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गाँववाले समझे नहीं, दरोगाजी झंडे की तरफ जा रहे थे।
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लेकिन उसमें रहने का सुख बहुत दिन तक नहीं देख पाए थे।
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हीराबाई रेलगाड़ी से जा रही है?' हिरामन ने गाड़ी खोल दी।
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‘‘राम-राम भाई! कहो, कुशल समाचार ठीक है न?’’ ‘‘राम-राम भैया जी।
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और फिर मेघ जितना अधिक गरजता, बिजली जितनी अधिक चमकती, बूदों की रिमझिमाहट जितनी तीव्र होती जाती नीलकण्ठ के नृत्य का वेग उतना ही अधिक बढ़ता जाता और उसकी केका का स्वर उतना ही मन्द्र से मन्द्रतर होता जाता।
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तीसरे दिन मुलिया मैके से आ गयी।
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इस की पुतलीयों में चांद चमक रहा था और वो चांद हैरत और मुसर्रत से कह रहा था: इन्सान मर जाते हैं, लेकिन ज़िंदगी नहीं मरती।
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“कहते हैं आजकल किसी के पास पैसा ही नहीं रहा, ”
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तुलादान को आई हुई गंदुम पिसी।
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मुलिया— क्या कहती हूँ, कुछ सुनाई देता है, रोटी तैयार है, जाओ नहा आओ।
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जीने से आहट मालूम दी।
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गर्म गर्म पूरियों की सब्र-आज़मा ख़ुशबू उस के दिमाग़ में बसी जा रही थी।
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अब वही मेंढ़क की आवाज़ थी।
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उसने जरा ठिठककर उसे देखा और आगे बढ़ गया।
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उसने झोंट पकड़कर खींचते हुए कहा-“चल, सरकार बुलाती हैं। ”
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यहां हाई क्लास जुआ चलता है।
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बी०ए० पास थे।
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बड़ी कठिनाई से मैंने उसे थाली के पास बैठना सिखाया जहां बैठकर वह मेरी थाली में से एक-एक चावल उठाकर बड़ी सफ़ाई से खाता रहता .
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हम लोगों के वजूद ही से तो ये लोग जीते हैं।
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आदमी भगवान के घर से ही संवदिया बनकर आता है।
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अगर कोई फ़र्क़ है, तो महिज़ ज़ाहिरी सजाट या फिर चेहरे की ज़ाहिरी साख़त में! वहां लड़कीयां भारती हैं, यहां चीनी और कोई फ़र्क़ नहीं! ओह, मैं समझ गया, तुमको फ़ौरन माल पसंद है, एंबेसी रोड पर जो मेरा बुरा थल है, इस में बाहर का माल भी मिलता है।
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साहब ने तुरंत ही बाएं हाथ से उस अनाथ बालक को रोक लिया और बालक-' दीदी! दीदी!' चिल्लाता हुआ जोर-जोर से रोने लगा।
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उसके एक हाथ में पट्टी-बंधी हुई थी।
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" अगर सुपरिन्‍टेंडेंट साहब हुकम दें तो अभी पंद्रह बीस माली, चपरासी और क्‍लर्क जोर लगा के पेड़ के नीचे दबे आदमी को निकाल सकते हैं।"" माली ठीक कहता है।" बहुत से क्‍लर्क एक साथ बोल पड़े।
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अब उसके पास कोई जिस्म न था।
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मैं उन लोगों को चिट्ठी भेज दूंगा।" इसलिए अपनी छुट्टियाँ खत्म होने के पास आज वह तांगे पे बैठ कर करम सिंह के गाँव जा रहा था।
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अंदर मामा एक चारपाई पर लेटे थे।
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इस लम्हे वो निगाहें बहुत पाकीज़ा थीं।
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वकालत करके उन्होंने बहुत-सा रुपया कमाया, भोग करने का उन्हें पल-भर भी समय नहीं मिला।
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वकील जमीन पर या ताक पर हो नहीं बैठ सकता।
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“बताओ, तुम्हारी मर्ज़ी किया है ?” “ अगर आप ठंडे दिल से सुनें तो मैं अर्ज़ करूं। ”
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कलकत्ता के बाहर बाकी जितनी दुनिया है, सबको मामा अंडमान द्वीप के अंतर्गत ही समझते थे।
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लेकिन अटारी पहुंच कर तो मुसलमानों की इतनी लाशें हिंदू मुहाजिर ने देखीं कि उनके दिल फ़र्त-ए-मसर्रत से बाग़ बाग़ हो गए।
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' तेरे पिताजी को मैंने भेजा था, वह परसों देखकर लौटे हैं।
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लक्षमण ने कुएँ में से पानी की सत्रहवीं गागर निकाली।
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पर करें तो क्या करें?
