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यह अदालत है, यह कालेज है, यह क्लब घर है।
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“कुत्थू राम”।
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घाट था बहुत लंबा चौड़ा।
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रग्घू ने आहत स्वर में कहा — इसी बात का तो मुझे गम है।
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आठ आने पेसे मिले थे।
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बासा के मीर-गाड़ीवान मियाँजान बूढ़े ने सफरी गुड़गुड़ी पीते हुए पूछा,' क्यों भाई, मीनाबाजार की लदनी लाद कर कौन आया है?
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मामूँ जी किलो ( कित्ता ) लाएँगे।
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एक सौ एक तक आ जाय, तब जरूरत नहीं।'' डॉक्टर चले गये।
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पण्डितजी तोते को विद्या पढ़ाने बैठे।
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उसकी सहेलियाँ भी रुक गईं।
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गोधन पंचलैट में पम्प देने लगा।
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औरत है या चंपा का फूल! जब से गाड़ी मह-मह महक रही है।
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...बड़ी बहुरिया दूध पिला रही है?
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उसकी स्मृति सदा बनी रहेगी।
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“नीचे बाज़ार में चले जाओ, ” वह बोला, “नत्थासिंह का होटल पूछ लेना।
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नहीं, कोई दोष नहीं- पिता अपनी कन्या के योग्य वर कहीं भी न खोज पाए।
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उसने नारियल को कसकर गाली दी और ज़ोर की एक ठोकर लगायी।
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मुलिया— मैं आज ही चली जाऊँगी, अम्मा, उसके पैरों पड़कर मना लाऊँगी।
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वो फ़ौरन आ जाएगी।
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मैंने उस का हाथ अपने हाथ में ले लिया और इस से कहा।
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तीन कोस का पेदल रास्ता, फिर सैकड़ों आदमियों से मिलना-भेंटना, दोपहर के पहले लोटना असम्भव है।
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उसे ऐसे दिखाई दे रहा था, जैसे वो लक्षमण के अजीब से रूप को देख कर श्राद्ध तो क्या, अपने पत्रों तक को भूल गई है।
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शंभूनाथ ने कहा, अपनी कन्या का गहना मैं चुरा लूंगा, जो यह बात सोचता है उसके हाथों मैं कन्या नहीं दे सकता।
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उस जगह और ऐसी हालत में वो कुत्थू राम को कुछ कह भी तो ना सकती थी।
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किसी के कुरते में बटन नहीं है, पड़ोस के घर में सुई-धागा लेने दौड़ा जा रहा है।
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हर नौजवान राइफ़ल से मुसल्लह था।
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सुपरिन्‍टेंडेंट ने शायर के बाजू को हिलाकर कहा। मगर शायर का हाथ सर्द था।
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मैंने कहा, ‘चतुरी, मैं शक्ति भर तुम्हारी मदद करूँगा। ’
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यहां पहली बार हिन्दोस्तान की सरहद पर इस्लाम का पर्चम लहराया था।
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आधी रात गुजर गयी थी।
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उसी दिन से गाँव में ढिंढोरा पीटने लगे, बिरजू की माँ इस बार बैलगाड़ी पर चढ़ कर जाएगी
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जीवन के अमरत्व का वह रहस्य तुम्हें ज्ञात हो चुका है, जिसकी देवताओं को सर्वदा इच्छा रही है, किन्तु तनिक विचार तो करो, क्या कोई और ऐसी वस्तु शेष नहीं जिसकी तुम इच्छा कर सको?" कच-" कोई नहीं।" देवयानी-" बिल्कुल नहीं?
