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सुखी आया है।
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जब झुककर देखती होगी तब चित्र के ऊपर क्या उसके मुख के दोनों ओर से खुले बाल आकर नहीं पड़ते होंगे?
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हरिद्वार जाने से पहले डाक्टरी मुआइना बहुत ज़रूरी होता है।" डाक्टरी मुआइने से मुराद ये थी कि वो लोग ख़त्ना देखते थे और जिसके ख़त्ना हुआ होता उसे वहीं मार डालते।
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गोया दूसरे आदमी की मौजूदगी चाहती है।
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उसके बाद फिर बिंदा को मिलन सम्भव न हो सका; क्योंकि मेरे इस आज्ञा- उल्लंघन से मां बहुत चिन्तित हो उठी थीं।
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इसीलिए हमेशा सींग खुजाती फिरती जंगी की पुतोहू! बिरजू की माँ के आँगन में जंगी की पुतोहू की गला-खोल बोली गुलेल की गोलियों की तरह दनदनाती हुई आई थी।
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गो माया ने जूती को सरसों का तेल लगा दिया था।
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हमने उसकी जातिवाचक संज्ञा को व्यक्तिवाचक का रूप दे दिया और इस प्रकार हम उसे गिल्लू कहकर बुलाने लगे .
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कौन किसी यतीम बच्चे की इस तरह परवरिश करता है।
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एक बच्चे को कन्धे से चिपकाये और एक उँगली पकड़े हुए जो भिखारिन द्वार-द्वार फिरती थी, वह भी तो बच्चों के लिए ही कुछ माँगती रहती थी।
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चटपट जंगला खोलकर मैंने मुंह बाहर निकाला, कुछ भी न दिखा।
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जमादारनी सेहन में एक जगह चादर का एक पल्लू बिछाए बैठी थी।
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मैं तार से वापस बुला लिया गया और घर पर मेरी खूब ले-दे हुई।
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मेरे सामान उठाने में मेरी अफसरी पर बात आती थी। और यदि फौजी सामान उठाने लग जाते तो हम सभी की जान को खतरा था।
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वाहगा कैंप से इन्हें आगे ठेल दिया जाता था और फिर ये शरणार्थी एक जिले से दूसरे जिले और एक गांव से दूसरे गांव जमीन की खोज में डोलने लगते।
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कभी कभी अकेला ही क्रोटन चील के बल खाते हुए तनों पर चढ़ जाता और उतर आता।
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पासी हफ्ते में तीन दिन हिरन, चौगड़े और बनैले सुअर खदेड़कर फाँसते हैं।
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बागड़ को मारने के लिए वह मिट्टी का छोटा ढेला उठा चुकी थी, कि पड़ोसिन मखनी फुआ की पुकार सुनाई पड़ी-' क्यों बिरजू की माँ, नाच देखने नहीं जाएगी क्या?'' बिरजू की माँ के आगे नाथ और पीछे पगहिया हो तब न, फुआ!' गरम गुस्से में बुझी नुकीली बात फुआ की देह में धँस गई और बिरजू के माँ ने हाथ के ढेले को पास ही फेंक दिया-' बेचारे बागड़ को कुकुरमाछी परेशान कर रही है।
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एक-एक कर उसकी बहू के गहने-गुरिया सब बिक गए थे।
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पुलिस का काफी प्रबंध था।
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किसी विशेष परिचित को आया देखकर वह सदर्प धीरे-धीरे भीतर आकर मेरे कमरे के दरवाजे पर खड़ा हो जाता।
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पास ही बैठे कुत्ते ने कान उठाकर इधर-उधर देखा फिर भौं-भौं करके भौंक उठा।
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जहाँ भूल जाओगी, बगल में मासटरनी बैठी ही है!' दोनों पुतोहुओं ने तो नहीं, किंतु चंपिया और सुनरी ने खँखार कर गला साफ किया।
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लेकिन जब वो अंदर अपने कमरे में थोड़ी देर आराम करने के लिए गई तो उस ने क़मीस उठा कर देखा कि उस की छातियां उभरी हुई थीं।
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अत्तार की अलमारी के शीशे में लक्षमण को अपना अक्स बहुत ही धुँदला सा नज़र आता था, मगर उस के बावजूद लक्षमण जानता था कि ये उस का अपना अक्स है, और वो क़रीब-तर खड़े हुए गधे का....
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झुनिया सबसे छोटी थी।
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धोती नीचे की तरफ़ ढलक जाती थी ... .
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ठाकुर साहब ने नम्रता से कहा-दरोग़ा जी ज़रा सब्र रखिए, में अभी यहां से सब को हटवाए देता हूँ।
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सवेरा हो चुका था…आ रहलौ है!