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हवा से तरंगायित अशोक के रक्तिमाभ पत्तों में तो वह मूंगे के फलक पर मरकत से बना चित्र जान पड़ता था।
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क्लास में पढ़ती है।
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अलबत्ता शुरू शुरू में एक दफ़ा सुंदरलाल ने लाजवंती के सियाह दिनों के बारे में सिर्फ इतना सा पूछा था —
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मगर लड़कों को तो चन्द्रु डाँट देता और वो जल्दी से भाग जाते।
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बच्चे छोटे हैं।
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मैंने आहिस्ता से क्षति खोली।
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अचानक पारो की निगाहें नए ठेले वाले की तरफ़ उठीं।
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एक करूण गीत की भूली हुई कड़ी फिर उसके कानों के पास गूंजने लगीः ‘‘पैयां पड़ूं दाढ़ी धरूं....
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उनको विदा करने में अवर पक्ष का जो नाकों-दम होगा उसका स्मरण करके मामा के साथ स्वर मिलाकर मां खूब हंसी।
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पुल के किनारे किनारे बादाम के पेड़ों की शाख़ों पर शगूफ़े चमकने लगे थे।
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उसकी गाड़ी पर' बिदागी' ( नैहर या ससुराल जाती हुई लड़की ) है।
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‘बुलाना चाहती हो, बुला लो; मगर फिर यह न कहना कि यह मेहरिया को ठीक नहीं करता, उसका गुलाम हो गया। ’
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इतनी भारी कि बेचारे अल्ला रखे के लिए उसमें सांस लेना भी कठिन हो गया था।
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आज-कल स्त्रियों को कुटुम्ब को कुटुम्ब में मिल-जुल कर रहने की जो अरुचि होती है, उसे वह जाति और देश दोनों के लिए हानिकारक समझते थे।
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इस साल आखिरी नाच है। .. .
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एक और लहर उमड़ती आ रही थी।
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वो फिर ज़ोर ज़ोर से हँसने लगी। वो मुझसे मिलने के लिए आया था, उसी रोज़ तुम भी आने वाले थे।
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जान पड़ता था, उसके पैरों में पर लग गये हैं।
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मोहन! ये आम बाबूजी दे गए हैं, ले जाओ। तकवाहा बाजार गया है।' मोहन बाग की ओर चला। नजदीक गया तो सुपर्णा हंसने लगी,' कैसा धोखा देकर बुलाया है?
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माँ ने कहा। इतने बड़े सेठों का लड़का आवे तुझे बुलाने के लिए और तो यूँ पड़ रहे...
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वो जो फैसला देंगे वही सबको मंजूर होगा।
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घरों के बर्तन, आलमारियां रसोई घर और परछतियों में से निकलकर सरकारी दंफ्तरों के सामने पड़ी हुई थीं।
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दर-अस्ल बाबू को भूक लग रही थी।
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कुत्ते भाषा नहीं जानते ध्वनि पहचानते हैं।
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सूरदास के गीतों को सुनकर उसका जी स्थिर हुआ, थोड़ा-
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यहाँ भी तख्त-हजारा बनानेवाला माली का बेटा राम है।
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गोपू की हालत और भी ज़्यादा खराब हो गयी थी।
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असल में हर चीज उलट-पुलट गयी थी और अपनी पुरानी हालत में आने का यत्न कर रही थी।
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बाहर देख! साले!
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बहुत शरीफ़ और मुहब्बत करने वाला साबित हुआ।
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मोरनी राधा जैसी ही थी।
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“बस जी पाँच मिनट में लेकर आ रहा हूँ, ”
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काऊ देवी से ब्याह करवाने का मेरा ज़िम्मा। सारा ख़र्च मैं अपनी गिरह से दूँगी। ” अब लक्षमण के पाँव ज़मीन पर न पड़ते थे।
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रे घोड़े, मामूँ जी के देस।
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देखो, तुम्हारे लिए भी पास दिया है, पास ले लो अपना, तमासा देखो।' लालमोहर ने कहा,' लेकिन एक सर्त पर पास मिलेगा।
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गर्मियों में जब मैं दोपहर में काम करती रहती तो गिल्लू न बाहर जाता न अपने झूले में बैठता .
