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चारों ओर शोर-कोलाहल-कलरव-चीख़-पुकार और पानी का कलकल रव। लहरों का नर्त्तन।
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सभी को, कि गाँव-घर में यह बात एक पंछी भी न जान पाए।' लालमोहर ने उत्तेजित हो कर कहा,' कौन साला बोलेगा, गाँव में जा कर?
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वहां कोई बैठा थोड़ी है कि रोक देगा –
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मैंने काबुली से कहा," इसे यह सब क्यों दे दिया?
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वैसे अल्लाह का दिया बहुत कुछ है मेरा हाथ उन्हों ने कभी तंग होने नहीं दिया ”
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केवल चिट्ठी लिखने का ज्ञान न होने के कारण एक क्रिय होकर भी भिन्न फल है—वे पत्र और पुस्तकों के संपादक हैं, यह जूतों का।
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सुबह होते ही मेरे दिल में ख़याल आया कि भोला सोचता होगा कि कल रात बाबा ने मेरी बात किस तरह बर्दाश्त की?
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चुनांचे उस ने ज़ुबेदा से पूछा “ये नोट दूध की पतीली में किस ने डाले हैं? ”
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मामा उसे बता रहे थे कि कस्बे में आँख के एक डॉक्टर का कैंप लगा था तो वहाँ उन्होंने एक आँख का ऑपरेशन किया था।
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ऊपर काला आभास देनेवाले भूरे पीताभ रोम, बुद्धिमानी का पता देनेवाली काली पर छोटी आँखें, सजग खड़े कान और सघन, रोयेंदार तथा पिछले पैरों के टखनों को छूनेवाली लम्बी पूँछ, सब कुछ उसे राजसी विशेषता देता था।
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वो बस स्टैंड के पास खड़ी ए रूट वाली बस का इंतिज़ार कर रही थी उस के पास कई मर्द खड़े थे उन में एक उसे बहुत बुरी तरह घूर रहा था उस को ऐसा महसूस हुआ कि ये शख़्स बर्मे से इस के दिल-ओ-दिमाग़ में छेद बना रहा है।
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उसमें आपकी गवाही होगी।
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ये सस्ता किस्म का होटल था।
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घर में कोई भी नहीं था।
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इस अप्रत्याशित अनुग्रह ने उसे पैरों में जो पंख लगा दिये थे, वे गाँव की सीमा में पहुँचते ही झड़ गये।
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ये लो आर्डर की कॉपी।"" मगर मुझे इस पेड़ के नीचे से तो निकालो।" दबे हुए आदमी ने कराह कर कहा।
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उगटन माने उबटन- जो देह में लगाते हैं।' हिरामन ने विस्मित हो कर कहा,' इस्स!' ...सो रोने-धोने से क्या होए! सौदागर ने पूरा दाम चुका दिया था महुआ का।
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मैं तो घर-बार बेच दूं...
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उसका बाप दारू-ताड़ी पी कर दिन-रात बेहोश पड़ा रहता।
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उन की उभरी हुई तोंद के नीचे पतली सी धोती में लंगोट, भारी भरकम जिस्म पर हल्का सा जनेऊ, लंबी चोटी, चंदन का टीका देख कर बाबू जलता था, और भला ये भी कोई जलने की बात थी।
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उसके माथे से बहकर पसीना उसके होंठों पर आ रहा था, लेकिन उसे पोंछने की फुरसत नहीं थी।
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रूप भी कम बड़ी वस्तु नहीं है, किंतु मनुष्य में जो अंतरतम और अनिर्वचनीय है, मुझे लगता है, जैसे कंठ-स्वर उसी की आकृति हो।
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अब श्रीकंठ का हृदय भी पिघला।
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बड़े खरगोश सभ्य सभासदों के समान क्रम से बैठकर गम्भीर भाव से उनका निरीक्षण करने लगे।
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यह भी मेरे बौड़मपन में दाखिल है।
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ज्यों−ज्यों अल्लारखा सामान के नग उठा−उठा कर ले जा रहा था, आसपास खड़े दर्शकों का क्रोध बढ़ता जा रहा था, कभी वे आपस में लड़ने लग जाते,' तुमसे कहा था कि न कि इसको भी ठिकाने से लगा दो।
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आज कश्मीर की बिहार की पहली रात है।
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बड़े होने पर देखा कि वह अपनी माँ के समान ही विशिष्ट है।
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साथ ही उसकी आँखें झपकीं और उसके दो-एक दाँत बाहर दिखाई दे गये।
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मैं दूसरे का नौकर ठहरा घर पर रहता नहीं।
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शाम को बाबू घर आया तो उसे हल्का हल्का तप था, जो कि बढ़ता गया।
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‘‘लौटा ले भैया। आगे बढ़ने की ज़रूरत नहीं। ’’
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आखिरी फेरे में उसकी पत्नी को भी मैं साथ ही ले आया।
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रग्घू— कहाँ उठ गये?
