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अपनी कन्या का, जिन्हें हम शास्त्रिणी जी लिखते हैं, नाम उन्होंने सुपर्णा रखा है। | 4 |
तभी तो तुम लोग जूतों में बैठने के लायक़ हो। | 2 |
मैंने पूछा। | 4 |
वो बोली: ये मिस्री मकई के भुट्टे हैं। | 2 |
मगर होनहार के सामने उसकी एक न चली। | 4 |
कजरी नदी की दुबली-पतली धारा तेगछिया के पास आ कर पूरब की ओर मुड़ गई है। | 1 |
शास्त्री जी के अदृश्य होने पर इशारे से पं. रामखेलावन जी को साथ लेकर वासस्थल की ओर प्रस्थान किया। | 4 |
उसके बाद से जितनी देर तक सो नहीं पाती है, उस समय का एक पल भी वह चुप्पी में नहीं खोती। | 1 |
मैंने पूछा। | 4 |
इस प्रकार के नीरव द्वन्द्व का गोपनीय आघात-प्रतिघात प्रकट संघर्ष की अपेक्षा कहीं अधिक कष्टदायक होता है, यह बात उन समवयस्कों से छिपाना कठिन है जो कि विवाहित दुनिया की सैर कर चुके हों। | 1 |
तुमने खान को दिए हैं। | 2 |
गांव के कई बीमारों को नाव पर चढ़ाकर कैंप में ले जाता था। | 1 |
बेचारी उसका दुलार करती है, खिलाती-पिलाती है यह उसी का फल है। | 1 |
पिछली बार जब गए थे तब उनकी बूढ़ी बुआ थीं, पर अब तो वे भी नहीं रहीं। | 1 |
अब उस में झुकने की ताब न थी कि फूंकें मार कर आग जला सके। | 4 |
चतुरी चमार डाकखाना चमियानी मौजा गढ़कला, उन्नाव का एक कदीमी बाशिंदा है। | 1 |
पकड़ ढीली पड़ते ही खरगोश का बच्चा मुख से निकल आया, परन्तु निश्चेष्ट-सा वहीं पड़ा रहा। | 1 |
इस का ज़िक्र उस ने अपनी माँ से न किया। | 4 |
दिन बदिन दुबली हो रही थी। | 1 |
तीन-चार मास में उसके स्निग्ध रोए, झब्बेदार पूंछ और चंचल चमकीली आंखें सबको विस्मित करने लगीं . | 1 |
रात के वक़्त रायता नहीं खाओ, तो अच्छा है। | 2 |
सुतीक्ष्ण, रक्त-लिप्त, अदृश्य दाँतों की लाल जिह्वा, योजनों तक, क्रूर; भीषण मुख फैलाकर, प्राणसुरा पीती हुई मृत्यु तांडव कर रही है। | 1 |
अपने साथी-संगियों का भी क्या भरोसा! हीराबाई मान गई। | 2 |
पर कुब्जा ने कोलाहल के साथ खोज-ढूँढ़ आरम्भ की। | 4 |
गंदुम के अलावा चावल बासमती, चुने, उड़द, मोटे माश और दूसरी इस क़िस्म की अजनास भी मौजूद थीं। | 1 |
पहले मिस्टर देश के बेताज बादशाहों की जय बुलाता था। | 2 |
यह बात उसके पिता को भी माननी पड़ेगी। | 4 |
आधे घंटे में सब सफ़ाया हो गया। | 4 |
आखिर एक दिन पन्ना ने जिद करके कहा -तो तुम न लाओगे? | 4 |
यह सब आप की ही तबियत से हो रहा है। | 2 |
श्रीकृष्णपुरी, पाटलिपुत्र कॉलोनी, बोरिंग रोड, इंडस्ट्रियल एरिया का कहीं पता नहीं…अब भट्टाचार्जी रोड पर पानी आ गया होगा !…छाती-भर पानी है। | 1 |
कभी उसके होंठ हिलते थे, और कभी सिर हिल जाता था। | 1 |
मैं थाने में रपट किये बिना न मानूँगा। | 2 |
मन में एक पीड़ा की लहर दौड़ गई। | 4 |
नामलगर ड्योढ़ी का जमाना! क्या था और क्या-से-क्या हो गया!' हिरामन गप रसाने का भेद जानता है। | 2 |
गाय की अभी कौन जल्दी है? | 2 |
बिना रोशनी की गाड़ी को पकड़ कर चालान कर देते हैं। | 1 |
टैगोर में हाँ, थोड़ी कविता ज़रूर थी। ” | 2 |