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लड़की इन छयों से एक बरस बड़ी थी।
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मैंने अपने शाने से चादर उतार कर चारपाई की पायंती पर रखी और अपनी दबी हुई एड़ी को जूती की क़ैद बा मशक़्क़त से नजात दिलाते हुए पलंग पर लेट गया।
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ध्‍यान लगाए कितनी लड़ाइयां लड़ीं प्रसाद, पन्‍त और माखनलाल के विवेचन में।
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ऐसे भाई के मुँह से आज ऐसी हृदय-विदारक बात सुनकर लालबिहारी को बड़ी ग्लानि हुई।
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मैंने दीवार पर खूँटी से टँगे हुए मकई के भट्टों को देखा।
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डंडा नहीं लाया।
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देखा, एक दूसरे वृक्ष के नीचे एक धुँधला दीपक जल रहा है, और कई आदमी बैठे हुए आपस में कुछ बातें कर रहे हैं।
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ऐसी ही किसी स्थिति में एक साँप जाली के भीतर पहुँच गया।
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उसे सर्दी में बर्फ़ से ज़्यादा ठंडे पानी और गर्मियों में भेजा जला देने वाली धूप में खड़ा नहीं होना पड़ता।
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उसने ड्राइवर को उसे देकर खुद उसपर गाड़ी का नंबर लिख लेने के लिए कहा क्योंकि ठेकेदार बाबू घर गए हुए थे।
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उसने बच्चों का हाथ-मुँह धुलाया, उन्हें पानी पिलाया, फिर मां के पीछे-पीछे बाहर चली गई।
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सिगरेट बुझाकर ऐश-ट्रे पर फेंकते हुए प्रोफेसर साहब ने कहा-बात उन दिनों की है जब मैं बी।ए।
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उन की दोस्ती दिन ब-दिन ज़्यादा उस्तुवार होती गई बल्कि यूं कहिए कि बड़ी शिद्दत इख़्तियार कर गई जो नवाब नवाज़िश अली मरहूम की बेगम को बहुत खलती थी।
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कुन्ती की समझ में यह पहेली न आई, उसने कहा,' जरा समझाकर कहो।
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हीराबाई को। हीराबाई ने पहचाना ही नहीं।
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बाग से लौटने पर सुपर्णा के हृदय में मोहन के लिए क्रोध पैदा हुआ।
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इसकी मेहनत हम देंगे।
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उस की माँ ने अपने कानों पर ज़ोर दे कर ये आवाज़ सुनने की कोशिश की, जब कुछ सुनाई न दिया तो उस ने कहा “ कोई बच्चा रो नहीं रहा ............. ”
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नंगी औरतें पनाह गज़ीनों के साथ बिठा दी गईं और मैं इस्लाम ज़िंदाबाद और क़ाइद-ए-आज़म मुहम्मद अली जिन्ना ज़िंदाबाद के नारों के दरमियान रुख़्सत हुई।
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उस समय वह बड़ी शिथिल-सी थी और बहुत ही धीरे-धीरे बोल रही थी।
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यहां मेरा एक चंडूख़ाना है।
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इसी समय गाड़ी एक बड़े स्टेशन पर आकर रुक गई।
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ये जो कहेंगे वही होगा?
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घर की शेखी में मत भूलिएगा।
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शाम होते ही भोला दरवाज़े में जा बैठा ताकि मामूँ की शक्ल देखते ही अंदर की तरफ़ दौड़े और पहले-पहल अपनी माता जी को और फिर मुझे अपने मामूँ जी के आने की ख़बर सुनाए।
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‘‘पहचान लीजिए।
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आज 60 ) माहवार मिलते हैं, नौकरी छोड़ने पर कोई बीस रुपल्ली को भी न पूछेगा;
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उसने एक हाथ से घूँगट को चोटी की तरफ़ खिसकाया, कूल्हे पर से धोती का पल्लू सरक गया।
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हिरामन के अंग-अंग में उमंग समा जाती है।
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नहीं तो गँवार छोकरा, जिसको चपरासगिरी करने का भी शऊर नहीं, मुझे खड़ाऊँ से मार कर यों न अकड़ता।
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इतने में रग्घू भी अंदर आ गया।
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स्त्री का बल और साहस, मान और मर्यादा पति तक है।
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क्योंकि दूसरी दासियों से वह काम करने में तेज और सरल थी।
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वो अपनी ज़ात में बेजोड़ और मुकम्मल था।
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प्राय: उसके उचित- अनुचित सारे हठ पूरे हुआ करते थे।
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हमारी कमाई इसलिए नहीं है कि दूसरे खायें और मूँछों पर ताव दें।
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महादेव घबड़ा कर उठा और इधर-उधर खपरैलों पर निगाह दौड़ाने लगा।
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मैंने द्वार से बाहर निकलकर सिपाही को रोक लिया, पूछा," क्या बात है?" कुछ सिपाही से और कुछ रहमत से सुना कि हमारे एक पड़ोसी ने रहमत से रामपुरी चादर खरीदी थी।
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हाय! मालकिन! तुम्हें कपड़ों की पड़ी है।
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घबरा कर इस ने आवाज़ दी और अपनी बीवी को बुलाया।
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लेकिन अब वो सुसराल से इतनी सैर हो चुकी थी कि वहाँ से भाग जाना चाहती थी।
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हर लहर के बाद दूसरी लहर और आगे तक बढ़ आती थी।
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मैं हमेशा उस से यही सुनने का आदी था कि “भोला बाबा-जी का है और माता जी का नहीं ”
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मैंने माया को पत्थर के एक कूज़े में मक्खन रखते देखा।
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आठ पहर का दबाव कम हुआ तो आंसू निकल बहे।
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रग्घू ने झुँझलाकर कहा — काकी तू घर में रहने देगी कि मुँह में कालिख लगाकर कहीं निकल जाऊँ?
