाता है | इस तरल को वापस हीट एक्सचेंजर में भेज दिया जाता है | भारत अक्षय ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन से लड़ने के उद्देश्य से 2022 तक कई ऊर्जा स्रोतों के उपयोग के रणनीति पर कार्य कर रहा है |
##Question:महासागरीय ऊर्जा से आप क्या समझते हैं ? भारत में महासागरीय ऊर्जा की स्थिति को बताते हुए ज्वारीय ऊर्जा एवं ओटेक तकनीक पर चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक ) What do you understand by ocean energy? Describe the status of ocean energy in India and discuss tidal energy and otech technology. (150-200 words/ 10 marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत महासागरीय ऊर्जा के बारे में बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात भारत में महासागरीय ऊर्जा की वर्तमान चिंता की चर्चा कीजिये | पुनः ज्वारीय ऊर्जा के बारे में बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में ओटेक तकनीक को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - महासागरीय ऊर्जा महासागर पृथ्वी की सतह का 70 प्रतिशत भाग है | महासागरों के लहर, ज्वार, समुद्री तापमान आदि का उपयोग ऊर्जा स्रोत के रूप में किया जा सकता है, इसे ही महासागरीय ऊर्जा कहा जाता है | भारत सरकार ने अक्षय ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन से लड़ने के उद्देश्यों के सन्दर्भ में 2022 तक कई ऊर्जा स्रोतों के उपयोग के रणनीति पर कार्य कर रहा है | 100 से अधिक विभिन्न महासागर ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के 30 से अधिक देशों में अनुसन्धान एवं विकास कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं | भारत में महासागरीय ऊर्जा की वर्तमान चिंता ज्वारीय ऊर्जा की कुल पहचान छमता 9000 MW खम्भात की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी व सुंदरवन डेल्टा में ज्वारीय ऊर्जा को क्रियान्वित किया जा सकता है | भारत के तट के 7516 में तरंग ऊर्जा की कुल उपलब्ध क्षमता 40 हजार MW होने का अनुमान है | 2010 में खम्भात की खाड़ी में "कल्पसर" टाइडल पॉवर परियोजना UNDP की सहायता से किया जा रहा है | भारत में लक्षद्वीप के कवरत्ती में विश्व का प्रथम ओटेक प्लांट की स्थापना की गयी है | ज्वारीय ऊर्जा विश्व का सबसे बड़ा टाइडल प्लांट - सिहवा लैगून प्लांट (दक्षिण कोरिया) ज्वार सूर्य एवं चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण प्रत्येक 12 घंटों में होता है | निम्न ज्वार और उच्च ज्वार में जल की ऊँचाई में अन्तर्निहित ऊर्जा क्षमता होती है | जिस प्रकार नदियों में बांधों से जल विद्युत उत्पन्न किया जाता है, उसी प्रकार नदी के मुहाने में ज्वारीय बाँध द्वारा बिजली उत्पादन किया जा सकता है | ज्वारीय बाँध में टरबाइन की सहायता से बिजली उत्पादन किया जाता है | जब उच्च ज्वार होता है , समुद्र के जल का स्तर, नदी के जल के स्तर से ऊंचा होता है, जिसके कारण समुद्री जल का नदी की तरफ प्रवाह होता है | इस दौरान जल को ज्वारीय बाँध में एक जलशाय में संगृहीत कर लिया जाता है | निम्न ज्वार के दौरान इस जलाशय से जल को समुद्र की ओर छोड़ा जाता है, जो टरबाइन जनरेटर से बिजली उत्पादन करने में सहायक होता है | ओटेक (OTEC) भारत में ओटेक की 1 लाख 80 हजार MW की क्षमता है | पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन कार्यरत राष्ट्रीय समुद्री प्रौद्योगिकी संस्थान (NIOT) चेन्नई के वैज्ञानिकों द्वारा ओटेक तकनीकि विकसित किया गया है | ओटेक तकनीक में समुद्री सतह का गर्म पानी तथा 1 हजार मीटर की गहराई के ठन्डे जल के तापमान अंतर का उपयोग किया जाता है | इस तकनीक में एक तरल पदार्थ जैसे कि अमोनिया को हीट एक्सचेंजर के माध्यम से वाष्पीकृत किया जाता है | अमोनिया गैस द्वारा टरबाइन जेनेरटर चलाया जाता है, जिससे विद्युत उत्पादन होता है | इस अमोनिया गैस को पुनः तरल में परिवर्तित कंडेंसर में किया जाता है, जिसे ठंडा गहरे जल से किया जाता है | इस तरल को वापस हीट एक्सचेंजर में भेज दिया जाता है | भारत अक्षय ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन से लड़ने के उद्देश्य से 2022 तक कई ऊर्जा स्रोतों के उपयोग के रणनीति पर कार्य कर रहा है |
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How do murals differ from miniatures? Discuss the features of Pala miniature and western miniature. (150 words/10 marks)
Brief approach Give differences between the mural and miniature painting. Discuss the features of Pala miniature. Discuss the features of the western miniature. Answer Indian paintings can largely be categorized under murals and miniatures. The basic difference between the two is based on the object the painting is been done. Mural paintings are large work on thewalls of solid structures. For instance, Ajanta cave murals and Kailashnath Temple in Ellora.History of Mural paintings starts in ancient times (from 2nd century BC). Within the Mural paintings, there is a technique calledFrescowhich is executed uponfreshly-laid lime plaster. This implies that the Fresco is done on wet plaster and that is why it is more durable than Mural. Murals are painted on already dried surfaces. Miniaturepaintings, on the other hand, are executed on a very small scale and are generally done on perishable material such as cloth, paper, leaves, etc. The evolution of Miniature started in medieval times. Palas (in 11th century AD) were the initiator of Miniatures but it reached its zenith under the Mughals. Features of Pala Miniature The painting dating back to the 8th century AD belongs to this school. This school emphasized the symbolic use of colours and the themes were often taken from the Buddhist Tantric rituals. Apart from the emphasis on symbolic usage of colours, other prominent characteristics of the Pala School include the skillful and graceful usage of lines, and modeling forms by delicate and expressive variation of pressure, usage of natural colours, etc. Nalanda, Somapura Mahavihara, Odantapuri, and Vikramasila Buddhist monasterieswitness how images of Buddha and other deities were portrayed on palm leaves. The style of the paintings of this school is very popular in Sri Lanka, Nepal, Burma, Tibet, and South-East Asian countries. Features of the western miniature In western India between the 10th to 12th-century miniature painting developed. These small paintings were part of manuscripts written at the time and illustrate the subjects of the manuscripts. These miniatures are found in some Hindu and Jaina manuscripts and are of 2 to 4 inches in size. During the 12th to 17th centuries, western Indian miniature paintings flourish very richly. Particular manuscript miniature painting developed in the western part of India that is the modern state of Gujarat. From the 17th century "Rajput miniature painting " developed in the western part of India that is a modern western state of Rajasthan. Miniature paintingplayed a significant role in the development and spread of art and religion in India.
##Question:How do murals differ from miniatures? Discuss the features of Pala miniature and western miniature. (150 words/10 marks)##Answer:Brief approach Give differences between the mural and miniature painting. Discuss the features of Pala miniature. Discuss the features of the western miniature. Answer Indian paintings can largely be categorized under murals and miniatures. The basic difference between the two is based on the object the painting is been done. Mural paintings are large work on thewalls of solid structures. For instance, Ajanta cave murals and Kailashnath Temple in Ellora.History of Mural paintings starts in ancient times (from 2nd century BC). Within the Mural paintings, there is a technique calledFrescowhich is executed uponfreshly-laid lime plaster. This implies that the Fresco is done on wet plaster and that is why it is more durable than Mural. Murals are painted on already dried surfaces. Miniaturepaintings, on the other hand, are executed on a very small scale and are generally done on perishable material such as cloth, paper, leaves, etc. The evolution of Miniature started in medieval times. Palas (in 11th century AD) were the initiator of Miniatures but it reached its zenith under the Mughals. Features of Pala Miniature The painting dating back to the 8th century AD belongs to this school. This school emphasized the symbolic use of colours and the themes were often taken from the Buddhist Tantric rituals. Apart from the emphasis on symbolic usage of colours, other prominent characteristics of the Pala School include the skillful and graceful usage of lines, and modeling forms by delicate and expressive variation of pressure, usage of natural colours, etc. Nalanda, Somapura Mahavihara, Odantapuri, and Vikramasila Buddhist monasterieswitness how images of Buddha and other deities were portrayed on palm leaves. The style of the paintings of this school is very popular in Sri Lanka, Nepal, Burma, Tibet, and South-East Asian countries. Features of the western miniature In western India between the 10th to 12th-century miniature painting developed. These small paintings were part of manuscripts written at the time and illustrate the subjects of the manuscripts. These miniatures are found in some Hindu and Jaina manuscripts and are of 2 to 4 inches in size. During the 12th to 17th centuries, western Indian miniature paintings flourish very richly. Particular manuscript miniature painting developed in the western part of India that is the modern state of Gujarat. From the 17th century "Rajput miniature painting " developed in the western part of India that is a modern western state of Rajasthan. Miniature paintingplayed a significant role in the development and spread of art and religion in India.
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19वीं शताब्दी में भारत में राष्ट्रवाद के उदय के प्रमुख कारणों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । ( 150-200 शब्द , अंक -10 ) Briefly discuss the major reasons for the rise of nationalism in India in the 19th century. (150-200 words , marks -10 )
दृष्टिकोण : भारतीय राष्ट्रवाद की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । 19वीं सदी में भारतीय राष्ट्रवाद के उदय के विभिन्न कारणों की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । राष्ट्रीय आंदोलन के संदर्भ में संक्षिप्त चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : सामान्यतः राष्ट्र को एक ऐसे जनसमूह के रूप में परिभाषित किया जाता है जो कि एक निश्चित भौगोलिक सीमाओं में रहता है और अपनी समान परंपरा, हितों व भावनाओं से जुड़ा रहता है । राष्ट्र निर्माण के लिए इन तत्वों का विकास राष्ट्रवाद की भावना से होता है । राष्ट्रीयता की भावना का संचार ही एक राष्ट्र को सुदृढ़ बनाता है । एक राष्ट्र के रूप में भारत का अस्तित्व प्राचीन काल से ही रहा है तथापि आधुनिक मानकों के अनुरूप एक राष्ट्र के रूप में भारत का विकास 19वीं शताब्दी में माना जा सकता है । भारत में राष्ट्रवाद के उदय के कारणों को हम निम्नलिखित रूपों में देख सकते हैं : 1. हितों का टकराव : किसी भी उपनिवेश में आधुनिक राष्ट्रवाद के उदय में हितों का टकराव एक महत्वपूर्ण कारक रहा है । भारत भी इसका अपवाद नहीं है । ब्रिटिश शासन काल के दौरान शिक्षित वर्ग, उद्योगपति, श्रमिक इत्यादि नए वर्गों के साथ किसान, कारीगर इत्यादि वर्गों के हित ब्रिटिश हितों से टकराते थे और यह राष्ट्रीय चेतना के उदय का एक महत्वपूर्ण कारण बना । 2. राजनीतिक प्रशासनिक एकीकरण : साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा से प्रेरित होकर अंग्रेजों ने समस्त हिंदुस्तान को जीता और प्रभावी नियंत्रण तथा शोषण के लिए आधुनिक प्रसाशनिक ढांचे की स्थापना की । इसी के साथ भारत का राजनीतिक प्रशासनिक एकीकरण तो हुआ लेकिन साथ ही समस्याओं का भी एकीकरण हुआ । इससे पूरे देश में लोगों की अंग्रेजों के विरुद्ध एकजैसी भावना का विकास हुआ । साथ ही उनमें एकीकरण का भाव भी जागृत हुआ । 3. सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन : सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन भारतीय समाज के लिए एक उपचार के रूप में सामने आया । इसने सामाजिक जड़ता को दूर कर आधुनिकीकरण का आधार तैयार किया । साथ ही प्रमुख सुधारकों यथा-राममोहन राय , दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद आदि ने एक राष्ट्र के रूप में भी भारत के विकास के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए । 4. रेलवे की भूमिका : रेलवे ने भारत की भौगोलिक दूरी को कम करके विभिन्न क्षेत्रों व विभिन्न वर्गों के लोगों को जोड़ने का काम किया । इससे विभिन्न क्षेत्रों के लोगों व नेताओं के बीच संपर्क बढ़ा और इसने राष्ट्रवाद की भावना को उभारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । 5. आधुनिक शिक्षा : आधुनिक शिक्षा के साथ आधुनिक विचारों का प्रसार प्रारंभ हुआ । जैसे- समानता, स्वतंत्रता , वैज्ञानिक चिंतन आदि । इन्हीं विचारों के साथ आत्मावलोकन व विश्लेषण की भी प्रक्रिया प्रारंभ हुई और बुद्धिजीवियों ने ब्रिटिश नीति पर प्रश्न उठाना प्रारम्भ किया और बेरोजगारी व पिछड़ेपन के लिए उपनिवेशवाद को जिम्मेदार माना गया । आधुनिक शिक्षा के साथ ही अँग्रेजी भाषा का भी प्रचलन हुआ अँग्रेजी भाषा ने राष्ट्रीय नेतृत्व व संगठन के बीच समन्वय बिठाने में संपर्क भाषा की भूमिका निभाई । 6. प्रेस की भूमिका : राष्ट्रीय चेतना के उदय व प्रसार में प्रेस की निर्णायक भूमिका रही । सरकारी नीतियों की आलोचना तथा लोगों को जागरूक व एकजूट करने में प्रेस का महत्वपूर्ण योगदान रहा । 7. इतिहास लेखन : एकतरफ साम्राज्यवादी लेखन ने ब्रिटिश शासन के औचित्य को उचित बताने के लिए इतिहास को गलत तरीके से पेश करना प्रारंभ किया ।जैसे- हम शासन करने में सक्षम नहीं हैं और धार्मिक विषयों में हमारी अधिक रूची है, भारत पर विदेशियों का लंबे समय तक शासन रहा है आदि । इसकी प्रतिक्रिया में राष्ट्रवादी इतिहास लेखन ने अतीत की उपलब्धियों से हमारा परिचय कराया । जैसे- अशोक, शिवाजी, लिच्छवि आदि । इसने आत्मविश्वास एवं आत्मगौरव की भावना का संचार किया । 8. वाइसराय लिटन की नीतियाँ : वाइसराय लिटन की प्रतिक्रियावादी नीतियां यथा - दिल्ली दरबार का आयोजन, शस्त्र अधिनियम, सिविल सेवा में प्रवेश की उम्र घटाकर 19 वर्ष करना आदि ने भी प्रे देश के लोगों को उद्वेलित किया और उन्हें एकजुट किया । 9. इल्बर्ट बिल विवाद : इसी प्रकार रिपन के कार्यकाल में इल्बर्ट बिल के मुद्दे पर शिक्षित भारतीयों की भावनाएं आहत हुई । ये नीतियाँ उस दौर में इसलिए भी महत्व रखती हैं क्योंकि उस दौर में शिक्षित भारतीयों में असंतोष बढ़ता जा रहा था । इन मुद्दे को लेकर भारतीय नेताओं ने अपने क्षेत्र से बाहर निकल कर अन्य क्षेत्रों में भी प्रचार-प्रसार किया । इससे अखिल भारतीय स्तर पर स्वीकृत नेताओं के उदय की भी प्रक्रिया प्रारंभ हुई । इस प्रकार हम निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि 19वीं शताब्दी की कई घटनाओं ने मिलकर पूरे देश के जनमानस को प्रभावित किया और उन्हें आपस में जोड़ने का काम किया । एक राष्ट्र के रूप में भारत के निर्माण की प्रक्रिया आज भी जारी है और हममें समय के साथ राष्ट्रवाद की भावनाओं का निरंतर विकास हो रहा है ।
##Question:19वीं शताब्दी में भारत में राष्ट्रवाद के उदय के प्रमुख कारणों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । ( 150-200 शब्द , अंक -10 ) Briefly discuss the major reasons for the rise of nationalism in India in the 19th century. (150-200 words , marks -10 )##Answer:दृष्टिकोण : भारतीय राष्ट्रवाद की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । 19वीं सदी में भारतीय राष्ट्रवाद के उदय के विभिन्न कारणों की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । राष्ट्रीय आंदोलन के संदर्भ में संक्षिप्त चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : सामान्यतः राष्ट्र को एक ऐसे जनसमूह के रूप में परिभाषित किया जाता है जो कि एक निश्चित भौगोलिक सीमाओं में रहता है और अपनी समान परंपरा, हितों व भावनाओं से जुड़ा रहता है । राष्ट्र निर्माण के लिए इन तत्वों का विकास राष्ट्रवाद की भावना से होता है । राष्ट्रीयता की भावना का संचार ही एक राष्ट्र को सुदृढ़ बनाता है । एक राष्ट्र के रूप में भारत का अस्तित्व प्राचीन काल से ही रहा है तथापि आधुनिक मानकों के अनुरूप एक राष्ट्र के रूप में भारत का विकास 19वीं शताब्दी में माना जा सकता है । भारत में राष्ट्रवाद के उदय के कारणों को हम निम्नलिखित रूपों में देख सकते हैं : 1. हितों का टकराव : किसी भी उपनिवेश में आधुनिक राष्ट्रवाद के उदय में हितों का टकराव एक महत्वपूर्ण कारक रहा है । भारत भी इसका अपवाद नहीं है । ब्रिटिश शासन काल के दौरान शिक्षित वर्ग, उद्योगपति, श्रमिक इत्यादि नए वर्गों के साथ किसान, कारीगर इत्यादि वर्गों के हित ब्रिटिश हितों से टकराते थे और यह राष्ट्रीय चेतना के उदय का एक महत्वपूर्ण कारण बना । 2. राजनीतिक प्रशासनिक एकीकरण : साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा से प्रेरित होकर अंग्रेजों ने समस्त हिंदुस्तान को जीता और प्रभावी नियंत्रण तथा शोषण के लिए आधुनिक प्रसाशनिक ढांचे की स्थापना की । इसी के साथ भारत का राजनीतिक प्रशासनिक एकीकरण तो हुआ लेकिन साथ ही समस्याओं का भी एकीकरण हुआ । इससे पूरे देश में लोगों की अंग्रेजों के विरुद्ध एकजैसी भावना का विकास हुआ । साथ ही उनमें एकीकरण का भाव भी जागृत हुआ । 3. सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन : सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन भारतीय समाज के लिए एक उपचार के रूप में सामने आया । इसने सामाजिक जड़ता को दूर कर आधुनिकीकरण का आधार तैयार किया । साथ ही प्रमुख सुधारकों यथा-राममोहन राय , दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद आदि ने एक राष्ट्र के रूप में भी भारत के विकास के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए । 4. रेलवे की भूमिका : रेलवे ने भारत की भौगोलिक दूरी को कम करके विभिन्न क्षेत्रों व विभिन्न वर्गों के लोगों को जोड़ने का काम किया । इससे विभिन्न क्षेत्रों के लोगों व नेताओं के बीच संपर्क बढ़ा और इसने राष्ट्रवाद की भावना को उभारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । 5. आधुनिक शिक्षा : आधुनिक शिक्षा के साथ आधुनिक विचारों का प्रसार प्रारंभ हुआ । जैसे- समानता, स्वतंत्रता , वैज्ञानिक चिंतन आदि । इन्हीं विचारों के साथ आत्मावलोकन व विश्लेषण की भी प्रक्रिया प्रारंभ हुई और बुद्धिजीवियों ने ब्रिटिश नीति पर प्रश्न उठाना प्रारम्भ किया और बेरोजगारी व पिछड़ेपन के लिए उपनिवेशवाद को जिम्मेदार माना गया । आधुनिक शिक्षा के साथ ही अँग्रेजी भाषा का भी प्रचलन हुआ अँग्रेजी भाषा ने राष्ट्रीय नेतृत्व व संगठन के बीच समन्वय बिठाने में संपर्क भाषा की भूमिका निभाई । 6. प्रेस की भूमिका : राष्ट्रीय चेतना के उदय व प्रसार में प्रेस की निर्णायक भूमिका रही । सरकारी नीतियों की आलोचना तथा लोगों को जागरूक व एकजूट करने में प्रेस का महत्वपूर्ण योगदान रहा । 7. इतिहास लेखन : एकतरफ साम्राज्यवादी लेखन ने ब्रिटिश शासन के औचित्य को उचित बताने के लिए इतिहास को गलत तरीके से पेश करना प्रारंभ किया ।जैसे- हम शासन करने में सक्षम नहीं हैं और धार्मिक विषयों में हमारी अधिक रूची है, भारत पर विदेशियों का लंबे समय तक शासन रहा है आदि । इसकी प्रतिक्रिया में राष्ट्रवादी इतिहास लेखन ने अतीत की उपलब्धियों से हमारा परिचय कराया । जैसे- अशोक, शिवाजी, लिच्छवि आदि । इसने आत्मविश्वास एवं आत्मगौरव की भावना का संचार किया । 8. वाइसराय लिटन की नीतियाँ : वाइसराय लिटन की प्रतिक्रियावादी नीतियां यथा - दिल्ली दरबार का आयोजन, शस्त्र अधिनियम, सिविल सेवा में प्रवेश की उम्र घटाकर 19 वर्ष करना आदि ने भी प्रे देश के लोगों को उद्वेलित किया और उन्हें एकजुट किया । 9. इल्बर्ट बिल विवाद : इसी प्रकार रिपन के कार्यकाल में इल्बर्ट बिल के मुद्दे पर शिक्षित भारतीयों की भावनाएं आहत हुई । ये नीतियाँ उस दौर में इसलिए भी महत्व रखती हैं क्योंकि उस दौर में शिक्षित भारतीयों में असंतोष बढ़ता जा रहा था । इन मुद्दे को लेकर भारतीय नेताओं ने अपने क्षेत्र से बाहर निकल कर अन्य क्षेत्रों में भी प्रचार-प्रसार किया । इससे अखिल भारतीय स्तर पर स्वीकृत नेताओं के उदय की भी प्रक्रिया प्रारंभ हुई । इस प्रकार हम निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि 19वीं शताब्दी की कई घटनाओं ने मिलकर पूरे देश के जनमानस को प्रभावित किया और उन्हें आपस में जोड़ने का काम किया । एक राष्ट्र के रूप में भारत के निर्माण की प्रक्रिया आज भी जारी है और हममें समय के साथ राष्ट्रवाद की भावनाओं का निरंतर विकास हो रहा है ।
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पंचायती राज संस्थाओं ने ग्रामीण विकास के माध्यम से भारतीय लोकतंत्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है किन्तु स्थानीय स्वशासन संस्थाएं अभी भी अनेक चुनौतियों का सामना कर रही हैं| चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द) Panchayati Raj institutions have played an important role in the development of Indian democracy through rural development, but institutions of local self-government are still facing many challenges. Discuss. (150 to 200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में पंचायती राज व्यवस्था के बारे में सामान्य जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में ग्रामीण विकास में पंचायती राज व्यवस्था की भूमिका को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में पंचायती राज व्यवस्था द्वारा भारतीय लोकतंत्र के विकास में निभायी गयी भूमिका को स्पष्ट कीजिये 4- तीसरे भाग में पंचायती राज व्यवस्था की चुनौतियों को स्पष्ट कीजिये 5- अंतिम में चुनौतियों के समापन की आवश्यकता को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत में प्राचीन काल से ही पंचायतों का अस्तित्व रहा है| जिसे देखते हुए स्थानीय स्तर पर शक्तियों केविकेंद्रीकरण तथा ग्रामीण स्थानीय स्वशासन की स्थापनाहेतु भारत में पंचायती राज की अवधारणा का विकास किया गया और संविधान केअनुच्छेद 40के अंतर्गत इसके गठन हेतु राज्यों को उत्तरदायित्व सौंपा गया था| इसके बाद बलवंतराय मेहता समिति, अशोक मेहता समिति, जी.वी.के. राव समिति तथा एम.एल.सिंघवी समितिके सिफारिशों के द्वारा क्रमशः इसको ज्यादा प्रभावी बनाने हेतु प्रयास किया गया| वर्ष 1992 में 73वें संविधान संशोधनअधिनियमके द्वारा पंचायतों कोसंवैधानिक दर्जाप्रदान किया गया तथा| इसके बाद पंचायती राज संस्थाओं ने ग्रामीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है| ग्रामीण विकास में पंचायती राज संस्थाओं की भूमिका पंचायती राज का एक उद्देश्य सामाजिक और राजनीतिक विकास था। इन संस्थाओं में महिलाओं की बढ़ती भूमिका ने राजनीति में महिलाओं के समावेशन में वृद्धि की है। वर्तमान में महिलाओं की भूमिका 40% से अधिक है। निर्णय निर्माण तथा क्रियान्वयन को निचले स्तर तक पहुँचने में मदद मिली है जिससे जनता के शासन में विश्वास में वृद्धि हुई है। विकास कार्यों का संचालन स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार हुआ है जिससे संसाधनों का आवंटन दक्षतापूर्ण हुआ है। योजनाओं एवं कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में प्रभाविता का समावेश हुआ है। यथा पचायती राज व्यवस्था के कारण मनरेगा में भ्रस्टाचार में कमी आई है। शासन का फोकस स्थानीय समस्याओं पर अधिक हुआ है। नीति निर्माण के फीडबैक तंत्र में सुधार हुआ है। भारतीय लोकतंत्र को सुदृढ़ करने में पंचायतों की भूमिका भागीदारीपूर्ण लोकतन्त्र की आधुनिक अवधारणा को साकार करने में मजबूती मिली है। प्रत्यक्ष लोकतंत्रको बढ़ावा देने मेंग्राम सभाओंकी अहम् भूमिका क्योंकि इसमें उस ग्राम के सभी मतदाता शामिल होते हैं| इससेना सिर्फ विकास एवं योजना निर्माण/निगरानी/मूल्यांकन आदि मेंसभी की सहभागितासुनिश्चित होती है बल्कि लोकतंत्र को सुदृढ़ता प्रदान करने में यह अहम् भूमिका अदा कर सकता है| महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण सेमहिला सशक्तिकरण; अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों हेतु सीटों के आरक्षण सेसामाजिक न्याय को प्रोत्साहन; 11वीं अनुसूची में वर्णित विषयों सेआर्थिक एवं सामाजिक न्याय को बढ़ावाजैसे- कृषि से संबंधित विषय; भूमि-सुधार तथा भूमि-संरक्षण; वंचितों एवं कमजोर वर्गों का कल्याण; जनवितरण व्यवस्था; महिला एवं बाल विकास;गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम; परिवार कल्याण आदि| लोगों के मध्यएकता को प्रोत्साहन तथा सामुदायिक भावनाको बढ़ावा; सशक्त तरीके से योजनाओं का क्रियान्वयन सुनिश्चित करना जिससे लोकतंत्र के प्रति आस्था का विकास; ग्राम सशक्तिकरण से भारत का विकास की ओर बढ़ना; पंचायतों के उपरोक्त महत्वों के द्वारा उन मूल्यों तथा कारकों को बढ़ावा मिलता है जिससे लोकतंत्र की मूल जड़ों का सतत विकास सुनिश्चित करने में मदद मिलती है| पंचायती राज संस्थाओं से जुड़ी चुनौतियाँ इतने व्यापक महत्त्व के बाद भी पंचायती राज संस्थाएं विभिन्न चुनौतियों का सामना कर रही हैं| इन चुनौतियों के कारण पंचायती राज संस्थाएं अपनी पूर्ण क्षमता का प्रदर्शन नहीं कर पा रही हैं| पंचायती राज संस्थाओं की प्रमुख चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं यथा स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव का नहीं होना, चुनाव में सभी वर्गों की सहभागिता का अभाव तथा सहभागिता के लिए उपयुक्त वातावरण का अभाव; पंचायतों की कार्यप्रणाली पक्षपातपूर्ण; विषयों के अनुरूप जबावदेही निर्धारित नहीं विषयों का हस्तांतरण नहीं होना; वास्तव में संसाधनों का हस्तांतरण नहीं; अंतरक्षेत्रीय अधिकारिता का निर्धारण नहीं अधिकांश पंचायतों को कर/शुल्क आदि लगाने/वसूलने का अधिकार नहीं; संसाधनों के प्रयोग में पारदर्शिता का अभाव जैसे -लेखाजोखा/लेखापरीक्षण का ना होना राज्य वित आयोग की सिफारिशों को लागू करने में राज्य-सरकारों की आनाकानी; कार्मिक प्रबंधन, प्रशिक्षण आदि की कोई पृथक व्यवस्था नहीं; जिले के स्तर पर कमजोर नियोजन-ढाँचा जबकि मध्यवर्ती तथा ग्राम स्तर पर इनका पूरी तरह अभाव; स्थानीय संसाधनों एवं क्षमता का सही तरीके से दोहन नहीं; राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए स्थानीय निकायों का प्रयोग जिससे पारदर्शिता का अभाव; योजना कार्यान्वयन पर निगरानी तथा मूल्यांकन का अभाव आदि चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं पंचायती राज से जुड़ी उपरोक्त चुनौतियाँ इसके मूल भावना पर प्रहार करती हैं| जरुरत इस बात है कि इन चुनौतियों को सरकार द्वारा बेहतर तरीके से निपटा जाये ताकि स्थानीय स्तर पर शक्तियों का विकेंद्रीकरण प्रभावी तरीके से सुनिश्चित हो सके एवं लोकतंत्र की जड़ों को मजबूती मिल सके|
##Question:पंचायती राज संस्थाओं ने ग्रामीण विकास के माध्यम से भारतीय लोकतंत्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है किन्तु स्थानीय स्वशासन संस्थाएं अभी भी अनेक चुनौतियों का सामना कर रही हैं| चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द) Panchayati Raj institutions have played an important role in the development of Indian democracy through rural development, but institutions of local self-government are still facing many challenges. Discuss. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में पंचायती राज व्यवस्था के बारे में सामान्य जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में ग्रामीण विकास में पंचायती राज व्यवस्था की भूमिका को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में पंचायती राज व्यवस्था द्वारा भारतीय लोकतंत्र के विकास में निभायी गयी भूमिका को स्पष्ट कीजिये 4- तीसरे भाग में पंचायती राज व्यवस्था की चुनौतियों को स्पष्ट कीजिये 5- अंतिम में चुनौतियों के समापन की आवश्यकता को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत में प्राचीन काल से ही पंचायतों का अस्तित्व रहा है| जिसे देखते हुए स्थानीय स्तर पर शक्तियों केविकेंद्रीकरण तथा ग्रामीण स्थानीय स्वशासन की स्थापनाहेतु भारत में पंचायती राज की अवधारणा का विकास किया गया और संविधान केअनुच्छेद 40के अंतर्गत इसके गठन हेतु राज्यों को उत्तरदायित्व सौंपा गया था| इसके बाद बलवंतराय मेहता समिति, अशोक मेहता समिति, जी.वी.के. राव समिति तथा एम.एल.सिंघवी समितिके सिफारिशों के द्वारा क्रमशः इसको ज्यादा प्रभावी बनाने हेतु प्रयास किया गया| वर्ष 1992 में 73वें संविधान संशोधनअधिनियमके द्वारा पंचायतों कोसंवैधानिक दर्जाप्रदान किया गया तथा| इसके बाद पंचायती राज संस्थाओं ने ग्रामीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है| ग्रामीण विकास में पंचायती राज संस्थाओं की भूमिका पंचायती राज का एक उद्देश्य सामाजिक और राजनीतिक विकास था। इन संस्थाओं में महिलाओं की बढ़ती भूमिका ने राजनीति में महिलाओं के समावेशन में वृद्धि की है। वर्तमान में महिलाओं की भूमिका 40% से अधिक है। निर्णय निर्माण तथा क्रियान्वयन को निचले स्तर तक पहुँचने में मदद मिली है जिससे जनता के शासन में विश्वास में वृद्धि हुई है। विकास कार्यों का संचालन स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार हुआ है जिससे संसाधनों का आवंटन दक्षतापूर्ण हुआ है। योजनाओं एवं कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में प्रभाविता का समावेश हुआ है। यथा पचायती राज व्यवस्था के कारण मनरेगा में भ्रस्टाचार में कमी आई है। शासन का फोकस स्थानीय समस्याओं पर अधिक हुआ है। नीति निर्माण के फीडबैक तंत्र में सुधार हुआ है। भारतीय लोकतंत्र को सुदृढ़ करने में पंचायतों की भूमिका भागीदारीपूर्ण लोकतन्त्र की आधुनिक अवधारणा को साकार करने में मजबूती मिली है। प्रत्यक्ष लोकतंत्रको बढ़ावा देने मेंग्राम सभाओंकी अहम् भूमिका क्योंकि इसमें उस ग्राम के सभी मतदाता शामिल होते हैं| इससेना सिर्फ विकास एवं योजना निर्माण/निगरानी/मूल्यांकन आदि मेंसभी की सहभागितासुनिश्चित होती है बल्कि लोकतंत्र को सुदृढ़ता प्रदान करने में यह अहम् भूमिका अदा कर सकता है| महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण सेमहिला सशक्तिकरण; अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों हेतु सीटों के आरक्षण सेसामाजिक न्याय को प्रोत्साहन; 11वीं अनुसूची में वर्णित विषयों सेआर्थिक एवं सामाजिक न्याय को बढ़ावाजैसे- कृषि से संबंधित विषय; भूमि-सुधार तथा भूमि-संरक्षण; वंचितों एवं कमजोर वर्गों का कल्याण; जनवितरण व्यवस्था; महिला एवं बाल विकास;गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम; परिवार कल्याण आदि| लोगों के मध्यएकता को प्रोत्साहन तथा सामुदायिक भावनाको बढ़ावा; सशक्त तरीके से योजनाओं का क्रियान्वयन सुनिश्चित करना जिससे लोकतंत्र के प्रति आस्था का विकास; ग्राम सशक्तिकरण से भारत का विकास की ओर बढ़ना; पंचायतों के उपरोक्त महत्वों के द्वारा उन मूल्यों तथा कारकों को बढ़ावा मिलता है जिससे लोकतंत्र की मूल जड़ों का सतत विकास सुनिश्चित करने में मदद मिलती है| पंचायती राज संस्थाओं से जुड़ी चुनौतियाँ इतने व्यापक महत्त्व के बाद भी पंचायती राज संस्थाएं विभिन्न चुनौतियों का सामना कर रही हैं| इन चुनौतियों के कारण पंचायती राज संस्थाएं अपनी पूर्ण क्षमता का प्रदर्शन नहीं कर पा रही हैं| पंचायती राज संस्थाओं की प्रमुख चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं यथा स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव का नहीं होना, चुनाव में सभी वर्गों की सहभागिता का अभाव तथा सहभागिता के लिए उपयुक्त वातावरण का अभाव; पंचायतों की कार्यप्रणाली पक्षपातपूर्ण; विषयों के अनुरूप जबावदेही निर्धारित नहीं विषयों का हस्तांतरण नहीं होना; वास्तव में संसाधनों का हस्तांतरण नहीं; अंतरक्षेत्रीय अधिकारिता का निर्धारण नहीं अधिकांश पंचायतों को कर/शुल्क आदि लगाने/वसूलने का अधिकार नहीं; संसाधनों के प्रयोग में पारदर्शिता का अभाव जैसे -लेखाजोखा/लेखापरीक्षण का ना होना राज्य वित आयोग की सिफारिशों को लागू करने में राज्य-सरकारों की आनाकानी; कार्मिक प्रबंधन, प्रशिक्षण आदि की कोई पृथक व्यवस्था नहीं; जिले के स्तर पर कमजोर नियोजन-ढाँचा जबकि मध्यवर्ती तथा ग्राम स्तर पर इनका पूरी तरह अभाव; स्थानीय संसाधनों एवं क्षमता का सही तरीके से दोहन नहीं; राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए स्थानीय निकायों का प्रयोग जिससे पारदर्शिता का अभाव; योजना कार्यान्वयन पर निगरानी तथा मूल्यांकन का अभाव आदि चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं पंचायती राज से जुड़ी उपरोक्त चुनौतियाँ इसके मूल भावना पर प्रहार करती हैं| जरुरत इस बात है कि इन चुनौतियों को सरकार द्वारा बेहतर तरीके से निपटा जाये ताकि स्थानीय स्तर पर शक्तियों का विकेंद्रीकरण प्रभावी तरीके से सुनिश्चित हो सके एवं लोकतंत्र की जड़ों को मजबूती मिल सके|
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जनसांख्यिकी से आप क्या समझते हैं? माल्थस के जनसंख्या संबंधी सिद्धान्त की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) What do you understand by demographics? Discuss the population theory of Malthus. (150-200 words)
Approach: भूमिका में जनसांख्यिकी को परिभाषित कीजिए। जनसांख्यिकी की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। माल्थस के जनसंख्या के सिद्धान्त को स्पष्ट कीजिए। सिद्धान्त के महत्व की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर- जनसांख्यिकी या जनांकिकी, जनसंख्या का सुव्यवस्थित अध्ययन है। इस शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा से हुई है तथा यह दो शब्दों "डेमोस" अर्थात जन (लोग) और "ग्राफीन" अर्थात वर्णन से मिलकर बना है जिसका तात्पर्य है- "लोगों का वर्णन"। जनसांख्यिकी के अंतर्गत जनसंख्या से संबन्धित विभिन्न प्रवृतियों और प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है, जिसमें जनसंख्या के आकार में परिवर्तन, जन्म, मृत्यु एवं प्रवसन के प्रतिरूप तथा जनसंख्या की संरचना एवं संघटन को सम्मिलित किया जाता है। जनसांख्यिकी के विभिन्न प्रकार होते हैं जैसे- आकारिकी जनसांख्यिकी जिसमें अधिकतर जनसंख्या के आकार अर्थात मात्रा का अध्ययन किया जाता है और सामाजिक जनसांख्यिकी जिसमें जनसंख्या के सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक पक्षों पर विचार किया जाता है। जनसंख्या का माल्थस सिद्धान्त- माल्थस वो पहले व्यक्ति थे जिन्होने जनसंख्या पर निबंध लिखते हुए जनसंख्या तथा संसाधनों के बीच संबंध स्थापित किया। माल्थस ने अपने सिद्धांत का विकास करते हुए निम्नलिखित दो विशेषताओं की कल्पना की- मानव के जीवित रहने के लिए भोजन आवश्यक है स्त्री-पुरुष के बीच कामुक आवेग आवश्यक है और यह अपनी वर्तमान स्थिति में ऐसे ही बना रहेगा. माल्थस ने विचार व्यक्त किया कि मानव में जनसंख्या बढ़ाने की क्षमता बहुत अधिक है और इसकी तुलना में पृथ्वी में मानव के लिए जीविकोपार्जन के साधन जुटाने की क्षमता कम है. माल्थस के अनुसार किसी भी क्षेत्र में जनसंख्या की वृद्धि गुणोत्तर श्रेणी (Geometrical Progression) के अनुसार बढ़ती है, जबकि जीविकोपार्जन में साधन समान्तर श्रेणी (Arithmetic Progression) के अनुसार बढ़ते हैं सके अनुसार जनसंख्या की वृद्धि 1, 2, 3, 4, 8, 16, 32, 64, 128, 256……..की दर से बढ़ती है, जबकि जीविकोपार्जन 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 की दर से बढ़ते हैं। अतः शीघ्र ही जनसंख्या इतनी अधिक हो जाएगी कि उसका भरण-पोषण लगभग असंभव हो जायेगा और भुखमरी तथा कुपोषण होना अनिवार्य होगा. माल्थस के अनुसार प्रत्येक 25 वर्षों के बाद जनसंख्या दुगनी हो जाती है. दो शताब्दियों में जनसंख्या और भरण पोषण के साधनों में अंतर 256 तथा 9 और तीन शताब्दियों में 4096 और 13, और दो हजार वर्षों में यह अंतर लगभग अनिश्चित हो जायेगा। अतः उत्पादन चाहे कितना भी बढ़ जाए, जनसंख्या की वृद्धि दर उससे सदा ही अधिक रहेगी. अंततः मानव की संख्या भुखमरी, बीमारी, युद्ध, लूट-पाट आदि का शिकार होकर कम हो जाएगी. इस प्रकार खाद्य सामग्री की उपलब्ध मात्र जनसंख्या का सबसे बड़ा नियंत्रक है. जहाँ अधिक खाद्य सामग्री उपलब्ध होगी वहाँ मृत्यु दर कम होगी और जनसंख्या स्वतः ही कम हो जाएगी. मृत्यु को जनसंख्या कम करने का सामान्य उपाय (Positive Cheek) माना गया है अत: एक समय के पश्चात उपलब्ध स्रोत जनसंख्या के लिए अपर्याप्त हो जाते हैं। माल्थस के अनुसार ऐसी स्थिति में प्रकृति स्वयं जनसंख्या नियंत्रित करने के प्रयास करेगी जो स्वभावत: विध्वंसक होंगे। माल्थस के अनुसार इस प्रकृति द्वारा नियंत्रण को रोका जा सकता है यदि स्व-नियंत्रण के प्रयास किए जाएँ। मुख्यतया जनसंख्या नियंत्रण एवम जनसंख्या नियमन के संदर्भ में जन्म मृत्यु एवं प्रवसन को महत्वपूर्ण घटक माना जाता है। माल्थस का सिद्धान्त संसाधनों हेतु भविष्य के तनाव के लिए आगाह करता है। यह जनसंख्या नियंत्रण हेतु या संसाधनों के युक्तियुक्त उपयोग के लिए प्रेरित करता है।
##Question:जनसांख्यिकी से आप क्या समझते हैं? माल्थस के जनसंख्या संबंधी सिद्धान्त की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) What do you understand by demographics? Discuss the population theory of Malthus. (150-200 words)##Answer:Approach: भूमिका में जनसांख्यिकी को परिभाषित कीजिए। जनसांख्यिकी की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। माल्थस के जनसंख्या के सिद्धान्त को स्पष्ट कीजिए। सिद्धान्त के महत्व की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर- जनसांख्यिकी या जनांकिकी, जनसंख्या का सुव्यवस्थित अध्ययन है। इस शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा से हुई है तथा यह दो शब्दों "डेमोस" अर्थात जन (लोग) और "ग्राफीन" अर्थात वर्णन से मिलकर बना है जिसका तात्पर्य है- "लोगों का वर्णन"। जनसांख्यिकी के अंतर्गत जनसंख्या से संबन्धित विभिन्न प्रवृतियों और प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है, जिसमें जनसंख्या के आकार में परिवर्तन, जन्म, मृत्यु एवं प्रवसन के प्रतिरूप तथा जनसंख्या की संरचना एवं संघटन को सम्मिलित किया जाता है। जनसांख्यिकी के विभिन्न प्रकार होते हैं जैसे- आकारिकी जनसांख्यिकी जिसमें अधिकतर जनसंख्या के आकार अर्थात मात्रा का अध्ययन किया जाता है और सामाजिक जनसांख्यिकी जिसमें जनसंख्या के सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक पक्षों पर विचार किया जाता है। जनसंख्या का माल्थस सिद्धान्त- माल्थस वो पहले व्यक्ति थे जिन्होने जनसंख्या पर निबंध लिखते हुए जनसंख्या तथा संसाधनों के बीच संबंध स्थापित किया। माल्थस ने अपने सिद्धांत का विकास करते हुए निम्नलिखित दो विशेषताओं की कल्पना की- मानव के जीवित रहने के लिए भोजन आवश्यक है स्त्री-पुरुष के बीच कामुक आवेग आवश्यक है और यह अपनी वर्तमान स्थिति में ऐसे ही बना रहेगा. माल्थस ने विचार व्यक्त किया कि मानव में जनसंख्या बढ़ाने की क्षमता बहुत अधिक है और इसकी तुलना में पृथ्वी में मानव के लिए जीविकोपार्जन के साधन जुटाने की क्षमता कम है. माल्थस के अनुसार किसी भी क्षेत्र में जनसंख्या की वृद्धि गुणोत्तर श्रेणी (Geometrical Progression) के अनुसार बढ़ती है, जबकि जीविकोपार्जन में साधन समान्तर श्रेणी (Arithmetic Progression) के अनुसार बढ़ते हैं सके अनुसार जनसंख्या की वृद्धि 1, 2, 3, 4, 8, 16, 32, 64, 128, 256……..की दर से बढ़ती है, जबकि जीविकोपार्जन 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 की दर से बढ़ते हैं। अतः शीघ्र ही जनसंख्या इतनी अधिक हो जाएगी कि उसका भरण-पोषण लगभग असंभव हो जायेगा और भुखमरी तथा कुपोषण होना अनिवार्य होगा. माल्थस के अनुसार प्रत्येक 25 वर्षों के बाद जनसंख्या दुगनी हो जाती है. दो शताब्दियों में जनसंख्या और भरण पोषण के साधनों में अंतर 256 तथा 9 और तीन शताब्दियों में 4096 और 13, और दो हजार वर्षों में यह अंतर लगभग अनिश्चित हो जायेगा। अतः उत्पादन चाहे कितना भी बढ़ जाए, जनसंख्या की वृद्धि दर उससे सदा ही अधिक रहेगी. अंततः मानव की संख्या भुखमरी, बीमारी, युद्ध, लूट-पाट आदि का शिकार होकर कम हो जाएगी. इस प्रकार खाद्य सामग्री की उपलब्ध मात्र जनसंख्या का सबसे बड़ा नियंत्रक है. जहाँ अधिक खाद्य सामग्री उपलब्ध होगी वहाँ मृत्यु दर कम होगी और जनसंख्या स्वतः ही कम हो जाएगी. मृत्यु को जनसंख्या कम करने का सामान्य उपाय (Positive Cheek) माना गया है अत: एक समय के पश्चात उपलब्ध स्रोत जनसंख्या के लिए अपर्याप्त हो जाते हैं। माल्थस के अनुसार ऐसी स्थिति में प्रकृति स्वयं जनसंख्या नियंत्रित करने के प्रयास करेगी जो स्वभावत: विध्वंसक होंगे। माल्थस के अनुसार इस प्रकृति द्वारा नियंत्रण को रोका जा सकता है यदि स्व-नियंत्रण के प्रयास किए जाएँ। मुख्यतया जनसंख्या नियंत्रण एवम जनसंख्या नियमन के संदर्भ में जन्म मृत्यु एवं प्रवसन को महत्वपूर्ण घटक माना जाता है। माल्थस का सिद्धान्त संसाधनों हेतु भविष्य के तनाव के लिए आगाह करता है। यह जनसंख्या नियंत्रण हेतु या संसाधनों के युक्तियुक्त उपयोग के लिए प्रेरित करता है।
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कांग्रेस के नरम दल की उपलब्धियों का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए । ( 150-200 शब्द/10 अंक ) Critically evaluate the achievements of the moderates of Congress. (150-200 words/ 10 Marks)
दृष्टिकोण : कांग्रेस के नरम दल का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । कांग्रेस के नरम दल की उपलब्धियों की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । नरम दल की सीमाओं की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । परवर्ती काल के राष्ट्रीय आंदोलन को दिशा देने के संदर्भ में नरम दल के योगदान की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : कांग्रेस की स्थापना के बाद प्रारंभिक दो दशकों के काल को सामान्यतः नरम दल का काल या उदारवादी युग कहा जाता है । इस काल के अधिकांश नेता शिक्षित मध्य वर्ग से आते थे जिनपर ब्रिटेन की व्यवस्था व पश्चिमी शिक्षा का काफी प्रभाव था । ये संवैधानिक तरीकों से स्वशासन के लिए कुछ अधिकार प्राप्त करना चाहते थे । प्रारंभिक दौर में इस लक्ष्य को ध्यान में रखकर कुछ तात्कालिक लक्ष्य निर्धारित किए गए । जैसे- राजनीतिक संगठनों तथा नेताओं के बीच मित्रवत सम्बन्धों की स्थापना , जाति, धर्म, क्षेत्र इत्यादि की सीमाओं को तोड़कर राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहन , जनता को जागरूक एवं प्रशिक्षित करना तथा राष्ट्रीय मांगों का निर्धारन । ज्ञापन, प्रार्थना पत्र, व बौद्धिक भाषणों के माध्यम से ये ब्रिटिश संसद के समक्ष अपनी मांग रखते थे । ये भारत के विकास के लिए अंग्रेजों की उपस्थिती को आवश्यक समझते थे । राष्ट्रीय आंदोलन में नरम दल के योगदान/उपलब्धियों को हम निम्नलिखित रूपों में देख सकते हैं : इन्होंने एक अखिल भारतीय संगठन का निर्माण किया तथा उसे सफलतापूर्वक संचालित किया । समकालीन परिस्थितियों में ऐसे संगठन का निर्माण ही बड़ी उपलब्धि थी । प्रारम्भिक दौर में राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य नेतृत्व एवं नेताओं का उदय को संभव बनाया । राष्ट्रीय मुद्दों का निर्धारन , जिसने देश को जोड़ने का कार्य किया और इसकी प्रकृति भी अखिल भारतीय थी साथ ही प्रगतिशील भी । राष्ट्रीय मांगों में धन के दोहन को रोकने संबंधी मांग का राष्ट्रीय आंदोलन के प्रत्येक चरण में महत्व बना रहा । इसी मुद्दे को आधार बना कर अंग्रेजों के शोषणकारी चरित्र को उजागर किया गया । लोकतांत्रिक कार्यशैली को आधार बनाकर गतिविधियों का संचालन किया । थोड़े संशोधनों के साथ यह शैली राष्ट्रीय आंदोलन की प्रमुख शैली बनी रही । भारत का शासन भारतीयों के हक में होना चाहिए , इस विचार को मजबूती से आगे बढ़ाया । आजादी की लड़ाई को ब्रिटेन तथा अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर ले जाने की परंपरा की शुरुआत भी नरमदलीय नेताओं ने की । 1892 के भारत शासन अधिनियम को नरम दल की ही उपलब्धि मानी जा सकती है । नरम दल की सीमाएं : इनका प्रभाव व संकेंद्रण मुख्यतः शहरों में ही रहा । जब तक कांग्रेस पर इनका प्रभाव रहा कांग्रेस का विस्तार ग्रामीण क्षेत्रों तक नहीं हो पाया । शहरों में मुख्यतः शिक्षित मध्य व उच्च वर्ग के बीच ही जनाधार रहा । अर्थात निम्न वर्ग के बीच कांग्रेस का जानधार नहीं । नरमदलीय कांग्रेस की कार्यशैली के कारण छात्र एवं युवा भी कांग्रेस से अलग-थलग । लंबे समय तक नरमदलीय नेताओं की ब्रिटिश सरकार में आस्था लेकिन सरकार से कोई महत्वपूर्ण सुधारों या रियायतों को प्राप्त करने में विफल । नरमदलीय कार्यशैली की सीमाओं के कारण ही गरमदल का उदय । उपरोक्त सीमाओं के बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के लिए वास्तविक अर्थों में संगठित व संस्थागत प्रयास नरमदलीय कांग्रेसी नेतृत्व द्वारा ही प्रारम्भ हुआ । इन्होंने ही उस आधार को निर्मित किया जिस पर परवर्ती काल में राष्ट्रीय आंदोलन की अन्य धाराओं यथा- गरमदलीय, गांधीवादी आदि का विकास हुआ ।
##Question:कांग्रेस के नरम दल की उपलब्धियों का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए । ( 150-200 शब्द/10 अंक ) Critically evaluate the achievements of the moderates of Congress. (150-200 words/ 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण : कांग्रेस के नरम दल का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । कांग्रेस के नरम दल की उपलब्धियों की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । नरम दल की सीमाओं की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । परवर्ती काल के राष्ट्रीय आंदोलन को दिशा देने के संदर्भ में नरम दल के योगदान की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : कांग्रेस की स्थापना के बाद प्रारंभिक दो दशकों के काल को सामान्यतः नरम दल का काल या उदारवादी युग कहा जाता है । इस काल के अधिकांश नेता शिक्षित मध्य वर्ग से आते थे जिनपर ब्रिटेन की व्यवस्था व पश्चिमी शिक्षा का काफी प्रभाव था । ये संवैधानिक तरीकों से स्वशासन के लिए कुछ अधिकार प्राप्त करना चाहते थे । प्रारंभिक दौर में इस लक्ष्य को ध्यान में रखकर कुछ तात्कालिक लक्ष्य निर्धारित किए गए । जैसे- राजनीतिक संगठनों तथा नेताओं के बीच मित्रवत सम्बन्धों की स्थापना , जाति, धर्म, क्षेत्र इत्यादि की सीमाओं को तोड़कर राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहन , जनता को जागरूक एवं प्रशिक्षित करना तथा राष्ट्रीय मांगों का निर्धारन । ज्ञापन, प्रार्थना पत्र, व बौद्धिक भाषणों के माध्यम से ये ब्रिटिश संसद के समक्ष अपनी मांग रखते थे । ये भारत के विकास के लिए अंग्रेजों की उपस्थिती को आवश्यक समझते थे । राष्ट्रीय आंदोलन में नरम दल के योगदान/उपलब्धियों को हम निम्नलिखित रूपों में देख सकते हैं : इन्होंने एक अखिल भारतीय संगठन का निर्माण किया तथा उसे सफलतापूर्वक संचालित किया । समकालीन परिस्थितियों में ऐसे संगठन का निर्माण ही बड़ी उपलब्धि थी । प्रारम्भिक दौर में राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य नेतृत्व एवं नेताओं का उदय को संभव बनाया । राष्ट्रीय मुद्दों का निर्धारन , जिसने देश को जोड़ने का कार्य किया और इसकी प्रकृति भी अखिल भारतीय थी साथ ही प्रगतिशील भी । राष्ट्रीय मांगों में धन के दोहन को रोकने संबंधी मांग का राष्ट्रीय आंदोलन के प्रत्येक चरण में महत्व बना रहा । इसी मुद्दे को आधार बना कर अंग्रेजों के शोषणकारी चरित्र को उजागर किया गया । लोकतांत्रिक कार्यशैली को आधार बनाकर गतिविधियों का संचालन किया । थोड़े संशोधनों के साथ यह शैली राष्ट्रीय आंदोलन की प्रमुख शैली बनी रही । भारत का शासन भारतीयों के हक में होना चाहिए , इस विचार को मजबूती से आगे बढ़ाया । आजादी की लड़ाई को ब्रिटेन तथा अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर ले जाने की परंपरा की शुरुआत भी नरमदलीय नेताओं ने की । 1892 के भारत शासन अधिनियम को नरम दल की ही उपलब्धि मानी जा सकती है । नरम दल की सीमाएं : इनका प्रभाव व संकेंद्रण मुख्यतः शहरों में ही रहा । जब तक कांग्रेस पर इनका प्रभाव रहा कांग्रेस का विस्तार ग्रामीण क्षेत्रों तक नहीं हो पाया । शहरों में मुख्यतः शिक्षित मध्य व उच्च वर्ग के बीच ही जनाधार रहा । अर्थात निम्न वर्ग के बीच कांग्रेस का जानधार नहीं । नरमदलीय कांग्रेस की कार्यशैली के कारण छात्र एवं युवा भी कांग्रेस से अलग-थलग । लंबे समय तक नरमदलीय नेताओं की ब्रिटिश सरकार में आस्था लेकिन सरकार से कोई महत्वपूर्ण सुधारों या रियायतों को प्राप्त करने में विफल । नरमदलीय कार्यशैली की सीमाओं के कारण ही गरमदल का उदय । उपरोक्त सीमाओं के बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के लिए वास्तविक अर्थों में संगठित व संस्थागत प्रयास नरमदलीय कांग्रेसी नेतृत्व द्वारा ही प्रारम्भ हुआ । इन्होंने ही उस आधार को निर्मित किया जिस पर परवर्ती काल में राष्ट्रीय आंदोलन की अन्य धाराओं यथा- गरमदलीय, गांधीवादी आदि का विकास हुआ ।
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नैनो तकनीकी की अवधारणा को समझाते हुए, इसके पीढ़ियों की चर्चा कीजिये | साथ ही नैनो प्रौद्योगिकी के विभिन्न अनुप्रयोगों की चर्चा करते हुए इसके नकारात्मक प्रभावों की भी संक्षेप में वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) Whilw explaining the concept of nano technology, discuss its generations. Also, briefly describe its negative effects while discussing various applications of nanotechnology. (150-200 words/10 Marks)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत नैनो तकनीकी के अर्थ को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात नैनो तकनीक की पीढ़ियों को बताते हुए उतार को विस्तारित कीजिये | पुनः नैनो तकनीक के विभिन्न अनुप्रयोगों की चर्चा कीजिये | अंत में नैनो तकनीक के नकारात्मक प्रभाव की चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - नैनो तकनीकी नैनो विज्ञान विज्ञान की वह शाखा है जिसमे वैज्ञानिकों के द्वारा अणु या परमाणु के गुणधर्म का अध्ययन किया जाता है | जैसे- रासायनिक अभिक्रिया, यांत्रिकी, विद्युतीय, चुम्बकीय, आदि क्षेत्रों में | इसमें 1-100 नैनो मीटर की आकृति वाले कणों का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है | इसमें कण एवं पदार्थ का व्यास 10 के घात -9 (10 -9 ) के बराबर होता है | नैनो प्रौद्योगिकी 21 वीं शदी का महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी क्षेत्र है | यह एक बहु आयामी विषय है जिसका मानव अनुप्रयोग की क्षमता अत्यधिक है | वैज्ञानिकों एवं अभियाँत्रिकों द्वारा नैनो कण एवं नैनो पदार्थ अलग-अलग अनुप्रयोगों के लिए विकसित किया जाता है | इसके अंतर्गत दो प्रविधि है - टॉप-डाउन - जहाँ बड़े आकर के पदार्थ को छोटे कणों में विकसित किया जाता है | बॉटम -अप- जहाँ हम छोटे अणुओं को जोड़कर बड़े आकार का नैनो पदार्थ विकसित किया जाता है | नैनो तकनीकी की पीढियां प्रथम पीढ़ी-(नैनो संरचना)- इस पीढ़ी में विभिन्न वस्तुओं में बदलाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है | इस पीढ़ी में हम विभिन्न पदार्थों की संरचना को उसके आणविक स्तर पर नियोजित करते हैं तथा नैनो संरचना विकसित करते हैं | द्वितीय पीढ़ी (सक्रिय नैनो संरचना)- द्वितीय पीढ़ी में ऐसे नैनो संरचना विकसित किया जाता है जो माध्यम में सक्रिय होते हैं | नैनो -मेडिसिन इसके प्रमुख उदहारण हैं जिसके द्वारा ड्रग डिलिवरी किया जा सकता है | नैनो गोल्ड का वर्तमान समय में कैंसर के उपचार के लिए उपयोग किया जा रहा है | तृतीय पीढ़ी -इस पीढ़ी में सभी छोटी बड़ी इकाइयाँ छोटे बड़े स्तर पर नैनो तकनीक के माध्यम से उत्पादन करेगी | ये युग नैनो बोट और मिश्रित नैनो मशीनों का है, जैसे - सेल्फ हीलिंग पॉलीमर चतुर्थ पीढ़ी (आणुविक नैनो प्रणाली)- चौथी पीढ़ी अणुओं को पूर्ण नियंत्रण करेगा | अर्थात तीसरी पीढ़ी के नैनो मशीन की सहयता से अलग-अलग संरचनाएं एवं कार्य आणविक स्तर पर नैनो मशीन की सहयता से किया जाएगा | नैनो प्रौद्योगिकी के विभिन्न अनुप्रयोग वाणिज्यिक अनुप्रयोग -खेल कूद, घर एवं भवन के सामग्री में उपयोग | ऊर्जा के क्षेत्र में - उच्च दक्षता वाला सोलर पैनल, फ्यूल सेल | जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र में - डीएनए जीन, एंटीजन एवं एंटीबॉडी | चिकित्सा के क्षेत्र में- नैनो कंपोजिट, कैंसर के उपचार के लिए नैनो कण का प्रयोग, जीन थेरेपी, ड्रग डिलीवरी | रक्षा के क्षेत्र में - कलर चेंजिंग पॉलीमर जोकि एक तरह का पेंट होता है, नैनो कंपोजिट का उपयोग मिसाइल, लड़ाकू विमान में | अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में - कार्बन नैनो पदार्थ का उपयोग उपग्रह आदि में प्रयोग | पर्यावरण के क्षेत्र में - तेल के रिसाव या प्रदूषण के शोधन में , आदि कृषि के क्षेत्र में - नैनो सिल्वर, कीटनाशक के तौर पर प्रयोग, आदि नैनो प्रौद्योगिकी के नकारात्मक प्रभाव स्वास्थ्य के क्षेत्र में - नैनो कण द्वारा शारीरिक अंतर्क्रियाओं पर प्रभाव पड़ता है , आदि पर्यावरण - जैविक सांद्रण/जैविक आवर्धन हो सकता है, नैनो अपशिष्ट - प्रदूषण का कारण बनता है | सुरक्षा की दृष्टि से - नैनो सेंसर का उपयोग जासूसी के लिए किया जा सकता है, नैनो हथियार(जैविक हथियार) से खतरा , आदि | इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि नैनो तकनीक की मूल समस्या उसकी स्पष्ट परिभाषाओं का न होना है, इसलिए सरकार को विभिन्न हितधारकों को शामिल कर नैनो तकनीक के संभावित लाभों के साथ -साथ उसकी सुभेद्याताओं को विचार के दायरे में लाना चाहिए |
##Question:नैनो तकनीकी की अवधारणा को समझाते हुए, इसके पीढ़ियों की चर्चा कीजिये | साथ ही नैनो प्रौद्योगिकी के विभिन्न अनुप्रयोगों की चर्चा करते हुए इसके नकारात्मक प्रभावों की भी संक्षेप में वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) Whilw explaining the concept of nano technology, discuss its generations. Also, briefly describe its negative effects while discussing various applications of nanotechnology. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत नैनो तकनीकी के अर्थ को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात नैनो तकनीक की पीढ़ियों को बताते हुए उतार को विस्तारित कीजिये | पुनः नैनो तकनीक के विभिन्न अनुप्रयोगों की चर्चा कीजिये | अंत में नैनो तकनीक के नकारात्मक प्रभाव की चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - नैनो तकनीकी नैनो विज्ञान विज्ञान की वह शाखा है जिसमे वैज्ञानिकों के द्वारा अणु या परमाणु के गुणधर्म का अध्ययन किया जाता है | जैसे- रासायनिक अभिक्रिया, यांत्रिकी, विद्युतीय, चुम्बकीय, आदि क्षेत्रों में | इसमें 1-100 नैनो मीटर की आकृति वाले कणों का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है | इसमें कण एवं पदार्थ का व्यास 10 के घात -9 (10 -9 ) के बराबर होता है | नैनो प्रौद्योगिकी 21 वीं शदी का महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी क्षेत्र है | यह एक बहु आयामी विषय है जिसका मानव अनुप्रयोग की क्षमता अत्यधिक है | वैज्ञानिकों एवं अभियाँत्रिकों द्वारा नैनो कण एवं नैनो पदार्थ अलग-अलग अनुप्रयोगों के लिए विकसित किया जाता है | इसके अंतर्गत दो प्रविधि है - टॉप-डाउन - जहाँ बड़े आकर के पदार्थ को छोटे कणों में विकसित किया जाता है | बॉटम -अप- जहाँ हम छोटे अणुओं को जोड़कर बड़े आकार का नैनो पदार्थ विकसित किया जाता है | नैनो तकनीकी की पीढियां प्रथम पीढ़ी-(नैनो संरचना)- इस पीढ़ी में विभिन्न वस्तुओं में बदलाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है | इस पीढ़ी में हम विभिन्न पदार्थों की संरचना को उसके आणविक स्तर पर नियोजित करते हैं तथा नैनो संरचना विकसित करते हैं | द्वितीय पीढ़ी (सक्रिय नैनो संरचना)- द्वितीय पीढ़ी में ऐसे नैनो संरचना विकसित किया जाता है जो माध्यम में सक्रिय होते हैं | नैनो -मेडिसिन इसके प्रमुख उदहारण हैं जिसके द्वारा ड्रग डिलिवरी किया जा सकता है | नैनो गोल्ड का वर्तमान समय में कैंसर के उपचार के लिए उपयोग किया जा रहा है | तृतीय पीढ़ी -इस पीढ़ी में सभी छोटी बड़ी इकाइयाँ छोटे बड़े स्तर पर नैनो तकनीक के माध्यम से उत्पादन करेगी | ये युग नैनो बोट और मिश्रित नैनो मशीनों का है, जैसे - सेल्फ हीलिंग पॉलीमर चतुर्थ पीढ़ी (आणुविक नैनो प्रणाली)- चौथी पीढ़ी अणुओं को पूर्ण नियंत्रण करेगा | अर्थात तीसरी पीढ़ी के नैनो मशीन की सहयता से अलग-अलग संरचनाएं एवं कार्य आणविक स्तर पर नैनो मशीन की सहयता से किया जाएगा | नैनो प्रौद्योगिकी के विभिन्न अनुप्रयोग वाणिज्यिक अनुप्रयोग -खेल कूद, घर एवं भवन के सामग्री में उपयोग | ऊर्जा के क्षेत्र में - उच्च दक्षता वाला सोलर पैनल, फ्यूल सेल | जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र में - डीएनए जीन, एंटीजन एवं एंटीबॉडी | चिकित्सा के क्षेत्र में- नैनो कंपोजिट, कैंसर के उपचार के लिए नैनो कण का प्रयोग, जीन थेरेपी, ड्रग डिलीवरी | रक्षा के क्षेत्र में - कलर चेंजिंग पॉलीमर जोकि एक तरह का पेंट होता है, नैनो कंपोजिट का उपयोग मिसाइल, लड़ाकू विमान में | अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में - कार्बन नैनो पदार्थ का उपयोग उपग्रह आदि में प्रयोग | पर्यावरण के क्षेत्र में - तेल के रिसाव या प्रदूषण के शोधन में , आदि कृषि के क्षेत्र में - नैनो सिल्वर, कीटनाशक के तौर पर प्रयोग, आदि नैनो प्रौद्योगिकी के नकारात्मक प्रभाव स्वास्थ्य के क्षेत्र में - नैनो कण द्वारा शारीरिक अंतर्क्रियाओं पर प्रभाव पड़ता है , आदि पर्यावरण - जैविक सांद्रण/जैविक आवर्धन हो सकता है, नैनो अपशिष्ट - प्रदूषण का कारण बनता है | सुरक्षा की दृष्टि से - नैनो सेंसर का उपयोग जासूसी के लिए किया जा सकता है, नैनो हथियार(जैविक हथियार) से खतरा , आदि | इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि नैनो तकनीक की मूल समस्या उसकी स्पष्ट परिभाषाओं का न होना है, इसलिए सरकार को विभिन्न हितधारकों को शामिल कर नैनो तकनीक के संभावित लाभों के साथ -साथ उसकी सुभेद्याताओं को विचार के दायरे में लाना चाहिए |
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पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद के उदय की पृष्ठभूमि स्पष्ट करते हुए मेघालय के विशेष सन्दर्भ में उग्रवाद पर टिप्पणी कीजिये| (150 से 200 शब्द/10 अंक) Explaining the background of the rise of the insurgency in Northeast India, comment with special reference to the insurgency in Meghalaya. (150 to 200 words/10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में उत्तर पूर्व का परिचय दीजिये 2- प्रथम भाग में पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद के उदय की पृष्ठभूमि स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में मेघालय के विशेष सन्दर्भ मेंउग्रवाद पर टिप्पणी कीजिये| 4- अंतिम में उग्रवाद को रोकने की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| पूर्वोत्तर भारत से आशय भारत के सर्वाधिक पूर्वी क्षेत्रों से है जिसमे एक साथ जुड़े "सात बहनों" के नाम से प्रसिद्ध राज्य और सिक्किम शामिल है |पूर्वोत्तर भारत, शेष भारत से से "चिकेन नेक" जिसे सिलीगुड़ी कोरिडोर के नाम से जानते हैं , से जुड़ा हुआ है | भारत के समस्त उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में 100 से भी अधिक जनजातीय समूह निवास करते हैं जो अपनी विभिन्न भाषाओं एवं रीति-रीवाजों, समृद्ध एवं विस्तृत सांस्कृतिक धरोहर के साथ जीवन निर्वाह करते है| इस क्षेत्र की लगभग 99% सीमा बांग्लादेश, म्यांमार, चीन और भूटान के साथ लगती है| अतः भारत की आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से यह एक सामरिक क्षेत्र है किन्तु यह विभिन्न सुरक्षा चुनौतियों से घिरा है | इतिहास एवं वस्तुस्थिति आजादी के पूर्व अंग्रेजों द्वारा कबीलाई संस्कृति में इसाई संस्कृति का विस्तार किया गया तथा भारत से मुख्य भूमि से सम्पर्क को रोकने की नीति अपनाई गयी | अतः उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के इन आदिवासियों का अन्य भारतीय क्षेत्र के साथ किसी भी प्रकार के राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, भौगोलिक, धार्मिक तथा व्यावसायिक संबंध नही के बराबर थे। भारत ने एकीकरण की प्रवृत्ति पर आधारित नीति अपनाई|सम्पूर्ण पूर्वोत्तर को असम प्रांत एवं NEFA नामक दो प्रशासनिक इकाइयों में बांटा गया प्रारंभिक तौर पर असम राज्य NEFA के अतिरिक्त शेष पूरा उत्तर-पूर्व शामिल था। ध्यातव्य है कि नेफा- नॉर्थ-ईस्ट प्रंटियर एजेंसी एक केंद्र शासित क्षेत्र के रूप में स्थापित किया गया था बाद में नेफा को अरुणाचल प्रदेश नाम दे दिया गया, जिसे 1987 में एक अलग राज्य का दर्जा दिया गया। नेफा का विकास देश के अन्य भागों के साथ सहज एवं शांतिपूर्ण रूप से हुआ जबकि असम में प्रशासनिक नियंत्रण वाले क्षेत्र के अंदर आदिवासी क्षेत्रों में कई समस्याएँ पनपने लगीं। इसकी शुरुआत 50 के दशक में नागालैंड में फिजो द्वारा विद्रोह का झंडा खड़ा करने के साथ हुई जो बाद में मिजोरम, मणिपुर, त्रिपुरा और मेघालय तक फैल गई। 1960-1980 के मध्य असम राज्य द्वारा सरकारी नौकरियों में असमी भाषा को प्राथमिकता दी गयी अतः सांस्कृतिक संरक्षण के लिएभाषा के आधार पर असम से पृथक राज्य की मांग की जाने लगी| इसी क्रम में उग्रवाद का विकास प्रारम्भ हुआ| 1980 के बाद से लेकर वर्तमान तक इसी तरह की घटनाएँ असम के निचले क्षेत्र तथा कर्बी आंगलोंग के क्षेत्रों में होती रही हैं।नागालैंड में अलगाववादी उग्रवाद, बोडो क्षेत्र में आदिवासी तथा गैर-आदिवासी लोगों के बीच अविश्वास की भावना बढ़ रही है। मेघालय में गारो अलगाववाद जारी है तथा मणिपुर में गैर-मणिपुरी लोगों को ज्यादा क्षति पहुँचाई जाती है। मेघालय में उग्रवाद में उग्रवाद के कारण विभिन्न जनजातियों के मध्य अलगाव की भावना तथा आदिवासी एवं बाहर से आकर बसे अन्य जातियों के मध्य विभाजन, पहचान की समस्या आदि कारणों से यहाँ उग्रवाद पनपा है मेघालय में बांग्लादेश से आये अवैध प्रवासियों तथा आदिवासियों के बीच तनाव उत्पन्न होता रहता है मेघालय में उग्रवाद का बड़ा कारण नृजातीयता है अर्थात यहाँ के उग्रवाद में धरम का प्रभाव नहीं है मेघालय में उग्रवाद का स्वरुप मेघालय के उग्रवाद को दो रूपों में वर्गीकृत किया जा सकता है यथा गारो क्षेत्र में अचिक नेशनल वालंटियर काउंसिल, गारो हिल लिबरेशन आर्मी, गारो नॅशनल लिबरेशन आर्मी नामक उग्रवादी संगठन सक्रिय हैं इनमें से ANC और GNLA गारो क्षेत्र में एक स्वायत्त प्रांत का निर्माण करने की माँग करते हैं जबकि गारो हिल लिबरेशन आर्मी सेना और पुलिस के भगोड़े सिपाहियों का संगठन है जो चोरी, डकैती, फिरौती आदि अपराधों में लिप्त है दूसरी ओर जयंतिया और खासी पहाड़ियों में HNCL हाईन्यूट्रिप काउंसिल (1992 ) सक्रिय है| इसका उद्देश्य खासी क्षेत्रों को गारो जनजातियों से पृथक रखना और अलग स्वायत्त क्षेत्र का निर्माण करना मेघालय में उग्रवाद के नकारात्मक परिणाम देखने को मिलते हैं जैसे उग्रवाद और हिंसा ने भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है| बांग्लादेश से आये घुसपैठियों के कारण जनांकिकी में परिवर्तन की समस्या उत्पन्न हुई है| यहाँ तक कि देशी आदिवासियों के अन्दर अल्पसंख्यक होने का भय बढ़ने लगा हैकोकीन, गांजा, अफीम आदि के साथ साथ हथियार, नारकोटिक्स की तस्करी जैसी आपराधिक गतिविधियाँ बढ़ी हैं| आज मेघालय भारत और बांग्लादेश के बीच सबसे बड़ा तस्करी मार्ग बन गया है| ये सभी गतिविधियाँ भारत की आंतरिक सुरक्षा में बाधा उत्पन्न करती हैं| अतः समुचित विकास के लिए आंतरिक सुरक्षा को सुनिश्चित करना आवश्यक है| भारत सरकार इस दिशा में निरंतर प्रयास कर रही है|
##Question:पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद के उदय की पृष्ठभूमि स्पष्ट करते हुए मेघालय के विशेष सन्दर्भ में उग्रवाद पर टिप्पणी कीजिये| (150 से 200 शब्द/10 अंक) Explaining the background of the rise of the insurgency in Northeast India, comment with special reference to the insurgency in Meghalaya. (150 to 200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में उत्तर पूर्व का परिचय दीजिये 2- प्रथम भाग में पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद के उदय की पृष्ठभूमि स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में मेघालय के विशेष सन्दर्भ मेंउग्रवाद पर टिप्पणी कीजिये| 4- अंतिम में उग्रवाद को रोकने की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| पूर्वोत्तर भारत से आशय भारत के सर्वाधिक पूर्वी क्षेत्रों से है जिसमे एक साथ जुड़े "सात बहनों" के नाम से प्रसिद्ध राज्य और सिक्किम शामिल है |पूर्वोत्तर भारत, शेष भारत से से "चिकेन नेक" जिसे सिलीगुड़ी कोरिडोर के नाम से जानते हैं , से जुड़ा हुआ है | भारत के समस्त उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में 100 से भी अधिक जनजातीय समूह निवास करते हैं जो अपनी विभिन्न भाषाओं एवं रीति-रीवाजों, समृद्ध एवं विस्तृत सांस्कृतिक धरोहर के साथ जीवन निर्वाह करते है| इस क्षेत्र की लगभग 99% सीमा बांग्लादेश, म्यांमार, चीन और भूटान के साथ लगती है| अतः भारत की आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से यह एक सामरिक क्षेत्र है किन्तु यह विभिन्न सुरक्षा चुनौतियों से घिरा है | इतिहास एवं वस्तुस्थिति आजादी के पूर्व अंग्रेजों द्वारा कबीलाई संस्कृति में इसाई संस्कृति का विस्तार किया गया तथा भारत से मुख्य भूमि से सम्पर्क को रोकने की नीति अपनाई गयी | अतः उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के इन आदिवासियों का अन्य भारतीय क्षेत्र के साथ किसी भी प्रकार के राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, भौगोलिक, धार्मिक तथा व्यावसायिक संबंध नही के बराबर थे। भारत ने एकीकरण की प्रवृत्ति पर आधारित नीति अपनाई|सम्पूर्ण पूर्वोत्तर को असम प्रांत एवं NEFA नामक दो प्रशासनिक इकाइयों में बांटा गया प्रारंभिक तौर पर असम राज्य NEFA के अतिरिक्त शेष पूरा उत्तर-पूर्व शामिल था। ध्यातव्य है कि नेफा- नॉर्थ-ईस्ट प्रंटियर एजेंसी एक केंद्र शासित क्षेत्र के रूप में स्थापित किया गया था बाद में नेफा को अरुणाचल प्रदेश नाम दे दिया गया, जिसे 1987 में एक अलग राज्य का दर्जा दिया गया। नेफा का विकास देश के अन्य भागों के साथ सहज एवं शांतिपूर्ण रूप से हुआ जबकि असम में प्रशासनिक नियंत्रण वाले क्षेत्र के अंदर आदिवासी क्षेत्रों में कई समस्याएँ पनपने लगीं। इसकी शुरुआत 50 के दशक में नागालैंड में फिजो द्वारा विद्रोह का झंडा खड़ा करने के साथ हुई जो बाद में मिजोरम, मणिपुर, त्रिपुरा और मेघालय तक फैल गई। 1960-1980 के मध्य असम राज्य द्वारा सरकारी नौकरियों में असमी भाषा को प्राथमिकता दी गयी अतः सांस्कृतिक संरक्षण के लिएभाषा के आधार पर असम से पृथक राज्य की मांग की जाने लगी| इसी क्रम में उग्रवाद का विकास प्रारम्भ हुआ| 1980 के बाद से लेकर वर्तमान तक इसी तरह की घटनाएँ असम के निचले क्षेत्र तथा कर्बी आंगलोंग के क्षेत्रों में होती रही हैं।नागालैंड में अलगाववादी उग्रवाद, बोडो क्षेत्र में आदिवासी तथा गैर-आदिवासी लोगों के बीच अविश्वास की भावना बढ़ रही है। मेघालय में गारो अलगाववाद जारी है तथा मणिपुर में गैर-मणिपुरी लोगों को ज्यादा क्षति पहुँचाई जाती है। मेघालय में उग्रवाद में उग्रवाद के कारण विभिन्न जनजातियों के मध्य अलगाव की भावना तथा आदिवासी एवं बाहर से आकर बसे अन्य जातियों के मध्य विभाजन, पहचान की समस्या आदि कारणों से यहाँ उग्रवाद पनपा है मेघालय में बांग्लादेश से आये अवैध प्रवासियों तथा आदिवासियों के बीच तनाव उत्पन्न होता रहता है मेघालय में उग्रवाद का बड़ा कारण नृजातीयता है अर्थात यहाँ के उग्रवाद में धरम का प्रभाव नहीं है मेघालय में उग्रवाद का स्वरुप मेघालय के उग्रवाद को दो रूपों में वर्गीकृत किया जा सकता है यथा गारो क्षेत्र में अचिक नेशनल वालंटियर काउंसिल, गारो हिल लिबरेशन आर्मी, गारो नॅशनल लिबरेशन आर्मी नामक उग्रवादी संगठन सक्रिय हैं इनमें से ANC और GNLA गारो क्षेत्र में एक स्वायत्त प्रांत का निर्माण करने की माँग करते हैं जबकि गारो हिल लिबरेशन आर्मी सेना और पुलिस के भगोड़े सिपाहियों का संगठन है जो चोरी, डकैती, फिरौती आदि अपराधों में लिप्त है दूसरी ओर जयंतिया और खासी पहाड़ियों में HNCL हाईन्यूट्रिप काउंसिल (1992 ) सक्रिय है| इसका उद्देश्य खासी क्षेत्रों को गारो जनजातियों से पृथक रखना और अलग स्वायत्त क्षेत्र का निर्माण करना मेघालय में उग्रवाद के नकारात्मक परिणाम देखने को मिलते हैं जैसे उग्रवाद और हिंसा ने भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है| बांग्लादेश से आये घुसपैठियों के कारण जनांकिकी में परिवर्तन की समस्या उत्पन्न हुई है| यहाँ तक कि देशी आदिवासियों के अन्दर अल्पसंख्यक होने का भय बढ़ने लगा हैकोकीन, गांजा, अफीम आदि के साथ साथ हथियार, नारकोटिक्स की तस्करी जैसी आपराधिक गतिविधियाँ बढ़ी हैं| आज मेघालय भारत और बांग्लादेश के बीच सबसे बड़ा तस्करी मार्ग बन गया है| ये सभी गतिविधियाँ भारत की आंतरिक सुरक्षा में बाधा उत्पन्न करती हैं| अतः समुचित विकास के लिए आंतरिक सुरक्षा को सुनिश्चित करना आवश्यक है| भारत सरकार इस दिशा में निरंतर प्रयास कर रही है|
