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डाल चंद की लड़की, महा ब्राह्मण के दो भतीजे, सबको सीतला माता ने दर्शन दिया।
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टिकट नहीं, पास! ...तब हम लोगों के सामने कंपनी की औरत को कोई बुरी बात करे तो कैसे छोड़ देंगे?' कंपनी के मैनेजर की समझ में आ गई सारी बात।
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वह स्वयं भी अपने सम्बन्ध में नहीं जानता, परन्तु जिस व्यक्ति का उसके साथ सम्पर्क हो, उस व्यक्ति को उसे पहचानने में कठिनाई नहीं होती।
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सारे आदमी, घर, दीवारें और सड़कें उसको अपनी दुश्मन लगतीं।
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नीले दोपट्‌टे वाली लडक़ी बोली।
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' बात यह कि कुल सराधें एक ही महीने में करवानी पड़ेगीं, और फिर ब्रह्मभोज भी तो है, और बड़ा। कम-से-कम तीन हजार खर्च होंगे।
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मैंने देखा है लौंडों की तरह कद कड़े लगाती रहती है। ”
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मय्या कहती थी ग्रहण से पहले रोटी वग़ैरा खा लेनी चाहिए, वगरना हर हरकत पेट में बच्चे के जिस्म-ओ-तक़्दीर पर असर-अंदाज़ होती है।
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जब यह पता चला कि दबा हुआ आदमी शायर है, तो सेक्रेटेरिएट की सब-कमेटी ने फैसला किया कि चूंकि दबा हुआ आदमी एक शायर है लिहाजा इस फाइल का ताल्‍लुक न तो कृषि विभाग से है और न ही हार्टिकल्‍चर विभाग से बल्कि सिर्फ संस्‍कृति विभाग से है।
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सवेरे उठने पर उन्हें याद आई कि कल ही जो उन्हें तनखाह के तीन सौ रुपये मिले थे उसे वे कोट की जेब में ही रखकर सो गए थे।
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उसकी उम्र तेरह या चौदह साल की होगी।
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उसने पहला क़ुहबाख़ाना दिखाते हुए कहा।
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आज तेरे घर में ख़िज़ां आ गई है।
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एक पाज़ेब की खनक औरा एक शरीर हंसी जो फुलझड़ी की तरह उसकी गूँगी सुनसान दुनिया के वीराने को एक लम्हे के लिए रोशन कर दे।
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मैं उनको मार-पीट तो न सकूँगा।
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बल्लोची सिपाहियों ने कहा, खिड़कियाँ मत बंद करो, हवा रुकती है, खिड़कियाँ बंद होती गईं।
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पन्ना— जब उनका जी चाहेगा, खायेंगे।
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उसने जोरों से पुकारना शुरू किया।
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आज पहली बार उसे अपनी स्वार्थपरता पर लज्जा आयी।
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वह व्यक्ति दूसरों के कहने-कहाने से स्त्री और बच्चों को साथ लेकर वहाँ से चल दिया।
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बड़े का नाम श्रीकंठ सिंह था।
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ज़रूर कोई हा निजी गा रहा है और इस की आवाज़ गूँजती गूँजती उफ़ुक़ के इस पार गुम होती जा रही है।
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जाने क्या बातें करती थीं?
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फ़र्ख़ंदा बार बार इल्तिजा करती कि उस की सहेली नसीमा को बुलाया जाये मगर उस की माँ टालती रही।
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कुछ देर बाद मैं चाय पीकर वहाँ से चलने लगा, तो बसन्ते ने कुल छ: आने माँगे।
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उसने परीक्षा करने के लिए कलसा उठाया। और दो सौ पग तक बेतहाशा भागा हुआ चला गया।
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कभी सबके सब दौड़कर आगे निकल जाते।
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जिसका शोषण तो कर लिया जाए, पर जिसे घर आने पर गुड़गुड़ी के बदले बंधे हुक्के में( गुड़गुड़ी हुक्का अधिक सम्मान-सूचक समझा जाता है, बंधा हुक्का मामूली हुक्का होता है।
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वह सोचने लगी, पति की ओर से किसी दोष की वह कल्पना भी नहीं कर सकती, जिससे उनके प्रति ऐसा कठोर भाव जागृत हो जाएे।
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बिरादरी वालों की बिरादरियां टूट गयी थीं और यारों के यार छूट गये थे।
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कई दिन पेड़ के नीचे सोए, अल्ला कसम, पेड़ के नीचे! फिरन जाने कहॉँ से एक सौ कर्ज लाए तो बरतन-भॉँड़े आए। हामिद—एक सौ तो पचार से ज्यादा होते है?
