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हँसकर राजेन्द्र ने कहा,'' यही तुम अंगेजी की एम.ए. हो?
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ऐसे नरम-ओ-नाज़ुक भुट्टे इस धरती ने उगाए थे और मैं ना था।
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ठाकुर साहब तुरंत कोर्ट से बाहर हो गए।
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मेरी पढ़ाई-लिखाई उसी जमीन की उपज से चलती है।' ... और भी कितनी बातें।
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सिर हिलाकर कहा- चलो। देखिए, बाबा विश्‍वनाथ ही हैं।
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एक दिन उसके अपत्यस्नेह का हमें ऐसा प्रमाण मिला कि हम विस्मित हो गए।
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इस शास्‍त्र पर जितनी पुस्‍तकें हैं, पूर अध्‍ययन के लिए पूरा मनुष्‍य-जीवन थोड़ा है।
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मुलिया ने धरती को सम्बोधित करके कहा — मैं कुछ नहीं चाहती, मुझे मेरे घर पहुँचा दो।
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एक दिन मैं कॉलेज जा रहा था।
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एलान कर रही है, जो आदमी तख्तहजारा बना कर ला देगा, मुँहमाँगी चीज इनाम में दी जाएगी।
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हाय! इस की सांस तेज़ी से चल रही थी, फिर रुक जाती, फिर तेज़ी से चलने लगती।
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वो भी हिन्दोस्तान के बैंक का। कितनी रक़म चाहिए?
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एक महीना पहले से ही मैया कहती थी, बलरामपुर के नाच के दिन मीठी रोटी बनेगी, चंपिया छींट की साड़ी पहनेगी, बिरजू पैंट पहनेगा, बैलगाड़ी पर चढ़ कर- चंपिया की भीगी पलकों पर एक बूँद आँसू आ गया।
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“कौन है वो? क्या नाम है उस का?” “सीमा मेरे साथ कॉलिज में पढ़ती थी। ”
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ऐसे ख़्वाब देख देख कर उस का दिल-ओ-दिमाग़ ग़ैर मुतवाज़िन होगया ........ .... .
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जरा सुनूँ, आज त्योहार के दिन लड़के मेला देखने न जायेंगे?
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भैया समझते थे कि हम लोगों से अलग होकर सोने और ईट रख लेंगे।
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रेलगाड़ी में सो रहा था।
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साथ ही याद आ जाते विनयी, नम्र और सादगी की प्रतिमा सीताराम जी।
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यही है मौका अपनी गाड़ी बनवाने का।
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मोहन शिष्‍ट था, पर अपना आसन न छोड़ता था।
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...गाँव में एक पंछी भी नहीं है।
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यक़ीनन सिद्धू ऐसा अहमक़ नहीं है कि उसका ऑप्रेशन करवाए।
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कमेटी का जुलूस मंदिर के पास रुक चुका था और लोग रामायण की कथा और श्लोक का वर्णन सुनने के लिए ठहर चुके थे।
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भाभी ने कुछ बनाया ही
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वो दिल मसूस कर रह गया।
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मैं लाख चेष्टा करूँ फिर भी उसकी बराबरी तक नहीं उठ सकता।
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होंठों पर एक स्थायी मुस्कराहट दिखाई देती थी, फिर भी चेहरे का भाव गम्भीर था।
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घर के अंदर पैर रखने में हृदय धड़कता था।
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बिरजू का भी दिल भर आया।
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कोई दूसरा उस का ठिकाना भी नहीं था।
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करम सिंह के बारे में एक खास बात ये थी कि उसकी ज़ुबान में बड़ा रस था।
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लक्षमन— तो अब हमको कोई मारेगा, तब भी दादा न बोलेंगे?