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पंचायती राज संस्थाएं आर्थिक विकास सुनिश्चित करने एवं निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रमों के बेहतर क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं|लेकिन इनके द्वारा विभिन्न व्यावहारिक सीमाओं का सामना करना पड़ता है|भारत के विशेष संदर्भ में कथन का विश्लेषण कीजिये| (150 से 200 शब्द) Panchayati Raj institutions can play an important role in ensuring economic development and better implementation of poverty alleviation programs. But they face various practical limitations. Analyze the statement in the specific context of India. (150 to 200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में पंचायती राज संस्थाओं के बारे में सामान्य सूचनाएं दीजिये 2- प्रथम भाग में आर्थिक विकास एवं निर्धनता उन्मूलन में PRIs की भूमिका को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में PRIs द्वारा सामना की जाने वाली व्यावहारिक चुनौतियों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में सुधार के सुझाव देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत में प्राचीन काल से ही पंचायतों का अस्तित्व रहा है| जिसे देखते हुए स्थानीय स्तर पर शक्तियों केविकेंद्रीकरण तथा ग्रामीण स्थानीय स्वशासन की स्थापनाहेतु भारत में पंचायती राज की अवधारणा का विकास किया गया और संविधान केअनुच्छेद 40के अंतर्गत इसके गठन हेतु राज्यों को उत्तरदायित्व सौंपा गया था| इसके बाद बलवंतराय मेहता समिति, अशोक मेहता समिति, जी.वी.के. राव समिति तथा एम.एल.सिंघवी समितिके सिफारिशों के द्वारा क्रमशः इसको ज्यादा प्रभावी बनाने हेतु प्रयास किया गया| वर्ष 1992 में 73वें संविधान संशोधनअधिनियमके द्वारा पंचायतों कोसंवैधानिक दर्जाप्रदान किया गया तथा| पंचायती राज संस्थाओं को प्रदत्त विषयों पर कार्य करते हुए पंचायती राज संस्थाएं आर्थिक विकास को तीव्रता दे सकती हैं एवं निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रमों के बेहतर क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है| जिसे निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं| निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रमों के बेहतर क्रियान्वयन में भूमिका लोगों को इन कार्यक्रमों की जानकारी देना एवं उपादेयता समझानातथा कार्यक्रमों के सफल क्रियान्वयन में जनभागीदारी सुनिश्चित करना| ग्रामीण निर्धनों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करना कि वे अपनी समस्याओं को ग्राम सभा की बैठकों में जिनमें पंचायत के सदस्य भी शामिल होते हैं, खुल कर रखें| सरकारी कार्मिकों से प्रश्न पूछने का अधिकार देना एवं समूची कार्यप्रणाली में पारदर्शिता बनाए रखने के माध्यम से पंचायती राज संस्थाएं निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रमों के बेहतर क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं ग्राम पंचायतों की आर्थिक भूमिका ग्राम पंचायते ग्रामीण स्तर पर रोजगार सृजन के लिए अनेक कदम उठा सकती हैं यथा कुटीर एवं ग्रामीण उद्योगों का प्रोत्साहन कर सकती हैं| खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों की स्थापना की जा सकती है| भारत सरकार मुद्रा योजना के अंतर्गत इसे प्रोत्साहित कर रही है| ग्राम पंचायतों द्वारा सौर ऊर्जा और ग्रामीण अपशिष्ट से उत्पन्न की जाने वाली ऊर्जा एवं खाद निर्माण आदि क्रियाकलाप शुरू किये जा सकते हैं| दुग्ध उत्पादन अथवा डेयरी केन्द्रों की स्थापना के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार के लिए प्रेरित किया जा सकता है|ओड़िसा सरकार ने ओड़िसा दुग्ध उत्पादन संघ के माध्यम से उपरोक्त को साकार करने का प्रयास किया है| स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से गाँव का समावेशी विकास किया जा सकता है| मत्स्ययन उद्योग का विकास, पिगरीज उद्योग, कुक्कुट, मधुमक्खी, रेशम उत्पादन आदि के माध्यम से ग्रामीण स्तर पर रोजगार पैदा किये जा सकते हैं| विभिन्न राज्यों के विशिष्ट उत्पादों पर आधारित उद्योग धंधों का विकास किया जा सकता है जैसे काजू और मसाला प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना करना, नारियल अपशिष्टों का प्रसंस्करण आदि| उपरोक्त गतिविधियों के प्रोत्साहन के माध्यम से पंचायती राज संस्थाएं आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं किन्तु अपनी व्यावहारिक सीमाओं के कारण ये संस्थाएं अपनी क्षमता का पूर्ण दोहन नहीं कर पाती हैं| पंचायती राज संस्थाओं की सीमाएं विभिन्न केस अध्ययनों में ग्रामीणों ने निम्नलिखित समस्याओं के प्रति पंचायतों का ध्यान आकृष्ट किया है यथा लोगों को ग्राम सभा एवं पंचायतों की सापेक्षिक भूमिकाओं की जानकारी नहीं होती है पंचायत सदस्य लोगों की समस्याओं के प्रति जानबूझकर अनजान बने रहते हैं पंचायत सदस्य, लोगों के द्वारा पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देने से बचते हैं सरकारी अधिकारी व कर्मचारी प्रायः जनसमस्याओं के प्रति उदासीन व्यवहार/दृष्टिकोण अपनाते हैं लोग सरकार द्वारा दिए जाने वाले धन का लेखा जोखा जानना चाहते हैं किन्तु इसकी सटीक जानकारी उनको नहीं दी जाती है| गावों में बड़े अधिकारियों का द्वारा प्रायः बहुत कम ही बार होता है| इसके कारण ग्रामीण लोग अपनी परेशानियों को उच्चाधिकारियों तक नहीं पहुंचा पाते लोगों को विकास कार्यों की पूरी जानकारी नहीं दी जाती है ग्राम पंचायते दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कार्य नहीं करती हैं अपितु जाति-धर्म आदि पक्षपातपूर्ण व्यवहार के आधार पर कार्य करती है महिलाओं को अपनी बात रखने का अवसर प्रायः नहीं दिया जाता है एवं उस क्षेत्र के विधायक एवं सांसद प्रायः ग्राम सभा की बैठकों से स्वयं को अलग रखते हैं अपनी उपरोक्त व्यावहारिक सीमाओं के कारण ये पंचायती राज संस्थाएं अपनी क्षमता का पूर्ण दोहन नहीं कर पाती हैं| अतः उपरोक्त सीमाओं के समाधान के लिए प्रत्येक गाँव के स्तर पर एक निगरानी एवं पुनरीक्षण समिति का गठन किया जाना चाहिए जो पंचायतों का उत्तरदायित्व निर्धारित कर सके और लाभार्थियों को उनका हक़ दिला सके| इस सम्बन्ध में ग्राम सभा की भूमिका बढाने के साथ साथ उन्हें विधायी एवं वित्तीय रूप से सशक्त करने का प्रयास किया जाना चाहिए |
##Question:पंचायती राज संस्थाएं आर्थिक विकास सुनिश्चित करने एवं निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रमों के बेहतर क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं|लेकिन इनके द्वारा विभिन्न व्यावहारिक सीमाओं का सामना करना पड़ता है|भारत के विशेष संदर्भ में कथन का विश्लेषण कीजिये| (150 से 200 शब्द) Panchayati Raj institutions can play an important role in ensuring economic development and better implementation of poverty alleviation programs. But they face various practical limitations. Analyze the statement in the specific context of India. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में पंचायती राज संस्थाओं के बारे में सामान्य सूचनाएं दीजिये 2- प्रथम भाग में आर्थिक विकास एवं निर्धनता उन्मूलन में PRIs की भूमिका को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में PRIs द्वारा सामना की जाने वाली व्यावहारिक चुनौतियों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में सुधार के सुझाव देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत में प्राचीन काल से ही पंचायतों का अस्तित्व रहा है| जिसे देखते हुए स्थानीय स्तर पर शक्तियों केविकेंद्रीकरण तथा ग्रामीण स्थानीय स्वशासन की स्थापनाहेतु भारत में पंचायती राज की अवधारणा का विकास किया गया और संविधान केअनुच्छेद 40के अंतर्गत इसके गठन हेतु राज्यों को उत्तरदायित्व सौंपा गया था| इसके बाद बलवंतराय मेहता समिति, अशोक मेहता समिति, जी.वी.के. राव समिति तथा एम.एल.सिंघवी समितिके सिफारिशों के द्वारा क्रमशः इसको ज्यादा प्रभावी बनाने हेतु प्रयास किया गया| वर्ष 1992 में 73वें संविधान संशोधनअधिनियमके द्वारा पंचायतों कोसंवैधानिक दर्जाप्रदान किया गया तथा| पंचायती राज संस्थाओं को प्रदत्त विषयों पर कार्य करते हुए पंचायती राज संस्थाएं आर्थिक विकास को तीव्रता दे सकती हैं एवं निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रमों के बेहतर क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है| जिसे निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं| निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रमों के बेहतर क्रियान्वयन में भूमिका लोगों को इन कार्यक्रमों की जानकारी देना एवं उपादेयता समझानातथा कार्यक्रमों के सफल क्रियान्वयन में जनभागीदारी सुनिश्चित करना| ग्रामीण निर्धनों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करना कि वे अपनी समस्याओं को ग्राम सभा की बैठकों में जिनमें पंचायत के सदस्य भी शामिल होते हैं, खुल कर रखें| सरकारी कार्मिकों से प्रश्न पूछने का अधिकार देना एवं समूची कार्यप्रणाली में पारदर्शिता बनाए रखने के माध्यम से पंचायती राज संस्थाएं निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रमों के बेहतर क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं ग्राम पंचायतों की आर्थिक भूमिका ग्राम पंचायते ग्रामीण स्तर पर रोजगार सृजन के लिए अनेक कदम उठा सकती हैं यथा कुटीर एवं ग्रामीण उद्योगों का प्रोत्साहन कर सकती हैं| खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों की स्थापना की जा सकती है| भारत सरकार मुद्रा योजना के अंतर्गत इसे प्रोत्साहित कर रही है| ग्राम पंचायतों द्वारा सौर ऊर्जा और ग्रामीण अपशिष्ट से उत्पन्न की जाने वाली ऊर्जा एवं खाद निर्माण आदि क्रियाकलाप शुरू किये जा सकते हैं| दुग्ध उत्पादन अथवा डेयरी केन्द्रों की स्थापना के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार के लिए प्रेरित किया जा सकता है|ओड़िसा सरकार ने ओड़िसा दुग्ध उत्पादन संघ के माध्यम से उपरोक्त को साकार करने का प्रयास किया है| स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से गाँव का समावेशी विकास किया जा सकता है| मत्स्ययन उद्योग का विकास, पिगरीज उद्योग, कुक्कुट, मधुमक्खी, रेशम उत्पादन आदि के माध्यम से ग्रामीण स्तर पर रोजगार पैदा किये जा सकते हैं| विभिन्न राज्यों के विशिष्ट उत्पादों पर आधारित उद्योग धंधों का विकास किया जा सकता है जैसे काजू और मसाला प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना करना, नारियल अपशिष्टों का प्रसंस्करण आदि| उपरोक्त गतिविधियों के प्रोत्साहन के माध्यम से पंचायती राज संस्थाएं आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं किन्तु अपनी व्यावहारिक सीमाओं के कारण ये संस्थाएं अपनी क्षमता का पूर्ण दोहन नहीं कर पाती हैं| पंचायती राज संस्थाओं की सीमाएं विभिन्न केस अध्ययनों में ग्रामीणों ने निम्नलिखित समस्याओं के प्रति पंचायतों का ध्यान आकृष्ट किया है यथा लोगों को ग्राम सभा एवं पंचायतों की सापेक्षिक भूमिकाओं की जानकारी नहीं होती है पंचायत सदस्य लोगों की समस्याओं के प्रति जानबूझकर अनजान बने रहते हैं पंचायत सदस्य, लोगों के द्वारा पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देने से बचते हैं सरकारी अधिकारी व कर्मचारी प्रायः जनसमस्याओं के प्रति उदासीन व्यवहार/दृष्टिकोण अपनाते हैं लोग सरकार द्वारा दिए जाने वाले धन का लेखा जोखा जानना चाहते हैं किन्तु इसकी सटीक जानकारी उनको नहीं दी जाती है| गावों में बड़े अधिकारियों का द्वारा प्रायः बहुत कम ही बार होता है| इसके कारण ग्रामीण लोग अपनी परेशानियों को उच्चाधिकारियों तक नहीं पहुंचा पाते लोगों को विकास कार्यों की पूरी जानकारी नहीं दी जाती है ग्राम पंचायते दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कार्य नहीं करती हैं अपितु जाति-धर्म आदि पक्षपातपूर्ण व्यवहार के आधार पर कार्य करती है महिलाओं को अपनी बात रखने का अवसर प्रायः नहीं दिया जाता है एवं उस क्षेत्र के विधायक एवं सांसद प्रायः ग्राम सभा की बैठकों से स्वयं को अलग रखते हैं अपनी उपरोक्त व्यावहारिक सीमाओं के कारण ये पंचायती राज संस्थाएं अपनी क्षमता का पूर्ण दोहन नहीं कर पाती हैं| अतः उपरोक्त सीमाओं के समाधान के लिए प्रत्येक गाँव के स्तर पर एक निगरानी एवं पुनरीक्षण समिति का गठन किया जाना चाहिए जो पंचायतों का उत्तरदायित्व निर्धारित कर सके और लाभार्थियों को उनका हक़ दिला सके| इस सम्बन्ध में ग्राम सभा की भूमिका बढाने के साथ साथ उन्हें विधायी एवं वित्तीय रूप से सशक्त करने का प्रयास किया जाना चाहिए |
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अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं के महत्व की चर्चा करते हुए इनके मध्य अंतर स्थापित कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) Discussing the importance of latitude and longitude lines, establish the difference between them. (150-200 words/10 Marks)
Approach : भूमिका में अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं को परिभाषित कीजिए। अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं के महत्व की बिंदुवत चर्चा कीजिए। अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं के बीच अंतर कीजिए। इन रेखाओं के महत्व की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर - पृथ्वी को एक गोला मानते हुए इसे क्षैतिज एवं उधर्वधार रूप से काल्पनिक रेखाओं के माध्यम से विभाजन करने का प्रयास किया गया। क्षैतिज रेखाओं को अक्षांश तथा उधर्वधार रेखाओं को देशांतर कहा जाता है। अक्षांश व देशांतर रेखाओं का महत्व इन रेखाओं के माध्यम से भौगोलिक अवस्थिति की जानकारी मिलती है। इसके माध्यम से विभिन्न कटिबंधों का वैज्ञानिक विभाजन संभव है। यथा उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र भूमध्य रेखा से 23-1/2 डिग्री अक्षाश के बीच का क्षेत्र होता है। तथा रेखाओं को कर्क व मकर रेखा के रूप में निरूपित किया जाता है। अक्षांश व देशांतरिय विस्तार के माध्यम से जलवायु, वर्षण, वनस्पति के आधार पर भौगोलिक रेखांकन कर पाना संभव हुआ है। देशांतर रेखाएँ के माध्यम से वैश्विक समय तथा तिथि के निर्धारण में मदद मिलती है। उदाहरण के लिए 0 डिग्री देशांतर को माध्य समय रेखा मानते हुए ग्रीनविच रेखा माना गया है तथा 180 डिग्री देशांतर को अंतर्राष्ट्रीय समय रेखा। देशों की भौगोलिक सीमा को अक्षांशिय व देशांतरीय विस्तार द्वारा निरूपित किया जाता है। अक्षांश व देशांतर रेखाओं में अंतर- अक्षांश देशांतर 1 ये ग्लोब पर क्षैतिज रूप से मौजूद हैं। ये ग्लोब पर उधर्वधार रूप से मौजूद हैं। 2 0 डिग्री से 90 डिग्री के रूप में विभाजन किया गया है। जिसे दोनों गोलार्धों में विभाजित किया गया है। इन्हे 180 रेखाओं में विभाजित किया गया है। 3 0 डिग्री अक्षांश को भूमध्य रेखा या विषुवतीय रेखा कहा जाता है। 0 डिग्री देशांतर को अंतर्राष्ट्रीय समय रेखा माना जाता है तथा 180 डिग्री देशांतर को अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा। 4 अक्षांश रेखाएँ एक दूसरे के समानान्तर होती है। तथा इनके बीच की दूरी समान रहती है। ये एक दूसरे को नहीं काटती हैं। देशांतर रेखाओं के बीच की दूरी विषुवत रेखा पर न्यूनतम होती है तथा ध्रुवों की ओर जाने पर एक दूसरे के बीच की दूरी कम होती है। 5 भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर इनकी लंबाई में कमी आती है। सभी देशांतर रेखाओं की लंबाई समान होती है। अक्षांश व देशांतर रेखाएँ भौगोलिक विभजन कर स्थिति निर्धारण, भौगोलिक विभाजन, समय निर्धारण, तिथि निर्धारण व जलवायु निर्धारण में मदद करती है। इस प्रकार इनका राजनैतिक, आर्थिक व भौगोलिक महत्व है।
##Question:अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं के महत्व की चर्चा करते हुए इनके मध्य अंतर स्थापित कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) Discussing the importance of latitude and longitude lines, establish the difference between them. (150-200 words/10 Marks)##Answer:Approach : भूमिका में अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं को परिभाषित कीजिए। अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं के महत्व की बिंदुवत चर्चा कीजिए। अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं के बीच अंतर कीजिए। इन रेखाओं के महत्व की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर - पृथ्वी को एक गोला मानते हुए इसे क्षैतिज एवं उधर्वधार रूप से काल्पनिक रेखाओं के माध्यम से विभाजन करने का प्रयास किया गया। क्षैतिज रेखाओं को अक्षांश तथा उधर्वधार रेखाओं को देशांतर कहा जाता है। अक्षांश व देशांतर रेखाओं का महत्व इन रेखाओं के माध्यम से भौगोलिक अवस्थिति की जानकारी मिलती है। इसके माध्यम से विभिन्न कटिबंधों का वैज्ञानिक विभाजन संभव है। यथा उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र भूमध्य रेखा से 23-1/2 डिग्री अक्षाश के बीच का क्षेत्र होता है। तथा रेखाओं को कर्क व मकर रेखा के रूप में निरूपित किया जाता है। अक्षांश व देशांतरिय विस्तार के माध्यम से जलवायु, वर्षण, वनस्पति के आधार पर भौगोलिक रेखांकन कर पाना संभव हुआ है। देशांतर रेखाएँ के माध्यम से वैश्विक समय तथा तिथि के निर्धारण में मदद मिलती है। उदाहरण के लिए 0 डिग्री देशांतर को माध्य समय रेखा मानते हुए ग्रीनविच रेखा माना गया है तथा 180 डिग्री देशांतर को अंतर्राष्ट्रीय समय रेखा। देशों की भौगोलिक सीमा को अक्षांशिय व देशांतरीय विस्तार द्वारा निरूपित किया जाता है। अक्षांश व देशांतर रेखाओं में अंतर- अक्षांश देशांतर 1 ये ग्लोब पर क्षैतिज रूप से मौजूद हैं। ये ग्लोब पर उधर्वधार रूप से मौजूद हैं। 2 0 डिग्री से 90 डिग्री के रूप में विभाजन किया गया है। जिसे दोनों गोलार्धों में विभाजित किया गया है। इन्हे 180 रेखाओं में विभाजित किया गया है। 3 0 डिग्री अक्षांश को भूमध्य रेखा या विषुवतीय रेखा कहा जाता है। 0 डिग्री देशांतर को अंतर्राष्ट्रीय समय रेखा माना जाता है तथा 180 डिग्री देशांतर को अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा। 4 अक्षांश रेखाएँ एक दूसरे के समानान्तर होती है। तथा इनके बीच की दूरी समान रहती है। ये एक दूसरे को नहीं काटती हैं। देशांतर रेखाओं के बीच की दूरी विषुवत रेखा पर न्यूनतम होती है तथा ध्रुवों की ओर जाने पर एक दूसरे के बीच की दूरी कम होती है। 5 भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर इनकी लंबाई में कमी आती है। सभी देशांतर रेखाओं की लंबाई समान होती है। अक्षांश व देशांतर रेखाएँ भौगोलिक विभजन कर स्थिति निर्धारण, भौगोलिक विभाजन, समय निर्धारण, तिथि निर्धारण व जलवायु निर्धारण में मदद करती है। इस प्रकार इनका राजनैतिक, आर्थिक व भौगोलिक महत्व है।
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भारत में सिविल सेवाओं, पुलिस प्रणाली और न्यायिक प्रणाली के क्षेत्र में ब्रिटिश काल के दौरान प्रस्तुत किए गए सुधारों का वर्णन कीजिए।। (150-200 शब्द) Elaborate the reforms introduced during brtish era in sphere of civil services, police system and Judicial system in India. (150-200 words)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में प्रशासनिक सुधार प्रारम्भ करने के उद्देश्यों को लिखिए। उसके पश्चात क्रमिक रूप से सिविल सेवा, पुलिस प्रणाली, और न्यायिक प्रणाली के सुधारों का उदाहरण सहित विवरण दीजिए। निष्कर्ष में कमियाँ बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये। प्लासी युद्ध में राजस्व का अधिकार प्राप्त करने के बाद अंग्रेजों की महत्वाकांक्षा राजनीतिक प्रभाव स्थापित करने के लिए भी जागृत हुई। इसी क्रम में बक्सर युद्ध के पश्चात अंग्रेजों को भारत में साम्राज्य विस्तार के लगभग सभी अधिकार परपर हो गए। इसके लिए ब्रिटिश सरकार ने कंपनी के माध्यम से आर्थिक, प्रशासनिक और सामाजिक नीति का विकास किया। प्रशासनिक नीति के अंतर्गत सिविल सेवा, पुलिस और न्यायिक प्रणाली में व्यापक सुधार किए गए। जिसका विवरण इस प्रकार है: सेना: सेना में ब्रिटिश सेना के साथ-साथ भारत में रहने वाले यूरोपीय व भारतीय शामिल थे। उच्च पदों पर अंग्रेजों की नियुक्ति होती थी सभी निम्न पदों पर भारतीयों की ही नियुक्ति होती थी। पुलिस : आधुनिक पुलिस की शुरुआत कार्नवालिस के समय हुआ। पुलिस स्टेशन के प्रमुख के तौर पर दरोगा की नियुक्ति की जाने लगी 1861 में इंडियन पुलिस एक्ट के द्वारा श्रेणीबद्ध पुलिस ढांचे की नींव रखी गयी। सिविल सेवा: आधुनिक सिविल सेवा का जन्मदाता कार्नवालिस को माना जाता है। 1793 में प्रसंविदा के आधार पर नौकरी की शुरुआत हुई। न्यायिक कार्यों को अलग किया गया वेलेजली में सिविल सेवकों के प्रशिक्षण के लिए भारत में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की ईस्ट इंडिया कॉलेज की स्थापना की गयी। 1853 के अधिनियम में प्रतियोगिता परीक्षा का प्रावधान 1861 में भारतीय सिविल सेवा अधिनियम 1863 में सत्येंद्र नाथ टैगोर ने इस परीक्षा को पास किया। 1922 में पहली बार इलाहाबाद में परीक्षा का आयोजन 1926 में लोकसेवा आयोग गठन न्यायपालिका: वारेन हेस्टिंग के समय सदर दीवानी व सदर फ़ौजदारी न्यायालय की स्थापना जिला दीवानी एवं फ़ौजदारी कार्नवालिस के समय बदलाव सदर न्यायालय के नीचे प्रांतीय एवं सर्किट न्यायालय जिला न्यायालय के नीचे भी श्रेणीबद्ध न्यायालय का गठन- रजिस्ट्रार एवं मुंसिफ़ की अदालत कलेक्टर से न्यायिक अधिकार लेकर जज को दिये गए। भारत में इस्लामिक फ़ौजदारी कानून के कई अतार्किक कानून को समाप्त किया। विलियम बैंटिक के समय: स्थानीय भाषाओं का प्रयोग भारतीयों का अपेक्षाकृत उच्च पदों पर नियुक्ति कैनिंग के समय: 1861 में इंडियन हाइकोर्ट एक्ट द्वारा द्वारा सदर न्यायालय और उच्चतम न्यायालय को समाप्त कर हाइ कोर्ट के गठन का प्रावधान 1935 के अधिनियम में संघीय न्यायालय का प्रावधान 1859-61 के बीच आधुनिक कानूनों का संकलन: आईपीसी, सीपीसी, सीआरपीसी को लागू करना कानून के शासन और समानता की अवधारणा लोकप्रिय हुई। गौरतलब है कि ब्रिटिश काल में प्रारम्भ प्रशासनिक सुधार व्यापक आयामों को सम्मिलित किए हुए था। इन सुधारों ने आधुनिक भारत के निर्माण कि नींव तो रखी परंतु साथ में यह भी सही है कि इन सुधारों का वास्तविक उद्देश्य साम्राज्य विस्तार और औपनिवेशिक शासन को सुदृढ़ करना था।
##Question:भारत में सिविल सेवाओं, पुलिस प्रणाली और न्यायिक प्रणाली के क्षेत्र में ब्रिटिश काल के दौरान प्रस्तुत किए गए सुधारों का वर्णन कीजिए।। (150-200 शब्द) Elaborate the reforms introduced during brtish era in sphere of civil services, police system and Judicial system in India. (150-200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में प्रशासनिक सुधार प्रारम्भ करने के उद्देश्यों को लिखिए। उसके पश्चात क्रमिक रूप से सिविल सेवा, पुलिस प्रणाली, और न्यायिक प्रणाली के सुधारों का उदाहरण सहित विवरण दीजिए। निष्कर्ष में कमियाँ बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये। प्लासी युद्ध में राजस्व का अधिकार प्राप्त करने के बाद अंग्रेजों की महत्वाकांक्षा राजनीतिक प्रभाव स्थापित करने के लिए भी जागृत हुई। इसी क्रम में बक्सर युद्ध के पश्चात अंग्रेजों को भारत में साम्राज्य विस्तार के लगभग सभी अधिकार परपर हो गए। इसके लिए ब्रिटिश सरकार ने कंपनी के माध्यम से आर्थिक, प्रशासनिक और सामाजिक नीति का विकास किया। प्रशासनिक नीति के अंतर्गत सिविल सेवा, पुलिस और न्यायिक प्रणाली में व्यापक सुधार किए गए। जिसका विवरण इस प्रकार है: सेना: सेना में ब्रिटिश सेना के साथ-साथ भारत में रहने वाले यूरोपीय व भारतीय शामिल थे। उच्च पदों पर अंग्रेजों की नियुक्ति होती थी सभी निम्न पदों पर भारतीयों की ही नियुक्ति होती थी। पुलिस : आधुनिक पुलिस की शुरुआत कार्नवालिस के समय हुआ। पुलिस स्टेशन के प्रमुख के तौर पर दरोगा की नियुक्ति की जाने लगी 1861 में इंडियन पुलिस एक्ट के द्वारा श्रेणीबद्ध पुलिस ढांचे की नींव रखी गयी। सिविल सेवा: आधुनिक सिविल सेवा का जन्मदाता कार्नवालिस को माना जाता है। 1793 में प्रसंविदा के आधार पर नौकरी की शुरुआत हुई। न्यायिक कार्यों को अलग किया गया वेलेजली में सिविल सेवकों के प्रशिक्षण के लिए भारत में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की ईस्ट इंडिया कॉलेज की स्थापना की गयी। 1853 के अधिनियम में प्रतियोगिता परीक्षा का प्रावधान 1861 में भारतीय सिविल सेवा अधिनियम 1863 में सत्येंद्र नाथ टैगोर ने इस परीक्षा को पास किया। 1922 में पहली बार इलाहाबाद में परीक्षा का आयोजन 1926 में लोकसेवा आयोग गठन न्यायपालिका: वारेन हेस्टिंग के समय सदर दीवानी व सदर फ़ौजदारी न्यायालय की स्थापना जिला दीवानी एवं फ़ौजदारी कार्नवालिस के समय बदलाव सदर न्यायालय के नीचे प्रांतीय एवं सर्किट न्यायालय जिला न्यायालय के नीचे भी श्रेणीबद्ध न्यायालय का गठन- रजिस्ट्रार एवं मुंसिफ़ की अदालत कलेक्टर से न्यायिक अधिकार लेकर जज को दिये गए। भारत में इस्लामिक फ़ौजदारी कानून के कई अतार्किक कानून को समाप्त किया। विलियम बैंटिक के समय: स्थानीय भाषाओं का प्रयोग भारतीयों का अपेक्षाकृत उच्च पदों पर नियुक्ति कैनिंग के समय: 1861 में इंडियन हाइकोर्ट एक्ट द्वारा द्वारा सदर न्यायालय और उच्चतम न्यायालय को समाप्त कर हाइ कोर्ट के गठन का प्रावधान 1935 के अधिनियम में संघीय न्यायालय का प्रावधान 1859-61 के बीच आधुनिक कानूनों का संकलन: आईपीसी, सीपीसी, सीआरपीसी को लागू करना कानून के शासन और समानता की अवधारणा लोकप्रिय हुई। गौरतलब है कि ब्रिटिश काल में प्रारम्भ प्रशासनिक सुधार व्यापक आयामों को सम्मिलित किए हुए था। इन सुधारों ने आधुनिक भारत के निर्माण कि नींव तो रखी परंतु साथ में यह भी सही है कि इन सुधारों का वास्तविक उद्देश्य साम्राज्य विस्तार और औपनिवेशिक शासन को सुदृढ़ करना था।
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Briefly discuss the advent of colonial powers in India.(250 words/15 marks)
Approach Introduction: A brief introduction to the arrival of European colonial powers to India. Body:Briefly discuss the arrival of all the colonial powers that entered the Indian sub-continent as trading companies. Model Answer: Disruptions in trade routes and changing political scenarios in the Middle East compelled the European traders to search for new trading routes to India. The discovery of the sea route to India via Cape of Good Hope marked the beginning of the arrival of colonial powers to India through the trading companies. The Portuguese The expedition of Vasco de Gama that reached Calicut in May 1498welcomed by the local ruler Zamorin.The first Portuguese ViceroyFrancisco d"Almeida arrived in 1505 AD.It was Albuquerque who (1509-15) gave shape to the Portuguese geopolitical designs.Goa was taken in 1510 which later became the capital of the Portuguese Commercial "empire" in India. The Portuguese later occupied Diu, Dalian, and Bassein to control the trade from Gujarat and also occupied the coast of Konkan and Malabar to control the trade from Malabar. Bythe end of the 16th century, they had about fifty forts and a powerful naval fleetof 100 ships. The British In 1600, the East India Company acquired a charter from the ruler of England, Queen Elizabeth I, granting it the sole right to trade with the East. The first English factory was set up on the banks of the river Hugli in 1651By 1696 it began building a fort around the settlement. Mughal emperor Aurangzeb issued a farman granting the Company the right to trade duty-free. Later they established their factories at Surat, Madras, Bombay, Machilipatnam, etc. The Dutch The Dutch East India Company was formed in 1602 through a charter. They established their first factory at Petapuli in North Coromandal in 1606, followed by another at Masulipatam in the same year. Later they established their factories at Pulicat, Cambay, Surat, and Agra, Hariharpur, Patna. Dacca etc. The Danes The Danes entered as traders in 1616 but with no ambition to establish an Empire. They managed to secure the Tranquebar port in 1620 and built a fort there. Later they established their factories at Masulipatam, Porto Novo and Serampur. The French The French company designated as Campaignie des Indes Orientales was started in 1664 with the state"s financial support. The French established their first factory in India at Surat in 1668. Subsequently, Francois Martin established Pondicherry in 1674, which emerged as the headquarters of the French in India. Like other Europeans trading companies, the French added other important factories to the existing ones at Balasore, Masulipatnam, Chandernagore, Tellicherry, and Calicut.
##Question:Briefly discuss the advent of colonial powers in India.(250 words/15 marks)##Answer:Approach Introduction: A brief introduction to the arrival of European colonial powers to India. Body:Briefly discuss the arrival of all the colonial powers that entered the Indian sub-continent as trading companies. Model Answer: Disruptions in trade routes and changing political scenarios in the Middle East compelled the European traders to search for new trading routes to India. The discovery of the sea route to India via Cape of Good Hope marked the beginning of the arrival of colonial powers to India through the trading companies. The Portuguese The expedition of Vasco de Gama that reached Calicut in May 1498welcomed by the local ruler Zamorin.The first Portuguese ViceroyFrancisco d"Almeida arrived in 1505 AD.It was Albuquerque who (1509-15) gave shape to the Portuguese geopolitical designs.Goa was taken in 1510 which later became the capital of the Portuguese Commercial "empire" in India. The Portuguese later occupied Diu, Dalian, and Bassein to control the trade from Gujarat and also occupied the coast of Konkan and Malabar to control the trade from Malabar. Bythe end of the 16th century, they had about fifty forts and a powerful naval fleetof 100 ships. The British In 1600, the East India Company acquired a charter from the ruler of England, Queen Elizabeth I, granting it the sole right to trade with the East. The first English factory was set up on the banks of the river Hugli in 1651By 1696 it began building a fort around the settlement. Mughal emperor Aurangzeb issued a farman granting the Company the right to trade duty-free. Later they established their factories at Surat, Madras, Bombay, Machilipatnam, etc. The Dutch The Dutch East India Company was formed in 1602 through a charter. They established their first factory at Petapuli in North Coromandal in 1606, followed by another at Masulipatam in the same year. Later they established their factories at Pulicat, Cambay, Surat, and Agra, Hariharpur, Patna. Dacca etc. The Danes The Danes entered as traders in 1616 but with no ambition to establish an Empire. They managed to secure the Tranquebar port in 1620 and built a fort there. Later they established their factories at Masulipatam, Porto Novo and Serampur. The French The French company designated as Campaignie des Indes Orientales was started in 1664 with the state"s financial support. The French established their first factory in India at Surat in 1668. Subsequently, Francois Martin established Pondicherry in 1674, which emerged as the headquarters of the French in India. Like other Europeans trading companies, the French added other important factories to the existing ones at Balasore, Masulipatnam, Chandernagore, Tellicherry, and Calicut.
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उन्नत कंप्यूटिंग के सन्दर्भ में सुपर कंप्यूटर एवं क्लाउड कंप्यूटिंग के अनुप्रयोगों की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द; 10 अंक) Discuss the applications of supercomputers and cloud computing in the context of advanced computing. (150-200 Words; 10 marks)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत उन्नत कंप्यूटिंग का सामान्य परिचय देते हुए सुपर कंप्यूटर के अनुप्रयोगों की चर्चा कीजिये | इसके पश्चात क्लाउड कंप्यूटिंग का परिचय देते हुए इसके अनुप्रयोगों को बताइए | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - उन्नत कंप्यूटिंग भारत में वर्ष 1988 में सी डैक की स्थापना ने उन्नत कंप्यूटिंग के क्षेत्र में परम-2000 सुपर कंप्यूटर के आविष्कार से कंप्यूटर में महत्वपूर्ण क्रांति आई है | उन्नत कंप्यूटिंग, कंप्यूटर के ट्रांजिस्टर,डायोड के बाद आई सी चिप के माध्यम से सुपर कंप्यूटर विकसित किया गया | सुपर कंप्यूटर इसे हजारों प्रोसेसर को जोड़ कर बनाया जाता है | इसकी गणना करने की क्षमता को "FLOP" कहा जाता है | सुपर कंप्यूटर सामानांतर प्रणाली पर कार्य करने के कारण कम समय में एवं अधिक शुद्धता से अपना कार्य करता है | सुपर कंप्यूटर के अनुप्रयोग - विज्ञान के अध्ययन में मॉडलिंग और सिमुलेशन में | मौसम विज्ञान के संदर्भ में सुपर कंप्यूटर का उपयोग | जलवायु परिवर्तन के सन्दर्भ में भविष्वाणी को लेकर | जैव -प्रौद्योगिकी में बायो-इन्फार्मेटिक्स के सन्दर्भ में | उद्योग क्षेत्र में सुपर कंप्यूटर का उपयोग | रक्षा क्षेत्र में- मिसाइल, लड़ाकू विमान, किसी भी प्रकार के हथियार को तैयार करने में इसका उपयोग | अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में - इवेंट होराइजन, ब्रम्हांड के अध्ययन में, इसरो द्वारा इसका प्रयोग किया जाता है | आदि क्लाउड कंप्यूटिंग क्लाउड कंप्यूटिंग में डेटा एवं कंप्यूटिंग संसाधनों को वेर्चुअल मशीन या सर्वर में संग्रह किया जाता है | जिसे विभिन्न उपयोगकर्ता द्वारा इन्टरनेट के माध्यम से एक्सेस किया जाता है और उपयोग में लाया जाता है पब्लिक क्लाउड - ऐसा क्लाउड जो सभी व्यक्तियों द्वारा उपयोग में किया जा सकता है जैसे- DG क्लाउड, गूगल ड्राइव, आदि प्राइवेट क्लाउड - ऐसा क्लाउड होता है जो केवल विशेष व्यक्तियों एवं संस्थानों, निजी कम्पनी अथवा सरकारी एजेंसी द्वारा उपयोग में लाया जाता है, जैसे- मेघराज आदि क्लाउड कंप्यूटिंग के लाभ - कम खर्च, डेटा का उपयोग हर समय, डेटा का व्यापक होना, उपयोग के अनुसार पेमेंट, आदि समस्याएं - इन्टरनेट का होना आवश्यक, बुनियादी सुविधाओं के लिए अधिक खर्च -जैसे -डेटा केंद्र बनाना, साइबर सुरक्षा संबंधी मुद्दे -हैकिंग, आदि संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि क्लाउड कंप्यूटिंग आधुनिक युग के लिए एक बेहतरीन विकल्प है, जिसमे इंफ्रास्ट्रक्चर, प्लेटफोर्म और सॉफ्टवेयर एक्सेस सर्विस आदि शामिल है | कंप्यूटर की उन्नत प्रौद्योगिकी द्वारा मनुष्य के जीवन को सुगम्य, आरामदायक बनाने के साथ-साथ मनुष्य द्वारा इसके अनुप्रयोग को सही दिशा में करने की अपेक्षा है |
##Question:उन्नत कंप्यूटिंग के सन्दर्भ में सुपर कंप्यूटर एवं क्लाउड कंप्यूटिंग के अनुप्रयोगों की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द; 10 अंक) Discuss the applications of supercomputers and cloud computing in the context of advanced computing. (150-200 Words; 10 marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत उन्नत कंप्यूटिंग का सामान्य परिचय देते हुए सुपर कंप्यूटर के अनुप्रयोगों की चर्चा कीजिये | इसके पश्चात क्लाउड कंप्यूटिंग का परिचय देते हुए इसके अनुप्रयोगों को बताइए | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - उन्नत कंप्यूटिंग भारत में वर्ष 1988 में सी डैक की स्थापना ने उन्नत कंप्यूटिंग के क्षेत्र में परम-2000 सुपर कंप्यूटर के आविष्कार से कंप्यूटर में महत्वपूर्ण क्रांति आई है | उन्नत कंप्यूटिंग, कंप्यूटर के ट्रांजिस्टर,डायोड के बाद आई सी चिप के माध्यम से सुपर कंप्यूटर विकसित किया गया | सुपर कंप्यूटर इसे हजारों प्रोसेसर को जोड़ कर बनाया जाता है | इसकी गणना करने की क्षमता को "FLOP" कहा जाता है | सुपर कंप्यूटर सामानांतर प्रणाली पर कार्य करने के कारण कम समय में एवं अधिक शुद्धता से अपना कार्य करता है | सुपर कंप्यूटर के अनुप्रयोग - विज्ञान के अध्ययन में मॉडलिंग और सिमुलेशन में | मौसम विज्ञान के संदर्भ में सुपर कंप्यूटर का उपयोग | जलवायु परिवर्तन के सन्दर्भ में भविष्वाणी को लेकर | जैव -प्रौद्योगिकी में बायो-इन्फार्मेटिक्स के सन्दर्भ में | उद्योग क्षेत्र में सुपर कंप्यूटर का उपयोग | रक्षा क्षेत्र में- मिसाइल, लड़ाकू विमान, किसी भी प्रकार के हथियार को तैयार करने में इसका उपयोग | अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में - इवेंट होराइजन, ब्रम्हांड के अध्ययन में, इसरो द्वारा इसका प्रयोग किया जाता है | आदि क्लाउड कंप्यूटिंग क्लाउड कंप्यूटिंग में डेटा एवं कंप्यूटिंग संसाधनों को वेर्चुअल मशीन या सर्वर में संग्रह किया जाता है | जिसे विभिन्न उपयोगकर्ता द्वारा इन्टरनेट के माध्यम से एक्सेस किया जाता है और उपयोग में लाया जाता है पब्लिक क्लाउड - ऐसा क्लाउड जो सभी व्यक्तियों द्वारा उपयोग में किया जा सकता है जैसे- DG क्लाउड, गूगल ड्राइव, आदि प्राइवेट क्लाउड - ऐसा क्लाउड होता है जो केवल विशेष व्यक्तियों एवं संस्थानों, निजी कम्पनी अथवा सरकारी एजेंसी द्वारा उपयोग में लाया जाता है, जैसे- मेघराज आदि क्लाउड कंप्यूटिंग के लाभ - कम खर्च, डेटा का उपयोग हर समय, डेटा का व्यापक होना, उपयोग के अनुसार पेमेंट, आदि समस्याएं - इन्टरनेट का होना आवश्यक, बुनियादी सुविधाओं के लिए अधिक खर्च -जैसे -डेटा केंद्र बनाना, साइबर सुरक्षा संबंधी मुद्दे -हैकिंग, आदि संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि क्लाउड कंप्यूटिंग आधुनिक युग के लिए एक बेहतरीन विकल्प है, जिसमे इंफ्रास्ट्रक्चर, प्लेटफोर्म और सॉफ्टवेयर एक्सेस सर्विस आदि शामिल है | कंप्यूटर की उन्नत प्रौद्योगिकी द्वारा मनुष्य के जीवन को सुगम्य, आरामदायक बनाने के साथ-साथ मनुष्य द्वारा इसके अनुप्रयोग को सही दिशा में करने की अपेक्षा है |
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Briefly discuss the advent of colonial powers in India.(10 Marks/ 150 words)
Approach Introduction: A brief introduction to the arrival of European colonial powers to India. Body:Briefly discuss the arrival of all the colonial powers that entered the Indian sub-continent as trading companies. Model Answer: Disruptions in trade routes and changing political scenarios in the Middle East compelled the European traders to search for new trading routes to India. The discovery of the sea route to India via Cape of Good Hope marked the beginning of the arrival of colonial powers to India through the trading companies. The Portuguese The expedition of Vasco de Gama that reached Calicut in May 1498welcomed by the local ruler Zamorin.The first Portuguese ViceroyFrancisco d"Almeida arrived in 1505 AD.It was Albuquerque who (1509-15) gave shape to the Portuguese geopolitical designs.Goa was taken in 1510 which later became the capital of the Portuguese Commercial "empire" in India. The Portuguese later occupied Diu, Dalian, and Bassein to control the trade from Gujarat and also occupied the coast of Konkan and Malabar to control the trade from Malabar. Bythe end of the 16th century, they had about fifty forts and a powerful naval fleetof 100 ships. The British In 1600, the East India Company acquired a charter from the ruler of England, Queen Elizabeth I, granting it the sole right to trade with the East. The first English factory was set up on the banks of the river Hugli in 1651By 1696 it began building a fort around the settlement. Mughal emperor Aurangzeb issued a farman granting the Company the right to trade duty-free. Later they established their factories at Surat, Madras, Bombay, Machilipatnam, etc. The Dutch The Dutch East India Company was formed in 1602 through a charter. They established their first factory at Petapuli in North Coromandal in 1606, followed by another at Masulipatam in the same year. Later they established their factories at Pulicat, Cambay, Surat, and Agra, Hariharpur, Patna. Dacca etc. The Danes The Danes entered as traders in 1616 but with no ambition to establish an Empire. They managed to secure the Tranquebar port in 1620 and built a fort there. Later they established their factories at Masulipatam, Porto Novo and Serampur. The French The French company designated as Campaignie des Indes Orientales was started in 1664 with the state"s financial support. The French established their first factory in India at Surat in 1668. Subsequently, Francois Martin established Pondicherry in 1674, which emerged as the headquarters of the French in India. Like other Europeans trading companies, the French added other important factories to the existing ones at Balasore, Masulipatnam, Chandernagore, Tellicherry, and Calicut.
##Question:Briefly discuss the advent of colonial powers in India.(10 Marks/ 150 words)##Answer:Approach Introduction: A brief introduction to the arrival of European colonial powers to India. Body:Briefly discuss the arrival of all the colonial powers that entered the Indian sub-continent as trading companies. Model Answer: Disruptions in trade routes and changing political scenarios in the Middle East compelled the European traders to search for new trading routes to India. The discovery of the sea route to India via Cape of Good Hope marked the beginning of the arrival of colonial powers to India through the trading companies. The Portuguese The expedition of Vasco de Gama that reached Calicut in May 1498welcomed by the local ruler Zamorin.The first Portuguese ViceroyFrancisco d"Almeida arrived in 1505 AD.It was Albuquerque who (1509-15) gave shape to the Portuguese geopolitical designs.Goa was taken in 1510 which later became the capital of the Portuguese Commercial "empire" in India. The Portuguese later occupied Diu, Dalian, and Bassein to control the trade from Gujarat and also occupied the coast of Konkan and Malabar to control the trade from Malabar. Bythe end of the 16th century, they had about fifty forts and a powerful naval fleetof 100 ships. The British In 1600, the East India Company acquired a charter from the ruler of England, Queen Elizabeth I, granting it the sole right to trade with the East. The first English factory was set up on the banks of the river Hugli in 1651By 1696 it began building a fort around the settlement. Mughal emperor Aurangzeb issued a farman granting the Company the right to trade duty-free. Later they established their factories at Surat, Madras, Bombay, Machilipatnam, etc. The Dutch The Dutch East India Company was formed in 1602 through a charter. They established their first factory at Petapuli in North Coromandal in 1606, followed by another at Masulipatam in the same year. Later they established their factories at Pulicat, Cambay, Surat, and Agra, Hariharpur, Patna. Dacca etc. The Danes The Danes entered as traders in 1616 but with no ambition to establish an Empire. They managed to secure the Tranquebar port in 1620 and built a fort there. Later they established their factories at Masulipatam, Porto Novo and Serampur. The French The French company designated as Campaignie des Indes Orientales was started in 1664 with the state"s financial support. The French established their first factory in India at Surat in 1668. Subsequently, Francois Martin established Pondicherry in 1674, which emerged as the headquarters of the French in India. Like other Europeans trading companies, the French added other important factories to the existing ones at Balasore, Masulipatnam, Chandernagore, Tellicherry, and Calicut.
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आज़ादी के दो दशकों के भीतर ही राज्यों के पुनर्गठन के मसले को एक सीमा तक सुलझा लिया गया था। टिप्पणी कीजिये। (150 से 200 शब्द/10 अंक ) Within two decades of independence, the issue of reorganization of states was resolved to a certain extent. Comment (150 to 200 words/10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में राज्यों के पुनर्गठन की पृष्ठभूमि की चर्चा कीजिये 2- मुख्य भाग में राज्य पुनर्गठन के सन्दर्भ में घटनाक्रम की चर्चा कीजिये 3- अंतिम में प्रयासों की सीमाएं एवं महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| ब्रिटिश शासन काल में राज्यों का गठन साम्राज्यादी हितों में ध्यान में रखते हुए किया गया था जैसे प्रारम्भ में विस्तार के साथ बॉम्बे मद्रास एवं बंगाल नामक तीन राज्य बनाए गए वहीँ 1905 में बंगाल विभाजन का निर्णय या 1935 में सिंध का गठन भी साम्राज्यवादी हितों से ही संचालित था| 20 वीं सदी में राज्यों के पुनर्गठन को लेकर कांग्रेस का दृष्टिकोण स्पष्ट था| कांग्रेस ने भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का समर्थन किया था| नेहरु रिपोर्ट में भी इसका समर्थन किया गया थालेकिन आजादी के बाद राष्ट्रीय नेतृत्व का यह मत था कि रियासतों का विलय, खाद्यान्न संकट, साम्प्रदायिकता, शीत युद्ध आदि तात्कालिक चुनौतियों के परिप्रेक्ष्य में राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया को अभी स्थगित रखा जाना चाहिए| किन्तु राज्यों के पुनर्गठन के लिए जन दबाव बढ़ता जा रहा था अतः इस सन्दर्भ में क्रमिक रूप से प्रयास किये गए| घटनाक्रम संविधान सभा के द्वारा एस के धर आयोग (1948) का गठन किया गया| धर एक न्यायाधीश थे| आयोग तात्कालिक परिस्थितियों में भाषाई आधार पर पुनर्गठन के पक्ष में नहीं था| इसके बाद कांग्रेस ने जेबीपी समिति (1949) का गठन किया| समिति ने भी तात्कालिक परिस्थितियों में पुनर्गठन का विरोध किया लेकिन समिति का मानना था कि यदि किसी राज्य के भीतर सहमति है तो पुनर्गठन को अनुशंसित किया इन अनुशंसाओं का देश के कई हिस्सों में विरोध होने लगा जिनमें विशेषकर आंध्र प्रदेश का विरोध महत्वपूर्ण था| यहाँ अनशन के पश्चातपोट्टीश्रीरमल्लू की मृत्यु हो गयी जिस के बाद सरकार से हिंसक संघर्ष हुआ| अंततः 1953 में केंद्र सरकार ने आंध्र प्रदेश के पुनर्गठन की घोषणा की 1953 में ही फजल अली की अध्यक्षता में एक राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया गया| ह्रदय नाथ कुंजरू और के एम पणिक्कर इसके सदस्य थे इस आयोग की अनुशंसा पर 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम पारित किया गया जिसके अंतर्गत 14 राज्यों एवं 6 संघ शासित प्रदेशों का प्रावधान किया गया आयोग की अनुशंसा तथा राज्यों का पुनर्गठन अधिनियम से महाराष्ट्र पंजाब एवं उत्तर-पूर्वी भारत में बदलाव नहीं किये गए भाषाई आधार पर महाराष्ट्र एवं गुजरात को अलग किये जाने को लेकर हिंसक आन्दोलन चला, बॉम्बे पर नियंत्रण को लेकर भी दोनों में टकराव रहा| अंततः 1960 में महाराष्ट्र एवं गुजरात नामक दो राज्य बनाए गए और बॉम्बे पर महाराष्ट्र को नियंत्रण दिया गया| इसी समय पंजाब क्षेत्र में भाषाई एवं धार्मिक आधार पर राज्य के पुनर्गठन की मांग उभर रही थी| 1966 में पंजाब एवं हरियाणा को भाषाई आधार पर अलग प्रांत का दर्जा दिया गया तथा चंडीगढ़ को संघ शासित क्षेत्र बनाया गया कुल मिलाकर यह कह सकते हैं कि आजादी के 3 दशकों के भीतर ही लोकतांत्रिक तरीके से राज्यों के पुनर्गठन के मसले को बड़ी सीमा तक सुलझा लिया गया| किन्तु वर्तमान भारत के विभिन्न क्षेत्रों में उभरती नए राज्यों की मांग यह स्पष्ट करती है कि उपरोक्त प्रयासों से केवल तत्कालीन समस्याओं का समाधान प्रस्तुत किया गया था| इस सन्दर्भ में अन्य प्रयास अपेक्षित हैं ताकि इस तरह की मांगों को नियंत्रित किया जा सके|
##Question:आज़ादी के दो दशकों के भीतर ही राज्यों के पुनर्गठन के मसले को एक सीमा तक सुलझा लिया गया था। टिप्पणी कीजिये। (150 से 200 शब्द/10 अंक ) Within two decades of independence, the issue of reorganization of states was resolved to a certain extent. Comment (150 to 200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में राज्यों के पुनर्गठन की पृष्ठभूमि की चर्चा कीजिये 2- मुख्य भाग में राज्य पुनर्गठन के सन्दर्भ में घटनाक्रम की चर्चा कीजिये 3- अंतिम में प्रयासों की सीमाएं एवं महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| ब्रिटिश शासन काल में राज्यों का गठन साम्राज्यादी हितों में ध्यान में रखते हुए किया गया था जैसे प्रारम्भ में विस्तार के साथ बॉम्बे मद्रास एवं बंगाल नामक तीन राज्य बनाए गए वहीँ 1905 में बंगाल विभाजन का निर्णय या 1935 में सिंध का गठन भी साम्राज्यवादी हितों से ही संचालित था| 20 वीं सदी में राज्यों के पुनर्गठन को लेकर कांग्रेस का दृष्टिकोण स्पष्ट था| कांग्रेस ने भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का समर्थन किया था| नेहरु रिपोर्ट में भी इसका समर्थन किया गया थालेकिन आजादी के बाद राष्ट्रीय नेतृत्व का यह मत था कि रियासतों का विलय, खाद्यान्न संकट, साम्प्रदायिकता, शीत युद्ध आदि तात्कालिक चुनौतियों के परिप्रेक्ष्य में राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया को अभी स्थगित रखा जाना चाहिए| किन्तु राज्यों के पुनर्गठन के लिए जन दबाव बढ़ता जा रहा था अतः इस सन्दर्भ में क्रमिक रूप से प्रयास किये गए| घटनाक्रम संविधान सभा के द्वारा एस के धर आयोग (1948) का गठन किया गया| धर एक न्यायाधीश थे| आयोग तात्कालिक परिस्थितियों में भाषाई आधार पर पुनर्गठन के पक्ष में नहीं था| इसके बाद कांग्रेस ने जेबीपी समिति (1949) का गठन किया| समिति ने भी तात्कालिक परिस्थितियों में पुनर्गठन का विरोध किया लेकिन समिति का मानना था कि यदि किसी राज्य के भीतर सहमति है तो पुनर्गठन को अनुशंसित किया इन अनुशंसाओं का देश के कई हिस्सों में विरोध होने लगा जिनमें विशेषकर आंध्र प्रदेश का विरोध महत्वपूर्ण था| यहाँ अनशन के पश्चातपोट्टीश्रीरमल्लू की मृत्यु हो गयी जिस के बाद सरकार से हिंसक संघर्ष हुआ| अंततः 1953 में केंद्र सरकार ने आंध्र प्रदेश के पुनर्गठन की घोषणा की 1953 में ही फजल अली की अध्यक्षता में एक राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया गया| ह्रदय नाथ कुंजरू और के एम पणिक्कर इसके सदस्य थे इस आयोग की अनुशंसा पर 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम पारित किया गया जिसके अंतर्गत 14 राज्यों एवं 6 संघ शासित प्रदेशों का प्रावधान किया गया आयोग की अनुशंसा तथा राज्यों का पुनर्गठन अधिनियम से महाराष्ट्र पंजाब एवं उत्तर-पूर्वी भारत में बदलाव नहीं किये गए भाषाई आधार पर महाराष्ट्र एवं गुजरात को अलग किये जाने को लेकर हिंसक आन्दोलन चला, बॉम्बे पर नियंत्रण को लेकर भी दोनों में टकराव रहा| अंततः 1960 में महाराष्ट्र एवं गुजरात नामक दो राज्य बनाए गए और बॉम्बे पर महाराष्ट्र को नियंत्रण दिया गया| इसी समय पंजाब क्षेत्र में भाषाई एवं धार्मिक आधार पर राज्य के पुनर्गठन की मांग उभर रही थी| 1966 में पंजाब एवं हरियाणा को भाषाई आधार पर अलग प्रांत का दर्जा दिया गया तथा चंडीगढ़ को संघ शासित क्षेत्र बनाया गया कुल मिलाकर यह कह सकते हैं कि आजादी के 3 दशकों के भीतर ही लोकतांत्रिक तरीके से राज्यों के पुनर्गठन के मसले को बड़ी सीमा तक सुलझा लिया गया| किन्तु वर्तमान भारत के विभिन्न क्षेत्रों में उभरती नए राज्यों की मांग यह स्पष्ट करती है कि उपरोक्त प्रयासों से केवल तत्कालीन समस्याओं का समाधान प्रस्तुत किया गया था| इस सन्दर्भ में अन्य प्रयास अपेक्षित हैं ताकि इस तरह की मांगों को नियंत्रित किया जा सके|
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पृथ्वी की आंतरिक संरचना के अध्ययन के स्रोतों को सूचीबद्ध कीजिए। भूकंपीय तरंगें किस प्रकार आंतरिक संरचना को समझने में सहायक होती हैं? स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द, अंक- 10 ) List the sources of study of the internal structure of the Earth. How do seismic waves help in understanding the internal structure? Explain (150-200 words, Marks-10)
Approach: पृथ्वी की आंतरिक संरचना के संदर्भ में चर्चा करते हुए उत्तर की शुरुवात कर सकते हैं। पृथ्वी की आंतरिक संरचना के अध्ययन के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष स्रोतों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए। भूकंपीय तरंगों की आंतरिक संरचना के अध्ययन के संदर्भ में विस्तार से चर्चा करें। निष्कर्ष में पृथ्वी की आंतरिक संरचना के अध्ययन के महत्व की चर्चा कर सकते हैं। उत्तर: पृथ्वी की उत्पत्ति ब्रह्मांडीय प्रक्रियाओं के कारण हुई है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना का अध्ययन वैज्ञानिकों में सदा से ही जिज्ञासा का विषय रहा है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना के विषय में हमारी जानकारीप्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष स्रोतों पर आधारित है। प्रत्यक्ष स्रोत खनन क्षेत्र से चट्टानें ज्वालामुखी विस्फोट अप्रत्यक्ष स्रोत तापमान - गहराई में जाने पर तापमान में बढ़ोतरी घनत्व - आंतरिक भाग का अधिक घनत्व दबाव -आंतरिक भाग में अत्यधिक दबाव चुंबकीय सर्वेक्षण गुरुत्वाकर्षण बल - ध्रुवों पर भूमध्य की तुलना में अधिक गुरुत्वाकर्षण हर अक्षांश पर गुरुत्वाकर्षण का मान समान नहीं होता भूकंपीय तरंगें P तरंगें S तरंगें उल्कापिंड चाँद भूकंपीय तरंगें- पृथ्वी के आंतरिक भागों में संचलन के कारण भूकंप की उत्पत्ति होती है। इस संचलन के परिणामस्वरूप पृथ्वी के आंतरिक भागों में ठीक उसी प्रकार से तरंगें उत्पन्न होती है जिस प्रकार तालाब के शांत जल में पत्थर का टुकड़ा फेंकने से वृत्ताकार लहरें केंद्र के चारों तरफ बाहर की ओर प्रवाहित होती है। अधिकांश भूकंपों की उत्पत्ति ऊपरी मेंटल में होती है। भूकंपीय तरंगों को सीस्मोग्राफ के द्वारा मापा जाता है। भूकंपीय तरंगों के अध्ययन से भू-वैज्ञानिकों को पृथ्वी के आंतरिक भागों में चट्टानों के प्रकार और बहुस्तरीय संरचना के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। मूल रूप से भूकंपीय तरंगें दो प्रकार की हैं- भूगर्भीक तरंगें धरातलीय तरंगें भूगर्भीक तरंगें उद्गम केंद्र से ऊर्जा निर्मुक्त होने के दौरान उत्पन्न होती है और पृथ्वी के आंतरिक भाग से होकर सभी दिशाओं में आगे बढ़ती है। भूगर्भीक तरंगों एवं धरातलीय शैलों के बीच अन्योन्य क्रिया के कारण नई तरंगें उत्पन्न होती हैं जिन्हें धरातलीय तरंगें कहते हैं। ये तरंगें धरातल के साथ-साथ चलती है। भूकंपीय तरंगों का वेग अलग-अलग घनत्व वाले पदार्थों से गुजरने पर परिवर्तित हो जाता है। अधिक घनत्व वाले पदार्थों में तरंगों का वेग अधिक होता है तथा कम घनत्व वाले पदार्थों में इन तरंगों का वेग कम होता है। घनत्व में भिन्नताएँ होने के कारण तरंगों में परावर्तन एवं अपवर्तन होता है जिससे इन तरंगों की दिशा बदलती है। तरंगों की बदली गति व दिशा का अध्ययन कर पृथ्वी की संरचना का अध्ययन किया जाता है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना का अध्ययन पृथ्वी के निर्माण की प्रक्रिया को समझने में मदद करती है। इसके साथ ही इससे पृथ्वी में होने वाले परिवर्तनों का भी अध्ययन किया जाता है।
##Question:पृथ्वी की आंतरिक संरचना के अध्ययन के स्रोतों को सूचीबद्ध कीजिए। भूकंपीय तरंगें किस प्रकार आंतरिक संरचना को समझने में सहायक होती हैं? स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द, अंक- 10 ) List the sources of study of the internal structure of the Earth. How do seismic waves help in understanding the internal structure? Explain (150-200 words, Marks-10)##Answer:Approach: पृथ्वी की आंतरिक संरचना के संदर्भ में चर्चा करते हुए उत्तर की शुरुवात कर सकते हैं। पृथ्वी की आंतरिक संरचना के अध्ययन के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष स्रोतों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए। भूकंपीय तरंगों की आंतरिक संरचना के अध्ययन के संदर्भ में विस्तार से चर्चा करें। निष्कर्ष में पृथ्वी की आंतरिक संरचना के अध्ययन के महत्व की चर्चा कर सकते हैं। उत्तर: पृथ्वी की उत्पत्ति ब्रह्मांडीय प्रक्रियाओं के कारण हुई है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना का अध्ययन वैज्ञानिकों में सदा से ही जिज्ञासा का विषय रहा है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना के विषय में हमारी जानकारीप्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष स्रोतों पर आधारित है। प्रत्यक्ष स्रोत खनन क्षेत्र से चट्टानें ज्वालामुखी विस्फोट अप्रत्यक्ष स्रोत तापमान - गहराई में जाने पर तापमान में बढ़ोतरी घनत्व - आंतरिक भाग का अधिक घनत्व दबाव -आंतरिक भाग में अत्यधिक दबाव चुंबकीय सर्वेक्षण गुरुत्वाकर्षण बल - ध्रुवों पर भूमध्य की तुलना में अधिक गुरुत्वाकर्षण हर अक्षांश पर गुरुत्वाकर्षण का मान समान नहीं होता भूकंपीय तरंगें P तरंगें S तरंगें उल्कापिंड चाँद भूकंपीय तरंगें- पृथ्वी के आंतरिक भागों में संचलन के कारण भूकंप की उत्पत्ति होती है। इस संचलन के परिणामस्वरूप पृथ्वी के आंतरिक भागों में ठीक उसी प्रकार से तरंगें उत्पन्न होती है जिस प्रकार तालाब के शांत जल में पत्थर का टुकड़ा फेंकने से वृत्ताकार लहरें केंद्र के चारों तरफ बाहर की ओर प्रवाहित होती है। अधिकांश भूकंपों की उत्पत्ति ऊपरी मेंटल में होती है। भूकंपीय तरंगों को सीस्मोग्राफ के द्वारा मापा जाता है। भूकंपीय तरंगों के अध्ययन से भू-वैज्ञानिकों को पृथ्वी के आंतरिक भागों में चट्टानों के प्रकार और बहुस्तरीय संरचना के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। मूल रूप से भूकंपीय तरंगें दो प्रकार की हैं- भूगर्भीक तरंगें धरातलीय तरंगें भूगर्भीक तरंगें उद्गम केंद्र से ऊर्जा निर्मुक्त होने के दौरान उत्पन्न होती है और पृथ्वी के आंतरिक भाग से होकर सभी दिशाओं में आगे बढ़ती है। भूगर्भीक तरंगों एवं धरातलीय शैलों के बीच अन्योन्य क्रिया के कारण नई तरंगें उत्पन्न होती हैं जिन्हें धरातलीय तरंगें कहते हैं। ये तरंगें धरातल के साथ-साथ चलती है। भूकंपीय तरंगों का वेग अलग-अलग घनत्व वाले पदार्थों से गुजरने पर परिवर्तित हो जाता है। अधिक घनत्व वाले पदार्थों में तरंगों का वेग अधिक होता है तथा कम घनत्व वाले पदार्थों में इन तरंगों का वेग कम होता है। घनत्व में भिन्नताएँ होने के कारण तरंगों में परावर्तन एवं अपवर्तन होता है जिससे इन तरंगों की दिशा बदलती है। तरंगों की बदली गति व दिशा का अध्ययन कर पृथ्वी की संरचना का अध्ययन किया जाता है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना का अध्ययन पृथ्वी के निर्माण की प्रक्रिया को समझने में मदद करती है। इसके साथ ही इससे पृथ्वी में होने वाले परिवर्तनों का भी अध्ययन किया जाता है।
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उद्देश्यात्मक कूटनीति के विभिन्न प्रकारों का उल्लेख करते हुए उदाहरण सहित समझाइए कि भारत द्वारा किस प्रकार की कूटनीति पर अधिक बल दिया गया है? (150-200 शब्द) Citing various types of objective diplomacy, explain with examples that what kind of diplomacy has been emphasized more by India? (150-200 words)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में उद्देश्यात्मक कूटनीति के बारे में लिखिए। इसके पश्चात विभिन्न कूटनीति का उल्लेख कीजिए। भारत द्वारा प्रयोग की जा रही विभिन्न कूटनीति के प्रकारों का उदाहरण सहित विवरण दीजिए। उद्देश्यात्मक कूटनीति के अंतर्गत दो या दो देशों के मध्य किसी विशेष उद्देश्य से कूटनीतिक संबंध स्थापित किए जाते हैं। इस प्रकार की कूटनीति में ऐसे साधनों का प्रयोग होता है जिसमें दोनों देशों की आपसी सहमति होती है। उद्देश्यात्मक कूटनीति के प्रकार: अवपीड़क नीति गनबोट कूटनीति लोकतान्त्रिक कूटनीति सिविल कूटनीति उपहार (award) कूटनीति अतिथि कूटनीति खेल कूटनीति सॉफ्ट पावर कूटनीति भारत उपर्युक्त कूटनीति का समय समय पर प्रयोग करता आ रहा है। इसे निम्नलिखित उदाहरणों से समझ सकते हैं: लोकतान्त्रिक कूटनीति: भारत द्वारा विभिन्न देशों में स्थायी सरकार बनाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। जैसे- अफगानिस्तान, नेपाल आदि। सिविल कूटनीति: इसके अंतर्गत नागरिकों के मांग के अनुसार सरकार द्वारा प्रयास किया जा सकता है उदाहरण- धार्मिक भावनाओं की रक्षा के लिए हाल ही में पाकिस्तान के साथ करतारपुर गलियारे को प्रारम्भ करने का प्रयास। तमिल लोगों में विश्वास उत्पन्न करने के लिए श्रीलंकन तमिल लोगों के साथ उचित व्यवहार, बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए समझौते अतिथि कूटनीति: भारत द्वारा गणतन्त्र दिवस के अवसर पर विभिन्न देशों के राजप्रमुखों को आमंत्रित करना सॉफ्ट पावर कूटनीति: भारत द्वारा योग का व्यापक प्रसार किया जा रहा है। गांधी जी विचारों को प्रसारित करने के लिए विश्व अहिंसा दिवस को मान्यता देना भारत के फिल्म को बढ़ावा देने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन भारत द्वारा उपर्युक्त कूटनीति साधनों का व्यापक रूप से प्रयोग किया जा रहा है। वर्तमान समय में सॉफ्ट पावर कूटनीति का महत्व बढ़ रहा है।
##Question:उद्देश्यात्मक कूटनीति के विभिन्न प्रकारों का उल्लेख करते हुए उदाहरण सहित समझाइए कि भारत द्वारा किस प्रकार की कूटनीति पर अधिक बल दिया गया है? (150-200 शब्द) Citing various types of objective diplomacy, explain with examples that what kind of diplomacy has been emphasized more by India? (150-200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में उद्देश्यात्मक कूटनीति के बारे में लिखिए। इसके पश्चात विभिन्न कूटनीति का उल्लेख कीजिए। भारत द्वारा प्रयोग की जा रही विभिन्न कूटनीति के प्रकारों का उदाहरण सहित विवरण दीजिए। उद्देश्यात्मक कूटनीति के अंतर्गत दो या दो देशों के मध्य किसी विशेष उद्देश्य से कूटनीतिक संबंध स्थापित किए जाते हैं। इस प्रकार की कूटनीति में ऐसे साधनों का प्रयोग होता है जिसमें दोनों देशों की आपसी सहमति होती है। उद्देश्यात्मक कूटनीति के प्रकार: अवपीड़क नीति गनबोट कूटनीति लोकतान्त्रिक कूटनीति सिविल कूटनीति उपहार (award) कूटनीति अतिथि कूटनीति खेल कूटनीति सॉफ्ट पावर कूटनीति भारत उपर्युक्त कूटनीति का समय समय पर प्रयोग करता आ रहा है। इसे निम्नलिखित उदाहरणों से समझ सकते हैं: लोकतान्त्रिक कूटनीति: भारत द्वारा विभिन्न देशों में स्थायी सरकार बनाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। जैसे- अफगानिस्तान, नेपाल आदि। सिविल कूटनीति: इसके अंतर्गत नागरिकों के मांग के अनुसार सरकार द्वारा प्रयास किया जा सकता है उदाहरण- धार्मिक भावनाओं की रक्षा के लिए हाल ही में पाकिस्तान के साथ करतारपुर गलियारे को प्रारम्भ करने का प्रयास। तमिल लोगों में विश्वास उत्पन्न करने के लिए श्रीलंकन तमिल लोगों के साथ उचित व्यवहार, बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए समझौते अतिथि कूटनीति: भारत द्वारा गणतन्त्र दिवस के अवसर पर विभिन्न देशों के राजप्रमुखों को आमंत्रित करना सॉफ्ट पावर कूटनीति: भारत द्वारा योग का व्यापक प्रसार किया जा रहा है। गांधी जी विचारों को प्रसारित करने के लिए विश्व अहिंसा दिवस को मान्यता देना भारत के फिल्म को बढ़ावा देने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन भारत द्वारा उपर्युक्त कूटनीति साधनों का व्यापक रूप से प्रयोग किया जा रहा है। वर्तमान समय में सॉफ्ट पावर कूटनीति का महत्व बढ़ रहा है।
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What do you mean by cloud computing? Discuss the services provided and advantages of it? (10 Marks/150 words)
Approach – 1. Give the definition of the cloud computing. 2. Discuss the services provided by cloud computing services. 3. Enumerate the advantages of cloud computing. 4. In conclusion, write about the concerns briefly and then the importance of cloud computing. Answer – Cloud computing is the delivery of computing services, including servers, storage, databases, networking, software, analytics, and intelligence. over the Internet (“the cloud”) to offer faster innovation, flexible resources, and economies of scale. Cloud computing can be of three types Public cloud, Private cloud, and Hybrid cloud. Based on the usage of the clouds following are the services provided by cloud computing. 1. Infrastructure as a service (IaaS) – The most basic category of cloud computing services. With IaaS, you rent IT infrastructure, servers and virtual machines (VMs), storage, networks, operating systems, from a cloud provider on a pay-as-you-go basis.Google Drive, Dropbox are some of the examples of the IaaS. 2. Platform as a service (PaaS) – Platform as a service refers to cloud computing services that supply an on-demand environment for developing, testing, delivering and managing software applications. PaaS is designed to make it easier for developers to quickly create web or mobile apps, without worrying about setting up or managing the underlying infrastructure of servers, storage, network and databases needed for development. Amazon web services and Microsoft Azure are examples of it. 3. Software as a service (SaaS) – Software as a service is a method for delivering software applications over the Internet, on-demand and typically on a subscription basis. With SaaS, cloud providers host and manage the software application and underlying infrastructure and handle any maintenance, like software upgrades and security patching. Google Doc and Microsoft 360 are examples of it. Advantages of cloud computing – 1. Cost Savings – it does not need any physical hardware investments. The buying and managing of equipment are done by the cloud service provider. Cloud computing provides economic infrastructure to startups. 2. High Speed - Cloud computing allows you to deploy your service quickly in fewer clicks. This faster deployment allows you to get the resources required for your system within fewer minutes. Data can be backed up and restored at high speed using cloud computers. 3. Automatic Software Integration - In the cloud, software integration is something that occurs automatically. Therefore, you don"t need to take additional efforts to customize and integrate your applications as per your preferences. 4. Reliability and mobility - The server and nodes can always get instantly updated about the changes.Employees who are working on the premises or at the remote locations can easily access all the could services. All they need is Internet connectivity. It helps collaboration between employees who are located in different geographies to collaborate in a highly convenient and secure manner. 5. Unlimited storage capacit y - The cloud offers almost limitless storage capacity. At any time you can quickly expand your storage capacity with very nominal monthly fees. 6. Quick Deployment - Last but not least, cloud computing gives you the advantage of rapid deployment. So, when you decide to use the cloud, your entire system can be fully functional in very few minutes. Although, the amount of time taken depends on what kind of technologies are used in your business. Concerns related to safety of the data, Hacking, localization of the data and low connectivity in the rural areas are still present. but with the world becoming more connected and demand of services on the internet soaring, cloud computing can provide new avenues in governance, entertainment industry, education, medicine and many more areas.