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इस ख़याल से कि वो पाकिस्तान में बड़ी ख़ुश रही है, उसे बड़ा सदमा हुआ,लेकिन वो चुप रहा क्यूँ कि उसने चुप रहने की क़सम खा रक्खी थी।
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चन्द्रु की गैरहाज़िरी में सिद्धू ने एक अच्छा काम किया था।
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प्रियजनों की याद आ रही है।
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चारों ओर पहले के घाट-जैसा ही सुनसान एकांत था और उसकी गिरफ्त में पड़े अलाव तापते चेहरे कुदरती विस्तार का ही निर्जीव हिस्सा लग रहे थे।
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झकझोरकर मुझे जगाया गया।
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लड़के सबसे ज्यादा प्रसन्न हैं।
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जिनको गोद में खेलाया, वहीं अब मेरे पट्टीदार होंगे।
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वह खूब जानता था, रोटी के साथ लोगों के हृदय भी अलग हो जाते हैं।
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बाबू को ये महसूस हुआ कि न सिर्फ सुख नंदन ने उस के जज़्बात को ठेस लगाई है और वो उस के साथ कभी नहीं खेलेगा, बल्कि उस की माँ, जिसके पेट से वो नाहक़ पैदा हुआ था, वही औरत जिस से उसे दुनिया में सब से ज़्यादा प्यार की तवक़्क़ो है, वो उस से ऐसा सुलूक करती है।
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राधा नीलकण्ठ के समान नहीं नाच सकती थी, परन्तु उसकी गति में भी छन्‍द रहता था।
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अकस्मात् किसी एक स्टेशन पर जाग पड़ा, वह भी प्रकाश-अंधकार-मिश्रित एक स्वप्न था।
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अफ़्सुर्दा दिल चन्द्रु सर झुकाए अपने आपको मसरूफ़ रखने की कोशिश करने लगा।
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सुंदर लाल ने फिर से मीठे तंबाकू को फ़र्श पर से उठाते और हथेली पर मसलते हुए पूछा, और ऐसा करते हुए उसने रसालू की चिलम हुक़्क़े पर से उठाली और बोला— “भला क्या पहचान है उस की?” “ एक तेंदूला ठोढ़ी पर है, दूसरा गाल पर——” “हाँ हाँ हाँ और सुंदर लाल ने ख़ुद ही कह दिया तीसरा माथे पर। ” वो नहीं चाहता था, अब कोई ख़दशा रह जाए और एक दम उसे लाजवंती के जाने-पहचाने जिस्म के सारे तेंदूले याद आ गए, जो उसने बचपने में अपने जिस्म पर बनवा लिए थे, जो उन हल्के हल्के सब्ज़ दानों की मानिंद थे जो छुई-मुई के पौदे के बदन पर होते हैं और जिसकी तरफ़ इशारा करते ही वो कुम्हलाने लगता है।
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ये भी कोई शहरों में शहर है।
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मैं एक न मानूँगा।
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सुनार ने हाथ में गहने उठाकर कहा, इन्हें क्या देखूं।
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मैंने श्रद्धापूर्ण शब्दों में कहा- अब मैं आपको इसी नाम से पुकारूँगा।
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पिछली फ़सल के रखे थे, घड़ों में छिपा के।
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उस का इज़तिराब शबनम के उस क़तरे की तरह था जो पारा कर उस के बड़े से पते पर कभी इधर और कभी उधर लुढ़कता रहता है।
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चार से आठ बजे तक हाथ रोके बग़ैर, आराम का सांस लिए बग़ैर, वो जल्दी जल्दी काम करता।
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तलवों में भी घाव हो जाता है। ) की दवा, दियासलाई की डिबिया और किरासन तेल रहना चाहिए और, सचमुच हम जहां जाते, खाने-पीने की चीज़ से पहले ‘पकाही घाव’ की दवा और दियासलाई की मांग होती…1949…उस बार महानन्दा की बाढ़ से घिरे बापसी थाना के एक गांव में हम पहुंचे।
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ये पारो मुझे सताती क्यों नहीं है?
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गोधन चुपचाप पंचलैट में तेल भरने लगा।
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लड़का गीली गेंद को ज़रा-ज़रा उछालता हुआ, उन लोगों के पास ले आया।
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आखिर रग्घू ने हैरान होकर मुलिया से पूछा— कुछ मुँह से तो कह, चाहती क्या है?
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शायद इसलिए कि सुंदरलाल की अपनी बीवी अग़वा हो चुकी थी और इस का नाम था भी लाजो— लाजवंती।
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पहली बार आया है तो क्या?
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इसी समय सजीव शान्ति की प्रतिमा-सी एक निर्वसना-बालिका शून्यमना दो शवों के बीच खड़ी हुई चिदम्बर को दीख पड़ी।
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लेकिन वह किसी की मिन्नत नहीं करेगा।
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चमारिन लड़की को गोद में छोड़कर मर गयी।
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उसका खादी कुरता, गांधी टोपी, फटे-फटे चप्पल देखकर जी हिचकता है।
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जैसी मन में थी, वैसी रोशनी नहीं करा सका, अंग्रेजी बाजा भी नहीं आया, घर में औरतें बड़ी बिगड़ने लगीं, सब कुछ हुआ, फिर भी मेरा विचार है कि आज एक अपूर्व ज्योत्स्ना से हमारा शुभ समारोह उज्ज्वल हो उठा।
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रात में अंत की यातना में भी वह अपने झूले से उतरकर मेरे बिस्तर पर आया और ठंडे पंजों से मेरी वही उंगली पकड़कर हाथ से चिपक गया, जिसे उसने अपने बचपन की मरणासन्न स्थिति में पकड़ा था .