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जिस समय लालबिहारी सिंह सिर झुकाये आनंदी के द्वार पर खड़ था, उसी समय श्रीकंठ सिंह भी ऑंखें लाल किये बाहर से आये।
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अगर तुम्हारा जूता देना अर्ज होगा तो इसी तरह पुश्त-दर-पुश्त तुम्हें जूते देते रहने पड़ेंगे। ’
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पर जहां उसके पति शयन किया करते थे, उस स्थान पर दोनों बांहें फैलाकर वह औंधी पड़ी रही और बारम्बार तकिए को छाती से लगाकर चूमने लगी, तकिए में पति के सिर के तेल की सुगन्ध को वह महसूस करने लगी और फिर द्वार बन्द करके बक्स में से पति का एक बहुत पुराना चित्र और स्मृति-पत्र निकालकर बैठ गई।
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गेंद उछालने की प्रतियोगिता समाप्त हो गयी थी।
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और फिर कभी सब्र और कभी तुनक-मिज़ाजी से वो बाबू सुंदर लाल का प्रोपगेंडा सुना करते।
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उनके चारों ओर स्त्री-पुरुष होते थे।
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लक्षमण ने रेशमी पटका बाँधा।
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इसके बाँटों की आज जाँच करानी चाहिए।
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इसके सिवा आप जो दंड देंगे, मैं सहर्ष स्वीकार करूँगा।
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देखते-देखते क्या से क्या हो गया?
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विपत्ति अपना सारा दलबल लेकर आये, हामिद की आनंद-भरी चितबन उसका विध्वसं कर देगी।
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यहाँ यह भी बौड़मपन में दाखिल है।
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दो-एक व्यक्ति पगडिय़ाँ सिर के नीचे रखकर कम्पाउंड के बाहर सडक़ के किनारे बिखर गये थे।
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हरगोबिन ने अपना परिचय दिया, तो उन्होंने सबसे पहले अपनी बहिन का समाचार पूछा, ’’दीदी कैसी हैं ?’ ’
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बूढ़ी माता चुप रही। हरगोबिन बोला, ‘‘छुट्टी कैसे मिले! सारी गृहस्थी बड़ी बहुरिया के ऊपर ही है। ’’
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झील का पानी बार-बार किनारे को चूम रहा था।
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पुल के ऊपर और उसके दोनों ओर नदी के पाट पर अभी भी कुहरा छाया था जिसे काटकर गाड़ी कब आगे बढ़ गई, पता ही नहीं चला।
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उसके सभी साथी साहब को देखकर दूर हट गये।
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उमदाँ, जमादारनी के क़रीब ही बैठी थी।
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फिर मैंने उस के होंट चूमे और लाखों मंदिरों, मस्जिदों और कलीसाओं में दुआओं का शोर बुलंद हुआ और ज़मीन के फूल और आसमान के तारे और हवाओं में उड़ने वाले बादल सब मिल के नाचने लगे।
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अनाज रखा है क्या?” होली डरते डरते बोली “हाँ हाँ .....
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यहाँ डाल के आम खट्टे होते हैं, थोपी होती है, मुँह फदक जाता है, वहाँ पाल के आम आते हैं। ’
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जिस दिन वो नहीं आती थी हालाँकि उस दिन भी उसकी गाहकी और कमाई में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था मगर जाने क्या बात थी चन्द्रु को वो दिन सूना सूना सा लगता था।
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पौने आठ बजे के क़रीब एक टेन्डल आया और होली से टिकट मांगने लगा।
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बाबू भी शामिल हुआ।
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मन से अपराध की छाप मिट गयी, माता की वात्सल्य-सरिता में कुछ देर के लिए बाढ़-सी आ गयी, उठते उच्छ्वास से बोली,'' कानपुर में एक नामी वकील महेशप्रसाद त्रिपाठी हैं।'''' हूँ'' एक दूसरी तस्वीर देखती हुई।
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बरखी से पहले मंजूर न करेंगे।
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कभी घंटा भर, कभी दो घंटे, कभी तीन घंटे मेरी आँखों से आँसू जारी रहते हैं।
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कहाँ गई?
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हिरामन ने लालमोहर से पूछा,' तुम कब तक लौट रहे हो गाँव?' लालमोहर बोला,' अभी गाँव जा कर क्या करेंगे?
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यहाँ आ जा बिरजू, अंदर। तू भी आ जा, चंपिया! ... भला आदमी आए तो एक बार आज!' बिरजू के साथ चंपिया अंदर चली गई।
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जान बचा कर अल्ला रखे को अब अपनी जान संभालनी मुश्किल पड़ रखी थी।
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जरा अपना मुँह तो देखो, कैसी सूरत निकल आयी है।
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देखा कि इस नई मित्रता में बंधी हुई बातें और हँसी ही प्रचलित है।
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वह अब बदले हुए स्वर में मुझसे बोली, “आपको कोयला तो नहीं चाहिए? ”
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गांव की लक्ष्मी ही गांव छोड़कर चली आवेगी! ...किस मुंह से वह ऐसा संवाद सुनाएगा?