##Question:What do you mean by cloud computing? Discuss the services provided and advantages of it? (10 Marks/150 words)##Answer:Approach – 1. Give the definition of the cloud computing. 2. Discuss the services provided by cloud computing services. 3. Enumerate the advantages of cloud computing. 4. In conclusion, write about the concerns briefly and then the importance of cloud computing. Answer – Cloud computing is the delivery of computing services, including servers, storage, databases, networking, software, analytics, and intelligence. over the Internet (“the cloud”) to offer faster innovation, flexible resources, and economies of scale. Cloud computing can be of three types Public cloud, Private cloud, and Hybrid cloud. Based on the usage of the clouds following are the services provided by cloud computing. 1. Infrastructure as a service (IaaS) – The most basic category of cloud computing services. With IaaS, you rent IT infrastructure, servers and virtual machines (VMs), storage, networks, operating systems, from a cloud provider on a pay-as-you-go basis.Google Drive, Dropbox are some of the examples of the IaaS. 2. Platform as a service (PaaS) – Platform as a service refers to cloud computing services that supply an on-demand environment for developing, testing, delivering and managing software applications. PaaS is designed to make it easier for developers to quickly create web or mobile apps, without worrying about setting up or managing the underlying infrastructure of servers, storage, network and databases needed for development. Amazon web services and Microsoft Azure are examples of it. 3. Software as a service (SaaS) – Software as a service is a method for delivering software applications over the Internet, on-demand and typically on a subscription basis. With SaaS, cloud providers host and manage the software application and underlying infrastructure and handle any maintenance, like software upgrades and security patching. Google Doc and Microsoft 360 are examples of it. Advantages of cloud computing – 1. Cost Savings – it does not need any physical hardware investments. The buying and managing of equipment are done by the cloud service provider. Cloud computing provides economic infrastructure to startups. 2. High Speed - Cloud computing allows you to deploy your service quickly in fewer clicks. This faster deployment allows you to get the resources required for your system within fewer minutes. Data can be backed up and restored at high speed using cloud computers. 3. Automatic Software Integration - In the cloud, software integration is something that occurs automatically. Therefore, you don"t need to take additional efforts to customize and integrate your applications as per your preferences. 4. Reliability and mobility - The server and nodes can always get instantly updated about the changes.Employees who are working on the premises or at the remote locations can easily access all the could services. All they need is Internet connectivity. It helps collaboration between employees who are located in different geographies to collaborate in a highly convenient and secure manner. 5. Unlimited storage capacit y - The cloud offers almost limitless storage capacity. At any time you can quickly expand your storage capacity with very nominal monthly fees. 6. Quick Deployment - Last but not least, cloud computing gives you the advantage of rapid deployment. So, when you decide to use the cloud, your entire system can be fully functional in very few minutes. Although, the amount of time taken depends on what kind of technologies are used in your business. Concerns related to safety of the data, Hacking, localization of the data and low connectivity in the rural areas are still present. but with the world becoming more connected and demand of services on the internet soaring, cloud computing can provide new avenues in governance, entertainment industry, education, medicine and many more areas.
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To what extent the British land revenue policies differed from its pre-colonial counterparts?Discuss its impact on rural agrarian society.(225 words)
Approach- Introduction: give a brief outline of the British revenue system The main body: explain the differences between the British and its pre-colonial counterparts land revenue policies on various parameters : explain how this land revenue policy has affected the rural agrarian system on various lines conclude : covering the essence of answer written Answer -As colonial mechanisms of exploitation, the British under East India Company invented and experimented with different land revenue settlements in colonial India with majorly 3 land revenue systems; Zamidari, Ryotwari,mahalwari system to appropriate revenues. These to a larger extent differed as well had some common elements with the British pre-colonial counterparts. These point of difference can be highlighted as - Appropriation of Land revenue- Under the Mughals, surplus produce was the land revenue, in some cases, it was a tax on the crop which was the main source of the state"s income. While the British regarded the land revenue as the rent of the soil. Owner of the land -King was the owner of the land in Mughal reign, under British ownership was with Zamindars according to permanent settlement and with peasants under the Ryotwari system. Land revenue as profit -While Mughals wanted Land revenue to be paid in return for protection and justice while it was for the profit in the case of British. The risk of crop failure In the Mughal period it was mitigated and shared and was made sure peasant had the subsistent level for his sustenance. While, under the British, the land revenue was fixed, irrespective of the season, famine, failure, etc. Revenue Collection : The revenue collectors under Mughals were paid a fixed % of revenue, while under British, there was no limit applied to Zamindars to collect revenue, while the amount Zamindars had to pay British was fixed, which led to exploitation of peasants. Impact on Rural agrarian system - The tool of the colonial plunder -The The establishment of East India Company as the tool of colonial plunder which operated through the monopoly of trade and reali0ation of land revenue as their main concern was to collect as such revenue as possible. Therefore, several land revenue experiments were introduced in haste to maximize extraction. The disorganization of the rural agrarian economy and societ y-The The European officers commanded these policies and their lack of understanding of the local situation led to the complete disorganization of the agrarian economy and society. As a result, far-reaching changes were unleashed in Indian agrarian structure which slowed down the country"s progressive development and raised the burden on the Indian peasantry Extortion and oppression -The European officers commanded these policies and their lack of understanding of the local situation led to the complete disorganization of the agrarian economy and society. As a result, far-reaching changes were unleashed in the Indian agrarian structure which slowed down the country"s progressive development and raised the burden on the Indian peasantry. Loss of cottage and handicrafts -The British made India exporter of raw material and importer of finished goods and turn into the market for Britain. This destroyed India"s rural industries and turned them into mere daily laborers. so, to say that British pre-colonial counterparts were all-time concerned for its people while fetching revenue will be a mere exaggeration. But as Britsh revenue policy is concerned they were only aimed at maximizing their benefit ignoring the needs of people destroying the rural agrarian system.
##Question:To what extent the British land revenue policies differed from its pre-colonial counterparts?Discuss its impact on rural agrarian society.(225 words)##Answer:Approach- Introduction: give a brief outline of the British revenue system The main body: explain the differences between the British and its pre-colonial counterparts land revenue policies on various parameters : explain how this land revenue policy has affected the rural agrarian system on various lines conclude : covering the essence of answer written Answer -As colonial mechanisms of exploitation, the British under East India Company invented and experimented with different land revenue settlements in colonial India with majorly 3 land revenue systems; Zamidari, Ryotwari,mahalwari system to appropriate revenues. These to a larger extent differed as well had some common elements with the British pre-colonial counterparts. These point of difference can be highlighted as - Appropriation of Land revenue- Under the Mughals, surplus produce was the land revenue, in some cases, it was a tax on the crop which was the main source of the state"s income. While the British regarded the land revenue as the rent of the soil. Owner of the land -King was the owner of the land in Mughal reign, under British ownership was with Zamindars according to permanent settlement and with peasants under the Ryotwari system. Land revenue as profit -While Mughals wanted Land revenue to be paid in return for protection and justice while it was for the profit in the case of British. The risk of crop failure In the Mughal period it was mitigated and shared and was made sure peasant had the subsistent level for his sustenance. While, under the British, the land revenue was fixed, irrespective of the season, famine, failure, etc. Revenue Collection : The revenue collectors under Mughals were paid a fixed % of revenue, while under British, there was no limit applied to Zamindars to collect revenue, while the amount Zamindars had to pay British was fixed, which led to exploitation of peasants. Impact on Rural agrarian system - The tool of the colonial plunder -The The establishment of East India Company as the tool of colonial plunder which operated through the monopoly of trade and reali0ation of land revenue as their main concern was to collect as such revenue as possible. Therefore, several land revenue experiments were introduced in haste to maximize extraction. The disorganization of the rural agrarian economy and societ y-The The European officers commanded these policies and their lack of understanding of the local situation led to the complete disorganization of the agrarian economy and society. As a result, far-reaching changes were unleashed in Indian agrarian structure which slowed down the country"s progressive development and raised the burden on the Indian peasantry Extortion and oppression -The European officers commanded these policies and their lack of understanding of the local situation led to the complete disorganization of the agrarian economy and society. As a result, far-reaching changes were unleashed in the Indian agrarian structure which slowed down the country"s progressive development and raised the burden on the Indian peasantry. Loss of cottage and handicrafts -The British made India exporter of raw material and importer of finished goods and turn into the market for Britain. This destroyed India"s rural industries and turned them into mere daily laborers. so, to say that British pre-colonial counterparts were all-time concerned for its people while fetching revenue will be a mere exaggeration. But as Britsh revenue policy is concerned they were only aimed at maximizing their benefit ignoring the needs of people destroying the rural agrarian system.
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Critically examine the nature of the Revolt of 1857. What were the effects of the revolt on the British policy after 1858? (250 words) (15 words)
In March 1857 in Barrackpore near Calcutta, there took place a disturbance when a sepoy, Mangal Pandey killed one of the European officers. This disturbance was easily suppressed but in the next few weeks disturbances in the army gathered momentum. The mutiny of the Meerut sepoy on 10 May 1857 crossed over to Delhi to appeal to Mughal emperor Bahadur Shah 11, to become their leader, led to the revolt of 1857. Nature of Revolt: A critical perspective There are different views and opinions among the nature of the revolt. To many British historians, it was merely a sepoy mutiny. On the other hand, many other historians believe it to be a popular revolt and an uprising against the oppressive British rule. Vir Savarkar went to an extent to call it as the first war of Indian independence. A popular revolt-. The participation of peasants and artisans made the revolt a widespread and popular event. In some areas, the common people revolted even before the sepoys. All this shows that it was clearly a popular revolt. Unity across region and religion -It was characterized by Hindu-Muslim unity. Unity between different regions also existed. Rebels in one part of the country helped people fighting in other areas. Different grievances, Common foe- The Revolt of 1857 was not one movement but many. The majority of the rebels consisted of the sepoys who were discontented with the discrimination they faced in the service in the British army. However, a national war of independence necessarily implies or presupposes a definite plan and organization. Further, such an organization implies a pre-concerted conspiracy or plot to drive out the British.But, there is no evidence for the existence of any such conspiracy. The upsurge of the people was limited to a comparatively narrow region of India comprising at best the great part of UP and a narrow zone to its east, west, and south. Dr. R C Majumdar also did not find any nationalist element in the rebellion. He was also against calling it the war of independence. The rebel forces were unable to inspire a sense of unity among the Indian population during the revolt which is reflected in the fact that a large number of people sided with the British in the war or did not participate in the war at all. Effects upon British policy post-1858 The Revolt of 1857 gave a severe jolt to the British administration inIndiaand made its re-organization inevitable. The Government of India’s structure and policies underwent significant changes in the decades following the Revolt. Changes in the army :The Indian army was carefully re-organized after 1858, most of all to prevent the recurrence of another revolt. Firstly, the domination of the army by its European branch was carefully guaranteed. The proportion of Europeans to Indians in the army was raised. · Changes in Administration :By the Act of Parliament of 1858, the power to governIndiawas transferred from the East India Company to the British Crown. · Public Services: The Indians suffered from numerous handicaps. The competitive examination was held in farawayLondon. It was conducted through the medium of the alien English language. The maximum age for entry into the Civil Service was gradually reduced from 23 in 1859 to 19 in 1878 Divide and Rule ;After the Revolt of 1857 the British increasingly continued to follow their policy of divide and rule by turning the princes against the people, province against, caste against caste, group against groups and above all, Hindus against Muslims Government attitudes towards educated Indians : The officials became hostile to the educated Indians when the latter began to organize a nationalist movement among the people and founded the Indian National Congress. Government attitudes towards the zamindars :After the revolt, the British changed their attitudes towards the zamindars and landlords to use them as a dam against the rise of the popular and nationalist movement. Thus, we can say that the revolt of 1857 definitely had some seeds of nationalism and anti-imperialism and it was much more than a mutiny of disgruntled sepoys which is reflected in the widespread participation of the civilian population. However, one cannot go so far to call it a war of independence.
##Question:Critically examine the nature of the Revolt of 1857. What were the effects of the revolt on the British policy after 1858? (250 words) (15 words)##Answer:In March 1857 in Barrackpore near Calcutta, there took place a disturbance when a sepoy, Mangal Pandey killed one of the European officers. This disturbance was easily suppressed but in the next few weeks disturbances in the army gathered momentum. The mutiny of the Meerut sepoy on 10 May 1857 crossed over to Delhi to appeal to Mughal emperor Bahadur Shah 11, to become their leader, led to the revolt of 1857. Nature of Revolt: A critical perspective There are different views and opinions among the nature of the revolt. To many British historians, it was merely a sepoy mutiny. On the other hand, many other historians believe it to be a popular revolt and an uprising against the oppressive British rule. Vir Savarkar went to an extent to call it as the first war of Indian independence. A popular revolt-. The participation of peasants and artisans made the revolt a widespread and popular event. In some areas, the common people revolted even before the sepoys. All this shows that it was clearly a popular revolt. Unity across region and religion -It was characterized by Hindu-Muslim unity. Unity between different regions also existed. Rebels in one part of the country helped people fighting in other areas. Different grievances, Common foe- The Revolt of 1857 was not one movement but many. The majority of the rebels consisted of the sepoys who were discontented with the discrimination they faced in the service in the British army. However, a national war of independence necessarily implies or presupposes a definite plan and organization. Further, such an organization implies a pre-concerted conspiracy or plot to drive out the British.But, there is no evidence for the existence of any such conspiracy. The upsurge of the people was limited to a comparatively narrow region of India comprising at best the great part of UP and a narrow zone to its east, west, and south. Dr. R C Majumdar also did not find any nationalist element in the rebellion. He was also against calling it the war of independence. The rebel forces were unable to inspire a sense of unity among the Indian population during the revolt which is reflected in the fact that a large number of people sided with the British in the war or did not participate in the war at all. Effects upon British policy post-1858 The Revolt of 1857 gave a severe jolt to the British administration inIndiaand made its re-organization inevitable. The Government of India’s structure and policies underwent significant changes in the decades following the Revolt. Changes in the army :The Indian army was carefully re-organized after 1858, most of all to prevent the recurrence of another revolt. Firstly, the domination of the army by its European branch was carefully guaranteed. The proportion of Europeans to Indians in the army was raised. · Changes in Administration :By the Act of Parliament of 1858, the power to governIndiawas transferred from the East India Company to the British Crown. · Public Services: The Indians suffered from numerous handicaps. The competitive examination was held in farawayLondon. It was conducted through the medium of the alien English language. The maximum age for entry into the Civil Service was gradually reduced from 23 in 1859 to 19 in 1878 Divide and Rule ;After the Revolt of 1857 the British increasingly continued to follow their policy of divide and rule by turning the princes against the people, province against, caste against caste, group against groups and above all, Hindus against Muslims Government attitudes towards educated Indians : The officials became hostile to the educated Indians when the latter began to organize a nationalist movement among the people and founded the Indian National Congress. Government attitudes towards the zamindars :After the revolt, the British changed their attitudes towards the zamindars and landlords to use them as a dam against the rise of the popular and nationalist movement. Thus, we can say that the revolt of 1857 definitely had some seeds of nationalism and anti-imperialism and it was much more than a mutiny of disgruntled sepoys which is reflected in the widespread participation of the civilian population. However, one cannot go so far to call it a war of independence.
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Briefly introduce to the permanent settlement policy of land revenue initiated by the British in India? Also, discuss its effects in detail? (10 marks/150 words)
The Permanent Settlement of Bengal was brought into effect by Governor-General Lord Cornwallis in 1793. This was basically an agreement between the company and the Zamindars to fix the land revenue. First enacted in Bengal, Bihar, and Odisha . This was later followed in northern Madras Presidency and the district of Varanasi . Cornwallis envisaged the creation of a hereditary class of landlords in India. This system was also called the Zamindari System. Features- • Landlords or Zamindars were recognized as the owners of the land. They were given hereditary rights of succession of the lands under them. • The Zamindars could sell or transfer the land as they wished. • The Zamindars’ proprietorship would stay as long as he paid the fixed revenue at the said date to the government. If they failed to pay, their rights would cease to exist and the land would be auctioned off. • The amount to be paid by the landlords was fixed. It was agreed that this would not increase in the future (permanent). • The fixed amount was 10/11th portion of the revenue for the government and 1/10th was for the Zamindar. This tax rate was way higher than the prevailing rates in England. Effects on various sections- 1)ON THE ZAMINDARS- • While the Permanent Settlement was pro-Zamindar, yet the way in which it eventually worked out even the Zamindars lost. Default meant the loss of his land. The threat of losing land very real more so because the revenue was fixed at a very high rate and the ryots could not often meet it. There were instances of sale of Zamindari lands. • Given the precarious position of the Zamindars, they did not transform into improving landlords as expected of them. But in fact, many of them simply sub-let their land to different categories of people leading to a process popularly called sub-infeudation. • And on the other hand, it also created a hierarchy of rentiers who would be dependent on the revenue derived from the primary produces. This led to a situation where the entrepreneurial spirit was institutionally destroyed. 2) ON THE RYOTS- • The manner of implementation of the Permanent Settlement actually increased the insecurity of the peasants. The settlement fixed was quite high and it was not usually met. They became victim of over-assessment; they had nobody (a zamindar) to help them out when falling short of dues. • It also left no room for respite in times of food shortage due to any calamity . The ryots or the peasants who were the actual tillers of the land and who paid their dues to the super-ordinate zamindars were the ones who did not really benefit from the Permanent Settlement. • The fragmentation of land meant that they had to part with a larger portion of their produce. The customary occupancy rights which the peasants ‘held’ in relation to the land was taken away and they were transformed into tenants who could be evicted exploited and thus insecure in their hold of the land. However, instead of being a solution for ensuring a flowing avenue of revenues, Permanent Settlement led to increasing disappointment. The zamindars did not turn into the improving landlords, and since the revenue was fixed any increase procured from the land was appropriated by the zamindars. Nonetheless, it was extended to the Madras Presidency where in the absence of substantial zamindari class, the local polygars were recognized as zamindars.
##Question:Briefly introduce to the permanent settlement policy of land revenue initiated by the British in India? Also, discuss its effects in detail? (10 marks/150 words)##Answer:The Permanent Settlement of Bengal was brought into effect by Governor-General Lord Cornwallis in 1793. This was basically an agreement between the company and the Zamindars to fix the land revenue. First enacted in Bengal, Bihar, and Odisha . This was later followed in northern Madras Presidency and the district of Varanasi . Cornwallis envisaged the creation of a hereditary class of landlords in India. This system was also called the Zamindari System. Features- • Landlords or Zamindars were recognized as the owners of the land. They were given hereditary rights of succession of the lands under them. • The Zamindars could sell or transfer the land as they wished. • The Zamindars’ proprietorship would stay as long as he paid the fixed revenue at the said date to the government. If they failed to pay, their rights would cease to exist and the land would be auctioned off. • The amount to be paid by the landlords was fixed. It was agreed that this would not increase in the future (permanent). • The fixed amount was 10/11th portion of the revenue for the government and 1/10th was for the Zamindar. This tax rate was way higher than the prevailing rates in England. Effects on various sections- 1)ON THE ZAMINDARS- • While the Permanent Settlement was pro-Zamindar, yet the way in which it eventually worked out even the Zamindars lost. Default meant the loss of his land. The threat of losing land very real more so because the revenue was fixed at a very high rate and the ryots could not often meet it. There were instances of sale of Zamindari lands. • Given the precarious position of the Zamindars, they did not transform into improving landlords as expected of them. But in fact, many of them simply sub-let their land to different categories of people leading to a process popularly called sub-infeudation. • And on the other hand, it also created a hierarchy of rentiers who would be dependent on the revenue derived from the primary produces. This led to a situation where the entrepreneurial spirit was institutionally destroyed. 2) ON THE RYOTS- • The manner of implementation of the Permanent Settlement actually increased the insecurity of the peasants. The settlement fixed was quite high and it was not usually met. They became victim of over-assessment; they had nobody (a zamindar) to help them out when falling short of dues. • It also left no room for respite in times of food shortage due to any calamity . The ryots or the peasants who were the actual tillers of the land and who paid their dues to the super-ordinate zamindars were the ones who did not really benefit from the Permanent Settlement. • The fragmentation of land meant that they had to part with a larger portion of their produce. The customary occupancy rights which the peasants ‘held’ in relation to the land was taken away and they were transformed into tenants who could be evicted exploited and thus insecure in their hold of the land. However, instead of being a solution for ensuring a flowing avenue of revenues, Permanent Settlement led to increasing disappointment. The zamindars did not turn into the improving landlords, and since the revenue was fixed any increase procured from the land was appropriated by the zamindars. Nonetheless, it was extended to the Madras Presidency where in the absence of substantial zamindari class, the local polygars were recognized as zamindars.
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नीति आयोग की संरचना को स्पष्ट कीजिये। साथ ही नीति आयोग बनाम योजना आयोग के बीच अंतरों पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) Explain the structure of NITI Aayog. Also,Discuss the differences between NITI Aayog vs Planning Commission. (150-200 words/10 Marks)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत नीति आयोग की संरचना को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात योजना आयोग बनाम नीति आयोग की चर्चा करते हुए उत्तर को विस्यरित कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - नीति आयोग योजना आयोग यद्यपि कि प्रारंभ में नीतिगत सन्दर्भों में एक थिंक टैंक की भूमिका निभा रहा था,परन्तु कालांतर में इसमें विभिन्न प्रकार की कमियां देखी गयी, जिसे संशोधित करते हुए 1 जनवरी 2015 को नीति आयोग का गठन किया गया |यद्यपि कि 16 फरवरी को इसमें कुछ संशोधन भी किये गये | नीति आयोग की संरचना - भारत के प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष होंगे | शासी परिषद (Governing Council) का गठन किया गया जिसमे विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री तथा केंन्द्र शासित प्रदेशों के उपराज्यपाल सदस्य होंगे | एक क्षेत्रीय परिषद का गठन किया जाय - जो ऐसे मुद्दों को जिसमे एक से अधिक प्रदेशों का क्षेत्र या उनके मुद्दे जुड़े हों, के सन्दर्भ में आवश्यक हस्तक्षेप करे | क्षेत्रीय परिषद में उन क्षेत्रों के मुख्यमंत्री, सम्बंधित केंद्र शासित प्रदेशों के उपराज्यपाल तथा नीति आयोग द्वारा नामित सदस्य होंगे | इस आयोग में विभिन्न क्षेत्रों से सम्बंधित विशेष ज्ञान रखने वाले विशेषज्ञों को प्रधानमंत्री द्वारा विशेष नामित, आमंत्रित सदस्य की तरह सदस्यता दी जायेगी | इस आयोग में निम्न प्रकार का संगठनात्मक ढांचा है- प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त उपाध्यक्ष - राजीव कुमार (वर्तमान में) मुख्य कार्यकारी अधिकारी -सीईओ -अमिताभ कांत (वर्तमान में), पांच पूर्णकालिक सदस्य - वी के सारस्वत (DRDO), रमेश चन्द्र(कृषि), वी के पॉल (पब्लिक हेल्थ) आदि | दो अल्पकालिक सदस्य, चार पदेन मंत्री - अमित शाह, राजनाथ सिंह, निर्मला सीतारमण, नरेन्द्र सिंह तोमर विशेष आमंत्रित सदस्य - राव इन्द्रजीत सिंह, पियूष गोयल, नितिन गडकरी, थावर सिंह गहलोत | योजना आयोग बनाम नीति आयोग नीति आयोग निम्न प्रकार से योजना आयोग से बेहतर सिद्ध हो रहा है - जहाँ योजना आयोग का दृष्टिकोण शीर्ष से धरातल की तरफ था वहीँ नीति आयोग धरातल से शीर्ष की तरफ (बॉटम अप) दृष्टिकोण का अनुपालन करता है | तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ सलाहकार की भूमिका निभाता है, जिससे नियोजन को बेहतर बनाया जा सके | जहाँ योजना आयोग शासकीय भूमिका में धन आवंटन भी करता था (जो कालांतर में भ्रस्टाचार का मूल हो गया था) | वहीँ नीति आयोग सलाहकार की भूमिका, जो तकनीकी नवाचार एवं डेटा प्रबंधन पर आधारित है, द्वारा नियोजन में सहायक होता है | नीति आयोग भारत में सार्वजनिक क्षेत्रों में तकनीकी नवाचार के नए मानक स्थापित करते हुए बिग डेटा, ब्लॉकचेन तकनीकी आदि का उपयोग कर रही है | जहाँ योजना आयोग में मुख्यमंत्रियों एवं उपराज्यपालों के निर्णय में उचित भागीदारी नहीं थी, वहीँ नीति आयोग में ये सदस्य हैं और सहकारी संघवाद को प्रोत्साहित कर रहा है | यद्यपि नीति आयोग के सदस्यों में राजनीतिज्ञों और विशेषज्ञों का अनुपात आलोचना का विषय रहा है किन्तु विगत पांच वर्षों में नीति आयोग ने सुशासन, समावेश, वितीय प्रबंधन, आदि द्वारा अपनी सार्थकता सिद्ध की है | नीति आयोग को योजना और गैर योजना के रूप में नहीं, बल्कि राजस्व और पूंजीगत व्यय की स्वतंत्रता के रूप में होनी चाहिए | इस पूंजीगत व्यय की वृद्धि से अर्थव्यवस्था में सभी स्तरों पर बुनियादी ढाँचे का घाटा दूर हो सकता है |
##Question:नीति आयोग की संरचना को स्पष्ट कीजिये। साथ ही नीति आयोग बनाम योजना आयोग के बीच अंतरों पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) Explain the structure of NITI Aayog. Also,Discuss the differences between NITI Aayog vs Planning Commission. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत नीति आयोग की संरचना को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात योजना आयोग बनाम नीति आयोग की चर्चा करते हुए उत्तर को विस्यरित कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - नीति आयोग योजना आयोग यद्यपि कि प्रारंभ में नीतिगत सन्दर्भों में एक थिंक टैंक की भूमिका निभा रहा था,परन्तु कालांतर में इसमें विभिन्न प्रकार की कमियां देखी गयी, जिसे संशोधित करते हुए 1 जनवरी 2015 को नीति आयोग का गठन किया गया |यद्यपि कि 16 फरवरी को इसमें कुछ संशोधन भी किये गये | नीति आयोग की संरचना - भारत के प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष होंगे | शासी परिषद (Governing Council) का गठन किया गया जिसमे विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री तथा केंन्द्र शासित प्रदेशों के उपराज्यपाल सदस्य होंगे | एक क्षेत्रीय परिषद का गठन किया जाय - जो ऐसे मुद्दों को जिसमे एक से अधिक प्रदेशों का क्षेत्र या उनके मुद्दे जुड़े हों, के सन्दर्भ में आवश्यक हस्तक्षेप करे | क्षेत्रीय परिषद में उन क्षेत्रों के मुख्यमंत्री, सम्बंधित केंद्र शासित प्रदेशों के उपराज्यपाल तथा नीति आयोग द्वारा नामित सदस्य होंगे | इस आयोग में विभिन्न क्षेत्रों से सम्बंधित विशेष ज्ञान रखने वाले विशेषज्ञों को प्रधानमंत्री द्वारा विशेष नामित, आमंत्रित सदस्य की तरह सदस्यता दी जायेगी | इस आयोग में निम्न प्रकार का संगठनात्मक ढांचा है- प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त उपाध्यक्ष - राजीव कुमार (वर्तमान में) मुख्य कार्यकारी अधिकारी -सीईओ -अमिताभ कांत (वर्तमान में), पांच पूर्णकालिक सदस्य - वी के सारस्वत (DRDO), रमेश चन्द्र(कृषि), वी के पॉल (पब्लिक हेल्थ) आदि | दो अल्पकालिक सदस्य, चार पदेन मंत्री - अमित शाह, राजनाथ सिंह, निर्मला सीतारमण, नरेन्द्र सिंह तोमर विशेष आमंत्रित सदस्य - राव इन्द्रजीत सिंह, पियूष गोयल, नितिन गडकरी, थावर सिंह गहलोत | योजना आयोग बनाम नीति आयोग नीति आयोग निम्न प्रकार से योजना आयोग से बेहतर सिद्ध हो रहा है - जहाँ योजना आयोग का दृष्टिकोण शीर्ष से धरातल की तरफ था वहीँ नीति आयोग धरातल से शीर्ष की तरफ (बॉटम अप) दृष्टिकोण का अनुपालन करता है | तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ सलाहकार की भूमिका निभाता है, जिससे नियोजन को बेहतर बनाया जा सके | जहाँ योजना आयोग शासकीय भूमिका में धन आवंटन भी करता था (जो कालांतर में भ्रस्टाचार का मूल हो गया था) | वहीँ नीति आयोग सलाहकार की भूमिका, जो तकनीकी नवाचार एवं डेटा प्रबंधन पर आधारित है, द्वारा नियोजन में सहायक होता है | नीति आयोग भारत में सार्वजनिक क्षेत्रों में तकनीकी नवाचार के नए मानक स्थापित करते हुए बिग डेटा, ब्लॉकचेन तकनीकी आदि का उपयोग कर रही है | जहाँ योजना आयोग में मुख्यमंत्रियों एवं उपराज्यपालों के निर्णय में उचित भागीदारी नहीं थी, वहीँ नीति आयोग में ये सदस्य हैं और सहकारी संघवाद को प्रोत्साहित कर रहा है | यद्यपि नीति आयोग के सदस्यों में राजनीतिज्ञों और विशेषज्ञों का अनुपात आलोचना का विषय रहा है किन्तु विगत पांच वर्षों में नीति आयोग ने सुशासन, समावेश, वितीय प्रबंधन, आदि द्वारा अपनी सार्थकता सिद्ध की है | नीति आयोग को योजना और गैर योजना के रूप में नहीं, बल्कि राजस्व और पूंजीगत व्यय की स्वतंत्रता के रूप में होनी चाहिए | इस पूंजीगत व्यय की वृद्धि से अर्थव्यवस्था में सभी स्तरों पर बुनियादी ढाँचे का घाटा दूर हो सकता है |
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What do you understand by denudation? What is meant by weathering? Explain the different types of weathering. (150 words/10Marks)
BRIEF APPROACH: INTRODUCTION - Meaning/ definition of weathering. THE TYPES OF WEATHERING - Physical weathering, Chemical Weathering Answer:- Weathering refers to the process of disintegration of rocky material. It is the first step in the process of gradation. There can be both block disintegration as well as granular disintegration. Weathering can further be classified into physical and mechanical weathering. PHYSICAL WEATHERING It refers to the disintegration of rocks due to physical processes. 1) THERMAL EXPANSION AND CONTRACTION The rock is a combination of minerals, and each mineral has its own melting point. Also, summer means expansion of the rock and in winters, the rock contracts. Over say a 1000 years, the rock loses its elastic capacity and breaks. Tors are an example of this. 2) FROST WEAHERING/ CONGELIFACTION The rock breaks due to the pressure of the frost and the cleavage goes on deepening. Ultimately, the rock breaks into two halves. 3) SALT WEATHERING This is similar to frost weathering. The water evaporates, leaving behind the salt. The residual salt keeps accumulating and generates pressure upon the rock, which ultimately breakd. 4) EXFOLIATION 4.1) FLAKING This can happen in two ways. One is onion weathering. In this, due to the differential heating of the outer and inner layers, the outer layer gets heated rapidly and the inner layers are relatively cooler. Also, at night, the outer layer is cooled, but the inner layers are still warm. This differential heating causes the entire layer to get peeled off, known as flaking In the second method, the ice over the rock generates great pressure. When the ice begins to thaw, the rock starts getting exposed to agents of natural weathering. This leads to exfoliation. The material is called the super-incumbent material. 4.2) SPALING The rocks in the inner layers of the Earth are subject to great pressures. When the top layers are removed due to weathering etc., the pressure on the rocks decrease. They are then subject to onion weathering. Such exfoliation is called spaling. CHEMICAL WEATHERING It refers to the disintegration of rocks due to chemical processes. 1) SOLUTION Rocks like calcium carbonate and magnesium carbonate (common names- limestone, dolomite etc.), which can readily dissolve in water- do so within minutes. For example in limestone covered areas, caves develop. 2) OXIDATION Rocks made of iron, for instance, get wet and meet oxygen. They turn into ferrous oxide i.e. rust. The entire rusted part of the rock is removed. This is known as weathering due to oxidation. 3) HYDRATION Minerals absorb water, swell in size and therefore need more space to occupy. They, therefore, secede from the parent material. 4) HYDROLYSIS Rocks like magnesium chloride, sodium chloride, calcium chloride etc. meet with water and experience chemical changes. For example, sodium chloride on meeting with water turns into sodium hydroxide. This bond is stronger than the older bond. Therefore, it separates and forms a new material 5) CHELATION It is an organic process by which the metallic cations are incorporated into hydrocarbon molecules. 6) BIOLOGICAL WEATHERING It refers to the disintegration of rocks through biological agents like men, animals, rodents, earthworms etc. For example, the roots of plants penetrate through the rocks and result in crevices, which expand and then disintegrate the rock.
##Question:What do you understand by denudation? What is meant by weathering? Explain the different types of weathering. (150 words/10Marks)##Answer:BRIEF APPROACH: INTRODUCTION - Meaning/ definition of weathering. THE TYPES OF WEATHERING - Physical weathering, Chemical Weathering Answer:- Weathering refers to the process of disintegration of rocky material. It is the first step in the process of gradation. There can be both block disintegration as well as granular disintegration. Weathering can further be classified into physical and mechanical weathering. PHYSICAL WEATHERING It refers to the disintegration of rocks due to physical processes. 1) THERMAL EXPANSION AND CONTRACTION The rock is a combination of minerals, and each mineral has its own melting point. Also, summer means expansion of the rock and in winters, the rock contracts. Over say a 1000 years, the rock loses its elastic capacity and breaks. Tors are an example of this. 2) FROST WEAHERING/ CONGELIFACTION The rock breaks due to the pressure of the frost and the cleavage goes on deepening. Ultimately, the rock breaks into two halves. 3) SALT WEATHERING This is similar to frost weathering. The water evaporates, leaving behind the salt. The residual salt keeps accumulating and generates pressure upon the rock, which ultimately breakd. 4) EXFOLIATION 4.1) FLAKING This can happen in two ways. One is onion weathering. In this, due to the differential heating of the outer and inner layers, the outer layer gets heated rapidly and the inner layers are relatively cooler. Also, at night, the outer layer is cooled, but the inner layers are still warm. This differential heating causes the entire layer to get peeled off, known as flaking In the second method, the ice over the rock generates great pressure. When the ice begins to thaw, the rock starts getting exposed to agents of natural weathering. This leads to exfoliation. The material is called the super-incumbent material. 4.2) SPALING The rocks in the inner layers of the Earth are subject to great pressures. When the top layers are removed due to weathering etc., the pressure on the rocks decrease. They are then subject to onion weathering. Such exfoliation is called spaling. CHEMICAL WEATHERING It refers to the disintegration of rocks due to chemical processes. 1) SOLUTION Rocks like calcium carbonate and magnesium carbonate (common names- limestone, dolomite etc.), which can readily dissolve in water- do so within minutes. For example in limestone covered areas, caves develop. 2) OXIDATION Rocks made of iron, for instance, get wet and meet oxygen. They turn into ferrous oxide i.e. rust. The entire rusted part of the rock is removed. This is known as weathering due to oxidation. 3) HYDRATION Minerals absorb water, swell in size and therefore need more space to occupy. They, therefore, secede from the parent material. 4) HYDROLYSIS Rocks like magnesium chloride, sodium chloride, calcium chloride etc. meet with water and experience chemical changes. For example, sodium chloride on meeting with water turns into sodium hydroxide. This bond is stronger than the older bond. Therefore, it separates and forms a new material 5) CHELATION It is an organic process by which the metallic cations are incorporated into hydrocarbon molecules. 6) BIOLOGICAL WEATHERING It refers to the disintegration of rocks through biological agents like men, animals, rodents, earthworms etc. For example, the roots of plants penetrate through the rocks and result in crevices, which expand and then disintegrate the rock.
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स्वदेशी आंदोलन का संक्षिप्त परिचय देते हुए , इसके प्रमुख विशेषताओं की चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द/10 अंक ) With a brief introduction to the Swadeshi movement, discuss its main features. (150-200 words/10 Marks)
दृष्टिकोण : स्वदेशी आंदोलन का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । इसके उदय के कारणों की चर्चा कीजिये । इसकी प्रमुख विशेषताओं की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । इसके महत्व की संक्षिप्त चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : वर्ष 1905 में ब्रिटिश सरकार द्वारा बंगाल विभाजन का निर्णय लिया गया । इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप भारतीय लोगों द्वारा स्वदेशी व बहिष्कार आंदोलन चलाया गया । इसे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के क्रम में सबसे पहला जनांदोलन माना जाता है और 1857 की क्रान्ति के बाद पहली बार अंग्रेजों को एक सशक्त जनप्रतिरोध का सामना करना पड़ा । स्वदेशी आंदोलन के उदय की पृष्टभूमि : स्वदेशी आंदोलन के लिए पृष्टभूमि तो 19वीं सदी के अंतिम वर्षों से ही बननी शुरू हो गयी थी । उदारवादी नेताओं ने ब्रिटिश शासन की आर्थिक शोषण की प्रकृति को प्रस्तुत कर भारतीयों को जागृत करने का काम किया । साथ ही कर्ज़न की प्रतिक्रियावादी नीतियों ने भी एक जनआंदोलन के लिए आधार निर्मित करने का काम किया तथापि आंदोलन का मूल व तात्कालिक कारण बना 1905 का बंगाल विभाजन का निर्णय । बंगाल विभाजन के निर्णय ने कांग्रेस के गरम दल के साथ-साथ नरम दल के नेताओं को भी उद्वेलित करने का काम किया और उन्होंने भी एक जनआंदोलन के रूप में स्वदेशी व बहिष्कार आंदोलन का समर्थन करते हुए इसे आगे बढ़ाया । स्वदेशी आंदोलन की प्रमुख विशेषताएँ : इस आंदोलन का प्रसार अखिल भारतीय स्तर पर रहा तथापि मुख्य केंद्र बंगाल में रहा । इसके अतिरिक्त पंजाब व महाराष्ट्र के क्षेत्र में भी आंदोलन का ठीक-ठाक प्रसार रहा । यह आंदोलन मुख्यतः शहरी क्षेत्रों तक सीमित रहा । कांग्रेसी नेताओं द्वारा संचालित पहला आंदोलन जिसमें मध्यवर्ग के साथ-साथ आमलोगों की व्यापक भागीदारी दिखी । आंदोलन में संगठनात्मक रूप में कांग्रेस की विशेष भूमिका नहीं थी लेकिन कांग्रेसी नेताओं ने व्यक्तिगत प्रयासों से इसे संगठित रखा ।आंदोलन की औपचारिक शुरुआत, स्वदेशी व बहिष्कार जैसे कार्यक्रम भी इसके संगठित प्रकृति को रेखांकित करते हैं। आंदोलन के दौरान लोकतान्त्रिक लेकिन उग्र तरीके अपनाए गए । जैसे- विदेशी वस्तुओ का बहिष्कार , विदेशी कपड़ों को जलाना, सरकार की आलोचना इत्यादि । उग्र तरीके के साथ-साथ आंदोलन में उदार शैली का भी महत्व बना रहा तथा अंतिम चरण में क्रांतिकारी युवाओं ने हिंसात्मक रास्ते को अपनाया । आंदोलन के दौरान सांस्कृतिक प्रतिकों का भी राष्ट्रीय चेतना के प्रसार के लिए उपयोग हुआ । इसके साथ ही गरमदलीय नेताओं ने आत्मत्याग को राजनीति से जोड़ा और भारत की वंदना मातृभूमि के रूप में करनी प्रारंभ की । सरकारी दमन के कारण आंदोलन कमजोर अवश्य हुआ लेकिन स्वशासन एवं आत्मनिर्भरता जैसे लक्ष्यों, आम लोगों की भागीदारी , संघर्ष के नए तरीकों , अखिल भारतीय स्तर पर आंदोलन इत्यादि पहलुओं के कारण राष्ट्रीय आंदोलन में स्वदेशी आंदोलन मील का पत्थर सिद्ध हुआ । गांधीवादी आंदोलनों की शुरुआत से पूर्व यह एकप्रकार से उसका पूर्वाभ्यास था । आगे इसी का विकसित व प्रभावी स्वरूप हमें गांधीवादी आंदोलनों में देखने को मिलता है ।
##Question:स्वदेशी आंदोलन का संक्षिप्त परिचय देते हुए , इसके प्रमुख विशेषताओं की चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द/10 अंक ) With a brief introduction to the Swadeshi movement, discuss its main features. (150-200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण : स्वदेशी आंदोलन का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । इसके उदय के कारणों की चर्चा कीजिये । इसकी प्रमुख विशेषताओं की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । इसके महत्व की संक्षिप्त चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : वर्ष 1905 में ब्रिटिश सरकार द्वारा बंगाल विभाजन का निर्णय लिया गया । इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप भारतीय लोगों द्वारा स्वदेशी व बहिष्कार आंदोलन चलाया गया । इसे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के क्रम में सबसे पहला जनांदोलन माना जाता है और 1857 की क्रान्ति के बाद पहली बार अंग्रेजों को एक सशक्त जनप्रतिरोध का सामना करना पड़ा । स्वदेशी आंदोलन के उदय की पृष्टभूमि : स्वदेशी आंदोलन के लिए पृष्टभूमि तो 19वीं सदी के अंतिम वर्षों से ही बननी शुरू हो गयी थी । उदारवादी नेताओं ने ब्रिटिश शासन की आर्थिक शोषण की प्रकृति को प्रस्तुत कर भारतीयों को जागृत करने का काम किया । साथ ही कर्ज़न की प्रतिक्रियावादी नीतियों ने भी एक जनआंदोलन के लिए आधार निर्मित करने का काम किया तथापि आंदोलन का मूल व तात्कालिक कारण बना 1905 का बंगाल विभाजन का निर्णय । बंगाल विभाजन के निर्णय ने कांग्रेस के गरम दल के साथ-साथ नरम दल के नेताओं को भी उद्वेलित करने का काम किया और उन्होंने भी एक जनआंदोलन के रूप में स्वदेशी व बहिष्कार आंदोलन का समर्थन करते हुए इसे आगे बढ़ाया । स्वदेशी आंदोलन की प्रमुख विशेषताएँ : इस आंदोलन का प्रसार अखिल भारतीय स्तर पर रहा तथापि मुख्य केंद्र बंगाल में रहा । इसके अतिरिक्त पंजाब व महाराष्ट्र के क्षेत्र में भी आंदोलन का ठीक-ठाक प्रसार रहा । यह आंदोलन मुख्यतः शहरी क्षेत्रों तक सीमित रहा । कांग्रेसी नेताओं द्वारा संचालित पहला आंदोलन जिसमें मध्यवर्ग के साथ-साथ आमलोगों की व्यापक भागीदारी दिखी । आंदोलन में संगठनात्मक रूप में कांग्रेस की विशेष भूमिका नहीं थी लेकिन कांग्रेसी नेताओं ने व्यक्तिगत प्रयासों से इसे संगठित रखा ।आंदोलन की औपचारिक शुरुआत, स्वदेशी व बहिष्कार जैसे कार्यक्रम भी इसके संगठित प्रकृति को रेखांकित करते हैं। आंदोलन के दौरान लोकतान्त्रिक लेकिन उग्र तरीके अपनाए गए । जैसे- विदेशी वस्तुओ का बहिष्कार , विदेशी कपड़ों को जलाना, सरकार की आलोचना इत्यादि । उग्र तरीके के साथ-साथ आंदोलन में उदार शैली का भी महत्व बना रहा तथा अंतिम चरण में क्रांतिकारी युवाओं ने हिंसात्मक रास्ते को अपनाया । आंदोलन के दौरान सांस्कृतिक प्रतिकों का भी राष्ट्रीय चेतना के प्रसार के लिए उपयोग हुआ । इसके साथ ही गरमदलीय नेताओं ने आत्मत्याग को राजनीति से जोड़ा और भारत की वंदना मातृभूमि के रूप में करनी प्रारंभ की । सरकारी दमन के कारण आंदोलन कमजोर अवश्य हुआ लेकिन स्वशासन एवं आत्मनिर्भरता जैसे लक्ष्यों, आम लोगों की भागीदारी , संघर्ष के नए तरीकों , अखिल भारतीय स्तर पर आंदोलन इत्यादि पहलुओं के कारण राष्ट्रीय आंदोलन में स्वदेशी आंदोलन मील का पत्थर सिद्ध हुआ । गांधीवादी आंदोलनों की शुरुआत से पूर्व यह एकप्रकार से उसका पूर्वाभ्यास था । आगे इसी का विकसित व प्रभावी स्वरूप हमें गांधीवादी आंदोलनों में देखने को मिलता है ।
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Discuss the reasons behind the decline of the mughal empire in the 18th century. (150 words/10 Marks)
Approach: Introduction: A brief introduction to the Mughal empire. Body: Discuss different factors responsible for the decline of the Mughal empire in India. Conclusion : A balanced conclusion on the overview of the decline of Mughals. Model Answer: The Mughal Empire, that was established in early 16th C, reached its peak to become a pan Indian Empire during the reign of Aurangzeb, But soon it began to decline by the early 18th C due to some policies of Aurangzeb, as well as due to some other administrative factors. Factors for the decline of the Mughal Empire: Policies of Aurangazeb : The Mughal expansion in Deccan was a hugely expensive affair that lasted for more than 3 decades since the 1660s. However, the agricultural productivity of the Deccan region was low and could not compensate for the expensive Deccan campaign. The imposition of Jaziya, an additional religious tax, upon non-muslims under Aurangzeb’s rule alienated the majority of the subject class under the Mughal rule and led to dissatisfaction that eventually contributed to its decline. Political Causes: Succession Disputes: Aurangzeb’s death triggered a major succession dispute due to the absence of clear succession rules within the Mughal empire. Within a decade from 1707 to 1719, three major Mughal rulers ruled briefly and finally, the arrival of Mohammed Shah in 1719 brought an end to these succession disputes. Factionalism in Mughal Court: Moreover the political instability was worsened by the bitter factionalism within the Mughal court over the appointment to key administrative positions between the Irani, Turani, and Hindustani factions. For example, Sayid Brothers (Hindustani) organized the assassination of FarrukSiyar and placed Mohammed Shah on the throne. But, Asaf Jahan I (the leader of Irani faction) organized the Irani and Turani factions together to assassinate Sayyid Brothers. Economic Causes: Jagirdari System: The Jagirdari System was the more prevalent system of revenue collection under the Mughal empire under which, revenue collections and military administration were the primary responsibilities of Jagirdars appointed by the King. This system suffered from a crisis as there were too many potential Jagirdars, chasing too few jagirs, coupled with the highly unequal size of Jagirs. Inefficiency in revenue collection: The jagirdari Crisis fueled political instability moreover it was an inefficient method of revenue collection as a major portion was retained by the Jagirdar for his personal expenses. Military Causes: Weak Supervision: The crisis within the Jagirdari System fuelled corruption within the army as in the absence of a strong central supervision Jagirdars often failed to maintain the requisite number of troops and horsemen and this adversely affected the military preparedness of the Mughals. Lack of Modernization: Moreover the period since the death of Aurangzeb saw no major technological modernizations being introduced within the Army. Thus, contributed to its military weakness. Thus the failure of Mughals to reform their political and economic structure of administration coupled with the worsening of succession disputes 1707 onwards eventually led to the decline of the Mughal empire during the early 18thCentury.
##Question:Discuss the reasons behind the decline of the mughal empire in the 18th century. (150 words/10 Marks)##Answer:Approach: Introduction: A brief introduction to the Mughal empire. Body: Discuss different factors responsible for the decline of the Mughal empire in India. Conclusion : A balanced conclusion on the overview of the decline of Mughals. Model Answer: The Mughal Empire, that was established in early 16th C, reached its peak to become a pan Indian Empire during the reign of Aurangzeb, But soon it began to decline by the early 18th C due to some policies of Aurangzeb, as well as due to some other administrative factors. Factors for the decline of the Mughal Empire: Policies of Aurangazeb : The Mughal expansion in Deccan was a hugely expensive affair that lasted for more than 3 decades since the 1660s. However, the agricultural productivity of the Deccan region was low and could not compensate for the expensive Deccan campaign. The imposition of Jaziya, an additional religious tax, upon non-muslims under Aurangzeb’s rule alienated the majority of the subject class under the Mughal rule and led to dissatisfaction that eventually contributed to its decline. Political Causes: Succession Disputes: Aurangzeb’s death triggered a major succession dispute due to the absence of clear succession rules within the Mughal empire. Within a decade from 1707 to 1719, three major Mughal rulers ruled briefly and finally, the arrival of Mohammed Shah in 1719 brought an end to these succession disputes. Factionalism in Mughal Court: Moreover the political instability was worsened by the bitter factionalism within the Mughal court over the appointment to key administrative positions between the Irani, Turani, and Hindustani factions. For example, Sayid Brothers (Hindustani) organized the assassination of FarrukSiyar and placed Mohammed Shah on the throne. But, Asaf Jahan I (the leader of Irani faction) organized the Irani and Turani factions together to assassinate Sayyid Brothers. Economic Causes: Jagirdari System: The Jagirdari System was the more prevalent system of revenue collection under the Mughal empire under which, revenue collections and military administration were the primary responsibilities of Jagirdars appointed by the King. This system suffered from a crisis as there were too many potential Jagirdars, chasing too few jagirs, coupled with the highly unequal size of Jagirs. Inefficiency in revenue collection: The jagirdari Crisis fueled political instability moreover it was an inefficient method of revenue collection as a major portion was retained by the Jagirdar for his personal expenses. Military Causes: Weak Supervision: The crisis within the Jagirdari System fuelled corruption within the army as in the absence of a strong central supervision Jagirdars often failed to maintain the requisite number of troops and horsemen and this adversely affected the military preparedness of the Mughals. Lack of Modernization: Moreover the period since the death of Aurangzeb saw no major technological modernizations being introduced within the Army. Thus, contributed to its military weakness. Thus the failure of Mughals to reform their political and economic structure of administration coupled with the worsening of succession disputes 1707 onwards eventually led to the decline of the Mughal empire during the early 18thCentury.
