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मोर के पंजों से दवा बनती है, सो ऐसे हो लोग खरीदने आये थे।
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एक दूसरे के मुँह में लुक़्मे डालते जाते हैं और हंसते जाते हैं।
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जब वो कोई अच्छी जगह देखे तो ताली पीटने लगता है।
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पद्मा अपराजिता बड़ी-बड़ी आँखों की उत्सुकता से प्रतीक्षा में थी, जब से छत से उसने देखा था।
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अर्जुन को नई और इतनी बड़ी उम्र में उतने छोटे से काका को श्रद्धा देते हुए प्रकृति के विरुद्ध दबना पड़ता था।
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“मुझे तो भावज का रिश्ता ही पसंद है।
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आ गए हिरामन! अच्छी बात, इधर आओ। ... यह लो अपना भाड़ा और यह लो अपनी दच्छिना! पच्चीस-पच्चीस, पचास।' हिरामन को लगा, किसी ने आसमान से धकेल कर धरती पर गिरा दिया।
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चाँद,ग्रहण के ज़ुमरे में आने वाला ही था, होली ने बच्चों को बड़े काइस्थ के पास छोड़ा।
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मैं उस की घोड़ी गाऊँगी।
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क्या कर दिया?
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अब माया ने अपने भाई के लिए सैर के क़रीब मक्खन तय्यार कर लिया।
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श्रीकंठ—जी नहीं, उसकी क्रूरता और अविवेक के कारण।
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अतएव मैं समझा, मेरे भाग्य में पंचशर का प्रजापति से कोई विरोध नहीं है।
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उस ने दाहने हाथ से नंदू की बहू....
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हामिद के पैरो में तो जैसे पर लग गए हैं।
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उस दिन एक अतिथि को स्टेशन पहुँचाकर लौट रही थी कि चिड़ियों और खरगोशों की दूकान का ध्यान आ गया और मैंने ड्राइवर को उसी ओर चलने का आदेश दिया।
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पाकिस्तान में उस समय सरकार का बहुत रोब था।
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फिर तुरत ही आ गई…शुक्र है!
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वहॉँ इतना घी नित्य नाई-कहार खा जाते हैं।
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आसामी बा-माल…’’ राजेन्द्रनगर चौराहे पर ‘मैगजिन कॉर्नर ’ की आखि़री सीढ़ियों पर पत्र-पत्रिकाएं पूर्ववत् बिछी हुई थीं।
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किन्तु कल एक कप कॉफ़ी नहीं पी सका।
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राधा अब प्रतीक्षा में ही दुकेली है।
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पन्ना— जब जी चाहेगा, खायेंगे।
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नसीमा ने उस के हाथ में किताब देखी तो पूछा “ये नावsल कैसा है? ”
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सामने बैठी छाया को छूकर बोला, ‘‘बड़ी बहुरिया ?’’ ‘‘हरगोबिन भाई, अब जी कैसा है?
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लेकिन मान सिंह का दिल करता था कि लोगों से खड़े होके बात करे।
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मेरी अंतरात्मा ने मुझे काटा।
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वह बोला, “वह आजकल अमृतसर में रहता है।
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अहीर युवती ने जब इस डकैत वर की मरम्मत कर कुण्डी खोली, तब पंच बेचारे समस्या में पड़ गये।
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अपने होश में उन्होंने कभी उसे घुड़का तक न था।
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गोया वो बद-ज़ेब, फ़राग़ नथुनों वाली मटीली मय्या अपनी बहू हमीदा बानो के पेट से किसी अकबर-ए-आज़म की मुतवक़्क़े है।
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इसलिए हलवाई एक दफ़ा उसे बचपन में एक डाक्टर के पास ले गया था।
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“ अभी लीजिए! ” और वह केतली में पानी डालने लगा।
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नहीं रक्खा, याद आया, भूल गई थी मय्या ”.... “तो बैठी कर क्या रही है, नबाब जादी?”
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चौबीसों घंटे गुलामी बजानी पड़ती है, तब कहीं तीन सौ रुपल्ली मिलते हैं।
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हिरामन हड़बड़ा कर उठा।
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" देवयानी-" परंतु क्या तुम कह सकते हो कि तुम्हारे नेत्रों ने पुस्तकों के अतिरिक्त और किसी वस्तु पर दृष्टि नहीं डाली?
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क्या यहॉँ मामूली पंखा भी न हो! कानून की गर्मी दिमाग पर चढ़ जाएगी कि नहीं?