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जज साहब की वफ़ात पर उसे बहुत सदमा हुआ था अब वो हर महीने उन के लड़के को सलाम करने की ग़रज़ से ज़रूर मिलता था।
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चंद लम्हात के बाद मुनशी करीम बख़्श मर गया, उस की मौत से डिप्टी साहब और छोटे साहब को लोगों ने मुत्तला कर दिया।
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लेकिन, अन्दाज़ है कि एक या दो दिन…कोयला है।
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उसने कहा, ‘हाँ, यही हैं। ’
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और लाजो एक पतली शहतूत की डाली की तरह, नाज़ुक सी देहाती लड़की थी।
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सोलह...सत्रह...अठ्ठारह ...जलालगढ़ स्टेशन का सिग्नल दिखाई पड़ता है ...
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" हम इस मामले को हार्टिकल्‍चर विभाग के सुपुर्द कर रहे हैं, क्‍योंकि यह एक फलदार पेड़ का मामला है और कृषि विभाग सिर्फ अनाज और खेती-बाड़ी के मामलों में फैसला करने का हक रखता है।
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लेकिन क्या शास्त्र किसी औरत ने बनाए हैं?
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चचा जिस पर उस की रोटी का बोझ जबरन पड़ गया था, हैरान थे।
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उसके दण्ड- विधान के समान ही उन जीव-जन्तुओं के प्रति उसका प्रेम भी असाधारण था।
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केदार खींचने लगा।
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चतुरी के जूते अपरिवर्तनवाद के चुस्त रूपक जैसे टस-से-मस नहीं होते।
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-' कौन, पलटदास? क्या है?' पलटदास आ कर खड़ा हो गया चुपचाप।
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तोते ने चारों ओर गौर से देखा, निश्शंक हो गया, उतरा और आ कर पिंजड़े के ऊपर बैठ गया।
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आपको यदि वह अधिक प्यारा है, तो मुझे विदा कीजिए, मैं अपना भार आप सॅंभाल लूँगा।
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दो कहीए दो हाज़िर करदूँ।
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शास्‍त्री जी ने पिकेटिंग में जाने की आज्ञा दे दी।
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मगर कशती, ये क्षति है।
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एक बहू- बुढ़िया यही चाहती है कि यह सब जन्म-भर लौंडी बनी रहें।
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ये आम चूँकि अपने बाग़ के हैं और बाग़ में सिर्फ़ एक बूटा है जिस के सब दाने घुलावट ख़ुशबू और मिठास में एक जैसे हैं
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एक टेण्डल को घूरते हुए बोला। “सारंग देव जाओगी होले?” और फिर अपने सामने खड़े हुए आदमी से मुख़ातब होते हुए बोला।
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कार्तिकेय ने अपने युद्ध-वाहन के लिए मयूर को क्यों चुना होगा, यह उस पक्षी का रूप और स्वभाव देखकर समझ में आ जाता है।
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वह कहने लगी- "हाय, हाय! छिपे-छिपे भइया का सत्यानाश करके ठाट-बाट से लोक दिखाऊ टीका करने से क्या फायदा?
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...औरतों का गुलाम।
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तुम नन्ही के क्या होते हो?”
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जो कुछ कान में पड़ रहा था वह सब तो बच्चों के साथ बचपने की बातें थीं।
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वगरना कौन भाबी है और कौन देवर?
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मैं तो झटपट घबराकर खड़ा हो गया।
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कपड़े के भाव रोज़ बरोज़ चढ़ रहे थे।
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रहमत काबुली की ओर से भी वह पूरी तरह निश्चिंत नहीं थी।
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पर चिरंजीव को रस मिलने के कारण बुलाते हुए हार न हुई थी।
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ड्राइवर के झिड़कने पर वे थोड़ा इधर-उधर हुए लेकिन फिर धीरे-धीरे उसके पास सरकने लगे थे।
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यहां पर गाड़ी रोक कर लोग गांव में घुस गए।
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हिरामन ने हठात अपने दोनों बैलों को झिड़की दी, दुआली से मारते हुए बोला,' रेलवे लाइन की ओर उलट-उलट कर क्या देखते हो?' दोनों बैलों ने कदम खोल कर चाल पकड़ी।
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“आजकल के ज़माने में शरीफ़ आदमियों का मिलना मुहाल है
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पुरुष ने उसकी जेब को बाहर से दबाया, जिससे कितनी ही सीपियाँ टूट गयीं।
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..नहीं, नहीं! पाँव सीधे हैं, टेढ़े नहीं। लेकिन, तलुवा इतना लाल क्यों हैं?