‘‘…पानी हमारे स्टूडियो की सीढ़ियों तक पहुच चुका है और किसी भी क्षण स्टूडियो में प्रवेश कर सकता है। ’’ | 2 |
उन्हें कोर्ट में यह पूछने के लिए बुलाया गया था कि उनका आम का बगीचा असहयोगियों का अड्डा कैसे और किसके हुक्म से बनाया गया। | 1 |
हरगोबिन का मन कलपने लगा- तब गांव में क्या रह जाएगा? | 4 |
कोतवाली में काम बहुत रहता है, बड़ा शहर है दिन भर काम करते-करते पिसे जाते हैं। | 3 |
साथ में कोतवाल आये, प्यादे आये, घुड़सवार आये! राजा ने तोते को चुटकी से दबाया। | 4 |
वह रह-रह कर वातावरण में कुछ सूँघता है, नाक सिकोड़ कर। | 1 |
उन्होंने उसी समय पोथी लिखनेवालों को बुलवाया। | 4 |
कितना सुन्दर संचालन है, कितनी सुन्दर व्यवस्था! लाखों सिर एक साथ सिजदे में झुक जाते हैं, फिर सबके सब एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते हें, और एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते हें, और एक साथ खड़े हो जाते हैं, कई बार यही क्रिया होती हे, जैसे बिजली की लाखों बत्तियाँ एक साथ प्रदीप्त हों और एक साथ बुझ जाऍं, और यही ग्रम चलता, रहे। कितना अपूर्व दृश्य था, जिसकी सामूहिक क्रियाऍं, विस्तार और अनंतता हृदय को श्रद्धा, गर्व और आत्मानंद से भर देती थीं, मानों भ्रातृत्व का एक सूत्र इन समस्त आत्माओं को एक लड़ी में पिरोए हुए हैं। | 1 |
दक्षिण-वाम दोनों पंखों में स्लेटी और सफेद आलेखन स्पष्ट होने लगे। पूँछ लम्बी हुई और उसके पंखों पर चंद्रिकाओं के इन्द्रधनुषी रंग उद्दीप्त हो उठे। | 1 |
ये सुर्ख़ सत लड़ी उस के गले में डाल दी और इस से कहा: तो आज रात-भर जागेगी। | 2 |
“ख़ैर!” उसने उठने की तैयारी में अपना हाथ आगे बढ़ा दिया, मैं अब आपसे इजाज़त लूँगा। | 4 |
तीसरा आदमी अहीर था। | 1 |
“तेरी साली तो बड़ी नमकीन है यार। बीवी भी चटपटी होगी। ” | 2 |
चाय है या जान! हीरा हँसते-हँसते लोट-पोट हो रही है-' अरे, तुमसे किसने कह दिया कि क्वारे आदमी को चाय नहीं पीनी चाहिए?' हिरामन लजा गया। | 2 |
सावित्री पागल-सी हो गई। | 4 |
कहकर वे स्वयं हँस पड़े। | 4 |
पहले कुछ परवाह न की। | 1 |
साल ही भर में एक लड़की की माँ हो गई। | 4 |
अब तक झूटी पत्तलों में चाट खिलाता रहा है।"" अरी उसके हात तो देखो..." पारो ने चमक कर चन्द्रु की तरफ़ इशारा किया। | 2 |
शंभूनाथ बाबू जब उठे तो मामा ने संक्षेप में ऊपर से ही उनको विदा कर दिया, गाड़ी में बिठाने नहीं गए। | 4 |
सड़क पर भी उसका एक मकान था। | 1 |
तोते को शिक्षा देने का काम राजा के भानजे को मिला। | 4 |
डरा, कहीं दवा के लिए न भेज दें। | 1 |
लाजो आई भी पर ना आई— और सुंदर लाल की शक्ल ही से जान पड़ता था, जैसे वो बीकानेर का सहरा फाँद कर आया है और अब कहीं दरख़्त की छाँव में, ज़बान निकाले हांप रहा है। | 1 |
" फौज में करम सिंह को सुबह उठने का बड़ा आलस्य है। | 2 |
वो भागते हुए ख़ूबानी के दरख़्त के क़रीब चले गए। जहां कशती बंधी थी। | 4 |
बनिये ने कहा- अगर मेरे बाँट रत्ती भर कम निकलें तो हजार रुपये डाँड़ दूँ। | 2 |
पन्ना— और बहू? | 2 |
उसने जल्दी से चेहरा अपने दोनों हाथों में छिपा लिया। | 4 |