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वो एक दम चुप हो गई।
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घुमाते ही लुढ़क जाऍं।
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मेरा जी ही लज्जत और शौक से फिर गया है।
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रग्घू की उम्र उस समय केवल दस वर्ष की थी।
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फिर बड़े जोर-शोर से मातम हुआ और वकील साहब की अस्थि घूरे पर डाल दी गई।
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तब मुझे कुछ मालूम न था।
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मुलिया— ऐसी औरत कहाँ मिलेगी?
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सब बोले, देखें, लड़की का विवाह कैसे करते हैं।
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मुझ पर कुछ एहसान नहीं करतीं, फिर मुझ पर धौंस क्यों जमाती हैं?
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कोई मुझे यह मंतर बता दे तो एक जिनन को खुश कर लूँ।
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जल्दी-जल्दी बैलों को सानी-पानी दे दें।
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चौपाटी का मैदान काफ़ी खुला है, और जब समुद्र भाटे पर हो, तो और भी खुला हो जाता है।
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मैं यह तय नहीं कर सका कि उसने कर्तार को निर्दोष बताने की कोशिश की है, या कर्तार की ज्ञानशक्ति पर सन्देह प्रकट किया है!
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यदि उसे किसी बात पर झिड़क दिया जाता तो बिना बहुत मनाये वह मेरे सामने ही न आता।
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हर कमरा एक मर्कज़ी हाल में निकलता जिसमें चंद चीनी साज़िंदे बैठे थे और एक चीनी रक़ासा ठुमक ठुमक कर नाच रही थी।
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हीराबाई ने अपने हाथ से उसका पत्तल बिछा दिया, पानी छींट दिया, चूड़ा निकाल कर दिया।
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गांव के लोगों की गलत धारणा है कि निठल्ला, कामचार और पेटू आदमी ही संवदिया का काम करता है।
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थोड़ी देर के बाद मुस्लिम ख़िदमतगार मेरे डिब्बों की तलाशी लेने लगे और ज़ेवर और नक़दी और दूसरा क़ीमती सामान मुहाजिरीन से ले लिया गया।
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वो हिंदू और मुस्लमान की तहज़ीब के बुनियादी फ़र्क़— दाएँ बुकल और बाएँ बुकल में इम्तियाज़ करने से क़ासिर रही थी।
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मुलिया का मन कभी उसकी ओर इतना आकर्षित न हुआ था।
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मुझे अपना तो कुछ ख़याल नहीं, लेकिन इन का तो है। ...... .
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होली ने डरते डरते दामन झटक दिया और अपने देवर को आवाज़ें देने लगी।
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हिरामन के मन में कोई अजानी रागिनी बज उठी। सारी देह सिरसिरा रही है।
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महादेव के अंतर्नेत्रों के सामने अब एक दूसरा जगत् था, चिंताओं और कल्पना से परिपूर्ण। यद्यपि अभी कोष के हाथ से निकल जाने का भय था, पर अभिलाषाओं ने अपना काम शुरू कर दिया।
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इस के इलावा माशा अल्लाह ज़मीनें हैं वहां की आमदन अलग है अनाज की कोई दिक्कत नहीं मनों गंदुम घर में पड़ा रहता है
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पलनों और तसवीरों का थाने में क्या काम?
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जिस पर मुंशी करीम बख़्श ने कहा।
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प्रतिदिन पाठ के पश्चात् संध्या के अंधेरे और शून्यता में यदि असाधारण हर्ष और प्रसन्नता की लहरें तुम्हारे सिर पर बीती हों तो उनको स्मरण रखो, उपकार को स्मरण रखने से क्या लाभ?
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मेरे यहाँ उसके मनोरंजन की चीज न थी।
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रग्घू— रुपये-पैसे तेरे हाथ में देने लगूँ तो दुनिया क्या कहेगी, यह तो सोच।
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अभी जमिनका दे रहा है, लोग जमाने के लिए।' पलटदास ढोलक बजाना जानता है, इसलिए नगाड़े के ताल पर गरदन हिलाता है और दियासलाई पर ताल काटता है।
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