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राष्ट्रीय आय को परिभाषित करते हुए इसके मापन की विधियों का विश्लेषण कीजिये। इसके साथ ही राष्ट्रीय आय के मापन की समस्याओं को भी रेखांकित कीजिये। (150 से 200 शब्द, अंक-10 ) Define national income and analyze its methods of measurement. Along with this, underline the problems of national income measurement. (150 to 200 words, Marks- 10 )
दृष्टिकोण 1- भूमिका में राष्ट्रीय आय को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम खंड में राष्ट्रीय आय के मापन की विधियों का विश्लेषण कीजिये 3- दुसरे खंड राष्ट्रीय आय के मापन की समस्याओं को रेखांकित कीजिये 4- अंतिम में सुझावात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| राष्ट्रीय आय किसी देश की अर्थव्यवस्था का आर्थिक आकार दर्शाती है,इसमें हुआ परिवर्तन आर्थिक वृद्धि दर्शाता है| किसी भी देश में राष्ट्रीय आय का विश्लेषण अथवा राष्ट्रीय आय का लेखांकन कई कारणों से महत्वपूर्ण होता है| राष्ट्रीय आय के मापन से राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति आय में होने वाली वृद्धि का विश्लेषण, तुलना करने, भावी आर्थिक नीति का निर्धारण, क्षेत्रीय विकास की समीक्षा तथा क्षेत्रकवार संरचनागत योगदान का विश्लेषण किया जा सकता है। समग्र राष्ट्रीय आय के मापन में आय, व्यय एवं उत्पादन अथवा मूल्यवर्धन विधि का प्रयोग किया जाता है| लेकिन राष्ट्रीय आय के मापन में वैश्विक रूप से अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है राष्ट्रीय आय के मापन की विधियाँ आय विधि इसमें सभी प्रकार की कारक आय का योग कर राष्ट्रीय आय का आकलन होता है कारक आय- किराया/रॉयल्टी. नकद या सुविधाओं के रूप में मजदूरी(अकुशल श्रमिक)/वेतन(कुशल श्रमिक), ब्याज एवं लाभ तथा स्वरोजगारो की मिश्रित आय(यह किसी उद्यमी की सभी कारकों की मिश्रित आय होती है) संपत्ति भौतिक एवं बौद्धिक रूप में हो सकती है| किसी की बौद्धिक संपत्ति का किसी अन्य प्रयोक्ता द्वारा प्रयोग के बदले प्रदान किया गया किराया, रॉयल्टी कहते हैं उत्पादन/मूल्य वर्धन विधि(VA) सभी फर्मों द्वारा वस्तुओं &सेवाओं के उत्पादन/वितरण प्रक्रिया में की जाने वाली मूल्य वृद्धि का योग GVA होता है| GDP, सभी फर्मों के GVA का योग होता है| इस GVA में से मूल्यह्रास घटा देने पर NDP प्राप्त होगी| NDP में NFIA को समायोजित करने पर NNP प्राप्त होगी| मूल्यवृद्धि, उत्पाद के मान से गैर कारक आगत के मान को घटा कर प्राप्त होगी व्यय विधि सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं पर किये गए व्यय का योग कर सकल राष्ट्रीय व्यय का आकलन किया जाता है व्यय का स्पष्टीकरण- निजी+सरकारी अंतिम उपभोग व्यय+पूंजीगत वस्तुओं पर व्यय+शुद्ध निर्यात वस्तुएं एवं सेवाओं, अंतिम(उपभोक्ता एवं पूंजीगत वस्तुएं) एवं मध्यवर्ती प्रकार की होती है| बंद अर्थव्यवस्था वह है जिसमें विदेशों से कोई भी लेन-देन नहीं होता है| बंद अर्थव्यवस्था में निजी एवं सार्वजिनिक क्षेत्र द्वारा अंतिम उपभोग व्यय+पूंजीगत वस्तुओं पर व्यय ही राष्ट्रीय व्यय होता है खुली अर्थव्यवस्था वह है जिसमें विदेशों से लेन-देन होता है| खुली अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र, सार्वजनिक क्षेत्र एवं बाह्य क्षेत्र को शामिल किया जाता है| इन तीनों के द्वारा निजी+सरकारी अंतिम उपभोग व्यय+पूंजीगत वस्तुओं पर व्यय+शुद्ध निर्यात(इसमें पर्यटन शामिल है) को जोड़ा जाता है राष्ट्रीय आय मापन की समस्याएं सैद्धांतिक समस्याएं विभिन्न देशों/अर्थशास्त्रियों के निम्नलिखित पर एकमत न होने के कारण होती हैं किन वस्तुओं को राष्ट्रीय आय में सम्मिलित किया जाए एवं किनकों नहीं| जैसे गृहिणियों की सेवायें, विदेशी कम्पनियों की गतिविधियाँ आदि अलग-अलग सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग जैसे कौन से माध्य एवं औसत का प्रयोग किया जाए राष्ट्रीय आय के आकलन की विधि यथा आधार मूल्य, बाजार मूल्य अथवा कारक लागत पर गणना पर मतैक्य का अभाव आकलन का आधार-बेसिक/मूल कीमत हो या चालू मूल्य या फिर कारक लागत पर हो| इससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तुलना में समस्या होती है| आंकड़ों के स्रोत, जिनके आंकड़े सम्मिलित किये जा सकते हैं जैसे MCA 21(कंपनी मामलों के मंत्रालय का इलेक्ट्रॉनिक डाटा बैंक) के आंकड़ों को शामिल किया जाए अथवा नहींव्यावहारिक/सांख्यिकीय समस्याएंअधिकांशतः अल्पविकसित देशों में अधिक प्रभावी रूप में दिखती है संतोषजनक आंकड़ों की अनुपलब्धता, सटीक आंकड़े न होना, असंगठित क्षेत्र की गतिविधियों का लेखांकन न होना बाजारेत्तर लेन-देन जैसे वस्तु विनिमय, इसके कारण लेन-देन का लेखांकन नहीं हो पाना है व्यावसायिक विशिष्टीकरण का अभाव अर्थात व्यवसायों में अस्थिरता(कभी कोई व्यवसाय कभी कोई) इससे आंकड़ों के संग्रहण एवं उनके वर्गीकरण की समस्या उत्पन्न होती है| समानांतर अर्थव्यवस्था एवं कालाधन का लेखांकन न होना आदि उपरोक्त समस्याओं के संदर्भ में सांख्यिकीय आंकड़ो के संग्रहण तंत्र को मजबूत किया जाना इसके साथ ही विश्व की बड़ी आर्थिक संस्थाओं के द्वारा सामान्य सिद्धांतों का प्रयोग करते हुए राष्ट्रों को इनको अपनाने के लिए प्रेरित किये जाने की आवश्यकता है|
##Question:राष्ट्रीय आय को परिभाषित करते हुए इसके मापन की विधियों का विश्लेषण कीजिये। इसके साथ ही राष्ट्रीय आय के मापन की समस्याओं को भी रेखांकित कीजिये। (150 से 200 शब्द, अंक-10 ) Define national income and analyze its methods of measurement. Along with this, underline the problems of national income measurement. (150 to 200 words, Marks- 10 )##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में राष्ट्रीय आय को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम खंड में राष्ट्रीय आय के मापन की विधियों का विश्लेषण कीजिये 3- दुसरे खंड राष्ट्रीय आय के मापन की समस्याओं को रेखांकित कीजिये 4- अंतिम में सुझावात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| राष्ट्रीय आय किसी देश की अर्थव्यवस्था का आर्थिक आकार दर्शाती है,इसमें हुआ परिवर्तन आर्थिक वृद्धि दर्शाता है| किसी भी देश में राष्ट्रीय आय का विश्लेषण अथवा राष्ट्रीय आय का लेखांकन कई कारणों से महत्वपूर्ण होता है| राष्ट्रीय आय के मापन से राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति आय में होने वाली वृद्धि का विश्लेषण, तुलना करने, भावी आर्थिक नीति का निर्धारण, क्षेत्रीय विकास की समीक्षा तथा क्षेत्रकवार संरचनागत योगदान का विश्लेषण किया जा सकता है। समग्र राष्ट्रीय आय के मापन में आय, व्यय एवं उत्पादन अथवा मूल्यवर्धन विधि का प्रयोग किया जाता है| लेकिन राष्ट्रीय आय के मापन में वैश्विक रूप से अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है राष्ट्रीय आय के मापन की विधियाँ आय विधि इसमें सभी प्रकार की कारक आय का योग कर राष्ट्रीय आय का आकलन होता है कारक आय- किराया/रॉयल्टी. नकद या सुविधाओं के रूप में मजदूरी(अकुशल श्रमिक)/वेतन(कुशल श्रमिक), ब्याज एवं लाभ तथा स्वरोजगारो की मिश्रित आय(यह किसी उद्यमी की सभी कारकों की मिश्रित आय होती है) संपत्ति भौतिक एवं बौद्धिक रूप में हो सकती है| किसी की बौद्धिक संपत्ति का किसी अन्य प्रयोक्ता द्वारा प्रयोग के बदले प्रदान किया गया किराया, रॉयल्टी कहते हैं उत्पादन/मूल्य वर्धन विधि(VA) सभी फर्मों द्वारा वस्तुओं &सेवाओं के उत्पादन/वितरण प्रक्रिया में की जाने वाली मूल्य वृद्धि का योग GVA होता है| GDP, सभी फर्मों के GVA का योग होता है| इस GVA में से मूल्यह्रास घटा देने पर NDP प्राप्त होगी| NDP में NFIA को समायोजित करने पर NNP प्राप्त होगी| मूल्यवृद्धि, उत्पाद के मान से गैर कारक आगत के मान को घटा कर प्राप्त होगी व्यय विधि सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं पर किये गए व्यय का योग कर सकल राष्ट्रीय व्यय का आकलन किया जाता है व्यय का स्पष्टीकरण- निजी+सरकारी अंतिम उपभोग व्यय+पूंजीगत वस्तुओं पर व्यय+शुद्ध निर्यात वस्तुएं एवं सेवाओं, अंतिम(उपभोक्ता एवं पूंजीगत वस्तुएं) एवं मध्यवर्ती प्रकार की होती है| बंद अर्थव्यवस्था वह है जिसमें विदेशों से कोई भी लेन-देन नहीं होता है| बंद अर्थव्यवस्था में निजी एवं सार्वजिनिक क्षेत्र द्वारा अंतिम उपभोग व्यय+पूंजीगत वस्तुओं पर व्यय ही राष्ट्रीय व्यय होता है खुली अर्थव्यवस्था वह है जिसमें विदेशों से लेन-देन होता है| खुली अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र, सार्वजनिक क्षेत्र एवं बाह्य क्षेत्र को शामिल किया जाता है| इन तीनों के द्वारा निजी+सरकारी अंतिम उपभोग व्यय+पूंजीगत वस्तुओं पर व्यय+शुद्ध निर्यात(इसमें पर्यटन शामिल है) को जोड़ा जाता है राष्ट्रीय आय मापन की समस्याएं सैद्धांतिक समस्याएं विभिन्न देशों/अर्थशास्त्रियों के निम्नलिखित पर एकमत न होने के कारण होती हैं किन वस्तुओं को राष्ट्रीय आय में सम्मिलित किया जाए एवं किनकों नहीं| जैसे गृहिणियों की सेवायें, विदेशी कम्पनियों की गतिविधियाँ आदि अलग-अलग सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग जैसे कौन से माध्य एवं औसत का प्रयोग किया जाए राष्ट्रीय आय के आकलन की विधि यथा आधार मूल्य, बाजार मूल्य अथवा कारक लागत पर गणना पर मतैक्य का अभाव आकलन का आधार-बेसिक/मूल कीमत हो या चालू मूल्य या फिर कारक लागत पर हो| इससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तुलना में समस्या होती है| आंकड़ों के स्रोत, जिनके आंकड़े सम्मिलित किये जा सकते हैं जैसे MCA 21(कंपनी मामलों के मंत्रालय का इलेक्ट्रॉनिक डाटा बैंक) के आंकड़ों को शामिल किया जाए अथवा नहींव्यावहारिक/सांख्यिकीय समस्याएंअधिकांशतः अल्पविकसित देशों में अधिक प्रभावी रूप में दिखती है संतोषजनक आंकड़ों की अनुपलब्धता, सटीक आंकड़े न होना, असंगठित क्षेत्र की गतिविधियों का लेखांकन न होना बाजारेत्तर लेन-देन जैसे वस्तु विनिमय, इसके कारण लेन-देन का लेखांकन नहीं हो पाना है व्यावसायिक विशिष्टीकरण का अभाव अर्थात व्यवसायों में अस्थिरता(कभी कोई व्यवसाय कभी कोई) इससे आंकड़ों के संग्रहण एवं उनके वर्गीकरण की समस्या उत्पन्न होती है| समानांतर अर्थव्यवस्था एवं कालाधन का लेखांकन न होना आदि उपरोक्त समस्याओं के संदर्भ में सांख्यिकीय आंकड़ो के संग्रहण तंत्र को मजबूत किया जाना इसके साथ ही विश्व की बड़ी आर्थिक संस्थाओं के द्वारा सामान्य सिद्धांतों का प्रयोग करते हुए राष्ट्रों को इनको अपनाने के लिए प्रेरित किये जाने की आवश्यकता है|
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राष्ट्रीय आय को परिभाषित करते हुए इसकी गणना की आय विधि, व्ययविधि तथा मूल्य वर्द्धनविधि की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) Define the national income and discuss the income method, expenditure method and value addition method of its calculation. (150-200 words/10 Marks)
Approach: भूमिका में राष्ट्रीय आय को परिभाषित कीजिए। राष्ट्रीय आय की आय विधि की चर्चा कीजिए। उत्पाद विधि एवं व्यय विधि की भी चर्चा कीजिए। इन विधियों के आपसी संबंध की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर- एक वित्तीय वर्ष की अवधि में सभी सामान्य निवासियों/नागरिकों द्वारा अर्जित की गयी कुल कारक आय को राष्ट्रीय आय (National Income) कहते हैं।राष्ट्रीय आय को अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के मान या उन पर व्यय के संदर्भ में भी अभिव्यक्त किया जा सकता है। राष्ट्रीय आय गणना की आय विधि, उत्पाद विधि, व्यय विधि आय विधि सभी नागरिकों की कारक आय का योग करके राष्ट्रीय आय का आकलन किया जाता है। किराया एवं रॉयल्टी + मजदूरी एवं वेतन + ब्याज + लाभ +स्वरोजगारियों की मिश्रित आय विकसित देशों में इस विधि का प्रयोग नहीं किया जाता है। यह विधि सेवा क्षेत्रक के लिए मुख्य रूप से प्रयुक्त की जाती है। चूंकि विकसित देशों में सेवा क्षेत्रक की अर्थव्यवस्था में योगदान अधिक होता है इसलिए इसी विधि के तहत गणना की जाती है। उत्पादन विधि सभी फार्मों द्वारा की जाने वाली मूल्य वृद्धि का योग करके राष्ट्रीय आय का आकलन किया जाता है। मूल्य वृद्धि = उत्पाद का मान - गैर कारक आगत का मान भारत में मुख्य रूप से कृषि व औद्योगिक क्षेत्रक में यह विधि प्रयुक्त होती है। व्यय विधि सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं पर व्यय का योग करके राष्ट्रीय आय की गणना की जाती है। Y = C + I + G + (X-M) C = निजी अंतिम उपभोग पर व्यय G = सरकारी अंतिम उपभोग व्यय I = पूंजीगत वस्तुओं पर व्यय X = निर्यात M = आयात निर्माण क्षेत्रक की गणना हेतु इसके लिए प्रयुक्त की जाती है। राष्ट्रीय आय की गणना के लिए भले ही भिन्न भिन्न देशों द्वारा तथा विभिन्न क्षेत्रकों के लिए अलग अलग विधियों का प्रयोग किया जाये किन्तु किसी भी विधि से प्राप्त मान लगभग समान ही प्राप्त होता है।
##Question:राष्ट्रीय आय को परिभाषित करते हुए इसकी गणना की आय विधि, व्ययविधि तथा मूल्य वर्द्धनविधि की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) Define the national income and discuss the income method, expenditure method and value addition method of its calculation. (150-200 words/10 Marks)##Answer:Approach: भूमिका में राष्ट्रीय आय को परिभाषित कीजिए। राष्ट्रीय आय की आय विधि की चर्चा कीजिए। उत्पाद विधि एवं व्यय विधि की भी चर्चा कीजिए। इन विधियों के आपसी संबंध की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर- एक वित्तीय वर्ष की अवधि में सभी सामान्य निवासियों/नागरिकों द्वारा अर्जित की गयी कुल कारक आय को राष्ट्रीय आय (National Income) कहते हैं।राष्ट्रीय आय को अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के मान या उन पर व्यय के संदर्भ में भी अभिव्यक्त किया जा सकता है। राष्ट्रीय आय गणना की आय विधि, उत्पाद विधि, व्यय विधि आय विधि सभी नागरिकों की कारक आय का योग करके राष्ट्रीय आय का आकलन किया जाता है। किराया एवं रॉयल्टी + मजदूरी एवं वेतन + ब्याज + लाभ +स्वरोजगारियों की मिश्रित आय विकसित देशों में इस विधि का प्रयोग नहीं किया जाता है। यह विधि सेवा क्षेत्रक के लिए मुख्य रूप से प्रयुक्त की जाती है। चूंकि विकसित देशों में सेवा क्षेत्रक की अर्थव्यवस्था में योगदान अधिक होता है इसलिए इसी विधि के तहत गणना की जाती है। उत्पादन विधि सभी फार्मों द्वारा की जाने वाली मूल्य वृद्धि का योग करके राष्ट्रीय आय का आकलन किया जाता है। मूल्य वृद्धि = उत्पाद का मान - गैर कारक आगत का मान भारत में मुख्य रूप से कृषि व औद्योगिक क्षेत्रक में यह विधि प्रयुक्त होती है। व्यय विधि सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं पर व्यय का योग करके राष्ट्रीय आय की गणना की जाती है। Y = C + I + G + (X-M) C = निजी अंतिम उपभोग पर व्यय G = सरकारी अंतिम उपभोग व्यय I = पूंजीगत वस्तुओं पर व्यय X = निर्यात M = आयात निर्माण क्षेत्रक की गणना हेतु इसके लिए प्रयुक्त की जाती है। राष्ट्रीय आय की गणना के लिए भले ही भिन्न भिन्न देशों द्वारा तथा विभिन्न क्षेत्रकों के लिए अलग अलग विधियों का प्रयोग किया जाये किन्तु किसी भी विधि से प्राप्त मान लगभग समान ही प्राप्त होता है।
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भारत में उपनिवेशवाद के दूसरे चरण में कंपनी की शिक्षा नीति का संक्षेप में मूल्यांकन कीजिए। (150-200 शब्द) Briefly evaluate the education policy of the company in the second phase of colonialism in India. (150-200 words)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में कंपनी का भारत में शासन स्थापना कोलिखते हुए उत्तर आरंभ कीजिए। इन प्रयासों का उल्लेख कीजिए। शिक्षा के विकास के पीछे वास्तविक उद्देश्यों का विवरण दीजिये इसके सकारात्मक पक्षों का संक्षिप्त विवरण दीजिए। निष्कर्ष में ब्रिटिश शिक्षा नीति के सम्पूर्ण प्रभावों का समग्र रूप प्रस्तुत कीजिए। बंगाल विजय के पश्चात भारत में कम्पनी का औपचारिक शासन स्थापित होता है तथा वेलेजली की सहायक संधि नीति द्वारा तीव्र विस्तार को प्राप्त किया। ऐसे में कंपनी को प्रशासनिक व्यवस्था हेतु सस्ते भारतीय क्लर्कों की आवश्यकता हुई , जिस परिणाम भारत में शिक्षा विकास हेतु प्रयास किये जाने प्रारंभ हुए। शिक्षा के प्रसार के लिए किए गए प्रमुख प्रयास: 1813 के चार्टर एक्ट के माध्यम से शिक्षा पर प्रतिवर्ष 1 लाख रुपए का व्यय मैकाले स्मरण पत्र द्वारा अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार अधोमुखी निस्यंदन सिद्धांत चार्ल्स वुड्स डिस्पैच हंटर कमेटी अंग्रेजों ने अपनी आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए शिक्षा नीति का विकास किया। आधुनिक शिक्षा नीति के प्रारम्भ का मुख्य उद्देश्य एक ऐसे वर्ग का सृजन करना था जो रक्त और रंग से भारतीय जबकि रुचि, विचार, नैतिकता और बुद्धि से अंग्रेज़ हो। आधुनिक पश्चिमी शिक्षा इस भावना का समावेश करती थी कि वे हीन हैं तथा उन्हे एक विदेशी शक्ति द्वारा शासित होना चाहिए। इस शिक्षा नीति का मूल्यांकन इस प्रकार है: 1813 के चार्टर अधिनियम के माध्यम से स्वीकृत राशि शिक्षा के प्रोत्साहन हेतु अपर्याप्त थी। मैकाले स्मरण पत्र, 1835 द्वारा किसी भी स्थानीय भाषा के समर्थन को पूर्णतः प्रतिबंधित कर दिया गया। अधोमुखी निस्यंदन सिद्धान्त का लक्ष्य केवल कुछ भारतीयों को शिक्षित करना था, जिनसे ब्रिटिश और भारतीय जनता के मध्य एक संपर्क सूत्र के रूप में करने की अपेक्षा की गयी थी। भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम, 1904 ने विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को प्रतिबंधित किया। महिला शिक्षा पर ध्यान नहीं, क्योंकि महिलाये ब्रिटिश की जरूरत को पूरा नहीं करती थी विज्ञानं एंड प्रोधोगिकी की शिक्षा का विकास नहीं हालांकि ब्रिटिश शिक्षा नीति ने कुछ सकारात्मक प्रभाव भी डाले: भारतियों में राष्ट्रीय चेतना का प्रसार हुआ वुड्स डिस्पैच ने शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव को आधार प्रदान किया। भारत में भी तकनीकी और वैज्ञानिक शिक्षा को बढ़ावा मिला। निष्कर्षतः अंग्रेजों द्वारा पाश्चात्य शिक्षा का प्रचार-प्रसार अपने स्वार्थपूर्ति के लिए किया गया जिसमें वे सफल भी हुए परंतु इसके सकारात्मक उद्देश्यों को पूर्णतः अस्वीकार्य नहीं किया जा सकता है।
##Question:भारत में उपनिवेशवाद के दूसरे चरण में कंपनी की शिक्षा नीति का संक्षेप में मूल्यांकन कीजिए। (150-200 शब्द) Briefly evaluate the education policy of the company in the second phase of colonialism in India. (150-200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में कंपनी का भारत में शासन स्थापना कोलिखते हुए उत्तर आरंभ कीजिए। इन प्रयासों का उल्लेख कीजिए। शिक्षा के विकास के पीछे वास्तविक उद्देश्यों का विवरण दीजिये इसके सकारात्मक पक्षों का संक्षिप्त विवरण दीजिए। निष्कर्ष में ब्रिटिश शिक्षा नीति के सम्पूर्ण प्रभावों का समग्र रूप प्रस्तुत कीजिए। बंगाल विजय के पश्चात भारत में कम्पनी का औपचारिक शासन स्थापित होता है तथा वेलेजली की सहायक संधि नीति द्वारा तीव्र विस्तार को प्राप्त किया। ऐसे में कंपनी को प्रशासनिक व्यवस्था हेतु सस्ते भारतीय क्लर्कों की आवश्यकता हुई , जिस परिणाम भारत में शिक्षा विकास हेतु प्रयास किये जाने प्रारंभ हुए। शिक्षा के प्रसार के लिए किए गए प्रमुख प्रयास: 1813 के चार्टर एक्ट के माध्यम से शिक्षा पर प्रतिवर्ष 1 लाख रुपए का व्यय मैकाले स्मरण पत्र द्वारा अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार अधोमुखी निस्यंदन सिद्धांत चार्ल्स वुड्स डिस्पैच हंटर कमेटी अंग्रेजों ने अपनी आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए शिक्षा नीति का विकास किया। आधुनिक शिक्षा नीति के प्रारम्भ का मुख्य उद्देश्य एक ऐसे वर्ग का सृजन करना था जो रक्त और रंग से भारतीय जबकि रुचि, विचार, नैतिकता और बुद्धि से अंग्रेज़ हो। आधुनिक पश्चिमी शिक्षा इस भावना का समावेश करती थी कि वे हीन हैं तथा उन्हे एक विदेशी शक्ति द्वारा शासित होना चाहिए। इस शिक्षा नीति का मूल्यांकन इस प्रकार है: 1813 के चार्टर अधिनियम के माध्यम से स्वीकृत राशि शिक्षा के प्रोत्साहन हेतु अपर्याप्त थी। मैकाले स्मरण पत्र, 1835 द्वारा किसी भी स्थानीय भाषा के समर्थन को पूर्णतः प्रतिबंधित कर दिया गया। अधोमुखी निस्यंदन सिद्धान्त का लक्ष्य केवल कुछ भारतीयों को शिक्षित करना था, जिनसे ब्रिटिश और भारतीय जनता के मध्य एक संपर्क सूत्र के रूप में करने की अपेक्षा की गयी थी। भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम, 1904 ने विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को प्रतिबंधित किया। महिला शिक्षा पर ध्यान नहीं, क्योंकि महिलाये ब्रिटिश की जरूरत को पूरा नहीं करती थी विज्ञानं एंड प्रोधोगिकी की शिक्षा का विकास नहीं हालांकि ब्रिटिश शिक्षा नीति ने कुछ सकारात्मक प्रभाव भी डाले: भारतियों में राष्ट्रीय चेतना का प्रसार हुआ वुड्स डिस्पैच ने शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव को आधार प्रदान किया। भारत में भी तकनीकी और वैज्ञानिक शिक्षा को बढ़ावा मिला। निष्कर्षतः अंग्रेजों द्वारा पाश्चात्य शिक्षा का प्रचार-प्रसार अपने स्वार्थपूर्ति के लिए किया गया जिसमें वे सफल भी हुए परंतु इसके सकारात्मक उद्देश्यों को पूर्णतः अस्वीकार्य नहीं किया जा सकता है।
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वर्ष 2015 मे भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय आय आंकलन विधि मे किए गए संशोधनों की चर्चा कीजिये| इसके साथ ही इन संशोधनों की सीमाओं को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिये ।(150-200 शब्द) Discuss the amendments made in the National Income Assessment method by the Government of India in the year 2015. Along with this, explain the limits of these amendments with examples. (150-200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में राष्ट्रीय आय के आकलन की विधियों की कुछ सीमाएं बताएं 2- प्रथम भाग में, वर्ष 2015 मे भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय आय आंकलन विधि मे किए गए संशोधनों की चर्चा कीजिये 3- दुसरे भाग में इन संशोधनों की सीमाओं को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में सुझावात्मक निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये राष्ट्रीय आय के मापन से राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति आय में होने वाली वृद्धि का विश्लेषण, तुलना करने, भावी आर्थिक नीति का निर्धारण, क्षेत्रीय विकास की समीक्षा तथा क्षेत्रकवार संरचनागत योगदान का विश्लेषण किया जा सकता है। समग्र राष्ट्रीय आय के मापन में आय, व्यय एवं उत्पादन अथवा मूल्यवर्धन विधि का प्रयोग किया जाता है| राष्ट्रीय आय मापन में अनेक समस्याएं सामने आती हैं जैसे सैद्धांतिक समस्याएं विभिन्न अर्थशास्त्रियों के कुछ पर एकमत न होने के कारण होती हैं| व्यावहारिक/सांख्यिकीय समस्याएं अधिकांशतः अल्पविकसित देशों में अधिक प्रभावी रूप में दिखती है| संतोषजनक आंकड़ों की अनुपलब्धता, सटीक आंकड़े न होना, असंगठित क्षेत्र की गतिविधियों का लेखांकन न होना| बाजारेत्तर लेन-देन जैसे वस्तु विनिमय, के कारण लेन-देन का लेखांकन नहीं हो पाता है |व्यावसायिक विशिष्टीकरण का अभाव अर्थात व्यवसायों में अस्थिरता(कभी कोई व्यवसाय कभी कोई) इससे आंकड़ों के संग्रहण एवं उनके वर्गीकरण की समस्या उत्पन्न होती है| इन्ही समस्याओं को देखते हुए वर्ष 2015 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय आय की आकलन विधि में कुछ संशोधन किये हैं| राष्ट्रीय आय के आकलन विधि में संशोधन ये संशोधन, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के राष्ट्रीय खाता प्रणाली (system of national accounts) के मानदंडों के अनुसार 2015 मेंकिये गए हैं राष्ट्रीय आय के आकलन हेतु आधार वर्ष में परिवर्तन किया गया और 2004-05 के स्थान पर 2011-12 के वित्तीय वर्ष को आधार वर्ष बनाया गया|इसके आधार पर आर्थिक वृद्धि दर को स्थिर साधन/कारक लागत पर GDP के स्थान पर स्थिर बाजार मूल्यों पर GDP के रूप में दर्शाया गया| क्षेत्रकवार आर्थिक वृद्धि का आकलन बेसिक कीमतों पर सकल मूल्य वृद्धि(GVA बेसिक प्राइस)के आधार पर की जायेगी आंकड़ों के स्रोतों में विस्तार जैसे बैंक,बीमा कम्पनियाँ, स्टॉक एक्सचेंज, नियामक संस्थान(RBI,SEBI.IRDAI,PFRDA), स्थानीय निकाय (पंचायत/म्युनिसिपलिटी ) तथा MCA 21 के आंकड़ों आदि का समेकन करने से नमूनों के आकार में वृद्धि होगी तो अधिक बेहतर आकलन किया जा सकेगा| IMF के मानदंडों के अनुसार सांख्यिकीय विधियों में परिवर्तन किया गया है| जैसे क्षेत्रवार आर्थिक वृद्धि, आधार मूल्य पर सकल मूल्य वृद्धि (GVA BASIC PRICE) के आधार पर दर्शाई जायेगी नयी विधि में त्रुटियाँ/सीमाएं MCA 21 में क्षेत्रों का वर्गीकरण राष्ट्रीय आय लेखांकन विधि(SNA) के वर्गीकरण से भिन्न है संशोधित विधि के अंतर्गत अनुमान किया गया है कि असंगठित क्षेत्र की वृद्धि दर संगठित क्षेत्र के बराबर ही होगी CSO, MCA 21 के आंकड़ों को पुनर्सत्यापित(क्रॉस चेक) नहीं करता है अतः इससे विभिन्न विवाद उभरे हैं|| सीमाओं से सम्बंधित उदाहरण एवं विवाद नयी विधि के आधार पर आर्थिक वृद्धि दर में तीव्र वृद्धि हुई| पुरानी विधि से वर्ष 2012-13 में वृद्धि दर 4.5% थी जबकि नयी विधि से यह वृद्धि दर 5.1% थी| इसी तरह पुरानी विधि से वर्ष 2013-14 में वृद्धि दर 4.7% थी जबकि नयी विधि से यह वृद्धि दर 6.9% थी| विभिन्न अर्थशास्त्रियों के अनुसार 2013-14 एक आर्थिक संकट वर्ष था| इस वर्ष में, मुद्रास्फीति अधिक थी जिसके कारण RBI ने ब्याजदरों में वृद्धि की थी, बचत निवेश में गिरावट, विदेशी पूँजी आहरण अधिक होने के कारण रूपये का मूल्यह्रास हुआ था, ऐसी स्थिति में भी नयी विधि ने वृद्धि दर्शाई थी नयी विधि ने 2016 की तीसरी तिमाही में किये गए विमुद्रीकरण के समय 7 % की वृद्धि दिखाई, पूरे वित्तीय वर्ष के लिए यह वृद्धि दर 7.1% दिखाई, यह वृद्धि अर्थव्यवस्था पर विमुद्रीकरण के नकारात्मक प्रभावों को स्पष्ट नहीं कर रहा था| नयी विधि में एक्स्ट्रापोलेसन की विधि(पुराने ट्रेंड के आधार पर आगे के लिए अनुमान करना) को अपनाया गया है| जिसके कारण जितनी वृद्धि होनी चाहिए उससे अधिक वृद्धि प्रदर्शित हो रही थी| 2019 में GDP बैक सीरीज डाटा(2015 में किये गए संशोधन के पूर्व वर्षों के आंकड़ों पर नयी विधि के आधार पर GDP का आकलन) के प्रकाशित होने पर पाया गया कि पूर्व वर्षों में नयी विधि से वृद्धि दर अधिक प्राप्त हो रही है| इसकी अर्थशास्त्रियो द्वारा आलोचना की गयी क्योंकि इससे सरकारी आंकड़ों की विश्वसनीयता कम होती है| शैल कंपनियों का मुद्दा आने पर NSSO के सर्वेक्षण में यह स्पष्ट हुआ कि जो कम्पनियाँ MCA 21 में पंजीकृत हैं, उनमें से 15.4 % कम्पनियाँ उपलब्ध नहीं थीं या बंद हो चुकी थीं| इसके साथ ही 21.4 % कम्पनियाँ अपनी वर्गीकृत श्रेणी में नहीं थीं| ऐसी स्थिति में आलोचना की गयी की वृद्धि के आंकड़े वास्तविक स्थिति से अधिक वृद्धि प्रदर्शित कर रह थे| भारत सरकार द्वारा किये गए उपरोक्त संशोधन IMF के SNA द्वारा प्रयुक्त अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों के अनुरूप है| इसके आधार पर भारतीय अर्थव्यवस्था की आर्थिक वृद्धि के संदर्भ में IMF &विश्व बैंक के अनुमान,नई विधि के अनुमानों के अनुरूप हैंनए आंकड़ों के स्रोतों में विस्तार जिससे आंकड़ों के नमूने के आकार बड़ा हुआ है जिससे आंकड़ों की विश्वसनीयता बढती है| फिर भी उपरोक्त मुद्दे संशोधनों की सीमाओं को उजागर करते हैं |अतः सरकार को नयी विधि के संदर्भ में पुनर्समीक्षा के लिए भारतीय एवं IMF के विशेषज्ञों की समिति बनाने की आवश्यकता है|
##Question:वर्ष 2015 मे भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय आय आंकलन विधि मे किए गए संशोधनों की चर्चा कीजिये| इसके साथ ही इन संशोधनों की सीमाओं को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिये ।(150-200 शब्द) Discuss the amendments made in the National Income Assessment method by the Government of India in the year 2015. Along with this, explain the limits of these amendments with examples. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में राष्ट्रीय आय के आकलन की विधियों की कुछ सीमाएं बताएं 2- प्रथम भाग में, वर्ष 2015 मे भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय आय आंकलन विधि मे किए गए संशोधनों की चर्चा कीजिये 3- दुसरे भाग में इन संशोधनों की सीमाओं को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में सुझावात्मक निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये राष्ट्रीय आय के मापन से राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति आय में होने वाली वृद्धि का विश्लेषण, तुलना करने, भावी आर्थिक नीति का निर्धारण, क्षेत्रीय विकास की समीक्षा तथा क्षेत्रकवार संरचनागत योगदान का विश्लेषण किया जा सकता है। समग्र राष्ट्रीय आय के मापन में आय, व्यय एवं उत्पादन अथवा मूल्यवर्धन विधि का प्रयोग किया जाता है| राष्ट्रीय आय मापन में अनेक समस्याएं सामने आती हैं जैसे सैद्धांतिक समस्याएं विभिन्न अर्थशास्त्रियों के कुछ पर एकमत न होने के कारण होती हैं| व्यावहारिक/सांख्यिकीय समस्याएं अधिकांशतः अल्पविकसित देशों में अधिक प्रभावी रूप में दिखती है| संतोषजनक आंकड़ों की अनुपलब्धता, सटीक आंकड़े न होना, असंगठित क्षेत्र की गतिविधियों का लेखांकन न होना| बाजारेत्तर लेन-देन जैसे वस्तु विनिमय, के कारण लेन-देन का लेखांकन नहीं हो पाता है |व्यावसायिक विशिष्टीकरण का अभाव अर्थात व्यवसायों में अस्थिरता(कभी कोई व्यवसाय कभी कोई) इससे आंकड़ों के संग्रहण एवं उनके वर्गीकरण की समस्या उत्पन्न होती है| इन्ही समस्याओं को देखते हुए वर्ष 2015 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय आय की आकलन विधि में कुछ संशोधन किये हैं| राष्ट्रीय आय के आकलन विधि में संशोधन ये संशोधन, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के राष्ट्रीय खाता प्रणाली (system of national accounts) के मानदंडों के अनुसार 2015 मेंकिये गए हैं राष्ट्रीय आय के आकलन हेतु आधार वर्ष में परिवर्तन किया गया और 2004-05 के स्थान पर 2011-12 के वित्तीय वर्ष को आधार वर्ष बनाया गया|इसके आधार पर आर्थिक वृद्धि दर को स्थिर साधन/कारक लागत पर GDP के स्थान पर स्थिर बाजार मूल्यों पर GDP के रूप में दर्शाया गया| क्षेत्रकवार आर्थिक वृद्धि का आकलन बेसिक कीमतों पर सकल मूल्य वृद्धि(GVA बेसिक प्राइस)के आधार पर की जायेगी आंकड़ों के स्रोतों में विस्तार जैसे बैंक,बीमा कम्पनियाँ, स्टॉक एक्सचेंज, नियामक संस्थान(RBI,SEBI.IRDAI,PFRDA), स्थानीय निकाय (पंचायत/म्युनिसिपलिटी ) तथा MCA 21 के आंकड़ों आदि का समेकन करने से नमूनों के आकार में वृद्धि होगी तो अधिक बेहतर आकलन किया जा सकेगा| IMF के मानदंडों के अनुसार सांख्यिकीय विधियों में परिवर्तन किया गया है| जैसे क्षेत्रवार आर्थिक वृद्धि, आधार मूल्य पर सकल मूल्य वृद्धि (GVA BASIC PRICE) के आधार पर दर्शाई जायेगी नयी विधि में त्रुटियाँ/सीमाएं MCA 21 में क्षेत्रों का वर्गीकरण राष्ट्रीय आय लेखांकन विधि(SNA) के वर्गीकरण से भिन्न है संशोधित विधि के अंतर्गत अनुमान किया गया है कि असंगठित क्षेत्र की वृद्धि दर संगठित क्षेत्र के बराबर ही होगी CSO, MCA 21 के आंकड़ों को पुनर्सत्यापित(क्रॉस चेक) नहीं करता है अतः इससे विभिन्न विवाद उभरे हैं|| सीमाओं से सम्बंधित उदाहरण एवं विवाद नयी विधि के आधार पर आर्थिक वृद्धि दर में तीव्र वृद्धि हुई| पुरानी विधि से वर्ष 2012-13 में वृद्धि दर 4.5% थी जबकि नयी विधि से यह वृद्धि दर 5.1% थी| इसी तरह पुरानी विधि से वर्ष 2013-14 में वृद्धि दर 4.7% थी जबकि नयी विधि से यह वृद्धि दर 6.9% थी| विभिन्न अर्थशास्त्रियों के अनुसार 2013-14 एक आर्थिक संकट वर्ष था| इस वर्ष में, मुद्रास्फीति अधिक थी जिसके कारण RBI ने ब्याजदरों में वृद्धि की थी, बचत निवेश में गिरावट, विदेशी पूँजी आहरण अधिक होने के कारण रूपये का मूल्यह्रास हुआ था, ऐसी स्थिति में भी नयी विधि ने वृद्धि दर्शाई थी नयी विधि ने 2016 की तीसरी तिमाही में किये गए विमुद्रीकरण के समय 7 % की वृद्धि दिखाई, पूरे वित्तीय वर्ष के लिए यह वृद्धि दर 7.1% दिखाई, यह वृद्धि अर्थव्यवस्था पर विमुद्रीकरण के नकारात्मक प्रभावों को स्पष्ट नहीं कर रहा था| नयी विधि में एक्स्ट्रापोलेसन की विधि(पुराने ट्रेंड के आधार पर आगे के लिए अनुमान करना) को अपनाया गया है| जिसके कारण जितनी वृद्धि होनी चाहिए उससे अधिक वृद्धि प्रदर्शित हो रही थी| 2019 में GDP बैक सीरीज डाटा(2015 में किये गए संशोधन के पूर्व वर्षों के आंकड़ों पर नयी विधि के आधार पर GDP का आकलन) के प्रकाशित होने पर पाया गया कि पूर्व वर्षों में नयी विधि से वृद्धि दर अधिक प्राप्त हो रही है| इसकी अर्थशास्त्रियो द्वारा आलोचना की गयी क्योंकि इससे सरकारी आंकड़ों की विश्वसनीयता कम होती है| शैल कंपनियों का मुद्दा आने पर NSSO के सर्वेक्षण में यह स्पष्ट हुआ कि जो कम्पनियाँ MCA 21 में पंजीकृत हैं, उनमें से 15.4 % कम्पनियाँ उपलब्ध नहीं थीं या बंद हो चुकी थीं| इसके साथ ही 21.4 % कम्पनियाँ अपनी वर्गीकृत श्रेणी में नहीं थीं| ऐसी स्थिति में आलोचना की गयी की वृद्धि के आंकड़े वास्तविक स्थिति से अधिक वृद्धि प्रदर्शित कर रह थे| भारत सरकार द्वारा किये गए उपरोक्त संशोधन IMF के SNA द्वारा प्रयुक्त अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों के अनुरूप है| इसके आधार पर भारतीय अर्थव्यवस्था की आर्थिक वृद्धि के संदर्भ में IMF &विश्व बैंक के अनुमान,नई विधि के अनुमानों के अनुरूप हैंनए आंकड़ों के स्रोतों में विस्तार जिससे आंकड़ों के नमूने के आकार बड़ा हुआ है जिससे आंकड़ों की विश्वसनीयता बढती है| फिर भी उपरोक्त मुद्दे संशोधनों की सीमाओं को उजागर करते हैं |अतः सरकार को नयी विधि के संदर्भ में पुनर्समीक्षा के लिए भारतीय एवं IMF के विशेषज्ञों की समिति बनाने की आवश्यकता है|
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वाणिज्यिक बैंको के कार्य एवं विस्तार का संक्षिप्त परिचय दीजिये | साथ ही मुद्रा निर्माण की प्रक्रिया का उल्लेख कीजिये | (150-200 शब्द) Give a brief introduction to the work and expansion of commercial banks. Also mention the process of money creation. (150-200 words)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत वाणिज्यिक बैंको के कार्य एवं विस्तार का वर्णन करते हुए कीजिये | इसके पश्चात मुद्रा निर्माण की प्रक्रिया को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - वाणिज्यिक बैंकों का विस्तार एवं कार्य तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं ने ऐसे मध्यस्थों को जन्म दियाजो विनिमय पत्र के लेन देन द्वारा न सिर्फ अपने लिए आय के स्रोत बना रहे थे अपितु साथ-ही साथ अर्थव्यवस्थाओं को प्रेरित भी कर रहे थे | क्योंकि वे विभिन्न सन्दर्भों में पूँजी निर्माण में सहायक थे | इन वाणिज्यिक बैंकों के कार्य में मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं- धन राशियों को जमा करना जो चालू खाता, बचत खाता या मियादी जमा के रूप में हो सकता है | चालू खाता एवं बचत खाता में जमा धन राशि कभी भी ग्राहक द्वारा मांगी जा सकती है, इसीलिए इन्हें डिमांड डिपोजिट कहा जाता है | ऋण उपलब्ध कराना -जिसके अंतर्गत ये संस्थाएं दीर्घकालिक, अल्पकालिक तथा डिमांड लोन, के अंतर्गत ऋण उपलब्ध कराते हैं | यद्यपि चालू खातों में कोई ब्याज नहीं दिया जाता किन्तु ओवरड्राफ्टिंग की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है | बचत खातों में जमाकर्ताओं को ब्याज दिया जाता है तथा दिए गए ऋण पर ब्याज लिया जाता है | इन दोनों के अंतर को स्प्रेड कहा जाता है | डिस्काउंटेड विनिमय पत्र का भुगतान - इसके अंतर्गत किसी भी प्रकार के विनिमय पत्र को बैंक स्वीकार करते हुए समबन्धित व्यक्ति को कुछ दंड शुल्क काटकर मुद्रा उपलब्ध करा सकता है | इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार की मुद्रा संबंधी सुविधाओं को सुनिश्चित करना भी इन बैंकों का कार्य है | बड़े व्यापारिक लेन-देन में बैंक अपने ग्राहकों को लेटर ऑफ क्रेडिट जारी करते हैं, जिससे उन्हें कहीं भी व्यापार करने में आसानी होती है | NEFT, RTGS जैसी सेवाओं के माध्यम से बैंक रियल टाइम में एक बड़ी धनराशि का आदान-प्रदान कर सकती है | आदि मुद्रा निर्माण मुद्रा निर्माण से तात्पर्य किसी अर्थव्यवस्था में मुद्रा के विस्तारण से है | जो इस बात पर निर्भर करता है कि मुद्रा का अर्थव्यवस्था में किस प्रकार संचालन हो रहा है | डिमांड डिपोजिट की आवश्यकताओं की पूर्ति करने हेतु हर एक देश की बैंकिंग व्यवस्था में एक निश्चित वैधानिक आरक्षित अनुपात(LRR) होता है | अतः यदि यह अनुपात कम हो तो बैंकिंग व्यवस्था में मुद्रा का संचालन तेजी से हो रहा होता है, जिससे और मुद्रा निर्मित हो रही होती है | मुद्रा गुणज से तात्पर्य मुद्रा निर्माण के इसी घटक से है, अतः किसी भी बैंकिंग व्यवस्था में मुद्रा निर्माण, मुद्रा गुणक का प्रतिफल होता है | मुद्रा गुणक एवं वैधानिक आरक्षित अनुपात एवं मुद्रा गुणक व्युत्क्रमानुपाती होते हैं | मुद्रा गुणक = 1/LRR उपरोक्त सन्दर्भ में स्पष्ट है कि देश की अर्थवयवस्था में मुद्रा गुणज के साथ मुद्रा निर्माण अपनी प्रमुख भूमिका निभाता है |
##Question:वाणिज्यिक बैंको के कार्य एवं विस्तार का संक्षिप्त परिचय दीजिये | साथ ही मुद्रा निर्माण की प्रक्रिया का उल्लेख कीजिये | (150-200 शब्द) Give a brief introduction to the work and expansion of commercial banks. Also mention the process of money creation. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत वाणिज्यिक बैंको के कार्य एवं विस्तार का वर्णन करते हुए कीजिये | इसके पश्चात मुद्रा निर्माण की प्रक्रिया को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - वाणिज्यिक बैंकों का विस्तार एवं कार्य तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं ने ऐसे मध्यस्थों को जन्म दियाजो विनिमय पत्र के लेन देन द्वारा न सिर्फ अपने लिए आय के स्रोत बना रहे थे अपितु साथ-ही साथ अर्थव्यवस्थाओं को प्रेरित भी कर रहे थे | क्योंकि वे विभिन्न सन्दर्भों में पूँजी निर्माण में सहायक थे | इन वाणिज्यिक बैंकों के कार्य में मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं- धन राशियों को जमा करना जो चालू खाता, बचत खाता या मियादी जमा के रूप में हो सकता है | चालू खाता एवं बचत खाता में जमा धन राशि कभी भी ग्राहक द्वारा मांगी जा सकती है, इसीलिए इन्हें डिमांड डिपोजिट कहा जाता है | ऋण उपलब्ध कराना -जिसके अंतर्गत ये संस्थाएं दीर्घकालिक, अल्पकालिक तथा डिमांड लोन, के अंतर्गत ऋण उपलब्ध कराते हैं | यद्यपि चालू खातों में कोई ब्याज नहीं दिया जाता किन्तु ओवरड्राफ्टिंग की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है | बचत खातों में जमाकर्ताओं को ब्याज दिया जाता है तथा दिए गए ऋण पर ब्याज लिया जाता है | इन दोनों के अंतर को स्प्रेड कहा जाता है | डिस्काउंटेड विनिमय पत्र का भुगतान - इसके अंतर्गत किसी भी प्रकार के विनिमय पत्र को बैंक स्वीकार करते हुए समबन्धित व्यक्ति को कुछ दंड शुल्क काटकर मुद्रा उपलब्ध करा सकता है | इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार की मुद्रा संबंधी सुविधाओं को सुनिश्चित करना भी इन बैंकों का कार्य है | बड़े व्यापारिक लेन-देन में बैंक अपने ग्राहकों को लेटर ऑफ क्रेडिट जारी करते हैं, जिससे उन्हें कहीं भी व्यापार करने में आसानी होती है | NEFT, RTGS जैसी सेवाओं के माध्यम से बैंक रियल टाइम में एक बड़ी धनराशि का आदान-प्रदान कर सकती है | आदि मुद्रा निर्माण मुद्रा निर्माण से तात्पर्य किसी अर्थव्यवस्था में मुद्रा के विस्तारण से है | जो इस बात पर निर्भर करता है कि मुद्रा का अर्थव्यवस्था में किस प्रकार संचालन हो रहा है | डिमांड डिपोजिट की आवश्यकताओं की पूर्ति करने हेतु हर एक देश की बैंकिंग व्यवस्था में एक निश्चित वैधानिक आरक्षित अनुपात(LRR) होता है | अतः यदि यह अनुपात कम हो तो बैंकिंग व्यवस्था में मुद्रा का संचालन तेजी से हो रहा होता है, जिससे और मुद्रा निर्मित हो रही होती है | मुद्रा गुणज से तात्पर्य मुद्रा निर्माण के इसी घटक से है, अतः किसी भी बैंकिंग व्यवस्था में मुद्रा निर्माण, मुद्रा गुणक का प्रतिफल होता है | मुद्रा गुणक एवं वैधानिक आरक्षित अनुपात एवं मुद्रा गुणक व्युत्क्रमानुपाती होते हैं | मुद्रा गुणक = 1/LRR उपरोक्त सन्दर्भ में स्पष्ट है कि देश की अर्थवयवस्था में मुद्रा गुणज के साथ मुद्रा निर्माण अपनी प्रमुख भूमिका निभाता है |
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राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना, 2016 के प्रमुख बिंदुओं पर चर्चा कीजिये| साथ ही,राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का महत्त्व तथा उसकी कमियों पर भी प्रकाश डालिए| (150-200 शब्द, 10 अंक) Discuss the major points of National Disaster Management Plan, 2016. Also, highlight the importance and shortcomings of the National Disaster Management Plan. (150-200 words, 10 Marks)
एप्रोच- आपदाओं के प्रति भारत की सुभेद्यता एवं इस संबंध में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना, 2016 की पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में,राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना, 2016 के प्रमुख बिंदुओं पर चर्चा कीजिये| अगले भाग में,राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का महत्त्व बताईये| अंतिम भाग में,राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना की कमियों पर प्रकाश डालिए| इस संदर्भ में आगे की राह बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- भारत एक भौगोलिक रूप से विविधता भरा देश है जिसमें हिमालय जैसे विशाल पर्वतश्रृंखला भी विद्यमान है वहीँ लंबी समुद्र तट की उपस्थिति भी है| विशाल मैदानी भागों के साथ रेगिस्तान एवं पठारीय विशाल क्षेत्रफल भी मौजूद है| इतनी ज्यादा भौगोलिक विविधता इसे आपदाओं के प्रति और ज्यादा सुभेद्य बना देता है| इस संदर्भ में भारत सरकार ने पहली बार 2016 में अपनी प्रथमराष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना को जारी किया था| इसे व्यापक रूप से आपदा जोखिम न्यूनीकरण हेतु सेन्डाई फ्रेमवर्क, सत्तत विकास लक्ष्य 2015-30 एवं कोप-21 में जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते में निर्धारित लक्ष्यों और प्राथमिकताओं के अनुसार सूत्रबद्ध किया गया है| इस योजना का विजन प्रशासन के सभी स्तरों एवं समुदायों के मध्य आपदाओं से निपटने की क्षमता को अधिकतम कर, भारत को आपदा प्रत्यास्थ बनाना, आपदा जोखिम न्यूनीकरण उपलब्धि प्राप्त करना तथा जीवन, आजीविकाओं और आर्थिक, शारीरिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं पर्यावरणीय परिसंपत्तियों की हानि को न्यूनतम करना है| राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना के प्रमुख बिंदु प्रत्येक संकट के आपदा जोखिम न्यूनीकरण के फ्रेमवर्क सेन्डाई फ्रेमवर्क के 4 घोषित प्राथमिकताओं को शामिल करना; आपदा जोखिम न्यूनीकरण के 5 कार्यक्षेत्र जोखिम को समझना; एजेंसियों के मध्य में समन्वय; संरचनात्मक उपाय- आपदा जोखिम न्यूनीकरण में निवेश; गैर-संरचनात्मक उपाय- आपदा जोखिम न्यूनीकरण में निवेश; क्षमता विकास; आपदा प्रबंधन के सभी चरणों(रोकथाम, शमन, अनुक्रिया और सामान्य स्थिति की बहाली) तथा मानवजनित आपदाओं जैसे- रासायानिक, नाभिकीय आदि को कवर करना; आपदाओं से निपटने हेतु लघु(5 वर्ष), मध्यम(10 वर्ष) तथा दीर्घ(15 वर्ष) योजनाओं की परिकल्पना; सुस्पष्ट भूमिका के साथ एकीकृत दृष्टिकोण सभी सरकारी एजेंसियों/विभागों के मध्य क्षैतिज तथा ऊर्ध्वाधर एकीकरण; मैट्रिक्स प्रारूप में पंचायत और शहरी स्थानीय निकाय स्तर तक सरकार के सभी स्तरों की भूमिकाएं और उत्तरदायित्व निर्धारित करना; विभिन्न मंत्रालयों को विशिष्ट आपदाओं हेतु भूमिका सौंपा जाना जैसे- चक्रवातों से संबंधित उत्तरदायित्व पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय को सौंपा जाना; दृष्टिकोण क्षेत्रीय जिससे आपदा प्रबंधन एवं विकास योजना के निर्माण में भी सहायता; आपदा प्रबंधन के सभी चरणों(रोकथाम, शमन, अनुक्रिया और सामान्य स्थिति की बहाली) में मापनीय रूप से क्रियान्वयन; प्रमुख गतिविधियों की पहचान आपदा के प्रति अनुक्रिया करने वाली एजेंसियों हेतु चेकलिस्ट के रूप में उपयोग किये जाने के लिए पूर्व चेतावनी, सूचना प्रसार, चिकित्सा देखभाल, ईंधन, परिवहन, खोज और बचाव, फंसे हुए लोगों को बाहर निकालना आदि प्रमुख गतिविधियों की पहचान; सामान्य स्थिति की बहाली हेतु सामान्यीकृत ढ़ांचा प्रदान करना; स्थिति का आकलन करना एवं पुनर्निर्माण में लचीलापन; सूचना एवं मीडिया विनियमन समुदायों को आपदाओं से निपटने हेतु तैयार करने के लिए सूचना, शिक्षा और संप्रेषण कार्यकलापों की आवश्यकता पर अत्यधिक बल; आपदाओं की कवरेज के लिए नैतिक दिशानिर्देशों एवं स्व-नियमन का निर्देश; अफवाहों एवं दशहत के प्रसार को रोकने के उद्देश्य से अधिकारियों को नियमित रूप से मीडिया ब्रीफिंग कार्यक्रम तय करने तथा इस संबंध में एक नोडल अधिकारी को नामित करने का निर्देश; प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण एवं सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय प्रणालियों को समाविष्ट करने पर ध्यान केंद्रण; राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का महत्त्व सरकारी एजेंसियों को आपदा प्रबंधन चक्र के सभी चरणों के लिए रुपरेखा तथा दिशानिर्देश प्रदान करना; उत्तरदायित्व संबंधित रुपरेखा तथा अस्पष्टता को दूर करने का प्रयास; यह निर्दिष्ट करना कि आपदा प्रबंधन के विभिन्न चरणों में कौन किस कार्य के लिए उत्तरदायी है| देश के किसी भी भाग में आपातस्थिति की अनुक्रिया में सक्रीय होने हेतु सदैव तैयार; आपदा प्रबंधन के सभी चरणों में आवश्यकतानुसार लचीले एवं मापनीय तरीके से क्रियान्वयन; राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना की कमियां स्पष्ट तथा व्यवहारिक रोडमैप बनाने में असफल; केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा आपदा जोखिम शमन, तैयारी, अनुक्रिया, सामान्य स्थिति की बहाली, पुनःनिर्माण और शासन हेतु अपनाई जाने वाली कार्यप्रणालियों की पहचान करने का तरीका अत्यंत सामान्य; इन कार्यप्रणालियों के निष्पादन हेतु कोई समयसीमा तय नहीं; इन प्रणालियों के संचालन हेतु वांछित निधि का मुद्दा; निधि संग्रहण के तरीके में अस्पष्टता; योजना की निगरानी तथा मूल्यांकन हेतु कोई फ्रेमवर्क प्रदान नहीं करना; सेन्डाई फ्रेमवर्क तथा सतत विकास लक्ष्यों के समान इस योजना के तहत कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं करना; सेन्डाई लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में अस्पष्टता; राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना के संदर्भ में आगे की राह ज्ञान नेटवर्क्स को प्रोत्साहन तथा समेकन; ज्यादा प्रभावी एवं तैयारी युक्त, शमन तथा अनुक्रिया हेतु आपदा स्वंयसेवकों(NCC, NSS, स्काउट्स एंड गाइड्स, NYK, सिविल डिफेंस, होमगार्ड आदि) को लामबंद तथा प्रशिक्षित करना; सुभेद्यता को तेजी से कम करने हेतु क्षमता निर्माण को प्रोत्साहन; आपदा के संदर्भ में तैयारी, शमन तथा अनुक्रिया हेतु सर्वोत्तम प्रैक्टिसेज से सीख लेना; आपदा जोखिम न्यूनीकरण(DRR) तथा जलवायु परिवर्तन एडोप्टेशन(CCA) दोनों के मध्य एकीकरण; सतत विकास लक्ष्य(2015-30), जलवायु परिवर्तन संबंधित पेरिस समझौता(2015) तथा सेन्डाई फ्रेमवर्क के मध्य सहयोग; अतः राष्ट्रीय योजना के साथ-साथ आपदा प्रत्यास्थता हेतु स्पष्ट लक्ष्यों, उद्देश्यों, समय सीमाओं तथा इसके कार्यान्वयन में संसाधनों के उपयोग हेतु एक राष्ट्रीय कार्ययोजना का प्रावधान किया जाना चाहिए|
##Question:राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना, 2016 के प्रमुख बिंदुओं पर चर्चा कीजिये| साथ ही,राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का महत्त्व तथा उसकी कमियों पर भी प्रकाश डालिए| (150-200 शब्द, 10 अंक) Discuss the major points of National Disaster Management Plan, 2016. Also, highlight the importance and shortcomings of the National Disaster Management Plan. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:एप्रोच- आपदाओं के प्रति भारत की सुभेद्यता एवं इस संबंध में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना, 2016 की पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में,राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना, 2016 के प्रमुख बिंदुओं पर चर्चा कीजिये| अगले भाग में,राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का महत्त्व बताईये| अंतिम भाग में,राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना की कमियों पर प्रकाश डालिए| इस संदर्भ में आगे की राह बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- भारत एक भौगोलिक रूप से विविधता भरा देश है जिसमें हिमालय जैसे विशाल पर्वतश्रृंखला भी विद्यमान है वहीँ लंबी समुद्र तट की उपस्थिति भी है| विशाल मैदानी भागों के साथ रेगिस्तान एवं पठारीय विशाल क्षेत्रफल भी मौजूद है| इतनी ज्यादा भौगोलिक विविधता इसे आपदाओं के प्रति और ज्यादा सुभेद्य बना देता है| इस संदर्भ में भारत सरकार ने पहली बार 2016 में अपनी प्रथमराष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना को जारी किया था| इसे व्यापक रूप से आपदा जोखिम न्यूनीकरण हेतु सेन्डाई फ्रेमवर्क, सत्तत विकास लक्ष्य 2015-30 एवं कोप-21 में जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते में निर्धारित लक्ष्यों और प्राथमिकताओं के अनुसार सूत्रबद्ध किया गया है| इस योजना का विजन प्रशासन के सभी स्तरों एवं समुदायों के मध्य आपदाओं से निपटने की क्षमता को अधिकतम कर, भारत को आपदा प्रत्यास्थ बनाना, आपदा जोखिम न्यूनीकरण उपलब्धि प्राप्त करना तथा जीवन, आजीविकाओं और आर्थिक, शारीरिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं पर्यावरणीय परिसंपत्तियों की हानि को न्यूनतम करना है| राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना के प्रमुख बिंदु प्रत्येक संकट के आपदा जोखिम न्यूनीकरण के फ्रेमवर्क सेन्डाई फ्रेमवर्क के 4 घोषित प्राथमिकताओं को शामिल करना; आपदा जोखिम न्यूनीकरण के 5 कार्यक्षेत्र जोखिम को समझना; एजेंसियों के मध्य में समन्वय; संरचनात्मक उपाय- आपदा जोखिम न्यूनीकरण में निवेश; गैर-संरचनात्मक उपाय- आपदा जोखिम न्यूनीकरण में निवेश; क्षमता विकास; आपदा प्रबंधन के सभी चरणों(रोकथाम, शमन, अनुक्रिया और सामान्य स्थिति की बहाली) तथा मानवजनित आपदाओं जैसे- रासायानिक, नाभिकीय आदि को कवर करना; आपदाओं से निपटने हेतु लघु(5 वर्ष), मध्यम(10 वर्ष) तथा दीर्घ(15 वर्ष) योजनाओं की परिकल्पना; सुस्पष्ट भूमिका के साथ एकीकृत दृष्टिकोण सभी सरकारी एजेंसियों/विभागों के मध्य क्षैतिज तथा ऊर्ध्वाधर एकीकरण; मैट्रिक्स प्रारूप में पंचायत और शहरी स्थानीय निकाय स्तर तक सरकार के सभी स्तरों की भूमिकाएं और उत्तरदायित्व निर्धारित करना; विभिन्न मंत्रालयों को विशिष्ट आपदाओं हेतु भूमिका सौंपा जाना जैसे- चक्रवातों से संबंधित उत्तरदायित्व पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय को सौंपा जाना; दृष्टिकोण क्षेत्रीय जिससे आपदा प्रबंधन एवं विकास योजना के निर्माण में भी सहायता; आपदा प्रबंधन के सभी चरणों(रोकथाम, शमन, अनुक्रिया और सामान्य स्थिति की बहाली) में मापनीय रूप से क्रियान्वयन; प्रमुख गतिविधियों की पहचान आपदा के प्रति अनुक्रिया करने वाली एजेंसियों हेतु चेकलिस्ट के रूप में उपयोग किये जाने के लिए पूर्व चेतावनी, सूचना प्रसार, चिकित्सा देखभाल, ईंधन, परिवहन, खोज और बचाव, फंसे हुए लोगों को बाहर निकालना आदि प्रमुख गतिविधियों की पहचान; सामान्य स्थिति की बहाली हेतु सामान्यीकृत ढ़ांचा प्रदान करना; स्थिति का आकलन करना एवं पुनर्निर्माण में लचीलापन; सूचना एवं मीडिया विनियमन समुदायों को आपदाओं से निपटने हेतु तैयार करने के लिए सूचना, शिक्षा और संप्रेषण कार्यकलापों की आवश्यकता पर अत्यधिक बल; आपदाओं की कवरेज के लिए नैतिक दिशानिर्देशों एवं स्व-नियमन का निर्देश; अफवाहों एवं दशहत के प्रसार को रोकने के उद्देश्य से अधिकारियों को नियमित रूप से मीडिया ब्रीफिंग कार्यक्रम तय करने तथा इस संबंध में एक नोडल अधिकारी को नामित करने का निर्देश; प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण एवं सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय प्रणालियों को समाविष्ट करने पर ध्यान केंद्रण; राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का महत्त्व सरकारी एजेंसियों को आपदा प्रबंधन चक्र के सभी चरणों के लिए रुपरेखा तथा दिशानिर्देश प्रदान करना; उत्तरदायित्व संबंधित रुपरेखा तथा अस्पष्टता को दूर करने का प्रयास; यह निर्दिष्ट करना कि आपदा प्रबंधन के विभिन्न चरणों में कौन किस कार्य के लिए उत्तरदायी है| देश के किसी भी भाग में आपातस्थिति की अनुक्रिया में सक्रीय होने हेतु सदैव तैयार; आपदा प्रबंधन के सभी चरणों में आवश्यकतानुसार लचीले एवं मापनीय तरीके से क्रियान्वयन; राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना की कमियां स्पष्ट तथा व्यवहारिक रोडमैप बनाने में असफल; केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा आपदा जोखिम शमन, तैयारी, अनुक्रिया, सामान्य स्थिति की बहाली, पुनःनिर्माण और शासन हेतु अपनाई जाने वाली कार्यप्रणालियों की पहचान करने का तरीका अत्यंत सामान्य; इन कार्यप्रणालियों के निष्पादन हेतु कोई समयसीमा तय नहीं; इन प्रणालियों के संचालन हेतु वांछित निधि का मुद्दा; निधि संग्रहण के तरीके में अस्पष्टता; योजना की निगरानी तथा मूल्यांकन हेतु कोई फ्रेमवर्क प्रदान नहीं करना; सेन्डाई फ्रेमवर्क तथा सतत विकास लक्ष्यों के समान इस योजना के तहत कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं करना; सेन्डाई लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में अस्पष्टता; राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना के संदर्भ में आगे की राह ज्ञान नेटवर्क्स को प्रोत्साहन तथा समेकन; ज्यादा प्रभावी एवं तैयारी युक्त, शमन तथा अनुक्रिया हेतु आपदा स्वंयसेवकों(NCC, NSS, स्काउट्स एंड गाइड्स, NYK, सिविल डिफेंस, होमगार्ड आदि) को लामबंद तथा प्रशिक्षित करना; सुभेद्यता को तेजी से कम करने हेतु क्षमता निर्माण को प्रोत्साहन; आपदा के संदर्भ में तैयारी, शमन तथा अनुक्रिया हेतु सर्वोत्तम प्रैक्टिसेज से सीख लेना; आपदा जोखिम न्यूनीकरण(DRR) तथा जलवायु परिवर्तन एडोप्टेशन(CCA) दोनों के मध्य एकीकरण; सतत विकास लक्ष्य(2015-30), जलवायु परिवर्तन संबंधित पेरिस समझौता(2015) तथा सेन्डाई फ्रेमवर्क के मध्य सहयोग; अतः राष्ट्रीय योजना के साथ-साथ आपदा प्रत्यास्थता हेतु स्पष्ट लक्ष्यों, उद्देश्यों, समय सीमाओं तथा इसके कार्यान्वयन में संसाधनों के उपयोग हेतु एक राष्ट्रीय कार्ययोजना का प्रावधान किया जाना चाहिए|
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राष्ट्रीय आय लेखांकन प्रणाली में किए गए परिवर्तनों की चर्चा कीजिये। इसके सकारात्मक तत्वों की चर्चा करते हुए संबन्धित मुद्दों को रेखांकित कीजिए। (150-200 शब्द) Discuss the changes made in the national income accounting system. While discussing its positive elements, outline the related issues. (150-200 words)
Approach : संक्षिप्त में राष्ट्रीय आय लेखांकन की चर्चा करते हुए उत्तर की शुरुवात कर सकते हैं। भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय आय लेखांकन में किए गए बदलावों की चर्चा कीजिए। इसके सकारात्मक तत्वों को रेखांकित कीजिए। इससे संबन्धित मुद्दों की चर्चा कीजिए। इन सुधारों के महत्व को दर्शाते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर -राष्ट्रीय आय लेखांकन का तात्पर्य उन विधियों या तकनीकों से है जिनका उपयोग किसी भी अर्थव्यवस्था के समग्र रूप से आर्थिक गतिविधियों के मापन के लिए होता है। भारत मेंराष्ट्रीय आय लेखांकन में निहित कमियों को दूर करने के लिए इस दिशा में महत्वपूर्ण सुधार करते हुए कुछ परिवर्तन किए गए। राष्ट्रीय आय लेखांकन विधि में संशोधन यह संशोधन IMF की राष्ट्रीय लेखा प्रणाली(System of national accouunts) केअनुसार किया गया राष्ट्रीय आय लेखांकन हेतु आधार वर्ष 2004-05 के स्थान पर 2011-12 किया गया। अर्थव्यवस्था की आर्थिक वृद्धि दर GDP- स्थिर मूल्यों के स्थान पर GDP-बाज़ार मूल्य पर दर्शाया जाएगा। नई विधि के अंतर्गत निम्नलिखित आंकड़ों के स्रोतों को सम्मिलित किया गया है।स्थानीय निकाय जैसे की पंचायत, नगरपालिका नियामक संस्थान - जैसे आरबीआई, सेबी, IRDAI MCA - 21 नई विधि के अंतर्गत असंगठित क्षेत्र की वृद्धि दर, संगठित क्षेत्र की वृद्धि दर के समान माना गया है। इसकी आवश्यकता का यह कारण है कि असंगठित क्षेत्र के आंकड़े नियमित समयावधि में उपलब्ध नहीं होते। असंगठित क्षेत्र के आंकड़ों का प्रथम स्रोत समय समय पर किए जाने वाले NSSO के सर्वेक्षण होते हैं। क्षेत्रवार वृद्धि दर सकल मूल्य वृद्धि - आधार मूल्य पर आकलित की जाएगी। नई विधि के सकारात्मक पहलू यह प्रणाली UNO/अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों पर आधारित है। भारत की आर्थिक वृद्धि के IMF एवं विश्व बैंक के अनुमान, नई विधि के अंतर्गत आर्थिक वृद्धि के समान हैं नई विधि के अंतर्गत आंकड़ों के नए स्रोत सम्मिलित करने से आंकड़ों के नमूने का आकार बढ़ा है। जिससे उनकी विश्वसनीयता बढ़ी है। नई विधि में मूल्य वर्धन की अवधारणा सम्मिलित करने से इसमें सैद्धांतिक सुधार हुआ है। नई विधि से संबन्धित विवाद/ संबन्धित मुद्दे वृद्धि दर में बढ़ोतरी - 2013 में वृद्धि दर 4.5% तथा 2013-14 में 4.7% थी। नई विधि अपनानाने से यह वृद्धि दरें बढ़ कर क्रमश: 5.1% तथा 6.9% हो गयी। विमौद्रिकरण के कारण आर्थिक संवृद्धि में कमी आनी चाहिए थी किन्तु आर्थिक वृद्धित में कमी देखने को नहीं मिली। जिसका प्रमुख कारण विमौद्रिकरण का प्रभाव असंगठित क्षेत्र पर बहुत अधिक देखने को मिला जबकि असंगठित क्षेत्र से जुड़े डाटा का अभाव देखने को मिलता है। GDP श्रंखला के पिछले आंकड़े – नई विधि के अनुसार पिछले वर्षों के आंकड़ों के आधार पर जीडीपी का आकलन शेल कंपनियों का मुद्दा - NSSO के सर्वेक्षण में यह पाया गया कि जो कंपनियाँ MCA-21 में पंजीकृत हैं उनमें से 16.4% कंपनियाँ उपलब्ध नहीं थी या बंद हो चुकी थी एवं 21.4% कंपनियों का वर्गीकरण उपयुक्त नहीं था। MCA- 21 से संबन्धित समस्याएँ – CSO MCA-21 के आंकड़ों को पुनर्सत्यापित नहीं करता। MCA-21 के अंतर्गत क्षेत्रों का वर्गीकरण राष्ट्रीय लेखांकन प्रणाली (SNA) के वर्गीकरण से भिन्न है। डॉ अरविंद सुब्रण्यम का शोध पत्र – इस शोध पत्र में भारत की आर्थिक वृद्धि को 4.5% बताया गया। राष्ट्रीय आय लेखांकन की वर्तमान प्रणाली अब वैश्विक मानदंडों के अधिक करीब है। साथ ही इसने डाटा बेस को भी विस्तृत किया है। नयी प्रणाली ने भारतीय अर्थव्यवस्था में लेखांकन को और प्रभावी बनाने का प्रयास किया है।
##Question:राष्ट्रीय आय लेखांकन प्रणाली में किए गए परिवर्तनों की चर्चा कीजिये। इसके सकारात्मक तत्वों की चर्चा करते हुए संबन्धित मुद्दों को रेखांकित कीजिए। (150-200 शब्द) Discuss the changes made in the national income accounting system. While discussing its positive elements, outline the related issues. (150-200 words)##Answer:Approach : संक्षिप्त में राष्ट्रीय आय लेखांकन की चर्चा करते हुए उत्तर की शुरुवात कर सकते हैं। भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय आय लेखांकन में किए गए बदलावों की चर्चा कीजिए। इसके सकारात्मक तत्वों को रेखांकित कीजिए। इससे संबन्धित मुद्दों की चर्चा कीजिए। इन सुधारों के महत्व को दर्शाते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर -राष्ट्रीय आय लेखांकन का तात्पर्य उन विधियों या तकनीकों से है जिनका उपयोग किसी भी अर्थव्यवस्था के समग्र रूप से आर्थिक गतिविधियों के मापन के लिए होता है। भारत मेंराष्ट्रीय आय लेखांकन में निहित कमियों को दूर करने के लिए इस दिशा में महत्वपूर्ण सुधार करते हुए कुछ परिवर्तन किए गए। राष्ट्रीय आय लेखांकन विधि में संशोधन यह संशोधन IMF की राष्ट्रीय लेखा प्रणाली(System of national accouunts) केअनुसार किया गया राष्ट्रीय आय लेखांकन हेतु आधार वर्ष 2004-05 के स्थान पर 2011-12 किया गया। अर्थव्यवस्था की आर्थिक वृद्धि दर GDP- स्थिर मूल्यों के स्थान पर GDP-बाज़ार मूल्य पर दर्शाया जाएगा। नई विधि के अंतर्गत निम्नलिखित आंकड़ों के स्रोतों को सम्मिलित किया गया है।स्थानीय निकाय जैसे की पंचायत, नगरपालिका नियामक संस्थान - जैसे आरबीआई, सेबी, IRDAI MCA - 21 नई विधि के अंतर्गत असंगठित क्षेत्र की वृद्धि दर, संगठित क्षेत्र की वृद्धि दर के समान माना गया है। इसकी आवश्यकता का यह कारण है कि असंगठित क्षेत्र के आंकड़े नियमित समयावधि में उपलब्ध नहीं होते। असंगठित क्षेत्र के आंकड़ों का प्रथम स्रोत समय समय पर किए जाने वाले NSSO के सर्वेक्षण होते हैं। क्षेत्रवार वृद्धि दर सकल मूल्य वृद्धि - आधार मूल्य पर आकलित की जाएगी। नई विधि के सकारात्मक पहलू यह प्रणाली UNO/अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों पर आधारित है। भारत की आर्थिक वृद्धि के IMF एवं विश्व बैंक के अनुमान, नई विधि के अंतर्गत आर्थिक वृद्धि के समान हैं नई विधि के अंतर्गत आंकड़ों के नए स्रोत सम्मिलित करने से आंकड़ों के नमूने का आकार बढ़ा है। जिससे उनकी विश्वसनीयता बढ़ी है। नई विधि में मूल्य वर्धन की अवधारणा सम्मिलित करने से इसमें सैद्धांतिक सुधार हुआ है। नई विधि से संबन्धित विवाद/ संबन्धित मुद्दे वृद्धि दर में बढ़ोतरी - 2013 में वृद्धि दर 4.5% तथा 2013-14 में 4.7% थी। नई विधि अपनानाने से यह वृद्धि दरें बढ़ कर क्रमश: 5.1% तथा 6.9% हो गयी। विमौद्रिकरण के कारण आर्थिक संवृद्धि में कमी आनी चाहिए थी किन्तु आर्थिक वृद्धित में कमी देखने को नहीं मिली। जिसका प्रमुख कारण विमौद्रिकरण का प्रभाव असंगठित क्षेत्र पर बहुत अधिक देखने को मिला जबकि असंगठित क्षेत्र से जुड़े डाटा का अभाव देखने को मिलता है। GDP श्रंखला के पिछले आंकड़े – नई विधि के अनुसार पिछले वर्षों के आंकड़ों के आधार पर जीडीपी का आकलन शेल कंपनियों का मुद्दा - NSSO के सर्वेक्षण में यह पाया गया कि जो कंपनियाँ MCA-21 में पंजीकृत हैं उनमें से 16.4% कंपनियाँ उपलब्ध नहीं थी या बंद हो चुकी थी एवं 21.4% कंपनियों का वर्गीकरण उपयुक्त नहीं था। MCA- 21 से संबन्धित समस्याएँ – CSO MCA-21 के आंकड़ों को पुनर्सत्यापित नहीं करता। MCA-21 के अंतर्गत क्षेत्रों का वर्गीकरण राष्ट्रीय लेखांकन प्रणाली (SNA) के वर्गीकरण से भिन्न है। डॉ अरविंद सुब्रण्यम का शोध पत्र – इस शोध पत्र में भारत की आर्थिक वृद्धि को 4.5% बताया गया। राष्ट्रीय आय लेखांकन की वर्तमान प्रणाली अब वैश्विक मानदंडों के अधिक करीब है। साथ ही इसने डाटा बेस को भी विस्तृत किया है। नयी प्रणाली ने भारतीय अर्थव्यवस्था में लेखांकन को और प्रभावी बनाने का प्रयास किया है।