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आनंद के आँसू कोई भी रोक नहीं मानते।
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कभी कभी बहुत से उपलों की आँच में कुश्ते मारे जाते थे और काले तेल का ग़ुलाम बना हुआ लक्षमण, विष्णु के सैंकड़ों कामों के अलावा भट्टी में आग भी झोंका करता था।
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होली सोचती थी कल रसीला ने मुझे इसलिए मारा था कि मैंने उस की बात का जवाब नहीं दिया, और आज इसलिए मारा है कि मैं ने बात का जवाब दिया है।
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मालूम नहीं वो जन्नत से जहन्नम तक क्यों पहुंचना चाहती थी।
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कहकहे पर लगायी गयी इस ब्रेक का मतलब था कि कमिश्नर साहब अपने कमरे में तशरीफ़ ले आये हैं।
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नसीमा को रेशमी मलबूस पसंद नहीं थे।
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बूढा अब कुछ ज्यादा ही अपने आप में था, वह कभी मान सिंह की तरफ और कभी दायें-बाएं झाँक रहा था।
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अभी आख़िरी निवाला मैंने तोड़ा ही था कि पटवारी ने दरवाज़े पर दस्तक दी।
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" पी ई एन पेन-पेन माने कलम; एच ई एन हेन-हेन माने मुर्गी; डी ई ऐन डेन-डेन माने अँधेरी गुफा...
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मैं शहर के लड़के से शादी न करूँगी।
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इस तथ्य के परिचित होने के कारण ही मैंने बीच ही में उन्हें रोककर पूछा, “ मोर के बच्चे हैं कहाँ ?”' बड़े मियाँ के हाथ के संकेत का अनुसरण करते हुए मेरी दृष्टि एक तार के छोटे-से पिंजड़े तक पहुँची, जिसमें तीतरों के समान दो बच्चे बैठे थे।
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जीवन के सामान उसकी मृत्यु भी दैन्य से रहित थी।
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लाल होठों पर गोरस का परस! ...पहाड़ी तोते को दूध-भात खाते देखा है?
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मैं- आपने वही किया जो इस हालत में मैं भी करता बल्कि मैं तो पहले साहब पर ग़बन का मुकदमा दायर करता, बदमाशों से पिटवाता, तब बात करता।
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फिर उन लोगों से मिलके आये तुम्हे मैं देखूंगा और तुमसे उनकी बाते सुनुँगा तो आधा मेल मेरा भी हो जायेगा।" फिर अपने इलाके में उसकी दिलचस्पी बढाने के लिए उस से पूछा" तू कभी उधर गया है कि नहीं?"" नहीं अमृतसर से गुजरा हूँ,पर उस तरफ गया नहीं कभी!"" उधर बहुत से गुरद्वारे हैं-तरन तारन, खडूर साहिब, गोइंदवाल। सभी जगह माथा टेक आना, और मेरे घर भी हो आना।
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उस के घर पर हर वक़्त मौजूद रहने से ज़ुबेदा की हालत किसी क़दर दुरसत होगई, लेकिन उस को इस बात की बहुत फ़िक्र थी कि दुकान का कारोबार कौन चला रहा है।
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इसरानी के मुँह से निकला अरे काफ़ी की प्याली उस के हाथ से छूट कर फ़र्श पर जा गिरी।
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इसके अतिरिक्त परिश्रमी, तेजस्वनी और पति के प्रति रोम-रोम से सच्ची पत्नी को वह चाहता भी बहुत रहा होगा, क्योंकि उसके प्रेम के बल पर ही पत्नी ने अलगौझा करके सबको अँगूठा दिखा दिया।
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...कहीं कोई रोसनी नहीं, किससे पूछे?
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पान की दुकानों के सामने खड़े लोग चुपचाप, उत्कर्ण होकर सुन रहे थे …
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डिप्‍टी सेक्रेटरी जाइंट सेक्रेटरी के पास गया।
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चन्द्रु बहुत ख़ुश हुआ क्योंकि पारो और उसकी सहेलियाँ अब फिर उसे सताने लगी थीं।
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मैं लक्षमण की बहन हुई न। और एक कहने लगी।
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रात को जब जसवंत आया तो बातें कुछ खुलके होने लगी।
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मैंने समझाया कि किताब में दादी-दादा से भैया की इज्जत बहुत ज्यादा है;
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उनमें से एक के दिल में कुछ शुब्हा सा हुआ।
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मुहर पहनना मुझे अच्छा भी नहीं मालूम होता।
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इस की उम्र मुश्किल से पंद्रह सोला साल होगी।
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मैं ठेठ देहाती हो रहा था।
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“नहीं निकली?”
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केदार ने कहा — आज दोपहर को भी चूल्हा नहीं जला काकी!
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आज की रात। मिस हीरादेवी गुलबदन ...!' नौटंकीवालों के इस एलान से मेले की हर पट्टी में सरगर्मी फैल रही है।
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उस दिन फहीमन के कपड़े सिले थे।
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शहज़ादा सलीम ने ख़ास एहतिमाम कर लिया था कि फूल, अनार की कलियां हों वो धड़कते हुए दिल के साथ मसहरी की तरफ़ बढ़ा और दूल्हन के पास बैठ गया
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जिन लोगों का वाक़ई बहुत नुक़्सान हुआ था वो लोग गुम-सुम बैठे हुए थे।
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