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फिर वो आप ही आप हंस दी।
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राधाकृष्ण जी की यही तो एक लड़की थी।
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अभी-अभी बलमपुर के बाबू की संपनी गाड़ी मोहनपुर होटिल-बँगला से हाकिम साहब को लाने गई है।
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बौड़म- इसलिए कि कटोरे में वही आधा पाव घी है जिसके विषय में आप कहते हैं कि बनिये ने कम तौला। घी वही है।
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1 आज मेरी आयु केवल सत्ताईस साल की है।
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ज्यों-ज्यों विवाह की तिथि नजदीक आती, गौरी की चिंता बढ़ती ही जाती थी।
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तब क्या उस घर में विवाह हो रहा है, और हो रहा है तो किसका?
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एक काम करता है दूसरा काम करने पर मजबूर करता है।
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लाजो— लाजो भाबी— मगर हमारी फ़ौज के सिपाहियों ने हमें ही मार मार के भगा दिया। और लाल चंद अपनी कोहनी दिखाने लगा, जहाँ उसे लाठी पड़ी थी।
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' लिली के साथ!'' पद्मा स्वर में काँप गयी।
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खूब मोहना जानता है उत्ता जरा-सा लड़का।
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कल तक पूरी ना थी, आज पूरी है।
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ख़ामोश, चुप-चाप और जिसके पास कभी कुछ न हुआ था वो अपनी लाखों की जायदाद खोने का ग़म कर रहा था और दूसरों को अपनी फ़र्ज़ी इमारत के क़िस्से सुना सुना कर मरऊब कर रहा था और मुसलमानों को गालियां दे रहा था।
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“बच्चे बड़े शरीर हैं, ये हरकत उन्ही की होगी। ”
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वे बिना जन्मपत्री मिलवाए विवाह नहीं करना चाहतीं।
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मेरे साथ बैठने का अर्थ वे तुरंत समझ गये कि वह पाकिस्तान छोड़ कर हिंदुस्तान जा रहा है।
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रोग से छुटकारा मिलने पर नीलमणि ने करुण स्वर में कहा-" दीदी! घर चलो।" वहां अपने साथियों से खेलने के लिए उसका जी मचल रहा है।
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सुनकर मां और मैं दोनों ही चौंक पड़े।
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“हुज़ूर ऐसा कभी हो सकता है ....... .
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देखते ही देखते अमराई में लाठियाँ बरसने लगी।
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तुम हिमालय की तरह अटल हो, मैं भी वर्तमान की तरह सत्य और दृढ़।'' रामेश्वरजी ने कहा,'' तुम्हें इसलिए मैंने नहीं पढ़ाया कि तुम कुल-कलंक बनो।'''' आप यह सब क्या कह रहे हैं?'''' चुप रहो। तुम्हें नहीं मालूम?
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उस से भी एक क़दम आगे बढ़ कर बड़े ठंडे दिल से ताजिर, इन्सानी माल, इन्सानी गोश्त और पोस्त की तिजारत और उस का तबादला करने लगे।
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प्रात:काल पानी का घड़ा लेकर चलती, तब उसका गेहुँआ रंग प्रभात की सुनहरी किरणों से कुंदन हो जाता, मानों उषा अपनी सारी सुगंध, सारा विकास और उन्माद लिये मुस्कराती चली जाती हो।
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उधार बिक्री की वसूली और पूँजी की किल्लत के कारण दुकान कभी पनप नहीं पाई थी।
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अपनी अज़मत और बाबू के सादा और बोसीदा, टाट के से कपड़ों को देख कर वो शायद उस से नफ़रत करने लगा था।
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..अन्न-जल मिले चाहे न मिले। ” उसका स्वर कुछ ऐसा था जैसे मुझसे उसे कोई पुराना गिला हो।
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बात उनकी बैठक में चली।
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चंपिया, बाँध दे बागड़ को। खोल दे गले की घंटी! हमेशा टुनुर-टुनुर! मुझे जरा नहीं सुहाता है!'' टुनुर-टुनुर' सुनते ही बिरजू को सड़क से जाती हुई बैलगाड़ियों की याद हो आई-' अभी बबुआनटोले की गाड़ियाँ नाच देखने जा रही थीं .. .
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