“दे दे चम्मच, तुझसे कुछ भी नहीं कहेंगे, ” | 2 |
वो सब बची कुची चीज़ें, हलवा, दाल, तोड़े हुए लुक़्मे, पकोड़ियाँ, मिले हुए आलू मटर और चावल उस बिछी हुई चादर या एलूमीनियम के एक बड़े से ज़ंग-आलूदा तसले में डाल देते। | 1 |
लड़के का दिल मुलिया पर आया हुआ है, पर संकोच और भय के मारे कुछ नहीं कहता। | 2 |
बाग में आम पकना शुरू होने के पहले बच्चे दिनभर उसी के नीचे जमे रहते और धमाचौकड़ी मचाया करते। | 1 |
मेरे ख़्याल में, दूसरे ने क़ता कलाम करते हुए और लड़की के पेट में छुरा घोंपते हुए कहा, मेरे ख़्याल में इसे ख़त्म कर देना ही बेहतर है। | 4 |
वही अद्भुत मधुर स्वर और वही गीत की टेक' जगह है' क्षण-भर की भी देर न करके मां को लेकर डिब्बे में चढ़ गया। | 4 |
किंतु जिस प्रकार बंदूक की आवाज़ सुनते ही हिरन भाग जाते हैं उसी प्रकार उसे आते देख सब-के-सब उठ कर भागे। | 4 |
उसे निस्संकोच चलती- फिरती, उठती-बैठती, हँसती-बोलती देखकर माता हृदय के बोलवाले तार से कुछ और ढीली तथा बेसुरी पड़ गयी हैं। | 4 |
लछमन- और बछिया कैसी भागीं, सबकी सब दौड़ीं! केदार-काकी, रग्घू दादा दोनों गाड़ियाँ एक साथ खींच ले जाते हैं। | 1 |
देखा, उसमें कोई रंग न दीख पड़ा। | 1 |
नहीं, कभी नहीं। | 1 |
उसने सलाम करते हुए कहा,' चार आदमी के भात में दो आदमी खुसी से खा सकते हैं। | 2 |
हम दें। | 2 |
तो यहाँ ऐसी कच्ची नहीं हूँ। | 2 |
भोला फिर अपने बाबा का बन गया। | 4 |
हलवाई और नत्थासिंह अपने-अपने पत्ते हाथ में लिये थे। | 1 |
खेमे के पास पहुँच कर हिरामन ने लालमोहर को इशारा किया, पूछताछ करने का भार लालमोहर के सिर। लालमोहर कचराही बोलना जानता है। | 4 |
हमारे पास एक ही लालटेन है। | 2 |
नाच! लौटा दो गाड़ी!' चंपिया-ह! उठती क्यों नहीं? | 2 |
मैं जल्दी जल्दी मगर अपने नए जूते में दबती हुई एड़ी की वजह से लंगड़ाता हुआ भागा। | 4 |
चारों ओर धूप मनमनाती और फसल-कटे खेतों में रह-रहकर बगूले उठते। | 1 |
कभी कभी मुंशी करीम बख़्श के आम के बाग़ों का भी ज़िक्र आजाता था। | 1 |
मामा यदि मनु होते तो वे अपनी संहिता में हावड़ा के पुल को पार करने का एकदम निषेध कर देते। | 1 |
उसने एक ब्राह्मण से पूछा," ब्राह्मण देवता किधर जा रहे हो?"" हरिद्वा,। तीर्थ करने।"" हरिद्वार जा रहे हो कि पाकिस्तान जा रहे हो।"" मियां अल्लाह अल्लाह करो।" दूसरे ब्राह्मण के मुँह से निकला। | 2 |
उसकी गलौठी बाहर की निकली हुई थी। | 1 |
“रांड, आप मारे तो उस से भी ज्यादा, और जो बेटा कुछ कहे तो हमदर्दी जताती है, बड़ी आई है ”.... . | 2 |
यूनीयन बंक से घूम कर टेलीफ़ोन ऐक्सचेंज के पास पहुंचा। | 4 |
जाइंट सेक्रेटरी चीफ सेक्रेटरी के पास गया। | 4 |
इससे सिद्ध है, धर्म बहुत ही व्यापक है। | 1 |
ऐसा दिखाई देता था जैसे ऊषा ने अपने प्रकाश में स्नान किया है। | 2 |
मान सिंह ने जसवंत से पूछा। जसवंत इकदम ठिठक गया, जैसे कोई चोरी करते पकड़ा गया हो। | 4 |
मगर राखी?” “हाँ राखी की कहो. . | 2 |
डॉक्टर अब यहाँ से चला गया है ...। ” | 2 |
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