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मुद्रा आपूर्ति के आशय को बताते हुए इसके प्रमुख घटकों का वर्णन कीजिये। साथ ही मुद्रा आपूर्ति के मापन की भी चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द, 10 अंक) While explaining the meaning of money supply, describe its main components. Also, discuss the measurement of the money supply. (150-200 words, 10 marks)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत मुद्रा आपूर्ति के आशय को स्पष्ट करते हुए कीजिये | इसके पश्चात मुद्रा आपूर्ति के विभिन्न घटकों की चर्चा करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में मुद्रा आपूर्ति के मापन के तरीकों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - मुद्रा आपूर्ति इससे तात्पर्य किसी बैंकिंग व्यवस्था में कुल उपलब्ध मुद्रा से है | मुद्रा आपूर्ति का अर्थ किसी दिए गए समय में देश की प्रचलित अर्थव्यवस्था में मुद्रा की कुल आपूर्ति से है | इसका आशय एक अर्थव्यवस्था में किसी भी समय पर मुद्रा की उस मात्रा से है , जो परिवारों, फर्मों या व्यापारिक संस्थानों द्वारा लेन-देन और ऋणों के निपटान के लिए रखी गयी है | दोहरी गणना से बचने के लिए मुद्रा के उत्पादको (RBI, सरकार, वाणिज्यिक बैंकों आदि) को इसमें सम्मिलित नहीं किया जाता है | मुद्रा आपूर्ति के घटक चलन में उपयोग हो रही वैधानिक मुद्रा -सिक्के एवं करेंसी, आदि CASA -जिसके अंतर्गत विभिन्न प्रकार की डिमांड डिपोजिट एवं सम्बंधित चालू खाते एवं बचत खाते आते हैं | FDRD - इसके अंतर्गत विभिन्न प्रकार के मियादी डिपोजिट की गणना की जाती है | कीन्स ने यह भी बताया कि लेन-देन की सुविधा तथा किसी भी प्रकार की असंतोषजनक स्थिति को संज्ञान में रखते हुए लोग वैधानिक मुद्रा को अपने पास रखना पसंद करते हैं | यही कारण है कि यद्यपि कैस लेस अर्थव्यवस्था सरकारों,व्यक्तियों एवं व्यवसाइयों के लिए हितकर है,| जहाँ सरकारें इससे अधिक कर इकठ्ठा कर पाएंगी तथा उन्हें अर्थवयवस्था का ज्यादा अच्छा अनुमान लगेगा,| व्यक्तियों को धन क्षरण के साथ-साथ अन्य चुनौतियों से बचाव होगा तथा व्यवसायियों को लाभ होगा तदापि कैसलेस व्यवस्था संभव नहीं है | यही कारण है कि लेस कैस अर्थवयवस्था की मांग बढ़ी है | मुद्रा आपूर्ति का मापन वैधानिक रूप से मुद्रा आपूर्ति को वर्ष 1968 से पहले M1 के स्वरुप में जाना जाता था | परन्तु 1977 के पश्चात यह निश्चित किया गया कि M1,M2,M3,M4 के रूप में इसे जाना जाएगा | M1 = व्यवस्था में उपलब्ध वैधानिक मुद्रा + बैंको के पास उपलब्ध डिमांड डिपोजिट +RBI के पास उपलब्ध अन्य डिपोजिट | M2 = M1+ डाकघरों में उपलब्ध डिमांड डिपोजिट M3 = M1 +बैंको के पास उपलब्ध मियादी जमा M4 = M3 + डाकघरों के पास उपलब्ध मियादी जमा (NSC - राष्ट्रीय बचत पत्र को छोड़कर) M1 एवं M2 को संकीर्ण मुद्रा कहा जाता है, क्योंकि इनकी तरलता अधिक है | M3 एवं M4 को व्यापक मुद्रा कहा जाता है, क्योंकि इनकी तरलता कम है | वर्ष 1985 में सुखमय चक्रवर्ती ने M3 मुद्रा को मौद्रिक नीति का आधार बनाने की बात कही, जिसे समस्त मौद्रिक संस्थान (एग्रीगेट मनीटरी रिसोर्सेज) की संज्ञा दी गयी | 21 वीं सदी में मुद्रा आपूर्ति के बदलते स्वरुप को दिमाग में रखते हुए रेड्डी समिति ने यह अनुशंषा की कि M2 एवं M4 के आंकलन में सभी डिपोजिट जो डाक घरों के हों, को एक साथ रखा जाय |तथा व्यवहार में सिर्फ M1 एवं M3 की चर्चा की जाय | M0 = इसे हाई पॉवर मनी भी कहा जाता है तथा इसे मौद्रिक आधार भी माना जाता है | यह RBI के पास उपलब्ध स्रोतों की गणना करता है -जिसमे करेंसी, बैंक डिपोजिट एवं अन्य प्रकार के डिपोजिट को जोड़ा जाता है | अमेरिकी मंदी के बाद ही विश्व अर्थव्यवस्था में कई बदलाव हुए जिनमे मुद्रा आपूर्ति के मापन की विधियों के साथ मुद्रा आपूर्ति पर नियंत्रण के लिए लिए एक निकाय का भी गठन था जो वर्तमान में केन्द्रीय बैंक के रूप में है |
##Question:मुद्रा आपूर्ति के आशय को बताते हुए इसके प्रमुख घटकों का वर्णन कीजिये। साथ ही मुद्रा आपूर्ति के मापन की भी चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द, 10 अंक) While explaining the meaning of money supply, describe its main components. Also, discuss the measurement of the money supply. (150-200 words, 10 marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत मुद्रा आपूर्ति के आशय को स्पष्ट करते हुए कीजिये | इसके पश्चात मुद्रा आपूर्ति के विभिन्न घटकों की चर्चा करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में मुद्रा आपूर्ति के मापन के तरीकों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - मुद्रा आपूर्ति इससे तात्पर्य किसी बैंकिंग व्यवस्था में कुल उपलब्ध मुद्रा से है | मुद्रा आपूर्ति का अर्थ किसी दिए गए समय में देश की प्रचलित अर्थव्यवस्था में मुद्रा की कुल आपूर्ति से है | इसका आशय एक अर्थव्यवस्था में किसी भी समय पर मुद्रा की उस मात्रा से है , जो परिवारों, फर्मों या व्यापारिक संस्थानों द्वारा लेन-देन और ऋणों के निपटान के लिए रखी गयी है | दोहरी गणना से बचने के लिए मुद्रा के उत्पादको (RBI, सरकार, वाणिज्यिक बैंकों आदि) को इसमें सम्मिलित नहीं किया जाता है | मुद्रा आपूर्ति के घटक चलन में उपयोग हो रही वैधानिक मुद्रा -सिक्के एवं करेंसी, आदि CASA -जिसके अंतर्गत विभिन्न प्रकार की डिमांड डिपोजिट एवं सम्बंधित चालू खाते एवं बचत खाते आते हैं | FDRD - इसके अंतर्गत विभिन्न प्रकार के मियादी डिपोजिट की गणना की जाती है | कीन्स ने यह भी बताया कि लेन-देन की सुविधा तथा किसी भी प्रकार की असंतोषजनक स्थिति को संज्ञान में रखते हुए लोग वैधानिक मुद्रा को अपने पास रखना पसंद करते हैं | यही कारण है कि यद्यपि कैस लेस अर्थव्यवस्था सरकारों,व्यक्तियों एवं व्यवसाइयों के लिए हितकर है,| जहाँ सरकारें इससे अधिक कर इकठ्ठा कर पाएंगी तथा उन्हें अर्थवयवस्था का ज्यादा अच्छा अनुमान लगेगा,| व्यक्तियों को धन क्षरण के साथ-साथ अन्य चुनौतियों से बचाव होगा तथा व्यवसायियों को लाभ होगा तदापि कैसलेस व्यवस्था संभव नहीं है | यही कारण है कि लेस कैस अर्थवयवस्था की मांग बढ़ी है | मुद्रा आपूर्ति का मापन वैधानिक रूप से मुद्रा आपूर्ति को वर्ष 1968 से पहले M1 के स्वरुप में जाना जाता था | परन्तु 1977 के पश्चात यह निश्चित किया गया कि M1,M2,M3,M4 के रूप में इसे जाना जाएगा | M1 = व्यवस्था में उपलब्ध वैधानिक मुद्रा + बैंको के पास उपलब्ध डिमांड डिपोजिट +RBI के पास उपलब्ध अन्य डिपोजिट | M2 = M1+ डाकघरों में उपलब्ध डिमांड डिपोजिट M3 = M1 +बैंको के पास उपलब्ध मियादी जमा M4 = M3 + डाकघरों के पास उपलब्ध मियादी जमा (NSC - राष्ट्रीय बचत पत्र को छोड़कर) M1 एवं M2 को संकीर्ण मुद्रा कहा जाता है, क्योंकि इनकी तरलता अधिक है | M3 एवं M4 को व्यापक मुद्रा कहा जाता है, क्योंकि इनकी तरलता कम है | वर्ष 1985 में सुखमय चक्रवर्ती ने M3 मुद्रा को मौद्रिक नीति का आधार बनाने की बात कही, जिसे समस्त मौद्रिक संस्थान (एग्रीगेट मनीटरी रिसोर्सेज) की संज्ञा दी गयी | 21 वीं सदी में मुद्रा आपूर्ति के बदलते स्वरुप को दिमाग में रखते हुए रेड्डी समिति ने यह अनुशंषा की कि M2 एवं M4 के आंकलन में सभी डिपोजिट जो डाक घरों के हों, को एक साथ रखा जाय |तथा व्यवहार में सिर्फ M1 एवं M3 की चर्चा की जाय | M0 = इसे हाई पॉवर मनी भी कहा जाता है तथा इसे मौद्रिक आधार भी माना जाता है | यह RBI के पास उपलब्ध स्रोतों की गणना करता है -जिसमे करेंसी, बैंक डिपोजिट एवं अन्य प्रकार के डिपोजिट को जोड़ा जाता है | अमेरिकी मंदी के बाद ही विश्व अर्थव्यवस्था में कई बदलाव हुए जिनमे मुद्रा आपूर्ति के मापन की विधियों के साथ मुद्रा आपूर्ति पर नियंत्रण के लिए लिए एक निकाय का भी गठन था जो वर्तमान में केन्द्रीय बैंक के रूप में है |
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नक्सलवाद या वामपंथी उग्रवाद(LWE) से आप क्या समझते हैं| इसकी उत्पत्ति के संदर्भ में विकास बनाम उग्रवाद के निहितार्थ को स्पष्ट कीजिये|(150 से 200 शब्द/10 अंक) What do you understand by Naxalism or Left Wing Extremism (LWE)? Explain the implications of development versus extremism in this context. (150 to 200 words/10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में वामपंथी उग्रवाद को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में वामपंथी उग्रवाद के उद्देश्यों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में इसकी उत्पत्ति एवं विकास के कारण के रूप में विकास बनाम उग्रवाद के निहितार्थ को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में नियंत्रण की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| विद्यमान व्यवस्थाओं एवं संवैधानिक प्रावधानों में विश्वास न रखते हुए अपनी व्यवस्था को स्थापित करने के लिए की गयी कार्यवाही को वामपंथी उग्रवाद के रूप में समझ सकते हैं| वामपंथी उग्रवाद अथवा नक्सलवाद को स्थापित एवं विद्यमान व्यवस्था के समानांतर सरकार की स्थापना के प्रयास के रूप में भी जाना जाता है| यह विचारधाराओं पर आधारित होता है|नक्सलवाद समाजवादी(राज्य पर पूंजीपतियों का नियंत्रण है, इसे हटा कर राज्य पर सर्वहारा वर्ग के नियंत्रण की स्थापना करनी है) एवं माओवादी विचारधारा( राज्य पर सर्वहारा का नियंत्रण स्थापित करने के लिए पांच प्रक्रियात्मक चरण) से प्रेरित उग्रवाद है| अतः कह सकते हैं कि नक्सलवाद को उद्देश्य समाजवाद से मिलते हैं किन्तु इनकी कार्यवाही का आधार माओवाद है| वामपंथी उग्रवाद के उद्देश्य येसरकार की वैधता को समाप्त करके अपना प्रभुत्वस्थापित करने की मंशा रखते हैं| सरकार के अन्दर रिक्तता पैदा करना तथा सरकार के प्रति अविश्वास पैदा करना; राजनीतिक सत्ता अपने हाथ में लेने की लालशाके साथ ये भारत के लोकतांत्रिक पहचान को ख़त्म करने का सपना देखते हैं| इन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु ये अपने प्रभाववृद्धि को बढ़ाने हेतु व्यापक क़दमों को उठाते हैं| वामपंथी उग्रवाद कामुख्य उद्देश्य पीपुल्स रिवोल्यूशनरी स्टेट की स्थापनाकरना है जिसे नेपाल सीमा से मध्य भारत होते हुए दक्षिण में कर्नाटक तक विस्तारितरेड कॉरिडोरकी स्थापना के माध्यम से प्राप्त किया जाना है| वामपंथी उग्रवाद की उत्पत्ति एवं पनपने के कारण वामपंथी उग्रवाद अथवा नक्सलवाद की उत्पत्ति एवं विकास का प्रमुख कारण असंतुलित विकास अथवा विकास बनाम उग्रवाद को माना जाता है| नक्सलवाद के मूल में अविकास, जल, जंगल, जमीन के मुद्दे देखे जाते हैं| जल जंगल एवं जमीन के सन्दर्भ में जनजातीय समाज की अधिकारिताओं का आपूर्ति न हो पाना विकास बनाम उग्रवाद की दुविधा को उत्पन्न करता है| वामपंथी उग्रवाद प्रायः जनजातीय क्षेत्रों में ही देखा जाता है भारत में नयी आर्थिक व्यवस्था, उदारीकरण आदि नीतियों के माध्यम से नगरीय क्षेत्रों का जिस प्रकार विकास किया गया वैसा विकास वंचित क्षेत्रों का नहीं हो पाया था जिससे जनजातीय समुदायों में असंतोष की उत्पत्ति हुई| सरकार ने समय पर आदिवासियों की गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया यहाँ तक कि उनके लिए मूलभूत आवश्यकताएं भी विकसित नहीं की गयी वन संरक्षण अधिनियम 1980 के द्वारा प्राचीन आदिवासियों का सम्बन्ध वनों से विघटित कर दिया गया जिसके कारण असंतोष उत्पन्न हुआ| वन कानून लाना और वनवासियों के अधिकारों को सीमित करना दूसरी और उद्योग घरानों को बड़े वन क्षेत्र सौंपना आदि को देखते हुए सापेक्षिक वंचना की भावना उत्पन्न हुई भूमि हदबंदी कानून का पालन न होना और जमींदार वर्गों द्वारा सार्वजनिक संपत्तियों, सार्वजनिक संसाधनों का अतिक्रमण करना असंतोष का एक बड़ा कारण था| औद्योगिक इकाइयों एवं बांधों आदि के निर्माण से जनजातीय समाजों का विस्थापन हुआ जिसके बदले में उन्हें उचित मात्रा और उचित समय पर क्षतिपूर्ति/मुआवजा न मिलना| दूसरी और इन संस्थापनाओं का विकास भी उन्हें न मिल पाना| सुशासन का अभाव सरकार की नीतियों को आदिवासियों तक पहुंचाने में असफल रहा| डी.बन्दोपाध्य्याय समिति ने अपनी सिफारिश में कहा है की आदिवासी क्षेत्रों में लोगों को समाज की मुख्यधारा में शामिल करने के लिए प्रयासों का अभाव रहा है| सापेक्षिक वंचना की भावना असंतोष में बदलती गयी और कालान्तर में यह उग्रवाद में बदल गया 2004 तक यह उग्रवाद अनियंत्रित हो गया था और वंचित वर्ग सरकार को अपने लिए अहितकारी मानने लगे अतः नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों में व्यवस्था के प्रति असंतोष एवं उसके प्रतिस्थापन के प्रयासों को देखा जा सकता है| इस प्रकार मुख्यतः शासन की परिधि में रह जाना, सामाजिक आर्थिक अवसंरचना की कमी, भ्रष्टाचार, क्रोनी कैपिटलिज्म, भूमि अधिग्रहण, विस्थापन, वनाधिकारों में कटौती आदि कारणों से वामपंथी उग्रवाद की उत्पत्ति एवं विकास के लिए आधार प्राप्त हुआ| किन्तु वर्तमान वस्तुस्थिति यह है कि भारत विरोधी ताकतें, जनजातियों के इस असंतोष को अपने हितों की पूर्ति के संदर्भ में प्रयुक्त कर रही हैं और भारत द्वारा विकास के प्रयासों को बाधित कर रही हैं ताकि भारत में अस्थिरता की स्थिति बनी रहे| अतः भारत सरकार को स्थानीय समुदाय को समावेशित करते हुए विकासात्मक प्रयासों के साथ-साथ सुरक्षात्मक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है|
##Question:नक्सलवाद या वामपंथी उग्रवाद(LWE) से आप क्या समझते हैं| इसकी उत्पत्ति के संदर्भ में विकास बनाम उग्रवाद के निहितार्थ को स्पष्ट कीजिये|(150 से 200 शब्द/10 अंक) What do you understand by Naxalism or Left Wing Extremism (LWE)? Explain the implications of development versus extremism in this context. (150 to 200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में वामपंथी उग्रवाद को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में वामपंथी उग्रवाद के उद्देश्यों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में इसकी उत्पत्ति एवं विकास के कारण के रूप में विकास बनाम उग्रवाद के निहितार्थ को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में नियंत्रण की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| विद्यमान व्यवस्थाओं एवं संवैधानिक प्रावधानों में विश्वास न रखते हुए अपनी व्यवस्था को स्थापित करने के लिए की गयी कार्यवाही को वामपंथी उग्रवाद के रूप में समझ सकते हैं| वामपंथी उग्रवाद अथवा नक्सलवाद को स्थापित एवं विद्यमान व्यवस्था के समानांतर सरकार की स्थापना के प्रयास के रूप में भी जाना जाता है| यह विचारधाराओं पर आधारित होता है|नक्सलवाद समाजवादी(राज्य पर पूंजीपतियों का नियंत्रण है, इसे हटा कर राज्य पर सर्वहारा वर्ग के नियंत्रण की स्थापना करनी है) एवं माओवादी विचारधारा( राज्य पर सर्वहारा का नियंत्रण स्थापित करने के लिए पांच प्रक्रियात्मक चरण) से प्रेरित उग्रवाद है| अतः कह सकते हैं कि नक्सलवाद को उद्देश्य समाजवाद से मिलते हैं किन्तु इनकी कार्यवाही का आधार माओवाद है| वामपंथी उग्रवाद के उद्देश्य येसरकार की वैधता को समाप्त करके अपना प्रभुत्वस्थापित करने की मंशा रखते हैं| सरकार के अन्दर रिक्तता पैदा करना तथा सरकार के प्रति अविश्वास पैदा करना; राजनीतिक सत्ता अपने हाथ में लेने की लालशाके साथ ये भारत के लोकतांत्रिक पहचान को ख़त्म करने का सपना देखते हैं| इन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु ये अपने प्रभाववृद्धि को बढ़ाने हेतु व्यापक क़दमों को उठाते हैं| वामपंथी उग्रवाद कामुख्य उद्देश्य पीपुल्स रिवोल्यूशनरी स्टेट की स्थापनाकरना है जिसे नेपाल सीमा से मध्य भारत होते हुए दक्षिण में कर्नाटक तक विस्तारितरेड कॉरिडोरकी स्थापना के माध्यम से प्राप्त किया जाना है| वामपंथी उग्रवाद की उत्पत्ति एवं पनपने के कारण वामपंथी उग्रवाद अथवा नक्सलवाद की उत्पत्ति एवं विकास का प्रमुख कारण असंतुलित विकास अथवा विकास बनाम उग्रवाद को माना जाता है| नक्सलवाद के मूल में अविकास, जल, जंगल, जमीन के मुद्दे देखे जाते हैं| जल जंगल एवं जमीन के सन्दर्भ में जनजातीय समाज की अधिकारिताओं का आपूर्ति न हो पाना विकास बनाम उग्रवाद की दुविधा को उत्पन्न करता है| वामपंथी उग्रवाद प्रायः जनजातीय क्षेत्रों में ही देखा जाता है भारत में नयी आर्थिक व्यवस्था, उदारीकरण आदि नीतियों के माध्यम से नगरीय क्षेत्रों का जिस प्रकार विकास किया गया वैसा विकास वंचित क्षेत्रों का नहीं हो पाया था जिससे जनजातीय समुदायों में असंतोष की उत्पत्ति हुई| सरकार ने समय पर आदिवासियों की गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया यहाँ तक कि उनके लिए मूलभूत आवश्यकताएं भी विकसित नहीं की गयी वन संरक्षण अधिनियम 1980 के द्वारा प्राचीन आदिवासियों का सम्बन्ध वनों से विघटित कर दिया गया जिसके कारण असंतोष उत्पन्न हुआ| वन कानून लाना और वनवासियों के अधिकारों को सीमित करना दूसरी और उद्योग घरानों को बड़े वन क्षेत्र सौंपना आदि को देखते हुए सापेक्षिक वंचना की भावना उत्पन्न हुई भूमि हदबंदी कानून का पालन न होना और जमींदार वर्गों द्वारा सार्वजनिक संपत्तियों, सार्वजनिक संसाधनों का अतिक्रमण करना असंतोष का एक बड़ा कारण था| औद्योगिक इकाइयों एवं बांधों आदि के निर्माण से जनजातीय समाजों का विस्थापन हुआ जिसके बदले में उन्हें उचित मात्रा और उचित समय पर क्षतिपूर्ति/मुआवजा न मिलना| दूसरी और इन संस्थापनाओं का विकास भी उन्हें न मिल पाना| सुशासन का अभाव सरकार की नीतियों को आदिवासियों तक पहुंचाने में असफल रहा| डी.बन्दोपाध्य्याय समिति ने अपनी सिफारिश में कहा है की आदिवासी क्षेत्रों में लोगों को समाज की मुख्यधारा में शामिल करने के लिए प्रयासों का अभाव रहा है| सापेक्षिक वंचना की भावना असंतोष में बदलती गयी और कालान्तर में यह उग्रवाद में बदल गया 2004 तक यह उग्रवाद अनियंत्रित हो गया था और वंचित वर्ग सरकार को अपने लिए अहितकारी मानने लगे अतः नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों में व्यवस्था के प्रति असंतोष एवं उसके प्रतिस्थापन के प्रयासों को देखा जा सकता है| इस प्रकार मुख्यतः शासन की परिधि में रह जाना, सामाजिक आर्थिक अवसंरचना की कमी, भ्रष्टाचार, क्रोनी कैपिटलिज्म, भूमि अधिग्रहण, विस्थापन, वनाधिकारों में कटौती आदि कारणों से वामपंथी उग्रवाद की उत्पत्ति एवं विकास के लिए आधार प्राप्त हुआ| किन्तु वर्तमान वस्तुस्थिति यह है कि भारत विरोधी ताकतें, जनजातियों के इस असंतोष को अपने हितों की पूर्ति के संदर्भ में प्रयुक्त कर रही हैं और भारत द्वारा विकास के प्रयासों को बाधित कर रही हैं ताकि भारत में अस्थिरता की स्थिति बनी रहे| अतः भारत सरकार को स्थानीय समुदाय को समावेशित करते हुए विकासात्मक प्रयासों के साथ-साथ सुरक्षात्मक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है|
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1975-77 का काल भारतीय लोकतंत्र के लिए चुनौती के रूप में समझा जाता है वहीँ इस काल में लोकतंत्र की विजय भी दृष्टिगोचर होती है| आपातकाल लगाये जाने के विशेष संदर्भ में टिप्पणी कीजिये| (150-200 शब्द, अंक-10 ) The period of 1975-77 is considered as a challenge for Indian democracy, while the triumph of democracy is also visible in this period. Comment with special reference to the imposition of emergency. (150-200 words, marks - 10 )
एप्रोच- वर्ष 1975 तथा आपातकाल की आरंभिक पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का आरंभ कीजिये| पहले भाग में, वर्ष1975-77 के मध्य लोकतंत्र के तीनों स्तंभों, विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका, के समक्ष उत्पन चुनौतियों का जिक्र कीजिये| अगले भाग में, आपातकाल के दौरान राजनीतिक उथलपुथल की पृष्ठभूमि में, आपातकाल पर जनता की प्रतिक्रिया तथा 1977 के चुनावों के पश्चात लोकतांत्रिक व्यवस्था बहाली के निहितार्थों पर प्रकाश डालिए| उत्तर- आपातकाल की पृष्ठभूमि खाद्यान संकट, मानसून की विफलता, तेल की कीमतों में वृद्धि, युद्ध का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव, बढ़ती गरीबी-बेरोजगारी, हड़तालों की श्रृंखला आदि रखे जा सकते हैं| 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा श्रीमती गाँधी को भ्रष्ट चुनाव आचरण में लिप्त होने का दोषी मानकर उनके चुनाव को अमान्य कर दिया गया था| साथ ही, सुप्रीम कोर्ट द्वारा अंतिम आदेश तक प्रधानमंत्री को संसद में भाग लेने से रोकदिया गया था| साथ ही, 1974 के गुजरात तथा बिहार छात्र आंदोलनों, अखिल भारतीय हड़तालों, जेपी आंदोलन की श्रृंखला की अगली कड़ी के रूप में जयप्रकाश नारायण द्वारा 25 जून 1975 को दिल्ली में एक विशाल रैली के माध्यम से इंदिरा गांधी सरकार पर दबाव बनाया गया| इस रैली में जेपी ने जनता, पुलिस, सेना, सरकारी अधिकारी, मजदूरों, किसानों आदि को सविनय अवज्ञा करने तथा सरकारी आदेशों को ना मानने के लिए प्रोत्साहित करने वाला बयान दिया| उपरोक्त घटनाक्रमों की अंतिम परिणति 26 जून 1975 को इंदिरा गाँधी द्वारा आंतरिक अशांति के आधार पर अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की उद्घोषणा के रूप में हुयी| 1975-77 के मध्य लोकतंत्र के समक्ष चुनौतियाँ संसदीय व्यवस्था के अभिन्न अंग विपक्ष का दमन सभी प्रमुख विपक्षी नेताओं को आंतरिक सुरक्षा प्रबंधन कानून(मीसा) के तहत गिरफ्तार करके जेल में डालना; निवारक निरोध का प्रयोग; आपातकाल के दौरान सरकार के सभी विरोधों पर पाबंदी लगाया जाना; लोकतंत्र के चौथे स्तंभ प्रेस पर कड़ी सेंसरशिप लागू करना; संघीय प्रावधानों का निलंबन तथा संसद को अप्रभावी बना देना; न्यायपालिका के साथ सरकार का टकराव; प्रतिबद्ध न्यायपालिका,कार्यपालिका की दिशा में कदम; राज्य सरकारों पर कड़ा नियंत्रण कुछ राज्य सरकारों को बर्खास्त करना; फलस्वरूप संघ-राज्य संबंधों पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव; कानूनों तथा 42वें संविधान संशोधन के द्वारा न्यायपालिका की शक्तियों को कम करने का प्रयास; संविधान संशोधनकी न्यायिक समीक्षा के न्यायालय के अधिकार पर प्रतिबंध लगाना; अध्यादेश के द्वारा शासन; 42वें संविधान संशोधन के द्वारा शक्ति का केंद्रीकरण; मौलिक अधिकारों को राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के मातहत करके नागरिकों को राज्य के विरुद्ध मिले अधिकारों को कम करने का प्रयास; राष्ट्रपति को कैबिनेट की सलाह मानने के लिए बाध्यकारी बनाना; संवैधानिक उपचारों के अधिकार का निलंबन; कार्यपालिका के कार्यों में गैर-आधिकारिक व्यक्तियों का हस्तक्षेप जिसके फलस्वरूप समानांतर सत्ता का उदय; संजय गाँधी की समानांतर सरकार- जबरन नसबंदी; शहरों के सौंदर्यीकरण के नाम पर लोगों का विस्थापन आदि; जेपी आंदोलन का अराजक चेहरा जैसे-जनता, पुलिस, सेना, सरकारी अधिकारी, मजदूरों, किसानों आदि को सविनय अवज्ञा करने तथा सरकारी आदेशों को ना मानने के लिए प्रोत्साहित करने वाला बयान; इससे फासीवादी अवधारणा को प्रोत्साहन मिलने की संभावना; 1975-77 के दौरान राजनीतिक घटनाक्रम तथा आपातकाल पर जनता की प्रतिक्रिया आपातकाल के माध्यम से 1976 के चुनावों को स्थगित करना; विपक्षी पार्टियों पर सख्त पाबंदी तथा सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी पर भी प्रधानमंत्री का कठोर नियंत्रण; जनवरी 1977 में इंदिरा गाँधी द्वारा लोकसभा चुनाव मार्च में करवाने की घोषणा तथा सभी राजनीतिक दलों पर प्रतिबंधों को हटा लेने तथा सभी विपक्षी नेताओं को रिहा कर देने के फलस्वरूप लोकतंत्र को मजबूती; मार्च 1977 में विचारधारा तथा प्रतिद्वंद्विता को भुलाकर ज्यादातर गैर-कॉंग्रेसी दलों द्वारा जनता पार्टी के नेतृत्व में कांग्रेस के खिलाफ लोकसभा का चुनाव लड़ना तथा आपातकाल के खिलाफ़ जनादेश पाकर संसद में बहुमत प्राप्त करना; आपातकाल की समाप्ति तथा लोकतंत्र की विजय मार्च 1977 के चुनाव-परिणामों के माध्यम से भारतीय लोकतंत्र की मजबूती तथा खूबसूरती का प्रदर्शन हुआ| इसने यह दर्शाया कि भारतीय जनमानस में लोकतांत्रिक मूल्यों की गहरी पैठ विद्यमान है| 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से जो संवैधानिक विकृतियाँ पैदा की गयी थीं उसे काफी हद तक 43वें एवं 44वें संविधान संशोधन के माध्यम से उपचारित कर दिया गया| 44 वें संविधान संशोधन के द्वारा लोकतंत्र एवं नागरिक अधिकारों की मजबूती हेतु कुछ नये उपबंधों को भी संविधान में समाविष्ट किया जाना जैसे- आपातकाल के लिए आंतरिक अशांति की जगह "सशस्त्र विद्रोह" को आधार बनाया जाना; राष्ट्रपति द्वारा कैबिनेट की लिखित सिफारिश पर ही आपतकाल घोषित करना; अनुच्छेद 20 तथा 21 को राष्ट्रीय आपातकाल में भी निलंबन नहीं करना; न्यायिक समीक्षा की बहाली; निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि 1975 से 1977 का समयकाल भारतीय लोकतंत्र के लिए एक कठिन परीक्षा या दुःस्वप्न का काल रहा था परंतु अंततः भारतीय जनता की लोकतंत्र में गहरी निष्ठा की वजह से भारतीय लोकतंत्र ने इन चुनौतियों पर विजय पा ही ली|
##Question:1975-77 का काल भारतीय लोकतंत्र के लिए चुनौती के रूप में समझा जाता है वहीँ इस काल में लोकतंत्र की विजय भी दृष्टिगोचर होती है| आपातकाल लगाये जाने के विशेष संदर्भ में टिप्पणी कीजिये| (150-200 शब्द, अंक-10 ) The period of 1975-77 is considered as a challenge for Indian democracy, while the triumph of democracy is also visible in this period. Comment with special reference to the imposition of emergency. (150-200 words, marks - 10 )##Answer:एप्रोच- वर्ष 1975 तथा आपातकाल की आरंभिक पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का आरंभ कीजिये| पहले भाग में, वर्ष1975-77 के मध्य लोकतंत्र के तीनों स्तंभों, विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका, के समक्ष उत्पन चुनौतियों का जिक्र कीजिये| अगले भाग में, आपातकाल के दौरान राजनीतिक उथलपुथल की पृष्ठभूमि में, आपातकाल पर जनता की प्रतिक्रिया तथा 1977 के चुनावों के पश्चात लोकतांत्रिक व्यवस्था बहाली के निहितार्थों पर प्रकाश डालिए| उत्तर- आपातकाल की पृष्ठभूमि खाद्यान संकट, मानसून की विफलता, तेल की कीमतों में वृद्धि, युद्ध का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव, बढ़ती गरीबी-बेरोजगारी, हड़तालों की श्रृंखला आदि रखे जा सकते हैं| 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा श्रीमती गाँधी को भ्रष्ट चुनाव आचरण में लिप्त होने का दोषी मानकर उनके चुनाव को अमान्य कर दिया गया था| साथ ही, सुप्रीम कोर्ट द्वारा अंतिम आदेश तक प्रधानमंत्री को संसद में भाग लेने से रोकदिया गया था| साथ ही, 1974 के गुजरात तथा बिहार छात्र आंदोलनों, अखिल भारतीय हड़तालों, जेपी आंदोलन की श्रृंखला की अगली कड़ी के रूप में जयप्रकाश नारायण द्वारा 25 जून 1975 को दिल्ली में एक विशाल रैली के माध्यम से इंदिरा गांधी सरकार पर दबाव बनाया गया| इस रैली में जेपी ने जनता, पुलिस, सेना, सरकारी अधिकारी, मजदूरों, किसानों आदि को सविनय अवज्ञा करने तथा सरकारी आदेशों को ना मानने के लिए प्रोत्साहित करने वाला बयान दिया| उपरोक्त घटनाक्रमों की अंतिम परिणति 26 जून 1975 को इंदिरा गाँधी द्वारा आंतरिक अशांति के आधार पर अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की उद्घोषणा के रूप में हुयी| 1975-77 के मध्य लोकतंत्र के समक्ष चुनौतियाँ संसदीय व्यवस्था के अभिन्न अंग विपक्ष का दमन सभी प्रमुख विपक्षी नेताओं को आंतरिक सुरक्षा प्रबंधन कानून(मीसा) के तहत गिरफ्तार करके जेल में डालना; निवारक निरोध का प्रयोग; आपातकाल के दौरान सरकार के सभी विरोधों पर पाबंदी लगाया जाना; लोकतंत्र के चौथे स्तंभ प्रेस पर कड़ी सेंसरशिप लागू करना; संघीय प्रावधानों का निलंबन तथा संसद को अप्रभावी बना देना; न्यायपालिका के साथ सरकार का टकराव; प्रतिबद्ध न्यायपालिका,कार्यपालिका की दिशा में कदम; राज्य सरकारों पर कड़ा नियंत्रण कुछ राज्य सरकारों को बर्खास्त करना; फलस्वरूप संघ-राज्य संबंधों पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव; कानूनों तथा 42वें संविधान संशोधन के द्वारा न्यायपालिका की शक्तियों को कम करने का प्रयास; संविधान संशोधनकी न्यायिक समीक्षा के न्यायालय के अधिकार पर प्रतिबंध लगाना; अध्यादेश के द्वारा शासन; 42वें संविधान संशोधन के द्वारा शक्ति का केंद्रीकरण; मौलिक अधिकारों को राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के मातहत करके नागरिकों को राज्य के विरुद्ध मिले अधिकारों को कम करने का प्रयास; राष्ट्रपति को कैबिनेट की सलाह मानने के लिए बाध्यकारी बनाना; संवैधानिक उपचारों के अधिकार का निलंबन; कार्यपालिका के कार्यों में गैर-आधिकारिक व्यक्तियों का हस्तक्षेप जिसके फलस्वरूप समानांतर सत्ता का उदय; संजय गाँधी की समानांतर सरकार- जबरन नसबंदी; शहरों के सौंदर्यीकरण के नाम पर लोगों का विस्थापन आदि; जेपी आंदोलन का अराजक चेहरा जैसे-जनता, पुलिस, सेना, सरकारी अधिकारी, मजदूरों, किसानों आदि को सविनय अवज्ञा करने तथा सरकारी आदेशों को ना मानने के लिए प्रोत्साहित करने वाला बयान; इससे फासीवादी अवधारणा को प्रोत्साहन मिलने की संभावना; 1975-77 के दौरान राजनीतिक घटनाक्रम तथा आपातकाल पर जनता की प्रतिक्रिया आपातकाल के माध्यम से 1976 के चुनावों को स्थगित करना; विपक्षी पार्टियों पर सख्त पाबंदी तथा सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी पर भी प्रधानमंत्री का कठोर नियंत्रण; जनवरी 1977 में इंदिरा गाँधी द्वारा लोकसभा चुनाव मार्च में करवाने की घोषणा तथा सभी राजनीतिक दलों पर प्रतिबंधों को हटा लेने तथा सभी विपक्षी नेताओं को रिहा कर देने के फलस्वरूप लोकतंत्र को मजबूती; मार्च 1977 में विचारधारा तथा प्रतिद्वंद्विता को भुलाकर ज्यादातर गैर-कॉंग्रेसी दलों द्वारा जनता पार्टी के नेतृत्व में कांग्रेस के खिलाफ लोकसभा का चुनाव लड़ना तथा आपातकाल के खिलाफ़ जनादेश पाकर संसद में बहुमत प्राप्त करना; आपातकाल की समाप्ति तथा लोकतंत्र की विजय मार्च 1977 के चुनाव-परिणामों के माध्यम से भारतीय लोकतंत्र की मजबूती तथा खूबसूरती का प्रदर्शन हुआ| इसने यह दर्शाया कि भारतीय जनमानस में लोकतांत्रिक मूल्यों की गहरी पैठ विद्यमान है| 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से जो संवैधानिक विकृतियाँ पैदा की गयी थीं उसे काफी हद तक 43वें एवं 44वें संविधान संशोधन के माध्यम से उपचारित कर दिया गया| 44 वें संविधान संशोधन के द्वारा लोकतंत्र एवं नागरिक अधिकारों की मजबूती हेतु कुछ नये उपबंधों को भी संविधान में समाविष्ट किया जाना जैसे- आपातकाल के लिए आंतरिक अशांति की जगह "सशस्त्र विद्रोह" को आधार बनाया जाना; राष्ट्रपति द्वारा कैबिनेट की लिखित सिफारिश पर ही आपतकाल घोषित करना; अनुच्छेद 20 तथा 21 को राष्ट्रीय आपातकाल में भी निलंबन नहीं करना; न्यायिक समीक्षा की बहाली; निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि 1975 से 1977 का समयकाल भारतीय लोकतंत्र के लिए एक कठिन परीक्षा या दुःस्वप्न का काल रहा था परंतु अंततः भारतीय जनता की लोकतंत्र में गहरी निष्ठा की वजह से भारतीय लोकतंत्र ने इन चुनौतियों पर विजय पा ही ली|
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वेगनर द्वारा प्रस्तुत महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त में पैंजिया की अवस्था को स्पष्ट करते हुए महाद्वीपों के प्रवाह के लिए उत्तरदायी बलों की विस्तृत चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Explain the state of Pangea in the continental displacement theory presented by Wegner and discuss the forces responsible for the flow of continents. (150-200 words)
Approach: भूमिका में महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त की चर्चा कीजिए। सिद्धान्त में महाद्वीपों की पैंजिया की अवस्था का वर्णन प्रस्तुत कीजिए। महाद्वीपों के प्रवाह हेतु उत्तरदायी बलों को स्पष्ट कीजिए। सिद्धान्त के महत्व की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर 1912 में जर्मन के जलवायुवेत्ता अल्फ्रेड वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था। इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था। इस सिद्धान्त के माध्यम से वेगनर भूगर्भीक इतिहास में हुए जलवायु परिवर्तन कि व्याख्या करना चाहते थे। भूमंडल पर अनेक स्थानोंमें ऐसे भूगर्भीक प्रमाण मिले हैं, जिनके आधार पर यह ज्ञात हुआ है कि एक ही स्थान पर जलवायु में समय समय पर अनेक परिवर्तन हुए हैं। महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त में पैंजिया की अवस्था वेगनर के अनुसार कार्बोनीफेरस युग में सभी महाद्वीप एक ही भू-खंड के भाग थे। उन्होने इस सुपर कोण्टिनेंट को पैंजिया कहा। पैंजिया एक विशाल महासागर से घिरा हुआ था जिसे पैन्थालासा कहा गया। वेगनर ने कल्पना भी की कि इस युग में दक्षिणी ध्रुव दक्षिणी अफ्रीकी तट के निकट अवस्थित था तथा उत्तरी ध्रुव प्रशांत महासागर में अवस्थित था। वेगनर ने भू-संतुलन के सिद्धान्त के आधार पर बताया कि महाद्वीपीय भाग सियाल का बना है जो सीमा पर उत्प्लवित व प्रवाहित हो रहा है। इसमें पृथ्वी की आंतरिक ऊष्मा के कारण विखंडन शुरू हुआ। पैंजिया दो वृहद महाद्वीपीय भू-भागों लारेशिया और गौंडवानालैंड में क्रमश: उत्तरी व दक्षिणी भू-खंडों में विभक्त हो गया। इसके बाद ये छोटे छोटे भागों में विभाजित हो गए जो वर्तमान में भी अस्तित्व में बने हुए हैं। प्रवाह संबंधी बल- सीमा के ऊपर तैरते हुए पैंजिया का विखंडन एव प्रवाह मुख्य रूप से गुरुत्वाकर्षण शक्तियों की असमानता के कारण संभव हुआ। यह प्रवाह दो दिशाओं में हुआ: भूमध्य रेखा की ओर प्रवाह – वेगनर ने बताया कि महाद्वीपों के भूमध्य रेखा की ओर प्रवाह के लिए पोलर फ्लीइंग बल, गुरुत्व और उत्प्लावन बल उत्तरदायी थे। पोलर फ्लीइंग बल पृथ्वी के घूर्णन से संबन्धित है। पश्चिम की ओर प्रवाह- वेगनर ने बताया कि पश्चिम की ओर स्थानांतरण का मुख्य कारण ज्वारीय बल था। यह सूर्य और चंद्रमा के आकर्षण से संबन्धित है। वेगनर का मानना था कि करोड़ों वर्षों के दौरान ये बल प्रभावशाली बनकर महाद्वीपों को विस्थापित करने में सक्षम हो गए थे। शुरुवाती दौर में इसने महाद्वीपों के निर्माण को समझना आसान किया।
##Question:वेगनर द्वारा प्रस्तुत महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त में पैंजिया की अवस्था को स्पष्ट करते हुए महाद्वीपों के प्रवाह के लिए उत्तरदायी बलों की विस्तृत चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Explain the state of Pangea in the continental displacement theory presented by Wegner and discuss the forces responsible for the flow of continents. (150-200 words)##Answer:Approach: भूमिका में महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त की चर्चा कीजिए। सिद्धान्त में महाद्वीपों की पैंजिया की अवस्था का वर्णन प्रस्तुत कीजिए। महाद्वीपों के प्रवाह हेतु उत्तरदायी बलों को स्पष्ट कीजिए। सिद्धान्त के महत्व की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर 1912 में जर्मन के जलवायुवेत्ता अल्फ्रेड वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था। इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था। इस सिद्धान्त के माध्यम से वेगनर भूगर्भीक इतिहास में हुए जलवायु परिवर्तन कि व्याख्या करना चाहते थे। भूमंडल पर अनेक स्थानोंमें ऐसे भूगर्भीक प्रमाण मिले हैं, जिनके आधार पर यह ज्ञात हुआ है कि एक ही स्थान पर जलवायु में समय समय पर अनेक परिवर्तन हुए हैं। महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त में पैंजिया की अवस्था वेगनर के अनुसार कार्बोनीफेरस युग में सभी महाद्वीप एक ही भू-खंड के भाग थे। उन्होने इस सुपर कोण्टिनेंट को पैंजिया कहा। पैंजिया एक विशाल महासागर से घिरा हुआ था जिसे पैन्थालासा कहा गया। वेगनर ने कल्पना भी की कि इस युग में दक्षिणी ध्रुव दक्षिणी अफ्रीकी तट के निकट अवस्थित था तथा उत्तरी ध्रुव प्रशांत महासागर में अवस्थित था। वेगनर ने भू-संतुलन के सिद्धान्त के आधार पर बताया कि महाद्वीपीय भाग सियाल का बना है जो सीमा पर उत्प्लवित व प्रवाहित हो रहा है। इसमें पृथ्वी की आंतरिक ऊष्मा के कारण विखंडन शुरू हुआ। पैंजिया दो वृहद महाद्वीपीय भू-भागों लारेशिया और गौंडवानालैंड में क्रमश: उत्तरी व दक्षिणी भू-खंडों में विभक्त हो गया। इसके बाद ये छोटे छोटे भागों में विभाजित हो गए जो वर्तमान में भी अस्तित्व में बने हुए हैं। प्रवाह संबंधी बल- सीमा के ऊपर तैरते हुए पैंजिया का विखंडन एव प्रवाह मुख्य रूप से गुरुत्वाकर्षण शक्तियों की असमानता के कारण संभव हुआ। यह प्रवाह दो दिशाओं में हुआ: भूमध्य रेखा की ओर प्रवाह – वेगनर ने बताया कि महाद्वीपों के भूमध्य रेखा की ओर प्रवाह के लिए पोलर फ्लीइंग बल, गुरुत्व और उत्प्लावन बल उत्तरदायी थे। पोलर फ्लीइंग बल पृथ्वी के घूर्णन से संबन्धित है। पश्चिम की ओर प्रवाह- वेगनर ने बताया कि पश्चिम की ओर स्थानांतरण का मुख्य कारण ज्वारीय बल था। यह सूर्य और चंद्रमा के आकर्षण से संबन्धित है। वेगनर का मानना था कि करोड़ों वर्षों के दौरान ये बल प्रभावशाली बनकर महाद्वीपों को विस्थापित करने में सक्षम हो गए थे। शुरुवाती दौर में इसने महाद्वीपों के निर्माण को समझना आसान किया।
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मल्टी ट्रैक कूटनीति से आप क्या समझते हैं? इसके प्रकारों को समसामयिक उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिये ।(150-200शब्द) What do you understand by multi track diplomacy? Explain its types with current examples. (150-200 words)
दृष्टिकोण मल्टी ट्रैक कूटनीति को परिभाषित कर उत्तर की भूमिका लिखिए। मल्टी ट्रैक कूटनीति के प्रकारों को उदाहरण देकर बिन्दुवार लिखिए अंत में, एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये। मल्टी–ट्रैक कूटनीति एक वैचारिक तरीका है जो अंतर्राष्ट्रीयस्तर पर शांति व्यवस्था की प्रक्रिया को एक जीवित प्रणाली के रूप में देखती है। यह आपस में जुड़ी गतिविधियों, व्यक्तियों,संस्थानों और समुदायों को एक समान लक्ष्य की पूर्ति के लिए प्रयास करते हुए देखती है और वो लक्ष्य है : विश्व शांति। मल्टी ट्रैक कूटनीति के कुछ महत्वपूर्ण इस प्रकार हैं:- ट्रैक 1 कूटनीति- दो देशों के मध्य प्रत्यक्ष कूटनीतिक प्रयासकिए जाते है, इसमें सरकारें एवं अधिकारी शामिल होते है। इसे आधिकारिक सरकारी कूटनीति भी कहते हैं। उदाहरण के लिए, भारत के प्रधानमंत्री के द्वारा इज़राइल की यात्रा इस कूटनीति के अंतर्गत आएगी। ट्रैक 2 कूटनीति- वैदेशिक मामलों के लिए गैर सरकारी निकायों के बीच अंतःक्रियात्मक संबंध स्थापित किए जातेहैं। उदाहरण के लिए, बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन द्वारा भारत में गरीबों को पेयजल उपलब्ध करने का प्रयास करना। ट्रैक 3 कूटनीति- यह दो देशों के व्यापारिक समुदायों के बीचसंबंधों का स्थापित होना है। जैसे – वर्ल्ड इकनॉमिक फॉरम विभिन्न देशों के व्यापारियों को आर्थिक मामलों पर बात करने का मंच देता है। भारत-नेपाल के बीच होने वाले व्यापार के कारण दोनों देशों के व्यापारियों के संबंध भी इसी कूटनीति के अंतर्गत आते है। ट्रैक 4 कूटनीति- दो देशों के नागरिकों के बीच संबंधबनाने के प्रयास किए जाते है। इसमें सामाजिक, आर्थिक, पर्यावरणीय, सांस्कृतिक आदि स्तरों पर नागरिकों के बीच संबंध स्थापित किए जाते है। उदाहरण के लिए किसी अमेरिकी का भारत में पर्यटक के रूप में आना। यह कूटनीति विश्वशांति के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत सरकार का प्रोजेक्ट मौसम इस दिशा में अच्छा प्रयास है। ट्रैक 5 कूटनीति- दो देशों के मीडिया के बीच संबंध बनाए जाते है। इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक आवश्यकता जैसे मुद्दे शामिल किए जाते है। जैसे कश्मीर के मुद्दे पर चर्चा के दौरान किसी मीडिया चैनल द्वारा किसी पाकिस्तानी पत्रकार को भी आमंत्रित करना। ट्रैक 6 कूटनीति, इसमें जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर संबंध स्थापित किए जाते हैं। उदाहरण के लिए 2015 का पेरिस सम्मेलन, जिसमें जलवायु परिवर्तन पर व्यापक विचार विमर्श हुआ। निष्कर्षतः, कहा जा सकता है कि वैश्विक शांति के लिए मल्टी ट्रैक कूटनीति एक व्यापक मार्ग प्रदान करती है। जिसका प्रयोग सभी देशों को करना चाहिए।
##Question:मल्टी ट्रैक कूटनीति से आप क्या समझते हैं? इसके प्रकारों को समसामयिक उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिये ।(150-200शब्द) What do you understand by multi track diplomacy? Explain its types with current examples. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण मल्टी ट्रैक कूटनीति को परिभाषित कर उत्तर की भूमिका लिखिए। मल्टी ट्रैक कूटनीति के प्रकारों को उदाहरण देकर बिन्दुवार लिखिए अंत में, एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये। मल्टी–ट्रैक कूटनीति एक वैचारिक तरीका है जो अंतर्राष्ट्रीयस्तर पर शांति व्यवस्था की प्रक्रिया को एक जीवित प्रणाली के रूप में देखती है। यह आपस में जुड़ी गतिविधियों, व्यक्तियों,संस्थानों और समुदायों को एक समान लक्ष्य की पूर्ति के लिए प्रयास करते हुए देखती है और वो लक्ष्य है : विश्व शांति। मल्टी ट्रैक कूटनीति के कुछ महत्वपूर्ण इस प्रकार हैं:- ट्रैक 1 कूटनीति- दो देशों के मध्य प्रत्यक्ष कूटनीतिक प्रयासकिए जाते है, इसमें सरकारें एवं अधिकारी शामिल होते है। इसे आधिकारिक सरकारी कूटनीति भी कहते हैं। उदाहरण के लिए, भारत के प्रधानमंत्री के द्वारा इज़राइल की यात्रा इस कूटनीति के अंतर्गत आएगी। ट्रैक 2 कूटनीति- वैदेशिक मामलों के लिए गैर सरकारी निकायों के बीच अंतःक्रियात्मक संबंध स्थापित किए जातेहैं। उदाहरण के लिए, बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन द्वारा भारत में गरीबों को पेयजल उपलब्ध करने का प्रयास करना। ट्रैक 3 कूटनीति- यह दो देशों के व्यापारिक समुदायों के बीचसंबंधों का स्थापित होना है। जैसे – वर्ल्ड इकनॉमिक फॉरम विभिन्न देशों के व्यापारियों को आर्थिक मामलों पर बात करने का मंच देता है। भारत-नेपाल के बीच होने वाले व्यापार के कारण दोनों देशों के व्यापारियों के संबंध भी इसी कूटनीति के अंतर्गत आते है। ट्रैक 4 कूटनीति- दो देशों के नागरिकों के बीच संबंधबनाने के प्रयास किए जाते है। इसमें सामाजिक, आर्थिक, पर्यावरणीय, सांस्कृतिक आदि स्तरों पर नागरिकों के बीच संबंध स्थापित किए जाते है। उदाहरण के लिए किसी अमेरिकी का भारत में पर्यटक के रूप में आना। यह कूटनीति विश्वशांति के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत सरकार का प्रोजेक्ट मौसम इस दिशा में अच्छा प्रयास है। ट्रैक 5 कूटनीति- दो देशों के मीडिया के बीच संबंध बनाए जाते है। इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक आवश्यकता जैसे मुद्दे शामिल किए जाते है। जैसे कश्मीर के मुद्दे पर चर्चा के दौरान किसी मीडिया चैनल द्वारा किसी पाकिस्तानी पत्रकार को भी आमंत्रित करना। ट्रैक 6 कूटनीति, इसमें जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर संबंध स्थापित किए जाते हैं। उदाहरण के लिए 2015 का पेरिस सम्मेलन, जिसमें जलवायु परिवर्तन पर व्यापक विचार विमर्श हुआ। निष्कर्षतः, कहा जा सकता है कि वैश्विक शांति के लिए मल्टी ट्रैक कूटनीति एक व्यापक मार्ग प्रदान करती है। जिसका प्रयोग सभी देशों को करना चाहिए।
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What do you understand by the term "cryptocurrency", explain the technology it works on. What are its advantages and the risks associated with it? (150 words/10 marks)
Approach - Give a brief introduction about cryptocurrency. Explain the BlockChain technology it"s basedon. Discuss the advantages of cryptocurrency which made it popular. Discuss the disadvantages and its conflict with the traditional banking system. Also, discuss the regulatory concerns associated with cryptocurrency. Conclusion - its current status and future prospects. Digital currency that uses cryptography for security and anti-counterfeiting measure. They are not denominated in an official currency and re not issued by any central authority thus making it immune to government interference. It works through a distributed ledger technology called the blockchain. Blockchain is a decentralized distributed ledger that contains all the transactional data, a data is stored in a block which has a unique identifier called a "hash", the block also contains a hash of the previous block, hence any type of tempering will require changing the data of all blocks. This is only the first layer of security because as one tries to change consecutive blocks, it becomes more and more difficult. This is called proof of work system.The final layer of security comes from the fact that the entire blockchain is decentralized without any central authority. To create a new cryptocurrency, one has to solve complex cryptographic problems and the network of awards with units to successful miners. In recent times, they have gained traction owing to advantages like- Anonymity of users: There is no need to give documental proofs of income, age or residence, unlike in opening bank accounts. Cryptocurrency systems like Bitcoins, Ethereum offer legitimate financial services and promote more efficient global commerce. These are more secured as it uses blockchain technology. It is also much more efficient and multi-layered than that used by banks and credit cards. They carry lesser transaction fees. It is difficult to counterfeit. However, there are several risks associated with cryptocurrencies- Regulatory concerns-They are not regulated or controlled by governments, making them a lucrative option for tax evasion. Anonymity: Makes it an attractive destination for money laundering, illicit transactions and seeking ransom. Hijacking/Routing attacks: They are open systems and vulnerable to attacks. In 2015, the Japanese Exchange lost Bitcoins due to such an attack. Volatility: Its value can be quite volatile since its prices are based on demand and supply. Uncertainty over consumer protection and dispute settlement: They are decentralized and there is no single authority for mediation and dispute settlement. As a result, they have emerged as a regulatory nightmare for agencies: Challenges around transparency and anonymity. Cross border nature of transactions, hence issue of jurisdiction. Updating of IT and Digital laws and rules. Thus, many governments including India have banned cryptocurrency because of the above-mentioned reasons. However,Blockchain Technology is very beneficial and can be used in many areas such as smart contracts, financial services (trading), digital voting, tax compliance and regulation, monitoring supply chain, etc.
##Question:What do you understand by the term "cryptocurrency", explain the technology it works on. What are its advantages and the risks associated with it? (150 words/10 marks)##Answer:Approach - Give a brief introduction about cryptocurrency. Explain the BlockChain technology it"s basedon. Discuss the advantages of cryptocurrency which made it popular. Discuss the disadvantages and its conflict with the traditional banking system. Also, discuss the regulatory concerns associated with cryptocurrency. Conclusion - its current status and future prospects. Digital currency that uses cryptography for security and anti-counterfeiting measure. They are not denominated in an official currency and re not issued by any central authority thus making it immune to government interference. It works through a distributed ledger technology called the blockchain. Blockchain is a decentralized distributed ledger that contains all the transactional data, a data is stored in a block which has a unique identifier called a "hash", the block also contains a hash of the previous block, hence any type of tempering will require changing the data of all blocks. This is only the first layer of security because as one tries to change consecutive blocks, it becomes more and more difficult. This is called proof of work system.The final layer of security comes from the fact that the entire blockchain is decentralized without any central authority. To create a new cryptocurrency, one has to solve complex cryptographic problems and the network of awards with units to successful miners. In recent times, they have gained traction owing to advantages like- Anonymity of users: There is no need to give documental proofs of income, age or residence, unlike in opening bank accounts. Cryptocurrency systems like Bitcoins, Ethereum offer legitimate financial services and promote more efficient global commerce. These are more secured as it uses blockchain technology. It is also much more efficient and multi-layered than that used by banks and credit cards. They carry lesser transaction fees. It is difficult to counterfeit. However, there are several risks associated with cryptocurrencies- Regulatory concerns-They are not regulated or controlled by governments, making them a lucrative option for tax evasion. Anonymity: Makes it an attractive destination for money laundering, illicit transactions and seeking ransom. Hijacking/Routing attacks: They are open systems and vulnerable to attacks. In 2015, the Japanese Exchange lost Bitcoins due to such an attack. Volatility: Its value can be quite volatile since its prices are based on demand and supply. Uncertainty over consumer protection and dispute settlement: They are decentralized and there is no single authority for mediation and dispute settlement. As a result, they have emerged as a regulatory nightmare for agencies: Challenges around transparency and anonymity. Cross border nature of transactions, hence issue of jurisdiction. Updating of IT and Digital laws and rules. Thus, many governments including India have banned cryptocurrency because of the above-mentioned reasons. However,Blockchain Technology is very beneficial and can be used in many areas such as smart contracts, financial services (trading), digital voting, tax compliance and regulation, monitoring supply chain, etc.
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The growing feeling of regionalism is essential for demand of separate states. Discuss (150 words/10 marks)
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION- What Is Regionalism - WHAT IS THE BASIS OF REGIONALISM- one-one example each . -CONCLUSION ANSWER: A region is a homogenous area which is culturally and physically distinct from the neighbouring areas. People have an awareness that they are similar, however distinct from the others. Based on this idea, they develop an identity and based on this identity, they start professing their political loyalties towards the region rather than to the state or the nation to which they belong to. Regionalism is rooted in India"s diversity wrt caste, religion, language, class etc. When all these factors get geographically concentrated, along with the feeling of relative deprivation, it is referred to as regionalism. BASIS FOR REGIONALISM 1) HISTORICAL For example, wrt Dravidanadu/ Dravidistan- The demand was supported by the theory that the Dravidian speaking area once had non-Brahminical polity, which was destroyed by Aryan conquest and Brahminical hegemony. Likewise, the idea of Tamil nationalism was based on idealization of ancient Tamil history. 2) GEOGRAPHICAL FACTORS The geographical factors are as follows: 2.1) PRESENCE OF NATURAL RESOURCES 2.2) CLIMATIC FACTORS 2.3) LANDFORMS- For example, the plain areas are often more developed than the hilly areas. 2.4) BORDERS- For example, in the North East (NE) India- 99% of their borders are international leading to the issues of illegal migration, drug trafficking etc. 2.5) CONNECTIVITY WITH THE MAIN-LAND INDIA - For example, NE connects with the mainland India only through the narrow Siliguri Corridor, leading to the building of regionalism there instead of nationalism (belongingness to the region rather than the nation). 2.6) BUFFER AREAS - For Example- The Bundelkhand area belongs to both Uttar Pradesh and Madhya Pradesh- No one wants to give up control nor do they take up the responsibility to develop it. 3) CULTURAL FACTORS The cultural factors are as follows: 3.1) LANGUAGE- The examples are the linguistic re-organisation of states, official language, Gorkha land issues, the recent decision that Urdu will replace Sanskrit in Uttarakhand. 3.2) CASTE- The demand for a separate state of Tamil Nadu is a manifestation of such regionalism. Also, the anti-caste movement provided a strong impetus to linguistic regionalism. 3.3) RELIGION- Since any demand on the basis of caste and religion would act as a threat to the essence of secularism, it was always presented in the garb of either language or under-development. 4) POLITICAL FACTORS Politics does not create regionalism. It only accentuates it. They take advantage of the situation of regional discontent and convert it in their favour, so as to strengthen their vote bank 4.1)For example-NSCN, AIADMK parties etc. 4.2)The crux of regional politics is based on limited resources and disproportionate demands. 4.3)The economic policies of the government have been such that it has aggravated the regional imbalances and economic disparities- It is due to the unequal distribution of developmental benefits that the demand for new states has emerged. 4.4) For example, the Telangana movement- they did all the work but the profit was reaped by the zamindars. As per the tripartite agreement- Mulki or Gentleman’s Agreement- it was said that the Andhra government will make special provisions in higher education and government jobs for the people from Telangana. The youth of Andhra was thus unhappy, and this agreement was not respected. Slowly, an antagonistic feeling started getting carved up. And finally, the division of states happened. So, the economic reality was there- But when the politicians started to appease them, a separate state was carved out. Therefore, the factors are always there- but where third forces are present, the feeling is very strong. If third forces are missing (which channelizes and mobilises the people), then the demands are not so strong. For example, in Vidarbha- there is the recurrent farmer suicide problem. However, demand for a separate state was only there when a particular political party was pitching in for the same. As soon as the party came to power, there was no talk about a separate state, despite the region still facing farmer suicides.
##Question:The growing feeling of regionalism is essential for demand of separate states. Discuss (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION- What Is Regionalism - WHAT IS THE BASIS OF REGIONALISM- one-one example each . -CONCLUSION ANSWER: A region is a homogenous area which is culturally and physically distinct from the neighbouring areas. People have an awareness that they are similar, however distinct from the others. Based on this idea, they develop an identity and based on this identity, they start professing their political loyalties towards the region rather than to the state or the nation to which they belong to. Regionalism is rooted in India"s diversity wrt caste, religion, language, class etc. When all these factors get geographically concentrated, along with the feeling of relative deprivation, it is referred to as regionalism. BASIS FOR REGIONALISM 1) HISTORICAL For example, wrt Dravidanadu/ Dravidistan- The demand was supported by the theory that the Dravidian speaking area once had non-Brahminical polity, which was destroyed by Aryan conquest and Brahminical hegemony. Likewise, the idea of Tamil nationalism was based on idealization of ancient Tamil history. 2) GEOGRAPHICAL FACTORS The geographical factors are as follows: 2.1) PRESENCE OF NATURAL RESOURCES 2.2) CLIMATIC FACTORS 2.3) LANDFORMS- For example, the plain areas are often more developed than the hilly areas. 2.4) BORDERS- For example, in the North East (NE) India- 99% of their borders are international leading to the issues of illegal migration, drug trafficking etc. 2.5) CONNECTIVITY WITH THE MAIN-LAND INDIA - For example, NE connects with the mainland India only through the narrow Siliguri Corridor, leading to the building of regionalism there instead of nationalism (belongingness to the region rather than the nation). 2.6) BUFFER AREAS - For Example- The Bundelkhand area belongs to both Uttar Pradesh and Madhya Pradesh- No one wants to give up control nor do they take up the responsibility to develop it. 3) CULTURAL FACTORS The cultural factors are as follows: 3.1) LANGUAGE- The examples are the linguistic re-organisation of states, official language, Gorkha land issues, the recent decision that Urdu will replace Sanskrit in Uttarakhand. 3.2) CASTE- The demand for a separate state of Tamil Nadu is a manifestation of such regionalism. Also, the anti-caste movement provided a strong impetus to linguistic regionalism. 3.3) RELIGION- Since any demand on the basis of caste and religion would act as a threat to the essence of secularism, it was always presented in the garb of either language or under-development. 4) POLITICAL FACTORS Politics does not create regionalism. It only accentuates it. They take advantage of the situation of regional discontent and convert it in their favour, so as to strengthen their vote bank 4.1)For example-NSCN, AIADMK parties etc. 4.2)The crux of regional politics is based on limited resources and disproportionate demands. 4.3)The economic policies of the government have been such that it has aggravated the regional imbalances and economic disparities- It is due to the unequal distribution of developmental benefits that the demand for new states has emerged. 4.4) For example, the Telangana movement- they did all the work but the profit was reaped by the zamindars. As per the tripartite agreement- Mulki or Gentleman’s Agreement- it was said that the Andhra government will make special provisions in higher education and government jobs for the people from Telangana. The youth of Andhra was thus unhappy, and this agreement was not respected. Slowly, an antagonistic feeling started getting carved up. And finally, the division of states happened. So, the economic reality was there- But when the politicians started to appease them, a separate state was carved out. Therefore, the factors are always there- but where third forces are present, the feeling is very strong. If third forces are missing (which channelizes and mobilises the people), then the demands are not so strong. For example, in Vidarbha- there is the recurrent farmer suicide problem. However, demand for a separate state was only there when a particular political party was pitching in for the same. As soon as the party came to power, there was no talk about a separate state, despite the region still facing farmer suicides.