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वह मेरा मुँह नहीं देखना चाहते;
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जो हो, हरीश की सरस रचना में गुण था मामा का मन नरम पड़ गया।
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पाँच सौ रुपये। ज़रूर। बी.डी. इसरानी ने इतमीनान का सांस लिया।
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सिद्धू हलवाई पहले तो उसे देर तक गालियां देता रहा और उसकी हमाक़त पर उसे बेनुक़त सुनाता रहा और देर तक चन्द्रु सर झुकाए ख़ामोशी से सब कुछ सुनता रहा।
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पन्ना— बता दूँ, वह तू ही है!
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परन्तु अचानक एक दिन वह मेरे जालीघर के पास पहुँचते ही, अपने झूले से उतरकर नीचे आ गया और पंखों का सतरंगी मण्डलाकार छाता तानकर नृत्य की भंगिमा में खड़ा हो गया।
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साहब ने कहा-" बेटा! तुम डरो मत, आओ, मेरे पास आओ।" अवगुण्ठन के भीतर अश्रुओं से झरना बहाते और पोंछते हुए अनाथ की दीदी ने कहा-" मेरा राजा भैया है न, जा, जा, साहब के पास जा-तेरी दीदी तुझसे फिर मिलेगी, अच्छा।" इतना कहकर उसने नीलमणि को उठा छाती से लगा लिया, और माथे पर, पीठ पर हाथ फेरकर किसी प्रकार उसके पतले हाथों से अपनी धोती का छोर छुड़ाया और बड़ी तेजी से वहां से चल दी।
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एक दिन माँ ने कहा कि केठानी रायसाहब के बंगले पर गारा-मिट्टी का काम करता है।
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बड़े-बड़े घरों से मेरे विवाह के प्रस्ताव आए थे।
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जमींदार की लड़की, जिस तरह वहां की समस्‍त डालों के ऊपर अपने को समझती थी, उसके लिए भी समझी।
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तभी पड़ोसिन तारा ने कहा-" अरे! खसम के साथ लड़ना ही हो तो घर पर रहकर लड़ो न, जितना लड़ना हो।
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अस्तु! लोग मेरी बातों को तन्मय हो कर सुनते।
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गोया कह रहा हो, छी! तुम्हें कपड़ों की धुलाई पर क़नाअत ही नहीं, तभी तो हर एक की मैल निकालने का काम ईश्वर ने तुम्हारे सुपुर्द कर दिया है, और तुम भी जमादारनी की तरह जूतों में बैठने के लायक़ हो।
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पैंशन के पच्चास रुपय जेब में डाल कर वह बरामदा तय करता और चक़ लगे कमरे के पास जा कर अपनी आमद की इत्तिला कराता।
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पिता का उस पर अगाध प्रेम होने के कारण स्वभावत: ईर्ष्यालु और सम्पत्ति की रक्षा में सतर्क विमाता ने उनके मरणान्तक रोग का समाचार तब भेजा, जब वह मृत्यु की सूचना भी बन चुका था।
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‘‘मैं आज दस बजे की गाड़ी से ही जा रहा हूं। ’ ’
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ये नसीमा का लिखा हुआ था।
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पूरी ढकी देह के नीचे से झाँकते काले, मटमैले पैर जिनमें गिलट के झाँझ और लच्छे पड़े होते, अजीब अटपटे-से लगते थे।
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चार बच्चों, तीन मर्दों, दो औरतों, चार भैंसों पर मुश्तमिल बड़ा कुम्बा और अकेली होली ....
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इस नए उन्माद की तीव्रता के आगे पिछला जीवन उनको बिल्कुल ही सारहीन-सा दृष्टिगत होने लगा।
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उसका यह स्वभाव मेरे लिए ही नहीं, सब देखनेवालों के लिए आश्चर्य की घटना थी।
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बीच-बीच में ओजस्विता लाने के लिए चरस की पुट चलती रही।
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“कौन था वो?” लाजवंती ने निगाहें नीची करते हुए कहा — “जुम्माँ”— फिर वो अपनी निगाहें सुंदरलाल के चेहरे पर जमाए कुछ कहना चाहती थी लेकिन सुंदरलाल एक अजीब सी नज़रों से लाजवंती के चेहरे की तरफ़ देख रहा था और उस के बालों को सहला रहा था।
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वही सुंदरलाल को जानती थी, उस के सिवाए कोई न जानता था।
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कितनी मीठी थीं, वो पिछली बिहार की रस-भरी ख़ूबानीयाँ।
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दो बच्चीयां थीं, बड़ी प्यारी और मासूम।
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मालूम होता है कि आप भी उन्हीं में से हैं।
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इतना बड़ा शायर! अवस के फूल का लेखक !! और हमारी अकादमी का मेंबर नहीं है! उफ उफ कैसी गलती हो गई हमसे! कितना बड़ा शायर और कैसे गुमनामी के अंधेरे में दबा पड़ा है!