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फलों के वृक्षों से अधिक उसे पुष्पित और पल्लवित वृक्ष भाते थे।
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मैंने अनेक कुत्ते देखे और पाले हैं, किन्तु कुत्ते के दैन्य से रहित और उसके लिए अलभ्य दर्प से युक्त मैंने केवल नीलू को ही देखा है।
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सालगिरा के दिन नसीमा आई।
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उस को देख कर लक्षमण को याद न रहा कि उस के हाथों पर उन ही बड़ी बड़ी, मस्त, नीम-वा आँखों ने कोइले से धर दिए हैं और वो औरत जिसके जूड़ा गाँव ननिहाल थे, उस की माँ को जब लक्षमण के बाप ने साली कहा था, तो अच्छा-ख़ासा कोरोखशीतर छिड़ गया था।
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शंभूनाथ बाबू ने मुझसे कहा, तुम्हारे मामा कहते हैं कि विवाह-कार्य शुरू होने के पहले ही वे कन्या के सारे गहने जंचवा देखेंगे, इसमें तुम्हारी क्या राय है?
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न उसे कोई बीमारी हुई; न उसके रंग- बिरंगे फूलों के स्तबक जैसे शरीर पर किसी चोट का चिह्न मिला।
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परिणामतः नीलू बेचारा एकाकी ही रहा।
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मुझे सारंग देव ग्राम पहुँचा दो....”।
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मुझे-सौ मरले का गड्ïढा! उसमें क्या मैं बाप-दादों की अस्थियाँ गाड़ूँगा?
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बाबू दिल ही दिल में कहने लगा।
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बीस-पच्चीस साल पहले, बिदेसिया, बलवाही, छोकरा-नाचनेवाले एक-से-एक गजल खेमटा गाते थे।
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कुछ देर यूँ ही सन्नाटा रहा, फिर बुढ़िया ने जसवंत से कहा-" हमारी पानी की बारी कब है?
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राजा के सम्बन्धियों ने हाँड़ी-जैसे मुँह लटका कर और सिर हिलाकर कहा,'' इस राज्य के पक्षी सिर्फ बेवकूफ ही नही, नमक- हराम भी हैं।
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उस आदमी को भी मुंशी करीम बख़्श हर साल मौसम पर एक टोकरा भेजता था।
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नगाड़ा फिर घनघना उठा।
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ए मैया, एक अँगुली गुड़ दे दे बिरजू ने तलहथी फैलाई- दे ना मैया, एक रत्ती भर!'' एक रत्ती क्यों, उठाके बरतन को फेंक आती हूँ
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दोनों तरफ से विवाह की तैयारी हो रही थी।
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उसने बार-बार रामू को ताकीद की कि दिन रहते ही वह बच्चों को लेकर लौट आए।
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थानेदार साहब ने मुझसे पूछा, ‘ आप कांग्रेस में हैं? ’
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दूसरो को हल्का रखने के लिए अकेला बोझ उठाये फिरता था।
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' जवाब सुनकर राजा नें पूरे मामले को भली-भाँति और साफ-साफ तौर से समझ लिया।
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खज़ाने का बड़ा अफ़्सर मुंशी करीम बख़्श के एक मुरब्बी और मेहरबान जज का लड़का था।
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मैं एक महीने तक आपकी राह देखूँगा।
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मन में यह प्रतिहिंसा लिए हुए, कि मोहन इस बहते में मिलेगा। और उसे हो सकेगा तो उचित शिक्षा देगी।
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वे किसी-न-किसी की नंजर में, किसी-न-किसी की रखवाली में रहती थीं।
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