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होमरुल आंदोलन का संक्षिप्त परिचय देते हुए भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में इसके महत्व की चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द , अंक-10 ) Giving a brief introduction to the Home rule movement, discuss its importance in the Indian national movement. (150-200 words, Marks -10 )
दृष्टिकोण : होमरूल आंदोलन का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । इसके उदय के कारणों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । राष्ट्रीय आंदोलन के संदर्भ में इसके महत्व की संक्षिप्त चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान शिथिल पड़ चुके राष्ट्रीय आंदोलन को गति देने तथा राष्ट्रवादी चेतना को जागृत करने के उद्देशय से आयरलैंड के स्वशासन के मॉडल पर भारत में लोकमान्य तिलक व एनी बेसेंट द्वारा होमरूल लीग की स्थापना की गयी और स्वशासन के लिए आंदोलन चालाया गया । तिलक द्वारा अप्रैल 1916 में बेलगांव में होमरूल लीग की स्थापना की गयी और इसकी शाखाएँ महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रांत व बरार में खोली गयी । आगे सितंबर 1916 में अड्यार में एनी बेसेंट द्वारा होमरूल लीग की स्थापना की गयी और शेष भारत में इसकी शाखाएं खोली गयी । होमरूल के संदर्भ में लोगों को जागरुक करने के लिए सभाओं का आयोजन किया गया , राष्ट्रीय राजनीति से संबंधित पुस्तकों के पुस्तकालय एवं अध्ययन कक्षों का निर्माण किया गया । लीग ने अपने उद्देश्यों के प्रसार के साधनों के रूप में समाचार पत्रों , पोस्टर , पर्चों , पोस्टकार्ड, पैम्फ़लेट्स , नाटकों , लोक गीतों आदि माध्यमों का प्रयोग किया । होमरूल आंदोलन के उदय के कारण : विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय संसाधनों का अत्यधिक दोहन किया जा रहा था । युद्ध खर्चों के कारण लोगों पर अत्यधिक कर आरोपित किए गए । साथ ही महंगाई में वृद्धि के कारण भी आम जनजीवन अस्तव्यस्त था । इन सभी कारकों ने मिलकर आमजन को आंदोलित किया । 1914 में तिलक जेल से रिहा होकर राष्ट्रीय आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए प्रयासरत थे । उन्होंने अहिंसात्मक आंदोलन के जरिये स्वराज्य की प्राप्ति पर बल दिया । एनी बेसेंट भी भारत में लंबे समय से कार्यरत रही थीं और वह भी भारतीयों के लिए स्वशासन की समर्थक थी । होमरूल आंदोलन का महत्व : 1907 के पश्चात फिर एक बार राजनीतिक सक्रियता का वातावरण निर्मित हुआ तथा सरकार पर सुधारों के लिए दबाव बना । मजबूर होकर सैद्धांतिक तौर पर ही सही सरकार ने उत्तरदायी सरकार के गठन का आश्वशन दिया । आंदोलन के क्रम में राष्ट्रीय चेतना का ग्रामीण क्षेत्रों में भी प्रसार हुआ । आंदोलन के दौरान जो राजनीतिक ऊर्जा निर्मित हुई, उसने प्रारंभिक गांधीवादी आंदोलनों को आधार प्रदान किया । लीग ने कई ऐसे नेताओं को आगे बढ़ाया जिन्होंने परवर्ती काल में राष्ट्रीय आंदोलन को नेतृत्व प्रदान किया । अगस्त 1917 के बाद आंदोलन शिथिल हो गया तथापि इसने राष्ट्रीय आंदोलन को एक नए दौर में पहुंचाया । लीग के प्रयासों से कांग्रेस में पुनः एकता स्थापित हुई । लीग के धर्मनिरपेक्ष चरित्र के कारण भी राष्ट्रीय आंदोलन में एक सकारात्मक विकास दिखा ।
##Question:होमरुल आंदोलन का संक्षिप्त परिचय देते हुए भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में इसके महत्व की चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द , अंक-10 ) Giving a brief introduction to the Home rule movement, discuss its importance in the Indian national movement. (150-200 words, Marks -10 )##Answer:दृष्टिकोण : होमरूल आंदोलन का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । इसके उदय के कारणों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । राष्ट्रीय आंदोलन के संदर्भ में इसके महत्व की संक्षिप्त चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान शिथिल पड़ चुके राष्ट्रीय आंदोलन को गति देने तथा राष्ट्रवादी चेतना को जागृत करने के उद्देशय से आयरलैंड के स्वशासन के मॉडल पर भारत में लोकमान्य तिलक व एनी बेसेंट द्वारा होमरूल लीग की स्थापना की गयी और स्वशासन के लिए आंदोलन चालाया गया । तिलक द्वारा अप्रैल 1916 में बेलगांव में होमरूल लीग की स्थापना की गयी और इसकी शाखाएँ महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रांत व बरार में खोली गयी । आगे सितंबर 1916 में अड्यार में एनी बेसेंट द्वारा होमरूल लीग की स्थापना की गयी और शेष भारत में इसकी शाखाएं खोली गयी । होमरूल के संदर्भ में लोगों को जागरुक करने के लिए सभाओं का आयोजन किया गया , राष्ट्रीय राजनीति से संबंधित पुस्तकों के पुस्तकालय एवं अध्ययन कक्षों का निर्माण किया गया । लीग ने अपने उद्देश्यों के प्रसार के साधनों के रूप में समाचार पत्रों , पोस्टर , पर्चों , पोस्टकार्ड, पैम्फ़लेट्स , नाटकों , लोक गीतों आदि माध्यमों का प्रयोग किया । होमरूल आंदोलन के उदय के कारण : विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय संसाधनों का अत्यधिक दोहन किया जा रहा था । युद्ध खर्चों के कारण लोगों पर अत्यधिक कर आरोपित किए गए । साथ ही महंगाई में वृद्धि के कारण भी आम जनजीवन अस्तव्यस्त था । इन सभी कारकों ने मिलकर आमजन को आंदोलित किया । 1914 में तिलक जेल से रिहा होकर राष्ट्रीय आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए प्रयासरत थे । उन्होंने अहिंसात्मक आंदोलन के जरिये स्वराज्य की प्राप्ति पर बल दिया । एनी बेसेंट भी भारत में लंबे समय से कार्यरत रही थीं और वह भी भारतीयों के लिए स्वशासन की समर्थक थी । होमरूल आंदोलन का महत्व : 1907 के पश्चात फिर एक बार राजनीतिक सक्रियता का वातावरण निर्मित हुआ तथा सरकार पर सुधारों के लिए दबाव बना । मजबूर होकर सैद्धांतिक तौर पर ही सही सरकार ने उत्तरदायी सरकार के गठन का आश्वशन दिया । आंदोलन के क्रम में राष्ट्रीय चेतना का ग्रामीण क्षेत्रों में भी प्रसार हुआ । आंदोलन के दौरान जो राजनीतिक ऊर्जा निर्मित हुई, उसने प्रारंभिक गांधीवादी आंदोलनों को आधार प्रदान किया । लीग ने कई ऐसे नेताओं को आगे बढ़ाया जिन्होंने परवर्ती काल में राष्ट्रीय आंदोलन को नेतृत्व प्रदान किया । अगस्त 1917 के बाद आंदोलन शिथिल हो गया तथापि इसने राष्ट्रीय आंदोलन को एक नए दौर में पहुंचाया । लीग के प्रयासों से कांग्रेस में पुनः एकता स्थापित हुई । लीग के धर्मनिरपेक्ष चरित्र के कारण भी राष्ट्रीय आंदोलन में एक सकारात्मक विकास दिखा ।
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भारतीय रिजर्व बैंक के गठन की प्रक्रिया का वर्णन करते हुए, इसके प्रमुख मौद्रिक नीतियों की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) While describing the process of formation of Reserve Bank of India, discuss its major monetary policies. (150-200 words)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत भारतीय रिजर्व बैंक के पृष्ठिभूमि का वर्णन करते हुए कीजिये | इसके पश्चात भारतीय रिजर्व बैंक के गठन की प्रक्रिया को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में रिजर्व बैंक के मौद्रिक नीति को विस्तार से बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर भारतीय रिजर्व बैंक 20 वीं सदी के प्रारंभ में ही यह चर्चा प्रारम्भ हो चुकी थी कि बैंकिंग व्यवस्था को केन्द्रेकृत करते हुए कुछ नियंत्रणों के प्रयास किये जाएँ |जिसमे 1929 की वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद अधिक स्पष्टता आई | भारतीय परिप्रेक्ष्य में वर्ष 1913 में कम्पनी एक्ट के अंतर्गत बैंकों के रजिस्टर की प्रक्रिया बनायी गयी |वर्ष 1926 में हिल्टन यंग समिति ने रिजर्व बैंक के गठन की बात कही | भारतीय रिजर्व बैंक के गठन की प्रक्रिया वर्ष 1926 में हिल्टन यंग समिति ने रिजर्व बैंक के गठन की बात कही | 31 मार्च 1934 को RBI एक्ट पास किया गया तथा 1935 से RBI कार्यरत रहा, जिसके पहले गवेर्नेर आसबर्ग स्मिथ बने | पहले भारतीय गवर्नर सीडी देशमुख 1945 में बने | RBI के गठन में 5 लाख विनिमय पात्र जारी किये गए, जिसमे 5 करोड़ पेडक्ट पूँजी की व्यवस्था हुई | यद्यपि प्रारम्भ में RBI मुख्यतः निजी निवेशकों का बैंक था एवं सरकार के पास सिर्फ 4.4 प्रतिशत का हिस्सा था | जिसे वर्ष 1948 में स्वामित्व हस्तांतरण कानून द्वारा शत प्रतिशत सरकार को सौंपा गया | 1949 में बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट के निर्धारण के साथ RBI को केन्द्रीय बैंक बनाते हुए बैंकों के संदर्भ में रजिस्ट्रेशन एवं अन्य नियमों के अधिकार दिए गए | इस बैंककारी विनियमन अधिनियम के अंतर्गत बैंको को RBI द्वारा दिए गए निर्देशों को मानना बाध्य है एवंकिसी भी प्रकार की मुद्रा की छपाई एवं मुद्रा आपूर्ति पर नियंत्रण भी RBI के मुख्य कार्य होंगे | वर्ष 1949 से पहले सिर्फ उन्ही बैंको पर RBI का कुछ नियंत्रण था, जिनके पास 5 लाख से अधिक पेडक्ट पूँजी हो,इन बैंको के सन्दर्भ में RBI, CRR निर्धारित कर सकता था | ऐसे बैंको को RBI कानून के धारा 2 में सूचीबद्ध किया गया, जिन्हें अनुसूचित बैंक कहा जाता है | आदि मौद्रिक नीति एवं मुद्रा आपूर्ति नियंत्रण मौद्रिक नीति के प्रमुख उद्देश्यों में मुद्रा आपूर्ति के नियंत्रण को रखा जाता है | जिसके दो विकल्प डियर मनी एवं चीप मनी कहे जाते हैं | यदि नीति का उद्देश्य तरलता को बढ़ाना हो तो उसे चीप मनी तथा यदि उसका उद्देश्य तरलता को घटाना हो तो उसे डियर मनी कहा जाता है | कभी -कभी इन्हें टाईट मनी या लूज मनी एवं निवेशकों के हिसाब से हॉट मनी आदि की संज्ञा दी जाती है | यदि अंतरराष्ट्रीय निवेशक किसी देश को त्वरित लाभ का केंद्र मान रहे हो तो उसे हॉट मनी अर्थव्यवस्थाएं कहा जाता है | इस मुद्रा आपूर्ति के संतुलन के विकल्प निम्नलिखित हैं, जो मात्रात्मक एवं गुणात्मक सन्दर्भ में देखे जाते हैं - बैंक दर - यह वह दर है जिसपर RBI बैंकों को ऋण उपलब्ध करा रहा होता है | अतः यदि बैंक दर अधिक होगी तो तरलता कम हो जायेगी | नकद आरक्षित अनुपात (CRR) - यह वह अनुपात है जो बैंको को RBI के पास आरक्षित रखना होता है | तथा यदि इसे बढा दिया जाय तो तरलता कम हो जायेगी | वैधानिक तरलता अनुपात (SLR) - यह, वह अनुपात है जो नकद प्रतिभूति या अन्य माध्यमों द्वारा बैंकों को अपने पास आरक्षित रखना होता है | यदि यह अधिक हो तो तरलता कम हो जायेगी | रेपो एवं रिवर्स रेपो दर -अल्पकालिक ऋणों हेतु रेपो व्यवस्था का प्रयोग किया जाता है | सैद्धांतिक रूप से यदि RBI बैंको को लोन दे रहा हो तो उसे रेपो दर एवं यदि बैंको से लोन ले रहा हो तो उसे रिवर्स रेपो दर कहा जाता है | भारतीय परिप्रेक्ष्य में वर्ष 2000 से नरसिम्हन समिति की सिफारिश को मानते हुए इसे "चलनिधि समायोजन सुविधा" (LAF) के अंतर्गत रखा गया है | रेपो लेन देन में एक-दूसरे के पास प्रतिभूति को दिए गए दर पर रखा जाता है, जिसमे दिए गए समय के बाद उन्हें वापस खरीदने की बाध्यता अन्तर्निहित होती है | अर्थात यदि बैंक ने रेपो दर पर रबी से पैसा लिया है तो वह यह भी स्पष्ट करेगा कि कितने समय बाद वह इन प्रतिभूतियों को दुबारा खरीदेगा | अर्थात बैंक RBI से प्रतिभूति के एवज में अधिक ऋण लेंगे जिससे तरलता में वृद्धि हो जायेगी तथा यदि रिवर्स रेपो दर बढ़ा दिया जाय तो बैंक RBI को उने प्रतिभूति के एवज में ऋण देना पसंद करेंगे जिससे तरलता में कमी आएगी | यह दोनों प्रयास लघुकालिक स्तर पर तरलता प्रबंधन एवं मुद्रास्फीति नियंत्रण हेतु किये जाते हैं | वर्ष 2010 के बाद के वितीय सुधारों में एक मुख्य आकर्षण MSF - सीमान्त स्थायी सुविधा है , जिसके अंतर्गत बैंक एक या उससे अधिक दिनों हेतु तरलता प्रबंधन के लिए RBI से प्रतिभूति का लेन देन कर सकते हैं | 20 जनवरी 2020 में रेपो दर 5.15 प्रतिशत, रिवर्स रेपो दर -4.9 प्रतिशत, MSF -5.4 प्रतिशत, बैंक दर -5.4, CRR -4 प्रतिशत तथा एसएलआर- 18.4 प्रतिशत है तथा G -SEC पर व्याज दर 6.45 प्रतिशत है |वहीँ गुणात्मक संदर्भों में क्षेत्रों की प्राथमिकता सुनिश्चित कर, मार्जिन सीमाओं को बढ़ा-घटाकर एवं नैतिक दबाव के माध्यम से मुद्रा आपूर्ति को सीमित किया जाता है |
##Question:भारतीय रिजर्व बैंक के गठन की प्रक्रिया का वर्णन करते हुए, इसके प्रमुख मौद्रिक नीतियों की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) While describing the process of formation of Reserve Bank of India, discuss its major monetary policies. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत भारतीय रिजर्व बैंक के पृष्ठिभूमि का वर्णन करते हुए कीजिये | इसके पश्चात भारतीय रिजर्व बैंक के गठन की प्रक्रिया को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में रिजर्व बैंक के मौद्रिक नीति को विस्तार से बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर भारतीय रिजर्व बैंक 20 वीं सदी के प्रारंभ में ही यह चर्चा प्रारम्भ हो चुकी थी कि बैंकिंग व्यवस्था को केन्द्रेकृत करते हुए कुछ नियंत्रणों के प्रयास किये जाएँ |जिसमे 1929 की वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद अधिक स्पष्टता आई | भारतीय परिप्रेक्ष्य में वर्ष 1913 में कम्पनी एक्ट के अंतर्गत बैंकों के रजिस्टर की प्रक्रिया बनायी गयी |वर्ष 1926 में हिल्टन यंग समिति ने रिजर्व बैंक के गठन की बात कही | भारतीय रिजर्व बैंक के गठन की प्रक्रिया वर्ष 1926 में हिल्टन यंग समिति ने रिजर्व बैंक के गठन की बात कही | 31 मार्च 1934 को RBI एक्ट पास किया गया तथा 1935 से RBI कार्यरत रहा, जिसके पहले गवेर्नेर आसबर्ग स्मिथ बने | पहले भारतीय गवर्नर सीडी देशमुख 1945 में बने | RBI के गठन में 5 लाख विनिमय पात्र जारी किये गए, जिसमे 5 करोड़ पेडक्ट पूँजी की व्यवस्था हुई | यद्यपि प्रारम्भ में RBI मुख्यतः निजी निवेशकों का बैंक था एवं सरकार के पास सिर्फ 4.4 प्रतिशत का हिस्सा था | जिसे वर्ष 1948 में स्वामित्व हस्तांतरण कानून द्वारा शत प्रतिशत सरकार को सौंपा गया | 1949 में बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट के निर्धारण के साथ RBI को केन्द्रीय बैंक बनाते हुए बैंकों के संदर्भ में रजिस्ट्रेशन एवं अन्य नियमों के अधिकार दिए गए | इस बैंककारी विनियमन अधिनियम के अंतर्गत बैंको को RBI द्वारा दिए गए निर्देशों को मानना बाध्य है एवंकिसी भी प्रकार की मुद्रा की छपाई एवं मुद्रा आपूर्ति पर नियंत्रण भी RBI के मुख्य कार्य होंगे | वर्ष 1949 से पहले सिर्फ उन्ही बैंको पर RBI का कुछ नियंत्रण था, जिनके पास 5 लाख से अधिक पेडक्ट पूँजी हो,इन बैंको के सन्दर्भ में RBI, CRR निर्धारित कर सकता था | ऐसे बैंको को RBI कानून के धारा 2 में सूचीबद्ध किया गया, जिन्हें अनुसूचित बैंक कहा जाता है | आदि मौद्रिक नीति एवं मुद्रा आपूर्ति नियंत्रण मौद्रिक नीति के प्रमुख उद्देश्यों में मुद्रा आपूर्ति के नियंत्रण को रखा जाता है | जिसके दो विकल्प डियर मनी एवं चीप मनी कहे जाते हैं | यदि नीति का उद्देश्य तरलता को बढ़ाना हो तो उसे चीप मनी तथा यदि उसका उद्देश्य तरलता को घटाना हो तो उसे डियर मनी कहा जाता है | कभी -कभी इन्हें टाईट मनी या लूज मनी एवं निवेशकों के हिसाब से हॉट मनी आदि की संज्ञा दी जाती है | यदि अंतरराष्ट्रीय निवेशक किसी देश को त्वरित लाभ का केंद्र मान रहे हो तो उसे हॉट मनी अर्थव्यवस्थाएं कहा जाता है | इस मुद्रा आपूर्ति के संतुलन के विकल्प निम्नलिखित हैं, जो मात्रात्मक एवं गुणात्मक सन्दर्भ में देखे जाते हैं - बैंक दर - यह वह दर है जिसपर RBI बैंकों को ऋण उपलब्ध करा रहा होता है | अतः यदि बैंक दर अधिक होगी तो तरलता कम हो जायेगी | नकद आरक्षित अनुपात (CRR) - यह वह अनुपात है जो बैंको को RBI के पास आरक्षित रखना होता है | तथा यदि इसे बढा दिया जाय तो तरलता कम हो जायेगी | वैधानिक तरलता अनुपात (SLR) - यह, वह अनुपात है जो नकद प्रतिभूति या अन्य माध्यमों द्वारा बैंकों को अपने पास आरक्षित रखना होता है | यदि यह अधिक हो तो तरलता कम हो जायेगी | रेपो एवं रिवर्स रेपो दर -अल्पकालिक ऋणों हेतु रेपो व्यवस्था का प्रयोग किया जाता है | सैद्धांतिक रूप से यदि RBI बैंको को लोन दे रहा हो तो उसे रेपो दर एवं यदि बैंको से लोन ले रहा हो तो उसे रिवर्स रेपो दर कहा जाता है | भारतीय परिप्रेक्ष्य में वर्ष 2000 से नरसिम्हन समिति की सिफारिश को मानते हुए इसे "चलनिधि समायोजन सुविधा" (LAF) के अंतर्गत रखा गया है | रेपो लेन देन में एक-दूसरे के पास प्रतिभूति को दिए गए दर पर रखा जाता है, जिसमे दिए गए समय के बाद उन्हें वापस खरीदने की बाध्यता अन्तर्निहित होती है | अर्थात यदि बैंक ने रेपो दर पर रबी से पैसा लिया है तो वह यह भी स्पष्ट करेगा कि कितने समय बाद वह इन प्रतिभूतियों को दुबारा खरीदेगा | अर्थात बैंक RBI से प्रतिभूति के एवज में अधिक ऋण लेंगे जिससे तरलता में वृद्धि हो जायेगी तथा यदि रिवर्स रेपो दर बढ़ा दिया जाय तो बैंक RBI को उने प्रतिभूति के एवज में ऋण देना पसंद करेंगे जिससे तरलता में कमी आएगी | यह दोनों प्रयास लघुकालिक स्तर पर तरलता प्रबंधन एवं मुद्रास्फीति नियंत्रण हेतु किये जाते हैं | वर्ष 2010 के बाद के वितीय सुधारों में एक मुख्य आकर्षण MSF - सीमान्त स्थायी सुविधा है , जिसके अंतर्गत बैंक एक या उससे अधिक दिनों हेतु तरलता प्रबंधन के लिए RBI से प्रतिभूति का लेन देन कर सकते हैं | 20 जनवरी 2020 में रेपो दर 5.15 प्रतिशत, रिवर्स रेपो दर -4.9 प्रतिशत, MSF -5.4 प्रतिशत, बैंक दर -5.4, CRR -4 प्रतिशत तथा एसएलआर- 18.4 प्रतिशत है तथा G -SEC पर व्याज दर 6.45 प्रतिशत है |वहीँ गुणात्मक संदर्भों में क्षेत्रों की प्राथमिकता सुनिश्चित कर, मार्जिन सीमाओं को बढ़ा-घटाकर एवं नैतिक दबाव के माध्यम से मुद्रा आपूर्ति को सीमित किया जाता है |
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साख सृजन की प्रक्रिया को विस्तार स्पष्ट करते हुए साख सृजन को प्रभावित करने वाले कारकों की उदाहरण सहित चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द) Explain the process of credit creation in detail and discuss the factors affecting credit creation with examples. (150-200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में साख सृजन को परिभाषित कीजिये, 2- प्रथम भाग में साख सृजन की प्रक्रिया को विस्तार स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में साख सृजन को प्रभावित करने वाले कारकों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में समाधानात्मक निष्कर्ष दीजिये साख को किये गये भुगतान को वापस भुगतान के रूप में प्राप्त करने के दावे के रूप में परिभाषित किया जाता है| अपनी जमाओं में से जब एक बैंक अपने ग्राहकों को ऋण देता है तो भविष्य में उस ग्राहक से ऋण वसूल करने का प्रबंध करता है अर्थात बैंक भविष्य में ऋणी से ऋण के रूप में दी गयी राशि के वापस भुगतान का दावा कर सकता है| अपनी इसी क्षमता के कारण कोई बैंक ब्याज लाभ प्राप्त करता है और अपनी जमाओं को बढाने के योग्य हो पाता है| इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को बैंक द्वारा किया गया साख सृजन कहते हैं| साख सृजन किसी व्यापारिक बैंक द्वारा किये जाने वाले प्रमुख क्रियाकलापों में से एक है| इसी के आधार पर बैंक अपने बैंकिंग कार्यों को करने में सक्षम हो पाता है| बैंक अपने सामान्य अनुभव से यह जानता है कि कि उसके ग्राहक अपनी सम्पूर्ण जमा को एक बार में बैंक से नहीं निकालेंगे, इस आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुचता है कि कोई ग्राहक कब उस बैंक से अपनी जमा का कितना भाग निकाल सकता है| अर्थात उसके ग्राहक अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए अपनी जमा का कुछ भाग निकाल सकते हैं और शेष भाग बैंक के पास ही जमा रखेंगे| बैंक अपने ग्राहकों की मांग पर भुगतान के लिए अपनी कुल जमा के कुछ अंश को अपने पास नकद के रूप में रखता है| कुल जमा के शेष भाग से बैंक साख सृजन करता है| साख सृजन की प्रक्रिया निम्नलिखित है किसी व्यक्ति (माना A )द्वारा बैंक में बचत खाता खोलने के लिए उस बैंक में 100 रूपये जमा करने पर बैंक की कुल जमा में 100 रूपये की वृद्धि हो जाती है, इस जमा को प्राथमिक जमा कहते हैं| जमा राशि का इंट्री उस ग्राहक की पासबुक में कर दी जाती है बैंक अपने अनुभव के आधार पर यह मान लेता है कि यह खाता धारक एक बार में 10% से अधिक राशि को नही निकलेगा अर्थात इस मांग को पूरा करने के लिए बैंक अपने पास जमा की गयी राशि का केवल 10% अर्थात 10 रुपये रखेगा और शेष 90 रुपये उसके पास साख सृजन के लिए उपलब्ध होते हैं| अगले चरण में उपरोक्त 90 रूपये को ऋण के रूप में लेने के लिए किसी ग्राहक (माना B) के आने पर बैंक उस ग्राहक के नाम एक खाता खोल कर उसे 90 रूपये का ऋण दे देता है और 90 रूपये की इंट्री उसकी पासबुक में कर देता है| इस तरह बैंक दूसरी जमा का सृजन करता है यहाँ भी बैंक अपने अनुभव के आधार पर यह मान लेता है कि यह खाताधारक (B) एक बार में 10% से अधिक राशि को नही निकलेगा अर्थात इस मांग को पूरा करने के लिए बैंक अपने पास जमा की गयी राशि का केवल 10% अर्थात 9 रुपये कैश रिजर्व के रूप में रखेगा और प्राथमिक जमा का शेष 81 रुपये को अपने पास साख सृजन के लिए रख लेता है| यह प्रक्रिया प्राथमिक जमा के शून्य होने तक जारी रहती है| इस तरह छोटी छोटी जमाओं के माध्यम से बैंक विशाल मात्रा में साख सृजन करते हैं और ब्याज लाभ प्राप्त करते हैं| बड़ी मात्रा में साख सृजन से अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति प्रभावित होती है| अधिक साख सृजन मुद्रा गुणांक में वृद्धि करता है| साख सृजन के स्तर के निर्धारण में अनेक कारकों की भूमिका होती है| साख सृजन के निर्धारक कारक जनता की बैंकिंग प्रवृत्ति का बैंकों की साख सृजन क्षमता पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है, साख सृजन का आधार प्राथमिक जमा होता है| प्राथमिक जमा की अनुपस्थिति में बैंक साख सृजन नहीं कर पायेंगे| इसी तरह जनता में बैंकिंग प्रवृत्ति के अधिक होने से बैंक के पास प्राथमिक जमा आधिक होगी, और बैंक अधिक साख सृजन करने में सक्षम होंगे| साख सृजन के आकार के निर्धारण में केन्द्रीय बैंक की मौद्रिक नीति का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है| केन्द्रीय बैंक द्वारा नकद अरक्षित अनुपात और वैधानिक तरलता अनुपात को बढाने पर बैंक की प्राथमिक जमा का बड़ा भाग इनकी व्यवस्था में लग जाता है इससे बैंक के पास साख सृजन के लिए उपलब्ध नकद में कमी आती है| इसी प्रकार केन्द्रीय बैंक द्वारा निर्धारित ब्याज दरें भी साख सृजन को प्रभावित करती हैं| जिन देशों में बैंकिंग सेवाओं का विस्तार अधिक हुआ है वहां साख सृजन अधिक होता है, सेवाओं का कम विस्तार साख सृजन में कमी लाता है| इसके अतिरिक्त साख सृजन के लिए उपलब्ध नकद की मात्रा, ऋण के बदले ली जाने वाली प्रतिभूतियों की गुणवत्ता, जारी चेकों के क्लियरेंस की तीव्रता आदि कारक भी साख सृजन को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करने वाले कारक हैं| चूँकि साख सृजन का सीधा प्रभाव मुद्रा आपूर्ति पर पड़ता है जिससे अर्थव्यवस्था की आर्थिक गतिविधियों में तेजी आती है अतः एक वांछित स्तर तक साख सृजन किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक होता है| अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीतिक दबाव की स्थिति के अतिरिक्त केन्द्रीय बैंक साख सृजन को सुचारू बनाए रखने का प्रयास करता है| जनता में बैंकिंग प्रवृत्ति के विकास के लिए वित्तीय समावेशन, JAM ट्रिनिटी का प्रयोग, निजी बैंकों को लाइसेंस, ऑनलाइन सुविधाओं का निरंतर विस्तार, रोजगार सृजन आदि कारक साख सृजन में सहायक होंगे|
##Question:साख सृजन की प्रक्रिया को विस्तार स्पष्ट करते हुए साख सृजन को प्रभावित करने वाले कारकों की उदाहरण सहित चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द) Explain the process of credit creation in detail and discuss the factors affecting credit creation with examples. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में साख सृजन को परिभाषित कीजिये, 2- प्रथम भाग में साख सृजन की प्रक्रिया को विस्तार स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में साख सृजन को प्रभावित करने वाले कारकों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में समाधानात्मक निष्कर्ष दीजिये साख को किये गये भुगतान को वापस भुगतान के रूप में प्राप्त करने के दावे के रूप में परिभाषित किया जाता है| अपनी जमाओं में से जब एक बैंक अपने ग्राहकों को ऋण देता है तो भविष्य में उस ग्राहक से ऋण वसूल करने का प्रबंध करता है अर्थात बैंक भविष्य में ऋणी से ऋण के रूप में दी गयी राशि के वापस भुगतान का दावा कर सकता है| अपनी इसी क्षमता के कारण कोई बैंक ब्याज लाभ प्राप्त करता है और अपनी जमाओं को बढाने के योग्य हो पाता है| इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को बैंक द्वारा किया गया साख सृजन कहते हैं| साख सृजन किसी व्यापारिक बैंक द्वारा किये जाने वाले प्रमुख क्रियाकलापों में से एक है| इसी के आधार पर बैंक अपने बैंकिंग कार्यों को करने में सक्षम हो पाता है| बैंक अपने सामान्य अनुभव से यह जानता है कि कि उसके ग्राहक अपनी सम्पूर्ण जमा को एक बार में बैंक से नहीं निकालेंगे, इस आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुचता है कि कोई ग्राहक कब उस बैंक से अपनी जमा का कितना भाग निकाल सकता है| अर्थात उसके ग्राहक अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए अपनी जमा का कुछ भाग निकाल सकते हैं और शेष भाग बैंक के पास ही जमा रखेंगे| बैंक अपने ग्राहकों की मांग पर भुगतान के लिए अपनी कुल जमा के कुछ अंश को अपने पास नकद के रूप में रखता है| कुल जमा के शेष भाग से बैंक साख सृजन करता है| साख सृजन की प्रक्रिया निम्नलिखित है किसी व्यक्ति (माना A )द्वारा बैंक में बचत खाता खोलने के लिए उस बैंक में 100 रूपये जमा करने पर बैंक की कुल जमा में 100 रूपये की वृद्धि हो जाती है, इस जमा को प्राथमिक जमा कहते हैं| जमा राशि का इंट्री उस ग्राहक की पासबुक में कर दी जाती है बैंक अपने अनुभव के आधार पर यह मान लेता है कि यह खाता धारक एक बार में 10% से अधिक राशि को नही निकलेगा अर्थात इस मांग को पूरा करने के लिए बैंक अपने पास जमा की गयी राशि का केवल 10% अर्थात 10 रुपये रखेगा और शेष 90 रुपये उसके पास साख सृजन के लिए उपलब्ध होते हैं| अगले चरण में उपरोक्त 90 रूपये को ऋण के रूप में लेने के लिए किसी ग्राहक (माना B) के आने पर बैंक उस ग्राहक के नाम एक खाता खोल कर उसे 90 रूपये का ऋण दे देता है और 90 रूपये की इंट्री उसकी पासबुक में कर देता है| इस तरह बैंक दूसरी जमा का सृजन करता है यहाँ भी बैंक अपने अनुभव के आधार पर यह मान लेता है कि यह खाताधारक (B) एक बार में 10% से अधिक राशि को नही निकलेगा अर्थात इस मांग को पूरा करने के लिए बैंक अपने पास जमा की गयी राशि का केवल 10% अर्थात 9 रुपये कैश रिजर्व के रूप में रखेगा और प्राथमिक जमा का शेष 81 रुपये को अपने पास साख सृजन के लिए रख लेता है| यह प्रक्रिया प्राथमिक जमा के शून्य होने तक जारी रहती है| इस तरह छोटी छोटी जमाओं के माध्यम से बैंक विशाल मात्रा में साख सृजन करते हैं और ब्याज लाभ प्राप्त करते हैं| बड़ी मात्रा में साख सृजन से अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति प्रभावित होती है| अधिक साख सृजन मुद्रा गुणांक में वृद्धि करता है| साख सृजन के स्तर के निर्धारण में अनेक कारकों की भूमिका होती है| साख सृजन के निर्धारक कारक जनता की बैंकिंग प्रवृत्ति का बैंकों की साख सृजन क्षमता पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है, साख सृजन का आधार प्राथमिक जमा होता है| प्राथमिक जमा की अनुपस्थिति में बैंक साख सृजन नहीं कर पायेंगे| इसी तरह जनता में बैंकिंग प्रवृत्ति के अधिक होने से बैंक के पास प्राथमिक जमा आधिक होगी, और बैंक अधिक साख सृजन करने में सक्षम होंगे| साख सृजन के आकार के निर्धारण में केन्द्रीय बैंक की मौद्रिक नीति का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है| केन्द्रीय बैंक द्वारा नकद अरक्षित अनुपात और वैधानिक तरलता अनुपात को बढाने पर बैंक की प्राथमिक जमा का बड़ा भाग इनकी व्यवस्था में लग जाता है इससे बैंक के पास साख सृजन के लिए उपलब्ध नकद में कमी आती है| इसी प्रकार केन्द्रीय बैंक द्वारा निर्धारित ब्याज दरें भी साख सृजन को प्रभावित करती हैं| जिन देशों में बैंकिंग सेवाओं का विस्तार अधिक हुआ है वहां साख सृजन अधिक होता है, सेवाओं का कम विस्तार साख सृजन में कमी लाता है| इसके अतिरिक्त साख सृजन के लिए उपलब्ध नकद की मात्रा, ऋण के बदले ली जाने वाली प्रतिभूतियों की गुणवत्ता, जारी चेकों के क्लियरेंस की तीव्रता आदि कारक भी साख सृजन को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करने वाले कारक हैं| चूँकि साख सृजन का सीधा प्रभाव मुद्रा आपूर्ति पर पड़ता है जिससे अर्थव्यवस्था की आर्थिक गतिविधियों में तेजी आती है अतः एक वांछित स्तर तक साख सृजन किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक होता है| अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीतिक दबाव की स्थिति के अतिरिक्त केन्द्रीय बैंक साख सृजन को सुचारू बनाए रखने का प्रयास करता है| जनता में बैंकिंग प्रवृत्ति के विकास के लिए वित्तीय समावेशन, JAM ट्रिनिटी का प्रयोग, निजी बैंकों को लाइसेंस, ऑनलाइन सुविधाओं का निरंतर विस्तार, रोजगार सृजन आदि कारक साख सृजन में सहायक होंगे|
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The growing feeling of regionalism is essential for demand of separate states. Discuss (150 words)
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION- What Is Regionalism - WHAT IS THE BASIS OF REGIONALISM- one-one example each. -CONCLUSION ANSWER: A region is a homogenous area which is culturally and physically distinct from the neighbouring areas. People have an awareness that they are similar, however distinct from the others. Based on this idea, they develop an identity and based on this identity, they start professing their political loyalties towards the region rather than to the state or the nation to which they belong to. Regionalism is rooted in India"s diversity wrt caste, religion, language, class etc. When all these factors get geographically concentrated, along with the feeling of relative deprivation, it is referred to as regionalism. BASIS FOR REGIONALISM 1) HISTORICAL For example, wrt Dravidanadu/ Dravidistan- The demand was supported by the theory that the Dravidian speaking area once had non-Brahminical polity, which was destroyed by Aryan conquest and Brahminical hegemony. Likewise, the idea of Tamil nationalism was based on idealization of ancient Tamil history. 2) GEOGRAPHICAL FACTORS The geographical factors are as follows: 2.1) PRESENCE OF NATURAL RESOURCES 2.2) CLIMATIC FACTORS 2.3) LANDFORMS- For example, the plain areas are often more developed than the hilly areas. 2.4) BORDERS- For example, in the North East (NE) India- 99% of their borders are international leading to the issues of illegal migration, drug trafficking etc. 2.5) CONNECTIVITY WITH THE MAIN-LAND INDIA- For example, NE connects with the mainland India only through the narrow Siliguri Corridor, leading to the building of regionalism there instead of nationalism (belongingness to the region rather than the nation). 2.6) BUFFER AREAS- For Example- The Bundelkhand area belongs to both Uttar Pradesh and Madhya Pradesh- No one wants to give up control nor do they take up the responsibility to develop it. 3) CULTURAL FACTORS The cultural factors are as follows: 3.1) LANGUAGE- The examples are the linguistic re-organisation of states, official language, Gorkha land issues, the recent decision that Urdu will replace Sanskrit in Uttarakhand. 3.2) CASTE- The demand for a separate state of Tamil Nadu is a manifestation of such regionalism. Also, the anti-caste movement provided a strong impetus to linguistic regionalism. 3.3) RELIGION- Since any demand on the basis of caste and religion would act as a threat to the essence of secularism, it was always presented in the garb of either language or under-development. 4) POLITICAL FACTORS Politics does not create regionalism. It only accentuates it. They take advantage of the situation of regional discontent and convert it in their favour, so as to strengthen their vote bank 4.1) For example- NSCN, AIADMK parties etc. 4.2) The crux of regional politics is based on limited resources and disproportionate demands. 4.3) The economic policies of the government have been such that it has aggravated the regional imbalances and economic disparities- It is due to the unequal distribution of developmental benefits that the demand for new states has emerged. 4.4) For example, the Telangana movement- they did all the work but the profit was reaped by the zamindars. As per the tripartite agreement- Mulki or Gentleman’s Agreement- it was said that the Andhra government will make special provisions in higher education and government jobs for the people from Telangana. The youth of Andhra was thus unhappy, and this agreement was not respected. Slowly, an antagonistic feeling started getting carved up. And finally, the division of states happened. So, the economic reality was there- But when the politicians started to appease them, a separate state was carved out. Therefore, the factors are always there- but where third forces are present, the feeling is very strong. If third forces are missing (which channelizes and mobilises the people), then the demands are not so strong. For example, in Vidarbha- there is the recurrent farmer suicide problem. However, demand for a separate state was only there when a particular political party was pitching in for the same. As soon as the party came to power, there was no talk about a separate state, despite the region still facing farmer suicides.
##Question:The growing feeling of regionalism is essential for demand of separate states. Discuss (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION- What Is Regionalism - WHAT IS THE BASIS OF REGIONALISM- one-one example each. -CONCLUSION ANSWER: A region is a homogenous area which is culturally and physically distinct from the neighbouring areas. People have an awareness that they are similar, however distinct from the others. Based on this idea, they develop an identity and based on this identity, they start professing their political loyalties towards the region rather than to the state or the nation to which they belong to. Regionalism is rooted in India"s diversity wrt caste, religion, language, class etc. When all these factors get geographically concentrated, along with the feeling of relative deprivation, it is referred to as regionalism. BASIS FOR REGIONALISM 1) HISTORICAL For example, wrt Dravidanadu/ Dravidistan- The demand was supported by the theory that the Dravidian speaking area once had non-Brahminical polity, which was destroyed by Aryan conquest and Brahminical hegemony. Likewise, the idea of Tamil nationalism was based on idealization of ancient Tamil history. 2) GEOGRAPHICAL FACTORS The geographical factors are as follows: 2.1) PRESENCE OF NATURAL RESOURCES 2.2) CLIMATIC FACTORS 2.3) LANDFORMS- For example, the plain areas are often more developed than the hilly areas. 2.4) BORDERS- For example, in the North East (NE) India- 99% of their borders are international leading to the issues of illegal migration, drug trafficking etc. 2.5) CONNECTIVITY WITH THE MAIN-LAND INDIA- For example, NE connects with the mainland India only through the narrow Siliguri Corridor, leading to the building of regionalism there instead of nationalism (belongingness to the region rather than the nation). 2.6) BUFFER AREAS- For Example- The Bundelkhand area belongs to both Uttar Pradesh and Madhya Pradesh- No one wants to give up control nor do they take up the responsibility to develop it. 3) CULTURAL FACTORS The cultural factors are as follows: 3.1) LANGUAGE- The examples are the linguistic re-organisation of states, official language, Gorkha land issues, the recent decision that Urdu will replace Sanskrit in Uttarakhand. 3.2) CASTE- The demand for a separate state of Tamil Nadu is a manifestation of such regionalism. Also, the anti-caste movement provided a strong impetus to linguistic regionalism. 3.3) RELIGION- Since any demand on the basis of caste and religion would act as a threat to the essence of secularism, it was always presented in the garb of either language or under-development. 4) POLITICAL FACTORS Politics does not create regionalism. It only accentuates it. They take advantage of the situation of regional discontent and convert it in their favour, so as to strengthen their vote bank 4.1) For example- NSCN, AIADMK parties etc. 4.2) The crux of regional politics is based on limited resources and disproportionate demands. 4.3) The economic policies of the government have been such that it has aggravated the regional imbalances and economic disparities- It is due to the unequal distribution of developmental benefits that the demand for new states has emerged. 4.4) For example, the Telangana movement- they did all the work but the profit was reaped by the zamindars. As per the tripartite agreement- Mulki or Gentleman’s Agreement- it was said that the Andhra government will make special provisions in higher education and government jobs for the people from Telangana. The youth of Andhra was thus unhappy, and this agreement was not respected. Slowly, an antagonistic feeling started getting carved up. And finally, the division of states happened. So, the economic reality was there- But when the politicians started to appease them, a separate state was carved out. Therefore, the factors are always there- but where third forces are present, the feeling is very strong. If third forces are missing (which channelizes and mobilises the people), then the demands are not so strong. For example, in Vidarbha- there is the recurrent farmer suicide problem. However, demand for a separate state was only there when a particular political party was pitching in for the same. As soon as the party came to power, there was no talk about a separate state, despite the region still facing farmer suicides.
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मौद्रिक प्रणाली में मुद्रा के कार्यों को सूचीबद्ध कीजिए। मुद्रा के विभिन्न प्रकारों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द, अंक-10) List the functions of currency in the monetary system. Discuss the different types of currency. (150-200 words, Marks-10)
Approach: भूमिका में मौद्रिक प्रणाली को परिभाषित कीजिए। मौद्रिक प्रणाली में मुद्रा के कार्यों को सूचीबद्ध कीजिए। मुद्रा के विभिन्न प्रकारों की चर्चा कीजिए। निष्कर्ष में मौद्रिक प्रणाली के महत्व की चर्चा कर सकते हैं। उत्तर: मौद्रिक प्रणाली से तात्पर्य किसी अर्थव्यवस्था में मुद्रा के प्रवाह से है।मुद्रा वह वस्तु होती है जिसे भुगतान करने हेतु सामान्यीकृत स्वीकृति होती है। मुद्रा किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए अति महत्वपूर्ण है। मुद्रा के कार्य विनिमय का माध्यम मान का समान माप स्थगित भुगतानों का मानक संपत्ति का भंडारण मुद्रा के प्रकार सम्पूर्ण मूर्तिमान मुद्रा - इसका मुद्रा मान इसकी वस्तु मान के समतुल्य होता है। उदाहरण - सोने के सिक्के सांकेतिक मुद्रा/टोकन मुद्रा/साख मुद्रा/ कागजी मुद्रा- इसका मुद्रा मान इसके वस्तु मान से बहुत अधिक होता है। प्रतिनिधि सम्पूर्ण मूर्तिमान मुद्रा- यह मुद्रा सांकेतिक मुद्रा के समान होती है। परंतु यह जारीकर्ता प्राधिकरण/सरकार द्वारा समतुल्य मान के स्वर्ण/चाँदी के भंडार के बदले/ आधार पर जारी की जा सकती है। परिवर्तनीय मुद्रा- यह मुद्रा, उसके जारीकर्ता प्राधिकरण द्वारा समतुल्य मान के स्वर्ण या चाँदी में परिवर्तित/विनिमय की जा सकती है। अपरिवर्तनीय मुद्रा - इस मुद्रा को इसके जारीकर्ता प्राधिकरण द्वारा स्वर्ण/ चाँदी में विनिमय नहीं किया जा सकता। अनुज्ञापित मुद्रा - सरकार के आदेश पर प्रचलित होती है। कानूनी शोधक मुद्रा - मौद्रिक लेन देनों हेतु इसे स्वीकार कानूनी बाध्यता होती है। सीमित कानूनी शोधक मुद्रा - एक सीमा तक के भुगतानों हेतु इसे स्वीकार करना अनिवार्य होता है। असीमित कानूनी शोधक मुद्रा - इससे असीमित भुगतान किया जा सकता है। गैर-कानूनी शोधक मुद्रा - मौद्रिक लेन देनों हेतु इसे स्वीकार करने की कानूनी बाध्यता नहीं होती है। विश्वाश्रित मुद्रा- यह मुद्रा पारस्परिक विश्वाश के आधार पर प्रचलित होती है। समीप मुद्रा - अत्यधिक तरल वित्तीय सम्पत्तियों को समीप मुद्रा कहते हैं। उदा. - चैक, ड्राफ्ट प्लास्टिक मुद्रा - डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड जमा मुद्रा - बैंकों एवं वित्तीय संस्थानों में जमा मुद्रा मौद्रिक प्रणाली के माध्यम से देश के केन्द्रीय बैंक द्वारा मौद्रिक नीति बनाई जाती है जो देश में अर्थव्यवस्था के विकास, रोजगार सृजन, मुद्रास्फीति नियंत्रण आदि की दिशा में प्रयासरत होती है।
##Question:मौद्रिक प्रणाली में मुद्रा के कार्यों को सूचीबद्ध कीजिए। मुद्रा के विभिन्न प्रकारों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द, अंक-10) List the functions of currency in the monetary system. Discuss the different types of currency. (150-200 words, Marks-10)##Answer:Approach: भूमिका में मौद्रिक प्रणाली को परिभाषित कीजिए। मौद्रिक प्रणाली में मुद्रा के कार्यों को सूचीबद्ध कीजिए। मुद्रा के विभिन्न प्रकारों की चर्चा कीजिए। निष्कर्ष में मौद्रिक प्रणाली के महत्व की चर्चा कर सकते हैं। उत्तर: मौद्रिक प्रणाली से तात्पर्य किसी अर्थव्यवस्था में मुद्रा के प्रवाह से है।मुद्रा वह वस्तु होती है जिसे भुगतान करने हेतु सामान्यीकृत स्वीकृति होती है। मुद्रा किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए अति महत्वपूर्ण है। मुद्रा के कार्य विनिमय का माध्यम मान का समान माप स्थगित भुगतानों का मानक संपत्ति का भंडारण मुद्रा के प्रकार सम्पूर्ण मूर्तिमान मुद्रा - इसका मुद्रा मान इसकी वस्तु मान के समतुल्य होता है। उदाहरण - सोने के सिक्के सांकेतिक मुद्रा/टोकन मुद्रा/साख मुद्रा/ कागजी मुद्रा- इसका मुद्रा मान इसके वस्तु मान से बहुत अधिक होता है। प्रतिनिधि सम्पूर्ण मूर्तिमान मुद्रा- यह मुद्रा सांकेतिक मुद्रा के समान होती है। परंतु यह जारीकर्ता प्राधिकरण/सरकार द्वारा समतुल्य मान के स्वर्ण/चाँदी के भंडार के बदले/ आधार पर जारी की जा सकती है। परिवर्तनीय मुद्रा- यह मुद्रा, उसके जारीकर्ता प्राधिकरण द्वारा समतुल्य मान के स्वर्ण या चाँदी में परिवर्तित/विनिमय की जा सकती है। अपरिवर्तनीय मुद्रा - इस मुद्रा को इसके जारीकर्ता प्राधिकरण द्वारा स्वर्ण/ चाँदी में विनिमय नहीं किया जा सकता। अनुज्ञापित मुद्रा - सरकार के आदेश पर प्रचलित होती है। कानूनी शोधक मुद्रा - मौद्रिक लेन देनों हेतु इसे स्वीकार कानूनी बाध्यता होती है। सीमित कानूनी शोधक मुद्रा - एक सीमा तक के भुगतानों हेतु इसे स्वीकार करना अनिवार्य होता है। असीमित कानूनी शोधक मुद्रा - इससे असीमित भुगतान किया जा सकता है। गैर-कानूनी शोधक मुद्रा - मौद्रिक लेन देनों हेतु इसे स्वीकार करने की कानूनी बाध्यता नहीं होती है। विश्वाश्रित मुद्रा- यह मुद्रा पारस्परिक विश्वाश के आधार पर प्रचलित होती है। समीप मुद्रा - अत्यधिक तरल वित्तीय सम्पत्तियों को समीप मुद्रा कहते हैं। उदा. - चैक, ड्राफ्ट प्लास्टिक मुद्रा - डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड जमा मुद्रा - बैंकों एवं वित्तीय संस्थानों में जमा मुद्रा मौद्रिक प्रणाली के माध्यम से देश के केन्द्रीय बैंक द्वारा मौद्रिक नीति बनाई जाती है जो देश में अर्थव्यवस्था के विकास, रोजगार सृजन, मुद्रास्फीति नियंत्रण आदि की दिशा में प्रयासरत होती है।
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नीचे दिए गये टॉपिक पर अधिकतम 600 शब्दों में निबंध लिखिए- प्रतिमाओं नहीं बल्कि आदर्शों के प्रति प्रतिबद्धता समय की मांग है। (Commitment to ideals, not idols, is the need of the hour.)
इस निबंध में निम्न आयामों पर ध्यान देने की आवश्यकता है- निबंध की शुरुआत के कई तरीके हो सकते हैं जैसे- उपरोक्त कथन को स्पष्ट करता हुआ कोई उदाहरण | उदाहरण- गांधीजी की प्रतिमा का हर जगह दिखाई देना परन्तु उनके आदर्शों पर चलने में कठिनाई| वर्तमान समय की परिस्थितियों का परिचय देना जैसे- समाज में नैतिक शिक्षा की जगह आर्थिक-भौतिक शिक्षा पर अत्यधिक बल; पर्यावरण की कीमत पर विकास; परस्पर बंधुत्व तथा भाईचारे की भावना में ह्रास; व्यक्तिवादी दृष्टिकोण पर अत्यधिक केंद्रण आदि; इन परिस्थितियों के संदर्भ में समय की मांग क्या है? जैसे- साक्षर होने की जगह शिक्षित होने के दृष्टिकोण को बढ़ावा; मूल्य आधारित शिक्षा को प्रोत्साहन; पर्यावरण तथा विकास को अलग-अलग करके ना देखना आदि; प्रतिमाओं पर आज के समय में अधिक फोकस रहना जैसे- हर जगह मूर्तियाँ तथा अन्य प्रतीक चिन्ह, स्मारकों आदि का दिखाई पड़ना; इन मूर्तियों/स्मारकों/प्रतिमाओं से संदर्भित दृष्टिकोण/विचार/मूल्य को आज के समय की मांग से जोड़ने की मांग को दर्शाना तथा इसके संदर्भ में उदाहरण देना; विभिन्न आदर्शों को दर्शाते हुए उन्हें आज के समय की मांग से जोड़ना;
##Question:नीचे दिए गये टॉपिक पर अधिकतम 600 शब्दों में निबंध लिखिए- प्रतिमाओं नहीं बल्कि आदर्शों के प्रति प्रतिबद्धता समय की मांग है। (Commitment to ideals, not idols, is the need of the hour.) ##Answer:इस निबंध में निम्न आयामों पर ध्यान देने की आवश्यकता है- निबंध की शुरुआत के कई तरीके हो सकते हैं जैसे- उपरोक्त कथन को स्पष्ट करता हुआ कोई उदाहरण | उदाहरण- गांधीजी की प्रतिमा का हर जगह दिखाई देना परन्तु उनके आदर्शों पर चलने में कठिनाई| वर्तमान समय की परिस्थितियों का परिचय देना जैसे- समाज में नैतिक शिक्षा की जगह आर्थिक-भौतिक शिक्षा पर अत्यधिक बल; पर्यावरण की कीमत पर विकास; परस्पर बंधुत्व तथा भाईचारे की भावना में ह्रास; व्यक्तिवादी दृष्टिकोण पर अत्यधिक केंद्रण आदि; इन परिस्थितियों के संदर्भ में समय की मांग क्या है? जैसे- साक्षर होने की जगह शिक्षित होने के दृष्टिकोण को बढ़ावा; मूल्य आधारित शिक्षा को प्रोत्साहन; पर्यावरण तथा विकास को अलग-अलग करके ना देखना आदि; प्रतिमाओं पर आज के समय में अधिक फोकस रहना जैसे- हर जगह मूर्तियाँ तथा अन्य प्रतीक चिन्ह, स्मारकों आदि का दिखाई पड़ना; इन मूर्तियों/स्मारकों/प्रतिमाओं से संदर्भित दृष्टिकोण/विचार/मूल्य को आज के समय की मांग से जोड़ने की मांग को दर्शाना तथा इसके संदर्भ में उदाहरण देना; विभिन्न आदर्शों को दर्शाते हुए उन्हें आज के समय की मांग से जोड़ना;
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Underline the factors responsible for industarilsation of East European industrial region citing relevant examples as well(150 words/10 marks)
Approach- Introduction -Briefly write what constitutes East European Industrial region Main Body - Write the nature of industrialization in the Region Further, write the factors which led to the growth of the industries in the region while giving an example of industries which grew Conclude Answer Eastern Europe industrial region also called USSR or Russian industrial region. It has 6 major industrial regions out of 4 are in Russia,1 is in Ukraine, 1 in southern Poland (part of erstwhile USSR). The industrialization in this region was not market forced industrialization but as they had a communist regime the government planned to fulfill the needs of people on its own so it retained the ownership of almost all resources, with no concept of private ownership. Such are the closed economy not open. The principle was taking from everyone as per the capacity, giving to everyone as per the need called a communist socialists economy Factors - The focus is on fulfilling basic needs and hence consumer good industries are less developed. One of the main goals of the economic strategy of the Soviet government was to overtake advanced capitalist economies in industrial output per head as quickly as possible. As a result, large-scale industry expanded rapidly. Also as they need good investments in defense for security purposes, capital goods and intermediate goods industry grew. For Ex: The defense sector, aviation, nuclear and space technology, energy, shipbuilding, etc. As this area had more resources of its own and the fewer population they became the world leaders in research by investing the profits back in the system for further development. So nuclear, thermal power technology is well developed, also a well-developed railway. For Ex, Trans Siberian railways are the world’s largest railway link. There is substantial disagreement among economists and historians as to which mechanisms caused rapid industrialization of the Soviet Union in 1928-40. Some view the Tsarist economy as being trapped in a low-income equilibrium and the " Big Push" policies of economy-wide investment pursued by the Soviet government as lifting the Russian economy out of that equilibrium. Lastly still some other emphasize ambitious production targets that Soviet enterprises were directed to achieve and "soft budget constraints " that incentivized state companies to expand demand for labor and capital, or violent collectivization policies that drove labor away from agriculture into state-owned heavy industries.
##Question:Underline the factors responsible for industarilsation of East European industrial region citing relevant examples as well(150 words/10 marks)##Answer:Approach- Introduction -Briefly write what constitutes East European Industrial region Main Body - Write the nature of industrialization in the Region Further, write the factors which led to the growth of the industries in the region while giving an example of industries which grew Conclude Answer Eastern Europe industrial region also called USSR or Russian industrial region. It has 6 major industrial regions out of 4 are in Russia,1 is in Ukraine, 1 in southern Poland (part of erstwhile USSR). The industrialization in this region was not market forced industrialization but as they had a communist regime the government planned to fulfill the needs of people on its own so it retained the ownership of almost all resources, with no concept of private ownership. Such are the closed economy not open. The principle was taking from everyone as per the capacity, giving to everyone as per the need called a communist socialists economy Factors - The focus is on fulfilling basic needs and hence consumer good industries are less developed. One of the main goals of the economic strategy of the Soviet government was to overtake advanced capitalist economies in industrial output per head as quickly as possible. As a result, large-scale industry expanded rapidly. Also as they need good investments in defense for security purposes, capital goods and intermediate goods industry grew. For Ex: The defense sector, aviation, nuclear and space technology, energy, shipbuilding, etc. As this area had more resources of its own and the fewer population they became the world leaders in research by investing the profits back in the system for further development. So nuclear, thermal power technology is well developed, also a well-developed railway. For Ex, Trans Siberian railways are the world’s largest railway link. There is substantial disagreement among economists and historians as to which mechanisms caused rapid industrialization of the Soviet Union in 1928-40. Some view the Tsarist economy as being trapped in a low-income equilibrium and the " Big Push" policies of economy-wide investment pursued by the Soviet government as lifting the Russian economy out of that equilibrium. Lastly still some other emphasize ambitious production targets that Soviet enterprises were directed to achieve and "soft budget constraints " that incentivized state companies to expand demand for labor and capital, or violent collectivization policies that drove labor away from agriculture into state-owned heavy industries.
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किसी अर्थव्यवस्था में आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने में केन्द्रीय बैंक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, कथन के विशेष संदर्भ में भारतीय रिजर्व बैंक के कार्यों का वर्णन कीजिये| (150 से 200 शब्द) The central bank has an important role in ensuring economic stability in an economy, with special reference to the statement explain the functions of the Reserve Bank of India. (150 to 200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में आर्थिक स्थिरता को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में केन्द्रीय बैंक के रूप में रिजर्व बैंक का परिचय दीजिये 3- दूसरे भाग में RBI के कार्यों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में निष्कर्ष के रूप में RBI के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये| किसी अवांछित आर्थिक संकट का सामना करने की क्षमता होने को किसी अर्थव्यवस्था की स्थिरता के रूप में समझ सकते हैं| किसी अर्थव्यवस्था में नियंत्रित मुद्रास्फीति, मूल्य स्थिरता, निरंतर होती आर्थिक वृद्धि, सुदृढ़ मौद्रिक प्रणाली, विनमय दर को स्थिर बनाए रखना, पूर्ण रोजगार की स्थिति और न्यूनतम गरीबी आदि कारक उस अर्थव्यवस्था की स्थिरता को सुनिश्चित करते हैं| इन कारकों की पूर्ति का कार्य उस अर्थव्यवस्था में उस देश का केन्द्रीय बैंक करता है| भारत में आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने का कार्य भारतीय रिजर्व बैंक करता है| भारतीय रिजर्व बैंक देश का केन्द्रीय बैंक है अर्थात मौद्रिक प्रणाली का शीर्ष संस्थान है| हिल्टन यंग समिति की संस्तुति पर RBI की स्थापना 1 अप्रैल 1935 को RBI अधिनियम 1934 के अंतर्गत की गयी थी| इसकी स्थापना 5 करोड़ रूपये की अंश पूँजी के साथ निजी क्षेत्र में की गयी थी| 1 जनवरी 1949 को RBI का राष्ट्रीयकरण किया गया था| इसकी स्थापना कलकत्ता में हुई थी लेकिन बाद में इसका मुख्यालय मुंबई स्थानांतरित कर दिया गया| रिजर्व बैंक भारत की मौद्रिक नीति का संचालक है| मौद्रिक नीति, देश की आर्थिक नीति का वह घटक है जिसके माध्यम से केन्द्रीय बैंक अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति (मुद्रा एवं साख) का नियमन करता है| यह वह नीति है जिसके माध्यम से RBI अपने अधीनस्थ उपकरणों(CRR, SLR आदि) का प्रयोग कर अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में मुद्रा एवं साख की उपलब्धता, उसका अंतिम प्रयोग, मुद्रा एवं साख की लागत(ब्याजदर)का नियमन करता है| रिजर्व बैंक निम्नलिखित गतिवधियों के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिरता सुनिश्चित करता है| RBI के कार्य मुद्रा का निर्गमन RBI अर्थव्यवस्था के लिए मुद्रा का निर्गमन करना है, मुद्रा अर्थव्यवस्था में होने वाली आर्थिक गतिविधियों का आधार होती है| RBI 2 रूपये तक के सिक्के/नोट जारी करता है, इन पर गवर्नर के हस्ताक्षर होते है जबकि 1 रूपये के नोट/सिक्के पर वित्त मंत्रालय के वित्त सचिव के हस्ताक्षर होते हैं क्योंकि इन्हें भारत सरकार निर्गमित करती है सरकार का बैंक RBI सरकार का बैंक है, केंद्र एवं राज्य सरकारों को RBI के पास खाता रखना होता है, केंद्र एवं राज्य सरकारों के सभी वित्तीय लेन-देन RBI के माध्यम से होते हैं, RBI, सरकार को वित्तीय मामलों में परामर्श भी देता है यह सरकारों(केंद्र-राज्य) को ऋण प्रदान करता है RBI सरकारी प्रतिभूतियों/बांडो के क्रय-विक्रय के माध्यम सेसार्वजनिक ऋण का प्रबंधन करता है अभी इसके लिए सार्वजनिक ऋण प्रबंधन एजेंसी का प्रावधान किया जा रहा है बैंकों का बैंक यह सभी बैंकों का नियमन करना है तथा अन्य सुविधाएं भी देता है| बैंकों को RBI के पास खाता एवं आरक्षित कोष रखना होता है RBI बैंकों को परामर्श भी देता है तथा बैंकों के पारस्परिक लेन-देनों का समाशोधन (clearance) कराता है यह आर्थिक संकट के समय में भी ऋण प्रदान करता है इसलिए RBI को अंतिम ऋणदाता भी कहा जाता है RBI बैंकों एवं कुछ NBFCs का पर्यवेक्षण और नियमन भी करता है भुगतान प्रणाली का पर्यवेक्षक देश एवं विदेश से कोष स्थानान्तरण मानदंडों का नियमन करता है चेक,DD,पोस्टल आर्डर, मनी आर्डर, NEFT, RTGS, IMPS(त्वरित भुगतान प्रणाली), कार्ड पेमेंट सिस्टम(ATM) आदि कोष स्थानान्तरण के माध्यम हैं| अभी इस कार्य को अलग करने की बात की जा रही है| भुगतान प्रणाली के पर्यवेक्षक के रूप में भुगतान विनियामक बोर्ड की संकल्पना की गयी है| विदेशी पूँजी भण्डार का संरक्षक भारत में केवल RBI एवं उसके अधिकृत एजेंट ही विदेशी पूँजी/मुद्रा में लेन-देन कर सकते हैं अधिकाँश बड़े बैंक ही RBI के अधिकृत एजेंट होते हैं, इनके पास उपलब्ध विदेशी पूँजी पर RBI की निगरानी में होते हैं, ये केवल एक सीमा तक ही विदेशी पूँजी रख सकते हैं| विदेशी मुद्रा विनिमय का नियंत्रण RBI रूपये को विदेशी मुद्राओं में एवं विदेशी मुद्राओं को रूपये में परिवर्तित करने सम्बन्धी मानदंड(परिवर्तनीयता) निर्धारित करता है, इनका निर्धारण FEMA अधिनियम के अंतर्गत निर्धारित होते हैं RBI रूपये के विनिमय दर का स्थिरीकरण भी करता है और मुद्रा के मूल्य को वांछित स्तर पर बनाए रखता है ताकि बाह्य अस्थिरताओं से भारतीय अर्थव्यवस्था की रक्षा की जा सके| मौद्रिक आंकड़ों का प्रकाशन RBI प्रत्येक 6 महीने पर मौद्रिक नीति रिपोर्ट जारी करता है इसके अतिरिक्त RBI करेंसी और फाइनेंस रिपोर्ट, वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट और मासिक पत्रिका के रूप में RBI बुलेटिन जारी करता है इनके माध्यम से केन्द्रीय बैंक अर्थव्यवस्था की मौद्रिक स्थिति को स्पष्ट करता है मुद्रा एवं साख का नियंत्रण RBI मौद्रिक नीति के माध्यम से अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति का नियमन करता है इसके लिए CRR, SLR आदि उपायों का प्रयोग करता है इसी प्रकार विकासात्मक कार्यों के अंतर्गतवित्तीय समावेशन का प्रोत्साहन, वित्तीय संस्थानों में स्थिरता बनाये रखना, मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखना आदि उपायों के माध्यम से RBI भारत मेंआर्थिक विकास का प्रोत्साहन करता है| अतःस्पष्ट होता है कि भारतीय रिजर्व बैंक को व्यापक अधिदेश प्राप्त है| इसी अधिदेश के माध्यम से भारतीय रिजर्व बैंक भारतीय अर्थव्यवस्था में आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करता है| आर्थिक स्थिरता ही भविष्य में आर्थिक विकास की संभावना का निर्माण करती है| इस सन्दर्भ में रिजर्व बैंक न केवल आर्थिक स्थिरता बल्कि आर्थिक विकास की परिस्थितियों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है|
##Question:किसी अर्थव्यवस्था में आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने में केन्द्रीय बैंक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, कथन के विशेष संदर्भ में भारतीय रिजर्व बैंक के कार्यों का वर्णन कीजिये| (150 से 200 शब्द) The central bank has an important role in ensuring economic stability in an economy, with special reference to the statement explain the functions of the Reserve Bank of India. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में आर्थिक स्थिरता को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में केन्द्रीय बैंक के रूप में रिजर्व बैंक का परिचय दीजिये 3- दूसरे भाग में RBI के कार्यों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में निष्कर्ष के रूप में RBI के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये| किसी अवांछित आर्थिक संकट का सामना करने की क्षमता होने को किसी अर्थव्यवस्था की स्थिरता के रूप में समझ सकते हैं| किसी अर्थव्यवस्था में नियंत्रित मुद्रास्फीति, मूल्य स्थिरता, निरंतर होती आर्थिक वृद्धि, सुदृढ़ मौद्रिक प्रणाली, विनमय दर को स्थिर बनाए रखना, पूर्ण रोजगार की स्थिति और न्यूनतम गरीबी आदि कारक उस अर्थव्यवस्था की स्थिरता को सुनिश्चित करते हैं| इन कारकों की पूर्ति का कार्य उस अर्थव्यवस्था में उस देश का केन्द्रीय बैंक करता है| भारत में आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने का कार्य भारतीय रिजर्व बैंक करता है| भारतीय रिजर्व बैंक देश का केन्द्रीय बैंक है अर्थात मौद्रिक प्रणाली का शीर्ष संस्थान है| हिल्टन यंग समिति की संस्तुति पर RBI की स्थापना 1 अप्रैल 1935 को RBI अधिनियम 1934 के अंतर्गत की गयी थी| इसकी स्थापना 5 करोड़ रूपये की अंश पूँजी के साथ निजी क्षेत्र में की गयी थी| 1 जनवरी 1949 को RBI का राष्ट्रीयकरण किया गया था| इसकी स्थापना कलकत्ता में हुई थी लेकिन बाद में इसका मुख्यालय मुंबई स्थानांतरित कर दिया गया| रिजर्व बैंक भारत की मौद्रिक नीति का संचालक है| मौद्रिक नीति, देश की आर्थिक नीति का वह घटक है जिसके माध्यम से केन्द्रीय बैंक अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति (मुद्रा एवं साख) का नियमन करता है| यह वह नीति है जिसके माध्यम से RBI अपने अधीनस्थ उपकरणों(CRR, SLR आदि) का प्रयोग कर अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में मुद्रा एवं साख की उपलब्धता, उसका अंतिम प्रयोग, मुद्रा एवं साख की लागत(ब्याजदर)का नियमन करता है| रिजर्व बैंक निम्नलिखित गतिवधियों के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिरता सुनिश्चित करता है| RBI के कार्य मुद्रा का निर्गमन RBI अर्थव्यवस्था के लिए मुद्रा का निर्गमन करना है, मुद्रा अर्थव्यवस्था में होने वाली आर्थिक गतिविधियों का आधार होती है| RBI 2 रूपये तक के सिक्के/नोट जारी करता है, इन पर गवर्नर के हस्ताक्षर होते है जबकि 1 रूपये के नोट/सिक्के पर वित्त मंत्रालय के वित्त सचिव के हस्ताक्षर होते हैं क्योंकि इन्हें भारत सरकार निर्गमित करती है सरकार का बैंक RBI सरकार का बैंक है, केंद्र एवं राज्य सरकारों को RBI के पास खाता रखना होता है, केंद्र एवं राज्य सरकारों के सभी वित्तीय लेन-देन RBI के माध्यम से होते हैं, RBI, सरकार को वित्तीय मामलों में परामर्श भी देता है यह सरकारों(केंद्र-राज्य) को ऋण प्रदान करता है RBI सरकारी प्रतिभूतियों/बांडो के क्रय-विक्रय के माध्यम सेसार्वजनिक ऋण का प्रबंधन करता है अभी इसके लिए सार्वजनिक ऋण प्रबंधन एजेंसी का प्रावधान किया जा रहा है बैंकों का बैंक यह सभी बैंकों का नियमन करना है तथा अन्य सुविधाएं भी देता है| बैंकों को RBI के पास खाता एवं आरक्षित कोष रखना होता है RBI बैंकों को परामर्श भी देता है तथा बैंकों के पारस्परिक लेन-देनों का समाशोधन (clearance) कराता है यह आर्थिक संकट के समय में भी ऋण प्रदान करता है इसलिए RBI को अंतिम ऋणदाता भी कहा जाता है RBI बैंकों एवं कुछ NBFCs का पर्यवेक्षण और नियमन भी करता है भुगतान प्रणाली का पर्यवेक्षक देश एवं विदेश से कोष स्थानान्तरण मानदंडों का नियमन करता है चेक,DD,पोस्टल आर्डर, मनी आर्डर, NEFT, RTGS, IMPS(त्वरित भुगतान प्रणाली), कार्ड पेमेंट सिस्टम(ATM) आदि कोष स्थानान्तरण के माध्यम हैं| अभी इस कार्य को अलग करने की बात की जा रही है| भुगतान प्रणाली के पर्यवेक्षक के रूप में भुगतान विनियामक बोर्ड की संकल्पना की गयी है| विदेशी पूँजी भण्डार का संरक्षक भारत में केवल RBI एवं उसके अधिकृत एजेंट ही विदेशी पूँजी/मुद्रा में लेन-देन कर सकते हैं अधिकाँश बड़े बैंक ही RBI के अधिकृत एजेंट होते हैं, इनके पास उपलब्ध विदेशी पूँजी पर RBI की निगरानी में होते हैं, ये केवल एक सीमा तक ही विदेशी पूँजी रख सकते हैं| विदेशी मुद्रा विनिमय का नियंत्रण RBI रूपये को विदेशी मुद्राओं में एवं विदेशी मुद्राओं को रूपये में परिवर्तित करने सम्बन्धी मानदंड(परिवर्तनीयता) निर्धारित करता है, इनका निर्धारण FEMA अधिनियम के अंतर्गत निर्धारित होते हैं RBI रूपये के विनिमय दर का स्थिरीकरण भी करता है और मुद्रा के मूल्य को वांछित स्तर पर बनाए रखता है ताकि बाह्य अस्थिरताओं से भारतीय अर्थव्यवस्था की रक्षा की जा सके| मौद्रिक आंकड़ों का प्रकाशन RBI प्रत्येक 6 महीने पर मौद्रिक नीति रिपोर्ट जारी करता है इसके अतिरिक्त RBI करेंसी और फाइनेंस रिपोर्ट, वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट और मासिक पत्रिका के रूप में RBI बुलेटिन जारी करता है इनके माध्यम से केन्द्रीय बैंक अर्थव्यवस्था की मौद्रिक स्थिति को स्पष्ट करता है मुद्रा एवं साख का नियंत्रण RBI मौद्रिक नीति के माध्यम से अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति का नियमन करता है इसके लिए CRR, SLR आदि उपायों का प्रयोग करता है इसी प्रकार विकासात्मक कार्यों के अंतर्गतवित्तीय समावेशन का प्रोत्साहन, वित्तीय संस्थानों में स्थिरता बनाये रखना, मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखना आदि उपायों के माध्यम से RBI भारत मेंआर्थिक विकास का प्रोत्साहन करता है| अतःस्पष्ट होता है कि भारतीय रिजर्व बैंक को व्यापक अधिदेश प्राप्त है| इसी अधिदेश के माध्यम से भारतीय रिजर्व बैंक भारतीय अर्थव्यवस्था में आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करता है| आर्थिक स्थिरता ही भविष्य में आर्थिक विकास की संभावना का निर्माण करती है| इस सन्दर्भ में रिजर्व बैंक न केवल आर्थिक स्थिरता बल्कि आर्थिक विकास की परिस्थितियों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है|
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What do you understand by the phenomenon of temperature inversion in meteorology? How does it affect the weather and the habitants of the place? (150 words/10 marks)
Approach : Define temperature inversion List down conditions suitable for temeperature inversion Examine types of temperature inversion Mention effects of temperature inversion Answer : Temperature inversion is a reversal of the normal behavior of temperature in the troposphere, in which a layer of cool air at the surface is overlain by a layer of warmer air. (Under normal conditions, temperature usually decreases with height- 6.5 degree celcius per km; called Normal Lapse Rate). There are certain conditions for temperature Inversion: 1. Long Nights, so that outgoing radiation is greater than incoming. 2. Clear Skies, that allow unobstructed escape of radiation 3. Calm and stable air, so that there"s no vertical mixing of air at lower levels Types of Temperature Inversion:- 1) Temperature Inversion in Inter-montane Valley (Air Drainage Type of Inversion) • Here, the surface radiates heat back to space rapidly and cools down at a faster rate than the upper layers. As a result the lower cold layers get condensed and become heavy. • The sloping surface underneath makes them move towards the bottom where the cold layer settles down as a zone of low temperature while the upper layers are relatively warmer. • This kind of temperature inversion is very strong in the middle and higher latitudes. It can be strong in regions with high mountains or deep valleys also. 2) Ground Inversion (Surface Temperature Inversion) • A ground inversion develops when air is cooled by contact with a colder surface until it becomes cooler than the overlying atmosphere; this occurs most often on clear nights, when the ground cools off rapidly by radiation. If the temperature of surface air drops below its dew point, fog may result. • This kind of temperature inversion is very common in the higher latitudes. 3) Subsidence Inversion (Upper Surface Temperature Inversion) • A subsidence inversion develops when a widespread layer of air descends. • The layer is compressed and heated by the resulting increase in atmospheric pressure, and as a result the lapse rate of temperature is reduced. • If the air mass sinks low enough, the air at higher altitudes becomes warmer than at lower altitudes, producing a temperature inversion. • Subsidence inversions are common over the northern continents in winter (dry atmosphere) and over the subtropical oceans; these regions generally have subsiding air because they are located under large high-pressure centers. 4) Adiabtic Inversion: Updrafts in clouds(thunderstorms) can lead to inversion due to release of latent heat which leads to increase in temperature not in line with the normal lapse rate. 5) Frontal Inversion (Advectional type of Temperature Inversion ) • A frontal inversion occurs when a cold air mass undercuts a warm air mass (Cold and Warm Fronts: we will study in detail later) and lifts it aloft; the front between the two air masses then has warm air above and cold air below. • This kind of inversion has considerable slope, whereas other inversions are nearly horizontal. In addition, humidity may be high, and clouds may be present immediately above it. Effects of Temperature Inversion: • Inversions play an important role in determining cloud forms, precipitation, and visibility. • An inversion acts as a cap on the upward movement of air from the layers below. As a result, convection produced by the heating of air from below is limited to levels below the inversion. Diffusion of dust, smoke, and other air pollutants is likewise limited. • In regions where a pronounced low-level inversion is present, convective clouds cannot grow high enough to produce showers. • Visibility may be greatly reduced below the inversion due to the accumulation of dust and smoke particles. Because air near the base of an inversion tends to be cool, fog is frequently present there. (Smog) • Inversions also affect diurnal variations in temperature. Diurnal variations tend to be very small. . It also facilitates habitation and cultivation along higher slopes. The lower slopes may face the wrath of inversion damaging crops and impacting settlement.
##Question:What do you understand by the phenomenon of temperature inversion in meteorology? How does it affect the weather and the habitants of the place? (150 words/10 marks)##Answer:Approach : Define temperature inversion List down conditions suitable for temeperature inversion Examine types of temperature inversion Mention effects of temperature inversion Answer : Temperature inversion is a reversal of the normal behavior of temperature in the troposphere, in which a layer of cool air at the surface is overlain by a layer of warmer air. (Under normal conditions, temperature usually decreases with height- 6.5 degree celcius per km; called Normal Lapse Rate). There are certain conditions for temperature Inversion: 1. Long Nights, so that outgoing radiation is greater than incoming. 2. Clear Skies, that allow unobstructed escape of radiation 3. Calm and stable air, so that there"s no vertical mixing of air at lower levels Types of Temperature Inversion:- 1) Temperature Inversion in Inter-montane Valley (Air Drainage Type of Inversion) • Here, the surface radiates heat back to space rapidly and cools down at a faster rate than the upper layers. As a result the lower cold layers get condensed and become heavy. • The sloping surface underneath makes them move towards the bottom where the cold layer settles down as a zone of low temperature while the upper layers are relatively warmer. • This kind of temperature inversion is very strong in the middle and higher latitudes. It can be strong in regions with high mountains or deep valleys also. 2) Ground Inversion (Surface Temperature Inversion) • A ground inversion develops when air is cooled by contact with a colder surface until it becomes cooler than the overlying atmosphere; this occurs most often on clear nights, when the ground cools off rapidly by radiation. If the temperature of surface air drops below its dew point, fog may result. • This kind of temperature inversion is very common in the higher latitudes. 3) Subsidence Inversion (Upper Surface Temperature Inversion) • A subsidence inversion develops when a widespread layer of air descends. • The layer is compressed and heated by the resulting increase in atmospheric pressure, and as a result the lapse rate of temperature is reduced. • If the air mass sinks low enough, the air at higher altitudes becomes warmer than at lower altitudes, producing a temperature inversion. • Subsidence inversions are common over the northern continents in winter (dry atmosphere) and over the subtropical oceans; these regions generally have subsiding air because they are located under large high-pressure centers. 4) Adiabtic Inversion: Updrafts in clouds(thunderstorms) can lead to inversion due to release of latent heat which leads to increase in temperature not in line with the normal lapse rate. 5) Frontal Inversion (Advectional type of Temperature Inversion ) • A frontal inversion occurs when a cold air mass undercuts a warm air mass (Cold and Warm Fronts: we will study in detail later) and lifts it aloft; the front between the two air masses then has warm air above and cold air below. • This kind of inversion has considerable slope, whereas other inversions are nearly horizontal. In addition, humidity may be high, and clouds may be present immediately above it. Effects of Temperature Inversion: • Inversions play an important role in determining cloud forms, precipitation, and visibility. • An inversion acts as a cap on the upward movement of air from the layers below. As a result, convection produced by the heating of air from below is limited to levels below the inversion. Diffusion of dust, smoke, and other air pollutants is likewise limited. • In regions where a pronounced low-level inversion is present, convective clouds cannot grow high enough to produce showers. • Visibility may be greatly reduced below the inversion due to the accumulation of dust and smoke particles. Because air near the base of an inversion tends to be cool, fog is frequently present there. (Smog) • Inversions also affect diurnal variations in temperature. Diurnal variations tend to be very small. . It also facilitates habitation and cultivation along higher slopes. The lower slopes may face the wrath of inversion damaging crops and impacting settlement.