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इसके बाद मजमा ने हवा में फ़ायर किया और गाड़ी चलाने के लिए स्टेशन मास्टर को हुक्म दिया।
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श्रीकंठ सिंह शनिवार को घर आया करते थे।
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कभी कोई अपने गाँव या अपने इलाके का आदमी नहीं मिला था।
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वह उसी रुखाई से बोला— मुलिया, मुझसे यह न होगा।
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वह भी अपनी जगह निश्चल था।
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आंखों की पुतलियां बेजान थीं और चींटियों की एक लंबी कतार उसके मुंह में जा रही थी।
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वो ये सब कुछ नहीं जानता था और न इस क़िस्म की बातों से कोई दिलचस्पी रखता था।
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उसने कमज़ोर आवाज़ में कहा, “ मुझे नहीं पता वह चम्मच कहाँ है। ”
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' मैं बातों का बनाना आज दस साल से देख रहा हूँ।
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गली में चंद औरतें बातें कर रही थीं।
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इस अवकाश की मरुभूमि में मेरा हृदय उस समय विश्वव्यापी नारी-रूप की मरीचिका देख रहा था- आकाश में उसकी दृष्टि थी, वायु में उसका निश्वास, तरु-मर्मर में उसकी रहस्यमयी बातें।
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“मुझ से मुहब्बत करते हैं यही उन का काम है।
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उन्होंने आवाज देकर किसी को बुलाया था पर देर तक कोई घर से बाहर नहीं निकला था।
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उसे अपराध का ही नहीं, अपराध के अभाव का भी दण्ड सहना पड़ता था, इसी से पंडित जी की थाली में पंडिताइन चाची का ही काला मोटा और घुँघराला बाल निकलने पर भी दण्ड बिंदा को मिला।
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गौरी ने कहा,' वहां बच्चे हैं।
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चुनांचे उस ने इस का घर से निकलना बंद कर दिया।
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( यों, सूचना बंगला में इस वाक्य से मिली थी –
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अब वह किसी की जय नहीं बुलाता।
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वह खुद ऊपर का काम-काज कर लेती।
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बेचारे से पचास रुपये ऐंठ लिये।
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गाड़ी कानपुर में आकर रुकी।
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बाबू उस वक़्त दिन-भर काम कर के थक कर सो रहा था।
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उबलते हुए आँसू ... फ़सीह और बलीग़ जुमलों की तरह उसके गालों पर बहते आरहे थे और पारो सर झुकाए सुन रही थी।
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गूना चूसते हुए उस ने कहा: “ बाबा! परसों मामूँ जी आएँगे ना....?”
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पगड़ी के सिरे की तरफ़ उससे ज़रा बड़ी उम्र की एक स्त्री और एक जवान लडक़ी बैठी थीं; और उनके पास खड़ा एक दुबला-सा लडक़ा आस-पास की हर चीज़ को घूरती नज़र से देख रहा था, अधेड़ मरद की फैली हुई टाँगें धीरे-धीरे पूरी खुल गयी थीं और आवाज़ इतनी ऊँची हो गयी थी कि कम्पाउंड के बाहर से भी बहुत-से लोगों का ध्यान उसकी तरफ़ खिंच गया था।
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इश्वर उस की उम्र दराज़ करे। ” मैंने पटवारी से कहा, तुम ख़ानक़ाह वाले कुँए को चलो और मैं तुम्हारे पीछे पीछे आ जाऊँगा।
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मैंने कहा, ‘देख लो, सिर्फ एक रुपया हक लगेगा। ’ वक्त बहुत हो गया था।
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तीन घंटों के बाद वह कोठी पर आ गया। और हम कुछ फोजियों को लेकर एक ट्रक में बैठकर उसके घर की ओर चल दिये।
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