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इन समस्त विघ्न-बाधाओं से उसके लिए कोई पनाह थी, तो वह यही तोता था।
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एक दिन तुम ज़रूर इस बात की क़ाइल हो जाओगी कि मर्द औरत के लिए लाज़िमी है इस के बग़ैर वो ऐसी गाड़ी है जिस के पहिए न हों मेरी शादी को एक बरस हुआ है
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मेरे पास बहुत से पशु-पक्षी हैं और उनका मुझसे लगाव भी कम नहीं है, परंतु उनमें से किसी को मेरे साथ मेरी थाली में खाने की हिम्मत हुई है, ऐसा मुझे स्मरण नहीं आता .
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कुछ देर बाद एक नंग-धड़ंग बच्ची कटोरी में कुछ लेकर खाती हुई घर से बाहर निकली थी।
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मेरी दिलचस्पी उसकी वर्तमान हालत में थी।
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वह किसलिए आया था?
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आज अमराई में ठाकुर साहब के भी घर की स्त्रियाँ और बच्चे थे और गाँव के भी प्रायः सभी घरों की स्त्रियाँ बच्चे और युवक त्योहार मनाने आए थे।
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जो मन की पीड़ा को स्पष्ट रूप में कह नहीं सकता, उसी को क्रोध अधिक आता है।
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पत्र पढ़ने के साथ ही सीताराम को यह समझने में देर न लगी कि यह विवाह न करने का केवल बहाना मात्र है, किन्तु फिर भी उन्होंने जन्मपत्री भेज दी।
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सामने फ़ुटपाथ को पारकर अब पानी हमारे पिछवाड़े में सशक्त बहने लगा है।
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रामखेलावन जी के जीवन में एक सुधार मिलता है।
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गाँठ से साढ़े तीन रुपये लग गये, जो अब पेट में जाकर खनकते भी नहीं! जो तेरी करनी मालिक! ” “इसमें मालिक की क्या करनी है? ”
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जाते समय सीताराम जी को पक्का विश्वास था कि विवाह होगा, केवल तारीख निश्चित करने भर की देर है।
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हमारा विभाग किसी भी हालत में इस फलदार पेड़ को काटने की इजाजत नहीं दे सकता।"" अब क्‍या किया जाए?" एक मनचले ने कहा-" अगर पेड़ नहीं काटा जा सकता तो इस आदमी को काटकर निकाल लिया जाए!
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सांस लेने में उस को बड़ी दिक़्क़त महसूस होने लगी, सर बहुत ज़ोर से चकराने लगा।
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तुम्हारा बेटा।
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नाव पर अकेला ट्रांज़िस्टर था जो पूरे दम के साथ मुखर था –
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मेरे नहीं, मेरे पिताजी के बल्कि उनके पूर्वजों के भी मकान के पिछवाडे़ कुछ फासले पर, जहाँ से होकर कई और मकानों के नीचे और ऊपरवाले पनालों का, बरसात और दिन-रात का शुद्धाशुद्ध जल बहता है।
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“मैं ने लाजो भाबी को देखा है। ”
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शहरवाली बात! तिस पर बाँस का अगुआ पकड़ कर चलनेवाला भाड़ेदार का महाभकुआ नौकर, लड़की-स्कूल की ओर देखने लगा।
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पर वे प्राय: कुछ अंगूर और सेब लेकर वहाँ हो आती थीं।
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इस की सारी ख़ुशीयां और ग़म देखे हैं।
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बटवारा हुआ और बेशुमार ज़ख़्मी लोगों ने उठ कर अपने बदन पर से ख़ून पोंछ डाला और फिर सब मिलकर उनकी तरफ़ मुतवज्जो हो गए जिनके बदन सही ओ सालिम थे, लेकिन दिल ज़ख़्मी— गली गली, मोहल्ले मोहल्ले मैं “फिर बसाओ” कमेटियाँ बन गई थीं और शुरू शुरू में बड़ी तुन्दही के साथ “कारोबार में बसाओ”, “ज़मीन पर बसाओ” और “घरों में बसाओ” प्रोग्राम शुरू कर दिया गया था।
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शास्‍त्री जी ने कई बार पढ़ा और पत्‍नी को सती समझकर मन-ही-मन प्रसन्‍न हुए।
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अब घाट आ चुका था जहाँ से मर्द और औरतें अलाहदा होती थीं।
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आनंदी एक बड़े उच्च कुल की लड़की थी।
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इसी से उस पेड़ का नाम सियरखौववा पड़ गया था।
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आई बैसाखी जटा लाए हे हे।
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बड़ी बेटी ने। हिरामन होशियार है।
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एक मेले शमादान के क़रीब सुर्मा पीसने का खरल रक्खा हुआ था।
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एक साल बाद फिर लोगों के बदन गुनाहों से आलूदा हो जाते हैं, फिर गहना जाते हैं।
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आप इतनी बड़ी बात राजेन्द्र को उसके सामने कह सकते हैं?