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भारतीय बैंकिंग प्रणाली का सामान्य परिचय देते हुए गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों के विन्यास की संक्षिप्त चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द; 10 अंक) While giving a general introduction to the Indian banking system, briefly discuss thefunctioningof non-banking financial institutions. (150-200 Words; 10 Marks)
एप्रोच उत्तर की शुरुआत भारतीय बैंकिंग प्रणाली का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात प्रमुख गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों का वर्णन करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारतीय बैंकिंग प्रणाली : एक परिचय भारत के बैंकिंग विन्यास को जो मुख्यतः RBI द्वारा निर्धारित एवं विनियमित होता है, को निम्न दो श्रेणी में बांटा जा सकता है | विभिन्न बैंक एवं गैर बैंकिंग वित्तीय विन्यास - सैद्धांतिक रूप से इन दोनों को वित्तीय मध्यस्थ कहा जाता है | बैंकों को निम्न दो प्रकारों में बांटा जा सकता है - अनुसूचित बैंक एवं गैर अनुसूचित बैंक अनुसूचित बैंकों से तात्पर्य उन बैंकों से है, जो RBI एक्ट 1934 के द्वितीय अनुसूची में सूचीबद्ध हों | गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थान इससे तात्पर्य उन सभी सभी संस्थानों से है जो मुख्यधारा की बैंकिंग व्यवस्था से इतर वित्तीय मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं - जो मुख्यत निम्नलिखित प्रकार के हो सकते हैं - विकास वित्त संस्थान - ये विभिन्न प्रकार के विकास मुद्दों में ऋण उपलब्धता सुनिश्चित करते हैं | वर्ष 1998 में नरसिम्हन समिति ने इन्हें समाप्त करके बैंकिंग प्रक्रिया में जुड़ने की बात कही, यद्यपि कि हाल ही में अवसंरचना के क्षेत्र में DFIs की चर्चा पुनः प्रारंभ हुई | अखिल भारतीय वित्तीय संस्थान इसमें चार प्रमुख - एक्सिम बैंक -1982, नाबार्ड -1982, NHB -1988 एवं सिडबी -1990 में स्थापित हुए | एक्सिम बैंक मुख्यतः आयात-निर्यात से सम्बंधित लेन-देन को सुलभ करने की दिशा में कार्यरत होता है तथा इस पर भारत सरकार का अधिकार है | नाबार्ड मुख्यतः ग्रामीण अवसंरचना हेतु विकास फण्ड, विभिन्न सहकारी बैंक के नियामक तथा परोक्ष रूप से कृषि एवं स्वयं सहयता समूहों को ऋण उपलब्ध कराना सुनिश्चित करता है | प्रारम्भ में इसके स्वामित्व में RBI का भी हिस्सा था किन्तु अब पूरा भरता सरकार के नियंत्रण में है | NHB का मुख्य उद्देश्य आवास परियोजनाओं संबंधी वित्तीय संस्थानों के नियामक एवं साथ ही मूल्य मानकीकरण में सहयोगी है | प्रारंभ में इसका शत प्रतिशत RBI के पास स्वामित्व था किन्तु वर्तमान में स्वामित्व भारत सरकार के पास है | सिडबी का मुख्य उद्देश्य विभिन्न प्रकार की विकास परियोजनाओं में सहयोग प्रदान करना तथा स्वामित्व मुख्यतः SBI, LIC एवं IDBI के पास है | प्राथमिक विक्रेता ये प्रतिभूति के लेन देन में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे होते हैं | वर्तमान में इनकी संख्या 21 है | NBFCs - गैर- बैंकिंग वित्तीय कम्पनियां यह मुख्य रूप से वित्तीय मध्यस्थ कहे जाते हैं, जो विभिन्न क्षेत्रों में ऋणों को उपलब्ध कराते हैं | इनका वाणिज्यिक बैंकों से मूलभूत अंतर यह होता है कि ये डिमांड डिपोजिट स्वीकार नहीं कर सकते | तथा इन पर सारफेसाई एक्ट तथा MCLR की बाध्यता नहीं होती | ये RBI द्वारा तथा कुछ संदर्भों में सेबी द्वारा या अन्य स्रोतों द्वारा नियंत्रित होते हैं | अभी NBFC लगातार विवादों में रहे क्योंकि विभिन्न प्रकार के छद्म वित्तीय मध्यस्थ के सहयोग से मुद्रा स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहे हैं | अतः यह आवश्यक है कि इस क्षेत्र में न सिर्फ RBI का हस्तक्षेप बढ़ाया जाय अपितु साथ ही अन्य नियामकों के माध्यम से इन्हें नियंत्रित भी किया जाय | मुद्रा बैंक यह शत प्रतिशत सिडबी का घटक है तथा शिशु - 50 हजार, किशोर -50 हजार से 5 लाख तक, तरुण - 5 लाख से 10 लाख तक वित्तपोषण उपलब्ध करा रहा है | इनके द्वारा दिए जा रहे ऋण सबप्राइम स्वभाव के होते हैं | इस्लामिक बैंकिंग यह भी एक प्रकार के NBFI हैं जो निवेश का एक वैकल्पिक मॉडल प्रयोग करते हैं | अनौपचारिक वित्तीय संस्थान यह भी विभिन्न प्रकार वित्तीय मध्यस्थों की भूमिका निभाते हैं | किसी भी देश के लिए बैंकिंग प्रणाली उस देश की प्राण वायु है | बैंकिंग प्रणाली को सुव्यवस्थित बनाकर देश की दशा और दिशा को सकारात्मक रूप से आगे बढ़ाया जा सकता है | इसी सन्दर्भ में भारतीय बैंकिंग प्रणाली में अनेक प्रकार के आयाम के लेन-देन को सुलभ बनाया गया है |
##Question:भारतीय बैंकिंग प्रणाली का सामान्य परिचय देते हुए गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों के विन्यास की संक्षिप्त चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द; 10 अंक) While giving a general introduction to the Indian banking system, briefly discuss thefunctioningof non-banking financial institutions. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच उत्तर की शुरुआत भारतीय बैंकिंग प्रणाली का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात प्रमुख गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों का वर्णन करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारतीय बैंकिंग प्रणाली : एक परिचय भारत के बैंकिंग विन्यास को जो मुख्यतः RBI द्वारा निर्धारित एवं विनियमित होता है, को निम्न दो श्रेणी में बांटा जा सकता है | विभिन्न बैंक एवं गैर बैंकिंग वित्तीय विन्यास - सैद्धांतिक रूप से इन दोनों को वित्तीय मध्यस्थ कहा जाता है | बैंकों को निम्न दो प्रकारों में बांटा जा सकता है - अनुसूचित बैंक एवं गैर अनुसूचित बैंक अनुसूचित बैंकों से तात्पर्य उन बैंकों से है, जो RBI एक्ट 1934 के द्वितीय अनुसूची में सूचीबद्ध हों | गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थान इससे तात्पर्य उन सभी सभी संस्थानों से है जो मुख्यधारा की बैंकिंग व्यवस्था से इतर वित्तीय मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं - जो मुख्यत निम्नलिखित प्रकार के हो सकते हैं - विकास वित्त संस्थान - ये विभिन्न प्रकार के विकास मुद्दों में ऋण उपलब्धता सुनिश्चित करते हैं | वर्ष 1998 में नरसिम्हन समिति ने इन्हें समाप्त करके बैंकिंग प्रक्रिया में जुड़ने की बात कही, यद्यपि कि हाल ही में अवसंरचना के क्षेत्र में DFIs की चर्चा पुनः प्रारंभ हुई | अखिल भारतीय वित्तीय संस्थान इसमें चार प्रमुख - एक्सिम बैंक -1982, नाबार्ड -1982, NHB -1988 एवं सिडबी -1990 में स्थापित हुए | एक्सिम बैंक मुख्यतः आयात-निर्यात से सम्बंधित लेन-देन को सुलभ करने की दिशा में कार्यरत होता है तथा इस पर भारत सरकार का अधिकार है | नाबार्ड मुख्यतः ग्रामीण अवसंरचना हेतु विकास फण्ड, विभिन्न सहकारी बैंक के नियामक तथा परोक्ष रूप से कृषि एवं स्वयं सहयता समूहों को ऋण उपलब्ध कराना सुनिश्चित करता है | प्रारम्भ में इसके स्वामित्व में RBI का भी हिस्सा था किन्तु अब पूरा भरता सरकार के नियंत्रण में है | NHB का मुख्य उद्देश्य आवास परियोजनाओं संबंधी वित्तीय संस्थानों के नियामक एवं साथ ही मूल्य मानकीकरण में सहयोगी है | प्रारंभ में इसका शत प्रतिशत RBI के पास स्वामित्व था किन्तु वर्तमान में स्वामित्व भारत सरकार के पास है | सिडबी का मुख्य उद्देश्य विभिन्न प्रकार की विकास परियोजनाओं में सहयोग प्रदान करना तथा स्वामित्व मुख्यतः SBI, LIC एवं IDBI के पास है | प्राथमिक विक्रेता ये प्रतिभूति के लेन देन में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे होते हैं | वर्तमान में इनकी संख्या 21 है | NBFCs - गैर- बैंकिंग वित्तीय कम्पनियां यह मुख्य रूप से वित्तीय मध्यस्थ कहे जाते हैं, जो विभिन्न क्षेत्रों में ऋणों को उपलब्ध कराते हैं | इनका वाणिज्यिक बैंकों से मूलभूत अंतर यह होता है कि ये डिमांड डिपोजिट स्वीकार नहीं कर सकते | तथा इन पर सारफेसाई एक्ट तथा MCLR की बाध्यता नहीं होती | ये RBI द्वारा तथा कुछ संदर्भों में सेबी द्वारा या अन्य स्रोतों द्वारा नियंत्रित होते हैं | अभी NBFC लगातार विवादों में रहे क्योंकि विभिन्न प्रकार के छद्म वित्तीय मध्यस्थ के सहयोग से मुद्रा स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहे हैं | अतः यह आवश्यक है कि इस क्षेत्र में न सिर्फ RBI का हस्तक्षेप बढ़ाया जाय अपितु साथ ही अन्य नियामकों के माध्यम से इन्हें नियंत्रित भी किया जाय | मुद्रा बैंक यह शत प्रतिशत सिडबी का घटक है तथा शिशु - 50 हजार, किशोर -50 हजार से 5 लाख तक, तरुण - 5 लाख से 10 लाख तक वित्तपोषण उपलब्ध करा रहा है | इनके द्वारा दिए जा रहे ऋण सबप्राइम स्वभाव के होते हैं | इस्लामिक बैंकिंग यह भी एक प्रकार के NBFI हैं जो निवेश का एक वैकल्पिक मॉडल प्रयोग करते हैं | अनौपचारिक वित्तीय संस्थान यह भी विभिन्न प्रकार वित्तीय मध्यस्थों की भूमिका निभाते हैं | किसी भी देश के लिए बैंकिंग प्रणाली उस देश की प्राण वायु है | बैंकिंग प्रणाली को सुव्यवस्थित बनाकर देश की दशा और दिशा को सकारात्मक रूप से आगे बढ़ाया जा सकता है | इसी सन्दर्भ में भारतीय बैंकिंग प्रणाली में अनेक प्रकार के आयाम के लेन-देन को सुलभ बनाया गया है |
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असहयोग आंदोलन का संक्षिप्त परिचय देते हुए इसके स्वरूप पर टिप्पणी कीजिये । ( 150-200 शब्द , अंक - 10 ) Giving a brief introduction to the non-cooperation movement, comment on its nature. (150-200 words, Marks - 10 )
दृष्टिकोण : असहयोग आंदोलन का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । इसके उदय के कुछ कारणों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । असहयोग आंदोलन के स्वरूप की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । इसके महत्व की संक्षिप्त चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के गांधीवादी चरण के अंतर्गत असहयोग आंदोलन पहला व्यापक जनांदोलन था । अगस्त 1920 से फरवरी 1922 तक का काल भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की एक महत्वपूर्ण गाथा को बयान करता है , जब पूरा देश एकजुट होकर ब्रिटिश सरकार की नीतियों के विरोध में खड़ा हुआ और स्वशासन की मांग को प्रभावी तरीके से ब्रिटिश सरकार के समक्ष रख पाया । प्रथम विश्वयुद्ध , रौलेट एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड तथा मांटेग्यू - चेम्सफोर्ड सुधारों से हुई निराशा आदि ने इस आंदोलन के लिए पृष्टभूमि तैयार कर दी थी । इसके बाद खिलाफ़त के मुद्दे ने भारत सहित पूरी दुनिया के मुसलमानों की भावनाओं को आहत किया । इन सभी घटनाओं व ब्रिटिश नीतियों ने एक बड़े जनआंदोलन के लिए लोगों को प्रेरित किया । गांधीजी द्वारा इसे एक अवसर के रूप में देखा गया और कांग्रेस के मंच से अगस्त 1920 में खिलाफ़त असहयोग आंदोलन की शुरुआत की गयी । असहयोग आंदोलन का स्वरूप : राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान कांग्रेस के नेतृत्व में संचालित पहला आंदोलन जिसका प्रसार शहरों के साथ-साथ बड़े पैमाने पर ग्रामीण क्षेत्रों में भी दिखा । देशी रियासतों में भी राजनीतिक सक्रियता एवं राष्ट्रीय चेतना के प्रसार के प्रमाण मिलते हैं । आंदोलन का लक्ष्य सभी शांतिमय एवं अहिंसक तरीकों से स्वराज्य की प्राप्ति । आंदोलन में बड़े पैमाने पर पहली बार किसानों एवं पूँजीपतियों की भागीदारी दिखी । स्वदेशी आंदोलन की तरह महिलाओं, छात्रों एवं मजदूरों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही । विभिन्न कारणों से मुस्लिम समुदाय की भी आंदोलन में व्यापक भागीदारी रही । आंदोलन को प्रत्येक स्थिति में अहिंसात्मक रखने की योजना थी ।इसके कई फायदे भी थे जैसे- महिलाओं, वृद्धों तथा उन वर्गों की भागीदारी जो हिंसात्मक गतिविधियों में भाग नहीं ले सकते थे तथा सरकार द्वंद की स्थिति में रहती थी । आंदोलन का दमन करने पर सरकार की छवि खराब होती थी और दमन ना करने की स्थिति में कांग्रेस का प्रभाव बढ़ता । आंदोलन के विरोधात्मक पहलू स्वदेशी आंदोलन की तरह ही थे । लेकिन इसे प्रत्येक स्थिति में अहिंसात्मक ही रखना था । रचनात्मक कार्यों के रूप में गांधीजी ने आंदोलन की एक व्यापक रूप रेखा बनाई ।इसमें आत्मनिर्भरता , समाज सुधार तथा राष्ट्रीय एकता पर बल दिया गया । इससे न केवल आंदोलन में लोगों की भागीदारी बढ़ी बल्कि आंदोलन को निरंतरता भी प्रदान की चूंकि आंदोलन के पश्चात भी इसे जारी रखना था । आंदोलन में गांधीवादी रणनीति से संबंधित सभी महत्वपूर्ण पहलू दिखाई देते हैं । जैसे- औपचारिक तौर पर आंदोलन को प्रारंभ एवं वापस लेने की घोषणा । निश्चित कार्यक्रम को केंद्र में रखकर आंदोलन , अहिंसात्मक आंदोलन , आवश्यकता पड़ने पर सरकार से वार्ता इत्यादि ।ये पहलू आंदोलन के संगठित स्वरूप को उद्घाटित करते हैं । आंदोलन के दौरान कार्यक्रम एवं तात्कालिक लक्ष्यों में लोचशीलता गांधीवादी रणनीति का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू है । जैसे- तारी की दुकानों पर धरना, अकाली आंदोलन में भागीदारी आदि । सरकार की दमनकारी नीति, गांधीवादी रणनीति , जनआंदोलन की सीमाएं इत्यादि कारणों से गांधीजी ने आंदोलन को वापस लिया । लेकिन स्वदेशी के पश्चात राष्ट्रीय आंदोलन में असहयोग आंदोलन कई कारणों से एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुआ । भारतीय राष्ट्रीयआंदोलन के गांधीवादी चरण के तीन प्रमुख आंदोलनों की शृंखला में यह पहला आंदोलन था और इस आंदोलन ने भारत की आजादी के मार्ग पर तेजी से राष्ट्र को अग्रसर किया ।
##Question:असहयोग आंदोलन का संक्षिप्त परिचय देते हुए इसके स्वरूप पर टिप्पणी कीजिये । ( 150-200 शब्द , अंक - 10 ) Giving a brief introduction to the non-cooperation movement, comment on its nature. (150-200 words, Marks - 10 )##Answer:दृष्टिकोण : असहयोग आंदोलन का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । इसके उदय के कुछ कारणों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । असहयोग आंदोलन के स्वरूप की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । इसके महत्व की संक्षिप्त चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के गांधीवादी चरण के अंतर्गत असहयोग आंदोलन पहला व्यापक जनांदोलन था । अगस्त 1920 से फरवरी 1922 तक का काल भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की एक महत्वपूर्ण गाथा को बयान करता है , जब पूरा देश एकजुट होकर ब्रिटिश सरकार की नीतियों के विरोध में खड़ा हुआ और स्वशासन की मांग को प्रभावी तरीके से ब्रिटिश सरकार के समक्ष रख पाया । प्रथम विश्वयुद्ध , रौलेट एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड तथा मांटेग्यू - चेम्सफोर्ड सुधारों से हुई निराशा आदि ने इस आंदोलन के लिए पृष्टभूमि तैयार कर दी थी । इसके बाद खिलाफ़त के मुद्दे ने भारत सहित पूरी दुनिया के मुसलमानों की भावनाओं को आहत किया । इन सभी घटनाओं व ब्रिटिश नीतियों ने एक बड़े जनआंदोलन के लिए लोगों को प्रेरित किया । गांधीजी द्वारा इसे एक अवसर के रूप में देखा गया और कांग्रेस के मंच से अगस्त 1920 में खिलाफ़त असहयोग आंदोलन की शुरुआत की गयी । असहयोग आंदोलन का स्वरूप : राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान कांग्रेस के नेतृत्व में संचालित पहला आंदोलन जिसका प्रसार शहरों के साथ-साथ बड़े पैमाने पर ग्रामीण क्षेत्रों में भी दिखा । देशी रियासतों में भी राजनीतिक सक्रियता एवं राष्ट्रीय चेतना के प्रसार के प्रमाण मिलते हैं । आंदोलन का लक्ष्य सभी शांतिमय एवं अहिंसक तरीकों से स्वराज्य की प्राप्ति । आंदोलन में बड़े पैमाने पर पहली बार किसानों एवं पूँजीपतियों की भागीदारी दिखी । स्वदेशी आंदोलन की तरह महिलाओं, छात्रों एवं मजदूरों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही । विभिन्न कारणों से मुस्लिम समुदाय की भी आंदोलन में व्यापक भागीदारी रही । आंदोलन को प्रत्येक स्थिति में अहिंसात्मक रखने की योजना थी ।इसके कई फायदे भी थे जैसे- महिलाओं, वृद्धों तथा उन वर्गों की भागीदारी जो हिंसात्मक गतिविधियों में भाग नहीं ले सकते थे तथा सरकार द्वंद की स्थिति में रहती थी । आंदोलन का दमन करने पर सरकार की छवि खराब होती थी और दमन ना करने की स्थिति में कांग्रेस का प्रभाव बढ़ता । आंदोलन के विरोधात्मक पहलू स्वदेशी आंदोलन की तरह ही थे । लेकिन इसे प्रत्येक स्थिति में अहिंसात्मक ही रखना था । रचनात्मक कार्यों के रूप में गांधीजी ने आंदोलन की एक व्यापक रूप रेखा बनाई ।इसमें आत्मनिर्भरता , समाज सुधार तथा राष्ट्रीय एकता पर बल दिया गया । इससे न केवल आंदोलन में लोगों की भागीदारी बढ़ी बल्कि आंदोलन को निरंतरता भी प्रदान की चूंकि आंदोलन के पश्चात भी इसे जारी रखना था । आंदोलन में गांधीवादी रणनीति से संबंधित सभी महत्वपूर्ण पहलू दिखाई देते हैं । जैसे- औपचारिक तौर पर आंदोलन को प्रारंभ एवं वापस लेने की घोषणा । निश्चित कार्यक्रम को केंद्र में रखकर आंदोलन , अहिंसात्मक आंदोलन , आवश्यकता पड़ने पर सरकार से वार्ता इत्यादि ।ये पहलू आंदोलन के संगठित स्वरूप को उद्घाटित करते हैं । आंदोलन के दौरान कार्यक्रम एवं तात्कालिक लक्ष्यों में लोचशीलता गांधीवादी रणनीति का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू है । जैसे- तारी की दुकानों पर धरना, अकाली आंदोलन में भागीदारी आदि । सरकार की दमनकारी नीति, गांधीवादी रणनीति , जनआंदोलन की सीमाएं इत्यादि कारणों से गांधीजी ने आंदोलन को वापस लिया । लेकिन स्वदेशी के पश्चात राष्ट्रीय आंदोलन में असहयोग आंदोलन कई कारणों से एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुआ । भारतीय राष्ट्रीयआंदोलन के गांधीवादी चरण के तीन प्रमुख आंदोलनों की शृंखला में यह पहला आंदोलन था और इस आंदोलन ने भारत की आजादी के मार्ग पर तेजी से राष्ट्र को अग्रसर किया ।
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अपनी सीमाओं के बावजूद, ब्रिटिश काल के दौरान सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों ने भारतीय समाज में कई दूरगामी परिवर्तनों का मार्ग प्रशस्त किया। चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) Despite the limitations, the Socio-Religious Reform Movements during the British times, led to many far-reaching changes in the Indian society. Discuss (150-200 words/10 marks)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भारत में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों का एक संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करते हुए उत्तर आरंभ कीजिए। इन सुधारों की सीमाओं को रेखांकित कीजिए। इन सुधारों के सकारात्मक प्रभावों पर चर्चा कीजिए। सारांश रूप में निष्कर्ष लिखिए। 19वीं सदी के दौरान भारत में महत्वपूर्ण सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन आरंभ हुए थे। एक वैकल्पिक सांस्कृतिक-वैचारिक प्रणाली का विकास तथा पारंपरिक संस्थाओं का पुनरुत्थान, सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन के दोहरे उद्देश्य के रूप में उभर कर आए। सुधार आंदोलनों की की निम्नलिखित सीमाएं थीं: मुख्यतः शहरी आंदोलन था। मध्यवर्गीय वर्ग तक पहुँच। सुधारकों के प्रयासों के बावजूद सामाजिक-धार्मिक कुरुतियाँ बनी रही वास्तविक उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं हो पायी। पुनरुत्थान वादी आंदोलन के कारण सांप्रदायिक चेतना का प्रसार हुआ। केवल धर्मग्रंथों के आधार पर आंदोलन ने वैज्ञानिक चिंतन को कमजोर किया। इन सीमाओं के बावजूद इन सुधार आंदोलनों ने भारतीय समाज पर कई दूरगामी प्रभावों का मार्ग प्रशस्त किया: इन सुधार आंदोलनों द्वारा भारतीय राष्ट्रवाद के विकास और राजनीतिक जागरूकता हेतु आधार निर्मित किया गया। जैसे- ब्रह्म समाज, आर्य समाज , रामकृष्ण मिशन स्वामी दयानन्द सरस्वती, विवेकानंद, विद्यासागर, टैगोर आदि के प्रयासों ने भारतीय लोगों को नव जीवन प्रदान किया। इन सुधारों ने सामाजिक-धार्मिक स्वतन्त्रता तथा मौलिक अधिकारों पर बल दिया। शिक्षा क्षेत्र में पाश्चात्य विचारों का प्रभाव बढ़ा इससे भारत में तकनीकी, वैज्ञानिक शिक्षा संस्कृति प्रभावी हुई। इन सुधारों से रूढ़िवादिता पर गहरा आघात पहुंचा। धर्म ग्रन्थों की व्याख्या में तर्क और वैज्ञानिकता का विकास हुआ। धार्मिक सहिष्णुता पर बल दिया गया। धार्मिक कट्टरता को कम करते हुए एक साथ विभिन्न धर्मो के सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों का मूल्यांकन प्रारम्भ हुआ। यद्यपि इन सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों की कुछ सीमाएं थीं परंतु निश्चित रूप से यह निर्विवाद सत्य है कि इन आंदोलनों ने भारतीय समाज की सामाजिक-सांस्कृतिक जागरूकता पर आश्चर्यजनक और चिरस्थाई प्रभाव डाला, जिसने आधुनिक भारत के विकास की आधारशिला रखी।
##Question:अपनी सीमाओं के बावजूद, ब्रिटिश काल के दौरान सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों ने भारतीय समाज में कई दूरगामी परिवर्तनों का मार्ग प्रशस्त किया। चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) Despite the limitations, the Socio-Religious Reform Movements during the British times, led to many far-reaching changes in the Indian society. Discuss (150-200 words/10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भारत में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों का एक संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करते हुए उत्तर आरंभ कीजिए। इन सुधारों की सीमाओं को रेखांकित कीजिए। इन सुधारों के सकारात्मक प्रभावों पर चर्चा कीजिए। सारांश रूप में निष्कर्ष लिखिए। 19वीं सदी के दौरान भारत में महत्वपूर्ण सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन आरंभ हुए थे। एक वैकल्पिक सांस्कृतिक-वैचारिक प्रणाली का विकास तथा पारंपरिक संस्थाओं का पुनरुत्थान, सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन के दोहरे उद्देश्य के रूप में उभर कर आए। सुधार आंदोलनों की की निम्नलिखित सीमाएं थीं: मुख्यतः शहरी आंदोलन था। मध्यवर्गीय वर्ग तक पहुँच। सुधारकों के प्रयासों के बावजूद सामाजिक-धार्मिक कुरुतियाँ बनी रही वास्तविक उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं हो पायी। पुनरुत्थान वादी आंदोलन के कारण सांप्रदायिक चेतना का प्रसार हुआ। केवल धर्मग्रंथों के आधार पर आंदोलन ने वैज्ञानिक चिंतन को कमजोर किया। इन सीमाओं के बावजूद इन सुधार आंदोलनों ने भारतीय समाज पर कई दूरगामी प्रभावों का मार्ग प्रशस्त किया: इन सुधार आंदोलनों द्वारा भारतीय राष्ट्रवाद के विकास और राजनीतिक जागरूकता हेतु आधार निर्मित किया गया। जैसे- ब्रह्म समाज, आर्य समाज , रामकृष्ण मिशन स्वामी दयानन्द सरस्वती, विवेकानंद, विद्यासागर, टैगोर आदि के प्रयासों ने भारतीय लोगों को नव जीवन प्रदान किया। इन सुधारों ने सामाजिक-धार्मिक स्वतन्त्रता तथा मौलिक अधिकारों पर बल दिया। शिक्षा क्षेत्र में पाश्चात्य विचारों का प्रभाव बढ़ा इससे भारत में तकनीकी, वैज्ञानिक शिक्षा संस्कृति प्रभावी हुई। इन सुधारों से रूढ़िवादिता पर गहरा आघात पहुंचा। धर्म ग्रन्थों की व्याख्या में तर्क और वैज्ञानिकता का विकास हुआ। धार्मिक सहिष्णुता पर बल दिया गया। धार्मिक कट्टरता को कम करते हुए एक साथ विभिन्न धर्मो के सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों का मूल्यांकन प्रारम्भ हुआ। यद्यपि इन सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों की कुछ सीमाएं थीं परंतु निश्चित रूप से यह निर्विवाद सत्य है कि इन आंदोलनों ने भारतीय समाज की सामाजिक-सांस्कृतिक जागरूकता पर आश्चर्यजनक और चिरस्थाई प्रभाव डाला, जिसने आधुनिक भारत के विकास की आधारशिला रखी।
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भारतीय रिजर्व बैंक का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करते हुए इसके प्रमुख कार्यों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/ 10 अंक) Give brief introduction of the Reserve Bank of India and discuss its major functions. (150-200 words/ 10 Marks)
Approach : रिजर्व बैंक का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करते हुए उत्तर की शुरुवात कर सकते हैं। संक्षिप्त में आरबीआई का ऐतिहासिक परिपेक्ष्य की चर्चा कर सकते हैं। आरबीआई के कार्यों की चर्चा कीजिये। आरबीआई की अर्थव्यवस्था की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर- भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) भारत का केन्द्रीय बैंक है। यहमौद्रिक प्रणाली का शीर्ष संस्थान है।देश में मौद्रिक नीति के संचालन के लिए यह संस्था उत्तरदायी है। इसकी स्थापना आरबीआई अधिनियम 1934 के अंतर्गत 1 अप्रैल 1935 को हुई। इसकी स्थापना हिल्टन समिति की सिफ़ारिशों के आधार पर हुई। इसकी स्थापना 5 करोड़ रुपये की अंश पूंजी के साथ निजी क्षेत्र में हुई। इसकी स्थापना कोलकाता में हुई थी लेकिन फिर मुख्यालय को मुंबई स्थानांतरित कर दिया गया। RBI के कार्य मुद्रा निगमन का कार्य आरबीआई देश में मुद्रा छापने के लिए उत्तरदायी संस्था है। 1 रुपये से अधिक के सभी नोट निर्गमन का कार्य आरबीआई द्वारा किया जाता है। सरकार का बैंक केंद्र एवं राज्य सरकारों को आरबीआई के पास खाता रखना होता है। सरकारों के सभी वित्तीय लेन देन आरबीआई के माध्यम से किए जाते हैं। आरबीआई वित्तीय मामलों पर सरकारों को परामर्श भी देता है। यह सरकार को ऋण प्रदान करता है एवं सार्वजनिक ऋण का प्रबंधन करता है बैंकों का बैंक बैंकों को आरबीआई के पास खाता एवं आरक्षित कोष रखना होता है। आरबीआई बैंकों को समाशोधन गृह सुविधा के माध्यम से उनके पारस्परिक लेन देनों का निपटारा करता है। यह बैंकों को अच्छे व खराब समय में बैंकों को ऋण देता है बैंकों का पर्यवेक्षक यह बैंकों एवं गैर बैंक वित्तीय संस्थानों का नियमन करता है। भुगतान प्रणाली का पर्यवेक्षक भारत एवं विदेश में कोष स्थानांतरण संबंधी नियमन का कार्य भी आरबीआई द्वारा संचालित किया जाता है। सरकार द्वारा संचालित राजकोषीय नीति व आरबीआई द्वारा संचालित मौद्रिक नीति दोनों मिलकर देश की अर्थव्यस्वस्था के विकास की दिशा में कार्य करते हैं जिसमें अर्थव्यवस्था में आर्थिक वृद्धि, रोजगार सृजन, मुद्रास्फीति नियंत्रण आदि शामिल हैं।
##Question:भारतीय रिजर्व बैंक का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करते हुए इसके प्रमुख कार्यों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/ 10 अंक) Give brief introduction of the Reserve Bank of India and discuss its major functions. (150-200 words/ 10 Marks)##Answer:Approach : रिजर्व बैंक का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करते हुए उत्तर की शुरुवात कर सकते हैं। संक्षिप्त में आरबीआई का ऐतिहासिक परिपेक्ष्य की चर्चा कर सकते हैं। आरबीआई के कार्यों की चर्चा कीजिये। आरबीआई की अर्थव्यवस्था की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर- भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) भारत का केन्द्रीय बैंक है। यहमौद्रिक प्रणाली का शीर्ष संस्थान है।देश में मौद्रिक नीति के संचालन के लिए यह संस्था उत्तरदायी है। इसकी स्थापना आरबीआई अधिनियम 1934 के अंतर्गत 1 अप्रैल 1935 को हुई। इसकी स्थापना हिल्टन समिति की सिफ़ारिशों के आधार पर हुई। इसकी स्थापना 5 करोड़ रुपये की अंश पूंजी के साथ निजी क्षेत्र में हुई। इसकी स्थापना कोलकाता में हुई थी लेकिन फिर मुख्यालय को मुंबई स्थानांतरित कर दिया गया। RBI के कार्य मुद्रा निगमन का कार्य आरबीआई देश में मुद्रा छापने के लिए उत्तरदायी संस्था है। 1 रुपये से अधिक के सभी नोट निर्गमन का कार्य आरबीआई द्वारा किया जाता है। सरकार का बैंक केंद्र एवं राज्य सरकारों को आरबीआई के पास खाता रखना होता है। सरकारों के सभी वित्तीय लेन देन आरबीआई के माध्यम से किए जाते हैं। आरबीआई वित्तीय मामलों पर सरकारों को परामर्श भी देता है। यह सरकार को ऋण प्रदान करता है एवं सार्वजनिक ऋण का प्रबंधन करता है बैंकों का बैंक बैंकों को आरबीआई के पास खाता एवं आरक्षित कोष रखना होता है। आरबीआई बैंकों को समाशोधन गृह सुविधा के माध्यम से उनके पारस्परिक लेन देनों का निपटारा करता है। यह बैंकों को अच्छे व खराब समय में बैंकों को ऋण देता है बैंकों का पर्यवेक्षक यह बैंकों एवं गैर बैंक वित्तीय संस्थानों का नियमन करता है। भुगतान प्रणाली का पर्यवेक्षक भारत एवं विदेश में कोष स्थानांतरण संबंधी नियमन का कार्य भी आरबीआई द्वारा संचालित किया जाता है। सरकार द्वारा संचालित राजकोषीय नीति व आरबीआई द्वारा संचालित मौद्रिक नीति दोनों मिलकर देश की अर्थव्यस्वस्था के विकास की दिशा में कार्य करते हैं जिसमें अर्थव्यवस्था में आर्थिक वृद्धि, रोजगार सृजन, मुद्रास्फीति नियंत्रण आदि शामिल हैं।
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Inequality in French society created the base of the French Revolution. Comment. (150 words/10 Marks)
Approach: Give a brief chronology of the French Revolution Highlight the inequalities prevailed during that period which forms the base of the French Revolution. Conclude the answer by giving your opinion Answer: The French Revolution started in 1789 and continued for at least 10 years, that is, till 1799 when Napoleon emerged as a military dictator of the new nation. Throughout this period the revolutionary developments took place under different ideological impulses, different organizations or institutions, and even different individuals or personalities. At each level or at each stage of the revolutionary development the limitations and contradictions of the revolution also expressed themselves making the nature of the revolution quite dynamic. The French Revolution was a product of a revolutionary situation created by a quite complex socio-inequality prevailed during that period which is explained below- French society was essentially a feudal society based on the system of feudal privileges dividing the French population into privileged and unprivileged classes. In the first category, we find the first two estates of the French society constituted by the higher clergy that is priestly classes and the aristocracy that is nobility respectively. In the second category, we find the third estate constituted by a vast majority of the French population comprising the peasantry, artisans, urban poor, and the most ambitious emerging middle classes. All three classes had equal representation in the feudal representative body of France known as the Estates-General despite differences in terms of their number/numerical strength in the French society which is seen as a violation of the principle of equality. Moreover, the voting was not by individuals but by orders. With the first two estates always voting together and possessing majority. Most of the French land was in the possession of the first two estates and the members of these two estates enjoyed a monopoly on all the posts offered by the estate and the church. The first two estates were also exempted from all types of taxes and the entire tax burden was shouldered by the third estate. Moreover, the first two estates also had the right to impose many taxes (collected by the aristocracy) and tithes (collected by the church) on the third estate. The inequality of taxation is accepted as the worst aspect of the French inequality which played an important role in creating immediate circumstances for the revolution. It was due to this reason the king was finding it difficult to resolve the financial crisis and was forced by the first two estates to convene the meeting of the estates general marking the beginning of the revolution. It is, for this reason, it is also said that the French revolution was started by the aristocracy itself challenging the right of the king to impose taxes on them without the consent of the Estates-General. Conclusion: French revolution destroyed the old system (ancient regime) in the old world. The French revolution and its slogans- “Equality, liberty, and fraternity" forming the basis for modern political nationalism came to have a profound impact not only on contemporary Europe but also on almost all parts of the world in due course of time. They still play a major role in shaping socio-political discourses of the contemporary world and they have been embodied or enshrined in almost all major modern constitutional experiments of the world.
##Question:Inequality in French society created the base of the French Revolution. Comment. (150 words/10 Marks)##Answer:Approach: Give a brief chronology of the French Revolution Highlight the inequalities prevailed during that period which forms the base of the French Revolution. Conclude the answer by giving your opinion Answer: The French Revolution started in 1789 and continued for at least 10 years, that is, till 1799 when Napoleon emerged as a military dictator of the new nation. Throughout this period the revolutionary developments took place under different ideological impulses, different organizations or institutions, and even different individuals or personalities. At each level or at each stage of the revolutionary development the limitations and contradictions of the revolution also expressed themselves making the nature of the revolution quite dynamic. The French Revolution was a product of a revolutionary situation created by a quite complex socio-inequality prevailed during that period which is explained below- French society was essentially a feudal society based on the system of feudal privileges dividing the French population into privileged and unprivileged classes. In the first category, we find the first two estates of the French society constituted by the higher clergy that is priestly classes and the aristocracy that is nobility respectively. In the second category, we find the third estate constituted by a vast majority of the French population comprising the peasantry, artisans, urban poor, and the most ambitious emerging middle classes. All three classes had equal representation in the feudal representative body of France known as the Estates-General despite differences in terms of their number/numerical strength in the French society which is seen as a violation of the principle of equality. Moreover, the voting was not by individuals but by orders. With the first two estates always voting together and possessing majority. Most of the French land was in the possession of the first two estates and the members of these two estates enjoyed a monopoly on all the posts offered by the estate and the church. The first two estates were also exempted from all types of taxes and the entire tax burden was shouldered by the third estate. Moreover, the first two estates also had the right to impose many taxes (collected by the aristocracy) and tithes (collected by the church) on the third estate. The inequality of taxation is accepted as the worst aspect of the French inequality which played an important role in creating immediate circumstances for the revolution. It was due to this reason the king was finding it difficult to resolve the financial crisis and was forced by the first two estates to convene the meeting of the estates general marking the beginning of the revolution. It is, for this reason, it is also said that the French revolution was started by the aristocracy itself challenging the right of the king to impose taxes on them without the consent of the Estates-General. Conclusion: French revolution destroyed the old system (ancient regime) in the old world. The French revolution and its slogans- “Equality, liberty, and fraternity" forming the basis for modern political nationalism came to have a profound impact not only on contemporary Europe but also on almost all parts of the world in due course of time. They still play a major role in shaping socio-political discourses of the contemporary world and they have been embodied or enshrined in almost all major modern constitutional experiments of the world.
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नक्सलवाद पर नियंत्रण स्थापित करने हेतु भारत सरकार द्वारा विविध प्रयास किये हैं किन्तु अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है| चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द) Various efforts have been made by the Government of India to control Naxalism, but much remains to be done. Discuss (150 to 200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में नक्सलवाद की समस्या को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये 3- दुसरे भाग में वस्तुस्थिति स्पष्ट करते हुए अपेक्षित उपायों की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये और अपने सुझाव प्रस्तुत कीजिये 4- अंतिम में हालिया प्रयासों की चर्चा करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये विद्यमान व्यवस्थाओं एवं संवैधानिक प्रावधानों में विश्वास न रखते हुए अपनी व्यवस्था को स्थापित करने के लिए की गयी कार्यवाही को वामपंथी उग्रवाद के रूप में समझ सकते हैं| भारत में नक्सलवादी उग्रवाद वस्तुतः एक वामपंथी उग्रवाद है| वामपंथी उग्रवाद भारत की आतंरिक सुरक्षा हेतु बहुत ही गंभीर मुद्दा बनता जा रहा है| अतः नक्सलवाद पर नियंत्रण स्थापित करने की आवश्यकता है| इस सन्दर्भ में भारत सरकार का दृष्टिकोण सुरक्षा, विकास, स्थानीय समुदायों के अधिकारों और हकदारियों को सुनिश्चित करने, शासन प्रणाली में सुधार और लोगों की मानसिकता में परिवर्तन करके वामपंथी उग्रवाद को ख़त्म करने का है| भारत सरकार दशकों पुरानी इस समस्या से निपटने के लिए एक ओर जहाँ विकासात्मक कार्यों कों सरकार प्रोत्साहित कर रही है वहीँ सशक्त कार्यवाहियों के माध्यम से उन्हें कुचलने का प्रयास भी किया जा रहा है| भारत सरकार के प्रयास विकासात्मक कार्यक्रम एकीकृत एक्शन प्लान तथा एकीकृत कमान-नागरिक प्रशासन से असैन्य अधिकारियों के साथ-साथ सुरक्षाबलों के अधिकारियों के सहयोग से संबंधित क्षेत्र हेतु एकीकृत योजनाएँ; वामपंथी उग्रवाद प्रभावित इलाकों मेंसड़क निर्माण योजनाएँ(RRP-1 & 2); LWE मोबाइल टावर प्रोजेक्टके माध्यम से दूरसंचार कनेक्टिविटी को प्रोत्साहन; पुलिस स्टेशनों के किलेबंदी के लिए योजना ताकि जनता एवं सुरक्षाबलों दोनों के मन में भय को दूर किया जा सके| सिविक एक्शन प्रोग्राम(CAP)के माध्यम से LWE प्रभावित क्षेत्रों में स्थानीय निर्धन लोगों के कल्याण के लिए विभिन्न नागरिक कार्रवाईयों हेतु सुरक्षाबलों को फंड देना ताकि सुरक्षाबलों तथा स्थानीय निवासियों के मध्य सौहाद्रपूर्ण संबंधों की स्थापना हो सके| GIS मैपिंगके माध्यम से वित्तीय सेवाओं, स्कूल, डाकघरों, स्वास्थ्य केन्द्रों, मोबाइल टावरों, PDS सेवाओं, सड़क तथा सुरक्षा सुविधाओं आदि की समयबद्ध मैपिंग जिससे हितधारकों को विकास तथा सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर स्पष्ट निर्णय लेने में सहायता; रौशनी योजना तथा प्रधानमंत्री कौशल विकास योजनाको इन क्षेत्रों में सुदृढ़ तरीके से लागू करना; पंचायत(अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम,(PESA) के प्रावधानोंका उचित क्रियान्वयन; समाधान(SAMADHAN) योजना-एक एकीकृत रणनीति जो विभिन्न स्तरों पर गठित अल्पकालिक और दीर्घकालिक नीतियों का संकलन; सशस्त्र कार्यवाही के प्रयास सीआरपीएफ तथाकोबराबलों की ज्यादा तैनाती; पुलिस स्टेशनों एवं पुलिस व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण; राज्य पुलिस आधुनिकीकरण योजना(MPF)के तहत राज्य पुलिस तथा उनके ख़ुफ़िया तंत्र को सुदृढ़ करना; नक्सल विरोधी अभियानों में तेजी; नक्सल नियंत्रित भूभाग पर पुनः कब्ज़ा करना; नक्सलियों केवित्तीयन को बंद करना; उन्नत प्रोद्योगिकी के प्रयोग को बढ़ावा देना; नक्सलरोधी अभियानों के लिए हेलिकॉप्टर उपलब्ध करवाना; भारतीय रिज़र्व बटालियनोंका गठन तथा काउंटर इंसरजेंसी एंटी टेररिज्म स्कूलों(CIAT)की स्थापना; तथा ग्रेहाउंड्स यूनिट्सके गठन के माध्यम से नक्सलवाद के उन्मूलन के लिए प्रयास किये जा रहे हैं वर्तमान वस्तुस्थिति गृह मंत्रालय के अनुसार ,वर्ष 2016 में 10 राज्यों के 106 जिलें LWE से प्रभावित हैं| सरकार के द्वारा एक अनुमानित आंकड़े के अनुसार 40000 पूर्णकालिक कैडरों का अनुमान है| विगत दशक में नक्सलवादी घटनाओं की तीव्रता में वृद्धि हुयी है जिसके कारणना सिर्फ सुरक्षाबलों पर हमले बढ़े हैं अपितु सरकारी संस्थानों तथा सार्वजनिक संरचनाओं के तोड़फोड़ से जनता के मन में भय का वातावरणभी निर्मित करने का प्रयास किया जा रहा है| अतः स्पष्ट होता है कि नक्सलवाद के उन्मूलन के लिए अन्य उपाय भी अपेक्षित हैं नक्सलवाद उन्मूलन हेतु अपेक्षित उपाय संरचनात्मक विकास को बढ़ावा देने, सुरक्षित करने एवं सक्रिय करने के लिए लोगों को भागीदार बनाने की आवश्यकता है वर्तमान योजनाओं तथा नीतियों को सही तरीके से लागू करना एवं नियमित निगरानी तथा समीक्षा करना; सामाजिक और आर्थिक विकास में और अधिक सक्रियता एवं तीव्रताकी आवश्यकता; केंद्र तथा राज्यों के मध्य उभरते मतभेदों(नदी जल, प्राकृतिक संपदा एवं भौगोलिक) को समाप्त करने के लिए स्थायी संस्थागत तंत्र के माध्यम से पारस्परिक समन्वय स्थापित करने की आवश्यकता है| नक्सलवादियों के विदेशी संगठनों के साथ संपर्क को अवरूद्ध करने की आवश्यकता है; मनोवैज्ञानिक ऑपरेशन के माध्यम से राष्ट्र के प्रति निष्ठा जागृत करने की आवश्यकता; बौद्धिक गुलामी से मुक्त करने की आवश्यकता; केंद्र और राज्यों के मध्य सहयोग स्थापित करते हुए सामूहिक व्यवस्थाओं के लिए भिन्न-भिन्न प्लेटफ़ॉर्म स्थापित करने की आवश्यकता है ताकि समस्याओं का उचित निपटान किया जा सके; पंचायत व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण; उपरोक्त सुझावों के साथ-साथ माओवादी चरमपंथ को रोकने हेतुविकास कार्यक्रमों को लागू करने के पूर्व बेहतर कानून-व्यवस्था की स्थापना एवं उसको सशक्त करना प्राथमिकता में होना चाहिए| विकास कार्यों को सुरक्षाबलों के साथ समन्वित रूप से संपन्न किया जाना चाहिए| किसी क्षेत्र को सुरक्षाबलों द्वारा उग्रवाद मुक्त किये जाने के साथ ही उस क्षेत्र में प्रशासनिक गतिविधियों को तुरंत बहाल किया जाना चाहिए| वर्ष 2019 में UAPA कानून और NIA कानून में संशोधन करके केंद्र राज्य समन्वय करने की समस्या से निपटने के उपाय किये गए हैं| इसी तरह अर्धसैनिक बलों के प्रति मनोवैज्ञानिक समर्थन बढाने के लिए उनकी भूमिका को निरंतर रचनात्मक बदलाव किये जा रहे हैं तथापि उपरोक्त उपायों को अपनाने पर नक्सलवाद पर नियंत्रण स्थापित करने में प्रभावी सफलता मिलेगी
##Question:नक्सलवाद पर नियंत्रण स्थापित करने हेतु भारत सरकार द्वारा विविध प्रयास किये हैं किन्तु अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है| चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द) Various efforts have been made by the Government of India to control Naxalism, but much remains to be done. Discuss (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में नक्सलवाद की समस्या को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये 3- दुसरे भाग में वस्तुस्थिति स्पष्ट करते हुए अपेक्षित उपायों की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये और अपने सुझाव प्रस्तुत कीजिये 4- अंतिम में हालिया प्रयासों की चर्चा करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये विद्यमान व्यवस्थाओं एवं संवैधानिक प्रावधानों में विश्वास न रखते हुए अपनी व्यवस्था को स्थापित करने के लिए की गयी कार्यवाही को वामपंथी उग्रवाद के रूप में समझ सकते हैं| भारत में नक्सलवादी उग्रवाद वस्तुतः एक वामपंथी उग्रवाद है| वामपंथी उग्रवाद भारत की आतंरिक सुरक्षा हेतु बहुत ही गंभीर मुद्दा बनता जा रहा है| अतः नक्सलवाद पर नियंत्रण स्थापित करने की आवश्यकता है| इस सन्दर्भ में भारत सरकार का दृष्टिकोण सुरक्षा, विकास, स्थानीय समुदायों के अधिकारों और हकदारियों को सुनिश्चित करने, शासन प्रणाली में सुधार और लोगों की मानसिकता में परिवर्तन करके वामपंथी उग्रवाद को ख़त्म करने का है| भारत सरकार दशकों पुरानी इस समस्या से निपटने के लिए एक ओर जहाँ विकासात्मक कार्यों कों सरकार प्रोत्साहित कर रही है वहीँ सशक्त कार्यवाहियों के माध्यम से उन्हें कुचलने का प्रयास भी किया जा रहा है| भारत सरकार के प्रयास विकासात्मक कार्यक्रम एकीकृत एक्शन प्लान तथा एकीकृत कमान-नागरिक प्रशासन से असैन्य अधिकारियों के साथ-साथ सुरक्षाबलों के अधिकारियों के सहयोग से संबंधित क्षेत्र हेतु एकीकृत योजनाएँ; वामपंथी उग्रवाद प्रभावित इलाकों मेंसड़क निर्माण योजनाएँ(RRP-1 & 2); LWE मोबाइल टावर प्रोजेक्टके माध्यम से दूरसंचार कनेक्टिविटी को प्रोत्साहन; पुलिस स्टेशनों के किलेबंदी के लिए योजना ताकि जनता एवं सुरक्षाबलों दोनों के मन में भय को दूर किया जा सके| सिविक एक्शन प्रोग्राम(CAP)के माध्यम से LWE प्रभावित क्षेत्रों में स्थानीय निर्धन लोगों के कल्याण के लिए विभिन्न नागरिक कार्रवाईयों हेतु सुरक्षाबलों को फंड देना ताकि सुरक्षाबलों तथा स्थानीय निवासियों के मध्य सौहाद्रपूर्ण संबंधों की स्थापना हो सके| GIS मैपिंगके माध्यम से वित्तीय सेवाओं, स्कूल, डाकघरों, स्वास्थ्य केन्द्रों, मोबाइल टावरों, PDS सेवाओं, सड़क तथा सुरक्षा सुविधाओं आदि की समयबद्ध मैपिंग जिससे हितधारकों को विकास तथा सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर स्पष्ट निर्णय लेने में सहायता; रौशनी योजना तथा प्रधानमंत्री कौशल विकास योजनाको इन क्षेत्रों में सुदृढ़ तरीके से लागू करना; पंचायत(अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम,(PESA) के प्रावधानोंका उचित क्रियान्वयन; समाधान(SAMADHAN) योजना-एक एकीकृत रणनीति जो विभिन्न स्तरों पर गठित अल्पकालिक और दीर्घकालिक नीतियों का संकलन; सशस्त्र कार्यवाही के प्रयास सीआरपीएफ तथाकोबराबलों की ज्यादा तैनाती; पुलिस स्टेशनों एवं पुलिस व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण; राज्य पुलिस आधुनिकीकरण योजना(MPF)के तहत राज्य पुलिस तथा उनके ख़ुफ़िया तंत्र को सुदृढ़ करना; नक्सल विरोधी अभियानों में तेजी; नक्सल नियंत्रित भूभाग पर पुनः कब्ज़ा करना; नक्सलियों केवित्तीयन को बंद करना; उन्नत प्रोद्योगिकी के प्रयोग को बढ़ावा देना; नक्सलरोधी अभियानों के लिए हेलिकॉप्टर उपलब्ध करवाना; भारतीय रिज़र्व बटालियनोंका गठन तथा काउंटर इंसरजेंसी एंटी टेररिज्म स्कूलों(CIAT)की स्थापना; तथा ग्रेहाउंड्स यूनिट्सके गठन के माध्यम से नक्सलवाद के उन्मूलन के लिए प्रयास किये जा रहे हैं वर्तमान वस्तुस्थिति गृह मंत्रालय के अनुसार ,वर्ष 2016 में 10 राज्यों के 106 जिलें LWE से प्रभावित हैं| सरकार के द्वारा एक अनुमानित आंकड़े के अनुसार 40000 पूर्णकालिक कैडरों का अनुमान है| विगत दशक में नक्सलवादी घटनाओं की तीव्रता में वृद्धि हुयी है जिसके कारणना सिर्फ सुरक्षाबलों पर हमले बढ़े हैं अपितु सरकारी संस्थानों तथा सार्वजनिक संरचनाओं के तोड़फोड़ से जनता के मन में भय का वातावरणभी निर्मित करने का प्रयास किया जा रहा है| अतः स्पष्ट होता है कि नक्सलवाद के उन्मूलन के लिए अन्य उपाय भी अपेक्षित हैं नक्सलवाद उन्मूलन हेतु अपेक्षित उपाय संरचनात्मक विकास को बढ़ावा देने, सुरक्षित करने एवं सक्रिय करने के लिए लोगों को भागीदार बनाने की आवश्यकता है वर्तमान योजनाओं तथा नीतियों को सही तरीके से लागू करना एवं नियमित निगरानी तथा समीक्षा करना; सामाजिक और आर्थिक विकास में और अधिक सक्रियता एवं तीव्रताकी आवश्यकता; केंद्र तथा राज्यों के मध्य उभरते मतभेदों(नदी जल, प्राकृतिक संपदा एवं भौगोलिक) को समाप्त करने के लिए स्थायी संस्थागत तंत्र के माध्यम से पारस्परिक समन्वय स्थापित करने की आवश्यकता है| नक्सलवादियों के विदेशी संगठनों के साथ संपर्क को अवरूद्ध करने की आवश्यकता है; मनोवैज्ञानिक ऑपरेशन के माध्यम से राष्ट्र के प्रति निष्ठा जागृत करने की आवश्यकता; बौद्धिक गुलामी से मुक्त करने की आवश्यकता; केंद्र और राज्यों के मध्य सहयोग स्थापित करते हुए सामूहिक व्यवस्थाओं के लिए भिन्न-भिन्न प्लेटफ़ॉर्म स्थापित करने की आवश्यकता है ताकि समस्याओं का उचित निपटान किया जा सके; पंचायत व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण; उपरोक्त सुझावों के साथ-साथ माओवादी चरमपंथ को रोकने हेतुविकास कार्यक्रमों को लागू करने के पूर्व बेहतर कानून-व्यवस्था की स्थापना एवं उसको सशक्त करना प्राथमिकता में होना चाहिए| विकास कार्यों को सुरक्षाबलों के साथ समन्वित रूप से संपन्न किया जाना चाहिए| किसी क्षेत्र को सुरक्षाबलों द्वारा उग्रवाद मुक्त किये जाने के साथ ही उस क्षेत्र में प्रशासनिक गतिविधियों को तुरंत बहाल किया जाना चाहिए| वर्ष 2019 में UAPA कानून और NIA कानून में संशोधन करके केंद्र राज्य समन्वय करने की समस्या से निपटने के उपाय किये गए हैं| इसी तरह अर्धसैनिक बलों के प्रति मनोवैज्ञानिक समर्थन बढाने के लिए उनकी भूमिका को निरंतर रचनात्मक बदलाव किये जा रहे हैं तथापि उपरोक्त उपायों को अपनाने पर नक्सलवाद पर नियंत्रण स्थापित करने में प्रभावी सफलता मिलेगी
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गैर -निष्पादित परिसंपत्तियों से आप क्या समझते हैं? साथ ही इस संदर्भ में बैंकिंग सुधारों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) What do you mean by Non-performing Assets? In this context briefly discuss the banking reforms. (150-200 words)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात बैंकिंग सुधारों के लिए किये गए प्रयासों में नरसिंहम समिति की चर्चा कीजिये | पुनः बेसेल मानक,दिवाला एवं दिवालिया कानून आदि को को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में MCLR के बारे में बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - गैर -निष्पादित परिसंपत्तियां (NPA) सैद्धांतिक स्तर पर बैंकों के सन्दर्भ में कुछ मुख्य चुनौतियाँ, बढ़ते NPA एवं अर्थव्यवस्था में मांग एवं आपूर्ति में असंतुलन दो मुख्य घटक कहे जा सकते हैं | NPA से तात्पर्य बैंकों के सन्दर्भ में उन ऋणों से है जो लगातार 90 दिनों तक किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हों | यदि ये एक वर्ष ऐसी ही स्थिति में रह रहे हैं तो इन्हें सब स्टैण्डर्ड NPA कहा जाता है | तथा एक वर्ष के बाद इन्हें संदेहास्पद NPA की संज्ञा दी जाती है | भारतीय परिप्रेक्ष्य में बैंकिंग सुधारों के सन्दर्भ में कुछ मुख्य प्रयास निम्नलिखित हैं - नरसिंहम समिति प्रथम एवं द्वितीय नरसिंहम समिति ने बैंकों के सुधार के लिए पहले लीड बैंक स्कीम की बात कही, जिसके अंतर्गत उन्हें दिए गए क्षेत्र में विस्तार पर अधिक ध्यान देना चाहिए | साथ ही NPA से निपटने हेतु परिसंपत्ति पुनर्निर्माण फंड द्वारा अपने NPA को कम करना चाहिए | किसी बैंक में हुए NPA को बैंक किसी तीसरे मध्यस्थ को कम दामों पर दे देता है | इन मध्यस्थों को एसेट पुनर्निर्माण कम्पनी (ARC) कहा जाता है | नरसिंहम द्वितीय समिति ने LAF (एलएएफ)- तरलता समायोजन सुविधा तथा पूँजी पर्याप्तता अनुपात की अनुशंषा भी की | साथ ही पेमेंट रेगुलेशन बोर्ड बनाने की बात कही (वर्ष 2017 में रतन वतल समिति ने इसकी स्थापना की सिफारिश की है) वर्ष 2007 से पेमेंट एवं सेटेलमेंट व्यवस्था कानून इसकी देख-रेख करता है | बेसेल मानक या नियम बेसेल स्विट्ज़रलैंड में स्थित एक अंतरराष्ट्रीय सेटलमेंट बैंक है, जिसमे 60 केन्द्रीय बैंक परस्पर हितधारक हैं | समय-समय पर केन्द्रीय बैंकों हेतु नियमावली जारी करता है , जिन्हें बेसेल नियम कहा जाता है | इनमे से प्रमुख बेसेल नियम - बेसेल प्रथम -1988 , बेसेल द्वितीय -2004, बेसेल तृतीय -2011 बेसेल प्रथम में -बैंकों को और अधिक व्यवस्थित होते हुए मात्रात्मक सुधारों पर ध्यान देने की अनुशंषा की गयी | बेसेल द्वितीय में- पूँजी पर्याप्तता अनुपात को जोखिम भारित आधार पर गणना करने की बात कही गयी, जिसको "पूँजी का जोखिम भारित पर्याप्तता अनुपात" (CRAR) कहा जाता है | बेसेल तृतीय में- अमेरिका के आर्थिक मंदी को संज्ञान में रखते हुए काउंटर पूँजी बफर बनाने की बात कही गयी, जिसके अंतर्गत एक पूँजी का बफर भी बनाए रखना चाहिए जिसको सापेक्षिक मंदी के समय इस्तेमाल किया जाय | दिवाला और दिवालियापन (शोधन अक्षमता) कानून (Insolvency and bankruptcy code) भारतीय सन्दर्भ में व्यवसायियों के लिए अपने व्यवसाय को पूर्णतः बंद करने की प्रक्रिया बहुत जटिल थी | जिसमे आवश्यक सुधार करते हुए वर्ष 2016 में यह नियम बनाया गया | इसकी कुछ प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं - ऐसे किसी मामलों का निस्तारण 180 दिनों में हो जाना चाहिए तथा कुछ विशिष्ट सन्दर्भों में यह न्यूनतम 90 दिन तथा अधिकतम 270 दिन हो सकता है | इस सन्दर्भ में एक बोर्ड की स्थापना भी की गयी जिसमे कुल 10 सदस्य निम्न प्रकार से हैं - एक अध्यक्ष, RBI द्वारा नामित सदस्य, 3 सचिव स्तरीय केन्द्रीय अधिकारी, 5 दिवालियेपन के मामलों के विशेषज्ञ | इस कानून के अंतर्गत पहले वित्तीय निवेशकों के लेन देन को पूरा किया जाता है तथा उसके पश्चात क्रियान्वयन के स्तर के सहयोगियों के कर्ज निपटाएं जाते हैं | वर्ष 2017 में इसे संशोधित करते हुए उन लोगों को अलग रखा गया जो जान-बूझकर स्वयं को दिवालिया घोषित कर रहे हैं | वर्ष 2018 में रियल स्टेट के सन्दर्भ में इंजेती श्रीनिवास समिति की बात मानते हुए रियल स्टेट के मामले में मकान की बुकिंग कराने वाले ग्राहकों को फाइनेंसियल क्रेडिटर कहा जाता है , आदि 201 6 से बेस दरों को निर्धारित करने हेतु बैंकों को सीमान्त कीमत के आधार पर करने की बात की गयी है | (एमसीएलआर (MCLR)) | सिबिल से तात्पर्य क्रेडिट इनफार्मेशन ब्यूरो से है , जो वर्ष 2000 से कार्यरत है |यह पैन कार्ड पर आधारित होते हुए व्यक्तियों एवं संस्थाओं के ऋण इतिहास की जानकारी को बैंकिंग प्रणाली को सुलभ करता है |यह 300-900 के मानक स्केल पर आधारित है तथा 700 से अधिक का सिबिल ऋणों के लिए उपयुक्त माना जाता है |
##Question:गैर -निष्पादित परिसंपत्तियों से आप क्या समझते हैं? साथ ही इस संदर्भ में बैंकिंग सुधारों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) What do you mean by Non-performing Assets? In this context briefly discuss the banking reforms. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात बैंकिंग सुधारों के लिए किये गए प्रयासों में नरसिंहम समिति की चर्चा कीजिये | पुनः बेसेल मानक,दिवाला एवं दिवालिया कानून आदि को को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में MCLR के बारे में बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - गैर -निष्पादित परिसंपत्तियां (NPA) सैद्धांतिक स्तर पर बैंकों के सन्दर्भ में कुछ मुख्य चुनौतियाँ, बढ़ते NPA एवं अर्थव्यवस्था में मांग एवं आपूर्ति में असंतुलन दो मुख्य घटक कहे जा सकते हैं | NPA से तात्पर्य बैंकों के सन्दर्भ में उन ऋणों से है जो लगातार 90 दिनों तक किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हों | यदि ये एक वर्ष ऐसी ही स्थिति में रह रहे हैं तो इन्हें सब स्टैण्डर्ड NPA कहा जाता है | तथा एक वर्ष के बाद इन्हें संदेहास्पद NPA की संज्ञा दी जाती है | भारतीय परिप्रेक्ष्य में बैंकिंग सुधारों के सन्दर्भ में कुछ मुख्य प्रयास निम्नलिखित हैं - नरसिंहम समिति प्रथम एवं द्वितीय नरसिंहम समिति ने बैंकों के सुधार के लिए पहले लीड बैंक स्कीम की बात कही, जिसके अंतर्गत उन्हें दिए गए क्षेत्र में विस्तार पर अधिक ध्यान देना चाहिए | साथ ही NPA से निपटने हेतु परिसंपत्ति पुनर्निर्माण फंड द्वारा अपने NPA को कम करना चाहिए | किसी बैंक में हुए NPA को बैंक किसी तीसरे मध्यस्थ को कम दामों पर दे देता है | इन मध्यस्थों को एसेट पुनर्निर्माण कम्पनी (ARC) कहा जाता है | नरसिंहम द्वितीय समिति ने LAF (एलएएफ)- तरलता समायोजन सुविधा तथा पूँजी पर्याप्तता अनुपात की अनुशंषा भी की | साथ ही पेमेंट रेगुलेशन बोर्ड बनाने की बात कही (वर्ष 2017 में रतन वतल समिति ने इसकी स्थापना की सिफारिश की है) वर्ष 2007 से पेमेंट एवं सेटेलमेंट व्यवस्था कानून इसकी देख-रेख करता है | बेसेल मानक या नियम बेसेल स्विट्ज़रलैंड में स्थित एक अंतरराष्ट्रीय सेटलमेंट बैंक है, जिसमे 60 केन्द्रीय बैंक परस्पर हितधारक हैं | समय-समय पर केन्द्रीय बैंकों हेतु नियमावली जारी करता है , जिन्हें बेसेल नियम कहा जाता है | इनमे से प्रमुख बेसेल नियम - बेसेल प्रथम -1988 , बेसेल द्वितीय -2004, बेसेल तृतीय -2011 बेसेल प्रथम में -बैंकों को और अधिक व्यवस्थित होते हुए मात्रात्मक सुधारों पर ध्यान देने की अनुशंषा की गयी | बेसेल द्वितीय में- पूँजी पर्याप्तता अनुपात को जोखिम भारित आधार पर गणना करने की बात कही गयी, जिसको "पूँजी का जोखिम भारित पर्याप्तता अनुपात" (CRAR) कहा जाता है | बेसेल तृतीय में- अमेरिका के आर्थिक मंदी को संज्ञान में रखते हुए काउंटर पूँजी बफर बनाने की बात कही गयी, जिसके अंतर्गत एक पूँजी का बफर भी बनाए रखना चाहिए जिसको सापेक्षिक मंदी के समय इस्तेमाल किया जाय | दिवाला और दिवालियापन (शोधन अक्षमता) कानून (Insolvency and bankruptcy code) भारतीय सन्दर्भ में व्यवसायियों के लिए अपने व्यवसाय को पूर्णतः बंद करने की प्रक्रिया बहुत जटिल थी | जिसमे आवश्यक सुधार करते हुए वर्ष 2016 में यह नियम बनाया गया | इसकी कुछ प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं - ऐसे किसी मामलों का निस्तारण 180 दिनों में हो जाना चाहिए तथा कुछ विशिष्ट सन्दर्भों में यह न्यूनतम 90 दिन तथा अधिकतम 270 दिन हो सकता है | इस सन्दर्भ में एक बोर्ड की स्थापना भी की गयी जिसमे कुल 10 सदस्य निम्न प्रकार से हैं - एक अध्यक्ष, RBI द्वारा नामित सदस्य, 3 सचिव स्तरीय केन्द्रीय अधिकारी, 5 दिवालियेपन के मामलों के विशेषज्ञ | इस कानून के अंतर्गत पहले वित्तीय निवेशकों के लेन देन को पूरा किया जाता है तथा उसके पश्चात क्रियान्वयन के स्तर के सहयोगियों के कर्ज निपटाएं जाते हैं | वर्ष 2017 में इसे संशोधित करते हुए उन लोगों को अलग रखा गया जो जान-बूझकर स्वयं को दिवालिया घोषित कर रहे हैं | वर्ष 2018 में रियल स्टेट के सन्दर्भ में इंजेती श्रीनिवास समिति की बात मानते हुए रियल स्टेट के मामले में मकान की बुकिंग कराने वाले ग्राहकों को फाइनेंसियल क्रेडिटर कहा जाता है , आदि 201 6 से बेस दरों को निर्धारित करने हेतु बैंकों को सीमान्त कीमत के आधार पर करने की बात की गयी है | (एमसीएलआर (MCLR)) | सिबिल से तात्पर्य क्रेडिट इनफार्मेशन ब्यूरो से है , जो वर्ष 2000 से कार्यरत है |यह पैन कार्ड पर आधारित होते हुए व्यक्तियों एवं संस्थाओं के ऋण इतिहास की जानकारी को बैंकिंग प्रणाली को सुलभ करता है |यह 300-900 के मानक स्केल पर आधारित है तथा 700 से अधिक का सिबिल ऋणों के लिए उपयुक्त माना जाता है |
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भारत में मादक पदार्थों की तस्करी के कारण एवं परिणामों को स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही मादक पदार्थों की तस्करी को रोकने की दिशा में भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Explain the causes and consequences of drug trafficking in India. Along with this, discuss the efforts made by the Government of India towards curbing drug trafficking. (150 to 200 words, 10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में मादक पदार्थों की तस्करी की समस्या को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में मादक पदार्थों की तस्करी के कारणों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में मादक पदार्थों की तस्करी के परिणामों को स्पष्ट कीजिये 4- तीसरे भाग में मादक पदार्थों की तस्करी रोकने के लिए भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये| 5- अंतिम में मादक पदार्थों की तस्करी रोकने के लिए कुछ सुझाव हुए उत्तर समाप्त कीजिये| मादक पदार्थों की तस्करी एक गैर परम्परागत श्रेणी का संगठित अपराध होता है |अंतर्राष्ट्रीय नारकोटिक्स कंट्रोल बोर्ड (INCB) की 2018 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत मादक पदार्थों की तस्करी के लिए एक प्रमुख केंद्र है।इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भांग, गांजा जैसे पारंपरिक मादक पदार्थों से लेकर ट्रामाडोल ( tramadol ) व मेथमफेटामाइन ( methamphetamin ) जैसे सिंथेटिक व डिजाइनर ड्रग्स सभी का अवैध व्यापार भारत में काफी फल-फूल रहा है । इसके विभिन्न कारण हैं| भारत में मादक पदार्थों की तस्करी का मुख्य कारण भारत की अवस्थिति तथा पूर्वोत्तर के क्षेत्र में छिद्रिल सीमा की मौजूदगी है।वस्तुतः भारत विश्व के दो प्रमुख मादक पदार्थों को उत्पादित करने वाले क्षेत्रों के बीच अवस्थित है। जहां पूर्व में गोल्डेन ट्राइऐंगल के रूप में थायलैंड, लाओस व म्यांमार जैसे मादक पदार्थों के उत्पादक क्षेत्र हैं, वहीं पश्चिम में गोल्डेन क्रेसेंट के रूप में पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान व ईरान का क्षेत्र आता है। इन उत्पादक क्षेत्रों के लिए भारत एक बड़ा बाज़ार है पडोसी देशों के साथ नकारात्मक सम्बन्ध होने के कारण भारत के पड़ोसी राष्ट्रों की मदद से आसानी से भारत में मादक पदार्थों का अवैध व्यापार चलाया जाता है । पूर्वोत्तर क्षेत्र में छिद्रिल सीमा व सीमा प्रबंधन की समस्या के कारण भी मादक पदार्थों की तस्करी को बढ़ावा मिलता है| भारत में मादक पदार्थों की तस्करी के परिणाम मादक पदार्थों की तस्करी भारत के लिए एक बड़ी समस्या बनी हुई है । तस्करों को पारगमन मार्ग की प्राप्ति, मादक पदार्थों की तस्करी के कारण सीमायें असुरक्षित होती है| नशे की चपेट में आकर युवाओं का जीवन बर्बाद हो रहा है और इसका स्पष्ट प्रमाण हमें पंजाब व पूर्वोत्तर के राज्यों में देखने को मिलता है। जनस्वास्थ्य प्रभावित होने से अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है| नशाखोरी के कारण कानून व्यवस्था में बाधा उत्पन्न होती है मादक पदार्थों की तस्करी के कारण हमारी आंतरिक सुरक्षा के समक्ष भी एक बड़ी चुनौती उत्पन्न होती है। मादक पदार्थों की तस्करी व आतंकवाद के बीच गहरा संबंध है। पूर्वोत्तर में अलगाववाद व आतंकवाद के लिए यह धन के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में कार्य करता है । पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के संदर्भ में भी मादक पदार्थों के तस्करी की भूमिका को देखा जा सकता है । भारत में मादक पदार्थों की तस्करी रोकने के लिए किये गए प्रयास मादक पदार्थों की तस्करी की गंभीरता को देखते हुए सरकार द्वारा कई कदम उठाए गए हैं| नारकोटिक्स ड्रग एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेन्स अधिनियम 1985 के तहत किसी भी नशीली दवा की कृषि, बिक्री अथवा परिवहन को अपराध घोषित किया गया है वर्ष 2014 में इस कानून के दायरे को बढाते हुए एसेंशियल नारकोटिक्सड्रग्स/दर्द निवारक औषधियों को इस कानून के दायरे में लाया गया है| 2015 में NDPS दवाओं जैसे मोर्फीन, फेंटेनियल, मेथोडॉन, हाइड्रोकोडेन, कोडेन एवं ओक्सी कोडेन को केंद्र के नियंत्रण में ले लिया गया है| नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो लगातार इस दिशा में प्रयासरत है। वर्ष 2016 में सरकार द्वारा NCORD का गठन भी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है । दवाइयों और रसायनों के अवैध परिवहन की रोकथाम के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग विकसित किया जा रहा है| इसके साथ ही नशीले पदार्थों और सिंथेटिक दवाओं के दुरूपयोग को रोकने के लिए सक्रिय प्रयास किये जा रहे हैं इसके साथ ही स्वैच्छिक संगठनों को भागीदार बना कर युवा वर्ग को इन पदार्थों से दूर रहने के लिए प्रेरित किया जा रहा है| गस्त और निगरानी को मजबूत करके सीमाओं एवं तटों की भौगोलिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निगरानी तंत्र को मजबूत किया गया है| बेहतर सीमा प्रबंधन भी मादक पदार्थों की तस्करी पर प्रभावी नियंत्रण के लिए एक आवश्यक शर्त है और भारत सरकार निरंतर इस ओर ध्यान से रही है तथापि इस समस्या को और गंभीरता के साथ संबोधित किए जाने की आवश्यकता है ।
##Question:भारत में मादक पदार्थों की तस्करी के कारण एवं परिणामों को स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही मादक पदार्थों की तस्करी को रोकने की दिशा में भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Explain the causes and consequences of drug trafficking in India. Along with this, discuss the efforts made by the Government of India towards curbing drug trafficking. (150 to 200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में मादक पदार्थों की तस्करी की समस्या को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में मादक पदार्थों की तस्करी के कारणों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में मादक पदार्थों की तस्करी के परिणामों को स्पष्ट कीजिये 4- तीसरे भाग में मादक पदार्थों की तस्करी रोकने के लिए भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये| 5- अंतिम में मादक पदार्थों की तस्करी रोकने के लिए कुछ सुझाव हुए उत्तर समाप्त कीजिये| मादक पदार्थों की तस्करी एक गैर परम्परागत श्रेणी का संगठित अपराध होता है |अंतर्राष्ट्रीय नारकोटिक्स कंट्रोल बोर्ड (INCB) की 2018 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत मादक पदार्थों की तस्करी के लिए एक प्रमुख केंद्र है।इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भांग, गांजा जैसे पारंपरिक मादक पदार्थों से लेकर ट्रामाडोल ( tramadol ) व मेथमफेटामाइन ( methamphetamin ) जैसे सिंथेटिक व डिजाइनर ड्रग्स सभी का अवैध व्यापार भारत में काफी फल-फूल रहा है । इसके विभिन्न कारण हैं| भारत में मादक पदार्थों की तस्करी का मुख्य कारण भारत की अवस्थिति तथा पूर्वोत्तर के क्षेत्र में छिद्रिल सीमा की मौजूदगी है।वस्तुतः भारत विश्व के दो प्रमुख मादक पदार्थों को उत्पादित करने वाले क्षेत्रों के बीच अवस्थित है। जहां पूर्व में गोल्डेन ट्राइऐंगल के रूप में थायलैंड, लाओस व म्यांमार जैसे मादक पदार्थों के उत्पादक क्षेत्र हैं, वहीं पश्चिम में गोल्डेन क्रेसेंट के रूप में पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान व ईरान का क्षेत्र आता है। इन उत्पादक क्षेत्रों के लिए भारत एक बड़ा बाज़ार है पडोसी देशों के साथ नकारात्मक सम्बन्ध होने के कारण भारत के पड़ोसी राष्ट्रों की मदद से आसानी से भारत में मादक पदार्थों का अवैध व्यापार चलाया जाता है । पूर्वोत्तर क्षेत्र में छिद्रिल सीमा व सीमा प्रबंधन की समस्या के कारण भी मादक पदार्थों की तस्करी को बढ़ावा मिलता है| भारत में मादक पदार्थों की तस्करी के परिणाम मादक पदार्थों की तस्करी भारत के लिए एक बड़ी समस्या बनी हुई है । तस्करों को पारगमन मार्ग की प्राप्ति, मादक पदार्थों की तस्करी के कारण सीमायें असुरक्षित होती है| नशे की चपेट में आकर युवाओं का जीवन बर्बाद हो रहा है और इसका स्पष्ट प्रमाण हमें पंजाब व पूर्वोत्तर के राज्यों में देखने को मिलता है। जनस्वास्थ्य प्रभावित होने से अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है| नशाखोरी के कारण कानून व्यवस्था में बाधा उत्पन्न होती है मादक पदार्थों की तस्करी के कारण हमारी आंतरिक सुरक्षा के समक्ष भी एक बड़ी चुनौती उत्पन्न होती है। मादक पदार्थों की तस्करी व आतंकवाद के बीच गहरा संबंध है। पूर्वोत्तर में अलगाववाद व आतंकवाद के लिए यह धन के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में कार्य करता है । पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के संदर्भ में भी मादक पदार्थों के तस्करी की भूमिका को देखा जा सकता है । भारत में मादक पदार्थों की तस्करी रोकने के लिए किये गए प्रयास मादक पदार्थों की तस्करी की गंभीरता को देखते हुए सरकार द्वारा कई कदम उठाए गए हैं| नारकोटिक्स ड्रग एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेन्स अधिनियम 1985 के तहत किसी भी नशीली दवा की कृषि, बिक्री अथवा परिवहन को अपराध घोषित किया गया है वर्ष 2014 में इस कानून के दायरे को बढाते हुए एसेंशियल नारकोटिक्सड्रग्स/दर्द निवारक औषधियों को इस कानून के दायरे में लाया गया है| 2015 में NDPS दवाओं जैसे मोर्फीन, फेंटेनियल, मेथोडॉन, हाइड्रोकोडेन, कोडेन एवं ओक्सी कोडेन को केंद्र के नियंत्रण में ले लिया गया है| नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो लगातार इस दिशा में प्रयासरत है। वर्ष 2016 में सरकार द्वारा NCORD का गठन भी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है । दवाइयों और रसायनों के अवैध परिवहन की रोकथाम के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग विकसित किया जा रहा है| इसके साथ ही नशीले पदार्थों और सिंथेटिक दवाओं के दुरूपयोग को रोकने के लिए सक्रिय प्रयास किये जा रहे हैं इसके साथ ही स्वैच्छिक संगठनों को भागीदार बना कर युवा वर्ग को इन पदार्थों से दूर रहने के लिए प्रेरित किया जा रहा है| गस्त और निगरानी को मजबूत करके सीमाओं एवं तटों की भौगोलिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निगरानी तंत्र को मजबूत किया गया है| बेहतर सीमा प्रबंधन भी मादक पदार्थों की तस्करी पर प्रभावी नियंत्रण के लिए एक आवश्यक शर्त है और भारत सरकार निरंतर इस ओर ध्यान से रही है तथापि इस समस्या को और गंभीरता के साथ संबोधित किए जाने की आवश्यकता है ।
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आर्थिक वृद्धि, आर्थिक विकास व मानव विकास की संकल्पनाओं को संक्षिप्त में समझाइए । (150-200 शब्द/10 अंक) Briefly explain the concepts of economic growth, economic development, and human development. (150-200 words/10 marks)
दृष्टिकोण : आर्थिक वृद्धि, आर्थिक विकास, व समावेशी विकास को संक्षिप्त में परिभाषित कीजिये । उदाहरणों के माध्यम से इन संकल्पनाओं को स्पष्ट रूप में समझाइए । आर्थिक वृद्धि , आर्थिक विकास व समावेशी विकास के बीच के अंतरसंबंधों की चर्चा कीजिये । उत्तर : आर्थिक वृद्धि : किसी अर्थव्यवस्था में दीर्घकाल की अवधि में वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन में वृद्धि होने की प्रक्रिया को आर्थिक वृद्धि कहते हैं । इसे वास्तविक जीडीपी या वास्तविक प्रतिव्यक्ति आय में निरंतर वृद्धि के माध्यम सेप्राप्त किया जा सकता है ।यह एक आयामी अवधारणा है , जोकेवल जीडीपी में वृद्धि को दर्शाता है । यह एक मात्रात्मक अवधारणा है। इसे आर्थिक विकास के बिना प्राप्त किया जा सकता है ।इसे वास्तविक जीडीपी से मापा जाता है । वास्तविक प्रतिव्यक्ति आय इसका एक सूचक है । आर्थिक विकास : यह आर्थिक वृद्धि की वह प्रक्रिया होती है जिसके साथ-साथ सामाजिक कल्याण में भी सुधार होता है । अर्थव्यवस्था के आर्थिक एवं सामाजिक ढांचे में प्रगतिशील परिवर्तन की प्रक्रिया को आर्थिक विकास कहते हैं । यह एक बहुआयामी व गुणात्मक अवधारणा है ।आर्थिक वृद्धि के बिना इसकी संभावना बहुत ही कम होती है । आर्थिकवृद्धि के द्वारा संसाधनों में वृद्धि आर्थिक विकास के लिए एक पूर्व शर्त है ।एचडीआई , वैश्विक खुशहाली सूचकांक , आदि के माध्यम से इसका मापन किया जाता है । समावेशी विकास : यह एक प्रक्रिया एवं परिणाम है जिसमें आर्थिक वृद्धि की संरचना में सभी वर्गों के व्यक्तियों की भागीदारी हो एवं वे उससे समानरूप से लाभान्वित हो ।इसका प्रमुख उद्देश लोगों को क्षमतावान बनाना व उन्हें रोजगार उपलब्ध करवाना । समावेशीविकास मानव की क्षमता में विस्तार करने व उसे आर्थिक विकास की प्रक्रिया में प्रत्यक्ष रूप से सहभागी बनाने व उसका लाभ उठाने से संबंधित है । समावेशी विकास के अंतर्गत मानव क्षमता में सुधार के अंतर्गत स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल विकास व प्रशिक्षण , मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति , सभी को समान अवसर , महिला सशक्तिकरण आदि शामिल किए जा सकते हैं । जबकि इसका एक दूसरा आयामरोजगार सृजन से संबंधित है और इसके अंतर्गतनिवेश ( मेक इन इंडिया ) , स्वरोजगार को बढ़ाना ( मुद्रा योजना ) , उधमिता को बढ़ाना ( स्टार्टअप ) , श्रम गहन क्षेत्रों को प्रोत्साहन ( खाध प्रसंस्करण , चमड़ा , वस्त्र उद्योग ) देने जैसे कार्य सम्मिलित हैं । आर्थिक विकास केवल उद्देश्य है जबकि समावेशी विकास प्रक्रिया व उद्देश्य दोनों है ।आर्थिक विकास केवल कल्याण को बढ़ाने पर केन्द्रित है जबकि समावेशी विकास भागीदारी के साथ कल्याण को बढ़ाने पर केन्द्रित होता है । पुनर्वितरण उपायों ( सहायकी, कल्याण भुगतान ) से आर्थिक विकास तो प्राप्त होता है लेकिन यह समावेशी विकास के अंतर्गत नहीं आता है ।
##Question:आर्थिक वृद्धि, आर्थिक विकास व मानव विकास की संकल्पनाओं को संक्षिप्त में समझाइए । (150-200 शब्द/10 अंक) Briefly explain the concepts of economic growth, economic development, and human development. (150-200 words/10 marks)##Answer:दृष्टिकोण : आर्थिक वृद्धि, आर्थिक विकास, व समावेशी विकास को संक्षिप्त में परिभाषित कीजिये । उदाहरणों के माध्यम से इन संकल्पनाओं को स्पष्ट रूप में समझाइए । आर्थिक वृद्धि , आर्थिक विकास व समावेशी विकास के बीच के अंतरसंबंधों की चर्चा कीजिये । उत्तर : आर्थिक वृद्धि : किसी अर्थव्यवस्था में दीर्घकाल की अवधि में वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन में वृद्धि होने की प्रक्रिया को आर्थिक वृद्धि कहते हैं । इसे वास्तविक जीडीपी या वास्तविक प्रतिव्यक्ति आय में निरंतर वृद्धि के माध्यम सेप्राप्त किया जा सकता है ।यह एक आयामी अवधारणा है , जोकेवल जीडीपी में वृद्धि को दर्शाता है । यह एक मात्रात्मक अवधारणा है। इसे आर्थिक विकास के बिना प्राप्त किया जा सकता है ।इसे वास्तविक जीडीपी से मापा जाता है । वास्तविक प्रतिव्यक्ति आय इसका एक सूचक है । आर्थिक विकास : यह आर्थिक वृद्धि की वह प्रक्रिया होती है जिसके साथ-साथ सामाजिक कल्याण में भी सुधार होता है । अर्थव्यवस्था के आर्थिक एवं सामाजिक ढांचे में प्रगतिशील परिवर्तन की प्रक्रिया को आर्थिक विकास कहते हैं । यह एक बहुआयामी व गुणात्मक अवधारणा है ।आर्थिक वृद्धि के बिना इसकी संभावना बहुत ही कम होती है । आर्थिकवृद्धि के द्वारा संसाधनों में वृद्धि आर्थिक विकास के लिए एक पूर्व शर्त है ।एचडीआई , वैश्विक खुशहाली सूचकांक , आदि के माध्यम से इसका मापन किया जाता है । समावेशी विकास : यह एक प्रक्रिया एवं परिणाम है जिसमें आर्थिक वृद्धि की संरचना में सभी वर्गों के व्यक्तियों की भागीदारी हो एवं वे उससे समानरूप से लाभान्वित हो ।इसका प्रमुख उद्देश लोगों को क्षमतावान बनाना व उन्हें रोजगार उपलब्ध करवाना । समावेशीविकास मानव की क्षमता में विस्तार करने व उसे आर्थिक विकास की प्रक्रिया में प्रत्यक्ष रूप से सहभागी बनाने व उसका लाभ उठाने से संबंधित है । समावेशी विकास के अंतर्गत मानव क्षमता में सुधार के अंतर्गत स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल विकास व प्रशिक्षण , मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति , सभी को समान अवसर , महिला सशक्तिकरण आदि शामिल किए जा सकते हैं । जबकि इसका एक दूसरा आयामरोजगार सृजन से संबंधित है और इसके अंतर्गतनिवेश ( मेक इन इंडिया ) , स्वरोजगार को बढ़ाना ( मुद्रा योजना ) , उधमिता को बढ़ाना ( स्टार्टअप ) , श्रम गहन क्षेत्रों को प्रोत्साहन ( खाध प्रसंस्करण , चमड़ा , वस्त्र उद्योग ) देने जैसे कार्य सम्मिलित हैं । आर्थिक विकास केवल उद्देश्य है जबकि समावेशी विकास प्रक्रिया व उद्देश्य दोनों है ।आर्थिक विकास केवल कल्याण को बढ़ाने पर केन्द्रित है जबकि समावेशी विकास भागीदारी के साथ कल्याण को बढ़ाने पर केन्द्रित होता है । पुनर्वितरण उपायों ( सहायकी, कल्याण भुगतान ) से आर्थिक विकास तो प्राप्त होता है लेकिन यह समावेशी विकास के अंतर्गत नहीं आता है ।
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प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत कीजिए। इस सिद्धान्त की व्याख्या हेतु शामिल किए गए विभिन्न सिद्धांतों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द, अंक-10 ) Present a brief introduction to the theory of plate tectonics. Discuss the various theories involved to explain this principle.(150-200 words, Marks-10)
Approach: प्रश्न के प्रथम भाग में प्लेट विवर्तनिकी की पृष्ठभूमि की चर्चा कर सकते हैं। सिद्धान्त के महवपूर्ण बिन्दुओं की संक्षिप्त चर्चा कीजिए। इस सिद्धान्त में शामिल विभिन्न सिद्धांतों की चर्चा कीजिये। निष्कर्ष में प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त के महत्व की चर्चा कर सकते हैं। उत्तर: प्लेट शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 1965 में टूजो विल्सन द्वारा रूपान्तरण भ्रंश की परिभाषा में किया गया, परंतु प्लेट विवर्तनिकी की परिकल्पना सर्वप्रथम 1967 में डबल्यू. जे. मोर्गन केद्वारा प्रतिपादित की गयी। मैकेजी, पार्कर और मॉर्गन ने स्वतंत्र रूप से प्रस्तुत किए गए विचारों को समन्वित कर एक अवधारणा प्रस्तुत की। इस अवधारणा को न्यू ग्लोबल टेक्क्तोनिक्स के नाम से जाना गया, परंतु कुछ समय पश्चात यह अवधारणा प्लेट विवर्तनिकी के रूप में प्रचलित हुई। इस सिद्धान्त के अनुसार प्लेटों की संकल्पना प्रस्तुत की गयी। प्लेटों का संचलन होता है जिससे विभिन्न प्रकार की सीमाओं का निर्माण होता है। तीन प्रकार की सीमाओं का निर्माण होता है अभिसारी सीमा – दो प्लेटों के एक दूसरे के पास आने पर अपसारी सीमा – दो प्लेटों के एक दूसरे से दूर जाने पर। इसमें नए क्रस्ट का निर्माण होता है। संरक्षी सीमा – प्लेटों की गति एक दूसरे के समानान्तर होती है। प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त के माध्यम से पर्वत निर्माण, कटक निर्माण, भूकंप, ज्वालामुखी, द्वीप समूह के निर्माण की व्याख्या की गयी। प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त में शामिल सिद्धान्त संवहनीय धारा सिद्धान्त आर्थर होम्स ने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। इसके अनुसार संवहन धाराएँ पृथ्वी के मेंटल में उत्पन्न होती है। इन संवहनीय धाराओं की उत्पत्ति का कारण रेडियोधर्मी तत्वों की उपस्थिति को माना गया, जिसके कारण मेंटल में तापीय भिन्नता उत्पन्न होती है। भू-चुम्बकत्व एवं पुराचुम्बकत्व पृथ्वी एक छड़ चुंबक की तरह व्यवहार करती है। पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूर्णन के कारण अर्द्ध द्रवित कोर में धीमी संवहन धाराएँ उत्पन्न हो जाती हैं। अत: पृथ्वी के भीतर विद्युत धारा तथा इस कारण चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है। ज्वालामुखी उद्गार से निर्मित बेसाल्टिक लावा पृथ्वी के तत्कालीन चुंबकीय ध्रुवीयता के अनुरूप चुंबकीय संरेखण ग्रहण करता है। बेसाल्ट की प्रथम स्थिति का चुम्बकत्व सुरक्षित रहता है। इस प्रकार चट्टानें अपने उत्पत्ति काल के चुंबकीय गुणों को वर्तमान में प्रदर्शित करती है। इस अध्ययन को पुराचुंबकत्व कहते हैं। महासागरीय नितल का मानचित्रण 1920 के बाद की अवधि में किये गए महासागरीय अध्ययनों से महासागर के नितल के मानचित्रण में सहायता मिली। इससे चट्टानों की आयु का अध्ययन किया गया इसने प्लेट विवर्तनिकी को समझने में सहायता प्रदान की। सागर नितल प्रसरण- हैरी हेस द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धान्त के द्वारा महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त के पश्चात चट्टानों के पुराचुंबकत्व अध्ययन और महासागरीय तक के मानचित्रण से कुछ तथ्य निकलकर सामने आए। हैरी हेस ने यह अवधारणा प्रस्तुत की कि महासागरीय नितल गतिशील है और महासागरीय कटकों के शीर्ष पर लगातार ज्वालामुखी उद्गार के कारण महासागरीय क्रस्ट का विखंडन हुआ है तथा नीचे से ऊपर आते लावा के द्वारा इस दरार को भर दिया जाता है। इस प्रकार महासागर के नितल का प्रसार हो रहा है। द्रवित क्रस्ट का मैग्मा मेंटल प्रवाह के रूप में पुन: कटकों के नीचे चला जाता है इस प्रकार सागर नितल प्रसरण कनवेयर बेल्ट कि तरह व्यवहार करता है। महाद्वीपों के निर्माण कि व्याख्या को प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त ने नयी दिशा दी। इसने सभी सिद्धांतों को शामिल करते हुए वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की जिसने स्थलाकृतियों के निर्माण को समझाया।
##Question:प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत कीजिए। इस सिद्धान्त की व्याख्या हेतु शामिल किए गए विभिन्न सिद्धांतों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द, अंक-10 ) Present a brief introduction to the theory of plate tectonics. Discuss the various theories involved to explain this principle.(150-200 words, Marks-10)##Answer:Approach: प्रश्न के प्रथम भाग में प्लेट विवर्तनिकी की पृष्ठभूमि की चर्चा कर सकते हैं। सिद्धान्त के महवपूर्ण बिन्दुओं की संक्षिप्त चर्चा कीजिए। इस सिद्धान्त में शामिल विभिन्न सिद्धांतों की चर्चा कीजिये। निष्कर्ष में प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त के महत्व की चर्चा कर सकते हैं। उत्तर: प्लेट शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 1965 में टूजो विल्सन द्वारा रूपान्तरण भ्रंश की परिभाषा में किया गया, परंतु प्लेट विवर्तनिकी की परिकल्पना सर्वप्रथम 1967 में डबल्यू. जे. मोर्गन केद्वारा प्रतिपादित की गयी। मैकेजी, पार्कर और मॉर्गन ने स्वतंत्र रूप से प्रस्तुत किए गए विचारों को समन्वित कर एक अवधारणा प्रस्तुत की। इस अवधारणा को न्यू ग्लोबल टेक्क्तोनिक्स के नाम से जाना गया, परंतु कुछ समय पश्चात यह अवधारणा प्लेट विवर्तनिकी के रूप में प्रचलित हुई। इस सिद्धान्त के अनुसार प्लेटों की संकल्पना प्रस्तुत की गयी। प्लेटों का संचलन होता है जिससे विभिन्न प्रकार की सीमाओं का निर्माण होता है। तीन प्रकार की सीमाओं का निर्माण होता है अभिसारी सीमा – दो प्लेटों के एक दूसरे के पास आने पर अपसारी सीमा – दो प्लेटों के एक दूसरे से दूर जाने पर। इसमें नए क्रस्ट का निर्माण होता है। संरक्षी सीमा – प्लेटों की गति एक दूसरे के समानान्तर होती है। प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त के माध्यम से पर्वत निर्माण, कटक निर्माण, भूकंप, ज्वालामुखी, द्वीप समूह के निर्माण की व्याख्या की गयी। प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त में शामिल सिद्धान्त संवहनीय धारा सिद्धान्त आर्थर होम्स ने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। इसके अनुसार संवहन धाराएँ पृथ्वी के मेंटल में उत्पन्न होती है। इन संवहनीय धाराओं की उत्पत्ति का कारण रेडियोधर्मी तत्वों की उपस्थिति को माना गया, जिसके कारण मेंटल में तापीय भिन्नता उत्पन्न होती है। भू-चुम्बकत्व एवं पुराचुम्बकत्व पृथ्वी एक छड़ चुंबक की तरह व्यवहार करती है। पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूर्णन के कारण अर्द्ध द्रवित कोर में धीमी संवहन धाराएँ उत्पन्न हो जाती हैं। अत: पृथ्वी के भीतर विद्युत धारा तथा इस कारण चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है। ज्वालामुखी उद्गार से निर्मित बेसाल्टिक लावा पृथ्वी के तत्कालीन चुंबकीय ध्रुवीयता के अनुरूप चुंबकीय संरेखण ग्रहण करता है। बेसाल्ट की प्रथम स्थिति का चुम्बकत्व सुरक्षित रहता है। इस प्रकार चट्टानें अपने उत्पत्ति काल के चुंबकीय गुणों को वर्तमान में प्रदर्शित करती है। इस अध्ययन को पुराचुंबकत्व कहते हैं। महासागरीय नितल का मानचित्रण 1920 के बाद की अवधि में किये गए महासागरीय अध्ययनों से महासागर के नितल के मानचित्रण में सहायता मिली। इससे चट्टानों की आयु का अध्ययन किया गया इसने प्लेट विवर्तनिकी को समझने में सहायता प्रदान की। सागर नितल प्रसरण- हैरी हेस द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धान्त के द्वारा महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त के पश्चात चट्टानों के पुराचुंबकत्व अध्ययन और महासागरीय तक के मानचित्रण से कुछ तथ्य निकलकर सामने आए। हैरी हेस ने यह अवधारणा प्रस्तुत की कि महासागरीय नितल गतिशील है और महासागरीय कटकों के शीर्ष पर लगातार ज्वालामुखी उद्गार के कारण महासागरीय क्रस्ट का विखंडन हुआ है तथा नीचे से ऊपर आते लावा के द्वारा इस दरार को भर दिया जाता है। इस प्रकार महासागर के नितल का प्रसार हो रहा है। द्रवित क्रस्ट का मैग्मा मेंटल प्रवाह के रूप में पुन: कटकों के नीचे चला जाता है इस प्रकार सागर नितल प्रसरण कनवेयर बेल्ट कि तरह व्यवहार करता है। महाद्वीपों के निर्माण कि व्याख्या को प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त ने नयी दिशा दी। इसने सभी सिद्धांतों को शामिल करते हुए वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की जिसने स्थलाकृतियों के निर्माण को समझाया।
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Discuss the factors that favoured the rise of Indian national movement (10 Marks/150 words)
Approach- Briefly introduce the topic by giving a general background Explain the causes/factors that led to growth of Indian nationalism Conclude Answer- The rise and growth of Indian nationalism was the response generated by the British government through the creation of a new institution, new opportunities and new style allocation of resources as well as a worldwide upsurge of the concepts of nationalism initiated by the French Revolution. The various factors which were responsible for the growth of Modern Nationalism during British rule are- 1. Motives behind the colonial interest The Indian nationalist movement was started when Indians realize that the colonial rule was the main reason for India’s economic backwardness. In other words, the interest of Indians involved the interest of all sections and classes like peasants, artisans, handicraftsmen, workers, intellectuals, the educated and the capitalists. The industrial infrastructure was in a pathetic state after 200 years of British rule in India. Small scale industries suffered badly and were facing near extinction. 2. Unification of Indians through political, administrative and economic reform s The reforms like professional civil services, unified judiciary accompanied by the codified civil and criminal laws added a new flavor in the dimensions of political unity as well as cultural unity. The planned development like railways, roads, electricity, and telegraph was also the driving force because it brings people especially the leaders from different regions together. 3) Role of Western Thought and Education- This education system helped nationalist leaders from the different linguistic regions to come to the same page linguistically. The new class of middle intelligentsia emerged which were isolated by the Brahmanism culture. 4 )Role of Press and Literature The press became a tool to criticize government policies and the best platform to address the people to unite. This is the only reason of numerous restrictions imposed on the press during the colonial period from time to time. It helped people to spread, modern ideas of self-government, democracy, civil rights, and industrialization. 5) Rise of Indian Intellects and rediscovery of India’s past a historian like BM Malabari, RG Bhandarkar, RL Mitra, etc. shows a new picture of India’s past which was characterized by the well-developed political, economic and social institutions, flourished trade and commerce, rich heritage of art and culture. This kind of writing created an environment of self-respect and confidence among the nationalists that helped them to demolish the colonial myths of superiority. 6) Role of socio-religious Movemen t It played an important role to remove social evils which divided the Indian society which had a detrimental effect on colonial rule. It brings different sections of the society altogether and proved to be an important factor in the growth of India nationalism. 7. Role of contemporary Movements in the world The French revolution, end of Spanish and Portuguese empire in South Africa and the national liberation movements of Greece and Italy deeply influence the Indian nationalism In a nutshell, Indian nationalism grew partially as a result of colonial policies and partially as a reaction to colonial policies as well as the impact of contemporary movements in the world.