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अतएव सहसा वह गौरी का विरोध न कर सकी, बोली, पर तेरे बाबू जी तो बाहर गए हैं, उन्हें तो आ जाने दे।
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वो बैंक का डायरेक्टर भी है।
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मैंने कहा, ‘तुम पहुँचे हुए हो, यह मुझे कल ही मालूम हो गया था। ’
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उसी के बीच से होकर तो सड़क से निकलकर उनके गाँव की बस्ती के लिए रास्ता जाता है।
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एक गंदा-सा बिस्तर लपेटकर उनके सर के नीचे रखा हुआ था।
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ऐं? रुक गया है?
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तरह-तरह से मुँह बनाने का आनंद लेकर चिरंजीव ने फिर डाँटा, ‘बोलता है या लगाऊँ झापड़। नहा लूँगा, गरमी तो है। ’ मैंने सोचा, अब प्रकट होना चाहिए।
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अब गंभीर हो जाया करता हूँ—जैसे उम्र की बाढ़ के साथ अक्ल बढ़ती है! मैं मचिया पर बैठकर भजन सुनने लगा।
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पन्ना— तो तुम लोगों ने खाया क्या?
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कहां गए वे दिन?
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कुम्हारों के गधों से ज़्यादा बोझ उठा लेता।
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मेरे असली अभिभावक थे मेरे मामा।
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रानी दूसरी दासियों से यह समाचार पाकर हिरनी का विवाह कर देने की सोचनी लगीं।
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पहले तो उसने मेरा कोई ख़्याल नहीं किया।
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बस इतनी सी बात पर इस अन्यायी ने मुझ पर खड़ाऊँ फेंक मारी।
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किन्तु टोले के पास जब हम पहुंचे तो ढोलक और मंजीरा की आवाज़ सुनाई पड़ी।
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उन्होंने जयगोपाल बाबू को चौकी पर बैठाकर गांव के हालचाल पूछे।
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प्रार्थथा की करुण चितवन से बूटासिंह को देखती हुई हिरनी बोली-“कुछ देर के लिए छोड़ दो, मयना को दवा पिला दूँ। ”
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दिन में सौ-सौ बार पूछता है, भाभी बहुत रोती तो नहीं हैं?
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उसने पास जाकर उसे दूसरी ठोकर लगायी।
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मैंने उसे समझाते हुए कहा, “तुम्हारे पास खाने-पीने की चीज़ों की छपी हुई लिस्ट होगी, वह ले आओ। ” “ अभी लाता हूँ जी,” कहकर वह सामने की दीवार की तरफ़ चला गया और वहाँ से एक गत्ता उतार लाया।
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चाट बनाना नहीं आता है तो ठेला लेकर इधर क्यों आता है?
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मुझसे भीतर-बाहर का सारा काम नहीं होता, मैं आज बुलाये लेती हूँ।
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लोग समझते होंगे कि बाप तो मरगया।
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दूसरे हाथ में बालटी-भर पानी।
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मुझसे मिलनेवालों में वह प्राय: सबको पहचानता था।
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इस पर पारो फ़ौरन उसे टोक देती," अबे अपना हाथ पीछे रख. ..नहीं तो मारूंगी चप्पल।" इस पर चन्द्रु घबरा जाता।
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“आप यहीं रहते हैं ?”
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बेनीमाधव सिंह पुराने आदमी थे।
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..कहाँ होगा वह इस समय?
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...हाँ, पहले गुरूकसम खानी होगी
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भोला को मरे एक महीना गुजर चुका था।
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“नहीं, ” मैंने कहा। “चौदह आने का किल्टा दूँगी, कोयला देख लो,” कहते हुए उसने अपनी चादर की तह में से एक कोयला निकालकर मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
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रात-दिन सिवा विवाह के उन्हें और कुछ सूझता नहीं।
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