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पूछा, तुम्हारा नाम क्या है, बेटी?
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इससे लोग नाराज हो गए थे।
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सावित्री हताश हो गई और फूट-फूटकर रोने लगी।
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यहां पर बादाम के पेड़ों की क़तार ख़त्म हो गई।
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बीवी, शारदा बहुत ही घरेलू और सीधी साधी औरत थी।
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मारे रंज के उनका सिर दुखने लगा था।
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महमूद को आज ज्ञात हुआ कि वह अच्छा डाक्टर है। उसको ऐसा मरहम मिला गया है जिससे वह टूटी टॉँग को आनन-फानन जोड़ सकता हे।
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बगल में एक पुराना पछरिया कोल्हू था जो उस घर की पुराने दिनों से चली आ रही संपन्नता की याद दिलाता था।
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सारे भारतवर्ष में समराग्नि धधक रही थी।
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फूलों से सजी हुई मसहरी पर दूल्हन घूंघट काढ़े रेशम की गठड़ी सी बनी बैठी थी।
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मित्रवर आवाज देते हुए जीने पर चढ़े।
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बिलआख़िर सर झुका कर चन्द्रु ने अपनी ग़लती तस्लीम करली और ये गोया एक तरह पिछली तमाम ग़लतीयों की भी तलाफ़ी थी।
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चोरी करना और जेब काटना तो इन लोगों का धन्धा ही है।
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कंठ सूख रहा है।
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' बंधी तो नहीं थी, वे तो ऐसे ही रखी थीं।'' वह नहीं आ सकतीं अब। जहां मकान और ऐसा ही और सामान रह गया है वहां वह भी रह जाने दे। बैठा जा चलें।' अल्लारखा ने ठीक कहा, उन्हें लाना अब बहुत खतरे वाला काम था।
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विवाह करने वाले जमींदार साहब हैं।
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न बाबू को सुखी के बुलाने की जुर्रत पैदा हुई, न सुखी को बाबू के बुलाने की।
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“पाँच कैसे हैं? ”
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बिलकुल अपने बड़े भाई की मानिंद” “जी हाँ ज़रूर होगा
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" अपने पिता जी पास चलोगे?
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लड़की की अपेक्षा लड़की के पिता की जानकारी ही उनके लिए महत्वपूर्ण थी।
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रात चाहे उजाली हो चाहे बादल गरज रहे हों, चाहे आंधी चल रही हो, उसके चक्कर को विराम नहीं था।
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उसके सिर का झालरदार साफा खुरच दिया गया है।
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“ख़ामोश! ख़ामोश! और नारायण बावा की महीनों की कथा अकारत चली गई।
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मैं उस आदमी को ध्यान से देख रहा था।
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ज़ोर से बाबा कह चुकने के बाद वो काठ गोदाम मंडी की बोरियों के पीछे या उस की तंग-गलियों में ग़ायब हो जाते।
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" शशि ने उत्तर दिया-" मैं अपने पति के घर लौट जाऊंगी, मेरी कुछ फिक्र नहीं है।" साहब मुस्कराया और ताबीज बंधे और दुबले-पतले, गंभीर स्वभाव वाले काले रंग के उस दुखी अनाथ बालक को अपने पास रखने को तैयार हो गया।
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मैं आसमान पर सितारों को देखने लगा।
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अज़-बैक आगे गुज़र जाता है और नाक़ाबिल-ए-क़ुबूल औरत एक एतिराफ़ शिकस्त, एक इन्फ़िआलियत के आलम में एक हाथ से इज़ारबंद थामे और दूसरे से अपने चेहरे को अवाम की नज़रों से छुपाए सिसकियां लेती है— —
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माली ने फिर कहा" तुम्‍हारा यहां कोई वारिस हो तो मुझे उसका अता-पता बताओ।
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उसकी मर्यादा का विचार तो करना ही होगा।
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घर पहुंचकर नीलमणि ने साहब के साथ अपने इस परिचय की बात खूब उत्साह के साथ दीदी को बताई।
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वह रात-दिन एक प्रकार की अव्यक्त पीड़ा से विकल-सी रहती।
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मेरे साथी ने बताया था कि यह जीनियस है और मैंने सहज ही इस बात पर विश्वास कर लिया था।
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