##Question:Discuss the factors that favoured the rise of Indian national movement (10 Marks/150 words)##Answer:Approach- Briefly introduce the topic by giving a general background Explain the causes/factors that led to growth of Indian nationalism Conclude Answer- The rise and growth of Indian nationalism was the response generated by the British government through the creation of a new institution, new opportunities and new style allocation of resources as well as a worldwide upsurge of the concepts of nationalism initiated by the French Revolution. The various factors which were responsible for the growth of Modern Nationalism during British rule are- 1. Motives behind the colonial interest The Indian nationalist movement was started when Indians realize that the colonial rule was the main reason for India’s economic backwardness. In other words, the interest of Indians involved the interest of all sections and classes like peasants, artisans, handicraftsmen, workers, intellectuals, the educated and the capitalists. The industrial infrastructure was in a pathetic state after 200 years of British rule in India. Small scale industries suffered badly and were facing near extinction. 2. Unification of Indians through political, administrative and economic reform s The reforms like professional civil services, unified judiciary accompanied by the codified civil and criminal laws added a new flavor in the dimensions of political unity as well as cultural unity. The planned development like railways, roads, electricity, and telegraph was also the driving force because it brings people especially the leaders from different regions together. 3) Role of Western Thought and Education- This education system helped nationalist leaders from the different linguistic regions to come to the same page linguistically. The new class of middle intelligentsia emerged which were isolated by the Brahmanism culture. 4 )Role of Press and Literature The press became a tool to criticize government policies and the best platform to address the people to unite. This is the only reason of numerous restrictions imposed on the press during the colonial period from time to time. It helped people to spread, modern ideas of self-government, democracy, civil rights, and industrialization. 5) Rise of Indian Intellects and rediscovery of India’s past a historian like BM Malabari, RG Bhandarkar, RL Mitra, etc. shows a new picture of India’s past which was characterized by the well-developed political, economic and social institutions, flourished trade and commerce, rich heritage of art and culture. This kind of writing created an environment of self-respect and confidence among the nationalists that helped them to demolish the colonial myths of superiority. 6) Role of socio-religious Movemen t It played an important role to remove social evils which divided the Indian society which had a detrimental effect on colonial rule. It brings different sections of the society altogether and proved to be an important factor in the growth of India nationalism. 7. Role of contemporary Movements in the world The French revolution, end of Spanish and Portuguese empire in South Africa and the national liberation movements of Greece and Italy deeply influence the Indian nationalism In a nutshell, Indian nationalism grew partially as a result of colonial policies and partially as a reaction to colonial policies as well as the impact of contemporary movements in the world.
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What is ecology? Explain the Autecology with the help of different types of adaptation. (150 words/10 marks)
Approach- Explain the meaning of ecology in brief Then explain the autecology Along with that, discuss various types of adaptations Answer The term Ecology was coined by the German zoologist Ernst Haeckel , who applied the term oekologie to the “relation of the animal both to its organic as well as its inorganic environment.” The word comes from the Greek Oikos, meaning “household,” “home,” or “place to live.” Thus it is basically referred to asthe study of organisms, environment and how the organisms interact with each other and their environment . It is studied at various levels such as organism, population, community, ecosystem, and biosphere. Autecology and various types of adaptations Autecology also the species ecology is the approach in the ecology referring to the study of the interactions of an individual organism or a single species with the living and nonliving factors of its environment.Most animals are well adapted to their biotic and abiotic conditions due to behavioral, physiological or structural adaptations that increase their chances of survival and reproduction. Therefore, there are three types of adaptations in the ecology, that is : Physiological Adaptations - It is the type of adaptations in which a body process helps an organism to survive/reproduce. For example - more efficient kidneys for desert animals like kangaroo rats, compounds that prevent blood coagulation in mosquito saliva, or the presence of toxins in plant leaves to repel herbivores. Behavioural Adaptations -It is the type of responses made by an organism that help it to survive/reproduce. For example -Bears hibernate to escape cold; birds and whales migrate to warmer winter climates. Desert animals are active at night during hot summer weather. Lizards seek a sunny spot in the morning to warm up to operating temperatures more quickly. A nesting killdeer will pretend to be injured to lure a predator away from her young. Structural/Morphological Adaptations -a feature of an organism’s body that helps it to survive/reproduce. For instance -Desert foxes have large ears for heat radiation and Arctic foxes have small ears to retain body heat. Seals have flippers to navigate water and raccoons have separate, flexible digits to manipulate food. White polar bears blend into ice floes and spotted jaguars into the speckled jungle shade. Trees may have corky bark to protect from wildfires.
##Question:What is ecology? Explain the Autecology with the help of different types of adaptation. (150 words/10 marks)##Answer:Approach- Explain the meaning of ecology in brief Then explain the autecology Along with that, discuss various types of adaptations Answer The term Ecology was coined by the German zoologist Ernst Haeckel , who applied the term oekologie to the “relation of the animal both to its organic as well as its inorganic environment.” The word comes from the Greek Oikos, meaning “household,” “home,” or “place to live.” Thus it is basically referred to asthe study of organisms, environment and how the organisms interact with each other and their environment . It is studied at various levels such as organism, population, community, ecosystem, and biosphere. Autecology and various types of adaptations Autecology also the species ecology is the approach in the ecology referring to the study of the interactions of an individual organism or a single species with the living and nonliving factors of its environment.Most animals are well adapted to their biotic and abiotic conditions due to behavioral, physiological or structural adaptations that increase their chances of survival and reproduction. Therefore, there are three types of adaptations in the ecology, that is : Physiological Adaptations - It is the type of adaptations in which a body process helps an organism to survive/reproduce. For example - more efficient kidneys for desert animals like kangaroo rats, compounds that prevent blood coagulation in mosquito saliva, or the presence of toxins in plant leaves to repel herbivores. Behavioural Adaptations -It is the type of responses made by an organism that help it to survive/reproduce. For example -Bears hibernate to escape cold; birds and whales migrate to warmer winter climates. Desert animals are active at night during hot summer weather. Lizards seek a sunny spot in the morning to warm up to operating temperatures more quickly. A nesting killdeer will pretend to be injured to lure a predator away from her young. Structural/Morphological Adaptations -a feature of an organism’s body that helps it to survive/reproduce. For instance -Desert foxes have large ears for heat radiation and Arctic foxes have small ears to retain body heat. Seals have flippers to navigate water and raccoons have separate, flexible digits to manipulate food. White polar bears blend into ice floes and spotted jaguars into the speckled jungle shade. Trees may have corky bark to protect from wildfires.
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काले धन से आप क्या समझते हैं? काले धन पर अंकुश लगाने के लिए भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की सविस्तार चर्चा कीजिये इसके साथ ही कालेधन के उन्मूलन के लिए कुछ सुझाव प्रस्तुत कीजिये| (150 से 200 शब्द/10 अंक) What do you understand by black money? Discuss in detail the efforts made by the Government of India to curb black money, along with this offer some suggestions for the elimination of black money. (150 to 200 words/10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में काले धन को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में काले धन पर अंकुश लगाने के लिएभारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की सविस्तार चर्चा कीजिये 3- दूसरे भाग में कालेधन के उन्मूलन के लिए कुछ सुझाव प्रस्तुत कीजिये 4- अंतिम में काले धन के उन्मूलन की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये यदि कोई भी धन अपनी उत्पत्ति, स्थानान्तरण व उपयोग में किसी कानून का उल्लंघन करता है औरजिसे कर चोरी के लिए छुपाया जाता है ऐसे सभी धन को काले धन के रूप में जाना जाता हैअवैध खनन, मादक पदार्थों की तस्करी, मनी लांड्रिंग भ्रष्टाचार, क्रिप्टोकरेंसी आदि काला धन के महत्वपूर्ण स्रोत है| भारत में काला धन आन्तरिक सुरक्षा के लिए खतरा बनता जा रहा है| इसी सन्दर्भ में भारत सरकार ने अनेक प्रयास किये हैं| मनी लांड्रिंग और काले धन को रोकने के लिए किये गए उपाय सरकार ने इस संदर्भ में कई कानून बनाए हैं जो अर्थव्यवस्था में काले धन पर अंकुश लगाने और आर्थिक लेन-देन की सूचना देने को अनिवार्य बनाते हैं। वर्ष 1999 में FEMA कानून लाया गया था इसके तहत बाहरी व्यापार और भुगतान की सुविधा को ध्यान में रखते हुए अवैध धन के सृजन पर रोक लगाई जाती है अर्थात यह कानून भारत में आई विदेशी मुद्रा को विनियमित करता है| मनी लांड्रिंग रोक अधिनियम(PMLA) 2002 के तहत मनी लांड्रिंग को रोकने के लिए दोषी व्यक्ति को 3 वर्ष से 7 वर्ष तक की सजा निर्धारित की गयी है| इसके साथ ही 5 लाख रूपये तक का जुर्माना किया जा सकता है , इस कानून को 2005, 2009, 2012 और 2013 में संशोधित किया गया है| 2013 में संशोधन के बाद इसके दायरे को बढ़ा दिया गया है| अब धन को छुपाना, अवैध तरीकों से अर्जित करना और कब्जा करना भी इस कानून के दायरे में है| इस कानून का दायरा बढ़ा कर वित्तीय संस्थानों यथा बैंकों, म्युचुअल फंड और बीमा कंपनियों को इसके दायरे में शामिल कर लिया गया है| विदेशी अनुदान नियमन अधिनियम(2010) के तहत ऐसे विदेशों से अनुदान प्राप्त करने वाले गैर सरकारी संगठनों या समुदाय 10 लाख रूपये या उससे अधिक का अनुदान घोषित किये बिना प्राप्त नहीं कर सकते हैं| विश्व के अनेक देशों(लगभग 39 देशों) से पारस्परिक विधिक सहायता समझौते किये गए हैं| इन समझौतों के अनुसार मनी लांड्रिंग करने वाले व्यक्ति के दोषी पाए जाने के पश्चात उसकी अवैध संपत्ति को भारत में वापस लाया जा सकेगा| इस कार्य में वह देश भारत की सहायता करेंगे| काला धन (अघोषित विदेशी आय और संपत्ति) तथा कर आरोपण अधिनियम वर्ष 2015 में पारित किया गया था| इसे दो चरणों में लागू किया गया| प्रथम चरम में 30 % कर और 30 आर्थिक दंड(कुल 60 %) के रूप में देकर धन को वैध बनाया जा सकेगा| यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो दूसरे चरण में 30 % कर, 90 % आर्थिक दंड और 10 वर्ष कि सजा के साथ ही संपत्तियों की जब्ती का प्रावधान किया गया है| कराधान विधि संशोधन अधिनियम 2016 के माध्यम से काला धन अधिनियम की कमियों को दूर किया गया| इसमें उपरोक्त करों एवं आर्थिक दंड को व्यावहारिक स्तर प्रदान किया गया | इसके साथ ही विमुद्रीकरण के माध्यम से काले धन पर अंकुश लगाने के प्रयास किये गए हैं| उपरोक्त के अतरिक्त बेनामी लेन-देन (निषेध) संशोधन अधिनियम, इसमें वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम, भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम आदि कानून भी बनाए गए हैं। फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स की सदस्यता ग्रहण की गयी है सरकार ने 2.5 लाख रुपए से अधिक के लेन-देन के लिये पैन (PAN) को अनिवार्य बना दिया है, जिसका प्रमुख उद्देश्य कर अधिकारियों से छुपाए जाने वाले लेन-देन को नियंत्रित करना है। आयकर विभाग ने भी ऐसे लोगों की पहचान करना शुरू कर दिया है जो एक वित्तीय वर्ष में उच्च मूल्य के आर्थिक लेन-देन तो करते हैं, परंतु अपना रिटर्न दाखिल नहीं करते हैं। कालेधन के उन्मूलन के लिए कुछ सुझाव जांच प्रणाली को मजबूत करना, मुद्रा के संचलन को हतोत्साहित करना, बडे मूल्य के नोटों को सीमित संख्या में जारी करना, टैक्स हेवन देशों के साथ समझौता, अवैध गतिविधियों पर यथा संभव नियंत्रण, काले धन के विरुद्ध जनमानस की मनःस्थिति विकसित करना, कर की दरों को धारणीय बनाना, राज्य द्वारा सामाजिक सुरक्षा का आश्वासन तथा FATF के मानदंडों का प्रभावी क्रियान्वयन कालेधन के उन्मूलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा| अर्थव्यवस्था में काले धन की अधिकता से देश में एक ‘समानांतर अर्थव्यवस्था’ (Parallel economy) सृजित हो जाती है जिसकी पहचान एवं नियमन अत्यंत मुश्किल होता है। इस प्रकार यह समानांतर अर्थव्यवस्था देश के आर्थिक विकास को चौपट कर देती है।काले धन के सृजन के दौरान कर वंचना (Tax Evasion) होती है जिससे सरकार को राजस्व हानि होती है। परिणामस्वरूप सरकार को उच्च करारोपण एवं ‘घाटे का वितपोषण’ (deficit financing) का सहारा लेना पड़ता है जो अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाता है।अतः काले धन के उन्मूलन के प्रयास अपेक्षित हैं
##Question:काले धन से आप क्या समझते हैं? काले धन पर अंकुश लगाने के लिए भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की सविस्तार चर्चा कीजिये इसके साथ ही कालेधन के उन्मूलन के लिए कुछ सुझाव प्रस्तुत कीजिये| (150 से 200 शब्द/10 अंक) What do you understand by black money? Discuss in detail the efforts made by the Government of India to curb black money, along with this offer some suggestions for the elimination of black money. (150 to 200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में काले धन को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में काले धन पर अंकुश लगाने के लिएभारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की सविस्तार चर्चा कीजिये 3- दूसरे भाग में कालेधन के उन्मूलन के लिए कुछ सुझाव प्रस्तुत कीजिये 4- अंतिम में काले धन के उन्मूलन की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये यदि कोई भी धन अपनी उत्पत्ति, स्थानान्तरण व उपयोग में किसी कानून का उल्लंघन करता है औरजिसे कर चोरी के लिए छुपाया जाता है ऐसे सभी धन को काले धन के रूप में जाना जाता हैअवैध खनन, मादक पदार्थों की तस्करी, मनी लांड्रिंग भ्रष्टाचार, क्रिप्टोकरेंसी आदि काला धन के महत्वपूर्ण स्रोत है| भारत में काला धन आन्तरिक सुरक्षा के लिए खतरा बनता जा रहा है| इसी सन्दर्भ में भारत सरकार ने अनेक प्रयास किये हैं| मनी लांड्रिंग और काले धन को रोकने के लिए किये गए उपाय सरकार ने इस संदर्भ में कई कानून बनाए हैं जो अर्थव्यवस्था में काले धन पर अंकुश लगाने और आर्थिक लेन-देन की सूचना देने को अनिवार्य बनाते हैं। वर्ष 1999 में FEMA कानून लाया गया था इसके तहत बाहरी व्यापार और भुगतान की सुविधा को ध्यान में रखते हुए अवैध धन के सृजन पर रोक लगाई जाती है अर्थात यह कानून भारत में आई विदेशी मुद्रा को विनियमित करता है| मनी लांड्रिंग रोक अधिनियम(PMLA) 2002 के तहत मनी लांड्रिंग को रोकने के लिए दोषी व्यक्ति को 3 वर्ष से 7 वर्ष तक की सजा निर्धारित की गयी है| इसके साथ ही 5 लाख रूपये तक का जुर्माना किया जा सकता है , इस कानून को 2005, 2009, 2012 और 2013 में संशोधित किया गया है| 2013 में संशोधन के बाद इसके दायरे को बढ़ा दिया गया है| अब धन को छुपाना, अवैध तरीकों से अर्जित करना और कब्जा करना भी इस कानून के दायरे में है| इस कानून का दायरा बढ़ा कर वित्तीय संस्थानों यथा बैंकों, म्युचुअल फंड और बीमा कंपनियों को इसके दायरे में शामिल कर लिया गया है| विदेशी अनुदान नियमन अधिनियम(2010) के तहत ऐसे विदेशों से अनुदान प्राप्त करने वाले गैर सरकारी संगठनों या समुदाय 10 लाख रूपये या उससे अधिक का अनुदान घोषित किये बिना प्राप्त नहीं कर सकते हैं| विश्व के अनेक देशों(लगभग 39 देशों) से पारस्परिक विधिक सहायता समझौते किये गए हैं| इन समझौतों के अनुसार मनी लांड्रिंग करने वाले व्यक्ति के दोषी पाए जाने के पश्चात उसकी अवैध संपत्ति को भारत में वापस लाया जा सकेगा| इस कार्य में वह देश भारत की सहायता करेंगे| काला धन (अघोषित विदेशी आय और संपत्ति) तथा कर आरोपण अधिनियम वर्ष 2015 में पारित किया गया था| इसे दो चरणों में लागू किया गया| प्रथम चरम में 30 % कर और 30 आर्थिक दंड(कुल 60 %) के रूप में देकर धन को वैध बनाया जा सकेगा| यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो दूसरे चरण में 30 % कर, 90 % आर्थिक दंड और 10 वर्ष कि सजा के साथ ही संपत्तियों की जब्ती का प्रावधान किया गया है| कराधान विधि संशोधन अधिनियम 2016 के माध्यम से काला धन अधिनियम की कमियों को दूर किया गया| इसमें उपरोक्त करों एवं आर्थिक दंड को व्यावहारिक स्तर प्रदान किया गया | इसके साथ ही विमुद्रीकरण के माध्यम से काले धन पर अंकुश लगाने के प्रयास किये गए हैं| उपरोक्त के अतरिक्त बेनामी लेन-देन (निषेध) संशोधन अधिनियम, इसमें वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम, भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम आदि कानून भी बनाए गए हैं। फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स की सदस्यता ग्रहण की गयी है सरकार ने 2.5 लाख रुपए से अधिक के लेन-देन के लिये पैन (PAN) को अनिवार्य बना दिया है, जिसका प्रमुख उद्देश्य कर अधिकारियों से छुपाए जाने वाले लेन-देन को नियंत्रित करना है। आयकर विभाग ने भी ऐसे लोगों की पहचान करना शुरू कर दिया है जो एक वित्तीय वर्ष में उच्च मूल्य के आर्थिक लेन-देन तो करते हैं, परंतु अपना रिटर्न दाखिल नहीं करते हैं। कालेधन के उन्मूलन के लिए कुछ सुझाव जांच प्रणाली को मजबूत करना, मुद्रा के संचलन को हतोत्साहित करना, बडे मूल्य के नोटों को सीमित संख्या में जारी करना, टैक्स हेवन देशों के साथ समझौता, अवैध गतिविधियों पर यथा संभव नियंत्रण, काले धन के विरुद्ध जनमानस की मनःस्थिति विकसित करना, कर की दरों को धारणीय बनाना, राज्य द्वारा सामाजिक सुरक्षा का आश्वासन तथा FATF के मानदंडों का प्रभावी क्रियान्वयन कालेधन के उन्मूलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा| अर्थव्यवस्था में काले धन की अधिकता से देश में एक ‘समानांतर अर्थव्यवस्था’ (Parallel economy) सृजित हो जाती है जिसकी पहचान एवं नियमन अत्यंत मुश्किल होता है। इस प्रकार यह समानांतर अर्थव्यवस्था देश के आर्थिक विकास को चौपट कर देती है।काले धन के सृजन के दौरान कर वंचना (Tax Evasion) होती है जिससे सरकार को राजस्व हानि होती है। परिणामस्वरूप सरकार को उच्च करारोपण एवं ‘घाटे का वितपोषण’ (deficit financing) का सहारा लेना पड़ता है जो अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाता है।अतः काले धन के उन्मूलन के प्रयास अपेक्षित हैं
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राजकोषीय नीति के मुख्य उद्देश्यों को बताते हुए, इसके मुख्य घटकों की चर्चा कीजिये | साथ ही कर व्यवस्था के मूल स्तंभों का भी संक्षेप में वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द, 10अंक ) While explaining the main objectives of fiscal policy, discuss its main components. Also, briefly describe the basic pillars of the tax system. (150-200 Words, 10 marks)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत राजकोषीय नीति के अर्थ को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात राजकोषीय नीति के मुख्य घटक को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | पुनः कर व्यवस्था के मूल स्तम्भ की चर्चा कीजिये | अंत में लाफेर वक्र को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - राजकोषीय नीति राजकोषीय नीतिसे तात्पर्य किसी सरकार द्वारा वित्त प्रबंधन के विभिन्न घटकों से है | इसके निम्नलिखित मुख्य उद्देश्य होते हैं - आर्थिक प्रगति को स्थिर एवं संतुलित करते हुए उसकी सततता को सुनिश्चित करना | इस सन्दर्भ में यह अनिवार्य होता है कि कुल मांग तथा कुल आपूर्ति के घटकों को समझते हुए उनके संतुलन हेतु प्रबंधकारी नीति बनायीं जाती है | विभिन्न मदों में वित्त आवंटन को रेखांकित करना जिससे संतुलन स्थापित किया जा सके तथा प्राथमिकताओं के आधार पर दिए गए क्षेत्र की प्रगति को त्वरित किया जाय | राजकोषीय नीति का एक उद्देश्य समावेश एवं समता को त्वरित करना करना भी होता है जिसके अंतर्गत विभिन्न आय के स्रोतों को समावेशी विकास हेतु प्रयोग किये जाने की अनुशंषा की जाती है | राजकोषीय नीति के मुख्य घटक आय एवं व्यय होते हैं - आय या प्राप्ति के अंतर्गत - राजस्व प्राप्ति तथा पूंजीगत प्राप्ति होते हैं | राजस्व प्राप्ति भी दो प्रकार की हो सकती - कर राजस्व एवं गैर कर राजस्व सम्मिलित होते हैं तथा गैर कर राजस्व प्राप्ति | प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों में मूलभूत अंतर मध्यस्थों के सन्दर्भ में होता है | यदि कर लगाने वाला एवं कर देने वाला प्रत्यक्ष रूप से एक दूसरे से जुड़े हों तो उसे प्रत्यक्ष कर और यदि किसी मध्यस्थ की सहायता से हो रहा हो तो उसे अप्रत्यक्ष कर कहते हैं | कर राजस्व - प्रत्यक्ष कर एवं अप्रत्यक्ष कर एवं गैर-कर राजस्व - फीस, चालान आदि यदि किसी देश की राजकोषीय नीति में व्यय, अनुमानित आय से अधिक हो तथा व्यय का एक बड़ा घटक योजनाबद्ध व्यय (Planned Expenditure) तो उसे विस्तारवादी राजकोषीय नीति कहते हैं | योजनाबद्ध व्यय से तात्पर्य उन घटकों में व्यय से है,जो भविष्य में किसी भी प्रकार से लाभ अर्जित करते हों | इसके विपरीत यदि राजकोषीय नीति में अनुमानित आय अधिक तथा अनुमानित व्यय कम है तो उसे संकुचित हो रही राजकोषीय नीति कहा जाता है | यदि दोनों घटकों में संतुलन हो तो उसे तटस्थ राजकोषीय नीति कहते हैं | व्यय के अंतर्गत - राजस्व व्यय एवं पूंजीगत व्यय होते हैं | कर व्यवस्था के मूल स्तंभ किसी भी राजकोषीय नीति में कर राजस्व सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है अतः अर्थशास्त्र में इसके प्रभावी होने के लिए निम्न चार घटकों का वर्णन है - समता का घटक - इसके अंतर्गत कर को आय के सापेक्षिक होना चाहिए तथा विभिन्न आय वर्गों में तुलनातमक रूप से आनुपातिक होना चाहिए | पूर्वानुमान का घटक - इसके अंतर्गत कर व्यवस्थाओं में पूर्वानुमान के आयाम होने चाहिए | अर्थव्यवस्था का घटक -इसके अंतर्गत किसी क्षेत्र में कर विन्यास को उस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में स्थिति के आधार पर निर्धारित किया जाना चाहिए | सुविधा का घटक - इसके अंतर्गत कर राजस्व हेतु करदाताओं को आवश्यक सुविधा भी एक महत्वपूर्ण घटक है | लाफेर वक्र - इन्होने यह सुझाया कि किसी अर्थव्यवस्था में कर की दर एवं कुल कर राजस्व में एक गतिक सम्बन्ध होता है | जिसके अंतर्गत यद्यपि प्रारंभ में तो कर की दर बढ़ाने से राजस्व में वृद्धि होती है परन्तु एक नियत बिंदु के बाद यदि कर की दर को बढ़ाया जाय तो राजकोष पर विपरीत प्रभाव पड़ता है | अतः कर व्यवस्थाओं को उस नियत बिंदु पर होना चाहिए |
##Question:राजकोषीय नीति के मुख्य उद्देश्यों को बताते हुए, इसके मुख्य घटकों की चर्चा कीजिये | साथ ही कर व्यवस्था के मूल स्तंभों का भी संक्षेप में वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द, 10अंक ) While explaining the main objectives of fiscal policy, discuss its main components. Also, briefly describe the basic pillars of the tax system. (150-200 Words, 10 marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत राजकोषीय नीति के अर्थ को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात राजकोषीय नीति के मुख्य घटक को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | पुनः कर व्यवस्था के मूल स्तम्भ की चर्चा कीजिये | अंत में लाफेर वक्र को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - राजकोषीय नीति राजकोषीय नीतिसे तात्पर्य किसी सरकार द्वारा वित्त प्रबंधन के विभिन्न घटकों से है | इसके निम्नलिखित मुख्य उद्देश्य होते हैं - आर्थिक प्रगति को स्थिर एवं संतुलित करते हुए उसकी सततता को सुनिश्चित करना | इस सन्दर्भ में यह अनिवार्य होता है कि कुल मांग तथा कुल आपूर्ति के घटकों को समझते हुए उनके संतुलन हेतु प्रबंधकारी नीति बनायीं जाती है | विभिन्न मदों में वित्त आवंटन को रेखांकित करना जिससे संतुलन स्थापित किया जा सके तथा प्राथमिकताओं के आधार पर दिए गए क्षेत्र की प्रगति को त्वरित किया जाय | राजकोषीय नीति का एक उद्देश्य समावेश एवं समता को त्वरित करना करना भी होता है जिसके अंतर्गत विभिन्न आय के स्रोतों को समावेशी विकास हेतु प्रयोग किये जाने की अनुशंषा की जाती है | राजकोषीय नीति के मुख्य घटक आय एवं व्यय होते हैं - आय या प्राप्ति के अंतर्गत - राजस्व प्राप्ति तथा पूंजीगत प्राप्ति होते हैं | राजस्व प्राप्ति भी दो प्रकार की हो सकती - कर राजस्व एवं गैर कर राजस्व सम्मिलित होते हैं तथा गैर कर राजस्व प्राप्ति | प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों में मूलभूत अंतर मध्यस्थों के सन्दर्भ में होता है | यदि कर लगाने वाला एवं कर देने वाला प्रत्यक्ष रूप से एक दूसरे से जुड़े हों तो उसे प्रत्यक्ष कर और यदि किसी मध्यस्थ की सहायता से हो रहा हो तो उसे अप्रत्यक्ष कर कहते हैं | कर राजस्व - प्रत्यक्ष कर एवं अप्रत्यक्ष कर एवं गैर-कर राजस्व - फीस, चालान आदि यदि किसी देश की राजकोषीय नीति में व्यय, अनुमानित आय से अधिक हो तथा व्यय का एक बड़ा घटक योजनाबद्ध व्यय (Planned Expenditure) तो उसे विस्तारवादी राजकोषीय नीति कहते हैं | योजनाबद्ध व्यय से तात्पर्य उन घटकों में व्यय से है,जो भविष्य में किसी भी प्रकार से लाभ अर्जित करते हों | इसके विपरीत यदि राजकोषीय नीति में अनुमानित आय अधिक तथा अनुमानित व्यय कम है तो उसे संकुचित हो रही राजकोषीय नीति कहा जाता है | यदि दोनों घटकों में संतुलन हो तो उसे तटस्थ राजकोषीय नीति कहते हैं | व्यय के अंतर्गत - राजस्व व्यय एवं पूंजीगत व्यय होते हैं | कर व्यवस्था के मूल स्तंभ किसी भी राजकोषीय नीति में कर राजस्व सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है अतः अर्थशास्त्र में इसके प्रभावी होने के लिए निम्न चार घटकों का वर्णन है - समता का घटक - इसके अंतर्गत कर को आय के सापेक्षिक होना चाहिए तथा विभिन्न आय वर्गों में तुलनातमक रूप से आनुपातिक होना चाहिए | पूर्वानुमान का घटक - इसके अंतर्गत कर व्यवस्थाओं में पूर्वानुमान के आयाम होने चाहिए | अर्थव्यवस्था का घटक -इसके अंतर्गत किसी क्षेत्र में कर विन्यास को उस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में स्थिति के आधार पर निर्धारित किया जाना चाहिए | सुविधा का घटक - इसके अंतर्गत कर राजस्व हेतु करदाताओं को आवश्यक सुविधा भी एक महत्वपूर्ण घटक है | लाफेर वक्र - इन्होने यह सुझाया कि किसी अर्थव्यवस्था में कर की दर एवं कुल कर राजस्व में एक गतिक सम्बन्ध होता है | जिसके अंतर्गत यद्यपि प्रारंभ में तो कर की दर बढ़ाने से राजस्व में वृद्धि होती है परन्तु एक नियत बिंदु के बाद यदि कर की दर को बढ़ाया जाय तो राजकोष पर विपरीत प्रभाव पड़ता है | अतः कर व्यवस्थाओं को उस नियत बिंदु पर होना चाहिए |
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What do you understand by Coriolis force? Explain the significance of Coriolis force to Earth and some of the atmospheric wind phenomena. (150 words/10 marks)
Structure:- 1. Introduction-Define Coriolis Force 2. Significance/effects of the Coriolis force. 3. Examples of atmospheric phenomenon where Coriolis force plays a role. 4. Conclusion Answer:- Coriolis force is an apparent force. Under which Objects moving over the earth"s surface across a substantial distance appear to be deflected towards the right in the northern hemisphere and towards the left in the Southern Hemisphere. This is said to be due to the Coriolis force which is considered to be the cause of these deflections. It must be noted that in reality (if seen from the outside the rotating earth), there is no deflection at all and hence no deflecting force in reality. Because of the rotation of the earth along its axis, the winds are deflected. The force which deflects the direction of winds is called Coriolis force. Significance/Effects seem to be created by Coriolis force:- 1. It is affected by wind speed. Hence, the higher the wind speed, the higher seem to be the deflection. 2. It does not affect the wind speed, but only changes the direction of moving wind. 3. It is zero near the equator(because the deflection seems to be zero at the equator) and force is strongest at the pole( as the deflection seems to be maximum near the poles) 4. It is the outcome of the rotation of the earth. Atmospheric phenomena and Coriolis force:- 1. Coriolis force and Cyclones:- Coriolis force acts as one of the driving forces in the generation of tropical cyclones. Tropical cyclones are the zones of low pressures. When low pressure is generated due to high temperature on a huge water body, then wind from all the surrounding areas come to that region. These winds when move; deflect to the right direction in the northern hemisphere and left in the southern hemisphere under the influence of Coriolis force. This deflection provides the necessary circulation to the low-pressure wind system and that is how tropical cyclones move anticlockwise in the northern hemisphere and vice versa. Hence, the Coriolis force plays a critical role in this atmospheric phenomenon. 2. Coriolis force and Anti- Cyclones:- Coriolis force acts as a responsible force for the rotation of Anti-cyclones also which is opposite to the cyclonic system. Anti-cyclones are the zones of high pressures. When high pressure is generated due to low temperature, then wind from high-pressure zone diverge to all the surrounding areas. These winds when move; deflect in the right direction in the northern hemisphere and left in the southern hemisphere under the influence of Coriolis force. This deflection provides the necessary circulation to the high-pressure wind system and that is how anticyclones move clockwise in the northern hemisphere and vice versa. Hence, the Coriolis force plays a critical role in this atmospheric phenomenon. 3. Easterly and Westerly winds:- From Sub-tropical high-pressure belts, when wind diverges, Coriolis force acts in a way that winds deflect in the right direction in the Northern hemisphere and vice versa. It leads to the generation of easterly and westerly winds. Though Coriolis force is an apparent force it plays a very vital role in global wind patterns and in few very influential atmospheric phenomena such as cyclones and anticyclones.
##Question:What do you understand by Coriolis force? Explain the significance of Coriolis force to Earth and some of the atmospheric wind phenomena. (150 words/10 marks)##Answer:Structure:- 1. Introduction-Define Coriolis Force 2. Significance/effects of the Coriolis force. 3. Examples of atmospheric phenomenon where Coriolis force plays a role. 4. Conclusion Answer:- Coriolis force is an apparent force. Under which Objects moving over the earth"s surface across a substantial distance appear to be deflected towards the right in the northern hemisphere and towards the left in the Southern Hemisphere. This is said to be due to the Coriolis force which is considered to be the cause of these deflections. It must be noted that in reality (if seen from the outside the rotating earth), there is no deflection at all and hence no deflecting force in reality. Because of the rotation of the earth along its axis, the winds are deflected. The force which deflects the direction of winds is called Coriolis force. Significance/Effects seem to be created by Coriolis force:- 1. It is affected by wind speed. Hence, the higher the wind speed, the higher seem to be the deflection. 2. It does not affect the wind speed, but only changes the direction of moving wind. 3. It is zero near the equator(because the deflection seems to be zero at the equator) and force is strongest at the pole( as the deflection seems to be maximum near the poles) 4. It is the outcome of the rotation of the earth. Atmospheric phenomena and Coriolis force:- 1. Coriolis force and Cyclones:- Coriolis force acts as one of the driving forces in the generation of tropical cyclones. Tropical cyclones are the zones of low pressures. When low pressure is generated due to high temperature on a huge water body, then wind from all the surrounding areas come to that region. These winds when move; deflect to the right direction in the northern hemisphere and left in the southern hemisphere under the influence of Coriolis force. This deflection provides the necessary circulation to the low-pressure wind system and that is how tropical cyclones move anticlockwise in the northern hemisphere and vice versa. Hence, the Coriolis force plays a critical role in this atmospheric phenomenon. 2. Coriolis force and Anti- Cyclones:- Coriolis force acts as a responsible force for the rotation of Anti-cyclones also which is opposite to the cyclonic system. Anti-cyclones are the zones of high pressures. When high pressure is generated due to low temperature, then wind from high-pressure zone diverge to all the surrounding areas. These winds when move; deflect in the right direction in the northern hemisphere and left in the southern hemisphere under the influence of Coriolis force. This deflection provides the necessary circulation to the high-pressure wind system and that is how anticyclones move clockwise in the northern hemisphere and vice versa. Hence, the Coriolis force plays a critical role in this atmospheric phenomenon. 3. Easterly and Westerly winds:- From Sub-tropical high-pressure belts, when wind diverges, Coriolis force acts in a way that winds deflect in the right direction in the Northern hemisphere and vice versa. It leads to the generation of easterly and westerly winds. Though Coriolis force is an apparent force it plays a very vital role in global wind patterns and in few very influential atmospheric phenomena such as cyclones and anticyclones.
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मानव विकास सूचकांक की संकल्पना के संबंध में संक्षिप्त चर्चा कीजिये । साथ ही मानव विकास सूचकांक रिपोर्ट 2021 में भारत की स्थिति का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत कीजिये । ( 150-200 शब्द; 10 अंक ) Briefly discuss the concept of Human Development Index. Also present a comparative analysis of the situation of India in the Human Development Index Report 2021. (150-200 words; 10 Marks )
दृष्टिकोण : मानव विकास व मानव विकास सूचकांक के संबंध में संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका । मानव विकास सूचकांक के विविध आयामों की चर्चा कीजिये । मानव विकास सूचकांक रिपोर्ट 2019 की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भारत की रैंकिंग दर्शाइए । भारत की रैंकिंग की तुलना पूर्व के वर्षों की रैंकिंग से , पड़ोसी राष्ट्रों , व ब्रिक्स देशों के साथ करते हुए निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : मानव विकास एक वृहद व बहुआयामी संकल्पना है । यह जनसामान्य के कल्याण से संबन्धित है । मानव विकास सूचकांक, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ( UNDP ) द्वारा जारी किया जाने वाला एक सूचकांक है, जिसका उपयोग विभिन्न देशों में मानव विकास के स्तर को जाँचने के लिए किया जाता है। इस सूचकांक के द्वारा यह पता चलता है कि मानव विकास के आधार पर किसी राष्ट्र का स्तर कैसा है । अर्थात यह दर्शाता है कि संबंधित राष्ट्र मानव विकास के उच्च स्तर, मध्यम स्तर या निम्न स्तर पर है । संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ( UNDP ) द्वारा मानव विकास सूचकांक की शुरुआत वर्ष 1990 में की गयी । इसका विकास UNDP द्वारा पाकिस्तानी अर्थशास्त्री महबूब उल हक की अध्यक्षता में गठित समिति द्वारा किया गया । यह रिपोर्ट वार्षिक स्तर पर प्रकाशित की जाती है , जिसमें विभिन्न राष्ट्रों की स्थिति का तुलनात्मक विश्लेषण प्रकाशित किया जाता है । इसकी गणना निम्नलिखित तीन आयामों के आधार पर किया जाता है : स्वास्थ्य : इसका सूचक जन्म पर जीवन प्रत्याशा है तथा इसका सूचकांक जीवन प्रत्याशा सूचकांक ( LEI ) है । ज्ञान : इसका सूचकस्कूल जाने के औसत वर्ष व स्कूल जाने के संभावित वर्ष हैं तथा इसका सूचकांक शिक्षा सूचकांक ( EI ) है । जीवन स्तर : इसे GNI प्रति व्यक्ति के द्वारा दर्शाया जाता है । उपरोक्त तीनों आयाम के औसत के आधार पर मानव विकास सूचकांक की गणना की जाती है । मानव विकास सूचकांक रिपोर्ट 2019 व भारत की स्थिति : हाल ही में UNDP द्वारा मानव विकास सूचकांक रिपोर्ट 2019 जारी किया गया । इस रिपोर्ट में भारत को 189 देशों में 129 वां स्थान प्राप्त हुआ है । वर्ष 2018 की तुलना में भारत की रैंकिंग में एक स्थान का सुधार हुआ है । भारत की रैंकिंग का पड़ोसी देशों व ब्रिक्स तथा सार्क देशों के साथ तुलना करने पर हम निम्नलिखित निष्कर्ष पर पहुँचते हैं : भारत माध्यम विकास वाले राष्ट्रों की श्रेणी में आता है । दक्षिण एशियाई देशों में भारत की रैंकिंग श्रीलंका ( 71 ) के बाद सबसे बेहतर है तथापि भारत का कुल स्कोर दक्षिण एशिया के औसत से थोड़ा ही अधिक है । ब्रिक्स देशों के साथ तुलना करने पर हम पाते हैं कि भारत की रैंकिंग सबसे निम्न है और भारत में मानव विकास का स्तर इन देशों की तुलना में काफी खराब है । मानव विकास सूचकों में भारत ने पिछले लगभग तीन दशकों में 50% से अधिक सुधार किया है तथापि अभी भी भारत विश्व के लगभग 28% निर्धन जनसंख्या का निवास स्थान है । इसलिए आवश्यकता है कि भारत मानव विकास की दिशा में और प्रभावी कदम उठाए ।
##Question:मानव विकास सूचकांक की संकल्पना के संबंध में संक्षिप्त चर्चा कीजिये । साथ ही मानव विकास सूचकांक रिपोर्ट 2021 में भारत की स्थिति का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत कीजिये । ( 150-200 शब्द; 10 अंक ) Briefly discuss the concept of Human Development Index. Also present a comparative analysis of the situation of India in the Human Development Index Report 2021. (150-200 words; 10 Marks )##Answer:दृष्टिकोण : मानव विकास व मानव विकास सूचकांक के संबंध में संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका । मानव विकास सूचकांक के विविध आयामों की चर्चा कीजिये । मानव विकास सूचकांक रिपोर्ट 2019 की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भारत की रैंकिंग दर्शाइए । भारत की रैंकिंग की तुलना पूर्व के वर्षों की रैंकिंग से , पड़ोसी राष्ट्रों , व ब्रिक्स देशों के साथ करते हुए निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : मानव विकास एक वृहद व बहुआयामी संकल्पना है । यह जनसामान्य के कल्याण से संबन्धित है । मानव विकास सूचकांक, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ( UNDP ) द्वारा जारी किया जाने वाला एक सूचकांक है, जिसका उपयोग विभिन्न देशों में मानव विकास के स्तर को जाँचने के लिए किया जाता है। इस सूचकांक के द्वारा यह पता चलता है कि मानव विकास के आधार पर किसी राष्ट्र का स्तर कैसा है । अर्थात यह दर्शाता है कि संबंधित राष्ट्र मानव विकास के उच्च स्तर, मध्यम स्तर या निम्न स्तर पर है । संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ( UNDP ) द्वारा मानव विकास सूचकांक की शुरुआत वर्ष 1990 में की गयी । इसका विकास UNDP द्वारा पाकिस्तानी अर्थशास्त्री महबूब उल हक की अध्यक्षता में गठित समिति द्वारा किया गया । यह रिपोर्ट वार्षिक स्तर पर प्रकाशित की जाती है , जिसमें विभिन्न राष्ट्रों की स्थिति का तुलनात्मक विश्लेषण प्रकाशित किया जाता है । इसकी गणना निम्नलिखित तीन आयामों के आधार पर किया जाता है : स्वास्थ्य : इसका सूचक जन्म पर जीवन प्रत्याशा है तथा इसका सूचकांक जीवन प्रत्याशा सूचकांक ( LEI ) है । ज्ञान : इसका सूचकस्कूल जाने के औसत वर्ष व स्कूल जाने के संभावित वर्ष हैं तथा इसका सूचकांक शिक्षा सूचकांक ( EI ) है । जीवन स्तर : इसे GNI प्रति व्यक्ति के द्वारा दर्शाया जाता है । उपरोक्त तीनों आयाम के औसत के आधार पर मानव विकास सूचकांक की गणना की जाती है । मानव विकास सूचकांक रिपोर्ट 2019 व भारत की स्थिति : हाल ही में UNDP द्वारा मानव विकास सूचकांक रिपोर्ट 2019 जारी किया गया । इस रिपोर्ट में भारत को 189 देशों में 129 वां स्थान प्राप्त हुआ है । वर्ष 2018 की तुलना में भारत की रैंकिंग में एक स्थान का सुधार हुआ है । भारत की रैंकिंग का पड़ोसी देशों व ब्रिक्स तथा सार्क देशों के साथ तुलना करने पर हम निम्नलिखित निष्कर्ष पर पहुँचते हैं : भारत माध्यम विकास वाले राष्ट्रों की श्रेणी में आता है । दक्षिण एशियाई देशों में भारत की रैंकिंग श्रीलंका ( 71 ) के बाद सबसे बेहतर है तथापि भारत का कुल स्कोर दक्षिण एशिया के औसत से थोड़ा ही अधिक है । ब्रिक्स देशों के साथ तुलना करने पर हम पाते हैं कि भारत की रैंकिंग सबसे निम्न है और भारत में मानव विकास का स्तर इन देशों की तुलना में काफी खराब है । मानव विकास सूचकों में भारत ने पिछले लगभग तीन दशकों में 50% से अधिक सुधार किया है तथापि अभी भी भारत विश्व के लगभग 28% निर्धन जनसंख्या का निवास स्थान है । इसलिए आवश्यकता है कि भारत मानव विकास की दिशा में और प्रभावी कदम उठाए ।
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Critically evaluate the merger of banks with special emphasis on the recent merger of the five associate banks with the SBI?(200 words)
Brief Approach Mention benefits of merger wrt each stakeholder Give issues faced due to the merger of banks Mention advantages and issues with the merger of SBI and associates Suggest some way forward/measures that should be taken during the merger Answer In 2017, Parliament has passed State Banks (Repeal and Amendment), Bill, 2017 to merge six subsidiary banks with State Bank of India after it was approved by Rajya Sabha,The bill repeals two Acts namely State Bank of India (Subsidiary Banks) Act, 1959, and State Bank of Hyderabad Act, 1956.The bill also seeks to amend State Bank of India (SBI) Act, 1955 to remove references to subsidiary banks and powers of SBI to act as an agent of the RBI for subsidiary banks. This was in confirmation of the Narasimhan committee ii has specifically emphasized the need to have Indian Banks that are comparable in size with global leading banks. Benefits of various stakeholders: For Banks: 1. Mergers help small banks to gear up to international standards with innovative products and services with the accepted level of efficiency. 2. Mergers help many PSBs, which are geographically concentrated, to expand their coverage beyond their outreach. 3. A better and optimum size of the organization would help PSBs offer more and more products and services and help in the integrated growth of the sector. 4. Consolidation also helps in improving professional standards. 5. This will also end the unhealthy and intense competition going on even among public sector banks as of now. In the global market, Indian banks will gain greater recognition and a higher rating. 6. The volume of inter-bank transactions will come down, resulting in saving of considerable time in clearing and reconciliation of accounts. 7. This will also reduce unnecessary interference by board members in day to day affairs of the banks. 8. After mergers, the bargaining strength of bank staff will become more and visible. Bank staff may look forward to better wages and service conditions in future. The wide disparities between the staff of various banks in their service conditions and monetary benefits will narrow down. For the economy: 1. The merger benefits include getting economies of scale and reduction in the cost of doing business. 2. Technical inefficiency is one of the main factors responsible for the banking crisis. The scale of inefficiency is more in case of small banks. Hence, the merger would be good. 3. The size of each business entity after the merger is expected to add strength to the Indian Banking System in general and Public Sector Banks in particular. 4. After the merger, Indian Banks can manage their liquidity – short term as well as long term – position comfortably. Thus, they will not be compelled to resort to overnight borrowings in call money market and from RBI under Liquidity Adjustment Facility (LAF) and Marginal Standing Facility (MSF). 5. The synergy of operations and scale of economy in the new entity will result in savings and higher profits. 6. A great number of posts of CMD, ED, GM and Zonal Managers will be abolished, resulting in savings of crores of Rupee. 7. Customers will have access to fewer banks offering them a wider range of products at a lower cost. 8. Mergers can diversify risk management. For the government: 1. The burden on the central government to recapitalize the public sector banks, again and again, will come down substantially. 2. This will also help in meeting more stringent norms under Basel III, especially the capital adequacy ratio. 3. From a regulatory perspective, monitoring and control of less number of banks will be easier after mergers. This is at the macro level. Arguments against merger: 1. The merger will affect regional flavour and end regional focus. 2. The argument that size is going to determine the future of the bank in a globalised scenario is facile. The fate of large global banks, which collapsed during the global financial crisis, can be remembered here. 3. The immediate negative impact of the merger would be from pension liability provisions (due to different employee benefit structures) and harmonisation of accounting policies for bad loans recognition. 4. Mergers will result in shifting/closure of many ATMs, Branches and controlling offices, as it is not prudent and economical to keep so many banks concentrated in several pockets, notably in urban and metropolitan centres. 5. Mergers will result in immediate job losses on account of a large number of people taking VRS on one side and slow down or stoppage of further recruitment on the other. This will worsen the unemployment situation further and may create law and order problems and social disturbances. Also, there are many problems to adjust top leadership in institutions and the unions. 6. New power centres will emerge in the changing environment. Mergers will result in a clash of different organizational cultures. Conflicts will arise in the area of systems and processes too. The weaknesses of the small banks may get transferred to the bigger bank also. 7. When a big bank books huge loss or crumbles, there will be a big jolt in the entire banking industry. Its repercussions will be felt everywhere. 8. Also, India right now needs more banking competition rather than more banking consolidation. In other words, it needs more banks rather than fewer banks. This does not mean that there should be a fetish about small-scale lending operations, but to know that large banks are not necessarily better banks. Advantages of the merger of SBI with associate banks SBI will have a global presence among top 50 Banks, bringing confidence, investment and greater lending. SBI can become one of the anchor banks to finance large infrastructure projects like dedicated freight corridor, solar energy, Sagarmala etc. It will increase networking of SBI all over India, thus better services of SBI compared to its associate branches will be able to reach remote locations. It will reduce duplication as SBI and its associates target the same clients with similar products. It will consolidate resources and infrastructure, reducing the cost of operations, human resource and technological solutions, overlapping bank branches, reduce inter-bank transaction cost etc. Disadvantages of the merger of SBI with its associate banks Presently these banks have huge NPAs thus merger should be planned after sufficient capital is injected. Banking competition may be affected, as SBI is likely to be five times larger than its nearest competitor. RBI has declared SBI as Domestic Systemically Important Bank (D-SIBs) and its failure can shock other parts of the financial system. A past example of large banks and their failure with the financial crisis in Japan, USA, etc. Workers resistance from associations like AIBEA calling for strikes India has poor financial inclusion, thus needs a variety of banks and differentiated services. What should be ensured if the merger is carried out? 1. The government shall not have any hidden political agenda, in bank mergers. The government shall not rush through the process of bank mergers. 2. All stakeholders are taken into confidence before the merger exercise is started. After mergers, shares of public sector banks shall not be sold to foreign banks, foreign institutions and Indian corporate entities, beyond a certain limit. 3. Whenever further divestment (dilution of government holdings) takes place, the government shareholdings shall not fall below 51% under any circumstances. This will ensure that the ownership and control of public sector banks remain with the government. 4. The decision with regard to the selection of smaller/weaker banks for the merger with larger/stronger banks is to be taken carefully and grouping of various banks for this purpose is the key issue involved. The government shall not yield to pressure from any political or social groups. 5. The acquiring bank should not attempt to dominate or subsume the acquired bank. Good aspects of both the banks before merger shall be combined, in order to instil confidence in all stakeholders and to produce better results. 6. Personnel absorbed from the smaller bank shall undergo a brief, intermittent training program to get acquainted with the philosophies, processes and technology in the new environment. The management must be ready with a good roadmap for this and allot considerable budgetary resources for this purpose. 7. There shall be conscious and organized efforts to synthesize the different organizational cultures, for the mergers to yield the desired results. A merger is a good idea. However, this should be carried out with the right banks for the right reasons. The merger is also tricky given the huge challenges banks face, including the bad loan problem that has plunged many public sector banks in an unprecedented crisis. Since mergers are also about people, a huge amount of planning would be required to make the consolidation process smoother. Piecemeal consolidation will not provide a lasting solution and what is required is an integrated approach from all stakeholders including the government.
##Question:Critically evaluate the merger of banks with special emphasis on the recent merger of the five associate banks with the SBI?(200 words)##Answer:Brief Approach Mention benefits of merger wrt each stakeholder Give issues faced due to the merger of banks Mention advantages and issues with the merger of SBI and associates Suggest some way forward/measures that should be taken during the merger Answer In 2017, Parliament has passed State Banks (Repeal and Amendment), Bill, 2017 to merge six subsidiary banks with State Bank of India after it was approved by Rajya Sabha,The bill repeals two Acts namely State Bank of India (Subsidiary Banks) Act, 1959, and State Bank of Hyderabad Act, 1956.The bill also seeks to amend State Bank of India (SBI) Act, 1955 to remove references to subsidiary banks and powers of SBI to act as an agent of the RBI for subsidiary banks. This was in confirmation of the Narasimhan committee ii has specifically emphasized the need to have Indian Banks that are comparable in size with global leading banks. Benefits of various stakeholders: For Banks: 1. Mergers help small banks to gear up to international standards with innovative products and services with the accepted level of efficiency. 2. Mergers help many PSBs, which are geographically concentrated, to expand their coverage beyond their outreach. 3. A better and optimum size of the organization would help PSBs offer more and more products and services and help in the integrated growth of the sector. 4. Consolidation also helps in improving professional standards. 5. This will also end the unhealthy and intense competition going on even among public sector banks as of now. In the global market, Indian banks will gain greater recognition and a higher rating. 6. The volume of inter-bank transactions will come down, resulting in saving of considerable time in clearing and reconciliation of accounts. 7. This will also reduce unnecessary interference by board members in day to day affairs of the banks. 8. After mergers, the bargaining strength of bank staff will become more and visible. Bank staff may look forward to better wages and service conditions in future. The wide disparities between the staff of various banks in their service conditions and monetary benefits will narrow down. For the economy: 1. The merger benefits include getting economies of scale and reduction in the cost of doing business. 2. Technical inefficiency is one of the main factors responsible for the banking crisis. The scale of inefficiency is more in case of small banks. Hence, the merger would be good. 3. The size of each business entity after the merger is expected to add strength to the Indian Banking System in general and Public Sector Banks in particular. 4. After the merger, Indian Banks can manage their liquidity – short term as well as long term – position comfortably. Thus, they will not be compelled to resort to overnight borrowings in call money market and from RBI under Liquidity Adjustment Facility (LAF) and Marginal Standing Facility (MSF). 5. The synergy of operations and scale of economy in the new entity will result in savings and higher profits. 6. A great number of posts of CMD, ED, GM and Zonal Managers will be abolished, resulting in savings of crores of Rupee. 7. Customers will have access to fewer banks offering them a wider range of products at a lower cost. 8. Mergers can diversify risk management. For the government: 1. The burden on the central government to recapitalize the public sector banks, again and again, will come down substantially. 2. This will also help in meeting more stringent norms under Basel III, especially the capital adequacy ratio. 3. From a regulatory perspective, monitoring and control of less number of banks will be easier after mergers. This is at the macro level. Arguments against merger: 1. The merger will affect regional flavour and end regional focus. 2. The argument that size is going to determine the future of the bank in a globalised scenario is facile. The fate of large global banks, which collapsed during the global financial crisis, can be remembered here. 3. The immediate negative impact of the merger would be from pension liability provisions (due to different employee benefit structures) and harmonisation of accounting policies for bad loans recognition. 4. Mergers will result in shifting/closure of many ATMs, Branches and controlling offices, as it is not prudent and economical to keep so many banks concentrated in several pockets, notably in urban and metropolitan centres. 5. Mergers will result in immediate job losses on account of a large number of people taking VRS on one side and slow down or stoppage of further recruitment on the other. This will worsen the unemployment situation further and may create law and order problems and social disturbances. Also, there are many problems to adjust top leadership in institutions and the unions. 6. New power centres will emerge in the changing environment. Mergers will result in a clash of different organizational cultures. Conflicts will arise in the area of systems and processes too. The weaknesses of the small banks may get transferred to the bigger bank also. 7. When a big bank books huge loss or crumbles, there will be a big jolt in the entire banking industry. Its repercussions will be felt everywhere. 8. Also, India right now needs more banking competition rather than more banking consolidation. In other words, it needs more banks rather than fewer banks. This does not mean that there should be a fetish about small-scale lending operations, but to know that large banks are not necessarily better banks. Advantages of the merger of SBI with associate banks SBI will have a global presence among top 50 Banks, bringing confidence, investment and greater lending. SBI can become one of the anchor banks to finance large infrastructure projects like dedicated freight corridor, solar energy, Sagarmala etc. It will increase networking of SBI all over India, thus better services of SBI compared to its associate branches will be able to reach remote locations. It will reduce duplication as SBI and its associates target the same clients with similar products. It will consolidate resources and infrastructure, reducing the cost of operations, human resource and technological solutions, overlapping bank branches, reduce inter-bank transaction cost etc. Disadvantages of the merger of SBI with its associate banks Presently these banks have huge NPAs thus merger should be planned after sufficient capital is injected. Banking competition may be affected, as SBI is likely to be five times larger than its nearest competitor. RBI has declared SBI as Domestic Systemically Important Bank (D-SIBs) and its failure can shock other parts of the financial system. A past example of large banks and their failure with the financial crisis in Japan, USA, etc. Workers resistance from associations like AIBEA calling for strikes India has poor financial inclusion, thus needs a variety of banks and differentiated services. What should be ensured if the merger is carried out? 1. The government shall not have any hidden political agenda, in bank mergers. The government shall not rush through the process of bank mergers. 2. All stakeholders are taken into confidence before the merger exercise is started. After mergers, shares of public sector banks shall not be sold to foreign banks, foreign institutions and Indian corporate entities, beyond a certain limit. 3. Whenever further divestment (dilution of government holdings) takes place, the government shareholdings shall not fall below 51% under any circumstances. This will ensure that the ownership and control of public sector banks remain with the government. 4. The decision with regard to the selection of smaller/weaker banks for the merger with larger/stronger banks is to be taken carefully and grouping of various banks for this purpose is the key issue involved. The government shall not yield to pressure from any political or social groups. 5. The acquiring bank should not attempt to dominate or subsume the acquired bank. Good aspects of both the banks before merger shall be combined, in order to instil confidence in all stakeholders and to produce better results. 6. Personnel absorbed from the smaller bank shall undergo a brief, intermittent training program to get acquainted with the philosophies, processes and technology in the new environment. The management must be ready with a good roadmap for this and allot considerable budgetary resources for this purpose. 7. There shall be conscious and organized efforts to synthesize the different organizational cultures, for the mergers to yield the desired results. A merger is a good idea. However, this should be carried out with the right banks for the right reasons. The merger is also tricky given the huge challenges banks face, including the bad loan problem that has plunged many public sector banks in an unprecedented crisis. Since mergers are also about people, a huge amount of planning would be required to make the consolidation process smoother. Piecemeal consolidation will not provide a lasting solution and what is required is an integrated approach from all stakeholders including the government.
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